व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य
प्रशस्तपादभाष्य — द्रव्य: सृष्टिसंहार, आकाश, काल, दिक्
13 मूल पद्य
सृष्टिसंहारविधिः
पृ. १२१
इदानीं चतुर्णा महाभूतानां सृष्टिसंहारविधिरुच्यते ।
ब्राह्मण मानेन वर्षशतान्ते वर्त्तमानस्य ब्रह्मणोऽपवर्गकाले संसारखिन्नानां सर्वप्राणिनां निशि विश्रामार्थं सकलभुवनपतेर्महेश्वरस्य सजिहीर्पा समकाल
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अब यहाँ पृथिवी , जल , तेज और वायु इन चारों महाभूतों की सृष्टि और उनके संहार की रीति कहते हैं । ब्राह्म मान से सौ वर्ष के अन्त में जब वर्तमान ब्रह्मा के मोक्ष का समय होता है , उस समय कुछ काल तक प्राणियों के ( जन्म मृत्यु जनित ) खेद को मिटाने के लिए सभी भुवनों के अधिपति महेश्वर को संहार
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
उत्पत्तिमन्ति चत्वारि द्रव्याण्याख्याय विस्तरात् ।
तेषां कर्त्ती परीक्षार्थमुद्यमः क्रियतेऽधुना ॥
पृथिव्यादीनां चतुर्णामुत्पत्तिविनाशौ निरूपणीयौ । तयोश्च प्रतिप्रकरणं निरूपणे ग्रन्थविस्तरः स्यादिति समानन्यायेनैकत्र निरूपणार्थं प्रकरणमारभ्यते-- चतुर्णा - मिति । सृष्टिसंहारयोर् उत्पत्तिविनाशयोः , विधिः प्रकारः कथ्यते । यद्य चतुर्णामपि सृष्टिसंहारौ कथ्येते , तथापि नेदं साधर्म्याभिधानम् , प्रत्येकं विलक्षणयोरेतयोरुपवर्णनात् । महाभूतानामित्युक्ते त्रयाणामेव परिग्रहः , कपिञ्जलानालभेतेतिवद् बहुत्वसंख्यायास्तावत्येव चरितार्थत्वात् , अतश्चतुर्णामित्युक्तम् । चतुर्णामित्युक्ते चानन्तरोक्तमेव वायुकार्य्यं शरीरमिन्द्रियं विषयः प्राण इति चतुष्टयं बुद्धौ निविशते , तन्निवृत्त्यर्थं महाभूतानामिति । नन्वेवं तहि द्वणुकानामुत्पत्तिविनाशौ न प्रतिज्ञातौ स्यातां तेषामणुत्वात् । नैवम् विधिशब्दोपादानात् । येन प्रकारेण महाभूतानामुत्पत्तिविनाशौ स प्रकारः कथ्यत इत्युक्तम् । तेषाञ्च द्वद्यणुकादिप्रक्रमेणोत्पत्तिरापरमाण्वन्तश्च विनाश इति । अतो द्वणुकानामपि सृष्टिसंहारौ प्रतिज्ञातौ स्याताम् अर्थप्रतिपादनमात्रस्य विवक्षितत्वात् ।
पश्चादुक्तमपि संहारं प्रथमं कथयति - ब्राह्मण मानेनेति । अस्माकं पञ्चदश निमेषा : काष्ठा 1 त्रिशतिः काष्ठाः कला । पञ्चदश कला नाडिका । त्रिंशत्कलो मुहूर्त्तः । त्रिशता मुहूर्तेरहोरात्रः । पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः । द्वौ पक्षौ मासः । द्वौ मासावृतुः । षड्ऋतवो द्वादश मासाः संवत्सरः । ऋतुत्रयेणोत्तरायणम् , ऋतुत्रयेण च दक्षिणायनम् । उत्तरायणश्च देवानां दिनम् , दक्षिणायनव देवानां रात्रिः । तथाभूताहोरात्रशतत्रयेण षष्ट्यधिकेन वर्षम् । द्वादशसहस्त्रेश्च वर्षैश्चतुर्युगम् । चतुर्युगसहस्रेण ब्रह्मणो दिनमेकम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — मूत्र और विष्ठा को नीचे ले जाने के कारण यही प्राणवायु ' अपान ' कहलाता है । यह व्यान इसलिए कहलाता है कि इसका काम गर्भनाडी में रस का विस्तार करना भी है । खायी और पीयी हुई वस्तुओं को ऊपर ले जाने के कारण वही ' उदान ' शब्द से भी अभिहित होता है । मुँह और नाक से निकलने के कारण ही वह प्राण कहलाता है । आहार द्रव्य को पचाने के लिए उदर्य तेज को उनमें समान रूप से पहुँचाने के कारण वही प्राण वायु ' समान ' कहलाता है । इस प्रकार पञ्चत्व उसमें कल्पित है , किन्तु वस्तुतः वह एक ही है । ( प्र ० ) वह एक हो क्यों है ? ( उ ० ) चूँकि एक मूर्त द्रव्य में अनेक द्रव्यों का समावेश असम्भव है ।
उत्पत्तिशील चारों द्रव्यों की विस्तृत व्याख्या के बाद अब उनके कर्त्ता की परीक्षा का उद्योग करते हैं | पृथ्वी , जल , तेज और वायु इन चारों द्रव्यों की उत्पत्ति और विनाश इन दोनों का निरूपण करना है । इन दोनों का अगर प्रत्येक प्रकरण में अलगअलग निरूपण किया जाय तो ग्रन्थ का व्यर्थं विस्तार होगा । अत : संक्षेप में एक ही जगह दोनों का निरूपण करने के लिए ' चतुर्णाम् ' इत्यादि सन्दर्भ को आरम्भ करते हैं । ' सृष्टिसंहारयोः ' अर्थात् उत्पत्ति और विनाश इन दोनों की ' विधि ' अर्थात् प्रकार कहते हैं । यद्यपि चारों भूतों को सृष्टि और संहार दोनों का निरूपण साथ ही किया जाता है ,
१६ फिर भी यह चारों का साधर्म्य कथन नहीं है , क्योंकि पृथिव्यादि में से प्रत्येक से तीन की सृष्टि और संहार का वर्णन अलग - अलग है । ' महाभूतानाम् ' केवल इतना कहने के बहुमहाभूतों का हो बोध होता , क्योंकि ' कपिञ्जलान् ' आलभेत ' इत्यादि वाक्यों संख्या उतने वचनान्त ' कपिञ्जलान् ' आदि पदों से त्रित्व का ही बोध होता है , बहुत्व सें भी चरितार्थ हो जाती है , अत : ' चतुर्णाम् ' यह पद कहा है । केवल ' चतुर्णाम् विषय ' इतना और मात्र कह देने से अव्यवहित पहिले कहे हुए वायु के ( शरीर , इन्द्रिय , प्राण रूप ) चारों भेद ही जल्दी से बुद्धि में आते हैं , उनको हटाने के लिए ' महाभूतानाम ' यह पद है । प्र ० ) तो फिर इससे द्वयणुकों की उत्पत्ति और उनका । विनाश नहीं , इस प्रतिज्ञा के अन्दर नहीं आते हैं । क्योंकि वे अणु हैं , ( महान नहीं ) उत्पत्ति क्योंकि ' विधि ' शब्द का उपादान है । ( अर्थात् ) जिस प्रकार महाभूतों की से ही और विनाश होता है , वह प्रकार कहते हैं । उनकी उत्पत्ति द्वयणुकादिक्रम विनाश होती है और विनाश भी परमाणु पर्यन्त होता है अतः द्वद्यणुकों की उत्पत्ति और भी उक्त प्रतिज्ञा के अन्दर आ जाते हैं ।
जिस किसी प्रकार पदार्थों का प्रतिपादन मात्र ही इष्ट है . अतः पीछे कहे हुए भी संहार को " ब्राह्मण मानेन ' इत्यादि से पहले कहते हैं । हम लोगों के १५ निमेषों को एक काष्ठा होती है । ३० काष्ठाओं की एक कला और १५ कलाओं को एक नाड़िका होती है । ३० कलाओं का एक मुहूर्त होता है । ३० मुहूर्ती से एक दिन और एक रात होती है । १५ अहोरात्रों का एक पक्ष होता है । दो पक्षों का एक मास और दो मासों की एक ऋतु होती है । छः ऋतुओं एवं बारह मासों का एक वर्ष होता है ।
मकर राशि में जब सूर्य आते हैं तब से लेकर मिथुन राशि में उनकी स्थिति पर्यन्त के शिशिर , वसन्त और ग्रीष्म इन तीन ऋतुओं का एक उत्तरायण होता है । एवं कर्क राशि में सूर्य की स्थिति से लेकर धनु राशि में उनकी स्थिति पर्यन्त के वर्षा , शरद् और हेमन्त इन तीन ऋतुओं का दक्षिणायन होता है । उत्तरायण देवताओं का दिन है , आलम्भन युक्त है , क्योंकि त्रित्व संख्या के ग्रहण से ही शास्त्रकृत्य सम्पन्न हो जाता है ।
एवं तीन संख्या से अधिक संख्या को ग्रहण करनेपर भी त्रिश्व को छोड़ा नहीं जा सकता , क्योंकि चतुष्ट्वादि के अन्दर त्रित्व अवश्य ही है । जो कोई त्रित्व को ग्रहण करेगा वह चतुष्ट्वादि को छोड़ सकता है , क्योंकि चतुष्ट्वादि त्रित्व के अन्दर नहीं है , अतः उनके लिए त्रित्व को छोड़ना असम्भव है । त्रिश्व सब से पहिले उपस्थित है , एवं उसके ग्रहण में लाघव भी है । तस्मात् त्रित्व संख्या के ग्रहण से ही शास्त्रकृत्य सम्पन्न हो जाता है , फिर उससे अधिक कपिञ्जल के वध से तो प्रत्यवाय ही होगा ।
तस्मात् विना विशेषण के बहुवचन का अर्थ त्रित्व ही है । ( मीमांसासूत्र अ . ११ पा . १ अधि . ८ ) एवं दक्षिणायन उनकी रात है । इस प्रकार के ३६० अहोरात्रों से उनका एक वर्ष होता है । इस वर्ष से बारह हजार ( १२००० ) वर्षों का एक चतुर्युग होता है । एक हजार ( १००० ) चतुर्युग से ब्रह्मा का एक दिन होता है । उतने की ही एक रात होती है । इसी अहोरात्र से ३६० दिनों का एक वर्ष और इसी वर्ष से सो वर्षों की आयु ब्रह्मा की है ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. १२२) १. श्रुति में ' वसन्ताय कपिञ्जलान् आलभेत ' यह वाक्य है । इस वाक्य में प्रयुक्त ' कपिञ्जलान् ' इस पद से तीन ही कपिञ्जल अभिप्रेत हैं , या तीन से लेकर आगे की संख्या में यथेच्छाचार है ? क्योंकि बहुत्व तो तीन से लेकर आगे की सभी संख्याओं में समान है । इसी संशय के समाधान से कहा कि तीन हो कपिञ्जलों का
(पृ. १२३) १. प्रतिज्ञावाक्य के विरुद्ध इस उलटफेर को किरणावली में इस प्रकार सुलझाया गया है कि- :- सृष्टि और संहार इन दोनों में पहिले कौन ? इस विप्रतिपत्त में वैशेषिकों का सिद्धान्त है कि कोई भी पहिले नहीं , क्योंकि संसार अनादि और अनन्त है । प्रत्येक सृष्टि के पहिले अनन्त संहार बीत चुके हैं , एवं हर एक संहार के पहिले अनन्त सृष्टियाँ बीत चुकी रहती हैं । इस विषय को सूचना देने के लिए ही प्रतिज्ञावाक्य में पीछे कथित भी संहार का ' ब्राह्मण मानेन ' इत्यादि से पहिले प्रतिपादन करते हैं । देखिये किरणावली - ( पृ ० ८६ पं ० १६ और पृ ० ६० पं ० ३ ) ।
पृ. १२४
शरीरेन्द्रियमहाभूतोपनिबन्धकानां सर्वात्मगतानामदृष्टानां वृत्तिनिरोधे सति महेश्वरेच्छात्मानुसंयोगजकर्म्मभ्यः शरीररेन्द्रिय कारणाणुविभागेभ्यस्तत्संयोग निवृत्तौ तेषामापरमाण्वन्तो विनाशः ।
तथा पृथिव्युदकज्वलन- पवनानामपि महाभूतानामनेनैव क्रमेणोत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन् सति पूर्वस्य पूर्वस्य विनाशः ।
ततः प्रविभक्ताः परमाणवोऽवतिष्ठन्ते धर्माधर्मसंस्कारानुविद्धा आत्मानस्तावन्तमेव कालम् |
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — की इच्छा होती है । उसके बाद ही शरीर , इन्द्रिय , एवं और सभी महाभूतों के उत्पादक सभी आत्माओं के सभी अदृष्टों के कार्यों के उत्पन्न करने की शक्ति कुण्ठित हो जाती है । उसके बाद महेश्वर की इच्छा , और आत्मा एवं परमाणुओं के संयोग से उत्पन्न क्रिया के द्वारा शरीर और इन्द्रिय के उत्पादक परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं । उन विभागों से ( शरीर और इन्द्रिय के आरम्भक परमाणुओं के ) संयोगों का नाश होता है । फिर ( शरीरादि ) कार्य द्रव्यों का परमाणु पर्यन्त विनाश हो जाता है । इसी प्रकार पृथिवी , जल , तेज और वायु इनमें आगे - आगे के रहते हुए पहिले पहिले का विनाश होता है । उसके बाद उतने ही समय तक ( ब्राह्म मान से सौ वर्ष पर्यन्त ) अपने में परस्पर असम्बद्ध परमाणु एवं धर्म , अधर्म और संस्कार से युक्त जीव ही रह जाते हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
इत्यनेन मानेन वर्षशतस्यान्तेऽवसाने , वर्तमानस्य ब्रह्मणोऽपवर्गकाले मुक्तिकाले , संसारे नानास्थानेषु भूयो भूयः शरीरादिपरिग्रहेण , खिन्नानां गर्भवासाविविधदुःखेन दुःखितानां प्राणिनाम् , निशि विश्रामार्थं कियत्कालं दुःखोपशमार्थम् , सकलभुवनपतेः सर्वत्राव्याहतप्रभावस्य महेश्वरस्य सञ्जिहीर्षा संहारेच्छा भवति । तत्समानकालं तदनन्तरं शरीरेन्द्रियमहाभूतोपनिबन्धकानां शरीरेन्द्रियमहाभूतारम्भकाणां सर्वात्मगतानां सर्वेष्वात्मसु समवेतानामदृष्टानां वृत्तिनिरोधः शक्तिप्रतिबन्धः स्यात् । तस्मिन् सत्यनागतानां शरीरेन्द्रियमहाभूतानामनुत्पत्तिः । उत्पन्नानाञ्च विनाशार्थं महेश्वरेच्छात्माणुसंयोगेभ्यः कर्माणि जायन्ते । महेश्वरेच्छा सजिहीर्षालक्षणा । अण्विति परमाणुपरिग्रहः । महेश्वरस्येच्छा चात्माणुसंयोगाश्चेति विग्रह । तेभ्यो जातानि तेभ्यो महेश्वरेच्छात्माणुसंयोगजकर्म्मभ्यः । शरीराणामिन्द्रियाणां ये पारम्पर्येण कारणभूता अणवस्तेषु विभागा भवन्ति । विभागेभ्यस्तेषामणूनां संयोगनिवृत्तिः । संयोगनिवृत्तौ सत्यां तेषामापरमाण्वन्तो विनाशः । तेषां शरीरेन्द्रियाणां द्वयणुकादिविनाशप्रक्रमेण तावद्विनाशो यावत्पर-
रिति ।
प्रजानामकाण्डे संहरन्नयमकारुणिको यत्किञ्चनकारी च स्यादिति यत्केनचिदुक्तं तत्रेयं प्रतिक्रिया - प्राणिनां निशि विश्रामार्थमिति ।
क्रमेण परिपच्यमानेषु यदप्येतदुक्तम् - " अनन्तानामात्मनामनन्तेष्वदृष्टेषु केचिददृष्टक्षयाद् भोगावुपरमन्ते भुज्यन्ते च केचित् । अपरे तु भोगाभिमुखा इत्येवं सर्वत्र विषयप्रवृत्तौ न शरीरादीनां युगपदभावो घटते " इति , तदनेन पराहतम् - अदृष्टानां वृत्तिप्रतिबन्ध इति । ब्रह्मणोऽपवर्गकाले निशीत्युक्त | M सर्वप्राणिनां प्रबोधप्रत्यस्तमयसाधर्म्येणोपचारात् । महाभूतानामप्येवं विनाश इत्याह- तथेति । यथा शरीरेन्द्रियाणामापरमाण्वन्तो विनाशस्तथा महाभूतानामप्यनेनैव क्रमेणेति । परमाणुक्रिया विभागादिक्रमेणोत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन् सति पूर्वस्य पूर्वस्य विनाश इति । जले तिष्ठति पूर्व पृथिव्या विनाशः , तेजसि तिष्ठति जलस्य , वायौं तिष्ठति तेजस इत्यर्थः । ततः प्रविभक्ताः परमाणवोऽवतिष्ठन्ते धर्माधर्म्मभावनाख्यसंस्कारैरनुविद्धा उपगृहीताश्र्चात्मानस्तावन्तमेव कालं ब्रह्मणो वर्षशतमेवावतिष्ठन्ते । दिगादयोऽपि तिष्ठन्ति नित्यत्वात् । किन्त्वा - त्मनामदृष्टवशात् परमाणवः पुनर्नारप्स्यन्त इति । प्राधान्याददृष्टवशादात्मपरमाण्ववस्थानसंकीर्त्तनम् ।
एवं संहारक्रमं प्रतिपाद्य सृष्टिक्रमं प्रतिपादयन्नाह - ततः पुनरिति । यद्यपि तदा आत्मनां प्राणसम्बन्धो नास्ति , तथापि प्राणिन इत्युक्तं योग्यत्वात् । तेषां भोगभूतये सुखदुःखानुभवोत्पत्तये महेश्वरस्य सिसृक्षा सर्जनेच्छा जायते । तदनन्तरं सर्वेष्वात्मसु गता अदृष्टा वृत्ति लभन्ते ।
यद्यपि युगपदुत्पद्य - मानासंख्येयकार्योत्पत्तौ व्याप्रियमाणा दिगादिव नित्यत्वादेकै वेश्वरेच्छा क्रियाशक्तिरूपा , तथाप्येषा तत्तत्कालविशेषसहकारिप्राप्तौ कदाचित् संहारार्था भवति , कदाचित् सृष्ट्यर्था भवति । यदा संहारार्था तदा तदनुरोधाददृष्टानां वृत्तिनिरोध औदासीन्यलक्षणो जायते । यदा त्वसौ सृष्टद्यर्था भवेत् तदा वृत्तिलाभः स्वकार्य्यजननं प्रति व्यापारो भवति । वृत्तिर्लब्धा यैस्ते वृत्तिलब्धा इति । आहिताग्न्यादित्वान्निष्ठायाः पूर्वनिपातः , दन्तजात इति यथा ।
सर्वात्मगताश्च वृत्तिलब्धाश्चादृष्टाश्च तानपेक्षन्ते ये तत्संयोगा आत्माणुसंयोगास्तेभ्यः पवनपरमाणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते । पवनपरमाणवः समवायिकारणम् । लब्धवृत्त्यदृष्टवदात्मपरमाणुसंयोगोऽसमवायिकारणम् । अदृष्टं निमित्तकारणम् । एवं कर्मोत्पत्तौ तेषां पवनपरमाणूनां परस्परसंयोगा जायन्ते । तत्संयोगेभ्यश्च घणुकान्युत्पद्यन्ते । तदनु त्र्यणुकानीत्यनेन क्रमेण महान् वायुः समुत्पद्यमानो नभसि आकाशे दोधूयमानः क्वचिदप्रतिहतत्वाद् वेगातिशययुक्तस्तिष्ठति ।
एवम् अनन्तरोक्तेन प्रक्रमेणोत्पन्नेषु महाभूतेषु महेश्वरस्य अभिध्यानमात्रात्
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इसी ब्राह्ममान से सौ वर्ष बीत जाने पर ब्रह्मा के अपवर्ग के समय में संसार में अनेक स्थानों में बार - बार शरीरादि धारण से ' ' खन्न ' गभवासादि अनेक दुःखों से दुःखी जीवों को रात में विश्राम देने के लिए , अर्थात् कुछ समय तक उक्त दुःखों से उन्हें छुटकारा देने के लिए ' सकलभुवनपति ' सभी स्थानों में अबाधित शक्तिवाले महेश्वर को ' सजिहीर्षा ' अर्थात् नाश करने की इच्छा होती है ।
उसी के समान काल में अर्थात् उसके बाद शरीर , इन्द्रिय और महाभूतों के ' उपनिबन्धक ' अर्थात् उत्पादक सभी जीवों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अदृष्टों का ' वृत्तिनिरोध ' अर्थात् कार्यों को उत्पन्न करने का सामर्थ्य प्रतिरुद्ध हो जाता है । सामर्थ्य के उक्त प्रतिरोध से भविष्यत् शरीर , इन्द्रिय और अन्य महाभूतों की उत्पत्ति रुक जाती है , एवं उत्पन्न शरीरादि के विनाश के लिए महेश्वर की इच्छा , आत्मा एवं अणुओं के संयोग इन सबों से क्रियाओं की उत्पत्ति होती है ।
महेश्वर की यह इच्छा ' सजिद्दीर्षा ' रूप है । कथित ' अणु ' शब्द से परमाणु समझना चाहिए ।
' महेश्वरेच्छात् माणुसंयोगेभ्यः ' इस समस्त वाक्य के विग्रह का यह स्वरूप है कि " महेश्वरस्येच्छा महेश्वरेच्छा , महेश्वरेच्छा चात्माणुसंयोगाश्च महेश्वरस्येच्छात्मा णुसंयोगाः , तेभ्यो जातानि कर्माणि महेश्वरेच्छा त्मानुसंयोग कम्र्माणि , तेभ्यो महेश्वरस्येच्छात् माणुसंयोगजकम्मभ्यः " अर्थात् महेश्वर की इच्छा एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन दोनों से उत्पन्न कर्मों के द्वारा शरीर और इन्द्रियों के कारण अणुओं में परस्पर विभाग उत्पन्न होते हैं ।
इन विभागों से परमाणुओं के ( द्वयणुकारम्भक ) संयोग का नाश होता है । संयोग के नाश से शरीर और इन्द्रिय का ' आपरमाण्वन्त ' विनाश हो जाता है । अर्थात् शरीरादिनाश की यह क्रिया द्वयणुकनाश पर्यन्त चलती है ।
प्रजा के इस अकारण विनाश से कोई - कोई परमेश्वर में अकरुणा और स्वेच्छाचार का दोष लगाते हैं , उन्हीं को समझाने के लिए ' प्राणिनां निशि विश्रामार्थम् ' यह वाक्य है । किसी की आपत्ति थी कि संहार का उक्त क्रम ठीक नहीं है क्योंकि जीव अनन्त प्रत्येक जीव में अदृष्ट भी अनन्त हैं । वे सभी अदृष्ट क्रमशः ही भोगों को उत्पन्न करेंगे ।
अतः कोई जीव अदृष्टनाश के कारण अगर भोग से निवृत्त होगा ( अथत्रा एक ही जीव एक अदृष्ट के भोग से निरस्त होगा ) , कोई जीव ( अथवा वही जीव ) वर्तमान फल के प्रति उन्मुख अदृष्ट से भोग करता ही रहेगा , अथवा किसी अदृष्ट में आगे फल देने की उन्मुखता ही उत्पन्न होगी ।
इा प्रकार के सभी कालों के विषयों में प्रवृत्त रहने के कारण शरीरादि सभी विषयों का विनाश एक काल में नहीं हो सकता , किन्तु ' अदृष्टानां वृत्तिप्रतिबन्धे ' इस वाक्य से उक्त आपत्ति का समाधान हो जाता है , क्योंकि ईश्वर की संहारेच्छा से सभी अदृष्टों की कार्यजननशक्ति एक ही समय में कुण्ठित हो जाएगी । ' निशि ' शब्द से लक्षणावृत्ति के द्वारा ब्रह्मा के मोक्ष का काल कहा गया है ।
जैसे कि रात में सोने पर प्राणियों के जाग्रत अवस्था के सभी सुखदुःखादि नष्ट हो जाते हैं , उसी तरह उस समय भी जीवों के सभी सुख दुःखादि नष्ट हो जाते हैं , यही सादृश्य इस लक्षणावृत्ति का मूल है | शरीरों और इन्द्रियों की तरह और भी सभी भूत नष्ट होते हैं , यही ' तथा ' इत्यादि पङ्क्ति से कहते हैं । अर्थात् जैसे शरीरों और इन्द्रियों का परमाणुपर्यन्त विनाश होता हैं , उसी प्रकार और उसी क्रम से अन्य महाभूतों का भी विनाश होता है ।
पहिले परमाणुओं में क्रिया , फिर उनमें परस्पर विभाग इत्यादि कथित क्रम से पूर्व पूर्व का विनाश होता है , अर्थात् जल के रहते हु पृथिवी का विनाश , एवं तेज के रहते हुए जल का विनाश और वायु के रहते हुए तेज का विनाश होता है । इसके बाद परस्पर असम्बद्ध परमाणु , एवं धर्म , अधर्म भावनाख्य संस्कार इन तीन गुणों से युक्त जीव ये ही ' उतने समय तक ' अर्थात् ब्रह्मा के सौ वर्षों तक रहते हैं ।
यद्यपि दिगादि पदार्थ भी नित्य होने के कारण उस समय रहते ही हैं , तथापि जीवों के अदृष्ट ( को अक्षमता ) से ही परमाणु अपने काम को नहीं करते । अतः प्रधान होने के कारण अदृष्टों से युक्त जीव और परमाणुओं की अवस्थिति का ही वर्णन किया है ।
पृ. १२७
ततः पुनः प्राणिनां भोगभूतये महेश्वर सिसृक्षानन्तरं सर्वात्मगतवृत्तिलब्धादृष्टापेक्षेभ्यस्तत्संयोगेभ्यः पवनपरमाणुषु कर्मोत्पत्तौ तेषां परस्परसंयोगेभ्यो द्वयणुकादि- प्रक्रमेण महान् वायुः समुत्पन्नो नभसि दोधूयमानस्तिष्ठति ।
तदनन्तरं तस्मिन्नेव वायावाप्येभ्यः परमाणुभ्यस्तेनैव क्रमेण महान् सलिलनिधि- रुत्पन्नः पोप्लूयमानस्तिष्ठति ।
तदनन्तरं तस्मिन्नेव पार्थिवेभ्यः परमाणुयो महापृथिवी संहतावतिष्ठते ।
तदनन्तरं तस्मिन्नेव महोदधौ तेजसेभ्योऽणुभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेणोत्पन्नो महाँस्तेजोराशिः केनचिदनभि भूतत्वाद्देदीप्यमानस्तिष्ठति ।
एवं समुत्पन्नेषु चतुर्षु महाभूतेषु महेश्वरस्याभिध्यानमात्रात् तेजसेभ्योऽणुभ्यः पार्थिव परमाणुसहितेभ्यो महदण्ड- मारभ्यते ।
तस्मिंश्चतुर्वदनकमलं सर्वलोकपितामहं ब्रह्माणं सकलभुवनसहितमुत्पाद्य प्रजासर्गे विनियुङ्क्ते ।
स च महेश्वरेण विनियुक्तो ब्रह्मातिशयज्ञानवैराग्यैश्वय्यं सम्पन्नः प्राणिनां कम्मविपाकं विदित्वा कर्मा- नुरूपज्ञानभोगायुषः सुतान् प्रजापतीन् मानसान् मनुदेवर्षिपितृगणान् मुखबाहूरुपादतश्चतुरो वर्णानन्यानि चोच्चावचानि भूतानि च सृष्ट्वा - शयानुरूपैर्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वय्यैः संयोजयतीति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — फिर जीवों के भोग सम्पादन के लिए महेश्वर को सृष्टि करने की इच्छा उत्पन्न होती है । तब सभी आत्माओं के अदृष्ट की कुण्ठित शक्ति कार्यों के उत्पादन के लिए फिर से उन्मुख हो जाती है । कार्य में उन्मुख अदृष्ट एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग से वायु के परमाणुओं में क्रिया उत्पन्न होती है । फिर क्रिया से उत्पन्न परमाणुओं के संयोगो के द्वारा द्वणुकादि क्रम से महान् वायु उत्पन्न होकर आकाश में अत्यन्त वेग से युक्त होकर रहता है । उसके बाद उसी क्रम से उसी वायु में जलीय परमाणुओं से उत्पन्न महान् जलराशि सर्वत्र प्लावित होकर रहता है । इसके बाद इसी जलनिधि में उसी क्रम से पार्थिव परमाणुओं के द्वारा कठिन स्वभाव का पार्थिव द्रव्य उत्पन्न होकर रहता है । एवं उसी जलनिधि में तैजस परमाणुओं से महान् तेज उत्पन्न होकर किसी से प्रतिहत न होने के कारण अत्यन्त दीप्ति से युक्त होकर विद्यमान होता है ।
इस प्रकार चारों महाभूतों के उत्पन्न होने पर केवल महेश्वर के संकल्प से ही पार्थिव परमाणुओं की सहायता से तेजस परमाणुओं से महान् ( हिरण्मय ) तदनन्तरं तस्मिन्नेव वायावाप्येभ्यः परमाणुभ्य :, तेनैव क्रमेण द्वयणुकादिक्रमेण , महान् सलिलनिधिरुत्पन्नः पोप्लूयमानः प्रतिरोधकाभावात् सर्वत्र प्लवमानस्तिष्ठति । तदनन्तरं जलनिधेरुत्पत्त्यनन्तरम् , तस्मिन्नेव जलधौ पार्थिवेभ्यः परमाणुभ्यो महापृथिवी संहता स्थिरस्वभावावतिष्ठते ।
तदनन्तरं तस्मिन्नेव महोदधौ तैजसेभ्योऽणुभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेणात्पन्नो महाँस्तेजोराशिः केनचिदनभिभूतत्वाद्देदीप्यमानस्तिष्ठति । यद्यपि पयःपावकयोः स्वाभाविको विरोधस्तथाप्यदृष्टव शेनाधाराधेयभावो नानुपपन्नः । हर किसी से बाधित न होने के कारण अत्यन्त वेग से युक्त होकर रहता है । उसी महान् वायु में जलीय परमाणुओं से ' उसी क्रम से ' अर्थात् द्वयणुकादि क्रम से जल का महान् निधि उत्पन्न होकर किसी से प्रतिरुद्ध न होने के कारण सर्वत्र प्लावित रहता है ।
तदनन्तर अर्थात् इस जलनिधि के उत्पन्न होने पर जल के उसी समुद्र में पार्थिव परमाणुओं से कठिन स्वभाव की महापृथिवी उत्पन्न होकर स्थित रहती है । तदनन्तर उसी जलनिधि में तैजस परमाणुओं से द्वथणुकादि क्रम से महान् तेज का समूह किसी से अभिभूत न होने के कारण अतिशय दीप्ति से युक्त होकर विद्यमान रहता है । यद्यपि जल और तेज इन दोनों मे स्वभावतः विरोध है , तथापि जीवों के अदृष्ट से उनमें भी आधाराधेयभाव होता है ।
१७ पिण्ड की उत्पत्ति होती है । उसी तेजस पिण्ड में ( महेश्वर ) कमल के सदृश चार मुँहवाले ब्रह्मा को उत्पन्न कर प्रजा की सृष्टि के लिए नियुक्त करते हैं । विलक्षण ज्ञान , उत्कट वैराग्य और अभूतपूर्व ऐश्वर्य से सम्पन्न , एवं परमेश्वर के द्वारा नियुक्त वह ब्रह्मा प्राणियों कर्म की परिणति समझकर कर्मों के अनुरूप ज्ञान , भोग , और आयु से युक्त ' सुत ' अर्थात् प्रजापतियों की एवं ' मानस ' अर्थात् मनु , देवर्षि और पितृगणों की सृष्टि करते हैं । एवं अपने मुँह से ब्राह्मणों को , बाहु से क्षत्रियों को , जङ्घा से वैश्यों को और पैर से शूद्रों को उत्पन्न करते हैं । इसी प्रकार और भी छोटे बड़े अनेक प्राणियों को उत्पन्न करके सभी को कर्मों के अनुरूप धर्म , ज्ञान , वैराग्य और ऐश्वर्य के साथ सम्बद्ध करते हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
, तैजसेभ्यः परमाणुभ्यः पार्थिवपरमाणुसहितेभ्यो महदण्डं सङ्कल्पमात्रात् महद् बिम्बमारम्यते । बिम्बारम्भे पार्थिवा अथवया उपष्टम्भकाः , तेनेदं वह्निपुञ्जप्रायं नाभूत् । तस्मिन्नण्डे चत्वारि वदनकमलानि यस्य तं ब्रह्माणं सर्वलोकपितामहं सर्वेषामेव लोकानामाद्यं पुरुषं समस्तैर्भुवनैः सहोत्पाद्य प्रजानां सर्गे जनने विनियुङ्क्ते त्वमिदं कुविति । स च महेश्वरेण विनि-
ब्रह्मातिशयज्ञानवैराग्यैश्वर्य्यसम्पन्नो ज्ञानञ्च वैराग्यञ्चैश्वर्य्यञ्च युक्तो ज्ञानवैराग्यैश्वर्य्याणि अतिशयेन ज्ञानवैराग्यैश्वर्य्याणि तैः सम्पन्न उपचितो ज्ञानातिशयात् प्राणिनां धर्माधम्मौ यथावत् प्रत्येति । वैराग्यान्न पक्षपातेन प्रवर्त्तते , ऐश्वर्य्यात् कर्म्मफलं भोजयति । प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वेति । विविधेन प्रकारेण पाको विपाकः , कर्म्मणां विपाकः कर्म्मविपाकः , तं विदित्वा एतावदस्य कर्मफलं भविष्यतीति ज्ञात्वा कम्र्मानुरूपाणि ज्ञानभोगायूंषि तान् सुतान् प्रजापतीन् दक्षादीन् मानसान् मनःसङ्कल्पप्रभवान् मनुदेवर्षिपितृगणान् मनून् , देवान् , ऋषीन् , पितृगणान् , मुखबाहूरुपादतश्चतुरो वर्णान् मुखाद् ब्राह्मणान् , बाहुभ्यां क्षत्रियान् ऊरुभ्यां वैश्यान् पद्भ्यां शूद्रान् , अन्यानि चोच्चावचानि क्षुद्रक्षुद्रतराणि च भूतानि सृष्ट्वा , आशयानुरूपैः आशेते फलोपभोगकालं यावदात्मन्यवतिष्ठत इत्याशयः कर्म्म , तदनुरूपैर्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वय्यैः , संयोजयति यस्य यथाविधं कर्म तत्तदनुरूपेण ज्ञानादिना सम्यग् योजयति , मात्रयाऽप्यन्यथा न करोतीत्यर्थः ।
खलु केचिदेवमाचचक्षिरे - प्रेक्षावत्प्रवृत्तिरिष्टार्थाधिगमा
यत् स्यादनिष्टपरिहारार्था वा न चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारावीश्वरे समस्तावाप्तकामे सम्भवतः , तेनास्य जगन्निर्माणे प्रवृत्तिरनुपपन्ना । तत्रोत्तरम् - - प्राणिनां भोगभूतय इति । परार्था सिसृक्षायां प्रवृत्तिर्न स्वार्थनिबन्धनेत्यभिप्रायः । नन्वेवं तर्हि सुखमयीमेव सृष्टि कुर्य्यान्न दुःखशबलां करुणाप्रवृत्तत्वादित्यत्रैष परिहारः -- प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वेति । परार्थं प्रवृत्तोऽपि न सुखमयीमेव करोति , विचित्रकर्माशयसहायस्य कर्तृत्वादित्यर्थः । न चैवं सति करुणाविरोधः , दुःखोत्पादस्य वैराग्यजननद्वारेण परमपुरुषार्थहेतुत्वात् । यदि धर्माधर्मावपेक्ष्य करोति नास्य स्वाधीनं कर्त्तृ त्वमित्यनीश्वरतादोष इत्यस्यायं प्रतिसमाधिः -आशयानुरूपैर्धर्म्मज्ञानवैराग्यैश्वय्यैः संयोजयति । स हि सर्वप्राणिनां कर्मानुरूपं फलं प्रयच्छन् कथमनीश्वरः स्यादिति भावः । नहि योग्यतानुरूप्येण भृत्यानां फलविशेषप्रदः प्रभुरप्रभुर्भवति ।
कल्पादावुत्पन्नानां प्राणिनां सर्वशब्दार्थेष्वव्युत्पन्नानां सङ्केतस्थाशक्यकरणत्वाच्छाब्दव्यवहारानुपपत्तिरिति चोदनायां प्रत्यवस्थान बीजमिदम् — मानसानिति । योनिजशरीरो हि महता गर्भवासादिदुःखप्रबन्धेन विलुप्तसंस्कारो जन्मान्तरानुभूतस्य सर्वस्य न स्मरति । ऋषयः प्रजापतयो मनवस्तु मानसा अयोनिजशरीर विशिष्टादृष्टसम्बन्धिनो दृष्टसंस्काराः कल्पान्तरानुभूतं सर्वमेव शब्दार्थव्यवहारं सुप्तप्रतिबुद्धवत् प्रतिसन्दधते , प्रतिसन्दधानाश्च परस्परं बहवो व्यवहरन्ति । तेषां व्यवहारात् तत्कालवत्तिनां प्राणिनां व्युत्पत्तिः , तद्व्यवहाराच्चान्येषामित्युपपद्यते व्यवहारपरम्परया शब्दार्थव्युत्पत्तिरित्यर्थः ।
किं पुनरीश्वरसद्भावे प्रमाणम् ? आगमस्तावदनुमानञ्च । महाभूतचतुष्टयमुपलब्धिमत्पूर्वकं कार्य्यत्वाद् यत्काय्यं तदुपलब्धिमत्पूर्वकं यथा घटः कार्य्यश्च महाभूतचतुष्टयं तस्मादेतदप्युपलब्धिमत्पूर्वकम् । प्रमाणेन पूर्व कोट्यनुपलब्धेर सिद्धं पृथिव्यादिषु कार्य्यत्वमिति चेत् ? तदयुक्तम् , सावयवत्वात् , यत् सावयवं तत् काय्र्य्यं यथा घटः सावयवश्व पृथिव्यादि , तस्मादेत -
कार्य्यमेव । ननु व्याप्तिग्रहणादनुमानप्रवृत्तिः , कार्यत्वबुद्धिमत्पूर्वकत्व - योश्च व्याप्तिग्रहणमशक्यम् , घटादिषु कर्त्तृप्रतीतिकाले एवाङ्कुरादिषूत्पद्यमानेषु तदभावप्रतीतेः । न चाङ्कुरत्वादीनामपि पक्षत्वमिति न्याय्यम् , गृहीतायां व्याप्तावनुमानप्रवृत्तिकाले प्रतिवाद्यपेक्षया पक्षादिप्रविभागः , इह तु सर्वदैव प्रतिपक्षप्रतीत्याकान्तत्वाद् व्याप्तिग्रहणमेव न सिद्ध्यतीत्युक्तम् ।
अत्र प्रतिविधीयते - यदि चैवं द्वैतानुपलम्भाद् व्याप्तिग्रहणाभाव :, तदानीं मीमांसाभाष्यकृदभिमतं सामान्यतो दृष्टमादित्य गत्यनुमानमपि न सिद्ध्यति , तत्रापि देवदत्तगतिपूर्वक देशान्तरप्राप्तिग्रहणकाल एव नक्षत्रादिषु देशान्तरप्राप्तिमात्रोपलम्भात् । अथ तेषु देशविप्रकर्षेणापि गतेरनुपलब्धौ सम्भवन्त्यां न तया व्याप्तिग्रहणहेतोर्निरुपाधिप्रवृत्तस्य भूयोदर्शनस्य प्रतिरोधः , तुल्यकक्ष्यत्वाभावात् ।
एवञ्चेत् , अत्राशरीरत्वेनाभ्युपेतस्य कर्तुः स्वरूपविप्रकर्षेणाप्यङ्कुरादिष्वनुपलम्भसम्भवान्न तेन निरुपाधिप्रवृत्तस्य भूयो दर्शनस्य सामर्थ्यमुपहन्यत इति समानम् । अपि च भोः ! किमनुमानेन कर्तृ मात्रं साध्यते ? पृथिव्यादिनिर्माणसमर्थो वा ?
कर्त्तृ मात्रसाधने तावदभिप्रेतासिद्धि :, नह्यस्मदादिसदृशः कर्त्ताऽभिप्रेतो भवताम् , न च तेनेदं पृथिव्यादिकार्य्यमर्वादृशा शक्यनिर्माणम् , पृथिव्यादिनिर्माणसमर्थस्तु कर्त्ता न सिद्धयत्यनन्वयात् , अन्वयबलेन हि दृष्टान्तदृष्टकर्त्ता सदृशः सिद्धयतीति । नायं प्रसङ्गः कर्त्तृ विशेषस्याप्रसाधनात् व्याप्तिसामर्थ्याद् बुद्धिमत्पूर्वकत्वे सामान्ये साध्यमाने पृथिव्यादिनिर्माणसामर्थ्यलक्षणोऽपि विशेषः सिद्धयत्येव , निर्विशेषस्य सामान्यस्य सिद्ध्यभावात् ।
ननु मा सिद्धयतु सामान्यमिति चेन्न कार्य्यत्वेन सह तद्व्याप्तेरप्रतिक्षेपत्वात् । यदि हि व्याप्तमपि न सिद्ध्यति , धूमादप्यग्निसामान्यं न सिद्धयेत् , अग्निविशेषस्यानन्वितस्यासिद्धेः , निर्विशेषस्थानवस्थानात् ।
अथेदमुच्यते-- द्वयमनुमानस्य स्वरूपं व्याप्तिः पक्षधर्म्मता च , तत्र व्याप्तिसामर्थ्यात् सामान्यं सिद्धयति , पक्षधर्म्मताबलेन चाभिप्रेतो विशेषः पर्वताद्यवच्छिन्नवह्निलक्षणात्मा सिद्धयति । अन्यथा पक्षधर्म्मताया : क्वोपयोगः क्व चानुमानस्य गृहीतग्राहिणः प्रामाण्यम् ? एवञ्चेत् , ईश्वरानुमानेऽपि तुल्यम् , अन्यत्राभिनिवेशात् । अथ मतम् , सिद्धयत्यनुमाने विशेषोऽपि यत्र प्रमाणविरोधो नास्ति । तथा हि-- धूमात् पर्वतनितम्बवृत्तिर्वाह्न विशेषसिद्धौ का नामानुपपत्तिः ? दृष्टो हि देशकालादिभेदः स्वलक्षणानाम् । ईश्वरानुमाने तु विशेषो न सिद्ध्यति , प्रमाणविरोधात् । तथा हि-- नात्र शरीरपूर्वकत्वं साधनीयम् , शरीरे सत्यवश्यमिन्द्रियप्राप्तावतीन्द्रियोपादानोपकरणादिकारकशक्तिपरिज्ञानासम्भवे सति कर्तृत्वासम्भवात् ।
एवं तहिं का गतिरत्र बुद्धिमत्कर्तृ पूर्वकत्वसामान्यस्य ? अगतिरेव , उभयोरपि शरीरित्वाशरीरित्वविशेषयोरनुपपत्तेः , निर्विशेषस्य सामान्यस्य सिद्धयभावात् । किमनुमानस्य दूषणम् ? न किञ्चित् , पुरुष एवायं विशेषाभावाच्छशविषाणायमाने साधनानहं सामान्ये साधनं प्रयुञ्जानो निगृह्यते , यथा कश्चिन्निशितं कृपाणमच्छेद्यमाकाशं प्रति व्यापारयन् । अथानुमानदूषणं विना न तुष्यति भवान् , तदिदमशरीरिपूर्वकत्वानुमानं व्याप्तिग्राहकप्रमाणबाधितत्वात् कालात्ययापदिष्टम् , व्याप्तिबलेन चाभिप्रेतमशरीरित्वविशेषं विरुन्धद् विशेषविरुद्धम् , ततश्च विरुद्धावान्तरविशेष एवेति पूर्वपक्षसङ्क्षेपः ।
अत्र प्रतिसमाधिः- किं शरीरित्वमेव कर्तृत्वमुत परिदृष्टसामर्थ्यंकारकप्रयोजकत्वम् ? न तावच्छरीरित्वमेव कर्तृत्वम् , सुषुप्तस्योदासीनस्य च कर्तृत्वप्रसङ्गात् , किन्तु परिदृष्टसामर्थ्य कारक प्रयोजकत्वम् , तस्मिन् सति कार्य्योत्पत्तेः । तच्चाशरीरस्यापि निर्वहति यथा स्वशरीरप्रेरणायामात्मनः । अस्ति तत्राप्यस्य स्वकर्मोपार्जितं तदेव शरीरमिति चेत् ? सत्यमस्ति परं प्रेरणोपायो न भवति , स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । प्रेय्यतयाऽस्तीति चेत् ? ईश्वरस्यापि प्रेय्र्यः परमाणुरस्ति ।
ननु स्वशरीरे प्रेरणाया इच्छाप्रयत्नाभ्यामुत्पत्तेरिच्छा प्रयत्नयोश्च सति शरीरे भावादसत्यभावाद् अस्ति तस्य स्वप्रेरणायामिच्छा प्रयत्नजननद्वारेणोपायत्वमिति चेन्न तस्येच्छाप्रयत्नयोरुपजननं प्रत्येव कारकत्वात् , लब्धात्मकयोरिच्छा प्रयत्नयोः प्रेरणाकरणकाले तु तदनुपायभूतमेव शरीरं कर्मत्वादिति व्यभिचार :, अनपेक्षितशरीरव्यापारस्येच्छा प्रयत्नमात्रसचिवस्यैव चेतनस्य कदाचिदचेतनव्यापारं प्रति सामर्थ्यदर्शनात् , बुद्धिमदव्यभिचारि तु कार्यत्वमितीश्वरसिद्धिः ।
इच्छा प्रयत्नोत्पत्तावपि शरीरमपेक्षणीयमिति चेत् ? अपेक्षतां यत्र तयोरागन्तुकत्वम् , यत्र पुनरिमौ स्वाभाविकावासाते तत्रास्यापेक्षणं व्यर्थम् । न च बुद्धीच्छा प्रयत्नानां नित्यत्वे कश्चिद् विरोधः । दृष्टा हि रूपादीनां गुणानामाश्रयभेदेन द्वयी गतिः - नित्यतानित्यता च । तथा बुद्ध्यादीनामपि भविष्यतीति । सेयमीश्वरवादे वादिप्रतिवादिनोः पराकाष्ठा । अतः परं प्रपञ्चः ।
आत्माधिष्ठिताः परमाणवः प्रवत्तिष्यन्त इति चेन्न , तेषां स्वकम्मोंपा जितेन्द्रियगणाधीन संविदां शरीरोत्पत्तेः ( विना ) सर्वविषयावबोधविरहात् । अस्त्यात्मनामपि सर्वविषयव्यापि सहजचैतन्यमिति चेन्न , सहजं शरीरसम्बन्धभाजां तत् केन विप्लुतं येनेदं सर्वत्रापूर्ववदवभासयति । शरीरावरणतिरोधानात् तदात्मन्येव समाधीयते , न बहिर्मुखं भवतीति चेत् ? व्यापकत्वेन तस्य विषयसम्बन्धानुच्छेदेन नित्यत्वेन च विषयप्रकाशस्वभावस्यानिवृत्तौ का तिरोधानवाचोयुक्तिः ? वृत्तिप्रतिबन्धचैतन्यतिरोधानमिति चेत् ? कथं तहि शरीरिणां विषयग्रहणम् ? क्वचिदस्य वृत्तयो न निरुध्यन्त इति चेत् ? कुतोऽयं विशेष : ? इन्द्रियप्रत्यासत्तिविशेषाद् यद्येवम् , इन्द्रियाधीनश्चैतन्यस्य विषयेषु वृत्तिलाभो न सन्निधिमात्रनिबन्धनः , सत्यपि व्यापकत्वे सर्वार्थेषु वृत्त्यभावादिन्द्रियवैयर्थ्यप्रसङ्गाच्च ( इति ) साधूक्तमशरीरिणामात्मनां न विषयावबोध इति ।
तथा चैके वदन्ति - “ रावि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ” इति । अनवबोधे च तेषां नाधिष्ठातार इति तेभ्यः परः सर्वार्थदशसहजज्ञानमयः कर्त्तृस्वभावः को s प्यधिष्ठाता कल्पनीयः , चेतनमधिष्ठातारमन्तरेणाचेतनानां प्रवृत्त्यभावात् ।
स किमेको s नेको वा ? एक इति वदामः । बहूनामसर्वज्ञत्वेऽस्मदादिवदसामर्थ्यात् , सर्वज्ञत्वे त्वेकस्यैव सामर्थ्यादपरेषामनुपयोगात् । न च समप्रधानानां भूयसां सर्वदैकमत्ये हेतुरस्तीति कदाचिदनुत्पत्तिरपि कार्य्यस्य स्यात् , एकाभिप्रायानुरोधेन सर्वेषां प्रवृत्तावेकस्येश्वरत्वं नापरेषाम् , मठपरिषदामिव कार्य्योत्पत्त्यनुरोधेन सर्वेषामविरोधे प्रत्येकमनीश्वरत्वम् । तदेवं कार्य्यविशेषेण सिद्धस्य कर्तृ विशेषस्य सर्वज्ञत्वान्न कुत्रचिद् वस्तुनि विशेषानुपलम्भः । अतो न तन्निबन्धनं मिथ्याज्ञानम् , मिथ्याज्ञानाभावे च न तन्मूलौ रागद्वेषौ तयोरभावान्न तत्पूर्विका प्रवृत्तिः प्रवृत्त्यभावे च न तत्साध्यौ धर्माधम्मौ , तयोरभावात् तज्जयोरपि सुखदुःखयोरभावः , सर्वदेव सद्भावात् स्मृतिसंस्कारावपि नासाते
चानुभव इत्यष्टगुणाधिकरणो भगवानीश्वर इति केचित् । अन्ये तु बुद्धिरेव तस्याव्याहता क्रियाशक्तिरित्येवं वदन्त इच्छाप्रयत्नावप्यनङ्गीकुर्वाणाः षड्गुणाधिकरणोऽयमित्याहुः । स कि बद्धो मुक्तो वा ? न तावद् बद्धः , बन्धनसमाज्ञातस्य बन्धहेतोः क्लेशादेरसम्भवात् । मुक्तोऽपि न भवति , बन्धविच्छेदपर्यायत्वामुक्तेः । नित्यमुक्तस्तु स्यात् , यदाह तत्रभवान् पतञ्जलि : - " क्लेशकर्म्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः " इति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इस प्रकार संहारक्रम का प्रतिपादन करने के लिए ' ततः पुनः ' इत्यादि लिखते हैं । यद्यपि उस समय के जीवों में प्राण का सम्बन्ध नहीं है , तथापि प्राणसम्बन्ध की योग्यता के कारण ' प्राणिनः ' पद का प्रयोग किया है । प्राणियों की ' भोगभूति ' अर्थात् सुख और दुःख के अनुभव के लिए महेश्वर की ' सिसृक्षा ' अर्थात् सृष्टि करने की इच्छा होती है । इसके बाद जीवों के सभी अदृष्टों में कार्यों को उत्पन्न करने की क्षमता आ जाती है ।
यद्यपि ईश्वर की असंख्य कार्यों की उत्पत्ति में व्यापृत इच्छा उनकी क्रियाशक्ति का रूप है , एवं दिगादि पदार्थों की तरह नित्य होने के कारण एक ही है , फिर भी तत्तत्काल रूप सहकारी को पाकर वही कभी संहार का कारण होती . है और कभी सृष्टि का कारण होती है । जब वह सृष्टि का कारण होती हैं , तब जीवों के अदृष्ट कार्यक्षम हो जाते हैं और अपने - अपने कार्यों के प्रति व्यापारशील हो जाते हैं ।
जब ईश्वर की इच्छा संहार का कारण होती है , तब अदृष्टों में कार्यों के प्रति उदासीनता रूप ' वृत्तिनिरोध ' हो जाता है । ' वृत्तिर्लब्धा यैस्ते वृत्तिलब्धा : ' इसी आशय का समास ' वृत्तिलब्ध ' पद में है । यद्यपि निष्ठाप्रत्ययान्त ' लब्ध ' शब्द का प्रयोग पहिले चाहिए , किन्तु आहिताग्निगण में पठित शब्द के साथ समस्त निष्ठा प्रत्ययान्तपद का पूर्व प्रयोग विकल्प से होता है , जैसे कि ' दन्तजातः ' इत्यादि स्थलों में , तदनुसार ही ' वृत्तिलब्ध ' शब्द का प्रयोग भी है ।
' सर्वात्मगतवृत्तिलब्धा दृष्टापेक्षेभ्य : ' इस समस्त महावाक्य का विग्रहवाक्य यों है कि ' सर्वात्मगताश्च वृत्तिलब्धाश्च , अदृष्टाश्च तानपेक्षन्ते ये , तत्संयोगास्तेभ्य : । ' तत्संयोग ' अर्थात् आत्मा और अणुओं का संयोग । इन संयोगों से वायवीय परमाणुओं में क्रिया उत्पन्न होती है । इस क्रिया के समवायिकारण हैं वायु के परमाणु , असमवायिकारण हैं वृत्तिलब्ध अदृष्ट से युक्त आत्मा और परमाणुओं का संयोग , एवं अदृष्ट निमित्तकारण है ।
इस प्रकार परमाणुओं में क्रिया को उत्पत्ति हो जाने पर इन वायवीय परमाणुओं में फिर संयोगों की उत्पत्ति होती है । इन संयोगों
कों की उत्पत्ति होती है , उसके बाद त्र्यसरेणु की । इस क्रम से महान् वायु उत्पन्न
' एवम् ' अर्थात् द्वयणुकादि क्रम से महाभूतों के उत्पन्न हो जानेपर महेश्वर के ' अभिध्यान ' अर्थात् केवल संकल्प से ही पार्थिव परमाणुओं से सहारा हुए पाये तैजस परमाणुओं से महदण्ड ' अर्थात् महान् पिण्ड को उत्पत्ति होती है । इस पिण्ड ( बिम्ब ) की उत्पत्ति में चूँकि पार्थिव परमाणुओं का विशेष सम्बन्ध है , अतः यह पि ' ( तैजस होनेपर भी ) वह्निपुञ्ज सदृश नहीं होता है ।
उसी पिण्ड में कमल के समान चार मुखवाले ' सर्वलोकपितामह ' अर्थात् सभी पुरुषों के आदि पुरुष ब्रह्मा को सकल भुवनों के साथ उत्पन्न कर जाओं को उत्पन्न करने के लिए नियुक्त करते हैं । कि तुम यह काम करो ' ।
महेश्वर के द्वारा सृष्टिकार्य के लिए नियुक्त वह ब्रह्मा ' अतिशय ज्ञानवैराग्यैश्वर्य सम्पन्न : ' अर्थात् " ज्ञानञ्च वैराग्यञ्च , ऐश्वर्यञ्च ज्ञानवैराग्यैश्वर्य्याणि , अतिशयेन ज्ञानवैराग्यैश्वय्र्याणि तैः सम्पन्नः ” इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का अर्थ है कि वह ब्रह्मा उत्तम ज्ञान , उत्कट वैराग्य और अमित ऐश्वर्य से युक्त हैं | अपने उत्तम ज्ञान के बल से वह प्राणियों के धर्म और अधर्म को ठीक से समझते हैं ।
उत्कट वैराग्य के प्रभाव से उनकी प्रवृत्ति पक्षपात से दूषित नहीं होती है । अपने अमित ऐश्वर्य के बल से वह प्राणियों के कर्म का भोग सम्पन्न कर सकते हैं । ' प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वा ' , विविधेन प्रकारेण पाको विपाकः ' इस व्युत्पत्ति 1 के अनुसार अनेक प्रकार की परिणति ' विपाक ' शब्द का अर्थ है ।
' कर्म्मणां विपाकः कम्र्म्मविपाकः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कर्मों की विविध परिणति ही ' कर्मविपाक ' शब्द का अर्थ है | अतः वे कर्मविपाक को समझकर अर्थात् ' इस जीव के कर्मों का फल इतना होगा ' यह समझकर ' कर्मानुरूपज्ञानभोगायुषः ' अर्थात् कर्म के अनुरूप ज्ञान , भोग और आयु से युक्त दक्षप्रजापति प्रभृति पुत्रों को मन मात्र से उत्पन्न अत एव मानस पुत्ररूप मनुओं , देवताओं , ऋषियों और पितरों को उत्पन्न करते हैं ।
इसी प्रकार मुख , बाहु , जङ्घा , एवं चरणों से क्रमशः ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों को एवं और भी छोटे बड़े जीवों को उत्पन्न करते हैं । ' आशयानुरूपैः ' अर्थात् ' आशेते फलोपभोगकालं यावदात्मन्यवतिष्ठित इत्याशय : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार फलों के उपभोग पर्यन्त जो आत्मा रहे उसे ' आशय ' कहते हैं । फलतः कर्म ( अदृष्ट ) ही ' आशय ' शब्द का अर्थ है । उसके अनुरूप धर्म , ज्ञान , वैराग्य और ऐश्वयं से जीवों को सम्बद्ध करते हैं ।
अर्थात् जिस जीव का अदृष्ट जिस प्रकार का है उसी के अनुरूप धर्म , ज्ञान , वैराग्य और ऐश्वर्य इन चारों वस्तुओं से जीवों को उचित रीति से सम्बद्ध करते हैं , इसमें थोड़ा सा भी इधर उधर नहीं करते ।
इस प्रसङ्ग में किसी की आपत्ति है कि ( १ ) इष्ट वस्तुओं की प्राप्ति एवं ( २ ) अनिष्ट वस्तुओं के परिहार इन दो भेदों से प्रवृत्ति दो ही प्रकार की है । महेश्वर को सभी वस्तुयें बराबर प्राप्त ही हैं । उनका अनिष्ट तो कोई है ही नहीं , अतः कारण की अनुपपत्ति से संसार रचना की उनकी प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती । इसी आपत्ति का समाधान ' प्राणिनां भोगभूतये ' इस वाक्य से दिया है ।
अभिप्राय यह है कि सृष्टिकार्य में महेश्वर को प्रवृत्ति अपने लिए नहीं है ( उक्त कार्यकारणभाव स्वार्थमूलक प्रवृति का है ) । ( इस पर यह आक्षेप हो सकता है कि ) तो फिर वे सुखमयी सृष्टि की ही रचना करते , दुःखबहुल सृष्टि की नहीं , क्योंकि वे करुणा से ही इसमें प्रवृत्त होते हैं । इसी आक्षेप का परिहार प्राणिनां कर्म्मविपाकं विदित्वा ' इस वाक्य से किया गया है ।
कहने का तात्पर्य है कि दूसरों के लिए प्रवृत्त होनेपर भी केवल सुखमयी सृष्टि नहीं कर सकते , क्योंकि सुख और दुःख दोनों के जनक ' विचित्र ' कर्माशय के साहाय्य से ही उनमें सृष्टि का कर्तृत्व है । ऐसा होनेपर भी उनकी स्वाभाविक करुणा में कोई अन्तर नहीं आता , क्योंकि वैराग्य के उत्पादन के द्वारा दुःखों का उत्पादन भी परम पुरुषार्थं मोक्ष ) का साधन है ।
अगर सृष्टिकार्य के लिए उन्हें भी जीवों के धर्म और अधर्म की अपेक्षा है तो फिर कहना पड़ेगा कि उनमें सृष्टि कार्य के प्रति स्वातन्त्र्य रूप कर्तृत्व नहीं है , फिर उनमें अनीश्वरत्व का दोष अनिवार्य है । इसी आक्षेप का समाधान ' आशयानुरूपैर्धर्मज्ञानवैराग्येश्वय्यैः संयोजयति ' इस वाक्य से किया है । अभिप्राय है कि सभी जीवों को अपने कर्म के अनुसार फल देते हुए भी वह ' अनीश्वर ' क्यों होंगे ? क्योंकि योग्यता के अनुसार अपने भृत्यों को फल देते हुए भी स्वामी अप्रभु नहीं होते ।
सृष्टि के आदि में उत्पन्न जीव शब्द और अर्थ के व्यवहार से अनभिज्ञ रहते हैं , अतः सृष्टि के आदि में सङ्केत के द्वारा शब्द से होनेवाले व्यवहारों की उपपत्ति नहीं होगी । इसी का समाधान मानसान् ' इस पद में है । अभिप्राय यह है कि योनिज शरीर के जीवों के संस्कार गर्भवासादिजनित बहुत बड़े दुःखों के भोगने के कारण विलुप्त हो जाते हैं , अतः उन जीवों को दूसरे जन्म में अनुभूत सभी बातों का स्मरण नहीं रहता है । ऋषि प्रजापति और मनु चूँकि मानस हैं ( योनिज नहीं ) , अतः योनिज शरीरवालों से उनका अदृष्ट विलक्षण है । अत एव उनके सभी संस्कार उद्बुद्ध रहते हैं । वे सोकर उठे हुए व्यक्तियों की तरह दूसरे जन्मों में किये गये शब्द और अर्थों के व्यवहारों को स्मरण कर इस जन्म में भी शब्द और अर्थ का व्यवहार करते हैं । उनके व्यवहार से ही और सभी जीव शब्द और अर्थ के सङ्केत को ग्रहण करते हैं । उन जीवों के व्ववहार से फिर अन्य जीव भी शब्दार्थ व्यवहार को ग्रहण करते हैं । व्यवहार की इस परम्परा से शब्द और अर्थ के सङ्केत का ग्रहण होता है ।
( प्र ० ) ईश्वर की सत्ता में प्रमाण ही क्या है ? ( उ ० ) शब्द और अनुमान दोनों हो । ( अनुमान इस प्रकार है कि ) पृथिवी प्रभृति चारों महाभूत किसी ज्ञानी कर्ता के द्वारा उत्पन्न होते हैं , क्योंकि वे कार्य हैं । कार्य अवश्य ही किसी ज्ञानी कर्ता के द्वारा उत्पन्न होते हैं , जैसे कि घटादि पृथिव्यादि चारों भूत भी कार्य हैं अतः वे सभी भी अवश्य ही ज्ञानी कर्त्ता के द्वारा उत्पन्न हैं ।
( प्र ० ) किसी भी प्रमाण से ' पूर्वकोटि ' अर्थात् पक्षधर्मता का ज्ञान ( अर्थात् पृथिव्यादि चारों महाभूतरूप पक्ष में कार्यत्व रूप हेतु का निश्चयात्मक ज्ञान ) नहीं है , उक्त पक्ष में कार्यत्व हेतु सिद्ध नहीं ( होने के कारण कार्यत्व हेतु स्वरूपासिद्ध ) है । ( उ ० ) प्रकृत में कार्यत्व हेतु स्वरूपासिद्ध नहीं है , क्योंकि पक्ष रूप चारों महाभूतों के सावयव होने के कारण उक्त सावयवत्व हेतु से उनमें कार्यत्व हेतु सिद्ध है , क्योंकि जितने भी सावयव हैं वे सभी कार्य हैं जैसे घटादि ।
पृथिव्यादि चारों महाभूत भी सावयव हैं , अतः वे भी अवश्य ही कार्य हैं । ( प्र ० ) व्याप्तिज्ञान से ही अनुमान की प्रवृत्ति होती है , किन्तु उपलब्धिमत्कर्तृ - जन्यत्वरूप प्रकृत साध्य की व्याप्ति का ज्ञान कार्यस्वरूप हेतु में सम्भव नहीं है , क्योंकि घटादि में उक्त साध्य और हेतु के दोनों की प्रतीति - काल में ही अङ्कुरादि में उक्त साध्य के अभाव के साथ कार्यत्व हेतु के सामानाधिकरण्य की भी अबाधित प्रतीति होती है | ( उ ० ) अङ्कुर तो पक्ष के अन्तर्गत है ?
( 50 ) इस कथन में कोई सार नहीं है , क्योंकि व्याप्ति के ज्ञात हो जाने के बाद अनुमान की प्रवृत्ति होती है । उस प्रवृत्तिकाल में प्रतिवादी को आकाङ्क्षा के अनुसार पक्ष- साध्यादि विभाग प्रवृत्त होते हैं ।
यहाँ तो हेतु में साध्याभाव के सामानाधिकरण्य के ज्ञान से व्याप्ति का ज्ञान ही असम्भव है | ( उ ० ) इसके समाधान में कहना है कि अगर इस प्रकार हेतु और साध्य के सामानाधिकरण्य की अनुपलब्धि से व्याप्ति का ज्ञान न हो तो मोमांसाभाष्यकार का अभिमत सामान्यतोदृष्ट अनुमान का सूर्य की गतिवाला उदाहरण ही असङ्गत हो जाएगा , क्योंकि जिस समय यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि ' देवदत्त का दूसरे देश के साथ सम्बन्ध गति से उत्पन्न होता हैं , उसी समय नक्षत्रों में केवल दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध का ही ज्ञान होता है ।
इसके लिए अगर यह उत्तर दिया जा सकता है कि नक्षत्र चूँकि बहुत दूर है , अतः उनमें दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध का ज्ञान होने पर भी गति का ज्ञान नहीं होता है । यहाँ गति की अनुपलब्धि से व्याप्तिज्ञान के कारणरूप उपाधि से शून्य ( गति और देशान्तरसञ्चार ) के भूयोदर्शन का प्रतिरोध नहीं हो सकता , क्योंकि ( प्रकृत गति की अनुपलब्धि और प्रकृत भूयोदर्शन ) दोनों समान कक्षा के नहीं हैं ।
( उ ० ) तो फिर प्रस्तुत विषय में भी कहा जा सकता है कि जिस कार्य का कर्ता शरीरी पुरुष होता है , उस कर्ता के शरीर में प्रत्यक्ष की योग्यता रहने के कारण उसके कार्यों में भी कर्तृ जन्यत्व की प्रतीति होती है , किन्तु प्रस्तुत महाभूतादि की सृष्टि के कर्ता महेश्वर को तो शरीर नहीं है , अतः ईश्वररूप - कर्तृ जन्य अङ्कुरादि कार्यों में कर्तृ जन्यत्व की प्रतीति नहीं होती है । किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि अङ्कुरादि कार्यों में कर्तृ जन्यत्व है ही नहीं । तस्मात् कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
( 50 और भी बात है— अनुमान से आप क्या साधन करना चाहते हैं ? केवल कर्ता ? या पृथिवी प्रभृति उक्त महाभूतों के निर्माण से समर्थ कर्ता ? केवल कर्ता की सिद्धि से तो आपका अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा , क्योंकि हम लोगों के समान अल्पज्ञ कर्ता की सिद्धि आपको उस अनुमान से इष्ट नहीं है , एवं हम लोगों के समान अल्पज्ञ पुरुष पृथिव्यादि का निर्माण कर भी नहीं सकता है ।
उक्त अनुमान से पृथिव्यादि के निर्माण में समर्थ कर्ता की सिद्धि हो ही नहीं सकती , क्योंकि इस विशेष प्रकार का कर्तृ जन्यत्व कहीं उपलब्ध नहीं है । अन्वय ( हेतु में साध्य का सामानाधिकरण्य ) के बल से दृष्टान्त में जिस प्रकार के कर्तृ जन्यत्व रूप साध्य की उपलब्धि होगी , पक्ष में भी उसी प्रकार के साध्य की सिद्धि होगी । घटादि रूप दृष्टान्तों में तो पृथिव्यादि निर्माण में समर्थ कर्ता का जन्यत्व उपलब्ध नहीं है ।
( उ ० ) उक्त आपत्ति ठीक नहीं है , क्योंकि विशेष प्रकार के कर्ता की सिद्धि अनुमान से इष्ट नहीं है , क्योंकि व्याप्ति के बल से पृथिव्यादि के किसी बुद्धियुक्त कर्ता को सिद्धि हो जाने पर पृथिव्यादि में उनके निर्माण में समर्थ कर्तृ जन्यत्वरूप विशेष की सिद्धि स्वत : हो जाएगी , क्योंकि विशेषों से रहित सामान्य की सिद्धि सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) सामान्य की भी सिद्धि न हो ? ( उ ० ) नहीं , क्योंकि कार्यत्व में कर्तृ जन्यत्व की व्याप्ति है , इसमें कोई गड़बड़ नहीं है ।
अगर व्याप्ति के रहने पर भी सामान्य की सिद्धि न हो तो फिर धूम से वह्नि सामान्य की भी सिद्धि नहीं होगी ।
अगर यह कहें कि अनुमान के दो रूप हैं— व्याप्ति और पक्षधर्मता । इनमें व्याप्ति के बल से सामान्य की सिद्धि होती हे और पक्षधर्मता के बल से विशेष की सिद्धि होती है । अगर पक्षधर्मता से विशेष का नियमन न हो तो उसका उपयोग ही क्या है ? एवं ज्ञातज्ञापक हो जाने के कारण अनुमान में प्रामाण्य ही कैसे हो ? ( उ ० ) अगर यह न्याय है तो फिर ईश्वरानुमान में भी यही न्याय है , अगर आपका कोई विशेष आग्रह न हो । अनुमान से विशेषों की सिद्धि वहीं होती है , जहाँ उसके विरुद्ध कोई प्रमाण उपस्थित नहीं रहता ।
जैसे कि पर्वत के मूल में वह्निविशेष की सिद्धि होती है । देश और काल के भेद से विशेषों का असाधारण्य प्रत्यक्ष से सिद्ध हैं । इसमें कौनसी अनुपपत्ति है ?
किन्तु उक्त अनुमान से पृथिव्यादि के निर्माण में समर्थ कर्ता की सिद्धि का तो विरोधी प्रमाण है , क्योंकि इससे पृथिव्यादि महाभूतों के शरीरी कर्ता की सिद्धि तो आपको इष्ट नहीं है , क्योंकि इससे ईश्वर का शरीर एवं उनकी इन्द्रियाँ माननी पड़ेगी और इन सबों से सब गुड़ गोबर हो जाएगा , क्योंकि इन्द्रियादि से युक्त कर्ता में महाभूतों के अतीन्द्रिय परमाणु रूप उपादानों में कार्योत्पादन शक्ति का ज्ञान सम्भव अशरीरपूर्वकत्वञ्चाशक्यसाधनम् , सर्वोऽपि कर्त्ता कारकस्वरूपमवधारयति , तत इच्छतीदमहमनेन निर्वर्त्तयामीति , ततः प्रयतते तदनु कायं व्यापारयति , ततः कारणान्यधितिष्ठति , ततः करोति , अनवधारयन्ननिच्छन्नप्रयतमानः कायम - व्यापारयन् न करोतीत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां बुद्धिवच्छरीरमपि कार्योत्पत्तावु - पायभूतम् ।
निखिलोपाधिग्रहणे व्याप्तिग्राहकप्रमाणादेवावधारितं न शक्यते प्रातुं वह्नेरिवेन्धनविकारसामर्थ्यं धूमानुमाने , तत्परित्यागे च बुद्धिरपि परित्यज्यताम् । प्रभावातिशयादशरीरवदबुद्धिमानेवायमीश्वरः करिष्यति । उपादानोपकरणादिस्वरूपानभिज्ञो न शक्नोतीति चेत् ? कुत एतत् ? तथानुपलम्भादिति चेत् ? फलितं ममापि मनोरथद्रुमेण , न तथा यावदिच्छा प्रयत्नव्यवहिता कार्य्योत्पत्तावुपयुज्यते यथेदमव्यवहितव्यापारं शरीरम् । नहीं है , एवं उसके बिना कर्तृत्व ही असम्भव है ।
यह सिद्ध करना तो बिलकुल ही असम्भव है कि ये महाभूत उन कर्ता से उत्पन्न होते हैं जिनके शरीर नहीं हैं । क्योंकि कर्ताओं का यह स्वभाव है कि वे पहिले उपादानों के स्वरूप को जानते हैं । फिर यह इच्छा होती है कि इन उपादानों से अमुक कार्य को उत्पन्न करें । इसके बाद वे तदनुकूल प्रयत्न करते हैं । फिर अपने शरीर को उस कार्य के अनुसार संचालित करते हैं । इन सबों के बाद कार्य के उपकरणों को यथावत् परिचालित कर कार्य को उत्पन्न करते हैं ।
बिना उपादान निश्चय के , उस कार्य की इच्छा न रखते हुए , उस कार्य विषयक प्रयत्न के बिना ही , शरीर को हिलाये डुलाये बिना कोई भी कर्ता किसी भी कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकता । इस अन्वय और व्यतिरेक से बुद्धि की तरह शरीर में भी कारणता सिद्ध | व्याप्ति की प्रतिबन्धक उपाधियों की खोज के बाद भी जिस हेतु में जिस साध्य की व्याप्ति गृहीत होती है , उस हेतु से साध्य के ज्ञान को कोई रोक नहीं सकता है । जैसे कि आद्रेन्धन प्रभव वह्निरूप उपाधि से युक्त होने के कारण धूम की सिद्धि नहीं होती हैं ।
इस प्रकार शरीर में सिद्ध कारणत्व का भी अगर परित्याग करे तो बुद्धि को भी छोड़िए । ईश्वर अगर अतिशय प्रभाव के कारण बिना शरीर के भी महाभूतों को उत्पन्न कर सकते हैं तो फिर बिना बुद्धि के भी उन कार्यों का सम्पादन कर सकते हैं । ( I ० ) उपादान एवं और कारणों से अनभिज्ञ कर्ता से किसी कार्य का उत्पादन सम्भव नहीं है , अतः बुद्धि को भी कार्यों का कारण मानते है ) | ( उ ० ) यह आपने कैसे समझा ?
( प्र ० ) स्थूल घटादि कार्यों में यह देखा जाता है कि वे उपादानादि कारणों के ज्ञान से युक्त कर्ता से ही उत्पन्न होते हैं । ( उ ० ) तो फिर हमारे मनोरथ के वृक्ष भी फल गये , क्योंकि जिस प्रकार किसी विषय की इच्छा रहने पर भी अगर उस विषय का प्रयत्न नहीं रहता हैं तो कार्य
१५ नहीं होता है , उसी प्रकार शरीरव्यापार के बिना केवल प्रयत्न से भी कार्य नहीं होता ।
( प्र ० ) कथित अनुमान से पृथिव्यादि महाभूतों में सिद्ध बुद्धिविशिष्टकर्तृजन्यत्व की क्या गति होगी ? ( उ ० ) कोई भी गति नहीं , ( क्योंकि बुद्धिमत्कर्तृ - जन्यत्वरूप ) सामान्य के विशेषभूत शारीरिकर्तृ जन्यत्व और अशरीरिकर्तृ जन्यत्व इन दोनों में से किसी भी विशेष की सिद्धि नहीं होगी । एवं विशेषों से शून्य सामान्य की सिद्धि भी सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) उस सामान्य विषयक अनुमान में दोष क्या है ?
( उ ० ) कोई भी दोष नहीं है , चूँकि विशेषों में से किसी की भी सिद्धि नहीं है , अतः आकाशकुसुमप्रतिम ईश्वर ही साधन के आयोग्य है । अतः अनुमान के द्वारा ईश्वर का साधन करनेवाला पुरुष उसी प्रकार विफल होगा , जैसे कि किसी भी प्रकार से न खण्डित होनेवाले आकाश की तरफ कृपाण को उछालनेवाला व्यक्ति विफल हो जाता है ।
अगर आपको बिना हेत्वाभासों के सुने सन्तोष न हो तो फिर उन्हें भी सुनिये | अशरीरिकर्तृ ' जन्यत्व में फलित उक्त अनुमान व्याप्तिग्राहक प्रमाणों से बाधित होने के कारण ' कालात्ययापदिष्ट ' नाम के हेत्वाभास से दूषित है । एवं व्याप्ति के बल से हो अशरीरिकर्तृ जन्त्वरूप विशेष की सिद्धि हो सकती है , किन्तु ' कर्ता शरीरयुक्त ही होता हैं ' विशेष प्रकार की इस व्याप्ति से भी उक्त अनुमान दूषित होता है , जो वस्तुतः विरुद्ध नाम से प्रसिद्ध हेत्वाभास का ही प्रभेद है ।
इतना हो उक्त ईश्वरानुमान के विषय में आक्षेप करनेवाले पूर्वपक्षियों का आशय है ।
( उ ० ) अब हमें इन सब आक्षेपों के समाधान में यह पूछना है कि शरीर का सम्बन्ध ही कर्तृत्व है ? या जिन कारणों में कार्य करने का सामर्थ्य ज्ञांत हो गया है , उन्हें उचित रूप से परिचालित करना ही कर्तृत्व है ? अगर शरीर सम्बन्ध कोही कर्तृत्व मानें तो फिर सोये हुए व्यक्ति में एवं कार्यों से उदासीन व्यक्ति में भी कर्तृत्व मानना पड़ेगा । अतः उक्त प्रकार के कारणों को परिचालित करना ही कर्तृत्व है , क्योंकि उचित रूप से उन्हें परिचालित होने पर ही कार्य की उत्पत्ति होती है ।
यह दूसरे प्रकार का कर्तृत्व शरीर सम्बन्ध के बिना भी सम्भव है , जैसे कि अपने शरीर के लिए जीव का । ( II ) यहाँ भी अपने पूर्व कर्मों से उपार्जित उसी शरीर का सम्बन्ध जीव को अपने शरीर को प्रेरित करने में सहायक है ? ( उ ० ) यह ठीक है कि जीव में शरीर का सम्बन्ध है , किन्तु अपने शरीर की क्रिया से अपने शरीर में प्रेरणा नही हो सकती । ( प्र ० ) फिर भी यहाँ प्रेरणा का आश्रय तो है ? ( उ ० ) ईश्वर की प्रेरणा के लिए भी परमाणु रूप आश्रय तो ही ।
( प्र ० ) इच्छा और प्रयत्न से अपने शरीर में प्रेरणा उत्पन्न होती है । इन दोनों में भी शरीर अपेक्षित है ही । इस प्रकार अपने शरीर की प्रेरणा में भी अपने शरीर की अपेक्षा होती है । ( उ ० ) शरीर केवल इच्छा और प्रयत्न का ही कारण है , अपने कारणों से उत्पन्न इच्छा एवं प्रयत्न इन दोनों से प्रेरणा की उत्पत्ति होती है । प्रेरणा में शरीर कारण नहीं है , क्योंकि शरीर प्रेरणा रूप क्रिया का कर्म है ।
इस प्रकार यह नियम हो गलत हो जाता है कि कर्तृत्व शरीर युक्त द्रव्यों में ही रहता है , क्योंकि शरीरव्यापार की अपेक्षा न रखते हुए भी केवल इच्छा और प्रयत्न की सहायता से ही चेतन में जड़ वस्तुओं को व्यावृत करने का सामर्थ्य कहीं कहीं देखा जाता है । कार्यत्व और बुद्धिमत्कर्तृ जन्यत्व दोनों अव्यभिचारी हैं , अतः उक्त अनुमान से ईश्वर की सिद्धि होती है । ( प्र ० ) ( महाभूतादि सृष्टि के प्रयोजक ईश्वरीय ) इच्छा और प्रयत्न के लिए भी शरीर की आवश्यकता होगी ?
( उ ० ) इच्छा और प्रयत्न जहाँ आगन्तुक गुण हैं , वहाँ शरीर की आवश्यकता भले ही हो , जहाँ ये दोनों स्वाभाविक गुण हैं , वहाँ शरीर की अपेक्षा व्यर्थ है । बुद्धि , इच्छा और प्रयत्न इन सबों का नित्यत्व भी युक्ति विरुद्ध नहीं है , क्योंकि आश्रय के भेद से रूपादि गुणों की नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों प्रकार की गति देखी जाती है | अतः बुद्धयादि भी जीव और ईश्वर रूप आश्रयों के भेद से नित्य और अनित्य दोनों प्रकार के होंगे ।
ईश्वर को माननेवाले और न माननेवाले दोनों की इतनी ही युक्तियाँ हैं , आगे इन्हीं का विस्तार है ।
( प्र ० ) जीवों की अध्यक्षता में केवल परमाणु ही पृथिव्यादि महाभूतों की सृष्टि करेंगे ? ( उ ० ) उनका ज्ञान अपने कर्मों से उपार्जित इन्द्रियों के अधीन है , अतः महाभूतों की सृष्टि में अपेक्षित सभी विषयों का ज्ञान जीवों में सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) जीवों में भी सभी विषयों में व्याप्त चैतन्य की सत्ता तो है ही । ( ३० ) तो फिर शरीर से युक्त जीवों में उस सहज चैतन्य का विघटन कौनकर देता हैं ? जिससे कि सभी विषयों को विना देखी हुई वस्तुओं की तरह देखता है ।
( प्र ० ) शरीर रूप आवरण के कारण वह सर्वविषयक सहज चैतन्य जीवों में तिरोहित रहता है , केवल प्रकाशित मात्र नहीं होता है । ( उ ० ) जीव भी व्यापक है , अतः विषयों के साथ सर्वदा उसका सम्बन्ध रहेगा । जीव नित्य है , अतः विषयों को प्रकाशित करनेवाला स्वभाव भी उसमें बराबर रहेगा । फिर तत्स्वरूप सहज चैतन्य के तिरोभाव में क्या युक्ति है ? ( प्र ० ) कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति का नाश ही उसका तिरोभाव है ? ( उ ० ) फिर जीवों को विषयों का ज्ञान कैसे होता है ?
( प्र ० ) कहीं उसकी वृत्तियाँ निरुद्ध नहीं भी होती हैं ? ( उ ० ) ( कहीं वह शक्ति उद्बुद्ध रहती है एवं कहीं तिरोहित ) , इस विशेष में क्या युक्ति है ? अगर इन्द्रिय सन्बन्ध रूप विशेष से ऐसा होता है ? ( उ ० ) तो फिर विषय केवल जीवों के समीप रहने के कारण ही उसके सहज चैतन्य के द्वारा प्रतिभासित नहीं होते , क्योंकि व्यापक होने पर भी जीवों को सभी विषयों का ज्ञान नहीं होता है !
अगर जीवों में इन्द्रियों से निरपेक्ष भी ज्ञान की सत्ता रहे तो फिर इन्द्रियों की रचना ही व्यर्थ हो जाएगी , अतः मैंने पहिले जो कहा है कि ' जीवों को बिना शरीर के विषयों का ज्ञान नहीं होता है ' वह ठीक है ।
' पराञ्चि खानि ' इत्यादि श्रुतियों का अवलम्बन करते हुए कोई कहते हैं कि सभी विषयों का ज्ञान जीवों को नहीं है । सभी विषयों के ज्ञान के बिना सृष्टि जैसा कार्यं सम्भव नहीं है । सृष्टि रचना के लिए जीवों से भिन्न सहजज्ञान से युक्त कर्तृत्वस्वभाववाले किसी अधिष्ठाता की कल्पना करनी होगी , क्योंकि जड़ वस्तुओं की प्रवृत्ति चेतन अधिष्ठाता के बिना सम्भव ही नहीं है , अतः ईश्वररूप अधिष्ठाता अवश्य है ।
किन्तु वह एक हैं या अनेक ? इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि वह एक ही है , क्योंकि अगर ईश्वर अनेक हों एवं सर्वज्ञ हों तो फिर हमलोगों की तरह ही सृष्टिकार्य में असमर्थ होंगे । अगर ईश्वर को अनेक मानकर सभी को सर्वज्ञ मानें , तो फिर एक ही ईश्वर के सामर्थ्य से सृष्टि कार्य की उत्पत्ति हो जाएगी , अन्य सभी ईश्वरों के सामर्थ्यं व्यर्थ जाएँगे । एवं एक ही प्रकार के प्राधान्य से युक्त अनेक व्यक्तियों में सर्वदा ऐकमत्य भी नहीं रहता है ।
अगर एक ही ईश्वर के अभिप्राय से अन्य ईश्वरों की भी प्रवृत्ति मानें तो फिर वही ईश्वरपद के मुख्यार्थ होंगे , और बाकी सर्वज्ञ ईश्वर न कहला सकेंगे । अगर कार्यसम्पादन के अनुरोध से अन्य विषयों में मतभेद रहते हुए भी मठ की परिषद् के सभासदों की तरह सृष्टिरूप एक कार्य में सभा ईश्वरों का एक मत मानें तो फिर प्रत्येक ईश्वर में अनीश्वरता की आपत्ति होगी । तस्मात् अन्य सभी कार्यों से विलक्षण कार्य द्वारा सिद्ध अन्य सभी कर्ताओं से विशिष्ट सृष्टिरूप कार्य का ईश्वररूप कर्ता एक ही है ।
चूंकि सर्वज्ञ हैं , किसी भी विषय का कोई भी विशेष उनको अज्ञात नहीं है , अतः विषयों के विशेष के अज्ञान से उत्पन्न होनेवाला मिथ्याज्ञान भी उनमें नहीं है । सुतरां मिथ्याज्ञानमूलक राग और द्वेष भी उनमें नहीं है । इसी हेतु से राग और द्वेष से होनेवाली प्रवृत्तियाँ भी उनमें नहीं हैं । फिर प्रवृत्ति , धर्म और अधर्म की उनमें सत्ता कैसी ? धर्म और अधर्म के न रहने से उनमें सुख एवं दुःख भी नहीं है । सर्वदा सभी विषयों के अनुभव के ही रहने के कारण उनमें स्मृति और संस्कार भी नहीं हैं ।
इस प्रकार किसी का मत है कि भगवान् परमेश्वर संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग . ज्ञान , इच्छा और प्रयत्न इन आठ गुणों से युक्त हैं । किसी विषय में व्याहत न होनेवाला ज्ञान ही उनकी क्रियाशक्ति है | इस प्रकार उनमें इच्छा और प्रयत्न को भी अस्वीकार करते हुए कोई उन्हें छः गुणों काही आधार मानते हैं । वे बद्ध हैं या मुक्त ? बद्ध तो वे नहीं हैं , क्योंकि बन्धन के कारण क्लेशकर्मादि उनमें नहीं हैं ।
वे मुक्त भी नहीं हो सकते , क्योंकि ' मुक्ति ' और ' बन्धविच्छेद ' दोनों शब्द पर्यायवाची हैं । नित्यमुक्त वे हो सकते हैं , जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ' क्लेशकर्म्मविपाकाशयैः ' इत्यादि सूत्र से है |
कहा
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. १३४) १. अर्थात् नहि पक्षे पक्षसमे वा व्यभिचारो दोषाधायक : ' इस न्याय से पक्षान्तर्गत अङ्कुर में व्यभिचार का उद्भावन अनुमिति का प्रतिरोध नहीं कर सकता ।
आकाशनिरूपणम्
पृ. १४३
आकाशकालदिशामेकैकत्वादपरजात्यभावे पारिभाषिक्यस्तिस्रः संज्ञा भवन्ति , आकाशः कालो दिगिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आकाश , काल और दिक् इन तीनों में से प्रत्येक एक एक ही है , अतः उनमें से किसी में ( द्रव्यत्व से भिन्न द्रव्यत्व व्याप्य और कोई ) भी अपर जाति नहीं है । तस्मात् आकाश , काल और दिक् नाम की उन तीनों की तीन पारिभाषिक संज्ञायें हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
आकाशादीनां त्रयाणां सङ्क्षेपार्थमेकेन ग्रन्थेन वैधम्र्म्यं कथयति - आकाशकालदिशामिति । आकाशस्य कालस्य दिशश्चैकैकत्वादपरजातिर्नास्ति , तस्या व्यक्तिभेदाधिष्ठानत्वात् । अपरजात्यभावे चाकाश इति काल इति दिगिति तिस्रः संज्ञा : पारिभाषिक्यो न पृथिव्यादिसंज्ञावदपरजातिनैमित्तिक्य इत्यर्थः । संज्ञेषामितरवैधर्म्यं यस्याः संज्ञाया विना निमित्तेन शृङ्गग्राहिकया सङ्केतः सा पारिभाषिकी , यथायं देवदत्त इति । यस्याः पुनर्नमित्तमुपादाय सङ्केतः सा नैमित्तिकोति विवेकः ।
सम्प्रति प्रत्येकं निरूपणार्थमाह - तत्राकाशस्य गुणा इति । तेषां त्रयाणां मध्ये आकाशस्य गुणाः शब्दसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः । शब्दादिगुणयोगोऽप्याकाशस्य वैधर्म्यम् ।
नन्वाकाशस्य सद्भावे किं प्रमाणम् ? प्रत्यक्षमेव वियति पतति पतत्त्रिणि चक्षुर्व्यापारेणेहायं पक्षी प्राप्तो नेहेति नियतदेशाधिकरणा प्रतीतिरिति चेत् , तदयुक्तम् , अरूपस्य द्रव्यस्य चाक्षुषत्वाभावात् । योऽप्ययमधिकरणप्रत्ययस्तत्र विततालोकमण्डलव्यतिरेकेण न द्रव्यान्तरं प्रतिभाति , अत आकाशस्य सद्भावे परिशेषानुमानमुपन्यस्यञ्छब्दस्य द्रव्यान्तरगुणत्वं निषेधति - शब्द इति । --
स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तद्गुणपूर्वः शब्दो न भवति , पटरूपादिवदाश्रयोत्पत्त्यनन्तरमनुत्पादात् । अतः सुखादिवत् स्पर्शवतो विशेषगुणो न भवति । विशेषगुणत्वप्रतिषेधे सामान्यगुणत्वं भविष्यतीति नाशङ्कनीयम् , सामान्यविशेषवतस्तस्य बाह्येन्द्रियग्राह्यत्वेन रूपादिवद्विशेषगुणत्वसिद्धेः । पार्थिवपरमाणुरूपादयः स्पर्शद्विशेषगुणा अथ चाकारणगुणपूर्वकाः परमाणोरकार्य्यत्वात् तद्वयवच्छेदार्थं प्रत्यक्षत्वे सतीति कृतम् ।
यावद्द्रव्यं शब्दो न भवति सत्येवाश्रये शङ्खादौ तस्य विनाशात् , अतोऽपि सुखादिवत् स्पर्शवद्विशेषगुणो न भवति । तत्रापि पार्थिव - परमाणुरूपादिभिरेव व्यभिचार :, तेषां सत्येवाश्रये परमाणावग्निसंयोगेन विनाशात् तदर्थं प्रत्यक्षत्वे सतीत्यनुवर्त्तनीयम् । हेत्वन्तरञ्चाह - आश्रयादन्यत्रोपलब्धेश्च । स्पर्शवद्विशेषगुणत्वे शब्दस्य शङ्खादिराश्रयो वाच्यः । स च तस्मादन्यत्र दूरे कर्णशष्कुलीदेशे समुपलभ्यते , न चान्यगुणस्यान्यत्र ग्रहणमस्ति , तस्मान्न स्पर्शवद्विशेषगुणः ।
ननु शङ्खादिदेशस्थित एव शब्दो गृह्यते , इन्द्रियाणामासंसारमण्डलव्यापित्वादिति चेन्न , संनिकृष्ट विप्रकृष्टयोरविशेषेणोपलब्धिः स्यात् । व्यापकत्वेऽपीन्द्रियाणां पुरुषार्थेन हेतुना क्षोभ्यमाणानां यदधिष्ठानदेशेभ्यो विषयग्रहणानुगुणवृत्तयो निर्गता विषयं विश्नुवते तदा विषयग्रहणस्य भावान्नाव्यवस्थेति चेत् ?
विषयग्रहणार्थानीन्द्रियाणि , विषयग्रहणञ्च वृत्तिनिबन्धनम् , वृत्तय एवेन्द्रियाणि तदन्येषामनुपयोगान्निः प्रमाणकत्वाच्च 1 न च श्रोत्रवृत्तिविषयदेशं गत्वाऽर्थमुपलभते , चाक्षुषप्रतीताविव शब्देऽपि दिक्सन्देहानुपपत्तिप्रसङ्गात् । नापि स्वाश्रयं परित्यज्य गुणस्यागमनमस्ति न च शङ्खवत्तना तेनान्तराले शब्द आरधव्यः , स्पर्शवद्विशेषगुणस्य स्वाश्रयारब्धे द्रव्ये विशेषगुणान्तरारम्भदर्शनात् , शङ्खारब्धस्य च द्रव्यस्य शङ्खश्रोत्रयोरन्तरालेऽनुपलम्भात् ।
न चाप्राप्तस्य ग्रहणमस्ति , अतिप्रसङ्गात् । तस्माच्छङ्खादिगुणत्वे शब्दस्यानुपलब्धिरेव । अस्ति च तदुपलब्धिः , सैव तस्य द्रव्यान्तरगुणत्वं साधयति , यस्मिन्नन्तरालव्यापिनि शब्दस्य शब्दान्तरारम्भक्रमेण श्रोत्रप्रत्यासन्नस्य ग्रहणं स्यात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — थोड़े शब्दों में ही आकाशादि तीनों द्रव्यों का लक्षण कहने के अभिप्राय से ' आकाशकालदिशाम् ' इत्यादि एक ही वाक्य से उन सभी के असाधारण धर्म कहे गये हैं । अभिप्राय यह है कि जातियों की कल्पना आश्रयों की विभिन्नता से ही की जाती है , आकाशादि चूँकि एक एक ही हैं , अतः अपर जातियाँ उनमें न रहने के कारण आकाश , काल और दिक् ये तीनों संज्ञायें पारिभाषिकी हैं । अर्थात् पृथिवीत्वादि अपर जातियों की निमित्तमूलक पृथिव्यादि संज्ञाओं की तरह आकाशादि नैमित्तिक संज्ञायें नहीं हैं । इन तीनों की ये पारिभाषिक संज्ञायें ही औरों को अपेक्षा इनका वैधर्म्य । जैसे कि शाम को गोष्ठ के सामने इकठ्ठी हुई गायों में से उनका रक्षक अपनी इच्छा के अनुसार किसी एक को पकड़ कर अन्दर कर देता है , उसी प्रकार जो संज्ञा किसी निमित्त विशेष की अपेक्षा न करके किसी व्यक्तिविशेष का बोध करा देती है , वही पारिभाषिकी संज्ञा है , जैसे कि देवदत्तादि संज्ञाएँ । जो संज्ञा किसी निमित्तमूलक सङ्केत से स्वार्थ विषयक बोध का उत्पादन करती है , उसे नैमित्तिकी संज्ञा कहते हैं । यही इन दोनों संज्ञाओं में अन्तर है ।
अब इन तीनों में से प्रत्येक का निरूपण करने के लिए ' तत्राकाशस्य गुणाः ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । अर्थात् इन तीनों में से आकाश में शब्द , संख्या , परिमाण , संयोग और विभाग ये छः गुण हैं । फलतः शब्द प्रभृति इन छः गुणों का सम्बन्ध भी आकाश का वैधर्म्य है ।
पृ. १४३
तत्राकाशस्य गुणाः शब्दसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इनमें आकाश के शब्द , संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग और विभाग ये छ : गुण हैं ।
पृ. १४४
शब्दः प्रत्यक्षत्वे सत्य कारणगुणपूर्वकत्वादयावद्द्रव्यभावि त्वादाश्रयादन्यत्रोपलब्धेश्च न स्पर्शवद् विशेषगुणः ।
बाह्येन्द्रिय प्रत्यक्षत्वादात्मान्तरग्राह्यत्वादात्मन्यसमवायादहङ्कारेण विभक्तग्रहणाच्च नात्मगुणः ।
श्रोत्रग्राह्यत्वाद् वैशेषिकगुणभावाच्च न दिक्कालमनसाम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शब्द स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है , क्योंकि वह प्रत्यक्ष का विषय होने पर भी अपने समवायिकारण के गुण से उत्पन्न नहीं होता है , एवं अपने समवायिकारण के अन्तिम समय तक वह नहीं रहता है , एवं अपने आश्रय ( स्पर्शवत् शङ्खादि द्रव्यों ) से अन्यत्र श्रोत्र में उनकी उपलब्धि होती है । शब्द आत्मा का भी गुण नहीं है , क्योंकि उसका प्रत्यक्ष बाह्य इन्द्रिय से होता है । एवं एक ही शब्द विभिन्न आत्माओं से गृहीत होता है । एवं शब्द का समवाय आत्मा में नहीं है । एवं अहङ्कार के साथ ( ' अहं जानामि ' इत्यादि प्रतीतियों में ज्ञान की तरह ) शब्द की प्रतीति नहीं होती है । शब्द दिक् , काल और मन का भी गुण नहीं है , क्योंकि वह विशेष गुण है । इस प्रकार चूँकि शब्द गुण है , अतः
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) आकाश की सत्ता में ही क्या प्रमाण है ? कोई कहते हैं कि प्रत्यक्ष ही इसमें प्रमाण है , क्योंकि आकाश में चिड़ियों के उड़ने के समय चक्षु के व्यापार से इस प्रदेश में पक्षी हैं , उस प्रदेश में नहीं इस प्रकार किसी नियमित अधिकरण में पक्षियों की प्रतीति होती है , किन्तु यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि बिना रूप के द्रव्य आखों से नहीं देखे जाते । उक्त प्रतीति में जो अधिकरणता भासित होती है , उसके सम्बन्ध में अगत्या यही मानना पड़ेगा कि आकाश में फैला हुआ प्रकाशपुञ्ज ही अधिकरणतया भासित होता है , अत : उसकी सत्ता में परिशेषानुमान का प्रदर्शन करने के बाद ' शब्दः प्रत्यक्षत्वे सति ' इत्यादि से प्रतिपादन करते हैं कि शब्द आकाशादि से भिन्न पृथिव्यादि का गुण नहीं है ।
पृ. १४५
परिशेषाद् गुणो भूत्वा आकाशस्याधिगमे लिङ्गम् ।
उक्त परिशेषानुमान के द्वारा आकाश के ज्ञान का हेतु है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
आत्मगुणनिषेधार्थमाह-- बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वादिति । श्रोत्रं तावद् बाह्येन्द्रियं नियमेन बाह्यार्थप्रकाशकत्वाच्चक्षुर्वत् , तद्ग्राह्यश्च शब्दस्तत्प्रतीतेस्तद्भावभावित्वात् । यस्तु बाह्येन्द्रियाग्राह्यो नासावात्मगुणो यथा रूपादि :, तस्मादयमपि न तद्गुण इत्यर्थः । इतोऽपि शब्दो नात्मगुण आत्मान्तरग्राह्यत्वादनेकप्रतित्तृसाधारणत्वादित्यर्थः । या खलु वीणावेण्वादिजा शब्दव्यक्तिः सन्ततिद्वारेणैकेन पुरुषेण प्रतीयते सैवापरेणापि तद्देशवत्तिना प्रतीयते , न त्वेवं सुखादिरित्यात्मगुण वैधर्म्यान्नात्मगुणः । आत्मन्यसमवायादपि शब्दो नात्मगुणः , रूपादिवत् । आत्मन्यसमवायस्तस्यासिद्ध इति चेत् ? न , रूपादिवद् बहिर्मुखतया प्रतीतेरात्मगुणानाञ्चान्तरत्वेनावगमात् । इतश्च नायमात्मगुणः - अहङ्कारेण अहमितिप्रत्ययेन , विभक्तस्य व्यधिकरणस्य ग्रहणात् , यः खल्वात्मगुणः सोऽहङ्कारसमानाधिकरणो गृह्यते , यथा सुख्यहं दुःख्यहमिति , न त्वेवं शब्दस्य ग्रहणमतो नात्मगुणः । प्रियवागहमिति व्यपदेशोऽस्तीति चेत् ? सत्यम् , किन्तु तदधिष्ठानशीलता न तु तद्गुणाधिकरणत्वेन , मृदङ्गादिशब्देषु तथा प्रतीत्यभावात् ।
अस्तु तहि दिशः कालस्य मनसो गुणस्तत्राह - श्रोत्रग्राह्यत्वादिति । किमुक्तं स्यात् ? ये दिक्कालमनसामुभयवादिसिद्धाः संयोगादयस्ते श्रोत्रग्राह्या न भवन्ति , अयन्तु तद्ग्राह्यस्तस्मान्न तद्गुणः | दिक्कालमनसां विशेषगुणो नास्ति , अयन्तु विशेषगुण इतोऽपि तेषां न भवतीत्याह - वैशेषिकगुणभावाच्चेति । शब्दो दिक्कालमनसां गुणो न भवति विशेषगुणत्वात् सुखादिवदिति प्रयोगः ।
नन्वेकस्मिन्नर्थेऽनेक साधनोपन्यासो व्यर्थः , एकेनैव तदर्थपरिच्छेदस्य कृतत्वादिति चेत् ? किमेकप्रमाणावसिते प्रमाणान्तरवैयर्थ्यं फलाभावात् ? पुरुषेणानपेक्षितत्वाद्वा ? न तावत् फलं नास्ति पूर्ववदुत्तरत्रापि तदर्थप्रतीतिभावात् । नापि पुरुषस्यानपेक्षा सर्वत्र । यत्रातिशयमाधुर्य्यात् प्रत्यनुभवं सुखोत्पत्तिः , तत्र दृष्टेऽपि पुनः पुनर्दर्शनाकाङ्क्षा भवत्येव यथाऽत्यन्तप्रियपुत्रादौ । यत्र त्वनपेक्षा तत्रापि पूर्ववदुत्तरस्यापि कारणसद्भावे सति प्रवृत्तस्य न वैयर्थ्यम् , तद्विषयपरिच्छेदे - नैवार्थेनार्थवत्त्वात् । पिष्टपेषणे त्वशक्तभङ्गताप्राप्तौ फलमेव न भवति । अन्यदपि प्रमाणविषयपरिच्छेदमात्रमेवार्थक्रियाया विषयसाध्यत्वात् । एकपरिच्छिन्ने द्वितीयस्य साधकतमत्वाभाव इति चेत् ? न , स्वकाय्यें तस्यैव साधकतम - त्वात् । अन्यथा धारावाहिकं ज्ञानमप्रमाणं स्यात् , विषयस्यानतिरेकात् । प्रतिज्ञानञ्च कालक्षणानामतिसूक्ष्माणामप्रतिभासनात् । न चैवं सत्यनवस्था , उपायाभावे सति विरामादित्यलम् ।
ननु यदि नाम पृथिव्यादिद्रव्याष्टकगुणः शब्दो न भवति तथाप्याकाशस्य सद्भावे किमायातम् ? तत्राह - परिशेषादिति । गुणः शब्दः , गुणश्च गुणिना बिना न भवति , न चैष पृथिव्यादीनां गुणः , द्रव्यान्तरञ्च नास्ति , तस्माद्यस्यायं गुणस्तदाकाशमिति परिशेषादाकाशस्याधिगमे प्रतिपत्तौ लिङ्गमित्यर्थनिर्देशः । प्रयोगः पुनरेवं द्रव्यान्तरगुणः शब्दो गुणत्वे सति पृथिव्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितत्वाद्यस्तु द्रव्यान्तरगुणो न भवति नासौ गुणत्वे सति पृथिव्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितो यथा रूपादिरिति व्यतिरेकी ।
सद्भावप्रतिपादकादेव प्रमाणादाकाशस्य शब्दगुणत्वं तावत् प्रतीतम् । सम्प्रति सङ्ख्यादिगुणत्वप्रतिपादनार्थमाह - शब्दलिङ्गाविशेषादिति । शब्दो लिङ्गमाकाशस्य शब्दश्च सर्वत्राविशिष्ट एक इत्येकरूपमेवाकाशं सिद्धयति , भेदप्रतिपादकप्रमाणाभावादित्यर्थः । ननु शब्दोऽपि तारतरादिरूपेण विविध एव ? सत्यम् , न तु तेन रूपेणास्य लिङ्गता , किन्तु गुणत्वेन तच्चाविशिष्टं नाश्रयभेदावगमाय प्रभवति , एकस्मादप्याश्रयात् कारणभेदेन तारतरादिभेदस्य शब्दस्योत्पत्त्यविरोधात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — जिस प्रकार पट का रूप अपने समवायिकारण पट के आश्रयीभूत तन्तुओं के रूप से उत्पन्न होता है , क्योंकि पट के उत्पन्न होने के बाद ही वह उत्पन्न होता है , उसी प्रकार से शब्द अपने समवायिकारण के आश्रयीभूत द्रव्यगत गब्द से उत्पन्न नहीं होता है , क्योंकि आश्रय की उत्पत्ति के बाद उसकी उत्पत्ति नहीं होती है ।
अतः जिस प्रकार स्पर्श से युक्त पृथिवी , जल , तेज और वायु इन चार द्रव्यों का सुख विशेषगुण नहीं है , उसी प्रकार शब्द भी स्पर्शो से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है । इससे यह शङ्का न करनी चाहिए कि " शब्द अगर उन स्पर्शयुक्त द्रव्यों का विशेषगुण नहीं है , तो विशेषगुण ही नहीं है , किन्तु सामान्य गुण ही है " क्योंकि शब्द परजाति एवं अपरजाति दोनों से युक्त है , एवं श्रोत्ररूप एक ही बाह्येन्द्रिय से गृहीत होता है , अतः वह अवश्य ही विशेषगुण है ।
पार्थिव परमाणु के रूपादि यद्यपि स्पर्शयुक्त द्रव्य के ही गुण हैं , फिर भी ' कारणगुणपूर्वक ' नहीं हैं , अर्थात् अपने आश्रय के समवायिकारण के गुण से उत्पन्न नहीं होते हैं . क्योंकि परमाणु कार्य नहीं है । अतः पार्थिव परमाणु के रूपादि में व्यभिचार वारण के लिए प्रकृत परिशेबानुमान के प्रथम हेतु में ' प्रत्यक्षत्वे सति ' यह विशेषण दिया गया है ।
शब्द चूँकि याद्रव्यभावी नहीं है , अर्थात् अपने समवायिकारणीभूत द्रव्य की अवस्थिति के सभी कालों में नहीं रहता है , क्योंकि ( पूर्वपक्षियों के अभिमत शब्द के आश्रय ) शङ्खादि के रहते हुए भी शब्द नष्ट हो जाते हैं । इसलिए अयावद्द्रव्यभावित्व हेतु से भी समझते हैं कि शब्द स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण नहीं है । यह हेतु भी केवल अपने इस रूप से पार्थिव परमाणु के रूपादि में व्यभिचरित होगा , क्योंकि रूपादि गुणों के आश्रयीभूत
१६ परमाणुओं के रहते हुए भी उन गुणों का नाश हो जाता है , अतः प्रथम हेतु के कथित ' प्रत्यक्षत्वे सति ' इस विशेषण को अनुवृत्ति इस हेतु में भी करनी चाहिए ।
शब्द स्पर्शयुक्त द्रव्यों का गुण नहीं है इसकी सिद्धि के लिए ' आश्रयादन्यत्रोपलब्धेश्च ' इत्यादि से एक और हेतु देते | शब्द को अगर किसी स्पर्शयुक्त द्रव्य का गुण मानें तो जिन शङ्खादि द्रव्यों से शब्द की उत्पत्ति देखी जाती है उन द्रव्यों को शब्द का आश्रय मानना पड़ेगा , किन्तु शब्द तो उन द्रव्यों से दूर कर्णशष्कुली प्रदेश में उपलब्ध होता है । एवं एक द्रव्य का गुण दूसरे द्रव्य में उपलब्ध नहीं होता है , तस्मात् शब्द स्पर्श से युक्त शङ्खादि द्रव्यों का गुण नहीं है ।
( प्र ० ) इन्द्रियाँ संसारमण्डलव्यापी हैं , अतः शङ्खादि देशों में विद्यमान शब्द की ही उपलब्धि होती है । ( उ ० ) अगर इन्द्रियाँ संसारमण्डलव्यापी हों तो फिर दूर की और समीप की वस्तुओं के ग्रहण में कोई अन्तर नहीं होना चाहिए । ( प्र ० ) इन्द्रियाँ यद्यपि व्यापक हैं , किन्तु पुरुषों के उपभोगजनक अदृष्ट से उनमें ' क्षोभ ' अर्थात् कार्य करने योग्य क्रिया उत्पन्न होती है ।
अत : जब अधिष्ठान देश से विषयज्ञान के अनुकूल वृत्तियाँ निकल कर विषयों से सम्बद्ध होती हैं तब इन्द्रियों से विषयों का ग्रहण होता है । अतः दूर और समीप की वस्तुओं के समान रूप से ग्रहण की आपत्ति नहीं है । ( उ ० ) इन्द्रियाँ विषयग्रहण के लिए हैं । विषयों का ग्रहण अगर वृत्तियों से होता है तो फिर वे ही इन्द्रियाँ हैं । उनसे भिन्न किसी का भी उपयोग विषयग्रहण में नहीं है । एवं विषय के ग्रहण में अनुपयोगी कोई भी वस्तु इन्द्रिय नहीं हो सकती है ।
जैसे कि रूप के प्रत्यक्ष के लिए चक्षु की वृत्ति को रूप के प्रदेश में जाना पड़ता है , श्रोत्र की वृत्ति को शब्दश्रवण के लिए उसके प्रदेश में जाने की आवश्यकता नहीं होती है । अगर ऐसा मानें तो रूपादि प्रतीति की तरह शब्द प्रतीति में दिक्सन्देह की उत्पत्ति नहीं होगी । ( अर्थात् यह शब्द पूर्व दिशा से सुन पड़ा है या पश्चिम दिशा से ? इस सन्देह की उपपत्ति नहीं होगी ) । गुण अपने अभय को छोडकर जा भी नहीं सकता है ।
शङ्ख का शब्द श्रोत्र और अपने बीच के शब्दों का कारण नहीं हो सकता , क्योंकि स्पर्श से युक्त द्रव्यों के विशेष गुणों का यह स्वभाव है कि अपने आश्रय से उत्पन्न होनेवाले द्रव्यों के विशेष गुणों का ही वह उत्पादन करें । शङ्ख से उत्पन्न किसी दूसरे द्रव्य की उपलब्धि शङ्ख और श्रोत्र के बीच में नहीं होती है । तथा इन्द्रियों से असम्बद्ध द्रव्यों का प्रत्यक्ष नहीं होता है , ऐसा मान लेने से चक्षुरादि से रसादि की अथवा व्यवहित या दूरस्थ घटादि के प्रत्यक्षत्व की आपत्ति होगी ।
तस्मात् शब्द अगर स्पर्श से युक्त द्रव्यों का विशेष गुण हो तो उसकी उपलब्धि ही नहीं होगी । लेकिन उसकी उपलब्धि होती है । यह उपलब्धि ही यह सिद्ध करती है कि शब्द ऐसे द्रव्य का विशेष गुण है जो शङ्खादि द्रव्य एवं श्रोत्ररूप इन्द्रिय के बीच में रहता है । जिससे कि एक शब्द से दूसरा शब्द दूसरे से तीसरा इस प्रकार शब्द की धारा उत्पन्न होकर उस धारा के श्रोत्र में उत्पन्न शब्द श्रोत्र के साथ सम्बद्ध होकर प्रत्यक्ष का विषय होता है ।
' शब्द आत्मा का गुण नहीं है ' इसका साधक हेतु ' बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वात् ' इस वाक्य से देते हैं । अभिप्राय यह है कि श्रोत्र बाह्येन्द्रिय है , क्योंकि चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियों की तरह वह केवल बाह्य वस्तु का ही प्रकाशक है । शब्द का प्रत्यक्ष श्रोत्र से ही होता है , क्योंकि शब्द प्रत्यक्ष की सत्ता श्रोत्र के अधीन है । जिस गुण का ग्रहण बाह्य इन्द्रिय से होता है वह कभी आत्मा का गुण नहीं हो सकता जैसे कि रूप , तस्मात् शब्द आत्मा का गुण नहीं है ।
' आत्मान्तरग्राह्यत्व ' हेतु से भी समझते हैं कि शब्द आत्मा का गुण नहीं है । ' आत्मान्तरग्राह्यत्व ' शब्द का अर्थ है अनेक पुरुषों से ( एक ही वस्तु का ) गृहीत होना । वीणा , वंशी प्रभृति से उत्पन्न शब्द का शब्दान्तर की उत्पत्ति के धाराक्रम से जैसे एक पुरुष को प्रत्यक्ष होता है , उस देश में विद्यमान और पुरुषों को भी उसी शब्द का उसी क्रम से प्रत्यक्ष होता है । ( आत्मा के गुण ) सुखादि में यह बात नहीं है ।
इस प्रकार शब्द में आत्मा के विशेष गुणों का आत्मान्तराग्राह्यत्व रूप वैधर्म्य रहने के कारण शब्द आत्मा का गुण नहीं है । आत्मा में शब्द का समवाय न रहने के कारण भी शब्द आत्मा का गुण नहीं है , जैसे कि रूपादि । ( प्र ० ) यही सिद्ध नहीं है कि ' आत्मा में शब्द का समवाय नहीं है ' ( उ ० ) रूपादि की प्रतीतियों की तरह शब्द की भी प्रतीति बहिर्मुखी होती है , किन्तु आत्मा के गुणों की प्रतीति अन्तर्मुखी होती है ( तस्मात् शब्द का समवाय आत्मा में नहीं है ) ।
अहम् ' प्रतीति में विषय न होने के कारण से भी समझते हैं कि शब्द आत्मा का गुण नहीं है । अहङ्कार ' से अर्थात् ' अहम् ' इस प्रकार की प्रतीति से शब्द का ' विभक्त ग्रहण ' अर्थात् व्यधिकरण ग्रहण होता है । अभिप्राय यह है कि जैसे ' अहं सुखी ' , ' अहं दुःखी ' इत्यादि ' अहम् ' घटित वाक्यों से सुख दुःखादि की प्रतीति आत्मा के साथ ही होती है । उस प्रकार ' अहं शब्दवान् ' इत्यादि ' अहम् ' पदघटित वाक्यों से शब्द की प्रतीति का अभिलाप नहीं होता है ।
( प्र ० ) ' मैं प्रिय बोलता हूँ ' ऐसा व्यवहार तो होता है । ( उ ० ) इस प्रतीति से इतना ही सिद्ध होता है कि प्रियवाक्य का उच्चारण कर्ता मैं हूँ , इससे आत्मा में प्रियशब्द की अधिकरणता सिद्ध नहीं होती है , क्योंकि मृदङ्गादि के शब्दों में प्रियत्व का व्यवहार होते हुए भी ' मृदङ्गादि प्रियवाक् हैं ' इस आकार का व्यवहार नहीं होता है ।
फिर शब्द को दिक् , काल और मन इन्हीं तीनों द्रब्यों का ही गुण मान लिया जाय ? इसी प्रश्न का समाधानजनक हेतु है श्रोत्रग्राह्यत्वात् ' । ( प्र ० ) इससे क्या अभिप्राय निकला ? ( उ ० ) यही कि दिक , काल और मन इन तीनों के जो सर्वसिद्ध संयोगादि गुण हैं उनमें से किसी का भी ग्रहण क्षेत्र से नहीं होता है । शब्द का ग्रहण श्रोत्र से होता है । तस्मात् शब्द दिगादि तीनों द्रव्यों का भी गुण नहीं है । एवं दिक काल और मन इन तीनों द्रव्यों में कोई भी विशेष गुण नहीं रहता है । शब्द विशेष गुण है , इस हेतु से भी शब्द उनका गुण नहीं है । ' वैशेषिकगुणभावाच्च ' इस हेतुवावय से यही न्यायप्रयोग इष्ट है ।
( प्र ० ) एक ही विषय की सिद्धि के लिए अनेक हेतुओं का प्रयोग व्यर्थं है ? ( उ ० ) इस प्रश्न का क्या आशय है ? ( १ ) एक प्रमाण के द्वारा ज्ञात वस्तु के लिए दूसरे प्रमाण का कथन असङ्गत है ? क्योंकि इससे कोई फल नहीं निकलेगा ? या ( २ ) ज्ञाता को एक प्रमाण से ज्ञात वस्तु के ज्ञान के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है ? अत : दूसरे हेतुओं का कथन असङ्गत है ? पहिली युक्ति इसलिए असङ्गत है कि पहिले हेतु की तरह और हेतुओं से भी साध्य के ज्ञान में कोई अन्तर नहीं होता है ।
दूसरी युक्ति इस लिए ठीक नहीं है कि सभी जगह एक हेतु से ज्ञात वस्तु का ज्ञान पुरुष को अनभीष्ट ही नहीं होता है , क्योंकि जहाँ अतिमाधुर्य के कारण विषय के प्रत्येक अनुभव में विलक्षण सुख की उत्पत्ति होती है , वहाँ उस विषय के ज्ञान के बाद भी फिर से ज्ञान होने की आकाङ्क्षा बनी ही रहती है , जैसे कि अत्यन्त प्रिय पुत्रादि के विषय में ।
जहाँ एक हेतु से ज्ञात वस्तु का ज्ञान अनपेक्षित भी है , वहाँ भी प्रथम हेतु के समान द्वितीय हेतु में भी ज्ञापकत्व समान रूप से है ही , अतः दूसरे हेतु के प्रयोग की प्रवृत्ति भी व्यर्थ नहीं है , क्योंकि अभीष्ट विषय का ज्ञापकत्व ही प्रयोग की सार्थकता है । वह दूसरे हेतुओं के प्रयोगों में भी है ही ।
( प्र ० ) पिसी हुई वस्तु को अगर फिर से पीसने की प्रवृत्ति ठीक हो , तो समाप्ति कभी नहीं होगी , अतः एक हेतु से ज्ञात वस्तु के पुनर्ज्ञापन के लिए दूसरे हेतुओं का प्रयोग व्यर्थ है , क्योंकि अर्थविषयक ज्ञान को छोड़कर हेतु प्रयोग का कोई दूसरा फल भी नहीं है । प्रवृत्ति विषय से होती है , अतः एक प्रमाण से ज्ञात वस्तु के ज्ञान का दूसरा हेतु ' साधकतम ' नहीं है ।
( उ ० ) ( उस प्रमाण से उत्पन्न तद्विषयक दूसरे ज्ञानरूप ) अपने कार्य के प्रति वही साधकतम है , अन्यथा सभी धारावाहिक ( कुछ क्षणों तक निरन्तर उत्पन्न होनेवाले एकविषयक अनेक ) ज्ञान अप्रमा हो जायेंगे क्योंकि उन सभी ज्ञानों का विषय एक ही है । प्रत्येक ज्ञान के आश्रयीभूत प्रत्येक क्षण भी उन धारावाहिक ज्ञान में प्रतिभासित नहीं होते , क्योंकि वे अत्यन्त सूक्ष्म हैं ।
इसी कारण से दूसरे हेतुओं के प्रयोग में अनवस्था दोष भी नहीं है , क्योंकि उपाय के समाप्त हो जानेपर हेतुप्रदर्शन की यह प्रवृत्ति भी समाप्त हो जाएगी । इस विषय में अब इतना ही बहुत है ।
शब्द अगर पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों का गुण न भी यह कैसे
हुआ , तथापि इससे समझा जाय कि यह आकाश का ही गुण है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' परिशेषात् ' इत्यादि से देते हैं । अभिप्राय यह है कि शब्द गुण है , गुण द्रव्य के बिना नहीं रह सकते । शब्द पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों का गुण नहीं है । इनसे भिन्न कोई द्रव्य ( सिद्ध ) नहीं है । तस्मात् शब्दरूप गुण का आश्रय ही आकाश है । आकाश के इस परिशेषानुमान में हेतु है ' शब्द ' | ' प्रत्यक्षत्वे सति ' यहाँ से लेकर ' आकाशस्याधिगमे लिङ्गम् ' यहाँ तक के भाष्यग्रन्थ का यही आशय हैं । इस विषय में अनुमान प्रयोग इस प्रकार है कि शब्द पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों से भिन्न किसी द्रव्य का गुण है , क्योंकि गुण होने पर भी वह पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में आश्रित नहीं है । जो पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों से भिन्न द्रव्य का गुण नहीं हैं , वह पृथिवी प्रभृति आठ द्रव्यों में अनाश्रित भी नहीं है , जैसे कि रूपादि ।
पृ. १५१
शब्दलिङ्गा विशेशादेकत्वं सिद्धम् ।
तदनुविधानादेकप थकत्वम् ।
विभववचनात् परममहत्परिमाणम् ।
शब्दकारणत्ववचनात् संयोगविभागाविति ।
अतो गुणवत्वादनाश्रितत्वाच्च द्रव्यम् ।
समानासमानजातीय-
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सर्वत्र आकाश में चूँकि शब्दरूप चिह्न समान रूप से है , अतः आकाश में एकत्व की सिद्धि होती है । चूँकि आकाश में एकत्व है , अतः एकपृथक्त्व भी है । “ विभववान् महानाकाशस्तथा चात्मा ” ( ७।१।२२ ) इस सूत्र के द्वारा आकाश को वैभवयुक्त कहने के कारण इसमें परममहत् परिमाण भी समझना चाहिए । ' संयोगाद्विभागात् शब्दाच्च शब्दनिष्पत्तिः " ( २२ | ३१ ) महर्षि ने इस सूत्र के द्वारा चूँकि संयोग और विभाग को शब्द का कारण कहा है , अतः उसमें संयोग
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
तदनुविधानादेकपृथक्त्वमिति । एकत्वानुविधानादेकपृथक्त्वम् । अस्ति चाकाशे भेदप्रतिपादकप्रमाणाभावात् सर्वसिद्धमेकत्वम् तेन पृथक्त्वमपि सिद्धमित्यर्थः । केचिद्वस्तुनो निजं स्वरूपमेवैकत्वम् , न तु सङ्ख्याविशेष इत्याहुः । तेषामेको घट इति सहप्रयोगानुपपत्तिः पर्य्यायत्वात् । येऽपि पदार्थानां स्वाभाविकमेकपृथक्त्वमित्याहु :, तेषामपि प्रतियोग्यनुसन्धानरहितस्यैकत्वविकल्पवत् पृथक्त्वविकल्पोऽपि प्राप्नोति न चैवं स्यात् , अयमस्मात् पृथगति पृथक्त्वस्य विकल्पनात् । तस्मान्न तयोरेकत्वम् ।
विभववचनात् परममहत्परिमाणमिति । द्रव्यत्वादावाकाशस्य परिमाणयोगित्वे सिद्धे " विभववान् महानाकाशः " इति सूत्रकारवचनात् परममहत्त्वमाकाशे सिद्धम् । यद्विभु तत्परममहद् , यथात्मा , विभु चाकाशं , तस्मादेतदपि परममहत् । विभुत्वं सर्वगतत्वं तदाकाशस्य कुतः सिद्धमिति चेत् ? सर्वत्र शब्दोत्पादात् , यद्याकाशं व्यापकं न भवति , तदा सर्वत्र शब्दोत्पत्तिर्न स्यात् , समवायिकारणाभावे कार्य्योत्पत्त्यभावात् । दिवि भुव्यन्तरिक्षे चोपजाताः शब्दा एकार्थसमवेताः , शब्दत्वात् , श्रूयमाणाद्यशब्दवत् श्रूयमाणाद्यशब्दयोश्चैकार्थसमवायः कार्य्यकारणभावेन प्रत्येतव्यो व्यधिकरणस्यासमवायिकारणत्वाभावात् ।
शब्दकारणत्ववचनात् संयोगविभागाविति । " संयोगाद्विभागाच्छब्दाच्च शब्दस्य निष्पत्तिः " इति सूत्रेणाकाशगुणं शब्द प्रति संयोगविभागौ कारणमित्युक्तम् । तेनाकाशे संयोगविभागौ सिद्धौ व्यधिकरणस्यासमवायिकारणत्वाभावात् । अतो गुणवत्त्वादनाश्रितत्वाच्च द्रव्यम् । यत आकाशं गुणवद् अतो गुणवत्त्वाद् द्रव्यं घटादिवत् , न केवलं गुणवत्त्वादाकाशं द्रव्यमनाश्रितत्वाच्च परमाणुवत् । समानासमानजातीयकारणाभावाच्च नित्यमिति । समानजातीयं समवायिकारणमसमानजातीयमसमवायिकारणं निमित्तकारणञ्च तेषामभावाशि त्यम् ।
सर्वप्राणिनां शब्दोपलब्धौ निमित्तमिति । नन्वेवं सर्वेषां सर्वशब्दोपलब्धिराकाशस्य सर्वत्राविशेषादत आह- श्रोत्रभावेनेति । किं पुनः श्रोत्रं तत्राह - श्रोत्रं पुनरिति । श्रूयतेऽनेनेति श्रवणं , श्रवणञ्च तद्विवरञ्चेति श्रवणविवरं , तदेव संज्ञा यस्य नभोदेशस्य स नभोदेशः श्रोत्रम् , तत्पिधाने शब्दस्यानुपलम्भात् । तस्य विशेषणमाह - शब्दनिमित्तेत्यादिना । शब्दनिमित्त उपभोग : सुखदःखानुभवस्तस्य प्रापकाभ्यां धर्माधर्म्माभ्यामुपनिबद्धः सहकृत इति ।
अयमर्थः - यस्य बाह्येकै केन्द्रियग्राह्यविशेषगुणग्राहकं यदिन्द्रियं तत्तद्गुणकं यथा रूपग्राहकं चक्षुरूपाधिकरणम् , श्रोत्रञ्च तथाभूतस्य शब्दस्य ग्राहकं तस्मात्तदपि शब्दगुणकम् । शब्दश्चाकाशगुण इति निर्णीतम् , तेनाकाशमेव तावच्छोत्रं तच्च व्यापकमपि न सर्वत्र शब्दमुपलम्भयति प्राणिनामदृष्टवशेन कर्णशष्कुल्यधिष्ठान नियतस्यैव तस्येन्द्रयत्वात् , यथा सर्वगतत्वेऽप्यात्मनो देहप्रदेशे ज्ञातृत्वं नान्यत्र , शरीरस्योपभोगार्थत्वात् , अन्यथा तस्य वैयर्थ्यात् ।
नन्वेवमपि बधिरस्य शब्दोपलब्धिः स्यात् कर्णशष्कुलीसद्भावादत्राह — तस्य चेति । तस्याकाशस्य नित्यत्वेऽप्युपनिबन्धकयोर्धर्माधर्म्मयोः सहकारिभूतयोवँ कल्यादभावाद् बाधिर्य्यम् । इतिशब्दः समाप्तौ ।
कालस्य निरूपणार्थमाह- -काल इति । दिग्विशेषापेक्षया यः परस्तस्मिन्नपर इति प्रत्यय :, यश्चापरस्तस्मिन् पर इति प्रत्ययः परापरयोर्व्यतिकरो व्यत्ययः । तथा च युगपत्प्रत्ययोऽयुगपत्प्रत्ययश्च क्षिप्रप्रत्ययश्चिरप्रत्ययश्च काललिङ्गम् । ननु कालस्याप्रत्यक्षत्वात् तेन सह परापरादिप्रत्ययानां व्याप्तिग्रहणाभावात् कुतो लिङ्गत्वमत आह- तेषामिति । तेषां युगपदादिप्रत्ययानां विषयेषु द्रव्यादिषु पूर्वप्रत्ययविलक्षणानां द्रव्यादिप्रत्यय विलक्षणानामुत्पत्तावन्यस्य निमित्त - स्याभावात् । एतदुक्तं भवति - द्रव्यादिषु विषयेषु पूर्वापरादिप्रत्यया जायन्ते , न चैषां द्रव्यादयो निमित्तं तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात् न च निमित्तमन्तरेण कार्य्यस्योत्पत्तिरस्ति , तस्माद्यदत्र निमित्तं स काल इति ।
आदित्यपरिवर्त्तनाल्पीयस्त्वभूयस्त्वनिबन्धनो युवस्थविरयोः परापरव्यवहार इत्येके , तदयुक्तम् , आदित्यपरिवर्तनस्य युवस्थविरयोः सम्बन्धाभावादसम्बद्धस्य निमित्तत्वे चातिप्रसङ्गात् ।
सहभावो यौगपद्यमित्यपरे , तदसङ्गतम् , कालानभ्युपगमसहार्थाभावात् । कस्याञ्चित् क्रियायां भावानामन्योन्यप्रतियोगित्वं सहार्थ इति चेन्न , अनुत्पन्नस्थितनिरुद्धानामन्योन्यप्रतियोगित्वाभावात् सहभवताञ्च प्रतियोगित्वे कालस्याप्रत्याख्यानमेवेत्युक्तम् । एवमयुगपदादिप्रत्यया अपि समर्थनीयाः । कालस्याभेदात् कथं प्रत्ययभेद इति चेत् ?
सामग्रीभेदात् वस्तुद्वयस्योत्पादसद्भावयोर्यदेकेन ज्ञानेन ग्रहणं तत्सहकारिणा कालेन परापरप्रत्ययौ जन्येते , भूयसामुत्पादव्यापारयोरेकग्रह्णसहकारिणा युगपत्प्रत्ययः , कार्य्यस्योत्पादविनाशयोरन्तर्वत्तिनां क्रियाक्षणानां भूयस्त्वाल्पीयस्त्वग्रहणसहकारिणा चिरक्षिप्रप्रत्ययाविति यथासम्भवं वाच्यम् । ननु तत्तनिबन्धन एवास्तु प्रत्ययभेदः कृतं कालेन ? न , असति तस्मिन् वस्तूत्पादाभावात् । न तावदत्यन्तसतो गगनस्योत्पादः , नाप्यत्यन्तासतो नरविषाणस्य , किन्तु प्रागसतः ।
कालासत्त्वे चाभावविशेषणस्य प्राक्शब्दार्थस्याभावान्नायं विशेष : सिद्धयतीति न कस्यचिदुत्पत्तिः स्यात् । अप्रत्यक्षेण कालेन कथं विशिष्टा प्रतीतिरिति चेत् ? तत्राह कश्चित् - विशिष्ट प्रत्ययस्योत्पत्ताविन्द्रियवत् कारणत्वं कालस्य , न तु दण्डवद् विशेषणत्वमिति , तद्सारम् , बोधैकस्वभावस्य ज्ञानस्य विषयसम्बन्धमन्तरेण विशेषणान्तराभावात् । तस्मादन्यथोच्यते ।
युवस्थविरयोः शरीरावस्थाभेदेन तत्कारणतया कालसंयोगेऽनुमिते स पश्चात्तयोः कालविशिष्टतावगतिः प्रत्येतुरेकत्वात् प्रमाणान्तरोपनीतस्यापि विशेषणत्वाविरोधात् , यथा सुरभि चन्दनमिति । यथा वा मीमांसकानामघट भूतलमिति , घटादिषु तु मूर्त्तद्रव्यत्वेनावस्थाभेदेन वा शरीरवत् कालसम्बन्धेऽनुमिते तद्विशिष्टो युगपदादिप्रत्ययो जातः । पश्चात् कार्य्यत्वादिविप्रतिपन्नं प्रति काललिङ्गत्वमित्यनवद्यम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इस प्रकार शब्द आकाश का साधक व्यतिरेकी हेतु है । आकाश की सत्ता के ज्ञापक प्रमाण से यह भी ज्ञात हो गया कि शब्द आकाश का गुण है । ' शब्दलिङ्गाविशेषात् ' इत्यादि वाक्य से अब यह प्रतिपादन करते हैं कि संख्यादि गुण भी आकाश में हैं । अभिप्राय यह है कि शब्द आकाश का लक्षण है । शब्द सभी स्थानों के आकाश में एक ही प्रकार से है , अतः एक रूप से हो आकाश की सिद्धि होती है , क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि ' आकाश परस्पर भिन्न हैं और अनेक हैं । ( प्र ० ) उच्चमन्दादि भेद से शब्द तो अनेक हैं । ( उ ० ) यह ठीक है कि उच्चमन्दादि भेद से शब्द अनेक प्रकार के हैं , किन्तु मन्दत्वादि उक्त विभिन्न रूपों से तो वह आकाश का लक्षण नहीं है , गुणत्व रूप से ही शब्द आकाश का लक्षण है । गुणत्व तो सभी शब्दों में समान रूप से ही है । । तस्मात् मन्दत्वादि भेद से शब्द का अनेकत्व आकाश के अनेकत्व का ज्ञापक नहीं हो सकता , क्योकि एक ही आश्रय में उक्त अनेक प्रकार के शब्दों की उत्पत्ति हो सकती है , इसमें कोई विरोध नहीं है ।
प्रशतपादभाष्यम् कारणाभावाच्च नित्यम् । सर्वप्राणिनाञ्च शब्दोपलब्धौ निमित्तं श्रोत्रभावेन । श्रोत्रं पुनः श्रवणविवरसंज्ञको नभोदेशः , शब्दनिमित्तोपभोगप्रापकधर्माधर्मोपनिबद्धः । तस्य च नित्यत्वे सत्युपनिबन्धक वै कन्याद् वाधिर्य्यमिति । और विभाग भी समझना चाहिए । गुणवत्त्व और अनाश्रितत्व ( स्वातन्त्र्य ) इन दहेतुओं से आकाश में द्रव्यत्व की सिद्धि होती है । चूँकि आकाश का समान - जातीय या असमानजातीय कोई भी कारण नहीं है , अतः वह नित्य है । श्रोत्ररूप में परिणत होकर वह सभी प्राणियों के शब्द प्रत्यक्ष का कारण है । श्रवण विवर नाम का आकाश प्रदेश ही श्रोत्रेन्द्रिय है । यह श्रोत्र जीव के शब्दप्रत्यक्षमूलक उपभोग के जनक धर्म और अधर्म के साथ सम्बद्ध है , अतः आकाश रूप होने के कारण नित्य होने पर भी धर्म और अधर्म के अभाव से ही उसमें बहरापन आता है ।
आकाश में एकत्व के रहने से यह भी समझते हैं कि उसमें एक पृथक्त्व भी है । अभिप्राय यह है कि आकाश में अनेकत्व का ज्ञापक कोई प्रमाण नहीं है , अतः आकाश में एकत्व फलतः सर्वसिद्ध ही है । एवं एकत्व के रहने से आकाश में एक पृथक्त्व भी है ही । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) द्रव्यों में प्रतीत होनेवाला एकत्व अपने आश्रयीभूत द्रव्य का ही स्वरूप है अतः संख्या नाम का कोई गुण नहीं है | ( उ ० ) किन्तु उनके मत में ' यह एक घट है ' इस प्रकार एक वाक्य में एक साथ ' एक ' शब्द और ' घट शब्द का प्रयोग अनुपपन्न हो जाएगा । क्योंकि उक्त मत में ' एक ' शब्द और ' घट ' शब्द दोनों एक ही अर्थ के बोधक होंगे । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) पृथक्त्व नाम का कोई गुण नहीं है , जिसमें पृथक्त्व की प्रतीति होती है , पृथक्त्व उस आश्रय से अभिन्न है । अतः पृथक्त्व अपने आश्रय का ही स्वरूप है । ( उ ० ) किन्तु पृथक्त्व की प्रतीति उसके प्रतियोगो को प्रतोति के साथ ही होती है । प्रतियोगी के ज्ञान से रहित पुरुषों को पृथक्त्व का ज्ञान नहीं होता है , अतः एकत्व के ज्ञान की तरह पृथक्त्व का ज्ञान भी बिना प्रतियोगी के ही होना चाहिए । चूंकि ' इससे यह पृथक है , इस प्रकार की प्रतीति होती है , अतः पृथक्त्व और उसका आश्रय दोनों एक नहीं हैं ।
" सूत्रकार ने चूँकि आकाश को विभु कहा है , अतः उसमें परममहत्परिमाण की सिद्धि होती है ” अभिप्राय यह है कि चूंकि आकाश द्रव्य है , अतः उसमें परिमाण है । इस प्रकार परिमाण सामान्य के सिद्ध हो जाने पर " विभववान् महानाकाशः " सूत्रकार की इस उक्ति से आकाश में परममहत्परिमाण की सिद्धि होती है । जो विभु है वह अवश्य ही परममहत्परिमाण से युक्त है , जैसे कि आत्मा आकाश विभु है , अतः वह भी परममहत्परिमाण से युक्त है । ( प्र ० ) सभी मूर्त द्रव्यों के साथ संयोग ही ' विभुत्व ' है ।
वह आकाश में किस हेतु से सिद्ध है ? ( उ ० ) सभी स्थानों में शब्दों की उत्पत्ति से । अगर आकाश व्यापक न हो तो सभी स्थानों में शब्दों की उत्पत्ति नहीं होगी , क्योंकि समवायिकारण के न रहने से ( समवेत ) कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है ।
स्वर्ग , मर्त्य और पाताल इन सबों में उत्पन्न सभी शब्द एक ही द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से हैं , क्योंकि सभी ' शब्द ' हैं , जैसे कि श्रूयमाण शब्द और प्रथम शब्द | ' श्रूयमाण शब्द और उसका उत्पादक पहिला शब्द दोनों एक ही आश्रय में रहते हैं ' यह इसी से अनुमान करना चाहिए कि पहिला शब्द श्रूयमाण शब्द का कारण है । क्योंकि विभिन्न स्थानों में रहनेवाली एवं विभिन्न स्थानों में उत्पत्तिशील वस्तु उस स्थान में उत्पन्न होनेवाली वस्तु का असमवायिकारण नहीं हो सकती है ।
" सूत्रकार ने चूँकि आकाश को शब्द का कारण कहा है , अतः आकाश में संयोग और विभाग ये दोनों गुण भी सिद्ध होते हैं । " अर्थात् " संयोगात् विभागात् शब्दाच्च शब्दस्य निष्पत्ति : " इस सूत्र से यह कहा है कि आकाश के गुण शब्द के संयोग और विभाग असमवायिकारण हैं । इसी से आकाश में संयोग और विभाग की भी सिद्धि होती है , क्योंकि एक आश्रय में रहनेवाली वस्तु किसी दूसरे आश्रय में
२० रहनेवाली वस्तु का असमवायिकारण नहीं हो सकती । आकाश चूंकि गुणवान् है और स्वतन्त्र है , अतः द्रव्य है । आकाश में चूँकि गुण है , अतः वह द्रव्य है । केवल गुण ही आकाश में द्रव्यत्व का साधक नहीं है , यतः आकाश ' अनाश्रित ' अर्थात् स्वतन्त्र है , इसलिए भी वह द्रव्य है , जैसे कि परमाणु ! चूंकि उसका समानजातीय अथवा असमानजातीय कोई भी कारण नहीं है , अतः वह नित्य है ( द्रव्य का ) समवायिकारण समानजातीय कारण है , एवं असमवायिकारण और निमित्तकारण दोनों ( द्रव्य के ) असमानजातीय कारण हैं ।
आकाश के इन दोनों में से कोई भी कारण उपलब्ध नहीं है , अतः आकाश नित्य है । वह सभी प्राणियों के शब्द प्रत्यक्ष का कारण है । ( प्र ० ) इस प्रकार तो सभी शब्दों का प्रत्यक्ष चाहिए ? क्योंकि आकाश तो सर्वत्र समानरूप से विद्यमान है । इसीलिए कहा है ' श्रोत्रभावेन ' , अर्थात् श्रोत्ररूप से ही आकाश शब्द प्रत्यक्ष का कारण है । श्रोत्र किसे कहते हैं ? इस प्रश्न का समाधान ' भोत्रं पुन : ' इत्यादि से कहते हैं ।
' भवणविवरसंज्ञकम् ' इस समस्त वाक्य का विग्रह यों है कि ' श्रवणञ्च तद्विवरञ्चेति श्रवणविवरम् तदेव संज्ञा यस्य ' अर्थात् शब्दप्रत्यक्ष का कारण विवर ' रूप आकाश ही ' श्रोत्र ' है , क्योंकि उस विवर के ढँक जानेपर शब्द का प्रत्यक्ष नहीं होता है । ' शब्दनिमित्त ' इत्यादि से उसका विशेश कहते हैं । शब्दमूलक ' उपभोग ' अर्थात् सुखदुःखानुभव के प्रापक जो धर्माधर्म हैं , उनसे युक्त होकर ही श्रोत्र इन्द्रिय है ।
अभिप्राय यह है कि एक ही बाह्य इन्द्रिय से गृहीत होनेवाले जितने भी विशेष गुण हैं , उनकी ग्राहक इन्द्रियाँ भी तत्तद्विशेष गुण से युक्त हैं । जैसे रूप की ग्राहक चक्षुरिन्द्रिय रूप से युक्त है , उसी प्रकार श्रोत्र भी शब्द प्रत्यक्ष का कारण होने से शब्द से युक्त है । अतः उसमें भी शब्द रूप विशेष गुण है ।
कालनिरूपणम्
पृ. १५५
कालः परापरव्यतिकरयौगपद्यायौगपद्यचिरक्षिप्रप्रत्ययलिङ्गम् ।
तेषां ।
विषयेषु पूर्वप्रत्यय विलक्षणानामुत्पत्तावन्यनिमित्ता- भावाद्यदत्र निमित्तं स कालः ।
सर्वकार्याणाञ्चोत्पत्तिस्थितिविनाशहेतुस्तद्व्यपदेशात् ।
क्षणलव निमेपकाष्ठाकला मुहूर्त्तयामाहोरात्रार्द्धमासमासवयनसंवत्सरयुग कल्पमन्वन्तरप्रलय महाप्रलय व्यवहारहेतुः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( एक ही वस्तु में ) परत्व और अपरत्व का वैपरीत्य , एककालिकत्व , एवं विभिन्नकालिकत्व , विलम्ब एवं शीघ्रता इन सबों की प्रतीति रूप हेतुओं से काल का अनुमान होता है । इनमें से प्रत्येक प्रतीति शेष प्रतीतियों से विलक्षण है । प्रतीतिगत इन वैलक्षण्यों का कोई कारण अवश्य है , उसी को ' काल ' कहते हैं । यह सभी उत्पत्तियों और विनाशों का कारण है , क्योंकि सभी उत्पत्ति और विनाश काल से युक्त होकर ही कहे जाते हैं । यह क्षण , लव , निमेष , काष्ठा , कला , मुहूर्त्त , याम , अहोरात्र , पक्ष , मास , ऋतु , अयन , वर्ष , युग , कल्प , मन्वन्तर , प्रलय और महाप्रलय इन सबों के व्यवहार का कारण है ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — यह निर्णय कर चुके हैं कि शब्द आकाश का गुण है , अत : श्रोत्रेन्द्रिय आकाश रूप ही है । व्यापक होनेपर भी उससे सर्वत्र सभी शब्दों का प्रत्यक्ष नहीं होता है , क्योंकि प्राणियों के धर्म और अधर्म से कर्णशष्कुल्यवच्छिन्न आकाश में ही इन्द्रियत्व है । जैसे कि आत्मा में सभी मूर्त द्रव्यों के साथ समान रूप से संयोग रहनेपर भी देहप्रदेशविशिष्ट आत्मा में ही ज्ञान का कर्तृत्व है और प्रदेशों के साथ संयुक्त आत्मा में नहीं , क्योंकि शरीररूप द्रव्य ही भोग का आयतन है । अन्यथा उसकी और कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । ( प्र ० ) इस प्रकार तो बहरे आदमियों को भी शब्द का प्रत्यक्ष होना चाहिए ? इस प्रश्न का समाधान ' तस्य च ' इत्यादि से देते हैं । ' तस्य ' अर्थात् आकाश रूप होने के कारण श्रोत्र के नित्य होनेपर भी उसके सहायक धर्म और अधर्म से ही आदमी बहरे होते हैं । यहाँ ' इति ' शब्द समाप्ति का सूचक है ।
काल का निरूपण करने के लिए ' काल ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । जैसे कि एक स्थान किसी दिशा की अपेक्षा दूर है , उसीमें फिर दूसरी दिशा विशेष की अपेक्षा सामीप्य की भी प्रतीति होती है । एवं कोई स्थान किसी विशेष दिशा से समीप है , उसी में किसी विशेश दिशा से दूरत्व की भी प्रतीति होती है । यही पर और अपरत्व का ' व्यतिकर ' अर्थात् व्यत्यय है । एककालिकत्व और विभिन्नकालिकत्व इन दोनों की प्रतीतियाँ भी काल की ज्ञापक हेतु हैं । ( प्र ० ) काल का तो प्रत्यक्ष नहीं होता है , अतः उन प्रतीतियों के साथ उसकी व्याप्ति गृहीत नहीं हो सकती हैं । अतः वे किस प्रकार हेतु हो सकती हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर ' तेषाम् ' इत्यादि से देते हैं । ' तेषाम् ' काल के ज्ञापक उन प्रतीतियों के विषय द्रव्यादि से विलक्षण इस ज्ञान की उत्पत्ति में काल को छोड़कर और कोई भी कारण नहीं है । इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि द्रव्यादि विषयों में परत्व और अपरत्व की प्रतीतियाँ होती हैं । उनके कारण वे द्रव्य नहीं हैं , क्योंकि केवल द्रव्यादि विषयक प्रतीतियों से परत्वादि विषयक प्रतीति विलक्षण आकार की होती है । निमित्त के बिना कार्य की उत्पत्ति सम्भव नहीं है । तस्मात् उन ( विलक्षण ) प्रतीतियों का कारण ही ' काल ' है ।
कोई कहते हैं कि सूर्य की गति की अधिकता एवं न्यूनता से ही वृद्ध और युवक में परत्व एवं अपरत्व की प्रतीति होती है , किन्तु यह ठीक नहीं है । क्योंकि सूर्य की गति के साथ उस वृद्ध और युवक का कोई भी सम्बन्ध नहीं है । असम्बद्ध पदार्थ को कारण मानने से अतिप्रसङ्ग होगा ।
कोई कहते हैं कि एक साथ रहना हो ' यौगपद्य ' है एक कालिकत्व नहीं , किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि काल के न मानने पर ' सह ' शब्द का कुछ अर्थ हो नहीं होता है । ( प्र ० ) किसी क्रिया में अनेक वस्तुओं का अविरोधित्व ही ' सह शब्द का अर्थ है । ( उ ० ) जिसकी उत्पत्ति नहीं हुई है , एवं जो विद्यमान है , एवं जिसका नाश हो गया हैं , इन तीनों में परस्पर विरोध की कोई सम्भावना ही नहीं है । एक साथ होनेवाले पदार्थों में अगर परस्पर विरोध मानें तो एक काल का न मानना असम्भव ही है ।
इसी प्रकार अयोगपद्य विषयक प्रतीति का भी समर्थन करना चाहिए | ( प्र ० ) काल अगर एक ही है तो तन्मूलक प्रतीतियों में अन्तर क्यों है ? ( उ ० ) कारणों ( सामग्री ) के भेद से । एक वस्तु की उत्पत्ति और दूसरी वस्तु को स्थिति इन दोनों का एक ज्ञान से ग्रहण ही परत्व और अपरत्व की प्रतीति है । यह प्रतीति अपने सहकारी कारण ' काल ' से उत्पन्न होती है । बहुत सी वस्तुओं के उत्पादन आदि व्यापारों के एक ज्ञान का सहकारिकाणीभूत ' काल ' से ही युगपत्प्रत्यय होता है ।
कार्यों की उत्पत्ति और विनाश के बीच की क्रियाओं के आधार जितने क्षण हैं , उन्हीं की न्यूनता और अधिकता से विलम्बत्व और क्षिप्रत्व की प्रतीति होती है । इसी प्रकार और भी कल्पना करनी चाहिए | ( प्र ० ) ( सहकारी काल के अतिरिक्त उनके और ) निमित्तों से ही उन विलक्षण ( युगपदादि ) प्रत्ययों की उत्पत्ति हो ?
( उ ० ) काल की सत्ता न मानने से सभी वस्तुओं की उत्पत्ति ही अनुपपन्न हो जाएगी , क्योंकि अत्यन्त ' सत् ' वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती है , जैसे कि गगनादि की , अत्यन्त असत् वस्तु की भी उत्पत्ति नहीं होती हैं , जैसे कि नरविषाण की । किन्तु ' प्रागसत् ' अर्थात् पहिले से अविद्यमान वस्तु की ही उत्पत्ति होती है । अगर ' काल ' की सत्ता न रहे तो ' प्रागसत् ' शब्द के अर्थ उस अभाव विशेषार्थक असत् शब्द में विशेषण रूप ' प्राक् ' शब्द का कुछ अर्थ ही नहीं होता है ।
इससे अनुत्पत्तिशील गगनादि और अत्यन्त असत् नरविषाणादि से उत्पत्तिशील घटादि में प्रागसत्व ' रूप विशेष की सिद्धि नहीं होगी , अतः उन्हीं अनुत्पत्तिशील वस्तुओं की तरह और सभी वस्तुओं का उत्पादन असम्भव हो जाएगा । ( प्र ० ) अप्रत्यक्ष काल रूप विशेषण से युक्त प्रागसत्त्व रूप विशेषण का ज्ञान ही कैसे होगा ? इस प्रश्न का समाधान कोई यों देते हैं कि प्रागसत्त्व की विशिष्ट प्रतीति में काल इन्द्रियों की तरह ' सामान्य ' कारण है , दण्डादि की तरह विशेष नहीं ।
( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि बोधमात्र स्वभाव के ज्ञानों में विषयों के सम्बन्ध को छोड़कर परस्पर भेद का कोई प्रयोजक नहीं है , अतः उक्त आक्षेप का दूसरा समाधान कहते हैं । बालक और वृद्ध के शरीर की विभिन्न अवस्थाओं से शरीरभेद का अनुमान होता है । एवं इस विभिन्नशरीरता के कारण रूप से काल का अनुमान होता है । उन शरीरों में कालविशिष्टता की प्रतीति होती है । क्योंकि ज्ञाता एक ही है । प्रत्यक्षातिरिक्त प्रमाणों से ज्ञात अर्थों को भी विशेषण मान लेने में कोई बाधा नहीं हैं ।
जैसे कि ' सुरभि चन्दनम् ' इत्यादि स्थलों में , अथवा मीमांसकों के अघटं भूतलम् ' इत्यादि स्थलों में । घटादि द्रव्यों में उक्त शरीर की तरह , अथवा मूर्त्तद्रव्यत्व हेतु से काल का संयोग अनुमित होनेपर एककालिकत्व ( यौगपद्य ) की प्रतीति होती है । उसके बाद काल रूप कारण उन प्रतीतियों से काल का अनुमान होता है । इस प्रकार काल की सत्ता के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवाले पुरुष को काल की सत्ता समझाने के लिए इन यौगपद्यादि प्रतीतियों को हेतु मानने में कोई बाधा नहीं है ।
पृ. १५९
तस्य गुणाः सख्यापरिमाणपृथक्त्व संयोगविभागाः ।
काललिङ्गाविशेषादेकत्वं सिद्धम् ।
तदनुविधानात् पृथक्त्वम् ।
कारणे काल इति वचनात् परममहत्परिमाणम् ।
कारणपरत्वादिति वचनात् संयोगः ।
तद्विनाशकत्वाद् विभाग इति ।
तस्याकाशव द्रव्यत्वनित्यत्वे सिद्धे | काल लिङ्गा विशेषादञ्ज सैकत्वेऽपि सर्वकार्याणामारम्भक्रियाभिनिर्वृत्तिस्थितिनिरोधोपाधिभेदान्मणिवत्पाचकवद्वा नानात्वोपचार इति ।
महत्परिमाण भी समझना चाहिए ।
“ कारणपरत्वात्कारणापरत्वाच्च परत्वापरत्वे "
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसमें संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग और विभाग ये पाँच गुण हैं । कालप्रतीति के ज्ञापक हेतु चूँकि सभी स्थलों में समानरूप से हैं , अतः वह एक ही है । एवं चूँकि उसमें एकत्व संख्या है , अतः पृथक्त्व भी है । “ कारणे कालाख्या " ( ७ | १ | १५ ) इस सूत्र के बल से इसमें ( ७।२।२२ ) इस सूत्र के बल से इसमें संयोग की सिद्धि समझनी चाहिए । विभाग चूँकि संयोग का विनाशक है , अत : विभाग भी काल में है । उसमें आकाश की ही तरह द्रव्यत्व और नित्यत्व भी सिद्ध हैं । चूँकि सभी कालों में उसके ज्ञापक हेतु समान रूप से हैं , अतः यद्यपि वह एक ही है , तथापि सभी क्रियाओं के आरम्भ , स्थिति और समाप्ति आदि उपाधियों से मणि और पाचक की तरह अनेकों जैसा प्रतीत होता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
सर्वकार्याणाञ्चोत्पत्तिविनाशहेतुः । अत्र युक्तिमाह - तद्व्यपदेशादिति । तेन कालेनोत्पत्त्यादीनां व्यपदेशात् उत्पत्तिकालो विनाशकाल इत्यादिव्यपदेशात् कालस्य तत्र हेतुत्वमित्यर्थः । काय्र्यान्तरमपि तस्य कथयतिक्षणलवेत्यादि । निमेषस्य चतुर्थो भागः क्षणः , क्षणद्वयेन लवः , अक्षिपक्ष्मकर्म्मापलक्षितकालो निमेष इत्यादिगणितशास्त्रानुसारेण प्रत्येतव्यम् ।
एवं धम्मणि सिद्ध तस्य गुणान् कथयति - तस्य गुणा इति । कालस्य द्रव्यत्वात् सङ्ख्यादियोगे सिद्धे तद्विशेषप्रतिपादनार्थमाह- काललिङ्गाविशेषादिति । कालस्य लिङ्गानां युगपदादिप्रत्ययानामविशेषादेकत्वम् , कालस्य भेदे प्रमाणान्तराभावादित्यर्थः । ननु युगपदादिप्रत्ययभेद एव तद्भेदप्रतिपादक : ? नैवम् , कालाभेदेऽपि सहकारिभेदात् प्रत्ययभेदोपपत्तेः । तदनुविधानात् पृथक्त्वमिति । एकत्वस्य पृथक्त्वानुविधानं साहच्यर्यनियमः , तेनैकत्वात् पृथक्त्वसिद्धिः । कारणे काल इति वचनात् ।
परममहत्परिमाणमित्यनेन " कारणे कालाख्या " इति सूत्रं लक्षयति । युगपदादिप्रत्ययानां कारणे कालाख्या कालसंज्ञेति सूत्रार्थः । तेन व्यापकः कालो लभ्यते , युगपदादिप्रत्ययानां सर्वत्र भावादित्यभिप्रायः । कारणपरत्वादिति वचनात् संयोग इति । " कारणपरत्वात् कारणापरत्वाच्च परत्वापरत्वे " इति सूत्रे कारणपरत्वशब्देन कालपिण्डसंयोगोऽभिहितः । तेनास्य संयोगगुणत्वं सिद्धम् । तद्विनाशकत्वाद्विभागं इति । तस्य संयोगस्य कृतकत्वादवश्यं विनाशिनो विभागो विनाशकः , सर्वत्राश्रय विनाशाभावात् ।
अतः काले विभाग सिद्धिर्व्यधिकरrer वभागस्याविनाशकत्वात् f । तस्थाकाशवद् द्रव्यत्वनित्यत्वे सिद्धे ( इति ) । यथा गुणवत्त्वादनाश्रितत्वाच्चाकाशं द्रव्यं तथा कालोऽपि । यथा समानासमानजातीयकारणाभावान्नित्यमाकाशं तथा कालोऽपि ।
यद्येकः कालः कथं तत्रानेकव्यपदेश इत्याह- काललिङ्गाविशेषादिति । काललिङ्गानां परापरादिप्रत्ययानामविशेषाद् भेदाप्रतिपादकत्वादञ्जसा मुख्यया वृत्त्या कालस्यैकत्वेऽपि सिद्धे नानात्वोपचारान्नानात्वव्यपदेशः । कुतः ? सर्वेषां कार्य्यणामारम्भ उपक्रमः क्रियाया अभिनिवृत्तिः क्रियायाः परिसमाप्तिः , स्थितिः स्वरूपावस्थानम् , निरोधो विनाशः , एषामुपाधीनां भेदान्नानात्वव्यपदेशः ।
यथैको मणिः स्फटिकादिर्नीलाद्युपाधिभेदान्नील इति पीत इति व्यपदिश्यते तथा कालोऽप्येक एवोपाधिभेदादारम्भकाल इति , क्रियाभिव्यक्तिकाल इति , निरोधकाल इति व्यपदिश्यत इत्यर्थः । मणेरुपाधिसम्बन्धो न वास्तव :, कालस्य तु क्रियासम्बन्धो वास्तव इति प्रतिपादयितुं दृष्टान्तान्तरमाह - पाचकेति । यथैकस्य पुरुषस्य पचनादिक्रियायोगात् पाचक इति , पाठक इति व्यपदेशस्तथा कालस्यापि , न तु प्रारम्भादिक्रियैव काल :, विलक्षण बुद्धिवेद्यत्वादिति ।
युगपदादिप्रत्ययलिङ्गत्वमिव कालस्य पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गत्वं दिशो वैधर्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह - दिक् पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गेति । पूर्वमित्यपरमित्यादिप्रत्ययो लिङ्गं यस्या दिशः सा तथोक्ता । एतदेव दर्शयति- मूर्त्तद्रव्य - मित्यादिना । अमूर्त्तस्य द्रव्यस्य नावधित्वम् , नापि पूर्वापरादिप्रत्ययविषयत्वमस्त्यनवच्छिन्नपरिमाणत्वात् । अत इदमुक्तं मूर्त्तद्रव्यमवधिं कृत्वा , मूर्त्तेष्वेव द्रव्येविदमस्मात् पूर्वेणेत्यादिप्रत्यया यतो भवन्ति सा दिगिति ।
एतस्मादिदं पूर्वमित्यस्मिन्नेवार्थे पूर्वेणेति निर्देशः , प्रातिपदिकार्थे तृतीयोपसङ्ख्यानाद् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' वह सभी कार्यों की उत्पत्ति स्थिति और विनाश जा कारण है । ' तद्वयपदेशात् ' इत्यादि से इसी में हेतु देते हैं । तेन ' अर्थात् उस काल के ' व्यपदेश ' अर्थात् व्यवहारों से । अभिप्राय यह है कि ' इसका यह उत्पत्तिकाल है , इसका यह विनाशकाल है ' इत्यादि व्यवहारों से काल में उत्पत्यादि तीनों के कारणत्व की सिद्धि होती है । ' क्षणलव ' इत्यादि से काल के द्वारा होनेवाले कार्यों को कहते हैं । ' निमेष ' का चौथा भाग ' क्षण ' हैं । दो क्षणों का एक ' लव ' होता है । आँख के पलकों की क्रिया से उपलक्षित काल को ' निमेष ' कहते हैं । ये सभी गणितशास्त्र के द्वारा जानना चाहिए ।
इस प्रकार कालरूप धर्मी के सिद्ध हो जानेपर ' तस्य गुणाः ' इत्यादि से उसके गुण कहे गये हैं । द्रव्यत्व हेतु के द्वारा काल में सामान्य संख्यादि की सिद्धि हो जानेपर उसमें विशेष संख्यादि की सिद्धि के लिए काललिङ्गाविशेषात् ' यह हेतु वाक्य लिखते हैं । अभिप्राय यह है कि काल की ज्ञापक यौगपद्यादि विषयक प्रतीतियाँ सभी कालों में समान रूप से हैं , अतः ' काल ' एक ही है । काल में अनेकत्व का ज्ञापक कोई प्रमाण भी नहीं है । ( sc ) यौगपद्यादि की विभिन्न प्रतीतियाँ काल के अनेकत्व की ज्ञापिका होंगी ? ( प्र ० ) काल के एक मान लेनेपर भी सहकारियों के भेद से उन विभिन्न प्रतीतियों की सिद्धि हो जाएगी । उसके अनुविधान से ही काल में पृथक्त्व भी हैं । अभिप्राय यह है कि एकत्र के साथ ' पृथक्त्व ' का ' अनुविधान ' अर्थात् नियत साहचर्यं है । अतः काल में एकत्व की सिद्धि से पृथक्त्व की सिद्धि समझनी चाहिए ।
' कारणे काल : ' सूत्रकार की इस उक्ति से काल में परममहत्परिमाणवत्त्वरूप विभुत्व की भी सिद्धि समझनी चाहिए । कथित ' उक्ति ' शब्द से " कारणे कालाख्या " ( ७ । १ । २५ ) इस सूत्र को समझना चाहिए । उस सूत्र का यह अर्थ है कि यौगपद्यादि विषयक प्रतीतियों के असाधारण कारण का ही नाम ' काल ' है चूंकि ये यौगपद्यादि की प्रतीतियाँ सभी स्थानों में होती हैं , अतः यह समझना चाहिए कि काल व्यापक है । ' कारणपरत्ववचनात् ' अर्थात् " कारणपरत्वात् कारणापरत्वाच्च परत्वापरत्वे ” ( ७ । २ ।
२२ ) इस सूत्र में महर्षि कणाद के द्वारा प्रयुक्त कारणपरत्व शब्द से काल और पिण्ड ( अवयवी द्रव्य ) का संयोग अभिप्रेत है । इसीसे काल में संयोगरूप गुण की सिद्धि होती है । विभाग चूंकि संयोग का विनाशक है , अतः विभाग भी काल में अवश्य है । अभिप्राय यह है कि संयोग उत्पत्तिशील है , उसके विनाशकों में से विभाग भी एक है क्योंकि सभी जगह संयोग का नाश आश्रय के नाश से ही नहीं होता है । एक अधिकरण में रहनेवाला विभाग अन्य अधिकरण में रहनेवाले संयोग का नाश नहीं कर सकता ।
अतः काल में विभाग भी अवश्य ही है । आकाश की ही तरह इसमें द्रव्यत्व और नित्यत्व भी है , अर्थात् जिस प्रकार अनाश्रितत्व और गुणत्व हेतु से आकाश द्रव्य है , उसी प्रकार उन्हीं हेतुओं से काल भी द्रव्य है । जैसे समानजातीय और असमानजातीय कारणों के अभाव से आकाश नित्य है , वैसे ही काल भी उसी हेतु से नित्य है । यदि काल एक है तो फिर उसमें अनेकत्व की प्रतीति कैसे होती है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' काललिङ्गा विशेषात् ' इत्यादि से देते हैं ।
अभिप्राय यह है कि काल की ज्ञापक यौगपद्यादि प्रतीतियों के ' अविशेष ' से अर्थात् भेदप्रतिपादक प्रमाण के न रहने से ' अञ्जसा ' अर्थात् मुख्यवृत्ति से काल यद्यपि एक ही है , किन्तु लक्षणारूप गौणवृत्ति से उसमें नानात्व का भी व्यवहार होता है , क्योंकि सभी कार्यों का आरम्भ अर्थात् उपक्रम सभी क्रियाओं की ' अभिनिर्वृत्ति ' अर्थात् समाप्ति , ' स्थिति ' अर्थात् अपने रूप से विद्यमानता , ' निरोध ' अर्थात् विनाश , इन उपाधियों की विभिन्नता से एक ही काल में नानात्व का व्यवहार होता है ।
जैसे एक ही मणि स्फटिकादि और नीलादि उपाधियों से कभी नील और कभी पीत प्रतीत होती हैं , वैसे ही उक्त उपाधियों के भेद से एक ही काल कभी आरम्भकाल , कभी क्रिया को अभिव्यक्ति का काल , कभी निरोधकाल इत्यादि नाना रूपों
२१ से व्यवहृत होता है । मणि एवं उपाधियों का सम्बन्ध अवास्तविक है , किन्तु काल और क्रियाका सम्बन्ध तो वास्तविक है , यही दिखलाने के लिए ' पाचक ' इत्यादि सन्दर्भ से प्रकृत विषय के अनुरूप दूसरा दृष्टान्त देते हैं । अर्थात् जिस प्रकार एक ही पुरुष में पाक क्रिया के सम्बन्ध से ' यह पाचक है ' एवं पठन क्रिया के सम्बन्ध से यह पाठक है ' इत्यादि अनेक व्यवहार होते हैं , वैसे ही काल में भी समझना चाहिए । प्रारम्भादि क्रियायें ही काल नहीं हैं , क्योंकि उनसे विलक्षण काल की प्रतीति होती है
जैसे योगपद्यादि प्रतीति से ज्ञात होना काल का असाधारण धर्म है , वैसे ही ' यह पूर्व है , यह पश्चिम इत्यादि प्रतीतियों से ज्ञात होना ' दिक् का असाधारण धर्म है ' यही वैलक्षण्य प्रतिपादन करते हुए ' दिक् पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा ' इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । " पूर्वमपरमित्यादि प्रत्ययो लिङ्गं यस्याः सा पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा " इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसकी ज्ञापक ' यह पूर्व है , यह पश्चिम है ' इत्यादि प्रतीतियाँ हैं ,
दिङ्निरूपणम्
पृ. १६२
दिक पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा ।
मूर्त्तद्रव्यमवधिं कृत्वा मूर्त्तेवेव द्रव्येष्वेतस्मादिदं पूर्वेण दक्षिणेन पश्चिमेनोत्तरेण पूर्वदक्षिणेन दक्षिणापरेणापरोत्तरेणोत्तरपूर्वेण चाधस्तादुपरिष्टाच्चेति दश प्रत्यया यतो भवन्ति सा दिगिति , अन्यनिमित्तासम्भवात् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' यह पूर्व है , यह पश्चिम है ' इत्यादि प्रतीतियों से अनुमित होनेवाला ( द्रव्य ही ) दिक् है । किसी मूर्त्त द्रव्य को अवधि बनाकर किसी दूसरे मूर्त्त द्रव्य में ही इससे यह पूर्व है या इससे यह दक्षिण है , पश्चिम है , उत्तर है , पूर्वदक्षिण है , दक्षिणापर है , अपरोत्तर है , उत्तरपूर्व है , इससे ऊपर है या इससे नीचे है , ये दश प्रकार के ज्ञान जिससे होते हैं उसे ही ' दिक् ' कहते हैं । इन प्रतीतियों का कोई अन्य ( असाधारण ) कारण सम्भव नहीं है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
ननु पूर्वापरादिप्रत्ययानां कार्य्यत्वात्कारणमनुमीयते तत्तु दिगेवेति कुतो निश्चयः ? तत्राह - अन्यनिमित्तासम्भवादिति । न तावत् पूर्वापरादिप्रत्ययानां द्रव्यमात्रं निमित्तम् , यथाकथञ्चिदवस्थिते द्रव्ये तेषामुत्पत्तिप्रसङ्गात् । परस्परापेक्षया द्रव्ययोरुत्पत्तिनिमित्तत्वेऽपि स एव दोषः , उभयाभावप्रसङ्गश्चाधिकः । क्रियागुणादिनिमित्तत्वे च समानगुणक्रियादिषु प्रत्ययविशेषो न स्यात् । तेन यदेषां निमित्तं सा दिगिति । यत्रैतस्मादिदमिति पञ्चमी प्रयुज्यते , अन्यथा सापि निर्विषया स्यात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' पूर्वापरादिप्रत्ययलिङ्गा ' शब्द का अर्थ है । यही ' मूर्तद्रव्यमवधि कृत्वा ' इत्यादि से समझाते हैं । अमूर्त ( आकाशादि ) द्रव्य किसी के अवधि नहीं हो सकते और न वे उक्त पूर्वापरादि प्रत्यय के विषय ही हैं , क्योंकि उनमें परममहत्परिमाण है । अतः ' मूर्त्तद्रव्यमवधिं कृत्वा ' यह वाक्य लिखा है । अर्थात् मूर्त्तद्रव्यों में ही ' यह उससे पूर्व है , अथवा यह उससे पश्चिम है ' इत्यादि प्रतीतियाँ होती हैं । ये प्रतीतियाँ जिससे हों वही ' दिक् ' है ।
' एतस्मादिदं पूर्वम् ' इसी अर्थ में केवल प्रातिपदिक अर्थमात्र के बोधक ' पूर्वेण ' इस पद में प्रातिपदिकार्थ मात्र में तृतीया है । ( प्र ० ) यह ठीक है कि पूर्वापरादि प्रतीतियाँ यतः कार्य हैं , अतः उनका कोई कारण अवश्य है , वह कारण ' दिक् ' ही है यह किस प्रकार निश्चय किया जाय ? इसी प्रश्न का समाधान है । ' अन्यनिमित्तासम्भवात् ' ।
अर्थात् पूर्वापरादि के अवधिभूत वे मूत्तं द्रव्य ही उनकी प्रतीतियों के कारण नहीं हैं , क्योंकि इससे दक्षिणादि दिशाओं में विद्यमान द्रव्य में अनभीष्ट पूर्वापरादि की प्रतीतियाँ होंगी , क्योंकि कारणीभूत मूर्त्त द्रव्य तो है ही । ' दो विरुद्ध दिशाओं में विद्यमान दोनों द्रव्यों में ही एक दूसरे की सहायता से यथायोग्य पूर्वापरादि प्रतीतियाँ होती है ' यह कहने पर उक्त दोष तो है ही , बल्कि इस कथन में उभयाभाव प्रसङ्ग का दोष अधिक १ है ।
द्रव्य में रहने वाले गुणों एवं कर्मों को अगर पूर्वादि प्रत्ययों का कारण मानें तो पूर्व दिशा में विद्यमान द्रव्य में रहनेवाले गुण और क्रिया से युक्त पश्चिम दिशा में विद्यमान मूर्तं द्रव्य में भी पूर्व दिशा की प्रतीति होगी । ' अत्र एतस्मादिदम् ' इस अर्थ में पञ्चमी का प्रयोग हैं । नहीं तो ' अस्मादिदं प्राची ' इत्यादि वाक्यों में प्रयुक्त पञ्चमी का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा । ( 10 ) यदि उक्त पञ्चमी का प्रयोग अवधि के अर्थ में मानें ?
( उ ० ) तो ठीक है , किन्तु बिना दिशा के वह भी सम्भव नहीं है , क्योंकि केवल उक्त मूर्त द्रव्य को ही अवधि मानने से सभी दिशाओं की प्रतीति सभी वस्तुओं में समान रूप से होगी ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. १६३) १. अर्थात् पूर्व प्रत्यय में पश्चिम दिशा में विद्यमान मूत्तं द्रव्य और पूर्व दिशा में विद्यमान सूर्य द्रव्य दोनों को परस्पर सम्मिलित होकर कारण मानें तो पूर्व प्रत्यय एवं पश्चिम प्रत्यय दोनों में से एक की भी उत्पत्ति नहीं होगी । क्योंकि एक प्रत्यय दूसरे प्रत्यय के विषय मूत्तं द्रव्य के अधीन हो जायेंगे । अतः परस्पराश्रयत्वरूप आपत्ति से दोनों प्रत्यय असम्भूत होंगे ।
पृ. १६४
तस्यास्तु गुणाः सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः कालवदेते सिद्धाः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — काल की तरह इसके ( दिशा के ) भी संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग और विभाग ये ही पाँच गुण हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अवधावियं पञ्चमीति चेत् ? सत्यम् , किन्त्वधित्वं दिगपेक्षया , न तु द्रव्यमात्रस्य , सर्वत्राविशेषप्रसङ्गात् । तस्या अप्रत्यक्षत्वेऽपि कालवद् विशिष्ट प्रत्ययहेतुत्वं वाच्यम् । गुणवत्त्वं द्रव्यलक्षणं तदस्यामस्तीति प्रतिपादयन्नाह - तस्यास्तु गुणा इत्यादि । कालवदेते सिद्धाः , यथा काललिङ्गा विशेषात् कालस्यैकत्वं सिद्धं तथा दिग्लिङ्गाविशेषाद् दिश एकत्वम् , यथा तदनुविधानात् काले पृथक्त्वं तथा दिशि यथा कारणे काल इति वचनात् परममहत्परिमाणं तथा कारणे दिगिति वचनाद् दिशः परममहत्परिमाणम् । सर्वत्र तत्काय्र्यस्य पूर्वापरादिप्रत्ययस्य भावात् । यथा कारणपरत्वाच्चेति कालस्य संयोगगुणत्वं प्रतिपादितं तथा दिशोऽपि यथा संयोगविनाशकत्वात् काले विभागः सिद्धस्तथा दिशीत्यतिदेशार्थः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — दिशा स्वयं यद्यपि अप्रत्यक्ष है , फिर भी काल की ही तरह विशिष्ट बुद्धि का कारण है । दिशा में गुणवत्त्व रूप द्रव्य का लक्षण है ' यह प्रतिपादन करते हुए ' तस्यास्तु गुणाः ' इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । ' काल की ही तरह इसमें भी इन गुणों की सत्ता समझी जाती है ' ।
अर्थात् जैसे सभी कालों में यौगपद्यादि प्रत्यय रूप ज्ञापक हेतुओं के समान रूप से रहने के कारण एकत्व संख्या की सिद्धि होती है , वैसे ही सभी दिशाओं में दिशा के ज्ञापक उक्त पूर्वापरादि प्रत्ययों के होने से दिशा में भी एकत्व संख्या की सिद्धि जाननी चाहिए । जैसे एकत्व संख्या की व्याप्ति से काल में एकपृथक्त्व की सिद्धि की है , वैसे ही दिशा में भी एक पृथक्त्व की सिद्धि समझनी चाहिए ।
जैसे ' कारणे काल : ' सूत्रकार की इस उक्ति से काल में परममहत्परिमाण की सिद्धि की गयी है , वैसे ही ' कारणे दिक् ' सूत्रकार की इस उक्ति से दिशा में भी परममहत्परिमाण रूप गुण समझना चाहिए । क्योंकि सर्वत्र दिशा के कार्य पूर्व , पश्चिम आदि प्रतीतियाँ होती हैं । जैसे ' कारणपरत्वाच्च ' इस सूत्र के अनुसार कालका संयोगगुण प्रतिपादित है , वैसे दिशा में भी संयोगगुण समझना चाहिए । जैसे विनाशशील संयोग की सत्ता से काल में विभाग नाम के गुण की सिद्धि की गयी है , वैसे ही दिशा में भी समझना चाहिए ।
यही ' कालवदेते सिद्धा : ' इस अतिदेश वाक्य का अर्थ है ।
पृ. १६५
दिग्लिङ्गा विशेषादञ्जसैकत्वेऽपि दिशः परममहर्षिभिः श्रुतिस्मृति- लोकसंव्यवहारार्थ मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य भगवतः सवितुर्ये संयोगविशेषा लोकपालपरिगृहीतदिक प्रदेशानामन्वर्थाः प्राच्यादिभेदेन दशविधाः संज्ञाः कृताः , अतो भक्त्या दश दिशः सिद्धाः ।
तासामेव देवतापरिग्रहात् पुनर्दश संज्ञा भवन्ति --- माहेन्द्री , वैश्वानरी , याम्या , नैर्ऋती , वारुणी , वायव्या , कौबेरी , ऐशानी , ब्राह्मी , नागी चेति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यतः दिक् के ज्ञापक उक्त प्रतीति रूप सभी हेतु सर्वत्र समान रूप से हैं , अतः यह भी वस्तुतः एक ही है । किन्तु श्रुति स्मृति एवं लोकव्यवहार के लिए मेरु की प्रदक्षिण परिक्रमा करते हुए भगवान् सूर्य के जो संयोग विशेष उनका ही लोकपालों से अधिकृत प्रदेशों का योग के द्वारा बोध करानेवाले प्राची प्रभृति दश नाम महर्षियों ने बनाये हैं । अत गौणवृत्ति से दश दिशाओं का व्यवहार होता है । उन्हीं दिशाओं के ( १ ) माहेन्द्री ( २ ) वैश्वानरी आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मा । तस्य सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षत्वे सति ( ३ ) याम्या ( ४ ) नैर्ऋती ( ७ ) कौबेरी ( ५ ) वारुणी ( ६ ) वायवी ( ८ ) ऐशानी ( ६ ) ब्राह्मी और ( १० ) नागी देवताओ के अधिकारमूलक ये दश ( यौगिक ) नाम और हैं ।
आत्मत्व जांति के सम्बन्ध से ' यह आत्मा है ' यह व्यवहार होता है । आत्मत्व जाति ही आत्माओं का असाधारण धर्म है । वह दुर्लक्ष्य होने के
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
ननु दिग्लिङ्गा विशेषो न सिद्ध :, पूर्वापरादिप्रत्ययानां परस्परतो भेदात् । तथा च सति दिशो भेद इति युक्तम् ? न , एकस्मिन्नेवार्थे युगपद्वस्त्वन्तरापेक्षया पूर्वापरादिप्रत्ययोत्पत्तेः , दिग्भेदे हि यत्पूर्वं न तत्र पश्चिमप्रत्ययो भवेत् । सर्वदिक्सम्बन्धस्तस्यास्तीति चेत् ? तह सर्वार्थेषु सर्वापेक्षया सर्वेषां सर्वे प्रत्ययाः प्रसज्येरन् । न चैवम् , तस्मादेका दिक् , प्रत्यय भेदस्तूपाधिभेदात् ।
पूर्वमादित्यसंयोगस्य तदार्जवावस्थितस्य च द्रव्यस्यान्तराले ( पूर्वेति ) दक्षिति , अस्तमयसंयोगस्य तदार्जवावस्थितस्य च द्रव्यस्यान्तराले पश्चिमेति , यत्रादित्य संयोगो न दृश्यते तत्र मध्याह्नसंयोगप्रगुणावस्थित द्रव्यापेक्षयोत्तरव्यवहारः , तासामन्तरालेषु पूर्वदक्षिणादिव्यवहार इत्युपपद्यते प्रतीतिभेदः । आदित्यसंयोगनिबन्धन एवास्तु प्रत्यय : ? न तस्य मूर्त्तद्रव्यसंयोगाभावात् , असम्बद्धस्य च प्रत्ययहेतुत्वासम्भवात् । एतदेव दर्शयति- दिग्लिङ्गाविशेषादिति ।
दिश एकत्वे स्थिते महर्षिभिः प्राच्यादिभेदेन दशविधाः सञ्ज्ञाः कृताः । कीदृश्यस्ताः ? अन्वर्थाः , अनुगतोऽर्थो यासामिति ता अन्वर्थाः । केषामर्थस्तास्वनुगतः ? लोकपालैरिन्द्रादिभिः परिगृहीतानां संयोग- दिक्प्रदेशानाम् । सवितुर्ये विभागास्तेषामित्यध्याहारः । तथा हि- प्रथममस्यामश्वति सवितेति प्राची । अवागञ्चतीति अवाची । प्रत्यगवतीति प्रतीची । उदगञ्श्वतीति उदीची । किं विशिष्टस्य सवितुः ? मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य , मेरुं प्रदक्षिणं परिभ्रमतः । किमर्थं सञ्ज्ञाः कृताः ?
श्रुतिश्च स्मृतिश्च लोकश्च तेषां सम्यग् व्यवहारार्थम् । श्रौतो व्यवहारः ' न प्रतीचीशिराः शयीत ' इत्यादिः । स्मार्त्तो व्यवहारः ' आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते ' इत्यादिः । लोकव्यवहारः पूर्वं गच्छ , दक्षिणमवलोकय ' इत्यादिः । यतो दश संज्ञाः कृतास्ततो भक्त्या उपचारेण दश दिशः सिद्धा व्यवस्थिताः । माहेन्द्रयादिसंज्ञास्तु नार्थान्तरविषयाः , किन्तु तासामेव निमित्तान्तरवशात् प्रवर्त्तन्त इत्याह- तासामेवेत्यादि । महेन्द्रस्येयमिति माहेन्द्री ।
वैश्वानरस्येयं वैश्वानरीत्यादि सर्वत्र निर्वचनीयम ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) सभी दिशाओं में तो दिग्बुद्धि के वे हेतु एक से नहीं हैं , क्योंकि पूर्वापरादि प्रत्यय परस्पर भिन्न प्रकार के होते हैं । अतः दिशाओं को भी अनेक मानना पड़ेगा । ( उ ० ) यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि एक ही समय एक ही वस्तु में अवधि रूप वस्तुओं के भेद से पूर्वपश्चिमादि नाना प्रतीतियों की उपपत्ति हो सकती है । अगर वे वास्तव में भिन्न हों तो फिर पूर्व दिशा में विद्यामान वस्तु में कभी पश्चिम दिशा की प्रतीति ही नहीं होगी । ( प्र ० ) उस वस्तु में सभी दिशाओं का सम्बन्ध है ? ( उ ० ) तो फिर सभी वस्तुओं में सभी वस्तुओं की अपेक्षा सभी को पूर्वापरादि प्रत्यय होना चाहिए , किन्तु होते नहीं हैं । तस्मात् " दिक " एक ही है । उपाधियों के भेद से उसमें नानात्व की प्रतीति होती है ।
सूर्य का प्रथम संयोगाधिकरण देश एवं उसके सामने के द्रव्य इन दोनों के बीच में पूर्वदिशा की प्रतीति होती है । सूर्य के अस्तकालिक संयोग के प्रदेश एवं उसके सम्मुख द्रव्य के बीच पश्चिम दिशा की प्रतीति होती है । मध्याह्नकालिक सूर्य के संयोगवाले प्रदेश के एक ओर दक्षिण ओर दूसरी ओर उत्तर की प्रतीति होती है । इस प्रकार विभिन्न प्रतीतियों की उपपत्ति होती है । ( प्र ० ) सूर्य के उक्त संयोग से ही पूर्वादि दिशाओं का व्यवहार मान लिया जाय ?
( 30 ) नहीं , क्योंकि उन मूर्त्त द्रव्यों के साथ सूर्य का संयोग सम्बन्ध नहीं है । असम्बद्ध वस्तु ज्ञान का कारण नहीं हो सकती है । यह " दिग्लिङ्गा विशेषात् " से दिखलाते हैं । इस प्रकार दिक् में एकत्व की सिद्धि हो जाने पर भी महर्षियों ने उसकी अन्वर्थ दश संज्ञायें बनायी हैं । ' अनुगतोऽय यासामु ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस संज्ञा का जो यौगिक अर्थ हो , उस वस्तु की वही अन्वर्थ संज्ञा है | ( प्र ० ) किनके अर्थ उन संज्ञाओं में अनुगत हैं ?
इस प्रश्न के समाधान के लिए " इन्द्रादि लोकपालों की अधिकृत दिशाओं के प्रदेश के साथ सूर्य के संयोगों और विभागों का " यह अध्याहार करना चाहिए । ' अस्यां सविता प्रथमञ्चति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' प्राची ' शब्द का अर्थ है कि पूर्व दिशा में सूर्य सबसे पहिले आते हैं , अतः उसका नाम ' प्राची ' है । ' अवागञ्चतीति अवाची ' अर्थात् सूर्य जिस दिशा में पूर्व दिशा से कुटिल गति के द्वारा जाते हैं वही अवाची ' है ।
' प्रत्यगञ्चतीति प्रतीची ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार सूर्य जिस दिशा में सबसे पीछे जाँय वही ' प्रतीची ' है । ' उदगच्चतीति उदीची ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार सूर्य जिस दिशा में सबसे ऊँचे पर् हों वही ' उदीची ' है । किस विशेषण से युक्त सूर्य का ? इस आकाङ्क्षा की पूर्ति के लिए ' मेरुं प्रदक्षिणमावर्त्तमानस्य ' यह वाक्य है । अर्थात् मेरु के चारों तरफ प्रदिक्षण क्रम से घूमते हुए सूर्य का । महर्षियों ने ये संज्ञायें क्यों बनायीं ?
इस प्रश्न के उत्तर के लिए ' श्रुतिस्मृति लोकसंहारार्थ है यह वाक्य लिखा गया है । " श्रुतिश्च , स्मृतिश्च , लोकश्च , तेषां संव्यवहारार्थम् ” इस व्युत्पत्ति के अनुसार अर्थ है कि श्रोत , स्मार्त और लौकिक इन सभी व्यवहारों को अच्छी तरह चलाने के लिए महर्षियों ने उन संज्ञाओं की रचना की । श्रीत व्यवहार का उदाहरण है ' न प्रतीचीशिराः शयीत ' अर्थात् पश्चिम की तरफ शिर रख कर नहीं सोना चाहिए ।
स्मार्त्त व्यवहार का उदाहरण है ' आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते ' अर्थात् आयु की कामना वाले पुरुष को पूर्वाभिमुख होकर भोजन करना चाहिए इत्यादि । लोक व्यवहार का उदाहरण है पूर्व की ओर जाओ दक्षिण की ओर देखो इत्यादि । यत महर्षियों ने दिशा की दश संज्ञायें बनायी हैं , अतः लक्षणा वृत्ति के द्वारा दिशाओं में भी दशत्व का व्यवहार होता है । माहेन्द्री प्रभृति संज्ञाएँ किसी दूसरी वस्तु की नहीं हैं , वे भी दिशाओं को ही दूसरे निमित्त से समझाती हैं । यही ' तासामेव ' इत्यादि से कहते हैं ।
' महेन्द्रस्येयं माहेन्द्री ' अर्थात् जिस दिशा के अधिष्ठाता महेन्द्र हों उस दिशा को माहेन्द्री कहते हैं । ' वैश्वानरस्येयं वैश्वानरी ' इस व्युत्पति के अनुसार जिस दिशा के अधिष्ठाता वैश्वानर ( अग्नि ) हों उस दिशा को वैश्वानरी कहते हैं । इसी प्रकार और संज्ञाओं का भी निर्वचन करना चाहिए ।
In English
Creation and Dissolution of the Four Elements
This commentary on the Prasastapada Bhashya explains the processes of creation and destruction for the four great elements: earth, water, fire, and air. It details the cosmic timeline of Brahma's life and describes how Shiva intervenes to end the suffering of living beings through dissolution.
This article answers
- Process of creation and destruction of mahabhutas?
- How long is a day of brahma in years?
- Purpose of destruction by maheshwara?
- Difference between utpatti and vinasha of elements?