व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य
प्रशस्तपादभाष्य — साधर्म्यवैधर्म्यप्रकरण
20 मूल पद्य
साधर्म्यवैधर्म्यप्रकरणम्
पृ. ४१
षण्णामपि पदार्थानामस्तित्वाभिधेयत्वज्ञेयत्वानि |
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( द्रव्यादि ) छहों पदार्थों का ( १ ) अस्तित्व , ( २ ) अभिधेयत्व और ( ३ ) ज्ञेयत्व ये तीन साधर्म्य हैं |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अनुद्दिष्टेषु धम्म धर्मा न शक्यन्ते वक्तुम् , अतो धर्माणामुद्देशं प्रक्रमयितुं सङ्गत प्रदर्शयति - एवमिति । एवं पूर्वोक्तेन ग्रन्थेन धर्मान् परित्यज्य धर्मिणामुद्देशः कृतः , धम्मणां संज्ञामात्रेण सङ्कीर्त्तनं कृतमिदानीं धर्मा उद्दिश्यन्त इति भावः । यद्यपि पूर्वं द्रव्यादीनां विभागः कृतस्तथाप्युद्देशः कृत इत्युक्तम् , विभागस्य नामधेयसङ्कीर्त्तनमात्रेणोद्देशेऽन्तर्भावात् ।
धर्माः षट्पदार्थेभ्यो न व्यतिरिच्यन्ते , किन्तु त एव अन्योन्यापेक्षया धर्मा धम्मिणश्च भवन्तीति । तथापि तेषां धम्मिरूपतया परिज्ञानार्थं पृथगुद्देशं करोति षण्णामपीति । अस्तित्वं स्वरूपवत्त्वम् , षण्णामपि साधर्म्यम् , यस्य वस्तुनो यत् स्वरूपं तदेव तस्यास्तित्वम् 1 । अभिधेयत्वमप्यभिधानप्रतिपादनयोग्यत्वम् , तच्च वस्तुनः स्वरूपमेव । भावस्वरूपमेवावस्थाभेदेन ज्ञेयत्वमभिधेयत्वञ्चोच्यते ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — जब तक धम्म न कहे जायें तब तक उनके धर्म नहीं कहे जा सकते | अतः पदार्थों के उद्देश के बाद पदार्थ के धर्म्म अर्थात् साधर्म्य क्यों कहे गये ? इस प्रश्न का समाधान सङ्गति प्रदर्शन के द्वारा ' एवम् ' इत्यादि पङ्क्ति से दिखलाते हैं । ' एवम् ' पहिले कहे हुये सन्दर्भ से . ' धर्मैविना ' धर्मों को छोड़कर ' धम्मिणामुद्देशः कृतः ' अर्थात् धर्मियों को ही केवल उनके नाम के द्वारा कहा है , अब उनके धर्मों को उनके नाम से कहते हैं । यद्यपि पहिले के ग्रन्थों से पदार्थों का विभाग भी किया है , फिर भी ' उद्देशः कृतः ' यही वाक्य कहा है , क्योंकि नामों के द्वारा पदार्थों के कथन रूप उद्देश में ही विभाग का भी अन्तर्भाव हो जाता है ।
यद्यपि धर्म भी इन छः पदार्थों के ही अन्तर्गत हैं , तथापि वे ही यथासम्भव अपने में एक दूसरे के धम्मं और धर्मी कहलाते हैं , फिर भी धर्मी रूप से उनको समझाने के लिए ‘ षण्णाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अलग से उनको कहते हैं । ' अस्तित्व ' शब्द का अर्थ है ' स्वरूप ' , अर्थात् वस्तुओं का अपना असाधारण रूप ही अस्तित्व है । यह ' अस्तित्व ' द्रव्याणि छहों पदार्थों में रहनेवाला धर्म है । ' अभिधेयत्व ' शब्द का अर्थ है अभिधान , अर्थात् शब्द से कहे जाने की क्षमता , वह भी वस्तुओं का स्वरूप ही है । वस्तुओं का यह स्वरूप ही अवस्थाओं के भेद से अभिधेयत्व ज्ञयत्व प्रभृति शब्दों से कहा जाता
पृ. ४२
आश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — द्रव्यादीनां पञ्चानां समवायित्वमनेकत्वञ्च ।
नित्य द्रव्यों को छोड़कर और सभी पदार्थों का आश्रितत्व साधर्म्य है |
द्रव्य , गुण , कर्म , सामान्य और विशेष इन पाँच पदार्थों के समवायित्व और अनेकत्व ये दो साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
आश्रितत्वञ्च परतन्त्रतयोपलब्धि :, न समवायलक्षणा वृत्तिः समवाये तदभावात् । इदञ्चाश्रितत्वं चतुर्विधेषु परमाणुषु आकाशकाल - दिगात्ममन : सु नास्तीत्याह- इ - अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति ।
ये तु धर्मान् व्यतिरिक्तानिच्छन्ति तेषामेकस्मिन् समस्तवस्तुव्यापिन्यस्तीतिप्रत्यय हेतावस्तित्वे कल्पिते द्रव्यादिषु सत्तावैयर्थ्यम् । अथास्तित्वं प्रतिवस्तु भिद्यते तदा तत्कल्पनावैयर्थ्यम् , सत्तायाः स्वरूपसत्तायाश्च सदिति प्रत्ययोपपत्तेः येषान्तु भावस्वरूपमेवास्तित्वं न तेषां व्यर्था सत्ता , स्वरूपस्यानुवृत्तिप्रत्यय हेतुत्वाभावात् । नाप्यस्तित्वमनर्थकं निःस्वरूपे सत्तायाः समवायाभावादित्युभयमुपपद्यते ।
द्रव्यादीनां विशेषान्तानां साधर्म्य । समवायित्वं
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — परतन्त्र रूप से ज्ञात होना ही ' आश्रितत्व ' शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध से कहीं रहना ( आश्रितत्व शब्द का अर्थ ) नहीं है , क्योंकि समवाय कहीं पर भी समवाय सम्बन्ध से नहीं रहता है । पृथिवी , जल , तेज और वायु इन चारों पदार्थों के परमाणुओं
६ में , तथा आकाश , काल , दिक् , आत्मा और मन इन नौ नित्य द्रव्यों में ( इतने ही द्रव्य नित्य हैं ) यह ' आभितत्व ' नहीं है , अतः ' अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः " यह वाक्य कहा गया है ।
जो समुदाय व्यक्तिभेद से धम्मों को भिन्न ही मानना चाहते हैं ( वे भी अनेक वस्तुओं में रहनेवाले और धर्मों को न भी मानें , किन्तु ) सभी वस्तुओ में एक प्रकार की ' अस्ति ' प्रतोति को उत्पन्न करनेवाला ' अस्तित्व ' नाम का धर्म उन्हें भी मानना ही पड़ेगा , किन्तु ऐसा मानने पर द्रव्यादि तीन पदार्थों में ही सत्त्व प्रतीति के लिए सत्ता ' जाति की कल्पना व्यर्थ हो जाएगी । अगर अस्तित्व धम्मं को प्रतिव्यक्ति भिन्न मानें तो फिर इस प्रकार के अस्तित्व की कल्पना ही व्यर्थ हो जाती है , क्योंकि सत्ता ' जाति एवं तत्तद्व्यक्तिगत तद्वयक्तित्व ( रूप स्वरूपसत्ता ) से ही ' सत्प्रतीति ' उपपन्न हो जाएगी । जो कोई ' अस्तित्व ' को वस्तुओं का स्वरूप ही मानते हैं , उनके मत में भी ' सत्ता ' जाति की कल्पना व्यर्थ नहीं है , क्योंकि ( बिना सत्ता जाति माने ) भिन्न रूप से प्रतीत होनेवाले द्रव्यादि तीन पदार्थों में एक आकार की सत्त्व की प्रतीति नहीं हो सकेगी । अस्तित्व की कल्पना भी व्यर्थ नहीं है , क्योंकि अपने अपने व्यक्तिगत स्वरूप ( अस्तित्व ) से शून्य वस्तुओं में सत्ता जाति का समवाय भी सम्भव नहीं है , अतः सत्ता जाति और सभी प्रकार की वस्तुओं में ' अस्ति ' प्रतीति का कारण अस्तित्व , इन दोनों को ही मानना आवश्यक है । 1
पृ. ४३
गुणादीनां पञ्चानामपि निर्गुणत्वनिष्क्रियत्वे ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — गुण से लेकर समवाय तक अर्थात् गुण , कर्म , सामान्य , विशेष और समवाय इन पाँच पदार्थों के निर्गुणत्व और निष्क्रियत्व साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
साधयति समवायलक्षणा वृत्तिः । अनेकत्वं परस्परविभिन्नत्वमितरेतरव्यावृत्तं स्वरूपमेव । द्रव्यादीनामित्युक्ते समवायोऽपि गृह्येत , तदर्थं पञ्चानामित्युक्तम् । पञ्चानामित्युक्ते च केषामिति न ज्ञायते तदर्थं द्रव्यादीनामिति ।
गुणादीनां समवायान्तानां साधर्म्यमाह - गुणादीनामिति । निर्गुणत्वं गुणाभावविशिष्टत्वम् , निष्क्रियत्वं क्रियाभावविशिष्टत्वम् , यथा भावोऽभावस्य विशेषणं स्वविशिष्टप्रत्ययजनना देवमभावोऽपि । तथा चोपनिबद्धमघटं भूतलमिति । भावाभावयोरसम्बन्धात् कथमभावो विशेषणमिति चेदस्ति तावदयं विशिष्टप्रत्ययः , तद्दर्शनात् सम्बन्धमपि कल्पयिष्यामः । यदि सम्बद्धमेव विशेषणं मन्यसे ।
द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तासम्बन्धः सत्तया सामान्येन सबन्ध : समवायरूपो द्रव्यगुणकर्म्मणां साधर्म्यम् । यथा चैतेषु सत्तासम्बन्धस्तथोपपादितम् । इदन्त्विह निरूप्यते - कि सत्तासम्बन्धः सतोऽसतो वा ? सतश्चेत् प्राक् सत्तासम्बन्धात् नेवासावर्थ इति व्यर्था सत्ता ? अथासतः सम्बन्धः ? खरविषाणादिष्वपि सत्ता स्यात् । नित्येषु तावत्पूर्वापरभावानभ्युपगमः । अनित्येषु प्रागसत एव सत्ता , कारणसामर्थ्यात् । न च खरविषाणादिष्वतिप्रसङ्गः , तदुत्पत्तौ कस्यचित् सामर्थ्याभावात् ।
अन्यदपि साधर्म्यं द्रव्यादीनां त्रयाणां कथयति - सामान्यविशेषवत्त्वञ्चेति । अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यविशेषा द्रव्यत्वादयस्तैः सह सम्बन्धो द्रव्यादीनाम् , स च समवाय एव ।
स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वञ्चेति । वैशेषिकैः स्वयं व्यवहाराय यः सङ्केतः कृतोऽस्मिन् शास्त्रे ' अर्थशब्दाद् द्रव्यगुणकर्माणि प्रतिपत्तव्यानि ' इति , तेन द्रव्यादीनि त्रीणि निरुपपदेनार्थशब्देनोच्यन्ते ।
धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वञ्चेति । धर्माधर्मोत्पत्तिनिमित्तत्वं त्रयाणाम् , यथा हि भूमिरेकैव दीयमानापहियमाणा च धर्माधर्म्मयोः कारणम् । एकः संयोगो द्वयोः कारणम् , यथा कपिलास्पर्शो नरास्थिस्पर्शश्च । एवं कम्प्युभयकारणम् , यथा तीर्थगमनं शौण्डिकगृहगमनञ्च , एवमन्यदप्यूह्यम् । धर्माधर्म्म कर्तृत्वमिति त्वप्रत्ययेन धर्माधर्म्मजननं प्रति तेषां निजा शक्तिरुच्यते । ननु जातिरपि तयोः कारणम् ? न तस्याः स्वाश्रयव्यवच्छेदमात्रेण चरितार्थत्वात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — द्रव्य से लेकर विशेष तक के पाँच पदार्थों के साधर्म्य का उपपादन करते हैं । ' समवायित्व ' शब्द का अर्थ है समवाम रूप सम्बन्ध , ( अर्थात् ) समवाय सम्बन्ध से कहीं रहना । ' अनेकत्व ' शब्द का अर्थ है विभिन्नत्व , वह परस्पर एक दूसरे में न रहनेवाला उन वस्तुओं का स्वरूप ही है । ' द्रव्यादीनाम् ' केवल इतना कह देने से समवाय का भी ग्रहण हो जाता , अतः ' पञ्चानाम् ' यह पद है । केवल ' पञ्चानाम् ' इतना ही कहने से ' कौन पाँच ' यह समझ में नहीं आता , अतः द्रव्यादीनाम् ' यह पद है ।
' गुणादीनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से गुण से लेकर समवाय तक के पाँच पदार्थों का साधर्म्य कहते हैं । ' निर्गुणत्व ' शब्द का अर्थ है गुणों का अभाव और ' निष्क्रियत्व ' शब्द का अर्थ हैं । क्रियाओं का अभाव । जिस प्रकार भाव ' अपने से युक्त अभाव प्रतीति का जनक होने से अभाव का विशेषण होता है , उसी प्रकार एवं उसी हेतु से अभाव भी भाव का विशेषण हो सकता है | एवं उसी के अनुकूल ' अघटं भूतलम् ' इत्यादि विशिष्टप्रतीति के जनक प्रयोग भी होते हैं । ( प्र ० ) भाव और अभाव दोनों ही परस्पर विरोधी हैं , अतः उन दोनों में परस्पर सम्बन्ध असम्भव है , एवं दोनों में परस्पर सम्बन्ध न रहने से विशेष्यविशेषणभाव सुतराम् असम्भव है । ( उ ० ) उक्त कथन ठीक नहीं है , क्योंकि भाव विशिष्ट अभाव की , एवं अभाव विशिष्ट , भाव की दोनों ही प्रतीतियाँ अवश्य हैं । अगर परस्पर सम्बद्ध दो वस्तुओं में से ही एक को विशेष्य और दूसरे को विशेषण मानना हो तो फिर उक्त विशिष्ट प्रतीतियों के बल से भाव और अभाव इन दोनों में भी किसी अनुकूल सम्बन्ध की कल्पना करनी ही पड़ेगी ।
पृ. ४३
द्रव्यादीनां त्रयाणामपि सत्तासम्बन्धः , सामान्य विशेष- ववम् , स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वम् , धर्माधर्मकत्वञ्च ।
रूप अभिधावृत्ति के द्वारा ' अर्थ ' शब्द के द्वारा समझा जाना और ( ५ ) धर्माधर्म्मकर्तृत्व ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — द्रव्यादि तीन वस्तुओं के अर्थात् द्रव्य , गुण और कर्म्म इन तीन पदार्थों के ये पाँच साधर्म्य हैं - ( १ ) सत्ता का सम्बन्ध , ( २ ) सामन्यवत्त्व , ( ३ ) विशेषवत्त्व ( अर्थात् पर और अपर दोनों जातियों का सम्बन्ध ) , ( ४ ) इस शास्त्र के सङ्केत
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — " द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तासम्बन्धः " अर्थात् सत्ता नाम की जाति के साथ समवाय नाम का सम्बन्ध द्रव्य , गुण और कर्म्म इन तीनों का साधर्म्य है । इन तीनों में सत्ता जाति का सम्बन्ध किस प्रकार है ? यह कह चुके हैं ( प्र ० ) अब यहाँ विचार करना है कि सत्ता जाति ' सत् ' अर्थात् पहिले से विद्यमान वस्तुओं के साथ सम्बद्ध होती है ? या असद्वस्तुओं के साथ ? अगर सत्ता सद्वस्तुओं के साथ सम्बद्ध होती है तो फिर सत्ता जाति की कल्पना ही व्यर्थ हो जाती है , क्योंकि सत्ता सम्बन्ध के बिना भी वे सत् हैं ही । अगर असत् वस्तुओं के साथ सत्ता सम्बद्ध होती है तो फिर गदहे के सींग प्रभृति पदार्थों की भी सत्ता माननी पड़ेगी । ( उ ० ) नित्य वस्तुओं में तो पहिले पीछे की कोई बात ही नहीं उठती है । अनित्य वस्तुओं के प्रसङ्ग में यह कहना है कि पहिले से अविद्यमान वस्तुओं के साथ ही कारणों के ( विशिष्ट ) बल से सत्ता सम्बद्ध होती है । गदहे के सींग प्रभृति अलीक पदार्थों की आपत्ति का भी प्रसङ्ग नहीं आता है , क्योंकि किसी भी वस्तु में उनके उत्पादन का बल ही नहीं है ।
' सामान्यविशेषवत्त्वश्व ' इत्यादि से द्रव्यादि तोन पदार्थों के और भी साधर्म्य कहते हैं । द्रव्यत्वादि जातियाँ अपने विभिन्न आश्रयों में ' द्रव्यम् ' इस एक आकार की ( अनुवृत्ति ) बुद्धि का कारण होने से ' सामान्य ' हैं एवं अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में समझाने के कारण ' विशेष ' भी हैं । सामान्य एवं विशेष इन दोनों शब्दों से समझी जानेवाली द्रव्यत्वादि जातियों के साथ द्रव्यत्वादि तीनों वस्तुओं का सम्बन्ध है । वह सम्बन्ध समवाय ही है ।
स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वञ्च ' अर्थात् वैशेषिक शास्त्र के आचार्यों ने सङ्केत किया है कि ' अर्थ ' शब्द से द्रव्यादि समझे जायँ । इस सङ्केत के बल से विशेषण से शून्य केवल ' अर्थ ' शब्द से द्रव्यादि तीन ही समझे जाते हैं । ( इस प्रकार वैशेषिक शास्त्र के सङ्केत सम्बन्ध से ' अर्थ ' शब्दवत्ता द्रव्यादि तीन पदार्थों में है ) अतः स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्व द्रव्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य है |
' धर्माधर्मकर्तृत्वच ' अर्थात् द्रव्यादि तीनों पदार्थों में धर्म और अधर्म्म दोनों की कारणता है , एक ही भूमि जब किसी को दी जाती है , तब वह धर्म का कारण होती है , वही भूमि जब किसी से छीनी जाती है , तब अधर्म का कारण होती है - इसी तरह कपिला गो का स्पर्श ( गुण ) धर्म का एवं मनुष्य की अस्थि का स्पर्श ( गुण ) अधर्म का कारण है । इसी प्रकार तीर्थगमन क्रिया से धर्म और मद्य बेचनेवाले के गृह में जाने की क्रिया से अधर्म होता है । इसी प्रकार और स्थलों में भी कल्पना करनी चाहिए । ' धर्माधर्मकर्तृत्वश्च ' इस वाक्य प्रयुक्त ' व ' प्रत्यय से द्रव्यादि तीनों वस्तुओं में धर्म और अधर्म के उत्पादन करने की अपनी शक्ति कही गई है । ( प्र ० ) ' जाति भी तो उन दोनों का कारण है ? ( उ ० ) जाति धर्म और अधर्म का कारण नहीं है , क्योंकि वह अपने आश्रय को विजातीय वस्तुओं से भिन्न समझाकर ही चरितार्थं हो जाती है , ( अर्थात् ) उक्त शब्द से धर्म और अधर्म का साक्षात् कारणत्व ही विवक्षित है , ( उक्त धर्माधर्म्म ) के तो ब्राह्मदि व्यक्ति ही कारण हैं । जाति का काम वहाँ इतना ही है कि ब्राह्मणादि से भिन्नजातीय व्यक्तियों से प्रकृत धम्मं और अधर्म की उत्पत्ति का प्रतिषेध करे , अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ४५) १. प्रश्न का अभिप्राय है कि द्रव्यादि तीनों पदार्थों की तरह जाति भी धर्म और अधर्म का कारण है , क्योंकि ब्राह्मणों के लिए विहित क्रिया के अनुष्ठान से क्षत्रि-
पृ. ४६
कार्य्यत्वानित्यत्वे कारणवतामेव ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कारणों से उत्पन्न पदार्थों के कार्यत्व और अनित्यत्व ये दो साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
कार्य्यत्वानित्यत्वे कारणवतामेव । येषां द्रव्यादीनामुत्पत्तिकारणमस्ति तेषां कार्य्यत्वमनित्यत्वञ्च धर्मो न सर्वेषामित्यर्थः । स्वकारणे समवायः , प्रागसतः सत्तासमवायो वा कार्यत्वमित्येके । तदयुक्तम् , प्रध्वंसे तदभावात् । तस्मात् कारणाधीनः स्वात्मलाभः काय्र्यत्वमिति लक्षणम् , व्यापकत्वात् । प्राक्प्रध्वंसाभावोपलक्षिता वस्तुनः सत्त्वानित्यत्वमिति केचित् । तदयुक्तम् , अप्रतीतेः । अनित्य इति विनाशीत्येवं लोकः प्रत्येति , न तु सत्ता- विशिष्टताम् । उत्पत्तिविनाशयोगित्वमित्यपरः । , प्रागभावे
तदप्यसारम् उत्पत्तेरभावात् , तस्याप्यनित्यत्वेन लोके सम्प्रतिपत्तेः । तस्मात् स्वरूपविनाश एवानित्यत्वमिति । यथोक्तम् - " अनित्यत्वं विनाशाख्यं क्रियासामान्ययमुच्यते " इति । यद्यपि विनाशो वस्तुकाले नास्ति , तथापि प्रमाणान्तरसिद्धसद्भावो भवत्येव विशेषणम् , अनित्यो घट इति प्रत्येतुरेकत्वात् । तथा लोके विनाशि शरीरमध्रुवा विषया इति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' कार्य्यत्वानित्यत्वे कारणवतामेव ' अभिप्राय यह है कि कारणों से जिन द्रव्यादि वस्तुओं की उत्पत्ति होती है : कारणत्व और अनित्यत्व उन्हीं पदार्थों के साधर्म्य हैं , सभी पदार्थों के नहीं । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) कारणों में कार्यों का समवाय ही उनका ' कार्यत्व ' है या पहिले से अविद्यमान कार्यों में ' सत्ता ' ( जाति ) का समवाय सम्बन्ध ही ' कार्यत्व ' है ।
( उ ० ) किन्तु ये दोनों ही पक्ष अयुक्त हैं , क्योंकि ध्वंसात्मक कार्य्यं में इन दोनों में से एक प्रकार का भी कार्यत्व नहीं है , अतः कार्यत्व लक्षण के सभी लक्ष्यों में रहने के कारण " कारणों से अपने स्वरूप का लाभ हो " काय्र्यत्व का लक्षण है । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) जिन वस्तुओं का कभी प्रागभाव रहे और कभी जिनका ध्वंस भी हो उनमें रहनेवाली ' सत्ता ' हो ' अनित्यत्व ' है । ( उ ० ) किन्तु यह असङ्गत है , क्योंकि अनित्यत्व की प्रतीति इस आकार को नहीं होती है ।
' अनित्यत्व ' शब्द से विनाशशीलत्व की ही प्रतीति होती है , किसी प्रकार की सत्ता की नहीं । ( प्र ० ) कोई कहते हैं कि उत्पत्ति और विनाश दोनों का सम्बन्ध ही ' अनित्यत्व ' है । ( उ ० ) किन्तु यह पक्ष भी ठीक नहीं है , क्योंकि प्रागभाव में अनित्यत्व की सार्वजनीन अबाधित प्रतीति होती है , किन्तु उसमें उत्पत्ति का सम्बन्ध नहीं है । अतः वस्तुओं के स्वरूप का नाश हो अनित्यत्व है । जैसा कहा भी है कि विनाश नाम की सामान्य क्रिया ही ' अनित्यत्व ' शब्द से कही जाती है ।
( प्र ० ) यद्यपि वस्तुओं की वर्तमान यादि को पुण्य नहीं होता , एवं ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध सुरापानादि से शूद्रादि को अधर्म नहीं होता , अतः यह कथन असङ्गत है कि उक्त धर्माधर्मकत्व केवल द्रव्यादि तीन के हो साधम्यं हैं । दशा में विनाश नहीं रहता है । ( उ ० ) तथापि जिसकी सत्ता प्रमाण सिद्ध से है , वह भी अवश्य विशेषण ही होता है । साधारण जनों को भी इस प्रकार की स्वारसिक प्रतीतियाँ होती हैं कि शरीर विनाशशील है , सभी वस्तु चिरकाल तक रहनेवाली नहीं हैं ।
पृ. ४७
कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डल्यादिभ्यः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पारिमाण्डत्य प्रभृति पदार्थों को छोड़कर और सभी पदार्थों का कारणत्व साधर्म्य है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डल्यादिभ्य इति । पारिमाण्डल्यमिति परमाणुपरिमाणम् , आदिशब्दाद् द्वयणुकपरिमाणम् , आकाशकालदिगात्मनां विभुत्वमन्त्यशब्दमनः परिमाणं परत्वापरत्वे द्विपृथक्त्वमत्यावयविपरिमाणञ्चेत्यादि ग्राह्यम् । एतानि परित्यज्यापरेषां द्रव्यादीनां त्रयाणां कारणत्वं समवाय्यसमवायिकारणत्वम् । यद्यपि द्रव्यस्य नासमवायिकारणत्वम् , न च समवायिकारणत्वं गुणकर्मणोः , तथापि निमित्तकारणविलक्षणतयेदं साधर्म्यमुक्तम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' पारिमाण्डल्य ' शब्द का अर्थ है परमाणुओं का परिमाण । ( पारिमाण्डल्यादि पद में प्रयुक्त ) ' आदि ' पद से आकाश काल , दिशा और आत्मा इन चार पदार्थों का ' विभुत्व ' अर्थात् परममहत्परिमाण अन्तिम शब्द मन का परिमाण तथा उसी का परत्व और अपरत्व , द्विपृथक्त्व , अन्त्यावयवी द्रव्य ( जो अवयवी किसी दूसरे अवयवी का अवयव न हो , जैसे घट ) का परिमाण , ये सभी अभिप्रेत हैं । इनसे भिन्न द्रव्यादि तीन पदार्थों का ' कारणत्व ' साधर्म्य है । यहाँ कारणत्व शब्द से समवायिकारणत्व और असमवायिकारणत्व हो इष्ट है । यद्यपि द्रव्यों में असमवायिकारणत्व नहीं है , एवं गुण और कर्म्म में समवायिकारणत्व नहीं है , किन्तु यहाँ ' क रणत्व ' शब्द से ' निमित्तकारणभिन्नकारणत्व ' रूप साधर्म्य ही विवक्षित है । ( यह साधर्म्य द्रव्यादि तीनों वस्तुओं में समान रूप से है ) ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ४७) १. पूर्वपक्षी का आशय है कि विनाश ही अगर अनित्यत्व हो तो ' घटोऽनित्यः ' इस प्रकार की विशिष्ट प्रमाबुद्धि नहीं होगी , क्योंकि विशिष्ट प्रमा के लिए विशेष्य में विशेषण का रहना आवश्यक है । जब तक घटरूप विशेष्य रहेगा , तब तक उसमें विनाशरूप अनित्यत्व नहीं रहे । और जब घट विनष्ट हो जाएगा , तब अनित्यत्वरूप विशेषण रहेगा कहाँ ? सुतरम् चूँकि विद्यमान वस्तु और विनाश दोनों परस्पर विरोधी हैं , अतः उनमें विशेष्यविशेषणभाव नहीं हो सकता ।
(पृ. ४७) २. इस समाधान ग्रन्थ का आशय है कि विशेष्यविशेषणभाव के लिए दोनों का एक समय में रहना आवश्यक नहीं है , केवल इतना ही आवश्यक है कि दोनों प्रमाणसिद्ध हों एवं परस्पर सम्बद्ध हों । इसका भी कोई बन्धन नहीं है कि वह सम्बन्ध आधाराघेयभाव का नियामक ही हो । अतः ' घटो विनष्ट : ' इत्यादि विशिष्ट प्रतीति के अनुरोध से घट और विनाश में भी प्रतियोगित्वादि सम्बन्ध की कल्पना करेंगे । अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
पृ. ४८
द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — नित्य द्रव्यों को छोड़कर और सभी पदार्थों का द्रव्य में आश्रित रहना साधर्म्य है |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति । नन्वाश्रितत्वं षण्णामित्युक्तं तेनेदं पुनरुक्तम् ? न पुनरुक्तम् , द्रव्योपलक्षितस्याश्रितत्वस्यात्र विवक्षितत्वादिति कश्चिद् । तदयुक्तम् , सामान्यादीनामपि द्रव्योपलक्षितस्याश्रितत्वस्य सम्भवान्नेदं द्रव्यादित्रयसाधर्म्यकथनं स्यात् । तस्मादित्थं व्याख्येयम् । अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति द्रव्यग्रहणमुपलक्षणम् , तद्वृत्तयोऽन्त्या विशेषास्तेऽपि गृह्यन्ते । नित्यद्रव्याणि तद्गतांश्च विशेषान् परित्यज्य द्रव्य एवाश्रितत्वं द्रव्यादीनां त्रयाणां साधम्र्म्यं नापरेषामित्यर्थः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — " द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः " । ( प्र ० ) पहिले कह चुके हैं कि आश्रितत्व ( नित्य द्रव्यों को छोड़कर ) छः पदार्थों का साधर्म्य है । फिर वही बात कहते हैं , अतः इसमें पुनरुक्ति दोष है । ( उ ० ) इस दोष का परिहार कोई इस प्रकार करते हैं कि पहिले केवल ' आश्रितत्व ' साधर्म्य का उल्लेख है , अब ' द्रव्यादि तत्व ' साधर्म्य कहते हैं । दोनों में कुछ अन्तर अवश्य है , अतः पुनरुक्ति दोष नहीं है । किन्तु यह समाधान ठीक नहीं है , क्योंकि यह द्रव्यादि तीन वस्तुओं के साधर्म्य का प्रकरण है , अतः द्रव्याश्रितत्व रूप प्रकृत साधर्म्यं सामान्यादि पदार्थों में अतिप्रसक्त होगा , इसलिए प्रकृत पक्ति की व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिए कि प्रकृत " अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः " इस वाक्य में प्रयुक्त द्रव्य ' पद उपलक्षण है ( ' द्रव्याश्रितत्व ' शब्द का अर्थ है , द्रव्यरूप समवायिकारण से उत्पन्न होना , तीन वस्तुओं का ( फलतः अनित्य द्रव्य , अनित्य गुण इन तीन वस्तुओं का ) तदनुसार ) नित्य द्रव्य और उनमें रहनेवाले ' विशेष ' अर्थात् नित्य गुणों को छोड़कर द्रव्यादि
और कर्म्म ' द्रव्याश्रितत्व ' अर्थात् द्रव्यरूप समवायिकारण से उत्पन्न होना साधर्म्य है , औरो का नहीं ।
पृ. ४९
सामान्यादीनां त्रयाणां स्वात्मसचं बुद्धिलक्षणत्वमकार्यत्वमकारणत्वमसामान्य विशेषवत्त्वं नित्यत्वमर्थशब्दानभिधेयत्वञ्श्चेति
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सामान्य प्रभृति तीन पदार्थों का अर्थात् सामान्य , विशेष , और समवाय इन तीन पदार्थों का ' स्वात्मसत्त्व ' अर्थात् सत्ता जाति के बिना सत्ता , बुद्धिलक्षणत्व , अकार्य्यत्व , अकारणत्व , असामान्यविशेषवत्त्व , नित्यत्व और ' अर्थ ' शब्द IT अभिधेय न होना ये सात साधर्म्य हैं |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
सम्प्रति सामान्यादीनां साधर्म्यमाह - सामान्यादीनामिति । स्वात्मैव सत्त्वं स्वरूपं यत्सामान्यादीनां तदेव तेषां सत्त्वम् , न सत्तायोगः सत्त्वम् । एतेन सामान्यादीनां त्रयाणां सामान्यरहितत्वं साधर्म्यमुक्तमित्यर्थः । कथमेतत् ? बाधकसद्भावात् , सामान्ये सत्ता नास्ति , अनिष्टप्रसङ्गात् । विशेषेष्वपि सामान्यसद्भावे संशयस्यापि सम्भवात् । निर्णयार्थं विशेषानुसरणेऽप्यनवस्थैव । समवायेऽपि सत्ताभ्युपगमे तद्वृत्त्यर्थं समवायाभ्युपगमादनिष्टापत्तिरेव दूषणम् । गोत्वादिष्वपरजातिमत्त्वेन व्याप्तस्य सत्तासम्बन्धस्य तन्निवृत्तौ निवृत्तिसिद्धिः । कुतस्तहि सामान्यादिषु सत्सदित्यनुगमः ? स्वरूप सत्त्वसाधर्म्येण सत्ताध्यारोपात् । तहि मिथ्याप्रत्ययोऽयम् ? को नामाह नेति । भिन्नस्वभावेष्वेकानुगमो मिथ्यैव , स्वरूपग्रहणन्तु न मृषा , स्वरूपस्य यथार्थत्वात् । द्रव्यादिष्वपि सत्ताध्यारोपकृत एवास्तु प्रत्ययानुगमः ? नैवम् सति मुख्येऽध्यारोपस्यासम्भवात् । न चेयं सामान्यादिष्वेव मुख्या , बाधकसम्भवाद् द्रव्यादिषु च तदभावात् ।
बुद्धिलक्षणत्वमिति । बुद्धिरेव लक्षणं प्रमाणं येषां ते बुद्धिलक्षणाः , विप्रतिपन्नसामान्यादिसद्भावे बुद्धिरेव लक्षणं नान्यत् , द्रव्यादिसद्भावे त्वन्यदपि तत्काय्यं प्रमाणं स्यादित्यर्थः । कश्चित् पुनरेवमाह - बुद्ध्या लक्ष्यन्ते प्रतीयन्त इति बुद्धिलक्षणाः । तदयुक्तम् , द्रव्यादेरपि स्वबुद्धिलक्षणत्वान्नेदं वैधर्म्यमुक्तं स्यात् ।
अकार्यत्वं कारणानपेक्षस्वभावत्वम् , तच्च सामान्ये तावद् व्यक्तेः पूर्वमूर्ध्वं व्यक्तिकाले चावस्थितिग्राहकेण कारणाभावोपलब्धिसहकारिणा भूयो - दर्शनजसंस्कारानुगृहीतेन प्रत्यक्षेणैव व्याप्तिवद् गृह्यते । समवायस्याप्य कार्य्य त्वं पूर्वापरसहभावानवक्लृप्तेः , यदि हि पटस्य समवायः पटात् पूर्वं सम्भवति , असति सम्बन्धिनि कस्यासौ सम्बन्धः स्याद् | अथ पटेन सहोत्पद्यते , तदा पटस्यानाधारत्वं प्राप्नोति । अथ पश्चाद्भवति , तथापि पटस्यानाधारत्वमेव न च कार्यत्वमनाधारं युक्तम् , तस्मादकृतकः समवायः | विशेषाणाञ्चाकाय्र्यत्वं वस्तुत्वे सति द्रव्यगुणकर्मान्यत्वात् सामान्यसमवायवत् सिद्धम् ।
अकारणत्वं - समवाय्यसमवायिकारणत्वाभावः , न तु निमित्तकारणत्वप्रतिषेधः , बुद्धिनिमित्तत्वाभ्युपगमाद् । असामान्यविशेषवत्त्वम् अपरजातिरहितत्वमित्यर्थः । सामान्येषु सामान्यनाम नापरं सामान्यमस्ति , अत्रापि सामान्यप्राप्त्याऽनवस्थानात् । विशेषसमवाययोस्तु सामान्याभावे कथित एव
इदानी द्रव्याणामेव साधर्म्य निरूपयति - पृथिव्यादीनामिति । पृथिव्यादीनामेव द्रव्यत्वेन सामान्येन योग : सम्बन्धः । स कियतामत आह-नवानामपीति । अपिशब्दोऽभिव्याप्त्यर्थः । एतेन द्रव्यपदार्थस्येतरेभ्यो भेदलक्षणमुक्तम् । द्रव्यशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तश्व चिन्तितम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — द्रव्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कहकर अब ' सामान्यादीनाम् ' इत्यादि से सामान्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्यं कहते हैं । अर्थात् सामान्यादि का ' आत्मा ' अर्थात् स्वरूप ही ' सत्त्व ' है । ( द्रव्यादि तीनों की तरह ) सत्ता जाति का सम्बन्ध उनकी ' सत्ता ' नहीं है । इससे सत्ता जाति से रहित होना सामान्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कथित होता है | ( प्र ० ) सामान्यादि में सत्ता क्यों नहीं है ?
( उ ० ) सामान्यादि तीन पदार्थों में सत्ता मानने में यह बाधा है कि इससे ' अनवस्था ' होगी । विशेषों में भी अगर सामान्य की सत्ता मानें तो वहाँ संशय हो सकता है कि ये विशेष एकजातीय हैं या विभिन्न जातीय ? और तब फिर सभी नित्य द्रव्यों में यह संशय होगा । निश्चय करने के लिए अगर और विशेष निश्चयों के पीछे दौड़ेंगे तो अनवस्था होगी । समवाय में अगर सत्ता जाति मानेंगे तो उसके सम्बन्ध के लिये दूसरे समवाय की कल्पना करनी पड़ेगी । इस प्रकार इसमें भी अनवस्था होगी ।
और भी बात है , जहाँ जहाँ सत्ता जाति रहती है , उन सभी स्थानों में गोत्वादि अपर जातियों में से भी कोई जाति अवश्य ही रहती है । सत्ता और गोवादि अपर जातियों की यह व्याप्ति गोप्रभृति वस्तुओं में सिद्ध है । सामान्यादि में कोई भी अपरजाति नहीं है अतः सत्ता जाति भी उनमें नहीं है । ( प्र ० ) फिर सामान्यादि में ' ये सत् हैं ' इस प्रकार की प्रतीति क्यों होती है ? ( उ ० ) सामान्यादि में रहनेवाली ' स्वरूपसत्ता ' और सत्ता जाति इन दोनों के सादृश्य से सामान्यादि पदार्थों में सत्ता जाति का आरोप
७ होता है । इसी आरोप से सामान्यादि पदार्थों में भी एक प्रकार की सत् है ' इस आकार की प्रतीति होती है । ( प्र ० ) तो फिर सामान्यादि में उक्त एक आकार की सत्त्व की प्रतीति भ्रमरूप है ? ( उ ० ) कौन कहता है कि भ्रम रूप नहीं है ? भिन्न स्वभाव की वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति अवश्य ही भ्रम है । किन्तु उनके स्वरूपों का ज्ञान यथार्थ ही है , क्योंकि वे उनमें ठीक ही हैं । ( प्र ० ) फिर द्रव्यादि तीनों पदार्थों में भी ( सामान्यादि की तरह ) स्वरूपसत्व के आरोप से सत्ता की एक आकार की प्रतीति को भी मिथ्या क्यों नहीं मान लेते ? ( उ ० ) इस लिए कि मुख्य प्रतीति के सम्भव होने पर आरोप मानना अनुचित है । यह भी सम्भव नहीं है कि सामान्यादि में ही सत्त्व को एक आकार की प्रतीति को ही मुख्य मान लें , क्योंकि ऐसा मानने में अनवस्था आ जाती है । द्रव्यादि तीनों पदार्थों में सत्त्व की एक आकार की प्रतीति को मुख्य मानने में इस प्रकार की कोई बाधा नहीं है ।
' बुद्धिलक्षणत्वम् ' , " बुद्धिरेव लक्षणं प्रमाणं येषां ते बुद्धिलक्षणा : " इस व्युत्पत्ति के अनुसार बुद्धि ही जिनका प्रमाण है , वे ही बुद्धिलक्षण कहे जाते हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवालों को द्रव्यादि के कर्यों से भी समझाया जा सकता है । किन्तु सामान्यादि के प्रसङ्ग में विरुद्धमत रखनेवालों को समझाने के लिए बुद्धि ही एक अवलम्ब है । ( प्र ० ) किसी सम्प्रदाय के व्यक्ति ' बुद्धधा लक्ष्यन्ते प्रतीयन्ते इति बुद्धिलक्षणा : " इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत बुद्धिलक्षण ' शब्द की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि " जो बुद्धि से ही प्रतीत हों वे ही बुद्धिलक्षण हैं " । ( उ ० ) किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार का बुद्धिलक्षणत्व तो द्रव्यादि में भी है , फिर यह ' बुद्धिलक्षणत्व ' रूप सामान्यादि तीन पदार्थों के साधर्म्य को द्रव्यादि पदार्थों का वैधर्म्य कहना सम्भव न होगा ? ।
अकार्यत्व शब्द का अर्थ है अपनी ( स्वरूप ) सत्ता के लिए कारणों की अपेक्षा न रखना । सामान्यादि के आश्रय द्रव्यादि व्यक्तियों में तीनों कालों में हो सामान्य की सत्ता के ज्ञापक एवं सामान्यादि के कारणों के अभावज्ञान का सहायक तथा बार बार के देखने से उत्पन्न संस्कार के द्वारा विशेष बलप्राप्त प्रत्यक्ष के द्वारा ही व्याप्ति की तरह इस अकार्यत्व का ज्ञान होता है । समवाय में भी अकार्यत्व है ही , क्योंकि समवाय को कार्य मानने की कोई रीति उपपन्न नहीं होती है ।
समवाय को अगर कार्य मानें तो फिर उसकी किया है । वैषम्यनिरूपण के लिए साधम्र्म्यनिरूपण के अन्त में लिखा है कि " एवं सर्वत्र साधर्म्य विपर्ययाच्च वैधर्म्यम् ” अर्थात् इस प्रकार ये साधर्म्य हैं और ( ये हो साधम्र्म्य ) उनसे भिन्न वस्तुओं में न रहने के कारण उनके वैधर्म्य हैं । तदनुसार ' सामान्यादीनाम् " इत्यादि प्रकृत पक्ति का एक यह भी अर्थ मानना पड़ेगा कि ' ये सभी स्वात्मसत्त्वादि तीन पदार्थों से भिन्न पदार्थों के वैधर्म्य भी हैं ।
अगर बुद्धिलक्षणत्व शब्द को ऐसी व्याख्या करें जिसके अनुसार यह द्रव्यादि में भी रह सके तो फिर प्रकृत पक्ति से उक्त वैधर्म्य का आक्षेप सम्भव न हो सकेगा । निम्नलिखित तीन ही गति हो सकती है कि ( १ ) समवाय अपने पटादिरूप प्रतियोगी से पूर्व ही उत्पन्न हो , या ( २ ) अपने प्रतियोगी से पीछे उत्पन्न हो ( ३ ) अथवा प्रतियोगी के साथ ही उत्पन्न हो । किन्तु इनमें से कोई भी प्रकार सम्भव नहीं है , ( १ ) क्योंकि सम्बन्ध बिना प्रतियोगी के नहीं होता है ।
अगर समवाय की उत्पत्ति से पूर्व पट को सत्ता नहीं रहेगी तो फिर पट से पूर्व उत्पन्न वह समवाय किसका सम्बन्ध होगा ? अतः समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के पहिले उत्पन्न नहीं हो सकता । ( २ ) समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के साथ साथ भी उत्पन्न नहीं हो सकता है , क्योंकि इससे पटादि कार्य समवाय के आधार ही नहीं हो सकते , क्योंकि आधार को आधेय से पूर्व रहना आवश्यक है । सुतरामु एक ही क्षण में उत्पन्न दो वस्तुओं में आधाराधेयभाव असम्भव है ।
( ३ ) समवाय की उत्पत्ति अगर पटादि कार्यों की उत्पत्ति के बाद मानें फिर भी पटादि की अनाधार उत्पत्ति की आपत्ति रहेगी , क्योंकि पट की उत्पत्ति के समय अगर समवाय ही नहीं है तो फिर तन्तु में किस सम्बन्ध से पट की उत्पत्ति होगी ? अतः समवाय अकार्य ही है । वह कारणों से उत्पन्न नहीं होता है । विशेष भी कार्य नहीं है , क्योंकि द्रव्य , गुण और कर्म्म इन तीनों से भिन्न होने पर भी वह भाव पदार्थ है , जैसे कि सामान्य और समवाय ।
यहाँ अकारणत्व ' शब्द से समवायिकारणत्व और असमवायिकारणत्व इन दोनों का ही निषेध इष्ट है , निमित्तकारणत्व का नहीं , क्योंकि सामान्यादि में भी बुद्धि की निमित्तकारणता स्वीकृत है । ' असामान्यविशेषवत्त्व ' शब्द का अर्थ है अपरजातियों का न रहना । सामान्यों में सामान्यत्व नाम का कोई अपर सामान्य नहीं है , क्योंकि इससे अनवस्था होगी । समवायों और विशेषों में सामान्य के न रहने की युक्ति दिखला न्यायः । कथं तहि सामान्येषु प्रत्ययानुवृत्ति : सामान्यं सामान्यमिति ?
अनेकव्यक्तिसमवायोपाधिवशाद् विशेषेष्वप्येकशब्दप्रवृत्तिः , अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिजनकत्वस्य सर्वत्र सम्भवात् । नित्यत्वं विनाशरहितत्वम् , तदपि सामान्यस्य व्यक्त्युत्पादविनाशयोरवस्थितिग्राहिणा भूयो भूयः प्रवृत्तेन निरुपाधिप्रत्यक्षेण व्याप्तिवन्निश्चीयते । समवायस्य तु सर्वत्र कार्य्योपलम्भादकृतकत्वाच्चानुमीयते । अर्थशब्दानभिधेयत्वञ्चेति । स्वसमयार्थशब्दानभिधेयत्वं चैतेषां साधर्म्यम् । चः समुच्चये । चुके हैं ।
( प्र ० ) फिर सभी सामान्यों में ' ये सामान्य हैं ' इस एक आकार की प्रतीति ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) क्यों होती हैं ? ( उ ० ) सभी सामान्य अनेक व्यक्तियों में रहते हैं , अतः यह " अनेक व्यक्तियों में रहना या अनेक व्यक्तिवृत्तित्व " रूप एक उपाधि सभी सामान्यों में है । इसी अनेक व्यक्तिवृत्तित्व - रूप उपाधि के कारण सभी सामान्यों में उक्त एक आकार की प्रतीति होती है । सभी विशेषों में भी ' ये विशेष हैं ' इस एक आकार की प्रतीति होती है ।
इसके लिए भी विशेषत्व नाम के सामान्य का मानना आवश्यक नहीं है । क्योंकि सभी विशेषों में जो अपने अपने आश्रय को विभिन्न पदार्थों से विलक्षण रूप से समझाने की क्षमता है , उसी क्षमता रूप एक उपाधि के बल से ही उक्त एकाकार की प्रतीति को उपपत्ति हो जाएगी । ' नित्यत्व ' शब्द का अर्थ है विनाश रहित होना । यह ( नित्यस्व ) भी व्यक्तियों की उत्पत्ति से पहिले और उनके नाश के बाद भी सामान्यों के वर्तमानता का ज्ञापक उनमें बार - बार प्रवृत्त प्रत्यक्ष प्रमाण से ही व्याप्ति की तरह ज्ञात होता है ।
समवाय से सभी स्थलों में ( सभी कालों में ) कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है , एवं समवाय किसी भी कारण से उत्पन्न हुआ नहीं दीखता है । इन्हीं दोनों हेतुओं से समवाय में नित्यत्व का अनुमान होता है । ' अर्थशब्दानभिधेयत्वश्व ' अर्थात् वैशेषिक शास्त्र में बिना विशेषण के केवल ' अर्थ ' शब्द से द्रव्य , गुण , कर्म इन तीनों के ही समकने का एक सङ्केत है । तदनुसार उक्त ' अर्थ ' शब्द का अभिधावृत्ति द्वारा न समझा जाना भी सामान्यादि तीनों का साधर्म्य है । ' च ' शब्द समुच्चय अर्थ का बोधक है ।
' पृथिव्यादीनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से अब केवल नौ द्रव्यों का ही साधर्म्यं कहते हैं । पृथिवी प्रभृति नो द्रव्यों का ही द्रव्यत्व जाति के साथ योग ' अर्थात् सम्बन्ध है । द्रव्यत्व जाति का यह सम्बन्ध पृथिव्यादि कितने द्रव्यों के साथ है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' नवानाम् ' इस पद से दिया है । ' नवानामपि ' इस वाक्य के ' अपि ' शब्द का अर्थ है ( सभी द्रव्यों में सम्बन्ध रूप ) ' अभिव्याप्ति ' । अर्थात् पृथिव्यादि नौ द्रव्यों में से किसी को न छोड़कर सभी द्रव्यों में रहना । इस अभिव्याप्ति से द्रव्य पदार्थ को गुणादि पदार्थों से भिन्न समझानेवाला स्वरूप कहा गया है । इससे ' द्रव्य ' शब्द का ' प्रवृत्तिनिमित्त ' भी निद्दिष्ट हो जाता है ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ५०) १. अभिप्राय यह है कि ग्रन्थ के आदि में पदार्थ एवं उनके साधर्म्यवैधर्म्य के निरूपण को प्रतिज्ञा कर चुके हैं । उसके बाद पदार्थ एवं उनके साधयों का विस्तार से निरूपण
(पृ. ५१) १. अभिप्राय यह है कि एक घट व्यक्ति की उत्पत्ति के पहिले भी उससे पहिले के घट में घटत्व की प्रतीति होती है । एवं एक घट व्यक्ति के नष्ट हो जानेपर भी दूसरे अविनष्ट घट में घटत्व की प्रतीति होती है । वर्त्तमान घट में घटत्व की प्रतीति में तो कोई विवाद ही नहीं है , अतः यह समझते हैं कि व्यक्ति के तीनों कालों में ही जाति की सत्ता रहती है । ऐसी स्थिति में सामान्य को अगर किसी कारण का कार्य माने तो वह कारण उसके आश्रयीभूत व्यक्तियों के कारणों में से ही होगा या उसके सदृश ही कोई दूसरा होगा , किन्तु किसी भी प्रकार से सामान्य में कार्यत्व मान लेने से उसकी उक्त त्रैकालिक प्रतीति को उपपत्ति नहीं होगी , अतः उक्त त्रैकालिक प्रतोति के कारणभूत प्रमाणों से ही यह भी समझते हैं कि सामान्यादि का कोई कारण नहीं है , अतः जिस प्रकार धूम और वह्नि के सामानाधिकरण्य के सूयोदर्शनजनितसंस्कार से युक्त पुरुष को घूम को देखते हो उसकी व्याप्ति भी दीखती है , उसी प्रकार व्यक्तियों में सामान्य का प्रत्यक्ष होते ही उसी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसमें रहनेवाले अकार्यस्व का भी ज्ञान हो जाता है ।
(पृ. ५२) १. जातियों में जातित्व नाम का सामान्य मानने में अनवस्था इस प्रकार होती है कि द्रव्यत्व गुणत्वादि जितने सामान्य पहिले से स्वीकृत हैं उन सभी सामान्यों में जातित्व या सामान्यत्व नाम का एक और सामान्य मानना पड़ेगा , किन्तु यह ' सामान्यत्व ' भी सामान्य ही होगा । यह सामान्यत्व - रूप सामान्य - द्रव्यत्वादि पहिले से स्वीकृत सामान्यों में तो रहेगा , किन्तु स्वाभिन्न सामान्यत्व - रूप सामान्य में न रहेगा , क्योंकि एक वस्तु में आधाराधेयभाव असम्भव है , अतः पूर्व स्वीकृत द्रव्यत्वादि सामान्य एवं अधुना स्वीकृत सामान्यत्व - रूप सामान्य एतत्साधारण एक दूसरे सामान्यत्व की कल्पना करनी पड़ेगी । इस प्रकार अनन्त सामान्यत्वों को कभी समाप्त न होनेवाली कल्पना की धारा चलेगी । यही अनवस्था है ।
पृ. ५४
पृथिव्यादीनां नवानामपि द्रव्यत्वयोगः स्वात्मन्यारम्भकत्वं गुणवत्वं कार्यकारणाविरोधित्व मन्त्य विशेषवश्वम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — द्रव्यत्व जाति का सम्बन्ध , अपने में समवाय सम्बन्ध से कार्य को उत्पन्न करना , गुणवत्त्व , अपने कार्यों से या कारणों से विनष्ट न होना एवं अन्त्यविशेष ये पाँच साधर्म्य पृथिवी प्रभृति नौ द्रव्यों के हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अत्र कश्चित् चोदयति- द्रव्यत्वयोगो द्रव्यत्वसमवायः , स च पश्वपदार्थधर्मत्वात् कथं द्रव्यलक्षणमिति । अपरः समाधत्ते -- यद्यपि सर्वत्राभिन्नः समवायः , तथापि द्रव्यत्वोपलक्षणभेदाद् द्रव्यस्य लक्षणम् , दृष्टो हि कल्पितभेदस्याप्याकाशस्य श्रोत्रभावेनार्थक्रियाभेद इति । द्वयमप्येतदसाधीय :, यथाकाशं श्रोत्रं नैवं योगो द्रव्यस्य लक्षणम् , किन्तु द्रव्यत्वमेव तत्त्वसम्बद्धं लक्षणं न स्यादिति योगसङ्कीर्त्तनं लिङ्गस्य धर्मिण्यस्तित्वकथनम् । तथा चैवं प्रयोग : -- पृथिव्यादिकमितरेभ्यो भिद्यते द्रव्यत्वात् , येषामितरेभ्यो भेदो नास्ति तेषां द्रव्यत्वमपि नास्ति , यथा रूपादीनामिति । तस्मादसच्चोद्यमसदुत्तरश्व ।
अन्यदपि द्रव्याणां साधर्म्यमाह - स्वात्मन्यारम्भकत्वमिति , स्वसमवेतकार्य्यजनकत्वमित्यर्थः । गुणवत्त्वं गुणैः सह सम्बन्धः । एतदप्युभयं गुणादिभ्यो द्रव्याणां वैधर्म्यमन्यत्रासम्भवात् । कार्यकारणाविरोधित्वम् । गुणो हि क्वचित् कार्येण विनाश्यते , यथा आद्यः शब्दो द्वितीयशब्देन । क्वचित् कारणेन विनाश्यते , यथा अन्त्यः शब्द उपान्त्यशब्देन । कर्मापि कार्येण विनाश्यते , यथोत्तरसंयोगेन । द्रव्याणि तु न कार्येण विनाश्यन्ते नापि कारणेनेति कार्यकारणाविरोधीनि । नित्यानां कारणविनाशयोरभावादेव कारणेनाविनाशः , अनित्यद्रव्याणां कारणविनाशयोः सम्भवेऽपि कारणेन न विनाशः , किन्त्वन्येनेति विवेकः । तथा अन्त्यविशेषवत्त्वमन्त्यविशेषयो गत्वमित्यर्थः ' ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इस प्रसङ्ग में कोई आक्षेप करते हैं कि प्रकृत ' द्रव्यत्वयोग ' शब्द का अर्थ है द्रव्यत्व का समवाय , वह द्रव्य से विशेष पर्यन्त पाँचों पदार्थों में समान रूप से है । फिर यह ' द्रव्यवयोग ' पृथिव्यादि नौ पदार्थों का हो ' साधर्म्य ' कैसे है ? इस आक्षेप का समाधान कोई इस प्रकार कहते हैं कि यह ठीक है कि ( समवाय एक होने के कारण ) सभी स्थलों में एक ही है , किन्तु द्रव्यत्व रूप उपलक्षण ( प्रतियोगी ) के भेद से वह केवल द्रव्यों का ही लक्षण हो सकता है ।
एक हो वस्तु में उपलक्षण के भेद से विभिन्न कार्यों के सम्पादन की क्षमता देखी जाती है . जैसे एक ही आकाश के सर्वत्र रहने पर भी कर्णशष्कुली रूप उपाधि से श्रोत्र भावापन्न आकाश से ही शब्दश्रवण रूप कार्य्य होता है । किन्तु उक्त आक्षेप और उसका यह समाधान दोनों ही असङ्गत हैं , क्योंकि जिस प्रकार आकाश ही श्रोत्र है उसी प्रकार प्रकृत में ' योग ' अर्थात् द्रव्यत्व का समवाय रूप सम्बन्ध ही द्रव्यों का साधर्म्य या लक्षण नहीं है , किन्तु द्रव्यत्व ही द्रव्यों का लक्षण है ।
यह द्रव्यत्व बिना किसी असाधारण सम्बन्ध के लक्षण नहीं हो सकता , अतः ' योग ' शब्द का उल्लेख है । अर्थात् इस ' योग ' शब्द से ( इतरभेदानुमिति के पक्ष रूप ) धम्र्मी में ( उस अनुमिति के लक्षण रूप ) हेतु का अस्तित्व दिखलाया गया है । इससे अनुमान का यह रूप फलित होता है कि पृथिव्यादि नौ पदार्थ गृणादि और पदार्थों से भिन्न हैं , क्योंकि इनमें द्रव्यत्व है । जिनमें यह इतरभेद नहीं है , उनमें द्रव्यत्व भी नहीं है । अतः उक्त आक्षेप और उसका समाधान दोनों
अशुद्ध हैं ।
' सात्मन्यारम्भकत्वम् ' इत्यादि से द्रव्यों का और भी साधर्म्य कहते हैं , अर्थात् अपने में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले कार्यों का कारणत्व भी द्रव्यों का साधर्म्य है । ' गुणवत्त्व ' शब्द का अर्थ है गुण के साथ सम्बन्ध , ये दोनों ही गुणादि पदार्थों से द्रव्यों में असाधारण्य के सम्पादक हैं , क्योंकि द्रव्य से भिन्न किसी भी पदार्थ में इन दोनों की सम्भावना नहीं है । “ कार्य्यकारणाविरोधित्त्रम् " गुण कहीं अपने कार्य्यं से ही नष्ट होता है , जैसे कि पहिला शब्द दूसरे शब्द से , कहीं वह अपने कारण से भी नष्ट होता है , जैसे कि अन्तिम शब्द अपने अव्यवहितपूर्व के शब्द से । क्रिया भी अपने कार्य से नष्ट होती है , जैसे कि उत्तर देश के संयोग से ; द्रव्य न अपने कार्यों से नष्ट होते हैं , न कारणों से ही , अतः द्रव्य कार्य और कारण दोनों के अविरोधी हैं । नित्य द्रव्यों का न कोई कारण हैं , न उनका विनाश ही होता है , अतः उनका विनाश कार्य और कारण किसी से भी नहीं होता है । अनित्य द्रव्यों का विनाश भी होता है , एवं उनके कारण भी होते हैं , किन्तु उनका विनाश अपने कारणों से नहीं होता है , अन्य वस्तुओं से होता है । इसी प्रकार ' अन्त्यविशेष ' शब्द का अर्थ है अन्त्यविशेष का सम्बन्ध |
पृ. ५६
अनाश्रितत्वनित्यत्वे चान्यत्रावयविद्रव्येभ्यः ।
पृथिव्युदकज्वलन पवनात्ममनसामनेकत्वापर जातिमन्वे ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — क्षितिजलज्योतिरनिलमनसां क्रियावश्व मूर्त्तत्वपरत्वापरत्व-
अवयवी द्रव्यों को छोड़कर और सभी द्रव्यों के अनाश्रितत्व और नित्यत्व ये दो साधर्म्य हैं |
पृथिवी , जल , तेज , वायु , आत्मा और मन इन छः द्रव्यों के अनेकत्व और अपरजातिमत्त्व ये दो साधर्म्य हैं ।
पृथ्वी , जल , तेज , वायु और मन इन पाँच द्रव्यों के क्रिया , मूर्त्तत्व ,
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अनाश्रितत्वं क्वचिदप्यसमवेतत्वम् , नित्यत्वं विनाशरहितत्वश्व द्रव्याणां साधर्म्यम् । तत् किं सर्वेषां साधर्म्यमित्यत आह - अवयविद्रव्येभ्योऽन्यत्रेति । अवयविद्रव्याणि परित्यज्यान्त्यविशेषवत्त्वाना श्रितत्व नित्यत्वान्यन्यत्र सन्तीत्यर्थः । न केवलं पूर्वोक्ताः पृथिव्यादीनां धर्माः , किन्त्वनाश्रितत्वनित्यत्वे चेति चार्थः ।
द्रव्याणामेव परस्परसाधर्म्य वैधर्म्यश्व प्रतिपादयन्नाह —— पृथिव्युदकज्वलनपवनात्ममनसामिति । अनेकत्वं प्रत्येकं व्यक्तिभेदः । अपरजातिमत्त्वमिति पृथिवीत्वादिजातिसम्बन्धित्वम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — कभी भी समवाय सम्बन्ध से न रहना ही ' अनाश्रितत्व ' शब्द का अर्थ है । ' नित्यत्व ' शब्द का अर्थ है नाश को प्राप्त न होना , अनाश्रितत्व और नित्यत्व ये दोनों ही द्रव्य के साधर्म्य हैं । ये दोनों क्या सभी द्रव्यों के साधर्म्य हैं ? इसी प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि " अवयविद्रव्येभ्योऽन्यत्र " अर्थात् अवयविद्रव्यों को छोड़कर और सभी द्रव्यों में अन्त्य विशेष , अनाश्रितत्व और अनित्यत्व ये तीनों रहते हैं । ' च ' शब्द से यह अभिप्रेत है कि पृथिवी प्रभृति द्रव्यों के पहिले कहे हुए साधम्यं ही नहीं है किन्तु प्रकृत अनाश्रितत्व और नित्यत्व भी उनके साधर्म्य हैं ।
पृथिव्यादि द्रव्यों में ही परस्पर साधम्यं और वैधर्म्य का निरूपण करते हुए “ पृथिव्युदकज्वलन मनसाम् " इत्यादि सन्दर्भ कहते हैं । प्रत्येक व्यक्ति में परस्पर भेद ही ' अनेकत्व ' शब्द का अर्थ है । ' अपरजातिमत्त्व ' शब्द से पृथिवीत्वादि जातियों को अधिकरणता अभिप्रेत है ।
पृ. ५७
araafa |
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परत्व , अपरत्व और वेगवत्त्व ये पाँच साधर्म्य हैं |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
क्षितिजलज्योतिरनिलमनसां क्रियावत्त्वमूर्त्तत्वपरत्वापरत्ववेगवत्त्वानीति | क्रियावत्त्वमुत्क्षेपणादिक्रियायोगः । मूर्त्तत्वमवच्छिन्नपरिमाणयोगित्त्वम् । परत्वापरत्ववेगवत्त्वानि परत्वापरत्ववेगसमवायः ।
संयुक्त संयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वयोरेव परापरव्यवहारहेतुत्वात् परत्वापरत्वे नस्त इति केचित् न , भिन्नदिक्सम्बन्धिनो : सत्यपि संयुक्तसंयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वसद्भावे सत्यपि च द्रष्टुः शरीरापेक्षया सन्निकृष्ट विप्रकृष्टबुद्धयोरुत्पादे परापरप्रत्ययाभावात् । एकस्यां दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोस्तथा प्रत्यय इति चेत् ? अस्ति तहि संयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वाभ्यां विषयान्तरम् , विषयवैलक्षण्यमन्तरेण विलक्षणाया बुद्धेरनुत्पादात् । वेगोऽपि गुणान्तरम् , न क्रियासन्ततिमात्रम् , मन्दगतौ वेगप्रतीत्यभावात् । क्रियाक्षणानामाशूत्पादनिमित्तो वेगव्यवहार इति चेत् ? न , अलातचक्रादिषु क्रियाक्षणानां निरन्तरोत्पादव्ययवतां प्रत्येकमन्तराग्रहणेनाशुत्पादस्य प्रत्यक्षेणाप्रतीतेः , वेगप्रत्ययस्य च भावात् । व्यक्ता च लोके क्रियावेगयोर्भेदावगतिः , वेगेन गच्छतीति प्रतीतेः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — क्रिया , मूर्त्तत्व , परत्व , अपरत्व , और वेग ये पाँच पृथिवी . जल , तेज , वायु और मन इन पाँच द्रव्यों के साधर्म्य हैं । ' क्रियावत्त्व ' शब्द का अर्थ है उत्क्षेपणादि क्रियाओं का सम्बन्ध । मूर्त्तत्व शब्द का अर्थ है किसी अल्प परिमाण का सम्बन्ध | परत्व , अपरत्व और वेग इन तीनों का समवाय ही परत्वापरत्ववेगवत्व ' शब्द का अर्थ है ।
( प्र ० ) कुछ आचार्यों का कहना है कि परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुण नहीं हैं । पाटलिपुत्र से काशी की अपेक्षा प्रयाग ' पर ' ( दूर ) है , एवं पाटलिपुत्र से प्रयाग की अपेक्षा काशी ' अपर ' ( समीप ) है , इसी प्रकार की प्रतीतियों से तो देशिक परत्व और अपरत्व स्वीकार किये जाते हैं । किन्तु यह ' परत्व ' और ' अपरत्व ' दूरस्व और समीपत्व को छोड़कर और कुछ नहीं है ।
एवं परत्व और अपरत्व इन प्रतीतियों से भी स्वीकार किये जाते हैं कि देवदत्त यज्ञदत्त से ' पर ' है , एवं यज्ञदत्त देव दत्त से ' अपर ' है , यह ( कालकृत ) परत्व और अपरत्व ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व के ही दूसरे नाम हैं । किन्तु इन व्यवहारों के लिए परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुणों की कल्पना व्यर्थ है , क्योंकि दूरत्व और समीपत्व रूप परत्व और अपरत्व के व्यवहार का नियामक देश के साथ संयोग की अधिकता और न्यूनता ही है ।
यह स्वीकार करना हो होगा कि पाटलिपुत्र से काशी में जितने दिग्देशों का सम्बन्ध है उससे प्रयाग में अधिक है । एवं पाटलिपुत्र से प्रयाग में जितने दिग्देशों का संयोग है उससे काशी में अल्प है । इसी प्रकार ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व रूप परत्व एवं अपरत्व का व्यवहार भी सूर्य की अधिक क्रिया से युक्त काल के सम्बन्ध और सूर्य की अल्प क्रिया से युक्त काल के सम्बन्ध से ही होता है । सुतराम् सूर्यक्रियाओं की अधिकता और अल्पता से ही ( कालिक ) परत्वापरत्व के व्यवहार की उपपत्ति होगी ।
इन प्रतीतियों के लिए परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुण की कल्पना आवश्यक नहीं है । ( उ ० ) किन्तु यह ठीक नहीं है , क्योंकि इस प्रकार से तो परस्पर विरुद्ध दो दिशाओं
८ में विद्यमान वस्तुओं में भी परत्व और अपरत्व का व्यवहार होना चाहिए , किन्तु देखनेवाले के शरीर से उनमें सामीप्य की बुद्धि होने पर भी ( विरुद्ध ) दिशाओं में अवस्थित उन दोनों वस्तुओं में परस्पर की अपेक्षा परत्व या अपरत्व की बुद्धि नहीं होती है | ( प्र ० ) अगर इसमें इतना बढ़ा दें कि समान दिशा के देशों के संयोग के अल्पत्व और अधिकत्व ही ( अपरत्व एवं परत्व ) प्रतीतियों के नियामक हैं ?
( उ ० ) तो भी परत्व और अपरत्व नाम का स्वतन्त्र गुण मानना ही पड़ेगा , क्योंकि विषयों में अन्तर हुए बिना प्रतीतियों में अन्तर नहीं हो सकता । वेग भी स्वतन्त्र गुण है , क्रियाओं का समूह नहीं , क्योंकि मन्द गतिवाली वस्तुओं में वेग की प्रतीति नहीं होती हैं । ( प्र ० ) क्रिया के कारणीभूत क्षणों का यह स्वभाव है कि वे अत्यन्त शीघ्र विनष्ट होते हैं ।
उनकी इस अत्यन्त शीघ्र विनाशशीलता से ही वेग का व्यवहार होता है ( अतः क्रियाओं का समूह ही वेग है , कोई स्वतन्त्र गुण नहीं ) | ( उ ० ) चूँकि अलातचक्रादि में होनेवाली क्रियाओं के कारणभूत क्षणों का बराबर उत्पाद और विनाश होता रहता है , किन्तु उत्पत्ति और विनाश की अत्यन्त शीघ्रता के कारण उन दोनों के बीच के समय गृहीत नहीं हो पाते , अत : उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है , किन्तु अलातचक्रादि में भी वेग की प्रतीति तो होती ही है । क्रिया और वेग की विभिन्न रीति से प्रतीति सर्वजन सिद्ध है ।
' यह वेग से जा रहा है ' इस आकार की वेग की प्रतीति होती है । ( क्रियाओं की प्रतीति का यह आकार नहीं है ) ।
पृ. ५८
आकाशकालदिगात्मनां सर्वगतत्वं परममहत्वं सर्व संयोगि- समानदेशत्वञ्च ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आकाश , काल , दिक् और आत्मा इन चार द्रव्यों के सर्वगतत्व , परममहत्त्व , और सर्वसंयोगिसमानदेशत्व ( सभी संयोगी द्रव्यों का समान रूप से पृथिव्यादीनां पञ्चानामपि भूतत्वेन्द्रिय प्रकृतित्ववाकै केन्द्रियग्राह्म विशेषगुणवश्वानि । आधार होना ) ये तीन साधर्म्य हैं ।
पृथिवी , जल , तेज , वायु और आकाश इन पाँच द्रव्यों के भूतत्व , इन्द्रिय प्रकृतित्व और एक एक बाह्येन्द्रिय से गृहीत होनेवाले विशेष गुण ये तीन साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
आकाशकालदिगात्मनां सर्वगतत्वमित्यादि । सर्वशब्देनात्र प्रकृतापेक्षयानन्तरोक्तानि मूर्त्तद्रव्याणि परामृश्यन्ते । सर्वगतत्वं सर्वैर्मूतैः सह संयोग आकाशादीनाम् , न तु सर्वत्र गमनम् , तेषां निष्क्रियत्वात् । परममहत्त्वमियत्तानवच्छिन्नपरिमाणयोगित्वम् । सर्वसंयोगिसमानदेशत्वं सर्वेषां संयोगिनां मूर्त्तद्रव्याणामाकाशः समानो देश एक श्राधार इत्यर्थः । एवं दिगादिष्वपि व्याख्येयम् । यद्यप्याकाशादिकं सर्वेषां संयोगिनामाधारो न भवति , आधारभावेनानवस्थानात् , तथापि सर्वसंयोगाधारत्वात् सर्वसंयोगिनामाधार इत्युच्यते , उपचारात् । अत एव सर्वगतत्वमित्यनेनापुनरुक्तता । तत्र हि सर्वैः सह संयोगोऽस्तीत्युक्तंम् । इह तु सर्वेषामाधार इत्युच्यते ।
साधम्यं कथयति-
पृथिव्यादीनामाकाशान्तानामितरवैधर्म्येण पृथिव्यादीनामिति । भूतत्वं भूतशब्दवाच्यत्वम् । एकनिमित्तमन्तरेणानेकेषु पृथिव्यादिष्वेकशब्दप्रवृत्तिरक्षशब्दवत् यथा देवनत्वेन्द्रियत्वबिभीतकत्वसामान्यत्रययोगाद्देवनादिष्वक्षशब्दः सङ्केतितः , तथा पृथिवीत्वादिसामान्यवशात् पृथिव्यादिषु चतुर्षु भूतशब्दः सङ्केतितः । आकाशे तु व्यक्तिनिमित्त एव भूतं भूतमिति तच्छब्दानुविद्धः प्रत्ययस्तच्छब्दवाच्यतोपाधिकृतः , यथा देवनादिष्वेकोऽक्ष इति प्रत्ययः ।
इन्द्रिय प्रकृतित्वमिन्द्रियस्वभावत्वम् । न भूतस्वभावानीन्द्रियाणि , अप्राप्यकारित्वात् प्राप्यकारित्वं हि भौतिको धर्मो यथा प्रदीपस्येति केचित् । तदयुक्तम् , व्यवहितानुपलब्धः , यदीन्द्रियमप्राप्यकारि कुड्यादिव्यवहितमप्यर्थं गृह्णीयादप्राप्तेरविशेषात् । योग्यताभावाद् व्यवहितार्थाग्रहणमिति चेत् ?
इन्द्रियस्य तावद् योग्यता विषयग्रहणसामर्थ्यमस्त्येव तदानीमव्यवहितार्थग्रहणात् विषयस्यापि योग्यता महत्त्वानेकद्रव्यवत्त्वरूपविशेषाद्यात्मिका व्यवधानेऽपि न निवृत्तैव , आर्जवावस्थानमपि तदवस्थमेव । अथ मतम् - आवरणाभावोऽप्यर्थप्रतीतिकारणं संयोगाभाव इव पतनकर्म्मणि , आवरणे सत्यावरणाभावो निवृत्त इति प्रतीतेरनुत्पत्तिः कारणाभावादिति ।
नैतत्सारम् आवरणस्य स्पर्शत्रद्द्रव्यप्राप्तिप्रतिषेधभावोपलब्धः , छत्रादिकं हि पततो जलस्य सावित्रस्य च तेजसः प्रतिषेधति , न तु स्वस्याभावमात्रं निवर्त्तयति । तथा सति सुलभमेतदनुमानम् - प्राप्तप्रकाशकं चक्षुः , व्यवहितार्थाप्रकाशकत्वात् प्रदीपवत् , बाह्येन्द्रियत्वात् त्वगिन्द्रियवत् । नन्वेवं तहि विप्रकृष्टार्थग्रहणं कुतः ? रश्म्यर्थसंनिकर्षादनुद्भूतरूपस्पर्शा नायना रश्मयो दूरे गत्वा सन्तमर्थं गृह्णन्ति , अत एव महदणुप्रकाशकत्वात् किमि - न्द्रियस्य भौतिकत्वं न सिद्धयति ?
प्रदीपस्येव रश्मिद्वारेण तदुपपत्तेः । यत्र च रश्मयो भूयोभिः स्वावयवैः सहार्थावयविना तदवयवैश्च सह सम्बद्धयन्ते , तत्राशेषविशेषास्कन्दितस्यार्थस्य ग्रहणात् स्पष्टं ग्रहणम् । यत्र त्ववयवमात्रेण सम्बन्धस्तत्र सामान्यमात्रविशिष्टस्य धम्मिणो ग्रहणादस्पष्टं ग्रहणम् । यद् गच्छति तत् संनिहितव्यवहितार्थो क्रमेण प्राप्नोति । तत् कथं शाखाचन्द्रमसोस्तुल्यकालोपलब्धिरिति चेत् ? इन्द्रियवृत्तेराशुसश्चारित्वात् पलाशशतव्यतिभेदवत् क्रमाग्रहणनिमित्तोऽयं भ्रमो न तु वास्तवं यौगपद्यम् ।
ननु प्राप्तिपक्षे सान्तरालोऽयमिति ग्रहणं न स्यात् ? न , अन्यथा तदुपपत्तेः । इन्द्रियसम्बन्धस्यातीन्द्रियत्वान्न तदभावाभावकृतौ सान्तरनिरन्तरप्रत्ययौ , किन्तु शरीरसम्बन्धभावाभावकृतौ यत्र शरीरसम्बद्धस्यार्थस्य ग्रहणं तत्र निरन्तरोऽयमिति प्रत्ययः , यत्र तु तदसम्बद्धस्य ग्रहणं तत्र सान्तर इति ।
बाह्येन्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वानीति । बाह्येकै केन्द्रियेण चक्षुरादिना ग्राह्या ये विशेषगुणा रूपादयस्तैस्तद्वत्ता पृथिव्यादीनामिति । अन्तःकरणग्राह्यत्वमप्येषां गुणानामस्ति , ततश्चैकैकेन्द्रियग्राह्यत्वमसिद्धम् , तदर्थं बाह्यग्रहणम् । एकैकग्रहणं स्वरूपकथनार्थम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — प्रकृत भाष्य के ' सर्वगतत्व ' पद में प्रयुक्त ' सर्व ' शब्द से प्रकृत आकाशादि से ठीक पहिले कहे हुए सभी मृत्तं द्रव्यों को समझना चाहिए । आकाशादि का सभी मूत्तं द्रव्यों के साथ संयोग ही सर्वगतत्व है , आकाशादि का सभी मूर्त्त द्रव्यों में जाना नहीं , क्योंकि वे सभी क्रियाशून्य हैं । ' परममहत्त्व ' शब्द का अर्थ है इयत्ता से रहित परिमाण का ( सबसे बड़े परिमाण का ) सम्बन्ध | ' सर्वसंयोगिसमानदेशत्व ' अर्थात् आकाश संयोग से युक्त सभी मूर्त द्रव्यों का एक आधार है । इसी प्रकार दिशा में भी व्याख्या करनी चाहिये । यद्यपि आकाशादि संयोग से युक्त पदार्थों का आधार नहीं है , किन्तु उनके सभी संयोगों का आधार है , अतः उनमें ' सर्वाधार ' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है । अतएव ' सर्वगतत्व ' के बाद ' सर्वसंयोगिसमानदेशत्व ' के कथन से पुनरुक्ति की आपत्ति नहीं होती है , क्योंकि ' सर्वगतत्व ' शब्द से आकाशादि में सभी मूर्त्त द्रव्यों का संयोग प्रतिपादित होता है और ' सर्व संयोगिसमानदेशत्व ' शब्द से लक्षणा वृत्ति के द्वारा उनमें सर्वाधारत्व का प्रतिपादन होता है ।
पृथिवी से लेकर आकाश पर्य्यन्त पाँच द्रव्यों का साधर्म्य औरों से असाधारण्य दिखलाते हुए कहते हैं । ' भूत ' शब्द का अर्थ है ' भूत ' शब्द से अभिधावृत्ति के द्वारा कहा जाना । यद्यपि पृथिवी प्रभृति पाँच द्रव्यों में सभी को समझाने के लिए एक शब्द की प्रवृत्ति का नियामक कोई एक धम्मं नहीं है , किन्तु तब भी ' अक्ष ' शब्द की तरह ' भूत ' शब्द की प्रवृत्ति उनमें होती है । अर्थात् जैसे देवनत्व ( द्यूतत्व ) इन्द्रियत्व और विभीतकत्व इन तीन सामान्य के सम्बन्ध से जूये प्रभृति में ' अक्ष ' शब्द की प्रवृत्ति होती है , वैसे ही पृथिवीत्वादि चारों जातियों से पृथिवी जल , तेज और वायु इन चार द्रव्यों को समझाने के लिए ' भूत ' शब्द प्रवृत्त होता है । आकाश में आकाश रूप व्यक्तिमूलक ' यह भूत है ' इत्यादि ' भूत ' शब्दमूलिका प्रतीति भूतशब्दबोध्यत्व रूप उपाधि से होती है । जैसे कि एक ही ' अक्ष ' शब्द देवनादि सभी अर्थों को समझाने के लिए प्रवृत्त होता है ।
' इन्द्रिय प्रकृतित्व ' शब्द का अर्थ है इन्द्रियस्वभावत्व | यहाँ कोई शङ्का उठाते हैं । कि ( प्र ० ) भूत इन्द्रियों की प्रकृति ( समवायिकारण ) नहीं है , क्योंकि इन्द्रियाँ वस्तुओं के साथ असम्बद्ध होकर ही अपना काम करती हैं । भौतिक वस्तुओं का यही स्वभाव है कि अपने विषयों के साथ सम्बद्ध होकर ही अपना काम करें , जैसे कि प्रदीप | ( उ ० ) किन्तु यह ठीक नहीं है , क्योंकि व्यवहित वस्तुओं की इन्द्रियों से उपलब्धि नहीं होती ।
अगर इन्द्रियाँ अपने से असम्बद्ध विषयों को भी ग्रहण करें तो फिर दीवाल प्रभृति से ढके हुए अपने विषयों का भी वे ग्रहण कर सकती हैं । दीवाल से घिरे और न घिरे हुए वस्तुओं में तो कोई अन्तर नहीं है , और इन्द्रियों की असम्बद्धता तो दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान है | ( प्र ० ) व्यवहित वस्तुओं में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है , अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है ? ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि व्यवहित विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है ?
या इन्द्रियों में व्यवहित विषयों के प्रत्यक्ष के उत्पादन की योग्यता नहीं है ? इन्द्रियों की योग्यता है विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य , सो उनमें है ही । क्योंकि उस समय भी अव्यवहित विषयों को वे ग्रहण करती ही हैं । विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता है महत्त्व , अनेकद्रव्यवत्त्वादि , सो दीवाल से घिर जाने पर भी विषयों से हट नहीं जाती । दीवाल से घिर जाने पर भी वे इन्द्रियों के सामने ही रहते हैं ।
( प्र ० ) जिस प्रकार संयोग का अभाव भी पतन का कारण है , उसी प्रकार आवरण का अभाव भी प्रत्यक्ष का कारण है । आवरण के रहते हुए आवरण का अभाव नहीं रह सकता , अतः दीवाल से घिरी हुई वस्तुओं का प्रत्यक्ष नहीं होता , क्योंकि वहाँ आवरणाभाव रूप कारण ही नहीं है । ( उ ० ) आवरण का इतना ही काम है कि स्पर्श से युक्त द्रव्यों के साथ संयोग न होने दे | जैसे छाता गिरते हुए पानी या धूप के साथ संयोग को नहीं होने देता । आवरण का इतना ही काम नहीं हैं कि अपने अभाव को हटाये ।
अतः ( १ ) यह अनुमान सुलभ है कि चक्षु अपने से सम्बद्ध वस्तुओं का ही प्रकाशक है , क्योंकि व्यवहित वस्तुओं का प्रकाश उससे नहीं होता , जैसे कि प्रदीप । ( २ ) अथवा चक्षुरादि ( इन्द्रियाँ ) अपने से सम्बद्ध वस्तुओं के ही प्रकाशक हैं , क्योंकि वे बाह्येन्द्रिय हैं , जैसे कि त्वगिन्द्रिय | ( प्र ० ) तो फिर चक्षु से कुछ दूर हटी हुई वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष ( क्यों ) और कैसे होता है ? ( उ ० ) चक्षु की रश्मियों के साथ विषयों के संयोग से ।
' अनुभूत रूप और अनुद्भूत स्पर्श से युक्त चक्षु की रश्मियाँ वहाँ विद्यमान वस्तुओं के प्रत्यक्ष को उत्पन्न करती है । इन्द्रियाँ चूंकि छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की वस्तुओं को दिखलाती हैं , इससे भी उनमें भौतिकत्व की सिद्धि क्यों नहीं होगी ? प्रदीप की तरह रश्मियों में भी भौतिकता सिद्ध हो सकती है । जहाँ पर रश्मियाँ अपने बहुत से अवयवों को लेकर अवयवी रूप वस्तु और उनके अवयवों के साथ सम्बद्ध होती हैं , वहाँ सभी विशेषों से युक्त अवयवी का ज्ञान होता है ।
अत एव वह ज्ञान ' स्पष्टग्रहण ' कहलाता है । जहाँ वे केवल वस्तुओं के किसी अवयव के साथ ही सम्बद्ध होती हैं , वहाँ सामान्यधम्मं से युक्त उस धर्मी का ज्ञान होता है , जिसे ' अस्पष्ट ग्रहण ' कहते हैं । ( प्र ० ) गतिशील वस्तु समीप की वस्तुओं के साथ पहिले सम्बद्ध होती है और दूर की वस्तुओं के साथ पीछे , तो फिर गतिशील इन्द्रियों से शाखा और चन्द्रमा का ग्रहण एक ही समय क्यों होता है ? ( उ ० ) वस्तुतः एक समय में शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान नहीं होता है ।
दोनों के ज्ञान क्रमशः ही होते हैं , किन्तु इन्द्रियाँ इतनी शीघ्रता से चलती हैं कि उनकी गति के क्रम का ज्ञान नहीं हो पाता । अत एव यह भ्रम होता है कि शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान एक ही समय होता है । जैसे फूल के सौ पत्रों को सूई से छेदने पर उसका क्रम उपलब्ध नहीं होता और भ्रम होता है कि एक ही समय में सभी पत्रों का छेदन हुआ है । ( प्र ० ) इन्द्रियाँ अपने से सम्बद्ध वस्तुओं को ही ग्रहण करती हैं ' इस पक्ष में विषय और इन्द्रियों में सार्वजनीन व्यवधान की प्रतीति अनुपपन्न होगी ?
( उ ० ) नहीं , क्योंकि दूसरी रीति से उसकी उपपत्ति हो सकती है । इन्द्रियों का सम्बन्ध अतीन्द्रिय है , अत : उसकी सत्ता से व्यवधान की प्रतीति और असत्ता से अव्यवधान की प्रतीति नहीं हो सकती , किन्तु शरीरसम्बन्ध की सत्ता और बसत्ता से ही उक्त दोनों प्रतीतियाँ होती हैं । जहाँ शरीर से सम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है , उस अर्थ में यह व्यवधान रहित है ' इस प्रकार की बुद्धि होती है और जहाँ शरीर से असम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है उस अर्थ में ' यह व्यवहित है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है ।
बाह्य के केन्द्रियग्राह्यगुणवत्त्वानि ' अर्थात् चक्षुरादि एक एक बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होनेवाले जो रूप , रस , गन्ध , स्पर्श और शब्द , ये पाँच विशेष गुण हैं , तद्वत्त्व ' पृथि व्यादि पांच द्रव्यों का साधर्म्य है । ये रूपादि मन रूप अन्तरिन्द्रिय से भी गृहीत होते हैं , अतः उनमें एकैकेन्द्रियग्राह्यत्व ' नहीं रह सकता , अतः ' बाह्य ' पद का प्रयोग है । ' एकैक ' पद केवल इस वस्तुस्थिति को समझाने के लिए है कि कथित रूपादि पाँच विशेष गुण एक एक बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होते हैं , संयोगादि की तरह दो इन्द्रियों से नहीं ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ६१) १. चक्षु की रश्मियाँ दूर की वस्तुओं को ग्रहण करने के लिए अगर उनके देशों तक जाती हैं तो फिर सूर्य की रश्मियों की तरह उनके रूप और स्पर्श का भी प्रत्यक्ष होना चाहिए , किन्तु होता नहीं है । अतः ' चक्षु की रश्मियाँ दूर जाकर वस्तुओं को ग्रहण करती हैं " यह कहना ठीक नहीं है । इसी पूर्वपक्ष के समाधान की सूचना देने के लिए कन्दलीकार ने चक्षु की रश्मियों में अनुद्भूतरूप और अनुभूत स्पर्श , ये दो विशेषण लगाये हैं । कहने का तात्पर्य है कि अगर चक्षु की रश्मियों का विषय देश तक जाना युक्तियों से सिद्ध है तो फिर उनके रूप और स्पर्श की अनुपलब्धि से वह हट नहीं सकती । उनके प्रत्यक्षापत्तिवारण का यह उपाय सुलभ है कि रश्मियों के रूप और स्पर्श को अनुद्भूत मान लेना ।
पृ. ६३
चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवच्वे ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवच्चद्रवत्वानि ।
पृथिवी , जल , तेज और वायु इन चार द्रव्यों का द्रव्य को उत्पन्न करना और स्पर्श से युक्त होना ये दो साधर्म्य हैं ।
पृथिवी , जल , और तेज इन तीन द्रव्यों का प्रत्यक्षत्व , रूपवत्त्व और द्रवत्व ये तीन साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवत्त्वे । चतुर्णां पृथिव्युदकानलानिलानाम् । द्रव्यारम्भकत्वं द्रव्यं प्रति समवायिकारणभावः । स च निजा शक्तिरेव । स्पर्शवत्त्वं स्पर्शसमवायः ।
त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवत्त्वद्रवत्वानि । त्रयाणां क्षित्युदकतेजसां प्रत्यक्षत्वमिन्द्रियजज्ञानप्रतिभासमानता , न तु महत्त्वादिकारणयोगः , रूपवत्त्वमित्यस्य पुनरुक्तत्वप्रसङ्गात् । नन्वात्मनोऽपि प्रत्यक्षत्वमस्ति ? सत्यम् , बाह्येन्द्रियापेक्षया त्रयाणामित्युक्तम् । तथा रूपवत्त्वं रूपसमवायः । द्रवत्वं द्रवत्वन्नाम गुणान्तरम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' चतुर्णाम् ' अर्थात् पृथिवी , जल , तेज और वायु इन चार द्रव्यों का ' द्रव्यारम्भकत्व ’ अर्थात् द्रव्य का समवायिकरणत्व साधर्म्य है । यह उनकी स्वाभाविक शक्ति है । ' स्पर्शवत्त्व ' शब्द का अर्थ है - स्पर्श का समवाय ।
' त्रयाणाम् ' अर्थात् पृथिवी , जल और तेज इन तीन द्रव्यों का ' प्रत्यक्षत्व ' साधम्यं है । इस ' प्रत्यक्षत्व ' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान में प्रतिभासित होना , महत्त्वादि प्रत्यक्ष के कारणों का सम्बन्ध नहीं , क्योंकि ऐसा मानने पर इन तीनों को रूपवत्त्व को साधर्म्य कहना पुनरुक्ति दुष्ट हो जाएगा । प्रत्यक्षत्व तो आत्मा में भी है ? ( उ ० ) हाँ है , किन्तु यहाँ बाह्य इन्द्रियों से उत्पन्न प्रत्यक्ष का ही ग्रहण है । एवं ' रूपवत्त्व ' शब्द का अर्थ है रूप का समवाय और ' द्रवत्व ' शब्द से द्रवत्व नाम का स्वतन्त्र गुण त्रिवक्षित है ।
पृ. ६४
द्वयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्च ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पृथिवी और जल इन दोनों के गुरुत्व और रसवत्त्व ये दो साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
द्वयोर्गुरुत्वम् । द्वयोः पृथिव्युदकयोः , गुरुत्वन्नाम गुणान्तरम् , तस्य भावात् पृथिव्यामुदके च गुरुशब्दनिवेशः । रसवत्त्वश्व रससमवायः , न केवलं तयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्चेति चार्थः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' द्वयो : ' पृथिवी और जल इन दोनों का गुरुत्व ' अर्थात् गुरुत्व नाम का स्वतन्त्र गुण साधर्म्य है । इसी गुरुत्व नामक गुण के सम्बन्ध से पृथिवी और जल ये दोनों ' गुरु ' शब्द से व्यवहृत होते हैं : ' रसवत्त्व ' शब्द से रस का समवाय इष्ट है । गुरुत्व और रसवत्त्व इन दोनों में से केवल गुरुत्व ही या केवल रसवत्त्व ही पृथिवी और जल के साधर्म्य नहीं हैं , किन्तु दोनों मिलकर उनके साधर्म्यं हैं , यही ' च ' शब्द से सूचित होता है ।
पृ. ६४
भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — भूत अर्थात् पृथिवी , जल , तेज , वायु और आकाश ये पाँच और आत्मा इन छः द्रव्यों का विशेषगुणवत्त्व साधर्म्य है |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् । भूतानां पृथिव्यप्तेजोवायुनभसामात्मनां च वैशेषिकगुणयोगः । विशेषो व्यवच्छेद :, विशेषाय स्वाश्रयस्येतरेभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिका रूपादयस्तद्योगो भूतात्मनाम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' भूतात्मनाम् ' अर्थात् पृथिवी , जल , तेज , वायु , आकाश एवं आत्मा इन छः द्रव्यों का वैशेषिकगुण का सम्बन्ध साधयं है । यहाँ ' विशेष ' शब्द का अर्थ है ' भेद ' ( व्यवच्छेद ) विशेषाय स्वाश्रयस्येतरभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिका : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अपने आश्रय को जो गुण भिन्न पदार्थों से अलग रूप से समझावे वही यहाँ ' वैशेषिक ' शब्द का अर्थ है । इन्हीं रूपादि विशेष गुणों का योग पृथिव्यादि पाँच भूत एवं आत्मां इन छः द्रव्यों का साधर्म्य है ।
पृ. ६५
क्षित्युदकात्मनां चतुर्दशगुणवश्वम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पृथिवी , जल और आत्मा इन तीन द्रव्यों का चौदह गुणों का सम्बन्ध साधर्म्य है |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
क्षित्युदकात्मनां चतुर्दशगुणवत्त्वम् । क्षितेरुदकस्यात्मनां चतुर्दशगुणयोगः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — पृथिवी , जल और आत्मा , इन तीन द्रव्यों का चौदह गुणों का सम्बन्ध साधर्म्य है ।
पृ. ६५
आकाशात्मनां क्षणिकैकदेशवृत्ति विशेषगुणवत्त्वम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आकाश और आत्मा इन दो द्रव्यों का क्षणिक एवं अव्याप्यवृत्ति ( अर्थात् अपने आश्रय के किसी एक अंश में ही रहनेवाला ) विशेष गुण साधर्म्य है |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
आकाशात्मनाच क्षणिकैकदेश वृत्तिविशेषगुणैः सह योगो विद्यत इत्याहआकाशात्मनामिति । विशेषगुणाः पृथिव्यादीनामपि सन्ति , तन्निवृत्त्यर्थमेकदेशवृत्तिग्रहणम् । ये च ते आकाशात्मनामव्याप्यवृत्तयो विशेषगुणास्तेषामाशुतरविनाशित्वञ्च स्वरूपमस्तीति क्षणिकसङ्कीर्त्तनं कृतम् ।
सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः पञ्चैव गुणा दिशि काले च वर्त्तन्त इत्याह - दिक्कालयोरिति । न केवलमनयोः पञ्चगुणवत्त्वं साधर्म्यं सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तकारणत्वञ्च साधर्म्यम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' आकाशात्मनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से कहते हैं कि आकाश में और आत्माओं में क्षणिक एवं ' अव्याप्यवृत्ति ' ( अपने आश्रय के किसी एक देश में रहनेवाले ) विशेष गुणों का सम्बन्ध है । विशेषगुण पृथिवी प्रभृति द्रव्यों में भी हैं , अतः ' एकदेशवृत्ति ' यह पद है । ' क्षणिक ' पद का उपादान यह सूचना देने के लिए है जि आकाश और आत्माओं के जितने भी ' अव्याप्यवृत्ति ' अर्थात् अपने आश्रय को व्याप्त कर न रहनेवाले विशेष गुण हैं , अतिशीघ्न नष्ट हो जाना ही उनका स्वरूप है
पृ. ६५
दिक्कालयोः पञ्चगुणवत्वं सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तकारणत्वञ्च ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — दिशा और काल इन दो द्रव्यों का ( संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग और विभाग ) ये पाँच गुण और सभी उत्पत्तिशील पदार्थों का निमित्तकारणत्व ये दो साधर्म्य हैं :
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
ननु दिक्काल सर्वेषामुत्पत्तिमतां निमित्तमिति कुत एतत् प्रत्येतव्यम् ? यदि सन्निधिमात्रेण ? आकाशस्यापि कारणत्वं स्यात् , अथ तद्व्यपदेशात् ? सोऽप्यनैकान्तिकः , गृहे जातो गोष्ठे जात इत्यनिमित्तेऽपि दर्शनात् । अत्रोच्यते - अस्ति तावत् तन्त्वादिप्रतिनियमात् पटाद्युत्पत्तिवद्देशविशेषनियमात् कालविशेषनियमाच्च सर्वेषामुत्पत्तिः , यदि देशकालविशेषावपि न कारणम् , अत्र क्वचन हेतवः काय्र्य्यं कुर्युरविशेषात् । सर्वदा सर्वत्र कारणाभावात् कार्य्यानुत्पत्तिरिति चेत् ? यत्र देशे काले च कारणानि भवन्ति , तत्र तेषां जनकत्वं नान्यत्रेत्यभ्युपगन्तव्यं विशिष्ट देशस्य देशकालयोरङ्गत्वम् , कार्य्यजननाय तयोः कारणैरपेक्षणीयत्वात् । इदमेव च कालस्य च निमित्तत्वम् , यदेकत्र कार्य्योत्पत्तिरन्यत्रानुत्पत्तिरिति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' दिक्कालयोः ' इत्यादि से कहते हैं कि संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग और विभाग ये ही पांच गुण दिशा और काल में रहते हैं । उक्त पाँच गुण ही इन दोनों के साधर्म्य
साधम्यं है । नहीं हैं , किन्तु सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं का निमित्तकारणत्व भी इन दोनों का
के निमित्त-
( प्र ० ) यह कैसे समझें कि दिशा और काल सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं के कारण ही कारण हैं ? अगर सभी वस्तुओं की उत्पत्ति के पहिले नियत रूप से रहने में भी यह ये दोनों सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं के निमित्तकारण हैं , तो फिर आकाश कारणता रहनी चाहिए । ' अभी घट की उत्पत्ति हुई है ' या ' उस दिशा का मानना में पट की उत्पत्ति हुई है ' इत्यादि व्यवहारों से भी काल और दिशा में निमित्तकारणता की उत्पत्ति हुई सम्भव नहीं है , क्योकि निमित्तकारणता के बिना भी ' घर में घट उक्त व्यवहारों की उपपत्ति हो सकती है । ( उ ० ) इस आक्षेप के उत्तर , उसी और गोष्ठ में पट की उत्पत्ति हुई ' इस प्रकार के व्यवहारों की तरह
में कहना कि जिस प्रकार पटादि कार्यों में यह नियम है कि वे तन्तु प्रभृति कारणों से ही उत्पन्न हों अगर ये प्रकार सभी कार्यों की उत्पत्ति में देश और काल का भी नियम है । दोनों अपेक्षित न हों तो फिर जहाँ - तहाँ विक्षिप्त कारणों से और भिन्नकालिककारणों से भी कार्यों की उत्पत्ति होनी चाहिए , क्योंकि नियमित देश और नियमित काल के कारणों में और अनियत देश और अनियत काल के कारणों में स्वरूपतः ( देश और काल के सम्बन्ध को छोड़कर ) कोई अन्तर नहीं है । ( १० ) सभी देशों और सभी कालों में कारणों की सत्ता न रहने से ही सभी देशों और सभी कालों में कार्यों की उत्पत्ति नहींहोती है । ( उ ० ) तो फिर यह मानना पड़ेगा कि जिस देश में और जिस काल में सम्मिलित होकर जो सब कारण कार्य को उत्पन्न कर सकें , उसी काल और उसी देश में वे कारण हैं और कालों में नहीं और देशों में नहीं , इस प्रकार यह स्वीकार करना पड़ेगा कि देश और काल भी कार्योत्पत्ति के अङ्ग हैं , क्योंकि कार्य के उत्पादक सभी कारण काल और दिशा की अपेक्षा रखते हैं । काल और दिशा में सभी कार्यों का यही निमित्तकारण है कि किसी कालविशेष और देशविशेष में ही कार्यों की उत्पत्ति होती है , सभी कालों और सभी देशों में नहीं ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ६५) १. रूप , रस , गन्ध , स्पर्श , संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , परत्व , अपरत्व , गुरुत्व , द्रवत्व और वेगाख्य तथा स्थितिस्थापक संस्कार ये चौदह गुण पृथिवी के हैं । इन्हीं चौदह गुणों में गन्ध के स्थान में स्नेह को रख देने से जल के चौदह गुण हो Ε जाते हैं । संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , भावनाख्य संस्कार , धर्म और अधर्म ये चौदह गुण आत्मा के हैं ।
पृ. ६७
क्षितितेजसो नैमित्तिकद्रवत्वयोगः ः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पृथिवी और तेज इन दो द्रव्यों का नैमित्तिकं द्रवत्व का सम्बन्ध साधर्म्य है |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
क्षितितेजसो मित्तिकद्रवत्वयोगः 1 निमित्तादुपजातं ( नैमित्तिकम् ) , नैमित्तिकञ्च तद्द्द्रवत्वञ्चेति नमित्तिकद्रवत्वम् , तेन सह क्षितितेजसोर्योगः , पार्थिवस्य सर्पिरादेस्तेजसस्य च सुवर्णरजतादेरग्निसंयोगेन विलयनात् । गुरुत्ववत्पार्थिवमेव द्रवत्वं दह्यमानेषु सुवर्णादिषु संयुक्तसमवायात् प्रतीयत इति चेत् ? न , पार्थिवद्रवत्वस्यात्यन्ताग्निसंयोगेन भस्मीभावोपलब्धेः अस्य च तदभावात् । अत एव सुवर्णादिकमपि पार्थिवमेवेति कस्यचित् प्रवादोऽपि प्रत्युक्तः , पार्थिवत्वे सति सर्पिरादिवदत्यन्तवह्निसंयोगेन द्रवत्वोच्छेदप्रसङ्गात् ।
यदपीदमुक्तं पार्थिव सुवर्णादिकम् , सांसिद्धिकद्रवत्वाभावे सति गुरुत्वाधिकरणत्वाल्लोष्टादिवत् तदप्यसारम् , किं तत्र गुरुत्वस्योपलब्धिस्तद्गुणत्वादुतान्यगुणत्वेऽपि घृतादिष्वपि स्नेहवत् स्वाश्रयप्रत्यासत्तिनिमित्तादिति संशयस्यानिवृत्तेः । यदपि साधनान्तरं परप्रकाश्यमानत्वादिति , तदप्यनुद्भूतरूपवत्त्वेनाप्युपपत्तेरसाधनम् । दिङ्मात्रमस्माभिरुपदिष्टम् ।
अनेनैव न्यायेन सर्वत्र पदार्थेऽन्यदपि साधर्म्यं स्वयं वाच्यम् , विपर्य्ययादितरव्यावृत्तेर्वैधर्म्यं वाच्यमिति शिष्यानाह - एवमिति ।
अनुद्दिष्टेषु पदार्थेषु न तेषां लक्षणानि प्रवर्त्तन्ते निर्विषयत्वात् , अलक्षितेषु च तत्त्वप्रतीत्यभावः कारणाभावात् , अतः पदार्थव्युत्पादनाय प्रवृत्तस्य शास्त्रस्योभयथा प्रवृत्तिः - उद्देशो लक्षणञ्च । परीक्षायास्त्वनियमः । यत्राभिहिते लक्षणे प्रवादान्तरव्याक्षेपात्तत्त्वनिश्चयो न भवति , तत्र परपक्षव्युदासार्थं परीक्षाविधिरधिक्रियते । यत्र तु लक्षणाभिधानसामर्थ्यादेव तत्त्वनिश्चयः स्यात् , तत्रायं व्यर्थो नार्थ्यते । योऽपि हि त्रिविधां शास्त्रस्य प्रवृत्तिमिच्छति , तस्यापि प्रयोजनादीनां नास्ति परीक्षा , तत् कस्य हेतो : ? लक्षणमात्रादेव ते प्रतीयन्त इति । एवञ्चेदर्थप्रतीत्यनुरोधाच्छास्त्रस्य प्रवृत्तिर्न त्रिधैव । नामधेयेन पदार्थानामभिधानमुद्देशः । उद्दिष्टस्य स्वपरजातीयव्यावर्त्तको धर्मो लक्षणम् । लक्षितस्य यथालक्षणं विचारः परीक्षा । उद्दिष्टविभागस्तु न विधान्तरम् , उद्देशलक्षणेनैव संगृहीतत्वात् । तथा हि पृथगुच्येत । एतान्येवेति नियमार्थं विशेषलक्षण प्रवृत्त्यर्थश्च विभक्तेषु पदार्थेषु तेषां विशेषलक्षणानि भवन्ति , अन्यथा तानि निर्विषयाणि स्युः । तत्र द्रव्याणि द्रव्यगुणकर्मेत्युद्दिष्टानि पृथिव्यप्तेज इति विभक्तानि । सम्प्रति तेषां विशेषलक्षणार्थं प्रकरणमारभ्यते ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' निमित्तादुपजातं नैमित्तकम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो कारण से उत्पन्न हो उसे ' नैमित्तिक ' कहते हैं । ' नैमित्तिकच तद्रवत्वञ्चेति ' इस कर्मधारय समास के बल से किसी निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही नैमित्तिकद्रवत्व ' शब्द का अर्थ है । उसके साथ सम्बन्ध ही पृथिवी और तेज का साधर्म्य है क्योंकि घृतादि पार्थिव द्रव्य और सुवर्णादि तैजस द्रव्य आग के संयोग से विलीन होते ( पिघलते ) दीख पड़ते हैं , अत : उनमें अवश्य ही नैमित्तिक द्रवत्वं है | ( प्र ० ) जिस प्रकार सुवर्ण में पार्थिव गुरुत्व की ही उपलब्धि संयुक्तसमवाय संबन्ध से होती है , उसी प्रकार सुवर्ग में पृथिवीगत नैमित्तिक द्रवत्व की ही सयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उपलब्धि होती है । ( अर्थात् सुवर्ण में नैमित्तिक द्रवत्व नहीं है ) | ( उ ० ) घृतादि पार्थिव द्रव्यों में रहनेवाले नैमित्तिक द्रवत्व का यह स्वभाव है कि अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट हो जाना , सुवर्ण के द्रवत्व में यह बात नहीं है । इसी समाधान से स्वर्ण को पृथिवी होने का प्रवाद भी खण्डित हो जाता है , अगर सुवर्ण पार्थिव होता तो फिर घृतादि पार्थिव द्रव्यों के द्रवत्व की तरह सुवर्ण का द्रवत्व भी अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट हो जाता ।
( प्र ० ) यह जो विरोधी अनुमान का प्रयोग किया जाता है कि सुवर्ण पार्थिव ही है , क्योंकि सांसिद्धिकद्रवत्व के न रहने पर भी उसमें गुरुल है , जैसे कि ढेले में ( उ ० ) इस
प्रशतपादभाष्यम्
एवं सर्वत्र साधर्म्यं विपर्य्ययाद्वैधर्म्यश्च वाच्यमिति द्रव्यासङ्करः ।
इसी प्रकार रहने के कारण साधर्म्य और नहीं रहने के कारण वैधर्म्य समझना चाहिए । अतः द्रव्यों में कोई साङ्कर्य नहीं है । अनुमान में भी कुछ सार नहीं है , क्योंकि सुवर्ण में जिस गुरुत्व की उपलब्धि होती है वह उसका अपना गुण है , जैसे कि ढेले में , या उसमें संयुक्त किसी दूसरे द्रव्य का है , जैसे कि तेल में स्नेह का , इस संशय की निवृत्ति नहीं होती है । सुवणं तैजस नहीं है ' इसको सिद्ध करने के लिए कोई यह हेतु देते हैं कि सुवर्ण तैजस इसलिए नहीं है कि वह ( दीपादि ) दूसरे वस्तुओं से प्रकाशित होता है , किन्तु यह भी हेत्वाभास ही है , क्योंकि स्वर्ण को ( दीपादि ) दूसरे द्रव्यों से प्रकाशित होने की उपपत्तिं उसके भास्वर शुक्ल रूप को अनुभूत मान लेने से भी हो सकती है । सुवर्ण मे तैजसत्व की साधक और बाधक युक्तियों का यहाँ हम लोगों ने दिग्दर्शन मात्र किया है ।
इसी प्रकार सभी पदार्थों में और साधर्म्य की भी कल्पना स्वयं करनी चाहिए । एवं जो साधर्म्यं जिनमें न हो उसको उनका वैधर्म्य समझना चाहिए । इसी विषय को शिष्यों को समझाने के लिए आगे ' एवम् ' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं ।
जिन पदार्थों का उल्लेख नामतः नहीं होता है , उनमें लक्षण को प्रवृत्ति नहीं होती है , क्योंकि उस लक्षण का कोई लक्ष्य ही निर्दिष्ट नहीं रहता है । एवं बिना लक्षण के पदार्थों का बोध ही असम्भव है ।
अतः पदार्थों के प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रों की प्रवृत्ति नियमत : ( १ ) उद्देश और ( २ ) लक्षण भेद से दो ही प्रकार की होती है , परीक्षा रूप शास्त्र की प्रवृत्ति के प्रसङ्ग में नियम नहीं है , ( अर्थात् ) जहाँ लक्षण कहे जाने के बाद विरुद्ध मत के उपस्थित होने के कारण पदार्थों का तत्त्व ज्ञात नहीं होने पाता , वहीं विरुद्ध मत को खण्डित करने के लिए परीक्षा आरम्भ की जाती है ।
किन्तु जहाँ लक्षण के कहने से ही वस्तुओं का तत्त्वज्ञान हो जाता है , वहाँ व्यर्थ होने के कारण परीक्षा अपेक्षित नहीं होती है । जो कोई ( न्यायभाष्यकार वात्स्यायन ) शास्त्रों की प्रवृत्ति को ( १ ) उद्देश , ( २ ) लक्षण और ( ३ ) परीक्षा भेद से नियमतः तीन प्रकार का मानते हैं , उनके शास्त्र में भी प्रयोजनादि पदार्थों की परीक्षा नहीं है । इसका क्या कारण है ? यही कि वे लक्षण कहने मात्र से तत्त्वतः ज्ञात हो जाते हैं ।
अगर प्रतीति के अनुरोध से ही शास्त्रों की प्रवृत्ति होती है तो फिर वह नियम से तीन हीप्रकार की नहीं होती है ( अधिक भी हो सकती है और अरूप भी ) पदार्थों को केवल उनके नामों से निर्दिष्ट करना ' उद्देश ' हैं । उद्दिष्ट पदार्थ को अपने से भिन्न सजातीय और विजातीय पदार्थों से भिन्न रूप से समझानेवाला धर्म ही ' लक्षण ' है । लक्षण के द्वारा समझाये गये वस्तु का लक्षण के अनुसार विचार ही ' परीक्षा ' है ।
' उद्दिष्ट लक्षण ' नाम की शास्त्र की कोई अलग प्रवृत्ति नहीं है , क्योंकि कथित उद्देश के लक्षण से ही वह गतार्थ हो जाता है । ' उद्दिष्ट विभाग ' नाम की अलग शास्त्र की प्रवृत्ति ( १ ) पदार्थ इतने ही हैं ' इस नियम के लिए या ( २ ) विशेष लक्षणों की प्रवृत्ति के लिए इन्हीं दो प्रयोजनों से मानी जा सकती थी , क्योंकि विभाग किये हुए पदार्थों के ही विशेष लक्षण होते हैं ।
अगर ऐसा न हो तो फिर इन विशेष लक्षणों का कोई विषय ही नहीं रहेगा | यहाँ द्रव्यगुणेत्यादि ग्रन्थ से द्रव्यों का उद्देश हो गया है एवं पृथिव्यप्तेज ' इत्यादि ग्रन्थ से वे विभक्त हुए हैं । अब द्रव्यों के विशेष लक्षण के लिए आगे का प्रकरण आरम्भ करते हैं ।
पृ. ७०
इहेदानीमेकैकशो वैधर्म्यमुच्यते ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अब तक कहे हुए पदार्थों में से प्रत्येक का वैधर्म्य , अर्थात् असाधारण धर्म रूप लक्षण कहते हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
इदानीमिति । पूर्वं द्वयोर्बहूनां परस्परापेक्षया वैधर्म्यमुक्तम् । इह वक्ष्यमाणे प्रकरणे सम्प्रत्येकैकस्य द्रव्यस्य व्यावर्त्तको धर्मः कथ्यते । एकैकश इति शस्प्रत्ययाद् वीप्सात्यन्तबहु व्याप्तिप्रदर्शनार्था ।
उद्देशक्रमेण पृथिव्याः प्रथमं वैधर्म्यमाह - पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवीति । यो हि पृथिवीं स्वरूपतो जानन्नपि कुतश्चिद् व्यामोहात् पृथिवीति न व्यवहरति तं प्रति विषय सम्बन्धाव्यभिचारेण व्यवहारसाधनार्थं मसाधारणो धर्मः कथ्यते -- पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवीति । इयं पृथिवीति व्यवहर्तव्या पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् , यत् पुनः पृथिवीति न व्यवह्रियते , न तत् पृथिवीत्वेनाभिसम्बद्धम् , यथाबादिकम् , न चेयं पृथिवीत्वेन नाभिसम्बद्धा , तस्मात् पृथिवीति व्यवहर्तव्येति ।
यो वा पृथिवीति लोके शृणोति , न जानाति च तस्याः स्वरूपं कीदृगिति तं प्रति तस्याः स्वपरजातीयव्यावृत्तस्वरूपप्रतिपादनार्थमसाधारणो धर्मः कथ्यते , या लोके पृथिवीति व्यपदिश्यते सा पृथिवी , पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् । यथाहोद्योतकरः -- “ समानासमानजातीयव्यवच्छेदो लक्षणार्थः ” ( न्या ० वा ० ) एतेनैतदपि प्रत्युक्तम् , प्रसिद्धाश्चेत् पदार्था न लक्षणीयाः , अप्रसिद्धा नितरामशक्यत्वात् , स्वरूपेणावगतस्यापि व्यवहारविशेषप्रतिपादनार्थं सामान्येन प्रसिद्धस्य विशेषावगमार्थञ्च लक्षणप्रवृत्तेः ।
नन्वेवं सत्यनवस्था , लक्ष्यवल्लक्षणस्याप्यन्ततो लक्षणीयत्वादिति चेन्न , अप्रतीतौ लक्षणापेक्षित्वात् सर्वत्र चाप्रतीत्यभावात् तथा हि-- शिरसा पादेन गवामनुबध्नन्ति विद्वांसः , न पुनरेतावप्यन्यतः समीक्षन्ते । यस्तु सर्वथैवाप्रतिपन्नः , न तं प्रत्युपदेशः , तस्य बालमूकादिवदनधिकारात् ।
गन्धसहचरितचतुर्दशगुणवत्त्वमपि पृथिव्या इतरेभ्यो वैधर्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह - - रूपरसगन्धेति । अत्र द्वन्द्वानन्तरं मतुप्प्रत्यययोगात् प्रत्येकं रूपादीनां पृथिव्या सह सम्बन्धो लभ्यते । सूत्रकारस्याप्येते गुणाः पृथिव्यामभिमता इत्याह-- एते चेति । गुणानां विनिवेशो द्रव्येषु वृत्तिः , सा प्रतिपाद्यते अनेनाधिक्रियतेऽस्मिन्निति गुणविनिवेशाधिकारो द्वितीयोऽध्यायः । तस्मिन् रूपरसगन्धस्पर्शाः पृथिव्यां सिद्धाः सूत्रकारेण प्रतिपादिताः -- रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवीति । चाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । “ सङ्ख्या परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे कर्म्म च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षुषाणि " ( ४१ - - १ ) इति चाक्षुषवचनाद् रूपवत्यां पृथिव्यां सङ्ख्यादयः सप्त सिद्धाः । यदि ते रूपिद्रव्येषु न सन्ति तत्समवाये तेषां प्रत्यक्षत्वं सूत्रकारेण नोक्तं स्यादित्यर्थः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( इससे ) पहिले दो या दो से अधिक पदार्थों में रहनेवाले एक दूसरे की अपेक्षा से जो असाधारण धर्म हैं — वे ही कहे गये हैं । अब प्रत्येक द्रव्य में रहनेवाले असाधारण धर्म ही कहे जाते हैं । ' एकैकशः ' इस पद में प्रयुक्त वीप्सा के बोधक ' शस् ' प्रत्यय के प्रयोग से इस बात की सूचना होती है कि लक्षण कहने के इस क्रम का दायरा बहुत दूर तक अर्थात् प्रत्येक द्रव्य के लक्षण कहने तक है ।
पृथिवीत्वादिसम्बन्धात् पृथिवी । जो कोई पृथिवी को स्वरूपतः जानते हुए भी उसमें ' पृथिवी ' शब्द का व्यवहार नहीं कर पाते पृथिवीत्व जाति और पृथिवीत्व जाति के अव्यभिचरित सम्बन्ध इन दोनों के द्वारा पृथिवी में ' पृथिवी ' पद का उनके व्यवहार के लिए " पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवी " इस वाक्य से पृथिवी का असाधारण धर्म कहते हैं । इसका व्यवहार ' पृथिवी ' शब्द से करना चाहिए , क्योंकि इसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध है ।
जो पृथिवी शब्द से व्यवहृत नहीं होता है , उसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध नहीं है , जैसे कि जलादि में , यह पृथिवी से असम्बद्ध भी नहीं है , तस्मात् इसका व्यवहार ' पृथिवी ' शब्द से करना चाहिए । अथवा जो लोगों से ' पृथिवी ' शब्द को सुनता है , किन्तु पृथिवी के स्वरूप को नहीं जानता कि वह कैसी है ? पृथिवी को सजातीयों से एवं विजातीयों से भिन्न समझानेवाले असाधारण धर्म्म के द्वारा उसे समझाने के लिए ' पथिवीत्वाभिसम्बन्धात् ' इत्यादि वाक्य कहते हैं ।
जिसका व्यवहार लोक में ' पृथिवी ' शब्द से होता है , वही पृथिवी है , क्योंकि उसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध है । जैसा कि उद्योतकर ने कहा है कि लक्ष्य को उनके समानजातीयों से एवं असमानजातीयों से भिन्न रूप में समझाना ही लक्षण का काम है । इससे यह आक्षेप भी खण्डित हो जाता है कि पदार्थं अगर प्रसिद्ध हैं तो फिर उनका लक्षण करना ही व्यर्थ है । अगर अप्रसिद्ध हैं तब तो और भी व्यर्थ है ।
स्वरूपतः ज्ञात वस्तुओं के विशेष व्यवहार के लिए एवं सामान्यतः प्रसिद्ध वस्तुओं के विशेष रूप से जानने के लिए ही लक्षण की प्रवृत्ति होती है । ( प्र ० ) इस प्रकार तो अनवस्था होगी क्योंकि उन लक्षणों को विशेष रूप से जानने के लिए भी दूसरे लक्षणों की आवश्यकता होगी , उनके विशेष ज्ञान के लिए फिर तीसरे की । ( उ ० ) सम्यक् प्रतीति न होने पर ही लक्षणों की अपेक्षा होती है , किन्तु सभी स्थलों में वस्तुओं की अप्रतीति नहीं होती ।
विद्वान् लोग शिर और पैर से गाय को समझते हैं , किन्तु शिर और पैर को किसी ओर से समझने की आवश्यकता नहीं होती । जो व्यक्ति इन सब बातों से सर्वथा अनजान है , उसके लिए उपदेश है ही नहीं , क्योंकि वह तो बालक और गूंगे की तरह उपदेश का सर्वथा अनधिकारी है ।
" गन्ध से युक्त चौदह गुणों का रहना भी औरों की अपेक्षा से पृथिवी का असाधारण धर्म है ” यही समझाने के लिए " रूपरसगन्धस्पर्श संख्या " इत्यादि वाक्य है । इस वाक्य में द्वन्द्व समास के बाद मतुप् प्रत्यय है , अन : कथित रूपादि गुणों में से प्रत्येक का सम्बन्ध पृथिवी के साथ ज्ञात होता है । पृथिवी में ' इतने गुण है ' इस विषय में महर्षि कणाद की सम्मति " एते च " इत्यादि से दिखलाते हैं ।
' गुणानां विनिवेशोऽधिक्रियते अस्मिन् ' इस व्युत्पत्ति के बल से द्रव्य में गुणों की विद्यमानता जिसमें कही गयी है , वह द्वितीय अध्याय हो यहाँ ' गुणविनिवेशाधिकार ' शब्द से कहा गया है । गुणविनिवेशाधिकार के " रूपरसगन्धस्पर्शवत्ती पृथिवी ” ( २ - १ - १ ) इस सूत्र से पृथिवी मे रूप , रस , गन्ध और स्पर्श की सत्ता सूत्रकार ने कही हैं ।
" संख्या परिमाणानि पृथकत्वं संयोगविभागो परत्वापरत्वे च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षुषाणि " ( ४ - १ - १ ) इस सूत्र से संख्यादि सात गुणों को रूप युक्त द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध के कारण ' चाक्षुष ' कहा है । जिससे रूपयुक्त पृथिवी में संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , परत्व और अपरत्व येसात गुण समझना चाहिए | अभिप्राय यह है कि संख्यादि सात गुण अगर रूपवाले द्रव्यों में न रहते तो ' रूपिद्रव्य के समवाय से इनका प्रत्यक्ष होता है ' यह सूत्रकार न कहते ।
In English
Discussion on Commonality and Difference of Categories
This text is a commentary on the Prasastapada Bhasya regarding the shared characteristics of various categories. It explains the three commonalities of the six primary categories—existence, expressibility, and knowability—and details the specific relationships between substances, qualities, and actions.
This article answers
- Prasastapada bhasya sadharmya vaidharmya prakarana summary?
- Three commonalities of the six padarthas?
- Difference between existence and expressibility in vaishesika philosophy?
- Relationship between substance quality and action in vaishesika?