शकुन्तलोपाख्यान : सत्य और धर्म की रक्षा हेतु पिता को पुत्र को कैसे स्वीकार करना चाहिए?
सत्य और पितृत्व का धर्म
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 68–74 · पृष्ठ 496–564
8,138 शब्द · 41 मिनटका पाठ · 40 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
भरतवंश की उत्पत्ति और शकुन्तला के प्रसङ्ग को जानने की जिज्ञासा हेतु
जनमेजय बोले — "ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे देवता, दानव, राक्षस, गन्धर्व तथा अप्सराओंके अंशावतरणका वर्णन अच्छी तरह सुन लिया।"
त्वत्तः श्रुतमिदं ब्रह्मन् देवदानवरक्षसाम् ।
अंशावतरणं सम्यग् गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥
जनमेजय बोले — ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे देवता, दानव, राक्षस, गन्धर्व तथा अप्सराओंके अंशावतरणका वर्णन अच्छी तरह सुन लिया ।
वैशम्पायनजी ने कहा— "भरतवंशशिरोमणे! पूरुवंशका विस्तार करनेवाले एक राजा हो गये हैं, जिनका नाम था दुष्यन्त। वे महान् पराक्रमी तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समूची पृथ्वीके पालक थे। राजा दुष्यन्त पृथ्वीके चारों भागोंका तथा समुद्रसे आवृत सम्पूर्ण देशोंका भी पूर्णरूपसे पालन करते थे। उन्होंने अनेक युद्धमें विजय पायी थी। रत्नाकर समुद्रतक फैले हुए, चारों वर्णके लोगोंसे भरे-पूरे तथा म्लेच्छ देशकी सीमासे मिले-जुले सम्पूर्ण भूभागोंका वे शत्रुमर्दन नरेश अकेले ही शासन तथा संरक्षण करते थे।
पौरवाणां वंशकरो दुष्यन्तो नाम वीर्यवान् ।
पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता भरतसत्तम ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भरतवंशशिरोमणे! पूरुवंशका विस्तार करनेवाले एक राजा हो गये हैं, जिनका नाम था दुष्यन्त। वे महान् पराक्रमी तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समूची पृथ्वीके पालक थे ।
उस राजाके शासनकालमें कोई मनुष्य वर्णसङ्कर सन्तान उत्पन्न नहीं करता था; पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अनाज पैदा करती थी और सारी भूमि ही रत्नोंकी खान बनी हुई थी, इसलिये कोई भी खेती करने या रत्नोंकी खानका पता लगानेकी चेष्टा नहीं करता था। पाप करनेवाला तो उस राज्यमें कोई था ही नहीं। नरश्रेष्ठ! सभी लोग धर्ममें अनुराग रखते और उसीका सेवन करते थे। अतः धर्म और अर्थ दोनों ही उन्हें स्वतः प्राप्त हो जाते थे। तात! राजा दुष्यन्त जब इस देशके शासक थे, उस समय कहीं चोरोंका भय नहीं था। भूखका भय तो नाममात्रको भी नहीं था। इस देशपर दुष्यन्तके शासनकालमें रोग-व्याधिका डर तो बिलकुल ही नहीं रह गया था।
धर्मे रतिं सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे ।
तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥
नासीच्चौरभयं तात न क्षुधाभयमण्वपि ।
नासीद् व्याधिभयं चापि तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥
नरश्रेष्ठ! सभी लोग धर्ममें अनुराग रखते और उसीका सेवन करते थे । अतः धर्म और अर्थ दोनों ही उन्हें स्वतः प्राप्त हो जाते थे । तात! राजा दुष्यन्त जब इस देशके शासक थे, उस समय कहीं चोरोंका भय नहीं था । भूखका भय तो नाममात्रको भी नहीं था । इस देशपर दुष्यन्तके शासनकालमें रोग- व्याधिका डर तो बिलकुल ही नहीं रह गया था ।
सब वर्णके लोग अपने-अपने धर्मके पालनमें रत रहते थे। देवाराधन आदि कर्मोंको निष्कामभावसे ही करते थे। राजा दुष्यन्तका आश्रय लेकर समस्त प्रजा निर्भय हो गयी थी। मेघ समयपर पानी बरसाता और अनाज रसयुक्त होते थे। पृथ्वी सब प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न तथा पशु-धनसे परिपूर्ण थी। ब्राह्मण अपने वर्णाश्रमोचित कर्ममें तत्पर थे। उनमें झूठ एवं छल-कपट आदिका अभाव था।
चतुर्भागं भुवः कृत्स्नं यो भुङ्क्ते मनुजेश्वरः ।
समुद्रावरणांश्चापि देशान् स समितिंजयः ॥
आम्लेच्छावधिकान् सर्वान् स भुङ्क्ते रिपुमर्दनः ।
रत्नाकरसमुद्रान्तांश्चातुर्वर्ण्यजनावृतान् ॥
राजा दुष्यन्त पृथ्वीके चारों भागोंका तथा समुद्रसे आवृत सम्पूर्ण देशोंका भी पूर्णरूपसे पालन करते थे । उन्होंने अनेक युद्धोंमें विजय पायी थी । रत्नाकर समुद्रतक फैले हुए, चारों वर्णके लोगोंसे भरे- पूरे तथा म्लेच्छ देशकी सीमासे मिले - जुले सम्पूर्ण भूभागोंका वे शत्रुमर्दन नरेश अकेले ही शासन तथा संरक्षण करते थे ।
राजा दुष्यन्त स्वयं भी नवयुवक थे। उनका शरीर वज्रके सदृश दृढ था। वे अद्भुत एवं महान् पराक्रमसे सम्पन्न थे। वे अपने दोनों हाथोंद्वारा उपवनों और काननोंसहित मन्दराचलको उठाकर ले जानेकी शक्ति रखते थे। गदायुद्धके प्रक्षेप, विक्षेप, परिक्षेप, और अभिक्षेप — इन चारों प्रकारमें कुशल तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रकी विद्यामें अत्यन्त निपुण थे। घोड़े और हाथीकी पीठपर बैठनेकी कलामें वे अत्यन्त प्रवीण थे। बलमें भगवान् विष्णुके समान और तेजमें भगवान् सूर्यके सदृश थे। वे समुद्रके समान अक्षोभ्य और पृथ्वीके समान सहनशील थे। महाराज दुष्यन्तका सर्वत्र सम्मान था। उनके नगर तथा राष्ट्रके लोग सदा प्रसन्न रहते थे। वे अत्यन्त धर्मयुक्त भावनासे सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन करते थे।"
स्वधर्मे रेमिरे वर्णा दैवे कर्मणि निःस्पृहाः ।
तमाश्रित्य महीपालमासंश्चैवाकुतोभयाः ॥
सब वर्णोंके लोग अपने- अपने धर्मके पालनमें रत रहते थे । देवाराधन आदि कर्मोंको निष्कामभावसे ही करते थे । राजा दुष्यन्तका आश्रय लेकर समस्त प्रजा निर्भय हो गयी थी ।
जनमेजय बोले— "ब्रह्मन्! मैं परम बुद्धिमान् भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथा शकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसङ्गको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्वं मतिमतां वर। भगवन्! वीरवर दुष्यन्तने शकुन्तलाको कैसे प्राप्त किया? मैं पुरुषसिंह दुष्यन्तके उस चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। तत्त्वज्ञ मुने! आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। अतः ये सब बातें बताइये।"
सम्भवं भरतस्याहं चरितं च महामतेः ।
शकुन्तलायाश्चोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
जनमेजय बोले- ब्रह्मन्! मैं परम बुद्धिमान् भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथा शकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसंगको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।
वैशम्पायनजी ने कहा— "एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरङ्गिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले। जब राजाने यात्रा की, उस समय खड्ग, शक्ति, गदा, मुसल, प्रास और तोमर हाथमें लिये सैकड़ों योद्धा उन्हें घेरे हुए थे।
अक्षोभ्यत्वेऽर्णवसमः सहिष्णुत्वे धरासमः ।
सम्मतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान् ॥
भूयो धर्मपरैर्भावैर्मुदितं जनमादिशत् ॥
वे समुद्रके समान अक्षोभ्य और पृथ्वीके समान सहनशील थे । महाराज दुष्यन्तका सर्वत्र सम्मान था । उनके नगर तथा राष्ट्रके लोग सदा प्रसन्न रहते थे । वे अत्यन्त धर्मयुक्त भावनासे सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन करते थे ।
महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शङ्ख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारणकरनेवाले योद्धाओंद्वारा कीकी गयी गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाशकरनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेले लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी। वहाँ देखती हुई स्त्रियोंने उन्हें वज्रपाणि इन्द्रके समान समझा और आपसमें वे इस प्रकार बातें करने लगीं— 'सखियो! देखो तो सही, ये ही वे पुरुषसिंह महाराज दुष्यन्त हैं, जो सङ्ग्रामभूमिमें वसुओंके समान पराक्रम दिखाते हैं, जिनके बाहुबलमें पड़कर शत्रुओंका अस्तित्व मिट जाता है।'
इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ताः स्त्रियः प्रेम्णा नराधिपम् ॥
तुष्टुवुः पुष्पवृष्टीश्च ससृजुस्तस्य मूर्धनि ।
तत्र तत्र च विप्रेन्द्रैः स्तूयमानः समन्ततः ॥
ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं । यत्र - तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति- प्रशंसा करते थे ।
ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करतीं। वहाँ खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति-प्रशंसा करते थे। इस प्रकार महाराज दुष्यन्त वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेले लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे। नगर और जनपदके लोग बहुत दूरतक उनके पीछे-पीछे गये। फिर महाराजकी आज्ञा होनेपर लौट आये।
प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया नृपशोभया ॥
ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम् ।
शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ॥
महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े - बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति- भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था । महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं । वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे । शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी ।
उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्राकरनेवाले नरेशने घरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान् दुष्यन्तने एक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव वृक्षोंसे भरपूर था। पर्वतकी चोटीसे गिरे हुए बहुत-से शिला-खण्ड वहाँ इधर-उधर पड़े थे। ऊँची-नीची भूमिके कारण वह वन बड़ा दुर्गम जान पड़ता था। अनेक योजनतक फैले हुए उस वनमें कहीं जल या मनुष्यका पता नहीं चलता था। वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयङ्को जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था।
निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया ।
तं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधूर्गतम् ॥
द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे ।
ददृशुर्वर्धमानास्ते आशीर्भिश्च जयेन च ॥
इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले । वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे । मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे - पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोंके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे ।
नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस विशाल वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याघ्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया।
न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह ॥
नगर और जनपदके लोग बहुत दूरतक उनके पीछे - पीछे गये । फिर महाराजकी आज्ञा होनेपर लौट आये ।
वहाँ हुए पशु सब ओर विचरने लगे। अद्भुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुण्ड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितनोंके यूथ इधर-उधर आर्तनाद कर रहे थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न होकर, दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर होकर बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े।
चचार स विनिघ्नन् वै स्वैरचारान् वनद्विपान् ।
राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधैश्च समरप्रियैः ॥
लोड्यमानं महारण्यं तत्यजुः स्म मृगाधिपाः ।
तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च ॥
मृगयूथान्यथौत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्ततः ।
शुष्काश्चापि नदीर्गत्वा जलनैराश्यकर्शिताः ॥
व्यायामक्लान्तहृदयाः पतन्ति स्म विचेतसः ।
क्षुत्पिपासापरीताश्च श्रान्ताश्च पतिता भुवि ॥
हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे । अद्भुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध - प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना- कोना छान डाला । अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये । पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर- उधर आर्तनाद करते थे । वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे । भूख, प्यास और थकावटसे चूर -चूर हो बहुत - से पशु धरतीपर गिर पड़े ।
वहाँ कितने ही व्याघ्र-स्वभावके नृशंस जङ्गली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खानेले लिये लगे। उस वनमें कितने ही बलवान् और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे। बड़े-बड़े जङ्गली हाथियोंने भी वहाँ भागते समय बहुत से मनुष्योंको कुचल डाला। वहाँ बाणरूपी जलकी धारा बरसानेवाले सैन्यरूपी बादलोंने उस वनरूपी व्योमको सब ओरसे घेर लिया था। महाराज दुष्यन्तने जहाँके सिंहोंको मार डाला था, वह हिंसक पशुओंसे भरा हुआ वन बड़ी शोभा पा रहा था।"
ततो मृगसहस्राणि हत्वा सबलवाहनः ।
राजा मृगप्रसङ्गेन वनमन्यद् विवेश ह ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर सेना और सवारियोंके साथ राजा दुष्यन्तने सहस्रों हिंसक पशुओंका वध करके एक हिंसक पशुका ही पीछा करते हुए दूसरे वनमें प्रवेश किया ।
राजा दुष्यन्त उस वन में घूम रहे थे, जहाँ सब ओर बड़ी-बड़ी शाखाओं वाले विशाल वृक्ष अपनी सुखद और शीतल छाया फैलाए हुए थे। उन वृक्षों के नीचे अनेक भ्रमर मँडरा रहे थे। वह वन ऐसा था जहाँ एक भी वृक्ष ऐसा नहीं था जिसमें फूल या फल न लगे हों, और वहाँ का दृश्य इतना मनोहारी था कि काँटेदार वृक्ष ढूँढ़ने पर भी सुलभ नहीं मिलते थे। अनेकों पक्षी वहाँ चहक रहे थे और भाँति-भाँति के पुष्प उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। सभी ऋतुओं में फूल देने वाले वे छायादार वृक्ष चारों ओर फैले हुए थे। महान धनुर्धर राजा दुष्यन्त ने जब उस मन को मोह लेने वाले उत्तम वन में प्रवेश किया, तो फूलों से भरी डालियों वाले वृक्ष वायु के झकोरों से हिलकर उन पर बार-बार अद्भुत पुष्पों की वर्षा करने लगे। वे वृक्ष इतने ऊँचे थे मानो आकाश को छू लेंगे। उन पर बैठे मीठी बोली बोलने वाले पक्षियों के मधुर शब्द वहाँ गूँज रहे थे।
उस वन में वृक्ष पुष्परूपी विचित्र वस्त्र धारण किए हुए प्रतीत हो रहे थे और फूलों के भार से झुके हुए अपने कोमल पल्लवों पर मधुलोभी भ्रमर गुञ्जार कर रहे थे। राजा दुष्यन्त ने वहाँ ऐसे रमणीय प्रदेश देखे जो फूलों के ढेर से सुशोभित और लता-मण्डपों से अलङ्कृत थे। उन मनोहर दृश्यों को देखकर महातेजस्वी राजा को बड़ा हर्ष हुआ। वहाँ फूल लदे हुए वृक्ष एक-दूसरे से अपनी डालियों को सटाकर मानो गले मिल रहे थे; वे गगनचुम्बी वृक्ष इन्द्र की ध्वजा के समान जान पड़ते थे। उस वन में सिद्ध, चारण, गन्धर्व और अप्सराओं के समूह भी निवास करते थे और वहाँ मतवाले वानर भी रहते थे। शीतल और सुगन्धित मन्द वायु फूलों का पराग वहन करती हुई मानो रमण की इच्छा से बार-बार वृक्षों के समीप आती थी।
रुवन्ति रावान् मधुरान् षट्पदा मधुलिप्सवः ।
तत्र प्रदेशांश्च बहून् कुसुमोत्करमण्डितान् ॥
लतागृहपरिक्षिप्तान् मनसः प्रीतिवर्धनान् ।
सम्पश्यन् सुमहातेजा बभूव मुदितस्तदा ॥
उस वनमें पुष्परूपी विचित्र वस्त्र धारण करनेवाले वृक्ष अद्भुत शोभा पा रहे थे । फूलोंके भारसे झुके हुए उनके कोमल पल्लवोंपर बैठे हुए मधुलोभी भ्रमर मधुर गुंजार कर रहे थे । राजा दुष्यन्तने वहाँ बहुत से ऐसे रमणीय प्रदेश देखे जो फूलोंके ढेरसे सुशोभित तथा लतामण्डपोंसे अलंकृत थे । मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले उन मनोहर प्रदेशोंका अवलोकन करके उस समय महातेजस्वी राजाको बड़ा हर्ष हुआ ।
वह वन मालिनी नदी के कछार में फैला हुआ था और ऊँची ध्वजाओं के समान ऊँचे वृक्षों के कारण अत्यन्त मनोहर लग रहा था। राजा ने उस उत्तम गुणों से युक्त वन का भली-भाँति अवलोकन किया। देखते ही देखते उनकी दृष्टि एक उत्तम आश्रम पर पड़ी, जो अत्यन्त रमणीय और मनोरम था। नाना प्रकार के वृक्षों से भरे उस वन में स्थान-स्थान पर अग्निहोत्र की आग प्रज्वलित हो रही थी। उस अनुपम आश्रम की शोभा देखकर श्रीमान् दुष्यन्त ने मन ही मन उसका बड़ा सम्मान किया। वहाँ अनेक त्यागी-विरागी यति, बालखिल्य ऋषि और अन्य मुनिगण निवास कर रहे थे। अनेक अग्निहोत्र-गृह उस आश्रम की शोभा बढ़ा रहे थे और वहाँ इतने फूल झड़कर गिे थे कि वे बिछौने बन गए थे। बड़े-बड़े तूनके के वृक्षों से आश्रम की शोभा बढ़ गई थी।
उस आश्रम के बीच में पुण्यसलिला मालिनी नदी बहती थी, जिसका जल बड़ा ही सुखद और स्वादिष्ट था। उसके दोनों तटों पर वह आश्रम फैला हुआ था। मालिनी में अनेक प्रकार के जलपक्षी निवास करते थे और तपोवन के कारण उसकी मनोहरता और बढ़ गई थी। वहाँ विषधर सर्प और हिंसक वनजन्तु भी सौम्य भाव से रहते थे। यह सब देखकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। राजा दुष्यन्त, जो अप्रतिरथ वीर थे और जिनकी समानता भूमण्डल में दूसरा कोई रथी योद्धा नहीं था, उस आश्रम के समीप जा पहुँचे जो देवताओं के लोक के समान प्रतीत होता था। उन्होंने मालिनी नदी की ओर दृष्टिपात किया, जो समस्त प्राणियों की जननी सी विराज रही थी। उसके तट पर चकवा-चकी पक्षी किलोल कर रहे थे और नदी के जल में अनेक फूल इस प्रकार बह रहे थे मानो फेन हो। वहाँ किन्नरों के निवास स्थान थे और वानर तथा रीछ भी उस नदी का सेवन करते थे। \ent_of_paragraph: 'महान् धनुर्धर राजा दुष्यन्तने...'
नदी के सुन्दर पुलिन मालिनी की शोभा बढ़ा रहे थे और वेद-शास्त्रों के पवित्र स्वाध्याय की ध्वनि से वह सारा प्रदेश गूँज रहा था। वहाँ मतवाले हाथी, सिंह और बड़े-बड़े सर्प भी मालिनी के तट पर आश्रय लेकर रहते थे। उसी तट पर कश्यप गोत्रीय महात्मा कण्व का वह उत्तम एवं रमणीय आश्रम था, जहाँ महर्षियों का समुदाय निवास करता था। उस मनोहर आश्रम और नदी को देखकर राजा ने उसमें प्रवेश करने का विचार किया। टापुओं से युक्त वह आश्रम गङ्गा नदी के समान शोभायमान लग रहा था।
चकाराभिप्रवेशाय मतिं स नृपतिस्तदा ॥
उस मनोहर आश्रम और आश्रमसे सटी हुई नदीको देखकर राजाने उस समय उसमें प्रवेश करनेका विचार किया ।
राजा दुष्यन्त ने कुबेर के चैत्ररथ वन के समान मनोहर इस महान वन में प्रवेश किया, जहाँ मतवाले मयूर अपनी केका ध्वनि फैला रहे थे। वहाँ पहुँचकर नरेश ने अपने रथ, घोड़े, हाथी और सैनिकों से भरी चतुरङ्गिणी सेना को तपोवन के किनारे ठहरा दिया और अपने सेनापति से कहा— 'सेनापति! और सैनिकों! मैं रजोगुणरहित तपस्वी महर्षि कश्यपनन्दन कण्वका दर्शन करने के लिये उनके आश्रम में जाऊँगा। जब तक मैं वहाँ से लौट न आऊँ, तब तक तुम लोग यहीं ठहरो।'
इस प्रकार आदेश देकर राजा ने तपोवन में भूख-प्यास को भुला दिया और उन्हें वहाँ बड़ा आनन्द मिला। उन्होंने अपना मुकुट और राजचिह्न हटाकर साधारण वेश-भूषा धारण की और अपने मन्त्रियों एवं पुरोहितों के साथ आश्रम के भीतर गए। वहाँ का दृश्य किसी दूसरे ब्रह्मलोक के समान था। नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे और भ्रमरों के गुञ्जन से सारा आश्रम गूँज रहा था। श्रेष्ठ ऋग्वेदी ब्राह्मण पद और क्रमपूर्वक ऋचाओं का पाठ कर रहे थे। राजा दुष्यन्त ने यज्ञ सम्बन्धी विभिन्न वैदिक ऋचाओं को सुना। वहाँ यजुर्वेदी विद्वान भी आश्रम की शोभा बढ़ा रहे थे। नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले सामवेदी महर्षियों द्वारा मधुर स्वर में सामवेद का गान किया जा रहा था। अथर्ववेदी महर्षि भी मन्त्रों का उच्चारण कर रहे थे, जिससे आश्रम की शोभा बढ़ रही थी।
यज्ञविद्याङ्गविद्भिश्च यजुर्विद्भिश्च शोभितम् ।
मधुरैः सामगीतैश्च ऋषिभिर्नियतव्रतैः ॥
भारुण्डसामगीताभिरथर्वशिरसोद्गतैः ।
यतात्मभिः सुनियतैः शुशुभे स तदाश्रमः ॥
यज्ञविद्या और उसके अंगोंकी जानकारी रखनेवाले यजुर्वेदी विद्वान् भी आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे । नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले सामवेदी महर्षियोंद्वारा वहाँ मधुरस्वरसे सामवेदका गान किया जा रहा था । मनको संयममें रखकर नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सामवेदी और अथर्ववेदी महर्षि भारुण्डसंज्ञक साममन्त्रोंके गीत गाते और अथर्ववेदके मन्त्रोंका उच्चारण करते थे; जिससे उस आश्रमकी बड़ी शोभा होती थी ।
वहाँ के द्विजाओं ने शब्द-संस्कार से सम्पन्न होकर संस्कृत वाक्यों का उच्चारण किया। वे विद्वान जो पशु-पक्षियों की बोली समझने वाले और व्यास-ग्रन्थ के ज्ञाता थे, उनके द्वारा किए जा रहे शब्दोच्चारण से वह आश्रम द्वितीय ब्रह्मलोक के समान सुशोभित हो रहा था। राजा दुष्यन्त ने देखा कि वहाँ अनेक विद्वान ब्राह्मण जप और होम में लगे हुए हैं। वहाँ अत्यन्त सुन्दर और विचित्र आसन देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। द्विजों द्वारा की गई देवालयों की पूजा-पद्धति देखकर उन्होंने सोचा कि जैसे मैं ब्रह्मलोक में आ पहुँचा हूँ। वह आश्रम महर्षि कण्व की तपस्या से सुरक्षित और अत्यन्त मङ्गलमय था।
तथापि, वैशम्पायन कहते हैं— राजन्! तदनन्तर महाबाहु राजा दुष्यन्त अपने मन्त्रियों को बाहर छोड़कर अकेले ही उस आश्रम में गए, किन्तु वहाँ उन्हें कोई कठोर व्रत वाले महर्षि दिखाई नहीं दिए। आश्रम को सूना पाकर राजा ने सम्पूर्ण वन को प्रतिध्वनित करते हुए पूछा— 'यहाँ कौन है?'
तभी एक सुन्दरी कन्या, जो उत्तम शील और सदाचार से सम्पन्न थी, ने राजा के आते ही मधुर वाणी में कहा— 'अतिथिदेव! आपका स्वागत है।' उसने राजा का आतिथ्य किया, आसन और पाद्य अर्पित किया और फिर पूछा— 'आपका शरीर नीरोग है न? घर पर कुशल तो है? कहिये, आपकी क्या सेवा की जाय? आपके आश्रम की ओर पधारने का क्या कारण है? आप यहाँ कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहते हैं? आपका परिचय क्या है? आप कौन हैं और आज यहाँ महर्षि के इस शुभ आश्रम पर किस उद्देश्य से आए हैं?'
राजा दुष्यन्त ने उस सर्वाङ्गसुन्दरी और मधुरभाषिणी कन्या की ओर देखकर कहा— 'कमललोचने! मैं राजर्षि इलिल का पुत्र हूँ और मेरा नाम दुष्यन्त है। मैं परम भाग्यशाली महर्षि कण्व की उपासना करने और उनके सत्सङ्ग का लाभ लेने आया हूँ। बताओ, भगवान कण्व कहाँ गए हैं?'
(दुष्यन्त उवाच राजर्षेरस्मि पुत्रोऽहमिलिलस्य महात्मनः ।
दुष्यन्त इति मे नाम सत्यं पुष्करलोचने ॥ ) आगतोऽहं महाभागमृषिं कण्वमुपासितुम् ।
क्व गतो भगवान् भद्रे तन्ममाचक्ष्व शोभने ॥
दुष्यन्त बोले- कमललोचने! मैं राजर्षि महात्मा इलिल- का पुत्र हूँ और मेरा नाम दुष्यन्त है । मैं यह सत्य कहता हूँ । भद्रे! मैं परम भाग्यशाली महर्षि कण्वकी उपासना करने -उनके सत्संगका लाभ लेनेके लिये आया हूँ । शोभने! बताओ तो, भगवान् कण्व कहाँ गये हैं?
शकुन्तला ने उत्तर दिया— 'अभ्यागत! मेरे पूज्य पिताजी फल लाने के लिये आश्रम से बाहर गये हैं। अतः दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये, लौटने पर उनसे मिल लीजियेगा।'
राजा दुष्यन्त ने देखा कि महर्षि कण्व आश्रम में नहीं हैं और यह तपस्विनी कन्या उन्हें ठहरने के लिये कह रही है। राजा की दृष्टि इस बात पर भी गई कि यह कन्या अपूर्व शोभा से सम्पन्न है; इसका शरीर सौंदर्य की प्रभा से प्रकाशित हो रहा है और तपस्या तथा इन्द्रियों के संयम ने इसमें अद्भुत तेज भर दिया है। यह नयी जवानी से उद्भासित हो रही है। यह सब सोचकर राजा ने पूछा— 'मनोहर कटिप्रदेश से सुशोभित सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और किस लिये इस वन में आयी हो? तुम्हारे भीतर ऐसे अद्भुत रूप और गुणों का विकास कैसे हुआ है? हे शुभे! तुमने दर्शन मात्र से मेरे मन को हर लिया है। कल्याणि! मैं तुम्हारा परिचय जानना चाहता हूँ, अतः मुझे सब कुछ ठीक-ठीक बताओ।'
दर्शनादेव हि शुभे त्वया मेऽपहृतं मनः ।
इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं तन्ममाचक्ष्व शोभने ॥
' शुभे! तुमने दर्शनमात्रसे मेरे मनको हर लिया है । कल्याणि! मैं तुम्हारा परिचय जानना चाहता हूँ, अतः मुझे सब कुछ ठीक -ठीक बताओ ।
'मैं तुम्हारा परिचय जानना चाहता हूँ, अतः मुझे सब कुछ ठीक-ठीक बताओ।'
उस आश्रम में राजा के इस प्रश्न पर शकुन्तला मुस्कुरा उठी और मिठास भरे वचनों में बोली— 'महाराज दुष्यन्त! मैं तपस्वी, धृतिमान्, धर्मज्ञ तथा महात्मा भगवान् कण्व की पुत्री मानी जाती हूँ।'
राजा दुष्यन्त ने आश्चर्य से उसे देखा और बोले— 'महाभागे! विश्ववन्द्य कण्व तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। वे बड़े कठोर व्रत का पालन करते हैं। साक्षात् धर्मराज भी अपने सदाचार से विचलित हो सकते हैं, परन्तु महर्षि कण्व नहीं! ऐसी दशा में तुम जैसी सुन्दरी देवी उनकी पुत्री कैसे हो सकती हो? इस विषय में मुझे बड़ा भारी सन्देह हो रहा है। मेरे इस सन्देह का निवारण तुम्हीं कर सकती हो।'
कथं त्वं तस्य दुहिता सम्भूता वरवर्णिनी ।
संशयो मे महानत्र तन्मे छेत्तुमिहार्हसि ॥
ऐसी दशामें तुम जैसी सुन्दरी देवी उनकी पुत्री कैसे हो सकती है? इस विषयमें मुझे बड़ा भारी संदेह हो रहा है । मेरे इस संदेहका निवारण तुम्हीं कर सकती हो ।
शकुन्तला ने शान्त भाव से कहा— 'राजन्! ये सब बातें मुझे जिस प्रकार ज्ञात हुई हैं, मेरा यह जन्म आदि पूर्वकाल में जिस प्रकार हुआ है और मैं जिस प्रकार कण्व मुनि की पुत्री हूँ, वह सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता रही हूँ; सुनिये।'
उसने बताना आरम्भ किया कि जिसका स्वरूप तो अन्य प्रकार का है, किन्तु जो सत्पुरुषों के सामने अपने को धर्मात्मा कहता है, वह वास्तव में मूर्ख, पाप से आवृत, चोर और आत्मवञ्चक होता है। शकुन्तला ने कहा— 'पृथ्वीपते! एक दिन किसी ऋषिने यहाँ आकर मेरे जन्म के सम्बन्ध में मुनि से पूछा था— "कश्यपनन्दन! आप तो ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हैं, फिर यह शकुन्तला कहाँ से आयी? आपसे पुत्री का जन्म कैसे हुआ? यह मुझे सच-सच बताइये।" उस समय भगवान् कण्व ने उससे जो बात बताई, वही कहती हूँ, सुनिये।'
कण्व मुनि ने बताया था कि पूर्वकाल की बात है, महर्षि विश्वामित्र बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। उन्होंने देवताओं के स्वामी इन्द्र को अपनी तपस्या से अत्यन्त सन्ताप में डाल दिया था। इन्द्र को भय हो गया कि विश्वामित्र उनकी शक्ति से उन्हें उनके स्थान से भ्रष्ट कर देंगे। अतः उन्होंने मेनका से कहा— 'मेनके! अप्सराओं के जो दिव्य गुण हैं, वे तुममें सबसे अधिक हैं। कल्याणि! तुम मेरा भला करो और सुनो; वे सूर्य के समान तेजस्वी, महातपस्वी विश्वामित्र घोर तपस्या में संलग्न होकर मेरे मन को कम्पित कर रहे हैं। सुन्दरी मेनके! उन्हें तपस्या से विचलित करने का यह महान भार मैं तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ। तुम उनके पास जाकर उन्हें लुभाओ, उनकी तपस्या में विघ्न डाल दो।'
मेनका ने सङ्कोच करते हुए कहा— 'देवराज! भगवान् विश्वामित्र बड़े भारी तेजस्वी और महान तपस्वी हैं। वे क्रोधी भी बहुत हैं। जिन महात्मा के तेज, तप और क्रोध से आप स्वयं उद्विग्न हो उठते हैं, उनसे मैं कैसे नहीं डरूँगी? वे वे हैं जिन्होंने महर्षि वसिष्ठ को उनके पुत्रों से वियोग करा दिया; जिन्होंने तपस्या के बल से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया; जिन्होंने कौशिकी नदी का निर्माण किया; जिन्होंने राजर्षि मतङ्ग का भरण-पोषण किया और स्वयं उनका पुरोहित बनकर यज्ञ कराया; जिन्होंने त्रिशङ्कु को स्वर्ग तक पहुँचा दिया। ऐसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी महात्मा का मुझ जैसी नारी कैसे स्पर्श कर सकती है? प्रभु! जिससे वे कुपित होकर मुझे भस्म कर दें, ऐसे कार्य के लिए मुझे आज्ञा दीजिये।'
यमश्च सोमश्च महर्षयश्च साध्या विश्वे वालखिल्याश्च सर्वे ।
एतेऽपि यस्योद्विजन्ते प्रभावात् तस्मात् कस्मान्मादृशी नोद्विजेत ॥
यमराज, चन्द्रमा, महर्षिगण, साध्यगण, विश्वेदेव और सम्पूर्ण बालखिल्य ऋषि — ये भी जिनके प्रभावसे उद्विग्न रहते हैं, उन विश्वामित्र मुनिसे मेरी जैसी स्त्री कैसे नहीं डरेगी?
परन्तु इन्द्र के आदेश पर मेनका ने कहा— 'देव! पहले मेरी रक्षा का उपाय सोचिये। जब मैं वहाँ जाकर क्रीड़ा में निमग्न होऊँ, तब वायुदेव आवश्यकता समझकर मेरा वस्त्र उड़ा दें और कामदेव मेरे सहायक हों। जब मैं ऋषिको लुभाने लगूँ, तब वन से सुगन्धभरी वायु चलनी चाहिये।' 'तथास्तु' कहकर इन्द्र ने व्यवस्था कर दी और मेनका प्रस्थित हुई।
वन में पहुँचकर भीरु स्वभाव वाली सुन्दरी मेनकाने एक आश्रम में विश्वामित्र मुनि को तप करते देखा। वे तपस्या द्वारा अपने समस्त पाप दग्ध कर चुके थे। महर्षि को प्रणाम करके वह अप्सरा उनके समीपवर्ती स्थान में ही भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करने लगी। इतने में ही वायु ने मेनका का चन्द्रमा के समान उज्ज्वल वस्त्र उसके शरीर से हटा दिया। यह देख सुन्दरी मेनका लजाकर और मुस्कुराती हुई, उस वस्त्र को लेने की इच्छा से तुरन्त ही उस स्थान की ओर दौड़ी जहाँ वह गिरा था।
अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र के देखते-देखते यह घटना घटित हुई। वह अनिन्द्य सुन्दरी विषम परिस्थिति में पड़ गयी थी और घबराकर वस्त्र लेने की इच्छा कर रही थी। उसका रूप-सौन्दर्य अवर्णनीय था। उस सुन्दरी अप्सरा को मुनिवर विश्वामित्र ने वहाँ नग्न देख लिया। उसके रूप और गुणों को देखते ही विप्रवर विश्वामित्र काम के अधीन हो गये और सम्पर्क में आने के कारण मेनका में उनका अनुराग हो गया।
तस्या रूपगुणान् दृष्ट्वा स तु विप्रर्षभस्तदा ।
चकार भावं संसर्गात् तया कामवशं गतः ॥
उसके रूप और गुणोंको देखते ही विप्रवर विश्वामित्र कामके अधीन हो गये । सम्पर्कमें आनेके कारण मेनकामें उनका अनुराग हो गया ।
शकुन्तला ने आगे कहा— 'राजन्! महर्षि कण्व ने बताया था कि मेनका का काम पूरा हो चुका था; वह उस नवजात गर्भ को मालिनी के तट पर छोड़कर तुरन्त इन्द्र-लोक चली गयी। सिंह और व्याघ्रों से भरे हुए निर्जन वन में उस शिशु को सोते देख शकुन्तों (पक्षियों) ने उसे सब ओर से पाँखों द्वारा ढक लिया, जिससे गीध आदि जीव उसकी हिंसा न कर सकें।
जब मैं मालिनीतट पर गया, तो देखा कि यह रमणीय निर्जन वन में पक्षियों से घिरी हुई सो रही है। मुझे देखते ही वे सब मधुरभाषी पक्षी मेरे पैरों पर गिर गये। कण्व मुनि कहते हैं— "ब्रह्मन्! मैं समस्त प्राणियों की बोली समझता हूँ और दयाभाव रखता हूँ।" अतः उस कन्या को मैंने अपनी पुत्री के पद पर प्रतिष्ठित किया। जो गर्भ का निर्माण करे, जो प्राणों की रक्षा करे और जिसका अन्न भोजन किया जाता है— धर्मशास्त्र में ये तीनों पिता कहे गये हैं। चूंकि इसे शकुन्तों ने घेर रखा था, इसलिये मैंने इसका नाम 'शकुन्तला' रख दिया। इस प्रकार शकुन्तला मेरी बेटी हुई और वह मुझे अपना पिता मानती है।'
शरीरकृत् प्राणदाता यस्य चान्नानि भुञ्जते ।
क्रमेणैते त्रयोऽप्युक्ताः पितरो धर्मशासने ॥
जो गर्भाधानके द्वारा शरीरका निर्माण करता है, जो अभयदान देकर प्राणोंकी रक्षा करता है और जिसका अन्न भोजन किया जाता है, धर्मशास्त्रमें क्रमशः ये तीनों पुरुष पिता कहे गये हैं ।
शकुन्तला ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा— 'राजन्! उन महर्षि के पूछने पर पिता कण्व ने मुझे यह सम्पूर्ण वृत्तान्त बताया था। इस तरह आप मुझे कण्व की ही पुत्री समझिये। मैं अपने जन्मदाता पिता को तो नहीं जानती, कण्व को ही पिता मानती हूँ। महाराज! जो वृत्तान्त मैंने सुना था, वह सब आपको बता दिया।'
'कल्याणि! तुम जैसी बातें कह चुकी हो, उनसे भलीभाँति स्पष्ट हो गया कि तुम क्षत्रिय-कन्या हो।' राजा दुष्यन्त के स्वर में एक नया आत्मविश्वास और अधिकार था। उन्होंने शकुन्तला की ओर देखते हुए कहा, 'सुश्रोणि! मेरी पत्नी बन जाओ। बोलो, मैं तुम्हारी प्रसन्नता के लिये क्या करूँ? सोने के हार, सुन्दर वस्त्र, तपाये हुए सुवर्ण के दो कुण्डल, विभिन्न नगरों के बने हुए सुन्दर और चमकीले मणिरत्ननिर्मित आभूषण, स्वर्णपदक और कोमल मृगचर्म आदि वस्तुएँ तुम्हारे लिये मैं अभी लाये देता हूँ। शोभने! अधिक क्या कहूँ, मेरा सारा राज्य आज से तुम्हारा हो जाय, तुम मेरी महारानी बन जाओ। भिरु! सुन्दरि! गान्धर्व विवाह के द्वारा मुझे अङ्गीकार करो। रम्भोरु! विवाहों में गान्धर्व विवाह श्रेष्ठ कहलाता है।'
शकुन्तला ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, 'राजन्! मेरे पिता कण्व फल लाने के लिये इस आश्रम से बाहर गये हैं। दो घड़ी प्रतीक्षा कीजिये। वे ही मुझे आपकी सेवा में समर्पित करेंगे।'
दुष्यन्त ने उसे देखा और बोले, 'वरारोहे! तुम्हारा शील और स्वभाव प्रशंसा के योग्य है। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे स्वेच्छा से स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये ही यहाँ ठहरा हूँ। आत्मा ही अपना बन्धु है, आत्मा ही अपना आश्रय है, आत्मा ही अपना मित्र है और वही अपना पिता है; अतः तुम स्वयं ही धर्मपूर्वक आत्मसमर्पण करने योग्य हो।'
आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः ।
आत्मनो मित्रमात्मैव तथाऽऽत्मा चात्मनः पिता ।
आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः ॥
आत्मा ही अपना बन्धु है। आत्मा ही अपना आश्रय है । आत्मा ही अपना मित्र है और वही अपना पिता है, अतः तुम स्वयं ही धर्मपूर्वक आत्मसमर्पण करनेयोग्य हो ।
राजा ने विवाह के भेदों की व्याख्या करते हुए कहा, 'धर्मशास्त्र की दृष्टि से सङ्क्षेप में आठ प्रकार के ही विवाह माने गये हैं— ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा आठवाँ पैशाच। स्वायम्भुव मनु का कथन है कि इनमें बादवालों की अपेक्षा पहलेवाले विवाह धर्मानुकूल हैं। पूर्वथित जो चार विवाह— ब्राह्म, दैव, आर्ष तथा प्राजापत्य हैं, उन्हें ब्राह्मण के लिये उत्तम समझो। अनिन्दिते! ब्राह्म से लेकर गान्धर्व तक क्रमशः छ: विवाह क्षत्रिय के लिये धर्मानुकूल जानो। राजाओं के लिये तो राक्षस विवाह का भी विधान है। वैश्यों और शूद्रों में आसुर विवाह ग्राह्य माना गया है। अन्तिम पाँच विवाहों में तीन तो धर्मसम्मत हैं और दो अधर्मरूप माने गये हैं। पैशाच और आसुर विवाह कदापि करने योग्य नहीं हैं। इस विधिके अनुसार विवाह करना चाहिये; यह धर्म का मार्ग है। गान्धर्व और राक्षस— दोनों विवाह क्षत्रिय जाति के लिये धर्मानुकूल ही हैं। अतः उनके विषय में तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिये। वे दोनों विवाह परस्पर मिले हों या पृथक्-पृथक् हों, क्षत्रिय के लिये करने योग्य ही हैं, इसमें संशय नहीं है। अतः सुन्दरी! मैं तुम्हें पाने के लिये इच्छुक हूँ। तुम भी मुझे पाने की इच्छा रखकर गान्धर्व विवाह के द्वारा मेरी पत्नी बन जाओ।'
सा त्वं मम सकामस्य सकामा वरवर्णिनि ।
गान्धर्वेण विवाहेन भार्या भवितुमर्हसि ॥
अतः सुन्दरी! मैं तुम्हें पानेके लिये इच्छुक हूँ । तुम भी मुझे पानेकी इच्छा रखकर गान्धर्व विवाहके द्वारा मेरी पत्नी बन जाओ ।
शकुन्तला ने कहा, 'पौरवश्रेष्ठ! यदि यह गान्धर्व विवाह धर्म का मार्ग है, यदि आत्मा स्वयं ही अपना दान करने में समर्थ है तो इसके लिये मैं तैयार हूँ; किन्तु प्रभो! मेरी एक शर्त है, उसे सुन लीजिये और उसका पालन करने के लिये मुझसे सच्ची प्रतिज्ञा कीजिये। वह शर्त क्या है, यह मैं एकान्त में आपसे कह रही हूँ— महाराज दुष्यन्त! मेरे गर्भ से आपके द्वारा जो पुत्र उत्पन्न हो, वही आपके बाद युवराज हो, ऐसी मेरी इच्छा है। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ। यदि यह शर्त इसी रूप में आपको स्वीकार हो तो आपके साथ मेरा समागम हो सकता है।'
वैशम्पायन जी कहते हैं— जनमेजय! शकुन्तला की यह बात सुनकर राजा दुष्यन्त ने बिना कुछ सोचे-विचारे यह उत्तर दे दिया कि 'ऐसा ही होगा।' वे शकुन्तला से बोले, 'शुचिस्मिते! मैं शीघ्र तुम्हें अपने नगर में ले चलूँगा। सुश्रोणि! तुम राजभवन में ही रहने योग्य हो। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ।' ऐसा कहकर राजर्षि दुष्यन्त ने अनिन्द्यगामिनी शकुन्तला का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया और उसके साथ एकान्तवास किया। फिर उसे विश्वास दिलाकर वहाँ से विदा हुए। जाते समय उन्होंने बार-बार कहा, 'पवित्र मुसकान वाली सुन्दरी! मैं तुम्हारे लिये चतुरङ्गिणी सेना भेजूँगा और उसी के साथ अपने राजभवन में बुलवाऊँगा।'
जनमेजय! इस प्रकार शकुन्तला से प्रतिज्ञा करके नरेश्वर राजा दुष्यन्त आश्रम से चल दिये। उनके मन में महर्षि कण्व की ओर से बड़ी चिन्ता थी कि तपस्वी भगवान् कण्व यह सब सुनकर न जाने क्या कर बैठेंगे? इस तरह चिन्ता करते हुए ही राजा ने अपने नगर में प्रवेश किया।
उनके गये दो ही घड़ी बीती थी कि महर्षि कण्व भी आश्रम पर आ गये; परन्तु शकुन्तला लज्जावश पहले के समान पिता के समीप नहीं गयी। शकुन्तला बोली, 'तात! इलिलकुमार महाराज दुष्यन्त इस वन में आये थे। दैवयोग से इस आश्रम पर भी उनका आगमन हुआ और मैंने उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया। पिताजी! आप उन पर प्रसन्न हों। वे महायशस्वी नरेश अब मेरे स्वामी हैं। इसके बाद का सारा वृत्तान्त आप दिव्य ज्ञान-दृष्टि से देख सकते हैं। क्षत्रियकुल को अभयदान देकर उन पर कृपादृष्टि करें।'
महातपस्वी भगवान् कण्व दिव्यज्ञान से सम्पन्न थे। वे दिव्य दृष्टि से देखकर शकुन्तला की तात्कालिक अवस्था को जान गये; अतः प्रसन्न होकर बोले, 'भद्रे! आज तुमने मेरी अवहेलना करके जो एकान्त में किसी पुरुष के साथ सम्बन्ध स्थापित किया है, वह तुम्हारे धर्म का नाशक नहीं है। क्षत्रिय के लिये गान्धर्व विवाह श्रेष्ठ कहा गया है। स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरे को चाहते हों, उस दश में उन दोनों का एकान्त में जो मन्त्रहीन सम्बन्ध स्थापित होता है, उसे गान्धर्व विवाह कहा गया है। शकुन्तले! महामना दुष्यन्त धर्मात्मा और श्रेष्ठ पुरुष हैं। वे तुम्हें चाहते थे। तुमने योग्य पतिके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है; इसलिये लोक में तुम्हारे गर्भ से एक महाबली और महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा, जो समुद्र से घिरी हुई इस समूची पृथ्वी का उपभोग करेगा। शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले उस महामना चक्रवर्ती नरेश की सेना सदा अप्रतिहत होगी।'
धर्मात्मा च महात्मा च दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः ।
अध्यगच्छः पतिं यत् त्वं भजमानं शकुन्तले ॥
महात्मा जनिता लोके पुत्रस्तव महाबलः ।
य इमां सागरापाङ्गीं कृत्स्नां भोक्ष्यति मेदिनीम् ॥
‘ शकुन्तले! महामना दुष्यन्त धर्मात्मा और श्रेष्ठ पुरुष हैं । वे तुम्हें चाहते थे । तुमने योग्य पतिके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है; इसलिये लोकमें तुम्हारे गर्भसे एक महाबली और महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा, जो समुद्रसे घिरी हुई इस समूची पृथ्वीका उपभोग करेगा ।
तदनन्तर शकुन्तला ने उनके लाये हुए फल के भार को लेकर यथास्थान रख दिया। फिर उन्होंने दोनों पैर धोये तथा जब वे भोजन और विश्राम कर चुके, तब वह मुनि से इस प्रकार बोली— 'भगवन्! मैंने पुरुषों में श्रेष्ठ राजा दुष्यन्त का पतिरूप में वरण किया है। अतः मन्त्रियों सहित उन नरेश पर आपको कृपा करनी चाहिये।'
कण्व बोले, 'उत्तम वर्ण वाली पुत्री! मैं तुम्हारे भले के लिये राजा दुष्यन्त पर भी प्रसन्न ही हूँ। शुचिस्मिते! अब तक तेरे बहुत-से ऋतु व्यर्थ बीत गये हैं। इस बार यह सार्थक हुआ है। अनघे! तुम्हें पाप नहीं लगेगा। शुभे! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मुझसे माँग लो।'
तब शकुन्तला ने दुष्यन्त के हित की इच्छा से यह वर माँगा कि पुरुवंशी नरेश सदा धर्म में स्थिर रहें और वे कभी राज्य से भ्रष्ट न हों।
ततो धर्मिष्ठतां वव्रे राज्याच्चास्खलनं तथा ।
शकुन्तला पौरवाणां दुष्यन्तहितकाम्यया ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब शकुन्तलाने दुष्यन्तके हितकी इच्छासे यह वर माँगा कि पुरुवंशी नरेश सदा धर्ममें स्थिर रहें और वे कभी राज्यसे भ्रष्ट न हों ।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्व के अन्तर्गत सम्भवपर्व में शकुन्तलोपाख्यान विषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ।
किया हुआ गर्भ धीरे-धीरे बढ़ने और पुष्ट होने लगा। शकुन्तला कार्य की गुरुता पर दृष्टि रखकर निरन्तर राजा दुष्यन्त का ही चिन्तन करती रहती थी। उसे न तो दिन में नींद आती थी और न रात में ही। उसका स्नान और भोजन छूट गया था। उसे यह दृढ़ विश्वास था कि राजा के भेजे हुए ब्राह्मण चतुरङ्गिणी सेना के साथ आज, कल या परसों तक मुझे लेने के लिये अवश्य आ जायेंगे। भरत-नन्दन! शकुन्तला को दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा वर्ष— इन सबकी गणना करते-करते तीन वर्ष बीत गये। तदनन्तर पूरे तीन वर्ष व्यतीत होने के बाद सुन्दर जाँघों वाली शकुन्तला ने अपने गर्भ से प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, रूप और उदारता आदि गुणों से सम्पन्न, अमित पराक्रमी कुमार को जन्म दिया, जो दुष्यन्त के वीर्य से उत्पन्न हुआ था।
इन्द्रादि देवताओं का यह वचन सुनकर कण्व के आश्रम में रहने वाले सभी महर्षि, शकुन्तला के सौभाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। यह सब सुनकर शकुन्तला को भी बड़ा हर्ष हुआ। पुण्यवानों में श्रेष्ठ महायशस्वी कण्व ने मुनियों से ब्राह्मणों को बुलाकर उनका पूर्ण सत्कार किया और विधिपूर्वक बालक का जातकर्म आदि संस्कार कराया।
देवतानां वचः श्रुत्वा कण्वाश्रमनिवासिनः ।
सभाजयन्त कण्वस्य सुतां सर्वे महर्षयः ॥ शकुन्तला च तच्छ्रुत्वा परं हर्षमवाप सा ।
द्विजानाहूय मुनिभिः सत्कृत्य च महायशाः ॥ ) जातकर्मादिसंस्कारं कण्वः पुण्यकृतां वरः ।
विधिवत् कारयामास वर्धमानस्य धीमतः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - इन्द्रादि देवताओंका यह वचन सुनकर कण्वके आश्रममें रहनेवाले सभी महर्षि कण्वकन्या शकुन्तलाके सौभाग्यकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे । यह सब सुनकर शकुन्तलाको भी बड़ा हर्ष हुआ। पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ महायशस्वी कण्वने मुनियोंसे ब्राह्मणोंको बुलाकर उनका पूर्ण सत्कार करके बालकका विधिपूर्वक जातकर्म आदि संस्कार कराया । वह बुद्धिमान् बालक प्रतिदिन बढ़ने लगा ।
वह बुद्धिमान बालक प्रतिदिन बढ़ने लगा। वह सफेद और नुकीले दाँतों से शोभा पा रहा था; उसके शरीर का गठन सिंह के समान था। वह ऊँचे कद का था और उसके हाथों में चक्र के चिह्न थे। वह अद्भुत शोभा से सम्पन्न, विशाल मस्तक वाला और महान बलवान था। देवताओं के बालक-सा प्रतीत होने वाला वह तेजस्वी कुमार वहाँ शीघ्रतापूर्वक बढ़ने लगा। छः वर्ष की अवस्था में ही वह बलवान बालक कण्व के आश्रम में सिंहों, व्याघ्रों, वराहों, भैंसों और हाथियों को पकड़कर खींच लाता और आश्रम के समीपवर्ती वृक्षों में बाँध देता था।
उसकी चीत्कार से भयभीत होकर मृग और सिंह आदि जङ्गली जीव मल-मूत्र करने लगते थे; आश्रम पर रहने वाले प्राणियों की भी यही दशा हुई। दुष्यन्त कुमार ने घुटनों से मार-मारकर उस दैत्य के प्राण ले लिये और तत्पश्चात् उसे छोड़ दिया; उसके हाथ से छूटते ही वह दैत्य गिर पड़ा। उस बालक का यह पराक्रम देखकर सब लोगों को बड़ा विस्मय हुआ। कितने ही दैत्य और राक्षस प्रतिदिन उस दुष्यन्त कुमार के हाथों मारे जाते थे। कुमार के भय से ही उन्होंने कण्व के आश्रम पर जाना छोड़ दिया। यह देख कण्व के आश्रम में रहने वाले ऋषियों ने उसका नया नामकरण किया—
षड्वर्ष एव बालः स कण्वाश्रमपदं प्रति ॥
सिंहव्याघ्रान् वराहांश्च महिषांश्च गजांस्तथा ।
बबन्ध वृक्षे बलवानाश्रमस्य समीपतः ॥
देवताओंके बालक-सा प्रतीत होनेवाला वह तेजस्वी कुमार वहाँ शीघ्रतापूर्वक बढ़ने लगा । छः वर्षकी अवस्थामें ही वह बलवान् बालक कण्वके आश्रममें सिंहों, व्याघ्रों, वराहों, भैंसों और हाथियोंको पकड़कर खींच लाता और आश्रमके समीपवर्ती वृक्षोंमें बाँध देता था ।
'यह सब जीवों का दमन करता है, इसलिए सर्वदमन नाम से प्रसिद्ध हो।' तब से उस कुमार का नाम 'सर्वदमन' हो गया। वह पराक्रम, तेज और बल से सम्पन्न था।
राजा दुष्यन्त ने अपनी रानी और पुत्र को बुलाने के लिये जब किसी भी मनुष्य को नहीं भेजा, तब शकुन्तला चिन्तामग्न हो गयी। उसके सारे अङ्ग सफेद पड़ने लगे; उसके खुले हुए लम्बे केश लटक रहे थे और वस्त्र मैले हो गये थे। वह अत्यन्त दुर्बल और दीन दिखायी देती थी। शकुन्तला की इस दयनीय दशा को देखकर कण्व मुनि ने कुमार सर्वदमन के लिये विद्या का चिन्तन किया, जिससे उस बारह वर्ष के ही बालक के हृदय में समस्त शास्त्रों और सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान प्रकाशित हो गया। उस कुमार के लोकोत्तर कर्मों को देखकर महर्षि ने शकुन्तला से कहा—
'अब इसके युवराज-पद पर अभिषिक्त होने का समय आया है।'
कण्व ने शकुन्तला से कहा— 'भामिनि! शकुन्तले! यह मेरी हितकर एवं लाभप्रद बात सुनो। पतिव्रताभाव-सम्बन्धी गुणों को छोड़कर तुम्हारे लिये और कोई वस्तु साध्य नहीं है। पतिव्रताओं पर सम्पूर्ण वरों को देने वाले देवता लोग भी सन्तुष्ट रहते हैं। भामिनि! वे आपत्तिके निवारण के लिये अपने कृपा प्रसाद का भी परिचय देंगे। शुचिस्मिते! पतिव्रता देवियाँ पति के प्रसाद से पुण्य गति को ही प्राप्त होती हैं, अशुभ गति को नहीं। अतः तुम जाकर राजा की आराधना करो।'
उस बालक के बल को समझकर कण्व ने अपने शिष्यों से कहा— 'तुम लोग समस्त शुभ लक्षणों से सम्मानित मेरी पुत्री शकुन्तला और इसके पुत्र को शीघ्र ही इस घर से ले जाकर पति के घर में पहुँचा दो। स्त्रियों का अपने भाई-बन्धुओं के यहाँ अधिक दिनों तक रहना अच्छा नहीं होता; वह उनकी कीर्ति, शील तथा पातिव्रत्य धर्म का नाश करने वाला होता है। अतः इसे अविलम्ब पति के घर में पहुँचा दो।'
महर्षि कण्व ने उन मुनियों को बुलाकर करुण भाव से कहा— 'महर्षियों! यह मेरी यशस्विनी पुत्री वन में उत्पन्न हुई और यहीं पलकर इतनी बड़ी हुई है। मैंने सदा इसे लाड़-प्यार किया है। यह कुछ नहीं जानती है। विप्रगण! तुम सब लोग इसे ऐसे मार्ग से राजा दुष्यन्त के घर ले जाओ जिसमें अधिक श्रम न हो।'
'बहुत अच्छा' कहकर वे सभी महातेजस्वी शिष्य, शकुन्तला को आगे करके दुष्यन्त के नगर की ओर चले। तदनन्तर सुन्दर भौंहों वाली शकुन्तला, कमल के समान नेत्रों वाले देव-बालक के सदृश तेजस्वी पुत्र को साथ ले अपने परिचित तपोवन से चलकर महाराज दुष्यन्त के यहाँ आयी।
राजा के यहाँ पहुँचकर, आगमन की सूचना देकर और अनुमति लेकर वह उसी बाल-सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र के साथ राजसभा में प्रविष्ट हुई। सभी शिष्यगण राजा को महर्षि का सन्देश सुनाकर पुनः आश्रम को लौट आये। शकुन्तला ने न्यायपूर्वक महाराज के प्रति सम्मान का भाव प्रकट करते हुए अपने पुत्र से कहा—
निवेदयित्वा ते सर्वे आश्रमं पुनरागताः ।
पूजयित्वा यथान्यायमब्रवीच्च शकुन्तला ॥
सब शिष्यगण राजाको महर्षिका संदेश सुनाकर पुनः आश्रमको लौट आये और शकुन्तला न्यायपूर्वक महाराजके प्रति सम्मानका भाव प्रकट करती हुई पुत्रसे बोली · ।
शकुन्तला ने कहा— 'महाराज! आप प्रसन्न हों। पुरुषोत्तम! मैं अपने आगमन का उद्देश्य बताती हूँ, सुनिये। राजन्! यह आपका पुत्र है, इसे आप युवराज पद पर अभिषिक्त कीजिये। यह देव-उपम कुमार आपके द्वारा मेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ है। पुरुषोत्तम! इसके लिये आपने मेरे साथ जो शर्त कर रखी है, उसका पालन कीजिये। महाभाग! आपने कण्व के आश्रम पर मेरे साथ समागम के समय जो प्रतिज्ञा की थी, उसका इस समय स्मरण कीजिये।'
राजा दुष्यन्त ने शकुन्तला का यह वचन सुनकर, सब बातों को याद रखते हुए भी उससे इस प्रकार कहा— 'दुष्ट तपस्विनि! मुझे कुछ भी याद नहीं है। तुम किसकी स्त्री हो? तुम्हारे साथ मेरा धर्म, काम अथवा अर्थ को लेकर वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हुआ है, इसका मुझे तनिक भी स्मरण नहीं है। तुम इच्छानुसार जाओ या रहो अथवा जैसी तुम्हारी रुचि हो, वैसा करो।'
सोऽथ श्रुत्वैव तद् वाक्यं तस्या राजा स्मरन्नपि ।
अब्रवीन्न स्मरामीति कस्य त्वं दुष्टतापसि ॥
राजा दुष्यन्तने शकुन्तलाका यह वचन सुनकर सब बातोंको याद रखते हुए भी उससे इस प्रकार कहा — ‘ दुष्ट तपस्विनि! मुझे कुछ भी याद नहीं है । तुम किसकी स्त्री हो?
सुन्दर अङ्ग वाली तपस्विनी शकुन्तला दुष्यन्त के ऐसा कहने पर लज्जित होकर दुःख से बेहोश-सी हो गयी और खम्भे की तरह निश्चल भाव से खड़ी रह गयी। क्रोध और अमर्ष से उसकी आँखें लाल हो गयीं, ओठ फड़कने लगे और मानो जला देगी—इस भाव से टेढ़ी चितवन द्वारा राजा की ओर देखने लगी। क्रोध उसे उत्तेजित कर रहा था, फिर भी उसने अपने आकार को छिपाए रखा और तपस्या द्वारा सञ्चित तेज को अपने भीतर ही धारण किये रखा।
वह दो घड़ी तक कुछ सोच-विचार करती रही, फिर दुःख और अमराण में भरकर पति की ओर देखते हुए क्रोधपूर्वक बोली— 'महाराज! आप जान-बूझकर भी दूसरे-दूसरे निम्न कोटि के मनुष्यों की भाँति निःशङ्क होकर ऐसी बात क्यों कहते हैं कि 'मैं नहीं जानता'? इस विषय में यहाँ क्या झूठ है और क्या सच, इस बात को आपका हृदय ही जानता होगा। उसी को साक्षी बनाकर, हृदय पर हाथ रखकर सही-सही बात कहिये जिससे आपका कल्याण हो। आप अपने आत्मा की अवहेलना न कीजिये। आपका स्वरूप तो कुछ और है, परन्तु आप बन कुछ और रहे हैं। जो अपने असली स्वरूप को छिपाकर अपने को कुछ-का-कुछ दिखाता है, अपने आत्मा का अपहरण करने वाले उस चोर ने कौन सा पाप नहीं किया?
आप समझ रहे हैं कि उस समय मैं अकेला था, परन्तु आपको पता नहीं कि वह सनातन मुनि सबके हृदय में अन्तर्यामी रूप से विद्यमान है। वह सबके पाप-पुण्य को जानता है और आप उसी के निकट रहकर पाप कर रहे हैं। जो सदा असत्य से दूर रहने वाले हैं, उन समस्त साधु पुरुषों की दृष्टि में केवल धर्म ही हितकारक है। धर्म कभी दुःखदायक नहीं होता। मनुष्य पाप करके यह समझता है कि मुझे कोई नहीं जानता, किन्तु उसका यह समझना भारी भूल है; क्योंकि सब देवता और अन्तर्यामी परमात्मा भी मनुष्य के उस पाप-पुण्य को देखते और जानते हैं। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, जल, हृदय, यमराज, दिन, रात, दोनों सन्ध्याएँ और धर्म—ये सभी मनुष्य के भले-बुरे आचार-व्यवहार को जानते हैं। जिस पर हृदयस्थित कर्मसाक्षी क्षेत्रज्ञ परमात्मा सन्तुष्ट रहते हैं, सूर्यपुत्र यमराज उसके सभी पापों को स्वयं नष्ट कर देते हैं। परन्तु जिस दुरात्मा पर अन्तर्यामी सन्तुष्ट नहीं होते, यमराज उस पापी को उसके पापों का स्वयं ही दण्ड देते हैं।'
( धर्म एव हि साधूनां सर्वेषां हितकारणम् ।
नित्यं मिथ्याविहीनानां न च दुःखावहो भवेत् ॥ ) मन्यते पापकं कृत्वा न कश्चिद् वेत्ति मामिति ।
विदन्ति चैनं देवाश्च यश्चैवान्तरपूरुषः ॥
‘जो सदा असत्यसे दूर रहनेवाले हैं, उन समस्त साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें केवल धर्म ही हितकारक है । धर्म कभी दुःखदायक नहीं होता । मनुष्य पाप करके यह समझता है कि मुझे कोई नहीं जानता, किंतु उसका यह समझना भारी भूल है; क्योंकि सब देवता और अन्तर्यामी परमात्मा भी मनुष्यके उस पाप- पुण्यको देखते और जानते हैं ।
सभा के बीच खड़ी शकुन्तला की आँखों में वेदना और मुख पर स्वाभिमान था। उसने राजा दुष्यन्त की ओर देखते हुए कहा, “मैं स्वयं आपके पास आयी हूँ, ऐसा समझकर मुझ पतिव्रता पत्नी का तिरस्कार न कीजिये। मैं आपके द्वारा आदर पाने योग्य हूँ और स्वयं आपके निकट आयी हुई आपकी ही पत्नी हूँ, तथापि आप मेरा आदर नहीं करते हैं। आप किसलिए नीच पुरुष की भाँति भरी सभामें मुझे अपमानित कर रहे हैं? मैं सूने जङ्गल में तो नहीं रो रही हूँ? फिर आप मेरी बात क्यों नहीं सुनते?”
उसका स्वर गम्भीर होता गया, “महाराज दुष्यन्त! यदि मेरे उचित याचना करने पर भी आप मेरी बात नहीं मानेंगे, तो आज आपके सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे।” शकुन्तला ने अपने पुत्र की ओर सङ्केत करते हुए तर्क दिया कि पति ही पत्नी के भीतर गर्भरूप से प्रवेश करके पुत्ररूप में जन्म लेता है। यही 'जाया' का जायात्व है, जिसे पुराणवेत्ता विद्वान् जानते हैं। शास्त्र कहते हैं कि जो सन्तान उत्पन्न होती है, वह सन्ततिकी परम्परा द्वारा अपने पूर्वजों का उद्धार कर देती है। 'पुत्र' वह है जो 'पुत्' नामक नरक से पिता का त्राण करता है, इसीलिए साक्षात् ब्रह्माजी ने उसे 'पुत्र' कहा है। मनुष्य पुत्र से पुण्यलोकों पर विजय पाता है और पौत्र से अक्षय सुख प्राप्त करता है।
पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुतः ।
तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥
‘ पुत्र' ‘ पुत्’ नामक नरकसे पिताका त्राण करता है, इसलिये साक्षात् ब्रह्माजीने उसे ' पुत्र ' कहा है ।
शकुन्तला ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि वही भार्या श्रेष्ठ है जो सन्तानवती हो और अपने पति को प्राणों के समान प्रिय मानती हो। पत्नी पुरुष का आधा अङ्ग और उसका सबसे उत्तम मित्र है; वह संसार-सागर से तरने के लिए प्रमुख साधन है। जिसके पास पत्नी है, वही सच्चा गृहस्थ है और लक्ष्मी से सम्पन्न है। सङ्कट के समय स्त्री माता की भाँति दुःख में हाथ बँटाती है। शकुन्तला ने आगे कहा, “राजन्! पति अपनी पतिव्रता स्त्री को इहलोक में तो पाता ही है, परलोक में भी प्राप्त करता है। पत्नी के गर्भ से अपने द्वारा उत्पन्न किए हुए आत्मा को ही विद्वान् पुरुष पुत्र कहते हैं, इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी उस धर्मपत्नी को, जो पुत्र की माता बन चुकी है, माता के समान देखे।”
उसने अपने पुत्र की ओर इशारा करते हुए कहा, “देखिये, आपका यह पुत्र स्वयं आपके पास आया है और प्रेमपूर्ण तिरछी चितवन से आपकी ओर देखता हुआ आपकी गोद में बैठने के लिये उत्सुक है; फिर आप किसलिये इसका तिरस्कार करते हैं? चींटियाँ भी अपने अण्डों का पालन करती हैं, उन्हें फोड़ती नहीं; फिर आप धर्मज्ञ होकर भी अपने पुत्र का भरण-पोषण क्यों नहीं करते? लोग मलयगिरि के चन्दन को शीतल कहते हैं, परन्तु गोद में सटाये हुए शिशु का स्पर्श चन्दन से भी अधिक सुखद होता है। संसार में पुत्र के स्पर्श से बढ़कर सुखदायक और कोई स्पर्श नहीं है।”
स त्वं स्वयमभिप्राप्तं साभिलाषमिमं सुतम् ।
प्रेक्षमाणं कटाक्षेण किमर्थमवमन्यसे ॥
अण्डानि बिभ्रति स्वानि न भिन्दन्ति पिपीलिकाः ।
न भरेथाः कथं नु त्वं धर्मज्ञः सन् स्वमात्मजम् ॥
‘ देखिये, आपका यह पुत्र स्वयं आपके पास आया है और प्रेमपूर्ण तिरछी चितवनसे आपकी ओर देखता हुआ आपकी गोदमें बैठनेके लिये उत्सुक है; फिर आप किसलिये इसका तिरस्कार करते हैं । चींटियाँ भी अपने अण्डोंका पालन ही करती हैं; उन्हें फोड़तीं नहीं । फिर आप धर्मज्ञ होकर भी अपने पुत्रका भरण - पोषण क्यों नहीं करते?
शकुन्तला ने अपनी व्यथा प्रकट की, “शत्रुओं का दमन करने वाले सम्राट्! मैंने पूरे तीन वर्षों तक अपने गर्भ में धारण करने के पश्चात् आपके इस पुत्र को जन्म दिया है। यह आपके शोक का विनाश करने वाला होगा। पौरव! जब मैं मालिनी नदी के तट पर थी, तब आकाशवाणी ने मुझसे कहा था कि यह बालक सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाला होगा। प्रायः देखा जाता है कि दूसरे गाँव से लौटे मनुष्य घर आकर अपने पुत्रों को स्नेह से गोद में उठा लेते हैं और उनके मस्तक सूँघकर आनन्दित होते हैं। यह बालक आपके अङ्गों से उत्पन्न हुआ है, मानो एक निर्मल सरोवर में दिखने वाले प्रतिबिम्ब की भाँति आप स्वयं ही दो रूपों में प्रकट हो गये हों।”
शकुन्तला ने अपना परिचय देते हुए कहा, “राजन्! आज से कुछ वर्ष पहले आप शिकार खेलते हुए मेरे पिताजी के आश्रम पर पहुँचे थे, जहाँ आपने गान्धर्व विवाह द्वारा मेरा पाणिग्रहण किया था। मेरे पिता कुलीन महर्षि कुशनाभ थे और मेरी माता मेनका नाम की श्रेष्ठ अप्सरा है। उस मेनका ने हिमालय के शिखर पर मुझे जन्म दिया था, किन्तु वह असद् व्यवहार करने वाली अप्सरा मुझे परायी सन्तान की तरह वहीं छोड़कर चली गयी।”
राजा दुष्यन्त का स्वर कठोर हो गया। उन्होंने सन्देह व्यक्त करते हुए कहा, “शकुन्तला! मैं तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न इस पुत्र को नहीं जानता। स्त्रियाँ प्रायः झूठ बोलने वाली होती हैं। तुम्हारी माता वेश्या मेनका बड़ी क्रूर हृदय है, जिसने तुम्हें हिमालय के शिखर पर निर्माल्य की तरह उतार फेंका है। और तुम्हारे क्षत्रिय पिता विश्वामित्र भी, जो ब्राह्मण बनने के लिये लालायित थे और मेनका को देखते ही काम के अधीन हो गये थे, बड़े निर्दयी जान पड़ते हैं। तुम उन्हीं दोनों की सन्तान होकर व्यभिचारिणी स्त्री के समान क्यों झूठी बातें बना रही हो? दुष्ट तपस्विनी! चली जाओ यहाँ से। कहाँ वे महर्षि विश्वामित्र, कहाँ अप्सराओं में श्रेष्ठ मेनका और कहाँ तुम जैसी दीन-हीन नारी? तुम्हारे इस पुत्र का शरीर बहुत बड़ा है, यह इतना कम समय में साखू के खम्भे जैसा लम्बा कैसे हो गया? तुम्हारी जाति नीच है। मैं तुम्हें नहीं पहचानता, जहाँ इच्छा हो वहीं चली जाओ।”
शकुन्तला ने धैर्य से उत्तर दिया, “राजन्! आप दूसरों के सरसों बराबर दोषों को तो देखते हैं, किन्तु अपने बेल के समान बड़े दोषों को नहीं देखते। मेनका देवताओं में रहती है और देवता उसके पीछे चलते हैं; अतः मेरे जन्म और कुल का आपके जन्म से बढ़कर होना स्वाभाविक है। राजेन्द्र! आप केवल पृथ्वी पर घूमते हैं, किन्तु मैं आकाश में भी चल सकती हूँ। तनिक ध्यान से देखिये, मुझमें और आपमें सुमेरु पर्वत और सरसों के समान अन्तर है। मैं इन्द्र, कुबेर, यम और वरुण—सभी लोकों में आने-जाने की शक्ति रखती हूँ।”
शकुन्तलोवाच राजन् सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यसि ।
आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यसि ॥
शकुन्तलाने कहा – राजन्! आप दूसरोंके सरसों बराबर दोषोंको तो देखते रहते हैं, किंतु अपने बेलके समान बड़े - बड़े दोषोंको देखकर भी नहीं देखते ।
उसने अन्त में एक दृष्टान्त दिया, “अनघ! एक कहावत प्रसिद्ध है: कुरूप मनुष्य जब तक आइने में अपना मुँह नहीं देख लेता, तब तक वह स्वयं को दूसरों से अधिक रूपवान समझता है; किन्तु जैसे ही वह विकृत मुख का दर्शन करता है, उसे सत्य ज्ञात हो जाता है। जो वास्तव में रूपवान है, वह किसी का अपमान नहीं करता; परन्तु जो रूपवान न होकर भी अपने रूप की प्रशंसा में बातें बनाता है, वह दूसरों को पीड़ा देता है। मूर्ख मनुष्य दूसरों की बुरी बातें ग्रहण करता है, जैसे सूअर विष्ठा को अपना भोजन बनाता है।”
विद्वान् पुरुष दूसरे वक्ताओं के शुभाशुभ वचन को सुनकर उनमें से गुणयुक्त बातों को ही अपनाता है, ठीक उसी तरह जैसे हंस पानी को छोड़कर केवल दूध ग्रहण कर लेता है। साधु पुरुष दूसरों की निन्दा का अवसर आने पर जैसे अत्यन्त सन्तप्त हो उठता है, ठीक उसी प्रकार दुष्ट मनुष्य दूसरों की निन्दा का अवसर मिलने पर बहुत सन्तुष्ट होता है। जैसे साधु पुरुष बड़े-बूढ़ों को प्रणाम करके बड़े प्रसन्न होते हैं, वैसे ही मूर्ख मानव साधु पुरुषों की निन्दा करके सन्तोष का अनुभव करते हैं। साधु पुरुष दूसरों के दोष न देखते हुए सुख से जीवन बिताते हैं, किन्तु मूर्ख मनुष्य सदा दूसरों के दोष ही देखा करते हैं। जिन दोषों के कारण दुष्टात्मा मनुष्य साधु पुरुषों द्वारा निन्दा के योग्य समझे जाते हैं, दुष्ट लोग वैसे ही दोषों का साधु पुरुषों पर आरोप करके उनकी निन्दा करते हैं। संसार में इससे बढ़कर हँसी की दूसरी कोई बात नहीं हो सकती कि जो दुर्जन हैं, वे स्वयं ही सज्जन पुरुषों को दुर्जन कहते हैं।
जो सत्यरूपी धर्म से भ्रष्ट है, वह पुरुष क्रोध में भरे हुए विषधर सर्प के समान भयङ्कर है। उससे नास्तिक भी भय खाता है; फिर आस्तिक मनुष्य के लिये तो कहना ही क्या है। जो स्वयं ही अपने तुल्य पुत्र उत्पन्न करके उसका सम्मान नहीं करता, उसकी सम्पत्ति को देवता नष्ट कर देते हैं और वह उत्तम लोकों में नहीं जाता। पितरों ने पुत्र को कुल और वंश की प्रतिष्ठा बताया है, अतः पुत्र सब धर्मों में उत्तम है। इसलिये पुत्र का त्याग नहीं करना चाहिये। अपनी पत्नी से उत्पन्न एक और अन्य स्त्रियों से उत्पन्न लब्ध, क्रीत, पोषित तथा उपनयनादि से संस्कृत—ये चार मिलाकर कुल पाँच प्रकार के पुत्र मनुजी ने बताये हैं। ये सभी पुत्र मनुष्यों को धर्म और कीर्ति की प्राप्ति कराने वाले तथा मन की प्रसन्नता को बढ़ाने वाले होते हैं। पुत्र धर्मरूपी नौका का आश्रय ले अपने पितरों का नरक से उद्धार कर देते हैं।
स्वपत्नीप्रभवान् पञ्च लब्धान् क्रीतान् विवर्धितान् ।
कृतानन्यासु चोत्पन्नान् पुत्रान् वै मनुरब्रवीत् ॥
अपनी पत्नीसे उत्पन्न एक और अन्य स्त्रियोंसे उत्पन्न लब्ध, क्रीत, पोषित तथा उपनयनादिसे संस्कृत —ये चार मिलाकर कुल पाँच प्रकारके पुत्र मनुजीने बताये हैं ।
अतः नृपश्रेष्ठ! आप अपने पुत्र का परित्याग न करें। पृथ्वीपते! नरेन्द्रप्रवर! आप अपने आत्मा, सत्य और धर्म का पालन करते हुए अपने सिर पर कपटका बोझ न उठावें। सौ कुएँ खोदवाने की अपेक्षा एक बावड़ी बनवाना उत्तम है। सौ बावड़ियों की अपेक्षा एक यज्ञ कर लेना उत्तम है। सौ यज्ञ करने की अपेक्षा एक पुत्र को जन्म देना उत्तम है और सौ पुत्रों की अपेक्षा भी सत्य का पालन श्रेष्ठ है। एक हजार अश्वमेध यज्ञ एक ओर तथा सत्यभाषण का पुण्य दूसरी ओर यदि तराजूपर रखा जाय, तो हजार अश्वमेध यज्ञों की अपेक्षा सत्य का पलड़ा ही भारी होता है। राजन्! सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन और समस्त तीर्थों का स्नान भी सत्य वचन की समानता कर सकेगा या नहीं, इसमें सन्देह ही है। सत्य के समान कोई धर्म नहीं है। सत्य से उत्तम कुछ भी नहीं है और झूठ से बढ़कर तीव्रतर पाप इस जगत् में दूसरा कोई नहीं है। राजन्! सत्य परब्रह्म परमात्मा का स्वरूप है। सत्य सबसे बड़ा नियम है। अतः महाराज! आप अपनी सत्य प्रतिज्ञा को न छोड़िये। सत्य आपका जीवन सङ्गी हो।
राजन् सत्यं परं ब्रह्म सत्यं च समयः परः ।
मा त्याक्षीः समयं राजन् सत्यं संगतमस्तु ते ॥
राजन्! सत्य परब्रह्म परमात्माका स्वरूप है । सत्य सबसे बड़ा नियम है । अतः महाराज! आप अपनी सत्य प्रतिज्ञाको न छोड़िये । सत्य आपका जीवनसंगी हो ।
यदि आपकी झूठ में ही आसक्ति है और मेरी बात पर श्रद्धा नहीं करते हैं, तो मैं स्वयं ही चली जाती हूँ। आप-जैसे के साथ रहना मुझे उचित नहीं है। यह रहस्य पर प्रकाश डालने वाली है—चाल-ढाल, स्वर, स्मरणशक्ति, उत्साह, शील-स्वभाव, विज्ञान, पराक्रम, साहस, प्रकृतिभाव, आवर्त तथा रोमावली; जिसकी ये सब वस्तुएँ जिससे सर्वथा मिलती-जुलती हों, वह उसी का पुत्र है, इसमें संशय नहीं है। राजन्! आपके शरीर से पूर्ण समानता लेकर यह बिम्ब की भाँति प्रकट हुआ है और आपको ‘तात’ कहकर पुकार रहा है। आप इसकी आशा न तोड़ें। त्वामृतेऽपि हि दुष्यन्त शैलराजावतंसकाम्। चतुरन्तामिमामुर्वीं पुत्रो मे पालयिष्यति।
महाराज दुष्यन्त! मैं एक बात कहे देती हूँ, आपके सहयोग के बिना भी मेरा यह पुत्र चारों समुद्रों से घिरी हुई गिरिराज हिमालयरूपी मुकुट से सुशोभित समूची पृथ्वी का शासन करेगा।
ऋत्विक्-पुरोहित-आचार्य और मन्त्रियों से घिरे हुए दुष्यन्त को सम्बोधित करते हुए आकाशवाणी हुई—"इस मास में इनके जो रजःस्राव होता है, वह इनके सारे दोषों को दूर कर देता है। नरदेव! वीर्य का आधान करने वाला पिता ही पुत्र बनता है और वह यमलोक से अपने पितृगण का उद्धार करता है। तुमने ही इस गर्भ का आधान किया था। शकुन्तला सत्य कहती है। जाया (पत्नी) दो भागों में विभक्त हुए पति के अपने ही शरीर को पुत्र रूप में उत्पन्न करती है। तस्माद् भरस्व दुष्यन्त पुत्रं शाकुन्तलं नृप। अभूतिरेषा यत् त्यक्त्वा जीवेज्जीवन्तमात्मजम्।"
"इसलिये राजा दुष्यन्त! तुम शकुन्तला से उत्पन्न हुए अपने पुत्र का पालन-पोषण करो। अपने जीवित पुत्र को त्यागकर जीवन धारण करना बड़े दुर्भाग्य की बात है। तस्माद् भवत्वयं नाम्ना भरतो नाम ते सुतः। पौरव! यह महामना बालक शकुन्तला और दुष्यन्त दोनों का पुत्र है। हम देवताओं के कहने से तुम इसका भरण-पोषण करोगे, इसलिये तुम्हारा यह पुत्र भरत के नाम से विख्यात होगा।"
ऐसा कहकर देवता तथा तपस्वी ऋषि शकुन्तला को पतिव्रता बतलाते हुए उस पर फूलों की वर्षा करने लगे। पूरुवंशी राजा दुष्यन्त देवताओं की यह बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और पुरोहित तथा मन्त्रियों से इस प्रकार बोले—"आप लोग इस देवदूत का कथन भलीभाँति सुन लें। भवेद्धि शङ्क्यो लोकस्य नैव शुद्धो भवेदयम्।" मैं भी अपने इस पुत्र को इसी रूप में जानता हूँ। यदि केवल शकुन्तला के कहने से मैं इसे ग्रहण कर लेता, तो सब लोग इस पर सन्देह करते और यह बालक विशुद्ध नहीं माना जाता।
(एवमुक्त्वा ततो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
पतिव्रतेति संहृष्टाः पुष्पवृष्टिं ववर्षिरे ॥ ) तच्छ्रुत्वा पौरवो राजा व्याहृतं त्रिदिवौकसाम् ॥
पुरोहितममात्यांश्च सम्प्रहृष्टोऽब्रवीदिदम् ।
शृण्वन्त्वेतद् भवन्तोऽस्य देवदूतस्य भाषितम् ॥
(वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! ) ऐसा कहकर देवता तथा तपस्वी ऋषि शकुन्तलाको पतिव्रता बतलाते हुए उसपर फूलोंकी वर्षा करने लगे । पूरुवंशी राजा दुष्यन्त देवताओंकी यह बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और पुरोहित तथा मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले ——आपलोग इस देवदूतका कथन भलीभाँति सुन लें ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! इस प्रकार देवदूत के वचन से उस बालक की शुद्धता प्रमाणित करके राजा दुष्यन्त ने हर्ष और आनन्द में मग्न होकर उस समय अपने उस पुत्र को ग्रहण किया। तदनन्तर महाराज दुष्यन्त ने पिता को जो-जो कार्य करने चाहिये, वे सब उपनयन आदि संस्कार बड़े आनन्द और प्रेम के साथ अपने उस पुत्र के लिये शास्त्र और कुल की मर्यादा के अनुसार कराये और उसका मस्तक सूँघकर अत्यन्त स्नेहपूर्वक उसे हृदय से लगा लिया। उस समय ब्राह्मणों ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वन्दीजनों ने उनके गुण गाये। महाराज ने पुत्र-स्पर्श जनित परम आनन्द का अनुभव किया।
दुष्यन्त ने अपनी पत्नी शकुन्तला का भी धर्मपूर्वक आदर-सत्कार किया और उसे समझाते हुए कहा—"देवि! मैंने तुम्हारे साथ जो विवाह सम्बन्ध स्थापित किया था, उसे साधारण जनता नहीं जानती थी। अतः तुम्हारी शुद्धि के लिये ही मैंने यह उपाय सोचा था। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव पृथग्विधाः। त्वां देवि पूजयिष्यन्ति निर्विशङ्कं पतिव्रताम्॥ देवि! तुम निःसन्देह पतिव्रता हो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये सभी पृथक्-पृथक् तुम्हारा पूजन करेंगे। मन्यते चैव लोकस्ते स्त्रीभावान्मयि सङ्गतम्। पुत्रश्चायं वृतो राज्ये मया तस्माद् विचारितम्॥ यदि इस प्रकार तुम्हारी शुद्धि न होती तो लोग यही समझते कि तुमने स्त्री-स्वभाव के कारण कामवश मुझसे सम्बन्ध स्थापित कर लिया और मैंने भी काम के अधीन होकर ही तुम्हारे पुत्र को राज्य पर बिठाने की प्रतिज्ञा कर ली। हम दोनों के धार्मिक सम्बन्ध पर किसी का विश्वास नहीं होता; इसलिये यह उपाय सोचा गया था। प्रिये! विशाललोचने! तुमने भी कुपित होकर जो मेरे लिये अत्यन्त अप्रिय वचन कहे हैं, वे सब मेरे प्रति तुम्हारा अत्यन्त प्रेम होने के कारण ही कहे गये हैं। अतः शुभे! मैंने वह सब अपराध क्षमा कर दिया है। त्वयाप्येवं विशालाक्षि क्षन्तव्यं मम दुर्वचः॥ क्षान्त्या पतिकृते नार्यः पातिव्रत्यं व्रजन्ति ताः।"
विशाल नेत्रों वाली देवि! इसी प्रकार तुम्हें भी मेरे कहे हुए असत्य, अप्राय, कटु एवं पापपूर्ण दुर्वचनों के लिये मुझे क्षमा कर देना चाहिये। पतिके लिये क्षमाभाव धारण करने से स्त्रियाँ पातिव्रत्य-धर्म को प्राप्त होती हैं। तामेवमुक्त्वा राजर्षि दुष्यन्त ने अपनी प्रिय मालिनी का आदर-सत्कार किया।
"विशालाक्षि! तेरा पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् होगा। तेरे पतिको तीनों लोकों पर विजय प्राप्त हो। सुन्दरि! तुम्हें सदा दिव्य भोग प्राप्त होते रहें।" यह कहकर राजमाता रथन्तर्या अत्यन्त हर्ष से विभोर उठीं। उस समय राजा ने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार समस्त आभूषणों से विभूषित शकुन्तला को पटरानी के पद पर अभिषिक्त करके ब्राह्मणों तथा सैनिकों को बहुत धन अर्पित किया। दुष्यन्तस्तु तदा राजा पुत्रं शाकुन्तलं तदा। भरतं नामतः कृत्वा यौवराज्येऽभ्यषेचयत्।
( भरते भारमावेश्य कृतकृत्योऽभवन्नृपः ।
ततो वर्षशतं पूर्णं राज्यं कृत्वा नराधिपः ॥ कृत्वा दानानि दुष्यन्तः स्वर्गलोकमुपेयिवान् ।
) फिर भरतको राज्यका भार सौंपकर महाराज दुष्यन्त कृतकृत्य हो गये ।
वे पूरे सौ वर्षोंतक राज्य भोगकर विविध प्रकारके दान दे अन्तमें स्वर्गलोक सिधारे ।
तस्य तत् प्रथितं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः ।
भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत् ॥
महात्मा राजा भरतका विख्यात चक्र- सब ओर घूमने लगा । वह अत्यन्त प्रकाशमान, दिव्य और अजेय था । वह महान् चक्र अपनी भारी आवाजसे सम्पूर्ण जगत्को प्रतिध्वनित करता चलता था ।
महात्मा राजा भरत का विख्यात चक्र सब ओर घूमने लगा। वह अत्यन्त प्रकाशमान, दिव्य और अजेय था। उसका वह महान् चक्र अपनी भारी आवाज से सम्पूर्ण जगत् को प्रतिध्वनित करता चलता था। उन्होंने सब राजाओं को जीतकर अपने अधीन कर लिया तथा सत्पुरुषों के धर्म का पालन और उत्तम यश का उपार्जन किया। महाराज भरत समस्त भूमण्डल में विख्यात, प्रतापी एवं चक्रवर्ती सम्राट् थे। उन्होंने देवराज इन्द्र की भाँति बहुत-से यज्ञों का अनुष्ठान किया।
स राजा चक्रवर्त्यासीत् सार्वभौमः प्रतापवान् ।
ईजे च बहुभिर्यज्ञैर्यथा शक्रो मरुत्पतिः ॥
महाराज भरत समस्त भूमण्डलमें विख्यात, प्रतापी एवं चक्रवर्ती सम्राट् थे । उन्होंने देवराज इन्द्रकी भाँति बहुत - से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ।
महर्षि कण्व ने आचार्य होकर भरत से प्रचुर दक्षिणाओं से युक्त 'गोवितत' नामक अश्वमेध यज्ञ का विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाया। श्रीमान् भरत ने उस यज्ञ का पूरा फल प्राप्त किया। उसमें महाराज भरत ने आचार्य कण्व को एक सहस्र पद्म स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणा रूप में दीं। भरत से ही इस भूखण्ड का नाम भारत हुआ। उन्हीं से यह कौरववंश भरतवंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनके बाद उस कुल में पहले तथा आज भी जो राजा हो गये हैं, वे भारत (भरतवंशी) कहे जाते हैं। भरत के कुल में देवताओं के समान महापराक्रमी तथा ब्रह्माजी के समान तेजस्वी बहुत-से राजर्षि हो गये हैं; जिनके सम्पूर्ण नामों की गणना असम्भव है। जनमेजय! इनमें जो मुख्य हैं, उन्हीं के नामों का तुमसे वर्णन करूँगा। वे सभी महाभाग नरेश देवताओं के समान तेजस्वी तथा सत्य, सरलता आदि धर्मों में तत्पर रहनेवाले थे।
भरतस्यान्ववाये हि देवकल्पा महौजसः ।
बभूवुर्ब्रह्मकल्पाश्च बहवो राजसत्तमाः ॥
येषामपरिमेयानि नामधेयानि सर्वशः ।
तेषां तु ते यथामुख्यं कीर्तयिष्यामि भारत ।
महाभागान् देवकल्पान् सत्यार्जवपरायणान् ॥
भरतके कुलमें देवताओंके समान महापराक्रमी तथा ब्रह्माजीके समान तेजस्वी बहुत-से राजर्षि हो गये हैं; जिनके सम्पूर्ण नामोंकी गणना असम्भव है। जनमेजय! इनमें जो मुख्य हैं, उन्हींके नामोंका तुमसे वर्णन करूँगा । वे सभी महाभाग नरेश देवताओंके समान तेजस्वी तथा सत्य, सरलता आदि धर्मोंमें तत्पर रहनेवाले थे ।
In English
The Reign and Hunting Trip of King Dushyanta
King Dushyanta rules a prosperous and peaceful land where crime and hunger do not exist. While on a hunting expedition through a dense forest, he travels with his army and discovers a beautiful ashram located near the Malini river.
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