श्रीगणेशाय नमः।

सावित्र्युपाख्यान : परम दुर्लभ भक्ति और मुक्ति के वास्तविक सार क्या हैं?

भक्ति और मुक्ति का रहस्य

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 26–38 · पृष्ठ 458–540

13,883 शब्द · 70 मिनटका पाठ · 40 श्लोक

सूत ने नारद से कहा

सावित्री की कथा सुनाने हेतु

हे नारद! सदा पवित्र रहने वाली, जो तुलसी नाम से प्रसिद्ध हैं, भगवान के लिए शिरोधार्य हैं, सबकी अभीष्ट हैं तथा सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करने वाली हैं; उन जीवन्मुक्त, मुक्तिदायिनी तथा श्रीहरिकी भक्ति प्रदान करने वाली भगवती तुलसी की मैं उपासना करता हूँ। हे मुने! विद्वान् पुरुष को चाहिए कि इस प्रकार से देवी तुलसी का ध्यान, पूजन तथा स्तवन करके उन्हें प्रणाम करे। मैंने आपसे तुलसी के उपाख्यान का वर्णन कर दिया; अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं?

नारदजी बोले— "यह तुलसी की अमृततुल्य कथा तो मैंने सुन ली, अब आप सावित्री की कथा कहने की कृपा कीजिये। ऐसा सुना गया है कि वे सावित्री वेदों की जननी हैं। वे सर्वप्रथम किससे उत्पन्न हुईं, जगत् में सर्वप्रथम इनकी पूजा किसने की और बाद में किन लोगों ने इनकी पूजा की?"

श्रीनारायण उवाच

श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको संयमपूर्वक रहकर व्रतीको ४४ चतुर्दशीतिथिमें व्रत करके शुद्ध समयमें भक्तिपूर्वक सावित्रीकी पूजा करनी चाहिये ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 44पृष्ठ 462

श्री नारायण बोले— "हे मुने! सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने वेदमाता सावित्री की पूजा की, इसके बाद वेदों ने और तदनन्तर विद्वद्गणों ने इनका पूजन किया। तत्पश्चात् भारतवर्ष में राजा अश्वपति ने इनका पूजन किया और इसके बाद चारों वर्ण के लोग इनकी पूजा करने लगे।"

नारद बोले— "हे ब्रह्मन्! वे अश्वपति कौन थे? सर्वप्रथम उन्होंने सर्वपूज्या उन देवी की पूजा किस कामना से की तथा बाद में किन लोगों ने उनका पूजन किया?"

श्री नारायण बोले— "हे मुने! मद्र देश में अश्वपति नामक एक महान् राजा हुए। वे अपने शत्रुओं के बल का नाश करने वाले तथा मित्रों का दुःख दूर करने वाले थे। उनकी महारानी मालती नाम से विख्यात थीं। वे रानी धर्मनिष्ठ थीं। वे उनके लिये उसी प्रकार थीं, जैसे गदाधारी विष्णु के लिये लक्ष्मी। हे नारद! वे रानी मालती निःसन्तान थीं। अतः उन्होंने वसिष्ठ के उपदेशानुसार भगवती सावित्री की भक्तिपूर्वक आराधना की। किन्तु रानी को देवी से न तो कोई सङ्केत मिला और न उनके दर्शन ही हुए; अतः कष्ट से व्याकुल होकर दुःखित मन से वे घर चली गयीं।"

इसके पश्चात राजा अश्वपति भक्तिपूर्वक सावित्री की तपस्या के लिये पुष्कर क्षेत्र में चले गये। वहाँ उन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में करके सौ वर्ष तक तपस्या की। उन्हें सावित्री के दर्शन तो नहीं हुए, किन्तु एक प्रत्यादेश प्राप्त हुआ। उस नृपेंद्र को एक अशरीरी आकाशवाणी सुनाई दी— "हे राजेन्द्र! तुम गायत्री का दस लाख जप करो।"

इसी बीच वहाँ मुनि पराशर आ गये। राजा ने उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर मुनि राजा से कहने लगे— "हे राजर्षे! इस क्रम से आप दस लाख गायत्री का जप कीजिये। इससे आपके तीन जन्मों के पापों का नाश हो जायेगा और आप भगवती सावित्री का साक्षात् दर्शन प्राप्त करेंगे। हे राजन्! आप पवित्र होकर प्रतिदिन प्रातः, मध्याह्न एवं सायङ्काल की सन्ध्या सदा कीजिये। सन्ध्या न करने वाला व्यक्ति अपवित्र रहता है और वह समस्त कर्मों के लिये अयोग्य हो जाता है। जो ब्राह्मण प्रातः एवं सायङ्काल की सन्ध्या नहीं करता, वह शूद्र के समान है और समस्त ब्राह्मणोचित कर्मों से बहिष्कृत कर देने योग्य है। जो द्विज त्रिकाल-सन्ध्या नहीं करता, उसके द्वारा सम्पादित पूजा को देवगण तथा पिण्ड-तर्पण को पितृगण स्वेच्छापूर्वक स्वीकार नहीं करते हैं।"

[ नैवेद्य - ] सन्तुष्टि, पुष्टि, प्रीति तथा पुण्य ६४ प्रदान करनेवाले एवं भूख शान्त करनेवाले इस स्वादिष्ट नैवेद्यको आप स्वीकार करें ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 643पृष्ठ 463

मुनि पराशर ने राजा अश्वपति को सावित्री की पूजा का सम्पूर्ण विधान बताया और कहा— "माला को कमल पर संयमपूर्वक रखकर गोरोचन से अनुलिप्त कर, फिर गायत्री मन्त्र का उच्चारण करके विद्वान् पुरुष माला को स्नान करायें। तत्पश्चात् उसी माला से विधिपूर्वक गायत्री मन्त्र का सौ बार जप करना चाहिये अथवा पञ्चगव्य या गङ्गाजल से शुद्ध की हुई माला से भी जप किया जा सकता है। इस क्रम से आप दस लाख गायत्री का जप कीजिये।" मुनि ने सम्पूर्ण उपदेश देकर राजा को आवश्यक प्रयोग बता दिये और अपने आश्रम चले गये।

६६ [ शीतल जल- ] प्यासका शमन करनेवाले, जगत्के जीवन तथा प्राणरूप इस परम शीतल जलको आप स्वीकार करें ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 663पृष्ठ 464

राजा अश्वपति ने भगवती सावति्री की विधिवत उपासना की। उन्होंने चौदह प्रकार के नैवेद्य अर्पण किये, पुष्प, धूप, वस्त्र तथा यज्ञोपवीत से पूजन किया। एक मङ्गल कलश स्थापित कर उस पर पल्लव रखे। गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वती की पूजा करके कलश पर अपनी इष्टदेवी सावित्री का आवाहन किया। सोलह प्रकार के पूजनोपचार अर्पित किये— आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, भूषण, माला, चन्दन, आचमन और मनोहर शय्या।

६७ [ वस्त्र— ] कपास तथा रेशमसे निर्मित, देहके शोभास्वरूप तथा सभाओंमें सौन्दर्यकी वृद्धि करनेवाले इस वस्त्रको आप स्वीकार करें ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 673पृष्ठ 464

सावित्री का ध्यान करते हुए राजा ने स्तोत्रराज से उनकी स्तुति की। इस प्रकार स्तोत्रराज से राजा अश्वपति ने भगवती सावित्री की स्तुति करके उनका दर्शन किया और उनसे मनोभिलषित वर भी प्राप्त कर लिया। जैसे ही राजा ने विधिपूर्वक पूजा पूर्ण की, वैसे ही हजारों सूर्यों के समान तेज से सम्पन्न उन देवी प्रकट हुईं। अपने प्रभामण्डल से दिशाओं को आलोकित करती हुई प्रसन्नवदना भगवती ने मुसकराते हुए राजा को सम्बोधित किया।

स्तुति

हिरण्यगर्भरूपे त्वं प्रसन्ना भव सुन्दरि ।
तेज: स्वरूपे परमे परमानन्दरूपिणि ॥

द्विजातीनां जातिरूपे प्रसन्ना भव सुन्दरि ।
नित्ये नित्यप्रिये देवि नित्यानन्दस्वरूपिणि ॥

सर्वमङ्गलरूपे च प्रसन्ना भव सुन्दरि ।
सर्वस्वरूपे विप्राणां मन्त्रसारे परात्परे ॥

सुखदे मोक्षदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि ।
विप्रपापेधमदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमे ॥

ब्रह्मतेजः प्रदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि ।
कायेन मनसा वाचा यत्पापं कुरुते नरः ॥

तत्त्वत्स्मरणमात्रेण भस्मीभूतं भविष्यति ।
इत्युक्त्वा जगतां धाता तस्थौ तत्रैव संसदि ॥

सावित्री ब्रह्मणा सार्धं ब्रह्मलोकं जगाम सा ।
अनेन स्तवराजेन संस्तूयाश्वपतिर्नृपः ॥

हे नारद! प्राचीन कालकी बात है - गोलोकमें विराजमान श्रीकृष्णने सावित्रीको ब्रह्माके पास जानेकी आज्ञा दी, किंतु वे सावित्री उनके साथ ब्रह्मलोक जानेको तैयार नहीं हुईं । तब कृष्णके कहनेपर ब्रह्माजी भक्तिपूर्वक वेदमाता सावित्रीका स्तवन करने लगे । तदनन्तर उन सावित्रीने परम प्रसन्न होकर ब्रह्माको पति बनाना स्वीकार कर लिया ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 77-783पृष्ठ 465

सावित्री बोलीं— "हे महाराज! मैं जानती हूँ कि आपके मन में क्या कामना है और आपकी पत्नी क्या चाहती है, मैं निश्चितरूप से वह सब प्रदान करूँगी। आपकी साध्वी पत्नी कन्या की कामना करती है और आप पुत्र की इच्छा रखते हैं; ये दोनों ही अभिलाषाएँ क्रमसे पूर्ण होंगी।"

[ आभूषण - ] सुवर्ण आदिसे निर्मित, प्रभायुक्त, ६८ सदा शोभा बढ़ानेवाले, सुखदायक तथा पुण्यप्रद इस रत्नमय आभूषणको आप स्वीकार करें ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 68पृष्ठ 464

ऐसा कहकर वे भगवती सावित्री ब्रह्मलोक चली गयीं और राजा अश्वपति अपने घर लौट गये। उन्हें समय पर पहले कन्या उत्पन्न हुई, जो भगवती सावित्री की आराधना के प्रभाव से श्रेष्ठ देवी कमला के रूप में पुत्रीरूपी उत्पन्न हुई थी। राजा अश्वपति ने उस कन्या का नाम 'सावित्री' रखा। वह कन्या शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान दिनोंदिन बढ़ने लगी और यथासमय रूप तथा यौवन से सम्पन्न हो गयी। उसने द्युमत्सेन के सत्यनिष्ठ तथा अनेक गुणों से युक्त पुत्र सत्यवान् का पतिरूप में वरण किया। तब राजा ने रत्नमय भूषणों से अलङ्कृत उस कन्या को उन्हें समर्पित कर दिया।

४५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ कृष्णेन दत्तां सावित्रीं गोलोके ब्रह्मणे पुरा ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 77पृष्ठ 465

सत्यवान् अपने पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर, हर्षपूर्वक फल और लकड़ियाँ एकत्र करने के लिए वन की ओर निकल पड़े। उनके अङ्गुष्ठ-प्रमाण के अत्यन्त सूक्ष्म शरीर को लेकर वे प्रस्थान कर रहे थे, तभी साध्वी सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दीं।

तभी संयमनीपुरी के स्वामी और साधुओं में परम श्रेष्ठ धर्मराज ने सुन्दर दाँतों वाली उस सावित्री को अपने पीछे आते देखा। धर्मराज ने मधुर वाणी में उसे रोकते हुए पूछा— "हे सावित्री! तुम यह मानव शरीर धारण किए कहाँ जा रही हो? यदि तुम अपने पति के साथ जाने की इच्छा रखती हो, तो पहले इस नश्वर शरीर का त्याग करो। विनाशशील मनुष्य इस पाञ्च-भौतिक शरीर को लेकर मेरे लोक कभी नहीं जा सकता।"

धर्मराज ने आगे कहा— "हे साध्वी! भारतवर्ष में आए हुए तुम्हारे पति की आयु अब पूर्ण हो चुकी है। अपने कर्मों का फल भोगने के लिए अब यह सत्यवान् मेरे लोक में जा रहा है। जीव अपने कर्म के प्रभाव से इन्द्र, ब्रह्मपुत्र या हरिका दास बनकर जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो सकता है। मनुष्य अपने कर्म से सम्पूर्ण सिद्धियाँ, अमरत्व और भगवान विष्णु के सालोक्य आदि चार प्रकार के मोक्षपद निश्चित रूप से प्राप्त कर सकता है। उसी प्रकार अपने कर्म के प्रभाव से ही मनुष्य— क्षत्रिय, वैश्य, जङ्गम (चल), शैल (पर्वत), राक्षस, किन्नर, वृक्ष, पशु, वनजीवी, क्षुद्रजन्तु, कीट, दैत्य, दानव और असुर जैसी योनियाँ प्राप्त करता है।" इतना कहकर यमराज ने सावित्री को विरराम किया।

यमराज की बात सुनकर पतिव्रता तथा दृढ़ निश्चय वाली सावित्री ने परम भक्ति के साथ उनकी स्तुति की और उनसे प्रश्न किए— "बुद्धि क्या है? इन्द्रियाँ क्या हैं? देवता कौन हैं? कराने वाला कौन है? जीव कौन है और परमात्मा कौन हैं? यह सब आप मुझे कृपा करके बताइये।"

धर्मराज बोले— "वेद में जो प्रतिपादित है, वही धर्म है और वही परम मङ्गलकारी कर्म है। इसके विपरीत अवैदिक कर्म निश्चित रूप से अशुभ होता है। श्रुतियों के अनुसार, जो मनुष्य ब्रह्म की भक्ति करता है, वह मुक्त होकर जन्म-मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक तथा भय से रहित हो जाता है। हे साध्वी! भक्ति दो प्रकार की है— एक जो निर्वाण पद प्रदान करती है और दूसरी जो साक्षात् श्रीहरि का स्वरूप प्रदान करती है। वैष्णवजन श्रीहरि के सारूप्य की कामना करते हैं, जबकि अन्य ब्रह्मवेत्ता योगी निर्वाण पद चाहते हैं।"

उन्होंने आगे ज्ञान का विस्तार करते हुए कहा— "कर्म का बीज ही उसका फल है। परमात्मा ही कर्म के कारण हैं और यह शरीर नश्वर है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश— ये पाँच महाभूत सृष्टि में प्रयुक्त होते हैं। कर्म करने वाला जीव देही है और वही अन्तर्यामी रूप से भोजयिता भी है। सुख और दुःख को भोगना तथा इससे छूट जाना ही 'निष्कृति' (मोक्ष) है। सत् और असत् में भेद करने वाला ज्ञान है, जो अनेक भेदों का कारण है। विवेचनमयी शक्ति ही बुद्धि है। वायु के विभिन्न रूप प्राण हैं, जो देहधारियों के लिए बलस्वरूप हैं। इन्द्रियाँ— आँख, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा— कर्मों की प्रेरक, सुख-दुःख देने वाली और ईश्वर का अंश रूप हैं। जो प्राण और देह को धारण करता है, वह जीव है; और प्रकृति से परे सर्वव्यापी निर्गुण ब्रह्म ही परमात्मा है। हे सावित्री! तुमने जो पूछा था, वह मैंने शास्त्रानुसार बता दिया। अब तुम सुखपूर्वक चली जाओ।"

सावित्री ने अत्यन्त करुणा भरे स्वर में कहा— "हे प्रभो! मैं अपने इन प्राणनाथ तथा ज्ञान के सागर स्वरूप आपको छोड़कर कहाँ जाऊँ? इस समय मैं आपसे जो प्रश्न कर रही हूँ, उन्हें आप मुझे बताइये। किस कर्म के प्रभाव से जीव किस योनि में जाता है? किस कर्म से स्वर्ग और किस कर्म से नरक मिलता है? किस कर्म से गुरु के प्रति भक्ति होती है? किन कर्मों से प्राणी योगी, रोगी, दीर्घजीवी, अल्पायु, दुःखी, सुखी, अङ्गहीन, काना, बहरा, अन्धा, पङ्गु या पागल हो जाता है? किस कर्म द्वारा मनुष्य सिद्धि, सालोक्य आदि चारों मुक्तियाँ, ब्राह्मणत्व, तपस्विता, स्वर्ग के भोग तथा परम गोलोक प्राप्त करता है? कितने प्रकार के नरक हैं और कौन-सा पापी किस नरक में कितना समय तक रहता है?"

सावित्री ने अन्त में कहा— "हे जगत्प्रभो! एक लाख वर्ष बीतने के पश्चात् मैं सत्यवान् के साथ भगवान श्रीहरि के धाम चली जाऊँगी।"

सावित्री की यह बात सुनकर यमराज आश्चर्य में पड़ गए और हँसकर प्राणियों के कर्मफल के विषय में बताना आरम्भ किया। धर्म बोले— "हे वत्से! तुम्हारी अवस्था अभी मात्र बारह वर्ष की है, किन्तु तुम्हारा ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों से भी बढ़कर है। तुम भगवती सावित्री की ही कला हो और राजा अश्वपति ने तपस्या द्वारा तुम्हें प्राप्त किया है। जिस प्रकार तुम सुशोभित हो, उसी प्रकार सत्यवान् की सौभाग्यवती प्रिया बनकर सुशोभित हो जाओ। यह मेरा वरदान है। इसके अतिरिक्त जो दूसरा वर चाहिए, माँग लो।"

कन्यां ददति विप्राय चन्द्रलोकं प्रयान्ति ते ।
वसन्ति तत्र ते साध्वि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 29 · श्लोक 42पृष्ठ 474

सावित्री ने अपने वर माँगे— "सौ और पुत्र प्राप्त हों, मेरे पिता को सौ पुत्र मिलें, मेरे श्वसुर को नेत्र-ज्योति और राज्य प्राप्त हो जाए; और अन्त में एक लाख वर्ष बीतने के पश्चात् मैं सत्यवान् के साथ श्रीहरि के धाम चली जाऊँ— यह वर भी दीजिये।"

ये विप्रा अन्यदेवेज्याः स्वधर्मनिरताः सति ।
ते यान्ति सर्वलोकं च पुनरायान्ति भारते ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 29 · श्लोक 36पृष्ठ 474

धर्मराज बोले— "हे महासाध्वि! तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। अब मैं जीवों के कर्मफल की विशेष बातें बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। केवल देवता, दैत्य, दानव और गन्धर्व ही शुभ-अशुभ कर्म करके विभिन्न योनियों में भटकते हैं और उनका फल भोगते हैं। शुभ कर्म से स्वर्ग और अशुभ से नरक मिलता है। कर्म क्षय होने पर भक्ति उत्पन्न होती है— निर्वाण स्वरूपा और भगवती प्रकृति की भक्ति। निष्काम जन शरीर त्यागकर भगवान के निरामय धाम को प्राप्त करते हैं और पुनः इस लोक में जन्म लेकर धीरे-धीरे निष्काम भक्त बनते हैं।"

हरिभक्ताश्च निष्कामाः स्वधर्मनिरता द्विजाः ।
ते च यान्ति हरेर्लोकं क्रमाद्भक्तिबलादहो ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 29 · श्लोक 37पृष्ठ 474

उन्होंने आगे बताया— "जो द्विज अपने धर्म में संलग्न रहकर तपस्या करते हैं, वे ब्रह्मलोक जाते हैं। जो अपने धर्म में रहकर सूर्य की उपासना करते हैं, वे सूर्यलोक जाते हैं। जो निष्काम भाव से भगवती जगदम्बा की भक्ति करते हैं, वे मणिद्वीप लोक जाते हैं। जो शिव, शक्ति और गणपति की उपासना करते हैं, वे शिवलोक जाते हैं। जो विप्र अपने धर्म से विमुख और देव-आराधना से रहित हैं, वे अवश्य ही नरक में पड़ते हैं। चारों वर्णों के लोग अपने कर्तव्य पालन से ही शुभ फल पाते हैं।"

स्वधर्मनिरता एव वर्णाश्चत्वार एव च ।
भवन्त्येव शुभस्यैव कर्मणः फलभोगिनः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 29 · श्लोक 39पृष्ठ 474

"दान के विषय में सुनो— कन्या को दान करने का फल दुगुना है। सकाम भाव से दान करने वाले चन्द्रलोक जाते हैं, किन्तु निष्काम दान करने वाले विष्णुलोक पहुँचते हैं। जो ब्राह्मण को गव्य, स्वर्ण, वस्त्र और जल देते हैं, वे चन्द्रलोक में एक मन्वन्तर तक रहते हैं। जो सुवर्ण, गौ और ताम्र देते हैं, वे सूर्यलोक में दस हजार वर्षों तक निवास करते हैं। जो भूमि और प्रचुर धन दान करते हैं, वे विष्णु के श्वेतद्वीप में पहुँचते हैं। ब्रह्माजी कहते हैं कि यदि पात्र को कन्या का दान किया जाए, तो वह अत्यन्त पुण्यदायी है। वापी (कुआँ) का दान करने से मनुष्य उस तड़ाग के रजकणों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक उस लोक में रहता है; वापी का दान तड़ाग के दान से कहीं अधिक फलदायी है।"

स्वधर्मरहिता विप्रा देवान्यसेवनाः सदा ।
भ्रष्टाचाराश्च कामाश्च ते यान्ति नरकं ध्रुवम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 29 · श्लोक 38पृष्ठ 474

"किसी वापी का कीचड़ दूर कराकर उसका उद्धार करने से वापी-दान के समान पुण्य प्राप्त हो जाता है। हे साध्वि! जो मनुष्य पीपल का वृक्ष लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह तपोलोक पहुँचता है और वहाँ दस हजार वर्षों तक निवास करता है। हे सावित्री! जो व्यक्ति समस्त प्राणियों के लिए पुष्पोद्यान का दान करता है, वह दस हजार वर्षों तक ध्रुवलोक में निश्चित रूप से निवास करता है। विमान का दान करने वाला पूरे एक मन्वन्तर तक विष्णुलोक में रहता है; और यदि वह चित्रयुक्त तथा विशाल विमान का दान करे, तो उसके दान का चौगुना फल मिलता है। शिविका का दान करने से मनुष्य उसका आधा फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति भगवान श्रीहरि के उद्देश्य से भक्तिपूर्वक दोला-मन्दिर का दान करता है, वह भी विष्णुलोक में सौ मन्वन्तर तक रहता है। हे पतिव्रते! जो मनुष्य आरामगृहों से युक्त राजमार्ग का निर्माण कराता है, वह दस हजार वर्षों तक इन्द्रलोक में प्रतिष्ठित होता है। इस प्रकार पुण्यवान विप्र भारतवर्ष में उत्तम ब्राह्मणकुलों में जन्म ग्रहण करता है; और वह अपने कर्मफल का भोग करके पुनः स्वर्ग से भारतवर्ष में ब्राह्मण होकर जन्म पाता है। क्षत्रिय के लिए भी यही नियम है, किन्तु कोई करोड़ों कल्प के तपस्या के प्रभाव से भी ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं कर सकता—ऐसा श्रुतियों में सुना गया है।"

"अपने द्वारा किए गए शुभ अथवा अशुभ कर्म का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। देवता और तीर्थ की सहायता से तथा कायव्यूह (तप) से प्राणी शुद्ध हो जाता है। हे साध्वि! ये कुछ बातें मैंने तुम्हें बतला दीं; अब आगे क्या सुनना चाहती हो?"

यमराज के इन वचनों को सुनकर सावित्री ने जिज्ञासावश पूछा— "हे यम! जिस कर्म के प्रभाव से पुण्यवान मनुष्य स्वर्ग आदि अन्य लोकों में जाते हैं, उसे मुझे बताने की कृपा कीजिये।"

सावित्री के इस प्रश्न पर धर्मराज ने दान और उसके फलों का वर्णन करना आरम्भ किया। उन्होंने कहा— "हे साध्वि! अन्नदान महादान है। जो अन्य लोगों को अन्नदान करता है, वह अन्न के दानों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। अन्नदान से बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा; इस दान में पात्र-परीक्षा अथवा समय सम्बन्धी नियम की आवश्यकता नहीं होती।"

अ ० २ ९ ] नवम स्कन्ध ४६५ स्वधर्मे निरता भक्ताः शैवा: शाक्ताश्च गाणपाः ।
ते यान्ति शिवलोकं च पुनरायान्ति भारते ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 29 · श्लोक 35पृष्ठ 474

धर्मराज ने आगे बताया— "हे साध्वि! यदि कोई मनुष्य देवताओं अथवा ब्राह्मणों को आसन का दान देता है, तो वह दस हजार वर्षों तक विष्णुलोक में निवास करता है। जो मनुष्य ब्राह्मण को दूध देने वाली दिव्य गाय प्रदान करता है, वह उस गाय के शरीर में विद्यमान रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित रहता है। पुण्य दिन में तीर्थ का फल चार गुना, और नारायण क्षेत्र में गोदान का फल करोड़ गुना होता है।"

"हे सावित्री! जो मनुष्य भारतवर्ष में भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को गाय प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षों तक चन्द्रलोक में निवास करता है। यदि कोई ब्राह्मण को उभयमुखी (प्रसव करती हुई) गाय का दान करे, तो वह उस गाय के रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो मनुष्य ब्राह्मण को स्वच्छ तथा मनोहर छत्र प्रदान करता है, वह दस हजार वर्ष तक वरुणलोक में आनन्दित रहता है। हे साध्वि! जो दुःखी और पीड़ित शरीर वाले ब्राह्मण को एक जोड़ा वस्त्र देता है, वह दस हजार वर्षों तक वायुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।"

"जो व्यक्ति ब्राह्मण को वस्त्र सहित शालग्राम का अर्पण करता है, वह चन्द्रमा तथा सूर्य की स्थिति तक वैकुण्ठ में प्रतिष्ठित होता है। जो मनुष्य ब्राह्मण को दिव्य तथा मनोहर शय्या का दान करता है, वह चन्द्र-सूर्य के काल तक चन्द्रलोक में रहता है। देवताओं और ब्राह्मणों को दीपक का दान करने वाले मन्वन्तरपर्यन्त अग्निलोक में वास करते हैं। भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मण को हाथी का दान करता है, वह इन्द्र की आयु पर्यन्त उनके आधे आसन पर विराजमान रहता है। जो अश्व दान करता है, वह चौदह इन्द्रों की स्थिति तक वरुणलोक में आनन्द पाता है। ब्राह्मण के लिए उत्तम शिविका का दान करने वाला भी चौदह इन्द्रों की स्थिति तक वरुणलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।"

"हे साध्वि! जो मनुष्य ब्राह्मण को उत्तम वाटिका प्रदान करता है, वह मन्वन्तरपर्यन्त वायुलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो व्यक्ति ब्राह्मण को पङ्खा तथा श्वेत चंवर का दान देता है, वह दस हजार वर्षों तक वायुलोक में रहता है। जो मनुष्य धान्य तथा रत्न का दान करता है, वह दीर्घायु और विद्वान् होता है; दान देने वाला और लेने वाला—दोनों निश्चय ही वैकुण्ठ लोक चले जाते हैं। जो मनुष्य भारतवर्ष में निरन्तर भगवान श्रीहरि के नाम का जप करता है, वह दीर्घजीवी होता है और मृत्यु उससे सदा दूर रहती है।"

"ब्राह्मण को तिल का दान करने वाला व्यक्ति तिलों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक शिवजी के धाम में आनन्द प्राप्त करता है; वहाँ से पुनः उत्तम योनी में जन्म पाकर वह दीर्घकाल तक सुख भोगता है। तिल से परिपूर्ण ताँबे के पात्र का दान करने से उससे भी दूना फल मिलता है। इसके बाद वह निश्चय ही गन्धर्वलोक में दस हजार वर्षों तक निवास करता है और वहाँ उर्वशी के साथ क्रीड़ा करते हुए दिन-रात आनन्द प्राप्त करता है। तत्पश्चात् उसे हजारों जन्मतक सुन्दर, साध्वी, सौभाग्यवती, कोमल तथा प्रिय सम्भाषण करने वाली भार्या प्राप्त होती है।"

"जो व्यक्ति ब्राह्मण को फलदान करता है, वह भी दीर्घ काल तक स्वर्ग में निवास करके पुनः भारतवर्ष में जन्म ग्रहण करता है। जो मनुष्य अनेक प्रकार के द्रव्यों और धान्यों से युक्त विशाल भवन ब्राह्मण को प्रदान करता है, वह सौ मन्वन्तर तक देवलोक में निवास करता है और तदनन्तर उत्तम योनि में जन्म पाकर महान धनाढ्य हो जाता है। हे साध्वि! पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में जो मनुष्य हरी-भरी फसलों से सम्पन्न भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को अर्पण करता है, वह सौ मन्वन्तर तक वैकुण्ठ में प्रतिष्ठित होता है और पुनः जन्म पाकर महान राजा बनता है; सौ जन्मों तक भूमि उसका त्याग नहीं करती।"

"जो व्यक्ति उत्तम गोशाला और गाँव ब्राह्मण को प्रदान करता है, वह एक लाख मन्वन्तर तक वैकुण्ठ में प्रतिष्ठित होता है। इसके बाद वह श्रेष्ठ कुल में जन्म पाकर लाखों गाँवों से सम्पन्न हो जाता है और लाख इन्द्रों की स्थिति पर्यन्त कैलास में सुप्रतिष्ठित रहता है। उसके पश्चात वह भारतवर्ष में उत्तम योनि में जन्म लेकर राजेश्वर बनता है और लाखों नगर प्राप्त करता है; दस हजार वर्षों तक धरा उसका साथ नहीं छोड़ती। जो मनुष्य अनेक वृक्षों से सम्पन्न सौ नगरों का दान किसी द्विज को करता है, वह करोड़ मन्वन्तर की अवधि तक वैकुण्ठ में रहता है और फिर जम्बूद्वीप का अधिपति बनकर पृथ्वीलोक में शोभा पाता है; करोड़ों जन्मों तक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती।"

"जो मनुष्य ब्राह्मण को अपना सम्पूर्ण अधिकार दे देता है, उसे अन्त में चौगुना फल प्राप्त होता है। जो तपस्वी ब्राह्मण को जम्बूद्वीप का दान देता है, वह सौ गुना फल पाता है। भूमिदान करने वाले, तीर्थ में निवास करने वाले, तपस्या में रत रहने वाले और समस्त सिद्धियों को प्राप्त किए हुए महेश्वरी जगदम्बा के भक्त को पुनः संसार में जन्म नहीं लेना पड़ता। भगवती जगदम्बा के उपासकों के समक्ष असङ्ख्य ब्रह्माओं का लय हो जाता है, किन्तु वे भगवती भुवनेश्वरी के परम धाम मणिद्वीप में निवास करते रहते हैं।"

"जो मनुष्य भगवती के मन्त्र की उपासना करते हैं, वे मानव शरीर त्यागने के उपरान्त जन्म-मृत्यु और जरा से रहित ऐश्वर्यमय दिव्य रूप धारण कर उनकी सारूप्य मुक्ति प्राप्त कर उनकी सेवा में संलग्न रहते हैं। वे मणिद्वीप में निवास करते हुए खण्डप्रलय का अवलोकन करते हैं; देवता और सिद्ध नष्ट हो जाते हैं, किन्तु देवीभक्त विनाश को प्राप्त नहीं होते।"

"जो मनुष्य कार्तिक महीने में भगवान श्रीहरि को तुलसी अर्पण करता है, वह श्रीहरि के धाम में तीन युगों तक आनन्दपूर्वक निवास करता है। तदनन्तर उत्तम कुल में जन्म लेकर वह निश्चित रूप से भगवान की भक्ति प्राप्त करता है और इस भारतभूमि में जितेन्द्रिय पुरुषों में अति श्रेष्ठ हो जाता है। सूर्य तथा चन्द्रमा की स्थिति पर्यन्त वहाँ आनन्द प्राप्त करने वाला जीव, पुनः जन्म लेकर परम तेजस्वी, तपस्वी, स्वधर्मपरायण और विद्वान् होता है।"

"जो पुरुष मीन और कर्क राशि के समय सूर्य के ताप में सुवासित जल का दान करते हैं, वे चौदह इन्द्रों की स्थिति तक कैलास में आनन्द भोगते हैं और पुनः जन्म पाकर शिवभक्त तथा वेद-वेदाङ्ग के विद्वान् होते हैं। जो मनुष्य वैशाख महीने में ब्राह्मण को सत्तू का दान करता है, वह सत्तू के कणों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक शिवलोक में निवास करता है और अन्ततः श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त करता है। इस भारतवर्ष में जो मनुष्य शिवरात्रिका व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरों तक शिवलोक में रहता है। जो शिवरात्रिका दिन भगवान शङ्कर को बिल्वपत्र अर्पण करता है, वह उतने ही वर्षों तक शिवलोक में आनन्द भोगता है और पुनः जन्म पाकर शिवभक्ति तथा प्रजा-भूमि से सम्पन्न होता है।"

"जो व्रती चैत्र अथवा माघ में पूरे मास, आधे मास, दस दिन या सात दिन तक भगवान शङ्कर की पूजा करता है और हाथ में बेंत लेकर उनके सम्मुख नर्तन करता है, वह उपासना के दिनों की सङ्ख्या के बराबर युगों तक शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो मनुष्य श्रीरामनवमी का व्रत सम्पन्न करता है, वह विष्णु धाम में सात मन्वन्तर तक आनन्द करता है और पुनः जन्म पाकर राम की भक्ति तथा महान धन प्राप्त करता है। वह हाथी-घोड़े के वाहनों से सम्पन्न राजराजेश्वर हो जाता है।"

"जो मनुष्य शिवलोक में निवास करता है, वह पुनः उत्तम योनि पाकर श्रीकृष्ण की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। भगवान श्रीहरि की सुदृढ़ भक्ति और मन्त्र प्राप्त करके देह त्यागने के उपरान्त वह गोलोक चला जाता है और श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त कर उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है; वहाँ उसका पतन नहीं होता और वह जरा-मृत्यु से रहित हो जाता है। जो तिथि को इन्द्र की पूजा करता है, वह साठ हजार वर्षों तक इन्द्रलोक में रहता है। जो रविवार, सङ्क्रान्ति या शुक्लपक्ष की सप्तमी को सूर्य की पूजा कर हविष्यान्न ग्रहण करता है, वह चौदह इन्द्रों के आयु पर्यन्त सूर्यलोक में प्रतिष्ठित होकर पुनः आरोग्ययुक्त और श्रीसम्पन्न जन्म प्राप्त करता है।"

जो मनुष्य ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवती सावित्री का पूजन करता है, वह सात मन्वन्तरों की अवधि तक ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। पुनः पृथ्वी पर लौटकर वह श्रीमान्, अतुल पराक्रमी, चिरञ्जीवी, ज्ञानवान् तथा समस्त सम्पदा से सम्पन्न हो जाता है। जो मनुष्य माघ महीने के शुक्लपक्ष की पञ्चमी तिथि को भक्तिपूर्वक सोलह प्रकार के पूजनोपचार अर्पण कर सरस्वती की पूजा करता है, वह ब्रह्मा जी की आयु तक मणिद्वीप में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और पुनः जन्म लेकर महान कवि तथा पण्डित बनता है। उससे भी दुगुने वर्षों तक वह विष्णुलोक में वास करता है और वहाँ भगवान श्रीहरि के साथ मङ्गलमय क्रीड़ा तथा उत्सव करते हुए आनन्द का भोग करता है। तत्पश्चात् पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर वह श्रीसम्पन्न, पुत्रवान्, विद्वान्, ज्ञानवान् तथा हर प्रकार से सुखी राजराजेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मणों को मिष्टान्न का भोजन कराता है, वह उस ब्राह्मण के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक विष्णुलोक में आनन्द प्राप्त करता है। तत्पश्चात् वहाँ से पुनः इस लोक में जन्म लेकर वह सुखी, धनवान्, विद्वान्, दीर्घजीवी, श्रीमान् तथा अतुलनीय पराधिकार वाला होता है। जो मनुष्य भगवान श्रीहरि के नाम का स्वयं कीर्तन करता है अथवा इसके लिए दूसरे को प्रेरणा देता है, वह जपे गये नामों की सङ्ख्या के बराबर युगों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है और वहाँ से पुनः इस लोक में आकर सुखी तथा धनवान् होता है। जो जीवन्मुक्त हो जाता है—यह सत्य है—उसका पुनर्जन्म नहीं होता, वह वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठित होकर भगवान विष्णु का सारूप्य प्राप्त कर लेता है और वहाँ से उसका पतन नहीं होता। इस प्रकार वह भगवान विष्णु की परम भक्ति सुलभ कर लेता है।

जो मनुष्य प्रतिदिन पार्थिव लिङ्ग बनाकर शिव की पूजा करता है और जीवनपर्यन्त इस नियम का पालन करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है; उस पार्थिव लिङ्ग में विद्यमान रजकणों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक वह शिवलोक में प्रतिष्ठित रहता है। वहाँ से पुनः भारतवर्ष में जन्म लेकर वह महान राजा बनता है। जो मनुष्य प्रतिदिन शालग्राम का पूजन करता है और शालग्राम शिला के जल का पान करता है, वह सौ ब्रह्माओं की आयु तक वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। उसके बाद फिर से जन्म लेकर वह भगवान श्रीहरि की दुर्लभ भक्ति प्राप्त करता है और पुनः विष्णुलोक में सुप्रतिष्ठित होता है, जहाँ उसका पतन नहीं होता। जो मनुष्य समस्त तपों तथा व्रतों को सम्पन्न कर लेता है, वह चौदह इन्द्रों के कालपर्यन्त वैकुण्ठ में निवास करता है और वहाँ से पुनः भारतवर्ष में जन्म लेकर महान सम्राट् बनता है; तदनन्तर वह मुक्त हो जाता है और उसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता। जो सभी तीर्थों में स्नान तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा कर लेता है, वह निर्वाण पद को प्राप्त कर लेता है और पुनः पृथ्वीलोक में उसका जन्म नहीं होता।

जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में अश्वमेध यज्ञ करता है, वह उस अश्व के शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षों तक इन्द्र के आधे आसन पर विराजमान रहता है। राजसूय यज्ञ करने से मनुष्य इससे भी चार गुना फल प्राप्त करता है। भगवती का यज्ञ सभी यज्ञों से भी श्रेष्ठ कहा गया है। हे वरानने! विष्णु और ब्रह्मा ने पूर्वकाल में इस यज्ञ को किया था और त्रिपुरासुर का वध करने के लिये महादेव शङ्कर जी ने भी इस यज्ञ को सम्पन्न किया था। हे सुन्दरि! यह शक्ति-यज्ञ सम्पूर्ण यज्ञों में प्रधान है; तीनों लोकों में इस यज्ञ के समान कोई दूसरा यज्ञ नहीं है।

साध्वि! पूर्व काल की बात है, दक्ष प्रजापति ने महान उत्सव के साथ भगवती का यज्ञ किया था, जिसमें दक्ष प्रजापति और शङ्कर में परस्पर कलह हो गया। क्रोध में आकर ब्राह्मणों ने नन्दी को शाप दिया और नन्दी ने ब्राह्मणों को शाप दे दिया; इस कारण चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले शिव ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर डाला। प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति, धर्म, कश्यप, शेषनाग, मुनि कर्दम, स्वायम्भुव मनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, कपिल तथा ध्रुव—ये सभी लोग देवीयज्ञ सम्पन्न कर चुके हैं। देवीयज्ञ करने वाला पुरुष हजारों राजसूय यज्ञों का फल निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है। वेद में कहा गया है कि देवीयज्ञ से बढ़कर फल प्रदान करने वाला कोई दूसरा यज्ञ नहीं है। देवीयज्ञ करने वाला सौ वर्ष तक जीवित रहकर अन्त में जीवन्मुक्त हो जाता है और इस लोक में ज्ञान तथा तप में साक्षात् भगवान विष्णु के तुल्य हो जाता है।

श्रीनारायण उवाच

शक्तेरुत्कीर्तनं श्रुत्वा सावित्री यमवक्त्रतः ।
साश्रुनेत्रा सपुलका यमं पुनरुवाच सा ॥

श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] यमके मुखसे भगवतीके नामकीर्तनकी महिमा सुनकर सावित्रीके नेत्रोंमें अश्रु भर आये और उसका शरीर पुलकित हो गया । वह यमसे पुनः कहने लगी ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 1पृष्ठ 488

गरुड़ स्त्रियों में मूल प्रकृति हैं; राधा, सरस्वती तथा पृथ्वी सर्वोपरि हैं; इन्द्रियों में मन चञ्चल है; प्रजापतियों में ब्रह्मा हैं; प्रजाओं में राजा है; वनों में वृन्दावन है; वर्षों में भारतवर्ष है; श्रीमान् लोगों में श्री है; विद्वानों में सरस्वती है; पतिव्रताओं में भगवती दुर्गा है और सौभाग्यवती स्त्रियों में राधा सर्वोपरि है। उसी प्रकार समस्त यज्ञों में देवीयज्ञ श्रेष्ठ है।

श्रीनारायण उवाच

सावित्र्युवाच शक्तेरुत्कीर्तनं धर्म सकलोद्धारकारणम् ।
श्रोतॄणां चैव वक्तॄणां जन्ममृत्युजराहरम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 2पृष्ठ 488

एक सौ अश्वमेध यज्ञ करने से मनुष्य इन्द्र पद प्राप्त कर लेता है। एक हजार अश्वमेध करके राजा पृथु ने विष्णुपद प्राप्त किया था। सम्पूर्ण तीर्थों के स्नान, समस्त यज्ञों की दीक्षा, सभी व्रतों, तपों तथा चारों वेदों के पाठ का पुण्य और पृथ्वी की प्रदक्षिणा—इन सभी साधनों के फल स्वरूप शक्तिस्वरूपा भगवती जगदम्बा की सेवा सुलभ हो जाती है, जो प्राणी को मोक्ष प्रदान कर देती है। देवी के चरणकमल की उपासना ही उसका सारभूत है। उन भगवती के चरित्र का वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम तथा गुणों का कीर्तन, उनके स्तोत्रों का स्मरण, उनकी वन्दना, उनके नाम का जप, उनके चरणोदक तथा नैवेद्य का ग्रहण—यह सब नित्य सम्पादित करना चाहिए। हे साध्वि! यह सर्वसम्मत तथा सभी के लिये अभीष्ट है।

हे वत्स! तुम निर्गुण परब्रह्म स्वरूपिणी पराम्बा भगवती मूलप्रकृति की उपासना करो। अब तुम अपने पति को ग्रहण करो और सुखपूर्वक अपने भवन में निवास करो। मनुष्यों का यह मङ्गलमय कर्मविपाक मैंने तुमसे कह दिया; यह प्रसङ्ग सबके लिये अभीष्ट, सर्वसम्मत, श्रेष्ठ तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करने वाला है।

श्रीनारायण बोले—"हे नारद!" यम के मुख से भगवती के नाम कीर्तन की महिमा सुनकर सावित्री के नेत्रों में अश्रु भर आए और उसका शरीर पुलकित हो गया। वह यम से पुनः कहने लगी—"हे धर्म! शक्तिस्वरूपा भगवती जगदम्बा का नाम कीर्तन सबका उद्धार करने वाला और श्रोता तथा वक्ता—दोनों के जन्म, मृत्यु तथा बुढ़ापे का नाश करने वाला है।"

धर्मराज उवाच

नानापुराणभेदेन नामभेदेन भामिनि ।
नानाप्रकारं स्वर्गं च याति जीवः स्वकर्मभिः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 3पृष्ठ 490

सावित्री बोली—"हे विभो! भगवती का यह कीर्तन दानवों, सिद्धों तथा तपस्वियों का परम पद है और समस्त योगों तथा वेदों का सेवनरूप ही है। मोक्षपद, अमरता और सभी प्रकार की सिद्धियाँ श्रीशक्ति के उपासक की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं। हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! मैं किस विधि से उन भगवती की उपासना करूँ, मुझे यह बताइये। मैंने आपसे मनुष्यों के शुभ कर्म का मनोहर फल सुन लिया, अब आप मुझे उनके अशुभ कर्मों का फल बताने की कृपा कीजिये।"

धर्मराज उवाच

शुभकर्मविपाकान्न नरकं याति कर्मभिः ।
कुकर्मणा च नरकं याति नानाविधं नरः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 4पृष्ठ 490

ऐसा कहकर वह सावित्री भक्तिभाव से अपना कन्धा झुकाकर वेदोक्त स्तोत्र द्वारा उन धर्मराज की स्तुति करने लगी—"मैं भगवान् यम को प्रणाम करती हूँ। जो अपनी आत्मा में रमण करने वाले, सर्वज्ञ, पुण्यात्माओं के मित्र तथा पापियों के लिये क्लेशप्रद हैं; उन भगवान् पुण्यमित्र को मैं प्रणाम करती हूँ। ब्रह्मा के अंश से जिनका जन्म हुआ है तथा जो सदा परब्रह्म का ध्यान करते रहते हैं—ब्रह्मतेज से दीप्तिमान उन भगवान् ईश को मैं प्रणाम करती हूँ।"

धर्मराज उवाच

नरकाणां च कुण्डानि सन्ति नानाविधानि च ।
नानाशास्त्रप्रमाणेन कर्मभेदेन यानि च ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 5पृष्ठ 490

"यमात्तस्य भयं नास्ति सर्वपापात्प्रमुच्यते। महापापी यदि पठेन्नित्यं भक्तिसमन्वितः॥ यमः करोति संशुद्धं कायव्यूहेन निश्चितम्।" मुने! इस प्रकार प्रार्थना करके सावित्री ने यमराज को प्रणाम किया। तदनन्तर धर्मराज ने उस सावित्री को भगवती के मन्त्र तथा प्राणियों के कर्मफल के विषय में बताया।

धर्मराज उवाच

विस्तृतानि च गर्तानि क्लेशदानि च दुःखिनाम् ।
भयङ्कराणि घोराणि हे वत्से कुत्सितानि च ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 6पृष्ठ 490

"जो मनुष्य प्रातः काल उठकर इस यमाष्टक का नित्य पाठ करता है, उसे यमराज से भय नहीं होता और वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। यदि महान पापी मनुष्य भी भक्तिपूर्वक नित्य इसका पाठ करे, तो यमराज अपने कायव्यूह से निश्चित रूप से उसे शुद्ध कर देते हैं।"

गरकुण्डं दूषिकुण्डं वसाकुण्डं तथैव च ।
शुक्रकुण्डमसृक्कुण्डमश्रुकुण्डं च कुत्सितम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 9पृष्ठ 491

धर्मराज बोले—"शुभ कर्म के विपाक के कारण मनुष्य नरक में नहीं जाता है। अब मैं अशुभ कर्मों का फल कह रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। हे भामिनि! अनेक प्रकार के पुराणों के अनुसार नामभेद से अनेकविध स्वर्ग हैं; अपने-अपने कर्मों के अनुसार जीव वहाँ जाता है। किन्तु विविध शास्त्रों के प्रमाणों के अनुसार तथा जीवों के कर्मभेद से प्राप्त होने वाले अत्यन्त विस्तृत, गहरे, पापियों के लिये क्लेशदायक, भयङ्कर, घोर तथा कुत्सित कुल छियासी कुण्ड हैं; इसके अतिरिक्त कुछ अन्य कुण्ड भी हैं। हे साध्वि! उन कुण्डों के वेदप्रसिद्ध नामों को बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो—दूषिकुण्ड, वसाकुण्ड, शुक्रकुण्ड, असृक्कुण्ड, कुत्सित अश्रुकुण्ड, गात्रमलकुण्ड, कर्णविट्कुण्ड, मज्जाकुण्ड, मांसकुण्ड, दुस्तर नक्रकुण्ड, लोमकुण्ड, केशकुण्ड, दुस्तर अस्थिकुण्ड, ताम्रकुण्ड, प्रतप्त एवं महान कष्टदायक लोहकुण्ड, चर्मकुण्ड, तप्तसुराकुण्ड, तीक्ष्ण कण्टककुण्ड, विषपूर्ण विषकुण्ड—ये कुण्ड बताये गये हैं। कालसूत्रकुण्ड, मत्स्योदकुण्ड, कृमितन्तु कुण्ड, पांसुभोज्यकुण्ड, पाशवेष्टकुण्ड, शूलप्रोतकुण्ड, प्रकम्पनकुण्ड, उल्कामुखकुण्ड, अन्धकूपकुण्ड, वेधनकुण्ड, ताडनकुण्ड, जालरन्ध्रकुण्ड, देहचूर्णकुण्ड, दलनकुण्ड, शोषणकुण्ड, कषकुण्ड, शूर्पकुण्ड, ज्वालामुखकुण्ड, धूमान्धकुण्ड और नागवेष्टनकुण्ड—ये कुण्ड बताये गये हैं। उपासकों एवं अपने कर्मों में लगे रहने वाले पुण्यशाली सिद्धों तथा योगियों को वे दिखाई नहीं पड़ते। इसी प्रकार जो सदा अपने धर्म में लगे रहते हैं, जिनका हृदय विशाल है, जो पूर्ण स्वतन्त्र हैं तथा जिन्हें स्वप्न में या कहीं भी अपने इष्टदेव का दर्शन हो चुका है—ऐसे वैष्णवजनों को वे बलवान् तथा निःशङ्क यमदूत कभी दिखाई नहीं पड़ते। हे साध्वि! यह मैंने तुमसे कुण्डों की सङ्ख्या का निरूपण कर दिया। जिन-जिन पापियों का इन-इन कुण्डों में वास होता है, अब मैं तुम्हें यह बता रहा हूँ, ध्यान से सुनो।"

कुण्डं गात्रमलानां च कर्णविट्कुण्डमेव च ।
मज्जाकुण्डं मांसकुण्डं नक्रकुण्डं च दुस्तरम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 10पृष्ठ 491

पापियों तथा उनके पापों का वर्णन करते हुए धर्मराज बोले—"हे साध्वि! भगवान श्रीहरि की सेवा में संलग्न रहने वाला, विशुद्धात्मा, योगसिद्ध, व्रती, तपस्वी तथा ब्रह्मचारी पुरुष निश्चित ही नरक में नहीं जाता है। जो बलशाली मनुष्य बल के अभिमान में आकर अपने कटु वचनों से बान्धवों को दग्ध करता है, वह वह्निकुण्ड नामक नरक में जाता है और अपने शरीर में विद्यमान रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक उस वह्निकुण्ड में वास करके तीन जन्मों तक रौद्रदग्ध पशु योनि प्राप्त करता है। जो मूर्ख घर पर आये हुए भूखे-प्यासे दुःखी ब्राह्मण को भोजन नहीं कराता है, वह तप्तकुण्ड नामक नरक में जाता है। उस ब्राह्मण के शरीर में विद्यमान रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक उस दुःखप्रद नरक में वास करके वह सात जन्मों तक पक्षी की योनि में पैदा होकर तपते हुए स्थान पर वह्निशय्या पर यातना भोगता है।"

४८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३२ वह्निकुण्डं तप्तकुण्डं क्षारकुण्डं भयानकम् ।
विट्कुण्डं मूत्रकुण्डं च श्लेष्मकुण्डं च दुःसहम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 32 · श्लोक 8पृष्ठ 491

जो मनुष्य रविवार, सूर्यसङ्क्रान्ति, अमावास्या और छठे श्राद्ध के अवसर पर क्षार पदार्थों से अपने वस्त्र धोता है, वह क्षारकुण्ड नामक नरक में जाता है। वहाँ उसे उन वस्त्रों के सूतों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक निवास करना पड़ता है। इसके पश्चात उसे भारतवर्ष में सात जन्मों तक रजक योनि में जन्म लेना पड़ता है। जो मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओं की निन्दा करता है अथवा गौरी और सरस्वती जैसी देवियों का उपहास करता है, वह उस भयानक नरककुण्ड में जाता है जिससे बढ़कर दुःखदायी दूसरा कोई कुण्ड नहीं है। वहाँ अनेक कल्पों तक वास करने के बाद उसे सर्पयोनि प्राप्त होती है; क्योंकि भगवती की निन्दा के अपराध का तो कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है।

जो मनुष्य अपने या दूसरे के द्वारा दी गई देवता अथवा ब्राह्मण की वृत्ति को छीन लेता है, वह साठ हजार वर्षों के लिए विट्कुण्ड नामक नरक में जाता है और उतने ही वर्षों तक वहाँ विष्ठा भक्षण करते हुए रहता है। इसके उपरान्त उसे पुनः पृथ्वी पर साठ हजार वर्षों तक विष्ठा का कृमि बनना पड़ता है। जो मनुष्य अपने उत्सर्ग अथवा लोकार्पण के दोष के कारण मूत्रकुण्ड नामक नरक में जाता है, वहाँ वह उस तड़ाग के रज-कणों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक मूत्र आदि का भक्षण करता रहता है और पुनः भारतवर्ष में पूरे सौ वर्षों तक वृष की योनि में निवास करता है। जो अकेले ही मिष्टान्न आदिका का भक्षण करता है, वह श्लेष्मकुण्ड नामक नरक में जाता है और उसी श्लेष्मा को खाते हुए पूरे सौ वर्षों तक वहाँ रहता है; तत्पश्चात उसे भारतवर्ष में पूरे सौ वर्षों तक प्रेतयोनि में पड़ा रहकर श्लेष्मा, मूत्र तथा पीव का भक्षण करना पड़ता है, उसके बाद ही उसकी शुद्धि होती है।

जो मनुष्य माता, पिता, गुरु, पत्नी, पुत्र, पुत्री और अनाथ का भरण-पोषण नहीं करता, वह गरकुण्ड यानी विषकुण्ड नामक नरक में जाता है और वहाँ सौ वर्षों तक उसी विष को पीते हुए पड़ा रहता है; तदनन्तर उसे सौ वर्षों तक भूतयोनि में रहना पड़ता है, उसके बाद ही वह शुद्ध होता है। पापी के जल को देवता तथा पितर ग्रहण नहीं करते और ब्रह्महत्या आदि जो भी पाप हैं, उनका फल उसे इसी लोक में भोगना पड़ता है। अन्ततः वह दूषिकाकुण्ड नामक नरक में जाकर सौ वर्षों तक दूषित पदार्थों को खाता है और फिर सौ वर्षों तक भूतयोनि में रहने के बाद उसकी शुद्धि होती है। जो व्यक्ति अपने द्रव्य का लोकार्पण करके उसे किसी अन्य को दे देता है, वह वसाकुण्ड में जाता है और वहाँ सौ वर्षों तक वसा खाते हुए रहता है; उसके बाद उसे भारतवर्ष में सात जन्मों तक गिरगिट होना पड़ता है और फिर वह महान क्रोधी, दरिद्र तथा अल्पायु प्राणी के रूप में जन्म लेता है।

यदि कोई स्त्री परपुरुष से सम्बन्ध रखती है अथवा कोई पुरुष परनारी में वीर्याधान करता है, तो वह शुक्रकुण्ड नामक नरक में जाता है जहाँ सौ वर्षों तक उसी वीर्य को खाते हुए रहना पड़ता है; उसके बाद उसे सौ वर्षों तक कीटयोनि में रहकर शुद्ध होना पड़ता है। जो व्यक्ति गुरु या ब्राह्मण को मारकर उनके शरीर से रक्त बहाता है, वह असृक्कुण्ड नामक नरक में जाता है और वहाँ सौ वर्षों तक रक्त का पान करते हुए रहता है; तदनन्तर उसे सात जन्मों तक व्याघ्र की योनि प्राप्त होती है और फिर वह मानवयोनि में जन्म लेता है। जो भक्त को देखकर खेदपूर्वक आँसू बहाता है या उनके गुण-सङ्गीत के अवसर पर उपहास करता है, वह सौ वर्षों तक अश्रुकुण्ड में वास करता है जहाँ उसे आँसुओं को ही भोजन के रूप में ग्रहण करना पड़ता है; उसके बाद उसे तीन जन्मों तक चाण्डाल की योनि में रहकर शुद्ध होना पड़ता है। \जो मनुष्य सहृदय व्यक्ति के साथ सदा शठता का व्यवहार करता है, वह गात्रमलकुण्ड नामक नरक में सौ वर्षों तक रहता है और फिर तीन जन्मों तक गर्दभ तथा तीन जन्मों तक श्रृङ्गाल योनि में रहकर शुद्ध होता है। जो अभिमानपूर्वक किसी की निन्दा करता है, वह कर्णविट्कुण्ड में सौ वर्षों तक कान की मैल खाते हुए रहता है; उसके बाद उसे सात जन्मों तक दरिद्र और बहरा होना पड़ता है, फिर सात जन्मों तक अङ्गहीन रहकर उसकी शुद्धि होती है। जो मनुष्य लोभवश जीवों की हत्या करता है, वह मज्जाकुण्ड में लाख वर्षों तक केवल मज्जा का भक्षण करता है; इसके बाद उसे सात जन्मों तक खरगोश और मछली, तीन जन्मों तक सूअर और सात जन्मों तक कुक्कुट होकर जीव-जन्तुओं के बीच रहकर अपनी क्षुधा शान्त करनी पड़ती है। उसके पश्चात वह साठ हजार वर्षों तक भारतवर्ष में कन्या की विष्ठा का कीड़ा बनकर रहता है; फिर सात जन्मों तक व्याध, तीन जन्मों तक सूअर, सात जन्मों तक कुक्कुट, सात जन्मों तक मेढक और जोंक बनकर रहने के बाद वह शुद्ध होता है।

जो मनुष्य व्रतों, उपवासों और श्राद्धों के अवसर पर क्षौरकर्म करता है, वह अपवित्र होकर नख आदि कुण्डों में उन दिनों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक दुष्पदार्थ भक्षण कर और डण्डों से पिटकर रहता है। जो शिवलिङ्ग की पूजा नहीं करता, वह उस मृदा के रज-कणों की सङ्ख्या के बराबर केशकुण्ड नामक नरक में निवास करता है; तदनन्तर भगवान शिव के कोप के कारण उसे यवन योनि और फिर राक्षस योनि प्राप्त होती है, सौ वर्ष पश्चात उसकी शुद्धि होती है। जो मनुष्य विष्णुपद तीर्थ यानी गया तीर्थ में पितरों को पिण्ड नहीं देता, वह अपने शरीर के रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक अस्थिकुण्ड नामक भयानक कुण्ड में रहता है; तत्पश्चात उसे सात जन्मों तक लँगड़ा और दरिद्र बनकर रहना पड़ता है, उसके बाद ही देहशुद्धि होती है। जो महामूर्ख मनुष्य अपनी गर्भवती स्त्री के साथ सहवास करता है, वह सौ वर्षों तक अत्यन्त तपते हुए ताम्रकुण्ड में रहता है जहाँ वह प्रतप्ते तैलकुण्डेऽग्नौ तिष्ठति स्म चतुर्युगम्—अर्थात् चार युगों तक तपते हुए तेल के कुण्ड में अग्नि के बीच रहता है। गवां लोमप्रमाणाब्दं वृषो भवति तत्परम्—वह गाय के शरीर के रोमों के बराबर वर्षों तक बैल बनता है; कुन्तेन हन्ति यो जीवं वह्निलोहेन हेलया—जो जीव की हत्या करता है, उसे सात जन्मों तक रजक और कौए की योनि मिलती है जहाँ वह दरिद्र और विशाल घावों से युक्त रहता है, उसके बाद ही वह शुद्ध होता है।

जो व्यक्ति चर्म से स्पर्शित हाथों द्वारा देवद्रव्य का स्पर्श करता है, वह सौ वर्षों तक चर्मकुण्ड में रहता है। जो ब्राह्मण किसी शूद्र की स्वीकृति पाकर उसका अन्न खाता है, वह तप्तसुराकुण्ड में सौ वर्षों तक रहता है; उसके बाद उसे सात जन्मों तक शूद्र-याजी बनना पड़ता है और शूद्रों का श्राद्ध-अन्न ग्रहण करना पड़ता है, तब वह शुद्ध होता है। जो अपने स्वामी को सदा पीड़ित करता है, वह तीक्ष्णकण्टककुण्ड में जाता है जहाँ उसे केवल कण्टक ही खाने को मिलते हैं और यमदूत उसे डण्डों से चार गुना पीटते हैं; उसके बाद सात जन्मों तक अश्व की योनि प्राप्त कर वह शुद्ध होता है। जो दयाहीन मनुष्य विष से प्राणी की हत्या करता है, वह हजार वर्षों तक विषकुण्ड में रहकर उसी विष का भक्षण करता है; तत्पश्चात उसे सात जन्मों तक बड़े-बड़े घावों और सात जन्मों तक कोढ़ से ग्रस्त होकर रहना पड़ता है, फिर वह शुद्ध होता है।

जो व्यक्ति पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में गाय और बैल को डण्डे से मारता है या मरवाता है, उसे चार युगों तक तपते हुए तैलकुण्ड में रहना पड़ता है; उसके बाद उसे गाय के शरीर के रोमों के बराबर वर्षों तक बैल होना पड़ता है। जो विधि द्वारा प्रदत्त जीव और क्षुद्र जन्तुओं की हत्या करता है, वह नरक में वास करता है और फिर उत्तम मानव योनि प्राप्त कर उदररोग से पीड़ित रहता है। जो अधम द्विज भगवत्प्रसाद का त्याग कर मांस भक्षण करता है, वह कृमिकुण्ड में जाता है जहाँ अपने शरीर के रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक रोम भक्षण करता है; उसके बाद तीन जन्मों तक म्लेच्छ जाति में रहकर पुनः द्विज बनता है। जो पूर्यकुण्ड में यमदूतों द्वारा पीटा जाता है और पीव का भोजन करता है, वह सात जन्मों तक शूद्र रहता है—अत्यन्त रोगी, दरिद्र, बहरा और गूँगा होकर; तत्पश्चात उसे सर्प की विष्ठा खानी पड़ती है और फिर मनुष्य योनि प्राप्त करने पर वह दाद आदि रोगों से युक्त और अल्पायु होता है, जिसके बाद सर्प के काटने से उसकी मृत्यु होती है।

अ ० ३३ ] नवम ब्राह्मणः शस्त्रधारी यो ह्यन्येषां धावको भवेत् ।
सन्ध्याहीनश्च यो विप्रो हरिभक्तिविहीनकः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 34 · श्लोक 81पृष्ठ 500

जो मनुष्य चीखता-चिल्लाता है, उसे यमदूत सदा पीटते रहते हैं जिससे वह हाहाकार करता है; उसके बाद उसे सात जन्मों तक सूअर और तीन जन्मों तक कौवे की योनि में रहकर शुद्ध होना पड़ता है। जो वृश्चिककुण्ड में जाता है, वहाँ बिच्छुओं के शरीर के रोमों के बराबर वर्षों तक वास करने के बाद उसे सात जन्मों तक बिच्छू की योनि मिलती है; फिर मनुष्य योनि प्राप्त कर वह अङ्गहीन और रोगी होकर शुद्ध होता है। जो विप्र सन्ध्या-वन्दन नहीं करता और श्रीहरि की भक्ति से विमुख है, वह शर आदि कुण्डों में अपने शरीर के रोमों के बराबर वर्षों तक निरन्तर शर (बाण) से बेधा जाता है, उसके बाद ही शुद्ध होता है। जो मनुष्य सरोवर से निकले नक्र (मगरमच्छ) आदि जल-जन्तुओं की हत्या करता है, वह नक्रकुण्ड में जाता है जहाँ नक्र के शरीर के काँटों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक निवास करता है; तत्पश्चात उसे नक्र योनि प्राप्त होती है और दण्ड पाकर शीघ्र शुद्ध होता है। जो मनुष्य कामवासना के वशीभूत होकर पराई स्त्री का वक्ष, नित्तम्ब, स्तन तथा मुख देखता है, वह अपने शरीर के रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक काककुण्ड में रहता है जहाँ कौवे उसकी आँखें नोचते रहते हैं; तत्पश्चात उसे तीन जन्मों तक सन्तप्त रहना पड़ता है।" }

स तिष्ठति स्वलोमाब्दं कुण्डेषु च शरादिषु ।
विद्धः शरादिभिः शश्वत्ततः शुद्धो भवेन्नरः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 34 · श्लोक 82पृष्ठ 500

जो मनुष्य भारतवर्ष में जन्म पाकर ताँबे तथा लोहे की चोरी करता है, वह बीजकुण्ड नामक नरक में जाता है और अपने शरीर के रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक वहाँ निवास करता है। वहाँ कीड़ों की विष्ठा खाता हुआ, कीड़ों से ढकी आँखों वाला वह प्राणी यमदूतों द्वारा पीटा जाता है; तत्पश्चात कालक्रम से वह शुद्ध होता है।

जो व्यक्ति भारतवर्ष में जन्म पाकर देवताओं की मूर्ति तथा देव-सम्बन्धी द्रव्यों की चोरी करता है, वह अपने शरीर में विद्यमान रोमों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक दुस्तर वज्रकुण्ड नामक नरक में निश्चित रूप से निवास करता है। उसे वहाँ भूखा रहना पड़ता है; उन वज्रों द्वारा यमदूतों से पीटे जाने पर उसका शरीर दग्ध हो जाता है और वह रोने-चिल्लाने लगता है, तत्पश्चात उस मनुष्य की शुद्धि होती है।

जो मनुष्य कांसे के बर्तनों का हरण करता है, वह अपने शरीर के लोमसङ्ख्यक वर्षों तक तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड नामक नरक में वास करता है। फिर वह सात जन्मों तक भारतवर्ष में घोड़े की योनि में उत्पन्न होता है; उसके बाद वह अधिक अङ्गों वाला तथा पैर के रोग से ग्रस्त होता है, तत्पश्चात वह शुद्ध हो जाता है।

जो व्यक्ति सामान्य द्रव्यों की चोरी करता है, वह नक्रमुख नामक नरक में जाता है। वहाँ पर वह यमदूतों द्वारा पीटा जाता हुआ तीन वर्षों तक निवास करता है; तदनन्तर वह सात जन्मों तक रोग से पीड़ित रहने वाला बैल होता है। उसके बाद वह मानव योनि में जन्म लेकर महान रोगों से ग्रस्त रहता है और फिर शुद्ध हो जाता है।

जो मनुष्य महापापी है, वह गजदंश नामक नरक में जाता है और तीन युगों तक वहाँ वास करता है; यमदूत उसे हाथी-दाँत से निरन्तर पीटते रहते हैं। तत्पश्चात वह तीन जन्मों तक हाथी, तीन जन्मों तक घोड़े, तीन जन्मों तक गाय और तीन जन्मों तक म्लेच्छ की योनि में पैदा होता है, तदनन्तर वह मनुष्य रूप में शुद्ध हो जाता है।

जो व्यक्ति जल से युक्त गोमुख नामक नरक में जाता है, वहाँ वह एक मन्वन्तर तक सन्तप्त रहता है; तदनन्तर वह सात जन्मों तक अन्त्य जाति में उत्पन्न होकर गोहीन, महान रोगी तथा दरिद्र मनुष्य के रूप में रहता है, उसके बाद वह व्यक्ति शुद्ध हो जाता है।

जो ब्राह्मण कछुए का निषिद्ध मांस खाता है, वह सौ वर्षों तक कूर्मकुण्ड नामक नरक में निवास करता है। वहाँ पर उसे कछुए सदा नोंच-नोंचकर खाते रहते हैं; तत्पश्चात् वह तीन जन्मों तक कछुए, तीन जन्मों तक सूअर, तीन जन्मों तक बिल्ली और तीन जन्मों तक मोर की योनि में जन्म लेता है, उसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

जो व्यक्ति किसी देवता या ब्राह्मण का घृत तथा तेल चुराता है, वह पापी ज्वालाकुण्ड और भस्मकुण्ड नामक नरक में जाता है। वहाँ पर वह सौ वर्षों तक वास करते हुए तेल में पकाया जाता है; इसके बाद वह सात जन्मों तक मछली और सात जन्मों तक चूहा होता है, तत्पश्चात उसकी शुद्धि हो जाती है।

जो मनुष्य वेदों में प्रतिपादित रीति से पितृपूजन अथवा देवार्चन का त्याग कर देता है और निषिद्ध विधि से कर्म सम्पन्न करता है, उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है। जो व्यक्ति अपने गुरु, अपने इष्टदेव तथा जन्म देने वाली माता में भेद मानता है, वह ब्रह्महत्या पाप का भागी होता है। जो मनुष्य ब्राह्मण के चरणोदक तथा शालग्राम के जल में भेदबुद्धि करता है, वह भी ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है।

धर्मराज उवाच

३ ९ जो मनुष्य भगवती शक्तिकी उपासना करनेवालेके प्रति द्वेषभाव रखता है तथा शक्ति - शास्त्रोंकी निन्दा करता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 34 · श्लोक 40पृष्ठ 507

जो मनुष्य शिव के नैवेद्य तथा भगवान विष्णु के नैवेद्य में भेद रखता है, वह ब्रह्महत्या का भागी है। जो व्यक्ति सर्वेश्वरों के भी ईश्वर, सभी कारणों के कारण, सबके आदिस्वरूप, सभी देवताओं के आराध्य और सबकी अन्तरात्मा—एक होते हुए भी—अपनी योगमाया के प्रभाव से अनेक रूप धारण करने में सक्षम तथा निर्गुण श्रीकृष्ण में और ईशान शिवजी में भेद करता है, उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है।

धर्मराज उवाच

३४ जो भगवान् विष्णुके भक्तों तथा दूसरे देवताओंकी पूजा करनेवाले ब्राह्मणोंमें भेदबुद्धि करता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 34 · श्लोक 35पृष्ठ 507

जो मनुष्य पुण्यदायिनी कृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, शिवरात्रि, एकादशी और रविवार—इन पाँच पुण्य पर्वों के अवसर पर व्रत नहीं करते, वे चाण्डाल से भी बढ़कर पापी हैं और उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगता है। जो मनुष्य अपने गुरु, अपनी माता, पिता, साध्वी भार्या, पुत्र तथा अनिन्दनीय आचरण करने वाली पुत्री का भरण-पोषण नहीं करता, उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है।

जो मनुष्य भगवान श्रीहरि को नैवेद्य अर्पण किए बिना भोजन करता है, विष्णु का नित्य पूजन नहीं करता और पवित्र पार्थिव लिङ्ग का पूजन नहीं करता, उसे ब्रह्महत्या कहा गया है। जो व्यक्ति गाय पर प्रहार करते हुए देखता है और उसे नहीं रोकता, वह गोहत्या के पाप का भागी होता है। जो मूर्ख ब्राह्मण गायों को डण्डों से पीटता है और बैल पर सवारी करता है, उसे प्रतिदिन गोहत्या का पाप लगता है। जो व्यक्ति गायों को जूठा अन्न खिलाता है और बैल की सवारी करने वाले को भोजन कराता है या उसका अन्न खाता है, उसे निश्चित रूप से गोहत्या का पाप लगता है।

जो ब्राह्मण शूद्रापतिके यहाँ यज्ञ कराता है और उसका अन्न ग्रहण करता है, वह एक सौ गोहत्या के पाप का भागी होता है; इसमें सन्देह नहीं है। जो मनुष्य पैर से अग्निका स्पर्श करता है, गायों को पैर से मारता है और स्नान करके बिना पैर धोये देवालय में प्रवेश करता है; उसे गोहत्या का पाप लगता है। जो व्यक्ति गीले पैर भोजन करता है, गीले पैर सोता है और सूर्योदय के समय भोजन करता है; उसे अवश्य ही गोहत्या का पाप लगता है। जो द्विज पति-पुत्रहीन स्त्री का तथा योनिजीवी व्यक्तिका अन्न खाता है और जो त्रिकाल सन्ध्या से विहीन है, उसे भी गोहत्या का पाप लगता है। जो स्त्री अपने पति तथा देवता में भेदबुद्धि रखती है तथा कटु वचनों से अपने पति को पीड़ित करती है, उसे निश्चित रूप से गोहत्या का पाप लगता है। जो मनुष्य गोचर भूमि को जोतकर उसमें अनाज बोता है या तालाब अथवा दुर्ग में फसल उगाता है, उसे निश्चय ही गोहत्या का पाप लगता है। जो गाय का स्वामी अराजकता तथा दैवोपद्रव के अवसर पर गाय की रक्षा नहीं करता तथा जो गाय को पीड़ा पहुँचाता है, उस मूर्ख को निश्चय ही गोहत्या का पाप लगता है। जो मनुष्य प्राणियों, देवमूर्ति, अग्नि, जल, नैवेद्य, पुष्प तथा अन्न को लाँघता है; वह निश्चित रूप से गोहत्या के पाप का भागी होता है। 'मेरे पास कुछ नहीं है' - ऐसा जो सदा कहता है, झूठ बोलता है, दूसरों को ठगता है और देवता तथा गुरु से द्वेष करता है, उसे गोहत्या का पाप अवश्य लगता है। हे साध्वि! जो मनुष्य देवप्रतिमा, गुरु तथा ब्राह्मण को देखकर आदरपूर्वक प्रणाम नहीं करता, उसे निश्चित रूप से गोहत्या का पाप लगता है।

जो व्यक्ति पुत्रके मोहसे अथवा अज्ञानके कारण गोवध प्रायश्चित्तमें व्यतिक्रम करता है, उसे निश्चित -रूपसे गोहत्याका पाप लगता है ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 34 · श्लोक 61पृष्ठ 509

जो ब्राह्मण सुरापी है, वृषलीपति है, तप्त मुद्रा से अगग्ध देह वाला है, तप्त शूल से अङ्कित है और हरि वासर में भोजन करता है, वह कुम्भीपाक नरक में जाता है। हे साध्वि! यह मैंने आतिदेशिकी ब्रह्महत्या और गोहत्या का वर्णन कर दिया, अब मैं मनुष्यों के लिये गम्य स्त्री के विषय में तुमसे कह रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। सभी मनुष्यों को केवल अपनी भार्या के साथ गमन करना चाहिये - यह वेदों का आदेश है। उसके अतिरिक्त अन्य स्त्री अगम्य है - ऐसा वेदवेत्ताओं ने कहा है। हे सुन्दरि! यह सब सामान्य नियम कहा गया, अब कुछ विशेष नियमों को सुनो। जो स्त्रियाँ विशेष रूप से गमन करने योग्य नहीं हैं, उनके विषय में बता रहा हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो। हे पतिव्रते! शूद्रों के लिये ब्राह्मण की पत्नी और ब्राह्मणों के लिये शूद्र की पत्नी अति अगम्य तथा निन्द्य है – ऐसा लोक और वेद में प्रसिद्ध है। ब्राह्मणी के साथ समागम करने से शूद्र एक सौ गोहत्या पाप का भागी होता है और वह निश्चित रूप से कुम्भीपाक नरक प्राप्त करता है; तथा उस शूद्र के साथ ब्राह्मणी भी कुम्भीपाक नरक में जाती है। अतः शूद्रों के लिये ब्राह्मण की स्त्री तथा ब्राह्मणों के लिये शूद्र की स्त्री सर्वथा अगम्य है। यदि कोई विप्र शूद्रा नारी का सेवन करता है, तो वह वृषलीपति कहा जाता है। वह विप्र जाति से च्युत हो जाता है और वह चाण्डाल से भी बढ़कर अधम तथा तर्पण-मूत्र के समान हो जाता है। उसके द्वारा प्रदत्त पिण्ड आदि पितरों तथा देवताओं को प्राप्त नहीं होता। करोड़ों जन्मों में पूजन तथा तप करके उस ब्राह्मण के द्वारा अर्जित किया गया पुण्य शूद्रा नारी के साथ गमन करने से नष्ट हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। सुरापान करने वाला, वेश्याओं का अन्न खाने वाला, शूद्रा नारी का सेवन करने वाला, तप्त मुद्रा तथा तप्त त्रिशूल आदि से दागे गये शरीर वाला और एकादशी को अन्न ग्रहण करने वाला ब्राह्मण कुम्भीपाक नरक में जाता है; वह महापापी अत्यन्त क्लेशदायक कुम्भीपाक नरक में जाता है।

शौचोदके निमग्ना सा यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
काकी जन्मसहस्त्राणि शतजन्मानि सूकरी ॥

शृगाली शतजन्मानि शतजन्मानि कुक्कुटी ।
पारावती सप्तजन्म वानरी सप्तजन्मसु ॥

ततो भवेत्सा चाण्डाली सर्वभोग्या च भारते ।
ततो भवेच्च रजकी यक्ष्मग्रस्ता च पुंश्चली ॥

ततः कुष्ठयुता तैलकारी शुद्धा भवेत्ततः ।
निवसेद्वेधने वेश्या पुङ्गी च दण्डताडने ॥

जलरन्ध्रे वसेद्वेश्या कुलटा देहचूर्णके ।
स्वैरिणी दलने चैव धृष्टा च शोषणे तथा ॥

निवसेद्यातनायुक्ता मम दूतेन ताडिता ।
विण्मूत्रभक्षा सततं यावन्मन्वन्तरं सति ॥

ततो भवेद्विकृमिश्च लक्षवर्षं ततः शुचिः ।
ब्राह्मणो ब्राह्मणीं गच्छेत्क्षत्रियां वापि क्षत्रियः ॥

अंगार डालते रहते हैं और उसके सिरपर डंडेसे प्रहार करते रहते हैं । उसके पतिके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्षोंतक उस स्त्रीको उस नरक-कुण्डमें रहना पड़ता है । उसके बाद मानवजन्म प्राप्त करके वह सात जन्मोंतक विधवा रहती है । विधवाका जीवन व्यतीत करनेके पश्चात् वह रोग ग्रस्त हो जाती है, तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो | जाती है ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 18-203पृष्ठ 514

जो शास्त्रोक्त विधान से सन्ध्या नहीं करता अथवा सन्ध्या करता ही नहीं और जो तीनों कालों की सन्ध्या से रहित है, वह द्विज 'सन्ध्याहीन द्विज' कहा गया है। जो अहङ्कार के कारण विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य तथा गणेश इन देवों के मन्त्र की दीक्षा ग्रहण नहीं करता, उसे 'अदीक्षित' कहा गया है। गङ्गा के प्रवाह के दोनों ओर की चार हाथ की चौड़ी भूमि को गङ्गागर्भ कहते हैं; वहीं पर भगवान नारायण निवास करते हैं। उस नारायण क्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त होने वाला व्यक्ति भगवान श्रीहरि के धाम में पहुँच जाता है। वाराणसी, बदरिकाश्रम, गङ्गासागर सङ्गम, पुष्करक्षेत्र, हरिहरक्षेत्र, प्रभासक्षेत्र, कामाख्या पीठ, हरिद्वार, केदारक्षेत्र, मातृपुर, सरस्वती नदी के तट, पवित्र वृन्दावन, गोदावरी नदी, कौशिकी नदी, त्रिवेणी सङ्गम और हिमालय - इन तीर्थों में जो मनुष्य कामनापूर्वक दान लेता है; वह तीर्थप्रतिग्राही है। इस दानग्रहण के कारण वह कुम्भीपाक नरक में जाता है। यहाँ यज्ञ आदि कराता है, उसे ग्रामयाजी कहा गया है। देवता की पूजा करके अपनी आजीविका चलाने वाला ब्राह्मण देवल कहा गया है। शूद्र के यहाँ रसोई बनाकर आजीविका चलाने वाले विप्र को सूपकार कहा गया है। सन्ध्या तथा पूजनकर्म से विमुख विप्र को प्रमत्त तथा पतित कहा गया है।

हे कल्याणि! वृषलीपति के समस्त लक्षणों का वर्णन मैंने कर दिया है। ये सब महापापी हैं और ये कुम्भीपाक नामक नरक में जाते हैं। हे साध्वि! जो पापी दूसरे कुण्डों में जाते हैं, उनके विषय में तुम्हें बता रहा हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो। एक पति वाली स्त्री पतिव्रता तथा दो पति वाली स्त्री कुलटा कही गयी है। तीन पति वाली स्त्री धर्षिणी, चार पति वाली पुंश्चली, पाँच-छः पति वाली वेश्या तथा सात-आठ पति वाली स्त्री को पुङ्गी जानना चाहिये। इससे अधिक पुरुषों से सम्बन्ध रखने वाली स्त्री को महावेश्या कहा गया है; वह सभी जाति लोगों के लिये अस्पृश्य है। वहाँ दस हजार वर्षों तक रहना पड़ता है, इसमें सन्देह नहीं है। वहाँ यमदूत से पीटा जाता हुआ वह तरह-तरह की यातनाएँ भोगता है। उसके बाद कुलटागामी तीतर, धर्षिणीगामी कौवा, पुंश्चलीगामी कोयल, वेश्यागामी भेड़िया और पुङ्गीगामी सूअर की योनि में भारतवर्ष में सात जन्मों तक पैदा होते रहते हैं — ऐसा कहा गया है। महावेश्या से समागम करने वाला मनुष्य मरका वृक्ष होता है।

जो अज्ञानी मनुष्य चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के अवसर पर भोजन करता है, वह अन्न के दानों की सङ्ख्या के बराबर वर्षों तक अरुन्तुद नामक नरक कुण्ड में जाता है। तत्पश्चात् वह मनुष्य योनि में उत्पन्न होता है; उस समय वह उदररोग से पीड़ित, प्लीहारोग से ग्रस्त, काना तथा दन्तविहीन हो जाता है; उसके बाद उसकी शुद्धि हो जाती है। जो अपनी कन्या का वाग्दान करके उसे किसी अन्य पुरुष को प्रदान कर देता है, वह पांसुकुण्ड नामक नरक में सौ वर्षों तक वास करता है और उसी धूल राशि का भोजन करता है। हे साध्वि! जो मनुष्य अपनी कन्या के धन का हरण करता है, वह पांशुवेष्ट नामक नरक कुण्ड में सौ वर्षों तक वास करता है; वहाँ वह बाणों की शय्या पर लेटा रहता है और मेरे दूत उसे पीटते रहते हैं।

अ ० ३५ ] नवम कटूक्तिं तं प्रवदति सोल्मुकं सम्प्रयाति हि ।
उल्कां ददाति तद्वक्त्रे सततं मम किङ्करः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 19पृष्ठ 514

जो विप्र भक्तिपूर्वक पार्थिव शिवलिङ्ग की पूजा नहीं करता, वह त्रिशूल धारण करने वाले भगवान शिव के प्रति अपराधजन्य पाप के कारण शूलप्रोत नामक अत्यन्त भयानक नरक कुण्ड में जाता है। वहाँ सौ वर्ष तक रहने के पश्चात् वह सात जन्मों तक वन्य पशु होता है; उसके बाद सात जन्मों तक देवल होता है, फिर उसकी शुद्धि हो जाती है। जो किसी विप्र को कुण्ठित कर देता है और उसके भय से वह काँपने लगता है, वह उस द्विज के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक प्रकम्पन कुण्ड में निवास करता है।

दण्डेन ताडयेन्मूर्ध्नि तल्लोमाब्दप्रमाणकम् ।
ततो भवेन्मानवी च विधवा सप्तजन्मसु ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 20पृष्ठ 514

कोपाविष्ट मुख वाली जो स्त्री अपने पति को क्रोध भरी दृष्टि से देखती है और कटु वाणी में उससे बात करती है, वह उल्मुक नामक नरक कुण्ड में जाती है; मेरे दूत उसके मुख पर निरन्तर अङ्गार डालते रहते हैं और उसके सिर पर डण्डे से प्रहार करते रहते हैं। उसके पति के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक उस स्त्री को उस नरक-कुण्ड में रहना पड़ता है। उसके बाद मानव जन्म प्राप्त करके वह सात जन्मों तक विधवा रहती है; विधवा का जीवन व्यतीत करने के पश्चात् वह रोग ग्रस्त हो जाती है, तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो जाती है। सौ जन्म तक कुक्कुटी, सात जन्म तक कबूतरी और सात जन्म तक वानरी होती है। उसके बाद वह भारतवर्ष में सर्वभोग्या चाण्डाली होती है, उसके बाद वह व्यभिचारिणी धोबिन होती है और सदा यक्ष्मारोग से ग्रस्त रहती है। तत्पश्चात् वह कोढ़रोग से युक्त तैलकारी होती है और उसके बाद शुद्ध हो जाती है; वह स्वैरिणी दलनकुण्ड में और धृष्टा शोषणकुण्ड में वास करती है। हे साध्वि! मेरे दूत से पीटी जाती हुई वह वहाँ यातनाएँ भोगती रहती है। उसे एक मन्वन्तर तक निरन्तर विष्ठा और मूत्र का भक्षण करना पड़ता है। उसके बाद वह एक लाख वर्ष तक विष्ठा के कीट रूप में रहती है और फिर उसकी शुद्धि हो जाती है।

सा भुक्त्वा चैव वैधव्यं व्याधियुक्ता ततः शुचिः ।
या ब्राह्मणी शूद्रभोग्या चान्धकूपे प्रयाति सा ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 21पृष्ठ 514

जो पुरुष दूसरी वर्ण की पराय स्त्रियों के साथ भोग करने वाले हैं, वे कषाय नामक नरक में जाते हैं; वहाँ वे कषाय तथा गर्म जल पीते हुए सौ वर्ष तक पड़े रहते हैं। उसके बाद वे ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि पुरुष शुद्ध होते हैं। उसी प्रकार यातनाएँ भोगकर वे ब्राह्मणी आदि स्त्रियाँ भी शुद्ध होती हैं - ऐसा पितामह ने कहा है। जो अपनी प्रतिज्ञा का पालन नहीं करता, वह ज्वालामुख नामक नरक में जाता है। उसी तरह जो मनुष्य अपने मित्र के साथ द्रोह करता है, कृतघ्न है, विश्वासघात करता है और झूठी गवाही देता है, वह भी ज्वालामुख नरक में जाता है; वे लोग उस नरक में चौदह इन्द्रों की स्थिति पर्यन्त निवास करते हैं। मेरे दूत उन्हें अङ्गारों से दागते हैं और बहुत पीटते हैं। जो मित्र के साथ द्रोह करता है, वह नेवला होता है; जो दूसरों का उपकार नहीं मानता, वह गैंडा होता है; जो विश्वासघाती होता है, वह सात जन्म तक बाघ होता है और जो झूठी गवाही देता है, वह सात जन्म तक मेढक होता है; वह अपनी सात पीढ़ी पहले तथा सात पीढ़ी बाद के पुरुषों का अध: पतन करा देता है। जो कपटपूर्वक उनका सदा उपहास करता है, जो व्रत तथा उपवास नहीं करता और दूसरों के उत्तम विचारों की निन्दा करता है, वह धूम्रान्ध नामक नरक में धूम्र का ही भक्षण करते हुए एक सौ वर्ष तक निवास करता है; उसके बाद वह क्रम से सौ जन्मों तक अनेक प्रकार का जलजन्तु होता है।

...दूसरों के उत्तम विचारों की निन्दा करता है, वह धूम्रान्ध नामक नरक में धूम्र का ही भक्षण करते हुए एक सौ वर्ष तक निवास करता है; उसके बाद वह क्रम से सौ जन्मों तक अनेक प्रकार का जलजन्तु होता है। इसके आगेसे लिखो, इसे दोहराओ मत।

अ ० ३६ ] नवम सर्वेषु सारभूतं यत्सर्वेष्टं सर्वसम्मतम् ।
कर्मच्छेदबीजरूपं प्रशस्तं सुखदं नृणाम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 2पृष्ठ 518

...नागवेष्टन नामक नरक में जाता है और नागों से आबद्ध होकर अपने शरीर के रोम प्रमाण वर्षों तक वहाँ निवास करता है; तत्पश्चात् उसे नानाविध पक्षी-योनियाँ मिलती हैं और उसके बाद वह मनुष्य होता है; तत्पश्चात् वह सात जन्म तक गणक और सात जन्म तक वैद्य होता है। पुनः गोप, कर्मकार और रङ्गकार होकर शुद्ध होता है।

सर्वप्रदं च सर्वेषां सर्वमङ्गलकारणम् ।
भयं दुःखं न पश्यन्ति येन वै सर्वमानवाः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 3पृष्ठ 518

हे पतिव्रते! मैंने प्रसिद्ध नरककुण्डों का वर्णन कर दिया। इनके अतिरिक्त और भी छोटे-छोटे कुण्ड हैं, जो प्रसिद्ध नहीं हैं, अपने कर्मों का फल भोगने के लिये पापी लोग वहाँ जाते हैं और विविध योनियों में भ्रमण करते रहते हैं; अब तुम और क्या सुनना चाहती हो?

कुण्डानि ते न पश्यन्ति तेषु नैव पतन्ति च ।
न भवेद्येन जन्मादि तत्कर्म वद साम्प्रतम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 4पृष्ठ 518

धर्मराज द्वारा सावित्री से देवोपासना से प्राप्त होने वाले पुण्य फलों को कहना।

सावित्री बोली— "हे वेद-वेदाङ्गों में पारङ्गत धर्मराज महाभाग! नानाविध पुराणों तथा इतिहासों में जो सारस्वरूप है, जो सर्वेष्ट है, सर्व-समुत्तम् है, कर्म-च्छेद के बीजरूप है, मनुष्यों को सुख देने वाला है और जिसके प्रभाव से मनुष्य भय तथा दुःख का अनुभव नहीं करते, उन्हें नरककुण्डों में नहीं गिरना पड़ता; वह सारभूत क्या है? अपने देह के भस्मसात् हो जाने पर मनुष्य किस देह से परलोक में जाता है और अपने द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्मों के फल कैसे भोगता है? दीर्घकाल तक महान क्लेश का भोग करने पर भी उस देह का नाश क्यों नहीं होता और वह देह किस प्रकार की होती है? हे ब्रह्मन्! यह मुझे बताने की कृपा कीजिये।"

सुचिरं क्लेशभोगेन कथं देहो न नश्यति ।
देहो वा किंविधो ब्रह्मंस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 7पृष्ठ 518

श्री नारायण बोले— [हे नारद!] सावित्री की बात सुनकर धर्मराज ने भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए कर्म-बन्धन को काटने वाली कथा कहनी आरम्भ की।

धर्मराज बोले— "हे वत्से! हे सुव्रते! चारों वेदों, धर्मशास्त्रों, संहिताओं, पुराणों, इतिहासों, पाञ्चरात्र आदि धर्मग्रन्थों तथा अन्य धर्मशास्त्रों और वेदाङ्गों में पाँच देवताओं की उपासना को सर्वेष्ट तथा सारभूत बताया गया है। वह परम आनन्द का कारण है; सम्पूर्ण सिद्धियों को प्रदान करने वाली; नरकरूपी समुद्र से उद्धार करने वाली; भक्तिरूपी वृक्ष को अङ्कुरित करने वाली; कर्म-बन्धनरूपी वृक्ष को काटने वाली; मोक्ष के लिये सोपानस्वरूप; शाश्वत पदस्वरूप; सालोक्य, साष्टि, सारूप्य तथा सामीप्य आदि मुक्तियों को प्रदान करने वाली तथा मङ्गलकारी बताई गयी है। पञ्चदेवों की आराधना करने वाले मनुष्यों को स्वप्न में भी इन कुण्डों का दर्शन नहीं होता जो भगवती की भक्ति से रहित हैं। जो भगवान के तीर्थों में जाते हैं, एकादशी का व्रत करते हैं, भगवान श्रीहरि को नित्य प्रणाम करते हैं और उनकी प्रतिमा की पूजा करते हैं, उन्हें भी मेरी भयङ्कर संयमिनी पुरी में नहीं जाना पड़ता। अपने धार्मिक आचार-विचार से सम्पन्न तथा अपने धर्म में संलग्न रहने वालों को मृत्युलोक गये हुए मेरे दूत दिखाई नहीं पड़ते। मेरे दूत शिव के उपासकों से उसी तरह भयभीत होते हैं जैसे गरुड़ से सर्प; हाथ में पाश लिये हुए अपने दूतों को शिवोपासक की ओर जाते देखकर मैं उन्हें रोक देता हूँ।

धर्मराज उवाच

अन्येषु धर्मशास्त्रेषु वेदाङ्गेषु च सुव्रते ।
सर्वेष्टं सारभूतं च पञ्चदेवानुसेवनम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 10पृष्ठ 518

मेरे दूत भगवान श्रीहरि के भक्तों के आश्रम को छोड़कर सभी जगह जा सकते हैं। श्रीकृष्ण के मन्त्रों की उपासना करने वालों से मेरे दूत गरुड़ से सर्प की भाँति डरते हैं। देवी के मन्त्रोपासकों के नाम चित्रगुप्त भयभीत होकर अपनी नखरूपी लेखनी से काट देते हैं और मधुपर्क आदि से बार-बार उनका सत्कार करते हैं। हे सति! वे भक्त ब्रह्मलोक पार करके भगवती के लोक—मणिद्वीप को चले जाते हैं। वहाँ पड़े सूखे पत्तों की भाँति उनके पाप जल जाते हैं। उन भक्तों को देखकर मोह भी भयभीत होकर मोहित हो जाता है; हे साध्वि! काम निर्मूल हो जाता है, लोभ तथा क्रोध नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु विलीन हो जाती है; इसी प्रकार रोग, जरा, शोक, भय, काल, शुभाशुभ कर्म, हर्ष तथा भोग—ये सब प्रभावहीन हो जाते हैं।

उस शरीर में जो जीव आबद्ध रहता है, वह उस समय अँगूठे के आकार वाले पुरुष के रूप में हो जाता है। अपने कर्मों का फल भोगने के लिये वह जीव सूक्ष्म रूप से उस देह को धारण करता है। मेरी पुरी में प्रज्वलित अग्नि में डाले जाने पर भी वह देह भस्म नहीं होती; अत्यन्त तप्त प्रतिमा से सटाने पर और पूर्वकथित नरककुण्डों में गिराने पर भी वह नाशवान शरीर न तो दग्ध होता है और न भग्न ही होता है; अपितु कष्ट ही भोगता रहता है। हे साध्वि! आगमशास्त्र के अनुसार देह-वृत्तान्त और कारण आदि मैंने बता दिये, अब तुम्हारी जानकारी के लिये नरककुण्डों का लक्षण बताता हूँ।"

धर्मराज बोले— "हे साध्वि! वे सभी नरककुण्ड पूर्णेन्दु-मण्डलाकार हैं; प्रत्येक कुण्ड चन्द्रमा की भाँति गोलाकार तथा बहुत गहरा है। वे अनेक प्रकार के पत्थरों से बनाये गये हैं। वे नाशवान नहीं हैं और प्रलयकाल तक बने रहते हैं। भगवान की इच्छा से उनकी रचना की गयी है; वे पापियों को क्लेश देने वाले हैं और अनेक रूपों वाले हैं।

चारों ओर से एक कोस के विस्तार वाले, सौ हाथ ऊपर तक उठती हुई लपटेदार ज्वालाओं और प्रज्वलित अङ्गार रूप वाले कुण्ड को 'अग्निकुण्ड' कहा गया है। वह भयानक चीत्कार करने वाले पापियों से भरा रहता है। उन पापियों को पीटने वाले मेरे दूत निरन्तर उस कुण्ड की रक्षा में तत्पर रहते हैं। तप्त जल तथा हिंसक जन्तुओं से भरा हुआ, अत्यन्त भयङ्कर और आधा कोस के विस्तार वाला कुण्ड 'तप्तकुण्ड' कहा गया है; जो मेरे सेवकों और दूतों द्वारा पीटे जाते हुए पापियों से युक्त रहता है। उनके दृढ़ प्रहारों से वे नारकी जीव उसमें चिल्लाते रहते हैं।

वह भयानक कुण्ड खौलते हुए खारे जल से परिपूर्ण तथा कौवों से भरा पड़ा रहता है। मेरे दूतों द्वारा पीटे जाने पर 'मेरी रक्षा करो'—ऐसे शब्दों का जोर-जोर से उच्चारण करते हुए पापियों से वह नरककुण्ड परिपूर्ण रहता है। आहार न मिलने के कारण सूखे कण्ठ, ओष्ठ तथा तालु वाले पापी उस कुण्ड में इधर-उधर भागते फिरते हैं। एक कोस के विस्तार वाला 'विट्कुण्ड' है; वह दारुण नरक की विष्ठा से सदा पूर्ण रहता है और उसमें अत्यन्त दुर्गन्ध फैली रहती है। मेरे महानिर्दयी दूतों द्वारा पीटे जाते हुए, 'मेरी रक्षा करो'—ऐसे शब्द करके चिल्लाने वाले तथा विष्ठा का आहार करने वाले पापियों से वह नरककुण्ड सदा भरा रहता है; वहाँ के कीड़े उन पापियों को सदा काटते रहते हैं।

'मूत्रकुण्ड' नामक नरक खौलते हुए मूत्र से भरा रहता है। उसमें मूत्र के कीड़े सर्वत्र व्याप्त होते हैं। दो कोस के विस्तार वाले और अन्धकारमय उस नरककुण्ड में मूत्र के कीड़ों द्वारा निरन्तर काटे जाते हुए तथा मेरे भयानक दूतों द्वारा लगातार पीटे जाने के कारण, सूखे कण्ठ, ओष्ठ तथा तालु वाले महापापी चिल्लाते हुए भरे पड़े रहते हैं। 'श्लेष्माकुण्ड' नामक नरक श्लेष्मा आदि अपवित्र वस्तुओं तथा उनके कीड़ों से सदा व्याप्त रहता है। वह नरककुण्ड श्लेष्मा का ही निरन्तर भोजन करने वाले पापीजनों से भरा पड़ा रहता है।

आधे कोस के विस्तार वाला 'दूषिकाकुण्ड' है, जो आँखों के मल तथा कीटों से सदा भरा रहता है; वहाँ के कीड़ों के काटने पर व्याकुल होकर इधर-उधर घूमते हुए पापियों से वह व्याप्त रहता है। चार कोस के विस्तार वाला 'वसाकुण्ड' है, जो अत्यन्त दुःसह है। वह नरककुण्ड मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए वसाभक्षी पापियों से पूर्णतः भरा रहता है। एक कोस के विस्तार वाला 'शुक्रकुण्ड' है, जो शुक्र के कीड़ों से व्याप्त रहता है; वहाँ के कीड़ों द्वारा काटे जाते हुए और इधर-उधर भागते हुए पापियों से वह कुण्ड सदा भरा रहता है।

वापी के समान परिमाण वाला, दुर्गन्धित रक्त से परिपूर्ण तथा अत्यन्त गहरा 'रक्तकुण्ड' नामक नरक है; उसमें रक्त का पान करने वाले पापी तथा उन्हें काटने वाले कीड़े भरे रहते हैं। 'अश्रुकुण्ड' नामक नरक चार बावलियों के समान विस्तार वाला है; वह अत्यन्त तप्त तथा नेत्र के आँसुओं से परिपूर्ण रहता है और वहाँ के कीड़ों के काटने पर रोते हुए बहुत-से पापियों से भरा पड़ा रहता है।

मनुष्य के शरीर के मलों से तथा मल का भक्षण करने वाले पापियों से युक्त 'गात्रकुण्ड' नामक नरक है; मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए तथा वहाँ के कीटों द्वारा काटे जाते हुए व्याकुल पापियों से वह व्याप्त रहता है। चार बावलियों के समान विस्तार वाला 'कर्णविट्-कुण्ड' है; वह कानों की मैल से सदा भरा रहता है और उसी मैल को खाने वाले तथा कीड़ों के काटने पर चिल्लाते हुए पापियों से वह भरा रहता है।

मनुष्यों की मज्जा से भरा हुआ और अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त 'मज्जाकुण्ड' है; चार बावलियों के विस्तार वाला वह नरककुण्ड महापापियों से व्याप्त रहता है। एक वापी के समान परिमाण वाला अत्यन्त भयानक 'मांसकुण्ड' है; वह कुण्ड गीले मांसों तथा मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए पापियों से भरा रहता है। कन्या का विक्रय करने वाले वे पापी वहाँ रहकर उसी मांस का भक्षण करते हैं और भयानक कीड़ों के काटने पर भयभीत होकर 'बचाओ-बचाओ' चिल्लाते रहते हैं।

चार बावलियों के विस्तार वाले 'नखादि चार कुण्ड' हैं; मेरे दूतों द्वारा निरन्तर पीटे जाते हुए पापियों से वे कुण्ड भरे पड़े रहते हैं। जलते हुए ताँबे के सदृश 'ताम्रकुण्ड' है, जो लाखों अतितप्त प्रतिमाओं से परिपूर्ण रहता है; दो कोस के विस्तार वाला वह कुण्ड मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए और प्रत्येक प्रतिमा से सटाने पर रोते हुए पापियों से व्याप्त रहता है।

लोहे की प्रतिमाओं से चिपके हुए और रोते हुए पापियों से भरा, भयानक और दो कोस के विस्तार वाला 'लोहकुण्ड' है; वहाँ निरन्तर दग्ध होते हुए और प्रत्येक प्रतिमा से श्लिष्ट होने तथा मेरे दूतों द्वारा पीटे जाने पर 'रक्षा करो-रक्षा करो' चिल्लाने वाले महापापियों से वह अन्धकारमय कुण्ड भरा रहता है। 'चर्मकुण्ड' और 'तप्तसुराकुण्ड' आधी बावली के प्रमाण वाले हैं; चर्म खाते हुए, सुरापान करते हुए और मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए पापियों से वे व्याप्त रहते हैं।

अत्यन्त तीखे काँटे बिछे रहते हैं; एक-एक करके सभी पापियों के अङ्ग काँटों से छिद उठते हैं। सूखे तालु वाले वे पापी 'मुझे जल दो'—ऐसा कहते रहते हैं। जिस प्रकार प्रतप्त तेल में पड़ने पर जीव छटपटा उठता है, वैसे ही मेरे दूतों के डण्डों के प्रहार से भग्न सिर वाले वे महापापी अत्यधिक व्याकुल होकर चकराने लगते हैं।

'विषोदकुण्ड' एक कोस के परिमाण वाला है; वह कुण्ड तक्षक के समान विषधरों और मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए तथा उसी विष का भक्षण करने वाले पापियों से भरा रहता है। 'प्रतप्ततैलकुण्ड' में सदा खौलता हुआ तेल भरा रहता है; चारों ओर जलते हुए अङ्गारों से घिरा यह नरककुण्ड मेरे दूतों द्वारा पीटे जाने से चीत्कार करते हुए और इधर-उधर भागते हुए महापापियों से भरा रहता है।

'कुन्तकुण्ड' त्रिशूल के समान आकार वाले तथा अत्यन्त तीखी धार वाले लौह अस्त्रों से परिपूर्ण है; चार कोस के विस्तार वाला वह नरककुण्ड शस्त्रों की शय्या के समान प्रतीत होता है। मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए, भालों से बिँधे हुए और सूखे कण्ठ-ओष्ठ वाले पापियों से वह भरा रहता है।

शङ्कु तथा सर्प के आकार वाले, भयङ्कर तीक्ष्ण दाँतों वाले और विकृत कीड़ों से युक्त 'कृमिकुण्ड' है; वह अन्धकारमय कुण्ड मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए महापापियों से परिपूर्ण रहता है। 'पूयकुण्ड' चार कोस के विस्तार वाला कहा गया है; जो मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए पूयभक्षी पापियों से परिपूर्ण रहता है।"

'कृमिकुण्ड' है; वह अन्धकारमय कुण्ड मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए महापापियों से परिमिलित रहता है। 'पूयकुण्ड' चार कोस के विस्तार वाला कहा गया है; जो मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हुए पूयभक्षी पापियों से परिपूर्ण रहता है।"

वह कुण्ड विकृत आकार वाले पापिष्ठ भक्षकों से भरा रहता है। उसके पश्चात 'वज्रकुण्ड' आता है, जो वज्र और बिच्छुओं से परिपूर्ण है; आधी वापी के विस्तार वाला वह कुण्ड उन पापियों से व्याप्त है जो निरन्तर वज्र और बिच्छुओं द्वारा डसे जा रहे हैं। फिर आते हैं शरकुण्ड, शूलकुण्ड और खड्गकुण्ड—ये तीन नरककुण्ड उन्हीं शर, शूल और खड्ग से परिपूर्ण हैं; आधी वापी के परिमाण वाले वे कुण्ड उन अस्त्रों से बँधे और रक्त से लथपथ शरीर वाले पापियों से व्याप्त रहते हैं।

एक गोलकुण्ड है जो तप्त जल से भरा हुआ और अन्धकार से पूर्ण रहता है; वह कुण्ड शङ्कु के समान आकार वाले कीड़ों से भक्षित होने वाले पापियों से भरा रहता है। वहाँ के पापी उन कीड़ों के काटने और मेरे दूतों के प्रहार से भयभीत होकर व्याकुलता में रोते हैं। फिर आता है 'नक्रकुण्ड', जो अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त है और पापियों को निरन्तर दुःख देता है; वह आधी वापी के परिमाण वाला कुण्ड करोड़ों भयानक और विकृत आकार वाले जलचर जन्तुओं द्वारा खाए जाने वाले पापियों से भरा रहता है।

उसके पश्चात 'काककुण्ड' है, जो भयानक और विकृत आकार वाले कौओं द्वारा नोचे जाते हुए, विष्ठा, मूत्र और श्लेष्म का भोग करने वाले करोड़ों पापियों से सदा परिपूर्ण रहता है। फिर आते हैं 'मन्थानकुण्ड' और 'बीजकुण्ड', जिनका विस्तार सौ धनुष के बराबर है; ये दोनों कुण्ड उन कीटों से भरे रहते हैं जिनके काटने पर पापी निरन्तर चीत्कार करते हैं। वहीं 'वज्रकुण्ड' भी है, जो वज्र के समान दाँत वाले जन्तुओं से युक्त और घने अन्धकार से आच्छादित है; इसका विस्तार सौ धनुष के बराबर है।

इसके बाद आता है 'तपते पाषाण कुण्ड', जो दो वापी के विस्तार वाला, अत्यन्त तप्त पत्थरों से निर्मित और जलते हुए अङ्गार के सदृश है; वहाँ के पापी व्याकुल होकर इधर-उधर भागते हैं। फिर 'लालाकुण्ड' है, जिसकी गहराई कोस भर है और जहाँ मेरे दूत पापियों को निरन्तर पीटते हैं। इसी प्रकार सौ धनुष के परिमाण वाला 'मसीकुण्ड' भी है, जो काजल के समान वर्ण वाले तप्त पत्थरों से बना है; वहाँ के पापी मेरे दूतों द्वारा पीटे जाने पर इधर-उधर भागते हैं।

तदसीपत्रकुण्डं च कीर्तितं च भयानकम् धनुः शतप्रमाणं च क्षुरधारास्त्रसंयुतम् पापिनां रक्तपूर्णं च क्षुरधारं भयानकम् ।
करो ' - ऐसा शब्द करनेवाले अधम पापियोंके रक्तसे ।
भरे हुए, अत्यन्त गहरे, अन्धकारपूर्ण, रक्तके कीड़ोंसे व्याप्त तथा अत्यन्त भयानक कुण्डको असिपत्रकुण्ड ॥

कहा गया है ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 73पृष्ठ 527

एक 'चूर्णकुण्ड' भी है, जो तपे हुए बालू से परिपूर्ण है और एक कोस तक विस्तृत है; वहाँ के पापी उस दहकते बालू का भोजन करते हैं और मेरे दूतों द्वारा पीटे जाते हैं। फिर आता है 'चक्रकुण्ड', जो कुम्हार के चक्र की भाँति निरन्तर घूमता हुआ, सोलह अरों वाला और अत्यन्त तीक्ष्ण है; वह क्षत-विक्षत अङ्गों वाले पापियों से भरा रहता है। उसके पश्चात 'वक्रकुण्ड' है, जो चार कोस के विस्तार वाला, कन्दरा के आकार का, अत्यन्त गहरा और टेढ़ा-मेढ़ा है; वह खौलते हुए जल से परिपूर्ण है और वहाँ के पापी जल-जन्तुओं के काटने तथा तप्त जल से दग्ध होने पर चीखते-चिल्लाते रहते हैं।

एक 'भस्मकुण्ड' भी है, जिसकी गहराई एक कोस है; उसमें अत्यन्त तपता हुआ भस्म व्याप्त रहता है और उसे खाने के कारण पापियों के अङ्गों में निरन्तर दाह उत्पन्न होता है। फिर आता है 'क्षुरधारकुण्ड', जो सौ धनुष के विस्तार वाला और छुरे की धार के समान तीखे अस्त्रों से युक्त है; वह पापियों के रक्त से लथपथ और अत्यन्त भयानक है। उसके बाद 'कुम्भीपाक' कुण्ड आता है, जो समस्त कुण्डों में मुख्य है; इसमें सूई की नोंक जैसे अस्त्र होते हैं और यह पापियों के रक्त से परिपूर्ण है।

वहाँ के पापी 'गोका' नामक जन्तु के मुख के समान आकृति वाले और कुएँ के समान गहरे कुण्ड में रहते हैं; वे बीस धनुष के विस्तार वाले इस कुण्ड में कीड़ों के काटने से अपना मुख नीचे किए रहते हैं। फिर 'नक्रमुखकुण्ड' है, जो सोलह धनुष के बराबर गहरा और कुएँ के सदृश है। उसके उपरान्त 'गजदंशकुण्ड' आता है, जिसका विस्तार सौ धनुष के बराबर है। 'गोमुखकुण्ड' भी है, जो तीस धनुष जितना विस्तृत और गो के मुख की आकृति वाला है; वहाँ के पापी यमदूतों द्वारा गिराए जाने पर निरन्तर रोते हैं।

हे सुन्दरी! ध्यान रहे, कुम्भीपाक नरक में रहने वाले पापी अन्य सभी कुण्डों के पापियों से चौगुने दुःख भोगते हैं; वे दीर्घकाल तक यातना पाने के बाद भी नष्ट नहीं होते। वहाँ के प्राणी मेरे दूतों द्वारा क्षण भर में ऊपर उठाए जाते हैं और फिर तुरन्त डुबो दिए जाते हैं, जिससे उनकी साँसें रुक जाती हैं और वे अचेत हो जाते हैं। देहभोग के कारण जो खौलते जल से युक्त कुण्ड है, उसे 'कालसूत्रकुण्ड' कहा जाता है।

इसके अतिरिक्त 'मत्स्योदकुण्ड' भी है, जिसे 'अवट' नामक कूप भी कहते हैं; यह चौबीस धनुष के विस्तार वाला और प्रतप्त जल से भरा रहता है। 'अरुन्तुदकुण्ड' वह है जिसके जल का स्पर्श होते ही पापियों को व्याधियाँ ग्रस्त कर लेती हैं; यह भयानक कीड़ों के काटने से होने वाले हाहाकार से परिपूर्ण है। 'पांसुकुण्ड' भी है, जो सौ धनुष के विस्तार वाला और तपी हुई धूल से भरा है; वहाँ के पापी उस धूल को खाते हैं जिससे उनकी त्वचा दग्ध हो जाती है।

वहाँ 'पाशवेष्टनकुण्ड' आता है, जिसमें गिरते ही पापी पाश से बँध जाता है और जिसका विस्तार कोस भर है। फिर 'शूलप्रोतकुण्ड' है, जो बीस धनुष के बराबर है और जिसमें गिरते ही पापी शूल से जकड़ उठता है। 'प्रकम्पन-कुण्ड' भी है, जहाँ गिरने पर पापियों में कँपकँपी उठने लगती है; यह आधा कोस विस्तृत और बर्फ जैसे शीतल जल से भरा है।

वहाँ 'उल्कामुखकुण्ड' आता है, जिसमें मेरे दूत पापियों के मुख में जलती हुई लकड़ियाँ डाल देते हैं; इसका विस्तार बीस धनुष है। इसके बाद 'अन्धकूप' है, जो कुएँ के समान गोलाकार और अन्धकार से व्याप्त है; वहाँ के पापी कीड़ों द्वारा काटे जाने और खौलते जल से दग्ध होने के कारण अन्धकार में नेत्रों से देखने में असमर्थ होकर सङ्घर्ष करते हैं। 'वेधनकुण्ड' भी है, जहाँ पापियों को अनेक शस्त्रास्त्रों से वेधा जाता है।

वहाँ 'दण्डताडनकुण्ड' आता है, जहाँ मेरे दूत पापियों को पीटते हैं; इसका विस्तार सोलह धनुष है। 'जालरन्ध्रकुण्ड' में जाते ही पापी मछलियों की भाँति जालों में फँस जाते हैं। 'देहचूर्णकुण्ड' भी है, जो बीस धनुष विस्तृत और करोड़ पोरसा गहरा है; वहाँ के पापियों के पैरों में लोहे की बेड़ियाँ होती हैं और वे अन्धकार में मूर्च्छित होकर जड़ की भाँति पड़े रहते हैं।

वहाँ 'दलनकुण्ड' आता है, जहाँ मेरे दूत पापियों को कुचलते और पीटते हैं। 'शोषणकुण्ड' भी है, जो तीस धनुष विस्तृत और सौ पोरसा गहरा है; वहाँ के पापी तपे हुए बालू से कण्ठ, ओठ और तालु सूखने के कारण महान कष्ट पाते हैं। फिर 'कषकुण्ड' आता है, जो सौ धनुष के विस्तार वाला और दुर्गन्धित है; वहाँ के पापी चर्मों के कसैले जल का भोग करते हैं।

अन्त में 'ज्वालामुखकुण्ड' आता है, जिसके भीतर आग की लपटें उठती रहती हैं; यह बीस धनुष विस्तृत है और यहाँ के पापी ज्वालाओं से दग्ध शरीर के साथ रहते हैं। वहीं 'नागवेष्टनकुण्ड' है, जहाँ जाते ही पापी नागों द्वारा लपेट लिए जाते हैं; इसका विस्तार सौ धनुष के बराबर है।

हे सावित्री! सुनो, मैंने इन छियासी नरककुण्डों और उनके लक्षणों का वर्णन कर दिया; अब तुम क्या सुनना चाहती हो?

सावित्री बोली— "हे प्रभो! आप मुझे भगवती की भक्ति प्रदान कीजिये; वह देवीभक्ति समस्त तत्त्वों का तत्त्व है, मनुष्यों के लिए मुक्तिद्वार का मूल कारण है, नरकरूपी समुद्र से तारने वाली है, मुक्तिके तत्त्वों का आधार है, सभी अशुभों का नाश करने में समर्थ है, समस्त कर्मवृक्षों को काटने वाली है तथा मनुष्य द्वारा किए गए पापों का हरण करने वाली है।

हे भगवन्! मुक्ति कितने प्रकार की होती है और उनके क्या लक्षण हैं? देवीभक्ति के स्वरूप, भक्तिके भेद तथा किये हुए कर्मों के भोग के नाश के विषय में मुझे बताइये। हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! ब्रह्मा द्वारा निर्मित स्त्रीजाति तत्त्वज्ञान से रहित होती है, अतः आप सङ्क्षेप में सारभूत बात बताइये।

हे प्रभो! दान, यज्ञ, तीर्थ, स्नान, व्रत और तप— ये सब अज्ञानी मनुष्य को ज्ञान देने से होने वाले पुण्यफल की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं। पिता की अपेक्षा माता सौ गुनी श्रेष्ठ है, किन्तु ज्ञान प्रदान करने वाला गुरु माता से भी सौ गुना अधिक श्रेष्ठ होता है।"

धर्मराज बोले— "हे वत्से! तुम्हारे मन में पहले जो भी अभिलषित वर था, वह सब मैं दे चुका हूँ; अब जो तुम भगवती की भक्ति चाहती हो, वह भी मेरे वर के प्रभाव से तुम्हें प्राप्त हो जाए।

हे कल्याणि! तुम जो श्रीदेवी का गुणकीर्तन सुनना चाहती हो, वह उसे करने वाले, सुनने वाले तथा इसके विषय में पूछने वाले— इन सभी के कुल का उद्धार कर देता है। भगवान् शेषनाग अपने हजार मुखों से इसे बता नहीं सकते और मृत्युञ्जय महादेव भी अपने पाँच मुख से इसका वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। चारों वेदों की उत्पत्ति तथा सम्पूर्ण लोकों का विधान करने वाले ब्रह्मा अपने चार मुखों से इसका वर्णन नहीं कर सकते; उसी प्रकार सर्वज्ञ विष्णु भी इसका वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं।"

ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवगण जिस भगवती के चरणकमल का ध्यान करते हैं, वह उनके सोलह भक्तों के लिए तो अति सुगम है, किन्तु अन्य लोगों के लिये अत्यन्त दुर्लभ है। कोई व्यक्ति उन भगवती के पवित्र गुणों का कीर्तन कुछ-कुछ जान सकता है, किन्तु ब्रह्मज्ञानी ब्रह्माजी उससे अधिक जानते हैं। ज्ञानियों के गुरु गणेशजी भी उन ब्रह्मा से कुछ विशेष जानते हैं और सब कुछ जानने वाले भगवान् शिव सबसे अधिक जानते हैं। पूर्वकाल में गोलोक के अत्यन्त निर्जन वन में रासमण्डल के मध्य परमेश्वर श्रीकृष्ण ने उन शिव को भगवती के कुछ पवित्र गुण बताए थे। तत्पश्चात् स्वयं भगवान् शिव ने शिवलोक में धर्म के प्रति उसका उपदेश किया था। उसके बाद सूर्य के पूछने पर धर्म ने उनसे भगवती के गुणों का वर्णन किया था।

हे सुव्रते! मेरे पिता सूर्य ने भी तपस्या के द्वारा उन देवी की आराधना करके उस ज्ञान को प्राप्त किया था। पूर्व समय में मेरे पिताजी यत्नपूर्वक मुझे अपना राज्य देना चाहते थे, किन्तु मैंने स्वीकार नहीं किया। उस समय वैराग्ययुक्त होने के कारण मैं तपस्या के लिये जाना चाहता था; तब पिताजी ने मेरे सामने भगवती के गुणों का वर्णन किया। मैंने उनसे जो प्राप्त किया, उसी परम दुर्लभ तत्त्व को तुम्हें बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। हे वरानने! जैसे आकाश अपना ही अन्त नहीं जानता, उसी प्रकार वे भगवती भी अपने सभी गुण नहीं जानतीं, तो अन्य व्यक्ति की बात ही क्या! स्वतन्त्रता, निराशाङ्क, निर्गुण, निर्विकार, अनासक्त, सर्वसाक्षी, सर्वाधार, परात्पर तथा मायाविशिष्ट परमात्मा ही मूल प्रकृति के रूप में अभिव्यक्त हो जाते हैं; सभी प्राकृत पदार्थ उन्हीं से आविर्भूत हैं। स्वयं परम पुरुष ही प्रकृति हैं और वे दोनों परस्पर उसी प्रकार अभिन्न हैं, जैसे अग्नि से उसकी शक्ति कुछ भी भिन्न नहीं है। वे ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी शक्ति महामाया हैं। वे निराकार होते हुए भी भक्तों पर कृपा करने के लिये रूप धारण करती हैं।

भक्तिरस से आप्लावित भक्तजन उनके इसी रूप का ध्यान करते हैं—जिनके वक्ष:स्थल पर कौस्तुभमणि निरन्तर प्रकाशित हो रही थी, जिनका विग्रह कुमकुम और अगूर-कस्तूरी मिश्रित दिव्य चन्दन से लिप्त था, जो चम्पा और मालती की मनोहर मालाओं से सुशोभित थीं; वह कान्तिमान चन्द्रमा की शोभा से परिपूर्ण तथा मनोहर चूडामणि से सुशोभित थीं। उन्हीं के भय से सभी प्राणियों के रक्षक भगवान् विष्णु सदा रक्षा करते हैं और उन्हीं के भय से कालाग्नि के समान भगवान् रुद्र सम्पूर्ण जगत् का संहार करते हैं। ज्ञानियों के गुरु के भी गुरु मृत्युञ्जय शिव उसी परब्रह्मरूप विग्रह को जान लेने पर योगीश्वर, ज्ञानविद्, परम आनन्दसे परिपूर्ण तथा भक्ति-वैराग्य से सम्पन्न हो सके हैं। उन्हीं के भय से तीव्र चलने वाले पवनदेव प्रवाहित होते हैं और उन्हीं के भय से सूर्य निरन्तर तपते रहते हैं। उन्हीं की आज्ञा से इन्द्र वृष्टि करते हैं, मृत्यु प्राणियों पर अपना प्रभाव डालती है, उन्हीं की आज्ञा से अग्नि जलाती है और जल शीतल करता है। उन्हीं के आदेश से भयभीत दिक्पालगण दिशाओं की रक्षा करते हैं और उन्हीं के भय से ग्रह तथा राशियाँ अपने मार्ग पर परिभ्रमण करती हैं। उन्हीं के भय से वृक्ष फलते-फूलते हैं और उन्हीं की आज्ञा स्वीकार करके काल निश्चित समय पर प्राणियों का संहार करता है।

उन्हीं की आज्ञा बिना जल तथा स्थल में रहने वाले कोई भी प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकते और सङ्ग्राम में आहत अथवा विषम स्थितियों में पड़े प्राणी की भी अकाल मृत्यु नहीं होती। उन्हीं की आज्ञा से वायु जलराशियों को, कच्छप को, शेषनाग को, शेष पृथ्वी को और पृथ्वी सभी समुद्रों तथा पर्वतों को धारण किये रहती है। जो सब प्रकार से क्षमाशालिनी है, वह पृथ्वी उन्हीं की आज्ञा से नानाविध रत्नों को धारण करती है। उन्हीं की आज्ञा से पृथ्वी पर सभी प्राणी रहते हैं तथा नष्ट होते हैं। इन्द्र की आयु होती है; ऐसे अट्ठाईस इन्द्रों के समाप्त होने पर ब्रह्मा का एक दिन-रात होता है। तीस दिनों का एक महीना होता है और इन्हीं दो महीनों की एक ऋतु कही गयी है। छह ऋतुओं का एक वर्ष होता है और ऐसे सौ वर्षों की ब्रह्मा की आयु कही गयी है। ब्रह्मा की आयु समाप्त होने पर श्रीहरि आँखें मूँद लेते हैं; श्रीहरि के आँखें मूँद लेने पर प्राकृत प्रलय हो जाता है। उस प्राकृतिक प्रलय के समय समस्त चराचर प्राणी, देवता, विष्णु तथा ब्रह्मा—ये सब श्रीकृष्ण के नाभिकमल में लीन हो जाते हैं। श्रीकृष्ण के वाम पार्श्व में विलीन होते हैं। ज्ञान के अधिष्ठाता सनातन शिव उनके ज्ञान में विलीन हो जाते हैं। सभी शक्तियाँ विष्णुमाया दुर्गा में समाविष्ट हो जाती हैं और वे बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवता दुर्गा भगवान् श्रीकृष्ण की बुद्धि में प्रविष्ट हो जाती हैं। नारायण के अंश स्वामी कार्तिकेय उनके वक्ष:स्थल में लीन हो जाते हैं। \हे सुव्रते! श्रीकृष्ण के अंशस्वरूप तथा गणों के स्वामी देवेश्वर गणेश श्रीकृष्ण की दोनों भुजाओं में समाविष्ट हो जाते हैं। श्रीलक्ष्मी की अंशस्वरूपा देवियाँ भगवती लक्ष्मी में तथा वे देवी लक्ष्मी राधा में विलीन हो जाती हैं। इसी प्रकार समस्त गोपिकाएँ तथा देवपत्नियाँ भी उन्हीं श्रीराधा में अन्तर्हित हो जाती हैं और श्रीकृष्ण के प्राणों की अधीश्वरी वे राधा उन श्रीकृष्ण के प्राणों में अधिष्ठित हो जाती हैं। सावित्री तथा जितने भी वेद और शास्त्र हैं, वे सब सरस्वती में प्रवेश कर जाते हैं और सरस्वती उन परमात्मा श्रीकृष्ण की जिह्वा में विलीन हो जाती है। गोलोक के सभी गोप उनके रोमकूपों में प्रवेश कर जाते हैं। सभी प्राणियों की प्राणवायु उन श्रीकृष्ण के प्राणों में, समस्त अग्नियाँ उनकी जठराग्नि में तथा जल उनकी जिह्वा के अग्रभाग में विलीन हो जाते हैं। सार के भी सारस्वरूप तथा भक्तिरूपी अमृत का पान करने वाले वैष्णवजन परम आनन्दित होकर उनके चरणकमल में समाहित हो जाते हैं।

सावित्री च सरस्वत्यां वेदाः शास्त्राणि यानि च ।
स्थिता वाणी च जिह्वायां यस्य च परमात्मनः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 59पृष्ठ 537

जब श्रीकृष्ण अपनी आँखें खोलते हैं, तो पुनः सृष्टिकार्य आरम्भ हो जाता है। जितना समय उनके पलक गिरने में लगता है, उतना ही समय उनके पलक उठाने में लगता है। ब्रह्मा सौ वर्ष बीत जाने पर सृष्टिका सूत्रपात और पुनः लय करते हैं। हे सुव्रते! जैसे पृथ्वी के रज:कणों की सङ्ख्या नहीं है, वैसे ही ब्रह्मा की सृष्टि तथा प्रलय की कोई सङ्ख्या नहीं है। पलक झपकते ही प्रलय होता है और पलक खोलते ही पुनः सृष्टि आरम्भ हो जाती है। वे श्रीकृष्ण प्रलय के समय उन परात्पर मूल प्रकृति में लीन हो जाते हैं; उस समय एकमात्र पराशक्ति ही शेष रह जाती है, यही निर्गुण परम पुरुष भी है। यही सत्स्वरूप तत्त्व सर्वप्रथम विराजमान था—ऐसा वेदों के ज्ञाताओं ने कहा है। अव्यक्त स्वरूपी मूल प्रकृति 'अव्याकृत' नाम से कही जाती है। चैतन्यस्वरूपिणी वे ही केवल प्रलयकाल में विद्यमान रहती हैं। उनके गुणों का वर्णन करने में ब्रह्माण्ड में कौन समर्थ है?

वे शिवत्व, अमरत्व तथा ब्रह्मत्व की अवहेलना करते हैं। वे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, भय, शोक, धन, दिव्यरूप धारण करना, निर्वाण तथा मोक्ष की अवहेलना करते हैं। मुक्ति सेवा रहित है और भक्ति सेवा भाव में वृद्धि करने वाली है; भक्ति तथा मुक्ति में यही भेद है। विद्वान् पुरुषों ने निषेक (जन्म) एवं भोग के खण्डन का कल्याणकारी उपाय श्रीप्रभु की एकमात्र परम सेवा को ही कहा है। हे सुव्रते! अब तुम सुखपूर्वक जाओ।

ऐसा कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज अपने पति को जीवित कर और उसे आशीर्वाद प्रदान करके वहाँ से जाने के लिये उद्यत हो गये। धर्मराज को जाते देखकर सावित्री उन्हें प्रणाम करके उनके दोनों चरण पकड़कर साधु-वियोग के कारण उत्पन्न दुःख से व्याकुल होकर रोने लगी। सावित्री का विलाप सुनकर कृपानिधि धर्मराज भी स्वयं रोने लगे और सन्तुष्ट होकर उससे कहने लगे— "हे सावित्री! तुम पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में एक लाख वर्ष तक सुख का भोग करके अन्त में उस लोक में जाओगी, जहाँ साक्षात् भगवती विराजमान रहती हैं।"

"हे शुचिस्मिते! यह महालक्ष्मी व्रत अत्यन्त मङ्गलकारी होता है, जैसे भाद्रपद महीने की आठवीं तिथि को महालक्ष्मी व्रत कल्याणप्रद होता है। इस महालक्ष्मी व्रत को सोलह वर्ष तक करना चाहिये। जो स्त्री इस व्रत का अनुष्ठान करती है, वह भगवान् श्रीहरि के चरणों की सन्निधि प्राप्त कर लेती है।"

प्रत्येक मंगलवारको मंगलकारिणी भगवती ८४ मंगलचण्डिकाका व्रत करना चाहिये ।
प्रत्येक मासकी शुक्लषष्ठी दिन व्रतपूर्वक मंगलदायिनी देवी षष्ठीकी पूजा करनी चाहिये ।
उसी प्रकार आषाढ़ - संक्रान्तिके ८५ अवसरपर समस्त सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली देवी मनसाकी पूजा करनी चाहिये ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 84-85पृष्ठ 539

"उनका पूजन पूर्वक उन्हें पूजा करने वाली स्त्री इस लोक में सुख भोगकर अन्त में ऐश्वर्यमयी भगवती के परम पद को प्राप्त होती है। इस प्रकार साधक को भगवती की विभूतियों की निरन्तर पूजा करनी चाहिये; उन सर्वरूपा परमेश्वरी की निरन्तर उपासना करनी चाहिये; इससे बढ़कर कृतकृत्यता प्रदान करने वाला और कुछ भी नहीं है।"

हे नारद! उससे ऐसा कहकर धर्मराज अपने लोक को चले गये और अपने पति को साथ लेकर सावित्री भी अपने घर चली गयी। हे नारद! सावित्री और सत्यवान् जब घर पर आ गये, तब सावित्री ने अपने अन्य बन्धु-बान्धवों से यह सारा वृत्तान्त कहा। सावित्री को पुत्रों की प्राप्ति हुई। इस प्रकार पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में एक लाख वर्ष तक सुख भोगकर वह पतिव्रता सावित्री अपने पति के साथ देवीलोक चली गयी।

सविताकी अधिष्ठात्री देवी होने अथवा सूर्यके ब्रह्मप्रतिपादक गायत्री मन्त्रकी अधिदेवता होने तथा ९ ५ सम्पूर्ण वेदोंकी जननी होनेसे ये जगत्में सावित्री नामसे प्रसिद्ध हैं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 38 · श्लोक 95पृष्ठ 540

In English

The Story of Savitri and Satyavan

King Ashvapati performs intense penance to worship the goddess Savitri, resulting in the birth of a daughter also named Savitri. As an adult, Savitri marries Satyavan and follows him into the forest, where she encounters Yama, the god of death, and uses her wisdom to secure his life.

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