श्रीगणेशाय नमः।

प्रह्रादचरित : एक पिता अपने ही पुत्र के प्रति इतना क्रूर क्यों हो गया?

भक्ति और आत्मज्ञान की विजय

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4–9 · पृष्ठ 1299–1366

7,144 शब्द · 36 मिनटका पाठ · 54 श्लोक

नारद मुनि ने युधिष्ठिर से कहा

हिराण्यकशिपु के अहङ्कार और प्रह्लाद की भक्ति के माध्यम से परमेश्वर की महिमा समझाने हेतु

नारद मुनि कहते हैं— हे युधिष्ठिर! हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से इस प्रकार के अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे कि वे संसार के समस्त प्राणियों को वश में कर सका। ब्रह्माजी ने उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर कहा— 'बेटा! तुम जो वर मुझसे माँग रहे हो, वे जीवों के लिये बहुत ही दुर्लभ हैं; परन्तु दुर्लभ होने पर भी मैं तुम्हें वे सब वर दे देता हूँ।'

नारद उवाच

एवं वृतः शतधृतिर्हिरण्यकशिपोरथ ।
प्रादात्तत्तपसा प्रीतो वरांस्तस्य सुदुर्लभान् ॥

नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर! जब हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीसे इस प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्यासे प्रसन्न होनेके कारण उसे वे वर दे दिये ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 1पृष्ठ 1300

उसने ब्रह्माजी से वर माँगा कि उसे ऐसा वर दें कि उसके द्वारा बनाए गए किसी भी प्राणी—चाहे वह मनुष्य हो या पशु, प्राणी या अप्राणी, देवता हो या दैत्य अथवा नागादि—से उसकी मृत्यु न हो। वह चाहता था कि न भीतर, न बाहर; न दिन में, न रात्रि में; न आपके बनाए प्राणियों के अतिरिक्त और भी किसी जीव से; न अस्त्र-शस्त्र से; न पृथ्वी में और न आकाश में—कहीं भी उसकी मृत्यु न हो। वह युद्ध में ऐसा सामना चाहता था जिससे कोई जीत न सके और वह समस्त प्राणियों का एकछत्र सम्राट बन जाए। उसने यह भी कहा कि इन्द्रादि समस्त लोकपालों में जैसी आपकी महिमा है, वैसी ही मेरी भी हो; और तपस्वियों तथा योगियों को जो अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त है, वही मुझे भी दीजिये। ब्रह्माजी ने उसे वे सब वर दे दिए।

नारद उवाच

ब्रह्मोवाच तातेमे दुर्लभाः पुंसां यान् वृणीषे वरान् मम ।
तथापि वितराम्यङ्ग वरान् यदपि दुर्लभान् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 2पृष्ठ 1300

इस प्रकार दिग्विजयी और एकछत्र सम्राट होकर वह अपने प्रिय लगने वाले विषयों का स्वच्छन्द उपभोग करने लगा। उसने समस्त लोकों के लोकपालों की शक्ति और स्थान छीन लिए थे। वह नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानों से युक्त स्वर्ग में रहने लगा, जिसका निवासस्थान स्वयं विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया इन्द्र का भवन था। उस महल में मूँगे की सीढ़ियाँ, पन्ने की गचें, स्फटिक मणि की दीवारें, वैदूर्य मणि के खम्भे और माणिक्य की कुर्सियाँ थीं। वहाँ रङ्ग-बिरङ्गे चँदोवे तथा दूध के फेन के समान शय्याएँ शोभायमान थीं, जिन पर मोतियों की झालरें लगी हुई थीं। वह उत्कट गन्ध वाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था और उसकी आँखें लाल-लाल होकर चढ़ी रहती थीं। वह तपस्या, योग और शारीरिक-मानसिक बल का भण्डार था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के सिवा अन्य सभी देवता भेंट लेकर उसकी सेवा में लगे रहते थे। जब वह अपने पुरुषार्थ से इन्द्रासन पर बैठता, तब विश्वावसु, तुम्बुरु और हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे। गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थीं। उसे जो चाहिए, वह अन्तरिक्ष से प्राप्त हो जाता और आकाश उसे भाँति-भाँति की आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखाकर उसका मनोरञ्जन करता था। खारे पानी, सुरा, घृत, इक्षुरस, दधि, दुग्ध और मीठे पानी के समुद्र अपनी पत्नी नदियों के साथ रङ्गों द्वारा उसके पास रत्नराशि पहुँचाते थे। पर्वत अपनी घाटियों के रूप में उसके खेलने का स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओं में फूलते-फलते। वह अकेला ही समस्त लोकपालों के विभिन्न गुणों को धारण करता था। परन्तु इतने विषयों से भी उसकी तृप्ति न हो सकी, क्योंकि अन्ततः वह इन्द्रियों का दास ही तो था।

वह ऐश्वर्य के मद से मतवाला होकर और घमण्ड में चूर होकर शास्त्रों की मर्यादा का उल्लङ्घन कर रहा था। देखते-देखते उसके जीवन का बहुत समय बीत गया। युधिष्ठिर! वह भगवान का वही पार्षद है जिसे सनकादिकों ने शाप दिया था।

इति ते संयतात्मानः समाहितधियोऽमलाः ।
उपतस्थुर्हृषीकेशं विनिद्रा वायुभोजनाः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 23पृष्ठ 1303

एक दिन उन देवताओं ने, जिन्होंने अपनी इन्द्रियों का संयम करके और मन को समाहित करके खाना-पीना और सोना छोड़ दिया था, निर्मल हृदय से भगवान की आराधना की। वे उस परम धाम को नमस्कार करते थे जहाँ श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त कर सन्न्यासी फिर लौटते नहीं। तभी उन्हें मेघ के समान गम्भीर आकाशवाणी सुनाई पड़ी, जिससे दिशाएँ गूँज उठीं। वह वाणी साधुओं को अभय देने वाली थी: 'श्रेष्ठ देवताओं! डरो मत। तुम सबका कल्याण हो। मेरे दर्शन से प्राणियों को परम कल्याण की प्राप्ति होती है। इस नीच दैत्य की दुष्टता का मुझे पहले से पता है और मैं इसे मिटा दूँगा। अभी कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करो। जब कोई प्राणी देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु, धर्म और मुझसे द्वेष करने लगता है, तब शीघ्र ही उसका विनाश हो जाता है। जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लाद से द्रोह करेगा—उसका अनिष्ट करना चाहेगा—तब वर के कारण शक्ति सम्पन्न होने पर भी मैं इसे अवश्य मार डालूँगा।'

निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने ।
प्रह्रादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 28पृष्ठ 1303

नारदजी कहते हैं— सबके हृदय में ज्ञान का सञ्चार करने वाले भगवान ने जब देवताओं को यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आए। उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा लगा मानो हिरण्यकशिपु मर गया हो।

नारद उवाच

इत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकसः ।
न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम् ॥

नारदजी कहते हैं - सबके हृदयमें ज्ञानका संचार करनेवाले भगवान्ने जब देवताओंको यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये । उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 29पृष्ठ 1304

युधिष्ठिर ने पूछा— 'नारदजी! आपका व्रत अखण्ड है। अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपु ने पिता होकर भी ऐसे शुद्ध हृदय महात्मा पुत्र से द्रोह क्यों किया? पिता तो स्वभाव से अपने पुत्रों से प्रेम करते हैं। यदि पुत्र कोई उल्टा काम करे, तो वे उसे शिक्षा देने के लिये डाँटते हैं, पर शत्रु की तरह वैर नहीं करते। प्रह्लाद जैसे अनुकूल और गुरुजनों में भगवद्भाव करने वाले पुत्र से भला कोई द्वेष कैसे कर सकता है? हमें जानकर बड़ा कौतूहल हो रहा है कि पिता ने द्वेष के कारण पुत्र को मारना क्यों चाहा?'

युधिष्ठिर उवाच

पुत्रान् विप्रतिकूलान् स्वान् पितरः पुत्रवत्सलाः ।
उपालभन्ते शिक्षार्थं नैवाघमपरो यथा ॥

युधिष्ठिरने पूछा- नारदजी! आपका व्रत अखण्ड है । अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपुने पिता होकर भी ऐसे शुद्धहृदय महात्मा पुत्रसे द्रोह क्यों किया ॥४४ ॥ पिता तो स्वभावसे ही अपने पुत्रोंसे प्रेम करते हैं । यदि पुत्र कोई उलटा काम करता है, तो वे उसे शिक्षा देनेके लिये ही डाँटते हैं, शत्रुकी तरह वैर - विरोध तो नहीं करते ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 45पृष्ठ 1307

नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! दैत्यों ने श्री शुक्राचार्य जी को अपना पुरोहित बनाया था। उनके दो पुत्र थे— शण्ड और अमर्क। वे राजमहल के पास रहकर प्रह्लाद और अन्य दैत्य-बालकों को राजनीति और अर्थनीति पढ़ाते थे। प्रह्लाद गुरुजी का पढ़ाया हुआ पाठ उन्हें सुना देते थे, किन्तु वे उसे मन से अच्छा नहीं समझते थे क्योंकि उस पाठ का मूल आधार अपने और पराये का झूठा आग्रह था।

नारद उवाच

पौरोहित्याय भगवान् वृतः काव्यः किलासुरैः ।
शण्डामर्कौ सुतौ तस्य दैत्यराजगृहान्तिके ॥

तौ राज्ञा प्रापितं बालं प्रह्रादं नयकोविदम् ।
पाठयामासतुः पाठ्यानन्यांश्चासुरबालकान् ॥

नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर! दैत्योंने भगवान् श्रीशुक्राचार्यजीको अपना पुरोहित बनाया था । उनके दो पुत्र थे - शण्ड और अमर्क । वे दोनों राजमहलके पास ही रहकर हिरण्यकशिपुके द्वारा भेजे हुए नीतिनिपुण बालक प्रह्लादको और दूसरे पढ़ानेयोग्य दैत्य-बालकोंको राजनीति, अर्थनीति आदि पढ़ाया करते थे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 1-2पृष्ठ 1309

एक दिन हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को बड़े प्रेम से गोद में लेकर पूछा— 'बेटा! बताओ तो सही, तुम्हें कौन-सी बात अच्छी लगती है?'

कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 37पृष्ठ 1306

प्रह्लाद ने कहा— 'पिताजी! संसार के प्राणी "मैं" और "मेरे" के झूठे आग्रह में पड़कर सदा ही अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं। ऐसे प्राणियों के लिये मैं यही ठीक समझता हूँ कि वे अपने अधःपतन के मूल कारण— घास से ढके हुए अन्धेरे कूएँ के समान इस घर को छोड़कर वन में चले जाएँ और भगवान श्रीहरि की शरण ग्रहण करें।'

तस्मिन्महाभागवते महाभागे महात्मनि ।
हिरण्यकशिपू राजन्नकरोदघमात्मजे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 43पृष्ठ 1307

नारदजी कहते हैं— प्रह्लाद के मुँह से शत्रुपक्ष की प्रशंसा भरी बात सुनकर हिरण्यकशिपु ठठाकर हँस पड़ा। उसने कहा— 'दूसरों के बहकाने से बच्चों की बुद्धि यों ही बिगड़ जाया करती है। जान पड़ता है गुरुजी के घर पर विष्णु के पक्षपाती कुछ ब्राह्मण वेष बदलकर रहते हैं। बालक की भली-भाँति देख-रेख की जाए, जिससे अब इसकी बुद्धि बहकने न पाए।'

नारद उवाच

यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनु पपाठ च ।
न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम् ॥

प्रह्लाद गुरुजीका पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों - का - त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे । किन्तु वे उसे मनसे अच्छा नहीं समझते थे । क्योंकि उस पाठका मूल आधार था अपने और परायेका झूठा आग्रह ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 3पृष्ठ 1309

गुरुजी ने प्रह्लाद को पुचकारकर और फुसलाकर, बड़ी मधुर वाणी से पूछा— "बेटा प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। ठीक-ठीक बतलाना। देखो, झूठ न बोलना। यह तुम्हारी बुद्धि उलटी कैसे हो गयी? और किसी बालक की बुद्धि तो ऐसी नहीं हुई। कुलनन्दन प्रह्लाद! बताओ तो बेटा! हम तुम्हारे गुरुजन यह जानना चाहते हैं कि तुम्हारी बुद्धि स्वयं ऐसी हो गयी या किसी ने सचमुच तुमको बहका दिया है?"

स एष आत्मा स्वपरेत्यबुद्धिभि-र्दुरत्ययानुक्रमणो निरूप्यते ।
मुह्यन्ति यद्वर्त्मनि वेदवादिनो ब्रह्मादयो ह्येष भिनत्ति मे मतिम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 13पृष्ठ 1311

प्रह्लाद ने अत्यन्त शान्त भाव से उत्तर दिया— "जिन मनुष्यों की बुद्धि मोह से ग्रस्त हो रही है, उन्हीं को भगवान् की माया से यह झूठा दुराग्रह देखा गया है कि यह 'अपना' है और यह 'पराया'। उन मायापति भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ। वे भगवान् ही जब कृपा करते हैं, तब मनुष्यों की पाशविक बुद्धि नष्ट हो जाती है। इसी पशुबुद्धि के कारण तो 'यह मैं हूँ और यह मुझसे भिन्न है' इस प्रकार का झूठा भेदभाव पैदा होता है। वही परमात्मा यह आत्मा है। अज्ञानी लोग अपने और पराये का भेद करके उसी का वर्णन किया करते हैं। उनका न जानना भी ठीक ही है; क्योंकि उसके तत्त्व को जानना बहुत कठिन है और ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े वेदज्ञ भी उसके विषय में मोहित हो जाते हैं। वही परमात्मा आप लोगों के शब्दों में मेरी बुद्धि 'बिगाड़' रहा है। गुरुजी! जैसे चुम्बक के पास लोहा स्वयं खिञ्च आता है, वैसे ही चक्रपाणि भगवान् की स्वच्छन्द इच्छाशक्ति से मेरा चित्त भी संसार से अलग होकर उनकी ओर बरबस खिञ्च जाता है।"

यथा भ्राम्यत्ययो ब्रह्मन् स्वयमाकर्षसन्निधौ ।
तथा मे भिद्यते चेतश्चक्रपाणेर्यदृच्छया ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 14पृष्ठ 1311

इस प्रकार गुरुजी ने तरह-तरह से डाँट-डपटकर प्रह्लाद को धमकाया और उसे अर्थ, धर्म एवं काम सम्बन्धी शिक्षा दी। कुछ समय बाद जब गुरुजी ने देखा कि प्रह्लाद ने साम, दान, भेद और दण्ड के सम्बन्ध की सारी बातें जान ली हैं, तब वे उन्हें उनकी माता के पास ले गये। माता ने बड़े लाड़-प्यार से उन्हें नहला-धुलाकर अच्छी तरह गहने और कपड़ों से सजा दिया। इसके बाद वे उन्हें हिरण्यकशिपु के पास ले गये। प्रह्लाद अपने पिता के चरणों में लोट गये। हिरण्यकशिपु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और दोनों हाथों से उठाकर बहुत देर तक गले से लगाये रखा। उस समय दैत्यराज का हृदय आनन्द से भर रहा था।

नारद उवाच

एतावद्ब्राह्मणायोक्त्वा विरराम महामतिः ।
तं निर्भर्त्स्यथ ' कुपितः स दीनो राजसेवकः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 15पृष्ठ 1311

हिरण्यकशिपु ने प्रसन्नमुख प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठाकर उनका सिर सूँघा। उसके नेत्रों से प्रेम के आँसू गिर-गिरकर प्रह्लाद के शरीर को भिगोने लगे। उसने अपने पुत्र से पूछा— "चिरञ्जीव बेटा प्रह्लाद! इतने दिनों में तुमने गुरुजी से जो शिक्षा प्राप्त की है, उसमें से कोई अच्छी-सी बात हमें सुनाओ।"

पादयोः पतितं बालं प्रतिनन्द्याशिषासुरः ।
परिष्वज्य चिरं दोर्भ्यां परमामाप निर्वृतिम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 20पृष्ठ 1312

प्रह्लाद ने गुरुपुत्र के रूप में कहा— "अज्ञानी लोगों के लिए तो परमेश्वर के चरणकमलों का स्पर्श ही सर्वस्व है। अन्धों के पीछे अन्धों की तरह गड्ढे में गिरने के लिये चले जा रहे हैं और वेदवाणी रूप रस्सी के काम्य-कर्मों के दीर्घ बन्धन में बँधे हुए हैं, उनको यह बात मालूम नहीं कि हमारे स्वार्थ और परमार्थ भगवान् विष्णु ही हैं; उन्हीं की प्राप्ति से हमें सब पुरुषार्थों की प्राप्ति हो सकती है। जिनकी बुद्धि भगवान् के चरणकमलों का स्पर्श कर लेती है, उनके जन्म-मृत्यु रूप अनर्थ का सर्वथा नाश हो जाता है। परन्तु जो लोग अकिञ्चन भगवत्प्रेमी महात्माओं के चरणों की धूल में स्नान नहीं कर लेते, उनकी बुद्धि काम्य-कर्मों का पूरा सेवन करने पर भी भगवच्चरणों का स्पर्श नहीं कर सकती।"

इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा ।
क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 24पृष्ठ 1313

यह सुनकर हिरण्यकशिपु के नेत्र लाल हो गये। वह क्रोधित होकर कहने लगा— "दैत्यो! इसे यहाँ से बाहर ले जाओ और तुरन्त मार डालो। यह मार ही डालने योग्य है! देखो तो सही— जिसने इसके चाचा को मार डाला, अपने स्वजनों को छोड़कर यह नीच दास के समान उसी विष्णु के चरणों की पूजा करता है! हो-ने हो, इसके रूप में मेरे भाई को मारने वाला विष्णु ही आ गया है। अब यह विश्वास के योग्य नहीं है। पाँच बरस की अवस्था में ही जिसने अपने माता-पिता के वात्सल्य स्नेह को भुला दिया— वह कृतघ्न भला विष्णु का क्या हित करेगा? यह स्वजन का बाना पहनकर मेरा कोई शत्रु ही आया है। जैसे योगी की भोगलोलुप इन्द्रियाँ उसका अनिष्ट करती हैं, वैसे ही यह मेरा अहित करने वाला है। इसलिये खाने, सोने, बैठने आदि के समय किसी भी उपाय से इसे मार डालो!"

तिग्मदंष्ट्रकरालास्यास्ताम्रश्मश्रुशिरोरुहाः ॥

नदन्तो भैरवान्नादांश्छिन्धि भिन्धीति वादिनः ।
आसीनं चाहनन् शूलैः प्रह्रादं सर्वमर्मसु ॥

शरीर सुखसे जी सकता है ॥ ३७ ॥ यह स्वजनका बाना पहनकर मेरा कोई शत्रु ही आया है । जैसे योगीकी भोगलोलुप इन्द्रियाँ उसका अनिष्ट करती हैं, वैसे ही यह मेरा अहित करनेवाला है । इसलिये खाने, सोने, बैठने आदिके समय किसी भी उपायसे इसे मार डालो ' ॥ ३८ । । जब हिरण्यकशिपुने दैत्योंको इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल - लाल दाढ़ी - मूँछ एवं केशोंवाले दैत्य हाथोंमें त्रिशूल ले - लेकर ' मारो, काटो ' – इस प्रकार बड़े जोरसे चिल्लाने लगे । प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानोंमें शूलसे घाव कर रहे थे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 39-40पृष्ठ 1316

जब हिरण्यकशिपु ने दैत्यों को इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल-लाल दाढ़ी-मूँछ एवं केशों वाले दैत्य हाथों में त्रिशूल लेकर 'मारो, काटो'— इस प्रकार बड़े जोर से चिल्लाने लगे। प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानों में शूल से घाव कर रहे थे। उस समय प्रह्लाद जी का चित्त उन परमात्मा में लगा हुआ था, जो मन-वाणी के अगोचर, सर्वात्मा, समस्त शक्तियों के आधार एवं परब्रह्म हैं। इसलिये उनके सारे प्रहार ठीक वैसे ही निष्फल हो गये, जैसे भाग्यहीनों के बड़े-बड़े उद्योग-धन्धे व्यर्थ होते हैं।

प्रह्राद उवाच

मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम् ।
अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 30पृष्ठ 1314

जब शूलों की मार से प्रह्लाद के शरीर पर कोई असर नहीं हुआ, तब हिरण्यकशिपु को बड़ी शङ्का हुई। अब वह प्रह्लाद को मार डालने के लिये बड़े हठ से भाँति-भाँतिके उपाय करने लगा। उसने उन्हें बड़े-बड़े मतवाले हाथियों से कुचलवाया, विषधर साँपों से हँसवाया, पुरोहितों से कृत्या राक्षसी उत्पन्न करायी, पहाड़ी चोटी से नीचे डलवा दिया, शम्बरासुर से अनेकों प्रकार की माया का प्रयोग करवाया, अँधेरी कोठरियों में बन्द करा दिया, विष पिलाया और खाना बन्द कर दिया।

अयं मे भ्रातृहा सोऽयं हित्वा स्वान् सुहृदोऽधमः ।
पितृव्यहन्तुर्यः पादौ विष्णोर्दासवदर्चति ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 35पृष्ठ 1315

हिरण्यकशिपु सोचने लगा— "इसे मैंने बहुत कुछ बुरा-भला कहा, मार डालने के बहुत से उपाय किये, परन्तु यह मेरे द्रोह और दुर्व्यवहारों से बिना किसी की सहायता के अपने प्रभाव से ही बचता गया। यह बालक होने पर भी समझदार है और मेरे पास ही निःशङ्क भाव से रहता है। हो-ने हो इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है। जैसे शुनःशेप अपने पिता की करतूतों से उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किये अपकारों को न भूलेगा। न तो यह किसी से डरता है और न इसकी मृत्यु ही होती है। इसकी शक्ति की थाह नहीं है। अवश्य ही इसके विरोध से मेरी मृत्यु होगी।"

अप्रमेयानुभावोऽयमकुतश्चिद्भयोऽमरः ।
नूनमेतद्विरोधेन मृत्युर्मे भविता न वा ॥

-'इसे मैंने बहुत कुछ बुरा - भला कहा, मार डालनेके बहुत से उपाय किये । परन्तु यह मेरे द्रोह और दुर्व्यवहारोंसे बिना किसीकी सहायतासे अपने प्रभावसे ही बचता गया ॥ ४५ ॥ यह बालक होनेपर भी समझदार है और मेरे पास ही निःशंक भावसे रहता है । हो - न - हो इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है । जैसे शुनःशेप * अपने पिताकी करतूतों से उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किये अपकारोंको न भूलेगा ॥ ४६ ॥ न तो यह किसीसे डरता है और न इसकी मृत्यु ही होती है । इसकी शक्तिकी थाह नहीं है । अवश्य ही इसके विरोधसे मेरी मृत्यु होगी । सम्भव है, न भी हो '

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 47पृष्ठ 1317

इस प्रकार सोच-विचार करते-करते उसका चेहरा कुछ उतर गया। शुक्राचार्य के पुत्र शण्ड और अमर्क ने जब देखा कि हिरण्यकशिपु तो मुँह लटकाकर बैठा हुआ है, तब उन्होंने एकान्त में जाकर उससे यह बात कही— "स्वामी! आपने अकेले ही तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। आपके भौंहें टेढ़ी करने पर ही सारे लोकपाल काँप उठते हैं। हमारे देखने में तो आपके लिये चिन्ता की कोई बात नहीं है। भला, बच्चों के खिलवाड़ में भी भलाई-बुराई सोचने की कोई बात है? जब तक हमारे पिता शुक्राचार्य जी नहीं आ जाते, तब तक यह डरकर कहीं भाग न जाये। इसलिये इसे वरुण के पाशों से बाँध रखिये। प्रायः ऐसा होता है कि अवस्था की वृद्धि के साथ-साथ और गुरुजनों की सेवा से बुद्धि सुधर जाया करती है।"

हिरण्यकशिपु ने 'अच्छा, ठीक है' कहकर गुरुपुत्रों की सलाह मान ली और कहा कि 'इसे उन धर्मों का उपदेश करना चाहिये, जिनका पालन गृहस्थ नरपति किया करते हैं।'

तभी प्रह्लाद ने अन्य बालकों को उपदेश देना आरम्भ किया। वे सब अभी बालक ही थे, इसलिये राग-द्वेषपरायण विषयभोगी पुरुषों के उपदेशों और चेष्टाओं से उनकी बुद्धि अभी दूषित नहीं हुई थी। इसी से, और प्रह्लाद जी के प्रति आदर-बुद्धि होने से उन सबने अपनी खेल-कूद की सामग्रियों को छोड़ दिया तथा प्रह्लाद जी के पास जाकर उनके चारों ओर बैठ गये और उनके उपदेश में मन लगाकर बड़े प्रेम से एकटक उनकी ओर देखने लगे।

भगवान के परम प्रेमी भक्त प्रह्लाद का हृदय उनके प्रति करुणा और मैत्री के भाव से भर गया और वे उनसे कहने लगे— "परमेश्वर की प्राप्ति के लिये परिश्रम करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि स्वयं मिलने वाली वस्तु के लिये परिश्रम करना आयु और शक्ति को व्यर्थ गँवाना है। जो इनमें उलझ जाते हैं, उन्हें भगवान के परम कल्याणस्वरूप चरणकमलों की प्राप्ति नहीं होती। हमारे सिर पर अनेकों प्रकार के भय सवार रहते हैं। इसलिये यह शरीर—जो भगवत्प्राप्ति के लिये पर्याप्त है— जब तक रोग-शोकादि ग्रस्त होकर मृत्यु के मुख में नहीं चला जाता, तभी तक बुद्धिमान मनुष्य को अपने कल्याण के लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये।

पुंसो वर्षशतं ह्यायुस्तदर्धं चाजितात्मनः ।
निष्फलं यदसौ रात्र्यां शेतेऽन्धं प्रापितस्तमः ॥

मनुष्यकी पूरी आयु सौ वर्षकी है । जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें नहीं कर लिया है, उनकी आयुका आधा हिस्सा तो यों ही बीत जाता है । क्योंकि वे रातमें घोर तमोगुण – अज्ञानसे ग्रस्त होकर सोते रहते हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · श्लोक 6पृष्ठ 1321

मनुष्य की पूरी आयु सौ वर्ष की है। जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर लिया है, उनकी आयु का आधा हिस्सा तो यों ही बीत जाता है, क्योंकि वे रात में घोर तमोगुण—अज्ञान से ग्रस्त होकर सोते रहते हैं। बचपन में उन्हें अपने हित-अहित का ज्ञान नहीं रहता, कुछ बड़े होने पर कुमार अवस्था में वे खेल-कूद में लग जाते हैं। इस प्रकार बीस वर्ष का तो पता ही नहीं चलता। जब बुढ़ापा शरीर को ग्रस लेता है, तब अन्त के बीस वर्षों में कुछ करने-धरने की शक्ति ही नहीं रह जाती। बीच की थोड़ी सी आयु बची रहती है, जिसमें कभी न पूरी होने वाली बड़ी-बड़ी कामनाएँ हैं, बलात् पकड़ रखने वाला मोह है और घर-द्वार की वह आसक्ति है जिससे जीव इतना उलझ जाता है कि उसे कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान ही नहीं रहता। इस प्रकार बची-खुची आयु भी हाथ से निकल जाती है।

दैत्य बालको! जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, ऐसा कौन-सा पुरुष होगा जो घर-गृहस्थी में आसक्त और माया-ममता की मजबूत फाँसी में फँसे हुए अपने आप को उससे छुड़ाने का साहस कर सके? जिसे चोर, सेवक एवं व्यापारी अपने अत्यन्त प्यारे प्राणों की भी बाजी लगाकर सङ्ग्रह करते हैं, उस धन की तृष्णा को भला कौन त्याग सकता है? जो अपनी प्रियतमा पत्नी के एकान्त सहवास, उसकी प्रेमभरी बातों और मीठी सलाह पर स्वयं को निछावर कर चुका है, भाई-बन्धु और मित्रों के स्नेह-पाश में बँध चुका है और नन्हे-नन्हे शिशुओं की तोतली बोली पर लुभा चुका है— भला, वह उन्हें कैसे छोड़ सकता है?"

युधिष्ठिर! जब दैत्य बालकों ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब भगवान्‌ के परम प्रेमी भक्त प्रह्लादजी को मेरी बात का स्मरण हो आया। कुछ मुसकराते हुए उन्होंने उनसे कहा—

"अपने प्राण बचाने के लिये बड़ी जल्दी में सब-के-सब इधर-उधर भाग गये। अपनी जीत चाहनेवाले देवताओं ने राजमहल में लूट-खसोट मचा दी। यहाँ तक कि इन्द्र ने राजरानी, मेरी माता कयाधू को भी बन्दी बना लिया। मेरी माँ भय से घबराकर कुकरी पक्षी की भाँति रो रही थी और इन्द्र उसे बलात् लिये जा रहे थे। दैववश देवर्षि नारद उधर निकल आए और उन्होंने मार्ग में मेरी माँ को देख लिया।"

"देवराज! यह निरपराध है। इसे ले जाना उचित नहीं। महाभाग! इस सती-साध्वी पर नारी का तिरस्कार मत करो। इसे छोड़ दो, तुरन्त छोड़ दो!"

इन्द्र ने कहा— "इसके पेट में देवद्रोही हिरण्यकशिपु का अत्यन्त प्रभावशाली वीर्य है। प्रसवपर्यन्त यह मेरे पास रहे, बालक हो जाने पर उसे मारकर मैं इसे छोड़ दूँगा।"

"परन्तु देवर्षि नारदजी ने कहा— 'इसके गर्भ में भगवान्‌ का साक्षात् परम प्रेमी भक्त और सेवक, अत्यन्त बली और निष्पाप महात्मा है। तुममें उसको मारने की शक्ति नहीं है।' देवर्षि नारदजी की यह बात सुनकर उसका सम्मान करते हुए इन्द्र ने मेरी माता को छोड़ दिया। और फिर इसके गर्भ में भगवद्भक्त है, इस भाव से उन्होंने मेरी माता की प्रदक्षिणा की तथा अपने लोक में चले गये।"

नारद उवाच

इत्युक्तस्तां विहायेन्द्रो देवर्षेर्मानयन्वचः ।
अनन्तप्रियभक्त्यैनां परिक्रम्य दिवं ययौ ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 7 · श्लोक 11पृष्ठ 1329

"इसके बाद देवर्षि नारदजी मेरी माता को अपने आश्रम पर ले गये और उसे समझा-बुझाकर कहा कि— 'बेटी! जब तक तुम्हारा पति तपस्या करके लौटे, तब तक तुम यहीं रहो।' 'जो आज्ञा' कहकर वह निर्भयता से देवर्षि नारदजी के आश्रम पर ही रहने लगी और तब तक रही, जब तक मेरे पिता घोर तपस्या से लौटकर नहीं आये। मेरी गर्भवती माता मुझ गर्भस्थ शिशु की मङ्गलकामना से और इच्छित समय पर— अर्थात् मेरे पिता के लौटने के बाद— सन्तान उत्पन्न करने की कामना से बड़े प्रेम तथा भक्ति के साथ नारदजी की सेवा-शुश्रूषा करती रही।"

"उस ज्ञान की स्मृति नहीं रही, परन्तु देवर्षि की विशेष कृपा होने के कारण मुझे उसकी विस्मृति नहीं हुई। यदि तुम लोग मेरी इस बात पर श्रद्धा करो तो तुम्हें भी वह ज्ञान हो सकता है; क्योंकि श्रद्धा से स्त्री और बालकों की बुद्धि भी मेरे ही समान शुद्ध हो सकती है। जैसे ईश्वरमूर्ति काल की प्रेरणा से वृक्षों के फल लगते, ठहरते, बढ़ते, पकते, क्षीण होते और नष्ट हो जाते हैं— वैसे ही जन्म, अस्तित्व की अनुभूति, वृद्धि, परिणाम, क्षय और विनाश— ये छ: भाव-विकार शरीर में ही देखे जाते हैं, आत्मा से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है। कारण, व्यापक, असङ्ग तथा आवरणरहित है; ये बारह आत्मा के उत्कृष्ट लक्षण हैं।"

"इनके द्वारा आत्मतत्त्व को जाननेवाले पुरुष को चाहिए कि शरीर आदि में अज्ञान के कारण जो 'मैं' और 'मेरे' का झूठा भाव हो रहा है, उसे छोड़ दे। जिस प्रकार सुवर्ण की खानों में पत्थर में मिले हुए सुवर्ण को उसके निकालने की विधि जानने वाला स्वर्णकार उन विधियों से उसे प्राप्त कर लेता है, वैसे ही अध्यात्मतत्त्व को जानने वाला पुरुष आत्मप्राप्तिके उपायों द्वारा अपने शरीररूप क्षेत्र में ही ब्रह्मपद का साक्षात्कार कर लेता है। इन्द्रिय आदि अनात्मवस्तुओं का 'यह आत्मा नहीं है'— इस प्रकार बाध करते हुए आत्मा को ढूँढ़ना चाहिए। आत्मा सबमें अनुगत है, परन्तु है वह सबसे पृथक्। इस प्रकार शुद्ध बुद्धिसे धीरे-धीरे संसार की उत्पत्ति, स्थिति और उसके प्रलय पर विचार करना चाहिए; उतावली नहीं करनी चाहिए।"

स्वर्णं यथा ग्रावसु हेमकारः क्षेत्रेषु योगैस्तदभिज्ञ आप्नुयात् ।
क्षेत्रेषु देहेषु तथाऽऽत्मयोगै-रध्यात्मविद् ब्रह्मगतिं लभेत ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 7 · श्लोक 21पृष्ठ 1331

"जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति— ये तीनों बुद्धिकी वृत्तियाँ हैं। इन वृत्तियों का जिसके द्वारा अनुभव होता है— वही सबसे अतीत, सबका साक्षी परमात्मा है। जैसे गन्ध से उसके आश्रय वायु का ज्ञान होता है, वैसे ही बुद्धिकी इन कर्मजन्य एवं बदलने वाली तीनों अवस्थाओं के द्वारा इनमें साक्षी रूप से अनुगत आत्मा को जान लेना चाहिए। गुणों और कर्मों के कारण होने वाला जन्म-मृत्यु का यह चक्र आत्मा को शरीर और प्रकृति से पृथक् न करने के कारण ही है; यह अज्ञानमूलक एवं मिथ्या है, फिर भी स्वप्न के समान जीव को इसकी प्रतीति हो रही है।"

"आराधना, उनकी कथा-वार्ता में श्रद्धा, उनके गुण और लीलाओं का कीर्तन, उनके चरणकमलों का ध्यान और उनके मन्दिर-मूर्ति आदि का दर्शन-पूजन— इन साधनों से भगवान्‌ में स्वाभाविक प्रेम हो जाता है। सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि समस्त प्राणियों में विराजमान हैं— ऐसी भावना से यथाशक्ति सभी प्राणियों की इच्छा पूर्ण करो और हृदय से उनका सम्मान करो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर— इन छ: शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जो लोग इस प्रकार भगवान्‌की साधन-भक्तिका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उस भक्तिके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें अनन्यप्रेम की प्राप्ति हो जाती है।"

गुरुशुश्रूषया भक्त्या सर्वलब्धार्पणेन च ।
सङ्गेन साधुभक्तानामीश्वराराधनेन च ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 7 · श्लोक 30पृष्ठ 1332

"जब वह आँसुओं से मारे कण्ठ गद्गद हो जाता है और वह सङ्कोच छोड़कर जोर-जोर से गाने-चिल्लाने और नाचने लगता है; जिस समय वह ग्रहग्रस्त पागल की तरह कभी हँसता है, कभी करुण-क्रन्दन करने लगता है, कभी ध्यान करता है तो कभी भगवद्भाव से लोगों की वन्दना करने लगता है; जब वह भगवान् में ही तन्मय हो जाता है, बार-बार लम्बी साँस खींचता है और सङ्कोच छोड़कर ‘हरे! जगत्पते!! नारायण!!!’ कहकर पुकारने लगता है— तब भक्तियोगके महान् प्रभावसे उसके सारे बन्धन कट जाते हैं और भगवद्भावकी ही भावना करते-करते उसका हृदय भी तदाकार-भगवन्मय हो जाता है। उस समय उसके जन्म-मृत्यु के बीजों का खजाना ही जल जाता है और वह पुरुष श्रीभगवान् को प्राप्त कर लेता है।"

नारद मुनि कहते हैं—हे युधिष्ठिर! इस अशुभ संसार के दलदल में फँसकर भटकते हुए जीवों के लिए भगवान की प्राप्ति ही वह एकमात्र साधन है, जो संसार के चक्करों को मिटा देता है। विद्वान इसे ब्रह्म या निर्वाण-सुख के रूप में पहचानते हैं। हे मित्रो! अपने हृदय में ही उस आकाश के समान नित्य विराजमान हृदयेश्वर का भजन करो। वे समस्त प्रणियों के अत्यन्त प्रेमी मित्र और स्वयं आत्मा हैं; उन्हें छोड़कर भोग की सामग्री जुटाने के लिए भटकना कितनी मूर्खता है! धन, स्त्री, पशु, पुत्र-पुत्री, महल, पृथ्वी, हाथी और खजाना—ये सब क्षणभङ्गुर हैं। इस लोक की सम्पत्ति नाशवान है और यज्ञों से प्राप्त होने वाले स्वर्ग भी नाशवान हैं। निर्दोष केवल परमात्मा है, जिसकी प्राप्ति के लिए अनन्य भक्ति आवश्यक है। जो पुरुष स्वयं को विद्वान् मानकर अनेक कर्म करता है, उसे अविवेक के कारण विपरीत फल ही मिलता है। इसलिए निष्काम भाव से उस परमेश्वर का भजन करो, क्योंकि अर्थ, धर्म और काम सब उन्हीं की इच्छा से मिलते हैं।

अधोक्षजालम्भमिहाशुभात्मनः शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।
तद् ब्रह्म निर्वाणसुखं विदुर्बुधा-स्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥

इस अशुभ संसारके दलदलमें फँसकर अशुभमय हो जानेवाले जीवके लिये भगवान्की यह प्राप्ति संसारके चक्करको मिटा देनेवाली है । इसी वस्तुको कोई विद्वान् ब्रह्म और कोई निर्वाण - सुखके रूपमें पहचानते हैं । इसलिये मित्रो! तुमलोग अपने - अपने हृदयमें हृदयेश्वर भगवान्का भजन करो ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 7 · श्लोक 37पृष्ठ 1334

भगवान श्रीहरि समस्त प्राणियों के ईश्वर, आत्मा और परम प्रियतम हैं। वे अपने द्वारा निर्मित शरीरों में जीव के नाम से जाने जाते हैं। देवता, दैत्य या मनुष्य—जो भी उनके चरणकमलों का सेवन करता है, वह कल्याण प्राप्त करता है। इसलिए हे दानव-वन्धुओ! समस्त प्राणियों को अपने समान समझकर उस सर्वशक्तिमान भगवान की भक्ति करो। भगवान की भक्ति के प्रभाव से दैत्य, यक्ष, राक्षस, स्त्री, शूद्र और यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी भगवद्भाव को प्राप्त हुए हैं। इस मनुष्य शरीर का एकमात्र परमार्थ यही है कि वह श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति प्राप्त करे। भक्त का स्वरूप यही है कि वह सर्वदा और सर्वत्र सब वस्तुओं में भगवान का दर्शन करे। मन में सबके प्रति समता का भाव लाना ही सबसे बड़ी पूजा है। जो लोग अपने इन्द्रियों रूपी डाकुओं पर विजय पाए बिना स्वयं को विजेता समझते हैं, वे मूर्ख हैं। जिस ज्ञानी ने समस्त प्राणियों के प्रति समता प्राप्त कर ली, उसके काम-क्रोध जैसे शत्रु स्वतः ही मर जाते हैं।

जब प्रह्लाद ने दैत्य बालकों को आत्मज्ञान और भक्ति का उपदेश दिया, तो उन सभी विद्यार्थियों की बुद्धि एकमात्र भगवान में स्थिर होने लगी। यह देखकर उनके गुरु अत्यन्त घबरा गए और तुरन्त हिरण्यकशिपु के पास पहुँचे। अपने पुत्र प्रह्लाद की इस 'अनीति' को सुनकर हिरण्यकशिपु क्रोध से थर-थर काँपने लगा। उसने निश्चय किया कि अब प्रह्लाद को अपने ही हाथों मार डालना चाहिए। वह पैर की चोट खाए हुए साँप की तरह फुफकारने लगा और टेढ़ी नजरों से देखते हुए कठोर वाणी में बोला—"मूर्ख! तू बड़ा उद्दण्ड हो गया है। स्वयं तो नीच है ही, अब हमारे कुल के बालकों को भी फोड़ना चाहता है! तूने मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन किया है। आज तुझे यमराज के घर भेजकर इसका फल चखाता हूँ। मैं तनिक सा क्रोध करता हूँ तो तीनों लोक काँप उठते हैं, फिर तू किसके बल पर निडर होकर मेरी आज्ञा के विरुद्ध काम कर रहा है?"

नारद उवाच

अथ दैत्यसुताः सर्वे श्रुत्वा तदनुवर्णितम् ।
जगृहुर्निरवद्यत्वान्नैव गुर्वनुशिक्षितम् ॥

नारदजी कहते है – प्रह्लादजीका प्रवचन सुनकर दैत्यबालकोंने उसी समयसे निर्दोष होनेके कारण, उनकी बात पकड़ ली । गुरुजीकी दूषित शिक्षाकी ओर उन्होंने ध्यान ही न दिया ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 1पृष्ठ 1338

क्रोध में भरकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को भूमि पर पटक दिया और उसे मारने के लिए विभिन्न क्रूर उपायों का प्रयोग किया, परन्तु परमात्मा ने हर बार प्रह्लाद की रक्षा की। अन्ततः, क्रोध से पागल होकर उसने एक खम्भे पर ज़ोरदार घूँसा मारा। उसी क्षण उस खम्भे में एक भयङ्कर शब्द हुआ, मानो पूरा ब्रह्माण्ड ही फट गया हो। यह ध्वनि सुनकर ब्रह्मादिक सोचने लगे कि क्या प्रलय आ गया है? हिरण्यकशिपु घबराकर इधर-उधर देखने लगा कि यह भयानक ध्वनि कहाँ से आई, पर उसे सभा के भीतर कुछ दिखाई नहीं दिया।

अन्तःसभायां न ददर्श तत्पदं वितत्रसुर्येन सुरारियूथपाः ॥

और बड़े जोरसे उस खंभेको एक घूँसा मारा ॥ १५ ॥ उसी समय उस खंभेमें एक बड़ा भयंकर शब्द हुआ । ऐसा जान पड़ा मानो यह ब्रह्माण्ड ही फट गया हो । वह ध्वनि जब लोकपालोंके लोकमें पहुँची, तब उसे सुनकर ब्रह्मादिको ऐसा जान पड़ा, मानो उनके लोकोंका प्रलय हो रहा हो || १६ || हिरण्यकशिपु प्रह्लादको मार डालनेके लिये बड़े जोरसे झपटा था; परन्तु दैत्यसेनापतियोंको भी भयसे कँपा देनेवाले उस अद्भुत और अपूर्व घोर शब्दको सुनकर वह घबराया हुआ - सा देखने लगा कि यह शब्द करनेवाला कौन है? परन्तु उसे सभाके भीतर कुछ भी दिखायी न पड़ा ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 17पृष्ठ 1341

इसी समय, अपने सेवक प्रह्लाद की वाणी को सत्य करने और अपनी व्यापकता दिखाने के लिए भगवान ने उसी खम्भे के भीतर से एक अत्यन्त विचित्र रूप धारण करके प्रकट होना शुरू किया। वह रूप न तो पूर्णतः सिंह का था और न ही मनुष्य का। जब हिरण्यकशिपु उस ध्वनि के स्रोत की खोज कर रहा था, तभी उसने खम्भे से निकलते हुए उस अद्भुत प्राणी को देखा। वह सोचने लगा—"अहो! न यह मनुष्य है, न पशु; यह कौन सा अलौकिक नृसिंह है?"

खम्भे से बाहर निकलते ही नृसिंह भगवान का वह रूप अत्यन्त भयावह था। उनकी आँखें तपाये हुए सोने की तरह पीली और भयानक थीं। जँभाई लेने पर उनके गले के बाल लहरा रहे थे, दाढ़ें विकराल थीं और जीभ तलवार जैसी तीखी थी। टेढ़ी भौंहों और फूली हुई नासिका के साथ उनका खुला हुआ मुँह किसी पहाड़ी गुफा के समान लग रहा था। हिरण्यकशिपु को लगा कि शायद महामाया ने उसे मारने के लिए यह रूप रचा है, पर वह सोचने लगा कि इस चाल से क्या होगा?

सिंहनाद करते हुए हिरण्यकशिपु गदा लेकर नृसिंह भगवान पर टूट पड़ा। परन्तु जैसे पतङ्गा आग में गिरकर गायब हो जाता है, वैसे ही वह दैत्य भगवान के तेज में विलीन हो गया। भगवान ने एक प्रचण्ड अट्टहास किया जिससे हिरण्यकशिपु की आँखें बन्द हो गईं। फिर भगवान ने उसे साँप द्वारा चूहे को पकड़े जाने की तरह झपटकर पकड़ लिया। जिस हिरण्यकशिपु के शरीर पर वज्र की चोट का असर नहीं होता था, वह अब भगवान के पञ्जों से छूटने के लिए छटपटा रहा था। भगवान उसे सभा के दरवाजे पर ले गए और अपनी जाँघों पर गिराकर, खेल-खेल में अपने नखों से उसे उसी प्रकार फाड़ डाला जैसे गरुड़ विषधर साँप को चीर देते हैं।

भगवान नृसिंह की क्रोध से भरी विकराल आँखों की ओर देखा भी नहीं जा सकता था। वे अपनी लपलपाती हुई जीभ से फैले हुए मुँह के दोनों कोनों को चाट रहे थे। खून के छींटों से उनका मुख और गर्दन के बाल लाल हो चुके थे। हाथी को मारकर उसके गले में आँतों की माला पहने हुए मृगराज के समान उनकी शोभा थी। उन्होंने अपने तीखे नखों से हिरण्यकशिपु का कलेजा फाड़कर उसे जमीन पर पटक दिया। उस समय हजारों दैत्य-दानव हाथों में शस्त्र लेकर भगवान पर प्रहार करने के लिए आए, पर भगवान ने अपनी भुजारूपी सेना, लातों और नखरूपी शस्त्रों से चारों ओर उन्हें खदेड़-खदेड़ कर मार डाला।

युधिष्ठिर! उस समय भगवान नृसिंह के गर्दन के बालों की फटकार से बादल तितर-बितर होने लगे। उनके नेत्रों की ज्वाला से सूर्य आदि ग्रहों का तेज फीका पड़ गया। उनके श्वास के धक्के से समुद्र क्षुब्ध हो गए। उनके सिंहनाद से भयभीत होकर दिग्गज चिग्घाड़ने लगे। उनके गर्दन के बालों से टकराकर देवताओं के विमान अस्त-व्यस्त हो गए और स्वर्ग डगमगा गया। उनके पैरों की धमक से भूकम्प आ गया, पर्वत उड़ने लगे और उनके तेज की चकाचौंध से आकाश तथा दिशाओं का दिखना बन्द हो गया। इस समय नृसिंह भगवान का सामना करने वाला कोई दिखाई नहीं दे रहा था, फिर भी उनका क्रोध बढ़ता ही जा रहा था। वे हिरण्यकशिपु की राजसभा में ऊँचे सिंहासन पर जाकर विराज गए। उनके अत्यन्त तेजस्वी और क्रोधभरे भयङ्कर चेहरे को देखकर किसी का साहस न हुआ कि वे पास जाकर उनकी सेवा करें।

जब स्वर्ग की देवियों को यह शुभ समाचार मिला कि तीनों लोकों के सिर की पीड़ा का मूर्तिमान स्वरूप हिरण्यकशिपु भगवान के हाथों मारा गया, तब आनन्द के उल्लास से उनके चेहरे खिल उठे। वे बार-बार भगवान पर पुष्पों की वर्षा करने लगीं। देवताओं के ढोल और नगारे बजने लगे, गन्धर्वराज गाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं।

तात्! इसी समय ब्रह्मा, इन्द्र, शङ्कर आदि देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, विद्याधर, महानाग, मनु प्रजापति, गन्धर्व, अप्सराएँ, चारण, यक्ष, किम्पुरुष, वेताल, सिद्ध, किन्नर और सुनन्द-कुमुद आदि भगवान के सभी पार्षद वहाँ आए। उन्होंने सिर पर अञ्जलि बाँधकर सिंहासन पर विराजमान अत्यन्त तेजस्वी नृसिंह भगवान की थोड़ी दूर से अलग-अलग स्तुति की।

ब्रह्माजी ने कहा— "प्रभो! आप अनन्त हैं। आपकी शक्ति का कोई पार नहीं पा सकता। आपका पराक्रम विचित्र और कर्म पवित्र है। यद्यपि गुणों के द्वारा आप लीला से ही सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति, पालन और प्रलय करते हैं, फिर भी आप उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, स्वयं निर्विकार रहते हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ।"

ब्रह्मोवाच नतोऽस्म्यनन्ताय दुरन्तशक्तये विचित्रवीर्याय पवित्रकर्मणे ।
विश्वस्य सर्गस्थितिसंयमान् गुणैः स्वलीलया संदधतेऽव्ययात्मने ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 40पृष्ठ 1346

श्रीरुद्र ने कहा— "आपके क्रोध करने का समय तो कल्प के अन्त में होता है। यदि इस तुच्छ दैत्य को मारने के लिये ही आपने क्रोध किया है, तो वह भी मारा जा चुका है। उसका पुत्र आपकी शरण में आया है। भक्तवत्सल प्रभो! आप अपने इस भक्त की रक्षा कीजिये।"

इन्द्र ने कहा— "पुरुषोत्तम! आपने हमारी रक्षा की है। आपने हमारे जो यज्ञभाग लौटाए हैं, वे वास्तव में आप ही के हैं। दैत्यों के आतङ्क से सङ्कुचित हमारे हृदय-कमल को आपने प्रफुल्लित कर दिया है। यह जो स्वर्गादिका राज्य हमें पुनः प्राप्त हुआ है, यह सब काल का ग्रास है। स्वामिन्! जिन्हें आपकी सेवा की चाह है, वे मुक्तिका भी आदर नहीं करते, फिर अन्य भोगों की उन्हें आवश्यकता ही क्या?"

इन्द्र उवाच

प्रत्यानीताः परम भवता त्रायता नः स्वभागा दैत्याक्रान्तं हृदयकमलं त्वद्गृहं प्रत्यबोधि ।
कालग्रस्तं कियदिदमहो नाथ शुश्रूषतां ते मुक्तिस्तेषां न हि बहुमता नारसिंहापरैः किम् ॥

इन्द्रने कहा – पुरुषोत्तम! आपने हमारी रक्षा की है । आपने हमारे जो यज्ञभाग लौटाये हैं, वे वास्तवमें आप ( अन्तर्यामी ) - के ही हैं । दैत्योंके आतंकसे संकुचित हमारे हृदयकमलको आपने प्रफुल्लित कर दिया । वह भी आपका ही निवासस्थान है । यह जो स्वर्गादिका राज्य हमलोगोंको पुनः प्राप्त हुआ है, यह सब कालका ग्रास है । जो आपके सेवक हैं, उनके लिये यह है ही क्या? स्वामिन्! जिन्हें आपकी सेवाकी चाह है, वे मुक्तिका भी आदर नहीं करते । फिर अन्य भोगोंकी तो उन्हें आवश्यकता ही क्या ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 42पृष्ठ 1346

ऋषियों ने कहा— "पुरुषोत्तम! आपने तपस्या के द्वारा ही अपने में लीन हुए जगत् की फिर से रचना की थी और कृपा करके उसी आत्मतेजः स्वरूप श्रेष्ठ तपस्या का उपदेश हमारे लिये भी किया था। इस दैत्य ने उसी तपस्या का उच्छेद कर दिया था। शरणागतवत्सल! उस तपस्या की रक्षा के लिये आपने अवतार ग्रहण करके हमारे लिये फिर से उसी उपदेश का अनुमोदन किया है।"

पितरों ने कहा— "प्रभो! हमारे पुत्र हमारे लिये पिण्डदान करते थे, यह उन्हें बलात् छीनकर खा जाया करता था। जब वे पवित्र तीर्थ में या सङ्क्रान्ति आदि अवसर पर तर्पण करते थे, तब उसे भी यह पी जाता था। आज आपने अपने नखों से उसका पेट फाड़कर वह सब का सब लौटाकर मानो हमें दे दिया। आप समस्त धर्मों के एकमात्र रक्षक हैं। नृसिंहदेव! हम आपको नमस्कार करते हैं।"

स्तुति

पितर ऊचुः श्राद्धानि नोऽधिबुभुजे प्रसभं तनूजै-दत्तानि तीर्थसमयेऽप्यपिबत् तिलाम्बु ' ।
तस्योदरान्नखविदीर्णवपाद् य आर्च्छत् तस्मै नमो नृहरयेऽखिलधर्मगोप्त्रे ॥

पितरोंने कहा — प्रभो! हमारे पुत्र हमारे लिये पिण्डदान करते थे, यह उन्हें बलात् छीनकर खा जाया करता था । जब वे पवित्र तीर्थमें या संक्रान्ति आदिके अवसरपर नैमित्तिक तर्पण करते या तिलांजलि देते, तब उसे भी यह पी जाता । आज आपने अपने नखोंसे उसका पेट फाड़कर वह सब का सब लौटाकर मानो हमें दे दिया । आप समस्त धर्मोंके एकमात्र रक्षक हैं । नृसिंहदेव! हम आपको नमस्कार करते हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 44पृष्ठ 1347

सिद्धों ने कहा— "नृसिंहदेव! इस दुष्ट ने अपने योग और तपस्या के बल से हमारी योगसिद्ध गति छीन ली थी। अपने नखों से आपने इस घमण्डी को फाड़ डाला है। हम आपके चरणों में विनीत भाव से नमस्कार करते हैं।"

विद्याधरों ने कहा— "यह मूर्ख हिरण्यकशिपु अपने बल और वीरता के घमण्ड में चूर था। यहाँ तक कि हमने विविध धारणाओं से जो विद्या प्राप्त की थी, उसे इसने व्यर्थ कर दिया था। आपने युद्ध में यज्ञ-पशु की तरह इसको नष्ट कर दिया। अपनी लीला से नृसिंह बने हुए आपको हम नित्य-निरन्तर प्रणाम करते हैं।"

विद्याधरा ऊचुः विद्यां पृथग्धारणयानुराद्धां न्यषेधदज्ञो बलवीर्यदृप्तः ।
स येन संख्ये पशुवद्धतस्तं मायानृसिंहं प्रणताः स्म नित्यम् ॥

विद्याधरोंने कहा — यह मूर्ख हिरण्यकशिपु अपने बल और वीरताके घमंडमें चूर था । यहाँतक कि हम लोगोंने विविध धारणाओंसे जो विद्या प्राप्त की थी, उसे इसने व्यर्थ कर दिया था । आपने युद्धमें यज्ञपशुकी तरह इसको नष्ट कर दिया । अपनी लीलासे नृसिंह बने हुए आपको हम नित्य - निरन्तर प्रणाम करते हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 46पृष्ठ 1348

नागों ने कहा— "इस पापी ने हमारी मणियों और हमारी श्रेष्ठ स्त्रियों को भी छीन लिया था। आज उसकी छाती फाड़कर आपने हमारी पत्नियों को बड़ा आनन्द दिया है। प्रभो! हम आपको नमस्कार करते हैं।"

मनुओं ने कहा— "देवाधिदेव! हम आपके आज्ञाकारी मनु हैं। इस दैत्य ने हमलोगों की धर्म-मर्यादा भङ्ग कर दी थी। आपने उस दुष्ट को मारकर बड़ा उपकार किया है। प्रभो! हम आपके सेवक हैं। आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?"

मनवो वयं तव निदेशकारिणो दितिजेन देव परिभूतसेतवः ।
भवता खलः स उपसंहृतः प्रभो करवाम ते किमनुशाधि किङ्करान् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 48पृष्ठ 1349

प्रजापतियों ने कहा— "परमेश्वर! आपने हमें प्रजापति बनाया था, परन्तु इसके रोक देने से हम प्रजा की सृष्टि नहीं कर पाते थे। आपने इसकी छाती फाड़ डाली और यह जमीन पर सर्वदा के लिये सो गया। सत्त्वमय मूर्ति धारण करने वाले प्रभो! आपका यह अवतार संसार के कल्याण के लिये है।"

गन्धर्वों ने कहा— "प्रभो! हम आपके नाचने वाले, अभिनय करने वाले और सङ्गीत सुनाने वाले सेवक हैं। इस दैत्य ने अपने बल, वीर्य और पराक्रम से हमें अपना गुलाम बना रखा था। उसे आपने इस दशा को पहुँचा दिया। सच है, कुमार्ग से चलने वाले का भी क्या कभी कल्याण हो सकता है?"

चारणों ने कहा— "प्रभो! आपने सज्जनों के हृदय को पीड़ा पहुँचाने वाले इस दुष्ट को समाप्त कर दिया। इसलिये हम आपके उन चरण-कमलों की शरण में हैं, जिनके प्राप्त होते ही जन्म-मृत्यु रूप संसारचक्र से छुटकारा मिल जाता है।"

चारणा ऊचुः हरे तवाङ्घ्रिपङ्कजं भवापवर्गमाश्रिताः ।
यदेष साधुहृच्छयस्त्वयासुरः समापितः ॥

चारणोंने कहा — प्रभो! आपने सज्जनोंके हृदयको पीड़ा पहुँचानेवाले इस दुष्टको समाप्त कर दिया । इसलिये हम आपके उन चरणकमलोंकी शरणमें हैं, जिनके प्राप्त होते ही जन्म - मृत्युरूप संसारचक्रसे छुटकारा मिल जाता है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 51पृष्ठ 1349

यक्षों ने कहा— "भगवन्! अपने श्रेष्ठ कर्मों के कारण हम आपके सेवकों में प्रधान गिने जाते थे, परन्तु हिरण्यकशिपु ने हमें अपनी पालकी ढोने वाला कहार बना लिया। प्रकृति के नियामक परमात्मा! इसके कारण होने वाले अपने निजजनों के कष्ट जानकर ही आपने इसे मार डाला है।"

किम्पुरुषों ने कहा— "हम लोग अत्यन्त तुच्छ किम्पुरुष हैं और आप सर्वशक्तिमान् महापुरुष हैं। जब सत्पुरुषों ने इसका तिरस्कार किया, तभी आज आपने इस कुपुरुष-असुराधम को नष्ट कर दिया।"

वैतालिकों ने कहा— "भगवन्! बड़ी-बड़ी सभाओं और ज्ञान-यज्ञों में आपके निर्मल यश का गान करके हम बड़ी प्रतिष्ठा-पूजा प्राप्त करते थे। इस दुष्ट ने हमारी वह आजीविका ही नष्ट कर दी थी। बड़े सौभाग्य की बात है कि महारोग के समान इस दुष्ट को आपने जड़-मूल से उखाड़ दिया।"

भगवान के पार्षदों ने कहा— "शरणागतवत्सल! सम्पूर्ण लोकों को शान्ति प्रदान करने वाले आपका यह अलौकिक नृसिंह रूप हमने आज ही देखा है। भगवन्! यह दैत्य आपका वही आज्ञाकारी सेवक था, जिसे सनकादि ने शाप दे दिया था। हम समझते हैं, आपने कृपा करके इसके उद्धार के लिये ही इसका वध किया है।"

नारद उवाच

एवं सुरादयः सर्वे ब्रह्मरुद्रपुरःसराः ।
नोपैतुमशकन्मन्यूसंरम्भं सुदुरासदम् ॥

नारदजी कहते हैं — इस प्रकार ब्रह्मा, शंकर आदि सभी देवगण नृसिंहभगवान्के क्रोधावेशको शान्त न कर सके और न उनके पास जा सके । किसीको उसका ओर - छोर नहीं दीखता था ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 1पृष्ठ 1353

नारद जी कहते हैं— इस प्रकार ब्रह्मा, शङ्कर आदि सभी देवगण नृसिंह भगवान के क्रोधावेश को शान्त न कर सके और न उनके पास जा सके। किसी को उसका ओर-छोर नहीं दीखता था। देवताओं ने उन्हें शान्त करने के लिये स्वयं लक्ष्मीजी को भेजा। उन्होंने जाकर जब नृसिंह भगवान का वह महान अद्भुत रूप देखा, तब भयवश वे भी उनके पास तक न जा सकीं। उन्होंने ऐसा अनूठा रूप न कभी देखा था और न सुना था।

तब ब्रह्माजी ने अपने पास ही खड़े प्रह्लाद को यह कहकर भेजा— "बेटा! तुम्हारे पिता पर ही तो भगवान कुपित हुए थे। अब तुम्हीं उनके पास जाकर उन्हें शान्त करो।"

भगवान के परम प्रेमी प्रह्लाद ने 'आज्ञा' कहकर और धीरे से भगवान के पास जाकर हाथ जोड़ पृथ्वी पर साष्टाङ्ग लेट गए। नृसिंह भगवान ने देखा कि नन्हा-सा बालक उनके चरणों के पास पड़ा हुआ है। उनका हृदय दया से भर गया। उन्होंने प्रह्लाद को उठाकर उनके सिर पर अपना वह कर-कमल रख दिया, जो काल-सर्प से भयभीत पुरुषों को अभयदान करने वाला है।

भगवान के कर-कमलों का स्पर्श होते ही प्रह्लाद के बचे-खुचे अशुभ संस्कार भी झड़ गए। तत्काल उन्हें परमात्म-तत्त्व का साक्षात्कार हो गया। उन्होंने बड़े प्रेम और आनन्द में मग्न होकर भगवान के चरण-कमलों को अपने हृदय में धारण कर लिया। उस समय उनका सारा शरीर पुलकित हो गया, हृदय में प्रेम की धारा प्रवाहित होने लगी और नेत्रों से आनन्दाश्रु झरने लगे।

प्रह्लाद जी भावपूर्ण हृदय और निर्निमेष नयनों से भगवान को देख रहे थे। भाव-समाधि से स्वयं एकाग्र हुए मन के द्वारा उन्होंने भगवान के गुणों का चिन्तन करते हुए प्रेम-गद्गद वाणी से स्तुति की।

प्रह्लाद जी ने कहा— "ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि-मुनि और सिद्ध पुरुषों की बुद्धि निरन्तर सत्त्वगुण में ही स्थित रहती है। फिर भी वे अपनी धारा-प्रवाह स्तुति और अपने विविध गुणों से आपको अब तक सन्तुष्ट नहीं कर सके। फिर मैं तो घोर असुर-जाति में उत्पन्न हुआ हूँ! क्या आप मुझसे सन्तुष्ट हो सकते हैं? मैं समझता हूँ कि धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या, ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योग— ये सभी गुण परमपुरुष भगवान को सन्तुष्ट करने में समर्थ नहीं हैं; परन्तु भक्ति से तो आप गजेन्द्र पर भी सन्तुष्ट हो गये थे।"

"समझता हूँ कि धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या, ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योग— ये सभी गुण परमपुरुष भगवान को सन्तुष्ट करने में समर्थ नहीं हैं; परन्तु भक्ति से तो आप गजेन्द्र पर भी सन्तुष्ट हो गये थे।"

प्रह्लाद ने अपने नेत्रों को भरकर, अत्यन्त शान्त भाव से भगवान नृसिंह की स्तुति करनी आरम्भ की। वह कहने लगा— "प्रभो! आप बड़े-बड़े सुन्दर-सुन्दर अवतार ग्रहण करके इस जगत् के कल्याण और अभ्युदय के लिये तथा उसे आत्मानन्द की प्राप्ति कराने के लिये अनेकों प्रकार की लीलाएँ करते हैं। जिस असुर को मारने के लिये आपने क्रोध किया था, वह मारा जा चुका है। अब आप अपना क्रोध शान्त कीजिये। जैसे बिच्छू और साँप की मृत्यु से सज्जन भी सुखी ही होते हैं, वैसे ही इस दैत्य के संहार से सभी लोगों को बड़ा सुख मिला है। अब सब आपके शान्त स्वरूप के दर्शन की बाट जोह रहे हैं।"

बालक प्रह्लाद का हृदय भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण से भरा था। उसने अत्यन्त करुण स्वर में कहा— "नृसिंहदेव! भय से मुक्त होने के लिये भक्तजन आपके इस रूप का स्मरण करेंगे। मैं तो अत्यन्त कृपण और दुःसह, क्रोधमय संसार चक्र के दानों से घिर गया हूँ; हे प्रभु! आप मेरे चरणों के मूल में स्थित हैं, मैं अपने कर्मों से बन्धा हुआ हूँ। कृपा करके मुझे अपना शरण दें, ताकि मैं आपकी सेवा-भक्ति प्राप्त कर सकूँ।"

प्रह्लाद की वाणी में अटूट विश्वास था। उसने आगे कहा— "प्रभो! आप हमारे प्रिय हैं और अहेतुक हितैषी सुहृद हैं। आप ही वास्तव में सबके परमाराध्य हैं। मैं ब्रह्माजी द्वारा गायी हुई आपकी लीला-कथाओं का गान करता हुआ बड़ी सुगमता से रागादि प्राकृत गुणों से मुक्त होकर इस संसार की कठिनाइयों को पार कर जाऊँगा; क्योंकि आपके चरणयुगलों में रहनेवाले भक्त परमहंस महात्माओं का सङ्ग तो मुझे मिलता ही रहेगा।"

सोऽहं प्रियस्य सुहृदः परदेवताया लीलाकथास्तव नृसिंह विरिञ्चगीताः ।
अञ्चस्तितर्म्यनुगृणन्गुणविप्रमुक्तो दुर्गाणि ते पदयुगालयहंससङ्गः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 18पृष्ठ 1356

उसने भगवान के विराट स्वरूप का स्मरण करते हुए कहा— "भगवान नृसिंह! इस लोक में दुःखी जीवों का दुःख मिटाने के लिये जो उपाय माना जाता है, वह आपकी उपेक्षा करने पर एक क्षण के लिये ही होता है। यहाँ तक कि मा-बाप बालक की रक्षा नहीं कर सकते, औषधि रोग नहीं मिटा सकती और समुद्र में डूबते हुए को नौका नहीं बचा सकती। सत्त्वादि गुणों के कारण भिन्न-भिन्न स्वभाव के जितने भी ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ और काला आदि कनिष्ठ कर्ता हैं, उनको प्रेरित करनेवाले आप ही हैं। वे आपकी प्रेरणा से जिस आधार में स्थित होकर, जिस निमित्त से, मिट्टी आदि उपकरणों से, जिस समय, जिन साधनों द्वारा, जिस अदृष्ट की सहायता से, जिस प्रयोजन के उद्देश्य से, जिस विधि से जो कुछ उत्पन्न करते हैं या रूपान्तरित करते हैं— वह सब और वह सब आपका ही स्वरूप है।"

प्रह्लाद ने अपने पिता के शासन का स्मरण किया और कहा— "स्वर्ग में मिलने वाली समस्त लोकपालों की आयु, लक्ष्मी और ऐश्वर्य मैंने खूब देख लिये। जिस समय मेरे पिता तनिक क्रोध करके हँसते थे और उससे उनकी भौंहें थोड़ी टेढ़ी हो जाती थीं, तब उन स्वर्ग की सम्पत्तियों के लिये कहीं ठिकाना नहीं रह जाता था, वे लुटती फिरती थीं। किन्तु आपने मेरे उन पिता को भी मार डाला। इसलिये मैं ब्रह्मलोक तक की आयु, लक्ष्मी, ऐश्वर्य और वे इन्द्रियभोग, जिन्हें संसार के प्राणी चाहा करते हैं, नहीं चाहता; क्योंकि मैं जानता हूँ कि अत्यन्त शक्तिशाली काल का रूप धारण करके आपने उन्हें ग्रस रखा है। इसलिये मुझे आप अपने दासों की सन्निधि में ले चलिये।"

तस्मादमूस्तनुभृतामहमाशिषो ज्ञ आयुः श्रियं विभवमैन्द्रियमाविरिञ्चात् ।
नेच्छामि ते विलुलितानुरुविक्रमेण कालात्मनोपनय मां निजभृत्यपार्श्वम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 24पृष्ठ 1358

उसने अपनी विवशता बताते हुए कहा— "परन्तु भगवन! देवर्षि नारद ने मुझे अपनाकर बचा लिया था। तब भला, मैं आपकी सेवा कैसे छोड़ सकता हूँ? अनन्त! जिस समय मेरे पिता ने अन्याय करने के लिये कमर कसकर हाथ में खड़ग ले लिया और कहने लगा कि 'यदि मेरे सिवा कोई और ईश्वर है तो तुझे बचा ले, मैं तेरा सिर काटता हूँ', उस समय आपने मेरे प्राणों की रक्षा की और मेरे पिता का वध किया। मैं तो समझता हूँ कि आपने अपने प्रेमी भक्त सनकादि ऋषियों का वचन सत्य करने के लिये ही वैसा किया था।"

प्रह्लाद ने संसार के कार्य-कारण के रहस्य को खोलते हुए कहा— "भगवन! यह जो कुछ कार्य-कारण के रूप में प्रतीत हो रहा है, वह सब आप ही हैं और इससे भिन्न भी आप ही हैं। अपने-पराये का भेद-भाव तो अर्थहीन शब्दों की माया है; क्योंकि जिससे जिसका जन्म, स्थिति, लय और प्रकाश होता है, वह उसका स्वरूप ही होता है— जैसे बीज और वृक्ष कारण और कार्य की दृष्टि से भिन्न-भिन्न हैं, तो भी गन्ध-तन्मात्र की दृष्टि से दोनों एक ही हैं। यह ब्रह्माण्ड आपका ही शरीर है।"

त्वां वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था ।
यद् यस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च तद् वै तदेव वसुकालवदष्टितर्वोः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 31पृष्ठ 1360

उसने सृष्टि के आरम्भ की कथा सुनाते हुए कहा— "पहले यह आपमें ही लीन था। जब प्रलयकालीन जल के भीतर शेषशय्या पर शयन करने वाले आपने योगनिद्रा की समाधि त्याग दी, तब वटके बीज से विशाल वृक्ष के समान आपकी नाभि से ब्रह्माण्ड-कमल उत्पन्न हुआ। उस पर सूक्ष्मदर्शी ब्रह्माजी प्रकट हुए। जब उन्हें कमल के सिवा और कुछ भी दिखाई न पड़ा, तब वे आपको अपने से बाहर समझकर जल के भीतर सौ वर्ष तक ढूँढ़ते रहे। परन्तु वहाँ उन्हें कुछ नहीं मिला। यह ठीक ही है, क्योंकि अङ्कुर उग आने पर उसमें व्याप्त बीज को कोई बाहर अलग कैसे देख सकता है?"

तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-स्त्वां बीजमात्मनि ततं स्वबहिर्विचिन्त्य ।
नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो जातेऽङ्कुरे कथमु होपलभेत बीजम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 34पृष्ठ 1360

प्रह्लाद ने आगे कहा— "ब्रह्माजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे हारकर कमल पर बैठ गये। बहुत समय बीतने के बाद तीव्र तपस्या करने से जब उनका हृदय शुद्ध हो गया, तब उन्हें अपने शरीर में ही आपके सूक्ष्म स्वरूप का साक्षात्कार हुआ— ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वी में व्याप्त उसकी अति सूक्ष्म तन्मात्रा गन्ध का होता है। वह विराट पुरुष सहस्रों मुख, चरण, सिर, हाथ और नेत्रों से सम्पन्न था; चौदहों लोक उसके विभिन्न अङ्गों के रूप में शोभायमान थे। उसे देखकर ब्रह्माजी को बड़ा आनन्द हुआ।"

उसने भगवान के अवतारों की महिमा गाते हुए कहा— "जब रजोगुण और तमोगुण रूप मधु और कैटभ नाम के दो बड़े बलवान दैत्य वेदों को चुराकर ले गये, तब आपने हयग्रीव अवतार ग्रहण किया और उन दोनों को मारकर सत्त्वगुण रूप श्रुतियाँ ब्रह्माजी को लोटा दीं। वह सत्त्वगुण ही आपका अत्यन्त प्रिय शरीर है। हे पुरुषोत्तम! आप मनुष्य, पशु, पक्षी, ऋषि, देवता और मत्स्य आदि अवतार लेकर लोकों का पालन करते हैं और प्रत्येक युग में धर्म की रक्षा करते हैं। कलियुग में आप छिपकर गुप्तरूप से रहते हैं, इसलिये आपका एक नाम 'त्रियुग' भी है।"

इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारै-कान् विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान् ।
धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स त्वम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 38पृष्ठ 1361

प्रह्लाद ने संसार के दुःखी लोगों के प्रति करुणा व्यक्त की— "मैं उन प्राणियों के लिये शोक कर रहा हूँ, जो आपके गुणगान से विमुख रहकर इन्द्रियों के विषयों का झूठा सुख प्राप्त करने के लिये सिर पर सारे संसार का भार ढोते रहते हैं। मेरे स्वामी! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तो अपनी मुक्तिके लिये निर्जन वन में जाकर मौनव्रत धारण कर लेते हैं और दूसरों की भलाई के लिये कोई प्रयत्न नहीं करते। परन्तु मेरी दशा दूसरी है; मैं इन भूले हुए असहाय गरीबों को छोड़कर अकेला मुक्त नहीं होना चाहता। इन भटकते हुए प्राणियों के लिये आपके सिवा और कोई सहारा नहीं दिखता।"

उसने सृष्टि के तत्त्वों का वर्णन करते हुए कहा— "वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, पञ्चतन्मात्राएँ, प्राण, इन्द्रिय, मन, चित्त, अहङ्कार, सम्पूर्ण जगत् एवं सगुण और निर्गुण— सब कुछ केवल आप ही हैं। मन और वाणी के द्वारा जो कुछ निरूपण किया गया है, वह सब आपसे पृथक् नहीं है। हे समग्र कीर्ति के आश्रय! ये सत्त्वादि गुण और इनके परिणाम महत्तत्त्वादि, देवता या मनुष्य कोई भी आपका स्वरूप जानने में समर्थ नहीं है; क्योंकि ये सब आदि-अन्त वाले हैं और आप अनादि एवं अनन्त हैं। ऐसा विचार करके ज्ञानीजन शब्दों की माया से ऊपर हो जाते हैं।"

अन्त में प्रह्लाद ने भक्ति के मार्ग को बताते हुए कहा— "परम पूज्य! आपकी सेवा के छः अङ्ग हैं— नमस्कार, स्तुति, समस्त कर्मों का समर्पण, सेवा-पूजा, चरणकमलों का चिन्तन और लीला-कथा का श्रवण। इस षडङ्ग-सेवा के बिना आपके चरण कमलों की भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? और भक्ति के बिना आपकी प्राप्ति कैसे होगी? प्रभो! आप तो अपने परम प्रिय भक्तजनों और परमहंसों के ही सर्वस्व हैं।"

स्तुति

तत् तेऽर्हत्तम नमः स्तुतिकर्मपूजाः कर्म स्मृतिश्चरणयोः श्रवणं कथायाम् ।
संसेवया त्वयि विनेति षडङ्गया किं भक्तिं जनः परमहंसगतौ लभेत ॥

परम पूज्य! आपकी सेवाके छः अंग हैं— नमस्कार, स्तुति, समस्त कर्मोंका समर्पण, सेवा - पूजा, चरणकमलोंका चिन्तन और लीला - कथाका श्रवण । इस षडंगसेवाके बिना आपके चरणकमलोंकी भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? और भक्तिके बिना आपकी प्राप्ति कैसे होगी? प्रभो! आप तो अपने परम प्रिय भक्तजनोंके, परमहंसोंके ही सर्वस्व हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 50पृष्ठ 1365

इस प्रकार प्रह्लाद ने प्रकृति और गुणों से रहित भगवान के स्वरूप का वर्णन कर अपना सिर झुका लिया। नृसिंह भगवान का क्रोध शान्त हो गया और वे बड़े प्रेम तथा प्रसन्नता से बोले— "परम कल्याण स्वरूप प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। दैत्यश्रेष्ठ! मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो। मैं जीवों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाला हूँ।"

नारद उवाच

श्रीभगवानुवाच प्रह्लाद भद्र भद्रं ते प्रीतोऽहं तेऽसुरोत्तम ।
वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम् ॥

श्रीनृसिंहभगवान्ने कहा— परम कल्याण स्वरूप प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो । दैत्यश्रेष्ठ! मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ । तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो । मैं जीवोंकी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 52पृष्ठ 1365

In English

The Boons of Hiranyakashipu and the Devotion of Prahlada

Hiranyakashipu receives rare boons from Brahma to become an invincible emperor. Despite his power, he grows arrogant and begins to hate his son, Prahlada, because the boy is a devoted follower of Vishnu. Hiranyakashipu orders his soldiers to kill Prahlada for his beliefs.

This page answers

  • What boons did hiranyakashipu ask brahma for?
  • Why did hiranyakashipu hate his son prahlada?
  • How did prahlada explain his devotion to vishnu?
  • What did the gods hear in the sky regarding hiranyakashipu?

Also written: Prahradacharita, Prahrada, Hiranyakashipu, Prahlada, Brahma, Yudhishthira, Shanda, Amarka, Shukracharya, Indra, Pitara, Siddha, Vidyadhara, Lakshmi, Rishi Muni, प्रह्रादचरित