श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य

प्रशस्तपादभाष्य — द्रव्य: आत्मा और मन

11 मूल पद्य

आत्मनिरूपणम्

पृ. १६८

भाष्य ७२

करणैः शब्दाद्युपलब्ध्यनुमितैः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते ।

वास्यादीनां करणानां कर्तृप्रयोज्यत्वदर्शनात् शब्दादिषु प्रसिद्धथा च

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. १६८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 243

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कारण बाह्य इन्द्रियों से गृहीत नहीं होता है । ( १ ) अतः शब्दादि प्रत्यक्ष से अनुमित होनेवाले श्रोत्रादि करणों ( इन्द्रियों ) के द्वारा आत्मा का अनुमान करते हैं । यह देखा जाता है कि बसुला आदि करण बढ़ई रूप कर्ता के सम्बन्ध से ही छेदनादि कार्य करते हैं । ( २ ) शब्दादि विषयक ज्ञानादि क्रियाओं से भी

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

यस्य तत्वज्ञानं निःश्रेयसाय घटते विपर्य्ययज्ञानं संसारहेतुर्यदर्थानि च भूतानि तत्प्रतिपादनार्थमाह - आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मेति । आत्मत्वं नाम सामान्यं तदभिसम्बन्धादात्मेति व्यवहारः । इदमस्येतरेभ्यो वैधर्म्यम् ।

ननु दृश्यस्य सत्त्वं तदाकारसंवेदनेन व्याप्तम् , न चात्माकारं कस्यचित्संवेदनमस्ति , अतो व्यापकानुपलब्ध्या तस्य सत्वमेव निराक्रियत कुतो धर्मनिरूपणमित्याशङ्क्य तत् सद्भावे बाधकं प्रमाणं नास्ति , प्रत्यक्षानुपलब्धेरन्यथासिद्धत्वात् साधकञ्च प्रमाणमनुमानमस्तीति प्रतिपादयन्नाह - तस्येति । प्रत्यक्षोपलब्धियोग्यताविरहः सौक्ष्म्यम् । तस्मादप्रत्यक्षस्यात्मनः करणैः शब्दाद्युपलब्धयः करणसाध्याः क्रियात्वाच्छिदिक्रियावदित्यनुमितैः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते ।

कुत इत्याह- वास्यादीनां करणानां कर्त्तृ प्रयोज्यत्वदर्शनात् । यत्करणं तत् केनचित् प्रतिक्षणविनाशि वा ? यदि नित्यम् ? संज्ञाभेदमात्रम् । अथ क्षणिकम् , चिरानुभूतस्य न स्मरणम् , प्रतिपत्तृभेदात् । यत्तु कार्यकारणभावात् पूर्वक्षणानुभूतस्योत्तरेण स्मरणम् , यत्पुनः पित्रानुभूतस्य पुत्रेणास्मरणम् , तत्र पितृपुत्रज्ञानयो : कार्यकारणभावाभावात् , शरीरयोश्च तथाभूतयोरचेतनत्वात् । तदयुक्तम् , आत्माभावे कार्यकारण भावस्यानिश्चयात् । कारणविज्ञानकाले कार्यज्ञानमनागतम् , तत्काले च कारणमतीतम् ।

न च ताभ्यामन्यः कश्चिदेको द्रष्टास्तीति कस्तयोः क्रमभाविनोः कार्य्यकारणभावं प्रतीयात् ।

यात्मना सह साक्षात् सम्बन्धो नास्ति , विभुत्वात् , तथाप्यात्मना तस्य प्रयोज्यत्वमन्तःकरणाधिष्ठानद्वारेण यथा हस्तेन सन्दंशयोगिना तत्संयुक्तस्यायः पिण्डस्य संयोगः । करणत्वञ्च श्रोत्रादीनां नियतार्थस्य ग्राहकत्वात् , प्रदीपवत् । यद्यप्यात्मा अहंममेति स्वकर्मोपार्जित कार्यकारणसम्बन्धोपाधिकृत कर्त्तृ तास्वामित्वरूपसभिन्नो मनसा संवेद्यते , तथाप्यत्राप्रत्यक्षत्ववाचोयुक्तिर्बाह्येन्द्रियाभिप्रायेण ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — जिसका तत्त्वज्ञान निःश्रेयस ( मोक्ष ) का कारण है , एवं जिसका विपर्यय ( मिथ्याज्ञान ) संसार का कारण है , एवं जिसके उपभोग के लिए ये भौतिक वर्ग हैं , उसी के प्रतिपादन के लिए ' आत्मत्वाभिसम्बन्धादात्मा ' यह सन्दर्भ लिखते हैं । ' आत्मत्व ' शब्द का अर्थ है आत्मत्व नाम की जाति । उसी के सम्बन्ध से ' यह आत्मा है ' इस प्रकार का व्यवहार होता है । यह ' आत्मत्व ' जाति ही अन्य पदार्थों की अपेक्षा आत्मा का वैधर्म्य असाधारणधर्म या इतरभेदानुमितिजनक हेतु है ।

( प्र ० 2 ) उसी वस्तु की सत्ता स्वीकार की जाती है . जो अपने आकार द्वारा ज्ञान का विषय हो , किन्तु आत्मा का कोई भी आकार उपलब्ध नहीं है , अतः अस्तित्व के व्यापक ' स्वाकारविषयत्व ' के अभाव से हम आत्मा के अस्तित्व का ही खण्डन करते हैं । फिर उसके धर्मों का निरूपण क्यों ? इस शङ्का के दो समाधान करते हैं एकतो आत्मा की सत्ता में बाधा डालने वाला कोई प्रमाण ही नहीं है । ' प्रत्यक्षानुपलब्धेः ' हेतु अन्यथासिद्ध है अर्थात् आत्मत्वाभावका साधक नहीं है ।

क्योंकि बाह्य इन्द्रियों से आत्मा का प्रत्यक्ष न होने का कोई अन्य ही हेतु है , आत्मा की असत्ता नहीं । दूसरे आत्मा की सत्ता का ज्ञापक अनुमान प्रमाण है । आत्मा की असत्त्वापत्ति का समाधान करते हुए तस्य ' इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ज्ञात होने की अयोग्यता ही ' सौक्ष्म्य ' शब्द का अर्थ है | अत : ( १ ) प्रत्यक्ष से ज्ञात न होने पर भी ' श्रोत्रादि करणों से ' शब्दादि की ये उपलब्धियाँ करणजन्य हैं , क्योंकि ये भी क्रियारूप हैं ।

जैसे कि छेदनादि क्रिया ' इस प्रकार के अनुमानों से सिद्ध श्रोत्र आदि करणों के द्वारा आत्मा का अनुमान होता है । कैसे होता है ? इस प्रश्न का समाधान ' वास्यादीनाम् ' इत्यादि से करते हैं । कर्ता के द्वारा ही करण कार्य में प्रवृत्त होते हैं । कर्त्रा प्रयुज्यते कार्ये व्यापार्यते , यथा वास्यादिकं वर्धकिणा । करणञ्च श्रोत्रादिकं तस्मात् केनचित् प्रयोक्तव्यं य एषां प्रयोक्ता स आत्मा । आकाशस्य श्रोत्रस्य

शब्दादिषु प्रसिद्धया च प्रसाधकोऽनुमीयते । शब्दादिषु विषयेषु

" प्रसिद्धिर्ज्ञानं तत्रापि प्रसाधको ज्ञातानुमीयते । ज्ञानं क्वचिदाश्रितं , क्रियात्वात् , छिदिक्रियावत् यत्रेदमाश्रितं स आत्मा ।

अथेदं स्वयमेव जानाति , न पराश्रितमिति चेत् ? किमिदं नित्यम् ? जैसे बढ़ई के द्वारा वसुला प्रभृति करण । श्रोत्रादि इन्द्रियाँ भी करण हैं । अतः उनका भी कोई प्रयोग करनेवाला चाहिए । वह प्रयोक्ता ही आत्मा है । यद्यपि श्रोत्र आकाश रूप होने के कारण त्रिभु है । एवं आत्मा भी विभु है । दो विभु किसी भी साक्षात् सम्बन्ध से परस्पर सम्बद्ध नहीं हो सकते , तथापि आत्मा से अधिष्ठित मन के साथ सम्बन्ध के द्वारा आत्मा में श्रोत्र रूप करण का भी प्रयोज्यकर्तृत्व है ।

जैसे कि तपे हुए लोहे को बढ़ई सोधे हाथ से नहीं छूता । हाथ से सड़सी को और सड़सी से तपे हुए लोहे को , तब भी हाथ में प्रयोज्यकर्तृत्त्व रहता ही है , क्योंकि चिमटे से संयुक्त लोहे के साथ भी चिमटे से संयुक्त हाथ का भी सम्बन्ध है हो । श्रोत्र शब्द- प्रत्यक्ष का ही करण है दूसरे प्रत्यक्ष का नहीं । चक्षुरूप प्रत्यक्ष का ही करण है रसादि का नहीं । अतः इन्द्रियाँ प्रदीप की तरह नियत अर्थों की ही प्रकाशक होने से ' करण ' हैं ।

यद्यपि अपने कर्मों से उपार्जित शरीर एवं इन्द्रियादि के सम्बन्ध रूप उपाधि के द्वारा स्वामित्व मिश्रित कर्तृत्त्व रूप से आत्मा मानसप्रत्यक्ष का भी विषय है , क्योंकि हम जानते हैं कि यह मेरा शरीर है , मेरी आँखें सुन्दर हैं , अतः अप्रत्यक्षत्व की युक्तियाँ बाह्य प्रत्यक्ष के अभिप्राय से कही गई समझनी चाहिए |

( २ ) शब्द दिषु प्रसिद्धया च प्रसाधको ज्ञातानुमीयते ' अर्थात् शब्दादि रूप विषयों में जो ' प्रसिद्धि ' अर्थात् ज्ञान , उससे आत्मा का अनुमान होता है । जैसे कि ज्ञान कहीं पर आश्रित है , क्योंकि वह क्रिया है । जैसे कि छेदनादि क्रिया । यह ज्ञान रूप क्रिया जहाँ पर आश्रित है वही ' आत्मा ' है ।

( प्र ० ) यह ज्ञान स्वयं ही विषय को समझ लेता है , इसके लिए इसे किसी . दूसरी वस्तु में आश्रित होने की आवश्यकता नहीं होती है । ( उ ० ) यह ज्ञान नित्य

२२ है , या प्रशिक्षण विनाशशील ? अगर नित्य है तो फिर फलतः आत्मा ही है , केवल नाम का अन्तर है । अगर प्रतिक्षण विनाशशील है तो फिर बहुत दिन पहिले अनुभूत विषय का आज स्मरण नहीं होगा क्योंकि स्मृति और अनुभव के कर्ता ( प्रकृत में ) भिन्न हैं , ( किन्तु अनुभव और स्मृति दोनों का एक ही कर्ता होना चाहिए ) ( प्र ० ) पहिले जिस विषय का ज्ञान चक्षुरादि से होता है , वहीं अपने विनाश काल के उत्तर क्षण में उसी विषय के दूसरे ज्ञान को जन्म देता है , फलतः कारणीभूत ज्ञान से ही अनुभूत विषय का स्मरण होता है । ' पिता से अनुभूत विषय का स्मरण पुत्र को नहीं होता हैं ' इसमें यह हेतु है कि पितृविज्ञान पुत्रविज्ञान का कारण नहीं है । पितृशरीर पुत्रशरीर का कारण हैं , किन्तु शरीर अचेतन हैं । ( उ ० ) आत्मा अगर न माना जाय तो दोनों विज्ञानों में कार्यकारणभाव है , यही निश्चय नहीं हो पायेगा । क्योंकि जिस क्षण में कारणविज्ञान है , उस समय कार्यविज्ञान भविष्य के ही गर्भ में रहता है | जिस क्षण में कार्यविज्ञान की सत्ता रहती है , उसी क्षण कारणविज्ञान का नाश हो जाता है । उन दोनों से भिन्न देखनेवाला कोई नही है , फिर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले उन दोनों विज्ञानों के कार्यकारणभाव को कौन समझे ?

( प्र ० ) विज्ञान जिस प्रकार विषयों को समझता है , उसी प्रकार अपने स्वरूप को भी समझता है । कारणविज्ञान का कारणत्व हो स्वरूप है , फिर कारणविज्ञान ही अपने से अभिन्न कारणत्व को भी समझता है । इसी प्रकार उत्तरकाल में होनेवाले कार्यविज्ञान को भी कार्यत्व का ज्ञान है । फलतः कारणविज्ञान को कारणत्व का ज्ञान है और कार्यविज्ञान को कार्यत्व का ज्ञान है । फिर दोनों विज्ञानों से वासना रूप विलक्षण बल से युक्त ' विकल्प ' नाम के ज्ञान की उत्पति होती है । उससे ही कार्यकारणभाव गृहीत होता है ।

पृ. १७१

भाष्य ७३

प्रसाधको को नुमीयते ।

न शरीरेन्द्रिय मनसाम् , अज्ञत्वात् ।

न शरीरस्य चैतन्यम् , घटादिवद् भूतकार्यत्वात् मृते चासम्भवात् ।

नेन्द्रियाणाम् , करणत्वात् ,

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. १७१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 246

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उक्त क्रिया के आश्रय रूप कारण आत्मा का अनुमान करते हैं । यह आश्रयत्व ( कर्त्तृत्व ) शरीर , इन्द्रिय एवं मन इन तीनों में सम्भव नहीं है , क्योंकि वे अज्ञ ( जड़ ) हैं | चैतन्य ( ज्ञान ) शरीर का धर्म नहीं है , क्योंकि वह ( शरीर ) घटादि की तरह भूत द्रव्य से उत्पन्न होता है । एवं मृत शरीर में ज्ञान सम्भव भी नहीं हैं । वह ( चैतन्य ) इन्द्रियों का भी धर्म नहीं है , क्योंकि वे ( ज्ञानक्रिया के ) करण हैं । एवं इन्द्रियों

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अथ मतम् , स्वात्मग्राहिणी पूर्वा बुद्धिः स्वात्माव्यतिरिक्तिं स्वस्य कारणत्वमतिरूपं गोचरयति । उत्तरापि बुद्धिः स्वरूपविषया तदव्यतिरिक्तमात्मीयं कार्य्यत्वमपि गृहणाति , ताभ्याञ्च प्रत्येकमुपात्तं कारणत्वं कार्यत्वं च तदुभयजनितैकवासनाबलभुवा विकल्पेनाध्यवसीयत इति चेत् ? अहो कुसृष्टिकल्पना ? पूर्वोत्तरधियौ स्वात्ममात्रनियते , कुतस्तस्याः कारणहमस्याचास्मि कार्य्यमिति प्रतीयेताम् परस्परवार्त्तानभिज्ञत्वात् । ताभ्यामगृहीतं कुतो - ऽध्यवस्यति , तस्यानुभवानुसारित्वात् भवतु पराश्रितं ज्ञानम् , तदधिकरणन्तु शरीरमिन्द्रियं मनो वा भविष्यति । तत्राह - न शरीरेन्द्रियमनसामिति । उत्तरवाक्यस्थितं चैतन्यमिति पदमिह सम्बद्धयते । शरीरेन्द्रियमनसां चैतन्यं न भवति , कुतस्तत्राह अज्ञत्वादिति । ज्ञानं प्रति समवायिकारणत्वाभावादित्यर्थः ।

नन्वेतदपि साध्याविशिष्टमित्याशङ्कयाह - न शरीरस्येति । चैतन्यं शरीरस्य न भवति घटादिवच्छरीरस्य भूतकार्य्यत्वात् , यद् भूतकार्यं न तच्चेतनं , यथा घटः । भूतकार्य्यञ्च शरीरम् , तस्मादेतदप्यचेतनम् । युक्त्यन्तरमाह-- मृते चासम्भवादिति । मृते शरीरे चैतन्यस्यासम्भवादित्यनेनायावद्द्रव्यभावित्वं विवक्षितम् । चैतन्यं शरीरस्य विशेषगुणो न भवति , अयावद्द्रव्यभावित्वात् संयोगवत् । अत एव तत्कारणान्यप्यचेतनानि तेषां चैतन्ये कार्य्येऽपि चैतन्यं स्यात् । एकस्मिन् शरीरे ज्ञातृबहुत्वञ्च प्राप्नोति । ततश्चैकाभिप्रायेण प्रवृत्तिनियमाभावादिदोषः । नेन्द्रियाणां करणत्वादिति । इन्द्रियाण्यचेतनानि करणत्वाद्दण्डवत् ।

हेत्वन्तरञ्च समुच्चिनोति - उपहतेष्विति । विनष्टेष्वपीन्द्रियेषु पूर्वानुभूतोऽर्थः स्मर्य्यते , न चानुभवितरि विनष्टे स्मरणं युक्तम् , तस्मान्नेन्द्रियगुण । ज्ञानम् । न च विषयस्य पूर्वानुभूतस्यासान्निध्येऽपि स्मृतिर्दृष्टा , बाह्येन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वात् । तस्मात् स्मृतिस्तावन्नेन्द्रियाणाम् । तदभावादनुभवोऽपि न स्यादन्यस्यानुभवेऽन्यस्यास्मरणादित्यर्थः । अत एव विषयस्यापि न चैतन्यम् , नष्टे विषये तत्स्मरणायोगात् । इतोऽपि न तस्य चैतन्यम् , तद्देशज्ञानस्य तज्जन्यस्य च सुखादे - रननुभवात् , बुद्धिपूर्व्व कचेष्टाविशेषाभावाच्च । न चेन्द्रियचैतन्ये विषयचैतन्ये च रूपमद्राक्षं रसमन्वभवं स्पर्शं स्पृशामि गन्धं प्रास्यामीति रूपादिप्रत्ययानामेकरूपत्वप्रतिपत्तिसम्भवः , रूपादीनां चक्षुरादीनाञ्च भेदात् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( उ ० ) एक तो यह कल्पना ही बड़ी विचित्र है कि वे दोनों ज्ञान अपने स्वरूप को समझ सकते हैं । फिर पूर्वविज्ञान को यह भान ही कैसे होगा कि ' उत्तरविज्ञान का कारण मैं ही हूँ ' । एवं उत्तरविज्ञान को भी यह कैसे पता चलेगा कि ' मैं पूर्वविज्ञान का कार्य & | क्योंकि दोनों ही अपने से भिन्न किसी भी विज्ञान के स्वरूप और प्रभाव से अनभिज्ञ हैं । फिर दोनों विज्ञानों से अगृहीत कार्यकारणभाव का निश्चय कैसे होगा ? क्योंकि निश्चय अनुभवमूलक है । ( प्र ० ) मान लिया कि ज्ञान का अपने से भिन्न कोई आश्रय है । किन्तु वह आश्रय शरीर , इन्द्रिय एवं मन भी हो सकता है ? इसी प्रश्न के उत्तर में " शरीरेन्द्रियमनसाम् " इत्यादि पंक्ति लिखते हैं । इस वाक्य के आगे लिखित ' न शरीरस्य चैतन्यम् ' इस वाक्य के चैतन्य पद का अनुसन्धान करके प्रकृत वाक्य को ' न शरीरेन्द्रियमनसां चैतन्यम् ' इस प्रकार पढ़ना चाहिए । उक्त प्रश्न का ही ' अज्ञत्वात् ' इत्यादि से समाधान करते हैं । अर्थात् शरीरादि ज्ञान के समवायिकारण नहीं हैं ।

किन्तु यह भी तो सिद्ध नहीं है , किन्तु साध्य ही है , अतः ' शरीरादि प्रत्येक

चैतन्य नहीं है ' यह प्रतिपादन करने के लिए " न शरीरस्य " इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । शरीर में चैतन्य नहीं है , क्योंकि वह घटादि जड़ द्रव्यों की तरह भूत द्रव्य का कार्य जितने भी कार्य भूतद्रव्यों से उत्पन्न होते हैं वे सभी अचेतन ही होते हैं , जैसे कि घटादि । शरीर भी भूत द्रव्य का ही कार्य है , अतः उसमें भी चैतन्य नहीं है । ' मृते चासम्भवात् ' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में दूसरा हेतु देते हैं कि मृत शरीर में चैतन्य असम्भव है । इससे यह अनुमान अभीष्ट है कि चैतन्य ( ज्ञान ) शरीर का विशेषगुण नहीं है क्योंकि वह अयावद्द्रव्यभावी है , जैसे कि संयोग । इसी हेतु से शरीर के अवयवों में भी चैतन्य नहीं है । यदि वे चेतन होते तो उनका कार्य शरीर भी चेतन होता । शरीर के अवयवों को अगर चेतन मान लें तो फिर एक ही शरीर में अनेक ज्ञाताओं की सत्ता माननी पड़ेगी । जिससे एक अभिप्राय के द्वारा नियमित प्रवृत्त्यादि की अनुपपत्ति होगी । ' नेन्द्रियाणां करणत्वात् ' इन्द्रियाँ अचेतन हैं , क्योंकि करण हैं , जैसे कि दण्डादि ।

' उपहतेषु ' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में दूसरा हेतु देते हैं । इन्द्रियों के नाश हो जाने पर भी उनके द्वारा अनुभूत विषयों को स्मृति होती है । फिर तो अनुभव करने वाली इन्द्रिय का नाश हो जाने पर उससे अनुभूत विषयों का स्मरण होना उचित नहीं है , अतः ज्ञान इन्द्रियों का गुण नहीं है । ( इस में एक युक्ति यह भी है कि ) इन्द्रियों का यह स्वभाव है कि जिस विषय के साथ उन का सम्बन्ध विद्यमान रहता है , उसी विषय के ज्ञान का वह उत्पादनकरती हैं । किन्तु जिस समय जिस विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध न भी रहे उस समय भी उस विषय की स्मृति होती है , अतः स्मृतियों की उत्पत्ति इन्द्रियों से नहीं होती है । इन्द्रियों में अनुभव करने की क्षमता भी नहीं है , क्योंकि अनुभव करने की एवं स्मरण करने की क्षमता एक ही वस्तु में होनी चाहिए । यह कभी नहीं होता कि अनुभव कोई करे एवं स्मृति किसी और को हो । ठीक इन्हीं कारणों से विषयों में भी चैतन्य नहीं स्वीकार किया जाता , क्योंकि विषयों के नष्ट हो जाने पर भी उनकी स्मृति होती है ।

पृ. १७३

भाष्य ७४

उपहतेषु विषयासान्निध्ये चानुस्मृतिदर्शनात् ।

नापि मनसः , करणान्तरानपेक्षित्वे युगपदालोचनस्मृतिप्रसङ्गात् स्वयं करणभावाच्च ।

परि- शेषादात्मकार्यत्वात्तेनात्मा समधिगम्यते ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. १७३प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 248

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — का सामीप्य न रहने पर या इन्द्रियों के नष्ट हो जाने पर भी स्मृति की उत्पत्ति देखी जाती है । ज्ञान मन का भी धर्म नहीं है , क्योंकि मन को अगर ( चक्षुरादि ) अन्य कारणों से निरपेक्ष होकर ज्ञान का समवायिकारण मानें तो फिर एक ही समय एक ही व्यक्ति को आलोचनज्ञान और स्मृति दोनों होंगी । एवं मन स्वयं करण है ( अतः कर्त्ता नहीं हो सकता ) । परिशेषानुमान के द्वारा यतः ज्ञान आत्मा रूप कारण का कार्य है , अतः ज्ञान रूप कार्य से आत्मा रूप कारण को समझते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अस्तु तर्हि मनोगुणो ज्ञानम् ? तस्य सर्वविषयत्वे नित्यत्वे च प्रतिसन्धानाद्युपपत्तंस्तत्राह - नापि मनस इति । मनो यदि चक्षुरादिविविक्तं कारणान्तरमपेक्ष्य रूपादीन् प्रत्येति , सञ्ज्ञाभेदमात्रे विवादः , यदपेक्षणीयं तन्मनो यच्च ज्ञानाधिकरणं मनः सोऽस्माकमात्मेति । अथ नापेक्षते करणान्तरम् , तदा रूपरसादिष्विन्द्रियसम्बद्धेषु युगपदालोचनानि प्रसज्यन्ते , कारणयौगपद्यात् । कारणान्तरापेक्षायां तु तस्याणुत्वे सर्वन्द्रियेषु सान्निध्याभावाद्युगपदालोचनानुत्पत्तिः । अथान्तःकरणाभावो युगपत्स्नरणानि स्युरपेक्षणीभावात् करणापेक्षायां तु तत्संयोगस्य युगपदसामर्थ्यात् क्रमेण स्मृत्युत्पत्तिः ।

यत्तूक्तं केनचिदेकस्य नित्यस्य क्रमयौगपद्याभ्यामकरणमिति ! तदयुक्तम् , युगपत्करणासम्भवात् , उत्तरकालमकरणश्व कर्त्तव्याभावात् ! न च तावता तस्य सत्त्वम् , अर्थक्रियाकारित्वव्यतिरिक्तस्य सत्त्वस्येष्टत्वात् ।

इतोऽपि मनोगुणो ज्ञानं न भवति , मनसः स्वयं करणत्वादित्याह - स्वयं करणभावाच्चेति । मनश्चेतनं न भवति करणत्वाद् घटादिवदिति । असिद्धं मनसः करणत्वम् कर्तृ त्वाभ्युपगमादिति चेत् ? मनसः कर्त्तृत्वे रूपादिप्रतीतौ चक्षुरादिवत् सुखादिप्रतीत करणान्तरं मृग्यं क्रियायाः करणमन्तरेणानुपजननात् । तथा सति च सञ्ज्ञाभेदमात्रम् , कर्तुःकरणस्य चोभयोरपि सिद्धत्वात् ।

इतोऽप्यचेतनं मनोमूर्त्तत्वाल्लोष्टवत् । यदि शरीरेन्द्रियमनसां गुणो ज्ञानं न भवति , तथाप्यात्मसिद्धौ किमायातं तत्राह --- परिशेषादिति । ज्ञानं तावत् कार्यत्वात् कस्यचित् समवायिकरणस्य कार्य्यम् , शरीरेन्द्रियमनसाञ्च तदाश्रयत्वं प्रतिषिद्धम् । न चान्येषु वक्ष्यमाणेन न्यायेन ज्ञानकारणत्वं प्रति शक्तिरस्ति , अतः परिशेषादात्मकार्य्यं ज्ञानम् । आत्मकार्य्यत्वात्तेन ज्ञानेनात्मा समधिगम्यत इत्युपसंहारः ।

ननु सर्वमेतदसम्बद्धम् , क्षणिकत्वेनाश्रयाश्रयिभावाभावात् । तथा हिसत्त्वमर्थक्रियाकारित्वम् , तच्च क्रमयौगपद्याभ्यां व्याप्तम् , क्रमाक्रमानात्मकस्य प्रकारान्तरस्यासम्भवात् । अनेकार्थक्रियाणामनेककालता हि क्रमः , यौगपद्यं चैककालता । न चैकाने काभ्यामन्यः प्रकारोऽस्ति , परस्परविरुद्धयोरेकप्रतिषेधस्येतरविधिनान्तरीयकत्वात् । अक्षणिकत्वे तु न क्रमसम्भवः , समर्थस्य क्षेपायोगात् । असमर्थस्य कालान्तरेऽप्यजनकत्वस्वभावस्यानतिवृत्तेः । क्रमवत्सहकारिलाभात्क्रमेण करणं तस्येति चेत् ?

अत्र वदन्ति - यदि सहकारिणो भावातिशयं न जनयन्ति , नापेक्षणीयाः , अकञ्चित्किरत्वात् । जनयन्ति चेत् ? स किं तावद्व्यतिरिक्तः ? अव्यतिरिक्तो वा ? व्यतिरेकपक्षे तावदतिशया देवागन्तुकादन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्योत्पत्तिरित्यक्षणिकस्य न हेतुत्वम् , सत्यपि तस्मिन्नभावात् । सहकारिकृताशसहितस्य तस्य जनकत्वमिति चेत् ? अतिशयस्यातिशयान्तरानारम्भे कीदृशी सहायता ? आरम्भे चानवस्थायाः का प्रतिक्रिया ? सहकारिजन्योऽतिशयः स चाक्षणिकस्येति सुभाषितम् , अनुपकार्य्यानुपकारकयोः सम्बन्धाभावात् । भावादभिन्नोऽतिशय : सहकारिभिः क्रियत इत्यपि न सुपेशलम् , भावस्य पूर्वोत्पन्नस्य पुनरुत्पत्त्यभावात् । प्राक्तनो हि भावोऽनतिशयात्मा निवर्त्तते , अन्यचातिशयात्मा जायत इति चेत् ? क्षणिकत्वसिद्धिः ।

ननु क्षणिकस्यापि सहकारिभि कि क्रियते ? न किञ्चित् किमर्थं तहिते अपेक्ष्यन्ते ? को ब्रूते अपेक्ष्यन्ते इति , प्रत्येकमेव हि कार्यजननाय समर्था अन्त्यावस्थाभाविनः क्षणाः , का तेषां परस्परापेक्षा ? यत्तु तदानीं परस्परं प्रत्यासीदन्ति तदुपसर्पणकारणस्यावश्यम्भावनियमात् न तु सम्भूयकार्यकरणाय , तत्काले चोपसर्पण हेतु नियमस्तेषां वस्तुस्वाभाव्यात् । प्रत्येकं समर्था हेतवः प्रत्येकं कार्यं जनयेयुः । किमित्येकमनेके कुर्व्वन्ति ?

अत्राप्यमीषां कारणानि प्रष्टव्यानि , यान्यप्रत्येकार्थनिर्वर्तनशीलानि प्रभावयन्ति । वयं तु यथादृष्टस्य वस्तुस्वभावस्य वक्तारो न पर्यनुयोगमर्हामः । कार्य्यमेकेनैव कृतं किमपरे कुर्व्वन्तीति चेत् ? न कृतं कुर्व्वन्ति किन्त्वेकेन क्रियमाणमपरेऽपि कुर्व्वन्ति । यत्रैकमेव समर्थं तत्रापरेषां क उपयोग इति चेद् ? सत्यम् , न ते प्रेक्षापूर्वकारिणो देवं विमृश्योदासते ।

एकं कार्य्यमनेकस्मादुत्पद्यत इति दुर्घटमिदम् , कारणभेदस्य कार्य्यभेदहेतुत्वादिति चेन्नैवम् , सामग्रीभेदाद्धि कार्य्यभेदो न सहकारिभेदात् एककार्यकारितैव सहकारिता , तस्मात् क्षणिकत्वे क्रमवतां भावानां क्रमेण कार्य्यकरणं घटते , दुर्घटा तु अक्षणिकस्यार्थक्रियेति । युगपत्करणमपि दुर्घटम् , तावत्कार्य्यकरणसमर्थस्य स्वभावस्योत्तरकालमप्यनिवृतेः । कृतस्य करणं नास्ति , कर्त्तव्यञ्चास्य न विद्यते । निखिलस्य कार्य्यकलापस्य सकृदेव कृतत्वात् अतः क्षणान्तरे न करोतीति चेत् ?

तर्हि अयं तदानीमसन्नेव , समस्तार्थक्रियाविरहात् । तदेवं व्यापकयोः क्रमयौगपद्ययोरनुपलम्भेनाक्षणिकान्निवर्त्तमानं सत्त्वं क्षणिके व्यवतिष्ठते । तथा च सति सुलभं क्षणिकत्वानुमानं यत् सत् तत् क्षणिकं , सन्ति च द्वादशायतनानीति । अत्रोच्यते - न सत्त्वात् क्षणिकत्वसिद्धिः , तस्य विपक्षव्यावृत्त्यनवगमात् ।

यत्क्रमयौगपद्यरहितं तदसत् यथा वाजिविषाणम् , क्रमयौगपद्यरहितञ्चाक्षणिकमिति बाधकेनाक्षणिकात् क्रमयौगपद्यव्यावृत्त्या सत्त्वव्यतिरेकप्रतीतिरिति चेन्न , अक्षणिकस्याप्रतीतौ सत्त्वस्य ततो व्यावृत्तिप्रतीत्यसम्भवात् , यथा प्रतीयमाने जले तत्र वह्निधूमयोरभावप्रतीतिः " एवमक्षणके f दृश्यमाने क्रमयौगपद्याभावात्सत्त्वाभाव : प्रत्येतव्यः । न चाक्षणिको नाम कश्चिदस्ति भवताम् , यथाऽप्रतीयमानेऽपि पिशाचे ततोऽन्यव्यावृत्तिः प्रतीयते स्तम्भः पिशाचो न भवतीति तद्वदेतदपि भविष्यती ' ति चेद् ?

न व्यावृत्तेरनुपलब्धिप्रमाणैकगोचरत्वात् तद्विविक्तेतरपदार्थोपलब्धिस्वभावत्वाच्चानुपलब्धेः प्रतियोग्युपलब्धिमन्तरेणाभावात् । न च स्वरूपविप्रकृष्टत्वे पिशाचस्य ततो व्यावृत्तिप्रतीतिसम्भवः । कथं तहि स्तम्भः पिशाचो न भवतीति प्रतीतिरिति चेत् ? नायं संसर्गप्रतिषेधः , किन्तु तादात्म्यप्रतिषेधोऽयम् । स च स्तम्भात्मतया प्रसञ्जितस्य पिशाचस्य दृश्यत्वाभ्यनुज्ञानात् प्रवर्त्तते नान्यथा , यथोक्तम्-“ तादात्म्येन यावान्निषेधः स सर्व उपलब्धिलक्षणप्राप्तत्वाभ्युपगमेन क्रियते " इति ।

तत्र स्तम्भस्वरूयैकनियता स्तम्भप्रतीतिस्तदनात्मन्यवच्छेदकारणम् , यदि स्तम्भः पिशाचो भवेत् तेनाप्यात्मना ज्ञातः स्यात् । न च ज्ञानं स्तम्भत्ववत्पिशाचात्मतामपि गृह्णाति तस्मादयं पिशाचो न भवतीति ।

अथ मतम् , न नीलादिव्यतिरिक्तोऽक्षणिक क्षणिको वा कश्चिदस्ति , किन्तु प्राक्तनबुद्धिवेद्यो नीलादिक्षणोऽधुनातनबुद्धिवेद्यान्नीलक्षणादभेदेनारोप्यमाणोऽक्षणिक इत्युच्यते । भेदेन व्यवस्थाप्यमाणश्च क्षणिक इति । तत्र नीलादिष्वेव क्रमाक्रमव्यावृत्त्या सत्वाभावप्रतीतिः । यदि पूर्वोपलब्धक्षण एवायमुपलभ्यते तदा सम्प्रतितनीमर्थक्रियां प्रागेव कुर्य्यात् , प्राक्तनीं वा सम्प्रत्येव , न पुनः क्रमेण कुर्य्यात् , एकस्य कारकत्वाकारकत्वविरोधात् ।

नापि सर्व पूर्वमेव कुर्य्यात् , सम्प्रत्यर्थक्रियारहितस्यासत्वप्रसङ्गादिति । तत्रापि किमेवं सत्त्वस्य तोर्वास्तवो विपक्षो दर्शितः ? कल्पनासमारोपितो वा समर्थित : ? न ताव - द्वास्तव विपक्ष :, नीलादीनामक्षणिकस्यावास्तवत्वात् , तस्मादनुमानाद्वास्तवीमर्थगतिमिच्छता लिङ्गस्य त्रैरूप्यविनिश्वयार्थ धूमानुमानवत् सर्वत्र प्रमाणसिद्धः पक्षादिभाव दर्शयितव्यः , न कल्पनामात्रेण । न चाक्षणिकस्तथाभूतोऽस्तीति व्यतिरेकासिद्धिः ।

तदसिद्धावन्वयस्याप्यसिद्धिस्तस्यास्तत्पूर्वकत्वादित्यसाधारणत्वं हेतोः । अपि च बाधकेनाक्षणिकात् सत्त्वव्यतिरेक : प्रसाधितः , क्षणिकत्वसत्वयोरन्वयः कुतः सिद्धयति ? न च तत्र विपक्षव्यावृत्तिमात्रेण हेतुत्वमसाधारणस्यापि हेतुत्वप्रसङ्गात् । केवलव्यतिरेक्यनुमानञ्च स्वयमनिष्टम् । अक्षणिकेऽपि सत्त्वं न भवतीत्यवस्थापितेऽर्थात् क्षणिकाश्रयं सत्त्वमित्यन्वयसिद्धिरिति चेत् ? न तावदर्थादिति सत्त्वस्य हेतोः परामर्शः , असिद्धान्वयस्य तस्याद्यापि हेतुत्वाभावात् ।

बाधकमेव तूभयव्यापारं प्रमाणन्तरं व्याप्ति प्रसाधयद् द्वादशायतनेष्वेव प्रसाधयेन्निव्विषयाया व्याप्तेः प्रत्येतुमशक्यत्वात् , द्वादशायतनव्यतिरिक्तस्य चार्थस्याभावात् । तेषु चान्वयप्रतीतौ क्षणिकत्वस्यापि प्रतीति :, सम्बन्धिप्रतीतिनान्तरीयकत्वात् सम्बन्धप्रतीतेरिति सत्त्ववैयर्थ्यम् । पक्षे सामान्येन व्याप्तिग्रहणं , विशेषे सत्वस्य हेतुत्वमिति चेन्न , निर्विशेषस्य सामान्यस्य प्रतीतेरभावात् ।

विशेषपरिनिष्ठयोश्च क्षणिकत्वसत्त्वसामान्ययोः प्रतीयमानयोर्नीलादिगतं क्षणिकत्वं प्रतीतमिति सूक्तं सत्त्ववैयर्थ्यमिति । बाधकक्षणिकत्वव्यावृत्त्यत्त्वव्यावृत्त्योर्व्याप्तिग्रहणम् , सत्त्वात्तु वस्त्वात्मकक्षणिकत्वप्रतीतिरिति चेन्न , व्यावर्त्यभेदेन कल्पितभेदयोर्व्यावृत्त्योस्तादात्म्यभावात् । तादात्म्यञ्चानुमानाङ्गमुक्तम् , वस्त्वात्मनोः क्षणिकत्वसत्त्वयोस्तादात्म्यभावात् । तदात्मकत्वेनाध्यवसितयोरपि व्यावृत्त्योस्तादात्म्यमिति चेत् ?

न वस्तुनोस्तादात्म्यस्यान्यतोऽप्रसिद्धः , प्रसिद्धौ वा बाधकस्यापि वैयर्थ्यम् । न च व्यावृत्त्योः प्रतिबन्धनिश्चये वस्तुसिद्धिरस्ति वस्त्ववस्तुनोर्भेदादसम्बन्धाच्च ।

यदयुक्तम् - धर्मोत्तरेण घटे बाधकेन व्याप्ति प्रसाध्य शब्दे सत्त्वात् क्षणिकत्वप्रसाधनमित्युभयोरपि सार्थकत्वं विषयभेदादिति । तत्रापोदमुत्तरम् । घट इव शब्देऽपि बाधकस्य प्रवृत्त्यविरोधात् प्रमाणान्तरानुसरणमफलमिति । न चाक्षणिकस्यार्थक्रियानुपपत्तिः , सहकारिसाहित्ये हि सति कार्य्यकरणस्वभावो हि भावो नानपेक्ष कारकस्वरूपः , तस्य यथान्वयव्यतिरेकावगतसामर्थ्याः सहकारिणः सन्निपतन्ति तथा कार्य्योत्पत्तिरित्युपपद्यते स्थिरस्यापि क्रमेण करणम् ।

अनेककारणाधीनस्य कार्य्यस्यैकस्मादुत्पत्त्यभावात् । न च सहकारिसापेक्षित्वे सति सत्कृतादेवातिशयात् कार्य्योत्पत्तेर्भावो न कारक इति युक्तम् , भावस्वरूपानुगमनेन काय्र्योत्पाददर्शनात् । अकारकत्वे हि यवबीजस्य क्षित्युदकसंनिधौ शालिबीजाद्यङ्कुरोऽपि स्यात् , नियमकारणाभावात् । नापि सहकारिणो भावस्य स्वरूपातिशयमादधति , किन्तु सहकारिण एव ते ।

अतिशयः पुनरेतस्य सहकारिसाहित्यम् अनतिशयोऽपि तदभाव एव तस्मिन् सति ततः कार्य्यस्य भावादसत्यभावात् , जनकाजनकक्षणभेदाभ्युपगमः सर्वदावस्थानग्राहिप्रत्यक्षबाधितः , सुसदृशक्षणानामव्यवधानोत्पादेनान्तराग्रहणादवस्थानभ्रमोऽयमिति चेत् ? स्थिते क्षणिकत्वे प्रत्यक्षस्य भ्रान्तता , तद्भ्रान्तत्वे च क्षणिकत्वसिद्धिरित्यन्योन्यापेक्षता । न च यद्यस्योत्पत्तिकारणं विनाशकारणश्वान्वयव्यतिरेकाभ्यामवगतं तयोरभावे तस्योत्पत्तिविनाशकल्पना युक्ता , निर्हेतुको विनाशो , बीजमपि बीजस्य कारणमिति चासिद्धम् ।

अङ्कुरजनकं बीजं बीजकृतं न भवति बीजत्वाच्छालिस्तम्भमूर्द्धस्थितबीजवत् । निर्भागं वस्तु तस्य कारकत्वमकारकत्वञ्चेत्यंशावनुपपन्नाविति यत् किश्विदेतत् । यथा वदहिं प्रति कारकत्वम् , अकारकत्वश्व स्नानं प्रति , न च ताभ्यामस्य स्वरूपभेद :, तथैकस्यैव भावस्य सहकारिभावात्कारकत्वमकारकत्वश्व तदभावात् कथमन्यस्य सन्निधावन्यस्य कारकत्वं कारकत्वेऽपि कथं कस्यचिदेव न सर्वस्येति चेत् ? अत्र वस्तुस्वभावाः पर्य्यनुयोक्तव्याः ।

वयन्तु यत्र येषामन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्यमवगच्छामः , तत्र तेषामेव सामग्रीभावमभ्युपगच्छन्तो नोपालम्भमर्हामः । त्वत्पक्षे s पि क्षित्युदकबीजानामेवाङ्कुरोपत्तौ सहकारिता नापरेषाम् , ( अत्र ) तवापि वस्तुस्वभावादपरः को हेतुः ? प्रत्येकमेव बीजादयः समर्था न परस्परसहकारिण इति चेत् ? किमर्थं तहि कृषीबल : परिकषितायां भूमौ बीजमावपति उदकञ्चासिश्वति ? परस्पराधिपत्येन तेभ्यः प्रत्येकमङ्कुरजननयोग्यक्षणजननायेति चेत् ?

यद्यङ्कुरजननयोग्यक्षणोपजननाय बीजं स्वहेतुभ्यः समर्थमुपजातं किमवनिसलिलाभ्याम् ? अथासमर्थम् ? तथापि तयोरकिञ्चित्करः सन्निधिः स्वभावस्यापरित्यागात् । क्षित्युदकाभ्यां बीजस्य स्वसन्तानवत्तन्यसमर्थक्षणान्तरारम्भणशक्तिनिरुद्धयते इति चेत् ? अस्तु तस्मादसमर्थक्षणानुत्पत्तिः , समर्थक्षणोत्पत्तिस्तु दुर्लभा कारणाभावात् । न च स्वभावभूतायाश्शक्तेरस्ति निरोधो भावस्यापि निरोधप्रसङ्गात् । सहेतुकश्च विनाशः प्राप्नोति , विशिष्टक्षणोत्पादनशक्त्याधानश्व बीजस्याशक्यं , क्षणिकत्वात् ।

स्वभावाव्यतिरिक्तशक्त्युत्पादने चोत्पन्नोत्पादनप्रसङ्गात् । तस्मादसमर्थस्योत्पादवतो न काचित् क्रिया , समर्थस्योत्पादानन्तरमेव करणमिति द्वयी गतिः । न त्वर्थान्तरसाहित्ये सति करणम् , तस्यानुपयोगात् । अथ मतम् एकस्मात्कार्य्यानुत्पत्तेर्बहुभ्यश्च तदुत्पत्तिदर्शनात् सहितानामेव सामर्थ्यमिति ? किमित्येवं वदद्भ्योऽस्मभ्यं भ्राम्यति भवान् ? तदेवमक्षणिकस्यार्थक्रियोपपत्तेरनैकान्तिको हेतुः ।

यदप्युक्तं कृतकानामवश्यम्भावी विनाशः , तेनापि शक्यं क्षणिकत्वमनुमातुम् , तथाहि यद्येषां ध्रुवभावि तत्र तेषां कारणान्तरापेक्षा नास्ति , यथा शरकृपाणादीनां लोहमयत्वे , ध्रुवभावी च कृतकानां विनाश इत्यनुमानं विनाशस्य हेत्वन्तरायत्ततां प्रतिक्षिपति । ये हेत्वन्तरसापेक्षा न ते ध्रुवभाविनः , यथा वाससि रागादयः तथा यदि भावा अपि स्वहेतुभ्यो विनाशं प्रति हेत्वन्तरमपेक्षन्ते तदा हेत्वन्तरस्य प्रतिबन्धवैकल्ययोरपि सम्भवे कश्चित्कृतकोऽपि न विनश्येत् ? स्वहेतुतश्च विनश्वरस्वभावा जायमाना उत्पत्त्यनन्तरमेव विनश्य न्तीति सिद्धं क्षणिकत्वम् ।

अपि च भावस्याविनश्वरस्वभावत्वे विनाशोऽशक्यकरणो वह्नेरव शीतिमा , विनश्वरस्वभावत्वे वा नार्यो हेतुभिः , न च भावादभिन्नस्य विनाशस्य हेत्वन्तरजन्यता , कारणभेदस्य भेदहेतुत्वात् ! भिन्नस्य हेत्वन्तरादुत्पादे च भावस्योपलब्ध्यादिप्रसङ्गः , अन्योत्पादादन्यस्वरूपप्रच्युतेरभावात् । घटो नष्ट इति च भावकर्त्तृ को व्यपदेशो न स्यात् किन्त्वभावो जात इति व्यपदिश्येत , तथा च सति घटः किमभूदिति वार्त्ताप्रश्ने तस्य निवृत्तौ प्रस्तुतायामप्रस्तुतमेव कथं स्यात् ? तस्माद् भावस्वभाव एव विनाश इति । अत्रोच्यते- उत्पन्नो भावः किमेकक्षणावस्थायी ? किं वा क्षणान्तरेऽप्यवतिष्ठते ? क्षणान्तरावस्थितिपक्षे तावत्क्षणिकत्वव्याहतिः , अनेककालावस्थानात् , एकक्षणास्थायित्वे तु क्षणान्तरे स्थित्यभाव इति न भावाभावयोरेकत्वम् , कालभेदात् । तदप्यसारम् , पूर्वापरक्षणयोर्व्यक्तिभेदेऽपि स्वरूपविरोधस्याभावात् । घटो अथ मतं न ब्रूमो भावः स्वस्यैवाभावः , किन्तु द्वितीयक्षणः पूर्वक्षणस्याभाव इति ,

यथा भिन्नसन्ततिर्वात्तना घटान्तरेण सह तिष्ठति एवमेकसन्ततिर्वात्तनाऽपि सह तिष्ठेत् , द्वितीयक्षणग्राहिप्रमाणान्तरस्य तत्स्वरूपविधेश्वरितार्थस्य प्रथमक्षणे निषेधे प्रमाणत्वाभावात् । अभावस्तु भावप्रतिषेधात्मैव , घटो नास्तीति प्रतीत्युदयात् । ततस्तस्योत्पत्तिर्भावस्य निवृत्तिः , तस्यावस्थानं भावस्यानवस्थिति :, तस्योपलम्भो भावस्यानुपलम्भ इति युक्तम् , परस्परविरोधात् ।

एवश्व सति न भावस्य क्षणिकत्वं पश्चाद् भाविनस्तदभावस्य हेत्वन्तरसापेक्षस्य भावानन्तर्य्यनियमाभावात् , तथा च दृश्यते घटस्योत्पन्नस्य चिरेणैव विनाशो मुद्गराभिघातात् । भावात्मको घटविनाशो मुद्गराभिघातात् तु कपालसन्तानोत्पाद : स्यादित्यसङ्गतम् । सन्तानप्रतिबद्धायाः सदृशारम्भणशक्तेरप्रतिघाते विलक्षणसन्तानोत्पत्त्यसम्भवात् । मुद्गराघातेन तस्याः प्रतिहत च भावप्रतिघाते कः प्रद्वेषः ?

न च कारणकार्यत्वे भाववदभावस्यापि वस्तुत्वप्रसक्तिस्तस्य वस्तुप्रतिषेधस्वभावस्य प्रत्यक्षादिसिद्धत्वात् । स्वरूपं यदयं कृतकोऽपि भाववन्न विनश्यति , नष्टस्यानुपलम्भात् । प्रमाणाधिगतस्य वस्तुस्वभावस्य परसाधर्म्येण निराकरणत्वे जगद्वैचित्र्यस्यापि निराकरणम् । अन्योत्पादे कथमन्यस्य स्वरूपप्रच्युतिरित्यपर्य्यनुयोज्यम् , वस्तुस्वाभाव्याद् । घटो विनष्ट इति च व्यपदेशस्तदवयव क्रियादिन्यायेनाभावोत्पत्त्यैव । अत एवायं तस्यैवाभावो न सर्वस्य ।

न चास्य समवायिकारणं किश्वित् , तदभावान्नासमवायिकारणम् । क्व कार्य्यमनाधारं दृष्टम् ? इदमेव दृश्यते तावत् न ह्ययं घटे समवैति , तस्याभावात् नापि भूतले , अन्यधर्म्मत्वात् । कथं तर्हि नियतदेशः प्रतीयते ? प्रतियोगिनियमात् । अयमस्य स्वभावो यत् संयुक्तप्रतिषेधे संयुक्तवत् प्रतिभाति , समवेतप्रतिषेधे समवेतवत् प्रतिभाति । विशेषणमपीत्थमेव , न पुनरस्य संयोगसमवायौ , तयोर्भावधर्मत्वात् । तदेवं सिद्धोऽभावो भावविरोधी नास्ति बुद्धिवेद्योऽर्थः यत्कृतो दहनतुहिनयोरपि विरोधः ।

दहनाभावस्तुहिने तुहिनाभावश्च दह इत्यनयोविरोधो न स्वरूपेण विधेविध्यन्तरविरोधाभावात् । यच्च ध्रुव भावित्वादभावस्य हेत्वन्तरानपेक्षेत्युक्तम् , तदपि सवितुरुदयास्तमयाभ्यामनैकान्तिकम् , तयोरनपेक्षत्वे हि कालभेदो न स्यात् । एकसामग्रीप्रतिबन्धेऽपि स एव दोषः । नियतो हि वाससि रागहेतुनियतकालश्च तस्य तत्कालासन्निधिमात्रेण रागस्यानुत्पादः सिद्धयति अनन्तास्तु विनाशहेतवो नियतकालाश्च तेषां सर्वदा सर्वेषां प्रतिबन्धस्याशक्यत्वात् कश्चिदेको निपतत्येव ।

कालान्तरे च निपतितः क्षणेनैव भावं विनाशयतीत्युपपद्यते कृतकत्वेऽपि ध्रुवो वशः ।

सर्वञ्चैतत्क्षणभङ्गसाधनं कालात्ययापदिष्टम् , प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षेण प्रतीतस्य पुनः प्रतीतेः । नन्वेष प्रत्ययो न भावस्य पूर्व्वापरकालावस्थानं शक्नोति प्रतिपादयितुम् , न ह्येतदेकं विज्ञानम् , कारणाभावात् । इन्द्रियं सन्निहितविषयं न पूर्वकालत्वमवगाहते , संस्कारोऽपि पूर्वानुभवजन्या तद्विषये नियतो नापरकालतां परिस्पृशति , न च ताभ्यामन्यदुभयविषयं किश्विदेकमस्ति यदेतद् विज्ञानं प्रसुवीत । इतोऽपि नैतदेकं विज्ञानं स्वभावभेदात् इदमिति हि प्रत्यक्षता तदिति हि परोक्षत्वम् , प्रत्यक्षतापरोक्षत्वे च परस्परविरोधिनी नैके युज्येते , तस्माद् ग्रहणस्मरणात्मके इमे संवित्तभिन्नविषये । अत्र ब्रूमः प्रतीयते तावदेतस्माद् विज्ञानात् पूर्वापरकालावच्छिन्नमेकं वस्तुतत्त्वम् , तदप्यस्य विषयो न भवतीति संविद्विरुद्धम् । ग्रहणस्मरणे च नैकं विषयमालम्बेते , तस्मादेकमेवेदं विज्ञानमिति प्रतीतिसामर्थ्या-

। प्रतीयमान कार्य्योत्पत्तये चाप्रतीयमानमपि कारणं दुभयविषयमास्थेयम् कल्पयन्ति विद्वांसो , न तु कारणाप्रतीत्या विशदमपि कार्य्यमपह्नवते , जगद्वैचित्र्यस्याप्यपह्नवप्रसङ्गात् । तेन यद्यपि प्रत्येकमिन्द्रियसंस्कारावसमथ तथापि संहताभ्यामिदमेकं कार्यं प्रत्यभिज्ञास्वभावं प्रभावयिष्यते , भविष्यति चैतदुभयकारणसामर्थ्यादुभयविषयम् , प्राप्स्यति च प्रत्यक्षतां विषयेन्द्रियसामर्थ्यानुविधानात् । न च यत्रैकैकमसमर्थ तत्र मिलितानामपि तेषा - मसामर्थ्यम् ?

प्रत्येक मकुर्वतामपि क्षित्युदकन्बीजानामन्योन्यसन्निधिभाजामकुरादिजननोपलब्धेः । यत्र विलक्षणा सामग्री तत्र कार्य्यमपि विलक्षणमेव स्थादिति सुप्रतीतम् तेनास्य सन्निहितातन्निहितविषयतालक्षणे प्रत्यक्षतापरोक्षते न विरोत्येते । अत एव चेन्द्रियसन्निकर्षाभावेऽपि पूर्वकालप्रत्यक्षतैव , इन्द्रियजज्ञानविषयत्वात् तन्मात्रानुबन्धित्याच्च प्रत्यक्षतायाः । असन्निहितमपि परिच्छि ददिन्द्रियं पूर्वकालतामेव परिच्छिनत्ति न भविष्यत्कालताम् , तत्र संस्कारस्य सहकारिणोऽभावात् ।

न चैकस्योभयकालतायां काचिदनुपपत्तिः , येनास्योभयकालां सङ्कलयतः कल्पनात्वम् , दृष्टो ह्येकस्यानेकेन विशेषणेन सम्बन्ध यथा चैत्रस्य छत्र पुस्तकाभ्याम् । युगपच्छत्र पुस्तकसम्बन्धे क्रमेण कालद्वयसम्बन्धे च न कश्चिद् विशेषः , एकस्योभयविशेषणावच्छेदप्रतीतेरुभयत्राविशेषात् । तदेवं देशकालावस्थाभेदानुगतमेकं वस्तुतस्वमध्यवसन्ती प्रत्यभिज्ञा भावानां प्रतिक्षणमुत्पादविनाशौ तिरयतीति । भ्रान्तेयं प्रतीतिरिति चेन्न , बाधकाभावात् । क्षणभङ्गसाधनमेतस्या बाधकमिति चेत् ?

प्रत्यक्षबाधे सत्यबाधितविषयत्वादनुमानोदयः , उदिते च तस्मिन् प्रत्यक्षबाध इत्यन्योन्याश्रयत्वम् । प्रत्यक्षे तु नायं विधिस्तस्यानपेक्षत्वात् , ज्वालादिषु सामान्यविषयं प्रत्यक्षं विशेषविषयवानुमानमित्यविरोधान्न प्रत्यक्षेणानुमानोत्पत्तिनिषेध इत्यलम् ।

योऽप्यतिप्रौढिम्ना प्रत्यक्षसिद्धं क्षणभङ्गमाह तस्यानुभवाभाव एवोत्तरम् । नोलमेतदिति प्रतिपत्तिर्न क्षणिकमेतदिति नीलत्वाव्यतिरेकिणी क्षणिकता , तस्याः पृथगर्थक्रियाया अभावात् । अतो नीलत्वे गृह्यमाणे क्षणिकत्वमपि गृह्यते , सुसदृशक्षणभेदाग्रहणात् । तथा नाध्यवसीयत इति चेत् ? अहोऽपरः प्रज्ञाप्रकर्षो यदयमनुभवमपि व्याख्याय कथयति । यन्नाध्यवसितं तद्गृहीतमिति मृगतृष्णिकेयम् , प्रत्यक्षबलोत्पन्नादध्यवसायादन्यस्य प्रत्यक्षदृष्टत्वव्यवस्थानिबन्धनस्यानभ्युपगमात् ।

यस्मिन्नध्यवसीसमाने धन्नियमेन नाध्यवसीयते नीलपीतयोरिव तयोस्तादात्म्याभिधानमपि प्रलापः । क्षणिकं प्रत्यक्षं ज्ञानं स्वसमानकालवत्तिनमर्थस्य सत्तां परिच्छिन्दत् तत्कालासम्बद्धतां व्यवच्छिन्दत् तत्कालभावाव्यभिचारिणः कालान्तरसम्बन्धमपि व्यवच्छिन्दत् तदेकक्षणावस्थायित्वं क्षणिकत्वं गृह्णातीति चेत् ? काशकुशावलम्बनमिदम् , स्वात्मानमेव न गृह्णाति विज्ञानम् , कुतः स्वसमानकालतामर्थस्य गृह्णाति ?

गृह्णातु वा , तथापि पूर्वमयं नासीत् पश्चाच्च न भविष्यतीत्यत्र प्रत्यक्षमजागरूकं पूर्वापरकालताग्रहणात् । वर्त्तमानकालपरिच्छेदे चातत्कालव्यवच्छेदो युक्तो भावाभावयोविरोधान्न तु कालान्तरसम्बन्धव्यवच्छेदो मणिसूत्रव देकस्यानेकसम्बन्धत्वादिरोधात् । प्रपञ्चितश्चायमर्थोऽस्माभिस्तत्त्वप्रबोधे तत्त्वसंवादिन्याञ्चेति नात्र प्रतन्यते ।

किश्व सर्वभावक्षणिकत्वाभ्युपगमे कस्य संसार : ? ज्ञानसन्तानस्येति चेत्? न सन्तानिव्यतिरिक्तस्य सन्तानस्याभावात् । अथ मतम् - नैकस्यानेकशरीरादियोगः संसारः , किं तर्हि ? ज्ञानसन्तानाविच्छेदः , स च क्षणिकत्वेऽपि नानुपपन्नः । तदप्यसारम् , गर्भादिज्ञानस्य प्राग्भवीयज्ञानकृतत्वे प्रमाणाभावात् नहि समानजातीयादेवार्थस्योत्पत्तिः , विजातीयादप्यग्नेर्धूमस्योत्पत्तिसम्भवात् ।

अथ मतम् -- यस्यान्वयव्यतिरेकावतिशयश्च यदनुविधत्ते तत्तस्य समानजातीयमुपादानञ्चेति स्थितिः , ज्ञानञ्च बोधात्मकत्वमतिशयं बिर्भात तच्च पृथिव्यादिभूतेषु नास्ति , तस्माद्यस्यायमतिशयस्तदस्य समानजातीयमुपादानकारणमिति स्थिते गर्भज्ञानं ज्ञानान्तरपूर्वकं सिद्ध्यति , कारणव्यभिचारे कार्य्यस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गादिति ।

तदप्यसारम् , अदहनस्वभावेभ्यो दारुनिर्मथनादिभ्यो वह्नेर्दाहातिशयोत्पत्तिवदबोधात्मकेभ्योऽपि चक्षुरादिभ्यो बोधात्मकत्वातिशयोत्पत्तिसम्भवे बोधात्मक कारणकल्पनानवकाशात् , न अतो प्राक्तनजन्मसिद्धिर्भविष्यति । जन्मान्तरमित्यपि न सिद्ध्यति , मरणे शरीरान्त्यज्ञानेन ज्ञानान्तरं प्रतिसन्धातव्यमित्यत्र प्रमाणाभावात् । यद्यत्राविकलकारणावस्थं तज्जनयत्येव यथाविकलजननावस्थं बीजमङ्कुरं प्रति अविकलजननावस्थं चान्त्यं ज्ञानमिति प्रमाणमस्तीति चेत् ?

न , ज्वालादीनामन्त्यक्षणेन व्यभिचारात् , स्नेहवत्तिक्षयादीनामन्त्यज्वालाक्षणस्य कारणावस्थावैकल्यादविकलत्वं नास्तीति चेत् ? अन्त्यज्ञानस्यापि मरणपीडया पोडितस्याविकलकारणावस्थात्वमसिद्धमिति सुव्याहृतं क्षणिकत्वे परलोकाभाव इत्युपरम्यते ।

आत्मसिद्धौ प्रमाणान्तरमप्याह - शरीरसमवायिनीभ्यामिति । प्रवृत्ति . निवृत्तिभ्यां प्रयत्नवान् विग्रहस्थ शरीरस्याधिष्ठातानुमीयते । लतादिप्रवृत्तिव्यवच्छेदार्थ शरीरसमवायिनीभ्यामित्युक्तम् । स्रोत : पतितमृतशरीरप्रवृत्तिनिवृतिव्यवच्छेदार्थश्व हिताहितप्राप्तिपरिहारयोग्याभ्यामिति । हितं सुखमहितं दु : खम् , तयोः प्राप्तिपरिहारौ हितस्य प्राप्तिरहितस्य परिहारः , तत्र योग्याभ्यां समर्थाभ्यामिति बुद्धिपूर्वकचेष्टापरिग्रहः । कर्मणा सारथिवदिति दृष्टान्तकथनम् ।

साधनोपादानपरिवर्जनद्वारेण हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्था चेष्टा प्रयत्नपूर्विका विशिष्ट क्रियात्वात् रथक्रियावत् । शरीरं वा प्रयत्नवदधिष्ठितं विशिष्टक्रियात्वात् रथवत् । प्राणादिभिश्चेति । प्राणादिभिश्व प्रयत्नवानधिष्ठातानुमीयत इत्यनुषञ्जनीयम् । प्राणादिभिरित्यनेन “ प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियविकारः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि " इति सूत्रोक्तमस्तलिङ्गपरिग्रहः । कथमिति प्रश्नपूर्वक्रं प्राणापानयोलिङ्गत्वं दर्शयति-- शरीरपरिगृहीत इति ।

वायुस्तिर्य्यग्गमनस्वभावः , शरीरपरिगृहीते arat returned विकृतं स्वभावविपरीतं कमौर्ध्वगमनमधोगमनञ्च दृश्यते , तस्मात् प्रयत्नवान् विग्रहस्याधिष्ठातानुमीयते यस्तथा वायु प्रेरयति , अन्यथास्य विकृतवाय्वसम्भवात् । भस्त्राध्मापयितेव दृष्टान्तः शरीरं प्रयत्नवदधिष्ठितमिच्छापूर्वक विकृतवाय्वाश्रयत्वाद् भस्त्रावत् । शरीरपरिगृहीतेत्यनेनेच्छापूर्वकत्वं दर्शितम् , तेन हि द्विवायुकादिभिर्नानैकान्तिकम् । निमेषोन्मेषकर्मणा नियतेन दारुयन्त्र प्रयोक्तेवेति ।

अक्षिपक्ष्मणोः संयोगनिमित्तं कर्म निमेषः , विभागार्थं कर्मोन्मेषः । तेन कर्मणा दारुयन्त्रप्रयोक्तेव विग्रहस्य प्रयत्नवानधिष्ठाता अनुमीयते । वायुवशेनापि दारुयन्त्रस्य निमेषोन्मेषौ स्याताम् , तन्निवृत्त्यर्थं नियतेनेति । अनेनेच्छाधीनत्वं कथयति । शरीरं प्रयत्नवदधिष्ठितमिच्छाधीननिमेषोन्मेषवदवयवयोगित्वाद् दारुयन्त्रवत् । जीवन लिङ्गकमनुमानं कथयति - देहस्येति । वृद्धिः प्रसिद्धैव । क्षतस्य भग्नस्य च संरोहणं पुनः सङ्घटनं तयोनिमित्तत्वाद् गृहपतिरिव प्रयत्नवानधिष्ठाता अनुमीयते ।

शरीरस्य वृद्धिक्षतसंरोहणं प्रयत्नवता कृतं वृद्धिक्षतभग्नसंरोहणत्वाद् गृहवृद्धिक्षतभग्नसंरोहणवत् । वृक्षादिगतेन वृद्धघादिना व्यभिचार इति चेन्न तस्यापीश्वरकृतत्वात् न तु वृक्षादयः सात्मकाः , बुद्ध्याद्युत्पादनसमर्थस्य विशिष्टात्मसम्बन्धस्याभावात् ।

मनोगति लिङ्गकमनुमानमुपन्यस्सति - अभिमतेत्यादिना । अभिमतो विषयो जिघृक्षितोऽर्थः , तस्य यद्ग्राहकं करणं चक्षुरादि तेन योगो मनस्सम्बन्धस्तस्य निमित्तेन मनः कर्मणा । गृहे कोणेषु कोष्ठेषु भूमौ रोपितं पेलकं प्रति हस्तस्थितस्य पेलकस्य प्रेरको दारक इव प्रयत्नवान् मनः प्रेरकोऽनुमीयते । प्रयत्नवता प्रेर्य मनः , अभिमतविषय सम्बन्धनिमित्त क्रियाश्रयत्वाद्दारकहस्तगतपेलकवत् । वाय्वादिप्रेरितस्यानभिमतेनापि सम्बन्धो भवति । नयनविषयेति ।

नयनविषयस्य रूपस्यालोचनाद् ग्रहणानन्तरं रसस्यानुस्मरणक्रमेण रसनेन्द्रियान्तरविकारो दृश्यते , तस्मादुभयोर्गवाक्षयोरन्तःप्रेक्षक इव द्वाभ्यामिन्द्रियाभ्यां रूपरसयोर्दर्शी कश्चिदेकोऽनुमीयते । किमुक्तं स्यात् ? कस्यचिदिष्टफलस्य रूपं दृष्ट्वा तत्सचहरितस्य पूर्वानुभूतस्य रसस्य स्मरणात्तत्रेच्छा भवति , ततोऽपि प्रयत्न आत्ममनस्संयोगापेक्षो रसनेन्द्रियविक्रियां करोति ।

सा दन्तोदकसंप्लवानुमिता रसनेन्द्रियविक्रिया इन्द्रियचैतन्ये न स्यात् , प्रत्येकं नियताभ्यां चक्षूरसनाभ्यां रूपरसयोः साहचर्य्यप्रतीतौ रूपदर्शनेन रसस्मृत्यभावात् । अस्ति चायं विकारैः तस्मादिन्द्रियव्यतिरिक्तः कोऽप्युभयदर्शी यो रूपं दृष्ट्वा रसस्य स्मरति । शरीरमेवोभयदशि भविष्यतीति चेन्न बालवृद्धशरीरयोः परिमाणभेदेनान्यत्वे सिद्धे बाल्यावस्थानुभूतस्य वृद्धावस्थायामस्मरणप्रसङ्गात् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — विषयों में चैतन्य न मानने में एक यह भी युक्ति है कि वे ज्ञान के आश्रय रूप में ज्ञात नहीं होते , एवं उनमें ज्ञानजनित सुख का भी अनुभव नहीं होता है , एवं विषयों में ज्ञानजनित विशेष प्रकार की चेष्टा भी नहीं है । इन्द्रियों में या विषयों में चैतन्य मान लेने से ' मैंने रूप को देखा , मैंने रस का अनुभव किया , मैं स्पर्श का अनुभव कर रहा हूँ , मैं गन्ध को सूघूँगा ' इत्यादि विभिन्न प्रतीतियों में एक कर्त्ता के द्वारा उत्पन्न होने का अनुभव ठीक नहीं बैठेगा । क्योंकि वे रूपादि और उनकी ग्राहक इन्द्रियाँ भिन्न - भिन्न हैं |

( प्र ० ) ज्ञान को मन का ही गुण मान लीजिए , क्योंकि वह सभी विषयों का ग्राहक एवं नित्य भी है । अतः शरीर में , इन्द्रियों में या विषयों में चैतन्य मान लेने से होने वाली स्मृति की अनुपपत्तियाँ आपत्तियाँ इस पक्ष में नहीं आयेंगी । इसी पूर्वपक्ष का खण्डन ' नापि मनसः ' इत्यादि से करते हैं | मन यदि चक्षुरादि इन्द्रियों से भिन्न किसी ( कारणान्तर ) इन्द्रिय की सहायता से रूपादि विषयों के ज्ञान का उत्पादन करता है तो फिर नाममात्र का विवाद रह जाता है ।

क्योंकि आप के मत से ज्ञान के उत्पादन में मन को चक्षुरादि इन्द्रियों से भिन्न जिस इन्द्रिय की अपेक्षा होती है उसे हम लोग ' मन ' कहते हैं । एवं ज्ञान के जिस अधिकरण को आप ' मन ' कहते हैं , वही हम लोगों की आत्मा है । यदि किसी अन्य ( करण ) इन्द्रिय की अपेक्षा नहीं होती है तो फिर एक ही क्षण में एक ही अधिकरण में स्मृति और अनुभव दोनों की उत्पत्ति अनिवार्य होगी , क्योंकि एक ही समय दोनों की सामग्री तैयार है ।

अगर दूसरे कारण की अपेक्षा मानते हैं और मन को अणु मान लेते हैं तो एक काल में अनेक इन्द्रियों के साथ उसका सम्बन्ध नहीं सकता , अतः ज्ञान यौगपद्य ' ( अर्थात् एक आश्रय में एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति ) की आपत्ति होगी । ( प्र ० ) यह ठीक है कि मन को चक्षुरादि से भिन्न किसी दूसरे करण की भी आवश्यकता रहती है , किन्तु वह करण ' अन्तःकरण नहीं है । ( उ ० ) तब भी एक काल में अनेक स्मृतियों की आपत्ति रहेगी , क्योंकि स्मृति के उत्पादन में बाह्य किसी भी करण की आवश्यकता नहीं होती है ?

अगर अन्तःकरण मान लेते हैं तो फिर अन्तःकरण में एक काल में अनेक स्मृतियों के उत्पादन का सामर्थ्य नहीं रहता है , अतः उससे क्रमशः ही स्मृतियाँ उत्पन्न होंगी ।

( प्र ) एक एवं नित्य कोई वस्तु कारण ही नहीं हो सकती . क्योंकि कारण का यह स्वभाव है कि या तो वह एक ही समय अपने सभी कामों को करेगा ( यही युगपत्कारित्व है ) या क्रमशः ही अपने कामों को करेगा ( यही क्रमकारित्व है ) । इन दोनों में से कोई भी किसी नित्य एक वस्तु में सम्भव नहीं है । अतः नित्य आत्मा ज्ञान का समवायिकारण नहीं हो सकता । ( उ ० ) एक ही कारण से होनेवाले सभी कार्य किसी एक ही क्षण में हो ही नहीं सकते क्योंकि ऐसा मान लेने पर वह उसके बाद कारण ही नहीं रह जायगा । पतः उससे सम्पादित होनेवाले सभी कार्य हो चुके हैं , अब उसे कुछ करना नहीं है । एवं यह भी कोई नियम नहीं है कि जो किसी का कारण न हो उसकी सत्ता हो उठ जाय । जो किसी का कारण नहीं है , उसकी भी सत्ता मानने में कोई बाधा नहीं है ।

' मन स्वयं ही करण है ' इस हेतु से भी ज्ञान मन का गुण नहीं है , यही बात ' स्वयं करणभावाच्च ' इस वाक्य से कहते हैं । मन चेतन नहीं है , क्योंकि स्वयं करण हैं , जैसे कि घटादि । ( प्र ० ) मैंने तो मन को कर्त्ता मान लिया है फिर उसके करणत्व की चर्चा कैसी ? ( उ ० ) मन को अगर कर्ता मान लें तो फिर जैसे रूपादिज्ञान के चक्षुरादि करण हैं , वैसे ही सुखादि ज्ञान के लिए भी कोई करण खोजना पड़ेगा । क्योंकि करण के बिना किया की उत्पत्ति ही असम्भावित है । तब फिर नाम का ही विवाद रह जाता है , क्योंकि सुखादि प्रतीति के कर्ता और करण दोनों ही सिद्ध हो चुके हैं ।

मन चेतन नहीं है , क्योंकि वह मूर्त्त है , जैसे कि ढेला , इस प्रकार मूर्त्तत्त्र हेतु से भी समझते हैं कि मन चेतन नहीं है । ( प्र ० ) ज्ञान शरीर , इन्द्रिय एवं मन इन तीनों में से किसी का भी गुण नहीं है , यह सिद्ध हो जाने पर आत्मा की सिद्धि में क्या उपकार हुआ ? इसी प्रश्न का उत्तर ' परिशेषात् ' इत्यादि से देते हैं । यतः ज्ञान ( समवेत ) कार्य है , अतः अवश्य ही उसका कोई समवायिकारण है । यह सिद्ध हो चुका है कि शरीर , इन्द्रिय और मन ये तीनों समदाय सम्बन्ध से उसके आश्रय नहीं हैं । आगे कही जाने वाली युक्तियों से और भी किसी वस्तु ज्ञान ( समवायि ) कारणत्व रूप शक्ति सम्भव नहीं है , अतः परिशेषानुमान से यह समझते हैं कि ज्ञान आत्मा रूप समवायिकारण का ही कार्य है । यही प्रकृत विषय का उपसंहार है ।

( प्र ० ) किन्तु ये सभी बातें असम्बद्ध हैं , क्योंकि संसार की सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं , क्षणिक वस्तुओं में आधाराधेयभाव सम्भव ही नहीं है । ( अभिप्राय यह है कि अर्थक्रियाकारित्व ही सत्य है , सत् वही है जो किसी कार्य का कारण हो ) अर्थक्रियाकारिश्व क्रम और यौगपद्य का व्याप्य है । कार्यों की उत्पत्ति के क्रम एवं अक्रम ( यौगपद्य ) ये दो ही प्रकार हैं । इन दोनों को छोड़कर इसका कोई तीसरा प्रकार नहीं है । अनेक अर्थक्रियाओं ( कार्यों ) की एक काल में उत्पत्ति ही ' क्रम ' है ।

एक काल में अनेक कार्यों की उत्पत्ति ही ' अक्रम ' या यौगपद्य है , अतः इन दोनों को छोड़कर कार्योत्पति का कोई तीसरा प्रकार नहीं है । परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं में से एक प्रतिषेध के बिना दूसरे का विधान नहीं हो सकता । अगर वस्तुओं को क्षणिक न मानें तो कार्यों की यह क्रमशः उत्पत्ति सम्भव नहीं होगी , क्योंकि जिसमें जिस कार्य है या नहीं ?

' . इस विकल्प को अगर विधिकोटि मानें , अर्थात् यह कहें कि बीजों में अंकुर के उत्पादन की शक्ति है तो फिर बीज से सर्वदा - बीजों को कोठियों में रहने के समय भी - अंकुरों को उत्पत्ति होनी चाहिए । अगर निषेधकोटि मानें , अर्थात् यह कहें कि बीजों में अंकुरों के उत्पादन करने का सामर्थ्य नहीं है , तो फिर कभी भी खेत में बोने पर भी - बीजों से अंकुरों की उत्पत्ति नहीं होगी । अतः अंकुर के अव्यवहित पूर्वक्षण में बीज में एक विलक्षण धर्म की उत्पत्ति होती है , जिसका नाम है ' कुर्व्वद्रूपत्व ' ।

इस रूप से ही बीज अंकुर का कारण है , केवल बीजत्व रूप से नहीं , कोठियों के बीजों में बीजस्व के रहने पर भी यह ' अंकुरकुर्व्वद्रूपत्व ' धर्म नहीं है , अतः कोठी के बीजों से अंकुरों की उत्पत्ति नहीं होती है । इस प्रकार खेत में बोये हुए बीजों से कोठी के बीज भिन्न हैं , क्योंकि यह सम्भव नहीं है कि एक ही वस्तु में एक ही जाति रहे भी और न भी रहे ।

बीजों को यह विभिन्नता प्रत्येक क्षण में विभिन्न बीजों की उत्पत्ति के बिना सम्भव नहीं है , अतः यह समझना चाहिए कि किसी भी वस्तु को क्षणिक माने बिना उसमें अर्थक्रियाकारित्व सम्भव ही नहीं है । एवं सत्त्व अर्थक्रियाकारित्व रूप ही है , अतः यह उपसंहार कर सकते हैं कि जो भी सत् है वह अवश्य ही क्षणिक है , जैसे कि बीज , तस्मात् सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं ।

आत्मा को अगर ज्ञान का समवायिकारण मानें तो उसे भो क्षणिक मानना हो पड़ेगा | अगर आत्मा क्षणिक है तो वह किसी का आश्रय नहीं हो सकता । अतः आत्मसिद्धि की कथित युक्तियां ठीक नहीं हैं । को करने का सामर्थ्य है , वह कभी नष्ट नहीं हो सकती है । एवं जो जिस कार्य को करने में असमर्थ है वह कभी उस काम को कर ही नहीं सकता है । क्रमशः कार्य करनेवाले सहकारि कारणों की सहायता से क्रमशः कार्यों की उत्पत्ति होती है ' ।

इस प्रसङ्ग में बौद्धगण कहते हैं कि ( प्र ० ) सहकारि कारण मुख्य कारण में किसी विशेष सामर्थ्य का उत्पादन करते हैं या नहीं ? यदि नहीं करते हैं तो फिर उस कार्य के लिए वे अपेक्षित ही नहीं हैं ( फलतः कारण ही नहीं हैं ) क्योंकि वे कार्योत्पत्ति के लिए . कुछ भी नहीं करते । यदि सहकारि कारण मुख्य कारण में किसी विशेष सामर्थ्य का उत्पादन करते हैं तो फिर यह पूछना है कि यह सामर्थ्य क्या अपने आश्रयीभूत मुख्य कारण से भिन्न है . या अभिन्न ?

यदि भिन्न है तो फिर कार्य की उत्पत्ति उसी से होगी , क्योंकि कार्य का अभ्वय और व्यतिरेक उसी के साथ है । इस से यह सिद्ध होता है . कि अक्षणिक वस्तुओं से कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है , क्योंकि उनके रहते हुए भी ( क्षणिक उस शक्ति के विना ) कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है । ( उ ० ) सहकारी कारणों से विलक्षण शक्ति की उत्पत्ति होती है एवं उस शक्ति से युक्त बीजादि हो कारण हैं ।

( प्र ० ) यह ' अतिशय ' ( विलक्षण सामर्थ्य ) उन बीजादि बस्तुओं में किसी दूसरे अतिशय को जन्म देता है या नहीं ? अगर नहीं तो फिर सहायता कैसी ? अगर हाँ ? तो अनवस्था दोष का क्या परिहार होगा ? यद्यपि यह कहना ठीक सा लगता है कि सहकारियों से अतिशय की उत्पत्ति अवश्य होती है किन्तु वह क्षणिक वस्तुओं का धर्म नहीं है , किन्तु अक्षणिकों का धर्म है । यह कहता भी ठीक नहीं हैं कि ' वह ' अतिशय या सामर्थ्य विशेष सहकारियों से अवश्य ही उत्पन्न होता है , एवं वह अपने

भूत मुख्य कारण से अभिन्न है , क्योंकि अनुपकार्य और अनुपकारक में ( सहाय्य - सहायकभाव ) सम्बन्ध असम्भव है " क्योंकि एक बार उत्पन्न वस्तु की फिर से उत्पत्ति नहीं होती है । ( उ ० ) अतिशय स्वरूप पहली वस्तु का नाश होता है एवं अतिशय स्वरूप दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) फिर तो क्षणिकत्व का सिद्धान्त अटल है ।

( उ ० ) वस्तुओं को क्षणिक मान लेने पर भी सहकारियों से उन्हें क्या सहायता मिलती है ? ( प्र ० ) कुछ भी नहीं ? ( उ ० ) फिर वे सहकारियों की अपेक्षा क्यों रखते हैं ? ( प्र ० ) कौन कहता है कि बीजादि कारण अपने कार्यों के लिए सहकारियों की अपेक्षा रखते हैं । ' अन्त्य क्षण अर्थात् कार्योत्पत्ति के अव्यवहित पूर्वक्षण में रहनेवाले सभी ( मुख्य और सहकारी दोनों ही प्रकार के ) कारण अङकुरादि कार्यों को उत्पन्न करने में समर्थ हैं । इस में सब की परस्परापेक्षा कैसी ?

उस क्षण में मुख्य सहकारी दोनों प्रकार के कारणों का सम्मेलन इसलिए नहीं होता कि मिलकर ही वे कार्य को उत्पन्न कर सकते हैं , किन्तु उस क्षण में नियमित रूप से सम्मेलन की सामग्री रहती है अतः उस क्षण में सभी कारण अवश्य ही सम्मिलित होते हैं । प्रश्न यह रह जाता है कि ' नियमत : उसी क्षण में क्यों एकत्र हों ?

इस का यही उत्तर है कि ' यह उनका स्वभाव है ' ( उ ० ) मुख्य कारण और सहकारियों में से प्रत्येक भी यदि स्वतन्त्र रूप से कार्य कर सकते हैं तो फिर वे अलग अलग अपना काम करेंगे , एक ही काम को सब मिलकर क्यों करेंगे ? ( प्र ० ) यह तो उन कारणों से ही पूछिये कि प्रत्येकशः वे कार्य करने में समर्थ होते हुए भी क्यों सम्मिलित होकर एक ही कार्य को करते हुए से प्रतीत होते हैं । इस अभियोग के भागी हमलोग नहीं । हमलोग तो वस्तुओं को जैसा देखते हैं वैसा ही वर्णन करते हैं ।

( उ ० ) कार्य जब एक ही कारण से सम्पादित हो जाता है तब शेष कारण क्या करते हैं , ठीक है वे उस एक कारण से किए जाते हुए कार्य को ही ( प्र ० ) कारण से को ही शेष करते हैं ? एक उत्पन्न हुए कार्य कारण नहीं करते हैं किन्तु एक के द्वारा सम्पादित होते हुए कार्य का ही सम्पादन शेष कारण भी करते हैं । ( उ ० ) जहाँ एक ही कारण से कार्य सम्पादन की सम्भावना है वहाँ और कारणों का क्या उपयोग है ?

( प्र ० ) यह आक्षेप सत्य है , किन्तु वे कारण तो कुछ समझ कर काम करने को क्षमता नहीं रखते कि एक ने इस काम को कर ही दिया तो हम लोगों को इस झंझट से क्या प्रयोजन ? यह समझकर इस से उदासीन हो जाँय । ( उ ० ) फिर भी यह दुर्घट ही है कि समान शक्ति वाले अनेक कारणों से एक ही कार्य की उत्पत्ति हो , क्योंकि कारणों के भेद से ही कार्यों के भेद होते हैं ।

( फलतः विभिन्न कारणों से विभिन्न हो कार्य होंगे , एक कार्य नहीं ) ( प्र ० ) यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि सहकारियों के भेद से कार्यों का भेद नहीं होता है , किन्तु सामग्रियों ( कारणसमूहों ) के भेद से कार्यों में भेद होता है । एक कार्यकारित्व ही अर्थात् मुख्य कारण से होनेवाले कार्य को मुख्य कारण के साथ मिलकर करना ही ' सहकारित्व ' है । अतः वस्तुओं को क्षणिक मानने पर ही क्रमशील भावों से क्रमशः कार्य की उत्पत्ति की सम्भावना है ।

अक्षणिक स्थिर वस्तुओं से कार्य की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है । एवं युगपत्कारित्व ( एक ही काल में अनेक कार्यों का सम्पादन ) भी सम्भव नहीं है , क्योंकि एक ही काल में अनेक कार्यों की सम्पादकता ही ' युगपत्कारिता ' है , इस युगपत्कारिता रूप सामर्थ्य का तो कारणों से लोप नहीं होगा ? तब फिर उन्हीं कार्यों की उत्पत्ति बराबर होती रहेगी । ( उ ० ) उत्पन्न कार्यों की फिर से उत्पत्ति नहीं हो सकती है । अपने से होनेवाले सभी कार्यों का सम्पादन वह कर चुका है यतः उस को कुछ कर्तव्य भी नहीं है ।

अतः उसके बाद वह कार्य का सम्पादन नहीं कर सकता । ( प्र ० ) फिर आगे के क्षणों में उस की सत्ता ही सम्भव नहीं है , क्योंकि उन क्षणों में उस में किसी किसी अर्थक्रिया का जनकत्व नहीं है । अतः सत्त्व के व्यापक क्रमकारित्व युगपत्कारित्व ये दोनों ही अक्षणिक स्थिर वस्तुओं में नहीं रह सकते ( अतः अक्षणिक स्थिर किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है ) फलतः सत्त्व क्षणिक वस्तुओं में ही नियमित हो जाता है ।

अत : सभी वस्तुओं में क्षणिकत्व का यह अनुमान सुलभ हो जाता है कि जो सत् है अवश्य ही क्षणिक है , जैसे कि द्वादश आयतन । ( उ ० ) हम लोग इस आक्षेप का यह समाधान करते हैं कि सत्त्व हेतु से क्षणिकत्व की सिद्धि नहीं हो सकती है , क्योंकि इस अनुमान के हेतु में ' विपक्षव्यावृत्ति ' अर्थात् विपक्षासत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता है ।

( प्र ० ) " जिसमें न क्रमशः कार्य के उत्पादन का सामर्थ्य है अर्थात् क्रमकारित्व है और न कार्यों को एक ही समय में उत्पादन का सामर्थ्य अर्थात् युगपत्कारित्व है वह सत् भी नहीं है जैसे कि घोड़े की सींग ” इस बाधक अनुमान के बल से स्थिर वस्तुओं से सत्व हट जाता है , अतः स्थिर वस्तुओं में सत्त्व के अभाव की प्रतीति होती है । अक्षणिक वस्तु ही प्रकृत में विपक्ष है । अत . अक्षणिक वस्तु रूप विपक्ष के ज्ञान के विना विपक्षव्यावृति का ज्ञान सम्भव नहीं है ।

प्रतीत होनेवाले जल में ही वह्नि और धूम के अभाव की प्रतीति होती है । इसी प्रकार जब अक्षणिक कोई वस्तु देखी जायेगी तब उस में क्रम और योगपद्य के न होने . से सत्र का अभाव समझेंगे । किन्तु आप ( बौद्ध ) के मत में कोई भी वस्तु अक्षणिक नहीं है । ( प्र ० ) जैसे कि अप्रतीत पिशाच में अन्य से व्यावृत्ति की यह प्रतीति होती है कि ' स्तम्भ पिशाच नहीं है ' यहाँ भी वैसे ही विपक्ष - व्यावृत्ति की प्रतीति होगी ?

( उ ० ) ' व्यावृत्ति ' अर्थात् वृत्तित्व के अभाव का निश्चय अनुपलब्धिरूप अभाव प्रमाण से ही हो सकता है । अनुपलब्धि केवल उपलब्धि का अभाव ही नहीं है , किन्तु प्रतीत होनेवाले अभाव के प्रतियोगी से भिन्न की उपलब्धिरूप है । अतः ( विरक्ष व्यावृत्ति में अपेक्षित ) अनुपलब्धि साध्याभाव के प्रतियोगीरूप साध्यकी उपलब्धि के विना असम्भव है ( अर्थात् पिशाच की , यदि असत्ता सिद्ध हो जाय तो फिर उस का ज्ञान ही असम्भव है ' ) ( प्र ० ) तो फिर स्तम्भ पिशाच नहीं है ' यह प्रतीति कैसे होती है ?

( उ ० ) यह संसर्ग के अर्थात् आधारआधेयभाव के नियामक पिशाच के सम्बन्ध के अभाव की प्रतीति नहीं है , किन्तु यह उस के तादात्म्य के प्रतिषेध की प्रतीति है , यह भी स्तम्भ रूप से सम्भावित पिशाच को दृश्य मान कर ही प्रवृत्त होता है , अन्यथा नहीं , । जैसा कहा है कि तादात्म्य सम्बन्ध से जितने निषेधों की प्रतीति होती है वे निषिद्ध होनेवाले सभी वस्तुओं की सत्ता मान कर ही होती है ।

यहाँ केवल स्तम्भ में ही होनेवाली ' यह स्तम्भ है ' यह प्रतीति ही स्तम्भ के स्वरूप से भिन्न पिशाचादि के निषेध का कारण होती है । तदनुकूल न्याय का प्रयोग ऐसा है कि ' अगर यह स्तम्भ पिशाच होता तो यह पिशाचत्व रूप से ज्ञात होता , किन्तु स्तम्भोऽयम् ' यह ज्ञान स्तम्भत्व की तरह पिशाचत्व को समझाने में असमर्थ है । अतः स्तम्भ पिशाच नहीं है ।

( प्र ० ) प्रतीत होनेवाले नीलादि पदार्थों से भिन्न क्षणिक या अक्षणिक कोई पदार्थ है ही नहीं किन्तु पहले की बुद्धि से ज्ञात नीलादि क्षणों में जब वर्त्तमान कालिक बुद्धि के द्वारा ज्ञात क्षण का अभेदभ्रम होता है तभी नीलादि अक्षणिक ( स्थिर ) कहलाते हैं । जब वे ही क्षण भिन्न भिन्न रूप से ज्ञात होते हैं तभी नीलादि क्षणिक कहलाते हैं । यही स्थिर रूप से अभिमत नीलादि न क्रमशः कार्यों का उत्पादन कर सकते हैं , न एक ही समय में ( युगपत् ) कार्यों का उत्पादन कर सकते हैं ।

इस ( क्रम योगपद्याभाव ) की प्रतीति से स्थिर रूप से अभिमत नीलादि में हो सत्त्व के अभाव की प्रतीति होगी । क्योंकि अगर पहिले के ज्ञात क्षण में ही नीलादि की प्रतीतियाँ होती हैं , तो फिर वह ( क्षण ) अभी उत्पन्न होने वाले कार्यों को पहिले ही उत्पन्न करता , या पहिले उत्पन्न होनेवाले काय को अभी उत्पन्न करता । किन्तु क्रमशः तो वह कार्यों का उत्पादन कर नहीं सकता है , क्योंकि एक ही वस्तु में कारकत्व एवं अकारकत्व दोनों विरुद्ध धर्मों का समावेश असम्भव है ।

यह भी सम्भावना नहीं है कि सभी कार्यों को पहिले ही कर देता है तब तो इस समय अर्थ क्रिया से रहित होने के कारण वस्तु की ( वर्त्तमान काल में सत्ता हो ) उठ जायगी । ( उ ० ) आप के प्रदर्शित विपक्ष की ( स्थिरत्वेन व्यवहृत नीलादि की ) सत्ता यथार्थ है ? या काल्पनिक ? इस की सत्ता वास्तविक तो है नहीं , क्योंकि उक्त नीलादि का अक्षणिकत्व ( आप के मत से ) अवास्तविक है ।

अतः अनुमान के द्वारा वास्तव वस्तुओं की सिद्धि की इच्छा रखनेवाले को चाहिए कि हेतु के तीनों रूपों ( पक्षसत्त्व , सपक्षसत्त्व , एवं विपक्षासत्त्व ) के निश्चय के लिए धूमानुमान की तरह पक्षादि ( पक्ष , सपक्ष , एवं विपक्ष ) की काल्पनिक नहीं , वास्तविक सत्ता दिखलावे , किन्तु आप के मत से अक्षणिक वस्तुओं की वास्तविक सत्ता है नहीं ।

फलत : व्यतिरेक व्याप्ति भी नहीं बन सकती है | ( क्योंकि विपक्ष असिद्ध है ) इसी तरह अन्वय व्याप्ति भी नहीं बन सकती है , क्योंकि अन्वयव्याप्ति में भी विपक्ष का ज्ञान आवश्यक है | अतः कथित सत्त्व रूप हेतु ( केवल पक्ष में ही रहने के कारण ) असाधारण नाम का हेत्वाभास है ।

और भी बात है कि ( कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति रूप ) बाध मूलक अक्षणिकत्व हेतु से विपक्ष में असस्त्र रूप साध्य के अभाव का आपने निश्चय किया है , किन्तु क्षणिकत्व और सत्व में ( नियत ) सामानाधिकरण्य रूप अन्वय ( व्याप्ति ) किस हेतु से सिद्ध होगा ? केवल विपक्ष में न रहने से ही हेतु साध्य का साधन नहीं कर सकता है । क्योंकि इस प्रकार तो असाधारण हेत्वाभास से भी यथार्थ अनुमिति की आपत्ति होगी । केवल व्यतिरेकी अनुमान तो स्वयं ही दूषित है ।

( प्र ० ) अक्षणिकों ( स्थिरों ) ' सत्त्व नहीं है ' यह सिद्ध हो जाने पर यह ' अन्वय ' अर्थात् सिद्ध हो जाता है कि ' सत्त्व क्षणिक वस्तुओं में ही है । ( उ ० ) " अर्थात् " पञ्चमी विभक्ति युक्त इस हेतु बोधक पद से ' सत्त्व ' हेतु ही अभिप्रेत है , किन्तु अन्वय के असिद्ध होने के कारण उसमें हेतुत्व ही असिद्ध 1 ( 50 ) कथित कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति रूप दोष के ही दो व्यापारों की कल्पना करेंगे , एक से अक्षणिकों में असत्त्व की सिद्धि होगी और दूसरे से क्षणिकों में सत्व की सिद्धि होगी ।

अथवा वही बाधक अम्वयसाधक दूसरी व्याप्ति रूप प्रमाण को उपस्थित करता हुआ द्वादशायतनों में ही सत्त्र को सिद्ध करेगा । क्योंकि व्याप्ति की प्रतीति विषय के विना नहीं हो सकती है । एवं द्वादशायतनों से भिन्न किसी वस्तु की सत्ता है नहीं । उस में अन्वय की प्रतीति से क्षणिकत्व की प्रतीति अवश्य होगी । क्योंकि जहाँ सम्बन्ध की प्रतीति रहेगी वहाँ सम्बन्धियों को भी प्रतीति अवश्य ही रहेगी ।

अतः पहिले पक्ष में सत्त्वसिद्धि की कोई आवश्यकता नहीं है : व्याप्ति सामान्य रूप से ही गृहीत होगी और सत्त्व हेतु से विशेष की सिद्धि होगी ' अर्थात् उस सामान्य व्याप्ति से ही विशेष तत्तद्वयक्तियों में सत्त्व की सिद्धि होगी । ( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि विशेषों को छोड़कर सामान्य की प्रतीति नहीं होती है | एवं जब कि विशेष व्यक्तियों में क्षणिकत्व सामान्य और सत्व सामान्य की सिद्धि उस सामान्य व्याप्ति से हो ही गयी तो फिर नीलादि वस्तुओं में भी क्षणिकत्व ज्ञात हो ही गया ।

उसके लिए सत्त्व हेतु की फिर से आवश्यकता नहीं है अतः हम ने ठीक ही कहा है कि सत्त्व हेतु की कोई सार्थकता नहीं है । ( प्र 1 ) कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति रूप बाधक से ही अक्षणिकत्वव्यावृत्ति ' ( अक्षणिकत्वाभाव ) एवं ' असत्त्वव्यावृत्ति ' ( अर्थात् असत्त्वाभाव ) इन दोनों की व्याप्ति का ज्ञान होता है और सत्त्व से भावस्वरूप क्षणिकत्व की प्रतीति होती है ।

( उ ० ) व्यावर्त्य ( व्यावृत्ति के अभाव के प्रतीति का प्रयोजक ) के भेद से ( असत्त्वव्यावृत्ति एवं अक्षणिकत्व व्यावृत्ति इन ) दोनों व्यावृत्तियों में भी भेद की कल्पना करनी पड़ेगी । किन्तु साध्य और हेतु के तादात्म्य को आप ( बौद्ध ) अनुमान का अङ्ग मानते हैं ।

( प्र ० ) भावस्वरूप क्षणिकत्व और सत्त्व इन दोनो में तो तादात्म्य है ही , इस वादात्म्य से ही , ' सत्त्व और क्षणिकत्व ' इन दोनों के अभिन्न रूप से कल्पित अक्षणिकत्वव्यावृत्ति और असत्त्वव्यावृत्ति इन दोनों में भी तादात्म्य होगा । ( उ ० ) वस्तुओं का तादात्म्य किन्हीं और चीजों से साधन करने योग्य वस्तु नहीं है । अगर वह तादात्म्य अन्य वस्तु से ही सिद्ध हो तो फिर उक्त कार्यकारणभाव की अनुपत्ति का प्रदर्शन ही व्यर्थ है ।

( अभाव रूप ) दोनों व्यावृत्तियों में व्याप्ति निश्चय होने पर भी क्षणिकत्व रूप भाव पदार्थ की सिद्धि नहीं हो सकती है , क्योंकि भाव और अभाव दोनों भिन्न वस्तुएँ हैं । एवं इन दो विरुद्ध वस्तुओं में सम्बन्ध भी असम्भव है ।

धर्मोत्तर ने यह कहा है कि ( प्र ० ) उक्त बाधक के बल से घटादि में व्याप्ति की सिद्धि के बाद शब्दादि में सत्त्व हेतु से क्षणिकत्व की सिद्धि करेंगे । इस प्रकार बाधक के उपन्यास और सत्व हेतु दोनों की सार्थकता विषय भेद से है | ( उ ० ) किन्तु उनका यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि शब्दादि में ( घटादि पदार्थों की तरह ) उस बाधक के बल से ही क्षणिकत्व की सिद्धि होगी , उसके लिए भी सत्त्व हेतु का अवलम्बन व्यर्थ ही है ।

वस्तुतः यह कहना ही भूल है कि ' वस्तुएँ अगर क्षणिक न मानी जाँय तो उन से अर्थक्रिया का सम्पादन असम्भव है ' । क्योंकि वस्तुओं का यह स्वभाव है कि वे सहकारियों से सहायता प्राप्त करके ही कार्यों का सम्पादन करती हैं उन से निरपेक्ष रह कर नहीं । अतः यह निश्चित होने में कोई बाधा नहीं है कि अन्वय और व्यतिरेक से जिस में कार्य को उत्पन्न करने का सामार्थ्यं ज्ञात हो गया है , वे सहायक जब बीजादि प्रधान कारणों के साथ सम्मिलित होते हैं तभी कार्यों की उत्पत्ति होती है ।

इस प्रकार स्थिर वस्तुओं से भी क्रमशः कार्यों की उत्पत्ति हो सकती है । क्योंकि अनेक कारणों से उत्पन्न होने से एक कार्य की उत्पत्ति केवल किसी एक कारण से नहीं हो सकती है | ( प्र ० ) तब फिर सहकारि कारणों से उत्पन्न ' अतिशय ' रूप विलक्षण सामर्थ्य से ही उत्पत्ति होगी , ' भाव ' ( अर्थात् बीजादि मुख्य कारणों ) को कारण मानने की क्या आवश्यकता है ? ( उ ० ) इसलिए कि कार्यों में भावों के मूल कारणों की अनुवृत्ति देखी जाती है ।

यदि बीज ( अङ्कुर का ) कारण ही न हो , तो फिर यब के बीज से पृथिवी जलादि सहकारियों का संनिधान रहने पर धान के अङ्कुरः की भी उत्पत्ति होगी । क्योंकि ( यत्र बीज से यवाङ्कुर ही हों एवं धान्य बीज से धान्याकुर ही ) इस नियम का कोई ज्ञापक नहीं है । यह कहना भी दूषित है कि मूल कारण में सहकारिकारणों से किसी अतिशय की उत्पत्ति होती है । क्योंकि वे सहकारी हो हैं और उन का साहित्य ही ' अतिशय ' है , इस साहित्य का अभाव ही ' अनतिशय ' अर्थात् विलक्षण सामर्थ्य का न रहना है । ( प्र ० ) मूल

२४ कारण को जिस क्षण में सहकारियों का साहित्य मिलता है , उस से अव्यवहित आगे कार्य की उत्पत्ति होती है । और जिन क्षणों में वह साहित्य उन को नहीं मिलता है । उनसे अव्यवहित अग्रिम क्षण में कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है ।

इस अन्वय और व्यतिरेक से यह समझते हैं कि वह साहित्यक्षण ही ' जनकक्षण ' है और उस से भिन्न सभी ' अजनकक्षण ' है ( दो प्रकार के क्षणों में रहनेवाले बीजादि कोई एक स्थिर वस्तु नहीं हैं ) ( उ ० ) किन्तु ' जिस बीज को मैंने कल घर में देखा था उसी बीज को आज खेत में देख रहा हूँ इस प्रकार एक ही बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का ग्राहक प्रत्यक्ष बीजों के क्षणिकत्व का बाधक है ।

( प्र ० ) एक ही बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का भान इस लिए होता है कि उत्पन्न हुए अनेक बीजक्षण परस्पर अत्यन्त सदृश हैं , अतः उन का परस्पर भेद समझ नहीं पड़ता है । फलतः एक हो बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का ग्राहक उक्त प्रत्यक्ष ही भ्रम रूप है । ( उ ० ) उक्त प्रत्यक्ष भ्रान्त क्यों है ? इस लिए कि सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं । सभी वस्तुएँ क्षणिक क्यों है ? इसलिए कि उक्त प्रत्यक्ष भ्रान्ति रूप है । इस प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष स्पष्ट है ।

यह तो ठीक नहीं है कि अन्वय और व्यतिरेक से जिन में उत्पत्ति और विनाश की कारणता सिद्ध हो गयी है उन के बिना भी उत्पत्ति और विनाश माने जाँय । एवं ये दोनों बातें भी ठीक नहीं है कि ( १ ) विनाश विना कारण के हो उत्पन्न होता है एवं ( २ ) बीज ही बीज का कारण है ।

( ' बीज हो बीज का कारण नहीं है ' इस में यह अनुमान भी प्रमाण है कि ) बीज अङकुरजनक बीज का कारण नहीं है क्योंकि मञ्च पर रखे हुये बीज की तरह वह भी बीज है आप ( बौद्धों ) का यह कहना भी ठीक नहीं है कि ( प्र ० ) ' वस्तुओं के अनेक भाग नहीं हैं अतः एक ही वस्तु में कारकत्व और अकारकत्व इन दोनों विरुद्ध धर्मों का समावेश नहीं हो सकता है ' ( उ ० ) क्योंकि एक हो अग्नि में दाह का कारकत्व भी है एवं स्नान का अकारकत्व भी है । इस कारकत्व या अकारकत्व से वह्नि में कोई अन्तर नहीं आता है ।

इसी प्रकार एक भाव ( बीजादि ) में सहकारियों के सहयोग से कारकत्व और असहयोग से अकारकत्व दोनों ही रह सकते हैं ( इसके लिए उन के स्वरूप में कोई अन्तर मानने की आवश्यकता नहीं है ) ( प्र ० ) अन्य वस्तुओं के सांनिध्य से अन्य वस्तु में कारकत्व ही क्यों आता है ? और कुछ विशेष वस्तुओं में ही वह क्यों सीमित रहता है ? सभी वस्तुओं में नहीं । ( उ ० ) यह अभियोग तो वस्तुओं के स्वरूप के ऊपर लाना उचित है , हम लोगों के ऊपर नहीं ।

पृथिवी , जल और बीज ये तीन ही अङकुर के उत्पादन में परस्पर सहकारी हैं ' इस अपने पक्ष में आप ही स्वभाव को छोड़ कर और क्या उत्तर देंगे । ( प्र ० ) बीजादि प्रत्येक ही स्वतन्त्र रूप से ) अङ्कुर के उत्पादन में समर्थ है , वे तो परस्पर सहकारी नहीं हैं । ( उ " ) तो फिर जोते हुए खेत में बीजों को बो कर उसे पानी से सींचते क्यों हैं ?

( प्र ० उन सभी कारणों से परस्पर के आधिपत्य के द्वारा अङ्कुरोत्पत्ति की योग्यता रखने वाले क्षण की उत्पत्ति के योग्य क्षण की उत्पत्ति के लिए ही जल सिवनादि की आवश्यकता होती है । ( उ ० ) यदि बीज में अपने कारणों से ही अङ्कुर के उत्पादन योग्य क्षण को उत्पन्न का सामर्थ्य उत्पन्न होता है तो फिर खेत और जल वहाँ क्या करते हैं ? अगर बीज उस में असमर्थ है तो असामर्थ्य रूप अपने स्वभाव को छोड़ नहीं सकता है ।

( प्र ० ) प्रत्येक क्षण में रहनेवाले बीज अनेक हैं , सुतरामु क्षण भी अनेक हैं , उन क्षणों के समूह में से जो क्षण अकुर के उत्पादन में असमर्थ है उन में अङ्कुर की उत्पादिका शक्ति को जल और पृथिवी रोकते हैं । ( उ ० ) मान लिया कि पृथिवी और जल से असमर्थ क्षण की उत्पत्ति रोकी जाती है । फिर भी समर्थक्षण की उत्पत्ति असम्भव ही है , क्योंकि उसका कोई कारण नहीं है । एवं स्वभाव रूप शक्ति का कभी नाश नहीं होगा , क्योंकि इससे भाव का अर्थात् वस्तु का भी नाश हो जायगा ।

अतः विनाश का भी कारण अवश्य है । यह कहना भी ठीक नहीं है कि ( प्र ० ) सहकारियों में बीजादि में समर्थ क्षण की उत्पत्ति की शक्ति लायी जाती है , ( उ ० ) क्योंकि बीजादि क्षणिक हैं । स्वभाव से अभिन्न ही शक्ति का यदि उत्पादन मानें तो फिर वह उत्पन्न वस्तु का ही पुनरुत्पादन होगा | अतः आप के मत में भी ये दो ही गतियाँ सम्भव हैं कि ( १ ) जो उत्पत्तिशील होने पर भी असमर्थ हैं उनसे कभी कार्यों की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती है ।

या फिर ( २ ) उन में जो समर्थ हैं वह उत्पन्न होने के बाद ही अपना काम करेगा । किन्तु यह तो ( आप के मत में ) सर्वथा असम्भव है कि सहकारियों की सहायता से मुख्यकारण ( भाव कार्य को उत्पन्न करते हैं । ( प्र ० ) केवल एक ही वस्तु से कार्य की उत्पत्ति नहीं देखी जाती है , एवं बहुत सी वस्तुओं से कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है , अतः समझते हैं कि सहकारियों सहित मुख्यकारण में ही कार्य को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है ।

( उ ० ) तो फिर यही कहते हुए भी आपने हम लोगों को चक्कर में क्यों डाल रक्खा है ? तस्मात् अक्षणिकत्व की सिद्धि में बाधा डालनेवाली अर्थक्रिया की उपपत्ति रूप हेतु ही व्यभिचारी है !

( प्र ० ) बनाई हुई वस्तुओं का विनाश अवश्यम्भावी है । इस अवश्यम्भावी विनाश से भी वस्तुओं के क्षणिकत्व का अनुमान होता है । अभिप्राय यह है कि जो जिसका ' ध्र ुवभावी ' ( अवश्यम्भावी ) धर्म है वह किसी की अपेक्षा नहीं रखता है , जैसे कि शर , कृपाण आदि वस्तुओं का लौहमपत्व | बनाई हुई वस्तुओं का विनाश ' ध्रुवभावी ' है । यह ( ध्रुवभावित्व ) अनुमान खण्डन करता है कि ' वस्तुओं का विनाश किन्हीं स्वतन्त्र दूसरे हेतुओं से होता है ' क्योंकि जो किसी दूसरे हेतुओं से उत्पन्न होते हैं ' वे ' ध्रुवभावी ' नहीं हैं । जैसे की कपड़े का रङ्ग ! अगर भाव भी अपने विनाश के लिए अपने उत्पादन के हेतुओं से भिन्न दूसरे हेतुओं की अपेक्षा रक्खे , तो फिर उन कारणों में किसी प्रतिबन्ध के आ जाने से या विघटन हो जाने से कभी कभी बनाई हुई वस्तुओं में से किसी किसी का विनाश असम्भव हो जायगा । अतः अपने हेतुओं से विनाश स्वभाव की ही वस्तुओं की उत्पत्ति होती है और उत्पत्ति बाद ही वे विनष्ट हो जाती है । इस प्रकार ( ध्रुवभावित्व के द्वारा ) सभी वस्तुओं में क्षणिकत्व सिद्ध है ।

और भी बात है । वस्तुएँ अगर अविनश्वर स्वभाव की ही उत्पन्न हों तो फिर ह्न की शता की तरह उनका विनाश करना ही शक्ति के बाहर होगा । अगर ( कारणों से ) विनाशस्वभाव की ही वस्तुओं की उत्पत्ति होती है तो फिर विनाश के लिए दूसरे हेतुओं का क्या प्रयोजन ? एवं वस्तुओं से अभिन्न विनाश का कोई और कारण हो भी नहीं सकता है , क्योंकि कारणों की विभिन्नता हो वस्तुओं की विभिन्नता का कारण है ।

विभिन्न हेतुओं से भावों से भिन्न हो विनाशों की उत्पत्ति मानें तो फिर उन के स्वतन्त्र रूप से उपलब्धि प्रभृति आपत्तियाँ सामने आयेंगी । एवं एक वस्तु की उत्पत्ति से दूसरी वस्तु के स्वरूप का विघटन भी असम्भव है । अतः विनाश की प्रतीति ' घड़ा फूट गया ' इस प्रकार से भाव मूलक नहीं होगी किन्तु ' अभाव उत्पन्न हुआ है , इसी प्रकार का व्यवहार होगा । तब फिर यदि कोई पूछे कि घट का क्या हुआ ? तो फिर ' अभाव उत्पन्न हुआ ' इस प्रकार का उत्तर देना होगा जो असम्बद्ध ही होगा ।

अतः भाव एवं अभाव दोनों अभिन्न हो हैं । ( उ ० ) इस पर यह पूछना है कि उत्पन्न भाव एक ही क्षण तक रहता है ? या अनेक क्षणों तक भी ? यदि अनेक क्षणों तक उसकी सत्ता मानें तो फिर अनेक क्षणों में रहने के कारण उनका क्षणिकत्व ही व्याहत हो जायगा । यदि एक ही क्षण तक वस्तु की सत्ता मानें तो फिर आगे के क्षण में उत्पन्न होनेवाले विनाश काल में तो उस की सत्ता ही नहीं है फिर भाव और विनाश दोनों एक कैसे हैं ?

( प्र ० ) हम यह तो कहते नहीं कि भाव अपने ही अभाव अभिन्न है किन्तु ( हमारा यह कहना है कि ) द्वितीयक्षण पूर्वक्षण का ही अभाव है । ( उ ० ) यह कथन भी असङ्गत हो क्योंकि पूर्वक्षण रूप व्यक्ति और उत्तरक्षण रूप व्यक्ति भिन्न ही हैं , और उन में कोई विरोध नहीं है । जैसे एक घट दूसरे घट के साथ विद्यमान रहता है . वैसे ही क्षण समूहरूप एक ममुदाय के भी दूसरे व्यक्तियों के साथ रहने में कोई बाधा नहीं है । द्वितीय क्षण का ज्ञापक प्रमाण उसी में चरितार्थ हो जायगा ।

अतः प्रथमक्षण के निषेध में वह लागू नहीं होगा । भाव का प्रतिषेध ही अभाव है , क्योंकि ' घट नहीं है ' इस प्रकार से अभाव की प्रतीति होती है । अतः अभाव की उत्पत्ति ही भाव की निवृत्ति है और अभाव का रहना ही भाव का न रहना है एवं अभाव की उपलब्धि हो भाव की अनुपलब्धि है , क्योंकि भाव और अभाव दोनों परस्पर विरोधी हैं । अतएव भाव क्षणिक भी नहीं हैं , क्योंकि भावों के बाद दूसरे हेतुओं से उत्पन्न होनेवाले अभावों का यह नियम नहीं हो सकता कि भाव की उत्पत्ति के अव्यवहित क्षण में ही उत्पन्न हों ।

यह देखा भी जाता है कि घटादि उत्पन्न होने के बहुत दिनों बाद मुद्गरादि के प्रहार से नष्ट होते हैं । ( प्र ० ) मुद्गर के प्रहार से उत्पन्न होनेवाला घट का विनाश भावरूप ही है , क्योंकि कपाल समूह का उत्पादन ही घट विनाश का उत्पादन है ?

( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि ' सन्तान अपने सदृश ही दूसरे सन्तान को जन्म देता है " आप का यह नियम जब तक अक्षुण्ण है तब तक उससे विसदृश वस्तु को उत्पत्ति नहीं हो सकती है | यदि मुद्गर प्रहार से उस की साहशारम्भकत्व - शक्ति का विनाश हो इष्ट है तो फिर मुद्गरादि प्रहार से घटादि का नाश मानने में ही क्यों द्वेष है ? ( प्र ० ) भावों की तरह अभाव भी स्वतन्त्र कारण जन्य हों तो उन में भी वस्तुत्व ( भावत्व ) मानना अनिवार्य होगा ।

( उ ० ) नहीं , क्योंकि वे वस्तुओं के प्रतिषेध रूप से ही प्रत्यक्ष के विषय हैं । यही उन का स्वरूप है कि भावों की तरह कृतिजन्य होते हुए भी वे भावों की तरह नष्ट नहीं होते हैं , क्योंकि विनष्ट वस्तु की फिर से उपलब्धि नहीं होती है । प्रमाण से सिद्ध वस्तुओं का स्वभाव अगर किसी के सादृश्यमात्र से हट जाय तो फिर जगत् की विचित्रता ही ( प्र ० ) लुप्त हो जायगी । एक ( अभाव ) की उत्पत्ति से दूसरे ( अभाव ) की स्वरूपप्रच्युति क्यों होती है ।

( उ ० ) यह अभियोग लाने योग्य नहीं है , क्योंकि वस्तुओं का स्वभाव ही इस प्रकार का है । घट के अवयवों में क्रिया , तब विभाग इत्यादि द्रव्यनाश की सामान्य रीति से घटाभाव की उत्पत्ति होने पर ही " घट नष्ट हो गया " यह व्यवहार होता है , अतः यह अभाव घट का ही है नहीं । अभाव का कोई समवायिकारण नहीं है अतएव असमवायिकारण भी नहीं है । ( प्र ० ) कार्य को विना आधार के कहाँ देखा है ? ( उ ० ) यहीं , इस अभाव रूप कार्य को ही देखते हैं ।

क्योंकि समवाय सम्बन्ध से घट इसका आधार नहीं है , क्योंकि वह उसका अभाव ही है । भूतल भी उसका आधार नहीं है , क्योंकि वह दूसरे का धर्म है । इसका यह भी स्वभाव है कि वह जहाँ किसी वस्तु में संयोग सम्बन्ध से किसी भाव के प्रतिषेध का स्वरूप होता है वहाँ उस संयुक्त भाव की तरह प्रतीत होता है एवं जहाँ किसी वस्तु में समवाय सम्बन्ध से किसी वस्तु के प्रतिषेध - स्वरूप होता है वहां उस समवेत वस्तु की तरह प्रतीत होता है । प्रतियोगियों में रहने वाले संयोगादि के अनुसार ही वह विशेषण भी होता है ।

अभाव में स्वतः संयोग या समवाय नहीं है , क्योंकि ये दोनों हीं भाव के धर्म हैं । अतः अभाव नाम का एक स्वतन्त्र पदार्थ है और वह भाव पदार्थों का विरोधी है जो ' नास्ति ' प्रभृति शब्दों से प्रतीत होता है । जिससे कि वह्नि और पाला में विरोध है क्योंकि वह्नि में पाले का अभाव है और पाले में वह्नि का अभाव है । यही उन दोनों में विरोध है । स्वतन्त्र रूप से सिद्ध एक भाव का स्वतन्त्र रूप से सिद्ध दूसरे भाव के साथ विरोध का कोई दूसरा प्रकार नहीं है ।

यह जो आप ने कहा कि ( प्र ० ) अभाव यत : ' ध्रुवभावी ' है , अतः उसे भाव के कारणों से अतिरिक्त किसी कारण की अपेक्षा नहीं है ' ( उ ० ) आपका यह ' ध्रुव भावित्व ' हेतु भी सूर्य के उदय और अस्त में नहीं देखा जाता है । वे दोनों अगर विभिन्न हेतुओं की अपेक्षा न रक्खें तो फिर वे दोनों विभिन्नकालिक भी न होंगे उदय और अस्त दोनों को आपत्ति एक ही क्षण में होगी । अगर एक की उत्पादक सामग्री से दूसरे का प्रतिरोध मानें तो फिर वही ( ध्रुवभावित्वानुपपत्ति की ) आपत्ति होगी ।

वस्त्र के रङ्ग के काल और हेतु दोनों ही नियत हैं , अतः उस नियत काल का भी सांनिध्य न रहने के कारण वस्त्र में राम के अनुत्पाद की सिद्धि होती है , किन्तु भावों के विनाश के काल नियत होने पर भीउसके हेतु अनन्त हैं । अतः सर्वदा सभी का प्रतिरोध असम्भव है । अतः नियमित कालों में से किसी क्षण में कोई अप्रतिरुद्ध कारण रह ही जायगा , वही कारण ज्यो क्षण में भाव का विनाश कर देगा । इस प्रकार कृतिजन्य होने पर भी विनाश के ध्रुवभावित्व में कोई बाधा नहीं है ।

क्षणभङ्ग ( भाव एक क्षण में उत्पन्न होते हैं और उसके बाद के अगले ही क्षण में नष्ट हो जाते हैं इस सिद्धान्त ) के साधक उक्त सभी हेतु कालात्ययापदिष्ट ' अर्थात् बाध रूप हेत्वाभास से दूषित हैं । क्योंकि जिस घट को कल देखा था उसी को मैं आज देखता हूँ इस प्रत्यभिज्ञा से ज्ञात वस्तु ही फिर से ज्ञात होती है ।

( १० ) यह प्रत्यभिज्ञा नाम को व्रतोति अपने विषय घट में पूर्वकालवर्तित्व और उत्तरकालवर्तित्व इन दोनों को नहीं समझा सकती है , क्योंकि कारण की अनुपपत्ति से यह एक विज्ञान ही सिद्ध नहीं होती है । इन्द्रियाँ अपने सनिहित विषयों को ही ग्रहण करती हैं उनके पूर्वकालिकत्वादि को नहीं । संस्कार भी चूँकि पूर्वानुभव जनित है अतः पहिले अनुभूत विषयों की ही स्मृति को उत्पन्न कर सकता है , उत्तरकालिकत्व विषयक स्मृति को नहीं ।

पूर्वकालिकत्व और उत्तरकालिकत्व इन दोनों को छोड़ कर कोई दूसरा उभय ' यहाँ नही है , जिनसे युक्त घट विषयक ज्ञान को वह जन्म दे । प्रत्यभिज्ञा नाम का कोई एक विज्ञान नहीं है । इसमें यह हेतु भी है कि ' उसको ' यह प्रत्यक्षत्व का द्योतक है ' जिसको ' यह परोक्षत्व का द्योतक है । परोक्षत्व और प्रत्यक्षत्व दोनों परस्पर विरोधी हैं । परस्पर विरुद्ध दो वस्तुएँ एक काल में एक ही वस्तु में सम्बद्ध नहीं हो सकती हैं ।

अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा वस्तुतः दो ज्ञानों का एक समूह है , जिसमें ' जिस घट को ' यह अंश स्मृति रूप है एवं ' उसी को मैं देखता हूँ ' यह अंश अनुभव रूप हैं किन्तु दोनों ही भन्न के हैं । ( उ ० ) इस आक्षेप के समाधान में मैं कहता हूँ कि इस प्रत्यभिज्ञा से पूर्वकाल और उत्तर काल दोनों से सम्बद्ध एक ही वस्तुत्त्व की प्रतीति

२५ होती है । यह अनुभव से बाहर की बात है कि ' वह एक वस्तु प्रत्यभिज्ञा का विषय नहीं है ' यहाँ स्मृति और अनुभव दोनों एक विषयक नहीं हैं । अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा नाम की प्रतीति से यह कल्पना करनी पड़ेगी कि एक ही विज्ञान उभय विषयक है । विद्वान् लोग दृष्ट कार्य से अष्ट कारण को कल्पना करते हैं । कारण की अप्रतीति से अनुभूत कार्य का ही अपलाप नहीं करते । ऐसा करने पर संसार की विचित्रता ही लुप्त हो जायगी ।

( अतः यह कल्पना करनी पड़ेगी कि ) यद्यपि संस्कार और इन्द्रिय इन दोनों में से प्रत्येक प्रत्यभिज्ञा रूप कार्य के उत्पादन में समर्थ हैं तथापि मिलकर वे ही दोनों उक्त प्रत्यभिज्ञा रूप कार्य का सम्पादन कर सकते हैं । उक्त दोनों कारणों के प्रभाव से यह प्रत्यभिज्ञा पूर्वकाल और उत्तर काल दोनों विषयक होंगी । एवं इन्द्रियजन्य होने से प्रत्यक्ष भी कहलाएगी । यह कोई बात नहीं है कि जो स्वयं अकेला जिस कार्य को न कर सके , वह दूसरे के साथ मिलकर भी उस कार्य को न कर सके ।

क्योंकि पृथिवी जल और बो इनमें से प्रत्येक अङ्कुर के उत्पादन में असमर्थ होने पर भी तीनों मिल कर अङ्कुर का उत्पादन करते ही हैं । रही यह बात कि एक ही प्रत्यभिज्ञा में इन्द्रियों से जन्य होने के कारण प्राप्त संनिहित विषयवाला ' प्रत्यक्षत्व ' एवं संस्कार से उत्पन्न होने के कारण प्राप्त असंनिहित विषयवाला ' परोक्षत्व ' परस्पर विरुद्ध इन दोनों धर्मों का समावेश कैसे होगा ? किन्तु यह अनुभव की बात है कि सामग्री की विलक्षणता से कार्य की विलक्षणता होती है ।

फलतः ये दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध ही नहीं हैं । अत एव इन्द्रियसंनिकर्ष के न रहने पर भी ' पूर्वकाल ' में भी प्रत्यक्षविषयत्व है क्योंकि तह इन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय है । इन्द्रियजन्य ज्ञान विषयत्व ही ( विषयनिष्ठ ) प्रत्यक्षत्व है । ( इन्द्रिय सविकर्ष उसका प्रयोजक नहीं है ) ।

असंनिहित विषयों में से इन्द्रियाँ पूर्वकालिक विषयों को ही ग्रहण करती हैं . भविष्यत्कालिक विषयों को नहीं , क्योंकि ( असंनिहितविषयक प्रत्यक्ष का ) संस्कार रूप सहकारी नहीं रहता है ' | ( अतः ) वर्तमान और अतीत काल विषयक एक ज्ञान में कोई विरोध नहीं है , जिससे कि दोनों कालविषयक प्रत्यभिज्ञा रूप ज्ञान में भ्रमत्व को कल्पना की जाय । एक ही वस्तु में अनेक विशेषणों का सम्बन्ध हो सकता है , जैसे कि छाता और पुस्तक दोनों के साथ एक ही चैत्र का सम्बन्ध देखा भी जाता है ।

चैत्र में इन दोनों के और एककालिक सम्बन्ध और विभिन्नकालिक सम्बन्ध में कोई अन्तर नहीं है । क्योंकि एक ही विशेष्य में दोनों विशेषणों से वैशिष्ट्य की प्रतीति दोनों ( चैत्र और प्रत्यभिज्ञा ) स्थानों में समान ही है । तस्मात् उक्त रीति से विभिन्न देश विभिन्न काल और विभिन्न अवस्था इन तीनों में एक ही वस्तुतत्त्व को समझाने वाली उक्त प्रत्यभिज्ञा भावों की प्रतिक्षण उत्पत्ति और विनाश ( क्षणभङ्ग ) को जड़ मूल से उखाड़ फेंकती है । ( प्र ० ) उक्त प्रत्यभिज्ञा तो भ्रान्ति है ? ( उ ० ) क्यों ?

कोई बाधक तो नहीं है ? ( प्र ० ) क्षणभङ्ग के साधक ही उक्त प्रत्यभिज्ञा के प्रमात्व के बाधक हैं | ( उ ० ) इसमें यह अन्योन्याश्रय दोष है यतः उक्त प्रत्यभिज्ञा रूप प्रत्यक्ष बाधित है अत : क्षणिकत्व का अनुमान होता है , और वह प्रत्यक्ष बाधित क्यों है ? क्योकि अनुमान के द्वारा क्षणिकत्व सिद्ध है । प्रत्यक्ष में यह बात नहीं है , क्योंकि उसे किसी दूसरे प्रमाण की अपेक्षा नहीं है ।

( ० ) प्रत्यक्ष प्रमाण से दीप की शिखा अनेक कालों तक रहनेवाली प्रतीत होती है , किन्तु सभी मतों से सिद्ध अनुमान के द्वारा यह निर्णीत है कि वहाँ प्रतिक्षण ज्वाला की उत्पत्ति होती है । अत : प्रत्यक्ष से बाधित सभी अनुमान भ्रम ही नहीं होते । ( उ ० ) दीपशिखा स्थल में प्रत्यक्ष केवल सामान्य विषयक होता है और अनुमान विशेष विषयक होता है , अतः विभिन्न विषयक होने के कारण वहाँ प्रत्यक्ष से अनुमान का बाध नहीं होता है ।

जो कोई अति प्रौढ़तावश क्षणभङ्ग को प्रत्यक्षप्रमाण से ही सिद्ध करना चाहते हैं उनके लिए अनुभव का अभाव ही उत्तर है । क्योंकि ' यह नोल है ' यही प्रतीति होती है यह ' क्षणिक है ' इस प्रकार की प्रतिति नहीं होती है | ( प्र ० ) नोलत्व से क्षणिकत्व कोई भिन्न वस्तु नहीं है , क्योंकि क्षणिकत्व का कोई कार्य नहीं है , अतः यदि नीलत्व गृहीत होता है तो क्षणिकत्व भी ज्ञात हो ही जाता है ।

' यह नील है ' इस बुद्धि में क्षणिकत्व के स्फुट प्रतिभास न होने का यह हेतु है कि दोनों ( नीलक्षण और क्षणिकत्व का प्रतिभासक क्षण ) अत्यन्त सदृश हैं । ( उ ) यह तो बड़ी विलक्षण प्रज्ञा है कि जो अनुभव की भी व्याख्या करके यह समझाती है कि ' जो आपने नहीं समझा है वह भी उस अनुभव का विषय है अतः ( उक्त कथन से अभिप्राय सिद्धि की अभिलाषा ) मृगतृष्णा ही है । क्योंकि ' अमुक वस्तु प्रत्यक्ष सिद्ध है इस व्यवस्था का मूल प्रत्यक्ष प्रमाण जनित निश्चय से भिन्न और किसी को नहीं माना जा सकता ।

जिसके निश्चित हो जाने पर जो अवश्य ही निश्चित नहीं हो जाते . जैसे की नील और पीत उन दोनों को अभिन्न कहना भी प्रलाप ही है । ( प्र ० ) क्षणमात्र स्थायी प्रत्यक्षात्मक ज्ञान अपने काल में रहनेवाली वस्तु की सत्ता को समझाता हुआ एवं उस वस्तु में उस काल की असम्बद्धता को हटाता हुआ उस काल में रहनेवाली वस्तु की सत्ता के अव्यभिचारी दूसरे काल के सम्बन्ध का भी निषेध करता हुआ उस वस्तु के एक क्षणावस्थायित्व रूप क्षणिकत्व को भी ग्रहण करता है । ( उ ० ) यह कहना भी युक्ति से दुर्बल है ।

क्योंकि जो विज्ञान अपने स्वरूप को भी ग्रहण नहीं कर सकता वह अपने विषय रूप अर्थ की समानकालीनता ( क्षणिकत्व ) को कैसे ग्रहण करेगा ? अगर यह मान भी लें कि उक्त प्रत्यक्ष से क्षणिकत्व की प्रतीति होती है तो भी ' यह वस्तु पूर्वक्षण में नहीं थी , और आगे के क्षणों में भी नहीं रहेगी ' यह समझाने में उक्त प्रत्यक्ष कैसे समर्थ होगा १ क्योंकि पूर्वकाल ? ( भूत ) और पश्चात् काल ( भविष्यत् ) इन दोनों को समझाने में प्रत्यक्ष असमर्थ है ।

यह ठीक है कि किसी वस्तु में वर्त्तमान काल के सम्बन्ध का ज्ञान होने पर उस ज्ञान से भविष्यत् काल और भूतकाल दोनों हट जाते हैं , किन्तु ज्ञान के विषय उप नीलादि वस्तुओं से अनेक कालों का सम्बन्ध क्यों हटेगा ? एक ही सूत्र के साथ अनेक मणियों का सम्बन्ध तो होता है , क्योंकि उसमें कोई विरोध नहीं है । अपने ' तत्त्वप्रबोध ' और ' तत्त्वसंवादिनी ' नाम के ग्रन्थों में इन्हीं विषयों की आलोचना की है , अतः इस विषय के विस्तार से यहाँ विरत होते हैं ।

अब बात है कि अगर सभी वस्तुएँ क्षणिक हों तो संसार किसको होगा ? ( प्र ० ) ज्ञान समूह को ? ( उ ० ) नहीं , क्योंकि सन्तान ( समूह ) अपने सन्ता - नियों ( अर्थात् सन्तान घटक प्रत्येक व्यक्ति ) से भिन्न नहीं है । ( प्र ० ) एक ही वस्तु ( आत्मा ) का अनेक शरीरादि के सम्बन्ध ही संसार नहीं है किन्तु ज्ञान की निरवच्छिन्न ( अविरल ) धारा रूप सन्तान हो संसार है । यह संसार तो वस्तुओं को क्षणिक मान लेने पर भी उत्पन्न हो सकता है ।

( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि ' गर्भादि विषयक ज्ञान पहिले के ही ज्ञान से उत्पन्न होते हैं ' इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसका भी कुछ ठीक नहीं है कि वस्तुओं से ही समानजातीय वस्तुओं की उत्पत्ति होती हो , क्योंकि वह्नि से विभिन्नजातीय धूम की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) वस्तुस्थिति यह है कि जिसका जिसमें अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही हों , एवं जिसमें जिसके असाधारण रूप की अनुवृत्ति हो वही उसका समानजातीय है और उपादान भी है ।

( अतः यह सिद्ध है कि गर्भादि ज्ञान भी पहिले के अपने राजातीय ज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं ) बोधरूपता ही ज्ञान का असाधारण धर्म है , वह पृथिव्यादि भूतों में नहीं हैं । अतः जिसमें वह ( बोधरूपता है ) वही उसका समानजातीय है और उपादान भी है । इससे यह सिद्ध है कि गर्भज्ञान भी पहिले के गर्भज्ञान से ही उत्पन्न होता है , क्योंकि कार्य अगर कारणों के बिना भी हों तो फिर उनकी उत्पत्ति अनियमित हो जायगी ।

( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि काष्ठों के संघर्ष का स्वभाव दाह नहीं है काष्ठ से उनके मन्थन के द्वारा दाह स्वभाव के वह्नि को उत्पत्ति होती है | वैसे ही चक्षुरादि इन्द्रियों में बोधात्मकत्व शक्ति के न रहने पर भी उन से बोध स्वरूप विलक्षण धर्मविशिष्ट ज्ञान की उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं है । इसके लिए वोध स्वरूप कारण की कल्पना की आवश्यकता नहीं है । अतः इस मत में पूर्वजन्म की सिद्धि असम्भव है ।

आगे के जन्म की सिद्धि भी असम्भव है क्योंकि इसमें कोई प्रमाणनहीं कि मृत्यु हो जाने पर अन्तिम ज्ञान रूप शरीर अवश्य ही आगे के दूसरे शरीर रूप ज्ञान का अनुसन्धान करेगा । जहाँ पर जिस वस्तु की कारणावस्था में कोई विघटन नहीं हुआ रहता है वहाँ उस कारण से वस्तु की उत्पत्ति अवश्य ही होती है , जैसे कि कारणावस्था के विघटन से रहित बीज से अकुर की उत्पत्ति अवश्य होती है । शरीर के उक्त अन्तिम ज्ञान की भी कारणावस्था विघटित नहीं है । अतः यही प्रमाण इस पक्ष में अपर जन्म का साधक है ।

( उ ० ) उक्त हेतु अन्तिम क्षण

. प्रशस्तपादभाष्यम्

शरीरसमवायिनीभ्याञ्च हिताहितप्राप्तिपरिहारयोग्याभ्यां प्रवृत्तिनिवृत्तिभ्यां रथकर्मणा

सारथिवत् प्रयत्नवान् विग्रहस्याधिष्ठातानुमीयते , प्राणादिभिचेति । कथम् ? ( ३ ) शरीर में समवाय सम्बन्ध से रहने वाली हित की प्राप्ति एवं अहित का परिहार इन दोनों की प्रयोजक क्रियाओं के द्वारा प्रयत्न से युक्त आत्मा रूप शरीर के अधिष्ठाता का अनुमान करते हैं । जैसे कि रथ की गति रूप क्रिया से सारथि का अनुमान होता है । ( ४ ) प्राणादि से भी वायु का अनुमान होता है । ( प्र ० ) कैसे ? की ज्वाला में व्यभिचरित है । ( प्र ० ) अन्तिम क्षण में तेल बत्ती प्रभृति कारणता के अवैकल्य के सम्पादक नष्ट हो जाते हैं अतः उस क्षण की दीपशिखा की कारणावस्था विघटित हो जाता है | ( उ ० ) तो फिर मरण की पीड़ा से दुःखी अन्तिम शरीर रूप विज्ञान की भी कारणावस्था अविघटित नहीं है । अतः हमने ठीक हो कहा है कि वस्तु मात्र को क्षणिक मानने के पक्ष में परलोक की सिद्धि नहीं होगी अतः इससे विरत होता हूँ ।

' शरीरसमवायिनीभ्याम् ' इत्यादि से आत्मा की सिद्धि में और भी प्रमाण देते हैं । प्रवृत्ति और निवृत्ति से शरीर रूप विग्रह ( मूर्ति ) के प्रयत्न वाले अधिष्ठाता का अनुमानकरते हैं । लताओं ( वृक्षादि पर चढ़ने ) की प्रवृत्ति में व्यभिचार वारण करने के लिए ' शरीरसमवायिनीभ्याम् ' यह पद कहा है । जल के प्रवाह में गिरे हुए शरीर की प्रवृत्ति और निवृत्ति में व्यभिचार वारण के लिए ' हिताहितप्राप्तिपरिहारयोग्याभ्याम् ' इत्यादि से प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों में क्रमशः हितप्राप्तियोग्यत्व एवं अतिपरिहारयोग्यत्व ये दोनों विशेषण दिये गये हैं । ' हित ' शब्द का अर्थ है ' सुख ' एवं ' अहित ' शब्द का अर्थ है दुःख । इन दोनों का जो प्राप्ति परिहार ' अर्थात् सुख की प्राप्ति एवं दुःख का परिहार इन दोनों में समर्थ ' अर्थात् क्षम । इन दोनों विशेषणों में से ज्ञानजनित चेष्टा का संग्रह किया गया है ।

टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. १७५) १. बौद्धों का कहना है कि ' बीजों में अङ्कुरों को जन्म देने का सामर्थ्य

(पृ. १७७) १. अभिप्राय यह है कि बीजादि में सर्वदा अङकुरादि के उत्पन्न का सामर्थ्य है । ही । जब उसे खेत , पानी प्रभृति सहकारियों की सहायता पहुंचती है तभी उन से अङ्कुरादि कार्यों की उत्पत्ति होती है । २३

(पृ. १८०) १. अभिप्राय यह है कि वही हेतु साध्य का ज्ञापक हो सकता है जिसमें ( १ ) पक्ष सत्त्व ( २ ) सपक्षसश्व ( ३ ) विपक्षासत्त्व ४ ) अबाधितत्व एवं ( ५ ) असत्प्रतिपक्षितत्व ये पाँच रूप निर्णीत रहे । प्रकृत क्षणिकत्व के साधक सत्त्व हेतु में विपक्षध्यावृत्ति या विपक्षासत्त्व का निर्णय नहीं हो सकता है , क्योकि बौद्धगण संसार की सभी वस्तुओं में क्षणिकत्व का साधन करते हैं । अतः सभी पदार्थ पक्ष के हो अन्तर्गत आ गये हैं । विपक्ष के लिए कोई बचा ही नहीं । अतः प्रकृत में विपक्ष को अप्रसिद्धि के कारण विपक्षव्यावृत्ति भी अप्रसिद्ध ही है । अतः साध्यसाधक हेतु का ज्ञान न होने के कारण प्रकृतानुमान ठीक नहीं है ।

पृ. २००

भाष्य ७५

शरीरपरिगृहीते वा विकृतकर्मदर्शनाद् भस्त्राध्मापयतेव निमेषोन्मेषकर्मणा नियतेन दारुयन्त्र प्रयोक्तेव , देहस्य वृद्धिक्षतभग्नसंरोहणादिनिमित्त- त्वात् गृहपतिरिव , अभिमत विषयग्राहककरण सम्बन्धनिमित्तेन मन : - कर्म्मणा गृहकोणेषु पेलकप्रेरक इव दारकः , नयनविषयालोचनानन्तरं रसानुस्मृतिक्रमेण रसनविक्रियादर्शनादनेक गवाक्षान्तर्गत प्रेक्षकवदुभयदर्शी कश्चिदेको विज्ञायते ।

सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयस्नैश्च गुणैर्गुण्यनुमीयते ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २००प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 275

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( उ ० ) वायु की गति स्वभावतः कुटिल होती है , किन्तु उसके विपरीत प्राण वायु की गति कभी ऊर्ध्व भी देखी जाती है , अतः भाथी को चलाने वाले की तरह् शरीर सम्बन्धी वायु को भी ऊपर की तरफ चलाने वाला कोई अवश्य है । उसी का नाम है ' आत्मा ' । ( ५ ) निमेष और उन्मेष की क्रिया से भी कठपुतली को नचाने वाले की तरह आत्मा का अनुमान होता है । ( ६ ) देह की वृद्धि , घाव एवं टूटे हुए अङ्गों का पुनः संघटन इन दोनों से भी घर के मालिक की तरह प्रयत्न विशिष्ट आत्मा का अनुमान होता है । ( ७ ) अभिमत विषयों को ग्रहण करनेवाली चक्षुरादि इन्द्रियों ICT विषयों के साथ सम्बन्ध करानेवाले मन की क्रिया से भी आत्मा का अनुमान होता है । जैसे घर के एक कोने में रक्खी हुई लाख की गोली पर दूसरी लाख की गोली फेंक कर खेलने वाले लड़के का अनुमान होता है । ( ८ ) चाक्षुष ज्ञान के बाद रस की स्मृति के क्रम से रसनेन्द्रिय में विकार देखा जाता है । ( अर्थात् मुँह में पानी भर आता है ) । इससे भी अनेक गवाक्षों से एक देखने वाले की तरह रूप और रस दोनों के एक ज्ञाता रूप आत्मा का अनुमान होता है । ( ६ ) सुख , दु : ख , इच्छा , द्वेष और प्रयत्नादि गुणों से भी गुणी आत्मा का अनुमान होता है । वे ( सुखादि )

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' रथकर्म्मणा सारथिवत् यह वाक्य अनुमान का दृष्टान्त दिखाने के लिए है । सुखसाधनों के ग्रहण के द्वारा ही जिस चेष्टा से हित की प्राप्ति होती है , एवं दुःख साधनों के परिवर्जन के द्वारा ही जिस चेष्टा से अहित का परिहार होता है , से दोनों प्रकार की चेष्टायें प्रयत्न से उत्पन्न होती हैं क्योंकि ये विशेष प्रकार की क्रियायें हैं जैसे कि रथ की क्रिया ।

अथवा प्रयत्न से युक्त कोई व्यक्ति ही शरीर का अधिष्ठाता है . क्योंकि उसमें विशेष प्रकार की क्रिया है जैसे कि रथ में प्राणादिभिश्च ' अर्थात् प्राणादि से भी " प्रयत्न से युक्त अविष्ठाता का अनुमान होता है ” यह अनुषङ्ग कर लेना चाहिए । ' प्राणादिभि : ' इस ' आदि ' पद घटित हेतु वाक्य से प्राणापानादि , निमेष उन्मेष 1 जीवन , मन की गति इन्द्रिय का विकार आदि " सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि ( ३ अ . २ आ . ४ सू . ) इस सूत्र के द्वारा कथित सभी हेतु अभीष्ट हैं । ' कथम् ?

' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न करके " शरीरपरिगृहीत " इत्यादि वाक्य से प्राण और अपान वायु में आत्मानुमान का हेतुत्व दिखलाते हैं । टेढ़े मेढ़े चलना वायु का स्वभाव है , किन्तु शरीर की प्राण और अपान नाम को वायुओं में ' विकृत ' अर्थात् उन स्वभाव से विपरीत क्रमशः ऊर्ध्वगति और अधोगति देखी जाती हैं , अतः इस शरीर रूप मूर्ति के प्रयत्नशील अधिष्ठाता का अनुमान करते हैं जो उन दोनों वायुओं को विपरीत गति से चलने के लिए प्रेरित करते हैं ।

अन्यथा उक्त वायु में उक्त विपरीत गति की सम्भावना नहीं है । ' भस्त्राध्मापयितेव ' इस वाक्य से उसी अनुमान का दृष्टान्त कहा गया है । अर्थात् जैसे कि भाथी की वायु से प्रयत्नशील किसी चलाने वाले का अनुमान होता है , इसी प्रकार शरीर का भी कोई प्रयत्न से युक्त अधिष्ठाता अवश्य है , क्योंकि इच्छा जनित विपरीत गति से युक्त वायु का वह ( शरीर ) आश्रय है जैसे कि भाथी । ' शरीर - परिगृहीत ' इत्यादि से यह दिखलाया गया है कि शरीर में रहने वाली वायु की उक्त विपरीत गति इच्छा से उत्पन्न होती है ।

अतः विपरीत दशाओं में बहनेवालो दो वायुओं की विपरीत गति में व्यभिचार नहीं है । शरीर के किसी प्रयत्नशील अधिष्ठाता का अनुमान कठपुतली को नचाने वाले की तरह ' निमेष ' एवं ' उन्मेष ' रूप क्रियाओं से भी होता है । जिस क्रिया से आँख के दोनों पलकों का संयोग उत्पन्न हो उसे ' निमेष ' एवं जिस क्रिया से उन्हीं दोनों पलकों का विभाग उत्पन्न हो उसे ' उन्मेष ' कहते हैं । उन दोनों क्रियाओं से कठपुतली को नचाने वाले की तरह शरीर रूप मूर्ति के प्रयत्नशील अधिष्ठाता का अनुमान होता है ।

वायु से कठपुतली में भी निमेष और उन्मेष हो सकते हैं अतः ' नियतेन ' यह पद दिया है । इससे यह लाभ होता है कि निमेष और उन्मेष इच्छा से ही उत्पन्न होते हैं । फलत : ( यह अनुमान होता है कि ) शरीर का कोई प्रयत्नविशिष्ट अधिष्ठाता है , क्योंकि उसमें इच्छाजनित निमेष और उम्मेष क्रियाओं से युक्त अवयवों का सम्बन्ध हैं , जैसे कि कठपुतली में । ' देहस्य ' इत्यादि से ' जीवन ' हेतुक अनुमान दिखलाया गया है ।

' वृद्धि ' शब्द का ( बढ़ना ) अर्थ प्रसिद्ध है | घाव और टूटे हुए अङ्गों का ' संरोहण ' अर्थात् पहिले की तरह होना इन दोनों के कारण रूप में भी घर के मालिक की तरह शरीर ( रूप घर ) के प्रयत्नशील अधिष्ठाता का अनुमान होता है । शरीर की वृद्धि , उसके घाव और टूटे हुए अङ्गों का पुनः सङ्घटन ये सभी

२३ किसी प्रयत्नवान् के द्वारा उत्पन्न होते हैं , क्योंकि वे भी वृद्धि और संरोहण हैं , जैसे कि घर की वृद्धि और टूटे हुए अङ्गों का जुटना । ( प्र ० ) वृक्ष में भी तो ये भग्नक्षत संरोहणादि है ? ( उ ० ) वे भी ईश्वर रूप आत्मा से ही उत्पन्न होते हैं , किन्तु वृक्ष में आत्मा ( जीव ) का सम्बन्ध नहीं है , क्योंकि आत्मा का वह विलक्षण प्रकार का सम्बन्ध बुद्धि का कारण है , किन्तु विलक्षण सम्बन्ध वृक्षादि में नहीं है ।

' अभिमत ' इत्यादि से मनोगतिहेतुक आत्मा का अनुमान दिखलाते हैं । ' अभिमतविषय ' अर्थात् जिस विषय को लेने की इच्छा हो , उस वस्तु के ज्ञान का उस बस्तु के साथ एवं चक्षुरादि विषयों के साथ ' योग ' अर्थात् मन का संयोग है । इस सम्बन्ध के कारण मन की क्रिया से भी ( आत्मा का अनुमान होता है ) ।

' घर में ' अर्थात् घर के कोने में , अथवा भूमि में गड़े हुए एक लाह की गोली पर जब बालक अपने हाथ की दूसरी गोली चलाता है , तब उस दूसरी गोली की क्रिया से गोली चलानेवाले प्रयत्न से युक्त उक्त बालक का अनुमान होता है । अतः मन प्रयत्न से युक्त किसी व्यक्ति के द्वारा प्रेरित होता है , क्योंकि वह इच्छित विषय के सम्बन्ध का कारण क्रिया का आश्रय है , जैसे बालक के हाथ की लाह की गोली | वायु प्रभृति से प्रेरित वस्तुओं का सम्बन्ध अनभीष्ट विषयों के साथ भी होता है ।

" नयनविषयेति " चक्षु से देखे जाने वाले रूप के आलोचन अर्थात् ज्ञान के बाद रस के स्मरणक्रम से रसनेन्द्रिय में विकार ( मुँह में पानी आना ) देखा जाता है , उसी से दो गवाक्षों के द्वारा एक देखने वाले की तरह दो इन्द्रियों से देखने वाले एक ज्ञाता का अनुमान करते हैं । इससे यही तात्पर्य क्या निकला ? कि किसी अभीष्ट फल के रूप को देखकर उस रूप के साथ रहनेवाले पूर्वानुभूत रस की स्मृति से उस रस के आस्वादन की इच्छा होता है । उस इच्छा से प्रयत्न की उत्पत्ति होती है ।

इस प्रयत्न , ( आत्मा और मन के संयोग ) से रसनेन्द्रिय में विकृति हो जाती है । इन्द्रिय को अगर चेतन मानें तो मुँह के पानी से अनुमित रसनेन्द्रिय की विकृति की उपपत्ति नहीं होगी , क्योंकि इन्द्रियों के विषय नियमित हैं । चक्षु से रूप का ही ज्ञान होता है रसादि का नहीं , एवं रसना से रस का ही ज्ञान हो सकता है रूप का नहीं । अतः रूप और रस के सामानाधिकरण्य की प्रतीति के बाद जो रूप को देखने से रस की स्मृति होती है , वह नहीं हो सकेगी , और वह विकार है अवश्य ।

अतः इन्द्रियादि से भिन्न कोई दोनों का अभिज्ञ एक व्यक्ति अवश्य है जो रूप को देखकर रस का स्मरण करता है । ( प्र ० ) रूप को देखनेवाला और रस को स्मरण करनेवाला शरीर हो क्यों नहीं है ? ( उ ० ) एक ही व्यक्ति की बाल्यावस्था का शरीर और वृद्ध अवस्था का शरीर यतः भिन्न हैं , दोनों भिन्न परिमाणों के हैं । ( ऐसी स्थिति में शरीर को ही अनुभविता और स्मर्त्ता दोनों मान लेने पर ) बाल्यावस्था में अनुभूत विषय का स्मरण वृद्धावस्था में अनुपपन्न हो जायगा ।

पृ. २०४

भाष्य ७६

ते च न शरीरेन्द्रियगुणाः कस्मादहङ्कारेणैकवाक्यताभावात् प्रदेशवृत्ति- स्वादयावद्द्रव्यभावित्वाद् बाह्येन्द्रियाप्रत्यक्षत्वाच्च तथाहंशब्देनापि पृथिव्यादिशब्दव्यतिरेकादिति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २०४प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 279

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शरीर और इन्द्रिय के गुण नहीं हैं , क्योंकि ( १ ) अहङ्कार के साथ उनकी प्रतीत नहीं होती है । ( २ ) वे अपने आश्रय के किसी प्रदेश में रहते है । ( ३ ) जब तक उनके आश्रय विद्यमान रहें तब तक रहते ही नहीं हैं ( अयावद्द्रव्यभावी हैं ) । ( ४ ) एवं बाह्य इन्द्रियों से उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है । ( १० ) ' अहम् ' शब्द से भी आत्मा का अनुमान होता है , क्योंकि पृथिवी प्रभृति अन्य द्रव्यों के लिए ' अहम् ' शब्द का मुख्य प्रयोग कहीं नहीं देखा जाता है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

न केवलं पूर्वोक्तैर्हेतुभिः सुखदुःखेच्छाद्वेषादिभिश्च गुणैर्गुण्यनुमीयते । अहङ्कारेणाहमितिप्रत्ययेनैकवाक्यत्वमेकाधिकरणत्वं सुखादीनां ' अहं सुखी , अहं दुःखी ' इत्यहङ्कारप्रत्ययविषयस्य सुखाद्यवच्छेद्यस्य प्रतीतेः । अहं प्रत्ययश्च न शरीरालम्बनः , परशरीरेऽभावात् । स्वशरीरे एवायं भवतीति चेन्न , अविशेषात् । शरीरालम्बनोऽहं प्रत्ययः स्वशरीवत् परशरीरमपि चेत् प्रत्यक्षं तत्र यथा स्थूलादिप्रत्ययः स्वशरीरे परशरीरेऽपि भवति , एवमहमिति प्रत्ययोऽपि स्यात् , स्वरूपस्योभयत्राविशेषात् ।

स्वसम्बन्धिताकृते तु विशेषे तत्कृत एवायं प्रत्ययो न शरीरालम्बनः , तदालम्बनत्वे चान्तर्मुखतयापि न भवेत् । अत एवायं नेन्द्रियावलम्बनः , इन्द्रियाणामतीन्द्रियत्वात् , अस्य च लिङ्गशब्दानपेक्षस्य प्रत्यक्ष प्रत्ययत्वात् , तस्मात् सुखादयोऽपि न शरीरेन्द्रियविषयाः । किश्व , योऽनुभविता तस्यैव स्मरणमभिलाषः , सुखसाधनपरिग्रहः , सुखोत्पत्तिः , दुःखप्रद्वेष इति सर्वशरीरिणां प्रत्यात्मसंवेदनीयम् । अनुभवस्मरणे च न शरीरेन्द्रियाणामित्युक्तम् । ततो s पि सुखादयो न तद्विषयाः ।

युक्त्यन्तरश्वाह – प्रदेशवृत्तित्वादिति । दृश्यते प्रदेशवृत्तित्वं सुखादीनां पादे मे सुखं शिरसि मे दुःखमिति प्रत्ययात् । ततश्च शरीरेन्द्रियगुणत्वाभावः । तद्विशेषगुणानां व्याप्यवृत्तिव्यभिचारात् । सुखादयः शरीरेन्द्रियविशेषगुणा न भवन्ति , अव्याप्यवृत्तित्वात् । ये तु शरीरेन्द्रियविशेषगुणास्ते व्याप्यवृत्तयो दृष्टाः , यथा रूपादयः , न च तथा सुखादयो व्याप्यवृत्तयः , तस्मान्न शरीरेन्द्रियगुणा इति व्यतिरेकी ।

कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नस्य नभोदेशस्य श्रोत्रेन्द्रियभावमापन्नस्य यश्शब्दो गुणो भवति स तद्विवरव्यापीत्यव्यभिचारः । इतोऽपि न शरीरेन्द्रियगुणाः सुखादयो भवन्ति , अयावद्द्रव्यभावित्वात् , व्यतिरेकेण रूपादय एवं निदर्शनम् । इन्द्रियगुणप्रतिषेधे तु नायं हेतु :, श्रोत्रगुणेन शब्देनानैकान्तिकत्वात् । इतोऽपि न शरीरेन्द्रियगुणाः सुखादयो बाह्येन्द्रियाप्रत्यक्षत्वात् । शरीरेन्द्रियगुणानां द्वयी गतिः - अप्रत्यक्षता गुरुत्वादीनाम् , बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षता रूपादीनाम् ।

विधान्तरन्तु सुखादयस्तस्मान्न तद्गुणा इति शरीरेन्द्रियगुणत्वे प्रतिषिद्धे परिशेषात्तैरात्मानुमीयत इति स्थितिः ।

ननु सुखं दुःखञ्चेमौ विकाराविति नित्यस्यात्मनो न सम्भवतः । भवतश्चेत् सोऽपि चर्म्मवदनित्यः स्यात् । न तयोरुत्पादविनाशाभ्यां तदन्यस्यात्मनः रेकः समानधिकरणत्वाभाव :, अहं पृथिव्यहमुदकमिति प्रयोगाभावात् तस्मान्नायं पृथिव्यादिविषयः । ननु शरीरविषय एवायं दृश्यते स्थूलोऽहमिति ? न , अहं जानामि अहं स्मरामतिप्रयोगात् । शरीरस्य च ज्ञानस्मृत्यधिकारणत्वं निषिद्धम् , तस्मादात्मोपकारकत्वेन लक्षणया शरीरे तस्य प्रयोगः , यथा भृत्येऽहमेवायिमिति व्यपदेशः I ।

एवं व्यवस्थिते सत्यात्मनो गुणान् कथयति - तस्य च गुणा इत्यादिना । बुद्ध्यादीनामात्मनि सद्भावे सूत्रकारानुमतं दर्शयति- आत्मलिङ्गाधिकारे लक्षयति धर्माधर्मा- बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ताः सिद्धा इति । आत्मलिङ्गाधिकार इति प्राणापानादिसूत्रं

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — केवल पहिले कहे हुए हेतुओं से ही नहीं , किन्तु सुख , दुःख , इच्छा , द्वेषादि गुणों से भी गुणी आत्मा का अनुमान होता है ।

' अहङ्कार से ' , ' अहम् ' इस प्रकार की प्रतीति से , एवं सुखादि के एकवाक्यत्व अर्थात् एकाधिकरणत्व से भी ( आत्मा का अनुमान होता है ) , क्योंकि अहं सुखी , अहं दुःखी ' इत्यादि प्रतीतियों में ' अहम् ' शब्द के अर्थ का सुखादियुक्त रूप से ही भान होता है , ' अहम् ' इस आकार की प्रतीति का विषय शरीर नहीं हो सकता है , क्योंकि दूसरे के शरीर में ' अहम् ' इस आकार की प्रतीति नहीं होती है । केवल अपने ही शरीर में ' अहम् ' शब्द की प्रतीति होती है ।

( प्र ० ) ( यतः ) अपने ही शरीर में ' अहम् ' इस आकार की प्रतीति होती है , ( अतः वही अहं प्रत्यय का विषय हो ) | ( उ ० ) इस कथन में कोई विशेष नहीं हैं , क्योंकि ' अहम् ' यह प्रतीति यदि शरीर विषयक है तो फिर स्वशरीरविषयक और परशरीर विषयक दोनों होगी , जैसे कि स्थूलत्व का प्रत्यक्ष होता है , वह स्वशरीर में भी होता है एवं पर शरीर में भी होता है । इसी प्रकार ' अहम् ' प्रतीति भी दोनों में समान होगी , क्योंकि स्वशरीर और परशरीर के स्वरूपों में कोई अन्तर नहीं है ।

यदि अपना सम्बन्ध ही अपने शरीर में विशेष मानें ? तो फिर वह प्रतीति उस सम्बन्ध विषयक ही होगी ( आत्मविषयक नहीं ) । एवं ' अहम् ' प्रतीति अगर शरीर विषयक हो तो फिर अन्तमुखतया उसकी उत्पत्ति नहीं होगी । अत एव ' अहम् ' प्रतीति इन्द्रिय विषयक भी नहीं है , क्योंकि इन्द्रियाँ अतीन्द्रिय हैं , एवं ' अहम् ' प्रतीति प्रत्यक्षरूप है , क्योंकि इस में ' हेतु ' और ' शब्द ' इन दोनों की ( अर्थात् अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण की ) अपेक्षा नहीं है ।

( यतः शरीर और इन्द्रिय अहम् प्रत्यय के विषय नहीं हैं ) अतः सुखादि भी शरीर और इन्द्रिय के धर्म नहीं हैं । एवं यह सभी शरीरधारियो का अनुभव है कि स्मरण , अभिलाषा , सुख के साधनों का ग्रहण , सुख की उत्पत्ति , दुःख के प्रति द्वेष प्रभृति अनुभव करने वाले को ही होते हैं । यह कह चुके हैं कि अनुभव और स्मरण दोनों शरीर और इन्द्रियों को नहीं हो सकते । इस हेतु से भी शरीरादि सुखादि के आश्रय नहीं हैं ।

' सुखादि के आश्रय शरीरादि नहीं हैं ' इसमें ' प्रदेश वृत्तित्वात् ' इत्यादि से दूसरी युक्ति भी देते हैं । ' पैर में सुख है , और शिर में वेदना है ' इत्यादि प्रतीतियों से समझते हैं कि सुखादि प्रदेशवृत्ति हैं , अर्थात् अपने आश्रय के किसी एक देश में ही रहते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि सुखादि शरीर इन्द्रियों के गुण नहीं हैं , क्योंकि सुखादि विशेषगुण कभी ' व्याप्यवृत्ति ' अर्थात् अपने आश्रय के समस्त अंशों में रहनेवाले नहीं होते ।

शरीर और इन्द्रियों के जितने भी विशेष गुण हैं , सभी व्याप्यवृत्ति अर्थात् अपने आश्रय के सभी अंशों में रहनेवाले होते हैं , जैसे कि रूपादि । सुखादि रूपादि - विशेष गुणों की तरह व्याप्यवृत्ति नहीं हैं , अतः सुखादि शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं । यह व्यतिरेक व्याप्ति जनित अनुमान भी ( ' सुखादि शरीरादि के गुण नहीं हैं ) इसका साधक है ।

यद्यपि आकाश रूपी विभु - श्रोत्रेन्द्रिय का विशेषगुण शब्द अव्याप्यवृत्ति प्रतीत होता है , तथापि विभु आकाश श्रोत्रेन्द्रिय नहीं है , किन्तु कर्णशष्कुली से सीमित आकाश ही श्रोत्रेन्द्रिय है और इस आकाश में शब्द व्याप्यवृत्ति ही है । अतः इन्द्रियादि के विशेषगुण अवश्य ही व्याप्यवृत्ति होते हैं ' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है ।

' सुखादि शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं ' इसमें यह हेतु भी है कि ' वे अयावद्द्रव्यभावी ' हैं ( अर्थात् वे आश्रय रूप द्रव्य के विद्यमान समय तक बराबर नहीं रहते ) , अयावद्रव्य भावित्व हेतु के न्याय प्रयोग में भी रूपादि ही व्यतिरेक दृष्टान्त हैं । ' सुखादि इन्द्रिय के विशेष गुण नहीं है ' अयावद्द्रव्य हेतुक अनुमान इसका साधक नहीं है ( इस अनुमान से केवल यही सिद्ध होता है कि सुखादि शरीर के गुण नहीं हैं ) क्योंकि यह हेतु श्रोत्रेन्द्रिय के शब्द रूप गुण में व्यभिचरित है ।

इस हेतु से भी सुखादि शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं , क्योंकि सुखादि का बाह्य इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहींहोता है । वस्तुस्थिति यह है कि शरीर और इन्द्रियों के गुण के दो ही प्रकार हैं ( १ ) किन्हीं गुणों का तो किसी भी प्रकार प्रत्यक्ष ही नहीं होता है जैसे कि गुरुत्वादि का या फिर ( २ ) बाह्य इन्द्रियों से ही प्रत्यक्ष होता है , जैसे कि रूपादि का । सुखादि दोनों प्रकारों से भिन्न तीसरे प्रकार के हैं , अतः शरीरादि के गुण सुखादि नहीं हैं ।

इस प्रकार यह सिद्ध हो जाने पर कि ' सुखादि शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं ' इन सुखादि हेतुओं से होनेवाले परिशेषानुमान से भी आत्मा का अनुमान होता है ।

( प्र ० ) सुख और दुःख ये दोनों तो विकार हैं , अत : वे नित्य आत्मा के गुण नहीं हो सकते , अगर विकार स्वरूप सुखादि भी आत्मा के गुण हों तो फिर आत्मा चर्म की तरह अनित्य वस्तु होगी । ( प्र ० ) नहीं , क्योंकि सुख और दुःख दोनों की उत्पत्ति और विनाश से उन दोनों से भिन्न आत्मा के स्वरूप में कोई विघटन नहीं

न्यायकन्द्रलो स्वरूपप्रच्युतेरभावात् । नित्यस्य हि स्वरूपविनाशः स्वरूपान्तरोत्पादश्च विकारो नेष्यते , गुणनिवृत्ति र्गुणान्तरोत्पादश्चाविरुद्ध एव । अथास्य नित्यस्य सुखदुःखाभ्यां किं क्रियते ? स्वविषयोऽनुभवः । सुखदुःखानुभवे सत्यास्यातिशयानतिशयरहितस्य क उपकारः ? अयमेव तस्योपकारोऽयमेव चातिशयो यस्मिन् सति सुखदुःखभोक्तृत्वम् । तथाहंशब्देनापीति । यथा सुखादिभिरात्मा अनुमीयते तथाहंशब्देनाप्यनुमीयते अहंशब्दो लोके वेदे चाभियुक्तैः प्रयुज्यमानो न तावन्निरभिधेयः ।

न च स्वरूपमभिधेयं युक्तं स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । यथोक्तम्' नात्मानमभिधत्ते हि कश्चिच्छन्दः कदाचन । ” तस्माद् यो s स्याभिधेयः स आत्मेति । नन्वयं पृथिव्यादीनामेव वाचको भविष्यति तत्राह - पृथिव्यादि - शब्दव्यतिरेकादिति । यो यस्यार्थस्य वाचकः स तच्छब्देन समानाधिकरणो दृष्ट :, यथा द्रव्यं पृथिवीति । अहंशब्दस्य तु पृथिव्यादिवाचकैः शब्दैः सह व्यति हो सकता है । एक स्वरूपविनाश और दूसरे स्वरूप की उत्पत्ति ये दोनों त्रिकार तो नित्य वस्तुओं में होते नहीं हैं ।

एक गुण का नाश और दूसरे गुण की उत्पत्ति ये दोनों विकार उसके नित्यत्व के विरोधी नहीं हैं । ( प्र ० ) नित्य आत्मा को सुख और दुःख से क्या होता है ? ( उ ० ) सुख दुःखादि का अनुभव होता है । ( प्र ० ) अतिशय ( वैशिष्ट्य ) और अनतिशय से रहित आत्मा का सुख और दुःख के अनुभव से क्या उपकार होता है ? ( उ ० ) इनसे यही उपकार होता है और इनसे आत्मा में यही अतिशय उत्पन्न होता है कि इन दोनों के रहने से ही सुख दुःख के भोक्तृत्व का व्यवहार उस में होता है ।

" तथाऽहंशब्देनापि " जैसे कि सुखादि से आत्मा का अनुमान होता है वैसे ही ' अहम् ' शब्द से भी आत्मा का अनुमान होता है । लोक में और वेदों में प्रयुक्त ' अहम् ' शब्द अपने वाच्य अर्थ से रहित नहीं हैं और अपना स्वरूप ( आनुपूर्वी ) भी उसके वाच्य अर्थ नहीं है , क्योंकि एक ही वस्तु में एक क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों नहीं रह सकते , क्योंकि वे दोनों परस्पर विरोधी हैं ।

जैसा कहा है कि ' कोई भी शब्द अपने स्वरूप ( आनुपूर्वी ) को कभी भी अभिधावृत्ति से नहीं समझाते , अतः आत्मा ही ' अहम् ' शब्द का वाच्य अर्थ है । ' अहम् ' शब्द पृथिव्यादि का वाचक हो सकता है ? इस आक्षेप के समाधान में ' पृथिव्यादिशब्दव्यतिरेकात् ' यह वाक्य कहा है । जो शब्द जिस अर्थ का वाचक रहता है वह उस अर्थ के वाचक दूसरे शब्द के साथ ' समानाधिकरण ' अर्थात् अभेद का बोध करनेवाले रूप से प्रयुक्त होता है , जैसे कि ' द्रव्यं पृथिवी ' इत्यादि ।

' अहम् ' शब्द का पृथिव्यादि वाचक शब्दों केसाथ व्यतिरेक ' अर्थात् सामानाधिकरण्य नहीं है , क्योंकि ' अहं पृथिवी , अहमुदकम् ' इत्यादि प्रतीतियाँ नहीं होती हैं । अत : ' अहम् ' शब्द पृथिव्यादि का वाचक नहीं है | ( प्र ० ) ' अहम् ' शब्द तो शरीर के लिए ही प्रयुक्त दीखता है , जैसे कि ' स्थूलोऽहम् ' इत्यादि ।

पृ. २०८

भाष्य ७७

परिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः ।

आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्धयादयः तस्य गुणा बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधम्र्म्माधर्म्म संस्कारसङ्ख्या- ( १ ) बुद्धि , ( २ ) सुख , ( ३ ) दु : ख , ( ४ ) इच्छा , ( ५ ) द्वेष , ( ६ ) प्रयत्न , ( ७ ) धर्म्म , ( ८ ) अधर्म्म , ( ६ ) संस्कार , ( १० ) संख्या , ( ११ ) परिमाण , ( १२ ) प्रयत्नान्ताः सिद्धाः ।

धर्माधर्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्ववचनात् ।

संस्कारः , स्मृत्युत्पत्तौ कारणवचनात् ।

व्यवस्थावचनात् सङ्ख्या ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २०८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 283

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पृथक्त्व , ( १३ ) संयोग और ( १४ ) विभाग ये चौदह गुण आत्मा के हैं ' आत्मलिङ्गाधिकार ' अर्थात् ‘ प्राणापानादि ' ( ३।२।४ ) सूत्र के द्वारा बुद्धि से प्रयत्न पर्यन्त छः गुण आत्मा में कहे गये हैं । यतः " आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् ” ( ६ । १ । १५ ) इस सूत्र के द्वारा एक आत्मा के गुणों को दूसरी आत्मा के गुणों का अकारण कहा गया है , इससे सिद्ध होता है कि धर्म और अधर्म ये दोनों भी आत्मा गुण हैं । महर्षि ने “ आत्ममनसोः संयोगविशेषात्संस्काराच्च स्मृति : " ( ६ | २ | ६ ) इस सूत्र के द्वारा संस्कार को स्मृति का कारण कहा है , अतः आत्मा में संस्कार नामक गुण का रहना भी उनको अभिप्रेत समझना चाहिए । “ व्यवस्थातो नाना " ( ३।२।२० ) सूत्रकार की इस उक्ति से आत्मा में संख्या की सिद्धि समझनी

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

। धर्माधर्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्ववचनादिति । वात्मान्तरगुणानामकारणत्वादिति वचनात्सिद्धौ । दारि वर्तमानो दानधर्मः प्रतिगृहीतरि अधर्मं जनयतीति कस्यचिन्मतं निषेद्ध सूत्रकृतोक्तम्" आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरगुणेष्वकारणत्वात् " इति । अस्यायमर्थः - आत्मान्तरगुणानां सुखादीनामात्मान्तरगुणेषु सुखादिषु कारणत्वाभावाद्धर्माधर्म्मयो . रन्यत्र वर्त्तमानयोरन्यत्रारम्भकत्वमयुक्तमिति । एतेन धर्माधर्म्मयोरात्मगुणत्वं कथितम् , अन्यथा तयो : सुखादिसाधर्म्यकथनेनानारम्भकत्वसमर्थनं न स्यात् । संस्कारः स्मृत्युत्पत्ताविति । आत्ममनसोः संयोगात्संस्काराच्चेति स्मृतिसूत्रं लक्षयति । पूर्वानुभूतोऽर्थः स्मर्य्यते , न तत्रानुभव : कारणम् , चिरविनष्टत्वात् , नाप्यनुभवाभावः कारणमभावस्य निरतिशयत्वेन पटुमन्दादिभेदानुपपत्तेरभ्यासवैयर्थ्याच्च । तस्मादनुभवेनात्मनि कश्चिदतिशयः कृतो यतः स्मरणं स्यादिति संस्कारकल्पना । ये तु विनष्टमप्यनुभवमेव स्मृतेः कारणमाहुः , तेषां विनष्टमेव ज्योतिष्टोमादिकं स्वर्गादिफलस्य साधनं भविष्यतीत्यदृष्टस्याप्युच्छेदः स्यात् । व्यवस्थावचनात् संख्येति । " नानात्मानो व्यवस्थातः " इति सूत्रेणात्मनानात्वप्रतिपादनाद् बहुत्वसङ्ख्या सिद्धेत्यर्थः ।

अथ व्यवस्था ? केयं नानाभेदभाविनां ज्ञानसुखादीनामप्रतिसन्धानम् , ऐकात्म्ये हि यथा बाल्यावस्थायामनुभूतं वृद्धावस्थायामनुसन्धीयते मम सुखमासीन्मम दुःखमासीदिति , एवं देहान्तरानुभूतमप्यनुसन्धीयते , अनुभवितुरेकत्वात् । न चैवमस्ति , अत : प्रतिशरीरं नानात्मानः । यथा सर्वत्रैकस्य [ काशस्य श्रोत्रत्वे कर्णशष्कुल्याद्युपाधिभेदाच्छन्दोपलब्धिव्यवस्था , तथात्मैकत्वेऽपि देहभेदादनुभवादिव्यवस्थेति चेद् ?

विषमोऽयमुपन्यासः , प्रतिपुरुषं व्यवस्थिताभ्यां धर्माधर्म्माभ्यामुपगृहीतानां शब्दोपलब्धिहेतूनां कर्णशष्कुलीनां व्यवस्थानाद्युक्ता तदधिष्ठाननियमेन शब्दग्रहणव्यवस्था | ऐकात्म्ये तु धर्माधर्म्मयोरव्यवस्थानाच्छरीरव्यवस्थाभावे किं कृता सुखदुःखोत्पत्तिव्यवस्था ? मनस्सम्बन्धस्यापि साधारणत्वात् 1 यस्य तु नानात्मानः , तस्य सर्वेषामात्मनां सर्वगतत्वेन सर्वशरीरसम्बन्धेऽपि न साधारणो भोगः ।

यस्य कर्म्मणा यच्छरीरमारब्धं तस्यैव तदुपभोगायतनं न सर्वस्य , कर्मापि यस्य शरीरेण तस्येव तद्भवति नापरस्य एवं शरीरान्तरनियमः कर्मान्तिरनियमादित्यनादिः । अथ मतम् एकत्वेऽपि परमात्मनो जीवात्मनां परस्परभेदाद् व्यवस्थेति तदसत् , परमात्मनो भेदेऽद्वैत सिद्धान्तक्षतिः , “ अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि ' इति जीवपरमात्मनोस्तादात्म्यश्रुतिविरोधाच्च । अविद्याकृतो जीवपरमात्मनोर्भेद इति चेत् ? कस्येयमविद्या ? किं ब्रह्मणः ? किमुत जीवानाम् ?

न तावद् ब्रह्मणोऽस्त्य विद्यायोगः , शुद्धबुद्धस्वभावत्वात् । जीवाश्रयाविद्येति चान्योन्याश्रय दोषपराहतम् , अविद्याकृतो जीवभेदो जीवाश्रयाविद्येति । बीजाङकुरवदनादिरविद्या जीवप्रभेद इति चेत् ?

बीजाङकुरव्यक्तिभेदवदविद्याजीवयोः पारमार्थिकत्वाभावादनुपपन्नं व्यक्तिभेदेन च बीजाङ्कुरयोरन्योन्यकारणता , जीवस्तु सर्वासु भवकोटिष्वेक एव मानुषपशुपक्ष्यादियोनिप्रत्यग्रजातस्य शिशोजतिसाम्यादाहारविशेषाभिलाषेण तासु तासु जातिषु जन्मान्तरकृतस्य तत्तदाहारविशेषस्यानुमानपरम्परया तस्यानादिशरीरयोगप्रतीतेः , तत्राविद्याकृतो जीवभेदो जीवभेदाच्चाविद्येत्यसङ्गतिः ।

ब्रह्मवज्जीवस्याप्यनादिनिधनत्वेन ब्रह्मप्रतिबिम्बता , तस्मात् " तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति " इति श्रुतिप्राण्यादनादिनिधनं ब्रह्मतत्त्वमेवेदं सर्वदेहेषु प्रतिभासत इति न वाच्यम् , तथा सति चानुपपन्ना व्यवस्थितेति सूक्तं ' नानात्मानो व्यवस्थात ' इति । अभेदश्रुतयस्तु गौणार्या इति दिक् । न च नानात्मपक्षे सर्वेषां क्रमेण मुक्तावन्ते संसारोच्छेदः , अपरिमितानामन्त्यन्यूनातिरिक्तत्वायोगात् । यथाहुवर्तिकका रमिश्रा : -

अत एव च विद्वत्सु मुच्यमानेषु सन्ततम् ।

ब्रह्माण्डलोके जीवानामनन्तत्वादशून्यता ॥

अन्त्यन्यूनातिरिक्तत्वे पूज्यते परिमाणवत् ।

वस्तुन्यपरिमेये तु नूनं तेषामसम्भवः || इति ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( उ ० ) नहीं , " अहं जानामि , अहं स्मरामि " इत्यादि भी प्रयोग होते हैं । यह कह चुके हैं कि अनुभव और स्मृति शरीर के धर्म नहीं हैं , अतः शरीर चूंकि आत्मा को उपकार पहुँचाने वाला है , अतः आत्मा के वाचक ' अहम् ' शब्द का लक्षणावृत्ति से शरीर में भी प्रयोग होता है , जैसे कि भृत्य में ' यह मैं ही हूं " यह प्रयोग होता है ।

इस प्रकार आत्मा की सिद्धि हो जाने पर ' तस्य च गुणाः ' इत्यादि से आत्मा के गुणकहे जाते हैं । आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्धयादयः प्रयत्नान्ताः सिद्धाः ' इत्यादि से आत्मा में बुद्धयादि गुणों की सत्ता में सूत्रकार की अनुमति सूचित करते हैं । ' आत्मलिङ्गाधिकार ' शब्द से ' प्राणापानादि ' सूत्र सूचित होता है । ' धर्माधर्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्ववचनात् " अर्थात् " आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् " ( ६।१।५ ) सूत्रकार की इस उक्ति से आत्मा में धर्म और अधर्म की सिद्धि समझनी चाहिए ।

किसी का कहना है कि दाता के दानजनित धर्म से ग्रहण करनेवाले पुरुष में अधर्म की उत्पत्ति होती है , इस मत को खण्डन करने के लिए सूत्रकार ने ' आत्मान्तरगुणानाम् ' इत्यादि सूत्र लिखा है । इस सूत्र का अभिप्राय है कि जैसे कि एक आत्मा का धर्मरूप गुण दूसरी आत्मा में सुख का उत्पादन नहीं कर सकता है , वैसे ही एक आत्मा का धर्म या अधर्मं दूसरी आत्मा में धर्म या अधर्म को भी उत्पन्न नहीं कर सकता । इससे यह कथित हो जाता है कि ' धर्म और अधर्म आत्मा के गुण हैं ' ।

अगर ये आत्मा के गुण न हों तो फिर जैसे एक आत्मा में रहनेवाले सुखादि दूसरी आत्मा में सुखादि के उत्पादक नहीं हैं , वैसे ही धर्म और अधर्म भी , तथा एक आत्मा में रहनेवाले सुखादि भी , इस सादृश्य से दूसरी आत्मा में अधर्मादि के उत्पन्न न होने का समर्थन असङ्गत हो जायगा । महर्षि कणाद ने संस्कार को स्मृति का कारण कहा है , अतः आत्मा में संस्कार ( भावना नाम का ) गुण भी समझना चाहिए ।

' संस्कार : ' इत्यादि भाष्य को पंक्ति " आत्ममनसोः संयोगात्संस्का( च्च स्मृतिः ” ( ६।२।६ ) इस सूत्र की ओर सङ्केत करती है । पूर्वकाल में अनुभूत विषय की ही स्मृति होती है । स्मृति के प्रति पूर्वानुभव कारण नहीं हो सकता है , क्योंकि स्मृति की उत्पत्ति से बहुत पहिले वह नष्ट हो जाता है । उस अनुभव का नाश भी उसका कारण नहीं हो सकता है , क्योंकि अभाव में अर्थात् अनुभवनाशजनित अनुभव की असत्ता रूप

२७ अभाव में और अनुभव की अनुत्पत्तिमूलक अनुभव की असत्ता रूप अभाव में कोई भी अन्तर नहीं है , अतः अधिक काल तक स्मरण रखने से ' पटु ' और थोड़े समय तक स्मरण रखने से मन्द , इस प्रकार की दोनों स्मृतियों में कोई अन्तर नहीं रहेगा | एवं चिरकाल तक स्मरण रखने के लिए अभ्यास की भी जरूरत न रह जायगी अतः संस्कार रूप अतिशय की कल्पना की जाती है । जो कोई विनष्ट अनुभव को ही स्मृति का कारण मानते हैं , उनके मत में विनष्ट ज्योतिष्टोमादि याग से ही स्वर्गादि की उत्पत्ति माननी पड़ेगी । अतः उनके मत में धर्म और अधर्म इन दोनों को भी मानने की आवश्यकता नहीं रहेगी । ' व्यवस्था के रहने से संख्या भी ' अर्थात् " व्यवस्थातो नाना " ( ३२ २० ) इस सूत्र से आत्मा में नानात्व को सिद्धि की गयी है । इससे आत्मा में बहुत्व संख्या की भी सिद्धि होती है ।

( प्र ० ) ( आत्मा अनेक हैं ) इसमें क्या युक्ति है ? ( उ ० ) यही कि एक के ज्ञानसुखादि का दूसरे को स्मरण नहीं होता है । अर्थात् आत्मा अगर एक माना जाय तो फिर बाल्यावस्था में विषय का जैसे वृद्धावस्था में स्मरण होता है कि ' मुझे दुःख था , मुझे सुख था ' वैसे ही और देहों के द्वारा अनुभूत विषयों का स्मरण भी हो , क्योंकि अनुभव करने वाला आत्मा सभी देहों में एक ही है , किन्तु ऐसा नहीं होता । अतः प्रत्येक शरीर में रहनेवाले आत्मा भिन्न भिन्न हैं ।

( प्र ० ) जैसे यह नियम है कि आकाश के एक होने पर भी कर्णशष्कुली रूप उपाधि से युक्त आकाश से ही शब्द सुना जाता है , वैसे ही आत्मा के एक होने पर भी जिस देह रूप उपाधि से युक्त होकर वह ( आत्मा ) जिन सुखादि का अनुभव करता है , उस देह रूप उपाधि से युक्त आत्मा ही उन सुखादि का स्मरण भी करेगा दूसरा नहीं , यह व्यवस्थां भी की जा सकती है । ( इस के लिए आत्मा को नाना मानने की आवश्यकता नहीं है ) । उ ० ) प्रत्येक पुरुष के शब्दोपलब्धि के अदृष्ट से कर्णशष्कुली रूप कारण की कल्पना की गयी है ।

अतः यह ठीक है कि उसी कर्णशष्कुली रूप उपाधि से युक्त आकाश श्रवणेन्द्रिय ) से ही शब्द का प्रत्यक्ष होता है , औरों से नहीं , किन्तु आत्मा को एक मान लेने से धर्म और अधर्म की कोई व्यवस्था नहीं रहेगी , फिर सुखदुःखादि की भी व्यवस्था नहीं होगी , फिर सुखदुःखादि का भी नियम नहीं रहेगा , क्योंकि मन का सम्बन्ध तो सभी देहों में समान ही है , अतः उक्त आक्षेप असङ्गत है ।

यद्यपि जिनके मत में आत्माएँ अनेक हैं , उनके मत में भी ( व्यापक होने के कारण प्रत्येक ) आत्मा सभी मूत्तं द्रव्यों के साथ सम्बद्ध है , फिर भी भोग के सर्वसाधारणत्व की आपत्ति नहीं होती है , क्योंकि जिस आत्मा के कर्म ( अदृष्ट ) से जो शरीर उत्पन्न होगा वह शरीर उसी आत्मा के भोग का ' आयतन ' होगा , दूसरी आत्माओं के भोग का नहीं , एवं जिस आत्मा के शरीर से जो कर्म ( अ ) उत्पन्न होगा वह कर्म उसी आत्मा का होगा और आत्माओं का नहीं ।

इसी प्रकार अन्य शरीर और अन्य कर्मों की भी व्यवस्था समझनी चाहिए । ( प्र ० ) जीवात्मा और परमात्मा ये दो मान लेने से ही ( शरीर भेद से अनन्त जीव न मानने पर भी ) सभी व्यवस्थायें ठीक हो जाती हैं ? ( उ ० ) यह मान लेने पर भी अद्वैत सिद्धान्त तो विघटित हो हो जायगा । एवं ' अनेन जीवेन ' इत्यादि श्रुतियाँ भी विरुद्ध हो जायँगी । ( प्र ० ) जीव और ईश्वर वास्तव में तो अभिन्न ही हैं , किन्तु ' अविद्या ' से अर्थात् अज्ञान से दोनों में भेद की कल्पना की जाती है । ( उ ० ) यह अविद्या किसकी ?

जीव की ? या ब्रह्म की ? ब्रह्म की तो वह हो नहीं सकती है , क्योंकि वे शुद्ध , बुद्ध और मुक्तस्वभाव के हैं | अगर अविद्या का आश्रय जीव को मानें , तो फिर अन्योन्याश्रय दोष होगा , क्योंकि अविद्या से ही जीव की कल्पना की जाती है और वह अविद्या उसी में आश्रित है । अविद्या के रहने से ही वह जीव होगा एवं जीव के रहने से ही अविद्या की सत्ता रहेगी , इन दोनों में पहिले कौन होगा ? और पीछे कौन ? यह निर्णय असम्भव है , अतः इस निर्णय के बल पर कोई भी निर्णय सम्भव नहीं है ।

( प्र ० ) बीज और अङ्कुर की तरह जीव और अविद्या का सम्बन्ध भी अनादि है । ( उ ० ) जब बीज और अङ्कुर नाम के दो स्वतन्त्र वस्तु हैं , तब यह स्वीकार करना पड़ता है कि अकुर के कारण बीज का भी कोई दूसरा अङ्कुर ही कारण है । अतः अन्योन्याश्रय से दूषित होते हुए भी बीज और अङ्कुर का सामान्य कार्यकारणभाव मानना पड़ता है । किन्तु जीव और अविद्या वास्तव में दो व्यक्ति नहीं हैं , अतः यहाँ अन्योन्याश्रयदोष को सह्य करना उचित नहीं है । ( प्र ० ) संसार के सभी देहों में जीव एक ही है ।

मनुष्य , पशु , पक्षी प्रभृति जिस योनि में अभी उसका जन्म होता उस जाति के विशेष प्रकार के भोजन की अभिलाषा से उस जीव में इससे पहिले जन्म में भी इस प्रकार के आहार का अनुमान होता है और यही अनुमान की परम्परा जीव में शरीर के अनादि सम्बन्ध को प्रमाणित करती है । ( उ ० ) इस पक्ष में भी अविद्या के कारण जीवों में भेद एवं जीवभेद के कारण अविद्या , यह असङ्गति है ही । ( प्र ० ) ब्रह्म की तरह जीव भी आदि और अन्त से रहित है , फलतः जीव ब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब है ।

" तमेव भान्तम् ' इत्यादि श्रुतियां भी इस अर्थ को पुष्ट करती हैं , अतः आदि और अन्त से रहित ब्रह्मतत्त्व ही सभी देहों में प्रतिभासित होता है । ( उ ० ) इस पक्ष में भी यह उक्ति ठीक है ।

पृ. २१३

भाष्य ७८

पृथकत्वमप्यत एव ! तथा चात्मेतिवचनात् परममहत्परिमाणम् !

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २१३प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 288

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — चाहिए | यतः आत्मा में संख्या है , अतः पृथक्त्व भी अवश्य ही है । वैभव सूत्र ( ७ | १ | २२ ) में प्रयुक्त ' तथा चात्मा ' इस उक्ति से आत्मा में परममहत्परिमाण गुण का रहना भी महर्षि का अभिप्रेत समझना चाहिए । यतः सुखादि

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

पृथक्त्वमप्यत एव । " नानात्मानो व्यवस्थातः " इति वचनादेव पृथक्त्वं सिद्धम् , सङ्ख्यानुविधायित्वात्पृथक्त्वस्येत्यभिप्रायः । तथा चात्मेतिवचनात्परममहत्परिमाणमिति । " विभववान् महानाकाशस्तथा चात्मा " इति विभुत्वश्वात्मनो वह्नेरूर्ध्वज्वलनाद् वायोस्तिऽर्यग्गमनादवगतम् । दृष्ट- सूत्रकारवचनादाकाशवदात्मनोऽपि विभुत्वात् परममहत्परिमाणं सिद्धमित्यर्थः । व्यवस्था की उक्त अनुपपत्ति रहेगी ही , अतः " तीनात्मानो व्यवस्थातः ' " " की

सूत्रकार कारिते । न च तदाश्रयेणासम्बद्धमदृष्टं तयोः कारणं भवितुमर्हति अतिप्रसङ्गात् । न चात्मसमवेतस्यादृष्टस्य साक्षात् द्रव्यान्तरसम्बन्धी घटत इति स्वाश्रय सम्बन्ध - द्वारेण तस्य सम्बन्ध इत्यायातम् । ततः समस्तमूर्त्तद्रव्यसम्बन्धलक्षणमात्मनो विभुत्वं सिद्धयति । स्वभावत एव वह्नेरूर्ध्वज्वलनं नादृष्टादिति चेत् ? कोऽयं स्वभावो नाम ? यदि वह्नित्वमुत दाहकत्वम् ? रूपविशेषो वा ? तप्तायःपिण्डे वह्नेरपि स्यात् । अथेन्धन विशेषप्रभवत्वं स्वभाव इति ? अनिन्धनप्रभवस्य विद्युदादिप्रभवस्य चौधैर्ध्वज्वलनं न स्यात् । अथातीन्द्रियः कोऽपि स्वभाव : कासुचिद् व्यक्तिष्वस्ति यासामूर्ध्वज्वलनं दृश्यत इति , पुरुषगुणे कः प्रद्वेषः ? यस्य कर्म्मणो गुरुत्वद्रवत्ववेगा न कारणं तस्यात्म विशेषगुणादुत्पादः , यथा पाणिकर्मणः पुरुषप्रयत्नात् , ऊर्ध्वज्वलनतिर्यक्पवनादिनां कर्म्मणां गुरुत्वादयो न कारणमभावात् , तत्तत्कार्य्यविपरीतत्वाच्च । तस्मादेषामप्यात्म विशेषगुणादेवोत्पाद न्याय्यः ऊर्ध्वज्वलन तिय्यं पवनान्यात्मविशेषगुणकृतानि गुरुत्वादिकारणाभावे सति कर्म्मत्वात् पुरुषप्रयत्नजपाणिकर्म्मवत् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — जीव और ब्रह्म में अभेद को प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ गौण हैं । जीव को नाना मान लेने से इसका भी समाधान हो जाता है कि ' सभी आत्माओं के मुक्त हो जाने पर अन्त में संसार का ही लोप हो जायगा ' , क्योंकि ' अपरिमित ' अर्थात् अनन्त वस्तुओं में अन्तिम , न्यूनत्व , अधिकत्व प्रभृति की चर्चा ही नहीं उठती है । जैसा वांतिककार मिश्र ने कहा है कि यतः जीव अनन्त हैं , अतः बराबर ज्ञानी जीवों को मुक्त होते रहने पर भी यह ससार जीवों से शून्य नहीं होता है । अन्तिम , न्यून , और अधिक ये सभी बातें परिमित वस्तुओं की हैं , अपरिमत वस्तुओं में ये सभी बातें असम्भव हैं ।

आत्मा में पृथकूत्व नाम के गुण की भी सिद्धि समझनी चाहिए क्योंकि जहाँ पर संख्या रहेगी वहाँ पर पृथक्त्व भी अवश्य ही रहेगा । " तथा चात्मा " ( ७ | १ | २२ ) वैभव सूत्र में प्रयुक्त सूत्रकार की इस उक्ति से त्रिभुत्व हेतु से आत्मा में भी आकाश की तरह परममहत्परिमाण की सिद्धि होती है । आत्मा का विभुत्व आग की ऊर्ध्वगति और वायु की कुटिल गति से समझते हैं , क्योंकि वे दोनों ही अष्टकृत हैं ।

उन गतियों के आश्रयों में असम्बद्ध अदृष्ट उनके कारण नहीं हो सकते , क्योंकि ऐसा मानने से अतिप्रसङ्ग होगा , एवं आत्मा में समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण अट का बाह्य वस्तुओं के साथ कोई भी साक्षात् सम्बन्ध नहीं हो सकता हैं , अतः यही मानना पड़ेगा कि अदृष्ट के आश्रय आत्मा के साथ वह्निप्रभृति के सम्बन्ध होते हैं । इस प्रकार तद्गत अदृष्ट के साथ भी उनका परम्परा सम्बन्ध होता है । अतः मूर्त्त द्रव्यों के साथ आत्मा का सम्बन्ध अवश्य है और सभी मूर्त द्रव्यों के साथ सम्बन्ध ही विभुत्व ' है ।

( प्र ० ) ' स्वभाव ' से ही वह्नि ऊपर की ओर जलती है , इसमें अदृष्ट कारण नहीं है । ( उ ० ) ' स्वभाव ' शब्द का यहाँ क्या अर्थ है ? ' स्व ' वह्नि का जो ' भाव ' अर्थात् धर्म वह तो ( १ ) वह्नित्व ( २ ) दाहकत्व और ( ३ ) विशेष प्रकार का रूप ये तीन ही हैं , ' स्वभाव ' शब्द से इन तीनों धर्मों को कारण मानने से तपे हुए लोहे का भी ऊर्ध्वज्वलन मानना पड़ेगा , क्योंकि उसमें भी स्वभाव शब्द के उक्त तीनों अर्थ हैं ।

( प्र ० ) लकड़ी की आग ही ऊपर को तरफ जलती है , अतः वह्नि का लकड़ी से उत्पन्न होना ही ऊर्ध्वज्वलन का कारणीभूत ' स्वभाव ' है । ( उ ० ) फिर इन्धन के बिना हो उत्पन्न विद्युत् प्रभृति वह्नि का ऊर्ध्वज्वलन नहीं होगा । अगर किसी वह्नि में कोई ऐसी अतीन्द्रिय सामर्थ्य मानते हैं , जिससे उसी वह्नि में ऊर्ध्वज्वलन होता है , तो फिर जीव के अतीन्द्रिय धर्म्म रूप अदृष्ट को ही अगर ऊध्वंज्वलन का कारण मानते हैं तो आपको क्यों जलन होती है ?

जिस क्रिया का कारण गुरुत्व , द्रवत्व और वेग नहीं है , वह क्रिया आत्मा के विशेष गुण से ही उत्पन्न होती है , जैसे कि पुरुष के प्रयत्न से उत्पन्न हाथ की क्रिया | गुरुत्व , द्रवत्व या वेग वह्नि के ऊर्ध्वज्वलन या वायु की कुटिलगति रूप क्रिया के कारण नहीं हैं , क्योंकि वे वहाँ नहीं है , एवं उनसे होनेवाली क्रियायें भी विलक्षण प्रकार की होती हैं , अतः यही न्याय सङ्गत है कि ऊर्ध्वज्वलनादि क्रियाओं का कारण भी आत्मा का विशेषगुण ही हो ।

पृ. २१५

भाष्य ७९

सन्निकर्षजत्वात् सुखादीनां संयोगः ।

तद्विनाशकत्वाद्विभाग इति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २१५प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 290

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संयोग से उत्पन्न होते हैं , अतः आत्मा में संयोग भी है । यतः विभाग संयोग का नाशक है , अतः आत्मा में विभाग भी है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

सन्निकर्षजत्वात्सुखादीनां संयोगः । सुखादीनामात्मगुणानां मनःसंयोगजत्वादात्मनि संयोगः सिद्धः , व्यधिकरणस्यासमवायिकारणत्वाभावात् । तद्विनाशकत्वाद् विभाग इति । तस्य संयोगस्य विनाशकत्वाद् विभागः सिद्धः , आत्ममनसोनित्यत्वेनाश्रयविनाशस्य विनाशहेतोरभावादित्यर्थः । नन्वात्मनि नित्ये स्थिते नित्यात्मदर्शिनः सुखतृष्णापरिप्लुतस्य सुखसाधनेषु रागो दुःखसाधनेषु द्वेषस्ताभ्यां प्रवृत्तनिवृत्ती , ततो धर्माधम्मौ ततः संसार इत्यदिर्मोक्षः । नैरात्म्ये त्वहमेव नास्मि कस्य दुःखमित्यनास्थायां सर्वत्र रागद्वेषरहितस्य प्रवृत्त्यादेरभावे सत्यपवर्गो घटत इति चेन्न , नित्यात्मदशिनोऽपि विषयदोषदर्शनाद् वैराग्योत्पत्तिद्वारेण तस्योत्पत्तिरित्यलम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — जिस प्रकार हाथ की क्रिया पुरुष में रहने वाले प्रयत्न रूप विशेष गुण से उत्पन्न होती है , उसी प्रकार वह्नि की ऊध्वंज्वलन रूप क्रिया एवं वायु की कुटिल गति रूपा किया ये दोनों ही आत्मा के विशेष गुण से उत्पन्न होती हैं , क्योंकि गुरुत्वादि उनके कारण वहां नहीं हैं जैसे कि पुरुष के प्रयत्न से उत्पन्न हाथ की क्रिया ।

' यतः सुखादि संयोग से उत्पन्न होते हैं , अतः संयोग भी आत्मा का गुण है ' , क्योंकि ' व्यधिकरण ' अर्थात् विभिन्न अधिकरणों में रहने वाले कारणों से उस अधिकरण में कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है । ' विभाग चूंकि संयोग का नाशक है , अतः वह भी आत्मा का गुण है ' अर्थात् विभाग संयोग का नाशक है इससे आत्मा में विभाग नाम के गुण की भी सिद्धि समझनी चाहिए । अभिप्राय यह है कि आत्मा और मन दोनों ही नित्य हैं , अतः सुखादि के कारणीभूत संयोग का नाश आश्रयों के नाश से नहीं हो सकता , फलतः उक्त संयोग का नाश विभाग से ही मानना पड़ेगा । सुख की एवं दुःख की वितृष्णा से ) ओतप्रोत जीव का सुख के साधनों में राग ( प्र ० ) नित्य आत्मा के सिद्ध हो जाने पर नित्य आत्मा के ज्ञान से युक्त एवं

मनोनिरूपणम्

पृ. २१६

भाष्य ८०

मनस्त्वयोगान्मनः ।

सत्यध्यात्मेन्द्रियार्थसान्निध्ये ज्ञानसुखादीनामभूत्वोत्पत्तिदर्शनात् करणान्तरमनुमीयते ।

श्रोत्राद्यव्यापारे स्मृत्युत्पत्ति- दर्शनाद् बाह्येन्द्रियैरगृहीतसुखादिग्राह्यान्तरभावाच्चान्तःकरणम् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २१६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 291

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — मनस्त्वजाति के सम्बन्ध से मन का व्यवहार होता है । आत्मा और इन्द्रिय का संयोग , विषय और इन्द्रिय का संयोग इन दोनों के रहने पर भी किसी को ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति कभी होती है , कभी नहीं । अतः आत्मा , इन्द्रिय और विषय इन सबों से भिन्न ( ज्ञानादि के कारण का अनुमान करते हैं , श्रोत्रादि इन्द्रियों के व्यापार के न रहने पर भी स्मृति की उत्पत्ति होती है । एवं बाह्य इन्द्रियों से गृहीत न होने वाले एवं दूसरे प्रकार से प्रत्यक्ष होने वाले सुखादि की भी सत्ता है । इन दोनों से भी ' अन्तःकरण ' ( मन ) का अनुमान होता है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

प्रधानत्वात् प्रथममात्मनमाख्याय तदनन्तरं मनोनिरूपणार्थमाहमनस्त्वयोगान्मन इति । व्याख्यानं पूर्ववत् । मनस्त्वं नाम सामान्यं मनोव्यक्तीनां भेदे स्थिते सत्यनुमेयम् । या हि समानगुणकार्य्या व्यक्तयस्तासु परं सामान्यं दृष्टं यथा घटादिषु , समानगुणकार्य्याश्च मनोव्यक्तयस्तस्मात्तासु सद्भावे सामान्ययोगः । असिद्धे मनसि तस्य धर्मनिरूपणमन्याय्यमिति मत्वा तस्य सद्भावे प्रमाणमाह – सत्यप्यात्मेन्द्रियार्थसान्निध्ये इति ।

आत्मनस्तावत् सर्वेन्द्रियैर्युगपत्सम्बन्धोऽस्त्येव , इन्द्रियाणामपि सन्निहितैरर्थः सन्निकर्षो भवति , तथाप्येकस्मिन् विषये प्रतीयमाने विषयान्तरे ज्ञानसुखादयो न भवन्ति , तदुपरमाच्च भवन्तीति दृश्यते , तद्दर्शनादात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षेभ्यः करणान्तरमनुमीयते यस्य सन्निधानाज्ञानसुखादीनामुत्पत्तिः , असन्निधानाच्चानुत्पत्तिः । आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षाः काय्र्योत्पत्तौ करणान्तरसापेक्षाः , सत्यपि सद्भावे कार्य्यानुत्पादकत्वात् तन्त्वादिवत् , यच्च तदपेक्षणीयं तन्मनः ।

एकार्थोपलब्धिकालेऽनुपलभ्यमानस्याप्यर्थान्तरस्येन्द्रियसन्निकर्षोऽस्तीति किं प्रमाणम् ? इन्द्रियाधिष्ठानसन्निधिरेव । रूपोपलब्धिकाले गन्धादो s पि घ्राणादिभिः सन्निकृष्यन्ते , तदधिष्ठानसन्निहितत्वादुपलभ्यमानगन्धादिवत् । प्रमाणान्तरमप्याह— श्रोत्राद्यव्यापारे स्मृत्युत्पत्तिदर्शनादिति । स्मृतिस्तावदिन्द्रियजा ज्ञानत्वाद् गन्धादिज्ञानवत् , न चास्याः श्रोत्रादीनि करणानि , बधिरादीनां श्रोत्रादिव्यापाराभावे तस्या उत्पत्तिदर्शनात् ।

तस्माद्यदस्याः करणमिन्द्रियं तन्मनः , न केवलं पूर्वस्मात्कारणात् करणान्तरानुमानं बाह्येन्द्रियैश्चक्षुरादिभिगृहीतानां सुखादीनां रूपाद्यपेक्षया ग्राह्यान्तराणां भावाच्च तदनुमान . मित्याह - बाह्येन्द्रियैरिति । सुखादिप्रतीतिरिन्द्रियजा , अपरोक्षप्रतीतित्वाद् रूपादिप्रतीतिवत् यच्च तदिन्द्रियं तन्मनः , चक्षुरादीनां तत्र व्यापाराभावात् । अभिन्नकरणत्वाज्ज्ञानात्मकाः सुखदाय : सुखसंवेदनानि ( च ) न कारणान्तरेण गृह्यन्ते इति चेन्न , ज्ञानस्वभावत्वे सुखदुःखयोरविशेषप्रसङ्गात् ।

परस्परभेदे चन तयोर्ज्ञानात्मकता , बोधाकारस्योभयसाधारणत्वेऽपि सुखदुःखाकारयोः परस्परव्यावृत्तत्वात् । न चानयविज्ञानाभिन्नहेतुत्वम् , ज्ञानस्यार्थाकारादुत्पत्तेः , तस्माच्च वासनासाहयात् सुखदुःखयोरुत्पादात् , अन्यथोपेक्षाज्ञानाभावप्रसङ्गात् । न च स्वसंवेदनं विज्ञानमित्यपि सिद्धम् एकस्य कर्म्मकरणादिभावे दृष्टान्ताभावात् , स्वप्रकाशः प्रदीपोऽस्ति दृष्टान्त इति चेन्नैवम् , सोऽपि हि पुरुषेण ज्ञायते ज्ञाप्यते चक्षुषा । ज्ञानञ्च तस्य क्रिया , न च स्वयं करणं कर्ता कम्मं क्रिया च भवति ।

यथात्मवादिनां स्वप्रतीतावात्मना युगपत्कर्मकर्तृभाव :, तथा ज्ञानस्यापि करणादिभाव इति चेन्न , अविरोधात् , ज्ञानक्रियाविषयत्वं कर्मत्वमात्मनस्तस्यामेव च स्वातन्त्र्यात् कर्त्तृत्वम् , न स्वातन्त्र्यविषयत्वयोरस्ति विरोधः । करणत्वं क्रियात्वन्तु सिद्धसाध्यत्वाभ्यामेकस्य परस्परविरुद्धम् , कारणकरणयोरेकत्वाभावात् । एवं परप्रयोज्यता करणत्वमितराप्रयोज्यत्वं कर्त्तृत्वमित्यनयोरपि विरोधः , विधिप्रतिषेधस्वभावत्वादित्यतो नैषामेकत्र सम्भवो युक्तः ।

अथ मतम् न ज्ञानस्य करणाद्यभावः स्वसंवेदनार्थः , किन्तु स्वप्रकाशस्वभावस्य तस्योत्पत्तिरेव स्वसंवेदनमिति । अत्रापि निरूप्यते कि तदर्थस्य प्रकाशः ? स्वस्य वा ? यद्यर्थस्य प्रकाशः , तदुत्पत्तेरर्थस्य संवेदनं स्यान्न तु स्वस्येति तस्यासंवेद्यतादोषः । अथेदं स्वस्य प्रकाश :, तदेव प्रकाश्यं प्रकाशश्चेति क्रियाकरणयोरेकत्वं तदवस्थम् । न च स्वोत्पत्तिरेव स्वात्मनि क्रियेत्यपि निदर्शनमस्ति ।

यदपि स्वसंवेदनासिद्धौ प्रमाणमुक्तं यद्यदायत्तप्रकाशं तत्तस्मिन् प्रकाशमाने प्रकाशते , यथा प्रदीपायत्तप्रकाशो घटो , ज्ञानायत्तप्रकाशाश्च रूपादय इति । तत्रापि यदि ज्ञानमेवार्थप्रका शोऽभिमतः , तदा तदायत्तप्रकाशा रूपादय इत्यसिद्धमनैकान्तिकञ्चेन्द्रियेण ।

अथ च ज्ञानजन्योऽर्थप्रकाशो न तु ज्ञानमेवार्थप्रकाशस्तदा दृष्टान्ताभाव :, ज्ञानजनकस्य प्रदीपस्यार्थप्रकाशकत्वाभावात् । एतेनैतदपि प्रत्युक्तम् - " अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिद्धयति " इति । नहि ज्ञानस्य प्रत्यक्षताऽर्थस्य दर्शनम् , किन्तु विज्ञानस्योत्पत्तिः , तत्रासंविदितेऽपि ज्ञाने तदुत्पत्तिमात्रेणैवार्थस्य संवेदनं fearfa | कथमन्यस्योत्पत्तिरन्यस्य संवेदनमिति चेत् ? किं कुर्मो वस्तुस्वभावत्वात् । न चैवं सति सर्वस्य संवेदनम् ? तस्य स्वकारणसामग्री नियमात् प्रतिनियतार्थसंवित्तिस्वभावस्य प्रतिनितप्रतिपत्तृसंवेद्यस्यैव चोत्पादात् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — तृष्णा और दुःख के साधनों में द्वेष , राग से प्रवृत्ति एवं द्वेष से निवृत्ति एवं प्रवृत्ति से धर्म और निवृत्ति से अधर्म और धर्माधर्म से संसार इस प्रकार मोक्ष की ही अनुपपत्ति होगी । अगर ' नैरात्म्य ' अर्थात् आत्मा का विनाश मान लिया जाय ' जब हम ही नहीं तो फिर दुःख किसको ? इस प्रकार की अवज्ञा से पुरुष स्वभावतः राग और द्वेष से निवृत्त हो जायगा । राग और द्वप से शून्य पुरुष को न किसी विषय में प्रवृत्ति होगी किसी से निवृत्ति । प्रवृत्ति और निवृत्ति के न रहने से धर्म और अधर्म की धारा रुक जायगी । इससे जन्म की धारा रुक जाएगी इस प्रकार इस ( नैरात्म्य ) पक्ष में अपवर्ग की उपपत्ति हो सकती है । ( उ ० ) नित्य आत्मा के ज्ञान से युक्त पुरुष को भी विषयों में दोष दीख पड़ते हैं , इस दोष दर्शन से वैराग्य की उत्पत्ति होती है , फिर मोक्ष की उत्पत्ति असम्भव नहीं है । अब इस विषय में इतना ही बहुत है ।

आत्मा और मन इन दोनों में आत्मा ही प्रधान है , अतः आत्मा का निरूपण करके बाद में ' मतस्त्वयोगात् ' इत्यादि से मन का निरूपण करते हैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या ' आत्मत्वाभिसम्बन्धात् ' इत्यादि पङ्क्तियों की तरह समझनी चाहिये । भिन्न - भिन्न मनोव्यक्तियों की सिद्धि हो जाने पर ' मनत्व ' जाति का अनुमान करना चाहिए | जिनसे समान रूप के ( जितने भी ) कार्य होते हैं एवं समान गुणवाले जिनने भी व्यक्ति हैं , उन सबों में एक परसामान्य देखा जाता है , जैसे कि घटादि में ।

मनोव्यक्तियों से भी समान कार्य होते हैं , एवं मनोव्यक्तियां भी समान गुणवाली हैं , अतः उनमें भी एक परसामान्य अवश्य ही है । ' मन की सिद्धि के बिना उसके गुणों का निरूपण सङ्गत नहीं है ' यह मान कर ही ' सत्यपीन्द्रियार्थसंनिकर्षे ' इत्यादि से मन की सत्ता में प्रमाण देते हैं । आत्मा का सभी इन्द्रियों के साथ एक ही काल में सम्बन्ध है ही , ( क्योंकि आत्मा विभु है ) इन्द्रियाँ भी समीप के अपने विषयों के साथ सम्बद्ध हैं हो ।

तब भी जिस क्षण में एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है , उस क्षण में दूसरे ज्ञान या सुखादि रूप आत्मा के दूसरे विशेष गुणों की उत्पत्ति नहीं होती । उस ज्ञान का नाश हो जाने पर दूसरे ज्ञान या सुखादि की उत्पत्ति देखी जाती है ।

इससे ज्ञान के प्रति आत्मा और इन्द्रिय का संनिकर्ष एवं विषय और इन्द्रिय का सन्निकर्ष इन दोनों को छोड़ कर तीसरे कारण का भी अनुमान होता है , जिसके संनिहित रहने से दूसरे ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति होती है एवं जिसके संनिहित न रहने पर नहीं होती है , अतः आत्मा और इन्द्रिय का संनिकर्ष एवं इन्द्रिय और विषय का संनिकर्ष ये दोनों ज्ञानादि के उत्पादन में किसी और व्यक्ति की भी अपेक्षा रखते हैं , क्योंकि उनके रहते हुए भी ज्ञानादि की उत्पत्ति नहीं होती है , जैसे कि तन्तु प्रभृति से ( ज्ञानादि की उत्पत्ति नहीं होती है ) ।

उन संनिकर्षो को ज्ञानादि के उत्पादन में जिसकी अपेक्षा होती है वही मन हैं । ( प्र ० ) जिस समय एक विषय की उपलब्धि होती है , उसी समय अनुपलब्ध दूसरे विषयों के साथ भी इन्द्रियों का संनिकर्ष है ' , इसमें क्या प्रमाण है ? ( उ ० ) इन्द्रियों के अधिष्ठान ( चक्षुगोलकादि आश्रय प्रदेश , ही प्रमाण हैं ।

जिस समय ( चक्षु से ) रूप की उपलब्धि होती है , उसी समय घ्राणादि इन्द्रियों के साथ भी उनके विषय गन्धादि सम्बद्ध रहते हैं , क्योंकि वे भी अपने ग्राहक घ्राणादि इन्द्रियों के अधिष्ठान के समीप हैं , जैसे कि उपलब्धि कालिक गन्धादि । ' श्रोत्राद्यव्यापारे ' इत्यादि से मन को सत्ता में और भी प्रमाण देते हैं । स्मृति भी इन्द्रिय से उत्पन्न होती है , क्योंकि वह भी ज्ञान है , जैसे कि गन्धादि का ज्ञान ।

श्रोत्रादि इन्द्रियाँ स्मृति के हेतु नहीं हैं , क्योंकि श्रोत्रादि व्यापार के न रहने पर भी बहरे व्यक्ति को भी स्मृति होती है , अतः स्मृति का हेतु जो इन्द्रिय वही ' मन ' है । केवल इन कहे हुए हेतुओं से ही मन का अनु-

२८ मान नहीं होता है , किन्तु ' बाह्य इन्द्रियों से ' अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से जिन सुखादि विषयों का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है , वे रूपादि से विलक्षण अर्थ , अथ च प्रत्यक्ष योग्य सुखादि से भी मन का अनुमान होता है ! यही बात ' बाह्येन्द्रियैः ' इत्यादि से कहते हैं । सुख की प्रतीति भी इन्द्रिय से होती है , क्योंकि वह भी अपरोक्ष प्रतीति है , जैसे कि रूपादि की प्रतीति ।

सुखादि का प्रत्यक्ष करानेवाली इन्द्रिय हो ' मन ' है , क्योंकि ( वहाँ ) चक्षुरादि अन्य इन्द्रियों का व्यापार असम्भव है । ( प्र ० ) ज्ञान एवं सुखादि वस्तुतः अभिन्न हैं , क्योंकि एक ही सामग्री से इन सबों की उत्पत्ति होती है , अतः सुख एवं उसके ज्ञान के लिए ज्ञान के उत्पादकों को छोड़ कर और किसी को अपेक्षा के होते तो और दुःख में कोई अन्तर नहीं है | ( उ ० ) सुखादि अगर ज्ञान स्वभाव सुख न रहता । सुख और दुःख परस्पर भिन्न हैं तो फिर दोनों ज्ञान स्वभाववाले नहीं हो सकते ।

सुखादि में ज्ञानाकारतारूप एक धर्मं मान लेने पर भी उनमें से प्रत्येक में रहनेवाले सुखाकारत्व एवं दुःखाकारत्व रूप विभिन्न धर्म तो परस्पर भिन्न हैं हो । ( बौद्ध मत में भी ) केवल ज्ञान के कारण विज्ञान से सुख और दुःख की उत्पत्ति नहीं हो सकती , क्योंकि विषयाकार विज्ञान से ज्ञान को ही उत्पत्ति होती है ।

विषयाकारविज्ञान को ही जब वासना का साहाय्य मिलता है तो उससे सुख दुःख की उत्पत्ति ( बौद्ध मत से ) होती है , अगर ज्ञान के उत्पादक विषयाकार विज्ञान से ही सुख और दुःख की भी उत्पत्ति मानें तो संसार से उपेक्षात्मक ज्ञान की सत्ता उठ जायगी , ( क्योंकि सुख और दुःख से भिन्न ज्ञान ही बौद्ध मत में उपेक्षा ज्ञान है ।

) विज्ञान ' स्वसंवेदन ' अर्थात् स्वप्रकाश ही है ' इसमें भी कोई प्रमाण नहीं है , क्योंकि इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है कि एक ही वस्तु एक ही क्रिया का एक ही समय में करण भी हो एवं कर्मादि अन्य कारक भी हो । ( प्र ) स्वतः प्रकाश प्रदीप हो इस विषय में दृष्टान्त है ? ( उ ) नहीं , प्रदीप का ज्ञान पुरुष को होता है , ( अतः वह उसका कर्ता है ) ।

वह चक्षु से उत्पन्न होता है , अतः चक्षु उसका करण है , ( वह ज्ञान प्रदीप - विषयक होने के कारण प्रदीप कर्म है ) , वह क्रिया ( धात्वर्थ ) प्रदीप विषयक ज्ञान रूप है । अतः एक ही वस्तु एक ही समय में क्रिया , कर्त्ता , कर्म और करण नहीं हो सकती है ।

( प्र ० ) आत्मवादियों ( विज्ञानादि भिन्न स्थिर नित्य आत्मा माननेवालो ) के मत में एक ही आत्मतत्त्वज्ञान ( क्रिया ) का कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों एक ही समय में एक ही आत्मा में है हो , अतः कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों में कोई विरोध नहीं है , उसी प्रकार विज्ञानवादियों के मत में भी उपपत्ति हो सकती है ।

( उ ० ) सविषयक ( ज्ञानादि रूप एक ही क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व ये दोनों विरुद्ध नहीं हैं , क्योंकि सविषयक ज्ञान क्रिया का विषयत्व ही उसका कर्मत्व है , एवं उसी क्रिया में स्वतन्त्रता है कर्तृत्व , ये दोनों ही आत्मा में रह सकते हैं , किन्तु क्रियात्व एवं करणत्व ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं , क्योंकि करण सिद्ध रहता है , एवं क्रिया साध्य होती है , अतः एक ही व्यक्ति में क्रियात्व एवं करणत्व दोनों नहीं रह सकते ।

करणत्व एवं कर्तृत्व ये दोनों भी परस्पर विरुद्ध हैं , क्योंकि करण दूसरे के द्वारा प्रयुक्त होता है , एवं कर्ता दूसरे कारकों से बिलकुल ही अप्रयोज्य होता है , अर्थात् स्वतन्त्र होता है । अतः ये दोनों भी एक समय एक में नहीं रह मकते । ( प्र ० ) ज्ञान के प्रकाश के लिए करणादि का अभाव कभी हो ही नहीं सकता , क्योंकि ज्ञान की उत्पत्ति ही उसका प्रकाश है । ( उ ० ) इस विषय में यह पूछना है कि ज्ञान अपने विषयों का प्रकाश रूप है ? या ' स्वसंवेदन ' ' स्व ' अर्थात् अपना ही प्रकाश रूप है ?

अगर अर्थ प्रकाश रूप है तो फिर उससे अर्थ का ही ' संवेदन ' अर्थात् प्रकाश होगा , ' स्व ' अर्थात् ज्ञान का नहीं , अतः ज्ञान को अर्थप्रकाश रूप मानने से बौद्ध मत में ज्ञान ' असंवेद्य ' अर्थात् अतीन्द्रिय हो जायगा । अगर ज्ञान को ' स्व का ही प्रकाशक मानें तो फिर एक ही वस्तु प्रकाश्य और प्रकाशक दोनों ही होगी , अतः इस पक्ष में भी करणत्वं और क्रियात्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का समावेश रूप असामञ्जस्य है ही । ' स्व ' की उत्पत्ति हो ' स्व रूपा किया है , इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है ।

' स्वसंवेदन ' अर्थात् ज्ञान के स्वप्रकाशत्व में जो यह युक्ति दी जाती है | ( प्र ० ) जिस का प्रकाश जिसके अधीन रहता है , उस प्रकाशक के प्रकाशित होने पर वह ( प्रकाश्य ) भी प्रकाशित हो जाता है , जैसे कि प्रदीप से प्रकाशित होने वाले घटादि एवं ज्ञान से प्रकाशित होने वाले रूपादि । ( उ ० ) इस विषय में यह पूछना है कि ' प्रकाश ' शब्द से अगर रूपादि विषय का ज्ञान ही इष्ट है तो फिर यह सिद्ध नहीं होता कि रूपादि का प्रकाश ज्ञान के अधीन है । अतः उक्त हेतु इन्द्रियों में व्यभिचरित है ।

अगर यह कहें कि ( प्र ० २ ) ज्ञान अर्थ - प्रकाश रूप नहीं है , किन्तु ज्ञान से अर्थ का प्रकाशहोता है , ( उ ० ) तो फिर इ विषय में कोई दृष्टान्त नहीं मिलेगा , क्योंकि प्रदीप में अर्थ को प्रकाशित करने का सामर्थ्य नहीं है । चूँकि ज्ञान कोही अर्थ का प्रकाशक माना है । प्र ) अप्रत्यक्ष ज्ञान से अर्थ प्रकाशित नहीं होता है ।

( उ ० ) ज्ञान का प्रत्यक्षत्व और अर्थ का प्रकाशन दोनों एक नहीं है , अतः ज्ञान को प्रत्यक्ष न होने पर भी उसकी उत्पत्ति से ही अर्थ प्रकाशित हो जाता है , ( फलतः ज्ञान की उत्पत्ति ही अर्थ का प्रकाश है ) | ( प्र ० ) एक वस्तु की उत्पत्ति दूसरे की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? ( उ ० ) इसके लिए हम क्या करें ? यह तो वस्तुओं के स्वभाव के अधीन है । ( प्र ) इस प्रकार से तो सभी अर्थों का प्रकाशन होना चाहिए ?

( उ ० ) वह तो अपने विलक्षण कारणसमूह रूप सामग्री के अधीन है , जिससे कि कुछ नियमित विषयों का ज्ञान कुछ नियमित ज्ञाताओं को ही होता है ।

पृ. २२१

भाष्य ८१

तस्य गुणाः संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वसंस्काराः ।

प्रयत्नज्ञानायौगपद्यवचनात्प्रतिशरीरमेकत्वं सिद्धम् ।

पृथक्त्व- मध्यत एव ।

तदभाववचनादणुपरिमाणम् ।

अपसर्पणोपसर्पणवचनात्संयोग- विभाग | मूर्तत्वात्परत्वापरत्वे संस्कारश्च ।

अस्पर्शवश्वाद् द्रव्यानारम्भकत्वम् ।

क्रियावच्चान्मूर्त्तत्वम् ।

साधारणविग्रहवत्वप्रसङ्गादज्ञत्वम् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २२१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 296

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — मन के संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , परत्व , अपरत्व और संस्कार ये आठ गुण हैं । चूंकि सूत्रकार ने कहा है ( ३।२३ ) कि प्रयत्न और ज्ञान एक क्षण में ( एक आत्मा में ) नहीं होते , अतः सिद्ध होता है कि प्रति शरीर में एक एक मन है । एकत्व संख्या के रहने से ही उसमें पृथकत्व गुण की भी सिद्धि होती है । " तदभाववचनादणु मनः " ( ७।१।२२ ) सूत्रकार की इस उक्ति से मन में अणु परिमाण की सिद्धि होती है ।

' असर्पणोसपण ' वचन से अर्थात् " अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि ” ( ५।२।१७ ) सूत्रकार की इस उक्ति से मन में संयोग और विभाग भी सिद्ध हैं । यतः इसमें मूर्त्तत्व है , अतः परत्व , अपरत्व और ( वेगाख्य ) संस्कार भी हैं । यत : इसमें स्पर्श नहीं है , अतः यह किसी द्रव्य का समवायिकारण भी नहीं है । यतः इसमें क्रिया है , अतः इसमें मूर्त्तत्व भी है ।

मन चेतन नहीं है , क्योंकि मन को चेतन मान लेने पर कारितानि ” इति सूत्रेण मनसः पूर्वशरीरादपसर्पणं शरीरान्तरे चोपसर्पणञ्चादृष्टकारितमित्युक्तम् , तस्मादस्य संयोगविभागौ सिद्धौ । मूर्त्तत्वात्परत्वापरत्वे संस्कारश्च । विभवाभावान्मूर्त्तत्वं सिद्धं तस्माद् घटादिवत् परत्वापरत्ववेगाः सिद्धाः । अस्पर्शवत्त्वाद् द्रव्यानारम्भकत्वम् । अस्पर्शवत्त्वं मनसः शरीरान्यत्वे सति सर्वविषयज्ञानोत्पादकत्वादात्मवत् सिद्धम् , तस्माच्चात्मवदेव सजातीयद्रव्यानारम्भकत्वम् ।

क्रियावत्त्वान्मूर्त्तत्वमिति । अणुत्वप्रतिपादनान्मूर्त्तत्वे सिद्धेऽपि विस्पष्टार्थमेतदुक्तम् । साधारणविग्रहवत्त्वप्रसङ्गादज्ञत्वम् । यदि ज्ञातृ मनो भवेच्छरीरमिदं साधारणमुपभोगायतनं स्यात् । न चैवम् , एकाभिप्रायानुरोधेन तस्य सर्वदा प्रवृत्तिनिवृत्तिदर्शनात् तस्मादज्ञं मनः । चैतन्ये निषिद्धेऽपि प्रक्रमात् में जाना ये दोनों ही अदृष्ट से होते हैं , अतः मन में संयोग और विभाग की सिद्धि होती है । चूंकि मन में मूर्तस्व है , अतः परत्व , अपरत्व और ( वेगाख्य ) संस्कार भी हैं ।

विभुत्व केन रहने पर ही मन में मूर्त्तत्व सिद्ध है । मूर्त्तत्व हेतु से घटादि की तरह मन में परत्व , अपरत्व और वेग ( संस्कार ) ये तीनों भी सिद्ध होते हैं । चूँकि मन में स्पर्श नहीं है , अतः वह किसी द्रव्य का समवायिकारण भी नहीं है । मन में स्पर्श इसलिए नहीं है कि शरीर से भिन्न होने पर भी आत्मा की तरह ज्ञान का कारण है , एवं आत्मा की तरह ही अपने सजातीय द्रव्य का अनारम्भक है । चूंकि मन में क्रिया है , अतः मूर्त्तत्व भी है ।

यद्यपि उसमें अणु परिमाण के कह देने से ही मूर्त्तत्व भी सिद्ध हो जाता है , फिर भी और स्पष्ट करने के लिए क्रिया रूप हेतु का भी उपादान किया है । ' वह अज्ञ ( अचेतन ) इस लिए है कि ( उसको चेतन मानने पर ) ' साधारण विग्रहवत्त्व ' प्रसङ्ग होगा ' ।

अभिप्राय यह है कि मन में अगर ज्ञान ( चैतन्य ) मान लिया जाय तो शरीर जो केवल आत्मा के ही भोग का ' आयतन ' है , उसे आत्मा और मन दोनों के ही भोग का ' आयतन ' मानना पड़ेगा , किन्तु शरीर की प्रवृत्ति और निवृत्ति ये दोनों ही एक ही व्यक्ति के अनुरोध से देखी जाती हैं , अतः मन ' अज्ञ ' ( चेतन नहीं ) है । यद्यपि मन के

२ ९

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अपरे पुनरेवमाहुः - ज्ञानसंसर्गाद्विषये प्रकाशमाने प्रकाशस्वभावत्वात् प्रदीपद्विज्ञानं प्रकाशते , प्रकाशाश्रयत्वात् प्रदीपवर्तिवदात्माऽपि प्रकाशत इति त्रिपुटीप्रत्यक्षतेति । तदप्यसत् , घटीऽयमित्येतस्मिन् प्रतीयमाने ज्ञातृज्ञानयोरप्रतिभासनात् । यत्र त्वनयोः प्रतिभासो घटमहं जानामीति , तत्रोत्पत्रे ज्ञाने ज्ञातृज्ञानविशिष्टस्यार्थस्य मानसप्रत्यक्षता । न तु ज्ञातृज्ञानयोश्चाक्षुषज्ञाने प्रतिभासः , तयोरपि चाक्षुषत्वप्रसङ्गात् ।

तदेवं सिद्धे मनसि तस्य गुणान् प्रतिपादयति - तस्य गुणा इत्यादिना । सङ्ख्याद्यष्टगुणयोगोऽपि मनसो वैधर्म्यम् । सङ्ख्यासद्भावं कथयति - प्रयत्नेत्यादिना । प्रतिशरीरमेकं मन आहोस्विदनेकमिति संशये सति सूत्रकृतोक्तम्- “ प्रयत्नायौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्च प्रतिशरीरमेकं मनः " इति । तेन प्रतिशरीरमेकत्वं सिद्धमिति । मनोबहुत्वे ह्यात्ममनः संयोगानां बहुत्वाद्युगपज्ज्ञानानि प्रयत्नाश्च भवेयुः , दृश्यते च क्रमो ज्ञाननामेकोपलम्भव्यासक्तेन विषयान्तरानुपलम्भाद् निवृत्तव्यासङ्गेन चोपलम्भादित्युक्तम् । एवं प्रयत्नानामपि कपोत्पाद एव एकत्र प्रयतमानस्यान्यत्र व्यापाराभावात् , समाप्त क्रियस्य च भावात् तस्मादेकं मनः । तस्यैकत्वे खल्वेक एबैकदा संयोग इत्येकमेव ज्ञानमेकः प्रयत्न इत्युपपद्यते । यस्तु क्वचिद्युगपदभिमानस्तदलाचक्रवदाशुभावात् 1 न तु तात्त्विकं यौगपद्यमेकत्र दृष्टेन कार्यक्रमेणान्यत्रापि करणस्य तस्यैव सामर्थ्यानुमानात् ।

वेद्वाविमा पुष्पितास्तरव इत्यनेकार्थप्रतिभास : कुत : ? कुतश्च स्वशरीरस्य सह प्रेरणधारणे , न , अर्थसमूहालम्बनस्यैकज्ञानस्याप्रतिषेधाद् बुद्धिभेदएव , न तु तथा प्रतिभासः , सर्वासामेकैकार्थनियत्वात् । एवं शरीरस्य प्रेरणधारणे च प्रयत्नविशेषादेकस्मादेव भवतः यथानेकविषयमेकं ज्ञानं तथा तत्कारणाविच्छाप्रयत्नावपीति न किञ्चिद् दुरुपपादम् । पृथक्त्वमप्यत एवेति । सङ्खयानुविधानादेव पृथक्त्वमपि सिद्धमित्यर्थः । तदभाववचनादणुपरिमाणम् ।

विभववान्महानाकाशस्तथा चात्मेत्यभिधाय तदभावादणु मन इत्युक्तम् । तस्मादणुपरिमाणं मन इति सिद्धम् । नित्यद्रव्यगतस्य विभवाभावस्य अणुपरि माणत्वाव्यभिचारात् । विभवाभावाश्चास्य युगपज्ज्ञानानुपपत्त्यैव समधिगतः । मनसो विभुत्वे युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धाच्चक्षुरादिसन्निकृष्टेषु रूपादिषु ज्ञानयोगपद्यं स्यात् । अथ कथमेकेन्द्रियग्राह्येषु घटादिषु मनोधिष्ठितेन चक्षुषा युगपत्सन्निकृष्टेषु ज्ञानानि युगपन्न भवन्ति ? आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षाणां यौगपद्यान्न भवन्ति ।

लादनेनात्ममनः संयोगस्यैकस्य युगपदनेकस्य ज्ञानस्योत्पादनसामर्थ्याभावः कल्प्यत इति चेत् ? समानमेतद्विभुत्वेऽपि मानस :, तस्मादविभुत्वेऽपि युक्त्यन्तरं वाच्यम् तदुच्यते विभुत्वादात्ममनसोः परस्परसंयोगाभावे सत्यात्मगुणानां ज्ञानसुखादीनामनुत्पत्तिरसमनायिकारणाभावात् । आत्मार्थसंयोगस्य ह्यसमवायिकारणत्वेऽर्थदेशे ज्ञानोत्पत्तिः स्यादसमवायिकारणाव्यवधानेन प्रदेशवृत्तीनां गुणानामुत्पादात् ।

आत्मेन्द्रियसंयोगस्यासमवायिकारणत्वे शब्दज्ञानानुत्पत्तिः , आकाशात्मकेन श्रोत्रेणात्मनः संयोगाभावात् । न च बहिर्देशे प्रत्ययो नापि शब्दज्ञानानुत्पाद :, तस्मादात्मार्थसंयोगस्यात्मेन्द्रियसंयोगस्य चासमवायिकारणत्वं प्रतिषिद्धे परिशेषादात्ममनः संयोगस्यासमवायिकारणत्वं व्यवतिष्ठते , तच्च मनसो व्यापकत्वे न सम्भवतीत्यनुत्पत्तिरेव ज्ञानमुखादीनाम् , अस्ति च तेषामुत्पाद : स एव मनसो विभुत्वं निवर्त्तयतीति । अपसर्पणोपसर्पणवचनात् संयोगविभागावति ।

“ अपसर्पणमुपसर्पणम शितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टपुनरेतदुक्तम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — कोई कहते है कि ( प्र ० ) जब ज्ञान के सम्बन्ध से विषय प्रकाशित होता है , उसी समय ' प्रकाशस्वभाव ' के कारण ज्ञान भी प्रदीप की तरह प्रकाशित हो जाता है , एवं प्रकाश के आश्रय होने के कारण जैसे प्रदीप भी प्रकाशित होता है , वैसे ही प्रकाश रूप ज्ञान के प्रकाशित होने पर आत्मा भी प्रकाशित होता है । इस प्रकार ज्ञान , ज्ञाता और ज्ञेय इन तीनों ' पुटों ' से युक्त होने के कारण प्रत्यक्षता ' त्रिपुटी ' है । ( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि यह घट है ' इस प्रकार का प्रत्यक्ष होने पर भी उसमें ज्ञान और ज्ञातो प्रतिभासित नहीं होते । ' घट को मैं जानता हूँ ' इत्यादि जिन ज्ञानों से वे प्रकाशित होते हैं , वे घटप्रत्यक्ष के बाद ज्ञान और ज्ञाता विशिष्ट घटादिविषयक और ही मानस प्रत्यक्षात्मक ज्ञान हैं , किन्तु पहिले के घटादि विषयक चाक्षुष प्रत्यक्ष में ही ज्ञान और ज्ञाता ये दोनों भी विषय नहीं होते , क्योंकि तब ज्ञाता और ज्ञान इन दोनों को भी चाक्षुष प्रत्यक्ष का विषय मानना पड़ेगा ।

इस प्रकार मन के सिद्ध हो जाने पर ' तस्य गुणाः ' इत्यादि से मन का गुण कहते हैं । संख्यादि आठ गुणों का सम्बन्ध मन का ' वैधर्म्य ' अर्थात् असाधारण धर्म है । प्रयत्न ' इत्यादि से ' मन में संख्यादि आठ गुणों का सम्बन्ध है ' इसमें प्रमाण देते हैं । ' प्रति शरीर में मन एक है या अनेक ?

" इस संशय में सूत्रकार ने कहा है कि चूँकि एक काल में ( एक आत्मा में ) दो ज्ञानों और दो प्रयत्नों की उत्पत्ति नहीं होती है . अतः एक शरीर में एक ही मन है ' इस कथन से ( एक शरीरस्थ ) मन में एकत्व संख्या की सिद्धि होती है ।

अभिप्राय यह है कि ( एक ही शरीर में ) अगर अनेक मन मानें जाँय तो मन और आत्मा के संयोग भी उतने ही होंगे , फिर उन संयोगों से ( एक ही आत्मा एक साथ में ) अनेक ज्ञान एवं अनेक प्रत्यत्तों की उत्पत्ति होनी चाहिए , किन्तु ज्ञानादि की उत्पत्ति क्रमशः हो देखी जाती है , क्योंकि एक प्रयत्न के समय अन्य विषयों के व्यापार नहीं देखे जाते । उस प्रयत्न जनित व्यापार के समाप्त होने पर फिर अन्य विषयक व्यापार भी होते हैं , अतः ( एक शरीर में ) एक हो मन है ।

उसे एक मान लेने पर आत्मा और मन का संयोग भी एक ही होगा , अतः एक क्षण में एक ही ज्ञान और प्रयत्नादि की उत्पत्ति होगी । कभी - कभी एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों और अनेक प्रयत्नों की जो उत्पत्ति दीख पड़ती है , वह भी एक ही क्षण में नहीं होती है , किन्तु अलातचक्र भ्रमण की तरह क्रमशः ही होती है । यह और बात है कि अतिशीघ्रता के कारण वह क्रम समझ में नहीं आता है । एक स्थान पर देखे हुए कार्य के क्रम से दूसरी जगह भी उन्हीं सामर्थ्य से युक्त कारणों का अनुमान होता है ।

( प्र ० ) तो फिर ' ये दो वस्तुएँ हैं , ये वृक्ष फूले हैं ' इत्यादि अनेक विषयों का ज्ञान एवं एक समय अपने शरीर में धारण और प्रेरण आदि क्रियायें कैसे होती हैं ? ( उ ० ) अनेक विषयक एक समूहालम्बन ज्ञान का खण्डन करना उक्त कथन का अभिप्राय नहीं है , किन्तु एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति का खण्डन करना ही उसका अभिप्राय है , चाहे वे एक ही विषयक क्यों न हों ?

अगर उक्त ( समूहालम्बन ) ज्ञान विभिन्न विषयक अनेक ज्ञान ही होते तो फिर उनके आकार भी परस्पर विलक्षण ही होते , क्योंकि वे सभी सरस्पर विभिन्न व्यक्तियों में नियत होते हैं । इसी प्रकार विशेष प्रकार के एक ही प्रयत्न से शरीर का धारण और प्रेरण दोनों हो होंगे । जैसे कि एक ही सामग्री से अनेक विषयक एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है , वैसे ही एक ही इच्छा और प्रयत्नवाली सामग्री से धारण और प्रेरण दोनों की उत्पत्ति होगी इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है ।

' अत एव मन में पृथक्त्व भी है ' अर्थात् चूँकि मन में संख्या है , अतः उसमें पृथक्त्व भी है । ' उसके ' अभाव ' के कहने से मन में अणु परिमाण भी है ' अर्थात् महर्षि कणाद ने वैभवसूत्र के बाद कहा हैं कि ' तदभावादणु मनः , इसमें मन में अणु परिमाण की सिद्धि होती है । ' जो निश्य द्रव्य विभु न हो वह अवश्य हो अणु परिमाण का हो ' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है । एक क्षण में एक आत्मा में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती हैं , इसी से समझते हैं कि मन विभु नहीं है ।

अगर मन विभु हो तो फिर एक ही क्षण में अनेक इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध होने के कारण चक्षुरादि इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध रूपादि विषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति हो जायगी । ( प्र ० ) ( हर एक शरीर में एक एक ही मन मान लेने पर भी ) एक ही इन्द्रिय से सम्बद्ध घटादि विषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति क्यों नहीं होती है ? क्योंकि आत्ममन : संयोग इन्द्रिय का मन के साथ संयोग , एवं अनेक विषयों के साथ इन्द्रिय का संयोग ये सभी तो एक ही क्षण में है ही ।

अगर यह कल्पना करें कि ' उस सामग्री को एक क्षण में एक ही ज्ञान को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है , अनेक ज्ञानों को उत्पन्न करने का नहीं तो फिर ज्ञान यौगपद्य का कारण मन को विभु मान लेने पर भी हो सकता है , इसके लिए मन को अणु मानना व्यर्थ ही होगा , अतः ' मन विभु नहीं है ' इसके लिए दूसरी युक्ति कहनी चाहिए ।

( उ ० ) कहते हैं , आत्मा और मन ये दोनों हो अगर विभुहों तो फिर इन दोनों का संयोग ही नहीं होगा और उन दोनो के संयोग न होने पर आत्मा के विशेषगुण ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति ही नहीं होगी क्योंकि उसका कोई असमवायिकारण नहीं होगा । आत्मा और विषय इन दोनों के संयोग को अगर ज्ञानसुखादि का असमवायिकारण मानें तो फिर उस विषय के देश में ही ज्ञानादि की उत्पत्ति माननी पड़ेगी क्योंकि प्रादेशिक ( अव्याप्यवृत्ति ) गुणों का यह स्वभाव है कि वे असमवायिकारण के अव्यवहित प्रदेश में ही उत्पन्न हों ।

आत्मा एवं ( श्रोत्रादि ) इन्द्रियों के संयोग को ही अगर आत्मा के उन ज्ञानादि गुणों का असमवायिकारण मानें तो शब्दज्ञान की ही अनुत्पत्ति माननी पड़ेगी , क्योंकि आकाशात्मक ( विभु ) श्रोत्र के साथ ( बिभु ) आत्मा का संयोग ही असम्भव हैं , तस्मात् भूतलादि प्रदेशों में ज्ञानादि गुणों की उत्पत्ति नहीं होती हैं , एवं शब्दादि गुणों की उत्पत्ति होती हैं ।

इन ( अनुत्पत्ति और उत्पति ) दोनों से यह सिद्ध होता है कि आत्मा के साथ विषयों के संयोग एवं इन्द्रियों के साथ आत्मा का संयोग ये दोनों आत्मा के विशेष गुणों के असमवायिकारण नहीं हैं , अतः आत्मा और मन का संयोग हो उनका असमवायिकारण है । यह ( असमवायिकारण ) संयोग मन को विभु मानने पर असम्भव होगा , फलतः ज्ञान की उत्पत्ति अनुपपन्न हो जायगी , किन्तु ज्ञान की उत्पत्ति होती है , अतः ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति से ही मन से विभुत्व हट जाता है ।

पृ. २२६

भाष्य ८२

करणभावात्परार्थम् ।

गुणवत्वाद् द्रव्यम् ।

प्रयत्नादृष्टपरिग्रहवशादाशुसञ्चारि चेति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २२६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 301

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आत्मा की तरहमन को भी शरीर का अधिष्ठाता मानना पड़ेगा । चूँकि यह करण है अत : दूसरों के उपभोग का ही साधन ( पदार्थ ) है | चूँकि इसमें गुण हैं , अतः यह द्रव्य है । प्रयत्न और अदृष्ट के कारण यह तीब्र गतिवाला है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अज्ञत्वे सिद्धे सत्याह- करणभावात् परार्थमिति । परस्यो - पभोगसाधनमित्यर्थः । गुणवत्त्वाद् द्रव्यं पृथिव्यादिवत् । प्रयत्नादृष्टपरिग्रहवशादाशु सञ्चारि चेति द्रष्टव्यम् । इच्छाद्वेषपूर्वकेण जीवनपूर्वकेण च प्रयत्नेन परिगृहीतं स्थानात् स्थानान्तरमाशु सञ्चरति तथा अदृष्टेन परिगृहीतं मरणाच्छरीरान्तरमाशु सञ्चरतीति द्रष्टव्यम् । इतिशब्दः परिसमाप्तौ ।

विशुद्धविविध न्यायमौक्तिकप्रकराकरः I

सेव्यतां द्रव्यजलधिः स्फुटसिद्धान्तविद्रुमः ॥

द्रव्यपदार्थः समाप्तः ॥

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — " अपसर्पण और उपसर्पण के कहने से मन में संयोग और विभाग भी हैं " अर्थात् सूत्रकार ने लिखा है कि " अर्पणमुपसर्पणमशितपीत संयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि ” । अभिप्राय यह है कि मन का एक शरीर से ' अपसर्पण ' अर्थात् हटना एवं ' उपसर्पण ' अर्थात् दूसरे शरीर चैतन्य का निषेध कर चुके हैं ( देखिये आत्मनिरूपण ) तथापि प्रसङ्ग आने के कारण उसे फिर से दुहराया है । अज्ञत्व के सिद्ध हो जाने के बाद कहते हैं कि यतः वह करण है , अतः ' परार्थ ' है , अर्थात् दूसरों के उपभोग का साधन मात्र है । चूंकि उसमें गुण है , अतः पृथिवी की तरह वह द्रव्य है । " आत्मा के प्रयत्न और अदृष्ट से शीघ्र चलना उसका स्वभाव है " अर्थात् जिस प्रकार से इच्छा , द्वेष और जीवनयोनि यत्न इन तीनों के साथ सम्बद्ध होने के कारण मन क्षिप्रगति से एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता है , वैसे ही यह अदृष्ट से प्रेरित होकर मरण के बाद दूसरे शरीर में भी शीघ्र चला जाता है । यह ' इति ' शब्द समाप्ति का बोधक है ।

अनेक प्रकार के न्याय रूपी विशुद्ध मोतियों की खान निश्चित सिद्धान्त रूपी मूंगों से युक्त ' द्रव्य समुद्र ' ( द्रव्य निरूपण ) का ( विद्वान लोग ) सेवन करें ।

भट्ट श्रीश्रीषर द्वारा रचित पदार्थों की बोधिका न्यायकन्दली

नाम की टीका में द्रव्य का निरूपण समाप्त हुआ ।

In English

The Soul and the Senses

This text is a commentary by Prasastapada on the nature of the soul (Atman). It explains how the soul can be inferred through the senses and the mind, even though it cannot be perceived directly.

This article answers

  • How to infer the soul through senses?
  • Is the soul perceptible by direct perception?
  • Relationship between soul and senses in prasastapada bhashya?
  • Why the soul is considered the agent of the senses?

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — प्रशस्तपादभाष्य।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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