श्रीगणेशाय नमः।

ययात्युपाख्यान : अत्यधिक इच्छाओं और तृष्णा के चक्र से मुक्ति कैसे प्राप्त होती है?

तृष्णा का त्याग और आत्मिक शान्ति

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 75–85 · पृष्ठ 564–644

10,697 शब्द · 54 मिनटका पाठ · 88 श्लोक

वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा

राजा जनमेजय के प्रश्न पर वंशों की उत्पत्ति और धर्म की व्याख्या हेतु।

वैशम्पायनजी कहते हैं - 'निष्पाप जनमेजय! अब मैं दक्ष प्रजापति, वैवस्वत मनु, भरत, कुरु, पूरु, अजमीढ, यादव, कौरव तथा भरतवंशियों की कुल परम्परा का तुमसे वर्णन करूँगा। उनका कुल परम पवित्र, महान् मङ्गलकारी तथा धन, यश और आयु की प्राप्ति कराने वाला है।'

वैशम्पायन उवाच

प्रजापतेस्तु दक्षस्य मनोर्वैवस्वतस्य च ।
भरतस्य कुरो: पूरोराजमीढस्य चानघ ॥

यादवानामिमं वंशं कौरवाणां च सर्वशः ।
तथैव भरतानां च पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ । वैशम्पायनजी कहते हैं - निष्पाप जनमेजय! अब मैं दक्ष प्रजापति, वैवस्वत मनु, भरत, कुरु, पूरु, अजमीढ, यादव, कौरव तथा भरतवंशियोंकी कुल परम्पराका तुमसे वर्णन करूँगा । उनका कुल परम पवित्र, महान् मंगलकारी तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 1-2पृष्ठ 565

जनमेजय! प्रचेता के दस पुत्र थे, जो अपने तेज के द्वारा सदा प्रकाशित होते थे। वे सब महर्षियों के समान तेजस्वी, सत्पुरुष और पुण्यकर्मा माने गये हैं। उन्होंने पूर्वकाल में अपने मुख से प्रकट की हुई अग्नि द्वारा उन बड़े-बड़े वृक्षों को जलाकर भस्म कर दिया था जो प्राणियों को पीड़ा दे रहे थे। उन दस दक्षों द्वारा मारिषा के गर्भ से प्राचेतस दक्ष का जन्म हुआ तथा दक्ष से ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। हे नरश्रेष्ठ! वे सम्पूर्ण जगत् के पितामह हैं।

वैशम्पायन उवाच

तेजोभिरुदिताः सर्वे महर्षिसमतेजसः ॥

दश प्राचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः ।
मुखजेनाग्निना यैस्ते पूर्वं दग्धा महीरुहाः ॥

प्रचेताके दस पुत्र थे, जो अपने तेजके द्वारा सदा प्रकाशित होते थे । वे सब - के - सब महर्षियोंके समान तेजस्वी, सत्पुरुष और पुण्यकर्मा माने गये हैं । उन्होंने पूर्वकालमें अपने मुखसे प्रकट की हुई अग्निद्वारा उन बड़े - बड़े वृक्षोंको जलाकर भस्म कर दिया था ( जो प्राणियोंको पीड़ा दे रहे थे )

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 3-4पृष्ठ 565

प्राचेतस मुनि दक्ष ने अपनी वीरिणी से समागम करके अपने ही समान गुण-शील वाले एक हजार पुत्र उत्पन्न किये। वे सब अत्यन्त कठोर व्रत का पालन करने वाले थे। उन सहस्र पुत्रों को देवर्षि नारद ने मोक्ष-शास्त्र का अध्ययन कराया और परम उत्तम साङ्ख्य-ज्ञान का उपदेश दिया। जब वे सभी विरक्त होकर घर से निकल गये, तब प्रजा की सृष्टि करने की इच्छा से प्रजापति दक्ष ने अपनी ही पुत्री के द्वारा पुत्र (दौहित्र) होने पर उस पुत्री को ही पुत्र मानकर पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं।

वैशम्पायन उवाच

वीरिण्या सह संगम्य दक्षः प्राचेतसो मुनिः ।
आत्मतुल्यानजनयत् सहस्रं संशितव्रतान् ॥

प्राचेतस मुनि दक्षने वीरिणीसे समागम करके अपने ही समान गुण- शीलवाले एक हजार पुत्र उत्पन्न किये । वे सब - के - सब अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 6पृष्ठ 565

मरीचिनन्दन कश्यप की तेरह पत्नियों में से जो सबसे बड़ी दक्ष-कन्या अदिति थीं, उनके गर्भ से इन्द्र आदि बारह आदित्यों का जन्म हुआ जो बड़े पराक्रमी थे। तदनन्तर उन्होंने अदिति से ही विवस्वान् को उत्पन्न किया। विवस्वान् के पुत्र यम हुए, जो वैवस्वत कहलाते हैं और समस्त प्राणियों के नियन्ता हैं। विवस्वान् के ही पुत्र परम बुद्धिमान मनु हुए। मनु के बाद उनसे यम नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई, जो सर्वत्र विख्यात हैं; वे मनु के छोटे भाई तथा प्राणियों का नियमन करने में समर्थ हैं।

त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा ।
मारीचः कश्यपस्त्वस्यामादित्यान् समजीजनत् ॥

इन्द्रादीन् वीर्यसम्पन्नान् विवस्वन्तमथापि च ।
विवस्वतः सुतो जज्ञे यमो वैवस्वतः प्रभुः ॥

मरीचिनन्दन कश्यपने अपनी तेरह पत्नियोंमेंसे जो सबसे बड़ी दक्ष- कन्या अदिति थीं, उनके गर्भसे इन्द्र आदि बारह आदित्योंको जन्म दिया, जो बड़े पराक्रमी थे । तदनन्तर उन्होंने अदितिसे ही विवस्वान्‌को उत्पन्न किया । विवस्वान्के पुत्र यम हुए, जो वैवस्वत कहलाते हैं । वे समस्त प्राणियोंके नियन्ता हैं ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 10-11पृष्ठ 566

बुद्धिमान् मनु बड़े धर्मात्मा थे, जिन पर सूर्यवंश की प्रतिष्ठा हुई। मानवों से सम्बन्ध रखने वाला यह मनुवंश उन्हीं से विख्यात हुआ। उन्हीं मनु से ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उत्पन्न हुए। महाराज! तभी से ब्राह्मणकुल क्षत्रिय से सम्बद्ध हुआ। उनमें से ब्राह्मणजातीय मानवों ने छहों अङ्गों सहित वेदों को धारण किया—वेन, धृष्णु, नरिष्यन्त, नाभाग, इक्ष्वाकु, कारूष, शर्याति, आठवीं इला, नवें क्षत्रिय-धर्मपरायण पृषध्र तथा दसवें नाभागारिष्ट। इन दसों को मनुपुत्र कहा जाता है। मनु के इस पृथ्वी पर पचास पुत्र और हुए, परन्तु आपस की फूट के कारण वे सब नष्ट हो गये, ऐसा हमने सुना है।

धर्मात्मा स मनुर्धीमान् यत्र वंशः प्रतिष्ठितः ।
मनोर्वंशो मानवानां ततोऽयं प्रथितोऽभवत् ॥

बुद्धिमान् मनु बड़े धर्मात्मा थे, जिनपर सूर्यवंशकी प्रतिष्ठा हुई । मानवोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह मनुवंश उन्हींसे विख्यात हुआ ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 13पृष्ठ 566

तदनन्तर इला के गर्भ से विद्वान् पुरूरवा का जन्म हुआ। सुना जाता है कि इला पुरूरवा की माता भी थी और पिता भी। राजा पुरूरवा समुद्र के तेरह द्वीपों का शासन और उपभोग करते थे। वे मानव होकर भी मानवेतर प्राणियों से घिरे रहते थे। वे अपने बल-पराक्रम से उन्मत्त होकर ब्राह्मणों के साथ विवाद करने लगे। बेचारे ब्राह्मण चीखते-चिल्लाते रहते थे, तो भी वे उनका सारा धन-रत्न छीन लेते थे। जनमेजय! ब्रह्मलोक से सनत्कुमारजी आकर उन्हें बहुत समझाया और ब्राह्मणों पर अत्याचार न करने का उपदेश दिया, किन्तु वे उनकी शिक्षा ग्रहण न कर सके। तब क्रोध में भरे हुए महर्षियों ने तत्काल उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट हो गये।

सनत्कुमारस्तं राजन् ब्रह्मलोकादुपेत्य ह ॥

अनुदर्शं ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ ।
ततो महर्षिभिः क्रुद्धैः सद्यः शप्तो व्यनश्यत ॥

जनमेजय! ब्रह्मलोकसे सनत्कुमारजीने आकर उन्हें बहुत समझाया और ब्राह्मणोंपर अत्याचार न करनेका उपदेश दिया, किंतु वे उनकी शिक्षा ग्रहण न कर सके । तब क्रोधमें भरे हुए महर्षियोंने तत्काल उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट हो गये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 21-22पृष्ठ 567

राजा पुरूरवा लोभ और बल के घमण्ड में विवेक खो बैठे थे। इलानन्दन पुरूरवा के छः पुत्र उत्पन्न हुए—आयु, धीमान्, अमावसु, दृढायु, वनायु और शतायु। ये सभी उर्वशी के पुत्र हैं। आयु के स्वर्भानुकुमारी के गर्भ से पाँच पुत्र बताये जाते हैं—नहुष, वृद्धशर्मा, रजि गय तथा अनेना। आयु-नन्दन नहुष बड़े बुद्धिमान् और सत्य-पराक्रमी थे। उन्होंने अपने विशाल राज्य का धर्मपूर्वक शासन किया। पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों, गन्धर्वों, नागों तथा क्षत्रियों का पालन किया।

अपने इन्द्रत्वकाल में पराक्रमी नहुष ने महर्षियों को पशु की तरह वाहन बनाकर उनकी पीठ पर सवारी की थी। उन्होंने तेज और पराक्रम द्वारा समस्त देवताओं को तिरस्कृत करके इन्द्रपद का उपभोग किया था। राजा नहुष ने छः प्रियवादी पुत्रों को जन्म दिया—यति, ययाति, संयाति, आयाति, अयति और ध्रुव। यति योग का आश्रय लेकर ब्रह्मभूत मुनि हो गये थे।

तदुपरान्त नहुष के दूसरे पुत्र सत्यपराक्रमी ययाति सम्राट हुए। उन्होंने पृथ्वी का पालन तथा बहुत यज्ञों का अनुष्ठान किया। वे सदा मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर बड़े भक्ति-भाव से देवताओं तथा पितरों का पूजन करते और प्रजा पर अनुग्रह रखते थे। महाराज! राजा ययाति के देवयानी और शर्मिष्ठा के गर्भ से महान् धनुर्धर पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी समस्त सद्गुणों के भण्डार थे। यदु और तुर्वसु ये दो देवयानी के पुत्र थे, जबकि द्रुह्यु, अनु तथा पूरु ये तीन शर्मिष्ठा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।

अतिभक्त्या पितॄनर्चन् देवांश्च प्रयतः सदा ।
अन्वगृह्णात् प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः ॥

तस्य पुत्रा महेष्वासाः सर्वैः समुदिता गुणैः ।
देवयान्यां महाराज शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥

महाराज ययाति किसीसे परास्त होनेवाले नहीं थे । वे सदा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर बड़े भक्ति- भावसे देवताओं तथा पितरोंका पूजन करते और समस्त प्रजापर अनुग्रह रखते थे । महाराज जनमेजय! राजा ययातिके देवयानी और शर्मिष्ठाके गर्भसे महान् धनुर्धर पुत्र उत्पन्न हुए । वे सभी समस्त सद्गुणोंके भण्डार थे ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 33-34पृष्ठ 569

एक समय नहुषपुत्र ययाति को अत्यन्त भयानक वृद्धावस्था प्राप्त हुई, जो रूप और सौन्दर्य का नाश करने वाली है। वृद्धावस्था से आक्रान्त होने पर राजा ययाति ने अपने समस्त पुत्रों—यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनु से कहा:

"पुत्रो! मैं युवावस्था से सम्पन्न होकर जवानी के द्वारा कामोपभोग करते हुए युवतियों के साथ विहार करना चाहता हूँ। तुम मेरी सहायता करो।"

यह सुनकर देवयानी के ज्येष्ठ पुत्र यदु ने पूछा: "भगवन्! हमारी जवानी लेकर उसके द्वारा आपको कौन-सा कार्य करना है?"

तब ययाति ने कहा: "तुम मेरा बुढ़ापा ले लो और मैं तुम्हारी जवानी से विषयोपभोग करूँगा। पुत्रो! अब तक तो मैं दीर्घकालीन यज्ञों के अनुष्ठान में लगा रहा और अब मुनिवर शुक्राचार्य के शाप से बुढ़ापे ने मुझे धर दबाया है, जिससे मेरा कामरूप पुरुषार्थ छिन गया है। मैं इसी से सन्तप्त हो रहा हूँ। तुममें से कोई एक व्यक्ति मेरा वृद्ध शरीर लेकर उसके द्वारा राज्य-शासन करे। मैं नूतन शरीर पाकर युवावस्था से सम्पन्न होकर विषयों का उपभोग करूँगा।"

मामकेन शरीरेण राज्यमेकः प्रशास्तु वः ।
अहं तन्वाभिनवया युवा काममवाप्नुयाम् ॥

‘ तुममेंसे कोई एक व्यक्ति मेरा वृद्ध शरीर लेकर उसके द्वारा राज्यशासन करे । मैं नूतन शरीर पाकर युवावस्थासे सम्पन्न हो विषयोंका उपभोग करूँगा'

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 42पृष्ठ 570

राजा के ऐसा कहने पर भी वे चार पुत्र उनकी वृद्धावस्था नहीं ले सके। तब सबसे छोटे पुत्र सत्यपराक्रमी पूरु ने कहा: "राजन्! आप मेरे नूतन शरीर से नौजवान होकर विषयों का उपभोग कीजिये। मैं आपकी आज्ञा से बुढ़ापा लेकर राज्य-सिंहासन पर बैठूंगा।"

ते न तस्य प्रत्यगृह्णन् यदुप्रभृतयो जराम् ।
तमब्रवीत् ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः ॥

राजंश्चराभिनवया तन्वा यौवनगोचरः ।
अहं जरां समादाय राज्ये स्थास्यामि तेऽऽज्ञया ॥

राजाके ऐसा कहनेपर भी वे यदु आदि चार पुत्र उनकी वृद्धावस्था न ले सके । तब सबसे छोटे पुत्र सत्यपराक्रमी पूरुने कहा- ' राजन्! आप मेरे नूतन शरीरसे नौजवान होकर विषयोंका उपभोग कीजिये । मैं आपकी आज्ञासे बुढ़ापा लेकर राज्यसिंहासनपर बैठूंगा'

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 43-44पृष्ठ 570

ऐसा कहने पर राजर्षि ययाति ने तप और वीर्य के आश्रय से अपनी वृद्धावस्था अपने महात्मा पुत्र पूरु में सञ्चार कर दी। ययाति स्वयं पूरु की नयी अवस्था लेकर नौजवान बन गये और इधर पूरु भी राजा ययाति की अवस्था लेकर राज्य का पालन करने लगे। तदनन्तर सिंह के समान पराक्रमी नृपश्रेष्ठ ययाति एक सहस्र वर्ष तक युवावस्था में रहे। उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों के साथ दीर्घकाल तक विहार किया और चैत्ररथ वन में जाकर विश्वाची अपसारा के साथ रमण किया।

परन्तु उस समय भी महायशस्वी ययाति काम-भोग से तृप्त न हो सके। उन्होंने मन से विचार कर निश्चय कर लिया कि विषयों के भोग से भोगेच्छा कभी शान्त नहीं हो सकती। तब राजा ने यह गाथा गायी:

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

‘ विषय - भोगकी इच्छा विषयोंका उपभोग करनेसे कभी शान्त नहीं हो सकती । घीकी आहुति डालनेसे अधिक प्रज्वलित होनेवाली आगकी भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है '

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 50पृष्ठ 571

"विषय-भोग की इच्छा विषयों का उपभोग करने से कभी शान्त नहीं हो सकती। घी की आहुति डालने से अधिक प्रज्वलित होने वाली आग की भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है। रत्नों से भरी हुई सारी पृथ्वी, संसार का सारा सुवर्ण, सारे पशु और सुन्दरी स्त्रियाँ किसी एक पुरुष को मिल जायें, तो भी वे सब उसके लिये पर्याप्त नहीं होंगे। वह और भी पाना चाहेगा। ऐसा समझकर शान्ति धारण करे—भोगेच्छा को दबा दे। जब मनुष्य मन, वाणी और क्रिया द्वारा कभी किसी भी प्राणी के प्रति बुरा भाव नहीं करता, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। जब सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि होने के कारण यह पुरुष किसी से नहीं डरता और जब उससे भी दूसरे प्राणी नहीं डरते तथा जब वह न तो किसी की इच्छा करता है और न किसी से द्वेष ही रखता है, उस समय वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।"

जनमेजय! परम बुद्धिमान् महाराज ययाति ने इस प्रकार भोगों की निःसारता का विचार करके बुद्धि के द्वारा मन को एकाग्र किया और पुत्र से अपना बुढ़ापा वापस ले लिया।

दत्त्वा च यौवनं राजा पूरुं राज्येऽभिच्य च। अतृप्त एव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह॥

पूरु को उसकी जवानी लौटाकर राजा ने उसे राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। भोगों से अतृप्त रहकर ही अपने पुत्र पूरु से कहा: "बेटा! तुम्हारे जैसे पुत्र से ही मैं पुत्रवान् हूँ। तुम्हीं मेरे वंश-प्रवर्तक पुत्र हो। तुम्हारा वंश इस जगत् में पौरव वंश के नाम से विख्यात होगा।"

त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः ।
पौरवो वंश इति ते ख्यातिं लोके गमिष्यति ॥

‘ बेटा! तुम्हारे - जैसे पुत्रसे ही मैं पुत्रवान् हूँ । तुम्हीं मेरे वंश- प्रवर्तक पुत्र हो । तुम्हारा वंश इस जगत्में पौरव वंशके नामसे विख्यात होगा'

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 56पृष्ठ 572

तदनन्तर पूरु का राज्याभिषेक करने के पश्चात् राजा ययाति अपनी पत्नियों के साथ भृगुतुङ्ग पर्वत पर जाकर सत्कर्मों का अनुष्ठान करते हुए वहाँ बड़ी भारी तपस्या की। इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होने के बाद स्त्रियों सहित निराहार व्रत करके उन्होंने स्वर्गलोक प्राप्त किया।

वैशम्पायन उवाच

ततः स नृपशार्दूल पूरुं राज्येऽभिषिच्य च ।
ततः सुचरितं कृत्वा भृगुतुङ्गे महातपाः ॥

कालेन महता पश्चात् कालधर्ममुपेयिवान् ।
कारयित्वा त्वनशनं सदारः स्वर्गमाप्तवान् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं –नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर पूरुका राज्याभिषेक करनेके पश्चात् राजा ययातिने अपनी पत्नियोंके साथ भृगुतुंग पर्वतपर जाकर सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए वहाँ बड़ी भारी तपस्या की । इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेके बाद स्त्रियोंसहित निराहार व्रत करके उन्होंने स्वर्गलोक प्राप्त किया ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 75 · श्लोक 57-58पृष्ठ 572

'उन महात्मा की प्यारी पुत्री का नाम देवयानी है, उसे अपनी सेवाओं द्वारा आप ही प्रसन्न कर सकते हैं। दूसरा कोई इसमें समर्थ नहीं है। अपने शील-स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार तथा इन्द्रियसंयम द्वारा देवयानी को सन्तुष्ट कर लेने पर आप निश्चय ही उस विद्या को प्राप्त कर लेंगे।'

शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च ।
देवयान्यां हि तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम् ॥

‘ अपने शील- स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार तथा इन्द्रियसंयमद्वारा देवयानीको संतुष्ट कर लेनेपर आप निश्चय ही उस विद्याको प्राप्त कर लेंगे'

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 16पृष्ठ 575

'बहुत अच्छा!'—बृहस्पतिपुत्र कच ने ये शब्द कहे और देवताओं से सम्मानित होकर वह वृषपर्वा के समीप जा पहुँचा।

राजन्! देवताओं के भेजे हुए कच तुरन्त दानवराज वृषपर्वा के नगर में जाकर शुक्राचार्य से मिले और इस प्रकार बोले— 'भगवन्! मैं अङ्गिरा ऋषिका पौत्र तथा साक्षात् बृहस्पतिका पुत्र हूँ। मेरा नाम कच है। आप मुझे अपने शिष्य के रूप में ग्रहण करें। ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षों तक उत्तम ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा। इसके लिये आप मुझे अनुमति दें।'

ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद् बृहस्पतेः ।
नाम्ना कचमिति ख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान् ॥

‘ भगवन्! मैं अंगिरा ऋषिका पौत्र तथा साक्षात् बृहस्पतिका पुत्र हूँ । मेरा नाम कच है । आप मुझे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण करें ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 19पृष्ठ 575

शुक्राचार्य ने कहा— 'कच! तुम्हारा भलीभाँति स्वागत है; मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये आदर के पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान एवं सत्कार करूँगा। तुम्हारे आदर-सत्कार से मेरे द्वारा बृहस्पतिका आदर-सत्कार होगा।'

शुक्र उवाच

कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः ।
अर्चयिष्येऽहमर्थ्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः ॥

शुक्राचार्यने कहा- कच! तुम्हारा भलीभाँति स्वागत है; मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ । तुम मेरे लिये आदरके पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान एवं सत्कार करूँगा । तुम्हारे आदर - सत्कारसे मेरे द्वारा बृहस्पतिका आदर- सत्कार होगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 21पृष्ठ 575

तब कच ने 'बहुत अच्छा' कहकर महाकान्तिमान् कविपुत्र शुक्राचार्य के आदेश के अनुसार स्वयं ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर लिया। नियत समय तक के लिये व्रत की दीक्षा लेने वाले कच को शुक्राचार्य ने भलीभाँति अपना लिया। कच आचार्य शुक्र तथा उनकी पुत्री देवयानी दोनों की नित्य आराधना करने लगे। वे नवयुवक थे और जवानी में प्रिय लगने वाले कार्य—गायन और नृत्य करके तथा भाँति-भाँति के बाजे बजाकर देवयानी को सन्तुष्ट रखते थे।

भारत! आचार्यकन्या देवयानी भी युवावस्था में पदार्पण कर चुकी थी। कच उसके लिये फूल और फल ले आते तथा उसकी आज्ञा के अनुसार कार्य करते। इस प्रकार उसकी सेवा में संलग्न रहकर वे सदा उसे प्रसन्न रखते। देवयानी भी नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करने वाले कच के ही समीप रहकर गाती और आमोद-प्रमोद करती हुई एकान्त में उसकी सेवा करती थी।

इस प्रकार वहाँ रहकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए कच के पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो गये। तदनन्तर दानवों को यह बात मालूम हुई। एक दिन जब कच वन के एकान्त प्रदेश में अकेले गौएँ चरा रहे थे, तब बृहस्पतिके द्वेष से और सञ्जीवनी विद्या की रक्षा करने के लिए क्रोध में भरे हुए दानवों ने कच को मार डाला। उन्होंने मारने के बाद उनके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर कुत्तों और सियारों को बाँट दिया। उस दिन गौएँ बिना रक्षक के ही अपने स्थान पर लौट आईं।

हत्वा शालावृकेभ्यश्च प्रायच्छँल्लवशः कृतम् ।
ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वं निवेशनम् ॥

उन्होंने मारनेके बाद उनके शरीरको टुकड़े -टुकड़े कर कुत्तों और सियारोंको बाँट दिया । उस दिन गौएँ बिना रक्षकके ही अपने स्थानपर लौटीं ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 29पृष्ठ 576

जनमेजय! जब देवयानी ने देखा कि गौएँ तो वन से लौट आयीं, पर उनके साथ कच नहीं हैं, तब उसने उस समय अपने पिता से इस प्रकार कहा— 'प्रभो! आपने अग्निहोत्र कर लिया और सूर्यदेव भी अस्ताचल को चले गये। गौएँ भी आज बिना रक्षक के ही लौट आयी हैं। तात! फिर भी कच नहीं दिखायी देते हैं। पिताजी! अवश्य ही कच या तो मारे गये हैं या मर गये हैं। मैं आपसे सच कहती हूँ, उनके बिना जीवित नहीं रह पाऊँगी।'

व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति ।
तं विना न च जीवेयमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥

पिताजी! अवश्य ही कच या तो मारे गये हैं या मर गये हैं । मैं आपसे सच कहती हूँ, उनके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 32पृष्ठ 579

शुक्राचार्य ने कहा— 'बेटी! चिन्ता न करो। मैं अभी "आओ" इस प्रकार बुलाकर मरे हुए कच को जीवित कर देता हूँ।' ऐसा कहकर उन्होंने सञ्जीवनी विद्या का प्रयोग किया और कच को पुकारा। गुरु के पुकारने पर कच विद्या के प्रभाव से हृष्ट-पुष्ट होकर कुत्तों के शरीर फाड़-फाड़कर निकल आये और वहाँ प्रकट हो गये।

शुक्र उवाच

भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि वृकाणां स विनिर्गतः ।
आहूतः प्रादुरभवत् कचो हृष्टोऽथ विद्यया ॥

फिर तो गुरुके पुकारनेपर कच विद्याके प्रभावसे हृष्ट- पुष्ट हो कुत्तोंके शरीर फाड़-फाड़कर निकल आये और वहाँ प्रकट हो गये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 34पृष्ठ 579

उन्हें देखते ही देवयानी ने पूछा— 'आज आपने लौटने में विलम्ब क्यों किया?'

कच ने शुक्राचार्य की कन्या से कहा— 'भामिनि! मैं समिधा, कुश आदि और काष्ठ का भार लेकर आ रहा था। रास्ते में थकावट और भार से पीड़ित होकर एक वटवृक्ष के नीचे ठहर गया। वहीं सारी गौएँ भी उसी वृक्ष की छाया में आकर विश्राम करने लगीं। वहाँ मुझे देखकर असुरों ने पूछा— "तुम कौन हो?" मैंने कहा— "मेरा नाम कच है, मैं बृहस्पतिका पुत्र हूँ।" मेरे इतना कहते ही दानवों ने मुझे मार डाला और मेरे शरीर को चूर्ण करके कुत्तों-सियारों को बाँट दिया। भद्रे! फिर महात्मा भार्गव ने जब विद्या का प्रयोग करके मुझे बुलाया है, तब किसी प्रकार से पूर्ण जीवन लाभ करके यहाँ तुम्हारे पास आ सका हूँ।'

ब्राह्मणकन्या के पूछने पर कच ने उसे अपने मारे जाने की बात बताई। तदनन्तर पुनः देवयानी ने एक दिन अकस्मात् कच को फूल लाने के लिये कहा। विप्रवर कच इसके लिये वन में गये, परन्तु वहाँ दानवों ने उन्हें देख लिया और फिर उन्हें पीसकर समुद्र के जल में घोल दिया। जब उनके लौटने में विलम्ब हुआ, तब आचार्यकन्या ने पिता से पुनः यह बात बताई। विप्रवर शुक्राचार्य ने कच का पुनः सञ्जीवनी विद्या द्वारा आवाहन किया। इससे बृहस्पतिपुत्र कच पुनः वहाँ पहुँच गये और उनके साथ असुरों ने जो बर्ताव किया था, वह बताया।

तत्पश्चात् असुरों ने तीसरी बार कच को मारकर आग में जला दिया और उनकी जली हुई लाश का चूर्ण बनाकर मदिरा में मिला दिया तथा उसे ब्राह्मण शुक्राचार्य को ही पिला दिया।

अब देवयानी पुनः अपने पिता से यह बात बोली— 'पिताजी! कच मेरे कहने पर प्रत्येक कार्य पूर्ण कर दिया करते हैं। आज मैंने उन्हें फूल लाने के लिये भेजा था, परन्तु अभी तक वे दिखायी नहीं दिये। तात! जान पड़ता है वे मार दिये गये या मर गये हैं। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उनके बिना जीवित नहीं रह सकती।'

शुक्राचार्य ने कहा— 'बेटी! बृहस्पतिके पुत्र कच मर गये। मैंने विद्या से उन्हें कई बार जिलाया, तो भी वे इस प्रकार मार दिये जाते हैं, अब मैं क्या करूँ? देवयानी! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत। तुम जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरने वाले के लिये शोक नहीं करती। तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्र सहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगत् के प्राणी मेरे प्रभाव से तीनों सन्ध्याओं के समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं। अब उस ब्राह्मण को जिलाना असम्भव है। यदि जीवित हो जाये, तो फिर दैत्यों द्वारा मार डाला जायेगा।'

देवयानी बोली— 'पिताजी! अत्यन्त वृद्ध महर्षि अङ्गिरा जिनके पितामह हैं, तपस्या के भण्डार बृहस्पति जिनके पिता हैं, जो ऋषिके पुत्र और ऋषिके ही पौत्र हैं; उन ब्रह्मचारी कच के लिये मैं कैसे शोक न करूँ और कैसे न रोऊँ? तात! वे ब्रह्मचर्य पालन में रत थे, तपस्या ही उनका धन था। वे सदा ही सजग रहने वाले और कार्य करने में कुशल थे। इसलिये कच मुझे बहुत प्रिय थे। वे सदा मेरे मन के अनुरूप चलते थे। अब मैं भोजन का त्याग कर दूँगी और कच जिस मार्ग पर गये हैं, वहीं मैं भी चली जाऊँगी।'

देवयानी के कहने से उसके दुःख से दुःखी हुए महर्षि शुक्राचार्य ने कच को पुकारा और दैत्यों के प्रति कुपित होकर बोले— 'इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि असुर लोग मुझसे द्वेष करते हैं। तभी तो यहाँ आये हुए मेरे शिष्यों को ये लोग मार डालते हैं। ये भयङ्कर स्वभाव वाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्व से गिराना चाहते हैं। इसलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पाप का परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा। ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हो?'

वैशम्पायन उवाच

अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा- स्ते मां यथा व्यभिचरन्ति नित्यम् ।
अप्यस्य पापस्य भवेदिहान्तः कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम् ॥

‘ ये भयंकर स्वभाववाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्वसे गिराना चाहते हैं । इसीलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं । इस पापका परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा । ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हो?

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 52पृष्ठ 582

तदुपरान्त शुक्राचार्य ने पूछा— 'विप्र! किस मार्ग से जाकर तुम मेरे उदर में स्थित हो गये? ठीक-ठीक बताओ।'

कच ने कहा— 'गुरुदेव! आपके प्रसाद से मेरी स्मरणशक्ति ने साथ नहीं छोड़ा है। जो बात जैसे हुई है, वह सब मुझे याद है। इस प्रकार पेट फाड़कर निकल आने से मेरी तपस्या का नाश होगा। वह न हो, इसीलिये मैं यहाँ घोर क्लेश सहन करता हूँ। आचार्यपाद! असुरों ने मुझे मारकर मेरे शरीर को जलाया और चूर्ण बना दिया। फिर उसे मदिरा में मिलाकर आपको पिला दिया! विप्रवर! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैवी तीनों प्रकार की मायाओं को जानते हैं। आपके होते हुए कोई इन मायाओं का उल्लङ्घन कैसे कर सकता है?'

शुक्राचार्य बोले— 'बेटी देवयानी! अब तुम्हारे लिये कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? मेरे वध से ही कच का जीवित होना सम्भव है। मेरे उदर को विदीर्ण करने के सिवा और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मेरे शरीर में बैठा हुआ कच बाहर दिखायी दे।'

देवयानी ने कहा— 'पिताजी! कच का नाश और आपका वध— ये दोनों ही शोक अग्नि के समान मुझे जला देंगे। कच के नष्ट होने पर मुझे शान्ति नहीं मिलेगी और आपका वध हो जाने पर मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।'

शुक्राचार्य बोले— 'बृहस्पतिके पुत्र कच! अब तुम सिद्ध हो गये, क्योंकि तुम देवयानी के भक्त हो और वह तुम्हें चाहती है। यदि कच के रूप में तुम इन्द्र नहीं हो, तो मुझसे मृतसञ्जीवनी विद्या ग्रहण करो। केवल एक ब्राह्मण को छोड़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो मेरे पेट से पुनः जीवित निकल सके। इसलिये तुम विद्या ग्रहण करो। तात! मेरे इस शरीर से जीवित निकलकर मेरे लिये पुत्र के तुल्य हो जाओ। मुझे पुनः जिला देना। मुझ गुरु से विद्या प्राप्त करके विद्वान् हो जाने पर भी मेरे प्रति धर्मयुक्त दृष्टि से ही देखना।'

शुक्र उवाच

पुत्रो भूत्वा भावय भावितो मा- मस्मद्देहादुपनिष्क्रम्य तात ।
समीक्षेथा धर्मवतीमवेक्षां गुरोः सकाशात् प्राप्य विद्यां सविद्यः ॥

तात! मेरे इस शरीरसे जीवित निकलकर मेरे लिये पुत्रके तुल्य हो मुझे पुनः जिला देना । मुझ गुरुसे विद्या प्राप्त करके विद्वान् हो जानेपर भी मेरे प्रति धर्मयुक्त दृष्टिसे ही देखना ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 60पृष्ठ 584

जनमेजय! गुरु से सञ्जीवनी विद्या प्राप्त करके सुन्दर रूप वाले विप्रवर कच तत्काल ही महर्षि शुक्राचार्य का पेट फाड़कर ठीक उसी तरह बाहर निकल आये, जैसे दिन बीतने पर पूर्णिमा की सन्ध्या को चन्द्रमा प्रकट हो जाते हैं।

वैशम्पायन उवाच

गुरोः सकाशात् समवाप्य विद्यां भित्त्वा कुक्षिं निर्विचक्राम विप्रः ।
कचोऽभिरूपस्तत्क्षणाद् ब्राह्मणस्य शुक्लात्यये पौर्णमास्यामिवेन्दुः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! गुरुसे संजीवनी विद्या प्राप्त करके सुन्दर रूपवाले विप्रवर कच तत्काल ही महर्षि शुक्राचार्यका पेट फाड़कर ठीक उसी तरह बाहर निकल आये, जैसे दिन बीतनेपर पूर्णिमाकी संध्याको चन्द्रमा प्रकट हो जाते हैं ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 61पृष्ठ 584

मूर्तिमान् वेदराशिके तुल्य शुक्राचार्यको भूमिपर पड़ा देख कचने भी अपने मरे हुए गुरुको विद्याके बलसे जिलाकर उठा दिया और उस सिद्ध विद्याको प्राप्त कर लेनेपर गुरुको प्रणाम करके वे इस प्रकार बोले- 'मैं विद्यासे शून्य था, उस दशमें मेरे इन पूजनीय आचार्य जैसे मेरे दोनों कानोंमें मृतसञ्जीवनी विद्यारूप अमृतकी धारा डाली है, इसी प्रकार जो कोई दूसरे ज्ञानी महात्मा मेरे कानोंमें ज्ञानरूप अमृतका अभिषेक करेंगे, उन्हें भी मैं अपना माता-पिता मानूँगा (जैसे गुरुदेव शुक्राचार्यको मानता हूँ)। गुरुदेवके द्वारा किये हुए उपकारको स्मरण रखते हुए शिष्यको उचित है कि वह उनसे कभी द्रोह न करे। जो लोग सम्पूर्ण वेदके सर्वोत्तम ज्ञानको देने वाले तथा समस्त विद्याओंके आश्रयभूत पूजनीय गुरुदेवका उनसे विद्या प्राप्त करके भी आदर नहीं करते, वे प्रतिष्ठारहित होकर पापपूर्ण लोकों—नरकोंमें जाते हैं।'

ऋतस्य दातारमनुत्तमस्य निधिं निधीनामपि लब्धविद्याः ।
ये नाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयं पापाँल्लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठाः ॥

‘ जो लोग सम्पूर्ण वेदके सर्वोत्तम ज्ञानको देने वाले तथा समस्त विद्याओंके आश्रयभूत पूजनीय गुरुदेवका उनसे विद्या प्राप्त करके भी आदर नहीं करते, वे प्रतिष्ठारहित होकर पापपूर्ण लोकों — नरकोंमें जाते हैं '

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 64पृष्ठ 585

वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! विद्वान् शुक्राचार्य मदिरापानसे ठगे गये थे और उस अत्यन्त भयानक परिस्थितिको पहुँच गये थे, जिसमें तनिक भी चेत नहीं रह जाता। मदिरासे मोहित होने के कारण ही वे उस समय अपने मनके अनुकूल चलनेवाले प्रिय शिष्य ब्राह्मणकुमार कचको भी पी गये थे। यह सब देख और सोचकर वे महानुभाव कविपुत्र शुक्र कुपित हो उठे। मदिरापानके प्रति उनके मनमें क्रोध और घृणाका भाव जाग उठा और उन्होंने ब्राह्मणोंका हित करनेकी इच्छासे स्वयं इस प्रकार घोषणा की- 'आजसे इस जगत्का जो कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानसे भी मदिरापान करेगा, वह धर्मसे भ्रष्ट हो ब्रह्महत्याके पापका भागी होगा तथा इस लोकऔर परलोक दोनोंमें वह निन्दित होगा।'

'मया चैतां विप्रधर्मोक्तिसीमां मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके। सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां देवा लोकाश्चोपशृण्वन्तु सर्वे॥'

'धर्मशास्त्रोंमें ब्राह्मण-धर्मकी जो सीमा निर्धारित की गयी है, उसीमें मेरे द्वारा स्थापित की हुई यह मर्यादा भी रहे और यह सम्पूर्ण लोकमें मान्य हो। साधु पुरुष, ब्राह्मण, गुरुओंके समीप अध्ययन करनेवाले शिष्य, देवता और समस्त जगत्के मनुष्य, मेरी बाँधी हुई इस मर्यादाको अच्छी तरह सुन लें।' ऐसा कहकर तपस्याकी निधियोंकी निधि, अप्रमेय शक्तिशाली महानुभाव शुक्राचार्यने दैवने जिनकी बुद्धिको मोहित कर दिया था उन दानवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा- 'जिन महात्मा कचने देवताओंके लिये वह दुष्कर कार्य किया है, उनकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं हो सकती और वे यज्ञभागके अधिकारी होंगे।' ऐसा कहकर शुक्राचार्यजी चुप हो गये और दानव आश्चर्यचकित होकर अपने-अपने घर चले गये।

न तत्कीर्तिर्जरां गच्छेद् यज्ञियश्च भविष्यति ॥ ) एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स भार्गवः ।
दानवा विस्मयाविष्टाः प्रययुः स्वं निवेशनम् ॥

‘ जिन महात्मा कचने देवताओंके लिये वह दुष्कर कार्य किया है, उनकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं हो सकती और वे यज्ञभागके अधिकारी होंगे। ' ऐसा कहकर शुक्राचार्यजी चुप हो गये और दानव आश्चर्यचकित होकर अपने - अपने घर चले गये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 76 · श्लोक 71पृष्ठ 587

कचने एक हजार वर्षोंतक गुरुके समीप रहकर अपना व्रत पूरा कर लिया। तब घर जानेकी अनुमति मिल जानेपर कचने देवलोकमें जानेका विचार किया। वैशम्पायनजी कहते हैं- जब कचका व्रत समाप्त हो गया और गुरुने उन्हें जानेकी आज्ञा दे दी, तब वे देवलोकको प्रस्थित हुए। उस समय देवयानीने उनसे इस प्रकार कहा—'महर्षि अङ्गिराके पौत्र! आप सदाचार, उत्तम कुल, विद्या, तपस्या तथा इन्द्रियसंयम आदिसे बड़ी शोभा पा रहे हैं। महायशस्वी महर्षि अङ्गिरा जिस प्रकार मेरे पिताजीके लिये माननीय हैं, उसी प्रकार आपके पिता बृहस्पतिजी मेरे लिये आदरणीय तथा पूज्य हैं। तपोधन! ऐसा जानकर मैं जो कहती हूँ उसपर विचार करें। आप जब व्रत और नियमोंके पालनमें लगे थे, उन दिनों मैंने आपके साथ जो बर्ताव किया है, उसे आप भूले नहीं होंगे। अब आप व्रत समाप्त करके अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त कर चुके हैं। मैं आपसे प्रेम करती हूँ, आप मुझे स्वीकार करें; वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिवत् मेरा पाणिग्रहण कीजिये।'

वैशम्पायन उवाच

ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः ।
तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः ॥

‘ महायशस्वी महर्षि अंगिरा जिस प्रकार मेरे पिताजीके लिये माननीय हैं, उसी प्रकार आपके पिता बृहस्पतिजी मेरे लिये आदरणीय तथा पूज्य हैं ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 77 · श्लोक 3पृष्ठ 588

कचने कहा- 'निर्दोष अङ्गोंवाली देवयानी! जैसे तुम्हारे पिता भगवान् शुक्राचार्य मेरे लिये पूजनीय और माननीय हैं, वैसे ही तुम हो; बल्कि उनसे भी बढ़कर मेरी पूजनीया हो। भद्रे! महात्मा भार्गवको तुम प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो, गुरुपुत्री होनेके कारण धर्मकी दृष्टिसे सदा मेरी पूजनीया हो। देवयानी! जैसे मेरे गुरुदेव तुम्हारे पिता शुक्राचार्य सदा मेरे माननीय हैं, उसी प्रकार तुम हो; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये।'

यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव ।
देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि ॥

देवयानी! जैसे मेरे गुरुदेव तुम्हारे पिता शुक्राचार्य सदा मेरे माननीय हैं, उसी प्रकार तुम हो; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 77 · श्लोक 8पृष्ठ 589

देवयानी बोली—'द्विजोत्तम! आप मेरे पिताके गुरुपुत्रके पुत्र हैं, मेरे पिताके नहीं; अतः मेरे लिये भी आप पूजनीय और माननीय हैं। कच! जब असुर आपको बार-बार मार डालते थे, तबसे लेकर आजतक आपके प्रति मेरा जो प्रेम रहा है, उसे आप याद कीजिये। सौहार्द और अनुरागके अवसरपर मेरी उत्तम भक्तिका परिचय आपको मिल चुका है। आप धर्मके ज्ञाता हैं। मैं आपके प्रति भक्ति रखनेवाली निरपराध अबला हूँ। आपको मेरा त्याग करना उचित नहीं है।'

देवयान्युवाच गुरुपुत्रस्य पुत्रो वै न त्वं पुत्रश्च मे पितुः ।
तस्मात् पूज्यश्च मान्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम ॥

असुरैर्हन्यमाने च कच त्वयि पुनः पुनः ।
तदा प्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमद्य स्मरस्व मे ॥

देवयानी बोली – द्विजोत्तम! आप मेरे पिताके गुरुपुत्रके पुत्र हैं, मेरे पिताके नहीं; अतः मेरे लिये भी आप पूजनीय और माननीय हैं। कच! जब असुर आपको बार- बार मार डालते थे, तबसे लेकर आजतक आपके प्रति मेरा जो प्रेम रहा है, उसे आज याद कीजिये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 77 · श्लोक 9-10पृष्ठ 589

कचने कहा—'उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरी! तुम मुझे ऐसे कार्यमें लगा रही हो, जिसमें लगाना कदापि उचित नहीं है। शुभे! तुम मेरे ऊपर प्रसन्न होओ। तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर गुरुतर हो। विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भामिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहिन हो। अतः सुमध्यमे! मुझसे ऐसी बात न कहो। कल्याणी! मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है। अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुमसे पूछता हूँ—तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ, आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मङ्गल हो। धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसङ्गमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेवकी सेवामें लगी रहना।'

आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमाशंस मे पथि ।
अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ।
अप्रमत्तोत्थिता नित्यमाराधय गुरुं मम ॥

अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुमसे पूछता हूँ—तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ, आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मंगल हो । धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसंगमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेवकी सेवामें लगी रहना ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 77 · श्लोक 15पृष्ठ 590

देवयानी बोली—'कच! मैंने धर्मानुकूल कामके लिये आपसे प्रार्थना की है। यदि आप मुझे ठठरा देंगे, तो आपकी यह सञ्जीवनी विद्या सिद्ध नहीं हो सकेगी।'

देवयान्युवाच यदि मां धर्मकामार्थे प्रत्याख्यास्यसि याचितः ।
ततः कच न ते विद्या सिद्धिमेषा गमिष्यति ॥

देवयानी बोली- कच! मैंने धर्मानुकूल कामके लिये आपसे प्रार्थना की है । यदि आप मुझे ठुकरा देंगे, तो आपकी यह संजीवनी विद्या सिद्ध नहीं हो सकेगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 77 · श्लोक 16पृष्ठ 590

कचने कहा—'देवयानी! गुरुपुत्री समझकर ही मैंने तुम्हारे अनुरोधको टाल दिया है; तुममें कोई दोष देखकर नहीं। गुरुजीने भी इसके विषयमें मुझे कोई आज्ञा नहीं दी है। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, मुझे शाप दे दो। बहिन! मैं आर्ष धर्मकी बात बता रहा था। इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था। तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी। कोई भी ऋषिपुत्र कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा। तुमने जो मुझे यह कहा कि तुम्हारी विद्या सफल नहीं होगी, सो ठीक है; किन्तु मैं जिसे यह विद्या पढ़ा दूँगा, उसकी विद्या तो सफल होगी ही।'

कच उवाच

आर्षं धर्मं ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया ।
शप्तो नार्होऽस्मि शापस्य कामतोऽद्य न धर्मतः ॥

तस्माद् भवत्या यः कामो न तथा स भविष्यति ।
ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति ॥

बहिन! मैं आर्ष धर्मकी बात बता रहा था । इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था । तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी । कोई भी ऋषिपुत्र (ब्राह्मणकुमार ) कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 77 · श्लोक 18-19पृष्ठ 590

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! द्विजश्रेष्ठ कच देवयानीसे ऐसा कहकर तत्काल बड़ी उतावलीके साथ इन्द्रलोकको चले गये। उन्हें आया देख इन्द्रादि देवता बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हो कचसे ये वचन बोले—'ब्रह्मन्! तुमने हमारे हितके लिये यह बड़ा अद्भुत कार्य किया है, अतः तुम्हारे यशका कभी लोप नहीं होगा और तुम यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी होओगे।'

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वको ययात्युपाख्यानविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ। वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब कच मृतसञ्जीवनी विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये। फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा - 'पुरन्दर! अब आपके लिये पराक्रमकरनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये।' सङ्गठित होकर आये हुए देवताओद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये।

वैशम्पायन उवाच

सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन् ।
कालस्ते विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरन्दर ॥

फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा - ' पुरन्दर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये '

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 79 · श्लोक 2पृष्ठ 592

वहाँ एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा। वह वन चैत्ररथ नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये। तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक प्रकारके वस्त्र, जो निकट रखे हुए थे, लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी; दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता नहीं था।

राजेन्द्र! उस समय वस्त्रोंकी अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया। देवयानी बोली—'अरी दानवकी बेटी! मेरी शिष्या होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सज्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा।'

शर्मिष्ठाने कहा—'अरी! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है। तू भिखमङ्गेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते हैं। अरी भिक्षुकि! तू छाती पीट-पीटकर रो अथवा धूलमें लोट-लोटकर कष्ट भोग। मुझसे द्रोह रख या क्रोध कर (इसकी परवा नहीं है)। भिखमङ्गिन! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है, तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाला मुझ-जैसा योद्धा तुझे मिल जायगा। मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती।'

शर्मिष्ठाने देवयानीको कुएँमें ढकेल दिया और अब यह मर गयी होगी, ऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी। वह क्रोधके आवेशमें थी, अतः देवयानीकी ओर देखे बिना ही घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये। उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड़नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे। वहाँ उन्हें अग्नि-शिखाके समान तेजस्विनी एक कन्या दिखी, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही राजाने उससे पूछा—'तुम कौन हो? तुम्हारे नख लाल-लाल हैं। तुम षोडशी जान पड़ती हो। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं। तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर शोक क्यों कर रही हो? तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सुमध्यमे! ठीक-ठीक बताओ।'

"मैं शुक्राचार्य की कन्या हूँ," देवयानी ने कहा, "जो देवताओंद्वारा मारे गये दैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही उन्हें इस बातका पता नहीं होगा कि मैं इस दुरवस्थामें पड़ी हूँ।"

ययाति ने उत्तर दिया, "भद्रे! मैं राजा नहुषका पुत्र ययाति हूँ। एक हिंसक पशुको मारनेकी इच्छासे इधर आ निकला। थका- माँदा प्यास बुझानेके लिये यहाँ आया और तिनकोंसे ढके हुए इस कूपमें गिरी हुई तुमपर मेरी दृष्टि पड़ गयी।"

देवयानी ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, "महाराज! लाल नख और अङ्गुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी मालूम है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये।"

उसने आगे कहा, "हे नरेश्वर! यदि तुम मेरे कहनेसे आज मुझे साथ ले जाना नहीं चाहते, तो मैं पिताजीके द्वारा भी तुम्हारा ही वरण करूंगी। फिर तुम मुझे अपने योग्य मानोगे और साथ चलोगे।"

शुक्र उवाच

वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः ।
अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम ॥

इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं । निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 79 · श्लोक 38पृष्ठ 599

ययाति उसे लेकर अपने नगर की ओर चला गया। नहुष के जाने के बाद, देवयानी ने अपनी सखी शर्मिष्ठा द्वारा किए गए अपमान को अपनी धाय 'घूर्णिका' को विस्तार से बताया। वह शोकसे सन्तप्त थी। जब घूर्णिका उसके पास पहुँची, तो देवयानी ने उसे अपने निकट बुलाकर सब कुछ कह सुनाया।

देवयानी ने व्याकुल होकर कहा, "त्वरितं गच्छ घूर्णिके! शीघ्र मेरे पिताजीके पास जाओ और उन्हें बताओ कि अब मैं वृषपर्वणः नगर में पैर नहीं रखूँगी।"

जब महाप्राज्ञ शुक्राचार्य को यह ज्ञात हुआ कि उनकी पुत्री शर्मिष्ठा द्वारा वन में मृततुल्य कर दी गई है, तो वे बड़ी उतावली के साथ उसे ढूँढ़ने निकले। जब उन्होंने अपनी बेटी को देखा, तो उन्हें हृदय से लगा लिया और दुखी होकर बोले— "बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे — अशुभ या शुभ कर्मोंसे दुःख एवं सुखमें पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका बदला तुम्हें इस रूप में मिला है।"

देवयानी ने सिसकते हुए कहा, "पिताजी! मुझे अपने कर्मोंका फल मिले या न मिले, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या वह सच है? वह कहती है कि आप भाटों की तरह दैत्यों के गुण गाया करते हैं। वह क्रोधसे लाल आँखें करके मुझसे कह रही थी— 'देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते एक धेला भी नहीं हैं।' तात! वह भारी घमण्डसे भरी हुई थी और उसने बार-बार ये बातें दुहरायीं। यदि सचमुच मैं ऐसी हूँ, तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओद्वारा प्रसन्न करूँगी।"

शुक्राचार्य ने उसे शान्त करते हुए कहा, "देवयानी! तू स्तुति करनेवाले या दान लेनेवाले की बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मण की पुत्री है जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं। इस बात को वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है। ब्रह्माजी ने मुझे वरदान दिया है कि मैं इस भूतल, देवलोक और समस्त प्राणियों का स्वामी हूँ। मैं ही प्रजाओं के हित के लिये पानी बरसाता हूँ और ओषधियों का पोषण करता हूँ।"

उन्होंने आगे समझाया, "बेटी! मेरी विद्या द्वन्द्वरहित है। मुझमें दीनता, शठता या अधर्म नहीं है। जो मनुष्य दूसरों की निन्दा सह लेता है, उसने सम्पूर्ण जगत् पर विजय प्राप्त कर ली। जो उभरे हुए क्रोध को घोड़े के समान वश में कर लेता है, वही सच्चा सारथि है। जो क्रोध को क्षमा द्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है। जो क्रोध को रोककर निन्दा सह लेता है, वह सब पुरुषार्थों का पात्र है। सौ वर्षों तक यज्ञ करने वाला भी तब तक पवित्र नहीं होता जब तक वह क्रोध न करे। जो स्वभाव से क्रोधी है, उसके धर्म, सत्य और मित्र उसे छोड़कर चले जाते हैं।"

देवयानी ने कहा, "पिताजी! यद्यपि मैं बालिका हूँ, फिर भी धर्म-अधर्म का अन्तर समझती हूँ। परन्तु जो शिष्य होकर भी शिष्ट बर्ताव नहीं करता, उसके गुरु को उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिए। इसलिए इन दानवों के बीच रहना मुझे अच्छा नहीं लगता।"

उसने भारी मन से कहा, "तात! शर्मिष्ठा ने जो भयङ्कर दुर्वचन कहे हैं, वे मेरे हृदय को मथ रहे हैं। कटु वचन मर्मस्थलों को विदीर्ण कर देते हैं। जो मनुष्य लक्ष्मी की उपासना करता है, उसका मर जाना ही अच्छा है— ऐसा विद्वान अनुभव करते हैं।"

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! देवयानी की बात सुनकर भृगुश्रेष्ठ शुक्राचार्य बड़े क्रोध में भरकर वृषपर्व के समीप गये। वह राजसिंहासन पर बैठा हुआ था। शुक्राचार्यजी ने बिना कुछ सोचे-विचारे उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया-

'राजन्! जो अधर्म किया जाता है, उसका फल तुरन्त नहीं मिलता। जैसे गाय की सेवा करने पर धीरे-धीरे कुछ काल के बाद वह ब्याती और दूध देती है अथवा धरती को जोत-बोकर बीज डालने से कुछ काल के बाद पौधा उगता और यथासमय फल देता है, उसी प्रकार किया जाने वाला अधर्म धीरे-धीरे कर्ता की जड़ काट देता है। यदि वह दुष्परिणाम अपने ऊपर नहीं दिखायी देता, तो उस अन्यायोपार्जित द्रव्य का उपभोग करने के कारण पुत्रों अथवा नाती-पोतों पर अवश्य ही प्रकट होता है। जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरन्त नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेट में उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है।

राजन्! अङ्गिरा के पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण हैं। वे स्वाध्याय-परायण, हितैषी, क्षमावान् और जितेन्द्रिय हैं, स्वभाव से ही निष्पाप और धर्मज्ञ हैं तथा उन दिनों मेरे घर में रहकर निरन्तर मेरी सेवा में संलग्न थे, परन्तु तुमने उनका बार-बार वध करवाया था। वृषपर्वन्! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वध के अयोग्य ब्राह्मण का वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानी का भी वध करने के लिये उसे कुएँ में ढकेला गया है। इन दोनों हत्याओं के कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई-बन्धुओं को त्याग दूँगा। राजन्! तुम्हारे राज्य में और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा। दैत्यराज! बड़े आश्चर्य की बात है कि तुमने मुझे मिथ्यावादी समझ लिया। तभी तो तुम अपने इस दोष को दूर नहीं करते और लापरवाही दिखाते हो।'

अहो मामभिजानासि दैत्य मिथ्याप्रलापिनम् ।
यथेममात्मनो दोषं न नियच्छस्युपेक्षसे ॥

‘ दैत्यराज! बड़े आश्चर्यकी बात है कि तुमने मुझे मिथ्यावादी समझ लिया । तभी तो तुम अपने इस दोषको दूर नहीं करते और लापरवाही दिखाते हो'

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 6पृष्ठ 606

वृषपर्व ने कहा— 'यदि मैं शर्मिष्ठा से देवयानी को पिटवाता या तिरस्कृत करवाता होऊँ, तो इस पाप से मुझे सद्गति न मिले। नाधर्मं न मृदावादं त्वयि जानामि भार्गव। त्वयि धर्मश्च सत्यं च तत् प्रसीदतु नो भवान्।'

वृषपर्व बोले— 'ब्रह्मन्! यदि आप पर अधर्म अथवा मिथ्याभाषण का दोष मैंने कभी लगाया हो, तो मैं यह नहीं जानता। आपमें तो सदा धर्म और सत्य प्रतिष्ठित हैं। अतः आप हमलोगों पर कृपा करके प्रसन्न होइये। भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं, तो हम सब लोग समुद्र में समा जाएँगे; हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है।'

यद्यस्मानपहाय त्वमितो गच्छसि भार्गव ।
समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामो नान्यदस्ति परायणम् ॥

भृगुनन्दन! आपपर अधर्म अथवा मिथ्याभाषणका दोष मैंने कभी लगाया हो, यह मैं नहीं जानता । आपमें तो सदा धर्म और सत्य प्रतिष्ठित हैं । अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये । भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो हम सब लोग समुद्रमें समा जायँगे; हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 8पृष्ठ 606

शुक्राचार्य ने कहा— 'असुरो! तुम लोग समुद्र में घुस जाओ अथवा चारों दिशाओं में भाग जाओ; मैं अपनी पुत्री के प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। तुम देवयानी को प्रसन्न करो, क्योंकि उसी में मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जाने पर इन्द्र के पुरोहित बृहस्पति की भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेम का वहन करता रहूँगा।'

शुक्र उवाच

यत् किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर ।
तस्येश्वरोऽस्मि यद्येषा देवयानी प्रसाद्यताम् ॥

शुक्राचार्यने कहा- महान् असुर! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन- वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 12पृष्ठ 607

वृषपर्व बोले— 'भृगुनन्दन! असुर-एश्वरों के पास इस भूतल पर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े और गाय आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं।'

शुक्राचार्य ने कहा— 'महान् असुर! दैत्यराजों का जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ, तो उसके द्वारा इस देवयानी को प्रसन्न करो।'

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! शुक्राचार्य के ऐसा कहने पर वृषपर्व ने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा मान ली। तदनन्तर दोनों देवयानी के पास गये और महाकवि शुक्राचार्य ने वृषपर्व की कही हुई सारी बात कह सुनाई।

तब देवयानी ने कहा— 'तात! यदि आप राजा के धन के स्वामी हैं, तो आपके कहने से मैं इस बात को नहीं मानूँगी। राजा स्वयं कहें, तो मुझे विश्वास होगा।'

वैशम्पायन उवाच

देवयान्युवाच यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव ।
नाभिजानामि तत् तेऽहं राजा तु वदतु स्वयम् ॥

तब देवयानीने कहा - तात! यदि आप राजाके धनके स्वामी हैं तो आपके कहनेसे मैं इस बातको नहीं मानूँगी । राजा स्वयं कहें, तो मुझे विश्वास होगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 14पृष्ठ 607

वृषपर्व बोले— 'पवित्र मुसकान वाली देवयानी! तुम जिस वस्तु को पाना चाहती हो, वह यदि दुर्लभ हो तो भी तुम्हें अवश्य दूँगा।'

देवयानी ने कहा— 'मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओं के साथ मेरी दासी होकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय।'

यह सुनकर वृषपर्व ने धाय से कहा— 'धात्री! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठा को शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानी की जो कामना हो, उसे वह पूर्ण करे।'

वृषपर्वोवाच उत्तिष्ठ त्वं गच्छ धात्रि शर्मिष्ठां शीघ्रमानय ।
यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम् ॥

यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा - धात्री! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जो कामना हो, उसे वह पूर्ण करे ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 17पृष्ठ 608

वैशम्पायनजी कहते हैं— तब धाय ने शर्मिष्ठा के पास जाकर कहा— 'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति-भाइयों को सुख पहुँचाओ। पापरहित राजकुमारी! आज बाबा शुक्राचार्य देवयानी के कहने से अपने शिष्यों—यजमानों को त्याग रहे हैं। अतः देवयानी की जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये।'

वैशम्पायन उवाच

त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः ।
सायं कामयते कामं स कार्योऽद्य त्वयानघे ॥

‘ पापरहित राजकुमारी! आज बाबा शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों— यजमानोंको त्याग रहे हैं । अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये '

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 19पृष्ठ 608

शर्मिष्ठा बोली— 'यदि इस प्रकार देवयानी के लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं, तो देवयानी जो कुछ चाहती है, वह सब आज से मैं करूँगी। मेरे अपराध से शुक्राचार्यजी न जायें और देवयानी भी मेरे कारण अन्यत्र जाने का विचार न करे।'

वैशम्पायन उवाच

शर्मिष्ठोवाच येन केनचिदार्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत् ।
अतस्त्वामनुयास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ॥

शर्मिष्ठा बोली - जिस किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये । अतः तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 24पृष्ठ 609

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर पिता की आज्ञा से राजकुमारी शर्मिष्ठा शिबिका पर आरूढ़ होकर तुरन्त राजधानी से बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र कन्याओं से घिरी हुई थी।

शर्मिष्ठा बोली— 'देवयानी! मैं एक सहस्र दासियों के साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।'

वैशम्पायन उवाच

शर्मिष्ठोवाच अहं दासीसहस्रेण दासी ते परिचारिका ।
अनु त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ॥

शर्मिष्ठा बोली — देवयानी! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 22पृष्ठ 609

देवयानी ने कहा— 'अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुक की पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बाप की बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं; फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी?'

स्तुति वैशम्पायन उवाच

देवयान्युवाच स्तुवतो दुहिताहं ते याचतः प्रतिगृह्णतः ।
स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि ॥

देवयानीने कहा — अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं; फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 23पृष्ठ 609

शर्मिष्ठा बोली— 'जिस किसी उपाय से भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयों को सुख पहुँचाना चाहिये। अतः तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।'

वैशम्पायनजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ! जब वृषपर्व की पुत्री ने दासी होने की प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानी ने अपने पिता से कहा।

देवयानी बोली— 'पिताजी! अब मैं नगर में प्रवेश करूँगी। द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्या का बल अमोघ है।'

देवयान्युवाच प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम ।
अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते ॥

देवयानी बोली – पिताजी! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी । द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 26पृष्ठ 610

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अपनी पुत्री देवयानी के ऐसा कहने पर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्य समस्त दानवों से पूजित एवं प्रसन्न होकर नगर में प्रवेश किया।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तो दुहित्रास द्विजश्रेष्ठो महायशाः ।
प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 27पृष्ठ 610

वैशम्पायनजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् उत्तम वर्ण वाली देवयानी फिर उसी वन में विहार करने के लिये गयी। वन के उसी प्रदेश में जाकर वह उन समस्त सखियों के साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँति के खेल खेलते हुए आनन्द में मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पों के मकरन्द का पान करती थीं, तो कभी नाना प्रकार के भोज्य पदार्थों का स्वाद लेती थीं और कभी फल खाती थीं।

इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलने के लिये दैवेच्छा से उसी स्थान पर आ गये। वे परिश्रम करने के कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियों को भी देखा। वे सभी दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर पीने योग्य रस का पान और भाँति-भाँति की क्रीड़ाएँ कर रही थीं। राजा ने पवित्र मुसकान वाली देवयानी को वहाँ समस्त आभूषणों से विभूषित परम सुन्दर दिव्य आसन पर बैठी हुई देखा। उसके रूप की कहीं तुलना नहीं थी। वह सुन्दरी उन स्त्रियों के मध्य में बैठी हुई थी और शर्मिष्ठा द्वारा उसकी चरणसेवा की जा रही थी।

रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराङ्गनाम् ।
शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः ॥

उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी । वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठाद्वारा उसकी चरणसेवा की जा रही थी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 7पृष्ठ 612

ययाति ने पूछा— 'दो हजार कुमारी सखियों से घिरी हुई कन्याओ! मैं आप दोनों के गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ। शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें।'

देवयानी बोली— 'महाराज! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें। असुरों के जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हीं की पुत्री जानिये। यह दानवराज वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है; मैं विवाह होने पर जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी जायगी।'

ययाति बोले— 'सुन्दरी! यह असुरराज की रूपवती कन्या, सुन्दर भौंहों वाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये। इसे सुनने के लिये मेरे मन में बड़ी उत्कण्ठा है।'

देवयानी बोली— 'नरश्रेष्ठ! सब लोग देव के विधान का ही अनुसरण करते हैं। इसे भी भाग्य का विधान मानकर सन्तोष कीजिये। इस विषय की विचित्र घटनाओं को न पूछिये। आपके रूप और वेष राजा के समान हैं और आप ब्राह्मी वाणी बोल रहे हैं। मुझे बताइये; आपका क्या नाम है, कहाँ से आये हैं और किसके पुत्र हैं?'

ययाति ने कहा— 'मैंने ब्रह्मचर्य पालन पूर्वक सम्पूर्ण वेद का अध्ययन किया है। मैं राजा नहुष का पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है।'

देवयानी ने पूछा— 'महाराज! आप किस कार्य से वन के इस प्रदेश में आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकार की इच्छा से ही आये हैं?'

ययाति ने कहा— 'भद्रे! मैं एक हिंसक पशु को मारने के लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीने के लिये यहाँ आया हूँ। अतः अब मुझे आज्ञा दीजिये।'

देवयानी ने कहा— 'राजन्! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन्याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठा के साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे सखा और पति हो जायँ।'

ययाति बोले— 'शुक्रनन्दिनी देवयानी! आपका भला हो। भाविनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पिता से कन्यादान लेने के अधिकारी नहीं हैं।'

देवयानी ने कहा— 'नहुष नन्दन! ब्राह्मण से क्षत्रिय जाति और क्षत्रिय से ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षि के पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं। अतः मुझसे विवाह कीजिये।'

ययाति बोले— 'वराङ्गने! एक ही परमेश्वर के शरीर से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई है; परन्तु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सब वर्णों में श्रेष्ठ हैं।'

देवयानी ने कहा— 'नहुष कुमार! नारी के लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुष ने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आप ही ने मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आप ही का मैं पति रूप में वरण करती हूँ। मैं मन को वश में रखने वाली स्त्री हूँ। आप जैसे राजर्षि कुमार अथवा राजर्षि द्वारा पकड़े गये मेरे हाथ का स्पर्श अब दूसरा पुरुष कैसे कर सकता है?'

ययाति बोले— 'देवि! विज्ञ पुरुष को चाहिये कि वह ब्राह्मण को क्रोध में भरे हुए विषधर सर्प तथा सब ओर से प्रज्वलित अग्नि से भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयङ्कर समझे।'

देवयानी ने विस्मय से पूछा— "पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओर से प्रज्वलित होने वाली अग्नि से भी दुर्धर्ष एवं भयङ्कर है, यह बात आपने कैसे कही?"

ययाति ने गम्भीर स्वर में उत्तर दिया— "भद्रे! सर्प तो केवल एक व्यक्ति को मारता है, शस्त्र से भी एक ही व्यक्ति का वध होता है; परन्तु क्रोध में भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगर का भी नाश कर देता है। मैं इस कारण ब्राह्मण को अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जब तक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तब तक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा।"

ययातिरुवाच एकमाशीविषो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते ।
हन्ति विप्रः राष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ॥

दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम ।
अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ॥

ययाति बोले — भद्रे! सर्प एकको ही मारता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर देता है । भीरु! इसलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ । अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 25-26पृष्ठ 615

देवयानी ने धैर्य रखते हुए कहा— "राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिता के देने पर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं; उनके देने पर ही मुझे स्वीकार करेंगे। अतः आपको उनके कोप का भय नहीं है। राजन्! दो घड़ी ठहर जाइए। मैं अभी पिता के पास सन्देश भेजती हूँ।"

वैशम्पायन जी कहते हैं— "राजन्! इस प्रकार देवयानी ने तुरन्त अपनी धाय को भेजकर अपने पिता को सन्देश दिया। धाय ने जाकर शुक्राचार्य से सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्य वहाँ आकर राजा को दर्शन देने लगे। विप्रवर शुक्राचार्य को आया देख राजा ययाति ने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्र भाव से खड़े हो गए।"

स्तुति

दृष्ट्वैव चागतं शुक्रं ययातिः पृथिवीपतिः ।
ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥

सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर राजाको दर्शन दिया । विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रभावसे खड़े हो गये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 29पृष्ठ 616

देवयानी अपने पिता के समीप पहुँची और बोली— "तात! ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने सङ्कट के समय मेरा हाथ पकड़ा था। आपको नमस्कार है। आप मुझे इन्हीं की सेवा में समर्पित कर दें। मैं इस जगत् में इनके सिवा दूसरे किसी पति का वरण नहीं करूँगी।"

स्तुति

देवयान्युवाच राजायं नाहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत् ।
नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे ॥

देवयानी बोली- तात! ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं । इन्होंने संकटके समय मेरा हाथ पकड़ा था । आपको नमस्कार है । आप मुझे इन्हींकी सेवामें समर्पित कर दें । मैं इस जगत्में इनके सिवा दूसरे किसी पतिका वरण नहीं करूँगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 30पृष्ठ 616

शुक्राचार्य ने प्रसन्न होकर कहा— "वीर नहुष-नन्दन! मेरी इस लाड़ली पुत्री ने तुम्हें पति रूप में वरण किया है; अतः मेरी दी हुई इस कन्या को तुम अपनी पटरानी के रूप में ग्रहण करो।"

ययाति ने आशङ्का व्यक्त करते हुए पूछा— "भार्गव ब्रह्मन्! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाह में यह प्रत्यक्ष दिखने वाला वर्णसङ्कर जनित महान अधर्म मेरा स्पर्श न करे।"

शुक्र उवाच

ययातिरुवाच अधर्मो न स्पृशेदेष महान् मामिह भार्गव ।
वर्णसंकरजो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ॥

ययाति बोले- भार्गव ब्रह्मन्! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 32पृष्ठ 616

शुक्राचार्य ने आश्वासन देते हुए कहा— "राजन्! मैं तुम्हें अधर्म से मुक्त करता हूँ; तुम्हारी जो इच्छा हो वर माँग लो। इस विवाह को लेकर तुम्हारे मन में ग्लानि नहीं होनी चाहिए। मैं तुम्हारे सारे पापों को दूर करता हूँ। तुम सुन्दरी देवयानी को धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो। महाराज! वृषपर्वा की पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है। इसका सदा आदर करना, किन्तु इसे अपनी सेज पर कभी न बुलाना।"

इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।
सम्पूज्या सततं राजन् मा चैनां शयने ह्वयेः ॥

महाराज! वृषपर्वाकी पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है । इसका सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न बुलाना ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 35पृष्ठ 617

वैशम्पायन जी कहते हैं— "जनमेजय! शुक्राचार्य के ऐसा कहने पर राजा ययाति ने उनकी परिक्रमा की और शास्त्रोक्त विधि से मङ्गलमय विवाह कार्य सम्पन्न किया। शुक्राचार्य से देवयानी ने कहा कि जैसी उत्तम कन्या, शर्मिष्ठा और दो हजार अन्य कन्याओं तथा महान वैभव को पाकर दैत्यों एवं शुक्राचार्य से पूजित हुए उन महात्मा की आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्ष के साथ अपनी राजधानी को गए।"

वैशम्पायन उवाच

लब्ध्वा शुक्रान्महद् वित्तं देवयानीं तदोत्तमाम् ।
द्विसहस्रेण कन्यानां तथा शर्मिष्ठया सह ॥

सम्पूजितश्च शुक्रेण दैत्यैश्च नृपसत्तमः ।
जगाम स्वपुरं हृष्टोऽनुज्ञातोऽथ महात्मना ॥

शुक्राचार्यसे देवयानी - जैसी उत्तम कन्या, शर्मिष्ठा और दो हजार अन्य कन्याओं तथा महान् वैभवको पाकर दैत्यों एवं शुक्राचार्यसे पूजित हो, उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको गये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 81 · श्लोक 37-38पृष्ठ 617

राजा ययाति की राजधानी महेन्द्रपुरी—अमरावती के समान थी। उन्होंने वहाँ आकर देवयानी को तो अन्तःपुर में स्थान दिया और उसी की अनुमति से अशोकवाटिका के समीप एक महल बनवाकर उसमें वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा को उसकी एक हजार दासियों के साथ ठहराया। उन सबके लिए अन्न, वस्त्र तथा पेय आदि की अलग-अलग व्यवस्था करके शर्मिष्ठा का समुचित सत्कार किया गया।

देवयानी ययाति के साथ परम रमणीय एवं मनोरम अशोकवाटिका में आती और शर्मिष्ठा के साथ वन-विहार करके उसे वहीं छोड़कर स्वयं राजा के साथ महल में चली जाती थी। इस तरह वह बहुत समय तक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द भोगती रही। नहुष कुमार राजा ययाति ने देवयानी के साथ बहुत वर्षों तक देवताओं की भाँति विहार किया। वे उसके साथ बहुत प्रसन्न और सुखी थे। इसी बीच ऋतुकाल आने पर सुन्दरी देवयानी ने गर्भ धारण किया और समयानुसार प्रथम पुत्र को जन्म दिया।

इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो जाने पर, जब वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा युवावस्था को प्राप्त हुई, तो उसने अपने आप को रजस्वलावस्था में देखा और वह अत्यन्त चिन्तामग्न हो गई। वह भरी अशोक-शाखा का आश्रय लिए खड़ी थी। दर्पण में अपना मुँह देखकर उसके मन में पति के दर्शन की लालसा जाग उठी और वह शोक एवं मोह से युक्त होकर बोली— "हे अशोक वृक्ष! जिनका हृदय शोक में डूबा हुआ है, उन सबके शोक को तुम दूर करने वाले हो। इस समय मुझे प्रियतम का दर्शन कराकर अपने ही जैसे नामवाली बना दो।"

शर्मिष्ठा फिर विचार करने लगी— "मुझे ऋतुकाल प्राप्त हो गया; किन्तु अभी तक मैंने पति का वरण नहीं किया है। यह कैसी परिस्थिति आ गई! अब क्या करना चाहिए अथवा क्या करने से सुकृत होगा? देवयानी तो पुत्रवती हो गई; किन्तु मुझे जो जवानी मिली है, वह व्यर्थ जा रही है। जिस प्रकार उसने पति का वरण किया है, उसी तरह मैं भी उन्हीं महाराज का क्यों न पति के रूप में वरण कर लूँ? मेरे याचना करने पर राजा मुझे पुत्र रूप फल दे सकते हैं, ऐसा मुझे पूरा विश्वास है; परन्तु क्या वे धर्मात्मा नरेश इस समय मुझे एकान्त में दर्शन देंगे?"

शर्मिष्ठा अभी विचार ही कर रही थी कि राजा ययाति दैववश महल से बाहर निकले और अशोकवाटिका के निकट शर्मिष्ठा को देखकर ठहर गए। मनोहर हास वाली शर्मिष्ठा ने उन्हें एकान्त में अकेला देख आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना की— "नहुष-नन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, विष्णु, यम, वरुण अथवा आपके महल में कौन किसी स्त्री की ओर दृष्टि डाल सकता है? महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदा से जानते हैं। मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिए— मेरे ऋतुकाल को सफल बनाइए।"

शर्मिष्ठोवाच सोमस्येन्द्रस्य विष्णोर्वा यमस्य वरुणस्य च ।
तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति ॥

रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा ।
सा त्वां याचे प्रसाद्याहमृतुं देहि नराधिप ॥

शर्मिष्ठाने कहा - नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, विष्णु, यम, वरुण अथवा आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? ( अतएव यहाँ मैं सर्वथा सुरक्षित हूँ) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं । मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये – मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 82 · श्लोक 12-13पृष्ठ 620

ययाति ने कहा— "शर्मिष्ठे! तुम दैत्यराज की सुशील और निर्दोष कन्या हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे शरीर अथवा रूप में सूई की नोक बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है, जो निन्दा के योग्य हो। परन्तु क्या करूँ; जब मैंने देवयानी के साथ विवाह किया था, उस समय कविपुत्र शुक्राचार्य ने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'वृषपर्वा की पुत्री इस शर्मिष्ठा को अपनी सेज पर कभी न बुलाना'।"

शर्मिष्ठा ने तर्क दिया— "राजन्! परिहासयुक्त वचन असत् हो तो भी वह हानिकारक नहीं होता। अपनी स्त्रियों के प्रति, विवाह के समय, प्राण सङ्कट के समय तथा सर्वस्व का अपहरण होते समय यदि कभी विवश होकर असत्य भाषण करना पड़े तो वह दोषकारक नहीं होता। ये पाँच प्रकार के असत्य पापशून्य बताए गए हैं। महाराज! किसी निर्दोष प्राणी का प्राण बचाने के लिए गवाही देते समय यदि कोई अन्यथा भाषण करे, तो उसे पतित कहा जाता है; परन्तु जहाँ अपने और दूसरे दोनों के प्राण बचाने का प्रसङ्ग हो, वहाँ केवल अपने प्राण बचाने के लिए बोला गया असत्य उसका नाश नहीं करता।"

ययाति बोले— "देवि! सब प्राणियों के लिये राजा ही प्रमाण है। वह यदि झूठ बोलने लगे तो उसका नाश हो जाता है। अतः सङ्कट में पड़ने पर भी मैं झूठा काम नहीं कर सकता।"

शर्मिष्ठा ने कहा— "राजन्! अपना पति और सखी का पति दोनों बराबर माने गए हैं। सखी के साथ ही रहने वाली दूसरी कन्याओं का भी विवाह हो जाता है। मेरी सखी ने आपको अपना पति बनाया है, अतः मैंने भी बना लिया। राजन्! 'जिसकी जैसी इच्छा होगी, उस मनुष्य को मैं मुँहमाँगी वस्तु दूँगा'— ऐसा कहकर आपने नगर में जो तीनों समय दान की घोषणा करायी है, वह मेरी प्रार्थना ठुकरा देने पर झूठी सिद्ध होगी। आपकी वह सारी घोषणा व्यर्थ समझी जाएगी। राजेन्द्र! आप कुबेर की भाँति अपनी उस घोषणा को सत्य कीजिये।"

ययाति बोले— "याचकों को उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दी जाएँ, ऐसा मेरा व्रत है। तुम भी मुझसे अपने मनोरथ की याचना करती हो; बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?"

शर्मिष्ठा ने कहा— "राजन्! मुझे अधर्म से बचाइए और धर्म का पालन कराईये। मैं चाहती हूँ कि आपसे सन्तानवती होकर इस लोक में उत्तम धर्म का आचरण करूँ। महाराज! तीन व्यक्ति धन के अधिकारी नहीं हैं— पत्नी, दास और पुत्र। जो ये धन प्राप्त करते हैं, वह उसी का होता है जिसके अधिकार में ये हैं; अर्थात् पत्नी के धन पर पति का, सेवक के धन पर स्वामी का और पुत्र के धन पर पिता का अधिकार होता है। मैं देवयानी की सेविका हूँ और वह आपके अधीन है; अतः राजन्! वह और मैं दोनों ही आपके सेवन करने योग्य हैं। मेरा सेवन कीजिये।"

शर्मिष्ठोवाच अधर्मात् पाहि मां राजन् धर्मं च प्रतिपादय ।
त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम् ॥

शर्मिष्ठाने कहा — राजन्! मुझे अधर्मसे बचाइये और धर्मका पालन कराइये । मैं चाहती हूँ, आपसे संतानवती होकर इस लोकमें उत्तम धर्मका आचरण करूँ ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 82 · श्लोक 21पृष्ठ 622

वैशम्पायन जी कहते हैं— "शर्मिष्ठा के ऐसा कहने पर राजा ने उसकी बातों को ठीक समझा। उन्होंने शर्मिष्ठा का सत्कार किया और धर्मानुसार उसे अपनी भार्या बनाया। फिर शर्मिष्ठा के साथ समागम किया और इच्छानुसार कामोपभोग करके, एक-दूसरे का आदर-सत्कार करने के पश्चात् दोनों जैसे आये थे, वैसे ही अपने-अपने स्थान पर चले गये। सुन्दर भौंह तथा मनोहर मुस्कान वाली शर्मिष्ठा ने उस समागम में नृपश्रेष्ठ ययाति से पहले-पहल गर्भ धारण किया।"

शर्मिष्ठा बोली— "शुचिस्मिते! वे अपने तप और तेज से सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर मुझे कुछ पूछने का साहस ही नहीं हुआ।"

देवयानी ने कहा— "शर्मिष्ठे! यदि ऐसी बात है; यदि तुमने ज्येष्ठ और श्रेष्ठ द्विज से सन्तान प्राप्त की है, तो तुम्हारे ऊपर मेरा क्रोध नहीं रहा।"

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वे दोनों आपस में इस प्रकार बातें करके हँस पड़ीं। देवयानी को प्रतीत हुआ कि शर्मिष्ठा ठीक कहती है; अतः वह चुपचाप महल में चली गयी। राजा ययाति ने देवयानी के गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे यदु और तुर्वसु। वे दोनों दूसरे इन्द्र और विष्णु की भाँति प्रतीत होते थे। उन्हीं राजर्षि से वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने तीन पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम थे द्रुह्यु, अनु और पूरु।

राजन्! तदनन्तर किसी समय पवित्र मुस्कान वाली देवयानी ययाति के साथ एकान्त वन में गयी। वहाँ उसने देवताओं के समान सुन्दर रूप वाले कुछ बालकों को निर्भय होकर क्रीड़ा करते देखा। उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो वह इस प्रकार बोली— "राजन्! ये देवबालकों के तुल्य शुभ लक्षण सम्पन्न कुमार किसके हैं? तेज और रूप में तो ये मुझे आप ही के समान जान पड़ते हैं।"

राजा से इस प्रकार पूछकर उसने उन कुमारों से प्रश्न किया— "बच्चो! तुम्हारे कुल का क्या नाम है? तुम्हारे पिता कौन हैं? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ। मैं तुम्हारे पिता का नाम सुनना चाहती हूँ।" सुन्दरी देवयानी के इस प्रकार पूछने पर उन बालकों ने पिता का परिचय देते हुए तर्जनी अङ्गुली से उन्हीं नृपश्रेष्ठ ययाति को दिखा दिया और शर्मिष्ठा को अपनी माता बताया।

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर वे सब बालक एक साथ राजा के समीप आ गये; परन्तु उस समय देवयानी के निकट राजा ने उनका अभिनन्दन नहीं किया— उन्हें गोद में नहीं उठाया। तब वे बालक रोते हुए शर्मिष्ठा के पास चले गये। उनकी बातें सुनकर राजा ययाति लज्जित से हो गये। उन बालकों का राजा के प्रति विशेष प्रेम देखकर देवयानी सारा रहस्य समझ गयी और शर्मिष्ठा से इस प्रकार बोली—

"भामिनि! तुम तो कहती थीं कि मेरे पास कोई ऋषि आया करते हैं। यह बहाना लेकर तुम राजा ययाति को ही अपने पास आने के लिये प्रोत्साहन देती रहीं। मैंने पहले ही कह दिया था कि तुमने कोई पाप किया है। शर्मिष्ठे! तुमने मेरे अधीन होकर भी मुझे अप्रिय लगने वाला बर्ताव क्यों किया? तुम फिर उसी असुर-धर्म पर उतर आयीं। मुझसे डरती भी नहीं हो?"

दृष्ट्वा तु तेषां बालानां प्रणयं पार्थिवं प्रति ।
बुद्ध्वा च तत्त्वं सा देवी शर्मिष्ठामिदमब्रवीत् ॥

उन बालकोंका राजाके प्रति विशेष प्रेम देखकर देवयानी सारा रहस्य समझ गयी और शर्मिष्ठासे इस प्रकार बोली ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 83 · श्लोक 18पृष्ठ 627

शर्मिष्ठा बोली— "मनोहर मुस्कान वाली सखी! मैंने जो ऋषि कहकर अपने स्वामी का परिचय दिया है, सो सत्य ही है। मैं न्याय और धर्म के अनुकूल आचरण करती हूँ, अतः तुमसे नहीं डरती। जब तुमने पति का वरण किया था, उसी समय मैंने भी कर लिया। शोभने! जो सखी का स्वामी होता है, वही उसके अधीन रहने वाली अन्य अविवाहिता सखियों का भी धर्मतः पति होता है। तुम ज्येष्ठ हो, ब्राह्मण की पुत्री हो, अतः मेरे लिये माननीय एवं पूजनीय हो; परन्तु ये राजर्षि मेरे लिये तुमसे भी अधिक पूजनीय हैं। क्या यह बात तुम नहीं जानतीं?"

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! शर्मिष्ठा का यह वचन सुनकर देवयानी ने कहा— "राजन्! अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी। आपने मेरा अत्यन्त अप्रिय किया है।" ऐसा कहकर तरूणी देवयानी आँखों में आँसू भरकर सहसा उठी और तुरन्त ही शुक्राचार्य जी के पास जाने के लिये वहाँ से चल दी। यह देख उस समय राजा ययाति व्यथित हो गये। वे व्याकुल हो देवयानी को समझाते हुए उसके पीछे-पीछे गये, किन्तु वह नहीं लौटी। उसकी आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं। वह राजा से कुछ न बोलकर केवल नेत्रों से आँसू बहाये जाती थी।

कुछ ही देर में वह कविपुत्र शुक्राचार्य के पास जा पहुँची। पिता को देखते ही वह प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हो गयी। तदनन्तर राजा ययाति ने भी शुक्राचार्य की वन्दना की। देवयानी ने कहा— "पिताजी! अधर्म ने धर्म को जीत लिया। नीच की उन्नति हुई और उच्च की अवनति। वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा मुझे लाँघकर आगे बढ़ गयी। इन महाराज ययाति से ही उसके तीन पुत्र हुए हैं, किन्तु तात! मुझ भाग्यहीना के दो ही पुत्र हुए हैं। यह मैं आपसे ठीक बता रही हूँ।"

"भृगुश्रेष्ठ! ये महाराज धर्मज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हैं; किन्तु इन्होंने ही मर्यादा का उल्लङ्घन किया है। कविनन्दन! यह आपसे यथार्थ कह रही हूँ।"

शुक्राचार्य ने कहा— "महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्म को प्रिय मानकर उसका आचरण किया है। इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबाएगी।"

शुक्र उवाच

धर्मज्ञः सन् महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम् ।
तस्माज्जरा त्वामचिराद् धर्षयिष्यति दुर्जया ॥

शुक्राचार्यने कहा- महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्मको प्रिय मानकर उसका आचरण किया है । इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबायेगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 83 · श्लोक 31पृष्ठ 629

ययाति बोले— "भगवन्! दानवराज की पुत्री मुझसे ऋतुदान माँग रही थी; अतः मैंने धर्म-सम्मत मानकर यह कार्य किया, किसी दूसरे विचार से नहीं। ब्रह्मन्! जो पुरुष न्याययुक्त ऋतु की याचना करने वाली स्त्री को ऋतुदान नहीं देता, वह ब्रह्मवादी विद्वानों द्वारा भ्रूणहत्या करने वाला कहा जाता है। जो न्यायसम्मत कामना से युक्त गम्य स्त्री के द्वारा एकान्त में प्रार्थना करने पर उसके साथ समागम नहीं करता, वह धर्म-शास्त्र में विद्वानों द्वारा गर्भ की हत्या करने वाला बताया जाता है।

ब्रह्मन्! मेरा यह व्रत है कि मुझसे कोई जो भी वस्तु माँगे, उसे वह अवश्य दे दूँगा। आपके ही द्वारा मुझे सौंपी हुई शर्मिष्ठा इस जगत् में दूसरे किसी पुरुष को अपना पति बनाना नहीं चाहती थी। अतः उसकी इच्छा पूर्ण करना धर्म समझकर मैंने वैसा किया है। आप इसके लिये मुझे क्षमा करें। भृगुश्रेष्ठ! इन्हीं सब कारणों का विचार करके अधर्म के भय से उद्विग्न हो मैं शर्मिष्ठा के पास गया था।"

शुक्राचार्य ने कहा— "राजन्! तुम्हें इस विषय में मेरे आदेश की भी प्रतीक्षा करनी चाहिये थी; क्योंकि तुम मेरे अधीन हो। नहुषनन्दन! धर्म में मिथ्या आचरण करने वाले पुरुष को चोरी का पाप लगता है।"

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! क्रोध में भरे हुए शुक्राचार्य के शाप देने पर नहुषपुत्र राजा ययाति उसी समय पूर्वावस्था—का परित्याग करके तत्काल बूढ़े हो गये।

वैशम्पायन उवाच

क्रुद्धेनोशनसा शप्तो ययातिर्नाहुषस्तदा ।
पूर्वं वयः परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -क्रोधमें भरे हुए शुक्राचार्यके शाप देनेपर नहुषपुत्र राजा ययाति उसी समय पूर्वावस्था ( यौवन ) - का परित्याग करके तत्काल बूढ़े हो गये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 83 · श्लोक 37पृष्ठ 631

ययाति बोले— "भृगुश्रेष्ठ! मैं देवयानी के साथ युवावस्था में रहकर तृप्त नहीं हो सका हूँ; अतः ब्रह्मन्! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे यह बुढ़ापा मेरे शरीर में प्रवेश न करे।"

वैशम्पायन उवाच

ययातिरुवाच अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह ।
प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं न विशेच्च माम् ॥

ययाति बोले — भृगुश्रेष्ठ! मैं देवयानीके साथ युवावस्थामें रहकर तृप्त नहीं हो सका हूँ; अतः ब्रह्मन्! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे यह बुढ़ापा मेरे शरीरमें प्रवेश न करे ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 83 · श्लोक 38पृष्ठ 631

शुक्राचार्य जी ने कहा— "भूमिपाल! मैं झूठ नहीं बोलता; बूढ़े तो तुम हो ही गये; किन्तु तुम्हें इतनी सुविधा देता हूँ कि यदि चाहो तो किसी दूसरे से जवानी लेकर इस बुढ़ापा को उसके शरीर में डाल सकते हो।"

शुक्र उवाच

नाहं मृषा ब्रवीम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप ।
जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन् संक्रामय यदीच्छसि ॥

शुक्राचार्यजीने कहा - भूमिपाल! मैं झूठ नहीं बोलता; बूढ़े तो तुम हो ही गये; किंतु तुम्हें इतनी सुविधा देता हूँ कि यदि चाहो तो किसी दूसरेसे जवानी लेकर इस बुढ़ापाको उसके शरीरमें डाल सकते हो ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 83 · श्लोक 39पृष्ठ 631

ययाति बोले— "ब्रह्मन्! मेरा जो पुत्र अपनी युवावस्था मुझे दे, वही पुण्य और कीर्तिका का भागी होने के साथ ही मेरे राज्य का भी भागी हो। आप इसका अनुमोदन करें।"

राज्यभाक् स भवेद् ब्रह्मन् पुण्यभाक् कीर्तिभाक् तथा ।
यो मे दद्यात् वयः पुत्रस्तद् भवाननुमन्यताम् ॥

ययाति बोले – ब्रह्मन्! मेरा जो पुत्र अपनी युवावस्था मुझे दे, वही पुण्य और कीर्तिका भागी होनेके साथ ही मेरे राज्यका भी भागी हो । आप इसका अनुमोदन करें ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 83 · श्लोक 40पृष्ठ 632

शुक्राचार्य ने कहा— "नहुषनन्दन! तुम भक्तिभाव से मेरा चिन्तन करके अपनी वृद्धावस्था का इच्छानुसार दूसरे के शरीर में सञ्चार कर सकोगे। उस दशा में तुम्हें पाप भी नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा, साथ ही दीर्घायु, यशस्वी तथा अनेक सन्तानों से युक्त होगा।"

शुक्र उवाच

संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज ।
मामनुध्याय भावेन न च पापमवाप्स्यसि ॥

वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति ।
आयुष्मान् कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च ॥

शुक्राचार्यने कहा - नहुषनन्दन! तुम भक्तिभावसे मेरा चिन्तन करके अपनी वृद्धावस्थाका इच्छानुसार दूसरेके शरीरमें संचार कर सकोगे । उस दशामें तुम्हें पाप भी नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें ( प्रसन्नतापूर्वक ) अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा, साथ ही दीर्घायु, यशस्वी तथा अनेक संतानोंसे युक्त होगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 83 · श्लोक 41-42पृष्ठ 632

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्व के अन्तर्गत सम्भवपर्व में ययात्युपाख्यान विषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ।

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा ययाति बुढ़ापा लेकर वहाँ से अपने नगर में आये और अपने ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ पुत्र यदु से इस प्रकार बोले—

ययाति ने कहा— "तात! कविपुत्र शुक्राचार्य के शाप से मुझे बुढ़ापे ने घेर लिया; मेरे शरीर में झुर्रियाँ पड़ गयीं और बाल सफेद हो गये; किन्तु मैं अभी जवानी के भोगों से तृप्त नहीं हुआ हूँ। यदो! तुम बुढ़ापे के साथ मेरे दोष को ले लो और मैं तुम्हारी जवानी के द्वारा विषयों का उपभोग करूँ। एक हजार वर्ष पूरे होने पर मैं पुनः तुम्हारी जवानी देकर बुढ़ापे के साथ अपना दोष वापस ले लूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

ययातिरुवाच जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगुः ।
काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने ॥

ययातिने कहा – तात! कविपुत्र शुक्राचार्यके शापसे मुझे बुढ़ापेने घेर लिया; मेरे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और बाल सफेद हो गये; किंतु मैं अभी जवानीके भोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 2पृष्ठ 633

यदु बोले— "राजन्! बुढ़ापे में खाने-पीने से अनेक दोष प्रकट होते हैं; अतः मैं आपकी वृद्धावस्था नहीं लूँगा, यही मेरा निश्चित विचार है। महाराज! मैं उस बुढ़ापे को लेने की इच्छा नहीं करता, जिसके आने पर दाढ़ी-मूँछ के बाल सफेद हो जाते हैं; जीवन का आनन्द चला जाता है। वृद्धावस्था एकदम शिथिल कर देती है। सारे शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और मनुष्य इतना दुर्बल तथा कृशकाय हो जाता है कि उसकी ओर देखते नहीं बनता। बुढ़ापे में काम-काज करने की शक्ति नहीं रहती, युवतियाँ तथा जीविका पाने वाले सेवक भी तिरस्कार करते हैं; अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता। धर्मज्ञ नरेश्वर! आपके बहुत से पुत्र हैं, जो आपको मुझसे भी अधिक प्रिय हैं; अतः बुढ़ापा लेने के लिये किसी दूसरे पुत्र को चुन लीजिये।"

सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप ।
जरां ग्रहीतुं धर्मज्ञ तस्मादन्यं वृणीष्व वै ॥

धर्मज्ञ नरेश्वर! आपके बहुत - से पुत्र हैं, जो आपको मुझसे भी अधिक प्रिय हैं; अतः बुढ़ापा लेनेके लिये किसी दूसरे पुत्रको चुन लीजिये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 8पृष्ठ 634

ययाति ने कहा— "तात! तुम मेरे हृदय से उत्पन्न औरस पुत्र होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते; इसलिये तुम्हारी सन्तान राज्य की अधिकारिणी नहीं होगी।"

ययातिरुवाच यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि ।
तस्मादराज्यभाक् तात प्रजा तव भविष्यति ॥

ययातिने कहा — तात! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न ( औरस पुत्र) होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते; इसलिये तुम्हारी संतान राज्यकी अधिकारिणी नहीं होगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 9पृष्ठ 634

अब उन्होंने तुर्वसु को बुलाकर कहा— "तुर्वसो! बुढ़ापे के साथ मेरा दोष ले लो। बेटा! मैं तुम्हारी जवानी से विषयों का उपभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूर्ण होने पर मैं तुम्हें जवानी लौटा दूँगा और बुढ़ापे सहित अपने दोष को वापस ले लूँगा।"

तुर्वसो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह ।
यौवनेन चरेयं वै विषयांस्तव पुत्रक ॥

( अब उन्होंने तुर्वसुको बुलाकर कहा- ) तुर्वसो! बुढ़ापेके साथ मेरा दोष ले लो । बेटा! मैं तुम्हारी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 10पृष्ठ 634

ययाति ने अपने पुत्र तुर्वसु की ओर क्रोधित दृष्टि से देखा और कहा— "तुर्वसो! तू मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देता है, इसलिये तेरी सन्तति नष्ट हो जाएगी। मूढ़! जिनके आचार और धर्म वर्णसङ्करों के समान हैं, जो प्रतिलोम-सङ्कर जातियों में गिने जाते हैं तथा जो कच्चा मांस खाने वाले एवं चाण्डाल आदि की श्रेणी में हैं, ऐसे लोगों का तू राजा होगा। जो गुरु-पत्नियों में आसक्त हैं, जो पशु-पक्षी आदि का आचरण करने वाले हैं तथा जिनके सारे आचार-विचार भी पशुओं के समान हैं, तू उन पापात्मा म्लेच्छों का राजा होगा।"

ययातिरुवाच यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि ।
तस्मात् प्रजा समुच्छेदं तुर्वसो तव यास्यति ॥

ययातिने कहा — तुर्वसो! तू मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देता है, इसलिये तेरी संतति नष्ट हो जायगी ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 13पृष्ठ 635

वैशम्पायन जी कहते हैं— जनमेजय! राजा ययाति ने इस प्रकार अपने पुत्र तुर्वसु को शाप देकर शर्मिष्ठा के पुत्र द्रुह्यु से यह बात कही। ययाति ने फिर द्रुह्यो की ओर मुड़कर कहा— "द्रुह्यो! कान्ति तथा रूप का नाश करने वाली यह वृद्धावस्था तुम ले लो और एक हजार वर्षों के लिये अपनी जवानी मुझे दे दो। हजार वर्ष पूर्ण हो जाने पर मैं पुनः तुम्हारी जवानी तुम्हें दे दूँगा और बुढ़ापे के साथ अपना दोष फिर ले लूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

ययातिरुवाच द्रुह्यो त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम् ।
जरां वर्षसहस्रं मे यौवनं स्वं ददस्व च ॥

ययातिने कहा – द्रुह्यो! कान्ति तथा रूपका नाश करनेवाली यह वृद्धावस्था तुम ले लो और एक हजार वर्षोंके लिये अपनी जवानी मुझे दे दो ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 17पृष्ठ 635

द्रुह्यु ने विवशता और असमर्थता प्रकट करते हुए कहा— "पिताजी! बूढ़ा मनुष्य हाथी, घोड़े और रथ पर नहीं चढ़ सकता; स्त्री का भी उपभोग नहीं कर सकता। उसकी वाणी भी लड़खड़ाने लगती है; अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता।" ययाति के स्वर में अब कठोरता आ गई, उन्होंने कहा— "द्रुह्यो! तू मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी अपनी जवानी मुझे नहीं दे रहा है; इसलिये तेरा प्रिय मनोरथ कभी सिद्ध नहीं होगा। जहाँ घोड़े जुते हुए उत्तम रथों, घोड़ों, हाथियों, पालकियों, गदहों, बकरों, बैलों और शिबिकाओं की गति नहीं है, जहाँ प्रतिदिन नाव पर बैठकर ही घूमना-फिरना होगा, ऐसे प्रदेश में तू अपनी सन्तानों के साथ चला जाएगा और वहाँ तेरे वंश के लोग राजा नहीं, भोज कहलाएंगे।"

यत्राश्वरथमुख्यानामश्वानां स्याद् गतं न च ।
हस्तिनां पीठकानां च गर्दभानां तथैव च ॥

बस्तानां च गवां चैव शिबिकायास्तथैव च ।
उडुपप्लवसंतारो यत्र नित्यं भविष्यति ।
अराजा भोजशब्दं त्वं तत्र प्राप्स्यसि सान्वयः ॥

जहाँ घोड़े जुते हुए उत्तम रथों, घोड़ों, हाथियों, पीठकों ( पालकियों ), गदहों, बकरों, बैलों और शिबिका आदिकी भी गति नहीं है, जहाँ प्रतिदिन नावपर बैठकर ही घूमना फिरना होगा, ऐसे प्रदेशमें तू अपनी संतानोंके साथ चला जायगा और वहाँ तेरे वंशके लोग राजा नहीं, भोज कहलायेंगे ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 21-22पृष्ठ 636

तदनन्तर ययाति ने अनु की ओर देखा और कहा— "अनो! तुम बुढ़ापे के साथ मेरा दोष ले लो और मैं तुम्हारी जवानी के द्वारा एक हजार वर्ष तक सुख भोगूँगा।" अनु ने सङ्कोचवश उत्तर दिया— "पिताजी! बूढ़ा मनुष्य बच्चों की तरह असमय में भोजन करता है, अपवित्र रहता है तथा समय पर अग्निहोत्र नहीं करता, अतः ऐसी वृद्धावस्था को मैं नहीं लेना चाहता।" ययाति ने उसे शाप देते हुए कहा— "अनो! तू मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था मुझे नहीं दे रहा है और बुढ़ापे के दोष बतला रहा है; अतः तू वृद्धावस्था के समस्त दोषों को प्राप्त करेगा और तेरी सन्तान जवान होते ही मर जाएगी तथा तू भी बूढ़े जैसा होकर अग्निहोत्र का त्याग कर देगा।"

यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि ।
जरादोषस्त्वया प्रोक्तस्तस्मात् त्वं प्रतिपत्स्यसे ॥

प्रजाश्च यौवनप्राप्ता विनशिष्यन्त्यनो तव ।
अग्निप्रस्कन्दनपरस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि ॥

ययातिने कहा — अनो! तू मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था मुझे नहीं दे रहा है और बुढ़ापेके दोष बतला रहा है, अतः तू वृद्धावस्थाके समस्त दोषोंको प्राप्त करेगा और तेरी संतान जवान होते ही मर जायगी तथा तू भी बूढ़े- जैसा होकर अग्निहोत्रका त्याग कर देगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 25-26पृष्ठ 637

अन्त में ययाति ने पूरु की ओर देखा और अत्यन्त व्याकुल स्वर में कहा— "पूरू! तुम मेरे प्रिय पुत्र हो। गुणों में तुम श्रेष्ठ होगे। तात! मुझे बुढ़ापे ने घेर लिया; सब अङ्गों में झुर्रियां पड़ गयीं और सिर के बाल सफेद हो गए। बुढ़ापा के ये सारे चिह्न मुझे एक ही साथ प्राप्त हुए हैं। कविपुत्र शुक्राचार्य के शाप से मेरी यह दशा हुई है; किन्तु मैं जवानी के भोगों से अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ। पूरू! तुम बुढ़ापे के साथ मेरे दोष को ले लो और मैं तुम्हारी युवावस्था लेकर उसके द्वारा कुछ काल तक विषय भोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूरे होने पर मैं तुम्हें पुनः तुम्हारी जवानी दे दूँगा और बुढ़ापे के साथ अपना दोष ले लूँगा।"

काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने ।
पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह ।
कंचित् कालं चरेयं वै विषयान् वयसा तव ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् ।
स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥

कविपुत्र शुक्राचार्यके शापसे मेरी यह दशा हुई है; किंतु मैं जवानीके भोगोंसे अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ । पूरो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी युवावस्था लेकर उसके द्वारा कुछ कालतक विषयभोग करूँगा । एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं तुम्हें पुनः तुम्हारी जवानी दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष ले लूँगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 28-29पृष्ठ 637

वैशम्पायन जी कहते हैं— जनमेजय! ययाति के ऐसा कहने पर पूरू ने अपने पिता से अत्यन्त विनयपूर्वक कहा— "महाराज! आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, आपके उस वचन का मैं पालन करूँगा। गुरुजनों की आज्ञा का पालन मनुष्यों के लिये पुण्य, स्वर्ग तथा आयु प्रदान करने वाला है। गुरु के ही प्रसाद से इन्द्र ने तीनों लोकों का शासन किया है। गुरुस्वरूप पिता की अनुमति प्राप्त करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं को पा लेता है। राजन्! मैं वृद्धावस्था से आच्छादित होकर आपकी आयु एवं रूप धारण कर रहूँगा और आपको जवानी देकर आप मेरे लिये जो आज्ञा देंगे, उसका पालन करूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमञ्जसा ।
यथाऽऽत्थ मां महाराज तत् करिष्यामि ते वचः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं- ययातिके ऐसा कहनेपर पूरुने अपने पितासे विनयपूर्वक कहा— ‘ महाराज! आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, आपके उस वचनका मैं पालन करूँगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 30पृष्ठ 637

ययाति ने प्रसन्न होकर कहा— "वत्स! पूरू! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ और प्रसन्न होकर तुम्हें यह वर देता हूँ कि तुम्हारे राज्य में सारी प्रजा समस्त कामनाओं से सम्पन्न होगी।" ऐसा कहकर महातपस्वी ययाति ने शुक्राचार्य का स्मरण किया और अपनी वृद्धावस्था महात्मा पूरू को देकर उनकी युवावस्था ले ली।

ययातिरुवाच पूरो प्रीतोऽस्मि ते वत्स प्रीतश्चेदं ददामि ते ।
सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति ॥

ययाति बोले — वत्स! पूरो! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ और प्रसन्न होकर तुम्हें यह वर देता हूँ ——तुम्हारे राज्यमें सारी प्रजा समस्त कामनाओंसे सम्पन्न होगी'

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 33पृष्ठ 638

वैशम्पायन जी कहते हैं— जनमेजय! नहुष के पुत्र नृपश्रेष्ठ ययाति ने पूरू की युवावस्था से अत्यन्त प्रसन्न होकर अभीष्ट विषय भोगों का सेवन आरम्भ किया। वे राजा सिंह के समान पराक्रमी और नवयुवक थे। सम्पूर्ण विषय उनके अधीन थे। काल-तत्त्व को जानने वाले ययाति एक-एक कला और काष्ठा की गिनती करके एक हजार वर्ष की अवधि स्मरण रखते थे। वे नन्दनवन में अप्सराओं के साथ रमण करते और अलकापुरी तथा मेरु शिखर पर विहार करते थे।

जब समय पूरा हुआ, तब ययाति अपने पुत्र पूरू के पास आए और बोले— "शत्रुदमन पुत्र! मैंने तुम्हारी जवानी के द्वारा अपनी रुचि, उत्साह और समय के अनुसार विषयों का सेवन किया है। परन्तु विषयों की कामना उन विषयों के उपभोग से कभी शान्त नहीं होती; अपितु घी की आहुति पड़ने से अग्निकी भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है। इस पृथ्वी पर जितने भी धान, जौ, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक मनुष्य के लिये भी पर्याप्त नहीं हैं। अतः तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए। जो मनुष्य के बूढ़े होने पर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती और जो एक प्राणान्तक रोग है, उस तृष्णा को त्याग देने वाले पुरुष को ही सुख मिलता है। देखो, विषय भोग में आसक्त चित्त हुए मेरे एक हजार वर्ष बीत गये, तो भी प्रतिदिन उन विषयों के लिये ही तृष्णा पैदा होती है। अतः मैं इस तृष्णा को छोड़कर परब्रह्म परमात्मा में मन लगा द्वन्द्व और ममता से रहित होकर वन में मृगों के साथ विचरूँगा। पूरू! तुम्हारा भला हो, मैं प्रसन्न हूँ। अपनी यह जवानी ले लो। साथ ही यह राज्य भी अपने अधिकार में कर लो; क्योंकि तुम मेरा प्रिय करने वाले पुत्र हो।"

पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम् ।
राज्यं चेदं गृहाण त्वं त्वं हि मे प्रियकृत् सुतः ॥

' पूरो! तुम्हारा भला हो, मैं प्रसन्न हूँ। अपनी यह जवानी ले लो । साथ ही यह राज्य भी अपने अधिकारमें कर लो; क्योंकि तुम मेरा प्रिय करनेवाले पुत्र हो'

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 85 · श्लोक 17पृष्ठ 641

तदनन्तर ययाति ने अपनी वृद्धावस्था वापस ले ली और पूरू ने पुनः अपनी युवावस्था प्राप्त कर ली। जब ब्राह्मणों ने देखा कि महाराज ययाति अपने छोटे पुत्र पूरू को राजा बनाना चाहते हैं, तब वे पास आए और बोले— "प्रभो! शुक्राचार्य के नाती और देवयानी के ज्येष्ठ पुत्र यदु के होते हुए उन्हें लाँघकर आप पूरू को राज्य क्यों देते हैं? यदु आपके ज्येष्ठ पुत्र हैं। उनके बाद तुर्वसु उत्पन्न हुए हैं। तदनन्तर शर्मिष्ठा के पुत्र क्रमशः द्रुह्यु, अनु और पूरू हैं। ज्येष्ठ पुत्रों का उल्लङ्घन करके छोटा पुत्र राज्य का अधिकारी कैसे हो सकता है? हम आपको इस बात का स्मरण दिला रहे हैं। आप धर्म का पालन कीजिये।"

वैशम्पायन उवाच

कथं ज्येष्ठानतिक्रम्य कनीयान् राज्यमर्हति ।
एतत् सम्बोधयामस्त्वां धर्मं त्वं प्रतिपालय ॥

‘ ज्येष्ठ पुत्रोंका उल्लंघन करके छोटा पुत्र राज्यका अधिकारी कैसे हो सकता है? हम आपको इस बातका स्मरण दिला रहे हैं । आप धर्मका पालन कीजिये '

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 85 · श्लोक 22पृष्ठ 641

ययाति ने उत्तर दिया— "ब्राह्मण आदि सब वर्ण के लोग मेरी बात सुनें, मुझे ज्येष्ठ पुत्र को किसी तरह राज्य नहीं देना है। मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदु ने मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया है। जो पिता के प्रतिकूल हो, वह सत्पुरुषों की दृष्टि में पुत्र नहीं माना गया है। जो माता और पिता की आज्ञा मानता है, उनका हित चाहता है और उनके अनुकूल चलता है, वही वास्तव में पुत्र है। अनुरूप पुत्र देवताओं, ऋषियों और पितरों के पूजन का अधिकारी होता है। जो बहुत-से मनुष्यों के लिये गुणकारक हो, उसी को ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं। यदु ने मेरी अवहेलना की है; तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनु ने भी मेरा बड़ा तिरस्कार किया है। पूरू ने मेरी आज्ञा का पालन किया और मेरी बात को अधिक आदर दिया है; इसीने मेरा बुढ़ापा ले रखा था। अतः मेरा यह छोटा पुत्र ही वास्तव में मेरे राज्य और धन को पाने का अधिकारी है। स्वयं शुक्राचार्य ने मुझे वर दिया है कि 'जो पुत्र तुम्हारा अनुसरण करे, वही राजा एवं समस्त भू-मण्डल का पालक हो'। अतः मैं आप लोगों से विनयपूर्ण आग्रह करता हूँ कि पूरू को ही राज्य पर अभिषिक्त करें।"

मम कामः स च कृतः पूरुणा मित्ररूपिणा ।
शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम् ॥

पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः ।
भवतोऽनुनयाम्येवं पूरू राज्येऽभिषिच्यताम् ॥

पूरुने मित्ररूप होकर मेरी कामनाएँ पूर्ण की हैं । स्वयं शुक्राचार्यने मुझे वर दिया है कि ‘ जो पुत्र तुम्हारा अनुसरण करे, वही राजा एवं समस्त भूमण्डलका पालक हो ’ । अतः मैं आपलोगोंसे विनयपूर्ण आग्रह करता हूँ कि पूरुको ही राज्यपर अभिषिक्त करें ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 85 · श्लोक 28-29पृष्ठ 643

प्रजा वर्ग के लोग बोले— "जो पुत्र गुणवान् और सदा माता-पिता का हितैषी हो, वह छोटा होने पर भी श्रेष्ठतम है। वही सम्पूर्ण कल्याण का भागी होने योग्य है। पूरू आपका प्रिय करने वाले पुत्र हैं, अतः शुक्राचार्य के वरदान के अनुसार ये ही राज्य पाने के अधिकारी हैं।"

प्रकृतय ऊचुः यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा ।
सर्वमर्हति कल्याणं कनीयानपि सत्तमः ॥

प्रजावर्गके लोग बोले- जो पुत्र गुणवान् और सदा माता- पिताका हितैषी हो, वह छोटा होनेपर भी श्रेष्ठतम है । वही सम्पूर्ण कल्याणका भागी होनेयोग्य है ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 85 · श्लोक 30पृष्ठ 643

वैशम्पायन जी कहते हैं— जनमेजय! नगर और राज्य के लोगों ने सन्तुष्ट होकर जब यह कहा, तब ययाति ने अपने पुत्र पूरू को ही राज्य पर अभिषिक्त किया। पूरू को राज्य देकर, वनवास की दीक्षा लेकर राजा ययाति तपस्वी ब्राह्मणों के साथ नगर से बाहर निकल गये।

वैशम्पायन उवाच

पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा ।
अभ्यषिञ्चत् ततः पूरुं राज्ये स्वे सुतमात्मनः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— नगर और राज्यके लोगोंने संतुष्ट होकर जब इस प्रकार कहा, तब नहुषनन्दन ययातिने अपने पुत्र पूरुको ही अपने राज्यपर अभिषिक्त किया ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 85 · श्लोक 32पृष्ठ 643

यदु से यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए, तुर्वसु की सन्तान यवन कहलायी, द्रुह्यु के पुत्र भोज नाम से प्रसिद्ध हुए और अनु से म्लेच्छ जातियाँ उत्पन्न हुईं। राजा पूरू से पौरव वंश चला; जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो। तुम्हें इन्द्रिय-संयमपूर्वक एक हजार वर्षों तक यह राज्य करना है।

In English

The Lineage of Manu and the Story of Yayati

This text traces the genealogy from Daksha through various kings, including Pururava and Nahusha. It details how King Yayati exchanged his old age for the youth of his son Puru before realizing that worldly pleasures are never satisfying. Finally, it describes Kach chasing the knowledge of Shukracharya while serving his daughter Devayani.

This page answers

  • How did yayati exchange his old age for puru's youth?
  • Why did pururava get cursed by the rishis?
  • What was yayati's lesson about worldly desires?
  • How did kach serve devayani while studying under shukracharya?

Also written: Yayatyupakhyana, Yayatya, Pururava, Sanatkumara, Nahusha, Yayati, Yadu, Puru, Sharmishtha, Devayani, Shukracharya, Brihaspati, Kacha, Angira, Indra, Ghurnika, Vrishaparva, Dhatri, Druhyu, Anu, Turvasu, ययात्युपाख्यान