पुरंजनोपाख्यान : कर्मकाण्ड और आसक्ति के जाल से मुक्त होकर परम कल्याण कैसे प्राप्त करें?
आसक्ति का त्याग और आत्मज्ञान
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25–28 · पृष्ठ 872–902
3,668 शब्द · 19 मिनटका पाठ · 33 श्लोक
नारद ने राजा प्राचीनबर्हिक से कहा
कर्मकाण्ड में फंसे राजा को अध्यात्म का उपदेश देने हेतु
राजकुमारों! इस लोक में सब प्रकार के कल्याण-साधनों में मोक्षदायक ज्ञान ही सबसे श्रेष्ठ है। जो पुरुष ज्ञान की नौका पर चढ़ जाता है, वह इस दुस्तर संसारसागर को अनायास ही पार कर लेता है। यदि तुम श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करोगे, तो सुगमता से भगवान की प्रसन्नता प्राप्त कर लोगे। भगवान ही सम्पूर्ण कल्याण के एकमात्र प्यारे हैं; अतः मेरे गाये हुए इस स्तोत्र के गान से उन्हें प्रसन्न करके, स्थिरचित्त होकर तुम उनसे जो कुछ चाहोगे, प्राप्त कर सकोगे। जो पुरुष उषःकाल में उठकर इसे श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर सुनता या सुनाता है, वह सब प्रकार के कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
मद्गीतगीतात्सुप्रीताच्छ्रेयसामेकवल्लभात् ॥
मैंने तुम्हें जो यह परमपुरुष परमात्मा का स्तोत्र सुनाया है, इसे एकाग्रचित्त से जपते हुए महान तपस्या करो। तपस्या पूर्ण होने पर इसी से तुम्हें अभीष्ट फल प्राप्त हो जाएगा। प्रचेताओं ने भगवान रुद्र की बड़ी भक्तिभाव से पूजा की और उसके पश्चात् वे राजकुमारों के सामने ही अन्तर्धान हो गए। वे सभी जल में खड़े रहकर भगवान रुद्र द्वारा बताए गए स्तोत्र का जप करते हुए दस हजार वर्ष तक तपस्या करते रहे।
इदं यः कल्य उत्थाय प्राञ्जलिः श्रद्धयान्वितः ।
शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यो मुच्यते कर्मबन्धनैः ॥
इन दिनों राजा प्राचीनबर्हिक का चित्त कर्मकाण्ड में बहुत रम गया था। जब उन्हें अध्यात्म-विद्या में विशारद और परम कृपालु नारदजी ने उपदेश दिया, तब उन्होंने कहा— 'राजन्! इन कर्मों के द्वारा तुम अपना कौन-सा कल्याण करना चाहते हो? दुःख के आत्यन्तिक नाश और परमानन्द की प्राप्ति ही तो वास्तविक कल्याण है; वह केवल कर्मों से नहीं मिलता।'
श्रेयस्त्वं कतमद्राजन् कर्मणाऽऽत्मन ईहसे ।
दुःखहानिः सुखावाप्तिः श्रेयस्तन्नेह चेष्यते ॥
फिर प्रचेताओंने शंकरजीकी बड़े भक्तिभावसे पूजा की । इसके पश्चात् वे उन राजकुमारोंके सामने ही अन्तर्धान हो गये ॥१ ॥ सब - के - सब प्रचेता जलमें खड़े रहकर भगवान् रुद्रके बताये स्तोत्रका जप करते हुए दस हजार वर्षतक तपस्या करते रहे ॥२ ॥ इन दिनों राजा प्राचीनबर्हिका चित्त कर्मकाण्डमें बहुत रम गया था । उन्हें अध्यात्मविद्या - विशारद परम कृपालु नारदजीने उपदेश दिया || ३ || उन्होंने कहा कि ' राजन्! इन कर्मोंके द्वारा तुम अपना कौन - सा कल्याण करना चाहते हो? दुःखके आत्यन्तिक नाश और परमानन्दकी प्राप्तिका नाम कल्याण है; वह तो कर्मोंसे नहीं मिलता '
राजा ने उत्तर दिया— 'महाभाग नारदजी! मेरी बुद्धि कर्म में फँसी हुई है, इसलिए मुझे परम कल्याण का कोई पता नहीं है। आप मुझे विशुद्ध ज्ञान का उपदेश दीजिये, जिससे मैं इस कर्म-बन्धन से छूट जाऊँ।'
इति सन्दिश्य भगवान् बार्हिषदैरभिपूजितः ।
पश्यतां राजपुत्राणां तत्रैवान्तर्दधे हरः ॥
नारदजी ने कहा— 'देखो, देखो राजन्! तुमने यज्ञ में निर्दयतापूर्वक जिन हजारों पशुओं की बलि दी है— उन्हें आकाश में देखो। ये सब तुम्हारे द्वारा प्राप्त हुई पीड़ाओं को याद करते हुए, बदला लेने के लिये तुम्हारी बाट देख रहे हैं। जब तुम मरकर परलोक में जाओगे, तब ये अत्यन्त क्रोध में भरकर तुम्हें अपने लोहे जैसे सींगों से छेदेंगे।' फिर उन्होंने कहा— 'अच्छा, इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन उपाख्यान सुनाता हूँ। वह राजा पुरञ्जन का चरित्र है, उसे तुम मुझसे सावधान होकर सुनो।'
भो भोः प्रजापते राजन् पशून् पश्य त्वयाध्वरे ।
संज्ञापिताञ्जीवसङ्घान्निर्घृणेन सहस्रशः ॥
राजन्! पूर्वकाल में पुरञ्जन नाम का एक बड़ा यशस्वी राजा था। उसका अविज्ञात नामक एक मित्र था, जिसकी चेष्टाओं को कोई समझ नहीं सकता था। राजा पुरञ्जन अपने रहने योग्य स्थान की खोज में सारी पृथ्वी में घूमा; किन्तु जब उसे कोई अनुरूप स्थान न मिला, तब वह कुछ उदास-सा हो गया। उसे तरह-तरह के भोगों की लालसा थी, पर उन्हें भोगने के लिये उसने संसार में जितने नगर देखे, उनमें से कोई भी उसे ठीक न जँचा।
एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव ।
सम्परेतमयःकूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः ॥
उसकी पुरञ्जनपुरी के महलों के फर्श नीलम, स्फटिक, वैदूर्य, मोती, पन्ने और लालों की बनी हुई थीं। अपनी कान्तिके कारण वह नगरी नागों की राजधानी भोगवतीपुरी के समान जान पड़ती थी। वहाँ अनेकों सभा भवन, चौराहे, सड़कें, क्रीडाभवन, बाजार, विश्राम-स्थान और मूँगे के चबूतरे सुशोभित थे। नगर के बाहर दिव्य वृक्षों और लताओं से पूर्ण एक सुन्दर बाग था, जिसके बीच में एक सरोवर सुशोभित था। सरोवर के तट पर वृक्षों की डालियाँ शीतल झरनों के जलकणों से मिली हुई वासन्ती वायु के झरोखों से हिल रही थीं। वहाँ के वन्य पशु मुनिजनोचित अहिंसा आदि व्रतों का पालन करने वाले थे, जिससे किसी को कोई कष्ट नहीं पहुँचता था।
नीलस्फटिकवैदूर्यमुक्तामरकतारुणैः ।
क्लृप्तहर्म्यस्थलीं दीप्तां श्रिया भोगवतीमिव ॥
उसके महलोंकी फर्शो नीलम, स्फटिक, वैदूर्य, मोती, पन्ने और लालोंकी बनी हुई थीं । अपनी कान्तिके कारण वह नागोंकी राजधानी भोगवतीपुरीके समान जान पड़ता था ।
तभी एक सुन्दरी वहाँ आयी। उसके साथ दस सेवक थे, जिनमें से प्रत्येक सौ-सौ नायिकाओं का पति था। उसका द्वारपाल एक पाँच फन वाला साँप था जो उसकी रक्षा करता था। वह सुन्दरी भोली-भाली किशोरी थी, जिसकी नासिका, दन्तपङ्क्ति और कपोल अत्यन्त सुन्दर थे। उसके कानों में कुण्डल झिलमिला रहे थे। वह पीले रङ्ग की साड़ी और सोने की करधनी पहने हुए थी; चलते समय उसके चरणों से नूपुरों की झनकार सुनाई देती थी। वह साक्षात् किसी देवी सी जान पड़ती थी। वह अपनी किशोरावस्था के सुगठित स्तनों को लज्जावश बार-बार अपने अञ्चल से ढकती जाती थी।
तामाह ललितं वीरः सव्रीडस्मितशोभनाम् ।
स्निग्धेनापांगपुङ्खेन स्पृष्टः प्रेमोद्भ्रमद्भुवा ॥
राजा पुरञ्जन ने उसे देखते ही कहा— 'समय कहाँ से आ रही हो, भीरु! इस पुरी के समीप तुम क्या करना चाहती हो? सुभ्रु! तुम्हारे साथ ये दस सेवक कौन हैं और तुम्हारे आगे-आगे चलने वाला यह सर्प कौन है? तुम साक्षात् लज्जादेवी हो अथवा उमा, रमा और ब्रह्माणी में से कोई हो? यहाँ वन में मुनियों की तरह एकान्तवास करके क्या अपने पतिदेव को खोज रही हो? तुम्हारे प्राणनाथ तो 'तुम उनके चरणों की कामना करती हो', इतने से ही पूर्णकाम हो जाएँगे। यदि तुम साक्षात् कमलादेवी हो, तो तुम्हारे हाथ का क्रीड़ा-कमल कहाँ गिर गया?
अर्हस्यलङ्कर्तुमदभ्रकर्मणा लोकं परं श्रीरिव यज्ञपुंसा ॥
परन्तु आज तुम्हारे कटाक्षों ने मेरे मन को बेकाबू कर दिया है। तुम्हारी लजीली मुस्कान और भौंहों के सङ्केत पाकर यह शक्तिशाली कामदेव मुझे पीड़ित कर रहा है। इसलिए सुन्दरी! अब तुम्हें मुझ पर कृपा करनी चाहिए। तुम्हारे मुख से निकले वाक्य बहुत मीठे हैं, परन्तु वह मुख तो लाज के मारे मेरी ओर होता ही नहीं। जरा ऊँचा करके अपने उस सुन्दर मुखड़े का मुझे दर्शन तो कराओ!'
निरृतिर्नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरंजनः ।
वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वितः ॥
पाँचवाँ द्वार था, उसमें होकर वह रसज्ञ और विपणके साथ क्रमशः बहूदन और आपण नामके देशोंको जाता था ॥४९ ॥ पुरीके दक्षिणकी ओर जो पितृहू नामका द्वार था, उसमें होकर राजा पुरंजन श्रुतधरके साथ दक्षिणपांचाल देशको जाता था ॥५० ॥ उत्तरकी ओर जो देवहू नामका द्वार था, उससे श्रुतधरके ही साथ वह उत्तरपांचाल देशको जाता था ॥ ५१ ॥ पश्चिम दिशामें आसुरी नामका दरवाजा था, उसमें होकर वह दुर्मदके साथ ग्रामक देशको जाता था ॥५२ ॥ तथा निरृति नामका जो दूसरा पश्चिम द्वार था, उससे लुब्धकके साथ वह वैशस नामके देशको जाता था ।
जब राजा पुरञ्जन ने इस प्रकार याचना की, तब उस बाला ने हँसते हुए उसका अनुमोदन किया, क्योंकि वह भी राजा को देखकर मोहित हो चुकी थी। वह कहने लगी— 'नरश्रेष्ठ! हमें अपने उत्पन्न करने वाले का ठीक-ठीक पता नहीं है और न हम अपने किसी नाम या गोत्र को जानती हैं। भला, आपको छोड़कर मैं और किसके साथ रमण करूंगी? दूसरे लोग तो न रति-सुख को जानते हैं, न विहित भोगों को भोगते हैं, न परलोक का विचार करते हैं और न कल क्या होगा— इसका ध्यान रखते हैं; अतएव वे पशु तुल्य हैं।
इत्थं पुरंजनं नारी याचमानमधीरवत् ।
अभ्यनन्दत तं वीरं हसन्ती वीर मोहिता ॥
अहो! इस लोक में गृहस्थाश्रम में ही धर्म, अर्थ, काम, सन्तान सुख, मोक्ष और स्वर्गादि की प्राप्ति हो सकती है। संसार त्यागी यतिजन तो इन सबकी कल्पना भी नहीं कर सकते। महापुरुषों का कथन है कि इस लोक में पितर, देव, ऋषि और मनुष्य— सबके कल्याण का एकमात्र आश्रय गृहस्थाश्रम ही है। वीर शिरोमणे! लोक में मेरी जैसी कौन स्त्री होगी, जो आप जैसे सुप्रसिद्ध, उदारचित्त और सुन्दर पति को वरण न करेगी? आपकी इन सुकोमल भुजाओं में स्थान पाने के लिये किस कामिनी का चित्त न ललचावेगा? आप तो अपनी करुणापूर्ण दृष्टि से हम जैसी अनाथाओं के मानसिक सन्ताप को शान्त करने के लिये ही पृथ्वी में विचर रहे हैं।'
कस्या मनस्ते भुवि भोगिभोगयोः स्त्रिया न सज्जेदद्भुजयोर्महाभुज ।
योऽनाथवर्गाधिमलं घृणोद्धत-स्मितावलोकेन चरत्यपोहितुम् ॥
उस नगर के पाँच द्वार थे। पाँचवाँ द्वार वह था जिससे वह रसज्ञ और विपण के साथ क्रमशः बहूदन और आपण नाम के देशों को जाता था। पुरी के दक्षिण की ओर 'पितृहू' नामक द्वार था, जिससे वह श्रुतधर के साथ दक्षिण पाञ्चाल देश जाता था। उत्तर की ओर 'देवहू' नामक द्वार से वह उत्तर पाञ्चाल जाता था। पश्चिम दिशा में 'आसुरी' नामक दरवाजा था, जिससे वह दुर्मद के साथ ग्रामक देश जाता था; और दूसरा पश्चिम द्वार 'निरृति' था, जिससे वह लुब्धक के साथ वैशस देश जाता था। इस नगर के निवासियों में निर्वाक् और पेशस्कृत् नामक दो नागरिक अन्धे थे। राजा पुरञ्जन आँख वाले नागरिकों का अधिपति होने पर भी इन्हीं की सहायता से जहाँ-तहाँ जाता था।
पितृहूर्नृप पुर्या द्वार्दक्षिणेन पुरंजनः ।
राष्ट्रं दक्षिणपंचालं याति श्रुतधरान्वितः ॥
राजा पुरञ्जन अपनी सुन्दरी रानी के द्वारा ठगा गया; सारा प्रकृति-वर्ग ही उसे धोखा देने लगा। वह मूर्ख विवश होकर, इच्छा न होने पर भी, खेल के लिये घर पर पाले हुए बन्दर के समान अनुकरण करता रहता था। कभी उसकी प्रिया शोकाकुल होती तो वह भी अत्यन्त दीन के समान व्याकुल हो जाता; जब वह प्रसन्न होती, तो वह भी प्रसन्न हो जाता।
महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत ॥
श्रीनारदजी बोले— हे बर्हिष्मन्! उस दिन राजा को अपनी प्रिया को क्षणभर के लिए भी छोड़ना अत्यन्त कठिन लग रहा था, किन्तु उस दिन उसे शिकार का ऐसा तीव्र शौक लगा कि उसने अपनी सुन्दरी की परवाह न की और बड़े गर्व से धनुष-बाण चढ़ाकर आखेट के लिए निकल पड़ा। इस समय उसकी आसुरी प्रवृत्ति बढ़ जाने के कारण उसका चित्त बड़ा कठोर और दयाशून्य हो गया था; इस उच्छृङ्खल भाव में उसने अपने तीखे बाणों से अनेक निर्दोष जङ्गली जानवरों का वध कर डाला। देखते ही देखते उसके बाणों से छिन्न-भिन्न होकर अनेकों जीव बड़े कष्ट के साथ प्राण त्यागने लगे। उसका वह निर्दयतापूर्ण जीव-संहार देखकर वहाँ उपस्थित सभी दयालु पुरुष अत्यन्त दुःखी हुए, वे इस दृश्य को सह नहीं पा रहे थे।
स एकदा महेष्वासो रथं पञ्चाश्वमाशुगम् ।
द्वीषं द्विचक्रमेकाक्षं त्रिवेणुं पञ्चबन्धुरम् ॥
राजा पुरञ्जन ने खरगोश, सूअर, भैंसे, नीलगाय, कृष्णमृग और साही जैसे अनेक मेध्य पशुओं का वध किया और अन्ततः वह बहुत थक गया। भूख और प्यास से अत्यन्त शिथिल होकर वह वन से लौटकर अपने राजमहल आया। वहाँ उसने यथायोग्य रीति से स्नान और भोजन करके कुछ विश्राम किया ताकि थकान दूर हो सके। तत्पश्चात, गन्ध, चन्दन और मालाओं से सुसज्जित होकर, शरीर पर सुन्दर आभूषण पहनकर जब वह तैयार हुआ, तब उसे अपनी प्रिया की याद आई। वह भोजनादि से तृप्त था, हृदय आनन्दित था, मद से उन्मत्त और काम से व्यथित होकर अपनी सुन्दरी भार्या को ढूँढने लगा; किन्तु उसे वह कहीं भी दिखाई नहीं दी।
एकरश्म्येकदमनमेकनीडं द्विकूबरम् ।
पञ्चप्रहरणं सप्तवरूथं पञ्चविक्रमम् ॥
चित्त में उदास होकर उसने अन्तःपुर की स्त्रियों से पूछा— “सुन्दरियों! क्या तुम सब अपनी स्वामिनी के सहित पहले की तरह कुशल हो? आज इस घर की सम्पत्ति पहले जैसी सुहावनी क्यों नहीं जान पड़ती? यदि घर में माता या पतिपरायणा भार्या न हो, तो वह घर बिना पहिये के रथ के समान हो जाता है; फिर उसमें कौन बुद्धिमान पुरुष दीन के समान रहना पसन्द करेगा? बताओ, वह सुन्दरी कहाँ है, जो दुःख के समुद्र में डूबने पर मेरे विवेक को जाग्रत करके मुझे इस सङ्कट से उबार लेती है?”
शशान् वराहान् महिषान् गवयान् रुरुशल्यकान् ।
मेध्यानन्यांश्च विविधान् विनिघ्नन् श्रममध्यगात् ॥
स्त्रियों ने उत्तर दिया— “हे नरनाथ! मालूम नहीं आज आपकी प्रिया ने क्या ठान लिया है। हे शत्रुदमन! देखिये, वे बिना बिछौने के पृथ्वी पर ही पड़ी हुई हैं।”
व्यंगे रथ इव प्राज्ञः को नामासीत दीनवत् ॥
नारदजी कहते हैं— राजन्! उस स्त्री के सङ्ग से राजा पुरञ्जन का विवेक नष्ट हो चुका था; इसलिए अपनी रानी को पृथ्वी पर अस्त-व्यस्त अवस्था में देखकर वह अत्यन्त व्याकुल हो गया। उसने दुःखित हृदय से उसे मधुर वचनों द्वारा समझाने का प्रयास किया, किन्तु उसे अपनी प्रेयसी के भीतर अपने प्रति प्रेम या कोप का कोई चिह्न दिखाई नहीं दिया। पुरञ्जन मनाने में कुशल था, अतः उसने धीरे-धीरे उसे मनाना आरम्भ किया। उसने पहले उसके चरण छुए और फिर उसे गोद में बिठाकर बड़े प्यार से कहने लगा— “प्रिये! मैंने आजतक तुम्हारा मुख कभी तिलकहीन, उदास, मुरझाया हुआ या क्रोध के कारण डरावना नहीं देखा; न ही कभी तुम्हारे सुन्दर स्तनों को अश्रुओं से भीगा या तुम्हारे बिम्बाफल सदृश अधरों को केसर की लाली से रहित देखा है। मैं व्यसनवश तुमसे बिना पूछे शिकार खेलने चला गया, इसलिए अवश्य अपराधी हूँ; फिर भी अपनी समझकर तुम मुझ पर प्रसन्न हो जाओ। कामदेव के विषम बाणों से अधीर होकर जो सर्वदा अपने अधीन रहता है, उसे भला कौन कामिनी स्वीकार नहीं करती?”
नूनं त्वकृतपुण्यास्ते भृत्या येष्वीश्वराः शुभे ।
कृतागस्स्वात्मसात्कृत्वा शिक्षादण्डं न युंजते ॥
महाराज! इस प्रकार वह सुन्दरी अनेक नखरों से पुरञ्जन को अपने वश में कर उसे आनन्दित करते हुए विहार करने लगी। उसने अच्छी तरह स्नान कर माङ्गलिक शृङ्गार किया और भोजनादि से तृप्त होकर राजा के पास आई। राजा ने उस मनोहर मुख वाली राजमहिषी का सादर अभिनन्दन किया; पुरञ्जनी ने राजा का आलिङ्गन किया और राजा ने उसे गले लगा लिया। एकान्त में मन के अनुकूल रहस्य की बातें करते हुए वह इतना मोहित हो गया कि चित्त रानी में ही लगा रहने के कारण उसे दिन-रात के भेद और काल की दुस्तर गति का पता ही नहीं चला। मद से छका हुआ पुरञ्जन अपनी प्रिया की भुजा पर सिर रखकर महामूल्य शय्या पर पड़ा रहता; उसे तो वह रमणी ही जीवन का परम फल जान पड़ती थी। अज्ञान से आवृत्त होने के कारण उसे आत्मा अथवा परमात्मा का कोई ज्ञान न रहा।
इत्थं पुरंजनं सम्यग्वशमानीय विभ्रमैः ।
पुरंजनी महाराज रेमे रमयती पतिम् ॥
उसी सुन्दरी से राजा के सौ पुत्र और एक सौ दस कन्याएँ हुईं, जो सभी माता-सुशीलता और उदारता जैसे गुणों से सम्पन्न थीं; वे 'पौरञ्जनी' नाम से विख्यात हुईं। इतने में ही उस सम्राट की लम्बी आयु का आधा भाग निकल गया। फिर पाञ्चालराज पुरञ्जन ने अपने पुत्रों का विवाह वधुओं के साथ और कन्याओं का योग्य वरों के साथ कर दिया। प्रत्येक पुत्र के सौ-सौ पुत्र हुए और इस प्रकार पुरञ्जन का वंश सारे पाञ्चाल देश में फैल गया। इन पुत्रों, पौत्रों, गृह, कोश और मन्त्रियों में दृढ़ ममता होने से वह इन्हीं विषयों में बँध गया। वह दिनों तक कर प्राप्त करके भोगों में मस्त रहता था, पर स्त्री के वशीभूत रहने के कारण उसे आने वाले भय का पता ही नहीं चला।
स राजा महिषीं राजन् सुस्नातां रुचिराननाम् ।
कृतस्वस्त्ययनां तृप्तामभ्यनन्ददुपागताम् ॥
उसी समय काल की एक कन्या वर की खोज में त्रिलोकी में भटकती रही, किन्तु उसे किसी ने स्वीकार नहीं किया। वह कालकन्या 'जरा' बड़ी भाग्यहीन थी, इसलिए लोग उसे 'दुर्भगा' कहते थे। एक बार राजर्षि पूरु ने उसे अपना वर लिया था, जिससे प्रसन्न होकर उसने उन्हें राज्य प्राप्ति का वर दिया था। एक दिन जब मैं ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर आया, तो वह घूमती हुई मुझे मिल गई; उसने मुझे नैष्ठिक ब्रह्मचारी जानकर भी कामातुरा होकर मुझसे विवाह करने की प्रार्थना की। मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, जिस पर उसने कुपित होकर मुझे यह शाप दिया— “तुम एक स्थान पर अधिक देर नहीं ठहर सकोगे!”
अनुनिन्येऽथ शनकैर्वीरोऽनुनयकोविदः ।
पस्पर्श पादयुगलमाह चोत्संगलालिताम् ॥
वह मनानेमें भी बहुत कुशल था, इसलिये अब पुरंजनने उसे धीरे - धीरे मनाना आरम्भ किया । उसने पहले उसके चरण छूए और फिर गोदमें बिठाकर बड़े प्यारसे कहने लगा ।
तभी कालकन्या ने यवनों में श्रेष्ठ राजा भय को अपना पति रूप में स्वीकार कर लिया और कहा— “वीरवर! मैं आपसे प्रेम करती हूँ और आपको पति बनाना चाहती हूँ। आपके प्रति किया हुआ सङ्कल्प कभी विफल नहीं होता।” यवनराज भय ने कालकन्या की बात सुनकर मुस्कराते हुए कहा— “तू सबका अनिष्ट करने वाली है, इसलिए कोई तुझे स्वीकार नहीं करता। तू इस कर्मजनित लोक को बलात् भोग। तू मेरी सेना लेकर जा; इसकी सहायता से तू सारी प्रजा का नाश कर सकेगी और कोई तेरा सामना नहीं कर पाएगा। यह प्रज्वार मेरा भाई है और तू मेरी बहिन बन जा; हम दोनों भयङ्कर सेना लेकर सारे लोकों में विचरेंगे।”
पुरंजनपुराध्यक्षो गन्धर्वैर्युयुधे बली ॥
कालकन्या के वश में होकर राजा पुरञ्जन अपने ऐश्वर्य के साथ इस पृथ्वीतल पर सर्वत्र विचरने लगे। एक बार, बड़ी ही तीव्र गति से, उस बूढ़े साँप से सुरक्षित और संसार की समस्त सुख-सामग्री से सम्पन्न पुरञ्जनपुरी को यवनों ने घेर लिया। देखते ही देखते, वह कालकन्या—जिसके चङ्गुल में फँसकर पुरुष शीघ्र ही निःसार हो जाता है—बलात् उस पूरी नगरी की प्रजा को भोगने लगी। उसी समय, वे यवन भी कालकन्या द्वारा भोगी जाती हुई उस पुरी में चारों ओर से, भिन्न-भिन्न द्वारों से घुसकर उसका विध्वंस करने लगे।
सैनिका भयनाम्नो ये बर्हिष्मन् दिष्टकारिणः ।
प्रज्वारकालकन्याभ्यां विचेरुरवनीमिमाम् ॥
पुरी के इस प्रकार पीड़ित किए जाने पर, उसके स्वामित्व का अभिमान रखने वाले तथा ममता में डूबे बहुकुटुम्बी राजा पुरञ्जन को भी नाना प्रकार के क्लेश सताने लगे; क्योंकि कालकन्या ने बलात् उनका सारा ऐश्वर्य लूट लिया था। जब उसने देखा कि सारा नगर नष्ट-भ्रष्ट हो गया है; पुत्र, पौत्र, भृत्य और अमात्यवर्ग प्रतिकूल होकर अनादर करने लगे हैं; स्त्री स्नेहशून्य हो गई है; मेरी देह को तो कालकन्या ने वश में कर रखा है और पाञ्चाल देश शत्रुओं के हाथ में पड़कर भ्रष्ट हो गया है—यह सब देखकर राजा पुरञ्जन अपार चिन्ता में डूब गया। उसे उस विपत्ति से छुटकारा पाने का कोई उपाय दिखाई नहीं दे रहा था।
त एकदा तु रभसा पुरंजनपुरीं नृप ।
रुरुधुर्भीमभोगाढ्यां जरत्पन्नगपालिताम् ॥
वह उन भोगों की लालसा में व्याकुल था जिन्हें कालकन्या ने उसे निःसार कर दिया था। अपनी पारलौकिक गति और बन्धुजनों के स्नेह से वञ्चित होकर, उसका चित्त केवल स्त्री और पुत्र के लालन-पालन में ही लगा हुआ था। देखते ही देखते, उस सारी पुरी में आग लगा दी गई। जब वह नगरी जलने लगी, तब पुरवासी, सेवकवृन्द, सन्तानवर्ग और कुटुम्ब की स्वामिनी के सहित, उस कुटुम्ब-वत्सल पुरञ्जन को बड़ा दुःख हुआ। नगर को कालकन्या के हाथ में पड़ा देख उसकी रक्षा करने वाले सर्प को भी बड़ी पीड़ा हुई; क्योंकि उसके निवास स्थान पर भी यवनों ने अधिकार कर लिया था और प्रज्वार उस पर भी आक्रमण कर रहा था।
कालकन्यापि बुभुजे पुरंजनपुरं बलात् ।
ययाभिभूतः पुरुषः सद्यो निःसारतामियात् ॥
जब वह नगर की रक्षा करने में सर्वथा असमर्थ हो गया, तब जिस प्रकार जलते हुए वृक्ष के कोटर में रहने वाला सर्प उससे निकल जाना चाहता है, उसी प्रकार उसने भी महान कष्ट से काँपते हुए वहाँ से भागने की इच्छा की। उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग ढीले पड़ गए थे और गन्धर्वों ने उसकी सारी शक्ति नष्ट कर दी थी। अतः जब यवन शत्रुओं ने उसे जाते देखकर रोक दिया, तब वह दुःखी होकर रोने लगा।
गन्धर्वयवनाक्रान्तां कालकन्योपमर्दिताम् ।
हातुं प्रचक्रमे राजा तां पुरीमनिकामतः ॥
गृहासक्त पुरञ्जन, जो देह और गेहादि में 'मैं मेरा' का भाव रखने के कारण अत्यन्त बुद्धिहीन हो गया था, स्त्री के प्रेम-पाश में फँसकर बहुत दीन हो गया था। अब जब इनसे बिछड़ने का समय उपस्थित हुआ, तब वह अपनी पुत्री, पुत्र, पौत्र, पुत्रवधू, दामाद, नौकर और घर, खजाना तथा अन्य जिन पदार्थों में उसकी ममता शेष थी, उन सबके लिए चिन्ता करने लगा। वह सोचने लगा—'हाय! मेरी भार्या तो बहुत गृहस्थी वाली है; जब मैं परलोक चला जाऊँगा, तब यह असहाय होकर अपना निर्वाह कैसे करेगी? यह तो सदा मेरी सेवा में तत्पर रहती थी; मैं कभी रूठ जाता तो यह भयभीत हो जाती, झिड़कने पर चुप रह जाती। मुझमें इसका इतना स्नेह है कि यदि मैं परदेश चला जाता तो यह विरह-व्यथा से सूखकर काँटा हो जाती। क्या यह अकेले गृहस्थाश्रम का व्यवहार कर सकेगी? मेरे जाने पर ये पुत्र और पुत्री भी कैसे जीवन धारण करेंगे? ये तो बीच समुद्र में नाव टूट जाने से व्याकुल यात्रियों के समान बिलबिलाने लगेंगे।'
कथं नु दारका दीना दारकीर्वापरायणाः ।
वर्तिष्यन्ते मयि गते ३ भिन्ननाव इवोदधौ ॥
करती थी, सदा मेरी ही सेवामें तत्पर रहती थी । मैं कभी रूठ जाता था तो यह बड़ी भयभीत हो जाती थी और झिड़कने लगता तो डरके मारे चुप रह जाती थी ॥ १ ९ ॥ मुझसे कोई भूल हो जाती तो यह मुझे सचेत कर देती थी । मुझमें इसका इतना अधिक स्नेह है कि यदि मैं कभी परदेश चला जाता था तो यह विरहव्यथासे सूखकर काँटा हो जाती थी । यों तो यह वीरमाता है, तो भी मेरे पीछे क्या यह गृहस्थाश्रमका व्यवहार चला सकेगी? ॥२० ॥ मेरे चले जानेपर एकमात्र मेरे ही सहारे रहनेवाले ये पुत्र और पुत्री भी कैसे जीवन धारण करेंगे? ये तो बीच समुद्रमें नाव टूट जानेसे व्याकुल हुए यात्रियोंके समान बिलबिलाने लगेंगे '
यद्यपि ज्ञानदृष्टि से उसे शोक करना उचित न था, फिर भी अज्ञानवश राजा पुरञ्जन अपने स्त्री-पुत्रादि के लिए शोकाकुल था। इसी समय उसे पकड़ने के लिए वहाँ भय नामक यवनराज आ धमका। जब यवन लोग उसे पशु के समान बाँधकर अपने स्थान को ले चले, तब उसके अनुचरगण अत्यन्त आतुर और शोकाकुल होकर उसके पीछे हो लिए। यवनों द्वारा रोका हुआ सर्प भी उस पुरी को छोड़कर इन सबके साथ ही चल दिया। उसके जाते ही सारा नगर छिन्न-भिन्न होकर अपने कारण में लीन हो गया। उस निर्दयी राजा ने जिन यज्ञ-पशुओं की बलि दी थी, वे उसकी पीड़ा को याद करके उसे क्रोधपूर्वक कुठारों से काटने लगे।
दुहितृः पुत्रपौत्रांश्च जामिजामातृपार्षदान् ।
स्वत्वावशिष्टं यत्किञ्चिद् गृहकोशपरिच्छदम् ॥
वह वर्षों तक विवेकहीन अवस्था में अपार अन्धकार में पड़ा निरन्तर कष्ट भोगता रहा। स्त्री की आसक्ति से उसकी यह दुर्गति हुई थी। उसके पश्चात, शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले पाण्ड्य-नरेश महाराज मलयध्वज ने समरभूमि में समस्त राजाओं को जीतकर उसके साथ विवाह किया। उससे महाराज मलयध्वज ने एक श्यामलोचना कन्या और उससे छोटे सात पुत्र उत्पन्न किए, जो आगे चलकर द्रविड देश के सात राजा हुए।
एवं कृपणया बुद्ध्या शोचन्तमतदर्हणम् ।
ग्रहीतुं कृतधीरेनं भयनामाभ्यपद्यत ॥
राजा मलयध्वज की पहली पुत्री बड़ी व्रतशीला थी। उसके साथ अगस्त्य ऋषिका का विवाह हुआ। उससे उनका दृढ़च्युत नाम का पुत्र हुआ, जिसने भोगों को तिलाञ्जलि दे पाण्ड्य-नरेश का अनुगमन किया। वहाँ चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी और वेटोदका नाम की तीन नदियाँ थीं। उनके पवित्र जल में स्नान करके वे प्रतिदिन अपने शरीर और अन्तःकरण को निर्मल करते थे। वहाँ रहकर उन्होंने कन्द, बीज, मूल, फल, पुष्प, पत्ते, तृण और जल से ही निर्वाह करते हुए बड़ा कठोर तप किया। इससे धीरे-धीरे उनका शरीर बहुत सूख गया। महाराज मलयध्वज ने शीत-उष्ण, वर्षा-वायु, भूख-प्यास और सुख-दुःख जैसे सभी द्वन्द्वों को जीत लिया था। तप और उपासना से वासनाओं को निर्मूल कर, वे आत्मा में ब्रह्म-भावना करने लगे। भगवान वासुदेव में सुदृढ़ प्रेम हो जाने के कारण उन्हें शरीर का भान भी न रहा।
गुरुस्वरूप साक्षात् श्रीहरि के उपदेश दिए हुए और अपने अन्तःकरण में व्याप्त विशुद्ध विज्ञान-दीपक से उन्होंने देखा कि—अन्तःकरण की वृत्तिका प्रकाशक आत्मा, स्वप्नावस्था की भाँति देहादि समस्त उपाधियों में व्याप्त तथा उनसे पृथक् भी है। ऐसा अनुभव करके वे सब ओर से उदासीन हो गए। फिर उन्होंने अपनी आत्मा को परब्रह्म में और परब्रह्म को आत्मा में अभिन्न रूप से देखा और अन्त में इस अभेद चिन्तन को भी त्यागकर सर्वथा शान्त हो गए।
परे ब्रह्मणि चात्मानं परं ब्रह्म तथाऽऽत्मनि ।
वीक्षमाणो विहायेक्षामस्मादुपरराम हा ॥
भगवान् वासुदेवमें सुदृढ़ प्रेम हो जानेके कारण इतने समयतक उन्हें शरीरादिका भी भान न हुआ ॥३९ ॥ राजन्! गुरुस्वरूप साक्षात् श्रीहरिके उपदेश किये हुए तथा अपने अन्तःकरणमें सब ओर स्फुरित होनेवाले विशुद्ध विज्ञानदीपकसे उन्होंने देखा कि अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रकाशक आत्मा स्वप्नावस्थाकी भाँति देहादि समस्त उपाधियोंमें व्याप्त तथा उनसे पृथक् भी है । ऐसा अनुभव करके वे सब ओरसे उदासीन हो गये ॥४०-४१ ॥ फिर अपनी आत्माको परब्रह्ममें और परब्रह्मको आत्मामें अभिन्नरूपसे देखा और अन्तमें इस अभेद चिन्तनको भी त्यागकर सर्वथा शान्त हो गये ।
इस समय पतिपरायणा वैदर्भी, भोगों को त्यागकर अपने परम धर्मज्ञ पति मलयध्वज की सेवा बड़े प्रेम से करती थी। वह चीर-वस्त्र धारण किये रहती; व्रत-उपवास के कारण उसका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था और सिर के बाल आपस में उलझ जाने के कारण लटें पड़ गयी थीं। उस समय वह अपने पतिदेव के पास अङ्गार-भाव वाले धूमरहित अग्निके समीप, उसकी शान्त शिखा के समान सुशोभित हो रही थी। उसके पति परलोकवासी हो चुके थे, परन्तु पूर्ववत् स्थिर आसन से विराजमान थे। इस रहस्य को न जानने के कारण वह उनके पास जाकर उनकी पूर्ववत् सेवा करने लगी।
चरण-सेवा करते समय जब उसे अपने पतिके चरणों में गरमी बिलकुल नहीं मालूम हुई, तब वह झुण्ड से बिछड़ी हुई मृगी के समान चित्त में अत्यन्त व्याकुल हो गयी। उस बीहड़ वन में स्वयं को अकेली और दीन देखकर वह बड़ी शोकाकुल हुई और आँसुओं की धारा से स्तनों को भिगोती हुई बड़े जोर-जोर से रोने लगी। वह बोली—'राजर्षे! उठिये, उठिये; समुद्र से घिरी हुई यह वसुन्धरा लुटेरों और अधार्मिक राजाओं से भयभीत हो रही है, आप इसकी रक्षा कीजिये!'
पतिके साथ वन में गयी हुई वह अबला इस प्रकार विलाप करती पतिके चरणों में गिर गयी और रो-रोकर आँसू बहाने लगी। उसने लकड़ियों की चिता बनाकर उस पर पतिके शव रखा और अग्नि लगाकर विलाप करते हुए स्वयं सती होने का निश्चय किया। इसी समय उसका एक पुराना मित्र, जो एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण था, वहाँ आया। उसने उस रोती हुई अबला को मधुर वाणी से समझाते हुए कहा—'भाई! इस नगर में घूमते-घूमते तुमने एक स्त्री का रचा हुआ स्थान देखा है; जिसमें पाँच बगीचे, नौ दरवाजे, तीन परकोटे और छः वैश्यकुल थे। इसकी स्वामिनी बुद्धि थी। इन्द्रियों के पाँच विषय इसके बगीचे थे, नौ इन्द्रिय-छिद्र इसके द्वार थे; तेज, जल और अन्न इसके तीन परकोटे थे; मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ इसके छः वैश्यकुल थे; क्रियाशक्ति रूप कर्मेन्द्रियाँ ही इसके बाजार थे और पाँच भूत इसके उपादान कारण थे। इस नगर में प्रवेश करने पर पुरुष ज्ञानशून्य हो जाता है—अपने स्वरूप को भूल जाता है।
भाई! उस नगर में उसकी स्वामिनी के फन्दे में पड़कर तुम भी अपने स्वरूप को भूल गये और उसी के सङ्ग से तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है। देखो, तुम न तो विदर्भराज की पुत्री हो और न यह वीर मलयध्वज तुम्हारा पति है। जिसने तुम्हें नौ द्वारों के नगर में बन्द किया था, उस पुरञ्जनी के पति भी तुम नहीं हो। तुम पहले जन्म में अपने को पुरुष समझते थे और अब सती स्त्री मानते हो—यह सब मेरी ही फैलायी हुई माया है। वास्तव में तुम न पुरुष हो न स्त्री। हम दोनों तो हंस हैं; हमारा जो वास्तविक स्वरूप है, उसका अनुभव करो।
मित्र! जो मैं (ईश्वर) हूँ, वही तुम (जीव) हो। तुम मुझसे भिन्न नहीं हो और विचारपूर्वक देखो, मैं भी वही हूँ जो तुम हो। ज्ञानी पुरुष हम दोनों में कभी थोड़ा सा भी अन्तर नहीं देखते।'
अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः ।
न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥
मित्र! जो मैं ( ईश्वर ) हूँ, वही तुम ( जीव ) हो । तुम मुझसे भिन्न नहीं हो और तुम विचारपूर्वक देखो, मैं भी वही हूँ जो तुम हो । ज्ञानी पुरुष हम दोनोंमें कभी थोड़ा - सा भी अन्तर नहीं देखते ।
इस प्रकार जब हंस ने उसे सावधान किया, तब वह मानसरोवर का हंस जीव अपने स्वरूप में स्थित हो गया और उसे अपने मित्र के विछोह से भूला हुआ आत्मज्ञान फिर प्राप्त हो गया। प्राचीनबर्हि! मैंने तुम्हें परोक्ष रूप से यह आत्मज्ञान का दिग्दर्शन कराया है; क्योंकि जगत्कर्ता जगदीश्वर को परोक्ष वर्णन ही अधिक प्रिय है।
बर्हिष्मन्नेतदध्यात्मं पारोक्ष्येण प्रदर्शितम् ।
यत्परोक्षप्रियो देवो भगवान् विश्वभावनः ॥
प्राचीनबर्हि! मैंने तुम्हें परोक्षरूपसे यह आत्मज्ञानका दिग्दर्शन कराया है; क्योंकि जगत्कर्ता जगदीश्वरको परोक्ष वर्णन ही अधिक प्रिय है ।
In English
The Story of King Puranjana
Narada warns King Barbhishik about the consequences of animal sacrifice and tells him the story of King Puranjana. Puranjana is a powerful ruler who becomes obsessed with a beautiful woman he meets in a garden, eventually losing his wisdom to her influence.
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