व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य
प्रशस्तपादभाष्य — द्रव्य: पृथिवी, जल, तेज, वायु
25 मूल पद्य
पृथिवीनिरूपणम्
पृ. ७०
पृथिवीत्वामिसम्बन्धात् पृथिवी ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पृथिवी जाति के सम्बन्ध से यह पृथिवी है यह व्यवहार करना चाहिए ।
पृ. ७१
रूपरसगन्धस्पर्शसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्व संयोगविभागपरत्वाप रत्वगुरुत्वद्रवत्वसंस्कारवती ।
एते च गुणविनिवेशाधिकारे रूपादयो गुण- यह पृथिवी रूप , रस , गन्ध , स्पर्श , संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , परत्व , विशेषाः सिद्धाः ।
चाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः ।
पतनोपदेशाद् गुरुत्वम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अपरत्व गुरुत्व , द्रवत्व और संस्कार इन चौदह गुणों से युक्त है । ये रूपादि गुणविशेष ' गुणविनिवेशाधिकार ' अर्थात् कौन गुण किस द्रव्य में है ? इसके प्रतिपादक वैशेषिक सूत्र के द्वितीय अध्याय के सूत्रों से पृथिवी में सिद्ध हैं । चाक्षुष् घटित सूत्र ( ४ - १ - ११ ) से पृथिवी में संख्या प्रभृति सात गुण सिद्ध हैं । महर्षि कणाद ने ( ५-१-७ से ) कहा है कि पृथिवी पतनशील
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
पतनोपदेशाद् गुरुत्वमिति । “ संयोग प्रतियत्नाभावे गुरुत्वात् पतनम् " ( ५ । १ । ७ ) इत्युपदेशात् सूत्रकारेण पतनसम्बन्धिन्यां पृथिव्यां गुरुत्वमस्तीत्यर्थात् कथितम् , व्यधिकरणस्याकरणत्वात् । अद्भिः सामान्यवचनाद् द्रवत्वम् , “ सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां पार्थिवानामग्निसंयोगाद् द्रवत्वमद्भिः इति नैमित्तिकं सामान्यम् " ( २ । १ । ७ ) वचनात् पृथिव्यां द्रवत्वमस्तीत्युक्तम् । मधूच्छिष्टशब्देन सिक्थस्याभिधानम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' पतनोपदेशाद् गुरुत्वम् ' अर्थात् ' ' संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ' ( ५ । १ । ७ ) इस सूत्र से महर्षि कणाद ने उपदेश किया है कि पतनशील पृथिवी में गुरुत्व है , क्योंकि एक आश्रय में विद्यमान वस्तु दूसरे आश्रय में कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकती । ' अद्भिः सामान्यवचनाद् द्रवत्वम् ' अर्थात् “ सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां पार्थिवानामग्निसंयोगाद् द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् ” ( २ । १ । ७ ) अर्थात् घृत , लाह , मोम प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में अग्नि के संयोग से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । यह ( नैमित्तिक द्रवत्व ) पृथिवी और जल दोनों में समान रूप से है । ‘ मधूच्छिष्ट ' शब्द का अर्थ है ' सिक्थ ' अर्थात् मोम । इस सूत्र से महर्षि कणाद ने कहा है कि पृथिवी में नैमित्तिक द्रवत्व है ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ७३) १. एक मात्र विजयनगरम् संस्कृत ग्रन्थमाला में मुद्रित न्यायकन्दली को पुस्तक में इस सूत्र का पाठ है " संयोगप्रतियत्नाभावे गुरुत्वात्पतनम् ' ( पृ ० २६ पं ० १४ ) । यद्यपि यह ठीक है कि विरुद्ध यत्न भी पतन का प्रतिबन्धक है , जिससे कि आकाश में उड़ते हुए पक्षी का पतन नहीं होता है । अतः पतन के लिए उसका भी अभाव अपेक्षित है । किन्तु ढेले को फेंकने पर कुछ दूर तक उसका भी पतन नहीं होता है , अतः वेग को भी पतन का प्रतिबन्धक कहना ही चाहिए । न कहने पर न्यूनता होगी । अतः प्रथमोपात्त संयोग पद को उपलक्षण मानकर उसे पतन के सभी प्रतिबन्धकों में लाक्षणिक १० मानना पड़ेगा । तब ' प्रतियत्न ' पद की आवश्यकता नहीं रह जाती है । इसी अभिप्राय से वैशेषिक सूत्र के सर्वमान्य वृत्तिकार श्रीशङ्कर मिश्र ने भी इस सूत्र की व्याख्या की है ( वै ० उपस्कार पृ ० १ ९ ७ पं ० २३ गुजराती प्रे ० सं ० ) । किरणावली में मुद्रित सूत्रपाठ में भी ' प्रतियत्न ' शब्द नहीं है । ( बनारस सं ० सिरीज में मुद्रित किरणावली सूत्र पाठ १० ६ पं ० १७ ) । अतः यहाँ पर ' संयोग प्रतियत्नाभावे गुरुत्वात्पतनम् ' यह पाठ न रखकर ' संयोगाभावे गुरुत्वात्पतनम् ' यही पाठ रखना उचित समझा गया |
पृ. ७३
अद्भिः सामान्यवचनाद् द्रवत्वम् ।
उत्तरकर्मवचनात् संस्कारः ।
क्षितावेव गन्धः ।
रूपमनेकप्रकारं शुक्लादि ।
रसः षड् विधो मधुरादिः ।
गन्धो द्विविधः सुरभिरसुरभिश्च ।
स्पर्शोऽस्या अनुष्णाशीतत्वे सति पाकजः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — है ' अतः ( समझना चाहिए कि ) गुरुत्व नाम का गुण भी पृथिवी में उन्हें अभीष्ट है । जल के साथ सादृश्य ( २-१-७ ) कहने से पृथिवी में द्रवत्व भी उन्हें अभीष्ट है । शर प्रभृति पार्थिव द्रव्य के उत्तर कर्म में संस्कार को कारण कहने ( ५–१–१७ ) से पृथिवी में ( वेग और स्थितिस्थापक ) संस्कार भी उन्हें अभिप्रेत हैं । गन्ध पृथिवी में ही है । शुक्लादि अनेक प्रकार के रूप भी पृथिवी में ही हैं । मधुरादि छः प्रकार के रस भी पृथिवी में ही हैं । सुरभि ( सुगन्ध ) और असुरभि ( दुर्गन्ध ) भेद से गन्ध दो प्रकार का है । पाकज अनुष्णाशीत स्पर्श भी पृथिवी में ही है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
उत्तरकर्मवचनात् संस्कार इति । " नोदनादाद्यमिषोः कर्म , तत्कर्मकारिताच्च संस्कारात् तथोत्तरमुत्तरञ्च " ( ५ । १ । १७ ) इति सूत्रकारेण इषौ पार्थिवद्रव्ये कर्महेतुः संस्कार इति दर्शयता पृथिव्यां वेगोऽस्तीति ज्ञापितम् , ' अविद्यमानस्याहेतुत्वात् । यथा चैक एव संस्कार आपतनात् तथोपपादयिष्यामः ।
क्षितावेव गन्धः । अयमस्यार्थः -- केवल एवायमसाधारणधर्म इति । सुगन्धि सलिलम् , सुगन्धिः समीरण इति प्रत्ययाद् द्रव्यान्तरेऽपि गन्धोऽस्तीति चेन्न , पार्थिव द्रव्यसमवायेन तद्गुणोपलब्धः । कथमेष निश्चय इति चेत् तदभावेऽनुपलम्भात् । यद्यपि रूपं त्रयाणाम् , तथाप्यवान्तरभेदापेक्षया तदपि पृथिव्या एव वैधर्म्यमाह - रूपमनेकप्रकारकमिति । अत्रापि क्षितावेवेत्यनुसन्धानीयम् । शुक्लपीताद्यनेकविधं रूपं क्षितावेव नान्यत्रेत्यथः । एकस्यां पृथिवीत्वजातौ नानारूपाणि व्यक्तिभेदेन समवयन्ति ।
क्वचिदेकस्यामपि व्यक्तावनेकप्रकाररूपसमावेशः , यत्र नानाविधरूपसम्बन्धिभिरवयवैरवयव्यारभ्यते । कथमेतदिति चेत् ? उच्यते , यथावयवैरवयव्यारब्धस्तथावयवरूपैरवर्यावनि रूपमारब्धव्यम् , अवयवेषु च न शुक्लमेव रूपमस्ति , नापि श्याममेव किन्तु श्यामशुक्लहरितादीनि । न च तेषामेकं रूपमेवारभते नापराणीत्यस्ति नियमः , प्रत्येकमन्यत्र सर्वेषामपि सामर्थ्यदर्शनात् । न च परस्परं विरोधेन सर्वाण्यपि नारभन्त एवेति युक्तम् । चित्ररूपस्यावयविन : प्रतीतेररूपस्य द्रव्यस्य प्रत्यक्षत्वाभावाच्च ।
न चावयवरूपाणि समुच्चितान्यत्र चित्रधिया प्रतीयन्ते तेनैवावयवी प्रत्यक्ष इति कल्पनायामन्यत्रापि तथाभावप्रसङ्गेनावयविरूपोच्छेदप्रसङ्गः , तस्मात् सम्भूय तैरारभ्यते । तच्चारभ्यमाणं विविध कारणस्वभावानुगमाच्छ्यामशुक्लहरितात्मकमेव स्यात् , चित्रमिति च व्यपदिश्यते । विरोधादेकमनेकस्वभावमयुक्तमिति चेत् ? तथा च प्रावादुकप्रवादः-“ एकञ्च चित्रञ्चेत्येतत्तच्च चित्रतरं ततः " इति । को विरोधो नीलादीनाम् , न तावदितरेतराभावात्मकः , भावस्वभावानुगमादन्योन्यसंश्रयापत्तेश्च ।
स्वरूपान्यत्वं विरोध इति चेत् ? सत्यमस्त्येव । तथापि चित्रात्मनो रूपस्य नायुक्तता , विचित्रकारणसामर्थ्यभाविनस्तस्य सर्वलोकप्रसिद्धेन प्रत्यक्षेणैवोपपादितत्वात् । अचित्रे पार्श्वे पटस्येव तदाश्रयस्य चित्ररूपस्य ग्रहणप्रसङ्गस्तस्यैकत्वादिति चेन्न , अन्वयव्यतिरेकाभ्यां समधिगतसामर्थ्यस्यावयवनानारूप दर्शनस्यापि चित्ररूपग्रहणहेतुत्वात् , तस्थ च पाश्र्वान्तरेऽभावात् । नन्वेवं तहि नानारूपैर्द्वयणुकैरारब्धे द्रव्ये न चित्ररूपग्रहणम् , तदवयवरूपग्रहणाभावात् ?
को नामाह न तथेति नहि परमसूक्ष्मस्य वस्तुनो रूपं विविच्य गृह्यते , यस्य तु विविच्य गृह्यते तस्यावयवरूपाण्यपि गृह्यते । यस्त्वव्यापकानि बहूनि चित्ररूपाणीति मन्यते , तस्य नीलपीताभ्यामारब्धे द्वितन्तु रूपानुत्पत्तिरेकैकस्यावयवरूपस्यानारम्भकत्वात् । अथ मतम् - तत्रो - भाभ्यामेकं चित्रं रूपमारभ्यते , तदन्यत्रापि तथा स्यादविशेषात् । विवादाध्यासितं चित्रद्रव्यमेकरूपद्रव्यसम्बन्धि द्रव्यत्वादितरद्रव्यवत् , तद्गतं रूपमेकमवयविरूपत्वाद् इतरावयविद्रव्यरूपवत् ।
रसः षड्विध इत्यत्रापि पूर्ववद् व्याख्यानम् । यद् गन्धस्य भेदनिरूपणं तत् पारम्पर्येण पृथिव्या अपि स्वरूपकथनमित्यभिप्रायेणाह - गन्धो द्विविध इति । तदेव द्वैविध्यं दर्शयति - सुरभिरसुरभिश्चेति । असुरभिरिति सुरभिगन्धविरुद्धं प्रतिद्रव्यादिसमवेतं प्रतिकूलसंवेदनीयं गन्धान्तरम् , न तु तदभावमात्रम् , विधिरूपेण सातिशयतया च संवेदनात् । उपेक्षणीयस्तु गन्धोऽनुद्भूतसुरभ्यसुरभिप्रभेद एवेति पृथनोच्यते । अथवा सोऽप्यसुरभिरेव , सुरभिगन्धादन्योऽसुरभिरिति व्युत्पादनात् ।
यथाभूतः स्पर्शो s स्या वैधर्म्यं तथा दर्शयति स्पर्शोऽस्या इति । पाकज: स्पर्शः पृथिव्या वैधर्म्यं तस्य स्वरूपकथनमनुष्णाशीतइति । यद्यपि स्पर्शवत्पाकजौ रूपरसावप्यस्याः वैधर्म्यम् , तथापि रूपरसयोः पाकजत्वानभिधानम् , अन्यथापि तयोर्वैधर्म्यस्य सम्भवात् वैधर्म्यमात्रप्रतिपादनस्यैव विवक्षितत्वात् । अप्रतीयमानपाकजेषु स्तम्भादिषु स्पर्शस्य पाकजत्वमनुमानात् । स्तम्भादिषु स्पर्शः पाकजः , पार्थिवस्पर्शत्वात् घटादिस्पर्शवत् । घटादिस्पर्शस्यापि पाकजत्वमेकेन्द्रियग्राह्यत्वे सति तद्गुणत्वात् तद्गतरूपवत् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' उत्तरकर्म्मवचनात् संस्कार : ' अर्थात् ' नोदनादाद्यमिषोः कर्म्म , तत्कर्म्मकारिताच्च संस्कारात् तथोत्तरमुत्तरञ्च ' ( ५-१-१७ ) | ( अर्थात् तीर की पहिली क्रिया नोदन से होती है , उस क्रिया से उत्पन्न संस्कारों के द्वारा शर के आगे आगे की क्रियायें होती हैं ) ' शर रूप पार्थिव द्रव्य में कर्म का कारण संस्कार है ' इस उक्ति के द्वारा महर्षि कणाद ने यह सूचित किया है कि ' पृथिवी में वेग है ' , " क्योंकि किसी आश्रय में अविद्यमान कोई भी वस्तु उस आश्रय में कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकती । पतन पर्यन्त एक ही वेगाख्य संस्कार जिस प्रकार से रहता है , उसका प्रतिपादन हम आगे करेंगे |
' क्षितावेव गन्ध : ' इस वाक्य का अर्थ है कि गन्ध दूसरे की अपेक्षा न करते हुए केवल पृथिवी का असाधारण धर्म है । ( प्र ० ) ' जल में सुगन्धि है , वायु में सुगन्धि है ' इत्यादि प्रतीतियों से ओर द्रव्यों में भी गन्ध सूचित होता है ? ( उ ० ) पार्थिव द्रव्य के ( संयुक्तसमवेत ) समवाय से ही जलादि द्रव्यों में गन्ध की उपलब्धि होती है | ( प्र ० ) यह कैसे समझते हैं ? ( उ ० ) क्योंकि पार्थिव द्रव्य का सम्बन्ध न रहने से जलादि में गन्ध की उपलब्धि नहीं होती है ।
यद्यपि रूप पृथिवी , जल और तेज इन तीनों द्रव्यों में है , किन्तु अगर विशेष रूप से देखा जाय तो अनेक प्रकार के रूप पृथिवी में ही हैं , इस प्रकार रूप भी पृथिवी का असाधारण धर्म हो सकता है । इसी अभिप्राय से " रूपमनेकप्रकारकम् ” यह वाक्य लिखा है । इस वाक्य में भी ' क्षितावेव ' इतना इस अभिप्राय से जोड़ देना चाहिए कि शुक्ल पीतादि अनेक प्रकार के रूप पृथिवी में ही हैं , और द्रव्यों में नहीं । एक ही पृथिवीत्व जाति के द्रव्यों में व्यक्तिभेद से अनेक प्रकार के रूप देखे जाते हैं ।
कहीं एक ही व्यक्ति में नाना प्रकार के रूपों का समावेश देखा जाता है , जहाँ कि नाना रूप के अवयवों से एक अवयवी की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) यह कैसे होता है ? ( उ ० ) जिस तरह अवयवों से अवयवी की उत्पत्ति होती है , उसी प्रकार अवयवों के रूपों अ arat में रूप को उत्पत्ति होती है । ( कथित पट के ) अवयवों में न केवल शुक्ल रूप ही है , न केवल नील रूप ही , किन्तु श्याम शुक्ल , हरित प्रभृति अनेक रूप हैं ।
इसका कोई नियामक नहीं है कि उनमें से कोई एक ही रूप अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हैं और रूप नहीं , क्योंकि उनमें से प्रत्येक रूप और जगह अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हुए दीख पड़ते हैं । यह भी ठीक नहीं है कि यहाँ परस्पर विरोध के कारण कोई भी रूप अवयवी में रूप को उत्पन्न नहीं करते , क्योंकि चित्र रूप से युक्त अवयवी का प्रत्यक्ष होता है , एवं बिना रूप के द्रव्य का चाक्षुषप्रत्यक्ष हो भी नहीं सकता !
यह भी सम्भव नहीं है कि अवयवों के ही रूप अवयवी में सम्मिलित होकर चित्रबुद्धि से प्रतीत होते हैं , एवं उसी चित्र रूप से अवयवी का भी प्रत्यक्ष होता है , क्योंकि इस प्रकार की कल्पना से तो सभी अवयवी की यही दशा होगी , फलतः अवयवियों से रूप की सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् अवयवों के सभी रूप मिलकर ही उस अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हैं । इस अवयवी में उत्पन्न होनेवाला वह एक रूप कारणों के अनेक स्वभाव से श्याम शुक्ल और हरित स्वरूप ही होगा जो ' चित्र ' शब्द से व्यवहृत होता है ।
( प्र ० ) विरोध के कारण एक वस्तु को अनेक स्वभाव का मानना ठीक नहीं है । ( उ ० ) लोक में यह प्रसिद्ध है कि ' चित्र ' रूप एक है और यह उस चित्र रूप से चित्रतर ' है । फिर नीलादि रूपों में परस्पर विरोध ही क्या है ? क्योंकि वे परस्पर अभाव स्वरूप नहीं हैं , क्योंकि उनमें से प्रत्येक में भावत्व की प्रतीति होती है एवं परस्पराभाव रूप मानने में अन्योन्याश्रय दोष भी होगा । ( प्र . ) एक में दूसरे की स्वरूपभिन्नता ही दोनों में विरोध है ?
( उ ) यह विरोध ठीक है , किन्तु इससे चित्ररूप की अत्युक्तता सिद्ध नहीं होती , क्योंकि विलक्षण कारणों से उत्पन्न चित्र रूप सर्वजनीन प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है । ( प्र . ) जिस पट के कुछ अंश बिलकुल सफेद हैं , और कुछ अंश चित्र रूप के हैं , उसमें शुक्ल रूप के ग्रहण से जैसेपट का ग्रहण होता है वैसे ही चित्र रूप का भी ग्रहण होना चाहिए , क्योंकि प्रकृत में शुक्लरूपाभय पट और चित्ररूपाश्रय पट दोनों एक ही हैं ?
( उ ) कारणता अन्वय और व्यतिरेक इन दोनों के अधीन है , ये दोनों जिसे जिसका कारण सिद्ध करेंगे वही उसका कारण होगा । तदनुसार चित्र रूप के प्रत्यक्ष में उसके आश्रय के अवयवों का प्रत्यक्ष भी कारण है । वह सफेदवाले अंश में नहीं है ( इसी से वहाँ चित्र रूप का प्रत्यक्ष नहीं होता है ) । ( प्र . ) तो फिर नाना रूप के द्वद्यणुकों से बने हुए द्रव्य में चित्र रूप का प्रत्यक्ष नहीं होगा ?
क्योंकि उत्पन्न होनेवाले द्रव्य के द्वथणुक रूप अवयव अतीन्द्रिय हैं , अतः उनके रूपों का ज्ञान सम्भव नहीं है । ( उ ) कौन कहता है कि ऐसा नहीं होता है । परम सूक्ष्म वस्तु के रूप नहीं देखे जाते जिसका रूप अच्छी तरह देखा जाता है उसके अवयवों के रूप भी देखे हो जाते हैं ।
जो कोई ' एक ही अवयवी में रहनेवाले अव्याप्यवृत्ति अनेक रूप ही चित्र रूप है ' ऐसा मानते हैं उनके मत में नील और पीत रूप के दो तन्तुओं से भारब्ध पट में रूप की उत्पत्ति नहीं होगी , क्योंकि अवयव का एक रूप तो कारण नहीं है ( प्र . ) वहाँ दोनों रूप मिलकर एक चित्र रूप का उत्पादन करते हैं । ( उ . ) तो फिर और स्थानों में भी वही होगा , क्योंकि स्थिति में कोई अन्तर नहीं है । ( १ ) विवाद का विषय यह चित्र द्रव्य एक रूप के द्रव्य का सम्बन्धी है , क्योंकि वह द्रव्य है ।
( २ ) उसमें रहनेवाला रूप एक ही है , क्योंकि वह अवयवी का रूप है । जैसे कि और अवयवी द्रव्यों का रूप ।
' रसः षड्विध : ' इस वाक्य की व्याख्या भी ' रुपमनेकप्रकारकम् ' इस पहिले वाक्य की तरह है । गन्ध के भेद का निरूपण परम्परा से पृथिवी के ही स्वरूप का निरूपण है , इसी अभिप्राय से गन्धो द्विविधः ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । यही दोनों प्रकार ' सुरभिरसुरभिश्च ' इस वाक्य से लिखते हैं । ' असुरभि ' शब्द का अर्थ सुगन्ध के विरोधी किसी विशेष द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला अनभीष्ट रूप से ज्ञात होनेवाला दूसरा गन्ध है , केवल सुरभि का अभाव नहीं , क्योंकि भावत्व रूप से और न्यूनाधिक भाव से उसका भान होता है । उपेक्षणीय गन्ध अनुभूत सुरभि और धनु - भूत असुरभि का ही प्रभेद है , अतः उसे अलग से नहीं कहा गया । अथवा उपेक्षणीय गन्ध असुरभि ' शब्द का ही अर्थ है , क्योंकि ' असुरभि ' शब्द का ऐसा अर्थ है कि सुरभिगन्धादन्यो गन्ध : ' अर्थात् सुरभि गन्ध से भिन्न गन्ध ही ' असुरभि ' शब्द का अर्थ है ।
' किस प्रकार का स्पर्श पृथिवी का असाधारण धर्म है ' यह ' स्पर्शोऽस्याः ' इत्यादि से दिखलाते हैं । पाकज स्पर्श ही पृथिवी का असाधारण धर्म है , ' अनुष्णाशीतः ' यह अंश उसी के स्वरूप का कथन है । यद्यपि स्पर्श की तरह पाकज रूप एवं पाकज रस भी पृथिवी के असाधारण धर्म हो सकते हैं , फिर भी असाधारण धर्म के लिए कथित रूप और रस में पाकजस्व इस लिए नहीं कहा कि वे और तरह से भी पृथिवी के वैधर्म्य हो सकते हैं । यहाँ केवल वैधम्यं प्रतिपादन ही इष्ट है । स्तम्भादि जिन पार्थिव द्रव्यों के स्पर्श में पाकजत्व का प्रत्यक्ष नहीं होता है , उन स्पर्शो में भी पाकजत्व का अनुमान करेंगे कि स्तम्भादि के स्पर्श पाकज हैं , क्योंकि वे पृथिवी के स्पर्श हैं , जैसे घटादि के स्पर्श । घट के स्पर्श में पाकजत्व का अनुमान इस प्रकार करेंगे कि वह पार्थिव होने के साथ साथ एक मात्र इन्द्रिय से गृहीत होता है , जैसे कि उसका रूप । ( अतः वह भी पाकज है ) ।
पृ. ७८
सा च द्विविधा - नित्या चानित्या च ।
परमाणुलक्षणा नित्या , कालक्षणा त्वनित्या ।
सा च स्थैय्याद्यवयवसन्निवेशविशिष्टाऽपरजातिबहुत्वोपेता शयनासनाद्यने कोपकारकरी च ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( १ ) परमाणुरूपा नित्य पृथिवी एवं ( २ ) कार्यरूपा अनित्य पृथिवी , इस भेद से पृथिवी के दो भेद हैं । इनमें कार्यरूपा पृथिवी स्थैर्यादि ( घनत्व शिथिलत्वादि ) अवयवों के विलक्षण संयोग से युक्त है और उसमें अनेक अपर जातियाँ रहती हैं । वह बिछावन और आसनादि द्वारा अनेक उपकारों का कारण है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अवान्तरभेदनिरूपणार्थमाह-- नित्या चानित्या चेति । प्रकारान्तराभावसंसूचनार्थी चशब्दौ । का नित्या का चानित्येत्याह-- परमाणुलक्षणा नित्या कार्यलक्षणा त्वनित्येति । उभयत्रापि लक्षणशब्दः स्वभावार्थः । परमाणुस्वभावायाः पृथिव्याः सत्त्वे किं प्रमाणम् ? अनुमानम् , अणुपरिमाणतारतम्यं क्वचिद् विश्रान्तं परिमाणतारतम्यत्वाद् महत्परिमाणतारतम्यवत् , यत्रेदं विश्रान्तं यतः परमाणुर्नास्ति स परमाणुः ।
अत एव नित्यो द्रव्यत्वे सत्यनवयवत्वादाकाशवत् अथायं सावयवो न तहि परमाणुः , कार्टापरिमाणापेक्षया तदवयवपरिमाणस्य लोकेऽल्पीयस्त्वप्रतीतेः , यश्च तस्यावयवः स परमाणुर्भविष्यति । अथ सोऽपि न भवति , अवयवान्तरसद्भावात् ? एवं तर्ह्यनवस्था , ततश्चावयविनामल्पतरतमादिभावो न स्यात् , सर्वेषामनन्तकारणजन्यत्वाविशेषेण परिमाण प्रकर्षाप्रकर्षहेतोः कारणसङ्ख्याभूयस्त्वाभूयस्त्वयोरसम्भवात् । अस्ति तावदयं परिमाणभेदः , तस्मादणुपरिमाणं क्वचिन्निरतिशयमिति सिद्धो नित्यः परमाणुः ।
स चैको नारम्भकः , एकस्य नित्यस्य चारम्भकत्वे कार्य्यस्य सततोत्पत्तिः स्यादपेक्षणीयाभावात् , अविनाशित्वश्च प्रसज्येत , आश्रयविनाशस्यावयविभागस्य च विनाशहेतोरभावात् । त्रयाणामप्यारम्भकत्वमयुक्तम् , इह महत्कार्य्यद्रव्यस्योत्पत्तौ स्वपरिमाणापेक्षया s पपरिमाणस्य कार्य्यद्रव्यस्यैव सामर्थ्यदर्शनात् । त्र्यणुकं कार्य्यद्रव्येणैव जन्यते , महत्परिमाणत्वात् घटवत् । एवं त्रयाणामेकस्य चारम्भकत्वे प्रतिक्षिप् द्वाभ्यामेव परमाणुभ्यामारभ्यते यत् तद्व्यणुकमिति सिद्धम् ।
द्वयणुकैर्बहुभिरारभ्यत इत्यपि नियमो न द्वाभ्यां तस्याणुपरिमाणोत्पत्तौ कारणसद्भावेनाणुत्वोत्पत्तावारम्भवैयर्थ्यात् , बहुषु त्वनियमः । कदाचित् त्रिभिरारभ्यत इति त्र्यणुकमित्युच्यते , कदाचिच्चतुभिरारभ्यते , कदाचित् पश्चभिरिति यथेष्टं कल्पना । न च कार्य्यस्य व्यर्थता , यथा यथा कारणसङ्ख्याबाहुल्यं तथा तथा महत्परिमाणतारतम्योपलम्भात् ।
न चैवं सति द्वयणुकानामेव घटारम्भकत्वप्रसक्तिः , घटस्य भङ्गेऽल्पतरतमादिभागदर्शनेन तथैवारम्भकल्पनात् तदेवं द्वयणुकादिप्रक्रमेण क्रियते कार्य्यलक्षणा पृथिवी ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' नित्या चानित्या च ' यह वाक्य पृथिवी के अवान्तर भेद के निरूपण के सिए लिखते हैं । ' पृथिवी के और प्रकार नहीं हैं ' इसकी सूचना देने के लिए ही दोनों ' च ' शब्द लिखे गये हैं । इनमें कौन नित्य है ? और कौन अनित्य ? यह समझाने के लिए लिखते हैं कि परमाणुलक्षणा नित्या , कार्यलक्षणा त्वनित्या ' इस वाक्य के दोनों ही ' लक्षण ' शब्द स्वभाव ' ' के बोधक हैं । ( प्र ० ) परमाणु स्वभाव की पृथिवी की सत्ता में प्रमाण क्या है ?
( उ ० ) यह अनुमान प्रमाण है कि अणुपरिमाण का न्यूनाधिक भाव भी कहीं समाप्त होता है , क्योंकि वह भी परिमाण का न्यूनाधिक भाव है , जैसे कि महत्परिमाण का न्यूनाधिक भाव । अणुपरिमाण का यह तारतम्य जहाँ समाप्त होता है , चूँकि उससे छोटा कोई और अणु नहीं है , अतः वही परमाणु है । अतएव वह नित्य भी है , क्योंकि वह द्रव्य होने पर भी सावयव नहीं है जैसे कि आकाश | अगर वह सावयव है तो फिर वह परमाणु नहीं है , क्योंकि यह लोक में सिद्ध है कि कार्य के परिमाण से कारण का परिमाण अल्प होता है ।
फिर वही कारणीभूत द्रव्य परमाणु कहलायेगा । यह परमाणु भी नहीं कहला सकता , अगर इसके छोटे अवयव हैं । इस प्रकार ( परमाणु को सावयव मानने में ) अनवस्था होगी , एवं इस अनवस्था से अवयवियों में परस्पर छोटे बड़े के भेद ही उठ जायेंगे । कोई अवयवी किसी दूसरे अवयवी से बड़ा इसलिए है कि उसका निर्माण उस छोठे अवयवी के निर्माणक अवयवों से अधिक संख्यक अवयवों से होता है । कोई अवयवी किसी अवयवी से छोटा इसलिए है कि उस अवयवी के निर्मापक अवयवों से अल्पसंख्यक अवयवों से उसका निर्माण होता है ।
अगर सभी को सावयव मान लें तो सभी अवयवियों को असंख्य अवयवों से निर्मित मानना पड़ेगा । फिर अवयवियों में परस्पर छोटे बड़े का व्यवहार ही किससे होगा ? किन्तु अवयवियों में परस्पर छोटे बड़े का भेद सर्वजनीन अनुभव से सिद्ध है । तस्मात् अणुपरिमाण का न्यूनाधिक भाव अवश्य ही कहीं समाप्त होता है । जहाँ यह समाप्त होता है वही ' नित्य परमाणु ' है ।
उन परमाणुओं में से किसी एक से ही कार्य्यं की उत्पत्ति नहीं हो सकती , क्योंकि इससे सभी समय कार्योत्पत्ति की आपत्ति होगी , कारण कि उसे दूसरे को अपेक्षा नहीं है ।
अगर एक ही नित्य वस्तु ८० से कार्य की उत्पत्ति मानें तो कार्य का विनाश ही असम्भव होगा , क्योंकि कार्यों का नाश दो ही वस्तुओं से सम्भव है , एक तो आश्रय के नाश से ( समवायिकारण के नाश से ) दूसरे अवयवों के विभाग से ( फलतः असमवायिकारण के नाश से ) , ये दोनों ही प्रकार नित्य वस्तु से कार्यों की उत्पत्ति मान लेने पर असम्भव हैं । तीन परमाणु भी मिलकर कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकते , क्योंकि तीन परमाणुओं से जो बनेगा वह अवश्य ही महान् होगा ।
महत्परिमाण के कार्यद्रव्य का यह स्वभाव सर्वत्र देखा जाता है कि उसकी उत्पत्ति उसके परिमाण से न्यून परिमाणवाले कार्यद्रव्यों से होती है । तस्मात् व्यसरेणु कार्यद्रव्यों से उत्पन्न होता है , क्योंकि उसमें महापरिमाण है , जैसे कि घटादि । इससे एक परमाणु से और तीन परमाणुओं से कार्य की उत्पत्ति खण्डित हो जाने पर यह सिद्ध होता है कि दो परमाणुओं से ही कार्य की उत्पत्ति होती है , एवं उस कार्य का नाम द्वणुक है ।
यह भी निश्चित ही है कि दो से अधिक द्वणुकों से ही कार्य की उत्पत्ति हो सकती है , दो द्वयणुकों से नहीं , क्योंकि दो द्वणुकों से उत्पन्न कार्य का परिमाण ' अणु ' ही होगा , क्योंकि उसके परिमाण अणुपरिमाण को ही उत्पन्न करने का सामथ्यं है । दो द्वथणुकों से जिस अणुपरिमाणवाले द्रव्य की उत्पत्ति होगी उसका उत्पन्न होना ही व्यर्थ है ।
दो से अधिक कितने द्वणुकों से कार्य को उत्पत्ति होती है , इसका कोई नियम नहीं है , कभी तीन द्वयणुकों से ही कार्योत्पत्ति होती है , कभी चार या पाँच द्वयणुकों से कार्योत्पत्ति की यथेच्छ कल्पना की जा सकती है ।
इस पक्ष में कार्य्योत्पत्ति की व्यर्थता नहीं है , क्योंकि जिस क्रम से कारणों की संख्या में अधिकता होगी , उसी क्रम से उनके कार्यों में परिमाण तारतम्य भी बढ़ता जाएगा , किन्तु इसे द्वणुक में साक्षात् घट को उत्पादकता सिद्ध नहीं होती है , क्योंकि घट के नष्ट होने पर अन्य छोटे बड़े अवयव दीख पड़ते हैं । उसीके अनुसार द्वघणुक से उत्पन्न होनेवाले कार्य को कल्पना करते हैं । तस्मात् परमाणुओं से द्वयणुकादि क्रम से कार्य रूप पृथिवी की उत्पत्ति होती है ।
पृ. ८१
त्रिविधं चास्याः कार्य्यम् ।
शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसके कार्य ( १ ) शरीर ( २ ) इन्द्रिय और ( ३ ) विषय भेद से तीन प्रकार के
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
सा चानित्या कारणविभागस्याश्रयविनाशस्य च हेतोः सम्भवात् । कार्यलक्षणायाः पृथिव्या अनित्यत्वेन सह धर्मान्तरं समुच्चिन्वन्नाह - सा चेति । स्थैय्यं नि fas त्वम् । आदिशब्दात् प्रशिथिलत्वादिपरिग्रहः । अवयवानां सन्निवेशोऽवयवसंयोगविभागविशेषः । स्थैर्य्यादयश्चावयवसन्निवेशाश्च तैर्विशिष्टा अपरजातिबहुत्वोपेता गोत्वादिजातिभूयस्त्वयुक्तेत्यर्थः । परमाण्वादिष्वपरजात्यभावेऽप्यदृष्टवशात्तथा तथा तेषां व्यूहो यथा यथा तदारब्धेष्वपरजातयो व्यज्यन्ते । नन्वदृष्टकारिता सर्वभावानां सृष्टिः , कार्य्यलक्षणा पृथिवी कामर्थक्रियां पुरुषस्य जनयति येनेयमदृष्टेन क्रियत इत्यत आह- शयनासनेति । शयनासनादयोऽनेक उपकारास्तत्कारिणी कार्यलक्षणेति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — यह कार्य रूप पृथिवी अनित्य है , क्योंकि आश्रयविनाश एवं अवयवों के विभाग , कार्यविनाश के ये दोनों ही हेतु सम्भावित हैं । कार्य रूप पृथिवी में अनित्यत्व के साथ और धर्मों का समावेश कहते हुए ' सा च ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । ' स्थैर्य ' शब्द का अर्थ है निबिडत्व , कठोरता । ' आदि ' पद से प्रशिथिलत्व , कोमलत्व प्रभृति का संग्रह अभीष्ट है । ' अवयवसंनिवेश ' शब्द का अर्थ है अवयवों का विशेष प्रकार का संयोग ।
( ' स्थैर्य्याद्यवयवसंनिवेशविशिष्टा ' ) इस वाक्य का विग्रह इस प्रकार है कि स्थैर्य्यादयश्च अवयवसंनिवेशाश्च स्थैर्य्याद्यवयवसंनिवेशा : ' तैः विशिष्टा स्थैर्य्याद्यवयवसंनिवेशविशिष्टा । ' अपरजाति बहुत्वोपेता ' अर्थात् गोत्वादि अनेक प्रकार की अपर जातियाँ उसमें रहतीं हैं । यद्यपि कार्य रूप पृथिवी के मूल कारण परमाणुओं में ये अपर जातियाँ नहीं हैं , किन्तु अदृष्टवश उनसे इस प्रकार से कार्यों की उत्पत्ति होती है कि उनमें ये गोत्वादि अपरजातियां अभिव्यक्त होती हैं ।
अगर सभी वस्तुओं की उत्पत्ति अदृष्ट से ही होती है तो फिर यह कार्य्यंरूपा पृथिवी जीवों के किन प्रयोजनों का सम्पादन करती है कि उन्हें अदृष्ट से उत्पन्न मानें ? इसी प्रश्न का समाधान ' शयनासन ' इत्यादि से देते हैं । अर्थात् शयन और आसन प्रभृति जीवों के अनेक उपकरण कार्यरूपा पृथिवी के द्वारा सम्पादित होते हैं ।
११
पृ. ८२
शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिजञ्च ।
तत्रायोनिजमनपेक्ष्य शुक्रशोणितं देवर्षीणां शरीरं धर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते ।
क्षुद्रजन्तूनां यातनाशरीराण्यधर्म विशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायन्ते ।
शुक्रशोणितसन्निपात योनिजम् ।
तद् द्विविधं जरायुजमण्डजञ्च ।
मानुषपशुमृगाणां जरायुजम् ।
पक्षिसरीसृपाणामण्डजम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — हैं । इनमें शरीर ( १ ) योनिज और ( २ ) अयोनिज भेद से दो प्रकार का है । इनमें एक प्रकार के अयोनिज शरीर देवताओं और ऋषियों के हैं , जो शुक्र और शोणित की अपेक्षा न रखकर विशेष प्रकार के धर्म और परमाणुओं से ही उत्पन्न होते हैं । ( दूसरे प्रकार के ) अयोनिज शरीर ( मशकादि ) क्षुद्र जीवों के हैं जो ( शुक्र शोणित की अपेक्षा न रखकर ) अधर्म एवं परमाणुओं से उत्पन्न होते हैं । शुक्र और शोणित के संयोग से उत्पन्न शरीर को ही ' योनिज शरीर ' कहते हैं । योनिज शरीर भी ( १ ) जरायुज और ( २ ) अण्डज भेद से दो प्रकार का है । मनुष्य , पशु एवं मृगादि के शरीर ' जरायुज ' हैं , एवं चिड़ियों और साँप प्रभृति जीवों के शरीर ' अण्डज ' हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
कार्यान्तरं त्वस्याः समुच्चिनोति -- त्रिविधमिति । कार्यत्रैविध्यमेव दर्शयति - शरीरेत्यादि । शरीरमिन्द्रियं विषय इति संज्ञा यस्य कार्यस्य तत्तथा । भोक्तुर्भोगायतनं शरीरम् , मृतशरीरे तद्योग्यत्वात् तद्व्यपदेशः । शरीराश्रयं ज्ञातुरपरोक्षप्रतीतिसाधनं शरीरभेदं द्रव्यमिन्द्रियम् । शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्तमात्मोपभोगसाधनं द्रव्यं विषयः । कथयति-योनिजमयोनिजञ्चेति । शुक्रशोणितसन्निपातो योनिः तस्माज्जातं योनिजम् , तद्विपरीतमयोनिजम् । तदेव दर्शयति-- तत्रायोनिजमिति ।
तयोर्योनिजायोनिजयोध्येयोनिजं शरीरं शुक्रशोणितमनपेक्ष्य जायते । केषामित्यत आह-- देवर्षीणामिति । देवानाञ्च ऋषीणाञ्चेत्यर्थः । अन्वयव्यतिरेकावधारितकारणभावस्य शुक्रशोणितस्याभावे कथं शरीरस्योत्पत्तिरित्यत आह- धर्मविशेषसहितेभ्य इति । विशिष्यत इति विशेषः , धर्म एव विशेषो धर्मविशेषः , प्रकृष्टो धर्म्मः , तत्सहितेभ्योS णुभ्य इति । अयमभिसन्धिः -- शरीरारम्भे परमाणव एव कारणम् , न शुक्रशोणितसन्निपातः क्रियाविभागादिन्यायेन तयोर्विनाशे सत्युत्पन्नपाकजैः परमाणुभिरारम्भात् ।
न च शुक्रशोणितपरमाणूनां कश्चिद्विशेषः , पार्थिवत्वाविशेषात् । अत्रापि का जातिनियमस्या दृष्ट एव हेतुः एवञ्चेद्धर्म्मविशेषानुगृहीतेभ्यः परमाणुभ्योऽयोनिजशरीरोत्पत्तिर्नानुपपन्ना । ननु दृष्टस्तावत् सर्वत्र शरीरोत्पत्तौ शुक्रशोणितयोः पूर्वकालतानियमः तेन यथा ग्रावोन्मज्जनाभ्युपगमस्तत्सदृशग्रावान्तरनिमज्जनग्राहकप्रमाणान्तरविरोधादनुपपन्नस्तद्वदयोनिजशरीराभ्युपगमोऽपि नैवम् , शुक्रादिनिरपेक्षस्यापि शलभादिशरीरस्य दर्शनात् । विशिष्ट संस्थानस्य शरीरस्य शुक्रादिपूर्वं तावगतेति चेत् ?
सत्यम् , तथापि न नियमसिद्धिः , किमदृष्टविशेषाभावादस्मदादिशरीरस्य शुक्रादिपूर्वता , किं वा विशिष्टसंस्थानमात्रानुबन्धकृति संदेहात् । एतेन बाधकानुमानमपि पर्युदस्तम् , तस्य व्याप्तिसंदेहात् । यच्चात्र वक्तव्यं तद्योगिप्रत्यक्षनिरूपणावसरे वक्ष्यामः ।
अधर्मविशेषेणाप्ययोनिजं शरीरं भवेतीत्याह -- क्षुद्रजन्तूनामिति । क्षुद्रजन्तवो दंशमशकादयस्तेषां यातना पीडा दु : खमिति यावत् , तदर्थं शरीरं यातनाशरीरम् । तदधर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते । इदन्त्विह लोकसिद्धमेव । योनिजं शरीरमाह-- शुक्रशोणितसन्निपातजमिति । शुक्रव शोणितश्व तयोः सन्निपातः संयोगविशेषः , तस्माज्जातं योनिजमित्युच्यते । पितुः शुक्रं मातुः शोणितं तयोः सन्निपातानन्तरं जठरानलसम्बन्धाच्छुक्रशोणितारम्भकेषु परमाणुषु पूर्वरूपादिविनाशे सति समानगुणान्तरोत्पत्तौ
कादिक्रमेण कललशरीरोत्पत्तिस्तत्रान्तःकरणप्रवेशो न तु शुक्रशोणितावस्थायाम् , शरीराश्रयत्वान्मनसः । तत्र मातुराहाररसो मात्रया संक्रामति , अदृष्टवशात् । तत्र पुनर्जठरानलसम्बन्धात् कललारम्भकपरमाणुत्रु क्रियाविभागादिन्यायेन कललशरीरे नष्टे समुत्पन्नपाकजैः कललारम्भकपरमाणुभिरदृष्टवशादुपजातक्रियैराहारपरमाणुभिः सह सम्भूय शरीरान्तरमारभ्यत इत्येषा कल्पना शरीरे प्रत्यहं द्रष्टव्या । शरीरभेदे किं प्रमाणम् ? परिमाणभेदः , स्वल्पपरिमाणावच्छिन्ने आश्रये महत्परिमाणस्य परिसमाप्त्यभावात् ।
अवस्थान्तरापनं शरीरं तदाश्रयो भवतीति चेत् ? अवस्थान्तरमाहारावयव सहकारिणः शरीरावयवा आरभेरन् शरीरं वा तत्सहकृतम् , उभयथापि पटादिषु तन्त्वादिवदन्ते होनाfreef रमाणवदनेकशरीरोपलम्भः स्यात् , न चैवम् , तस्मात् पूर्वं प्रनष्टमपरञ्च शरीरमुपजातम् । विवादाध्यासिते परिमाणे भिन्नाश्रये , हीनाधिकपरिमाणत्वात् , घटशरावपरिमाणवत् , विवादाध्यासितं परिमाणमाश्रयविनाशादेव विनश्यति परिमाणत्वात् , मुद्गराभिहतविनष्टघटपरिमाणवत् । प्रत्यभिज्ञानाच्छरीरैकत्वसिद्धिरिति चेत् ?
न तस्य सादृश्यविषयत्वेनाप्युपपत्तेः । व्यक्तीनामव्यवधानोत्पादनेनान्तराग्रहणस्यात्यन्तिकसादृश्यस्य च भ्रान्तिहेतोः सर्वदा सम्भवे ज्वालादिव्यक्तिवन्नेदं तदिति बाधकानुदयेऽपि युक्तिद्वारेण बाधकसम्भवात् ।
तस्य प्रकारं दर्शयति- द्विविधमिति । द्वे विधे प्रकारौ यस्य तद् द्विविधमिति व्याख्या । जरायुरिति गर्भाशयस्याभिधानम् , तेन वेष्टितं जायतइति जरायुजम् । अण्डं बिम्बं तेन वेष्टितं जायते तदण्डजम् । केषां जरायुजं केषां चाण्डजमित्यत्राह मानुषेत्यादि । मानुषा अस्मदादयः , पशवः छागाः , " अग्नीषोमीयं पशुमालभेत " , " सप्तदश प्राजापत्यान् पशूनालभेत " इति दर्शनात् । मृगाः कृष्णसारादयः , तेषां जरायुजं शरीरम् । इदश्वोपलक्षणपरम् , अन्येषामपि चतुष्पदां जरायुजत्वात् । पक्षिणः प्रसिद्धाः । सरीसृपाः सर्पास्तेषामण्डजं शरीरम् । एतदपि न नियमार्थमन्येषामपि मत्स्यादीनामण्डजत्वात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — पृथिवी के और कार्यों का सङ्कलन ' शरीर ' इत्यादि से करते हैं । अर्थात् शरीर , इन्द्रिय और विषय ये तीन नाम जिनके हैं वे ही ' शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञक , हैं । भोग करनेवाला ( जीव ) जिस आश्रय में भोग करे वही ' शरीर ' है । मृत शरीर में भोग की योग्यता के कारण शरीरत्व का व्यवहार होता है । शरीर में रहनेवाला एवं जीव के अपरोक्ष ज्ञान का सम्पादक द्रव्य ही इन्द्रिय है । शरीर और इन्द्रिय को छोड़कर जीवों के भोग के सम्पादक जितने द्रव्य हैं वे सभी ' विषय ' हैं । ' योनिजमयोनिजञ्च ' इत्यादि से शरीर का भेद दिखलाते हैं । प्रकृत में ' योनि ' शब्द का अर्थ है शुक्र और शोणित का मेल । उससे उत्पन्न होनेवाले ' योनिज ' कहलाते हैं , एवं इसके विपरीत जो कार्य शुक्र और शोणित के मेल के बिना ही उत्पन्न होता है , उसे ' अयोनिज ' कहते हैं । इस अर्थ को ' तत्रायोनिजम् ' इत्यादि वाक्य से समझाते हैं । ' तत्र ' अर्थात् योनिज और अयोनिज इन दोनों में अयोनिज शरीर अपनी उत्पत्ति में शुक्र एवं शोणित के मेल की अपेक्षा नहीं रखते । ये अयोनिज शरीर किनके हैं ? इस प्रश्न का समाधान ' देवर्षीणाम् ' इत्यादि से देते हैं । अर्थात् देवताओं और ऋषियों
शरीर अयोनिज हैं । शुक्र और शोणित में शरीर की कारणता अन्वय और व्यतिरेक से सिद्ध है , फिर देवताओं और ऋषियों के शरीर बिना शुक्रशोणित के ही कैसे उत्पन्न होते हैं ? इसी आक्षेप का उत्तर ' धम्मं विशेष सहितेभ्यः ' इस वाक्य से दिया गया है । ' विशिष्यत इति विशेषः , धर्म एव विशेषो धर्म्मविशेष : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उत्कृष्ट धर्म ही इस ' धर्मविशेष ' शब्द से इष्ट है । इसकी सहायता से परमाणु ही देवादि शरीरों को उत्पन्न करते हैं ।
अर्थात् उन शरीरों की उत्पत्ति परमाणुओं से ही होती हैं शुक्र और शोणित के मेल से नहीं । क्रियाविभागादिक्रम से ' अर्थात् पहिले अवयवों में क्रिया उसके बाद अवयवों का विभाग , फिर आरम्भक संयोग का नाश , अनन्तर कार्य द्रव्य का नाश , इस क्रम से जब शुक्र और शोणित का परमाणु पर्यन्त विनाश हो जाता हैं , तब इन परमाणुओं में दूसरे रूप रसादि की उत्पत्ति होती है , एवं इन पाकज रूपरसादि गुणों से युक्त परमाणुओं से ही शरीर की उत्पत्ति होती है ।
शुक्र और शोणित के आरम्भक परमाणुओं में एवं अन्य पार्थिव परमाणुत्रों में कोई अन्तर नहीं है , क्योंकि दोनों में पार्थिवत्व समान रूप से है । योनिज - शरीर स्थलों में भी किसी विशेष प्रकार के शुक्रशोणित से किसी विशेष प्रकार के ( द्रव्य रूप शरीर ) को ही उत्पत्ति हो , इसमें अदृष्ट को ही ( नियामक ) कारण मानना पड़ता है ।
अगर ऐसी बात है तो फिर उत्कृष्ट धर्म से अनुगृहीत परमाणुओं के द्वारा अयोनिज शरीर की उत्पति में कोई अयुक्तता नहीं है | ( प्र ० ) जिस प्रकार किसी पत्थर के तैरने को स्वीकार करना उसी तरह के दूसरे पत्थर के डूबने के बाधक प्रमाण के द्वारा असम्भव होता है , उसी प्रकार सर्वत्र देहोत्पत्ति से पहिले नियमतः शुक्रशोणित को देखने के कारण अयोनिज शरीर का मानना सम्भव नहीं है ? ( उ ० ) नहीं , क्योंकि शुक्र और शोणित के विना भी कीड़े - मकोड़े प्रभृति के अनेक शरीर देखे जाते हैं ।
( प्र ० ) फिर भी कुछ शरीर तो नियमतः शुक्रशोणित से ही उत्पन्न होते हैं । ( उ ० ) तब भी यह सन्देह रह ही जाता है कि जिन शरीरों की उत्पत्ति के पहिले शुक्र शोणित का संनिपात नियमत : देखा जाता है , उस ( नियम ) का कारण ( शुक्रशोणित निरपेक्ष शलभादि शरीर के सम्पादक अदृष्ट के सदृश ) अदृष्ट का अभाव है ? अथवा उस शरीर का ही यह स्वभाव है कि वह बिना शुक्रशोणित के उत्पन्न ही न हो । तस्मात् यह नियम ही नहीं हो सकता कि सभी शरीर शुक्र और शोणित से ही उत्पन्न हों ।
इससे यह बाधक अनुमान भी खण्डित हो जाता है कि देवादि शरीर भी शुक्रशोणितपूर्वक हैं , क्योंकि वे भी विशेष आकार के हैं जैसे कि मनुष्यशरीर , क्योंकि कथित युक्ति से इस अनुमान की व्याप्ति ही संदिग्ध है । इस विषय में और जो कुछ भी कहना है वह योगिप्रत्यक्ष के निरूपण में कहेंगे ।
' क्षुद्रजन्तूनाम् ' इत्यादि पङ्क्ति से कहते हैं कि विशेष प्रकार के अधर्म से भी अयोनिज शरीर की उत्पत्ति होती है । ये ' क्षुद्रजन्तु ' हैं डांस , मच्छर प्रभृति । इनके शरीर ' यातनाशरीर ' कहलाते हैं , ' यातना ' शब्द का अर्थ है पीड़ा , दुःख । भोग करना ही जिस शरीर का प्रधान प्रयोजन हो वही है ' यातनाशरीर ' । वे विशेष प्रकार के अधर्मों से सहकृत परमाणुओं से ही उत्पन्न होते हैं । यह विषय आपामर प्रसिद्ध है । शुक्रशोणितसंनिपातजम् ' इत्यादि से योनिज शरीर का निरूपण करते हैं ।
शुक्र और शोणित इन दोनों का जो ' संनिवेश ' अर्थात् विशेष प्रकार का संयोग , उस संयोग से ' जात ' अर्थात् जन्म हो जिसका वही ' योनिज ' शब्द से व्यवहृत होता है । पिता का शुक्र एवं माता का शोणित इन दोनों के मेल के बाद माता के उदर सम्बन्धी तेज से शुक्र के और शोणित के आरम्भक परमाणुओं के पहिले के रूपादि का नाश एवं दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । परिवर्तित रूपादि से युक्त इस शुक्र और शोणित के परमाणुओं से कलल ' नाम के शरीर की उत्पत्ति होती है ।
इस शरीर में मन का सम्बन्ध होता है , शुक्रशोणितावस्था में नहीं , क्योंकि मन शरीर में ही रह सकता है । उस शरीर में माता से खायी हुई वस्तुओं के रस का कुछ अंश सम्बद्ध होता है । ' अदृष्टवश उस ' कलल ' नामक शरीर के आरम्भक परमाणुओं में क्रिया होती है , फिर विभाग होता है । इस प्रकार द्रव्य नाश के कथित क्रम से उस कलल शरीर का नाश हो जाता है । इस नाश के बाद कलल के आरम्भक परमाणुओं के पहिले रूपादि का उसी तेज के संयोग से नाश होता है और दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है ।
पाकज रूपादि से युक्त कलल के आरम्भक ये परमाणु , अदृष्ट से उत्पन्न क्रिया से युक्त ( माता के ) आहार के परमाणुओं से मिलकर दूसरे शरीर को उत्पन्न करते हैं । शरीर के नाश और शरीरान्तर की उत्पत्ति की यह प्रक्रिया प्रतिदिन चलती है । अभिप्राय यह है कि अवस्था की वृद्धि के साथ हाथ पैर प्रभृति अङ्गों की लम्बाई चौड़ाई कुछ हद तक बढ़ती है , या शरीर ही कुछ दुबला पतला होता ही रहता है । यह ह्रास और वृद्धि पहिले शरीर के नाश के बाद अभिनव शरीर की उत्पत्ति मानने पर ही सम्भव है ।
इसी विषय को प्रश्नोत्तर रूप से समझाते ( प्र ० ) एक ही व्यक्ति के भिन्न भिन्न शरीर मानने में क्या प्रमाण है ? ( उ ० ) परिमाण का भेद ( ही प्रमाण है ) । अल्प परिमाण के द्रव्य में उस बड़े परिमाण का समावेश नहीं हो सकता । ( प्र ० ) वही शरीर दूसरी अवस्था पाकर उस बड़े परिमाण का आश्रय होगा । ( उ ० ) इस दूसरी अवस्था का उत्पादक कौन है ? आहार के अवयवों से साहाय्यप्राप्त शरीर के ही अवयव ? या आहार के अवयवों से सहकृत शरीर ही ?
दोनों ही प्रकार से यह अनुपपन्न है , क्योंकि स्वल्प परिमाण के अवयवों से आरब्ध पट और उससे अधिक परिमाणवाले अवयवों से आरब्ध घट दोनों की उपलब्धि एक समय में हो सकती है , उसी प्रकार एक ही व्यक्ति में एक ही समय में मोटे और पतले दोनों शरीरों की उपलब्धि होनी चाहिए , किन्तु होतो नहीं है , अतः ऐसे स्थलों में एक शरीर का नाश और दूसरे शरीर की उत्पत्ति माननी ही पड़ेगी ।
( उक्त विषय के साधक अनुमान ये हैं कि ) ( १ ) विवाद के विषय ( मोटे और पतले ) दोनों शरीरों के परिमाण दो विभिन्न व्यक्तियों में रहते हैं , क्योंकि उन दोनों में घड़े और पुरवे के परिमाणों की तरह एक न्यून है , दूसरा अधिक ।
( २ ) विवाद के विषय ये परिमाण मुद्गर से विनष्ट घट के परिमाण की तरह आश्रय के नष्ट होने पर ही नष्ट होते हैं , क्योंकि ये भी ( जन्य ) परिमाण हैं , ( प्र ० ) एक ही व्यक्ति के मोटे और पतले दोनों शरीरों में परस्पर यह प्रत्यभिज्ञा होती है कि ' जिसको मैंने पहिले देखा था उसी को अभी देख रहा हूँ । इसी प्रत्यभिज्ञा से दोनों शरीरों में एकत्व की सिद्धि करेंगे | ( उ ० ) दो सदृश व्यक्तियों में भी प्रत्यभिज्ञा हो सकती है . जैसे कि दीपशिखाओं में ।
यह और बात है कि दीपशिखाओं के एकत्व का बाधक अत्यन्त परिस्फुट होने के कारण उस प्रत्यभिज्ञा में अयथार्थत्व शीघ्र गृहीत हो जाता है , शरीर बिना व्यवधान के बराबर उत्पन्न और विनष्ट होता रहता है , अतः व्यवधान का अज्ञान और अत्यन्त सादृश्य ये दोनों भ्रान्ति रूप प्रत्यभिज्ञा के कारण बराबर रहते हैं , किन्तु युक्ति के द्वारा विचार करने पर विलम्ब से ही सही उस प्रत्यभिज्ञा का बाध अवश्य होता है ।
' द्विविधम् ' इत्यादि से योनिज शरीर का भेद दिखलाते हैं । ' द्वे विधे प्रकारौ यस्य तद् द्विविधम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस वस्तु के दो प्रकार हों वही ' द्विविध ' शब्द का अर्थ है । ' जरायु ' शब्द का अर्थ है गर्भाशय , उससे वेष्टित होकर जन्म होने के कारण ही ( मानुषादि ) शरीर जरायुज हैं । ' मानुष ' इत्यादि पक्तियों से समझाते हैं कि किन प्राणियों के शरीर जरायुज हैं और किन प्राणियों के अण्डज | ' मानुष ' हैं हम लोग , पशु शब्द का अर्थ है छाग , मेमना आदि । छाग रूप अर्थ में पशु शब्द के प्रयोग करने का यह अभिप्राय नहीं है कि ' जरायुज ' इतने ही हैं , क्योंकि सभी चौपाये भी जरायुज ही हैं । ' पक्षि ' शब्द का अर्थ प्रसिद्ध है । ' सर्प ' शब्द से साँप अभिप्रत है 1 इन सभी योनिजों के शरीर अण्डज हैं । इसका यह भी अभिप्राय नहीं कि अण्डज इतने ही हैं , क्योंकि माँ प्रभृति ओर भी अण्डज हैं ।
पृ. ८७
इन्द्रियं गन्धव्यञ्जकं सर्वप्राणिनां जलाद्यनभिभूतैः पार्थिवावयवैरारब्धं घ्राणम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इन्द्रिय रूप पृथिवी वह है जिससे सभी प्राणियों को गन्ध का ज्ञान होता है । यह जलादि से अनभिभूत पार्थिव अवयवों से बनती है । इस इन्द्रिय का अन्वर्थ नाम है ' प्राण ' ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' इन्द्रियम् ' इत्यादि से पार्थिव इन्द्रिय का निरूपण करते हैं । सभी प्राणियों के गन्धव्यञ्जक ' अर्थात् सभी प्राणियों के गन्ध प्रत्यक्ष की उत्पादक इन्द्रिय ही पार्थिव अवयवों से बनती है । किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि यह इन्द्रिय रूप पार्थिवद्रव्य ही गन्ध के प्रत्यक्ष का उत्पादक है और कोई पार्थिव द्रव्य नहीं । इसी नियम की सूचना के लिए लिखते हैं कि ' जलाद्यनभिभूतैः पार्थिवावयवैरारब्धं घ्राणम् ' अर्थात् जिन पार्थिव अवयवों का सामर्थ्य जलादिगत किसी विरोधी शक्ति से नष्ट नहीं है , अदृष्टवश उन पार्थिव अवयवों से आरब्ध यह घ्राणंन्द्रिय रूप पार्थिव द्रव्य और पार्थिव द्रव्यों से सर्वथा विलक्षण है ।
पृ. ८८
विषयस्तु द्वणुकादिक्रमेणारब्धस्त्रिविधो मृत्पाषाणस्थावरलक्षणः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — विषय रूप पृथिवी परमाणुओं से द्वणुक , व्यसरेणु प्रभृति के क्रम से उत्पन्न होती है । विषय रूप पृथिवी भी ( १ ) मृत्तिका , ( २ ) पाषाण और ( ३ ) स्थावर
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
इन्द्रियमाह - इन्द्रियमिति । सर्वप्राणिनां गन्धव्यञ्जकं गन्धोपलम्भकं यदिन्द्रियं तत् पार्थिवावयवैरारब्धम् । एतावता नियमो न लभ्यते यदेतदेव गन्धमभिव्यनक्ति नान्यत् पार्थिवं द्रव्यम् , तदर्थमाहजलाद्यनभिभूतैः पार्थिवावयवैरारब्धं घ्राणम् । जलादिभिरनभिभूतैप्रतिहत सामथ्यैरवयवैरदृष्टवशादितरविलक्षणमारब्धमेतत् , अतो विशिष्टोत्पादादिदमेव गन्धाभिव्यक्तिसमर्थम् , नान्यदित्यर्थ । घ्राणमिति तस्य संज्ञा । आत्मा जिघ्रति गन्धमुपादत्तेऽनेनेति कृत्वा तत्सद्भावे गन्धोपलब्धिरेव प्रमाणम् , क्रियायाः करणसाध्यत्वात् , चक्षुरादिव्यापारे च तस्या अनुत्पादात् । पार्थिवत्वेऽपि रूपादिषु मध्ये गन्धस्येवाभिव्यञ्जकत्वं प्रमाणम् , कुङ्कुमगन्धाभिव्यञ्जकघृतवत् । यथा घृतं स्वगन्धसहितमेव कुङ्कुमगन्धमभिव्यनक्ति , तथा घ्राणमपि स्वगन्धसहितमेवेन्द्रियम् , अतो न स्वगन्धस्य ग्राहकम् , तेनैव तस्याग्रहणात् । यथा घ्राणस्य तथा रसनचक्षुस्त्वगिन्द्रियाणामपि वक्ष्यमाणेन दृष्टान्तबलेन रूपरसस्पर्शसह कृतानामेवेन्द्रियत्वानुमानान्न स्वगुणग्रहणम् । श्रोत्रन्तु शब्दगुणमिन्द्रियम् , अतस्तेनैव शब्दोपलम्भः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इन विलक्षण कारणों से उत्पन्न होने के हेतु ही और पार्थिव द्रव्यों में गन्ध की व्यञ्जकता नहीं है , घ्राण में ही है । घ्राण इस इन्द्रिय का नाम है । इस नाम की व्युत्पत्ति से ही घ्राणेन्द्रिय की सत्ता में प्रमाण भी सूचित होता है । ' आत्मा जिघ्रत्यनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिससे आत्मा को गन्ध का प्रत्यक्ष हो वही ' घ्राण ' है । फलतः यह अनुमान निकला कि गन्ध ग्रहण रूप क्रिया का कोई करण है , क्योंकि वह भी किया है , जैसे कि छेदन क्रिया ।
चक्षु प्रभृति और इन्द्रियों के व्यापार से गन्ध का ज्ञान नहीं होता है . तस्मात् चक्षुरादि इन्द्रियों से विलक्षण कोई इन्द्रिय अवश्य है , जिसका अन्वर्थं नाम ' घ्राण ' है । घ्राण में पार्थिवत्व इस अनुमान प्रमाण से सिद्ध है कि घ्राणेन्द्रिय पार्थिव है , क्योंकि रूपादि वस्तुओं में से वह केवल गन्ध के ही प्रत्यक्ष का उत्पादक है , जैसे कि कुङ्कुम के गन्ध को अभिव्यक्त करानेवाला घुत ।
जिस प्रकार घृत अपने गन्ध के साथ ही कुङ्कुम के गन्ध का अभिव्यञ्जक है , उसी प्रकार से घ्राण भी अपने गन्ध के साथ ही सभी गन्धों का अभिव्यञ्जक है । अत : घ्राण से स्वगत गन्ध का प्रत्यक्ष नहीं होता । प्रत्यक्ष होनेवाले गन्ध से भिन्न दूसरे गन्ध से युक्त घ्राण से ही प्रत्यक्ष होता अतः स्वगत गन्ध से युक्त घ्राण से प्राणगत गन्ध का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है ।
इसी प्रकार आगे के दृष्टान्त से यह समझना चाहिए किरस से युक्त रसना रूप से युक्त चक्षु एवं स्पर्श से युक्त त्वचा में ही इन्द्रियत्व अर्थात् सादि प्रत्यक्ष का करणत्व है , अतः इन सबों से भी स्त्रगत रूपादि का प्रत्यक्ष नहीं होता है | श्रोत्र रूप इन्द्रिय का तो शब्द ही केवल विशेष गुण है , अतः उसीसे शब्द का प्रत्यक्ष होता है ।
पृ. ८९
तत्र भूप्रदेशाः प्राकारेष्टकादयो मृत्प्रकाराः ।
पाषाणा उपलमणिवज्रादयः ।
स्थावरास्तु णौषधिवृक्षलतावठान वनस्पतय इति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — भेद से तीन प्रकार की है । भूमि रूप प्रदेश , दीवाल , ईंटें आदि मृत्तिका केही प्रभेद हैं । साधारण पत्थर से लेकर मणि एवं वज्र पर्यन्त सभी पत्थर पाषाण ही हैं । औषधि , वृक्ष , लता , अवतान , वनस्पति प्रभृति सभी स्थावर रूप पृथिवी हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
शरीरेन्द्रियाभ्यां विषयस्य स्वरूपविशेषं ' तु ' शब्देन दर्शयन् भेदं दर्शयतिविषयस्त्विति । द्व्यणुकादिप्रक्रमेणारब्ध इति साधारणरूपानुवादः । मृत्पाषाणस्थावरलक्षण इति । मृत्पाषाणस्थावरादिस्वभाव इत्यर्थः । तेषां मध्ये मृदं स्वरूपेण निर्द्धारयन्नाह - तत्रेति । तत्र भूप्रदेशाः स्थलनिम्नादयः प्राकारेष्टकादयः सर्वे ते मृत्प्रकाराः , मृत्प्रभेदा इत्यर्थः । पाषाणभेदमाह- पाषाणा इति । उपलाः शिलाः , मणयः सूर्य्यकान्तादयः , वज्रोऽशनिर्होरश्च । तृणमुलपादिः , औषधयः फलपाकान्ता गोधूमादय :, ये सपुष्पफलास्ते वृक्षाः कोविदारप्रभृतयः , लता प्रसिद्धैव , अवतन्वन्तीत्यवताना नाम विटपाः केतकी बीजपूरादयः , ये विना पुष्पं फलन्ति ते वनस्पतय औदुम्बरादयः । ननु स्वेच्छाधीनचेष्टाविरहः स्थावरत्वम् , तत्तु मृत्पाषाणयोरप्यस्ति । सत्यम् , तयो रूपान्तरस्यापि सम्भवादनेन रूपेणाभिधानं न कृतम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' तु ' शब्द से शरीर और इन्द्रिय में परस्पर भेद दिखलाते हुए विषय रूप पृथिवी का भेद ' विषयस्तु ' इत्यादि से दिखलाते हैं । ' वह द्वघणुकादि क्रम से उत्पन्न होती है ' यह कहना केवल उसके साधारण धर्म का अनुवाद है । ' मृत्पाषाणस्थावरलक्षणः ' अर्थात् मिट्टी , पत्थर एवं स्थावर सभी वस्तु विषयरूपा पृथिवी हैं । इसमें मिट्टी को औरों से अलग करते हुए ' तत्र ' इत्यादि ग्रन्थ लिखते हैं । इनमें चौरस एवं नीची ऊँची सभी भूमि ' भूप्रदेश ' हैं ।
दीवाल , ईंटा प्रभृति सभी विषय मृत्तिका के ही प्रभेद हैं । ' पाषाणा : ' इत्यादि से पत्थर का भेद कहते हैं । उपल ' शब्द का अर्थ है शिला , अर्थात् साधारण पत्थर , ' मणि ' है सूर्यकान्त प्रभृति ' वज्र ' है अशनि ( इन्द्र का अस्त्र ) और हीरा । ' तृण ' है ' उलप ' प्रभृति , ' औषधि ' वह कहलाता है जो अपने फल के पकने तक ही रहे , जैसे गेहूँ प्रभृति । जिसमें फूल और फल दोनों ही लगे वह ' वृक्ष ' है , कोविदार प्रभृति । ' लता ' शब्द से माधवी लता प्रभृति प्रसिद्ध ही है ।
अवतन्वन्ति इति अवताना : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार बड़ा वृक्ष ही ' अवतात ' है , जिसे ' विटप ' कहते हैं ( पीपल आदि महावृक्ष ) | ( प्र ० ) जिसमें स्वाधीन चेष्टा न रहे वही स्थावर है । तदनुसार मिट्टी और पत्थर भी स्थावर के अन्तर्गत आ जाते हैं , फिर उनका अलग से निरूपण क्यों ? ( उ ० ) ठीक है , किन्तु स्थावरत्व से
जलनिरूपणम्
पृ. ९०
अप्त्वाभिसम्बन्धादापः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' यह जल है ' इस प्रकार का व्यवहार ' जलत्व ' जाति के सम्बन्ध से करना चाहिए ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अपां लक्षणमाह-- अपत्वाभिसम्बन्धादापः । अत्रापि व्यवहारसाधनं समानासमानजातीयव्यवच्छेदो वा लक्षणार्थ : पूर्ववत् । इदन्त्विह वक्तव्यम्-स्वयं प्रत्यक्षाधिगतपदार्थभेद : परस्य लक्षणेन प्रतिपादयेत् , अप्रतिपन्नस्याप्रतिपादकत्वात् । भेदच पदार्थानामन्योन्याभावलक्षणः । स च यस्याभावो यत्र चाभावस्तदुभयग्रहणेन गृह्यते , अन्यथा तत्स्वरूपप्रतिनियमेन निषेधानुपपत्तिः , गौरश्वो न भवतीति । तत्र किं सङ्कीर्णयोरुभयोर्ग्रहणादन्योन्याभावग्रहणं परस्परविविक्तयोर्वा ? सङ्कीर्णग्रहणे तावदयमयं न भवतीति प्रतीत्यसम्भव एव । परस्परविविक्तयोर्ग्रहणादभावप्रतीतावितरेतराश्रयत्वम् , विविक्तयोर्ग्रहणे सत्यभावग्रहणमभावग्रहणे च विविक्तग्रहणम् , अभाव एव विवेको यतः । अत्रोच्यते , भिन्नयोरितरेतराभावो नत्वितरेतराभावो भेदः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — १२ दूसरे रूप से भी वे कहे जा सकते हैं , अतः वे स्थावर वर्ग में नहीं कहे गये ।
' अपूत्वाभिसम्बन्धादापः ' इत्यादि से जल का लक्षण कहते हैं । यहाँ भी ' यह जल है ' इस व्यवहार का साधन अथवा जल को उनके सजातीत एवं विजातीय वस्तुओं से पृथक् रूप से समझाना हो जल के लक्षण का प्रयोजन है । ( प्र ० ) यहाँ यह पूछना है कि जिस व्यक्ति को लक्ष्य और उसके सजातीय विजातीयों के भेद प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञात हैं , वही व्यक्ति लक्षण के द्वारा इस विषय को दूसरों को समझा सकता है अज्ञ t यक्ति किसी को भी नहीं समझा सकता । पदार्थों के भेद एवं अन्योन्याभाव दोनों ही एक वस्तु हैं ।
जिसमें जिस वस्तु का अन्योन्याभाव समझाना है , उन दोनों के ज्ञान से ही अन्योन्याभाव ज्ञात होता है । अन्यथा ' गो अश्व नहीं है ' इस निषेध के लिए नियमतः प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों का उल्लेख अनुपपन्न हो जाएगा । इस प्रसङ्ग में प्रष्टव्य है कि भेद - ज्ञान के लिए परस्पर सम्बद्ध अनुयोगी और प्रतियोगी इन दोनों का ज्ञान आवश्यक है या परस्पर असम्बद्ध अनुयोगी और प्रतियोगी का ज्ञान ?
इनमें परस्पर सम्बद्ध प्रतियोगी और अनुयोगी के ज्ञान से तो भेद का ज्ञान सम्भव नहीं है , क्योंकि ' यह ' ( घट ) ' यह ' ( पट ) नहीं है ' इस प्रकार की प्रतीति नहीं होती है । परस्पर विविक्त अनुयोगी और प्रतियोगी के ज्ञान से अगर भेद का ज्ञान मानें तो फिर अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य होगा , क्योंकि भेद का ज्ञान परस्पर विविक्त प्रतियोगी और अनुयोगी के ज्ञान से होगा , एवं भेद ज्ञान से परस्पर विवेक की वृद्धि होगी , क्योंकि विवेक वस्तुतः भेद ही है ।
पृ. ९१
रूपरसस्पर्शद्रवत्व स्नेह सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्व संस्कारवत्यः ।
पूर्ववदेषां सिद्धिः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह ( जल ) रूप , रस , स्पर्श , द्रवत्व , स्नेह , संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , परत्व , अपरत्व , गुरुत्व और संस्कार इन चौदह गुणों ' युक्त है । पृथिवी की तरह सूत्र के वाक्यों से जल में ( भी ) गुणों की सिद्धि समझनी चाहिए ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
यदेतद् वस्तुनः प्रात्यात्मिकं स्वरूपं स एव भेदः , तच्चापरदर्शनानपेक्षमिन्द्रियसन्निकर्षमात्रादेव प्रतीयमानं प्रत्येकं विलक्षणमेव संवेद्यते । तथा हिगवार्थी नाश्वदर्शनात् प्रवर्त्तते , गोशब्दञ्च न स्मरति , तत्राश्वे गवि च स्वेन स्वेनात्मना गृह्यमाणेन तत्स्वरूपनियमेनान्योन्याभावप्रतीतिर्नानुपपन्ना । न चैवं सति वाच्यं स्वरूपभेद एवास्तु किमन्योन्याभावेनेति , तस्यापि प्रतिषेधविषयस्य संवेदनात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( उ ० 1 ) इस प्रश्न के समाधान में हम यह कहते हैं कि परस्पर भिन्न दो वस्तुओं में अन्योन्याभाव रहता है , इसका यह अर्थ नहीं है कि ( प्रकृत ) भेद और अन्योन्याभाव दोनों ( यहाँ ) एक ही वस्तु हैं । प्रत्येक वस्तु में रहनेवाला असाधारण धर्म ही यहाँ ( भेद ) है । यह भेद ( आश्रय में ) इन्द्रिय सम्बन्ध के होते ही और किसी के ज्ञान की अपेक्षा न करके और व्यक्तियों के असाधारण धर्म से विलक्षण रूप में प्रतिभासित होता है । गाय का प्रयोजन जिस व्यक्ति को है , वह अश्व के देखने से न प्रवृत्त होता है , न गो शब्द का स्मरण हो करता है । वहाँ गो और अश्व में असाधारण रूप से ज्ञात होनेवाले नियमित तत्तत् असाधारण धर्मों से दोनों में अन्योन्याभाव की प्रतीति में कोई अन्तर नहीं आता । इस लिए यह प्रश्न भी ठीक नहीं है । कि ( प्र ० ) वस्तुओं के तत्तत् असाधारण धर्म से अतिरिक्त भेद मानने की आवश्यकता नहीं है । ( 30 ) क्योंकि भेद की प्रतीति नञ् प्रभृति निषेधार्थक शब्दघटित वाक्यों से होती है ।
पृ. ९२
शुक्लमधुरशीता एव रूपरसस्पर्शाः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रूपों में शुक्ल रूप ही जल में है , रसों में मधुर रस ही एवं स्पर्शो में शीतस्पर्श ही है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
न केवलमपत्वमपां वैधर्म्यं स्नेहसहचरितं चतुर्दशगुणवत्त्वमपीतरेभ्यो वैधर्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह - रूपरसेति । अत्र द्वन्द्वानन्तरं मतुप्प्रत्ययः करणीयः । पूर्ववदेषां सिद्धि : । यथा पूर्वं पृथिव्यां सूत्रकारवचनादेषां रूपादीनां गुणानां सिद्धिः प्रतिपत्तिस्तथाप्स्वपीत्यर्थः । तथा च सूत्रम् - " रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवाः स्निग्धाश्च " इति । सङ्ख्यादिप्रतिपादकन्तु साधारणमेव सूत्रम् । वैधर्म्यनिरूपणावसरे पृथिव्यादिसाधारणानां रूपादीनामभिधानमयुक्तमित्याशङ्कयावान्तरभेदेनैषामसाधारणत्वं प्रतिपादयति - शुक्लेत्यादि । शुक्लमेव रूपमपाम् , मधुर एव रसः , शीत एव स्पर्शः । अप्सु रूपान्तरप्रतीतिराश्रयरूपभेदात् । कथमेतदिति चेत् ? तासामेवोद्धृत्य वियति विक्षिप्तानां धवलिममात्रप्रतीतेः पुनर्नपतितानामाश्रयरूपानुविधानात् । तासु न मधुरो रसो गुडादिवदप्रतिभासनादिति चेत् ? न कटुकषायतिक्तलवणाम्लविलक्षणस्य रसस्य संवेदनात् , गुडादिवदप्रतिभासनन्तु माधुर्य्यातिशयाभावात् ।
निविशेष एव स्नेहोऽपां वैधर्म्यमिति ध्वनति - स्नेहोऽम्भस्येवेति । नन्वयं पृथिव्यामपि वर्त्तते , यथा क्षीरे तैले सर्पिषि च । न सर्वत्र , पाषाणेष्टका शुष्केन्धनादिष्वसम्भवात् । यत्तु क्वचित् क्षीरादिषु दर्शनं तत्संयुक्तसमवायादुदकगतस्यैव यथा सांसिद्धिकद्रवत्वस्य क्षीरतैलयोः । उदकधर्मत्वन्तु स्नेहस्य सर्वत्र तदन्वयव्यतिरेकानुविधानात् । तथा चानूपदेशप्रभवानां तरुतृणादीनां स्निग्धता , जाङ्गलप्रदेशप्रभवानाञ्च रूक्षता । तत्रापि सततं परिषिच्यमानमूलानां स्निग्धत्वं तद्विरहिणाञ्च तन्नास्तीति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — केवल जलत्व जाति ही इसका असाधारण धर्म नहीं है , किन्तु स्नेहादि चोदह गुणों का आश्रयत्व भी औरों से जल का वैधर्म्य है , यह उपपादन करते हुए रूप , रस , इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । यहाँ द्वन्द्व समास के बाद मतुप् प्रत्यय करना चाहिए । ' पूर्ववदेषां सिद्धि : ' जैसे कि पहिले अर्थात् पृथिवी में सूत्रकार के वाक्यों से रूपादि गुणों की सिद्धि अर्थात् ज्ञान होता है , उसी प्रकार जल में भी ( समझना चाहिए ) ।
जैसा कि सूत्र है - “ रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवाः स्निग्धाश्च " ( २ । १ । २ ) । अर्थात् रूप , रस , स्पर्श ' , द्रवत्व और स्नेह से युक्त वस्तु हो जल है । संख्यादि नौ गुणों के लिए वही साधारण ( ' सख्याः परिमाणानि ' इत्यादि ४ । १ । ११ ) सूत्र है । रूपादि जितने गुण पृथिवी प्रभृति और द्रव्यों में भी रहते हैं जल के वैधर्म्य के निरूपण के प्रसङ्ग में उनका निरूपण क्यों ?
इस प्रकार का प्रश्न अपने मन में रखकर ये रूपादि गुण भी जिस रीति से जल के वैधर्म्य हो सकते हैं वह रीति ' शुक्लमधुर ' इत्यादि से कहते हैं । ( रूपों में ) शुक्ल रूप ही ( जल में ) है , एवं ( रसों में ) मधुर रस ही जल में है , एवं ( स्पर्शो में ) शीत स्पर्श ही ( जल में ) है । आश्रय रूप उपाधि के भेद से ही जल में दूसरे रूपों की प्रतीति होती है । ( प्र ० ) यह कैसे समझते हैं ?
( उ ० ) उसी जल को आकाश की ओर उछाल कर आश्रय से विच्छिन्न कर दिया जाय तो फिर उस ( जिस जल में नील - रूप का भान होता है ) में भी शुक्ल रूप की ही प्रतीति होती है । ( प्र ० ) जल में मधुर रस नहीं है , क्योंकि गुड़ प्रभृति द्रव्यों की तरह जल में मधुर रस की प्रतीति नहीं होती । ( उ ० ) यह स्वीकृत सत्य है कि ' जल में रस है ' , किन्तु वह रस कटु , कषाय , तिक्त , लवण और अम्ल से भिन्न है , अतः जल का रस मधुर ही है , क्योंकि इनसे भिन्न कोई सातवाँ रस नहीं है ।
गुड़ प्रभृति द्रव्यों की तरह जल में मधुर रस का भान इसलिए नहीं होता कि इसमें गुड़ादि द्रव्यों की तरह उत्कट माधुर्य नहीं है । केवल इससे जल में मधुर रस के अभाव की सिद्धि नहीं हो सकती ।
किसी और वस्तु को साथ में न लेकर भी स्वतन्त्र रूप से केवल स्नेह जल का असाधारण धर्म हो सकता है , यही बात ' स्नेहोऽम्भस्येव ' इस वाक्य से सूचित करते हैं | ( प्र ० ) स्नेह तो जल की तरह दूध , तेल , घी प्रभृति में भी है ? ( उ ० ) नहीं , क्योंकि पत्थर , इंट , सूखे काठ प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में स्नेह की उपलब्धि नहीं होती । दूध प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में जल का स्नेह हो संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उपलब्ध होता है जैसे कि दूध प्रभृति में ही स्रांसिद्धिक द्रवत्व की उपलब्धि होती है । सभी जलों में स्नेह की उपलब्धि ( रूप अन्वय ) एवं जल से भिन्न सभी वस्तुओं में स्नेह की अनुपलब्धि ( रूप व्यतिरेक ) ये ही दोनों ' स्नेह जल के ही धम्मं है ' इसमें प्रमाण है | अतः ' अनूप ' देश में उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि और तिनके स्निग्ध , एवं " जाङ्गल ' प्रदेश में उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि रूक्ष देखे जाते हैं । जाङ्गल प्रदेश में भी बराबर सींचे जाने वाले वृक्षादि स्निग्ध देखे जाते हैं तथा बराबर न सींचे जानेवाले वृक्षादि रूक्ष देखे जाते हैं ।
पृ. ९३
स्नेहोऽम्भस्येव सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — स्नेह एवं सांसिद्धिक ( स्वाभाविक ) द्रवत्व केवल जल में ही रहते हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वमिति । न केवलं स्नेहः , स्वभावसिद्धञ्च द्रवत्वमम्भस्येवेत्यर्थः । क्षीरतैलयोस्त्वाश्रयसन्निकर्षेण तदुपलम्भः , क्वचित् तयोघनत्वोपलम्भात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वम् ' अर्थात् बिना किसी की सहायता से स्वतन्त्र रूप से केवल स्नेह ही जल का बैधर्म्य नहीं है , किन्तु केवल ' सांसिद्धिक द्रवत्व ' भी उसी रूप से जल का वैधर्म्य है , क्योंकि वह भी केवल जल में ही है । दूध और तेल में आश्रय के सम्बन्ध से सांसिद्धिक द्रवत्व की प्रतीति होती है , क्योंकि उनमें कभी काठिन्य की प्रतीति भी होती है ।
१ ९ . स्वल्पोदकतृणो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः ।
सज्ञेयो जाङ्गलो देशो बहुधान्यादिसंयुतः ||
पृ. ९४
ताश्च पूर्ववद् द्विविधाः , नित्यानित्यभावात् ।
तासांतु कार्यं त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ।
तत्र शरीरमयोनिजमेब वरुणलोके , पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्चोपभोगसमर्थम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह भी पृथिवी की तरह नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का ह | शरीर , इन्द्रिय , और विषय भेद से कार्य रूप जल के तीन प्रकार हैं । जलीय शरीर अयोनिज ही होते हैं । वह शरीर केवल वरुण लोक में प्रसिद्ध है एवं पार्थिव अवयवों के सम्बन्ध से सुख और दुःख की अनुभूति की शक्ति प्राप्त करता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
इवापामप्यवान्तरभेदेन द्वैविध्य मित्याह - ताश्चेति ।
पृथिव्या आपो नित्याः , कार्य्यस्वभावास्त्वनित्याः । कार्य्यञ्च परमाणुस्वभावा त्रिविधम् । अत्रापि पूर्ववदनुषङ्गः , यथा शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञितं कार्यं त्रिविधमेवमपामपीति । तत्र शरीरमयोनिजमेव , पार्थिवं शरीरं योनिजमयोनिजञ्च , आप्यं शरीरमयोनिजमेवेति विशेष इत्यर्थः । ननु मानुषं शरीरं तावत् पार्थिवं गन्धगुणोपलब्धेः , आप्यं तु क्वास्तीत्याह - वरुणलोक इति । इदं शरीरमपामागमात् प्रत्येतव्यम् ।
द्रवत्वैकस्वभावत्वादपां तदारब्धं शरीरं जलबुबुदप्रायं विशिष्टव्यवहारायोग्यं कथमुपभोगसमर्थं स्यादित्याह - पार्थिवावयवोपष्टम्भादुपभोगसमर्थम् । पार्थिवानामवयवानामुपष्टम्भात् संयोगविशेषादाप्यं शरीरमुपभोगाय समर्थं स्यात् । आप्यशरीरोत्पत्तौ पार्थिवावयवा निमित्तकारणम् , तेषां संयोगादाप्यावयवानां द्रवत्वे प्रतिरुद्धे विशिष्टमेवेदं शरीरमुत्पद्यते , न जलबुद्बुदप्रायमित्यर्थः । ये तु पश्च भूतसमवायिकारणं शरीरमित्यास्थिषत , तेषामगन्धं शरीरं स्यात् , कारणगन्धस्यैकस्यानारम्भकत्वात् ।
चित्ररूपरसस्पfa प्राप्नोति कारणेषु नानारूपरसस्पर्शसम्भवात् । न चैवं दृष्टम् , तस्मान्न पञ्चभूतप्रकृतिकम् । भूजलप्रकृतिकमप्यत एव न स्यात् , अत एव भूजलानिलप्रकृतिकमपि न स्यात् , भूवाय्वाकाश प्रकृतिकत्वेऽरूपमरसमगन्धश्च स्यात् , अनलानिलाकाशप्रकृतिकत्वे चागन्धमरसं चेत्यादि यथासम्भवं योजनीयम् । न च पञ्चभूतसमवायि कारणत्वे शरीरस्यैकत्वं प्राप्नोति स्वभावभेवेन भेदोपपत्तेः । मानुषं शरीरं पृथिव्यात्मकं गन्धवत्त्वात् परमाणुलक्षणपृथिवीवत् । उदकादिधर्मोपलम्भः कथमत्रेति चेत् ?
संयुक्तसमवायादित्यलम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' ताश्च ' इत्यादि से लिखते हैं कि पृथिवी की तरह जल के भी अपने अवान्तर भेद दो प्रकार के हैं । परमाणुरूप जल नित्य है , एवं कार्यरूप जल अनित्य है । " कार्यं त्रिविधम् " इस वाक्य में ' त्रिविधम् ' यह पद भी जोड़ देना चाहिए । ( तदनुसार इस वाक्य का यह अर्थ है कि ) जैसे पृथिवी के शरीर , इन्द्रिय और विषय भेद से तीन भेद हैं , वैसे ही उसी नाम से जल के भी तीन भेद हैं ।
' तत्र शरीरमयोनिजमेव ' अर्थात् पार्थिव शरीर से जलीय शरीर में यह अन्तर है कि पार्थिव शरीर के योनिज और अयोनिज दोनों ही प्रकार हैं , किन्तु जलीय शरीर केवल अयोनिज ही होते हैं । मनुष्य के शरीर में गन्ध की उपलब्धि होती है , अतः समझते हैं कि वह पार्थिव है । किन्तु जलीय शरीर कहाँ है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं कि ' वरुणलोके ' , अर्थात् जलीय शरीर केवल वरुणलोक में प्रसिद्ध है । इस विषय को शास्त्र के द्वारा ही समझना चाहिए !
जल प्रसरणशील द्रव्य हैं , इससे उत्पन्न शरीर तो जल के बुद्बुदे के समान होंगे , उनसे शरीर के प्रधान प्रयोजन उपभोग कासम्पादन असम्भव होगा । इसी असम्भावना को ' पार्थिवावयत्रोपष्टम्भाच्च ' इत्यादि से हटाते हैं । अर्थात् पार्थिव अवयवों के उपष्टम्भ अर्थात् विलक्षण संयोग से जलीय शरीर में उपभोग की क्षमता आएगी । कहने का तात्पर्य है कि जलीय शरीर के पार्थिव अवयव भी निमित्तकारण हैं ।
उनके संयोग से जल का द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है , अतः उसके बाद जलीच शरीर भी विशेष आकार का ही उत्पन्न होता है , जल के बुद्बुद की तरह नहीं । जो कोई ( प्र ० ) पृथिवी , जल , तेल , वायु और आकाश इन पाँचों द्रव्यों को सभी शरीरों का समवायिकारण मानते हैं , उनके मत में ( उ ० ) ( १ ) शरीर गन्ध से सर्वथा रहित होगा , क्योंकि समवायिकारणों में से किसी एकमात्र में रहनेवाला केवल एक गुण कार्य के गुण को उत्पन्न नहीं कर सकता ।
( २ ) एवं पाँचों महाभूतों से उत्पन्न शरीर में चित्र रूप , चित्र रस , चित्र गन्ध और चित्र स्पर्शकी सत्ता माननी पड़ेगी , क्योंकि शरोर के समवायिकारणों में नाना तरह के रूप , रस , गन्ध और स्पर्श हैं , किन्तु चित्र रूपरसादिविशिष्ट शरीर की कहीं उपलब्धि नहीं होती ।
तस्मात् पाँचों महाभूत सम्मिलित होकर किसी भी एक शरीर के समवायिकारण नहीं हैं , इसी हेतु से पृथिवी और जल ये दोनों भी किसी एक शरीर के समवायिकारण नहीं हैं , एवं पृथिवी , जल और वायु ये तीनों भी किसी एक शरीर के समवायिकारण नहीं हैं । पृथिवी , वायु और आकाश इन तीनों को अगर किसी एक शरीर का समवायिकारण मानें तो इनसे उत्पन्न शरीर रूप , रस और गन्ध इन तीनों से रहित होगा ।
अगर तेज वायु और आकाश इन तीनों को एक शरीर का समवायिकारण मानें तो फिर इन तीनों कारणों से उत्पन्न शरीर गन्ध और रस से शून्य होगा । इस प्रकार और भी कल्पना करनी चाहिए । पञ्च महाभूत रूप अनेक समवायिकारणों से शरीररूप एक कार्य की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती , क्योंकि सभी के स्वभाव अलग अलग । भिन्न स्वभाव के व्यक्तियों से एक स्वभाव के कार्य को उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
मानव शरीर पार्थिव है , क्योंकि उसमें गन्ध को उपलब्धि होती है , जैसे कि पार्थिव परमाणु ( प्र ० ) मानव शरीरों में जलादि के धर्मों की उपलब्धि कैसे होती है ? ( उ ० ) संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से । अब इस विषय में इतना ही पर्याप्त है ।
पृ. ९६
इन्द्रियं सर्वप्राणिनां रसव्यञ्जकं विजात्यनभिभूतैर्जलावयवैरारब्धं रसनम् | विषयस्तु सरित्समुद्र हिमकरकादिः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जिससे प्राणियों को रस का प्रत्यक्ष होता है , वही जलीय इन्द्रिय है । यह विरोधी द्रव्यों की शक्ति से अपराजित जल के अवयवों से बनती है । इस इन्द्रिय का अन्वर्थ नाम है ' रसना ' । नदी , समृद्र , पाला , बरफ इत्यादि विषय रूप जल हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
इन्द्रियं रसव्यञ्जकं सर्वप्राणिनामिति । सर्वप्राणिनां रसव्यञ्जकं यदिन्द्रियं तज्जलावयवैरारब्धम् । तथापि कस्मात् तदेव रसव्यञ्जकं स्यात् , नान्यदुदकद्रव्यमित्याह -- विजात्यनभिभूतैरिति । विजातिभिः पार्थिवावयवैर्येऽनभिभूता अप्रतिहतसामर्थ्य आप्यावयवास्तैरितरद्रव्यविलक्षणमारब्धमत इदं विशिष्टोत्पादाद्रसव्यञ्जकमिन्द्रियं न द्रव्यान्तरम् , तस्येत्थमुत्पत्त्यभावादित्यर्थः । एतच्च नियमदर्शनादेव कल्प्यते । रसनेन्द्रियसद्भावे रसोपलब्धिरेव प्रमाणम् , क्रियायाः करणसाध्यत्वात् । आप्यत्वं रूपादिषु मध्ये रसव्यञ्जकत्वात् सुखशोषिणां कालादिद्रव्यवत् । विषयनिरूपणार्थमाह-- विषयस्त्विति । सरित्समुद्रौ हिमं करको घनोपलमित्यादिविषयो भोग्यत्वेन भोक्तुर्भोगसाधनत्वात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — " इन्द्रियं रसव्यञ्जकं सर्वप्राणिनाम् " । यह तो ठीक है कि सभी प्राणियों के रसप्रत्यक्ष का कारण रसनेन्द्रिय जल के अवयवों से बनती है फिर भी इन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य ही क्यों रस का व्यञ्जक होगा ? कोई और जलीय द्रव्य क्यों नहीं ? ' विजात्यनभिभूतैः ' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर देते हैं ।
' विजाति ' अर्थात् पार्थिव अवयवों से , ' अनभिभूत ' अर्थात् जिनका बल प्रतिरुद्ध नहीं हुआ है , इस प्रकार के जलीय श्रवयवों से यह ( इन्द्रिय रूप ) विलक्षण द्रव्य उत्पन्न होता है । इस प्रकार और जलीय द्रव्यों से विलक्षण रूप से उत्पन्न होने के कारण यह इन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य ही रस का ब्यञ्जक है , और कोई जलीय द्रव्य नहीं । क्योंकि और जलीय द्रव्यों की उत्पत्ति इससे भिन्न रीति से होती है ।
" इस रसनेन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य से ही रस को अभिव्यक्ति होती है , और द्रव्यों से नहीं " इस नियम से ही उक्त कल्पना करते हैं । रस की उपलब्धि ही रसनेन्द्रिय की सत्ता में प्रमाण है , क्योंकि क्रिया करण से ही निष्पन्न होती है । रसनेन्द्रिय जलीय इस लिए है कि रूपादि गुणों में से वह रस को ही व्यक्त करती है , जैसे कि मुँह का तरल द्रव्य | विषयरूप जल को समझाने के लिए ' विषयस्तु ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं ।
चूँकि नदी , समुद्र , पाला , बरफ प्रभृति द्रव्य जीव के सुखदुःखानुभव के साधन हैं , अतः ये विषयरूप जल हैं ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ९६) १. पार्थिव , जलीय , तेजस और वायवीय भेद से शरीर चार प्रकार के हैं । इनमें से प्रत्येक के क्रमशः पृथिवो , जल , तेज और वायु इनमें से एक एक ही समवायिकारण हैं । चारों में से तीन और आकाश ये सभी निमित्तकारण हैं । इसीसे शरीरों में पाश्वभौतिकत्व का व्यवहार होता है ।
तेजोनिरूपणम्
पृ. ९७
तेजस्त्वाभिसम्बन्धात्तेजः ।
रूपस्पर्श सख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वद्रवत्वसंस्कारवत् ।
पूर्ववदेषां सिद्धिः ।
तत्र शुक्लं भास्वरश्च रूपम् ।
उष्ण एव स्पर्शः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तेज का व्यवहार तेजस्त्व जाति के सम्बन्ध से करना चाहिए । यह रूप , स्पर्श , सङ्ख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , परत्व , अपरत्व , द्रवत्व और संस्कार इन ग्यारह गुणों से युक्त है । इसमें भी गुणों की सिद्धि पृथिवी और जल की तरह सूत्रकार की उक्तियों से समझनी चाहिए । इसमें रूपों में से भास्वर शुक्ल रूप ही , एवं स्पर्शो में से उष्ण स्पर्श ही है ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' पृथिवीश्वादिसम्बन्धात् पृथिवी ' , अप्त्वाभिसम्बन्धादापः ' इत्यादि पहिले वाक्यों की तरह तेजस्त्वाभिसम्बन्धात्तेज : ' इस वाक्य की भी व्याख्या करनी चाहिए । ' रूपस्पर्श ' इत्यादि पति का तात्पर्य है कि तेजस्त्व जाति की तरह रूपादि ग्यारह गुणों का सम्बन्ध भी तेज का ' वैधर्म्य ' अर्थात् लक्षण है । ' पूर्ववत्तेषां सिद्धिः ' अर्थात् जैसे पृथिव्यादि द्रव्यों में ' सूत्ररूप वचनों से गुणों की सत्ता प्रमाणित की है , उसी प्रकार सौत्र वचनों से ही तेज में भी रूपादि ग्यारह गुणों को सिद्धि समझनी चाहिए । जैसा कि सूत्र है - " तेजोऽपि रूपस्पर्शवत् ” २ - १ - ३ ) | ( अर्थात् भास्वर शुक्ल रूप एवं उष्ण स्पर्श से युक्त द्रव्य ही ' तेज ' है ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ९७) १. अभिप्राय यह है कि छेदनादि क्रिया कुठारादि करणों से ही निष्पन्न देखी जाती हैं । इस दृष्टान्त से यह अनुमान सुलभ है कि रस प्रत्यक्षरूप क्रिया का भी कोई करण १३ है , क्योंकि वह भी क्रिया है , जैसे कि छेदनादि क्रिया । रस प्रत्यक्ष का करणत्व चक्षुरादि इन्द्रियों में बाधित है , अतः इन सभी से भिन्न कोई इस क्रिया का करण मानना पड़ेगा , जिसका अन्वर्थ नाम है ' रसना ' ।
पृ. ९८
तदपि द्विविधमणुकाभावात् ।
कार्यश्च शरीरादित्रयम् ।
।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह भी परमाणु ( नित्य ) और कार्य के भेद से दो प्रकार का है , एवं कार्यरूप तेज के शरीर , इन्द्रिय एवं विषय भेद से तीन प्रकार हैं । तैजस
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
तेजस्त्वाभिसम्बन्धात्तेज इति । व्याख्यानं पूर्ववत् । तेजस्त्वमिव रूपाद्येकादशगुणयोगोऽपि तस्य वैधर्म्यमिति दर्शयति-- रूपेत्यादि । पूर्ववत्तेषां सिद्धिरिति । यथा सूत्रकारवचनाद्रूपादीनां पृथिव्यां सिद्धस्तथा तेजस्यपीत्यर्थः । तथा च सूत्रम् -- " तेजोऽपि रूपस्पर्शवत् " ( २ - १ - ३ ) । सङ्ख्यादिप्रतिपादकन्तु साधारणमेवसूत्रम् । यादृशमस्य रूपं तद्दर्शयति-- शुक्लं भास्वरञ्चेति । शुक्लं रूपं पृथिव्युदकयोरप्यस्ति , किन्तु न भास्वरं रूपम् , स्वरूपप्रकाशकं शुक्लं रूपं तेजस्येवेति वैधर्म्यम् । यत् त्वस्य लोहितं कपिलं वा रूपं क्वचित् प्रतीयते तदाश्रयोपाधिकृतम् , निराश्रयस्य सर्वत्र शुक्लतामात्रप्रतीतेः , यथा प्रदीपप्रभामण्डलस्य सौरचन्द्राद्यालोकस्य च उष्ण एव स्पर्श इति । पृथिव्युदकमरुतामनुष्णाशीतशीतानुष्णाशीतस्पर्शाः , उष्ण एव तेजसि स्पर्श इति वैधर्म्यम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — तेज में संख्यादि गुणों का प्रतिपादक " संख्याः परिमाणानि ” ( ४ - १ - ११ ) इत्यादि सामान्य सूत्र ही है । तेज में किस प्रकार का रूप है ? इसका उत्तर ' शुक्लं भास्वरञ्च ' इत्यादि से देते हैं । यद्यपि शुक्ल रूप पृथिवी और जल में भी है , तथापि उनका शुक्ल रूप ' भास्वर ' अर्थात् अपने रूप एवं पररूप दोनों का प्रकाशक नहीं है । इस प्रकार का शुक्ल रूप केवल तेज में ही है , अतः भास्वर शुक्ल रूप तेज का लक्षण है । कहीं कहीं तेज में जो लाल पीले प्रभृति रूपों के दर्शन होते हैं , वह आश्रयरूप उपाधिमूलक हैं , क्योंकि प्रदीप और सौर प्रकाश प्रभृति में सभी जगह शुक्लता की ही प्रतीति होती है । ' उष्ण एव स्पर्श : ' अर्थात् पृथिवी में अनुष्णाशीत स्पर्श , जल में शीत स्पर्श एवं वायु में अनुष्णाशीत स्पर्श हैं , किन्तु तेज में केवल उष्ण स्पर्श ही है , अर्थात् केवल उष्ण स्पर्श भी ' तेज ' का लक्षण है ।
पृ. ९९
शरीरमयोनिजमेवादित्यलोके ।
पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्चोपभोगसमर्थम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शरीर भी अयोनिज ही है एवं आदित्यलोक में प्रसिद्ध है । पार्थिव अवयवों के सम्बन्ध से यह सुख दुःख के अनुभव की क्षमता प्राप्त करता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
पृथिव्युदकवत् तेजसोऽपि द्वैविध्यम पिशब्देन सम्भावयन्नाह - तदपीति । अणुभावात् कार्य्यभावात् तेजोऽपि द्विविधमिति । कार्य्यञ्च शरीरादित्रयम् , शरीरमिन्द्रियं विषय इति त्रयं तेजसश्च कार्य्यम् । शरीरमयोनिजमेवादित्यलोके । ननु दहनात्मत्वात् तेजसां तदारब्धं शरीरं वह्निपुञ्जप्रायं विशिष्टव्यवहारायोग्यत्वान्नोपभोगाय कल्प्यते , तत्राह -- पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्च इति । पार्थिवानामवयवानां निमित्तभूतानामुपष्टम्भात् संयोगविशेषात् तेजोऽवयवा उपभोगक्षमं विशिष्टमेव शरीरमारभन्ते , न वह्निपुञ्जप्रायमित्यभिप्रायः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' तदपि ' इस वाक्य के ' अपि ' शब्द के द्वारा सूचित करते हैं कि पृथिवी एवं जल की तरह तेज के भी दो प्रकार हैं । अर्थात् परमाणु स्वरूप एवं कार्यं स्वरूप भेद से तेज के भी दो भेद हैं । " कार्यञ्च शरीरादित्रयम् " अर्थात् शरीर इन्द्रिय और विषय भेद से कार्यरूप तेज के तीन भेद हैं । तैजस शरीर अयोनिज ही है , जो कि आदित्यलोक में प्रसिद्ध है | तेज है अग्नि स्वरुप , उससे उत्पन्न द्रव्य अग्नि की तरह ही होगा , अत . शरीर से होनेवाले विशेष प्रकार के व्यवहार के अनुपयुक्त होगा । फलतः यह शरीर सुखदुःखानुभवरूप अपना प्रधान कार्य ही नहीं कर सकता ? इसी प्रश्न का समाधान ' पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्च " इस वाक्य से किया गया है । अभिप्राय यह है कि पार्थिव अवयवों के ' उपष्टम्भ ' अर्थात् विशेष प्रकार के संयोग की सहायता से तेज के अवयव ( उपभोगक्षम ) एक विशेष प्रकार के शरीर को उत्पन्न करते हैं , वह्निसमूह की तरह नहीं ।
पृ. ९९
इन्द्रियं सर्वप्राणिनां रूपव्यञ्जक मन्यावयवानभिभूतैस्तेजोऽवयवैरारब्धं चक्षुः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सभी प्राणियों को रूप का प्रत्यक्ष जिससे होता है , वही तैजस इन्द्रिय है । जिनकी शक्ति विजातीय द्रव्यों की शक्ति से पराभूत नहीं हुई है , उन तैजस अवयवों से तैजस इन्द्रिय की सृष्टि होती है । इस इन्द्रिय का नाम है ' चक्षु ' |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
इन्द्रियं रूपव्यञ्जकमिति । सर्वप्राणिनां रूपव्यञ्जकं यदिन्द्रियं तत् तेजोऽवयवैरारब्धम् । इदमेव कुतो रूपव्यञ्जकमिन्द्रियं स्याद् , नान्यत् तेजोद्रव्यमित्यत्रोपपत्तिः - - अन्यावयवानभिभूतैरिति । ये पार्थिवोदकावयवैरप्रतिबद्धसामर्थ्यास्तेजोऽवयवास्तैरारब्धं चक्षुः , अत इदं विशिष्टोत्पादाद्रूपाभिव्यञ्जकमिन्द्रियं नान्यत् । तादृशं तदुत्पद्यत इत्यत्रादृष्टमेव कारणम् , कार्य्यनियम एव प्रमाणम् । तैजसत्वन्तु तस्य रूपादिषु मध्ये नियमेन रूपस्याभिव्यञ्जकत्वात् प्रदीपवत् । इदं त्वदृष्टवशादनुद्भूतरूपस्पर्शम् , तेन न स्वाश्रयं दहति नाप्युपलभ्यते ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — " इन्द्रियं रूपव्यञ्जकम् " सभी प्राणियों के रूप- प्रत्यक्ष की कारणीभूत इन्द्रिय तेज के अवयवों से ही उत्पन्न होती है । यही इन्द्रियरूप तैजस द्रव्य रूप के प्रत्यक्ष का कारण क्यों है ? अन्य तैजस द्रव्य क्यों नहीं है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' अन्यानभिभूतैः ' इत्यादि से देते हैं । तेज के जिन अवयवों का सामर्थ्य पार्थिव और जलीय अवयवों से नष्ट नहीं हुआ है , उन तैजस अवययों से इस इन्द्रिय की सृष्टि होती है ।
चूँकि इसी तैजस द्रव्य की उत्पत्ति उक्त विशेष प्रकार से होती है , दूसरे तेजस द्रव्यों की नहीं , अतः यही तैजस द्रव्य रूप के प्रत्यक्ष का उत्पादक है , दूसरे तेजस द्रव्य नहीं । " उक्त विशेष प्रकार से इसी तैजस द्रव्य की उत्पत्ति क्यों होती है ? " इस प्रश्न के उत्तर में अदृष्ट को ही इसका कारण कहना पड़ेगा । एवं इस प्रकार के अदृष्ट की सत्ता में इस नियम को ही प्रमाण मानना पड़ेगा कि इन्द्रियरूप तैजस द्रव्य से ही रूप का प्रत्यक्षरूप कार्य होता है , दूसरे द्रव्यों से नहीं ।
( रूपप्रत्यक्ष का उत्पादक ) यह द्रव्य तैजस इस लिए है कि रूपादि गुणों में से यह केवल रूप के ही प्रत्यक्ष का उत्पादन कर सकता है , जैसे कि प्रदीप | अदृष्टवश इसके रूप और स्पर्श अनुभूत हैं , अतः ( स्पर्श के अनुभूतत्व प्रयुक्त ) अपने आश्रय में दाह को एवं ( रूप के अनुभूतत्व प्रयुक्त ) अपने प्रत्यक्ष को उत्पन्न नहीं कर सकता ।
पृ. १००
विषयसंज्ञकं चतुर्विधम् - भौमं दिव्यमुदर्य्यमाकरजञ्च ।
तत्र भौमं काष्ठेन्धनप्रभवमृज्वलनस्वभावं पचनदहनस्वेदनादिसमर्थम , दिव्यम- चिन्धनं सौरविद्युदादि , शुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थमुदर्थ्यम् , आकरजञ्च सुवर्णादि ।
त्र संयुक्तसमवायाद्रसाद्युपलब्धिरिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — विषय नामक तेज के भौम , दिव्य , उदर्य और आकरज भेद से चार प्रकार हैं । इनमें लकड़ी प्रभृति से उत्पन्न तेज ' भौम ' है । ऊपर की ओर प्रज्वलित होना उसका स्वभाव है । भौम तेज पाक , दाह एवं वस्तुओं के काठिन्य को दूर कर कोमल बनाने की शक्ति रखता है । जिसमें ' अप् , अर्थात् जल ही लकड़ी का काम देवे , उसी विषय रूपी तेज को ' दिव्य ' कहते हैं , इसके अन्तर्गत सौर तेज और विद्युत् प्रभृति आते हैं । खाये हुये द्रव्य को पचानेवाला उदर का तेज ही ' उदय ' तेज है । सुवर्ण प्रभृति ' आकरज ' तेज हैं । उनमें रस की उपलब्धि संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से होती है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
विषयसंज्ञकं चतुर्विधम् । विषय इति संज्ञा यस्य तद्विषयसंज्ञकं तेजः कार्यं चतुर्विधम् । चातुविध्यमेव दर्शयति- भौममित्यादि । तत्रेति निर्धार - णार्थः । भूमौ भवं भौमं काष्ठेन्धनप्रभवं काष्ठस्वभावं यदिन्धनं तस्मात् प्रभवत्युत्पद्यते , निराश्रयस्यानुत्पत्तेः । काष्ठग्रहणमुपलक्षणार्थम् , तृणतुषादीनामपि कारणत्वात् , ऊर्ध्वं ज्वलनं क्रियाविशेषः , तत्स्वभावकं तद्धर्मकम् ।
पचनस्वेदनादिसमर्थम् , पचनं पूर्वगुणविलक्षणं गुणान्तरोत्पादनम् , स्वेदनं स्तब्धत्वनाशनम् , आदिशब्दाद्विस्फोटादिजननलक्षणं दहनं तत्र समर्थमित्यर्थक्रियोपवर्णनम् । दिव्यमबिन्धनं सौरं विद्युदादिभवं तेजोऽबिन्धनम् , आप इन्धनं यस्येति व्युत्पत्त्या तत् सौरं विद्युदादि , आदिशब्दादुल्काया अवबोधः । भुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थमुदर्यम् , उदरे भवं तेजो भुक्तस्याहारस्य रसमलधातुभावेन परिणामप्रयोजनम् । आकरजश्च सुवर्णादि । आकर : स्थानविशेष :, तस्मिन् सुवर्णरजतादि तैजसं द्रव्यं जायते ।
सुवर्णादीनां तैजसत्वे तावदागमः प्रमाणम् । न्यायश्चाभिहितः । कथं तहि गन्धरसयोरनुष्णाशीतस्पर्शस्य च गुणस्योपलब्धिरत आह - तत्रेति । भोगिनामदृष्टवन भूयसां पार्थिवानां पार्थिवावयवानामुपष्टम्भादनुद्भूतरूपस्पर्श पिण्डीभावयोग्यं सुवर्णादिकमारभ्यते , तत्र पार्थिवद्रव्यसमवेता इमे रसादयो गृह्यन्ते । इतिशब्दः समाप्तौ ।
अनुद्भूतरूपस्पर्शं सुवर्णादिकमिति न मृष्यामहे , प्रतीयमानरूपस्पर्शव्यतिरिक्तस्य द्रव्यान्तरस्याभावादिति चेन्न , स्तम्भोऽयं कुम्भोऽयमिति प्रत्येक विलक्षणसंस्थानसंवेदनाद्रूपादिस्वभावस्य सर्वत्राविशेषात् । वासनाभेदात् प्रतिसञ्चयं संवित्तिभेद इति चेत् ? नीलादिसंवित्तिभेदोऽपि वासनाकृत एवास्तु नार्थो नीलादिभेदेन । असति बाह्यवस्तुनि स्वसन्तान - मात्राधीनजन्मनो वासनापरिपाकस्य कादाचित्कत्वानुपपत्तेस्तन्मात्र हेतोर्नीलादिसंवेदनस्य कादाचित्कत्वासम्भवान्नीलादिभेदकल्पनेति चेत् ?
स्तम्भादिसंवित्तिभेदस्यापि बाह्यवस्त्वननुरोधिनो न कादाचित्कत्वमुपपद्यत इति रूपादिव्यतिरिक्तः प्रतिसञ्चयं वासनाविशेषबोधहेतुविलक्षणः संस्थानविशेषः कल्पनीयः , येन दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणामपि सिद्ध्यति । रूपादिमात्रे वस्तुन्यस्याप्यसम्भवः , तेषामेकै केन्द्रियग्रहण नियमात् । अपि च , रूपादयः परमाणुस्वभावाः प्रत्येकमतीन्द्रियाः , तद्व्यतिरिक्तः सञ्चयो नास्तीति भवतां कोऽर्थो दर्शनस्पर्शनविषयः ?
प्रत्येकमतीन्द्रिया अपि परमाणवो मनस्कारेन्द्रियादिषु सत्सु समर्थोत्पन्ना ऐन्द्रियका भवन्तीति चेन्न , समर्थोत्पादे s पि परमसूक्ष्मस्वरूपानतिवृत्तेः , समर्थोत्पत्तिमात्रेण च चाक्षुषत्वे मनस्कारेन्द्रिययोरपि प्रत्यक्षता स्यात् , अविशेषात् । अथ मतम् , प्रत्येकमस्थूला अपि परमाणवः केशसमूहवत् संहताः स्थूलावभासभाजो भवन्तश्चाक्षुषा जायन्ते निरन्तरतया चैकत्वेनाध्यवसीयन्ते , इति चेत् ? किमेतेषु बहुषु तदानीमेकः स्थूलाकारो जायते ? किं वा केशेष्विवाविद्यमानः समारोप्य प्रतीयते ?
यदि च जायते स नोऽवयवीति । अथाविद्यमानः प्रतीयते , भ्रान्तिस्तहि । भ्रान्तिश्चाभ्रान्तिप्रतियोगिनी , क्वचिदेकः स्थूलः सत्योऽभ्युपेयः । न च विज्ञाने तस्य सत्यता युक्ता , स्थूलमहमस्मीति प्रतीत्यनुदयादनेकद्रष्टृसाधारणत्वाभावप्रसङ्गाच्च । तस्माद्विषय एवायमेकः स्थूलः , सर्वदा भिन्नाकारेण प्रतिभासनादर्थक्रियासम्पादनाच्चेत्यवयविसिद्धिः ।
नवसति बाधके प्रतीतिसिद्धस्तथेति व्यवह्रियते , अवयविसद्भावे तु बाधकं प्रमाणमस्ति । तथा हि -- पाणौ कम्पवति तदाश्रितं शरीरं न कम्पते पादे वा कम्पमाने तद्गतं शरीरं न कम्पत इत्येकस्य विरुद्धधर्मताप्रसङ्गः । तदसङ्गतम् , पाणौ कम्पमाने शरीर कम्पा वश्यम्भावनियमाभावात् । यदा पाणिमात्रं चालयितुं कारणं भवति तदा तन्मात्रं चलति न शरीरम् , कारणाभवात् । यदा तु शरीरस्यापि चलनकारणं भवेत् तदा शरीरं चलत्येव । नास्याचलनमस्तीति कुतो विरोधः , यदि हस्तचलति न शरीरं तदाऽवयवावयविनोर्युतसिद्धिः ?
नैवम् , पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धि :, न चलाचलत्वम् , द्रव्ये चलति गुणस्थाचलनेऽपि तयोर्युतसिद्ध्यभावात् । पृथगाश्रयाश्रयित्वं चावयवावयविनोभिन्नत्वेऽपि नास्तीति न युतसिद्धता । यदप्यन्यद् बाधकमुक्तम् , एकावयवावरणे तत्समवेतस्यावयविनो न ग्रहणम् , अनावृतावयवग्रहणे च ग्रहणमित्येकस्य युगपद् ग्रहणमग्रहणञ्च प्राप्नुत इति । तदप्यसारम् एकावयवावरणेऽवयव्यावरणस्याभावात् । स को s नेकेषु वाऽवयविषु वर्त्तमानः कतिपयावयवावरणेऽप्यनावृतेतर कतिपयावयवग्रहणेन गृह्यते , तस्य सर्वत्राभिन्नत्वात् ।
यत्तु बहुतरावयवग्रहणवत् स्थूलप्रतीतिर्न भवति , तद्भूयोऽवयवप्रचयग्रहणस्य परिमाण प्रकर्षप्रतीतिहेतोरभावात्। यत्र तु भूयसामवयवानामाव रणमल्पतरावयवग्रहणञ्च तत्रावयविनो न ग्रहणम् , यथा जलनिमग्नस्य शिरोमात्रदर्शनात् । एकस्मिन्नवयवे रक् तद्देशोऽवयवी रक्तोऽवयवान्तरे चारक्त इत्येकस्य रक्तारक्तत्वप्रसङ्ग इत्यदूषणम् , अविरोधात् । रागद्रव्यसंयोगो रक्तत्वम् , अरक्तत्वञ्च तदभावः । उभयं चैकत्र भवत्येव , संयोगस्याव्याप्यवृत्तिभावात् ।
इदमपरं बाधकम् , अवयविन : प्रत्यवयवमेकदेशेन वृत्तिः वा ? प्रकारान्तराभावात् । न तावदेकदेशेन वृत्तिरवयवव्यतिरेकेणास्यैकदेशाभावात् । कार्त्स्न्येन वृत्तौ वाऽवयवान्तरे वृत्त्यभावः , एकावयवसंसर्गावच्छिन्ने स्वरूपेऽवयवान्तराणामनवकाशात् , तत्स्वरूपव्यतिरेकेण चास्य स्वरूपान्तराभावात् । अत्रापि निरूप्यते - यद् वर्त्तते तदेकदेशेन वर्त्तते कात्स्न्येन वेति ? किमिदं स्वसिद्धमभिधीयते परसिद्धं वा ? स्वयं तावत् कस्यचित् क्वचिद् वृत्तिरसिद्धा शाक्यानाम् परस्यापि नैकदेशकात्स्यभ्यां वृत्तिः सिद्धा , तयोरवृत्तित्वात् , वृत्ति प्रत्यकारणत्वाच्च ।
यद् वर्त्तते तत् स्वरूपेणाश्रयाश्रितभावलक्षणया वृत्या वर्त्तते । न चैकस्यानेकसंसर्गो विरुद्धयते । दृष्टो हि चित्रज्ञाने नीलाकारावछिन्ने पीताद्याकारसंसर्गः । न च तस्य प्रत्याकारं भेदः , एकस्यानेकाकारग्रहणानुपपत्तौ भवतां चित्रप्रत्ययाभावप्रसङ्गात् । नापि ज्ञानैकत्वादाकाराणामप्येकत्वम् , चित्रानुभवविरोधात् ।
यथैकावयवावच्छिन्ने एकावयविस्वभावेऽवयवान्तरसमावेशः प्रत्यक्षेणाने कावयवसम्बद्धस्य तथैकस्य स्थूलात्मनः संवेदनादेकस्मिन्ननेकसंसर्गे दृष्टो नैस्यानेकेषु संसर्ग इति च वैधर्म्यमात्रम् , एकस्यानेकसंसर्गावच्छेदस्योभयत्राविशेषात् ।
एवं यदेकं तदेकत्रैव वर्त्तते , यथैकं रूपमेकश्चावयवीति , तथा यदनेकवृत्ति तदनेकम् , यथानेकभाजनगततालफलान्यनेकवृत्तिश्चावयवीति प्रसङ्गद्वयं प्रत्याख्यातम् , स्वतः परतश्च व्याप्त्यसिद्धेः , स्वतस्तावदेकं विज्ञानमनेकेषु विषयेन्द्रियमनस्कारेषु स्वरूपाभेदेन तदुत्पत्त्या वर्त्तते परस्याप्येकं सूत्रमभेदेनानेकेषु मणिषु संयोगवृत्त्या वर्त्तते , तथाऽवयव्यवयवेषु समवायवृत्त्या वर्तिष्यते नाना च न भविष्यति ।
सर्वश्चायं प्रसङ्गहेतुराश्रयं निघ्नन्नात्मानमपि हन्ति , अवयव्यभावे परमाणुमात्रे जगति धर्म्मधम्मदृष्टान्तादिप्रतीत्यसिद्धौ निराश्रयस्य वृत्त्यभावात् । अतो नानेन प्रत्यक्षसिद्धोऽवयवी शक्यो निराकर्तुम् , प्रत्यक्षसापेक्षस्य तस्य ततो दुर्बलत्वात् । भ्रान्तं प्रत्यक्षमिति चेत् ? कुत एतत् ? बाधकेनापाकरणादिति चेत् , प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वे बाधकस्य प्रमाणत्वं बाधकप्रामाण्ये च प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमित्यन्योन्यापेक्षित्वम् । प्रत्यक्षे तु नायं न्यायः , तस्यानपेक्षत्वात् ।
न चार्थक्रियासंवादिसर्वलोकसिद्धं स्पष्टप्रतिभासं भ्रान्तमिति युक्तम् , नीलादि - प्रत्यक्षस्यापि भ्रान्तत्वप्रसङ्गादिति बाधकोद्धारः । परमाणवोऽवयव्यनुमेया अपि सन्तो व्यवहर्त्तव्याः ।
षट्केन युगपद्योग एकस्य परमाणोः षडंशत्वमापादयन् परमाणुसद्भावं बाधत इति चेत् ? कोऽयं युगपद्योगो नाम ? किमेकस्य परमाणोः षड्भिः परमाणुभिः सह युगपदुत्पाद : ? किं वा युगपत्संयोगः ? युगपदुत्पादस्तावत् कारणयौगपद्यादेव निरंशस्यापि यदि भवेत् को विरोधः , अथ युगपत्संयोग :, सोऽपि नानुपपन्नः , न ह्यंशविषयः संयोगो द्रव्याणाम् , निरंशस्याप्याकाशस्य तद्भावात् , अंशस्याप्यंशान्तरसद्भावे परमाणुमात्रे संयोगस्थितौ तस्याप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गाच्च , किन्तु स्वरूपविषयः । एवञ्चेत् , सांशद्रव्यस्येव निरंशस्यापि परमाणोरेकस्य युगपत्कारणसम्भवे सत्यनेकसंयोगाधिकरणत्वमुपपद्यत एवे न तत्प्रतिक्षेपः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' विषयसंज्ञकं चतुर्विधम् ' अर्थात् ' विषय इति संज्ञा यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' विषय ' नाम के तेज के कार्य चार प्रकार के हैं । यहीं चारों भेद ' भोमम् ' इत्यादि से कहते हैं । ' त ' इस पद के सप्तमी विभक्ति का अर्थ है निर्द्धारण । ' भौम ' अर्थात् पृथिवी से उत्पन्न विषयरूप तेज का नाम ' भौम ' है ।
' काष्ठेन्धनप्रभवम् ' अर्थात् लकड़ी रूप इन्धन से जिसकी उत्पत्ति हो , वही तेज काष्ठेन्धनप्रभव ' है , क्योंकि बिना आश्रय के किसी वस्तु की उत्पत्ति नहीं हो सकती । ' काष्ठ ' पद उपलक्षण है , क्योंकि तिनके और भूसे आदि पृथिवी से भी अग्नि की उत्पत्ति होती है । ' ऊर्ध्वज्वलन ' ऊपर की तरफ उठनेवाली एक क्रिया है , वही ' स्वभाव ' अर्थात् धमं इस तेज का है ।
पचनस्वेदनादिसमर्थम् ' पचन शब्द का अर्थ है- द्रव्य में पहिले से विद्यमान गुणों से दूसरे प्रकार के गुणों का उत्पादन | स्वेदन शब्द का अर्थ है - काठिन्य का नाश करना | ' आदि ' शब्द से ' विस्फोट ' आदि इसके कार्य सूचित किये गये हैं । यह ' भौम ' तेज से होनेवाले कार्यों का विवरण है । ' आप इन्धनं यस्य ' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न ' अबिन्धन ' शब्द से समझे जानेवाले सौर एवं विद्युत् प्रभृति एवं उससे उत्पन्न तेज ही ' दिव्य ' तेज है ।
प्रकृत आदि शब्द से उल्का प्रभृति तेजों का परिग्रह इस दिव्य तेज के अन्तर्गत करना चाहिए । ' भुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थमुदर्यम् ' ' उदरे भवं तेज : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उदर्भ्य शब्द से खाये हुये अन्नादि को रस , मल , धातु प्रभृति रूपों में परिणत करनेवाला पेट का तेज हो अभीष्ट है । ' आकरजं सुवर्णादि ' विशेष प्रकार के स्थान ( खान ) को ' आकर ' कहते हैं । उसमें सोना चाँदी प्रभृति द्रव्य उत्पन्न होते हैं ।
सुवर्णादि के तैजस द्रव्य होने में ( " अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णम् " इत्यादि ) आगम भी प्रमाण हैं । सुवर्णादि द्रव्य के तैजस होने में अनुमान प्रमाण का उल्लेख कर चुके हैं । ( प्र ० ) फिर सुवर्णादि में गन्ध , रस एवं अनुष्णाशीत स्वर्श प्रभृति की उपलब्धि कैसे होती है ? इसी प्रश्न के उत्तर में ' तत्र ' इत्यादि पंङ्कि लिखी गयी है ।
भोग करनेवाले के अदृष्ट की सहायता से पार्थिव अवयवों के संयोग द्वारा ( पार्थिव वस्तुओं की तरह ) ठोस सुवर्णादि तैजस द्रव्यों की उत्पत्ति होती है | सुवर्णादि में निमित्त कारणरूप इन पार्थिव अवयवों के ही रसादि प्रतीत होते हैं । इस ' इति ' शब्द का अर्थ है समाप्ति |
( प्र ० ) हम लोगों को यह बात मान्य नहीं है कि अनुद्भूत रूप एवं अनुद्भूत स्पर्श से युक्त सुवर्ण नाम का कोई द्रव्य है , क्योंकि प्रतीत होनेवाले रूपरसादि को छोड़कर द्रव्य नाम की कोई दूसरी वस्तु नहीं है । ( उ ० ) नहीं क्योंकि " यह खूटा है , यह घट है " इन दोनों प्रतीतियों से दो विभिन्न आकार की वस्तुओं की सत्ता जनसाधारण ' अनुभव से सिद्ध है , किन्तु खूँटा और घट दोनों के रूपादि गुणसमूह तो समान ही हैं ।
( प्र ० ) वासना ( मिथ्याज्ञानजनित संस्कार ) के भेद से प्रत्येक गुणसमूह की प्रतीतियाँ विभिन्न आकार की होती हैं ? ( उ ० ) फिर ' यह नील है ' , ' यह पीत है ' इत्यादि गुणविषयक प्रतीतियाँ भी वासना से ही मान ली जायें , नीलादि गुणों की भी सत्ता मानने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । ( प्र ० ) अगर ( नीलादि ) किसी बाह्य वस्तु की सत्ता न मानी जाय तो फिर नीलादि प्रतीतियाँ कभी होती हैं एवं कभी नहीं ।
उनका यह कादाचित्कत्व अनुपपन्न हो जाएगा , क्योंकि वासना के परिपाक से तो कादाचित्कत्व सम्भव नहीं है . चूंकि वह अपने पूर्ववर्ती समूहों से ही उत्पन्न होती है , अतः नीलादि गुणों की सत्ता अवश्य माननी पड़ती है , जिससे उनकी सत्ता से नीलादि प्रतीतियाँ होती हैं और सत्ता न रहने से नहीं होती हैं । इस प्रकार प्रतीतियों का कादाचित्कत्व सम्भव होता है ।
( उ ० ) उक्त स्तम्भादि प्रतीतियों में भी अगर बाह्य किसी वस्तु की सत्ता की अपेक्षा न मानें तो इन प्रतीतियों का भी कादाचित्कत्व अनुपपन्न ही रहेगा , अत : ( आप को यह भी ) मानना पड़ेगा कि रूपादि गुणों से भिन्न स्तम्भावि प्रत्येक समूह में विशेष प्रकार की वासना की उद्बोधक कोई विलक्षण आकार की वस्तु है । इसे मान लेने से चक्षु और त्वचा से एक ही वस्तु के ग्रहणरूप सर्वजनीन प्रतीति की भी उपपत्ति हो जाएगी ।
द्रव्य को रूपादि समूहरूप मान लेने में यह सम्भव नहीं है क्योंकि रूपादि प्रत्येक गुण एक - एक इन्द्रिय से ही गृहीत होते हैं , और यह बात भी है कि रूपादि प्रत्येक परमाणु - स्वभाव के हैं अत : प्रत्येक अतीन्द्रिय हैं । समूह नाम की कोई अतिरिक्त वस्तु नही है । अत : आपके मत में कौन - सी वस्तु त्वचा से गृहीत होगी ?
( प्र ० ) उनमें से प्रत्येक अतीन्द्रिय है , किन्तु जिस क्षण में मन से सम्बद्ध उन्मुख इन्द्रियादि रूप प्रत्यक्ष की सामग्री का सम्बलन होता है , उससे आगे के क्षण में उस अतीन्द्रिय समुदाय से भी इन्द्रिय से ज्ञात होने योग्य समुदाय की उत्पत्ति होती है , अतः इस समुदाय का इन्द्रिय से ग्रहण होता है । ( उ ० ) ' अतीन्द्रिय वस्तुएँ भी चक्षु से गृहीत होने योग्य समुदाय को उत्पन्न करती हैं ' यह मान लेने पर भी वह चक्षु से गृहीत होनेवाला रामूही अपने सूक्ष्मत्वरूप स्वभाव को छोड़ नहीं सकता ।
अगर समर्थ के उत्पादन करने से ही उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष हो तो फिर मनोवृत्ति और इन्द्रियों का भी प्रत्यक्ष होना चाहिए , क्योंकि इनके रहने पर ही अतीन्द्रिय स्वभाव का समूह चाक्षुष प्रत्यक्ष योग्य समूह का उत्पादन करता है ) , क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । ( प्र . ) यह ठीक है कि प्रत्येक परमाणु प्रतीन्द्रिय है , किन्तु समुदाय भावापन्न होने पर वह इन्द्रिय से गृहीत हो सकता है । जैसे कि एक केश दूर से नहीं देखा ताता , किन्तु उसका समूह दूर से भी देखा जाता है ।
उस समूह के बीच व्यवधान न रहने के कारण केश अनेक होने पर भी एक दीखते हैं । ( उ ० ) ( १ ) उन परमाणुओं में एक स्थूलाकार वस्तु की उत्पत्ति होती है , जिसमें वस्तुतः विद्यमान एकत्व का भान होता है ? ( २ ) या जैसे केशसमूह में वस्तुतः अविद्यमान भ्रमज्ञान विषय के एकत्व का भान होता है , वैसे ही उक्त परमाणुसमूह के स्थल में भी होता है ? अगर पहिला पक्ष मानते हैं तो फिर वही ( परमाणुओं में उत्पन्न स्थूलाकार एक वस्तु ) हम लोगों का अभीष्ट अवयवी है ।
अगर दूसरा पक्ष माने तो फिर एकत्व की इन प्रतीतियों को भ्रान्तिरूप मानना पड़ेगा । भ्रान्ति अभ्रान्ति का प्रतियोगी है , इसकी प्रसिद्धि के लिए कहीं एक स्थूलाकार वस्तुकी यथार्थ सत्ता को स्वीकार्य करना अनिवार्य है । सभी वस्तुओं को विज्ञानस्वरूप मान लेने पर ( यद्यपि उक्त एकत्व प्रतीति के प्रमात्व की उपपत्ति हो जाती है , किन्तु यह विज्ञानवाद ' इसलिए अयुक्त है कि घटादि वस्तुओं में ) ' मैं स्थूल हूं ' इस प्रकार की प्रतीति नहीं होती ।
एवं घटादि वस्तुएं अनेक ज्ञाताओं से ज्ञात न हो सकेंगी । तस्मात् उन प्रतीतियों के विषय गुणादि से भिन्न गुणादि के आश्रय एवं परमाणुसमूहों से भिन्न , किन्तु उनसे उत्पन्न , एवं विज्ञान से भिन्न अवयवो अवश्य ही हैं ।
प्र ० ) जिस प्रतीति का आगे किसी विरोधी प्रतीति से बाध न हो , वह प्रतीति वस्तु को जिस रूप में उपस्थित करे , वह वस्तु उसी रूप से व्यवहृत होती है । किन्तु ' अवयवों से भिन्न अवयवों में रहनेवाला कोई अवयवी नाम का द्रव्य है ' इस बुद्धि को बाधित करनेवाली बुद्धि है , क्योंकि हाथ में कम्पन होने पर भी उसमें रहनेवाला शरीर रूप अवयवी कम्पित नहीं होता । अथवा पैर में कम्पन होने पर भी उसमें रहनेवाला शरीररूप Marat कम्पित नहीं होता है ।
इस प्रकार एक ही अवयवी में अकम्पत्व और कम्पत्व रूप दो विरुद्ध धम्म की सत्ता माननी पड़ेगी । ( उ ० ) यह आपत्ति ठीक नहीं है , क्योंकि यह नियम नहीं है कि हाथ काँपने पर शरीर अवश्य ही काँपे । जिस समय केवल हाथ में ही कम्पन के कारण रहते हैं , तब केवल वही कम्पित होता है । जब उसमें रहनेवाले शरीर में भी कम्प होने की सामग्री रहती है , उस समय शरीर में भी कम्प होता है । वह भी तो कम्पनशून्य नहीं है , फिर विरोध क्या है ?
( प्र ० ) अगर हाथ के चलने पर भी शरीर में क्रिया न हो तो अवयव और अवयवियों में ' युतसिद्धि ' की आपत्ति होगी । ( उ ० ) इससे ' युत सिद्धि ' को आपत्ति नहीं होगी । ( क्योंकि अयुतसिद्धि उन दो वस्तुओं में होती है , जिनमें ) एक से असम्बद्ध होकर दूसरा न कहीं रहे , और न उनमें कोई रहे , यही वस्तुओं की अयुतसिद्धि है ।
' भयुतसिद्धि ' शब्द का यह अर्थ नहीं है कि एक के चलने पर दूसरा भी चले , एवं एक के न चलने पर दूसरा भी न यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि ' इति न मृष्यामहे ' इत्यादि से जो आक्षेप किया गया है कि प्रतीत होनेवाले गुणसमूह से भिन्न कोई अतिरिक्त द्रव्य नहीं है , उसका समाधान ' भवती aisa दर्शनस्पर्शनविषयः ' इतनी पक्तियों से ही हो जाता है । रूपादिसमूह से अतिरिक्त द्रव्य अवश्य है । उसके बाद ' परमाणु- समूह ही अवयवी है ' या ' सभी विज्ञानस्वरूप हैं ' इत्यादि विषयों की चर्चा प्रासङ्गिक है ।
१४ चले , क्योंकि द्रव्य के चलने पर भी गुण नहीं चलते , किन्तु वे दोनों ' अयुत सिद्ध ' हैं | rara और aarat इन दोनों में परस्पर भेद रहने पर भी एक को छोड़कर न दूसरा कहीं रहता है , न एक से असम्बद्ध एक - दूसरे में कोई रहता है । अतः इन दोनों में सिद्धि की आपत्ति नहीं है ।
( अवयवों से भिन्न अवयवी के मानने में ) आपने जो दूसरा बाधक कहा है कि ( प्र ० ) जहाँ एक अवयवी के कुछ अवयव किसी दूसरी वस्तु से ढँके हुये हैं , और कुछ अवयव बिना ढँके हुये हैं , वहाँ ढँके हुए अवयवों में समवायसम्बन्ध से रहनेवाला अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होता है , और बिना ढके हुए अवयवों में समवायसम्बन्ध से रहनेवाले अवयवों का ग्रहण होता है , दोनों प्रकार के अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक ही है ।
तस्मात् अवयवों से भिन्न एक अवयवी के मानने में एक ही वस्तु में एक ही समय में ग्रहणत्व और अग्रहणत्व रूप विरुद्ध दो धर्मों का समावेश मानना पड़ेगा । ( उ ० ) इसमें भी कुछ सार नहीं है , क्योंकि एक या कुछ अवयवों के ढँके जाने पर भी अवयत्री नहीं ढँकता । यह अवयवी अनेक अवयवों में रहने के कारण कुछ अवयवों के ढँके रहने पर भी बिना ढके हुए अवयवों के ग्रहण से गृहीत होता है , क्योंकि सभी अवयवों में अवयवी तो एक ही है ।
यह ठीक है कि कुछ अवयवों के ग्रहण से जो अवयवी का ग्रहण होता है , वह सभी rana के ग्रहण से गृहीत होनेवाले अवयवी की प्रतीति को तरह ' स्थूल ' विषयक नहीं होता । उसका कारण यह है कि ' परिमाण प्रकर्ष ' रूप ' स्थूलता ' की प्रतीति के कारण बहुत से अवयवों की प्रतीति वहाँ नहीं है । जिस अवयवी के अधिक अवयव ढके रहते हैं और कुछ ही अवयव बिना ढके हुए रहते हैं , उस अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे कि पानी में डूबे हुए व्यक्ति का केवल शिर देखने पर भी प्रत्यक्ष नहीं होता ।
यह जो दूसरी आपत्ति ( अवयवी को अवयवों से अतिरिक्त मानने में बौद्ध लोग ) देते हैं कि ( प्र ० ) किसी अवयवी का एक अवयव रक्त रहे और दूसरा रक्त न रहे इनमें रक्त अवयवों में रहने वाले अवयवी को रक्त मानना पड़ेगा , और अरक्त अवयवों में रहनेवाले अवयवी को अरक्त मानना पड़ेगा , एवं दोनों प्रकार के अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक ही है । अवयव समुदाय से भिन्न एक अवयवी के मानने में उक्त रीति से एक ही काल में एक ही वस्तु में रक्तत्व और अरक्तत्व इन दो विरुद्ध धर्मों का समावेश स्वीकार करना पड़ेगा ।
( उ ० ) यह भी दोष नहीं है , क्योंकि ' रक्तत्व ' शब्द का अर्थ है लाल द्रव्य का संयोग , एवं अरक्तत्व शब्द का अर्थ है उसका अभाव । संयोग ' अव्याप्यवृत्ति ' अर्थात् एक ही समय में अपने आश्रय के किसी अंश में रहता है , एवं किसी में नहीं । तस्मात् रक्तत्व और अरक्तत्व दोनों का एक ही समय में एक अवयवी में रहना उनके परस्पर अविरोधी होने के कारण युक्तिविरुद्ध नहीं है ।
अवयवों से भिन्न अवयवी के मानने में बौद्ध लोग एक आपत्ति और करते हैं कि ( प्र ० ) प्रत्येक अवयव में अवयवी अपने किसी एक अंश के द्वारा सम्बद्ध रहता है ? या अपने सम्पूर्ण रूप से ? इन दोनों से भिन्न कोई तीसरा प्रकार नहीं है । किन्तु किसी एक अंश से तो रह नहीं सकता , क्योंकि उन अवयवों को छोड़कर उसका कोई एक अंश नहीं है ।
उसका अवयवों में अपने सम्पूर्ण रूप से रहना भी सम्भव नहीं है , क्योंकि इस प्रकार वह अपने किसी एक ही अवयव में रहेगा और अवयवों में नहीं , क्योंकि एक अवयव में अपने सम्पूर्ण रूप से सम्बद्ध अवयवी की दूसरे अवयवों में सम्बद्ध होने की सम्भावना नहीं है । जिस रूप से वह एक अवयव में सम्बद्ध होगा , उसको छोड़कर अवयवी का कोई दूसरा रूप नहीं है । किन्तु इस रूप से तो वह एक अवयव में है ही । ( उ ० ) इस विषय में यह पूछना है कि अवयवी अवयवों में एक अंश से रहता है या सम्पूर्ण रूप से ?
यह प्रश्न आप ( बौद्ध ) अपने से कर रहे हैं ? या दूसरों के सिद्धान्त के अनुसार ? बौद्धों के यहाँ किसी वस्तु की वृत्तिता किसी वस्तु में है ही नहीं । दूसरों के मत में भी ' एक देश से या सम्पूर्ण रूप से वृत्तिता सिद्ध नहीं है , क्योंकि ' एकदेश ' या ' सम्पूर्णरूप ' इन दोनों में कोई भी ' वृत्ति ' अर्थात् सम्बन्ध नहीं है , एवं सम्बन्ध के कारण भी नहीं हैं ।
किसी में रहना , उन दोनों वस्तुओं के आधाराधेयभावसम्बन्ध से
' वस्तु का किसी वस्तु ही होता है । अनेक वस्तुओं में एक वस्तु का सम्बन्ध विरुद्ध भी नहीं है , क्योंकि चित्रज्ञानस्थल में नीलाकारविशिष्ट में पीताकार का सम्बन्ध सर्वजनीन अनुभव से सिद्ध है । चित्ररूप की प्रतीति में उसके आश्रय रूप से भासित होनेवाली वस्तु नीलादि आकारों के भेद से भिन्न - भिन्न भी नहीं हैं , क्योंकि फिर उसमें चित्र रूप की प्रतीति नहीं होगी ।
( एक वस्तु में अनेक आकारों के रूप की प्रतीति ही चित्र की प्रतीति है ) एक ज्ञान में भासित होने के कारण ( नीलादि सभी ) आकारों को एक मानना भी सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) एक वस्तु एक ही आश्रय में रह सकती है , जैसे कि एक रूप ।
अवयवी भी एक ही है , ( तस्मात् अनेक अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक नहीं हो सकता ) , एवं जो वस्तु अनेक आश्रयों में रहता है वह स्वयं भी अनेकात्मक ही है , जैसे कि अनेक पात्रों में रक्खे हुए अनेक तालफल | ( तस्मात् अनेक अवयवों में रहनेवाला अवयवी अनेकात्मक ही हो सकता है , एकात्मक नहीं ) | ( उ ० ) किन्तु ये दोनों ही बाधक अनुमान अनादर के पात्र हैं , क्योंकि इनमें व्याप्तिन पूर्वपक्षवादी बौद्धों के मत से सिद्ध है , न हम लोगों के मत से ।
बौद्धों के मत में भी एक ही विज्ञान अपने उत्पत्तिरूप सम्बन्ध से और अपने स्वरूप के अभेद से विषय इन्द्रिय और मनोवृत्ति इन अनेकवस्तुओं में रहता है । हम लोगों के मत में भी एक डोरी अनेक मणियों में संयोग सम्बन्ध से रहती है । अतः एक अवयवी भी समवायसम्बन्ध से अनेक अवयवों में रहेगा , इसके लिए उसे नाना अवयवरूप मानने की आवश्यकता नहीं है । विरुद्ध अनुमानों के ये सभी हेतु अपने आश्रय का नाश करते हुए अपना भी नाश करते हैं , क्योंकि अगर अवयवी न रहे तो संसार परमाणुमात्र में परिणत हो जाय ।
फिर धर्म , धर्मी , दृष्टान्तादि की विलक्षण प्रतीतियों की उपपत्ति न होगी | और ये विरुद्ध अनुमान के हेतु बिना आश्रय के रह नहीं सकते ( अपना काम भी नहीं कर सकते ) , अत : इससे प्रत्यक्षसिद्ध अवयवी नहीं हटाया जा सकता , क्योंकि अनुमान प्रत्यक्ष सापेक्ष है , अतः अनुमान प्रत्यक्ष से दुर्बल है । ( प्र ० ) प्रत्यक्ष भ्रान्त है ? ( उ ० ) क्यों ? ( प्र ० ) क्योंकि वह बाधक अनुमान से हटा दिया जाता है ।
( उ ० ) प्रत्यक्ष जब भ्रान्तिरूप से निश्चित होगा तभी बाधक होगा , एवं बाधक अनुमान का प्रामाण्य जब तक निर्णीत नहीं है तब तक प्रत्यक्ष को भ्रान्ति रूप मानना सम्भव नहीं है , इस प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य है । प्रत्यक्ष को बाधक मानने में यह अन्योन्याश्रय दोष नहीं है , क्योंकि उसे अपने प्रामाण्य के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है ।
यह कहना भी ठीक नहीं है कि प्रवृत्ति की सफलता के लिए लोक में प्रसिद्ध स्पष्ट ज्ञानरूप प्रत्यक्ष भ्रान्त है : क्योंकि इस प्रकार नीलादि गुणसमूहों का प्रत्यक्ष भी भ्रान्त हो जाएगा । इस प्रकार सभी बाधकों का खण्डन हो गया ।
( प्र ० ) छ : परमाणुओं के एक ही समय का संयोग एक एक परमाणु के छः अंशों को सिद्ध करता है , जिससे ( आप के अभिमत निरंश ) परमाणु की सत्ता ही उठ जाती है | ( उ ० ) यह ' युगपद्योग ' क्या है ? ( १ ) छ : परमाणुओं के साथ एक ही समय में एक परमाणु की उत्पत्ति ( ' युगपद्योग ' शब्द का अर्थ है ? या ( २ ) एक परमाणु के साथ छः परमाणुओं का संयोग ? ( इनमें प्रथम विकल्प के प्रसङ्ग में यह कहना है कि ) ( १ ) अगर अंशशून्य वस्तुओं के भी कारण हों तो फिर कथित सात परमाणु रूप निरंश वस्तुओं के कारणों का अगर एक समय में सम्बलन हो सके तो एक ही समय में सात परमाणुओं की सृष्टि में क्या बाधा है ? इसमें कौन सा विरोध है ? ( २ ) अगर प्रकृत युगपद्योग शब्द का दूसरा अर्थ है , तब भी कोई अनुपपत्ति नहीं है , क्योंकि यह नियम नहीं है कि संयोग अंशशून्य द्रव्यों का ही हो , क्योंकि अंशशून्य आकाश में भी संयोग मानते ही हैं । अगर संयोग केवल अंशों में ही माना जाय तो फिर सभी अंशों का भी अंश मानना पड़ेगा , फलतः संयोग केवल परमाणु में ही सीमित
अर्थात् एक परमाणु एक ही समय में छः परमाणुओं के साथ संयुक्त होने के कारण ' षडंश : ' अर्थात् छः अंशों से युक्त है , क्योंकि एक ही स्थान में छः संयोग नहीं हो सकते । एक वस्तु के भिन्न - भिन्न अंशों में ही विभिन्न संयोगों की उत्पत्ति होती हैं । अगर आग्रहवश यह मान भी लें कि एक ही परमाणु के एक ही अंश में छः परमाणुओं के छः संयोग होते हैं तो फिर ' पिण्डः स्वादणुमात्रकः ' अर्थात् इस प्रकार सात परमाणुओं से जिस ' पिण्ड ' को उत्पत्ति होगी वह ' अणुमात्र ' अर्थात् परमाणुस्वभाव का ही होगा ।
इसमें स्थूलता नहीं आ सकती । कोई भी वस्तु अपने पहिले स्वरूप से अधिक लम्बी चौड़ी या अधिक वजन को इसलिए होती है कि उसके विभिन्न अंशों में विभिन्न द्रव्यों के विभिन्न संयोग होते हैं । अतः विना अंश के परमाणुओं से उत्पन्न वस्तु स्थूल नहीं हो सकती , परमाणु के एक प्रदेश में विभिन्न परमाणुओं के भिन्न - भिन्न संयोग मान लेने पर भी नहीं । एवं एक में अनेक संयोग हो भी नहीं सकते , अतः परमाणु के अनेक प्रदेश मानने होंगे ।
तस्मात् एक परमाणु के चार दिशाओं के चार अंशों में चार विभिन्न परमाणुओं के चार संयोग एवं परमाणु के नीचेवाले अंश में एक परमाणु का एक संयोग , एवं उसके ऊपर प्रदेश में एक परमाणु का एक संयोग , इस प्रकार छः दिशाओं से छः संयोग से ही स्थूल वस्तु को सृष्टि हो सकती है । फलतः एक परमाणु के उक्त छः दिशाओं से छ : परमाणु आकर संयुक्त होते हैं , तभी स्थूल सृष्टि होती है । तस्मात् जिसे आप परमाणु कहते हैं , वस्तुतः वह छः अंशवाली एक वस्तु है ।
फलतः निरवयव परमाणु की सत्ता ही अप्रामाणिक है | हो जाएगा , जो कि केवल अंश ही है ( उसका कोई अंश नहीं है ) , अतः संयोग को अंश की अपेक्षा नहीं है द्रव्य के स्वरूप की अपेक्षा है । तस्मात् कारणों के रहने पर एक समय
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. १०२) १. अर्थात् प्रतीत होनेवाले गुणसमूह को ही द्रव्य मानें तो दोनों प्रतीतियों में विलक्षणता उत्पन्न नहीं होगी , क्योंकि विषयों के अन्तर हुए बिना ज्ञानों में अन्तर नहीं आ सकता । अगर उक्त दोनों प्रतीतियों के विषय गुणसमूह ही हैं , तो फिर दोनों प्रतीतियों में अन्तर करना कठिन है ।
(पृ. १०४) १. अगर सभी पदार्थ विज्ञान स्वरूप ही हैं तो फिर आत्मा और घटादि दोनों एक ही विज्ञान स्वभाव के हैं , अत दोनों को एक मानना पड़ेगा । फिर जैसे आत्मा की अभिव्यक्ति ' अहम् ' शब्द से होती है कि ' मैं जानता हूँ , ' वैसे हो ' घटादि स्थूल हैं ' इत्यादि प्रतीतियों का यह अभिलाप न होकर ' मै स्थूल हूँ ' इस प्रकार का होना चाहिए । इससे दो आपत्तियाँ आ जाती हैं - ( १ ) घटादि के लिए ' अहम् ' शब्द के प्रयोग को , एवं ( २ ) ' अहम् ' शब्द बोध्य में स्थूलत्व की , किन्तु जो अहम् ' शब्द से समझा जाता है , वह स्थूल नहीं हो सकता , एवं जो स्थूल है वह ' अहम् ' शब्द का अभिधेय नहीं हो सकता ।
(पृ. १०४) २. ' अनेक प्रतिपत्त साधारणत्व ' की जो अनुपपत्ति दी गई है , उसका अभिप्राय है घटादि वस्तुएँ विज्ञान के आकार की हैं तो फिर यह मानना पड़ा कि मेरे विज्ञान से गृहीत होनेवाला घटविज्ञान आपके विज्ञान से गृहीत होनेवाले घटविज्ञान से भिन्न है , क्योंकि मेरा और आपका विज्ञान अवश्य ही भिन्न है । तस्मात् ' जिस घट को मैं देखता हूँ उसी को आप भी देखते हैं ' यह स्वारसिक प्रतीति नहीं हो सकेगी । अनेक ज्ञाताओं से किसी एक वस्तु का ज्ञात होना ही उस विषय का ' अनेकप्रतिपत्तसाधारणत्व ' है । यही अनुपपन्न होगा ।
(पृ. १०९) १. ' षट्केन युगपद्योग : ' इत्यादि कन्दलीकार का उठाया हुआ पूर्वपक्ष ' विज्ञप्ति - मात्रता सिद्धि ' को इस कारिका की ओर सङ्केत करता हैषट्केन युगपद्योगात् परमाणोः षडंशता । षण्णां समानदेशत्वात् पिण्डः स्यादणुमात्रकः ।।
वायुनिरूपणम्
पृ. १११
वायुत्वाभिसम्बन्धाद्वायुः ।
स्पर्शसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वसंस्कारवान् ।
स्पर्शो s स्यानुष्णाशीतत्वे
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वायुत्व जाति के सम्बन्ध से वायु का व्यवहार करना चाहिए । यह स्पर्श , संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , परत्व , अपरत्व और संस्कार इन नौ गुणों युक्त है । इसमें अपाकज अनुष्णाशीत स्पर्श ही है ये सभी
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
प्रत्यक्षं पृथिव्यादित्रयं व्याख्यायाप्रत्यक्षद्रव्यव्याख्यानावसरे नित्यानित्योभयस्वभावद्रव्यनिरूपणस्य प्रकृतत्वाद्वायुं व्याचष्टे - वायुत्वाभिसम्बन्धाद्वायुरिति । व्याख्यानं पूर्ववत् । तस्य गुणान् कथयति - स्पर्शेत्यादि । अत्रापि पूर्ववद् व्याख्या । यादृशः स्पर्शो वायौ वर्त्तते तं दर्शयति-- स्पर्श इति । पृथिवीस्पर्शः पाकजः परमाणुषु , तत्पूर्वकश्च स्वकार्येषु । अस्य तु स्पर्शोऽपाकज इत्यती वैधर्म्यम् । अपाकजत्वञ्चास्य पृथिव्यनधिकरणत्वादुदकतेजःस्पर्शवत् ।
अनुष्णाशीतत्वे सतीत्युदक तेजःस्पर्शाभ्यां वैधर्म्यमुक्तम् । अयञ्च द्वितीयाध्यायात् - " वायुः स्पर्शवान् " ( २।११४ वै ० सू ० ) इति सूत्रेण वायौ सिद्ध इत्याहगुणवनिवेशादिति । अरूपिष्वचाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । रूपरहितेषु द्रव्येषु सङ्ख्यादयश्चाक्षुषा न भवन्तीत्यभिधानादरूपषु सङख्यादीनां सद्भावः कथितः , अन्यथा तद्वतिनां तेषामप्रत्यक्षत्वाभिधानमसम्बद्धं स्यात् । तृणकर्मवचनात् संस्कार इति ।
" तृणे कर्म वायोः संयोगात् " ( ५।१।१४ वै ० सू ० ) इति वचनाद् वायौ संस्कारो दर्शितः , वेगरहितद्रव्यसंयोगस्य कर्महेतुत्वानुपलम्भात् । तस्य भेदनिरूपणार्थं माह - स चायमिति । स चेति स्मृत्युत्थापितो बुद्धिसन्निहितः पश्चादयमिति प्रत्यक्षवत् परामृश्यते । न केवलं पृथिव्यादयो द्विविधाः , अयमपि द्विविध इति चार्थः । कार्य्यलक्षणचतुविधः कार्य्यस्वभाव इत्यर्थः । चातुविध्यं कथमित्यत आह- शरीरमिन्द्रियं विषयः प्राण इति । तेषां मध्ये शरीरं जात्या निर्द्धारयति -- तत्र शरीरमिति ।
अयोनिजमेव न तु पार्थिवशरीरवद् योनिजमयोनिजमपीत्यर्थः । मरुतां लोक इति स्थानसङ्कीर्त्तनम् । भूयसां पार्थिवावयवानां निमित्तकारणभूतानामुपष्टम्भात् संयोगविशेषात् स्थिरं संहतस्वभावमुत्पन्नं पार्थिवशरीरवदुपभोगसमर्थम् । इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकमिति । यत् सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकमिन्द्रियं तत् पृथिव्याद्यनभिभूतैरप्रतिहतसामथ्र्यैव य्ववयवैरारब्धम् , अतो विशिष्टोत्पादादिन्द्रयं स्यादित्यर्थः । तस्य सद्भावे तावत् स्पर्शोपलब्धिरेव प्रमाणम् ।
वायवीयत्वञ्चास्य रूपादिषु मध्ये स्पर्शस्येवाभिव्यञ्जकत्वादङ्गसङ्गिसलिलशैत्याभिव्यञ्जक समीकरणवत् । तच्च सर्वशरीरव्यापि , सर्वत्र तत्कार्य्यस्य स्पर्शोपलम्भस्य भावात् ।
त्वगिन्द्रियमिति समाख्या त्वचि स्थितमिन्द्रियं त्वगिन्द्रियमित्युच्यते , तत्स्थे तदुपचारात् , त्वचा सर्वेन्द्रियाधिष्ठानानि व्याप्तानि , सत्यां त्वचि रूपादिग्रहणमसत्यामग्रहणमिति त्वगिन्द्रियं सर्वार्थम् , न तु स्पर्शमात्र ग्राहकमिति केचित् तदयुक्तम् , अन्धाद्यभावप्रसङ्गात् , तत्तदधिष्ठानभेदेन शक्तिभेदाभ्युपगमे प्रकारान्तरेणेन्द्रियभेदाभ्युपगमः । विषयब्यवस्थानियमनिरूपणार्थम् - विषयस्त्विति । उपलभ्यमानस्पर्शस्याधिष्ठानभूत आश्रयो यः स विषय इति । किमस्यास्तित्वे प्रमाणम् ?
प्रत्यक्षमेव , त्वगिन्द्रियव्यापारेण वायुर्वातीत्यपरोक्षज्ञानोत्पत्तेरिति कश्चित् , तन्न युक्तम् , स्पर्शव्यतिरिक्तस्य वस्त्वन्तरस्यासंवेदनात् , अपरोक्षज्ञाने तु स्पर्श एव प्रतिभाति नान्यत् , यदपि वायुर्वातीति ज्ञानं तदभ्यासपाटवातिशयाद् व्याप्तिस्मरणाद्यनपेक्षं स्पर्शेनानुमानम् , चक्षुषेव वृक्षादिगतिक्रियोपलम्भात् । शीतोष्णस्पर्शभेदप्रतीतौ वायुप्रत्यभिज्ञानमपि तदाश्रयोपनायकद्रव्यानुमानादेव । त्वगिन्द्रियेण तु शीतोष्णस्पर्शाभ्यामन्यस्य न प्रतिभासोऽस्ति ।
स्पार्शनप्रत्यक्षो वायुरुपलभ्यमान स्पर्शाधिष्ठानत्वाद् घटवदित्यनुमानं शशादिषु पशुत्वेन शृङ्गानुमानवदनुपलब्धिबाधितम् । द्रव्यस्य स्पार्शनत्वं चाक्षुषत्वेन व्याप्तमवगतं घटादिषु चाक्षुषत्वस्य च वायावभावस्तेनात्र शक्यं स्पार्शनत्वनिवृत्त्यनुमानमेतत् , अतस्तस्याप्रत्यक्षस्य सद्भावेऽनुमानमुपन्यस्यति - स्पर्शशब्दधृतिकम्पलिङ्ग इति । स्पर्शश्च शब्दश्च धृतिश्च कम्पश्चेति ते लिङ्गानि यस्येति बहुव्रीहिः ।
योऽयं रूपादिरहितः स्पर्शः प्रतीयते स क्वचिदाश्रितः , स्पर्शत्वात् , इतरस्पर्शवत् । न चास्य पृथिव्यैवाश्रयो रूपविप्रयोगात् । अस्त्यत्राप्यनुद्भूतं रूपमिति चेन्न , उपलभ्यमानस्य पार्थिवस्य स्पर्शस्योपलभ्यमानरूपेणैव सहाव्य भिचारोपलम्भात् , न चेह रूपस्यास्त्युपलम्भस्तस्मान्नायं पार्थिवः स्पर्शः । न चोदकतेजसोरयमाश्रितोऽनुष्णाशीतत्वाद् घटादिस्पर्शवत् । नाव्यमूर्तेष्वाकाशकालदिगात्मसु वर्त्तते , स्पर्शस्य मूर्त्ताव्यभिचारोपलम्भात् । मनसाञ्च स्पर्शवत्त्वे परमाणूनामिव तेषां सजातीयद्रव्यारम्भकत्वं स्यात् , न चैवम् , तस्मात् तेषामपि न भवति , अतो यत्रायमाश्रितः स वायुरिति परिशेषः ।
एवं शब्दोऽप्यस्य लिङ्गम् , योऽयं पर्णादिष्वकस्माच्छुकशुकाशब्दः श्रूयते तस्याद्यः शब्दः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगजः , अविभज्यमानावयवद्रव्य सम्बन्धित्वे सत्यादिशब्दत्वाद् दण्डाहत भेरीशब्दवत् , यश्चासौ स्पर्शवान् स वायुः । आकाशादीनां स्पर्शाभावात् पृथिव्युदकतेजसां च रूपवतां तच्छब्दहेतुत्वे प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । विभागजशब्दव्यवच्छेदार्थमविभज्यमानावयवद्रव्यसम्बधित्वे सतीत्युक्तम् ।
एवमन्तरिक्षे पर्णादीनां धृतिरवस्थितिः स्पर्शव द्रव्यसंयोगकार्य्या प्रयत्नवेगादिकारणाभावे सति धृतित्वाज्जलोपरि स्थितपर्णादिवत् । यच्च तत् स्पर्शद्द्रव्यं न तत् पृथिव्यादित्रयमप्रत्यक्षत्वादेवेति द्रव्यान्तरसिद्धिः । इषोः पक्षिणाञ्च स्थितिव्यवच्छेदार्थ प्रयत्नादिकारणाभावः ।
तथा वृक्षादीनां कम्प विशेषः स्पर्शवद्रव्यसंयोगजो विशिष्टअपने सजातीय द्वयणुकरूप दूसरे द्रव्य की समवायिकारणता माननी पड़ेगी , किन्तु उनसे कम्पत्वाद् नदीपूराहत वेतसादिवनकम्पवत् । भूकम्पेन व्यभिचार इति चेन्न , तस्यान्यहेतुत्वावगमात् स्पर्शवद्रव्यसंयोगजे तु विशिष्ट कम्पत्वमेव प्रमाणमित्यव्यभिचारः । नतु यदेव द्रव्यं स्पर्शेनानुमितं तदेव शब्दादिभिरप्यनुमीयते , न तु प्रतिलिङ्ग द्रव्यान्तरानुमिति , किमिह प्रमाणं येनैतदुच्यते स्पर्शशब्द धृतिकम्पलिङ्गो वायुरिति ? इदं प्रमाणम् , स्वर्शानुमितद्रव्य काय्र्यत्वेनैव शब्दादीनामुपपत्तौ सम्भवन्त्यां द्रव्यान्तरकल्पना वैयर्थ्यमिति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अंश से युक्त द्रव्यों की तरह अंशशून्य परमाणु में भी अनेक परमाणुओं के संयोग की अधिकरणता युक्तिविरुद्ध नहीं है , अतः अंशरहित परमाणु की सत्ता में कोई विवाद नहीं हैं ।
प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात होनेवाले पृथिवी , जल और तेज इन तीन पदार्थों के निरूपण के बाद प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात न होनेवाले द्रव्यों के निरूपण की बारी आती है , एवं पृथिवी प्रभृति कहे हुये द्रव्य नित्य और अनित्य दोनों ही प्रकार के हैं , अतः पूर्वागत होने के कारण नित्यानित्यस्वभाव के द्रव्य का ही निरूपण क्रम से प्राप्त है । अप्रत्यक्ष द्रव्यों में से नित्यानित्यस्वभाव के कारण वायु का निरूपण ही क्रमप्राप्त है । तदनुसार “ वायुत्वाभिसम्बन्धाद्वायुः " इत्यादि से वायु का निरूपण करते हैं । इस वाक्य की व्याख्या " पृथिवीत्वादिसम्बन्धात् पृथिवी " इत्यादि वाक्यों की तरह करनी चाहिए । ' स्पर्शः ' इत्यादि से वायु के गुणों का वर्णन करते हैं । इसकी भी व्याख्या पृथिवी प्रभृति द्रव्यों के गुण के बोधक वाक्यों की तरह करनी चाहिए । पार्थिव परमाणुओं में पाकज स्पर्श है , अतः उन परमाणुओं के कार्य और पार्थिव द्रव्यों में भी पाकज स्पर्श ही है , क्योंकि कार्य के गुण कारण के गुणों से उत्पन्न होते हैं । इस ( वायु ) का स्पर्श भी अपाकज ही है , अतः यह स्पर्श वायु का लक्षण है । यह स्पर्श अपाकज इसलिए है कि
प्रशतपादभाष्यम् सत्यपाकजः , गुणविनिवेशात् सिद्ध : । अरूपिष्वचाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । तृणकर्मवचनात् संस्कारः । स चायं द्विविधोऽणुकार्य्यगुण ( कणाद के ) गुणविनिवेशाधिकार के सूत्रों से इसमें सिद्ध समझना चाहिए । ' अरूपिष्वचाक्षुषाण ' ( ४।१।१२ ) ' रूप शून्य द्रव्यों के संख्यादि सात गुण आँखों से नहीं देखे जाते ' सूत्रकार की इस उक्ति में वायु में संख्यादि सात गुणों की सत्ता समझनी चाहिए ।
' तृणे कर्म्म वायुसंयोगात् ' ( ५।१।१४ ) ' वायु प्रभृति द्रव्यों के संयोग से तृण में क्रिया उत्पन्न होती है ' महर्षि कणाद की इस उक्ति से वायु में संस्कार नाम के गुण की सत्ता समझनी चाहिए । इसके भी ( १ ) अणु और ( २ ) पृथिवी में वह नहीं है , जैसे कि जल और तेज का स्पर्श । अनुष्णाशीतत्वे सति ' इस पद से ( इस अनुष्णाशीत स्पर्श में ) तेज और जल के स्पर्श से ( अपाकजत्वरूप से ) समानता होने पर भी ( अनुष्णाशीतत्वरूप से ) विभिन्नता कही गई है ।
यह ' स्पर्शवान् वायुः " ( २।१ ४ ) इस सूत्र से सिद्ध है । यह विषय ' गुणविनिवेशात्सिद्ध : ' इस वाक्य से कहा गया है । रूप से रहित द्रव्य के संख्यादि सात गुणों को चूंकि सूत्रकार ने ' अचाक्षुष ' कहा है ( ४ | १ | ११ ) , अतः इससे ही वायु में संख्यादि सात गुणों की सत्ता भी जाननी चाहिए । अगर ऐसा न हो तो रूपशुन्य द्रव्यों के संख्यादि गुणों की अचाक्षुषत्व की सूत्रकार की उक्ति असङ्गत हो जाएगी ।
' तृणकर्मवचनात्संस्कारः ' अर्थात् सूत्रकार ने ' तृणे कर्म वायुसंयोगात् ( ५ | १ | १४ ) इस सूत्र के द्वारा वायु में संस्कार नाम के गुण की सत्ता कही है , क्योंकि वेग से रहित द्रव्य का संयोग कर्म को उत्पन्न करते नहीं देखा जाता । स चायम् ' इत्यादि वाक्य वायु के प्रकारों का निरूपण करने के लिए लिखते हैं ।
पृ. ११३
भावात् ।
तत्र कार्यलक्षणश्चतुर्विधः , शरीरमिन्द्रियं विषयः प्राण इति ।
तत्रायोनिजमेव शरीरं मरुतां लोके , पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्चोपभोगसमर्थम् ।
इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकम् , पृथिव्याद्यनभि- भूतैर्वाय्वयवैरारब्धं सर्वशरीरव्यापि त्वगिन्द्रियम् ।
विषयस्तूपलम्य- मानस्पर्शाधिष्ठानभृतः स्पर्शशब्दधृति कम्पलिङ्ग स्तिर्यग्गमनस्वभावो मेघादिप्रेरणधारणादिसमर्थः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कार्य ये दो भेद हैं । इनमें कार्यरूप वायु ( १ ) शरीर ( २ ) इन्द्रिय ( ३ ) विषय और ( ४ ) प्राणभेद से चार प्रकार के हैं । इनके शरीर अयोनिज ही हैं , जो केवल वायुलोक में ही प्रसिद्ध हैं । इस शरीर में पार्थिव अवयवों के विलक्षण संयोग सेसुखऔर दुःख के अनुभव की क्षमता रहती है । सभी प्राणियों के स्पर्श के प्रत्यक्ष का साधन द्रव्य ही इन्द्रिय रूप वायु है । वायु के जिन अवयवों का बल पार्थिवादि विरोधी शक्तियों से नष्ट नहीं हुआ है , उन वायवीय अवयवों से इसकी सृष्टि होती है । यह शरीर के भी सभी अंशों में रहती है । इस इन्द्रिय का नाम है त्वचा । विषयरूप वायु प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात स्पर्श का आश्रय , एवं स्पर्श , शब्द , धृति और कम्प इन चार हेतुओं से अनुमेय , और कुटिल गति से चलनेवाला है । मेघ आदि वस्तुओं को इधर उधर जाने में प्रेरित करना और उनको गिरने न देना विषयरूप वायु के कार्य हैं ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' सच ' इस शब्द से स्मृति के द्वारा बुद्धि के अत्यन्त निकट ले आने के बाद वायु प्रत्यक्ष वस्तु की तरह कहा गया है । केवल पृथिव्यादि ही दो दो प्रकार के नहीं हैं किन्तु यह वायु भी उन्हीं की तरह दो प्रकार का है , यही ( ' स च ' इस वाक्य में प्रयुक्त ) ' च ' शब्द से सूचित होता है । ' कार्यलक्षणश्चतुर्विध : ' इस वाक्य में आनेवाले ' कार्यलक्षण ' शब्द का ' कार्यस्वभाव ' अर्थ है । यह चार प्रकार का कैसे है ?
इसी प्रश्न का उत्तर ' शरीरमिन्द्रियम् ' इत्यादि वाक्य से देते हैं । अर्थात् ( १ ) शरीर , ( २ ) इन्द्रिय , ( ३ ) विषय , और ( ४ ) प्राण इन भेदों से कार्यरूप वायु चार प्रकार का है । उनमें ' तत्र शरीरम् ' इत्यादि से शरीर रूप वायु को जाति के द्वारा निर्धारित करते हैं । अर्थात् वायवीय शरीर केवल अयोनिज ही है , पार्थिव शरीर की तरह योनिज और अयोनिज भेद से दो प्रकार का नहीं । ' मरुतां लोके ' यह वाक्त्र इस शरीर के स्थान का निर्देश करता है ।
निमित्तकारणरूप बहुत से पार्थिव अवयवों के ' उपष्टम्भ ' अर्थात् विशेश प्रकार के संयोग से यह शरीर भी ठोस आकार का उत्पन्न होता है और इसी से पार्थिवादि शरीरों की तरह उपभोग कर सकता है । ' इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकम् ' अभिप्राय यह है कि सभी प्राणियों
१५ के प्रत्यक्ष का कारण यह इन्द्रिय , पार्थिव अवयवों से अनभिभूत है , अर्थात् जिन वायवीय अवयवों की शक्ति का पार्थिवादि विरोधी शक्तियों से नाश नहीं हुआ है , उनसे बनी हुई है , अतः यह इन्द्रिय है । स्पर्श के प्रत्यक्षरूप प्रमाण से ही इस इन्द्रिय की सत्ता समझी जाती है । यह इन्द्रिय चूँकि रूपादि गुणों में से केवल स्पर्श के प्रत्यक्ष का ही उत्पादक है , अतः पसीने की शीतता को व्यञ्जित करनेवाले समीर की भाँति यह ( इन्द्रिय ) भी वायवीय सिद्ध होती है ।
शरीर के सभी प्रदेशों में स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है , अतः यह इन्द्रिय शरीर के सभी प्रदेशों में है । चूँकि यह इन्द्रिय त्वचा में रहती है , इसलिए इसका नाम ' त्वक् ' है । त्वचारूप अधिकरण में रहने के कारण ही लक्षणा वृत्ति के द्वारा उसके आधेयरूप इन्द्रिय में भी ' त्वक् ' शब्द का प्रयोग होता है ।
( प्र ० ) त्वगिन्द्रिय अगर शरीर के सभी प्रदेशों में है तो फिर उसका अन्वय और व्यतिरेक स्पर्श की तरह रूपादि गुणों में भी है , अतः त्वगिन्द्रिय मात्र एक ही इन्द्रिय मान ली जाय , इससे ही रूपादि प्रत्यक्षों का भी निर्वाह हो सकेगा ? ( उ ० ) उक्त कथन असङ्गत है क्योंकि इससे संसार से अन्धापन का मिट जाना मानना पड़ेगा | अगर अधिष्ठान के भेद से त्वचा में ही रूपादि प्रत्यक्ष की विभिन्न शक्तियाँ मानें तो फिर वह वस्तुतः दूसरे शब्दों में अनेक इन्द्रियों की सत्ता माननी जैसी ही होगी ।
विषयरूप वायु इतने ही हैं , इससे अधिक नहीं , इससे कम भी नहीं ' इस व्यवस्था के लिए ' विषयस्तु ' इत्यादि लिखते हैं । अर्थात् पृथिवी , जल और तेज के स्पर्श से विलक्षण जिस स्पर्श की उपलब्धि होती है , उस स्पर्श का आश्रय ही ' विषय ' रूप वायु है । ( प्र ० ) इस स्पर्श के आश्रयरूप द्रव्य की सत्ता में प्रमाण क्या प्रत्यक्ष ही प्रमाण है ? ( उ ० ) कोई कहते हैं कि उसके अस्तित्व में है , क्योंकि गिन्द्रिय के व्यापार से ही ' वायु चल रही है ' इस प्रकार की अपरोक्ष प्रतीति होती है ।
किन्तु यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि इस अपरोक्ष ज्ञान में स्वगिन्द्रिय के व्यापार के द्वारा स्पर्श से भिन्न कोई और पदार्थ भासित नहीं होते , अर्थात् उस अपरोक्ष ज्ञान में स्पर्श को छोड़कर ( उसके आश्रयादि ) और कोई वस्तु प्रतिभासित नहीं होती । ' हवा चलती है ' यह ज्ञान भी स्पर्शहेतुक अनुमिति ही है ।
यह और बात है कि बार बार स्पर्शहेतुक वायु की अनुमिति से उत्पन्न विशेष प्रकार की पटुता से उक्त अनुमिति में व्याप्ति की अपेक्षा नहीं होती , जैसे कि चक्षु से वृक्षादिगत क्रिया की अनुमिति में व्याप्ति को अपेक्षा नहीं होती । उस स्पर्श में शीत और उष्ण से वैलक्षण्य की प्रतीति के बाद जो यह प्रत्यभिज्ञा होती है कि ' यह स्पर्श वायु का है ' वह भी स्पर्श के आश्रयरूप द्रव्य के अनुमान से ही होती है ।
तस्मात् त्वगिन्द्रिय से शीतोष्णादि स्पर्शो से अतिरिक्त किसी और वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं होता है । ' बायु का स्पार्शन प्रत्यक्ष होता है , क्योंकि वह प्रत्यक्ष स्पर्श का आश्रय है , जैसे कि घटादि ' यह अनुमान शश ( खरहे ) में पशुत्व हेतु से सींग के अनुमान की तरह अनुपलब्धिमूलक बाध दोष से युक्त है ।
एवं त्वगिन्द्रिय द्वारा वायु के प्रत्यक्ष होने में बाधक अनुमान भी है कि ' स्पार्शन प्रत्यक्ष उसी द्रव्य का होता है , जिसका कि चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है ' यह व्याप्ति घटादि में ज्ञात है एवं वायु में चाक्षुषत्व नहीं है , तस्मात् ' वायु का स्पार्शन प्रत्यक्ष नहीं होता है ' अतः प्रत्यक्ष न होनेवाले वायु की सत्ता में " स्पर्शशब्दधृतिकम्पलिङ्गः ” इत्यादि से अनुमान प्रमाण दिखलाया गया है ।
' स्पर्शश्च शब्दश्च धृतिश्च कम्पश्चेति ते लिङ्गानि यस्य ' इस विग्रह के अनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि स्पर्श , शब्द , धृति और कम्प ये चार जिसके ज्ञापक हैं , वही ' वायु ' है ।
( १ ) ( सामानाधिकरण्य सम्बन्ध से ) रूपरहितत्व विशिष्ट जिस स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है उसका कोई आश्रय अवश्य है , क्योंकि वह भी स्पर्श है , जैसे कि और वस्तुओं का स्पर्श । प्रतीयमान इस स्पर्श का आश्रय पृथिवी नहीं है , क्योंकि इस स्पर्श में रूप का ( सामानाधिकरण्य ) सम्बन्ध नहीं है । ( प्र ० ) इसमें भी रूप है ही , किन्तु अनुभूत है ? ( उ ० ) नहीं , क्योंकि उपलब्धि के योग्य पृथिवी के स्पर्श का उपलब्धियोग्यरूप साथ ही नियत सम्बन्ध सभी जगहों में देखा जाता है , किन्तु इस स्पर्श के साथ रूप की उपलब्धि नहीं होती है , तस्मात् यह स्पर्श पार्थिव नहीं है । यह स्पर्श तेज और जल का भी नहीं है , क्योंकि यह अनुष्णाशीत है , जैसे कि घटादि का स्पर्शं । यह स्पर्श आकाश , काल , दिकू और आत्मा इन अमूर्त द्रव्यों का भी नहीं है , क्योंकि यह अव्यभिचरित नियम है कि स्पर्श मूर्त द्रव्यों में ही रहे । मन में अगर स्पर्श मानें तो फिर उनमें किसी द्वयणुकादि द्रव्यों की उत्पत्ति नहीं होती है । तस्मात् यह स्पर्श मन का भी गुण नहीं है , अतः परिशेषानुमान से यह सिद्ध होता है कि उक्त स्पर्श का आश्रय ही ' वायु ' है ।
( २ ) इसी प्रकार शब्द भी वायु का ज्ञापक हेतु है । पत्तों में कभी कभी जो शुक शुक प्रभृति शब्द सुनते हैं , उनका पहिला शब्द स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य के संयोग से उत्पन्न होता है , क्योंकि द्रव्यों के विभाग से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है . और वह पहिला शब्द है , जैसे डंडे से पिटे हुए नगाड़े का शब्द | उक्त स्पर्श का आश्रय ही वायु है । क्योंकि आकाशादि में कोई भी स्पर्श नहीं है । पृथिवी , जल और तेज में से किसी को उसका आश्रय मानने से उसके प्रत्यक्ष की आपत्ति होगी । उस शब्द - श्रवणस्थल में पृथिव्यादि किसी द्रव्य का प्रत्यक्ष नहीं होता है विभागज शब्द में व्यभिचार के वारण के लिए ( ' द्रव्यों के विभाग से इसकी उत्पत्ति नहीं होती है ' हेतु के इस अंश का बोधक ) ' अविभज्यमानावयवद्रव्यसम्बन्धित्वे सति ' यह वाक्य कहा है ।
( ३ ) इसी तरह आकाश में पत्तों का ठहरना स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य के संयोग से ही होता है , क्योंकि ठहरने के प्रयत्न और वेग प्रभृति कारण वहाँ नहीं हैं । और वह भी ठहरना ही है , जैसे पानी के ऊपर ठहरे हुये पत्ते का ठहरना प्रभृति । इस स्पर्श का आश्रय पृथिवी , जल और तेज रूप द्रव्य भी नहीं हैं , क्योंकि कह चुके हैं कि ' फिर उनका प्रत्यक्ष चाहिए ' किन्तु उनमें स किसी का भी प्रत्यक्ष नहीं होता है , अतः पृथिव्यादि आठ द्रव्यों से भिन्न वायु नाम के द्रव्य की सिद्धि होती है । तीर और चिड़ियों की आकाश में जो स्थिति है , उसमें व्यभिचार वारण करने के लिए ( ' स्थिति के वेगादि और कारणों के न रहने पर भो ' इस अर्थ के बोधक ) हेतु में , प्रयत्नादिकारणाभाव ' का निवेश है ।
( ४ ) वृक्षप्रभृति द्रव्यों का विशेष प्रकार का कम्प स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य के संयोग से उत्पन्न होता है , क्योंकि वह भी विशेष प्रकार का कम्प है , जैसे कि नदी के वेग
पृ. ११८
तस्याप्रत्यक्षस्यापि नानात्वं सम्मूर्च्छनेनानुमीयते ।
सम्मूर्च्छनं पुनः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात न होने पर भी वायु में अनेकत्व का अनुमान ' समूर्च्छन ' से होता है । विरुद्ध दो दिशाओं में गतिशील समानवेग की दो वायुओं
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अनुमीयमानेष्वाकाशादिष्वेकानेकत्वोपलब्धौ संशये सति तद्व्युदासार्थमाहसे आहत किनारे के बेतवन का कम्पन । ( प्र ० ) यह हेतु तो भूकम्प में व्यभिचरित है ? ( उ ० ) भूकम्प का कुछ और ही कारण समझा जाता है । भूकम्प की अपनी एक विशिष्टता है , जिससे समझा जाता कि भूकम्प स्पर्शयुक्त किसी द्रव्य के संयोग से ही उत्पन्न होता है । तस्मात् उक्त हेतु में कोई व्यभिचार नहीं है । ( प्र ० ) ' शब्द हेतु से जिस द्रव्य का अनुमान होता है , उसी द्रव्य का कम्पादि हेतुओं से भी अनुमान होता है , शब्दादि प्रत्येक हेतु से विभिन्न द्रव्य का अनुमान नहीं होता है ' इसमें क्या प्रमाण है ? एवं क्या प्रमाण है कि कथित शब्दादि हेतुओं में से सभी वायु के ही ज्ञापक हैं ? ( उ ० ) इसमें यही प्रमाण है कि स्पर्श से अनुमित वाय नाम के द्रव्य से ही उक्त शब्दादि कार्यों की उत्पत्ति होगी . उसके लिए और द्रव्यों की कल्पना व्यर्थ है ।
इस प्रकार वायु के सिद्ध हो जाने पर ' तिय्यंग्गमनस्वभावः ' इत्यादि से उसका धर्म दिखलाते हैं । तिर्य्यग्गमनं स्वभावो यस्य ' इस बहुव्रीहि समास से उक्त शब्द निष्पन्न है । मेघ आदि के ' प्रेरण ' में अर्थात् इधर - उधर ले जाने में , और ' धारण ' में , गुरुत्वके प्रतिरोध में , एवं ' आदि ' पद से उनको बरसाने में समर्थ है । ' मेघादि ' पद में आनेवाले ' आदि ' पद से सवारी वर्त्तन प्रभृति द्रव्यों का सङ्ग्रह समझना चाहिए ।
पृ. ११९
समानजवयोर्वावविरुद्ध दिकक्रिययोः सन्निपातः सोऽपि सावयविनोवोरूर्ध्वगमनेनानुमीयते तदपि तृणादिगमनेनेति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — का मेल ही ( प्रकृत में ) ' सम्मूर्च्छन ' शब्द का अर्थ है । अवयवयुक्त दो वायुओं के ऊपर जाने की क्रिया से समूर्च्छन का भी अनुमान ही होता है । एवं तृणादि द्रव्यों के ऊपर जाने की क्रिया से ही सावयव वायुओं की ऊपर जाने की क्रिया का भी अनुमान ही होता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
एवं स्थिते वायौ तद्धमं दर्शयति- तिर्य्यग्गमनस्वभाव इति । तिर्य्यग्गमनं स्वभावो यस्येति । मेधादिप्रेरणं इतस्ततो नयने । धारणे गुरुत्वप्रतिबन्धे । आदिशब्दाद् वर्षणे समर्थः । मेघादीत्यादिपदेन यानपात्रादिपरिग्रहः , तेषामपि वायुना प्रेमाणत्वात् । तस्याप्रत्यक्षस्यापीति । सम्मूर्च्छनमपि न ज्ञायते तदर्थमाह- सम्मूर्च्छनमिति ।
विरुद्धायां दिशि क्रिया ययोस्तयोः सन्निपातः परस्परगतिप्रतिबन्धहेतुः संयोगविशेषः सम्मूर्च्छनम् , तेन वायोर्नानात्वमनुमीयते एकस्य संयोगाभावात् , एकदिक्प्रस्थितयो - र्यथाक्रमं गच्छतोः सम्मूर्च्छनाभाव इति विरुद्ध दिविक्रययोभिन्नविविक्रययोरित्यर्थः । असमान वेगयोः सम्मूर्च्छनं न भवति , एकेनापरस्य विजयात् तदर्थं समानजवयोरिति । अप्रत्यक्षयोर्यथा नानात्वमप्रत्यक्षं तथा संयोगेऽपीति मत्वेदमाह - सोऽपीति । सोऽपि सन्निपातोऽपि ।
सावयविनोर्वाय्वोरूर्ध्वगमनेनानुमीयते वायोरूद्र्ध्वगमनं परस्परव्याहतिपूर्वकमन्यकारणासम्भवे सति तिर्य्यग्गतिस्वभावद्रव्योदुर्ध्वगतित्वात् परस्पराहतजलतरङ्गोर्ध्वगमनवत् । अवयविनोरिति वक्तव्ये सावयविनोरित्युक्तम् , अवयवानामप्यवयवित्वविवक्षया स्थूलवायुपरिग्रहार्थम् , अणुपरिमाणस्य तृणादिप्रेरणसामर्थ्याभावात् । ऊर्ध्वगमनमपि तयोर प्रत्यक्षमिति तत्प्रतिपत्तावनुमानमाह - तृणादिगमनेनानुमीयत इति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — आकाशादि द्रव्यों में एकत्व और अनेकत्व दोनों ही उपलब्ध होते हैं ( इनमें आकाश , काल और दिक् ये तीनों एक एक ही हैं एवं आत्मा और मन अनेक हैं ) , अतः ( प्रत्यक्ष क अविषय और अनुमान से सिद्ध ) वायु में संशय होता है कि वायु एक है या अनेक ? इसी संशय को हटाने के लिए ' तस्याप्रत्यक्षस्यापि ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । यह भी नहीं समझते कि ' संमूच्छेन ' क्या है ? इसी को समझाने के लिए ' संमूच्र्छनम् ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं ।
अर्थात् समानवेग की जिन दो वायुओं की गति दो विरुद्ध दिशाओं में हैं , उन दोनों का ' संनिपात ' अर्थात् दोनों की गति को प्रतिरुद्ध करनेवाला विशेष प्रकार का संयोग ही संमूच्र्छन ' है । न्यूनाधिक वेग की वायुओं का संमूच्र्छन नहीं हो सकता है , क्योंकि अधिक वेगवाली न्यून वेगवाली के ऊपर विजय पा जाती है , अतः लिखा है कि ' समानजवयोः ' । आँखों से न दीखनेवाली वस्तुओं के नानात्व का भी जैसे प्रत्यक्ष नहीं होता है , उसी प्रकार उन वस्तुओं में रहनेवाले संयोग का भी प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
यही मानकर ' सोऽपि ' इत्यादि ग्रन्थ लिखते । ' सोऽपि ' अर्थात् उक्त संयोग विशेष रूप संनिपात भी अवयवों से युक्त दो वायुओं की ऊपर की गति से अनुमति होता है , अर्थात् दोनों वायुओं का ऊपर जाना उनके परस्परसंघर्ष से उत्पन्न होता है , क्योंकि उनके ऊपर जाने का कोई दूसरा कारण सम्भावित नहीं है अथ च वह गति कुटिल स्वभाव के दो द्रव्यों की है , जैसे कि परस्पर संघर्ष से प्राप्त जल के तरङ्गों की ऊपर की गति ।
पृ. १२०
प्राणोऽन्तःशरीरे रसमलधातूनां प्रेरणादिहेतुरेकः सन् क्रियाभेदादपानादिसंज्ञां लभते ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शरीर के अन्दर रहनेवाली एवं उसके रस मल और धातु के प्रेरणादि क्रियाओं का कारण वायु ही ' प्राण ' है । यह एक होते हुए भी क्रियाओं की भिन्नता के कारण ' अपान ' प्रभृति नामों से भी कही जाती है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
लोके योगशास्त्रे च विषयवायोर्भेदेन प्रसिद्धस्य प्राणाख्यस्य स्वरूपमाह - प्राणोऽन्तः शरीर इति । अन्तःशरीरे यो वायुर्वर्त्तते स प्राण इत्युच्यते । तस्यार्थक्रियां कथयति — रसमलघातूनां प्रेरणादिहेतुरिति । रस इति भुक्तवतामाहारेषु पाकजोत्पत्तिक्रमेणोत्पन्नस्य द्रव्यविशेषस्य ग्रहणम् । मल इति मूत्रपुरीषयोरभिधानम् । धातवस्त्वङमांसास्थिशोणितादयः तेषां प्रेरणस्येतस्ततो नयनस्य , आदिशब्दाद् व्यूहनस्य च हेतुः । तस्यैकत्वानेकत्वसंशये सत्याह – एकः सन्निति । ननु पञ्च वायवः शारीराः श्रूयन्ते ? तत्राह - - क्रियाभेदादिति । मूत्रपुरीषयोरधोनयनादपानः , रसस्य गर्भनाडीवितननाद् व्यानः , अन्नपानादेरूर्ध्वं नयनादुदानः , मुखनासिकाभ्यां निष्क्रमणात् प्राणः , आहारेषु पाकार्थमुदय्र्यस्य वह्नेः समं सर्वत्र नयनात् समान इति न वास्तवमेतेषां पञ्चत्वमपि तु कल्पितम् । कथम् ? एकस्मिन्नाश्रये मूर्त्तानां समावेशाभावात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — परमाणु को छोड़कर सभी अवयव अवयवी भी हैं , इस अभिप्राय से स्थूल वायु के सङ्ग्रह के लिए ' अवयविनोः ' यह करने पर काम चलने की सम्भावना रहने पर भी ' सावयविनो : ' यह पद कहा है , क्योंकि अणुपरिमाणवाला द्रव्य तृणादि को इधर उधर नहीं ले जा सकता है । उन दोनों वायुओं की ऊर्ध्व गति भी अप्रत्यक्ष ही है , अतः उसके ज्ञान के लिए अनुमान का प्रयोग ' तृणादिगमनेनानुमीयते ' इस वाक्य से दिखलाये हैं ।
जनसाधारण में और योगशास्त्र में भी विषयरूप वायु से भिन्न रूप में प्रसिद्ध , प्राण नाम के वायु का स्वरूप ' प्राणोऽन्तः शरीरे ' इत्यादि से दिखलाते हैं । अर्थात् शरीर के अन्दर जो वायु है , उसे ही ' प्राण ' कहते हैं । ' रसमलधातूनाम् ' इत्यादि से प्राण वायु का कार्य दिखलाते | खाये हुए द्रव्यों में ( जाठर अग्निरूप तेज के संयोग रूप ) पाक से रूपरसादि परिवर्तित हो जाते हैं । परिवर्तित इन रूपरसादि से युक्त द्रव्य ही ' रस ' शब्द का अर्थ है । विष्ठा और मूत्र ही यहाँ ' मल ' शब्द के अर्थ हैं । त्वचा , मांस , शोणित प्रभृति यहाँ ' धातु ' शब्द से इष्ट हैं । इनके ' प्रेरण ' का अर्थात् इधर उधर ले जाने का एवं ' आदि ' शब्दसे ' व्यूहन ' का अर्थात् विशिष्ट प्रयोग में नियोग का भी कारण है । यह प्राण वायु एक है या अनेक ? इस संशय में कहते हैं ' एक : सन् ' । सुना जाता है कि शरीर पाँच वायु हैं ( फिर एक कैसे ? ) , इसी आक्षेप का समाधान ' क्रियाभेदात् ' इत्यादि से देते हैं ।
In English
Characteristics of the Earth Element
This text is a commentary on the Vaiśeṣika Sūtra by Praśastapāda, specifically focusing on the properties of earth (pṛthivī). It explains how qualities like heaviness, liquidity, smell, color, taste, and touch are inherent to the earth element.
This article answers
- Vaiśeṣika sutra earth element properties?
- Why does earth have gravity in vaiśeṣika philosophy?
- Characteristics of pṛthivī in prasastapada bhashya?
- Difference between inherent and accidental qualities in earth?