श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य

प्रशस्तपादभाष्य — गुण: साधर्म्य, रूपादि, संख्या

50 मूल पद्य

गुणसाधर्म्यवैधर्म्यम्

पृ. २२७

भाष्य ८३

रूपादीनां गुणानां सर्वेषां गुणत्वाभिसम्बन्धो द्रव्याश्रितत्वं निग णत्वं निष्क्रियत्वम् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २२७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 302

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — गुपदार्थों का निरूपण

गुणत्व जाति का सम्बन्ध , द्रव्यों में ही रहना , गुणों का राहित्य एवं क्रियाओं का राहित्य ( ये चार ) रूपादि सभी गुणों के साधर्म्य हैं ।

ॐॐॐ

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

नमो जलदनीलाय शेषपर्यङ्कशायिने ।

लक्ष्मीकण्ठग्रहानन्दनिष्यन्दायासुरद्विषे ॥

द्रव्यपदार्थं व्याख्याय गुणानां निरूपणार्थमाह - रूपादीनां गुणानामिति । गुणत्वं नाम सामान्यं तेनाभिसम्बन्धो गुणानामिति परस्परसाधर्म्यकथनम् । इतरपदार्थवैधर्म्यकथनमप्येतत् । गुणत्वं रूपादिषु रत्नत्वमिवोपदेश सहकारिणा प्रत्यक्षेणैव गृह्यते । यत्तु प्रथममस्य कर्मादिविलक्षणतया न ग्रहणं तदाश्रयपारतन्त्र्यस्यात्यन्तिका सादृश्यस्य सम्भवात् । रूपादीनां गुणानामिति स्वरूपमात्रकथनम् । सर्वेषामित्यभिव्याप्तिप्रदर्शनार्थम् । द्रव्याश्रितत्वं द्रव्योपसर्जनत्वम् । एतच्च धर्ममात्रकथनं न तु वैधर्म्याभिधानं द्रव्यकर्मादिष्वपि सम्भवात् ।

एवं निर्गुणत्वं गुणरहितत्वं गुणानां स्वरूपं तेषां स्वात्मनि गुणान्तरानारम्भकत्वात् , तदनारम्भकत्वच रूपादिषु रूपाद्यन्तरानुपलब्धेरनवस्थानाच्च । एवं सत्येकं रूपमणुः शब्द इत्यादिव्यवहार उपाचारात् । सङ्ख्यादिकं रूपाद्याश्रयं न भवति गुणत्वाद् रूपादिवत् । स्वरूपान्तरं कथयति - निष्क्रियत्वमिति । द्रव्ये गच्छति रूपादिकमपि गच्छतीति चेत् ? न , वेगवद्वायुसंयोगेन व्योमादिषु क्रियाया अभावाच्छाखादिषु च भावाद् अन्वयव्यतिरेकाभ्यां मूर्त्तत्वक्रियावस्त्वयो र्व्याप्यव्यापकभावसिद्धौ मूर्त्यभावेन रूपादिषु क्रियानिवृत्तिसिद्धेः कथं तर्हि तेषु गमनप्रतीति : ? आश्रयक्रियया , यथैव सत्तायां नहि सत्ता स्वाश्रयेण सह गच्छति , एकस्य गमने विश्वस्य गमनप्रसङ्गादिति ।

सभ्प्रति परस्परमेव तेषां साधर्म्यं वैधर्म्यश्व प्रतिपादयन्नाह - रूपेत्यादि । एते मूर्तानामेव गुणा नामूर्त्तानाम् । तथा हि रूपस्पर्शपरत्वापरत्ववेगाः पृथिव्यादिषु त्रिषु , वायौ रूपवर्जम् , रूपस्पर्शवजं मनसि , रसगुरुत्वे पृथिव्युदकयोः , द्रवत्वं पृथिव्युदकतेजस्सु , स्नेहोऽम्भसि , गन्धः पृथिव्याम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — शेषनाग रूपी पलंग पर सोनेवाले , लक्ष्मी के कठालिङ्गन से उत्पन्न आनन्द में विभोर , प्रणवस्वरूप मेघ के समान नीलवर्णवाले एवं असुरों के विनाशक ( श्री विष्णु ) को मैं प्रणाम करता हूँ ।

द्रव्य की व्याख्या करने के बाद ( क्रमप्राप्त ) गुणों का निरूपण करने के लिए ' रूपादीनां गुणानाम् ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । ' गुणत्व नाम की जाति के साथ सभी गुणों का सम्बन्ध है ' इस उक्ति से सभी गुणों का परस्पर साधर्म्यं कथित होता है । गुणों के इस साधर्म्य के कथन से ही ' गुणत्वादि जातियों का सम्बन्ध ही गुण से भिन्न पदार्थों का वैधम्यं है ' यह भी कयित हो जाता है ।

उपदेश के सहारे जिस प्रकार प्रत्यक्ष से ही रत्नों का रत्नश्व गृहीत होता है , उसी प्रकार उक्त प्रकार के प्रत्यक्ष से ही गुणत्व भी गृहीत होता है । ( उपदेश से ) पहिले कर्मादि से भिन्न रूप में जो गुणों का ग्रहण नहीं होता है , कर्मादि पदार्थों के साथ गुणों का ' आश्रय पारतन्त्र्य ' रूप अत्यन्त सादृश्य ही इसका कारण है । ' रूपादीनां गुणानाम् ' इस वाक्य से गुणों का केवल स्वरूप ही कहा गया है । सर्वेषाम् ' इस पद से इन साधयों का सभी गुणों में रहना अभिव्यक्त होता है ।

' द्रव्याश्रितत्व ' शब्द का अर्थ है द्रव्योपसर्जनत्व , अर्थात् द्रव्य रूप मुख्य का अप्रधान होना । यह द्रव्याश्रितत्व गुणों के केवल साधर्म्य समझाने के लिए ही कहा गया है , कर्मादि पदार्थां का वैधर्म्यं समझाने के लिए नहीं , क्योंकि द्रव्य एवं कर्म प्रभृति पदार्थों में भी ' द्रव्याश्रितत्व ' तो है ही ।

इसी प्रकार गुणरहितत्व रूप निर्गुणत्व भी गुणों का साधर्म्य ही है ( गुण से भिन्न पदार्थों का वैधर्म्य नहीं ) क्योंकि एक गुण में दूसरे गुण की उत्पत्ति नहीं हाती है । एक रूप दूसरे रूपों का उत्पादक इसलिए नहीं है कि एक रूप में दूसरे रूपों की उपलब्धि नही होती है एवं एक रूप में दूसरे रूप की सत्ता मानने में अनवस्था भी होगी ! इस प्रकार ( गुण में गुण की असत्ता सिद्ध हो जाने पर यही कहना पड़ेगा कि ) ' एकं रूपम् ' , ' अणुः शब्दः ' इत्यादि प्रयोग लक्षणामूलक हैं । इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि रूपादि गुणों में संख्यादि गुण नहीं है , क्योंकि वे भी गुण हैं , जैसे कि रूप !

' निष्क्रियत्वम् ' इत्यादि से गुणों का दूसरा साधर्म्य कहते हैं । ( प्र ० ) द्रव्य के चलने पर उसी के साथ रूपादि भी तो चलते हैं ? ( उ ० ) आकाश में वेग से युक्त वायु का संयोग रहने पर भी क्रिया होती है । किन्तु वेग से युक्त वायु का संयोग रहने पर शाखादि में क्रिया होती है । इस अन्वय और व्यतिरेक के बल से क्रिया और मूर्त द्रव्य में इस प्रकार व्याप्यव्यापकभाव निश्चित होता है कि क्रिया मूर्त द्रव्य में ही रहती है । ऐसा सिद्ध हो जाने पर रूपादि में व्यापकीभूत मूर्त्तत्व के अभाव से व्याप्यभूत क्रिया का अभाव सिद्ध होता है । ( प्र ० ) फिर रूपादि में गमन की उक्त प्रतीतियाँ कैसे होती हैं ? ( उ ० ) जिस प्रकार सत्ता में आश्रय की क्रिया से क्रिया की प्रतीति उसके स्वयं न चलने पर भी होती है , उसा प्रकार रूपादि में भी आश्रय की क्रिया से ही क्रिया की प्रतीति होती हूँ । इस प्रकार अगर क्रिया की प्रतीति से ही क्रिया की सत्ता मानी जाय तो फिर समस्त संसार का ही चलना स्वीकार करना पड़ेगा |

पृ. २२९

भाष्य ८४

रूपरसगन्धस्पर्शपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहवेगा मूर्त्तगुणाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २२९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 304

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रूप , रस , गन्ध , स्पर्श , परत्व , अपरत्व , गुरुत्व , द्रवत्व , स्नेह और वेग ये दस ' मूर्त्तगुण ' ( अर्थात् मूर्त्त द्रव्यों में ही रहनेवाले गुण ) हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अमूर्त्तगुणान् कथयति -- बुद्धिसुखेत्यादि । बुद्ध्यादयो भावनान्ता आत्मगुणाः । आकाशगुणः शब्दः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अब गुणों में ही परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्यं का निरूपण करते हुए ' रूप रस ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । ये मूतं ( द्रव्यों ) के ही गुण हैं , अमूर्त ( आकाशादि ) के नहीं | अभिप्राय यह है कि रूप , स्पर्श , परत्व , अपरत्व और वेग ये पाँच गुण ( मिलकर ) पृथिवी , जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहते हैं । इनमें से रूप को छोड़कर शेष चार गुण वायु में रहते हैं । कथित पाँच गुणों में से रूप और स्पर्श को छोड़ कर शेष तीन गुण मन में रहते हैं । पृथिवी और जल इन दोनों में ( इन पांच में से ) रस और गुरुत्व ये दो ही गुण हैं । द्रवत्व पृथिवी , जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहता है । स्नेह केवल जल में और गन्ध केवल पृथिवी में रहता है ।

बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , धर्म , अधर्म , भावना और शब्द ये दश अमृतं गुण ( अर्थात् मुत्तं द्रव्य से भिन्न द्रव्यों में ही रहते ) हैं ।

संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग और विभाग ये पाँच ' उभय गुण ' अर्थात् मूर्त्त द्रव्य और अमूर्त्त द्रव्य दोनों में रहने वाले गुण हैं ।

पृ. २२९

भाष्य ८५

बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्म भावनाशब्दा अमूर्त्तगुणाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २२९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 304

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , धर्म , अधर्म , भावना , और शब्द ये दश ' अमूर्त्तगुण ' ( अर्थात् अमूर्त्त द्रव्यों में ही रहने वाले गुण ) हैं ।

पृ. २२९

भाष्य ८६

सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागा उभयगुणाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २२९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 304

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , और विभाग ये पाँच ' उभयगुण ' ( अर्थात् मूर्त्तद्रव्य और अमूर्त्तद्रव्य दोनों में ही रहनेवाले गुण ) हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः उभयगुणाः मूर्त्तामूर्त्तगुणाः ।

पृ. २३०

भाष्य ८७

संयोग विभाग द्वित्वद्विपृथक्त्वादयोऽनेकाश्रिताः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 305

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संयोग , विभाग , द्वित्व और द्विपृथक्त्वादि गुण ' अनेकाश्रित ' ( अर्थात् इनमें से प्रत्येक अनेक द्रव्यों में ही रहने वाला है ) हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संयोगविभागद्वित्वद्विपृथक्त्वादयोऽनेकाश्रिताः , एका संयोगव्यतिरेका च विभागव्य क्तिरुभयोर्द्रव्योर्वर्त्तत इत्यनेकाश्रितत्वम् । एवं द्वित्वद्विपृथक्त्वव्यक्त्योरपि । आदिशब्दगृहीतास्तु त्रित्वत्रिपृथक्त्वादिव्यक्तयो यथासम्भवं बहुष्वाश्रिताः । अनेकशब्दरच ' एको न भवति ' इति व्युत्पत्त्या द्वयोर्बहुष्वपि साधारणः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — एक ही संयोग और एक ही विभाग ( अपने प्रतियोगी और अनुयोगी ) दोनों द्रव्यों में रहता है , अतः ये दोनों ' अनेकाश्रित ' गुण हैं । इसी प्रकार द्वित्व और द्विपृथक्त्वये दोनों भी ' अनेकाश्रित ' गुण हैं । आदि ' शब्द के द्वारा बहुत से द्रव्यों में रहनेवाले त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्वादि गुण भी अनेकाश्रित कहे गये हैं । ' एको न भवति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' दो ' एवं इससे अधिक ' बहुत ' सभी ' अनेक ' शब्द के अर्थ हैं ।

' शेष ' अवशिष्ट रूपादि गुणों की इकाइयाँ एक एक द्रव्य में हो रहती है । अभिप्राय यह है कि एक ही रूपादि इकाई संयोग की तरह दो व्यक्तियों को व्याप्त कर नहीं रहती ।

पृ. २३०

भाष्य ८८

शेषास्त्वेकैकवृत्तयः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 305

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शेष सभी गुण ' एकद्रव्यवृत्ति ' अर्थात् एक एक द्रव्य में ही रहते हैं

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

शेषास्त्वेकैकवृत्तयः ' शेषा ' रूपादिव्यक्तयः , एकस्यामेव व्यक्तौ वर्त्तन्ते , न पुनरेका रूपव्यक्तिः संयोगवदुभयत्र व्यासज्य वर्त्तत इत्यर्थः ।

विशेषगुणान् निरूपयति - रूपरसगन्धेत्यादि । विशेषो व्यवच्छेदः , तस्मै प्रभवन्ति ये गुणास्ते वैशेषिका गुणा रूपादयः । ते हि स्वाश्रयमितरस्मा-

द्वयवच्छिन्दन्ति न संख्यादय :, तेषां स्वतो विशेषाभावात् । यस्तु तेषां विशेषः स आश्रयविशेषकृतः एवेति बोद्धव्यम् ।

संख्यादय : सामान्यगुणाः 1 सामान्याय स्वाश्रयसाधम्र्माय गुणाः , न स्वाश्रयविशेषायेत्यर्थः 1 नन्वणुपरिमाणं परमाणूनां व्यवस्थापकम् ? न जात्यन्तरपरमाणुसाधारणत्वात् । सांसिद्धिकद्रवत्वमपां विशेषगुण एव तेन नैमित्तिकग्रहणम् ।

पृ. २३०

भाष्य ८९

रूपरसगन्धस्पर्शस्नेहसांसिद्धिकद्रवत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दा वैशेषिकगुणाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 305

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रूप , रस , गन्ध , स्पर्श , स्नेह , सांसिद्धिक द्रवत्व , बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , धर्म , अधर्म , भावना , संस्कार और शब्द ये ( सोलह ) विशेष गुण हैं ।

पृ. २३१

भाष्य ९०

सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वनैमित्तिकद्रत्ववेगाः सामान्यगणाः ।

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यैकै केन्द्रियग्राह्याः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 306

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संख्या , परिमाण , संयोग , विभाग , परत्व , अपरत्व ,

गुरुत्व , नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये ( ग्यारह ) सामान्य गुण हैं ।

शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध इन पाँच में से प्रत्येक एक ही इन्द्रिय से गुहीत होता है , एवं बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होता है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यकै केन्द्रियग्राह्याः । बाह्यानीन्द्रियाणि चक्षुरादीनि बाह्यर्थप्रकाशकत्वात् । तैः प्रत्येकं रूपादयो गृह्यन्ते ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' रूपरस ' इत्यादि वाक्य के द्वारा विशेष गुणों का वर्णन करते हैं । ' विशेष ' शब्द का अर्थ है ' व्यवच्छेद ' अर्थात् भेदबुद्धि । इतने गुण भेदबुद्धि के उत्पादन में समर्थ है | वे ही ' वैशेषिक गुण ' हैं , जैसे कि रूपादि । ये अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में समझाते हैं । संख्यादि सामान्य गुण अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में नहीं समझा सकते , क्योंकि ( एक द्रव्य की एक संख्या से दूसरे द्रव्य की उसी संख्या में ) स्वतः कोई अन्तर अर्थात् विशेष नहीं है । उन दोनों संख्याओं में जो कुछ अन्तर है उसे आश्रय के विशेषों से ही समझना चाहिए ।

ऊपर कहे हुए संख्यादि सामान्य गुण हैं । अर्थात् ' सामान्याय गुणा : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कथित संख्यादि ' सामान्य ' अर्थात् अपने आश्रयों में परस्पर साधर्म्य प्रतीति के ही कारणीभूत गुण हैं , इनसे इनके आश्रयों में परस्पर विभिन्नता की प्रतीति नहीं होती है । ( प्र ० ) अणु परिमाण तो परमाणुओं का व्यवस्थापक है , अर्थात् और परिमाणवालों से विभिन्नत्व बुद्धि का कारण है ? ( उ ० ) नहीं , अणु परिमाण भी विभिन्न जातीय परमाणुओं में समान रूप से रहने के कारण परस्पर ( परमाणुत्व रूप ) साधर्म्य - बुद्धि का ही कारण है । सांसिद्धिक ( स्वाभाविक ) द्रवत्व जल का विशेष गुण है , अतः नैमित्तिक द्रवत्व को ही सामान्य गुणो में गिनाया है ।

शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध ये पाँच गुण ' बाह्येकै केन्द्रियग्राह्य ' हैं , अर्थात् बाह्य विषयों के ही प्रकाशक होने के कारण चक्षुरादि ' बाह्येन्द्रिय ' हैं । शब्दादि में से प्रत्येक चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियों में से ही किसी एक इन्द्रिय से गृहीत होता है ।

पृ. २३२

भाष्य ९१

सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्व संयोग विभागपरत्वापरत्वद्रवत्वस्नेहवेगा द्वीन्द्रियग्राह्याः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 307

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग , विभाग , परत्व , अपरत्व , नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये नौ गुण दो इन्द्रियों से ( भी ) गृहीत हो सकते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संख्यादयो द्वीन्द्रियग्राह्याः चक्षुस्पर्शनग्राह्याः । यथा चक्षुषा ' स्निग्धोऽयम् ' इति प्रतीतिरेवं त्वगिन्द्रियेणापि भवति , संख्यादिवत् स्नेहोऽपि तदुभयग्राह्यः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — संख्या से लेकर वेग पर्यन्त कथित ये दश गुण ' द्वीन्द्रियग्राह्य ' हैं , अर्थात् चक्षु और त्वचा दोनों इन्द्रियों से गृहीत होते हैं । ' यह स्निग्ध है ' यह प्रतीति जैसे चक्षु से होती है , वैसे ही त्वचा से भी होती है अतः संख्यादि की तरह स्नेह भी ' द्वीन्द्रियग्राह्य ' है ।

बुद्धि से लेकर प्रयत्न पर्यन्त कहे हुये ये छः गुण ' अन्तःकरणग्राह्य हैं ' , अर्थात् इनका प्रत्यक्ष मन रूप अन्तरिन्द्रिय से ही होता है । कोई कहते हैं कि ( प्र ० > बुद्धि का अनुमान हो होता है , अतः अन्तरिन्द्रिय से भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता । ( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि बुद्धि को अनुमिति का कोई उपयुक्त हेतु नहीं है । केवल ( ज्ञेय ) अर्थ के ज्ञान अनुमिति के हेतु नहीं हो सकते , क्योंकि यह व्यभिचरित है ।

ज्ञात अर्थ के ज्ञानों को अनुमिति का हेतु माने ( तो भी नहीं हो सकता , क्योंकि ) अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध ही उसकी ' ज्ञातता ' है । अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध ( ज्ञानक्रिया का ) कर्मत्व रूप ही है । अत : ज्ञान के प्रतीत हुये बिना ज्ञानकर्मत्व रूप ज्ञातता की प्रतीति नहीं हो सकती , किन्तु अनुमिति में लिङ्ग की तरह उसका विशेषण भी कारण है वह लिङ्ग की तरह ज्ञात होकर ही ।

अगर यह मानें कि ( प्र ० ) ज्ञान की उत्पत्ति के बाद इस ज्ञान से ही अर्थ की एक विशेष प्रकार की अवस्था होती हैं , जिसे ज्ञात - तावस्था कहते हैं । जिस प्रकार कि चावल में पाक से पक्वता नाम की एक अवस्था उत्पन्न होती है । ( उ ० ) इस कथन में भी कुछ विशेष सार नहीं है , क्योंकि पाक से चावल में जिस प्रकार ओदनावस्था रूप पक्वता का अनुभव होता है , वैसे ही अर्थ में ज्ञातता का कोई अनुभव नहीं होता ।

( विषयों के ज्ञान के बाद जो ) उसमें अपरोक्ष रूपता , त्याग या ग्रहण करने की जो योग्यता भासित होती है , वह भी ज्ञान सम्बन्ध को छोड़ कर और कुछ नहीं है | एवं इस पक्ष में अनवस्था दोष भी है , क्योंकि जिस प्रकार ज्ञात होने पर अथों में ज्ञातता मानते हैं , उसी प्रकार ज्ञातता के ज्ञात होने पर उसमें भी कोई दूसरी ज्ञातता माननी पड़ेगी । जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । अगर ज्ञातता को स्वप्रकाश मान लें तो फिर ज्ञान की ही स्वप्रकाश मान लेने में क्यों द्वेष है ?

कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) तीनों कालों में से वर्तमान काल ही ऐसा है जिससे युक्त अर्थ का प्रत्यक्ष होता है अर्थात् वर्त्तमानकालिक वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष होता है । श्रतः वस्तुओं की जो वर्त्तमानावस्था , भूतावस्था और भविष्यदवस्था है इनमें से वस्तुओं के प्रत्यक्षमूलक होने के कारण केवल वर्तमानावस्था ही उसकी ज्ञातता है ! यह ज्ञातता ही ज्ञानानुमिति का हेतु है ( उ ० ) किन्तु इस कथन में भी कुछ सार नहीं है , क्योंकि वस्तुओं का वर्तमान काल के साथ सम्बन्ध ( या उसमें रहना ) ही उनकी

३० वर्त्तमानकालावच्छिन्नता है । यह उनका स्वाभाविक धर्म है , यह धर्म ज्ञान से उत्पन्न नहीं होता , ज्ञान के द्वारा प्रतीत भर होता है ।

जो कोई विषय संवेदन ज्ञान का अनुमान मानते हैं , उन्हें इस प्रकार पराजित करना चाहिये कि यह ' विषयसंवेदन ' समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है ? या विषयों में ? विषयों में तो रह सकता नहीं , क्योंकि विषयों में चैतन्य का खण्डन कर चुके हैं ( देखिए आत्मनिरूपण पृ ० १७१ ) । अगर यह समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है तो फिर ज्ञान उससे भिन्न कौन सी वस्तु है ? जिसका विषय संवेदन से अनुमान होता है ।

( ० ) अनुमेयज्ञान एवं विषयसंवेदन ये दोनों भिन्न हैं , क्योंकि ( अनुमेय ) ज्ञान विषयसंवेदन का कारण और ज्ञाता का व्यापार है । ( उ ० ) विषयसंवेदन का कारणीभूत ज्ञान नित्य है ? अथवा अनित्य ? अगर अनित्य है तो फिर उसकी उत्पत्ति के लिए भी अलग से कारण कहना पड़ेगा । विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों से युक्त ज्ञाता मनःसंयोग को अगर उसका कारण मानें , तो फिर इन्हीं कारणों के समूह से विषयसंवेदन की भी उपपत्ति मानिये ।

विषयसंवेदन के उत्पादक कारणों की पंक्ति में उस ज्ञान को बिठाने की क्या आवश्यकता है ? अगर उस अनुमेय ज्ञान को नित्य मानते हैं और विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों के रहने और नहीं रहने से विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व ( कभी होना कभी नहीं ) का निर्वाह करते हैं , तो फिर विषय संवेदन के कादाचित्कत्व के प्रयोजक इन्द्रियादि रूप कारणों से ही विषयसंवेदन की उत्पत्ति मान लीजिए ।

इस तरह के ज्ञान की कल्पना हो व्यर्थ है जो विषयसंवेदन से अनुमेय हो एवं विषयसंवेदन का कारण हो , क्योंकि उसी विषयसंवेदन से अर्थविषयक बोध एवं तज्जनित व्यवहार दोनों की उपपत्ति हो जायगी ।

अगर यह कहें कि प्र ० ) विषय एवं इन्द्रियादि से उत्पन्न ज्ञान तब तक आत्मा में समवाय सम्बन्ध से कैसे रह सकता है जब तक कि आत्मा को सहजज्ञानमय न माना जाय । आत्मा अगर स्वतः अचेतन हो किन्तु ज्ञान का कारण होने से ही ( उसमें ) ज्ञान की सत्ता हो तो फिर इन्द्रियादि ( रूप ज्ञान के और कारणों ) में भी ज्ञान का समवाय मानना पड़ेगा । ( उ ० ) उक्त कथन भी असङ्गत ही है , क्योंकि स्वाभाविक नियम के अनुसार ही इस विषय का अवधारण हो जायगा कि ज्ञान अपने आत्मा रूप कारण में ही समवाय सम्बन्ध से है , इन्द्रियादि रूप कारणों में नहीं । जैसे कि तन्तु में पटरूपता न रहने पर भी ( पट के कारणीभूत ) तन्तु में ही समवाय सम्बन्ध से पट रहता है , तुरी , वेमा प्रभृति अपने अन्य कारणों में नहीं । इस नियम को मान लेने से ही आत्मा में हा ज्ञान का समवाय है , इस नियम की भी उपपत्ति हो जायगी ।

इसी से किसी का यह मत भी खण्डित हो जाता है कि ( प्र ० ) स्वसंवेदन ( स्वतः प्रकाश ) ज्ञान आत्मा का स्वकीयचैतन्य ही है ( वह किसी कारण से उसमें उत्पन्न नहीं होता है ) | ( उ ० ) क्योंकि ( वह ज्ञान अगर स्वतः प्रकाश और नित्य है तो फिर ) संसारावस्था में भी उसका प्रत्यक्ष होना चाहिये । अगर यह कहें कि ( प्र ० ) संसारावस्था में वह अविद्या से ढँका रहता है , ( उ ) तो फिर इस विषय में यह पूछना है कि क्या ब्रह्म में भी अविद्या रहती है ?

एवं नित्य एवं स्वप्रकाश रूप ज्ञान के तिरोधान में ही क्या युक्ति है ? एवं उसके तिरोहित हो जाने पर ( संसारावस्था में ) और विषयों का ज्ञान भी असम्भव होगा , क्योंकि ' तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' इत्यादि श्रुतियों में कहाँ गया है कि उसीके प्रकाश से और सभी प्रकाशित होते हैं । अगर संसारावस्था में भी आत्मा का वह सहज चैतन्य प्रकाशित होता है तो फिर सभी जीवों को मुक्ति मिल जायगी , क्योंकि विद्या रूप तत्त्वज्ञान से अविद्या का विनाश हो जाता है ।

अगर विद्या के प्रकाशित होने पर भी अविद्या का विनाश नहीं होता है तो फिर विद्या ( तत्त्वज्ञान ) अविद्या के विनाश का कारण ही नहीं है । तब फिर किसी को भी मोक्ष का मिलना असम्भव हो जायगा । अंशों से शून्य किसी अखण्ड वस्तु के किसी अंश के प्रकाशित होने एवं किसी अंश के अप्रकाशित होने की तो शङ्का ही नहीं करनी चाहिए ।

पृ. २३२

भाष्य ९२

बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेष प्रयत्नास्त्वन्तःकरणग्राह्याः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 307

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष और प्रयत्न ये छ : गुण ' अन्त : - करण ' अर्थात् मन से ज्ञात होते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ता अन्तःकरणग्राह्याः , मनसा प्रतीयन्त इत्यर्थः ।

बुद्धिरनुमेया नान्तःकरणेन गृह्यत इति केचित् तदयुक्तम् , लिङ्गाभावात् । न तावदर्थमात्रं लिङ्गम् , तस्य व्यभिचारात् । ज्ञातोऽर्थो लिङ्ग चेत् ? ज्ञानसम्बन्धो ज्ञातता , याऽसौ ज्ञानकर्मता सा प्रतीयमाने ज्ञाने न प्रतीयते , सम्बन्धिप्रतीत्यधीनत्वात् सम्बन्धप्रतीतेरिति कथं तद्विशेषेणार्थो लिङ्गं स्यात् ? लिङ्गवल्लिङ्गविशेषणस्यापि ज्ञायमानस्यैवानुमान हेतुत्वम् । अथ मन्यसे ' ज्ञानेन स्वोत्पत्त्यनन्तरमर्थे ज्ञातता नाम काचिदवस्था जन्यते पाकेनेव तण्डुलेषु पक्वता , सा चार्थधर्मत्वादर्थेन सह प्रतीयते ' इति । तदप्यसारम् अननुभवात् । यथा हि तण्डुलानामेवोदनीभावः पक्वताऽनुभूयते नैवमर्थस्य ज्ञातता । या चेयमपरोक्षरूपता हानादिव्यवहारयोग्यता च तस्य , साऽपि हि ज्ञानसम्बन्धो न धर्मान्तरम् । यथा चार्थे ज्ञायमाने ज्ञातता , तथा ज्ञाततायामपि ज्ञायमानायां ज्ञाततान्तरमित्यनवस्था । अथेयं स्वप्रकाशा ? ज्ञाने कः प्रद्वेषः ?

वस्तुतस्त्रिकालविशिष्टोऽप्यर्थो ज्ञानेन प्रतीयमानो वर्त्तमानकालावच्छिन्नः प्रतीयते । या च त्रिकालस्य वर्त्तमानकालावच्छिन्नावस्था सा ज्ञातता , ज्ञानकृतत्वात्तस्य लिङ्गमिति कश्चित् । तदपि न किञ्चित् वर्त्तमानावछिन्नता हि वर्त्तमानकालविशिष्टता सा चार्थस्य स्वाभाविकी , न ज्ञानेन क्रियते किन्तु प्रतीयते ।

यो s पि हि विषयसंवेदनानुमेयं ज्ञानमिच्छति , सोऽप्येवं पर्यनुयोज्यः --किं विषयसंवेदनमात्मनि समवैति ? विषये वा ? न तावद्विषये , तच्चैतन्यप्रतिषेधात् । अथात्मनि समवैति ? ततः किमन्यद्विज्ञानं यदस्यानुमेयम् । अस्य कारणं ज्ञातृव्यापारलक्षणं तदिति चेत् ? तत्किं नित्यम् ? अनित्यं वा ? यद्यनित्यं तदुत्पत्तावपि कारणं वाच्यम् । विषयेन्द्रियादिसहकारी ज्ञानमनः संयोगोऽस्य कारणमिति चेत् ? सेव सामग्री विषयसंवेदनोत्पत्तावस्तु किमन्तर्गडुनानेन ? अथ तन्नित्यम् ? कादाचित्कविषयेन्द्रियसंनिकर्षादिसहकारि कादाचित्कं विषयसंवेदनं करोतीत्यभ्युपगः , तदस्याप्यागन्तुककारणकलापादेव विषयसंवेदनोत्पत्तिसिद्धौ तत्कल्पनावैयर्थ्यम् ? विषयसंवेदनादेवार्थावबोधस्य तत्पूर्वकस्य व्यवहारस्य च सिद्धेः ।

अथोच्यते - विषयेन्द्रियादिजन्यं विज्ञानं कथमात्मन्येव समवैति ? यद्यात्मा सहजज्ञानमयो न स्यात् । तस्याचेतनत्वे हि कारणत्वातिशेषादिन्द्रियादिष्वपि ज्ञानसमवायो भवेदिति I तत्र स्वभावनियमादेव नियमोपपत्तेः ।

तन्तूनामपत्वेऽपि तन्तुत्वजातिनियमात्तेषु समवायो न तुर्यादिषु तद्वदचिदात्मकेऽप्यात्मन्यात्मत्वजातिनियमाद् ज्ञानसमवायस्य नियमो भविष्यति ।

एतेनैतदपि प्रत्युक्तं यदाहुरेके स्वसंवेदनमात्मनो निजं चैतन्यम् ' इति , संसारावस्थायामपि तस्यावभासप्रसङ्गात् । अविद्यया वा तस्य तिरोधानमिति चेत् ? किं ब्रह्मणोऽप्यविद्या ? कथं च नित्ये स्वप्रकाशे तिरोधानवाचोयुक्ति : ? न च तिरोहिते तस्मिन्नन्यप्रतिभानमस्ति , ' तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' इति श्रुतेः । भासते चेत् ? सर्वमुक्तिः , विद्याविर्भाव

? विद्याप्रकाशस्तस्यासत्यविद्याविलयात् । अथेयं न विलीयते विलयहेतुरित्यनिर्मोक्षः । निर्भागस्यैकदेशेन प्रतिभानमनाशङ्कनीयम् ।

पृ. २३६

भाष्य ९३

गुरुत्वधर्माधर्मभावना तीन्द्रियाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 311

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — गुरुत्व , धर्म , अधर्म और भावना ये चार गुण किसी भी इन्द्रिय से गृहीत नहीं होते ( अर्थात् अतीन्द्रि य हैं ) ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

गुरुत्वधर्माधर्मभावना अतीन्द्रियाः , न केनचिदिन्द्रियेण गृह्यन्त इत्यर्थः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — गुरुत्व , धर्म , अधर्म और भावना ये चार गुण ' अतीन्द्रिय ' हैं , अर्थात् किसी भी इन्द्रिय से इनका ग्रहण नहीं होता ।

पृ. २३६

भाष्य ९४

अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणैकत्वक पृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्व स्नेहवेगाः कारणगुणपूर्वकाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 311

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अपाकज रूप , अपाकज रस , अपाकज गन्ध , अपाकज स्पर्श , परिमाण , एकत्व , एकपृथक्त्व , गुरुत्व , द्रवत्व , स्नेह और वेग ये ग्यारह गुण कारणगुणपूर्वक ' हैं , अर्थात् अपने आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले अपनेअपने समानजातीय गुण से उत्पन्न होते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अपाकजरूपादयो वेगान्ताः कारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तस्य ये गुणास्तत्पूर्वका रूपादयः , तन्तुरूपादिपूर्वकाः पटरूपादयः , वियभेन तद्धर्मानुविधानात् । अतत्पूर्वकत्वे हि पटे यत्किञ्चद् गुणान्तरं स्यान्नियहेतोरभावात् ।

एकमेव सर्वत्र शुक्लं रूपं प्रत्यभिज्ञानादिति प्रत्युक्तम् । तरतमादिभावानुपपत्तिप्रसङ्गाच्च । तस्मात्सामान्यविषया प्रत्यभिज्ञा ।

पार्थिवपरमाणुरूपादयः पाकाद्वह्निसंयोगाज्जायन्ते न तु परमाणुसमवायिकारणाश्रितरूपादिपूर्वकाः , अतस्तन्निवृत्त्यर्थमपाकज ग्रहणम् । सिद्धायामुत्पत्तौ कारणगुणपूर्वकत्वमकारणगुणपूर्वकत्वं चेति निरूपणीयम् । जलादिपरमाणुरूपादीनां चोत्पत्तिरेव नास्तीति न व्यभिचारः । एषां कारणगुणपूर्वकत्वाभिधानं स्वरूपकथनं न त्ववधारणार्थम् नैमित्तिकद्रवत्ववेगयोरकारणगुणपूर्वकत्वस्यापि सम्भवात् । कारणगुणपूर्वकत्वमनयोर्वेगवदारब्धजलावयविसमवेतयोर्द्रष्टव्यम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अपाकज रूप से लेकर वेग पर्यन्त कथित ग्यारह गुण ' कारणगुणपूर्वक ' हैं | अर्थात् उक्त रूपादि गुण अपने आश्रय ( द्रव्य ) के समवायिकारण ( अवयव ) में रहनेवाले गुणों से उत्पन्न होते हैं । पट प्रभृति द्रव्यों में रहनेवाले रूपादि की उत्पत्ति तन्तु आदि में रहनेवाले रूपादि गुणों से ही होती है । क्योंकि जिस तरह के रूपादि तन्तुओं में देखे जाते हैं , उसी प्रकार के रूपादि पट में भी देखे जाते हैं । अगर ऐसी बात न हो तो फिर पट में ऐसे भी गुणों की उत्पत्ति हो जो जन्तुओं में न देखे जाते हों क्योंकि ( ' अवयव के गुणों से ही अवयवी के गुण उत्पन्न होते हैं इस ) नियम में कोई अन्य ) प्रमाण नहीं हैं । अगर यह नियम न हो तो फिर पट में तन्तुओं में न रहनेवाले किसी गुण की उत्पत्ति होने में भी कोई बाधा नहीं है , क्योंकि ' पट में इतने ही गुण उत्पन्न हों ' इस विषय में ( उक्त नियम को छोड़ कोई अन्य ) कारण नहीं हैं ।

कथित युक्ति से ही किसी आचार्य का निम्नलिखित यह मत भी खण्डित हो जाता है कि ( प्र ० ) शुक्ल रूप से युक्त जितने भी द्रव्य दीख पड़ते हैं , उन सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप है , क्योंकि ( जिस शुक्ल रूप को मैंने घट में देखा था , उसी को पट में भी देख रहा हूँ यह ) प्रत्यभिज्ञा होती है । ( उ ० ) ( ' अवयव गत गुण ही अवयवी में गुण को उत्पन्न करते हैं ' इस नियम की अनुपपत्ति रूप दोष के अतिरिक्त इस पक्ष में ) यह दोष भी है कि अगर शुक्ल रूप से युक्त सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप हो तो फिर उनमें इस न्यूनाधिकभाव की प्रतीति नहीं होगो कि ' यह इससे अधिक शुक्ल है ' या ' यह इससे कम शुक्ल है ' , अत : कथित प्रत्यभिज्ञा केवल सादृश्य के कारण होती है ( दोनों द्रव्यों में प्रतीत होने वाले शुक्ल रूपों के एकत्व से नहीं ) ।

पार्थिव परमाणु के रूपरसादि पाक से ही उत्पन्न होते हैं , अपने आश्रय के समवायिकारणों में रहनेवाले रूप रसादि से नहीं , क्योंकि उन रूपादि के आश्रयीभूत , परमाणुओं का कोई समवायिकारण ही नहीं है । पार्थिव परमाणुओं के पाकजरूपादि में ' कारणगुणपूर्वकत्व ' रूप साधर्म्य अव्याप्त न हो जाय , अत : ( प्रकृत साधर्म्य के लक्ष्यबोधक वाक्य में ) ' अपाकज ' पद दिया है । उत्पत्ति की सिद्धि हो जाने पर फिर उस उत्पन्न वस्तु में ही जिज्ञासा होती है कि उसकी उत्पत्ति कारण के गुणों से होती है या और किसी से ? जलादि के परमाणुओं के रूपादि को तो उत्पत्ति ही नहीं होती ( क्योंकि वे नित्य हैं ) , अतः उनमें कारणगुणपूर्वकत्व साधर्म्य के न होने से भी व्यभिचार दोष नहीं हैं । इन गुणों को ' कारणगुणपूर्वक ' कहने का अभिप्राय केवल इनके स्वरूपों का कथन मात्र है । इस नियम का यह अभिप्राय नहीं है कि ये सभी गुण कारणगुणपूर्वक ही होते हैं ' , क्योंकि नैमित्तिकद्रवत्व और वेग अकारणगुणपूर्वक भी होते हैं । वेग एवं द्रवत्व से युक्त अययवों के द्वारा उत्पन्न जल रूप अवयवी के वेग और द्रवत्व में कथित कारणगुणपूर्वकत्व समझना चाहिए ।

पृ. २३८

भाष्य ९५

बुद्धि सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दा अकारणगुणपूर्वकाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 313

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , धर्म , अधर्म , भावना और शब्द ये नौ गुण ' अकारणगुणपूर्वक ' हैं ( अर्थात् ये अपने आश्रयों के अवयवों ' रहनेवाले अपने समानजातीय गुण से नहीं उत्पन्न होते ) ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

बुद्ध्यादयः शब्दान्ता अकारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तद्गुणपूर्वका न भवन्ति , नित्यगुणत्वात् ।

बुद्ध्यादयः संयोगजाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावना आत्ममनः संयोगजाः । शब्दो भेर्याकाशसंयोगजः । तूलपरिमाणं प्रचयाख्यसंयोगजम् । उत्तरसंयोगः संयोगजः संयोगोऽभिमतः । नैमित्तिकद्रवत्वं वह्निसंयोगजम् । परत्वापरत्वे दिक्कालपिण्डसंयोगजे । पार्थिवपरमाणुरूपरसगन्धस्पर्शा वह्निसंयोगजा इति विवेकः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — बुद्धि से लेकर शब्द पर्यन्त कथित ये नौ गुण ' अकारणगुणपूर्वक ' हैं , अर्थात् अपने आश्रयरूप द्रव्य के समवायिकारण में रहनेवाले गुण से नहीं उत्पन्न होते , क्योंकि इनके आश्रय नित्य हैं । इन गुणों के समवायिकारणों का कोई कारण ही नहीं है ।

पृ. २३८

भाष्य ९६

बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दतूलपरिमाणोत्तरसंयोगनैमित्तिकद्रवत्वपरत्वापरत्वपाकजाः संयोगजाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 313

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , धर्म , अधर्म , भावना , शब्द , रुई प्रभृति के परिमाण , उत्तरदेश के साथ संयोग , नैमित्तिक द्रवत्व ये तेरह गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं ।

पृ. २३९

भाष्य ९७

संयोग विभाग वेगाः कर्मजाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 314

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संयोग , विभाग और वेग ये तीन गुण क्रिया से उत्पन्न होते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संयोगविभाग वेगाः कर्मजाः । संयोगविभागौ कर्मजा ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' बुद्धि प्रभूति कथित गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं ' इनमें बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , धर्म , अधर्म और भावना , ये नौ गुण आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होते हैं । शब्द की उत्पत्ति भेरी ( नगाड़ा ) और आकाश के संयोग से होती है । ' प्रचय ' नाम के संयोग से रूई के परिमाण की उत्पत्ति होती है । संयोगजसंयोग ही यहाँ उत्तरसंयोग ' शब्द से इष्ट है । वह्नि के संयोग से नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । द्रव्यों के साथ दिशा एवं काल के संयोग से परत्व एवं अपरत्व की उत्पत्ति होती है । पार्थिव परमाणुओं के रूप , रस , गन्ध और स्पर्श ये सभी ( विशेष प्रकार के ) वह्निसंयोग रूप पाक से उत्पन्न होते हैं ( अतः संयोगज होते हुए भी अपाकज नहीं हैं ) ।

संयोग , विभाग और वेग ये तीनों क्रिया से उत्पन्न होते हैं । पहिला संयोग और पहिला विभाग ये दोनों ही क्रिया से उत्पन्न होते हैं ( द्वितीय संयोग की उत्पत्ति संयोग से एवं द्वितीय विभाग की उत्पत्ति विभाग से ही होती है ) ।

शब्द और उत्तरविभाग दोनों ही विभाग से उत्पन्न होते हैं । यह ध्यान रखना चाहिए कि ( इनमें ) प्रथम शब्द विभाग से भी उत्पन्न होता है , किन्तु उत्तर विभाग केवल विभाग से ही उत्पन्न होता है ।

परत्व , अपरत्व , द्वित्व द्विपृथकत्वादि बुद्धिसापेक्ष ' हैं , अर्थात् इन सबों की उत्पत्ति में बुद्धिनिमित्तकारण है । ' आदि ' पद से त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्व प्रभृति को समझना चाहिए |

पृ. २३९

भाष्य ९८

शब्दोत्तर विभागौ विभागजौ ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 314

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शब्द और उत्तर ( विभागज ) विभाग ये दोनों विभाग से उत्पन्न होते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ । आद्यः शब्दो विभागादपि जायते , उत्तरो विभागो विभागादेव जायत इति विवेकः ।

पृ. २३९

भाष्य ९९

परत्वापरत्वद्वित्व पृथक्त्वादयो बुद्धधपेक्षाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २३९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 314

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परत्व , अपरत्व , द्वित्व , द्विपृथक्त्व प्रभृति बुद्धिसापेक्ष हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वादयो बुद्धयपेक्षाः । एषामुत्पत्तौ निमित्तकारणं बुद्धिः | आदिशब्दात् त्रित्वत्रिपृथक्त्वादिपरिग्रहः ।

पृ. २४०

भाष्य १००

रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शशब्दपरिमाणैकत्वैकपृथक्त्व स्नेहाः समानजा त्यारम्भकाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 315

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रूप , रस , गन्ध , उष्ण से भिन्न सभी स्पर्श , शब्द , परिमाण , एकत्व , एकपृथक्त्व और स्नेह ये नौ गुण अपने अपने समानजातीय गुणों के ही उत्पादक हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

रूपादय : स्नेहान्ताः समानजात्यारम्भकाः कार्यरूपं

कारणरूपात् रसाद्रसो गन्धाद् गन्धः , स्पर्शात् स्पर्शः स्नेहात् स्नेहो महत्त्वान्महत्त्वमित्यादि योज्यम् । शब्दस्तु स्वाश्रये एव शब्दान्तरारम्भकः । अत्र कारणत्दमात्रं विवक्षितम् , न त्वसमवायिकारणत्वम् , अन्यथा विजातीयानां पाकजानां निमित्तकारणस्योष्णस्पर्शव्यवच्छेदोऽसङ्गतार्थः स्यात् । नन्वेवं तहि कथं रूपादीनां ज्ञानकारणत्वम् ? न तद्व्यतिरेकेण समानजातीयारम्भकत्वस्याभिप्रेतत्वात् ।

सुखादयोऽसमानजात्यारम्भकाः 1 सुखमिच्छायाः कारणं दुखं द्वेषस्य इच्छाद्वेषौ प्रयत्नस्य सोऽपि कर्मणः । पुत्रसुखं पितरि सुखं जनयति , अन्यथा तस्य प्रमोदानुपपत्तिरिति चेत् ? तदसारम् पुत्रस्य हि मुखप्रसादादिना सुखोत्पत्तिमनुमाय पश्चात् पितरि सुखं जायते । तत्रास्य पुत्रस्य सुखं न कारणम् , तस्यैतावन्तं कालमनवस्थानात् । किन्तु लैङ्गिकी तद्विषया प्रतीतिः कारणमिति प्रक्रिया |

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — रूप से लेकर स्नेह पर्यन्त नो गुण समानजातीय गुणों के उत्पादक है । कारणों में रहनेवाले रूप से कार्य में रूप की उत्पत्ति होती है । कारण में रहनेवाले रस से कार्य में रस की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले गन्ध से कार्य में गन्ध की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले स्पर्श से कार्य में स्पर्श की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले स्नेह से कार्य में स्नेह की उत्पत्ति होती है ।

कारणों में रहनेवाले महत्परिमाण से कार्य में महत्परिमाण की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार के वाक्यों की कल्पना करनी चाहियें । शब्द अपने आश्रय में ही दूसरे शब्द को उत्पन्न करता है | यहाँ ' आरम्भकत्व ' शब्द से सामान्यतः कारणत्व हो विवक्षित है , ( प्रकरण प्राप्त ) असमवायिकारणत्व नहीं , क्योंकि ऐसा न मानने पर उष्ण स्पर्श को प्रकृत लक्ष्यबोधक वाक्य में छोड़ देना असङ्गत होगा , चूंकि उष्ण स्पर्शं भी अपने विजातीय पाकजरूपादि गुणों का निमित्तकारण तो है ही ।

( उष्ण स्पर्श भी अपने सजातीय उष्ण स्पर्श का असमवायिकरण है ) | ( प्र ० ) फिर रूपादि अपने ज्ञान के प्रति कैसे कारण होते हैं ? ( उ ० ) प्रकृत में समानजातीय गुणों में ज्ञान से भिन्न गुणों की ही गणना करनी चाहिए । अतः ज्ञान से भिन्न अपने सजातीय गुणों की उत्पादकता ही प्रकृत में विवक्षित है ।

पृ. २४०

भाष्य १०१

सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चासमानजात्यारम्भकाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 315

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष और प्रयत्न ये पाँच गुण अपने से भिन्नजातीय वस्तुओं के उत्पादक हैं ।

पृ. २४१

भाष्य १०२

संयोगविभागसङ्ख्यागुरुत्वद्रवत्वोष्णस्पर्शज्ञानधर्माधर्म संस्काराः समानासमान जात्यारम्भकाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 316

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संयोग , विभाग , संख्या , गुरुत्व , द्रवत्व , उष्णस्पर्श , ज्ञान , धर्म , अधर्म और संस्कार ये दश गुण अपने समानजातीय एवं असमानजातीय दोनों तरह की वस्तुओं के उत्पादक हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संयोगादयः संस्कारान्ताः समानासमानजात्यारम्भकाः । संयोगात् समानजातीय उत्तरसंयोगो विजातीयं द्वितूलके महत्परिमाणम् , विभागाद्विभागः शब्दश्च , कारणगतैकत्वसङ्ख्यातः कार्यवत्तन्येकत्वसङ्ख्या , द्वित्वबहुत्वसङ्ख्याभ्यां चाणुत्वमहत्त्वे , गुरुत्वाद् गुरुत्वान्तरं पतनं च द्रवत्वाद् द्रवत्वान्तरं स्यन्दनक्रिया च , उष्णस्पर्शादुष्णस्पर्शः पार्थिवपरमाणुरूपादयश्च ज्ञानाज्ज्ञानं संस्कारश्च , धर्माद्धर्मः सुखं च , अधर्मादधर्मो दुःखं च , संस्कारात् संस्कारः स्मरणं च ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — सुखादि अपने असमानजातीय वस्तुओं के उत्पादक हैं । ( जैसे कि ) सुख इच्छा का , दुःख द्वेष का , इच्छा और द्वेष ये दोनों ही प्रयत्न के , एवं प्रयत्न भी क्रिया का उत्पादक है । ( प्र ० ) पुत्र का सुख तो पिता में ( अपने सजातीय ) सुख को उत्पन्न करता है । अगर ऐसा न हो तो फिर सुखी पुत्र को देख कर पिता का प्रफुल्लित होना युक्त नहीं होगा । ( उ ० ) इस आक्षेप में कुछ विशेष सार नहीं है | यहाँ ( पुत्र के सुखसे पिता में सुख की उत्पत्ति ) की यह रीति है कि पुत्र के प्रफुल्लमुख से पिता को उसमें सुख का अनुमान होता है । इस अनुमान से पिता में दूसरे सुख की उत्पत्ति होती है । पिता के इस सुख में पुत्र का सुख ( स्वयं ) कारण नहीं है , क्योंकि वह पिता में सुख की उत्पत्ति के अव्यवहितपूर्व क्षण तक ( क्षणिक होने के कारण ) ठहर नहीं सकता । अतः मुखप्रफुल्लादि हेतुओं से उत्पन्न पुत्रगत सुखविषयक अनुमिति रूप प्रतीति ही पिता के प्रकृत सुख का कारण है ।

संयोग से लेकर संस्कार पर्यन्त कथित ये नौ गुण अपने समानजातीय एवं असमानजातीय दोनों प्रकार की वस्तुओं के उत्पादक हैं । संयोग से उसके सजातीय उत्तर देशसंयोग ( संयोगजसंयोग ) की उत्पत्ति होती है , एवं संयोग से ही उसके विजातीय तूल ( रुई ) के दो अवयवों से उत्पन्न होने वाले एक बड़े तूल के अवयवी के महत्परिमाण की भी उत्पत्ति होती है । विभाग से उसके सजातीय विभागजविभाग को उत्पत्ति होती है , एवं विभाग से ही उसके विजातीय शब्द की भी उत्पत्ति होती है । कारण में रहनेवाली एकत्व संख्या से कार्य में उसकी सजातीय एकत्व संख्या की उत्पत्ति होती है , एवं द्वित्वबहुत्वादि संख्याओं से उनके विजातीय अणुत्व एवं महत् परिमाणों की भी

पृ. २४२

भाष्य १०३

बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषभावनाशब्दाः स्वाश्रयसमवेतारम्भ काः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 317

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , भावना और शब्द ये सात गुण अपने आश्रय में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली वस्तुओं के उत्पादक हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषभावनाशब्दाः स्वाश्रयसमवेतारम्भकाः । सुखादय' स्तावद्यत्र स्वयं वर्तन्ते तत्रैव कार्यं जनयन्ति । बुद्धिस्तु द्वित्वादिकं परत्रारभमाणाप्यात्म विशेषगुणं जनयन्ति स्वाश्रयसमवेतमेव जनयति नान्यत्र ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ३१ उत्पत्ति होती है । ( कारणों में रहनेवाले ) एक गुरुत्व से ( कार्य में रहनेवाली सजातीय ) दूसरी गुरुत्व एवं विजातीय पतन इन दोनों की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले द्रवत्व से कार्य में रहनेवाला उसका सजातीय दूसरा द्रवत्व एवं विजातीय स्यन्दन ( प्रसरण ) क्रिया इन दोनों की उत्पत्ति होती है । ( कारणों में रहनेवाले ) उष्ण स्पर्श से ( कार्य में रहने वाले ) उष्ण स्पर्शरूप सजातीय कार्य की उत्पत्ति होती है , एवं पार्थिव परमाणुओं के रूपादि स्वरूप विजातीय कार्यों की भी उत्पत्ति होती है । ज्ञान से भी अपने सजातीय ज्ञान और विजातीय संस्कार दोनों की उत्पत्ति होती है । धर्म से भी सजातीय धर्म एवं विजातीय सुख दोनों ही प्रकार के कार्य होते हैं । अधर्म भी अपने सजातीय अधर्म एवं विजातीय दुःख दोनों का उत्पादक है । संस्कार भी अपने सजातीय संस्कार एवं विजातीय स्मृति दोनों का उत्पादक है ।

बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , भावना और शब्द ये सात गुण अपने - अपने आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले पदार्थों के उत्पादक हैं | ( इनमें ) सुखादि जहाँ स्वयं रहते हैं , वहीं अपने कार्यों को भी उत्पन्न करते हैं । किन्तु बुद्धि अपने आश्रय से भिन्न पदार्थों में भी द्वित्वादि संख्या को उत्पन्न करती है , आत्मा के विशेष गुणों को बुद्धि तो अपने आश्रय में ही समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न करती है , और किसी आश्रय में नहीं ।

पृ. २४२

भाष्य १०४

रूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणस्नेहप्रयत्नाः परत्रारम्भकाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 317

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रूप , रस , गन्ध , स्पर्श , परिमाण , स्नेह और प्रयत्न ये सात गुण अपने आश्रय से भिन्न आश्रयों में ही कार्य को उत्पन्न करते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

परत्रारम्भकाः 1 अवयवेषु

रूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणस्नेहप्रयत्नाः वर्त्तमाना रूपादयो यथासम्भवमवयविनि रूपादिकमारभन्ते , आत्मनि समवेतः प्रयत्नो हस्तादिषु क्रिया हेतुः ।

पृ. २४३

भाष्य १०५

संयोगविभागसङ्ख्यैकपृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्ववेगधर्माधर्मास्तूभयत्रारम्भकाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४३प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 318

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संयोग , विभाग , संख्या , एकपृथक्त्व , गुरुत्व , द्रवत्व , वेग , धर्म और अधर्म ये नौ गुण अपने आश्रय एवं अनाश्रय दोनों प्रकार की वस्तुओं में कार्य को उत्पन्न करते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संयोगादय उभयत्रारम्भकाः । स्वाश्रये तदन्यत्र चारम्भकाः | तन्तुषु वर्त्तमानः संयोगस्तेष्वेव पटमारभते , विषयेन्द्रियसंयोगश्चात्मनि ज्ञानम् । वंशदलयोविभागोऽन्यत्राकाशे शब्दमारभते , वंशदलाकाशविभागश्च स्वाश्रय आकाशे । अवयववत्तिन्येकत्वसङ्ख्या अवयविन्येकत्वसङ्ख्यामारभते , स्वाश्रये च द्वित्वादिसङ्खयाम् । अथावयवेष्वेकपृथक्त्वमवयविन्येक पृथक्त्वं स्वाश्रयेषु त्रिपृथक्त्वादिकमिति । कारणगताश्च गुरुत्वद्रवत्ववेगाः कार्ये तानारभन्ते , स्वाश्रयेषु क्रियाम् । धर्माधर्मवात्मनि सुखदुःखे परत्र चाग्न्यादौ ज्वलनादिक्रियाम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — रूप , रस , गन्ध , स्पर्श , परिमाण , स्नेह और प्रयत्न सात गुण अपने आश्रय से भिन्न आश्रय में ही कार्य को उत्पन्न करते हैं । अवयवों में रहनेवाले रूपादि यथासम्भव अवयवो में ही रूपादि को उत्पन्न करते हैं । प्रयत्न स्वयं समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है किन्तु हाथ पैर प्रभृति अङ्गों में क्रिया को उत्पन्न करता है ।

संयोगादि ये नो गुण दोनों ही प्रकार के आश्रयों में कार्य को उत्पन्न करते हैं , अर्थात् ये अपने आश्रय और उससे भिन्न आश्रय , दोनों प्रकार के आश्रयों में कार्य के उत्पादक हैं , ( जैसे कि ) तन्तुओं में रहनेवाला संयोग अपने आश्रयीभूत उन तन्तुओं में ही पटरूप कार्य को उत्पन्न करता है , किन्तु विषय एवं इन्द्रिय का संयोग ( अपने आश्रयीभूत इन दोनों से भिन्न ) आत्मा में ज्ञान को उत्पन्न करता है ।

बाँस के दो दलों का विभाग ( अपने आश्रयीभूत उन दो वंशदलों से भिन्न ) आकाश में शब्दरूप कार्य को उत्पन्न करता है , किन्तु बाँस के ही दल और आकाश का विभाग अपने आश्रयीभूत आकाश में ही शब्दरूप कार्य को उत्पन्न करते हैं । अवयव में रहनेवाली एकत्व संख्या ( अपने आश्रय से भिन्न ) अवयवी में एकत्व संख्या को उत्पन्न करती है , एवं अपने आभयरूप अवयव मं द्वित्वादि संख्या को भी उत्पन्न करती है ।

अवयवों में रहनेवाला एकपृथक्त्व अवयवी में एक पृथक्त्व को एवं अपने आश्रय में त्रिपृथक्त्वादि को भी उत्पन्न करता है । इसी प्रकार कारणों में रहनेवाले गुरुत्व , द्रवत्व , वेग और स्नेह आश्रयीभूत उन कारणों के कार्यों गुरुत्व , द्रवत्व , वेग एवं स्नेहरूप कार्यों को उत्पन्न करते हैं , किन्तु अपने आश्रय में क्रिया को उत्पन्न करते हैं । धर्म और अधर्म अपने आश्रय में ( क्रमशः ) सुख और दुःख को एवं अपने आश्रय से भिन्न अग्नि प्रभृति में ऊर्ध्वज्वलनादि क्रिया को भी उत्पन्न करते हैं ।

पृ. २४४

भाष्य १०६

गुरुत्ववस्ववेगप्रयत्नधर्माधर्मसंयोग विशेषाः क्रियाहेतवः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४४प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 319

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — गुरुत्व , द्रवत्व , वेग , प्रयत्न , धर्म , अधर्म और विशेष प्रकार के संयोग से सात गुण क्रिया के कारण हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

गुरुत्वादयः क्रियाहेतवः । गुरुत्वात्पतनं द्रवत्वात् स्यन्दनं वेगादिषोरुत्तरकर्माणि प्रयत्नाच्छरीरादिक्रिया धर्माधर्माभ्यामग्न्यादिक्रिया । विशिष्यते इति विशेषः , संयोग एव विशेषः संयोगविशेषः , विशिष्टः संयोगो नोदनाभिघातलक्षणः , सोऽपि क्रियाहेतुरिति वक्ष्यते ।

रूपादयः शब्दान्ता असमवायिकारणम् । समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधूत सामर्थ्यमसमवायिकारणम् । प्रत्यासत्तिश्च समवायिकारणसमवायः समवायिकारणैकार्थसमवायश्च । सुखादीनां समवायिकारणमात्मा , तत्र समवायादात्ममनः संयोगस्तेषायसमवायिकारणम् । नन्वेवं तहि धर्माधर्मयोरप्यसमवायिकारत्वं स्यात् , न , तयोः समस्तात्मविशेषगुणोत्पतौ सामर्थ्यानवधारणात् । तथा हिधर्मादधर्मदुःखयोरनुत्पत्तिः , अधर्माच्च धर्मसुखयोरनुत्पादः । एवं ज्ञानादीनामपि प्रत्येकं व्यभिचारो दर्शनीयः । सर्वत्रावधृतसामर्थ्यस्तु ज्ञातृमनः संयोग इत्येतावता विशेषेण तस्यैवासमवायिकारणत्वम् । तथा पटरूपस्य समवायिकारणेन पटेन

कस्मिन्नर्थे तन्तौ समवायात् तन्तुरूपं पटरूपस्यासमवायिकारणं , न रसादयः , तस्यैव तदुत्पत्तावन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्यावधारणात् । एवं रसादिष्वपि योज्यते । उष्णस्पर्शस्य पाकजारम्भे निमित्तकारणत्वमप्यस्ति , तदर्थमनुष्णस्य ग्रहणम् । रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शपरिमाणस्नेहानां समवायिकरणकार्थसमवायादसमवायिकारणत्वम् , कारणवर्तिनामेषां कार्यसजातीयारम्भकत्वात् । शब्दस्य समवायिकारणसमवायादसमवायिकारणता , आकाशाश्रितेनाकाशे एव शब्दान्तरारम्भात् । सङ्ख्यापृथक्त्वयोरुभयथा कारणत्वम् , कारणवर्तिनोस्तयोः कार्ये यथासङ्ख्यमेकत्वैकपृथक्त्वारम्भकत्वात् , स्वाश्रये द्वित्वद्विपृथक्त्वजनकत्वात् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ये गुरुत्वादि सात गुण क्रिया के उत्पादक हैं । इनमें गुरुत्व से पतनरूप क्रिया , द्रवत्व से प्रसरणरूप क्रिया , वेग से तीर प्रभृति की उत्तर क्रियायें , प्रयत्न से शरीर की क्रिया , धर्म और अधर्म से अग्नि प्रभृति में ऊर्ध्वज्वलनादि क्रियायें होती हैं । ' संयोग एव विशेष : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार नोदन एवं अभिघातरूप विशेष प्रकार के संयोग हा प्रकृत ' संयोगविशेष ' शब्द से इष्ट हैं । आगे कहेंगे कि ये दोनों ही प्रकार के संयोग क्रिया के कारण हैं ।

रूप से लेकर शब्द पर्यन्त कथित ये सात गुण असमवायिकारण हैं । समवायिकारण में ' प्रत्यासन्न ' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध जिस वस्तु में कार्य करने की सामर्थ्यं निश्चित है , वही असमवायिकारण है । कार्यों के साथ अन्वय ( अर्थात् कारण के अव्यवहित क्षण में कार्य का अवश्य रहना ) एवं व्यतिरेक ( अर्थात् जिसके न रहने पर कार्य उत्पन्न ही न हों ) यही दोनों कारणों में कार्य के उत्पादन की सामर्थ्य हैं ।

' प्रत्यासन्न ' शब्द में प्रयुक्त ' प्रत्यासत्ति ' शब्द समवायिकारणानुयोगिकसमवाय सम्बन्ध का वाचक है । यह समवायरूप सम्बन्ध प्रकृत में दो प्रकार का है ( १ ) समवायिकारणानुयोगिक समवाय , एवं ( २ ) समवायिकारण जिस वस्तु में समवेत हो तदनुयोगिक समवाय । ( प्रथम प्रकार के सम्बन्ध के अनुसार ) आत्मा और मन का संयोग सुखादि का असमवायिकारण है , क्योंकि सुभ के समवायिकारण आत्मा में आत्मा और मन का संयोग समवाय सम्बन्ध से है । ( प्र ० ) इस प्रकार तो धर्म और अधर्म भी असमवायिकारण होंगे ।

( उ ० ) नहीं , क्योंकि उन दोनों में आत्मा के किसी भी विशेष गुण को उत्पन्न करने की सामर्थ्य ( अन्वय और व्यतिरेक से ) निश्चित नहीं है । इसी रीति से धर्म के द्वारा अधमं और दुःख की उत्पत्ति और अधर्म से सुख तथा धर्म की उत्पत्ति का निराकरण होता है । इसी प्रकार आत्मा के ज्ञानादि सभी विशेष गुणों में व्यभिचार दिखाना चाहिए ।

आत्मा के सभी गुणों में से केवल आत्मा और मन का संयोग ही ऐसा गुण है , जिसमें आत्मा के सभी विशेष गुणों के उत्पादन की सामथ्य ( अर्थात् अन्वय और व्यतिरेक ) निर्णीत है , इसी वैशिष्ट्य के कारण आत्मा के गुणों में से केवल आत्मा और मन का संयोग ही आत्मा के सभी विशेष गुणों का असमवायिकारण है ।

( असमवायिकारण के लक्षण में कथित एक दूसरे सम्बन्ध के अनुसार ) तन्तुओं का रूप पट के रूप का असमवायिकारण हैं , क्योंकि पटगत रूप का समवायिकारण पट है , वह तन्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहता है , एवं तन्तुओं का रूप भी तन्तुओं में ही समवाय सम्बन्ध से हैं । इस प्रकार तन्तुओं के रूपों में ही पटगत रूप के उत्पादन का सामथ्यं निश्चित है रसादि में नहीं , अतः तन्तुओं के रूप ही पटगत रूप के असमवायिकारण हैं पटगत रसादि नहीं ।

इसी प्रकार अवयवियों में रहनेवाले रसादि का असमवायिकारणत्व अवयवों में रहनेवाले रसादि में ही समझना चाहिए । उष्ण स्पर्श पाकज रूपादि का निमित्तकारण भी है , ( अतः लक्ष्यबोधक वाक्य में ) ' अनुष्ण ' पद लिखा है । समवायिकरणरूप एक वस्तु में कार्य के साथ समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण रूप , रस , गन्ध , अनुष्ण स्पर्श परिमाण और स्नेह ये छः गुण असमवायिकारण होते हैं ।

शब्द अपने कार्य के समवायिकारण ( आकाश ) में रहने से ही असमवायिकारण है , क्योंकि आकाश में रहने वाले शब्द से आकाश में ही शब्दों की उत्पत्ति होती है ।

पृ. २४४

भाष्य १०७

रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शंसङ्ख्यापरिमाणैक पृथक्त्व स्नेहशब्दानामसम वायिकारणत्वम् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४४प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 319

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रूप , रस , गन्ध , अनुष्णाशीतस्पर्श , संख्या , परिमाण , एकपृथक्त्व , स्नेह और शब्द ये नौ गुण असमवायिकारण हैं ।

पृ. २४६

भाष्य १०८

बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनानां निमित्तकारणत्वम् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 321

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न धर्म , अधर्म और भावना ये सभी निमित्तकारण ( ही ) होते हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

बुद्ध्यादीनां निमित्तकारणत्वम् । तेषां निमित्तकारणत्वमेवेत्यर्थः । यिकारणत्वं निमित्तकारणत्वं चेत्यर्थः 1 तथा हि- भेरीदण्डसंयोगः संयोगविभागोष्णस्पर्शगुरुत्वद्रवत्ववेगानामुभयथा कारणत्वम् । असमवाशब्दोत्पत्तौ निमित्तं भेर्याकाशसंयोगोऽसमवायिकारणम् । एवं विभागे दलविभागो निमित्तं वंशदलाकाशविभागोऽसमवायिकारणम् । उष्णस्पर्श उष्णस्पर्शस्यासमवायिकारणं पाकजानां निमित्तकारणम् । गुरुत्वं स्वाश्रये पतनस्यासमवायिकारणम् । नोदनाभिघातः क्रियोत्पत्तौ निमित्तकारणम् । द्रवत्ववेगयोरपि योज्यम् । परत्वापरत्वादीनामकारणत्वम् । नैतान्यसमवायिकारणं नापि निमित्तकारणम् । द्वित्वद्वि पृथक्त्वा दीनामित्यादिपदेन त्रिपृथक्त्वानां परमाणुपरिमाणपरममहत्परिमाणयोश्च परिग्रहः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — संख्या एवं पृथक्त्व ये दोनों ही प्रकार से असमवायिकारण होते हैं , क्योंकि ( कारणगत ) ये दोनों कार्यगत एकत्व एवं पृथक्त्व के कारण है , एवं अपने ही समवायिकारणरूप आश्रय में ही द्वित्व या द्विपृथक्त्व के कारण हैं ।

बुद्धि प्रभृति इन तो गुणों का निमित्तकारणत्व साधर्म्य है , अर्थात् ये निमित्तकारण ही होते हैं ( असमवायिकारण भी नहीं ) ।

संयोग , विभाग , उष्ण स्पर्श , गुरुत्व , द्रवत्व और वेग इन छः गुणों का ' उभयथा कारणत्व ' साधर्म्य है , अर्थात् ये सभी गुण असमवायिकारण और निमित्तकारण दोनों ही होते हैं । भरी और आकाश का संयोग शब्द का असमवायिकारण है , एवं भेरी और आकाश का संयोग शब्द का ही निमित्तकारण है , एवं विभाग में भी ( उभयथा कारणत्व ) है , क्योंकि बाँस के दोनों दलों का विभाग शब्द का निमित्तकारण है , एवं बाँस के दल और आकाश का विभाग शब्द का ही असमवायिकारण भी है । ( कारणगत ) उष्ण स्पर्श ( कार्यगत ) उष्ण स्पर्श का असमवायिकारण हैं , एवं पाकज रूपादि का निमित्तकारण भी है । गुरुत्व अपने आश्रय की पतन क्रिया का असमवायिकारण है , एवं नोदन और अभिघातजनित क्रिया का निमित्तकारण भी है । इसी तरह द्रवत्त्र और वेग में भी विचार करना चाहिए ।

पृ. २४६

भाष्य १०९

संयोगविभागोष्णस्पर्श गुरुत्वद्रवत्ववेगानामुभयथा कारणत्वम् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 321

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संयोग , विभाग , उष्ण स्पर्श , गुरुत्व , द्रवत्व और वेग ये छः गुण असमवायिकारण भी हैं और निमित्तकारण भी ।

पृ. २४७

भाष्य ११०

परत्वापरत्वद्वित्वद्वि पृथक्त्वादीनामकारणत्वम |

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 322

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परत्व , अपरत्व , द्वित्व , और द्विपृथक्त्वादि गुण किसी के भी कारण नहीं हैं ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — परत्व एवं अपरत्व प्रभृति चार गुणों का ' अकारणत्व ' साधम्यं है , अर्थात् ये न तो असमवायिकारण हैं और न निमित्तकारण ही ( समवायिकारण तो द्रव्य से भिन्न कोई होता ही नहीं है ) । ' द्वित्वद्विपृथक्त्वादि ' शब्द में प्रयुक्त ' आदि ' पद से त्रिपृथक्त्व , परमाणुओं के परिमाण , एवं परममहत्परिमाण प्रभृति को समझना चाहिए ( अर्थात् ये भी किसी के कारण नहीं होते ) ।

संयोग , विभाग , शब्द और आत्मा के सभी विशेष गुण इन सबों का ' प्रदेश - वृत्तित्व ' साधर्म्य है । ' प्रदेशवृत्ति ' शब्द का अर्थ है अव्याप्यवृत्ति अर्थात् ये अपने आश्रय ( के किसी अंश ) में रहें भी , एवं अपने आश्रय ( के ही दूसरे किसी अंश में ) न भी रहें । ( प्र ० ) यह तो ठीक नहीं है , क्योंकि एक ही समय में एक ही आश्रय में एक ही वस्तु रहे भी और न भी रहे , क्योंकि ' रहना ' और ' त रहना ' दोनों परस्पर विरोधी हैं ?

( उ ० ) इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है कि एक ही आश्रय में भाव और अभाव की उक्त प्रतीति प्रमाण से उत्पन्न होती है । एक ही महावृक्ष के अग्रभाग के साथ पुरुष के संयोग की प्रतीति होती है , उसी वृक्ष के मूल भाग में उसी पुरुष के संयोग के अभाव की भी प्रतीति होती है ।

अगर प्रदेशों ( अवयवों ) मे ही संयोग मानें प्रदेशी ( अवयवी ) में संयोग न मानें तो उन प्रदेशों में भी संयोग का मानना सम्भव न होगा , क्योंकि वे प्रदेश भी अपने अवयवों की अपेक्षा अवयवी हैं ही , फलतः अवयवों ( प्रदेशों ) से शून्य परमाणुओं में ही संयोग मानना पड़ेगा । जिससे संयोग का प्रत्यक्ष ही असम्भव हो जायगा , क्योंकि उसका आश्रय परमाणु अतीन्द्रिय है । अतः ( अवयवों में ही संयोग है अवयवियों में नहीं ) इस पक्ष में संयोग का प्रत्यक्ष ही न हो पायेगा ।

जैसे रूप रसादि के परस्पर भिन्न होने पर भी उनके आश्रय रूप अवयवी परस्पर भिन्न नहीं होते , उसी प्रकार संयोग और संयोगाभाव के आश्रय दो वस्तुओं के आधार होने के कारण ही परस्पर भिन्न नहीं हैं , क्योंकि इन दोनों के आश्रयों में एकता की प्रतीति प्रत्यक्ष प्रमाण से होती है ।

यद्यपि संयोग अपने प्रतियोगी एवं अनुयोगी दोनों में ही आश्रित है , क्योंकि उसके प्रत्यक्ष के लिए दोनों का प्रत्यक्ष आवश्यक है , तथापि जिस प्रकार रूपादि की उपलब्धि प्रत्यक्ष होनेवाले अवयवी के सभी अवयवों में होती है , संयोग की उपलब्धि उस प्रकार से सभी अवयवों में नहीं होती । अतः संयोग ' अव्यापक ' अर्थात् अव्याप्यवृत्ति है ।

इसी प्रकार शब्द भी ( अपने आश्रय ) आकाश के समूचे प्रदेश में नहीं रहता है , अतः एक ही समय आकाश में प्रदेश भेद से शब्द की सत्ता और असत्ता दोनों की ही सम्भावना है | ज्ञानादि गुणों की प्रतीति अन्तर्मुखी होती है , बहिर्मुखी नहीं होती , अतः वे भी अव्यापक अर्थात् प्रादेशिक हैं । ( प्र ० ) तो फिर धर्म और अधर्म से वह्नि प्रभृति में क्रिया कैसे होती है ? क्योंकि वे तो वहीं नहीं है ?

( उ ) क्रिया के प्रदेश में धर्मादि के न रहने पर भी धर्मादि आत्मा में रहते हैं , आत्मा का क्रिया प्रदेश से सान्निध्य है , इसी परम्परा सम्बन्ध के द्वारा धर्मादि क्रिया के कारण हैं । जिस प्रकार कपड़े के एक छोर में चाण्डाल का स्पर्श उसी कपड़े के दूसरे छोर से संयुक्त त्रैवर्णिकों के प्रत्यवाय का कारण होता है , वैसे ही यहां भी समझना चाहिए । शेष सभी गुणों का ' आश्रयव्यापित्व ' साधर्म्य है ।

पृ. २४७

भाष्य १११

संयोग विभागशब्दात्म विशेषगुणानां प्रदेशवृत्तित्वम् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 322

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संयोग , विभाग , शब्द एवं आत्मा के सभी विशेष गुण ये सभी प्रादेशिक ( अव्याप्यवृत्ति ) हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संयोगविभागशब्दात्मविशेषगुणानां प्रदेश वृत्तित्वमिति । प्रवेशवृत्तयोऽव्याप्यवृत्तयः स्वाश्रये वर्त्तन्ते , न वर्त्तन्ते चेत्यर्थः । नन्वेतदयुक्तम् , युगपदेकस्यैकत्र भावाभावविरोधात् । नानुपपन्नम् प्रमाणेन तथाभावप्रतीतेः । तथा हिमहतो वृक्षस्य पुरुषेण सहाग्रे संयोगो मूले च तदभावः प्रतीयते , मूले वृक्षोपलम्भेऽपि संयोगस्य सर्वैरनुपलम्भात् । न च मूलाग्रयोरेव संयोगतदभावौ , तत्प्रदेशावच्छेदेन वृक्षे एव पुरुषस्य भावाभावप्रतीतेः ।

यदि प्रदेशस्य संयोगो न प्रदेशिनस्तदा प्रदेशस्यापि स्वप्रदेशापेक्षया प्रदेशित्वान्निष्प्रदेशे परमाणुमात्रे संयोगः स्यात् । तद्वृत्तिस्तु संयोगो न प्रत्यक्ष इति संयोगप्रतीत्यभाव एव पर्यवस्यति । यथा च रूपादिभेदेऽप्येकोऽवयवी न भिद्यते तथा संयोगतदवाभ्यामपि उभयत्रापि तदेकत्वस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । यद्यप्युभयाश्रयः संयोगस्तयोरुपलब्धावुपलभत एव , तथापि तस्य रूपादिवद् गृह्यमाणाखिलावयवावच्छेदेनानुपलम्भादव्यापकत्वम् ।

एवं शब्दोऽप्याकाशं न व्याप्नोति तत्रैवास्य देशभेदेनोपलम्भानुपलम्भाभ्यां युगपद्भावाभावसम्भवात् । बुद्धयादयो ह्यन्तर्बहिश्चोपलम्भानुपलम्भाभ्यामव्यापकाः । कथं तहि धर्माधर्माभ्यामग्न्यादिषु क्रिया , तयोस्तद्देशेऽभावादिति चेन्न तत्रासतोरपि तयोः स्वाश्रयसन्निधिमात्रेण निमित्तत्वान् । यथा वस्त्रस्यैकान्ते चाण्डालस्पर्शोऽपरान्तसंयुक्तस्य त्रैवर्णिकस्य प्रत्यवायहेतुस्तथेदमपि द्रष्टव्यम् । शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् ।

पृ. २४९

भाष्य ११२

शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् ।

अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणै कपृथक्त्व सांसिद्धिकद्रवत्वगुरुत्वस्नेहानां यावद्रव्यभावित्वम् ।

शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वञ्चेति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २४९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 324

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अवशिष्ट सभी गुण अपने आश्रय के सभी अंशों में रहते हैं । अपाकज रूप , अपाकज रस , अपाकज गन्ध , अपाकज स्पर्श , परिमाण , एकत्व , एकपृथक्त्व , सांसिद्धिक द्रवत्व , गुरुत्व और स्नेह इन दश गुणों का ' यावद्द्रव्यभावित्व ' साधर्म्य है | ' शेष ' अर्थात् कथित अपाकज रूपादि से भिन्न सभी गुणों का ' अयावद्द्रव्यभावित्व ' साधर्म्य है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

उक्तेभ्यो येऽन्ये ते शेषाः । तेषामाश्रयव्यापित्वं संयोगादिवदव्यापकं न भवतीत्यर्थः । अपाकजरूपादीनां यावद्द्रव्यभावित्वम् । यावदाश्रयद्रव्यं तावद्रूपादयो विद्यन्ते । पाकजरूपादयः सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यपाकजग्रहणम् । शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वम् । अपाकजरूपादिव्यतिरिक्ता गुणा यावद्द्रव्यं न सन्ति , सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यर्थः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ऊपर जितने भी गुण कहे गये हैं , उनसे भिन्न सभी गुण यहाँ शेष ' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन सबों का ' आश्रयव्यापित्व ' ( साधर्म्य है ) , अर्थात् वे संयोगादि गुणों की तरह अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं । कथित अपाकज रूपादि गुणों का ' यावद्द्द्रव्यभावित्व ' ( साधर्म्य है ) , अर्थात् जब तक आश्रयरूप द्रव्य रहते हैं , तब तक ये अपाकज रूपादि रहते हैं । इसमें ' अपाकज ' पद का उपादान इस लिए किया गया है कि पाकज रूपादि आश्रय के रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं । ' शेष ' गुणो का ' अयावद्द्रव्यभावित्व ' साधर्म्य है । अर्थात् उक्त अपाकज रूपादि से भिन्न जितने भी गुण हैं , वे तब तक नहीं रहते , जब तक उसके आश्रय द्रव्य रहते हैं , किन्तु उनके रहते ही नष्ट हो जाते है । अव प्रत्येक गुण का असाधारण धर्म कहना है , अत : ' रूपादीनाम् ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । रूपमादिर्येषाम् ' इस व्युत्पत्ति से सिद्ध ' रूगदि ' शब्द से युक्त प्रकृत ३२ क्य का अर्थ है कि रूपादि गुणों में से प्रत्येक में रूपत्वादि स्वरूप अपर जातियों के सम्बन्ध से रूप , रस आदि संज्ञायें होती ।

पृ. २५०

भाष्य ११३

रूपादीनां सर्वेषां गुणानां प्रत्येकमपरसामान्यसम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा भवन्ति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २५०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 325

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रूपादि सभी गुणों के रूपादि नाम इसलिए हैं कि उनमें ( रूपत्वादि ) अपर जातियों का सम्बन्ध है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

सम्प्रति प्रत्येकं गुणानां परस्परवैधर्म्यप्रतिपादनार्थमाह-- रूपादीनामिति । रूपमादिर्येषां तेषामेकैकं प्रत्यपरजाते रूपत्वादिकायाः सम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा रूपमिति रस इति संज्ञा भवन्ति । रूपत्वाद्यपरसामान्यकृता रूपादिसंज्ञा रूपादीनां प्रत्येकं वैधम्र्म्यम् । रूपत्वसामान्यं नास्तीति केचित् , तदयुक्तम् , नीलपीतादिभेदेषु रूपं रूपमिति प्रत्ययानुवृत्तेः । चक्षुर्ग्राह्यतोपाधिकृता तदनुवृत्तिरिति चेन्न तेषां रूपमित्येवं चक्षुषाऽग्रहणात् । तद्गाह्यतानिमित्तत्वे हि ग्रहणादनन्तरं तथा प्रत्ययः स्यात् । चक्षुर्ग्राह्यता तद्ग्रहणयोग्यता , सा च नीलादिषु त्रिकालावस्थायिनीति चेत् ? अस्तु कामम् , किन्त्वेषा यदि प्रतिरूपं व्यावृत्ता , प्रत्ययानुगमो न स्यात् , एकनिमित्ताभावात् । अथानुवृत्ता , संज्ञाभेदमात्रम् । एवं रसादयोऽपि व्याख्याताः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — रूपादि नाम ही रूपादि गुणों के असाधारण धर्म हैं , जिनकी मूल हैं रूपत्वादि जातियाँ । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) रूपत्व नाम की कोई जाति नहीं है । ( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं क्योंकि नीलपीतादि विभिन्न रूपों में यह रूप है ' इस एक प्रकार की ( अनुवृत्त) प्रतीतियाँ होती हैं ( प्र ० ) सभी रूप आँख से देखे जाते हैं , इसीसे सभी रूपों में एक आकार की प्रतीति होती है ।

( उ ० ) नीलपीतादि में ' यह रूप है ' इस आकार की प्रतीति आँख से नहीं होती है , अगर चक्षु से गृहीत होने के कारण ही नीलादि में ' यह रूप है ' इस प्रकार की प्रतीति हो , तो फिर चक्षु के द्वारा ग्रहण के बाद ही ' यह रूप है ' इस प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । ( प्र ० ) ' चक्षुर्ग्राह्यत्व ' ( चक्षु से गृहीत होने का ) का अर्थ है चक्षु के द्वारा गृहीत होने की स्वरूपयोग्यता , यह तो नीलादि में तीनों कालों में है ही ।

( उ ० ) मान लिया कि है , किन्तु यह योग्यता नीलादि प्रत्येक रूप में अगर अलग अलग है तो फिर सभी रूपों में ये रूप हैं ' इस एक आकार की प्रतीति नहीं होगी , क्योंकि उसका कोई एक कारण नहीं है । अगर चक्षुर्ब्राह्यता सभी रूपों में एक है तो फिर जाति को मान लेने में कोई विवाद ही नहीं रह जाता है । इसी प्रकार से रसादि की भी व्याख्या हो जाती है ।

रूपनिरूपणम्

पृ. २५१

भाष्य ११४

तत्र रूपं चक्षुर्या पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २५१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 326

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उनमें चक्षु से ही जिसका ग्रहण हो वही यह

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

सर्वपदार्थानामभिव्यक्तिनिमित्तत्वादादौ रूपं निरूपयति- – तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यमिति । तेषां गुणानां मध्ये रूपं चक्षुषैव गृह्यते नेन्द्रियान्तरेण । ननु रूपत्वमपि चक्षुषैव गृह्यते कथमिदं वैधर्म्य रूपस्य ? न , गुणेभ्यो वैधर्म्यस्य विवक्षितत्वात् । तथा च प्रकृतेभ्यो निर्द्धारणार्थं तत्रेत्युक्तम् । सामान्यादस्य वैधर्म्यं तु सामान्यवत्त्वमेव । पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति । पृथिव्युदकज्वलनेष्वेव वर्त्तते । द्रव्याद्युपलम्भकम् । यस्मिन्नाश्रये वर्त्तते तस्य द्रव्यस्य तद्गतानां च गुणकर्मसामान्यानामुपलम्भकम् । नयनसहकारि । स्वगतं रूपं चक्षुषो विषयग्रहणे सहकारि । शुक्लाद्यनेकप्रकारम् । शुक्लादयोऽनेके प्रकारा यस्य तत् तथाविधम् । सलिलादिपरमाणुषु नित्यम् । सलिलपरमाणुषु तेजः परमाणुषु च नित्यम् । पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि | अग्निसंयोगो विनाशकः पार्थिवपरमाणुरूपस्येति च वक्ष्यामः । सर्वकार्य द्रव्येषु कारणगुणपूर्वकम् । कार्यद्रव्यगतं रूपं स्वाश्रयसमवायिकारणरूपपूर्वकम् । आश्रयविनाशादेव विनश्यति । कार्यरूपविनाशस्याश्रयविनाश एव हेतुः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — रूप सभी वस्तुओं के प्रत्यक्ष में किसी न किसी प्रकार से अवश्य ही कारण है , अतः ‘ तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यम् ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा गुणों में सबसे पहिले रूप का ही निरूपण करते हैं । इन सभी गुणों में रूप चक्षु के ही द्वारा गृहीत होता है और किसी भी इन्द्रिय के द्वारा नहीं । ( प्र ० ) रूपत्व भी तो केवल चक्षु से ही गृहीत होता है तो फिर ' चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व ' रूपों का असाधारण धर्म कैसे है ?

( उ ० ) ऐसी बात नहीं है , क्योंकि और गुणों की ही अपेक्षा चक्षुर्ग्राह्यत्व को रूप का असाधारण धर्म कहना यहाँ अभिप्रेत है , सभी पदार्थों की अपेक्षा नहीं । इसी ' निर्द्धारण ' को ही समझाने के लिए ' तत्र ’ शब्द का प्रयोग किया गया है । रूपों में जाति का रहना ही ( रूपत्वादि ) जातियों से रूप के भिन्न होने का प्रयोजक है ( क्योंकि सामान्य में सामान्य नहीं रह सकता ) । ' पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति ' अर्थात् रूप पृथिवी , जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहता है ।

' द्रव्याद्युपलम्भकम् ' अर्थात् रूप जिस आश्रय में रहता है उस द्रव्य का , एवं उस आश्रय द्रव्य में रहनेवाले अन्य गुणों , क्रियाओं और सामान्यों के भी प्रत्यक्ष का प्रयोजक है । ' नयनसहकारि ' चक्षुरूपद्रव्य में रहनेवाला रूप चक्षु से होनेवाले सभी प्रत्यक्षों का सहकारिकारण है । शुक्लाद्यनेकप्रकारम् ' ' शुक्लादयो s ने के प्रकाश यस्य ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा जिसके शुक्लादि अनेक प्रकार हों वही शुक्लाद्यनेकप्रकार ' है ( अर्थात् शुक्लादि भेद से रूप अनेक प्रकार के हैं ) ।

' सलिलादिपरमाणुषु नित्यम् ' जल के और तेज के परमाणुओं के रूप नित्य हैं । एवं ' पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि ' अर्थात् पार्थिव परमाणुओं में रहनेवाले रूपों का अग्नि के संयोग से नाश होता है , यह हम आगे कहेंगे । ' सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकम् ' अर्थात् कार्य द्रव्यों में रहनेवाले सभी रूप अपने आश्रय के समवायिकारणों में रहनेवाले रूपों से ही उत्पन्न होते हैं । आश्रय विनाशादेव विनश्यति अर्थात् उत्पन्न होनेवाले सभी रूपों का नाश अपने आश्रयों के नाश से ही होता है ।

( प्र ० ) हम यह नहीं मानते कि रूप का आश्रय के नाश से होता है , क्योंकि रूप के नाश एवं उसके आश्रयीभूत द्रव्य के नाश दोनों की प्रतीति साथ ही होती है | ( उ ० ) नहीं , क्योंकि आश्रयीभूत द्रव्य के नाश के साथ उसमें रहनेवाले रूप के नाश का कारण ही ( उस समय ) नहीं है । मुद्गरादि के आघात से कार्य द्रव्य के अवयवों में क्रिया , क्रिया से अवयवों का विभाग , इस क्रम के अनुसार द्रव्य के अवयवों के उत्पादक संयोग का विनाश हो जाने पर अवयवी द्रव्य का विनाश होता है ।

किन्तु तद्गत रूप का विनाश किससे मानेंगे ? आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों का संयोग रूप का कारण नहीं है । अकारणीभूत इस संयोग के नाश को ही अगर रूपनाश का कारण मानें तो फिर उक्त संयोग के नाश से कर्पालादि अवयवों में रहनेवाले रूप का भी नाश मानना पड़ेगा , क्योंकि अवयवों का संयोग जैसे कि अवयवी के रूप का कारण नहीं है , वैसे ही कपालादिगत रूप का भी कारण नहीं है ।

अगर अवयवी में रहनेवाले रूप के प्रति कारण न होते हुए भी अवयवों का संयोग अपने नाश से अवयवी में रहनेवाले रूप का नाश कर सकता है , तो फिर वही संयोग कपालादि अवयवों में रहनेवाले रूप का नाश क्यों नहीं कर सकता ? अतः हम यही युक्त समझते हैं कि पहिले द्रव्य का नाश होता है , उसके बाद तद्गत गुण का नाश होता | द्रव्य के एवं तद्गत गुण के नाश का यह क्रम मालूम इसलिए नहीं पड़ता है कि दोनों के मध्य में अत्यन्त थोड़े समय का व्यवधान रहता है ।

किसी सम्प्रदाय का मत है कि ( प्र ० ) द्रव्य एवं गुण दोनों अभिन्न हैं , अतः जो द्रव्य का कारण है वही गुण का भी कारण है । ( उ ० ) उनसे यह पूछना चाहिए कि परमाणुओं के रूप किसी दूसरे रूप को उत्पन्न करते हैं या नहीं ? अगर उत्पन्न करते हैं तो कहाँ ? अपने में ही ? या अपने आश्रय परमाणु में ?

अगर यह मान लें कि परमाणु के रूप किसी भी दूसरे रूप को उत्पन्न नहीं करते हैं या फिर यही मान लें कि परमाणु का रूप अपने आश्रय में एवं अपने में भी रूप को उत्पन्न करते हैं — हर हालत में द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति न हो सकेगी , जिससे समूचे जगत् कोही रूप शून्य मानना पड़ेगा । अगर परमाणुओं के रूप से द्वणुक में रूप की उत्पत्ति मानें तो फिर द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति के पहिले द्वणुक की उत्पत्ति माननी ही होगी ।

अतः यही कहना पड़ेगा कि द्वयणुक के उत्पन्न हो जाने पर पीछे उसमें रूपादि की उत्पत्ति होती है । क्योंकि बिना आश्रय के कार्य की उत्पत्ति नहीं होती । अगर यह स्थिति है तो फिर रूप ( गुण ) और द्रव्य का अभेद कैसा १ क्योंकि द्रव्य पहिले उत्पन्न होता है और रूप पीछे | और भी बात है , वह्नि के संयोग से घटगत रूप का नाश घट के रहते ही हो जाता है , अतः यही मानना पड़ेगा कि अग्नि के संयोग से ही उसी घट में दूसरे रूप की उत्पत्ति होती है ।

अतः यही रीति माननी होगी कि जिसकी उत्पत्ति से ही जिसकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं हो जाती एवं जिसके विनाश से हो जिसका विनाश सिद्ध नहीं हो जाता वे दोनों अभिन्न नहीं हो सकते ।

पृ. २५१

भाष्य ११५

द्रव्याघुपलम्भकं नयनसहकारि शुक्लाद्यनेकप्रकारं सलिलादिपरमाणुषु नित्यं पार्थिव परमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशादेव विनश्यतीति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २५१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 326

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' रूप ' है । पृथिवी , जल और तेज इन तीन द्रव्यों में रहता है । द्रव्यादि के प्रत्यक्ष के उत्पादन में आँख का सहारा है । यह शुक्लादि भेद से अनेक प्रकार का है । जलादि के परमाणुओं में यह नित्य है , एवं पृथिवी के परमाणु में अग्नि के संयोग से उसका विनाश होता है । जन्य द्रव्यों में उनके अवयवों में रहनेवाले रूप से यह उत्पन्न होता है , एवं आश्रय के विनाश से उसका विनाश होता है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

आश्रयविनाशाद्रूपस्य विनाश इति न मृष्यामहे सहैव रूपद्रव्ययोविनाशप्रतीतेरिति चेन्न कारणाभावात् । मुद्गराभिघातात् तावदवयवक्रियाविभागादिक्रमेण द्रव्यारम्भकसंयोगनिवत्तौ तदारब्धस्य द्रव्यस्य विनाशः कारणविनाशात् , तद्तरूपविनाशे तु किं कारणम् ? यदि ह्यकारणस्याt यवयवसंयोगस्य विनाशाद्रूपविनाशः , कपालरूपाण्यपि ततो विनश्येयुरविशेषात् । तस्मात् पूर्वं द्रव्यस्य विनाशस्तदनु रूपस्य , आशुभावात् क्रमस्याग्रहणमिति युक्तमुत्पश्यामः ।

ये तु रूपद्रव्ययोस्तादात्म्यमिच्छन्तो द्रव्यकारणमेव रूपस्य कारणमाहस्ते इदं प्रष्टव्याः - - किं परमाणुरूपं रूपान्तरमारभते न वा ? आरंभमाणमपि किं स्वात्मन्यारभते ? किं वा स्वाश्रये परमाणौ ? यदि नारभते ? यदि वा स्वात्मनि स्वाश्रये चारभते ? द्वयणुके रूपानुत्पत्तौ तत्पूर्वकं जगदरूपं स्यात् । अथ तद् द्व्यणुके आरभते , अविद्यमानस्य स्वाश्रयत्वायोगादुत्पन्ने द्वयणुके पश्चात्तत्र रूपोत्पत्तिरित्यवश्यमभ्युपेतव्यम् , निराश्रयस्य कार्यस्यानुत्पादात् । तथा सति तादात्म्यं कुतः ? पूर्वापरकालभावात् । किञ्चावस्थित एव घटे रूपादयो वह्निसंयोगाद्विनश्यन्ति तथा सति जायन्ते चेति भवतामभ्युपगमः , यस्य चोत्पत्तौ यस्यानुत्पत्तियन्निवृत्तौ चानिवृत्तिर्न तयोस्तादात्म्यमिति प्रक्रियेयम् । न चात्यन्तभेदे पृथगुपलम्भ प्रसङ्गः , सर्वदा रूपस्य द्रव्याश्रितत्वात् । एतदेव कथम् ? वस्तुस्वाभाव्यादिति कृतं गुरुप्रतिकूलवादेन ।

रसनिरूपणम्

पृ. २५४

भाष्य ११६

रसनग्राह्यः पृथिव्युदकवृत्तिर्जीवन पुष्टिबलारोग्य- रसो निमित्तं रसन सहकारी मधुगम्ललवणतिक्तकटुकषाय मेदभिन्नः ।

अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २५४प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 329

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रसनेन्द्रिय से गृहीत होनेवाला ( गुण ही ) ' रस ' है । वह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में ही रहता है , एवं जीवन , पुष्टि , बल और आरोग्य का कारण है । प्रत्यक्ष के उत्पादन में रसनेन्द्रिय का सहायक है । वह मधुर , अम्ल , लवण , कटु , कषाय और तिक्त भेद से छः प्रकार का है । नित्यत्व एवं अनित्यत्व के प्रसङ्ग में इसकी सभी बातें रूप की तरह है ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) अगर रूप और द्रव्य अत्यन्त भिन्न हैं तो द्रव्य को छोड़ कर भी रूप की प्रतीति होनी चाहिए । ( उ ० ) नहीं , क्योंकि रूप सभी कालों में द्रव्य में ही रहता है । ( प्र ० ) यहीं क्यों होता है ? ( उ ० ) यह तो वस्तुओं का स्वभाव है । गुरुचरणों के विरुद्ध व्यर्थ की बातों को बढ़ाना व्यर्थ है ।

अब एक ही बाह्य इन्द्रिय से गृहीत होनेवाले एवं प्रत्यक्ष योग्य द्रव्यों में ही रहने वाले गुणों का निरूपण करना है । इस प्रसङ्ग में रस और गन्ध इन दोनों की व्याख्या समान रूप से प्राप्त हो जाती है , किन्तु इन दोनों में गन्ध एक ही द्रव्य में रहता है और रस दो द्रव्यों में , इस विशेष के कारण रूप के निरूपण के बाद और गन्ध के निरूपण से पहिले ' रसो रसनग्राह्य ' , इत्यादि से रस का निरूपण करते हैं । गुणों में से केवल रस ही रसनेन्द्रिय से गृहीत होता है , अतः रसनेन्द्रिय से गृहीत होनेवाला गुण ही रस है । पृथिव्युदकवृत्तिः ' अर्थात् यह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में रहता है । ' जीवनबलारोग्यनिमित्तम् ' प्राण के धारण को ' जीवन ' कहते हैं । शरीर के अवयवों की वृद्धि ही ' पुष्टि ' है । विशेष प्रकार के उत्साह को ' बल ' कहते हैं ।

गन्धनिरूपणम्

पृ. २५५

भाष्य ११७

गन्धो घाणग्राह्यः पृथिवीवृत्तिर्घाण सहकारी सुरभिरसुरभिश्च ।

अस्यापि पूर्ववदुत्पश्यादयो व्याख्याताः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २५५प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 330

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जिस गुण का प्रत्यक्ष घ्राणेन्द्रिय से हो वही ' गन्ध ' है । वह केवल पृथिवी में ही रहता है । ( प्रत्यक्ष के उत्पादन में ) वह घ्राण का सहायक है । सुरभि एवं असुरभि भेद से यह दो प्रकार का है । इसकी उत्पत्ति और विनाश प्रभृति पहिले की तरह जानना चाहिए ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

सम्प्रति बाहाँकै केन्द्रियग्राह्यस्य प्रत्यक्षद्रव्यवृत्तविशेषगुणस्य निरूपणप्रसङ्गेन रसगन्धयोर्व्याख्यातव्ययोरुभयद्रव्यवृत्तित्वविशेषेणादौ रूपं व्याख्याय रसं व्याचष्टे - रसो रसनग्राह्य इति । गुणेषु मध्ये रस एव रसनग्राह्यो रसनग्राह्य एत रसः । पृथिव्युदक्वृत्तिः । पृथिव्युदकयोरेव वर्त्तते । जीवनपुष्टिबलारोग्यनिमित्तम् । जीवनं प्राणधारणम् , पुष्टिरवयवोपचयः , बलमुत्साहविशेषः , आरोग्यं रोगाभावः , एषां रसो निमित्तम् । एतच्च सर्वं वैद्यशास्त्रादवगन्तव्यम् । रसन सहकारी । स्वगतो रसो रसनस्य बाह्यरसोपलम्भे सहकारी | मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायभेदभिन्नः । मधुरादिभेदेन भिन्नः षट्प्रकार इत्यर्थः । तस्य च नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत् । यथा रूपं पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगादुत्पत्तिविनाशवत् सलिलपरमाणुषु नित्यं कार्ये कारणगुणपूर्वकमाश्रमविनाशाद्विनश्यति , तथा रसोऽपि ।

गन्धो घ्राणग्राह्यः । गन्ध एव प्राणग्राह्यो घ्राणग्राह्य एव गन्धः । ननु कथमयं नियमः ? स्वभावनियमात् । ईदृशो गन्धस्य स्वभावो यदयमेव घ्राणेनैकेन गृह्यते नान्यः , दृष्टानुमितानां नियोगप्रतिषेधाभावात् । पृथिवीवृत्तिः । पृथिव्यामेव वर्त्तते नान्यत्र । घ्राणसहकारी | स्वगतो गन्धो घ्राणस्य सहकारी । सुरभिरसुरभिश्चेति भेदः । अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः । यथा रसः पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगादुत्पत्तिविनाशवान् कार्ये कारणगुणपूर्वक आश्रयविनाशाद्विनश्यति तथा गन्धोऽपि । नित्यत्वं पुनरस्य नास्त्येव ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — रोगों का अभाव हो ' आरोग्य ' है । रस इन सबों का कारण है । ये सभी बातें आयुर्वेद से जाननी चाहिए । ' रमन सहकारी ' अर्थात् रसनेन्द्रिय रूप द्रव्य में रहने वाला रस रसनेन्द्रिय के द्वारा होनेवाले रस के बाह्य प्रत्यक्ष में सहकारी कारण हैं । ' मधुराम्ललवणकटुकषायादिभेदभिन्नः ' अर्थात् मधुरादि भेदों से विभक्त होकर वह छः प्रकार का है । रस के नित्यश्व एवं अनित्यत्व की निष्पत्ति रूप की तरह जाननी चाहिए , अर्थात् जिस प्रकार से रूप पार्थिव परमाणुओं में अग्निसंयोग से उत्पन्न भी होता हैं और नष्ट भी होता है एवं ( रूप ) जलादि परमाणुओं में नित्य है और कार्य द्रव्यों में कारण के गुणों से उत्पन्न होता है , एवं आश्रय के विनाश से नाश को प्राप्त होता है , उसी प्रकार से रस के प्रसङ्ग में भी व्यवस्था समझनी चाहिए ।

' गन्धो घ्राणग्राह्य : ' ( उक्त गुणों में से ) केवल गन्ध का ही ग्रहण घ्राणेन्द्रिय से होता है , अतः घ्राण से जिस गुण का प्रत्यक्ष हो वही ' गन्ध ' है । ( प्र ० ) ( गन्ध का ही प्रत्यक्ष घ्राण से होता है ) यह नियम क्यों ? ( उ ० ) स्वाभाविक नियम के अनुसार गन्ध का ही यह स्वभाव निर्णीत होता है कि गुणों में से केवल वही घ्राणेन्द्रिय के द्वारा गृहीत होता है कोई और गुण नहीं , क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा सिद्ध विषयों में नियोग या प्रतिषेध नहीं किया जा सकता ।

स्पर्शनिरूपणम्

पृ. २५६

भाष्य ११८

स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यः क्षित्युदकज्वलन पवनवृत्तिस्त्वक्- रूपानुविधायी शीतोष्णनुष्णाशीतभेदात् त्रिविधः ।

सहकारी अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववत् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २५६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 331

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — त्वगिन्द्रिय से गृहीत होनेवाला गुण ही ' स्पर्श ' है । यह पृथिवी , जल , तेज और वायु इन चार द्रव्यों में रहता है । स्पर्श त्वगिन्द्रिय ( से प्रत्यक्ष के उत्पादन में उसका ) सहायक है । रूप के आश्रयों में वह अवश्य ही रहता है । यह शीत , उष्ण और अनुष्णशीत भेद से तीन प्रकार का है । इसके नित्यत्व और अनित्यत्व की रीति पहिले की तरह जाननी चाहिए ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यः । त्वचि स्थितमिन्द्रियं त्वगिन्द्रियम् तेनेव स्पर्शो गृह्यते नान्येन । क्षित्युदमकज्वलनपवनवृत्तिः । एतेष्वेव वृत्तिरेव । त्वक्सहकारी | स्पर्शस्त्वगिन्द्रियस्य विषयग्रहणसहकारी । रूपानुविधायी रूपमनुविधातुमनुगन्तु शीलमस्य , यत्र रूपं नियमेन तस्य सद्भावात् । शीतोष्णानुष्णाशीतभेदात् त्रिविधः । काठिन्यप्रशिथिलादयस्तु संयोगविशेषा न स्पर्शान्तरम् , उभययेन्द्रियग्राह्यत्वात् । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववदिति । व्यवहितस्य रसस्य ग्रहणं न गन्धस्य , तस्य नित्यत्वाभावात् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' पृथिवीवृत्तिः ' अर्थात् गन्ध पृथिवी में ही रहता है और किसी द्रव्य में नहीं । इसके सुरभि ( सुगन्ध ) एवं असुरभि ( दुर्गन्ध ) दो भेद हैं । ' अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः ' अर्थात् जिस प्रकार पार्थिव परमाणुओं के रस की उत्पत्ति और विनाश दोनों ही अग्नि के संयोग से होते हैं एवं कार्य द्रव्यों में वे कारणगत गुणों से उत्पन्न होते हैं , एवं आश्रय के विनाश से विनष्ट होते हैं उसी प्रकार से गन्ध में भी समझना चाहिए । गन्ध नित्य होता ही नहीं ।

त्वचा में रहनेवाली इन्द्रिय ही ' त्वगिन्द्रिय ' है । स्पर्श का प्रत्यक्ष इसी से होता है , और किसी इन्द्रिय से नहीं । क्षित्युदकज्वलनपवनवृत्तिः ' अर्थात् पृथिवी , जल तेज और वायु इन चार द्रव्यों में वह रहता है और अवश्य रहता है । ' त्वक्सहकारी ' ( स्वगिन्द्रिय में रहनेवाला स ) स्वगिन्द्रिय के द्वारा स्पर्श के प्रत्यक्ष में सहायक है । ' रूपानुविधायी ' ' रूपमनुविधातुं शीलमस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का यह अभिप्राय है कि स्पर्श रूपानुगमनशील है , अर्थात् जहाँ रूप रहता है वहाँ स्पर्श भी अवश्य ही रहता हैं । शीत , उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से स्पर्श तीन प्रकार का है । कठिनता और कोमलता नाम के कोई अतिरिक्त स्पर्श नहीं हैं वे विशेष प्रकार के संयोग ही है , क्योंकि आँख और त्वचा दोनों इन्द्रियों से इनका प्रत्यक्ष होता है ।

पाकजोत्पत्तिविधानम्

पृ. २५७

भाष्य ११९

पार्थिवपरमाणुरूपादीनां पाकजोत्पत्तिविधानम् ।

घटादे - रामद्रव्यस्याग्निना सम्बद्धस्याग्न्यभिघातान्नोदनाद्वा तदारम्भकेष्वणुपु कर्माण्युत्पद्यते तेभ्यो विभागा विभागेभ्यः संयोगविनाशाः संयोगविनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति ।

तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेषु परमाणुष्वसंयोगादौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां विनाशः पुनरन्यस्मादग्निसंयोगादौयापेक्षात् पाकजा जायन्ते ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २५७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 332

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पार्थिव परमाणुओं के रूपादि की पाक से उत्पत्ति की रीति ( कहते हैं ) | घटादि कच्चे द्रव्यों के उत्पादक परमाणुओं के साथ अग्नि का ( अभिघात या नोदन नाम का ) संयोग होता है । उक्त परमाणुओं के साथ अग्नि के उस नोदन या अभिघात से उनमें क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । उन क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग होते हैं । इन विभागों से परमाणुओं के परस्पर के सारे संयोग टूट जाते हैं । संयोग के इन विनाशों से घटादि द्रव्यों का विनाश हो जाता है । उनके विनष्ट हो जाने के बाद परस्पर अलग हुए उन परमाणुओं में उष्णता और अग्नि के संयोग से पाकज रूपादि की उत्पत्ति होती है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

पार्थिवपरमाणुरूपादीनामुत्पत्तिविनाशनिरूपणार्थमाह-- पार्थिवपरमाणुरूपादीनामिति । यद्यपि परमाणव एव पृथिवी , तथापि ते कार्यरूपपृथिव्यपेक्षया पार्थिवा उच्यन्ते । पृथिव्या इमे कारणं परमाणवः पार्थिवपरमाणवः , तेषां ये रूपादयस्तेषां पाकजानामुत्पत्तविधानं प्रकारः कथ्यते । नन्वेवं सति श्यामादिविनाशनिरूपणं न प्रतिज्ञातं स्यात् , नैवम् यकारशब्देन तस्यावबोधात् । यथा हि रूपादीनां पाकादुत्पत्तिप्रकारः ।

यत्र पूर्वेषां विनाशादपरेषमुत्पादस्तमेव प्रकारं दर्शयति - घटादेरामद्रव्यस्येत्यादिना आदिशब्देन शरावादयो गृह्यन्ते । आमद्रव्यस्येत्यपक्वद्रव्यस्येत्यर्थः । पाकार्थमग्निना सम्बद्धस्य परमाणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते , आमद्रव्यस्य घटादेः संयोगिनोऽप्युदकपरमाणवः सन्ति , तन्निवृत्त्यर्थमाहतदारम्भकेष्विति । तस्य घटादेरारम्भकेष्वित्यर्थः । घटाद्यारम्भकाश्च परमाणवः पारम्पर्येण कर्मणां कारणमित्याह - अग्न्यभिघातान्नोननाद्वेति ।

पार्थिवस्य परमाणोरग्निनाऽभिघातो नोदनं वा संयोगविशेषः , स च कर्माधिकारे वक्ष्यते । तेभ्यो विभागा विभागेभ्यः संयोगविनाशाः संयोगविनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति , तेभ्यः कर्मभ्यः परमाणूनां विभागा विभागेभ्यो द्वयणुकलक्षणं कार्यद्रव्यं विनश्यति । तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेषु परमाणुष्वग्निसंयोगादग्निगौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां पूर्वरूपरसगन्धस्पर्शानां विनाशः । पुनरन्यस्मादग्निसंयोगात् पाकजा जायन्ते ।

स्वतन्त्रेषु परमाणुषु पाकजोत्पत्तौ कार्यानवरुद्ध एव द्रव्ये सर्वत्र रूपाद्युत्पत्तिदर्शनं प्रमाणम् । परमाणुरूपादयः कार्यानवरुद्धेष्वेव द्रव्येषु भवन्ति , आरभ्यमाणरूपादित्वात् तन्त्वादिरूपवत् । पूर्वरूपादिविनाशेऽपि रूपान्तरोत्पत्तिःप्रमाणम् । रूपादिमति रूपाद्यन्तरारम्भासम्भवाद् रक्तादिरूपादयो रूपादिमत्सु नारभ्यन्ते रूपादित्वात् , तन्त्वादिरूपादिवत् । एवं परमाणुषु पूर्वरूपादिविनाशे सिद्धे वह्निसंयोग एव विनाशहेतुरवतिष्ठते , तद्भावित्वादन्यस्यासम्भवात् । न च यदेवं रूपादीनां विनाशकारणं तदेव तेषामुत्पत्तिकारणमित्यवगन्तव्यम् , तन्तुरूपादीनामन्यत उत्पत्तेरन्यतरच विनाशदर्शनात् । तेन परमाणुषु रूपादीनामन्यस्मादग्निसंयोगादुत्पत्तिरन्यस्मादग्निसंयोगाद्विनाश इत्यसंयोगादौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां विनाशः , पुनरन्यस्मादग्निसंयोगादोपण्यापेक्षात्पाकजा वसीयते । परमाणुरूपादिविनाशोत्पादावेककारणकौ न भवतः , रूपादिविनाशोत्पादत्वात् तन्तुरूपादिविनाशोत्पादवत् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' अस्यापि नित्यत्वानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववत् ' इस वाक्य में ' पूर्व ' शब्द से ठीक पहिले कहा गया गन्ध अभिप्रेत नहीं है , क्योंकि गन्ध नित्य है ही नहीं । किन्तु गन्ध से पहिले कहे हुए रस का ग्रहण है ( जो नित्य और अनित्य दोनों प्रकार का होता है ) ।

' पार्थिव परमाणुरूपादीनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ पार्थिव परमाणुओं के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश का निरूपण करने के लिए है । पृथिवी के परमाणु यद्यपि स्वयं ही पृथिवी है , फिर भी ' पृथिव्या इमे कारणं परमाणवः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कार्यरूप पृथिवी की अपेक्षा ये परमाणु भी ' पार्थिव ' कहलाते हैं । पार्थिव परमाणुओं के जो ' रूपादि ' अर्थात् पाकजरूपादि उनकी जो उत्पत्ति उसका ' विधान ' अर्थात् प्रकार कहते हैं । ( प्र ० > इस प्रकार की व्याख्या में ( कच्चे घटादि के ) श्यामादि रूपों का विनाश प्रतिज्ञा के अन्दर नहीं आवेगा ? ( उ ० ) ( उक्त प्रतिज्ञा वाक्य में ) ' प्रकार ' शब्द के रहने से ( उस प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा ) रूपादि के विनाश का भी बोध हो जायगा । अर्थात् पाक से रूपादि की उत्पत्ति के जिस प्रकार में रूपादि के विनाश से दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है , वही ' प्रकार ' ' घटादेरामद्रव्यस्य ' इत्यादि से कहते हैं ।

३३ ( घटादिपद में प्रयुक्त ) ' आदि ' शब्द से शराव प्रभृति द्रव्यों को समझना चाहिए । ' आमद्रव्य ' का अर्थ है बिना पका हुआ कच्चा द्रव्य । पाक के लिए अग्नि के साथ सम्बद्ध परमाणुओं में क्रिया उत्पन्न होती हैं , किन्तु घटादि कच्चे द्रव्यों में तो जलादि के परमाणु भी सम्बद्ध हैं , किन्तु उनके परमाणुओं में पाक इष्ट नहीं है , अतः उनको हटाने के लिए ' तदारम्भकेषु ' यह वाक्य दिया गया है । ' तस्य ' शब्द के ' तत् ' शब्द से घटादि द्रव्य अभिप्रेत हैं ।

उनके आरम्भक अर्थात् उत्पादक परमाणुओं में । ' अग्न्यभिघातान्नोदनाद्वा ' इत्यादि से यह कहते हैं कि घटादि के उत्पादक परमाणु भी परम्परा से उक्त क्रिया के कारण हैं । पार्थिव परमाणु के साथ अग्नि का नोदन या अभिघात नाम का संयोग ( होता है ) इसकी बातें आगे कर्मपदार्थ - निरूपण में कहेंगे । ' तेभ्यो विभागः ।

विभागेभ्यः संयोगविनाशः , संयोगविनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति ' अर्थात् उन क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं , उन विभागों से संयोगों के नाश उत्पन्न होते हैं , संयोग के उन विनाशों से द्वणुक रूप कार्य द्रव्यों का नाश होता है । ' तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेष्वग्निजायन्ते ' ' स्वतन्त्र ' अर्थात् परस्पर असम्बद्ध परमाणुओं में पाक से विलक्षण रूपादि की उत्पत्ति होती है ।

जिस समय द्रव्य दूसरे द्रव्य के उत्पादनकार्य से विरत रहता है , उसी समय उसमें गुण की उत्पत्ति होती है । पटरूप कार्य के उत्पादन में लगने से पहिले ही तन्तुओं में रूपादि की उत्पत्ति होती है , अतः यही प्रामाणिक है कि द्वयणुक रूप कार्य में व्याप्त होने से पहिले पार्थिव परमाणुओं में भी रूपादि की उत्पत्ति होती है , क्योंकि ये भी उत्पत्तिशील रूपादि ही हैं ।

एवं यह भी प्रमाण से सिद्ध है कि एक आश्रय में दूसरे रूपादि की उत्पत्ति तब तक नहीं हो सकती , जब तक उसके पहिले के रूपादि का नाश न हो जाय । अतः यह अनुमान ठीक है कि पाक से रक्त रूपादि की उत्पत्ति रूप से युक्त किसी द्रव्य में नहीं होती है , जैसे कि तन्तु प्रभृति के रूपादि किसी रूपयुक्त द्रव्य में नहीं उत्पन्न होते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि परमाणुओं क पहिले रूपादि का नाश हो जाने पर पाक से उनमें दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है ।

एवं रूप का उक्त नाश भी अग्निसंयोग के रहते ही होता है एवं नहीं रहने से नहीं होता है , अतः पाकज रूपादि की उत्पत्ति की तरह उस आश्रय में रहनेवाले अपाकज ) रूपादि के नाश का भी अग्निसंयोग ही कारण है । किन्तु रूप का नाश एवं रूप की उत्पत्ति दोनों एक कारण से सम्भव नहीं हैं , क्योंकि तन्तु प्रभृति के रूपों का नाश एवं उत्पत्ति विभिन्न कारणों से देखे जाते हैं ।

इससे यह फलितार्थ निकलता है कि अग्नि के एक संयोग से पहिले के रूपादि का नाश होता है , एवं अग्नि के हो दूसरे संयोग से दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार तन्तु प्रभृति के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश दोनों एक सामग्री से इसलिए नहीं होते कि वे भी उत्पत्ति और विनाश हैं , उसी प्रकार उसी हेतु से यह भी निष्पन्न होता है कि परमाणुओं के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश दोनों ही एक सामग्री से उत्पन्न नहीं होते ।

पृ. २६०

भाष्य १२०

तदनन्तरं भोगिनामापेक्षादात्मानुसंयोगादुत्पन्नपाक जेष्वणुषु कर्मोत्पत्तौ तेषां परस्परसंयोगाद् द्व्यणुकादिक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते ।

तत्र च कारणगुणप्रक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २६०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 335

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसके बाद भोग करनेवाले आत्मा के अदृष्ट , एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन दोनों से पाकजनित विलक्षण रूपादि से युक्त परमाणुओं में परस्पर संयोग उत्पन्न होते हैं । इन संयोगों से द्वयणुकादि की उत्पत्ति के क्रम से ( घटादि ) स्थूल द्रव्य की उत्पत्ति होती है । फिर इस ( नये ) कार्य - द्रव्य में स्वाभाविक कारणगुण के क्रम से रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

तदनन्तरमित्यादि । उत्पन्नेषु घटादिषु येषां तत्साध्ययोः सुखदुःखयोरनुभवो भोगो भविष्यति ते भोगिनः , तेषामदृष्टं धर्माधर्मलक्षणम् , पद्यन्ते । तेभ्यस्तेषां परमाणूनां परस्परसंयोगास्ततश्च तमपेक्षमाणादात्मपरमाणु संयोगादुत्पन्नपाकजरूपरसगन्धस्पर्शेषु परमाणुषु कर्माण्युद्वयणुकं त्रिभिद्वर्यणुकैस्त्र्यणुक मित्यनेन क्रमेण कार्यद्रव्यं घटादिकमुत्पद्यत इति । तत्र च कारणगुणप्रक्रमेण रूपाद्युत्पतिः । परमाणुद्वयरूपाभ्यां द्वणुके रूपं द्वयणुकरूपेभ्यश्च त्र्यणुकरूपमित्यनेन क्रमेण घटादौ रूपरसगन्धस्पर्शोत्पत्तिः ! सङ्ख्यादीनां न पाकजत्वं तेषामविलक्षणत्वात् । ननु स्पर्शस्यापि वैलक्षण्यं न दृश्यते , सत्यम् तथाप्यस्य पाकजत्वमनुमानात् । तच्च पृथिव्यधिकारे दर्शितम् । पाकजोत्पत्यनन्तरं परमाणुषु क्रिया , न तु श्यामादिनिवृत्तित्समकालमेवेति रूपादिसत्येव द्रव्ये रूपादिसत्कार्य द्रव्यारम्भहेतुभूतक्रियादर्शनाद् दृश्यते । परमाणुक्रिया रूपादिमत्येव जायते रूपादिमत्कार्यारम्भहेतुभूतक्रियात्वात् पटारम्भकसंयोगोत्पादकतन्तुक्रियावत् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' तदनन्तरम् ' अर्थात् घटादि द्रव्यों के उत्पन्न हो जाने के बाद उन घटादि द्रव्यों से जिन जीवों को सुख या दुःख का अनुभव रूप ' भोग ' होगा , वे ही जोव ( भोगिनाम् ' इस पद के ) ' भोग ' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन्हीं के अदृष्ट अर्थात् धर्म और अधर्म एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन सबों से पाकज रूपादि से युक्त परमाणुओं में क्रियायें उत्पन्न होती हैं । इन क्रियाओं से उन परमाणुओं में परस्पर संयोग उत्पन्न होते हैं ।

उक्त संयोग एवं दो परमाणुओं से द्वणुक , एवं तीन द्वयणुकों से ' त्र्यणुक ' इसी क्रम से ( अभिनव ) घटादि द्रव्यों की उत्पत्ति होती है । ' उसमें ' अर्थात् द्वणुक में ' कारणगुणक्रम ' से अर्थात् परमाणुओं के ( पाकज रूपों से ( द्वणुकों में ) रूपों की उत्पत्ति होती है । अर्थात् दोनों परमाणुओं के दोनों रूपों से घणुक में एक रूप की उत्पत्ति होती है । एवं तीन द्वणुकों के तीनों रूपों से त्र्यणुक में एक रूप की उत्पत्ति होती है ।

इसी ( कारणगुणपूर्वक ) क्रम से घटादि स्थूल द्रव्यों में भी ( पाकज ) रूा , रस गन्ध एवं स्पर्श की उत्पत्ति होती है । ( पके हुए घटादि में भी ) संख्यादि गुणों की उत्पत्ति पाक से नहीं होती हैं , क्योंकि पाक के बाद भी संख्यादि गुणों में कोई अन्तर नहीं दीखता है । ( प्र ० ) स्पर्श में भी तो पाक के बाद कोई अन्तर नहीं दीखता है ? ( उ ० ) हाँ , फिर भी पृथिवी निरूपण में इस अनुमान को दिखा चुके हैं , जिसके द्वारा पके हुए द्रव्यों के स्पर्शो में पाकजन्यत्व की सिद्धि होती है ।

जिस क्रिया के द्वारा रूपादि से युक्त द्रव्य की उत्पत्ति होती है वह क्रिया रूपादि से युक्त द्रव्यों में हो देखी जाती है , अतः यह समझना चाहिए कि पार्थिव परमाणुओं में पाक से रूपादि की उत्पत्ति के बाद ही उसमें ( पके हुए द्वणुक को उत्पन्न करनेवाली ) क्रिया उत्पन्न होती है , श्यामादि रूपों के नाशक्षण में नहीं ।

इस प्रकार यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार पट के कारणीभूत तन्तुओं के संयोग को उत्पन्न करनेवाली क्रिया रूप से युक्त तन्तुओं में हो देखी जाती है , क्योंकि वह क्रिया ( तन्तुसंयोग के द्वारा ) रूप से युक्त पट स्वरूप द्रव्य का उत्पादक है , उसी प्रकार रूप से युक्त द्वयणुक . स्वरूप द्रव्य के उत्पादक दोनों परमाणुओं की क्रिया भी रूप से युक्त परमाणुओं में ही उत्पन्न होती है ।

( प्र ० ) घटादि कार्य द्रव्यों में ही अग्निसंयोग से रूपादि का विनाश एवं उत्पत्ति क्यों नहीं मान लेते ? क्योंकि भट्टी में पकने के लिए दिये गये घटादि का तीनों अवस्थाओं में प्रत्यक्ष होता है । एवं भट्टी के किसी छेद से झाँकनेवाले को यह वही घट है ' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा भी होती है । इसी आक्षेप के समाधान के लिए ' न च ' इत्यादि . वाक्य लिखते हैं । ' सर्वावयवेषु ' इत्यादि वाक्य से उक्त आक्षेप के खण्डन की ही युक्ति का प्रतिपादन करते हैं । अभिप्राय यह है कि भीतर और बाहर के सभी अवयवों में ' वर्तमान ' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अवयवी में केवल बाहर रहनेवाले वह्नि की ' व्याप्ति ' अर्थात् व्या कसंयोग ( बाहर और भीतर सभी अवयवों के साथ संयोग ) नहीं हो सकता ।

पृ. २६२

भाष्य १२१

न च कार्यद्रव्य एव रूपाद्युत्पत्तिर्विनाशो वा सम्भवति , सर्वावयवेष्वन्तर्बहिश्च वर्त्तमानस्याग्निना व्याप्त्यभावात ।

अणुप्रवेशादपि च व्याप्तिर्न सम्भवति , कार्यद्रव्यविनाशादिति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २६२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 337

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उस ( कच्चे स्थूल घटादि ) द्रव्यों में ही ( अग्निसंयोग से पाकज ) रूपादि की उत्पत्ति या ( नीलादि पहिले ) रूपादि का विनाश नहीं हो सकता , क्योंकि बाहर और भीतर के सभी अवयव केवल बाहर में विद्यमाम अग्नि के संयोग से व्याप्त नहीं हो सकते । ( अग्नि के ) परमाणुओं से भी उक्त व्याप्ति नहीं हो सकती , क्योंकि इसके मानने पर भी कार्य द्रव्य का नाश मानना ही पड़ेगा ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अथ कथं कार्यद्रव्ये एव रूपादीनामग्निसंयोगादुत्पादविनाशौ न कल्प्येते ? प्रतीयन्ते हि पाकार्थमुपक्षिप्ता घटादयः सर्वावस्थासु प्रत्यक्षाछिद्र विनिवेशितदृशा , प्रत्यभिज्ञायन्ते च पाकोत्तरकालमपि त एवामी घटादय इति , तत्राह - न चेति । उपपत्तिमाह - सर्वावयवेष्विति । अन्तर्वहिश्च सर्वेष्ववययेषु वर्त्तमानस्य समवेतस्यावयविनो बाह्ये वर्त्तमानेन वह्निना व्याप्तेर्व्यापकस्य संयोगस्याभावात् कार्यरूपादीनामुत्पत्तिविनाशयोरक्लृप्तेरन्तर्वत्तिनामपाक प्रसङ्गादिति भावः ।

सच्छिद्राण्येवावयविद्रव्याणि । तत्र यदि नाम महतस्तेजोऽवयविनो नान्तःप्रवेशोऽस्ति तत्परमाणूनां ततो व्याप्तिर्भविष्यति ? तत्राह - अणुप्रवेशादपीति । न तावत्परमाणवः सान्तराः , निर्भागत्वात् । द्व्यणुकस्य सान्तरत्वे चानुत्पत्तिरेव तस्य परमाण्वोरसंयोगात् । संयुक्तौ चेदिमा निरन्तरावेव । सभागयोहि वस्तुनोः केनचिदंशेन संयोगात् केनचिदसंयोगात् सान्तरः संयोगः । निर्भागयोस्तु नायं विधिरवकल्पते ।

स्थूलद्रव्येषु प्रतीयमानेष्वन्तरं न प्रतिभात्येव , त्र्यणुकेष्वेवान्तरम् , तच्चानुपलब्धियोग्यत्वान्न प्रतीयत इति गुर्वीयं कल्पना । तस्मान्निरन्तरा एव घटादयः । तेषामन्तस्तावदग्निपरमाणूनां प्रवेशो नास्ति यावत्पार्थिवावयवानां व्यतिभेदोन स्यात् । स्पर्शवति द्रव्ये तथाभूतस्य द्रव्यान्तरस्य प्रतीघाताद् व्यतिभिद्यमानेषु चावयवेषु क्रियाविभागादिन्यायेन द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशाcar यं द्रव्यविनाश इति कुतस्तस्याणुप्रवेशादभिव्यक्तिः ।

न च कार्यद्रव्येष्काश्रयविनाशादन्यतो रूपादीनां विनाशः कारणगुणेभ्यश्चान्यत उत्पादो दृष्टः , तेनादि घटवह्निसंयोगाद्रूपादीनामुत्पत्तिविनाशौ न कल्प्येते ।

घटरूपादय आश्रयविनाशादेव नश्यन्ति कार्यद्रव्यगत रूपरसगन्धस्पर्शत्वाद् मुद्गराभिहतनष्टघटरूपादिवत् । तथा घटरूपादयः कारणगुणेभ्य

जायन्ते कार्यद्रव्यगतरूपादित्वात् पटगतरूपादिवत् । किञ्च , एव पूर्वमवयवानां प्रशिथिलता आसीदिदानीं काठिन्यमुपलभ्यते , न च नोदनाभिघातयोरिव शैथिल्यकाठिन्ययोरेकत्र समावेशो युक्तः , परस्परविरोधात् । तस्मात् पूर्वव्यूहनिवृत्त व्यूहान्तरमेतदुपजातम् । तथा सति प्राक्तनद्रव्यविनाशः कारणविनाशात् , द्रव्यान्तरस्योत्पादः कारणसद्भावादेवेत्यवतिष्ठते । प्रत्यभिज्ञानं च ज्वालादिवत् सामान्यविषयम् । सर्वावस्थोपलब्धिरपि कार्यस्य विनश्यतोऽपि क्रमेण विनाशात् । नहि घटः परमाणुसञ्चयारब्धो येन विभक्तेषु परमाणुषु सहसैव विनश्येत् , किन्तु द्वणुकादिप्रक्रमेणारब्धः । तस्य द्वयणुकत्र्यणुकाद्यसङ्घयेयद्रव्यविनाशात्परम्परया चिरेण विनश्यतो यावदविनाशस्तावदुपलब्धिरस्त्येव । एकतश्च पूर्वेऽवयवा विनश्यन्ति , अन्यतश्चोत्पन्नपाकजैरणुभिरपूर्वे तत्स्थाने एवं द्वयणुकादिप्रक्रमेणारभ्यन्ते , तेन पक्वापक्वावयवदर्शनम् । यदा चान्यावयवानां नाशात्पूर्वावयविनो विनश्यत्ता तदेव पूर्वावयवानामुत्पादात् क्षणान्तरे पूर्वावयविविनाशेऽवयव्यन्तरस्य चोत्पाद इत्याधाराधेयभावोऽवधारणं च स्यात् , यावन्तः पूर्वस्यावयवास्तावन्त एवोत्तरस्यारम्भका ( इति ) तत्परिमाणत्वं तत्सङ्ख्यात्वं चोपपद्यते ।

प्रक्रिया तु द्वयणुकस्य विनाशः , त्र्यणुकस्य विनश्यत्ता , श्यामादीनां विनश्यत्ता , सक्रिये परमाणौ विभागजविभागस्योत्पद्यमानता , रक्ताद्युत्पादकस्याग्निसंयोगस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः । ततस्त्र्यणुकविनाशः , तत्कार्यस्य विनश्यत्ता , श्यामादीनां विनाशः , विभागजविभागस्योत्पाद :, संयोगस्य विनश्यत्ता , रक्ताद्युत्पादकाग्निसंयोगोत्पादः , रक्तादीनामुत्पद्यमानता , श्यामादिनिवर्त्तकाग्निसंयोगस्य विनश्यत्तेत्येकः कालः ।

ततस्तत्कार्यविनाश :, तत्कार्यविनश्यत्ता , उत्तरस्य संयोगस्योत्पाद्यमानता , रक्तादीनामुत्पादः , श्यामाद्युच्छेदकाग्निसंयोगस्य विनाशः , द्वितीयपरमाणौ द्रव्यारम्भकक्रियाया उत्पद्यमानतेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यस्य विनाशः , तत्कार्यस्य विनश्यत्ता , उत्तरसंयोगस्योत्पादः , क्रियाविभागविभागजविभागानां विनश्यत्ता , द्वितीयपरमाणौ क्रियाया उत्पादः , विभागस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः ।

ततस्तत्कार्यस्य विनाशः , तत्कार्यस्य विनश्यत्ता , क्रियाविभागविभागजविभागानां विनाशः , द्वितीयपरमाण्वाकाशाविभागस्योत्पादः , तत्संयोगस्य विनश्यत्तेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यस्य विनाशः , तत्कार्यस्य विनश्यत्ता , परमाण्वाकाशसंयोगविनाशः , उत्तरसंयोगस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यस्य विनाशः , तत्कार्यस्य विनश्यत्ता , परमाणोः परमाण्वन्तरेण सहोत्तरसंयोगोत्पादः , द्वद्यणुकस्योत्पद्यमानता , विभागकर्म णोविनश्यत्तेत्येकः कालः ।

ततस्तत्कार्यस्य विनाशः , तत्कार्यस्य विनश्यत्ता , द्वयणुकस्योत्पादः , तद्गतानां रूपादीनामुत्पद्यमानता , विभागकर्मणोविनाशः , ततः क्षणान्तरे कारणगुणप्रक्रमेण द्व्यणुके गुणान्तरोत्पाद : । एवं सर्वत्र द्वयणुकेषु कल्पना ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — एवं कार्यद्रव्यों के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश भी ( बिना कारण के ) नहीं हो सकते ( अतः आक्षेप करनेवाले के पक्ष में कथित व्यापकसंयोग रूप कारण के अभाव से ) भीतर के अवयवों में पाक ही उत्पन्न नहीं होगा ( फलतः भीतर की तरफ घटादि कच्चे ही रह जाएँगे ) | ( प्र ० ) जितने भी अवयवो रूप द्रव्य हैं सभी छोटे छोटे छिद्रों से युक्त हैं , उन छोटे छिद्रों के द्वारा यद्यपि बड़े तेजद्रश्य का प्रवेश सम्भव नहीं है , फिर भी तेज के परमाणुओं का प्रवेश उन छोटे छिद्रों से भी हो सकता है ।

इस प्रकार घट का विनाश न मानने पर भो ( अवयवी के बाहर और भीतर पाक का प्रयोजक ) कथित व्यापक वह्निसंयोग की उपपत्ति हो सकती है । इसी आक्षेप के समाधान में ' अणुप्रवेशादपि ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । अभिप्राय यह है कि परमाणुओं के तो अंश हैं नहीं , जिससे कि वे छिद्रयुक्त होंगे ?

द्वथणुकों को अगर छिद्र युक्त मानें तो फिर उनकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं होगी , क्योंकि दो परमाणुओं में इस प्रकार का संयोग असम्भव है ( जिससे छिद्र युक्त द्वयक की उत्पत्ति सम्भव हो ) क्योंकि दोनों परमाणु अगर संयुक्त हैं तो फिर उनमें अन्तर नहीं हो सकता । अनुयो और प्रतियोगी के किसी अंश में संयोग एवं किसी अंश में असंयोग से ही अन्तरयुक्त संयोग होता है , निरंश परमाणुओं में उक्त संयोग की सम्भावना नहीं है । एवं प्रतीत होनेवाले स्थूल द्रव्यों में छिद्र देखा भी नहीं जाता ।

अब केवल एक कल्पना बच जाती है कि केवल व्यसरेणु रूप अवयवी में ही छिद्र है , किन्तु अतीन्द्रिय होने के कारण उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है , किन्तु इस कल्पना में बहुत ही गौरव है । अतः घटादिद्रव्य छिद्रों से युक्त नहीं हैं । उनके भीतर अग्नि के परमाणुओं का प्रवेश तब तक सम्भव नहीं है , जब तक उनके अवयव विभक्त न हों जाँय । स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य में जब स्पर्श से युक्त किसी दूसरे द्रव्य का प्रतिघात होता है , तब उसके अवयव अवश्य ही विभक्त हो जाते हैं ।

फिर ' क्रिया से विभाग , विभाग से आरम्भक संयोग का नाश ' इस रीति से आरम्भक संयोग के नाश के द्वारा अवयवी द्रव्य का भी नाश अवश्य ही होगा फिर अणुप्रवेश के बाद अग्नि के व्यापक संयोग की उत्पत्ति कैसे होगी ? एवं कार्यद्रव्यों के रूपादि का नाश आश्रयनाश को छोड़कर और किसी कारण से नहीं देखा जाता है , इसी प्रकार कार्यद्रव्य के रूपादि की उत्पत्ति भी कारणों में रहनेवाले रूपादि से भिन्न किसी और कारण से नहीं देखी जाती है ।

इन सभी युक्तियों से भी घटादि कार्यद्रव्यों के रूपादि की उत्पत्ति घटादि कार्यद्रव्य और वह्नि के संयोग से कल्पित नहीं हो सकती ।

इस प्रकार यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार घटादिद्रव्यों के रूप रस , गन्ध एवं स्पर्श मुद्गरादि के प्रहार से उत्पन्न होते हैं , एवं घटादि कार्यद्रव्यों के नाश से ही नष्ट होते हैं , क्योंकि वे भी कार्यद्रव्य के रूपादि हैं , उसी प्रकार सभी कार्यद्रव्यों के रूपादि अपने आश्रयों के नाश से ही नष्ट होते हैं ।

एवं जिस प्रकार पटस्वरूप कार्यद्रव्य के रूपादि अपने कारणीभूत तन्तुओं के रूपादि से ही उत्पन्न होते हैं , उसी प्रकार घटादि सभी कार्यद्रव्यों के रूपादि अपने कारणीभूत द्रव्यों के रूपादि से ही उत्पन्न होते हैं ।

और भी बात है कि पाक से पहिले घटादि में रहनेवाला प्रशिथिल संयोग , एवं पाक के बाद होनेवाला कठिन संयोग दोनों परस्पर विरोधी हैं , नोदनसंयोग एवं अभिघात संयोग इन दोनों की तरह वे परसर अविरोधी नहीं हैं , अतः एक घट में पाक से पहिले का प्रशिथिल संयोग एवं पीछे का कठिन संयोग ये दोनों नहीं रह सकते । अतः यही मानना पड़ेगा कि पहिले ' व्यूह ' अर्थात् अवयवों के संयोग का नाश हो जाने पर अवयवों के दूसरे व्यूह ( संयोग ) की उत्पत्ति होती है ।

फलतः पहिले अवयवी का नाश हो गया ; क्योंकि उसके कारण अवयवों के संयोग ( पूर्वव्यूह ) का नाश हो गया है । दूसरे अवयवी की उत्पत्ति होती है , क्योंकि कारणीभूत दूसरे व्यूह ( अवयवसंयोग ) की सत्ता है । पकने के बाद भी यह वही घट हैं ' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा तो दोनों में अत्यन्त सादृश्य के कारण होती है जैसे कि दीपादि की ज्वालाओं में इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञायें होती हैं । घटादि की सभी अवस्थाओं की उक्त उपलब्धि में यह युक्ति है कि ( पाक से ) घटादि द्रव्यों का विनाश क्रमशः होता है ।

परमाणुओं के समूहों से हो तो घट उत्पन्न होते नहीं कि उनमें परस्पर विभागों के उत्पन्न होते ही उनका सहसा नाश हो जाय । द्वघणुकादि क्रम से उनकी उत्पत्ति होती है , अतः द्वणुक त्र्यसरेणु प्रभृति के नाश की असंख्य परम्परा से बहुत समय के बाद घटादि का नाश भी होगा , अतः जितने समय तक उनका नाश नहीं हो जाता उतने समय तक उनको उपलब्धि होना उचित ही है ।

अग्नि के एक संयोग से पहिले के अवयव नष्ट होते हैं एवं अग्नि के ही दूसरे संयोग से उसी स्थान पर पाकज रूपादि से युक्त अवयवों से नवीन अवयवी की सृष्टि होती जाती है , अतः पके हुए एवं बिना पके हुए दोनों प्रकार के अवयव देखने में आते हैं । जिस समय कुछ अवयत्रों के विमाश से पहिले के अवयवी के विनाश की सम्भावना होती है , उसी समय अपूर्व अवयवों की उत्पत्ति भी होती है । इसके बाद दूसरे क्षण में पहिले अवयवी का नाश एवं दूसरे अवयवी की उत्पत्ति होती है ।

इस प्रकार आधार आधेयभाव और नियम दोनों की ही उपपत्ति होती है । जितने ही अवयव पहिले अवयवी के उत्पादक थे उतने ही अवयव नवीन अवयवी के भी उत्पादक हैं , अतः दूसरे अवयवी में पहिले अवयवी के समान ही संख्या एवं परिमाण का भी सम्बन्ध ठीक बैठता है ।

( पाकज रूपादि की उत्पत्ति की ) रीति यह है कि ( १ ) परमाणुओं में अग्नि के नोदन या अभिघात संयोग से परमाणुओं के विभक्त हो जाने से द्वयणुक के उत्पादक परमाणुओं के संयोग नष्ट हो जाते हैं । उसके बाद द्वयणुकों का नाश , व्यसरेणु के विनाश की सम्भावना , श्याम रूपादि के विनाश की सम्भावना , क्रिया से युक्त परमाणुओं में विभागजविभाग की उत्पत्ति की सम्भावना , रक्तरूपादि के उत्पादक अग्नि के संयोग की उत्पत्ति की सम्भावना , ये पाँच काम एक समय में होते हैं । ( २ ) उसके बाद एक ही समय में व्यसरेणु का विनाश , त्र्यसरेणु से बननेवाले अवयवों के नाश की सम्भावना , श्याम रूपादि का विनाश , विभागजविभाग की उत्पत्ति , संयोग के विनाश की सम्भावना , रक्त रूपादि के उत्पादक अग्निसंयोग की उत्पत्ति , रक्त रूपादि की उत्पत्ति की सम्भावना , श्यामरूपादि का नाश एवं अग्निसंयोग के विनाश की सम्भावना ये आठ काम होते हैं । ( ३ ) इसके बाद व्यसरेणु से उत्पन्न द्रव्य का विनाश , इस द्रव्य से उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना , उत्तरदेश संयोग के उत्पत्ति की सम्भावना ,

३४ रक्तरूपादि की उत्पत्ति , श्यामरूपादि के नाशक अग्नि के संयोग का विनाश , दूसरे ( पके हुए ) परमाणुओं में द्रव्य को उत्पन्न करनेवाली क्रिया की सम्भावना ये पाँच काम एक समय में होते हैं ।

( ४ ) इसके बाद व्यसरेणुजनित द्रव्य से उत्पन्न कार्यद्रव्य का विनाश , एवं इस कार्यद्रव्य से उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना , क्रिया और विभागजविभागों का विनाश , द्वितीय परमाणु के आकाश के साथ विभाग की उत्पत्ति , द्वितीय परमाणु एवं आकाश के पहिले संयोग के विनाश की सम्भावना ये छः काम एक समय में होते हैं । ( ५ ) इसके बाद प्रकृत कार्य का नाश होता है ।

इससे विनष्ट कार्यद्रव्य से उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना , एक परमाणु का दूसरे परमाणु के साथ उत्तरसंयोग की उत्पत्ति , ( पके हुए ) द्वघण्क की उत्पत्ति की सम्भावना , एवं विभाग और क्रिया के विनाश की सम्भावना ये छः काम एक समय में होते हैं ।

( ६ ) इसके बाद ( उक्त सम्भावित विनाश के प्रतियोगी ) कार्यद्रव्य का विनाश एवं इस कार्यद्रव्य से उत्पन्न कार्यद्रव्य के विनाश की सम्भावना , ( पके हुए ) द्वणुक की उत्पत्ति , द्वथणुक में उत्पन्न होनेवाले ( रक्त ) रूपादि गुणों की उत्पत्ति की सम्भावना , विभाग एवं क्रिया का विनाश ये छ : काम एक समय में होते हैं । इसके बाद अगले क्षण में दूसरे रक्त रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार नवीन घटादिके प्रयोजकीभूत और द्वयणुकों में भी कल्पना करनी चाहिए ।

संख्यानिरूपणम्

पृ. २६७

भाष्य १२२

एकादिव्यवहारहेतुः संख्या

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २६७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 342

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' यह एक है , ये दो हैं ' इत्यादि व्यवहारों का कारण ही ' संख्या ' है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

त्र्यणुकाद्युत्पत्तौ तु कर्म न चिन्तनीयम् , युगपद् बहूनां परमाणूनां संयोगादुत्पन्नेषु द्वयणुकान्तरकारणस्य परमाणोद्वर्घणुकान्तरकारणेन परमाणुना सह संयोगाद् द्व्यणुकस्य द्व्यणुकान्तरकारणपरमाणुना संयोग :, ततोऽपि द्रयणुकयोः संयोग इत्यनेन क्रमेण संयोगजसंयोगेभ्य एतेषामुत्पादात् । एवं यथोपदेशं यथाप्रज्ञं च व्याख्यातमस्माभिः ।

सिद्धे s पि सङ्ख्यास्वरूपे ये केचिदत्यन्तदुर्दर्शनाभ्यासतिरोहितबुद्धयो विप्रतिपद्यन्ते तान् प्रत्याह – एकादीति । व्यवहृतिर्व्यवहारो ज्ञेयज्ञानं व्यवह्रियतेऽनेनेति व्यवहारः शब्दः , एकादिव्यवहार एकं द्वे त्रीणीत्यादिप्रत्ययः शब्दश्च तयोर्हेतुः सङ्खयेति । एकं त्रीणीत्यादिप्रत्ययो विशेषणकृतो विशिष्टप्रत्ययत्वाद् दण्डीतिप्रत्ययवत् । एवं शब्दमपि पक्षीकृत्य विशिष्टप्रत्ययत्वादिति हेतुरवगन्तव्यः ।

नन्वयं प्रत्ययो रूपादिविषयः ? न तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात् । रूपनिमित्तो हि प्रत्ययो नीलं पीतमित्येवं स्यान्न त्वेकं द्वे इत्यादि । अस्तु तहि निर्विषयो रूपादिव्यतिरिक्तस्यार्थस्याभावात् । कुतोऽस्मिन्नेकद्वित्रीणीत्याMarat जातः ? आलयविज्ञानप्रतिबद्धवासनापरिपाकादिति चेत् ? नीलाद्याकारोऽपि तत एवास्तु , नहि ज्ञानारूढस्य तस्य सङ्ख्याकारस्य वा कश्चिदनुभवकृतो विशेषो ये कोऽर्थजोऽनर्थजश्चापर इति प्रतिपद्यामहे । अथायं विशेषोऽयमभ्रान्तो नीलाकारः , सङ्ख्याकारस्तु विप्लुत इति ।

तदसारम् , नीलाकारस्याप्यत्राभ्रान्तत्वे प्रमाणाभावात् । न तावत् क्वचिदस्यास्ति संवाद :: तदेकज्ञाननियतत्वात् क्षणिकत्वाच्च । अत एव नार्थक्रियापि । न च प्रत्येकं सर्वज्ञानेषु स्वाकारमात्रसमाहितेषु पूर्वापरज्ञानवर्तिनामाकाराणां सादृश्यप्रतिपत्तिरस्ति , येन तत्सदृशाकार प्रवाहोपलब्धिनिबन्धनः संवादो व्यवस्थाप्येत , नापि सदृशाकारोपलम्भ एव सर्वत्र , विलक्षणाकारोपलम्भस्यापि क्वचिद् भावात् ।

न चार्थजत्वादेव नीलाकारस्याभ्रान्तत्वसिद्धिः , अर्थस्याप्रतीतौ तज्जन्यत्वविनिश्चयायोगात् , अन्यतश्च प्रमाणादर्थप्रतीतावाकारकल्पनावैयर्थ्यात् , आकारसंवेदना देवार्थसिद्धयभ्युपगमे वा अभ्रान्ताकारसंवेदनादर्थसिद्धिः सिद्धे चार्थे तज्जन्यत्व विनिश्चयादाकारस्याभ्रान्तत्वमिद्धिरित्यन्योन्यापेक्षित्वम् । अबाधितत्वं च नीलाकारवज्ज्ञानारूढस्य सङ्ख्याकारस्याप्यस्ति , अर्थगतत्वेन च बाधाया असम्भवो नीलादिष्वपि दुरधिगमः , तेषां स्वरूपविप्रकृष्टत्वात् ।

तस्मादाकारमात्र संवेदनमेव सर्वत्र , न चेदेकत्राऽनर्थजोऽन्यत्रापि तथैवेति न नीलादिसिद्धिः । असति बाह्ये वस्तुनि स्वसन्तानमात्राधीनजन्मनो वासनापरिपाकस्य कादाचित्कत्वानुपपत्तौ तन्मात्र हेतोर्नीलाद्याकारस्य कादाचित्कत्वासम्भवान्नीलादिकल्पनेति चेत् , एकद्वित्र्याकारस्यापि बाह्यवस्त्वननुरोधिनो न कादाचित्कत्वमुपपद्यत इति सङ्ख्यापि कल्पनीया , उपपत्तेरुभयत्राप्यविशेषात् ।

यदपि द्रव्यव्यतिरिक्ता सङ्ख्या न विद्यते , भेदेनाग्रहणादित्युक्तम् , तदप्ययुक्तम् , परस्परप्रत्यासन्नानां वृक्षाणां दूरादेकत्वाद्यग्रहणेऽपि स्वरूपग्रहणस्य सम्भवात् । एवं रूपादिव्यतिरेकोऽपि व्याख्यातः , दूरे रूपस्याग्रहणेऽपि द्रव्यप्रत्ययदर्शनात् । चानेकद्रव्या चेति । एकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः सा एकद्रव्या । अनेकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः सा अनेकद्रव्या | ' च ' शब्दावेकद्रव्याने कद्रव्ययोरन्योन्यसमुच्चयं प्रदर्शयन्तौ प्रकारान्तराभावं कथयतः । तत्रैकद्रव्यानेकद्रव्ययोर्मध्ये एकद्रव्याया : सलिलादिपरमाणुरूपादीनामिव नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः यथा सलिलपरमाणौ रूपरसस्पर्शा नित्यास्तथैकत्वसङ्कायपि । यथा च कार्यसलिलस्य रूपादयोऽनित्या आश्रयविनाशाद्विनश्यन्ति कारणगुणप्रक्रमेण च निष्पद्यन्ते , तथैकत्वसङ्ख्यापि ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — यसरेणु की उत्पत्ति में क्रिया की चिन्ता अनावश्यक है , क्योंकि बहुत से परमाणुओं के संयोग से द्वयणुकों की उत्पत्ति हो जाने पर दूसरे द्रयणुक के कारणीभूत परमाणु का तीसरे द्वणुक के कारणीभूत परमाणु के साथ भी संयोग होगा । इस संयोग से एक द्वथणुक का दूसरे द्वणुक के कारणीभूत परमाणु के साथ भी संयोग होगा । परमाणु एवं द्वणुक के इस संयोग से इस परमाणु के कार्यरूप द्वयणुक एवं पहिले के द्वयणुक इन दोनों में संयोगजसंयोग होगा । इन द्वयणुकों के संयोगजसंयोग के द्वारा भी यसरेणु की उत्पत्ति हो सकती है । इस विषय में हमलोगों को जैसी शिक्षा है और जितनी बुद्धि हैं , तदनुसार व्याख्या लिखी है ।

संख्या को यद्यपि सभी लोग जानते हैं फिर भी अत्यन्त दुष्ट दर्शनों के अभ्यास से जिनकी बुद्धि मारी गयी है , वे इसमें भी विवाद ठानते हैं अतः उनको समझाने के लिए ही ' एकादि ' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । ' व्यवहृतिर्व्यवहार : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' व्यवहार ' शब्द का अर्थ ज्ञान है । एवं ' व्यवह्रियते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसी का शब्दप्रयोग अर्थ भी है । ( तदनुसार ) ' एकादिव्यवहारः ' अर्थात् एक , दो , तीन इत्यादि की प्रतीतियाँ एवं एक , दो , तीन इत्यादि शब्दों के प्रयोग इन दोनों की हेतु ही ' संख्या ' है । ( प्रतीति की हेतुता संख्या में इस प्रकार है कि ) जैसे कि ' दण्डी पुरुष : ' इस विशिष्ट प्रतोति के प्रति दण्ड केवल इसीलिए कारण है कि वह भी विशिष्ट प्रतीति ( अर्थात् विशेषण से युक्त विशेष्य की प्रतीति ) है , वैसे ही ' यह एक है , ये दो हैं ये तीन हैं ' इत्यादि प्रतीतियाँ भी विशिष्ट प्रतीति होने के कारण ही एकत्वादि संख्या रूप विशेषणों से उत्पन्न होती है । इसी प्रकार शब्द को पक्ष बनाकर विशिष्ट शब्दत्व को संख्या का साधक हेतु समझना चाहिए ' ।

( प्र ० ) ये ( ' एक , द्वो ' इत्यादि ) प्रतीतियाँ तो रूपादि विषयक हैं ? ( उ ० ! रूपादि विषयक प्रतीतियाँ ' यह नील है , यह पोत है ' इत्यादि आकारों की होती हैं , ' एकः द्वौ ' इत्यादि प्रतीतियाँ उनसे भिन्न आकार की हैं । अतः ये रूपादि विषयक नहीं हैं | ( प्र ० ) ( प्रत्यक्ष से दीखने वाले ) रूपादि पदार्थों से भिन्न किसी वस्तु की सत्ता नहीं है । अत : ' एकः द्वौ ' इत्यादि प्रतीतियाँ ( अगर रूपादि विषयक नहीं हैं तो फिर बिना विषय के ही ( निर्विषयक ) ही मानी जायँ ?

( उ ० ) तो फिर इस प्रताति में ' एकः द्वौ ' इत्यादि आकार किससे उत्पन्न होते हैं । ( प्र ० ) आलयविज्ञान में नियत रूप से सम्बद्ध वासना के परिपाक से ही ( उक्त आकार उत्पन्न होते हैं ) ( उ ० ) इस प्रकार तो नीलाकार पीताकारादि ज्ञान भी उस वासना से ही उत्पन्न होंगे ( फलतः निर्विषयक होंगे ) , क्योंकि ज्ञानों में सम्बद्ध संख्या के आकारों में एवं नीलादि के आकारों में कोई अन्तर नहीं है ।

अतः नीलादि विषयक प्रतीतियों को अर्थ ( नीलादि ) जन्य मानें एवं संख्या विषयक प्रतीति को अनर्थ ( केवल वासना ) जन्य मानें इसमें काई विशेष युक्ति नहीं है । ( प्र ० ) यही दोनों में अन्तर है कि नीलादि आकार अभ्रान्त हैं और संख्यादि आकार भ्रान्त हैं । ( उ ० ) यह समाधान ठीक नहीं है , क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि नीलादि आकार अभ्रान्त हैं । एवं प्रत्येक आकार क्षणिक है , अतः एक आकार नियमतः एक ही ज्ञान से गृहीत हो सकता है ।

सुतरामु नीलादि आकारों की अभ्रान्तता किसी प्रमाण से निश्चित नहीं हो सकती । प्रत्येक ज्ञान क्षणिक होने के कारण अर्थक्रियाकारी ( कार्यजनक ) होने पर भी नीलाकारादि का अभ्रान्तता का ज्ञापक प्रमाण नहीं हो सकता । ( प्र ० ) नीलादि आकारों के समूह ( प्रवाह ) का प्रत्येक आकार परस्पर भिन्न होते हुए भी सभी एक से हैं । इस सादृश्य के ज्ञान से इस ' संवाद ' का निश्चय होगा , अर्थात् यह निश्चय होगा कि अत्यन्त सदृश ये सभी ज्ञान अभ्रान्त नीलाकारादि से अभिन्न ज्ञानसमूह के हैं ।

इस संवाद निश्चय से सभी आकारों में अभ्रान्तत्व का निश्चय होगा । ( उ ० ) ( इस पक्ष के खण्डन में प्रथम युक्ति यह है कि ) ( १ ) प्रत्येक आकार अपने विलक्षण ज्ञान से ही गृहीत होता है , अत : आकार के समूहों में परस्पर सादृश्य का ग्रहण ही असम्भव है । ( २ ) यह बात भी नहीं कि सभी आकार सदृश ही उत्पन्न हों , क्योंकि कहीं कहीं एक ही वस्तु विभिन्न आकारों से भी गृहीत होती है ।

( ३ ) यह कहना भी सम्भव नहीं है कि चूँकि नीलादि आकार ' अर्थ ' से उत्पन्न होते हैं , अतः वे अभ्रान्त हैं , क्योंकि अर्थनिश्चय के बिना अर्थजन्यत्व का निश्चय सम्भव नहीं है । यदि अर्थ का निश्चय किसी और ही प्रमाण से मान लें तो फिर आकार की कल्पना व्यर्थ हो जाती है ।

अगर आकार के ही अभ्रान्त ज्ञान से अर्थ का निश्चय मानें तो अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य होगा , क्योंकि आकार के अभ्रान्त ज्ञान से अर्थ की सिद्धि होगी , एवं इसकी सिद्धि हो जाने पर आकार ज्ञान के अर्थजन्य होने के कारण उस में अभ्रान्तत्व को सिद्धि होगी । ( यदि आकार की अबाधित प्रतीति को ही नीलादि अर्थों का साधक माने तो फिर ) वह जिस प्रकार नीलादि आकार के विज्ञानों में है , वैसे ही संख्याविज्ञान के आकार मे भी है हो ।

( एवं बौद्धों के मत से ) नीलादि आकारों के बाधित न होने से भी उनकी सत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती , क्योंकि नीलादि आकारों की वस्तुतः सत्ता न रहने के कारण नीलादि आकारो के बाधित न होने को प्रतीत ही असम्भव है । अतः सभी जगह केवल आकार का ही ज्ञान होता है , उन ज्ञानों में अगर एक बिना अर्थ के ही होता है तो और ज्ञान भी बिना अर्थ के ही हो सकते हैं । संख्या के सम्बन्ध में इस प्रकार के आक्षेपों से नीलादि आकारों की सिद्धि भी सङ्कट में पड़ जायगी । ( प्र ० ) यदि

टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. २६८) १. अर्थात् जिस प्रकार ' दण्डी पुरुष : ' विशेष प्रकार के इस शब्द के प्रयोग में दण्ड कारण है उसी प्रकार एकः द्वौ त्रीणि ' इत्यादि प्रयोगों का भी कोई कारण अवश्य है | वही है संख्या ।

पृ. २७०

भाष्य १२३

सा पुनरेकद्रव्या चानेकद्रव्या च ।

तत्रैकद्रव्यायाः सलिलादिपरमाणुरूपादीनामिव नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः ! अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २७०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 345

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वह एकद्रव्या एकद्रव्य मात्र में रहनेवाली ) एवं अनेकद्रव्या ( अनेक ( द्रव्यों में ही रहने वाली ) भेद से दो प्रकार की है । इनमें एकद्रव्या संख्या के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय परमाणुरूप जल एवं कार्यरूप जल के रूपादि की तरह है । अनेकद्रव्या संख्या द्वित्व से लेकर परार्द्ध पर्यन्त है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अनेकद्रव्य तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता । द्वित्वमादिर्यस्याः सा द्वित्वादिका , परार्धोऽन्तो यस्याः सा परार्धान्ता । यस्मिन्नियत्ताव्यवहारः समाप्यते स परार्द्धः । एकद्रव्यवत्तया एकत्वसङ्ख्यायाः सकाशाद् द्वित्वादेरनेकवृत्तित्वविशेषप्रतिपादनार्थः ' तु ' शब्दः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — एवं सिद्धे सङ्ख्यास्वरूपे तस्या भेदं प्रतिपादयति - सा पुनरेकद्रव्या बाह्य वस्तुओं की सत्ता बिलकुल ही न मानी जाय तो अपने समुदाय मात्र से उत्पन्न होनेवाली वासना का परिपाक कभी होता है कभी नहीं , यह ' कादाचित त्व ' असम्भव हो जायगा । एवं केवल वासना के परिपाक से ही उत्पन्न होनेवाले नीलादि का कादाचित्कत्व भी अनुपपन्न हो जायगा । अतः नीलादि की कल्पना करते हैं । ( उ ० ) उसी प्रकार नीलादि आकारों की प्रतीति की तरह एकाकार द्वित्वाकार , त्रित्वाकारादि प्रतीतियों का भी कादाचित्कत्व की अनुपपत्ति के कारण समान युक्ति से संख्या की कल्पना भी आवश्यक है ।

कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) द्रव्य की प्रतीति को छोड़कर अलग से संख्या की कोई प्रतीति नहीं होती , अतः द्रव्य से भिन्न संख्या नाम की कोई वस्तु नहीं है । ( उ ० ) किन्तु यह कहना भी असत्य है , क्योंकि आपस में सटे हुए बृक्षों में संख्या का भान न होने पर भी उनके स्वरूपो ( द्रव्यों ) का ग्रहण होता है ' ।

इस प्रकार संख्या की सिद्धि हो जाने पर ' सा पुनः ' इत्यादि से इसके भेदों का निरूपण करते हैं । ' एकं द्रव्यमाश्रयो यस्या : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार एक द्रव्य में ही रहने वाली संख्या को ' एकद्रव्या ' कहते हैं । ' अनेकद्रव्यमाश्रयो यस्याः " इस विग्रह के अनुसार अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली संख्या को ' अनेकद्रव्या ' कहते हैं । दोनों ही ' च ' शब्द से एक द्रव्य और अनेक द्रव्य इन दोनों के समुच्चय का बोध होता है एवं इन दोनों से तीसरी तरह की संख्या की सम्भावना का खण्डन भी होता है । ' तत्र ' अर्थात् एकद्रव्या और अनेकद्रव्या इन दोनों प्रकारें की संख्याओं में , एकद्रव्या संख्या का निर्णय ( कार्यरूप ) जलादि और परमाणु रूप जलादि की तरह समझना चाहिए । अर्थात् जिस प्रकार जलादि के परमाणुओं के रूपरसादि नित्य हैं , वैसे ही उनमें रहनेवाली एकद्रव्या संख्या भी नित्य है । एवं जिस प्रकार कार्यरूप जलादि के रूप रसादि अनित्य हैं ( अर्थात् ) आश्रय के नाश से उनका नाश एवं कारणगुणक्रम से उत्पत्ति होती है , वैसे ही कार्यरूप जलादि में रहनेवाली एकत्व ( एकद्रव्या ) संख्या भी आश्रय के नाश से ) विनष्ट होती है , एवं ( कारणगुणक्रम से ) उत्पन्न भी होती है ।

' अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता ' ( इस वाक्य में प्रयुक्त ) ' द्वित्वादिका ' शब्द का अर्थ वह संख्या समूह है जिस समूह के पहिले व्यक्ति का नाम द्वित्व है , क्योंकि ' द्वित्वादिका ' इस समस्त वाक्य का विग्रह वाक्य ' द्वित्वमादिर्यस्याः ' इस प्रकार का है । जिस संख्या ( परम्परा ) की समाप्ति परार्द्ध में हो वही ( संख्यासमूह ) ' परार्द्धान्त ' शब्द का अर्थ है , क्योंकि ' परार्द्धान्ता ' इस समस्त वाक्य का विग्रह वाक्य ' परार्दोऽन्तं यस्या : ' इस प्रकार है | जहाँ संख्या के व्यवहार की समाप्ति हो उसी सख्या को ' परार्द्ध ' कहते हैं | एकत्व संख्या केवल एक ही द्रव्य में रहती है , द्वित्वादि संख्यायें अनेक द्रव्यों में ही रहती हैं , अनेकद्रव्या संख्या में एकद्रव्या संख्या से इसी अन्तर को समझाने के लिए प्रकृत वाक्य में तु ' शब्द है । वाक्य में प्रयुक्त ) ' खलु ' शब्द का प्रयोग इस अवधारण के लिए हुआ है कि अनेकद्रव्या संख्या अनेक एकत्व संख्याओं का समूहमात्र नहीं है , किन्तु अनेक एकत्वों से उत्पन्न होनेवाली ( एकत्व से भिन्न ) अनेकद्रव्या संख्या ।

टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. २७०) १. द्रव्य और संख्या अगर अभिन्न होती तो फिर टूटे हुए वृक्षों के स्वरूप का जहाँ ग्रहण होता है वहाँ वृक्ष से अभिन्न संख्या का भी ग्रहण अवश्य ही होता ।

पृ. २७२

भाष्य १२४

तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाद् विनाश इति ।

कथम् १ यदा बोद्धुश्चक्षुषा समानासमानजातीययोर्द्रव्योः सन्निकर्षे सति तत्संयुक्तसमवेतसमवेतैकत्वसामान्य ज्ञानो- त्पत्तावेकत्वसामान्य तत्सम्बन्धज्ञानेभ्य एकगुणयोरनेकविषयिण्येका

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २७२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 347

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अनेक एकत्व की बुद्धि एवं अनेक एकत्व इन सबों से इसकी उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) कैसे ( उ ० ) चक्षु के साथ सम्बद्ध उक्त दोनों द्रव्यों में से प्रत्येक में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली ' एक ' संख्या में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली एकत्व जाति का ज्ञान होता है । इसके हो जाने पर एकत्व सामान्य एवं इसके ( दोनों ' एक ' संख्या रूप गुणों के साथ ) सम्बन्ध एवं ( इन संख्यारूप गुणों में ) उस सामान्य का ज्ञान इन सबों से दोनों ' एक संख्याओं में अनेक ( एकसंख्या ) विषयक एक बुद्धि उत्पन्न होती

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धि सहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाद्विनाशः । खत्वित्यवधारणे तस्या एकत्वेभ्यो निष्पत्तिरेव , न त्वकैकगुणसमुच्चयमात्रत्वमित्यर्थः । एकत्वे चैकत्वानि चेति समासाश्रयणम् , अन्यथा द्वित्वोत्पत्तिकारणं न कथितं स्यात् । अनेकविषयबुद्धिसहितेभ्य इति । अनेकशब्द एको न भवतीति व्युत्पत्त्या द्वयोर्बहुषु च द्रष्टव्यः , अ विषयेषु या बुद्धिस्तत्सहितेभ्य इति 1 एतदेव प्रश्नपूर्वकं प्रतिपादयति कथमित्यादिना । यदा यस्मिन् काले बोद्धुरात्मनश्चक्षुषा समानजातीययोर्घटयो-

' तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धि विनाशाद्विनाश : ' ( इस रसमानजातीययोर्घटपटयोर्वा सन्निकर्षै संयोगे सति चक्षुः संयुक्तयोर्द्रव्ययोः प्रत्येकं समवेतौ यावेकगुणौ तयोः समवेतं यदेकत्वं सामान्यं तस्मिन् ज्ञानमुत्पद्यते । विशेषणज्ञानं विशेष्यज्ञानस्य कारणम् । एकगुणयोश्च विशेष्योरेकत्व सामान्यं विशेषणम् , तेनादौ तत्रैव ज्ञानं चिन्त्यते । न च प्रत्यासत्तिमन्तरेण चाक्षुषं ज्ञानं जायत इत्येकत्वसामान्यस्येन्द्रियेण संयुक्तसमवेतसमवायलक्षणः सम्बन्धो दर्शितः । एवं ज्ञानोत्पत्तौ भूतायामेकत्वसामान्यात् तस्यैकत्वस्यैकगुणाभ्यां सम्बन्धाज्ज्ञानाच्च एकगुणयोरनेकविषयिण्युभयैकगुणालम्बिन्येका बुद्धिरुत्पद्यत इति , एकं चक्षुरिन्द्रियमन्तःकरणेन युगपदुभयोरधिष्ठानासम्भवादेकस्यैव सर्वदा विषयग्राहकत्वे द्वितीयस्य कल्पना वैयर्थ्यात् । तस्योभाभ्यां गोलकाभ्यां रश्मयो निस्सरन्ति विषयैश्च सह सम्बन्ध्यन्ते , प्रदीपस्येव गुहान्तर्गतस्य गवाक्षविवराभ्याम् । तत्रान्तःकरणं साक्षाच्चक्षुरधितिष्ठति , न विषयसम्बन्धात् , बहिर्निर्गमनाभावात् , चक्षुरधिष्ठानादेव च तस्य सम्बन्धा ज्ञानोत्पत्तिहेतवः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — स्वतन्त्र ) ही है । ' एकत्वेभ्य : ' इस पद की निष्पत्ति के लिए ' एकत्वे च एकत्वानि च ' इसी समास का अवलम्बन करना चाहिए , ऐसा न करने पर ( ' एकत्वञ्च एकत्वञ्च एकत्वञ्च एकत्वानि ' ऐसा समास मानने पर ) ' एकत्वेभ्य : ' इस पद से द्विश्व के कारणीभूत दो एकत्वों में द्वित्व की कारणता नहीं कही जायगी ।

' अनेकविषयबुद्धिसहितेभ्य : ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' अनेक ' शब्द से दो एवं उससे आगे की सभी संख्याओं का बोध होता है , क्योंकि ' अनेक ' शब्द की ' एको न भवति ' इस प्रकार की व्युत्पत्ति है । अनेक विषयों में जो ( अनेक एकत्वों की ) बुद्धि है , उससे ( द्वित्वादि ) अनेकद्रव्या संख्याओं की उत्पत्ति होती है । ' कथम् ' इस पद के द्वारा प्रश्न कर इसी विषय को समझाने का उपक्रम करते हैं I ।

' यदा ' अर्थात् जिस समय ' बोद्धुः ' अर्थात् आत्मा को आँखों से समान जाति के दो द्रव्यों में अर्थात् दो घटों में ( अथवा ) असमानजातीय दो द्रव्यों अर्थात् घट और पट के ' संनिकर्ष ' अर्थात् संयोग होने के बाद कथित समानजातीय एवं असमानजातीय दोनों प्रकार के दोनों द्रव्यों के प्रत्येक में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली एकत्वसंख्यागत जाति रूप एकत्व ( अर्थात् एकत्वत्व ) का ज्ञान होता है । विशेषण का ज्ञान विशेष्यज्ञान विशिष्ट ज्ञान ) का कारण है ।

संख्यारूप दोनों एकत्वों से अभिन्न विशेष्य का जातिरूप एकत्व एकत्वस्व ) विशेषण है , अतः सब से पहिले उसी का विचार करते हैं । ( विषयों के साथ ) चक्षु का सम्बन्ध रहे बिना चाक्षुष ज्ञान नहीं हो सकता , अतः सब से पहिले जातिरूप एकत्व के साथ ( चक्षु का ) संयुक्तसमवेतसमवायरूप सम्बन्ध ही दिखलाया गया है ।

इस प्रकार जाति रूप एकत्वविषयक ज्ञान की उत्पत्ति हो जाने पर उस सामान्य का अपने आभयों के साथ सम्बन्ध एवं इस सम्बन्ध के ज्ञान , इन दोनों से दोनों ' एक ' नाम की संख्याओं में ( अलग अलग ) ' एक ' ( संख्या ) गुण विषयक एकबुद्धि ( अर्थात् ' अयमेकः ' अयमेक : ' इस आकार ) को बुद्धि की उत्पत्ति होती है । एक ही समय एक ही चक्षुरिन्द्रिय अन्तःकरण के द्वारा दो विषयों का अधिष्ठान नहीं हो सकती । एवं अगर एक ही चक्षु से प्रत्यक्ष की उत्पत्ति मानें तो दूसरे चक्षु की कल्पना हो व्यर्थ हो जायगी ।

अतः ( यही जानना पड़ेगा कि ) जिस प्रकार गवाक्ष के छिद्रों से घर के भीतर के दीप की रश्मियाँ घटादि के साथ सम्बद्ध होती हैं , उसी प्रकार चक्षु के दोनों गोलकों से रश्मियाँ निकल कर विषयों के साथ सम्बद्ध होती हैं । अन्तःकरण का साक्षात् सम्बन्ध चक्षु के साथ ही होता हैं , विषयों के साथ नहीं । क्योंकि वह किसी भी प्रकार बाहर नहीं निकल सकता । ( विषयों सेसम्बद्ध ) चक्षु स्वरूप

पृ. २७४

भाष्य १२५

बुद्धिरुत्पद्यते तदा तामपेक्ष्यैकत्वाभ्यां स्वाश्रययोद्वित्वमारभ्यते ।

ततः पुनस्तस्मिन् द्वित्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते ।

तस्माद् द्वित्वसामान्यज्ञानाद-

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २७४प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 349

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — है ( इसे ही अपेक्षाबुद्धि कहते हैं ) । उस समय उसी बुद्धि की ' अपेक्षा ' करके उन दोनों एकत्व नाम के गुणों से उनके आश्रयरूप दोनों द्रव्यों में द्वित्व संख्या की उत्पत्ति होती है । इसके बाद द्वित्व संख्या में द्वित्वसामान्य ( द्वित्वत्व ) का ज्ञान उत्पन्न होता है । द्वित्वसामान्यविषयक इस ज्ञान से

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

एवं च सति युगपदनेकेषु विषयेषु ज्ञानं भवत्येव , कारणसामर्थ्यात् । तच्च भवदेकमेव प्रभवति , आत्मान्तःकरणसंयोगस्यैकस्यैकज्ञानोत्पत्तावेव सामर्थ्यात् । अत एव सविकल्पोत्पत्तिरपि , युगदभिव्यक्तेष्वनेकसङ्केतविषयेषु संस्कारेषु स्मृतिहेतुष्वात्मान्तःकरणसंयोगस्य सामर्थ्यादेकस्यानेकविषयस्मरणस्योत्पादात् । यदि नामानेकगुणालम्बनेका बुद्धिरुपजाता ततः किमेतावता ? तदेतां बुद्धिमपेक्ष्यैकत्वाभ्यामेकगुणाभ्यां स्वाश्रयोर्द्रव्ययद्वित्वमारभ्यते ।

स्वाश्रययोः समवायिकारणत्वम् , एकगुणयोरसमवायिकारणत्वम् , अनेक विषयाया बुद्धेनिमित्तकारणत्वम् । यदैकगुणयोरेका बुद्धिरुत्पद्यते तदेकत्वाभ्यां द्वित्वमारभ्यत इत्येककालनिर्देशः क्षणद्वयात्मकलवाख्यकालाभिप्रायेण । क्षणाभिप्रायेण तु कालभेद एव , कार्यकारणयोः पूर्वापरकालभावात् । ज्ञानादर्थस्योत्पाद इति नालौकिकमिदं सुखादीनां तस्मादुत्पत्तिदर्शनात् । बाह्यार्थस्योत्पादो न दृष्ट इति न वैधर्म्यमात्रम् , तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वस्योभयत्राविशेषात् ।

उभयगुणालम्बनस्य द्वित्वाभिव्यञ्जकत्वे सिद्धे सति ज्ञानस्य तदा नानन्तर्य्यनियमोपपत्तिरिति चेन्न , अनियमप्रसङ्गात् । यदि हि द्वित्वमबुद्धिजं स्याद्रूपादिवत्पुरुषान्तरेणापि प्रतीयेत , नियमहेतोरभावात् । बुद्धिजत्वे तु यस्य बुद्धया यज्जन्यते तत् तेनैवोपलभ्यत इति नियमोपपत्तिः । प्रयोगस्तु द्वित्वं बुद्धिजं नियमेनैकप्रतिपत्तृवेद्यत्वाद् , यन्नियमेनैकप्रतिपत्तवेद्यं तद् बुद्धिजं यथा सुखादिक्रम् । नियमेनैकप्रतिपत्तवेद्यं च द्वित्वं तस्मादिदमपि बुद्धिजम् ।

एवं द्वित्वस्योत्पन्नस्य प्रतीतिकारणं निरूपयति - ततः पुनरिति । ततो द्वित्वोत्पादादनन्तरं द्वित्वसामान्ये तस्मिन् ज्ञानमुत्पद्यते । अत्रापि संयुक्तसमवाय एव हेतुः । एकत्वसामान्यापेक्षया पुनरिति वाचोयुक्तिः । द्वित्वसामान्यं द्वित्वगुणस्य विशेषणम् , न चागृहीते विशेषणे विशेष्ये बुद्धिरुदेति , अतो विशेष्यविज्ञानकारणत्वेनादौ सामान्यज्ञानं निरूपितम् । अस्य सद्भावेऽपि द्वित्वसामान्यविशिष्टा द्वित्वबुद्धिरेव प्रमाणम् । तस्याः सद्भावेऽपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं प्रमाणम् । द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं विशेषणज्ञानपूर्वकं विशिष्टज्ञानत्वाद् दण्डीति ज्ञानवदित्यनुमिते गुणज्ञाने तस्यापि विशिष्टज्ञानत्वेन विशेषणज्ञानपूर्वकत्वमनुमेयम् ।

येतु विशेषणविशेष्ययो रे कज्ञानालम्बनत्वमाहुः , तेषां सुरभि चन्दनमित्यत्र का वार्त्ता ? नहि चक्षुर्गन्धविषयं न च घ्राणं द्रव्यमादत्ते । अत एव न ताभ्यां सम्बन्धग्रह्णम् , उभयसम्बन्धिग्रहणाधीनत्वात् सम्बन्धग्रहणस्य । यथा संस्कारेन्द्रियजन्यं प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षमुभयकारणसामर्थ्यात्पूर्वापरकालविषयम् , एवं चक्षुर्घा - णाभ्यां सम्भूय जन्यमानमिदं कारणद्वयसामर्थ्यादुभयविषयं स्यादित्येके समर्थयन्ति ।

तदपि न साधीयः , निर्भागत्वात् । यदि ज्ञानं सभागं स्यात्तदा कश्चिदस्यांशो घ्राणेन जन्येत कश्चिच्चक्षुषेत्युपपद्यते व्यवस्था , किन्त्विदमेकमखण्ड मुभाभ्यां जनितं यदि गन्धं द्रव्यं च गृह्णाति , तदा गन्धोऽपि चाक्षुषो द्रव्यमपि घ्राणगम्यं प्रसक्तम् , तज्जनितज्ञानविषयत्वलक्षणत्वात्तदिन्द्रियग्राह्यतायाः । न चाणुत्वान्मनसो युगपदुभयेन्द्रियाधिष्ठानसम्भवः ।

तस्माद् घ्राणेन गन्धे गृहीते पश्चात्तद्ग्रहणसहकारिणा चक्षुषा केवलविशेष्यालम्बनमेवेदं विशेष्यज्ञानं जन्यत इत्यकामेनाप्यभ्युपगन्तव्यम् । तथा च सत्यन्येषामपि विशेष्यज्ञानानामयं न्याय उपतिष्ठते । विवादाध्यासितं विशेष्यज्ञानं , केवलविशेष्यालम्बनं , प्रत्यक्षत्वे सति विशेष्यज्ञानत्वात् , सुरभि चन्दनमिति ज्ञानवत् । प्रत्यक्षत्वे सतीति लैङ्गिकज्ञानव्यवच्छेदार्थम् । ननु यदि द्रव्यस्वरूपमात्रमेव विशेष्यज्ञानस्यालम्बनम् असत्यपि विशेषणे तथा प्रत्ययः स्यात् ।

अथ विशेषणस्य जनकत्वान्न तदभावे विशेष्यज्ञानोदय :, तथापि द्रव्यरूपप्रत्ययादस्य न विशेषः , विषयविशेषमन्तरेण ज्ञानस्य विशेषान्तराभावात् न , अनभ्युपगमात् । न विशेष्यज्ञानस्य द्रव्यस्वरूपमात्रमालम्बनं ब्रूमः , किन्तु विशिष्टम् । विशिष्टता च स्वरूपातिरेकिण्येव , या दण्डीति ज्ञाने प्रतिभासते । न खलु तत्र पुरुषमात्रस्य प्रतीतिर्नापि दण्डसंयोगितामात्रस्य । तथा च दण्डीति प्रतीतावितरविलक्षण एव पुरुषः संवेद्यते । वैलक्षण्यं चास्य दण्डोपसर्जनत्वमेव । अत एव विशेषणं व्यवच्छेदकमिति गीयते ।

दण्डो हि स्वोपसर्जनताप्रतिपत्त पुरुषे कुर्वन् पुरुषमितरस्माद् व्यवच्छिनत्ति । अयमेव चास्योपलक्षणाद्विशेषः । उपलक्षणमपि व्यवच्छिनत्ति , न तु स्वोपसर्गनताप्रतीतिहेतुः । नहि यथा दण्डीति दण्डोपसर्जनता पुरुषे प्रतीयते तथा जटाभिस्तापस इति तापसे जटोपसर्जनता , दण्डोपसर्जनतापुरुषस्य प्राधान्यं चार्थक्रियायामुपभोगातिशयाऽनतिशयापेक्षया । नन्वेवं तर्ह्यपेक्षिकोऽयं विशेषणविशेष्यभावो न वास्तवः किं न दृष्टो भवद्भिः कर्तृकरणादिव्यवहार आपेक्षिको वास्तवश्चेति कृतं विस्तरेण संग्रहटीकायाम् ।

द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेविनश्यत्ता । उभयकगुणालम्बना बुद्धिरपेक्षाबुद्धिरित्युच्यते । तस्या द्वित्वसामान्यज्ञानाद्विनश्यता विनाशकारणसान्निध्यं द्वित्वसामान्यात् । तस्य द्वित्वगुणेन सह सम्बन्धाज्ज्ञानाच्च द्वित्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमानता उत्पत्तिकारणसान्निध्यम् । द्वित्वसामान्यज्ञानमपेक्षाबुद्धे विनाशकं गुणबुद्धेश्चोत्पादकम् । तेन तदुत्पत्तिरेवैकस्य विनश्यता परस्य चोत्पद्यमानत्युपपद्यते विनश्यत्तोत्पद्यमानतयोरेककालत्वम् । तत इदानीमपेक्षाबुद्धिविनाशो द्वित्वविनाशस्य कारणम् , तत्सद्भावे तस्यानुपलम्भात् । अतोऽपेक्षा बुद्धिविनाशो द्वित्वस्य विनश्यत्ता । दृष्टो गुणानां निमित्तकारणादपि विनाशो यथा मोक्षप्राप्त्यवस्थायामन्त्यतत्त्वज्ञानस्य शरीरविनाशात् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ३५ अधिष्ठान के साथ अन्तःकरण का सम्बन्ध ही ज्ञान का कारण है । ऐसी स्थिति में अनेक विषयों का ज्ञान सुलभ होगा , क्योंकि अनुरूप कारणों का संवलन है । अनेक विषयों का यह एक ही ज्ञान हो सकता है , क्योंकि आत्मा और अन्तःकरण के एक संयोग में एक ही ज्ञान को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है ।

इसी हेतु से सविकल्पोत्पत्ति अर्थात् अनेक विषयों की एक स्मृति की उत्पत्ति भी सङ्गत होती है , क्योंकि पहिले का अनुभव जितने विषयों का होगा उससे संस्कार भी उतने ही विषयक उत्पन्न होंगे । इसके अनुसार अनेकविषयक या एकविषयक अनुभव से जहाँ स्मृति में कारणीभूत अनेक विषयक संस्कार उत्पन्न होते हैं , एवं एक ही समय उबुद्ध होते हैं , वहीं अनेक विषयों की एक ही स्मृति उत्पन्न हो सकती है , चूंकि आत्मा और अन्तःकरण के उक्त संयोग में उक्त प्रकार के स्मरण को भी उत्पन्न करने का सामर्थ्यं है ।

( प्र ० ) अनेक विषयक एक बुद्धि की यदि उत्पत्ति मान ली गयी तो प्रकृत में इसका क्या उपयोग है ? ( उ ० ) यही उपयोग है कि अनेक विषयक एक बुद्धि की सहायता से दो संख्याविषयक एक बुद्धि ( ' अयमेकः , अयमेक : ' इस प्रकार की एक बुद्धि ) उत्पन्न होती है । उक्त रीति से ज्ञात इन्हीं दो एकत्वों से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । दोनों एकत्वों के आश्रयीभूत दोनों द्रव्य द्वित्व के समवायिकारण हैं । दोनों एकत्व संस्थायें असमवायिकारण हैं ।

दोनों एकत्व रूप अनेकविषयक एकबुद्धि ( अपेक्षा बुद्धि ) निमित्त - कारण है । जिस समय दोनों एकत्व संख्याओं की एकबुद्धि ( अपेक्षाबुद्धि ) उत्पन्न होती है , उसी समय दोनों एकत्वसंख्याओं से द्वित्व की उत्पत्ति होती । इसी अभिप्राय से ' इत्येकः कालः ' इस वाक्य से एककाल का निर्देश किया गया है । इस निर्देश वाक्य के ' एक काल ' शब्द से दो क्षणात्मक ' लव ' रूप काल अभिप्रेत है ।

क्षणात्मक काल के अनुसार वस्तुतः वे क्रियायें क्रमशः हो होती हैं , क्योंकि कारण को पहिले एवं कार्य को पीछे रहना आवश्यक है । ज्ञान से वस्तु की उत्पत्ति कोई अलौकिक घटना नहीं है , क्योंकि ज्ञान से सुखादि की उत्पत्ति देखी जाती है । ' ज्ञान से बाह्य वस्तु की सृष्टि नहीं होती है ' यहकहना केवल बाह्य और आन्तर दोनों वस्तुओं के भेद को ही प्रकट करता है , क्योंकि दोनों ही प्रकार की अवस्थाओं के साथ ज्ञान को अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही समान रूप से देखे जाते हैं ।

( प्र ० ) ( द्वित्व के ) दोनों आश्रयों में रहनेवाले दोनों एकत्वों से द्वित्व की उत्पत्ति हो ही जायगी , फिर उस के लिए अपेक्षाबुद्धि को भी कारण मानने की क्या आवश्यकता है ? ( उ ० ) द्वित्व को अगर बुद्धिजन्य न मानें तो साधारण्यरूप अनियम की आपत्ति होगी , क्योंकि रूपादि साधारण विषयों की तरह सभी द्वित्व सभी पुरुषों से गृहीत नहीं होते , किन्तु जिस पुरुष की अपेक्षा बुद्धि से जिस द्वित्व की उत्पत्ति होती , वह द्वित्व उसी पुरुष से गृहीत होता है और किसी पुरुष से नहीं ।

इस प्रकार द्वित्व असाधारण है , साधारण नहीं । अतः अपेक्षाबुद्धि भी द्वित्व का कारण है । ( इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि ) नियमतः सुखादि की तरह जो कोई भी वस्तु नियमतः किसी एक ही पुरुष के द्वारा गृहीत होती है , उसकी उत्पत्ति अवश्य ही बुद्धि से होती है । द्वित्व का ग्रहण भी किसी एक ही पुरुष से होता है , अतः द्वित्व भी बुद्धि से उत्पन्न होता है ।

इस प्रकार से उत्पन्न द्वित्व के प्रत्यक्ष के कारणों का निरूपण ' ततः पुनः इत्यादि ग्रन्थ से करते हैं । ' ततः ' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति के बाद , ' तस्मिन् ' अर्थात् संख्या रूप द्वित्व में जाति रूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) का ज्ञान उत्पन्न होता है । जाति स्वरूप इस द्वित्व के प्रत्यक्ष में संयुक्तसमवेतसमवाय सम्बन्ध ही कारण है ।

( द्वित्व के आश्रयीभूत दोनों द्रव्यों में अलग अलग ) पहिले एकत्व ही था , उसके बाद द्वित्व की उत्पत्ति हुई- - इस आनन्तर्य को समझाने के लिए ही ' पुनः ' शब्द का प्रयोग है । जातिरूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) संख्यारूप द्वित्व का विशेषण है । विशेषण का ज्ञान विशेष्य ( विशिष्ट ) ज्ञान का कारण है , अतः बिना विशेषण ज्ञान के विशेष्य ( विशिष्ट ) ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इसी लिए सब से पहिले सामान्य रूप द्वित्व के ज्ञान का ही निरूपण किया गया है ।

जातिरूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) विशिष्ट संख्यारूप द्वित्व का ज्ञान सर्वजनीन है , इसी से प्रमाणित होता है कि जातिरूप द्वित्व का भी अस्तित्व है । एवं ' द्वे द्रव्ये ' इत्यादि आकार की विशिष्ट अनुभूतियों से ही संख्यारूप द्वित्व की सत्ता प्रमाणित होती है ।

इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि जिस प्रकार ' दण्डी पुरुष : ' यह विशिष्ट बुद्धि केवल विशिष्ट बुद्धि होने के कारण हो दण्डरूप विशेषण की सत्ता के बिना नहीं हो सकती , उसी प्रकार ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार की विशिष्ट बुद्धि भी केवल विशिष्ट बुद्धि होने के कारण ही संख्यात्मक द्वित्व रूप विशेषण के अस्तित्व के बिना सम्भव नहीं है । अतः द्वित्व संख्या की सत्ता अवश्य है ।

द्वित्व संख्या की इस प्रकार से अनुमिति हो जाने पर ' इस अनुमिति की भी उत्पत्ति विशिष्ट बुद्धि होने के कारण ही जातिरूप द्विज विशेषण की अस्तित्व के बिना सम्भव नहीं है , अतः जातिरूप द्वित्व की भी सत्ता अवश्य है ' इस प्रकार द्वित्व संख्या की अनुमिति के बाद जातिरूप द्वित्व का भी उक्त रीति से अनुमान करना चाहिए ।

जो कोई विशेष्य और विशेषण दोनों को ( नियमतः ) एक ही ज्ञान का विषय मानते हैं , उनके सामने ' सुरभि चन्दनम् ' इस ज्ञान का प्रसङ्ग रखना चाहिए , क्योंकि गन्ध का ग्रहण आँखों से नहीं होता , एवं घ्राण में द्रव्य को ग्रहण करने की शक्ति नहीं है । अत एव सौरभ और चन्दन इन दोनों का ग्रहण भी इन दोनों इन्द्रियों से नहीं हो सकता , क्योंकि सम्बन्ध के प्रत्यक्ष के लिए उनके दोनों आश्रयों का प्रत्यक्ष आवश्यक है । कोई कहते हैं कि ' सुरभि चन्दनम् ' यह एक ही ज्ञान चक्षु और घ्राण दोनों इन्द्रियों से होता है । इसका समर्थन इस प्रकार करते हैं कि जिस प्रकार ( योऽहं घटमद्राक्षं सोऽहमिदानीं स्मरामि ) इत्यादि आकार की प्रत्यभिज्ञारूप प्रत्यक्ष इन्द्रिय से उत्पन्न होने के कारण वर्तमान काल विषयक होता हैं , एवं संस्कार से उत्पन्न होने के कारण भूतकाल विषयक भी होता है , इस प्रकार ' सुरभि चन्दनम् ' यह ज्ञान अलग अलग सामर्थ्य वाली चक्षु और घ्राण इन दोनों इन्द्रियों से उत्पन्न होने के कारण द्रव्य एवं सौरभ दोनों विषयों का हो सकता है ।

किन्तु इस प्रकार का समर्थन संगत नहीं है , क्योंकि ज्ञान अखण्ड है , उसके अंश नहीं होते । यदि ज्ञान अंशों से युक्त होता तो यह कह सकते थे कि उसका एक अंश आँखों से उत्पन्न होता है तो दूसरा घ्राण से ।

अतः ज्ञान अगर अखण्ड है और उसकी उत्पत्ति दो इन्द्रियों से होती है , एवं सौरभ और द्रव्य दोनों उसके विषय हैं तो फिर यह मानना ही पड़ेगा कि गन्ध का ग्रहण भी आंख से होता है , एवं घ्राण से द्रव्य भी गृहीत होता है , क्योंकि जिस इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान से जिसका प्रतिभास होता है , वही उस इन्द्रिय का ग्राह्य विषय है ।

दूसरी बात यह है कि मन अणु है , अतः एक ही समय वह दो इन्द्रियों का अधिष्ठान नहीं हो सकता , अतः इच्छा न रहते हुए भी प्रकृत में आप को यही मानना पड़ेगा कि घ्राण के द्वारा केवल गन्ध का ग्रहण हो जाने के बाद उसके सहकारी चक्षु के द्वारा केवल विशेष्य विषयक ( चन्दन विषयक ) ज्ञान उत्पन्न होता है ।

इस प्रकार यही रीति अन्य विशेष्य ज्ञानों के लिए भी प्रयुक्त होती है | इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार ' सुरभि चन्दनम् ' यह ज्ञान प्रत्यक्षात्मक होने पर भी केवल विशेष्य विषयक ज्ञान है , उसी प्रकार प्रकृत में विवाद का विषय ' द्वे द्रव्ये ' यह ज्ञान भी केवल विशेष विषयक ही है , क्योंकि वह भी प्रत्यक्षात्मक होने पर भी विशेष्य ज्ञान है । प्रकृत अनुमान वाक्य के प्रयोग के हेतु वाक्य में ' प्रक्षत्वे सति ' यह विशेषण अनुमिति में व्यभिचार वारण के लिए है ।

( प्र ० ) यदि ' द्वे द्रव्ये ' इस विशेष्य ( विशिष्ट ) ज्ञान का विषय केवल द्रव्य ही हो तो फिर विशेषण के न रहने पर भी उक्त प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । यदि यह कहें कि विशेषण विशेष्यज्ञान का कारण है , अतः विशेषण के न रहने पर विशिष्टज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है , तथापि केवल ' द्रव्यम् ' इस आकार के ज्ञान में और उक्त विशिष्टज्ञान में कोई अन्तर नहीं रहेगा , क्योंकि कारणों की विभिन्नता रहते हुए भी दोनों ज्ञानों के विषयों में कोई अन्तर नहीं है ।

विषयों के भेद से ही ज्ञानों में भेद होता है कारणों के भेद से नहीं । ( उ ० ) हम यह नहीं मानते कि ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान में केवल द्रव्य ही विषय है । किन्तु ' विशेष्य ' ( विशिष्ट ) को उक्त ज्ञान का विषय मानते हैं । ' दण्डी ' इस प्रकार की विशिष्ट प्रतीति में भासित होने वाली विशिष्टता विशेष्य ( विशिष्ट ) के स्वरूप से कोई भिन्न वस्तु नहीं है । ' दण्डी ' इस प्रतीति के दण्ड से रहित पुरुषों के विलक्षण पुरुष का ही बोध होता है ।

और पुरुषों से इस पुरुष में यही वैलक्षण्य है कि यह दण्डरूप विशेषण का विशेष्य है , और कुछ भी अन्तर नहीं है । अत एव विशेषण को व्यवच्छेदक ( भेदक ) कहा जाता है । पुरुष में अपनी ( दण्ड की ) विशेष्यता की प्रतीति एवं इस पुरूष को और पुरुषों से भिन्न में समझना ये ही दो काम यहाँ दण्डरूप विशेषण के हैं । विशेषण और उपलक्षण इन दोनों में यही अन्तर है कि उपलक्षण

पृ. २७९

भाष्य १२६

पेक्षा बुद्धेविनश्यता , द्वित्व सामान्यतत्सम्बन्धतज्ज्ञानेभ्यो द्वित्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः ।

तत इदानीमपेक्षा बुद्धिविनाशाद् द्वित्वगुणस्य विनश्यत्ता , द्वित्वगुणज्ञानम् , द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणम् , द्वित्वगुणतज्ज्ञानसम्बन्धेभ्यो द्वे द्रव्ये इति द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २७९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 354

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अपेक्षाबुद्धि के विनाश की सम्भावना उत्पन्न होती है । द्वित्व संख्या रूप गुण का द्वित्वसामान्य के साथ सम्बन्ध और द्वित्व गुण में द्वित्वसामान्य का ज्ञान इन सबों से गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की उत्पत्ति की सम्भावना , इतने काम एक काल में होते हैं । इसके बाद उसी समय अपेक्षाबुद्धि के विनाश से गुणरूप द्वित्व के विनाश की सामग्री का संवलन , गुणरूप द्वित्व का ज्ञान , सामान्यरूप द्वित्व विषयक ज्ञान के विनाशक गुणरूप द्वित्व का ज्ञान , गुणरूप दित्व और उसका ज्ञान एवं गुणरूप द्वित्व का ( अपने आश्रय द्रव्य के साथ ) सम्बन्ध इन तीनों से ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार के द्रव्य विषयक ज्ञान की सामग्री का

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अपने आश्रय को दूसरों से भिन्न रूप में समझाता तो है , किन्तु उसमें अपनी उपसर्जनता की प्रतीति को उत्पन्न नहीं करता , क्योंकि ' दण्डी ' इस प्रतीति से जिस प्रकार पुरुष में दण्डरूप विशेषण की उपसर्जनता प्रतीत होती है , उसी प्रकार ' जटाभिस्तापसः ' इस प्रकार के स्थलों में जटादि से युक्त तापसादि को जटा से शून्य तापसादि से विलक्षण रूप में भान यद्यपि होता है , फिर भी जटादि उपलक्षणों की उपसर्जनता की प्रतीति तापसादि में नहीं होती । दण्ड से युक्त ( दण्डी ) पुरुष में दण्ड से रहित पुरुष की अपेक्षा विशेष प्रकार का उपभोग मिलता है , इसी दृष्टि से दण्डी पुरुष में प्रधानता और दण्ड में उपसर्जनता है । ( प्र ० ) तो फिर यह कहिये कि विशेष्यविशेषणभाव आपेक्षिक हैं , वास्तविक नहीं ? ( उ ० ) क्या आप लोगों ने कर्तृत्वकरणत्वादि के आपेक्षिक है , वास्तविक दोनों प्रकार के व्यवहार नहीं देखे है ? टीकादि रूप संग्रह ग्रन्थों में इससे अधिक लिखना व्यर्थ है ।

( द्वित्व सामान्यज्ञानादपेक्षा बुद्धेविनश्यत्ता ) । गुणस्वरूप दो एकत्वों को विषय करनेवाले एक ज्ञान को ' अपेक्षाबुद्धि ' कहते हैं । जातिस्वरूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) के ज्ञान से उसकी ( अपेक्षा बुद्धि की ) ' विनश्यत्ता ' अर्थात् उसको विनष्ट करनेवाले कारणों की समीपता संघटित होती है , ( फलतः विनाश को उत्पन्न करनेवाली सामग्री का संवलन होता है ) ।

जातिरूप द्वित्व का गुणस्वरूप द्वित्व के साथ सम्बन्ध एवं इस सम्बन्ध का ज्ञान इन दोनों से गुणस्वरूप द्वित्व की ' उत्पद्यमानता ' अर्थात् द्वित्व संख्या को उत्पन्न करने वाले कारणसमूह परस्पर समीप हो जाते हैं , ( द्वित्वोत्पत्ति की सामग्री एकत्र हो जाती है ) ।

जातिरूप द्वित्व ( द्विश्वत्व ) का ज्ञान अपेक्षाबुद्धि का नाशक एवं गुणस्वरूप द्वित्व ( संख्या ) विषयक बुद्धि का उत्पादक भी है , अतः जातिरूप द्वित्व विषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक ( अपेक्षा बुद्धि ) की ' विनश्यत्ता ' एवं दूसरे ( गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि ) की उत्पद्यमानता दोनों ही है । सुतराम् उक्त विनश्यत्ता एवं उक्त उत्पद्यमानता दोनों का एक ही समय रहना युक्ति से सिद्ध है ( असङ्गत नहीं ) ।

उसके बाद के क्षण में अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है , यही ( नाश ) द्वित्व के नाश का कारण है , क्योंकि अपेक्षाबुद्धि के विनाश के बाद द्वित्व की उपलब्धि नहीं होती है , अत : अपेक्षा बुद्धि का विनाश ही द्वित्वबुद्धि की ' विनश्यत्ता ' है । जिस प्रकार मोक्षप्राप्ति की अवस्था में शरीर रूप निमित्तकारण के विनाश से अन्तिम तत्त्वज्ञानरूप गुण का विनाश होता है , उसी प्रकार ( यह मानना पड़ेगा कि ) निमित्तकारण के विनाश से भी अन्य गुणों का विनाश होता है ।

पृ. २८१

भाष्य १२७

तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो द्वित्वस्य विनाशो द्वित्वगुणबुद्धेर्विनश्यत्ता द्रव्यज्ञानात् संस्कारस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः ।

तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् द्वित्वगुणबुद्धेविनाशो द्रव्यबुद्धेरपि संस्कारात् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २८१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 356

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संवलन , द्रव्यज्ञान से उसी विषयक संस्कार की उत्पादक सामग्री का संवलन - इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद उक्त द्रव्य विषयक ज्ञान से गुणरूप द्वित्व विषयक बुद्धि का विनाश और उस द्रव्य विषयक बुद्धि का भी संस्कार से विनाश हो जाता है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

द्वित्वगुणज्ञानं द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणं बुद्धेर्बुद्धयन्तरविरोधात् । तथा द्रव्यज्ञानस्यापि कारणम् । अतो गुणबुद्धयुत्पाद एवैकस्योत्पद्यमानताऽपरस्य विनश्यता स्यात् । द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्य इति । द्वित्वगुणश्च तस्य ज्ञानं च सम्बन्धश्चेति योजना । तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो द्वित्वस्य विनाशो गुणबुद्धेविनश्यत्तेत्येकः कालः । यद्यपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानोत्पत्तिकाले द्वित्वं नास्ति , तथापि तदस्य कारणम् , कार्योत्पत्तिकाले कारणस्थितेरनुपयोगात् । कार्योत्पत्त्यनुगुणव्यापारजनकत्वं हि कारणस्य कारणत्वम् । स चेदनेन कृतः किमस्य कार्योत्पत्तिकाले स्थित्या ? व्यापारादेव कार्योत्पत्तिसिद्धेः । न त्वेवं सति तस्याकारकत्वम् , व्यापारद्वारेण तस्यैव हेतुत्वात् । न चैवं सति भाक्तं कारकत्वम् ? स्वव्यापारेण व्यवधानाभावात् । अन्यथा शरमुक्तिसमकालं निष्ठुरपृष्ठाभिघातादभिपतितस्य धन्विनः क्षणान्तरभाविनि लक्ष्यव्यतिभेदे कर्त त्वं न स्यात् । तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् गुणबुद्धेविनाशः , संस्कारस्योत्पद्यमानता , ततः संस्कारस्योत्पादो द्रव्यबुद्धेविनश्यत्ता , क्षणान्तरे संस्काराद् द्रव्यबुद्धे विनाशः , द्रव्यबुद्धिविनाशकारणत्वं च , संस्कारस्य नद्भावभावित्वादन्यथाऽसम्भवाच्च ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — गुणस्वरूप द्वित्व का ज्ञान जातिरूप द्वित्वविषयक ज्ञान का विनाशक है , क्योंकि एक बुद्धि दूसरी बुद्धि की विनाशिका है । एवं ( गुणस्वरूप द्वित्व विषयक यह ज्ञान ' द्वे द्रव्ये ' इस प्रकार के ) द्रव्य विषयक ज्ञान का उत्पादक भी है । अतः गुण स्वरूप द्वित्व विषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक ( सामान्य रूप द्वित्व विषयक ज्ञान ) की ' विनश्यत्ता ' एवं दूसरे ( ' द्वे द्रव्ये इस द्रव्य ज्ञान ' ) को ' उत्पद्यमानता ' दोनों ही होंगी ।

' द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्यः ' इस समस्त वाक्य का विग्रह इस प्रकार है -- द्वित्वगुणश्च , तस्य ज्ञानश्च सम्बन्धश्च | इसके बाद के एक समय में ' द्वे द्रव्ये ' इस द्रव्यज्ञान की उत्पत्ति , द्वित्व का विनाश एवं गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की विनश्यता ये तीन काम होते हैं । यद्यपि ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान के उत्पत्तिकाल में द्वित्व की सत्ता नहीं रहती , फिर भी द्वित्व उस ज्ञान का कारण अवश्य है ।

कारण होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह कार्य के उत्पत्ति क्षण तक रहे ही , क्योंकि कार्य के उत्पादन में उस समय तक कारण की सत्ता का कुछ भी उपयोग नहीं है । कारण का इतना ही स्वरूप है कि कार्य की उत्पत्ति के अनुकूल किसी व्यापार को वह उत्पन्न कर दे । यह ( व्यापारोत्पादनरूप ) काम अगर इस ( द्वित्व ) ने कर दिया तो फिर कार्य की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता रहे ही इससे क्या प्रयोजन ?

द्वित्व से उत्पन्न व्यापार के द्वारा ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञानस्वरूप कार्य की उत्पत्ति तो हो ही जाएगी , किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वह ( व्यापारी द्वित्व ) कारण ही नहीं है , वह भी ( उत्पत्तिक्षण के अव्यवहित पूर्व क्षण में न रहने पर भी ) व्यापार के उत्पादन के द्वारा कारण अवश्य हैं । ( प्र ० ) तो फिर द्वित्व में व्यापार के द्वारा कारणत्व के रहने से कारकत्व का प्रयोग गौण है ( उ ० ) नहीं , क्योंकि मध्य में

पृ. २८२

भाष्य १२८

एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता | एकत्वेभ्योऽनेक विषय बुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षा बुद्धिविनाशाच्च विनाश इति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २८२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 357

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसी से ( अनेक द्रव्यों में रहनेवाली ) त्रित्वादि संख्याओं की भी व्याख्या समझनी चाहिए । ( फलतः अनेक द्रव्यों में रहनेवाली संख्याओं की उत्पत्ति ) अनेक विषयक बुद्धि का साथ रहने पर अनेक एकत्वों से होती है , एवं अपेक्षा बुद्धि

विनाश से इन ( अनेकद्रव्या संख्याओं ) का विनाश होता है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

एतेन त्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । एतेन द्वित्वोत्पत्तिविनाशनिरूपणप्रक्रमेण त्रित्वादीनामुत्पत्तिर्व्याख्याता । तमेव प्रकारं दर्शयति - एकत्वेभ्योऽ-

विषय बुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाश इति । स्मृतिसन्निहितानां तर्कानुगुणसहकारिलाभात् समवायिकारणत्वमविरुद्धम् । न चैवं सति सर्वत्र तथाभाव :, यथादर्शनं व्यवस्थापनात् । अतीतस्य जनकत्वेS नुभवस्यैव स्मृतिहेतुत्वसम्भवे संस्कारकल्पनावैयर्थ्यमिति चेन्न , निरन्वयप्रध्वस्तस्यानुपस्थितस्यापि कारकत्वात् , तदुपस्थापनाकल्पनायां तु संस्कारसिद्धिः । तथा चान्त्यवर्णप्रतीतिकाले पूर्ववर्णानां विनष्टानामपि स्मृत्युपनीतत्वादर्थप्रतीतौ निमित्तकारणत्वमस्त्येव । यथेदं तथा समवायिकारणत्वमपि केषाञ्चिद्भविष्यति । यथा च संस्कारसचिवस्य मनसो बाह्ये स्मृत्युत्पादनसामर्थ्यमेवं प्रत्यक्षानुभवजननसामर्थ्यमपि दृष्टत्वादेषितव्यम् । एवं च सति नान्धबधिराद्यभावो बाह्येन्द्रियप्रवृत्त्यनुविधायित्वात् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ३६ व्यापार के रहने से भी व्यवधान नहीं माना जाता । अगर ऐसी बात न हो तो फिर तीर छोड़ने के समय यदि कोई धनुषधारी पीठ में पाये हुए किसी निष्ठुर आघात से गिर जाय और उस छोड़े हुए तीर से आगे क्षण में लक्ष्य का छेदन भी हो जाय , तब उस धनुषधारी में उस छेदन क्रिया के कर्तृत्व का व्यवहार न होगा , ( क्योंकि छेदन क्रिया की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता नहीं है ) । इसके बाद ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार के द्रव्यज्ञान से गुण ( द्वित्व ) बुद्धि का नाश होता है , एवं संस्कार के कारण ऐकत्र होते हैं । इसके दूसरे क्षण में संस्कार की उत्पत्ति होती है , एवं उक्त द्रव्यबुद्धि के विनाशक और कारणों का संवलन होता है । इसके बाद के क्षण में संस्कार से उक्त ' द्वे द्रव्ये ' इस बुद्धि का विनाश होता हैं । संस्कार के रहने से ही उक्त बुद्धि का नाश होता है , एवं संस्कार को छोड़ कर और कोई उसके विनाश का कारण सम्भव भी महीं है । इन्हीं दोनों से यह समझना चाहिए कि संस्कार ही उक्त द्वित्वविषयक बुद्धि के विनाश का कारण है ।

एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता | ' एतेन ' द्वित्व की उत्पत्ति एवं विनाश के उक्त उपपादनक्रम से त्रित्वादि और अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली ( अनेकद्रव्या ) और संख्याओं की भी व्याख्या हो गयी समझनी चाहिए । त्रित्वादि संख्याओं की उत्पत्ति की ही रीति ' एकत्वेभ्योऽनेकबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षा बुद्धिविनाशाच्च विनाश : ' इत्यादि से दिखलायी गयी है । क्रमभाविनां संस्काराणामन्त्यगुणानुभवानन्तरं शतव्यवहारसंवर्तकादृष्टा- एतेन शतसङ्ख्याद्युत्पत्तिरपि समर्थता ।

प्रत्येकमनुभूतेष्वेकैकगुणेषु युगपदभिव्यक्तौ संयोगकत्वादनेक विषयैकस्मरणोत्पादे सत्यनुभवस्मरणाभ्यामपेक्षा बुद्धिभ्यां स्वाश्रयेषु शतसङ्ख्या जन्यते । सा च सर्वद्रव्ये संस्कारसचिवा अन्त्यद्रव्यसंयुक्तेन्द्रियज्ञानविषयत्वात् प्रत्यक्षैव । यत्र विनष्टेषु सङ्ख्येष्वन्ते सङ्कलनात्मकः प्रत्ययो जायते , शतं पिपीलिकानां मया निहतमिति , तत्र कथं शतसङ्ख्याया उत्पत्तिः ? आश्रयाभावात् नोत्पद्यत एव तत्र सा , कारणाभावात् । शतव्यवहारस्तु रूपादिष्विव गौण इत्येके समर्थयन्ति ।

अपरे तु प्रतीतेस्तुल्यत्वादुपचारकल्पनामनादृत्यातीतानामेव द्रव्याणां संस्का रोपनीतत्वादाश्रयता मिच्छन्ति । यदत्यन्तममत् खपुष्पादि , तदकारणम् , निःस्वभावत्वात् । अतीतानां तु वर्तमानकालसम्बन्धो नास्ति , न तु स्वरूपम् , तेषां

इससे सौ प्रभृति संख्याओं को उत्पत्ति का भी समर्थन होता है । होता है । उन अनुभवों से क्रमशः उत्पत्ति होती है । सौ द्रव्यों में से प्रत्येक में क्रमश : ( यह एक है ) इस आकार के ' एक ' गुण का अनुभव

एकत्व गुण विषयक संस्कारों की अन्तिम ' एक ' रूप गुणविषयक अनुभव के बाद सौ विषयक व्यवहार के सम्पादक अदृष्ट से वे सभी संस्कार उबुद्ध हो जाते हैं । ( किन्तु उन सभी संस्कारों से ) आत्मा और उनके एक ही संयोग के कारण अनेक एकत्व गुण विषयक एक ही स्मरण उत्पन्न होता है । इसके बाद अनुभव और स्मरण दोनों प्रकार की अपेक्षाबुद्धियों से उन श्रीभूत द्रव्यों में ' सौ नाम की संख्या उत्पन्न होती है ।

कथित सभी द्रव्य विषयक संस्कारों से उत्पन्न होनेवाली ' सौ ' नाम की इस संख्या को सत्ता में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है , क्योंकि उन द्रव्यों में से अन्तिम द्रव्य एवं इन्द्रिय इन दोनों के संयोग से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा ही वह गृहीत होता है | ( प्र ० ) संख्येयों ( द्रव्यों ) के विनष्ट होने के बाद जोड़ कर जहाँ संख्या की प्रतीति " मैंने सो कोड़ों को मारा " इत्यादि आकार की होती है , वहाँ ' सौ ' संख्या की उत्पत्ति किस प्रकार से होगी ? क्योंकि उसके आश्रय ही विनष्ट हो गये हैं ।

इस प्रश्न का उत्तर कोई इस प्रकार देते हैं , कि ऐसे स्थलों में ' सौ ' संख्या को उत्पत्ति ही नहीं होती , अतः ऐसे स्थलों में सौ संख्या का व्यवहार रूपादि गुणों में संख्या के व्यवहार की तरह गौण है ।

कोई कहते हैं कि दोनों ही प्रकार के ( जहाँ सो संख्या का आश्रयीभूत द्रव्य हैं , एवं जहाँ उनका विनाश हो गया है ) स्थलों में संख्या की उक्त प्रतीति समान रूप से होती है , अतः इन प्रतीतियों में से एक प्रतीति को मुख्य और दूसरी को गौण नहीं मान सकते , अतः उक्त स्थल में विनष्ट अथ च संस्कार के द्वारा समीप tata front ही उक्त सौ संख्या का आश्रय है | आकाशकुसुमादि की किसी भी काल में सत्ता नहीं है , अतः वे कभी किसी के भी कारण नहीं होते , विनष्ट पिपीलिकादि में तो केवल वर्त्तमानकाल का ही सम्बन्ध नहीं है , उनके स्वरूप के अस्तित्व का तो अभाव नहीं है ।

अतः स्मृति के द्वारा समीप आयी हुई विनष्ट पिपीलिकादि वस्तुओं को भी अगर तर्कसम्मत सहकारी मिले तो वे भी समवायिकारण हो सकती हैं । इसमें कोई विरोध नहीं है । वस्तुस्थिति के अनुसार ही कल्पना की जाती है अतः उपर्युक्त दृष्टन्ति ( मात्र ) से यह कल्पना करना सङ्गत नहीं है कि विनष्ट हुए समवायिकारणों से ही सभी कार्य हों । ( ० ) अतीत वस्तु भी अगर कारण हो तो फिर अतीत अनुभव से ही स्मृति की उत्पत्ति हो ही जाएगी , इसके लिए संस्कार की कल्पना ही व्यर्थ है ।

( 30 ) जड़मूल सेविनष्ट वस्तुओं को जब तक कोई विद्यमान दूसरी वस्तु ( कारण होने के लिए ) उपस्थित न करे तब तक वह कारण नहीं हो सकती । प्रकृत में अगर अनुभव को उपस्थित करनेवाले की कल्पना करें तो फिर संस्कार की ही कल्पना होगी ।

( नाम में विवाद की सम्भावना रहने पर भी ) संस्कार ( वस्तु ) की सिद्धि हो ही जाएगी , अतः जिस प्रकार ज्ञान के समय विनष्ट भी पहिले के वर्णं वाक्य के अन्तिम अक्षर से स्मृति के द्वारा समीप लाये जाने पर शाब्दबोध के निमित्तकारण होते हैं , वैसे ही कुछ विनष्ट वस्तु समवायिकारण भी होंगे ।

वस्तुस्थिति के अनुसार ही तो कल्पना की जाती है , अतः प्रकृत में भी ऐसी कल्पना करेंगे कि संस्कार का साहाय्य पाकर मन जिस प्रकार बाह्य वस्तुओं के स्मरण को उत्पन्न करता है उसी प्रकार बाह्य वस्तुविषयक प्रत्यक्ष रूप अनुभव को भी ( मन ) उत्पन्न कर सकता है । इस ( मन से बाह्य वस्तु विषयक प्रत्यक्ष मान लेने ) से संसार से अन्धे और बहरों का लोप नहीं होगा , क्योंकि मन की प्रवृत्ति बाह्य इन्द्रियों के पीछे चलनेवाली है ।

पृ. २८५

भाष्य १२९

क्वचिच्चाश्रय विनाशादिति ।

कथम् ? करवा क तदैवैकत्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते , कर्म चावयवान्तराद्विभागः क्रियते , अपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिः ।

ततो यस्मिन्नेव

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २८५प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 360

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कहीं आश्रय के विनाश से भी संख्यायें विनष्ट होती हैं । ( प्र ० ) कैसे ? ( उ ० ) ( जिस स्थल विशेष में ) जिस समय संख्यारूप एकत्व के आधारभूत द्रव्य के अवयवों में क्रिया उत्पन्न होती है , उसी समय जातिरूप एकत्व का ज्ञान भी होता है । क्रिया एक अवयव से दूसरे अवयव को विभक्त करती है और अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है । इससे जिस समय विभाग से

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

यत्र विनष्ट एव तत्र पराश्रये स्मृत्युपनीते द्वित्वमुत्पद्यते , स्मृतिलक्षणापेक्षा बुद्धिविनाशादेवास्य विनाशः , यत्र त्वाश्रये विद्यमाने तदुत्पन्नं तत्र न केवलमपेक्षा बुद्धिविनाशादस्य विनाशः क्वचिदाश्रयविनाशादपि स्यात् । एकस्य द्रव्यस्य द्वयोर्वा द्रव्ययोरभावाद् द्वे इति प्रत्ययाभावादित्याह - क्वचिच्चाश्रयविनाशादिति । कथमित्यज्ञेन पृष्टस्तुदुपपादयन्नाह - यदेति ।

यस्मिन् काले एकगुणाश्रयस्य द्रव्यस्यावयवे क्रियोत्पद्यते तस्मिन् काले एकगुणवत्तन्येकत्वसामान्ये ज्ञानमुत्पद्यते , क्षणान्तरे कर्मणावयवान्तराद्विभागः क्रियते , एकत्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिः , यस्मिन्नेव कालेऽवयवद्रव्यविभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशस्तदापेक्षा बुद्धद्वित्वमुत्पद्यते , ततः संयोगविनाशाद् द्रव्यस्य विनाशः , द्वित्वसामान्यबुद्धेश्वोत्पाद इत्येकः कालः ।

ततो यस्मिन् काले द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेविनाशस्तदेवावयविविनाशाद् द्वित्वविनाशः , न त्वपेक्षाबुद्धेविनाशस्तत्कारणम् , सहभावित्वात् । अत्र यद्यपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानमकृत्वैव प्रणष्टस्य द्वित्वस्योत्पत्त्या न किञ्चित् प्रयोजनम् , तथापि कारणसामर्थ्य भावी कार्योत्पादो न प्रयोजनापेक्ष इति तदुत्पत्तिचिन्ता कृता । इह खलु द्वित्वोत्पत्तिक्रमेण पूर्वपूर्वज्ञानस्योत्तरोत्तरज्ञानाद्विनाशो दर्शितः । स च ज्ञानानां विरोधे सत्युपपद्यते ।

विरोधं च तेषां वध्यघातकस्वभावं केचिदिच्छन्ति , सहनिवस्थानं चापरे । तत्राचार्यो वध्यघातकपक्षपरिग्रहं कुर्वन्नाह - शोभनमेतद्विधानमिति । एतद्विधानमेष द्वित्वप्रकारः । वध्यघातकपक्षे द्वितीयं ज्ञानमुत्पद्य क्षणान्तरे पूर्वं विज्ञानं नाशयतीति पक्षे शोभनं युक्तमित्यर्थः । सहानवस्थानलक्षणे तु विरोधे एकस्य ज्ञानस्योत्पादोऽपरस्य विनाश इति पक्षे द्वे द्रव्ये इति ज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः , तस्मात् सहानवस्थानलक्षणो न युक्त इत्यभिप्रायः । एतदेवोपपादयति - कथमित्यादिना ।

सहानवस्थानपक्षे हि द्वित्वका एवापेक्षा बुद्धविनाशाद् द्वित्वस्य विनश्यत्ता , गुणबुद्धिसमकालं च द्वित्वस्य विनाश इति क्षणान्तरे द्वित्वापेक्षस्य द्वे द्रव्ये इति ज्ञानस्योत्पत्तिर्न भवेत् कारणाभावात् । अत्राशङ्कते - लैङ्गिकवदिति । एतद्विस्पष्टयति स्यान्मतमित्यादिना । एवं ते मतं स्यादिदमभिप्रेतं भवेत् ।

यथा ध्वनिविशेषेण पुरुषानुमाने ज्ञातमेव ध्वनिलक्षणं लिङ्गमभूतम विद्यमानं विनष्टमेव भूतस्य विद्यमानस्य पुरुषविशेषस्य लिङ्गं भवतीति लिङ्गस्याभावेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेव लैङ्गिकं ज्ञानं जायते , तथा

बुद्धिसमकालं द्वित्वे विनष्टेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेव द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं स्यादिति । अन्यस्तु -- अभूतं वर्षकर्म भूतस्य वाय्वभ्रसंयोगस्य लिङ्गमित्यत्र वर्षकर्मणो लिङ्गस्याभावेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेवानुमानमिति व्याचष्टे । तदसङ्गतम् , नह्यत्र वर्षकर्म लिङ्गम् अपि तु तस्याभावः । स च तदानीमस्त्येव , स्वरूपेण वस्त्वनुत्पादे प्रागभावस्याविनाशात् । तस्मादस्मदुक्तैव रीतिरनुसरणीया ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — जहाँ किसी आश्रयरूप वस्तुओं के नष्ट होने पर भी स्मृति के द्वारा उन्हें समीप लाये जाने पर उन विनष्ट वस्तुओं में द्वित्व उत्पन्न होता है , ऐसे स्थलों में स्मृति रूप अपेक्षाबुद्धि के नाश से ही द्वित्व का नाश होता है ।

किन्तु जहाँ विद्यमान वस्तुओं में ही द्वित्व उत्पन्न होता है , ऐसे स्थलों में अपेक्षा बुद्धि के नाश से ही द्वित्व का नाश नहीं होता है , ऐसे स्थलों में 4 कहीं आश्रय के नाश से भी द्वित्व का नाश होता है , क्योंकि एक ही द्रव्य के रहने पर या दोनों द्रव्यों के न रहने पर ' ये दो हैं ' इस प्रकार की प्रतीति नहीं हो सकती है । यही बात ' क्वचिच्चाश्रयविनाशात् ' इत्यादि से कहते हैं । ' कैसे ? ' इस विषय में किसी अनजान के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ' यदा ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं ।

जिस समय ' एक संख्या ' रूप गुण के आश्रयीभूत द्रव्य के अवयव में क्रिया होती है , उसी समय एक संख्या रूल गुण में रहनेवाला एकत्व रूप जाति विषयक ज्ञान भी उत्पन्न होता है । इसक े दूसरे क्षण में उस क्रिया से ( क्रियाश्रय अवयव का ) दूसरे अवयव से विभाग उत्पन्न होता है , एवं जातिरूप एकत्व के ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय अवयव रूप द्रयों के विभाग से ( अवयवी ) ब्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश होता हैं , उसी समय अपेक्षांबुद्धि से द्वित्व की उत्पत्ति होती है ।

उसके बाद द्रव्य के आरम्भक संयोग के नाश से द्रव्य का नाश होता है एवं जाति रूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) विषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय द्वित्वत्व जाति के ज्ञान से

प्रशस्तषादभाष्यम् काले विभागात् संयोगविनाशस्तस्मिन्नेव काले द्वित्वमुत्पद्यते । संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः , सामान्यबुद्धेश्चोत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाशस्तस्मिन्नेव काले आश्रयविनाशाद् द्वित्वविनाश इति । पूर्वसंयोग का नाश होता है , उसी समय द्वित्व की उत्पत्ति होती है । संयोग के विनाश से द्रव्य का विनाश होता है , एवं सामान्य रूप ( द्वित्व विषयक ) बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इसके बाद जिस समय सामान्यविषयक उक्त ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है , उसी समय आश्रय के नाश से द्वित्व का नाश भी हो

है1

( यद्यपि ) इस प्रकार द्वित्वनाश की यह प्रक्रिया ' वध्यघातक ' रूप विरोध पक्ष में तो ठीक है , किन्तु ' सहानवस्थान ' रूप विरोध पक्ष में अपेक्षा बुद्धि का नाश होता है , उसी समय आश्रय के नाश से द्वित्व गुण का नाश होता है । गुण रूप इस द्वित्व के विनाश का अपेक्षाबुद्धि का विनाश कारण नहीं है , क्योंकि ये दोनों एक ही क्षण में उत्पन्न हुए हैं । ' द्वे द्रव्ये ' इस बुद्धि को उत्पन्न करना ही द्वित्वोत्पत्ति का प्रधान प्रयोजन है ।

यह प्रयोजन यद्यपि प्रकृत में सिद्ध नहीं होता है , ( क्योंकि इसके पहले ही आश्रय के नाश से द्वित्व का नाश हो जाता हैं ) , फिर भी कारणों के सामर्थ्य से उत्पन्न होने वाले कार्य ( अपने उत्पादन में ) किसी प्रयोजन की अपेक्षा नहीं रखते , ( अतः वस्तुस्थिति के अनुसार आश्रन्ननाश से नष्ट होने वाले द्वित्व का निरूपण व्यर्थ नहीं है ) , अतः इस द्वित्व का भी विचार किया गया ।

यहाँ द्वित्व की उत्पत्ति के क्रम में आगे आगे के ज्ञान पहिले पहिले के ज्ञान का विनाश दिखलाया गया हैं , किन्तु यह तभी सम्भव है जब कि ज्ञानों में परस्पर विरोध रहे । ज्ञानों के विरोध को कोई ' वध्यघातक ' रूप मानते हैं , एवं कोई ' सहानवस्थान ' रूप । इन दोनों में से आचार्य ( प्रशस्तपाद ) वध्यघातक पक्ष को ग्रहण करते हुए ' शोभनमेतद्विधानम् ' यह वाक्य लिखते हैं ।

पृ. २८७

भाष्य १३०

शोभनमेतद्विधानं वध्यघातकपक्षे , सहानवस्थानलक्षणे तु विरोधे द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः ।

कथम् १ गुणबुद्धिसमकालमपेक्षा बुद्धिविनाशाद् द्वित्वविनाशे तदपेक्षस्य द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्यानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति ।

लैङ्गिकवज्ज्ञानमात्रादिति चेत् १ स्यान्मतम् यथाऽभूतं भूतस्येत्यत्र ( इस प्रक्रिया को स्वीकार करने पर ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार के ) द्रव्य ज्ञान की उत्पत्ति न सकेगी ।

( प्र ० ) कैसे ? ( उ ० ) चूँकि गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि के लिङ्गाभावेऽपि ज्ञानमात्रादनुमानम् , तथा गुणविनाशेऽपि गुणबुद्धिमात्राद् द्रव्यप्रत्ययः स्यादिति ।

न , विशेष्यज्ञानत्वात् ।

नहि विशेष्यज्ञानं सारूप्या- द्विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुमर्हति ।

तथा चाह सूत्रकारः - " समवायिनः श्वैत्याच्छ्वैत्यबुद्धेः श्वेते बुद्धिस्ते कार्यकारणभूते " इति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २८७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 362

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — समय ही द्वित्व का नाश हो जाएगा , अतः द्वित्व के द्वारा उत्पन्न होनेवाले ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार के द्रव्यज्ञान की उत्पत्ति न हो सकेगी । इस विषय में यह कह सकते थे कि ( प्र ० ) अनुमिति की तरह ( हेतुविषयक ज्ञान से ही ) उक्त ' द्वे द्रव्ये ' इस द्रव्यविषयक ज्ञान की उत्पत्ति होगी ।

( अभिप्राय यह है कि ) जैसे ' अभूतं भूतस्य ' इस सूत्र के द्वारा महर्षि ने हेतु के न रहने पर भी हेतु के ज्ञान से अनुमिति का उपादन किया है , वैसे ही यहाँ भी ( द्वित्व ) गुण का नाश हो जाने पर भी उसके ज्ञान से ही द्रव्यविषयक उक्त ज्ञान की उत्पत्ति होगी । ( उ ० ) किन्तु सो कहना सम्भव नहीं है , क्योंकि वह ( द्रव्य विषक ) ज्ञान ' विशेष्यज्ञान ' अर्थात् विशिष्ट ज्ञान है ।

( विशिष्ट ज्ञान ) विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध के बिना ( फलतः विशेष्य में विशेषण की सत्ता के बिना ) केवल ‘ सारूप्य ’ से , अर्थात् ज्ञानरूप एक अर्थ में विशेष्य और विशेषण के सामानाधिकरण्य मात्र से ( फलतः दोनों के एक ज्ञान में विषय होते मात्र से ) विशेष्य ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।

जैसा कि सूत्रकार ने कहा है कि ' समवायी ' ( अर्थात् विशेष्य ) को शुक्लता से द्रव्य में शुक्लता की प्रतीति होती है , क्योंकि इन दोनों ( विशेषण एवं विशेष्य के ज्ञानों ) में एक कारण और दूसरा कार्य है ,

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

परिहारमाह- –न , विशेष्यज्ञानत्वादिति । ज्ञानमात्रादेव द्वे द्रव्ये इति ज्ञानोत्पत्तिरित्येतन्न , कस्मात् ? विशेष्यज्ञानत्वात् । भवतु विशेष्यज्ञानं तथापि कुतो ज्ञानमात्रान्न भवति ? तत्राह -नहीति । विशेषणं विशेष्यस्य स्वरूपं विशेष्यानुरञ्जकं विशेष्ये स्वोपसर्जनताप्रतीतिहेतुरिति यावत् । न चाविद्यमानस्यानुरञ्जकत्वं स्वोपसर्जनताप्रतीतिहेतुत्वं युक्तम् , अतो न विशेष्यज्ञानं विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुमर्हतीति विशेष्यज्ञानं सारूप्याद्विशेषणानुक्तत्वाद् विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुं नार्हति । सूत्रार्थे सूत्रकारानुमति दर्शयति तथा चाहेति । समवायिनः समवेताच्छ्वैत्याच्छ्वेतगुणाच्छ्वैत्यबुद्धेः श्वेते द्रव्ये बुद्धिर्भवति श्वेतं द्रव्यमिति : ते विशेषणविशेष्यबुद्धी कार्यकारणभूते कार्यकारणस्वभावे इति सूत्रेण विशेषणस्यानुरञ्जकत्वमुक्तम् । तच्चाविद्यमानस्य नास्तीति भावः ।

सम्प्रति लैङ्गिकज्ञानस्य विशेष्यज्ञानात् ' तु ' शब्देन विशेषं सूचयन्नाह - न त्विति । लैङ्गिकं ज्ञानं लिङ्गाभेदेन लिङ्गिनो लिङ्गोपसर्जनताग्राहितया नोत्पद्यते । तस्माद्विषमोऽयमुपन्यासः । लैङ्गिकवदित्युपन्यासो विषमो द्वे द्रव्ये इति ज्ञानेन सह तुल्यो न भवतीत्यर्थः । द्वे द्रव्ये इति ज्ञानकाले द्वित्वमपि नास्ति कथं तद्विशिष्टमेव ग्रहणम् ? न , ज्ञानोत्पत्तेः पूर्वस्मिन् क्षणे तस्य सद्भावात् । सर्वत्र द्वित्वप्रत्यक्षज्ञानस्य पूर्वक्षणवर्त्येवार्थो विषयः , अस्ति च ' द्वे द्रव्ये ' इति ज्ञानोत्पादात् पूर्वस्मिन् क्षणे द्वित्वमिति तदुपसर्जनता भवत्येव ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' एतद्विधानम् ' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति का यह क्रम ' वध्यघातकपक्षे ' अर्थात् ' पहिला ज्ञान उत्पन्न होकर दूसरे ज्ञान को अपने उत्पत्तिक्षण के आगे के क्षण में ही नाश कर देता है ' इस पक्ष में ' शोभन ' है । ' सहानवस्थानलक्षणे तु विरोधे ' अर्थात् ' एक क्षण में ज्ञान की उत्पत्ति हीउससे पूर्व के क्षण में उत्पन्न ज्ञान का विनाश है ' इस पक्ष में ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं होगी । अतः ' सहानवस्थान ' रूप विरोध पक्ष ठीक नहीं है ।

' कथम् ' इस पद से प्रश्न कर इसका उपपादन करते हैं । ( अर्थात् ) सहानवस्थान पक्ष में द्वित्व के उत्पत्तिकाल में ही अपेक्षाबुद्धि के विनाश से द्वित्वविनाश की सामग्री एकत्र हो जाती है . अतः द्वित्वविषयक ( निर्विकल्पक ) बुद्धि की जिस क्षण में उत्पत्ति होती है , उस क्षण में द्वित्व का नाश हो जाता है , सुतरामु इसके अगले क्षण में ' द्वे द्रव्ये ' इस विशिष्ट बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होगी , क्योंकि द्वित्व रूप उस बुद्धि का कारण उस समय नहीं है ।

' लैङ्गिकवत् ' इस वाक्य के द्वारा सहानवस्थान रूप विरोधपक्ष के समर्थन का उपक्रम करते हैं , एवं ' स्यान्मतम् ' इत्यादि से इसी पक्ष को स्पष्ट करते हैं ।

अर्थात् यह सहानवस्थान रूप विरोध मानने वालों का यह अभिप्राय हो सकता है कि जैसे विशेष प्रकार की ध्वनि से पुरुष का अनुमान होने में ध्वनि रूप हेतु केवल ज्ञात ही रहता है( पुरुष की अनुमिति के अव्यवहित पूर्वक्षण में उसकी सत्ता नहीं रहती है ) , अतः ' अभूत ' अविद्यमान फलत : विनष्ट ( ध्वनि रूप हेतु ) ही ' भूत ' अर्थात् विद्यमान उस पुरुषविशेष का ( ज्ञापक ) हेतु होता है ।

जिस प्रकार हेतु के न रहने पर भी हेतु के केवल ज्ञान से ही पुरुष कीउक्त अनुमिति होती है , उसी प्रकार गुण रूप द्वित्व विषयक ज्ञान के समय ही दित्व के नष्ट हो जाने पर भी ( विनष्ट ) द्वित्व के ज्ञान से ' द्वे द्रव्ये ' यह ज्ञान भी होगा । ' अभूतं भूतस्य ' इस ( वैशेषिक ) सूत्र की व्याख्या कोई इस प्रकार करते हैं कि ' अभूतम् ' अर्थात् अविद्यमान वर्षा रूप क्रिया ' भूतस्य ' अर्थात् वायु एवं मेघ के विद्यमान संयोग का ( ज्ञापक ) लिङ्ग है ।

किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है , क्योकि प्रकृत में वर्षा रूप क्रिया ( वायु और मेघ के संयोग का ज्ञापक ) हेतु नहीं है , किन्तु वर्षा रूप क्रिया का ( प्राक् ) अभाव ही ( उक्त संयोग का ) हेतु हैं । वह तो संयोग की अनुमिति से पहिले विद्यमान ही है , क्योंकि ( प्रतियोगीभूत ) वस्तुओं की स्वरूपतः उत्पत्ति के बिना प्रागभाव का विनाश नहीं होता है , अतः मेरी ही व्याख्या ठीक है ।

' न विशेष्यज्ञानत्वात् ' इत्यादि ग्रन्थ से उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । यह बात नहीं है कि द्वित्व के नष्ट हो जाने पर भी ) केवल द्वित्व के ज्ञान से हो द्रव्ये ' इस ( विशेष्य ) ज्ञान की उत्पत्ति होगी ( प्र ० ; क्यों ? ( उ ० ) चूँकि वह विशेष्य ज्ञान है । ( प्र ० ) रहे वह विशेष्यज्ञान ही फिर भी ( हेतु के न रहने पर भी हेतु के ) केवल ज्ञान से ही उसकी उत्पत्ति क्यों नहीं होगी ? ' नहि ' इत्यादि से इसी प्रश्न का समाधान करते हैं । ( अर्थात् ) विशेषण विशेष्य ( विशिष्ट ) का' स्वरूप ' है , अर्थात् विशेष्य का ‘ अनुरञ्जक ' है । फलतः अपने में उपसर्जनत्व ( विशेषणत्व ) का कारण है । यह अनुरञ्जकता या ' स्व ' में उपसर्जनता प्रतीति की कारणता किसी अविद्यमान वस्तु में नहीं हो सकती , अनः विशिष्टज्ञान में ( विशेष्यज्ञान ज्ञानत्व रूप से अविशिष्ट ज्ञान का ) सारूप्य रहने के कारण ही विशेषण सम्बन्ध के बिना यह अनुरञ्जकता नहीं हो सकती । ' तथा चाह ' इत्यादि सन्दर्भ से इस प्रसङ्ग में सूत्रकार की अनुमति दिखलाते हैं । द्रव्यविशेष में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले श्वेत गुण से ही स्वैत्यबुद्धि अर्थात्

३७ न तु लैङ्गिकं ज्ञानमभेदेनोत्पद्यते । तस्माद्विषमोऽयमुपन्यासः । न , आशूत्पत्तेः । यथा शब्दवदाकाशमित्यत्र त्रीणि ज्ञानान्याशूत्पद्यन्ते , तथा द्वित्वादिज्ञानोत्पत्तावित्यदोषः । अर्थात् ( विशिष्टज्ञानरूप विशेष्य ज्ञान कारण है ) , अतः

में विशेषण लैङ्गिक ज्ञान अर्थात् अनुमिति में लिङ्ग अर्थात् हेतु अभेद सम्बन्ध से भासित नहीं होता , ( किन्तु ' श्वेतः शङ्खः ' इत्यादि आकार के विशेष्य ज्ञान अथवा विशिष्ट ज्ञान में ' श्वेत ' रूप विशेषण अभेद सम्बन्ध से भासित होता है ) , अतः विशेष्य में विशेषण के न रहते हुए भी विशेषण के केवल ज्ञान से ही विशिष्ट ज्ञान की उपपत्ति के लिए लैङ्गिक ज्ञान को दृष्टान्त रूप में उपस्थित करना युक्त नहीं है , क्योंकि लैङ्गिक ज्ञान एवं विशेष्य ज्ञान दोनों समान नहीं हैं । ( प्र ० ) ' द्वे द्रव्ये ' इस प्रत्यक्षात्मक ज्ञान से द्रव्य की तरह उसमें विशेषणीभूत द्वित्व भी प्रकाशित होता है , किन्तु उस समय द्वित्व श्वेत द्रव्य में वैत्यबुद्धि की उत्पत्ति होती है , क्योंकि श्वैत्य बुद्धि एवं श्वेत गुण इन दोनों में पहिला कार्य है और दूसरा कारण ।

अब लैङ्गिक ज्ञान ( अनुमिति से प्रकृत विशेष्य ( विशिष्ट ) ज्ञान में ' तु ' शब्द के द्वारा अन्तर दिखलाते हुए ' न तु ' इत्यादि भाष्य लिखते हैं । अर्थात् ( जिस प्रकार ' श्वेतः शङ्खः ' इस विशिष्टबुद्धि में श्वेत गुणविशिष्ट अभेद सम्बन्ध से भासित होता है , उसी प्रकार ) लैङ्गिक ज्ञान में लिङ्ग का अभेद भासित नहीं होता है , फलतः अनुमिति में साध्य का भान होता है , किन्तु साध्य में विशेषण होकर हेतु का भान नहीं होता , अतः कोई भी अनुमिति लिङ्गाभेदविशिष्ट लैङ्गिक विषयक न होने के कारण लिङ्ग में साध्य की उपसर्जनता नहीं होती । तस्मात् इसका दृष्टान्त रूप से ' लैङ्गिकवत् ' इस वाक्य का उत्थापन ' विषम ' है , अर्थात् लैङ्गिकवत् यह दृष्टान्त प्रकृत ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान के बराबर नहीं है । ( प्र ० ) ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान के समय जब द्वित्व की सत्ता ही नहीं है तो फिर द्वित्व से युक्त द्रव्य का उस ज्ञान से ग्रहण ही कैसे होता है ? ( उ ० ) नहीं ( यह बात नहीं है ) , क्योंकि द्वित्व के सभी प्रत्यक्षों में पहिले क्षण में विद्यमान द्वित्व ही प्रतिभासित होता है ।

पृ. २९१

भाष्य १३१

वयघातक पक्षेऽपि समानो दोष इति चेत् ? स्यान्मतम् - ननु वध्यघातक पक्षेऽपि तहिं दव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः ? कथम् ? द्वित्वसामान्य बुद्धिसमकालं संस्कारादपेक्षा बुद्धिविनाशादिति ।

न , समूहज्ञानस्य संस्कारहेतुत्वात् ।

समूहज्ञानमेव संस्कारकारणं नालोचन - ज्ञानमित्यदोषः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २९१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 366

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — का नाश मान लेने पर सी नहीं हो सकेगा , क्योंकि प्रत्यक्ष के द्वारा केवल विद्यमान विषय हो प्रकाशित होते हैं । अतः यही कहना पड़ेगा कि उक्त प्रत्यक्ष के समय तक द्वित्व का नाश नहीं होता । तस्मात् सहानवस्थान रूप विरोध पक्ष में जो ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान की अनुत्पत्तिरूप आपत्ति दी गयी है , वह अयुक्त है । इसी प्रश्न का समाधान न , आशूत्पत्तेः ' इत्यादि से देते हैं । ( उ ० ) नहीं , अर्थात् कथित द्रव्यप्रत्यक्ष के समय द्वित्व का नाश अवश्य ही हो जाता है ।

' द्वे द्रव्ये ' यह एक ही विशिष्ट ज्ञान नहीं है . किन्तु अलग अलग दो ज्ञान हैं । अतिशीघ्रता से उत्पन्न होने के कारण ' द्वे ' ' द्रव्ये ' एवं ' द्वे द्रव्ये ' ये तीन ज्ञान ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार के एक विशिष्ट ज्ञान की तरह मालूम पड़ते हैं ।

जैसे कि ' शब्दवदाकाशम् ' यह एक विशिष्टज्ञान नहीं है , किन्तु ' शब्द ' , ' आकाशः ' एवं ' शब्दवत् ' ये तीन ज्ञान हैं , फिर भी क्रमशः अतिशीघ्रता से उत्पन्न होने के कारण उन तीनों ज्ञानों में एक ही विशिष्ट ज्ञान की तरह व्यवहार होता है , इसी प्रकार ' द्वे द्रव्ये ' यहाँ भी समझना चाहिए । ( प्र ० ) ' वध्यघातक ' रूप विरोध पक्ष में भी तो द्रव्य ज्ञान की अनुत्पत्ति रूप आपत्ति है ही , क्योंकि द्वित्वत्व जाति के ज्ञान के समय हो संस्कार से अपेक्षाबुद्धि का नाश हो जाएगा ।

( उ ० ) नहीं , क्योंकि समूह ज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान संस्कार का कारण हैं । अर्थात् समूह ज्ञान ही संस्कार का कारण है , आलोचन ( निर्विकल्पक ) ज्ञान नहीं , अतः उक्त आपत्ति नहीं है । अतः उक्त ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान का अनुत्पत्तिरूप दोष नहीं है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

इदं त्विह वक्तव्यम् - द्वे द्रव्ये इति ज्ञाने यथा द्रव्यं प्रतिभाति तथोपसर्जनीभूतं द्वित्वमपि न चाविद्यमानस्य द्वित्वस्य प्रतिभासो युक्तः । तस्मादेतदविनष्टमेव तदानों विशेष्यज्ञानस्यालम्बनं स्यात् , तदव भासमानतालक्षणत्वात् तदालम्बनताया इत्यत आह --- नाशुत्पत्तेरिति । द्रव्यज्ञानका द्वित्वं न विनष्टमित्येतन्न , आशूत्पत्ते द्वित्वगुणज्ञानस्य द्रव्यज्ञानस्य च शीघ्रमुत्पादात् क्रमस्याग्रहणे द्वित्वद्रव्ययोरेकस्मिन्नेव ज्ञाने प्रतिभास इत्यभिमानः । वस्तुवृत्त्या तु पूर्वं द्वित्वस्य प्रतिभासस्तदनु द्रव्यस्येत्यर्थः । अत्र प्रकृतानुरूपं दृष्टान्तमाह - यथेति । शब्दवदाकाशमित्यत्र शब्दज्ञानमाकाशज्ञानं शब्दविशिष्टाकाशज्ञानं च त्रीणि ज्ञानान्याशुत्पद्यन्ते यथा , तथा द्वित्त्वादिविज्ञानोत्पत्तावपि । किमुक्तं स्यात ? यथा शब्दादिज्ञानेष्वाशुभावितया क्रमस्या ग्रहणे युगपत्प्रतिभासाभिमानस्तथा द्वित्वद्रव्य ज्ञानयोरपीति ।

द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति तदाशङ्कते - वध्यघातकपक्षेऽपीति । अस्यार्थं विवृणोति स्यान्मतमित्यादिना । यदि गुणबुद्धिसमकालं द्वित्वविनाशे द्रव्यज्ञानं नोत्पद्यते ? तहि वध्यघातकपक्षेऽपि तदनुत्पत्तिः । अत्रोपपत्तिमाह - सामान्यबुद्धिसमकालं संस्कारादपेक्षा बुद्धिविनाशादिति । यथापेक्षा बुद्धिरुत्पन्ना दित्वं जनयति तथा संस्कारमपि स च तस्या विनाशकः । तेन संस्कारस्य द्वित्वस्य चोत्पादे द्वित्वसामान्यज्ञानस्य चोत्पद्यमानतापेक्षाबुद्धेविनश्यत्तेत्येकः कालः । ततो द्वित्वसामान्यज्ञानस्य चोत्पादो गुणबुद्धेश्वोत्पद्यमानतापेक्षा बुद्धेविनाशो द्वित्वस्य विनश्यत्तेत्येकः कालः । ततो गुणबुद्धेरुत्पादो द्वित्वस्य विनाश इति क्षणान्तरे तदपेक्षस्य द्वे इति ज्ञानस्यानुत्पाद इति वध्यघातकपक्षेऽपि तुल्यो दोषः । समाधत्ते - न , समूहज्ञानस्य संस्कारहेतुत्वादिति । एतदेव विवृणोति - समूह इत्यादिना । समूहज्ञानं द्वित्वगुणविशिष्टद्रव्यज्ञानमेव संस्कारं करोति , नालोचनज्ञानम् , न निर्विकल्पकमपेक्षाज्ञानम् , अतो नास्य संस्काराद्विनाश इत्यर्थः । अपेक्षाज्ञानस्य संस्काराहेतुत्वे द्रव्यविवेकेनैकगुणयोः स्मरणं प्रमाणम् , गुणविशिष्टद्रव्यज्ञानस्य तद्धेतुत्वे चाविशिष्टद्रव्यस्मरणं प्रमाणम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — प्रकृत में भी ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान से पहिले क्षण में दित्व की सत्ता तो है ही , अतः द्वित्व में उक्त उपसर्जनता के रहने में कोई बाधा नहीं है । इस प्रसङ्ग में यह आक्षेप किया जाता है कि ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान में द्रव्य को तरह द्वित्व का भी प्रतिभासित होना कहा गया है , सो ठीक नहीं मालूम पड़ता , क्योंकि उक्त प्रत्यक्षात्मक ज्ञान में अविद्यमान द्वित्व का प्रतिभास कैसे होगा ?

अतः उक्त ज्ञान का अनिष्ट द्वित्व ही अवलम्बन हो सकता है . क्योंकि उस ज्ञान में प्रतिभासित होना ही उस ज्ञान का अवलम्बन होना है । इसी आक्षेप का समाधान ' न , आशूत्पत्तेः ' इत्यादि भाष्य से कहते हैं । अर्थात् ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान के समय द्वित्व का नाश हो जाता है , किन्तु आशुत्पत्ति ' से ( उक्त ज्ञान की उपपत्ति होती है ) , अर्थात् ' द्वे द्रव्ये ' ये दो ज्ञान हैं , जो अत्यन्त शीघ्रता से एक के बाद उत्पन्न होते हैं ।

इस शीघ्रता के कारण ही दोनों का अन्तर समझ में नहीं आता , एवं यह अभिमान होता है कि ' द्वे द्रव्ये ' इस आकार का एक ही विशिष्टज्ञान है , जिसमें द्वित्व और द्रव्य दोनों हो प्रतिभासित होते हैं । किन्तु वस्तुतः यहाँ पहिले ( ज्ञान में ) द्वित्व का प्रतिभास होता है पीछे ( के ज्ञान में ) द्रव्य का !

' यथा इत्यादि से इस प्रसङ्ग में अनुरूप दृष्टान्त देते हैं | अभिप्राय यह है कि ' शब्दवदाकाशम् यहाँ पर शब्दज्ञान , आकाशज्ञान , एवं शब्दविशिष्ट आकाश ज्ञान ये तीन ज्ञान क्रमशः अत्यन्त शीघ्रता से उत्पन्न होते हैं । एवं इस अत्यन्त शीघ्रता के कारण ही तीनों ज्ञानों का अन्तर गृहीत नहीं हो पाता और तीनों शब्द , आकाश और शब्दविशिष्ट आकाश इके एक ही समय प्रतिभासित होने का अभिमान होता है | वैसे ही द्वित्वज्ञान और द्रव्यज्ञान इन दोनों में भी है ।

किसी की शङ्का है कि वध्यघातक पक्ष में' द्वे द्रव्ये ' इस आकार के द्रव्यज्ञान की अनुपपत्ति है ही । बध्यघातकपक्षेऽपि ' इत्यादि से इसी शङ्का का उत्थापन करके ' स्यान्मतम् ' इत्यादि से उसको व्याख्या करते हैं । अर्थात् द्वित्व रूप गुणविषयक ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान के समय ही द्वित्व के नष्ट हो जाने के कारण द्रव्यविषयक उक्त ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान की उत्पत्ति न भी हो फिर भी वध्यघातक पक्ष में द्रव्य ज्ञान की अनुत्पत्ति रूप दोष है ही ।

इसी विषय में समान बुद्धिसमकालम् ' इत्यादि ग्रन्थ लिखा गया है ।

अभिप्राय यह है कि जैसे अपेक्षा बुद्धि स्वयं उत्पन्न होकर द्वित्व को उत्पन्न करती है वैसे ही संस्कार भी ( स्वयं उत्पन्न होकर ही द्वित्व को उत्पन्न करता है ) , एवं संस्कार अपेक्षाबुद्धि का विनाशक भी है , अतः संस्कार और द्वित्व इन दोनों के उत्पन्न हो जाने पर सामान्यरूप द्वित्व ( द्वित्वत्व ) विषयक ज्ञान की उत्पद्यमानता ( उक्त ज्ञान के सभी कारणों का एकत्र होना ) और अपेक्षा - बुद्धि की विनश्यत्ता , ( अर्थात् विनाश के सभी कारणों का एकत्र होना ) इतने काम एक समय में होते हैं ( यह मानना पड़ेगा ) ।

इसके बाद गुण रूप द्वित्व का ज्ञान और द्वित्व का नाश , ये दो काम होते हैं । अतः इसके बाद के क्षण में द्वित्व से उत्पन्न होनेवाले ' द्वे द्रव्ये ' इस ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होगी । इस प्रकार वध्यघातक पक्ष में भी द्रव्यज्ञान का उक्त अनुत्पत्ति रूप दोष तो समान ही है : " न , समूहज्ञानस्य संस्कारहेतुत्वात् " इत्यादि से इस आक्षेप का समाधान कर ' समूह ' इत्यादि से इसकी व्याख्या करते हैं ।

अभिप्राय यह है कि ' समूहज्ञान ' अर्थात् द्वित्वगुण - विशिष्ट द्रव्य का ज्ञान ही संस्कार का उत्पादक है , आलोचन ( केवल विशेष्य ) ज्ञान नहीं , निर्विकल्पकज्ञान रूप अपेक्षाज्ञान भी नहीं , अतः संस्कार से द्वित्व का विनाश नहीं हो सकता है ।

पृ. २९४

भाष्य १३२

ज्ञानयोगपद्यप्रसङ्ग इति चेत् ? स्यान्मतम् - ननु ज्ञानानां For घातकविरोधे ज्ञानयोगपद्यप्रसङ्ग इति ।

न , अविनश्यतोरवस्थानप्रतिषेधात् ।

ज्ञानायौगपद्यवचनेन ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्तिरविनश्य तोश्च युगपदेवस्थानं प्रतिषिध्यते ।

नहि वध्यघातकविरोधे ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्तिरविनश्यतोश्च युगपदवस्थानमस्तीति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. २९४प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 369

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) इस पक्ष में ज्ञानयोगपद्य ' की आपत्ति होगी ? अर्थात् अगर ' वध्यघातक ' रूप विरोध मानें तो एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति ( ज्ञानयोगपद्य ) की आपत्ति होगी । ( उ ० ) नहीं , क्योंकि ( ज्ञानयोगपद्य के खण्डन से ) एक ही क्षण में अविनाशावस्था वाले दो ज्ञानों की सत्ता खण्डित होती है । अर्थात् उक्त ज्ञानायौगपद्य ' वाक्य से एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति एवं अगले ही क्षण में विनष्ट न होनेवाले ज्ञानों की स्थिति खण्डित होती है । वध्यघातक पक्ष में एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति एवं अविनष्टावस्थावाले अनेक ज्ञानों की स्थिति नहीं ( माननी पड़ती ) है |

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

यदि ज्ञानमुत्पद्य पूर्वोत्पन्नं ज्ञानं विनाशयति तदेतस्मिन् पक्षे तयो : सहावस्थानं प्राप्नोति , ततश्च ज्ञानायौगपद्यादिति सूत्रविरोध इति केनचिदुक्तं तदाशङ्कते - ज्ञानयोगपद्यप्रसङ्ग इति चेत् ? स्यान्मतमित्यादिना । अस्य विवरणं करोति - नन्वित्या - दिना । समाधत्ते - नेति । एकस्मिन् क्षणे विनाश्यविनाशकज्ञानयोः सहावस्थानं न दोषाय , ज्ञानायोगपद्यादिति सूत्रेणाविनश्यतोरवस्थानप्रतिषेधात् । एतदेव दर्शयति - ज्ञानायौगपद्यवचनेन ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्तिरविनश्यतोश्च युगपदवस्थानं प्रतिषिध्यत इति । वध्घातकपक्षे च न ज्ञानयोर्युगपदुत्पादोऽस्ति , नाप्यविनश्यतोः सहावस्थानमेकस्योत्पादे द्वितीयस्य विनश्यद्रूपत्वादित्याह - न हीति । ' इति ' शब्दः समाप्ति कथयति ।

अयि भोः सर्वमिदमुत्पत्त्यादिनिरूपणं द्वित्वस्यानुपपन्नम् , तत्सद्भावे प्रमाभावात् । द्वे इति ज्ञानं प्रमाणमिति चेत् ? न , ग्राह्यलक्षणाभावात् । तथा ह्यर्थी ज्ञानग्राह्यो भवन्नुत्पन्नो भवति , अनुत्पन्नो वा ? उभयथाप्यनुपपत्तिरनुत्पन्नस्यासत्वात् उत्पन्नस्य च स्थित्यभावात् । अतीत एवार्थो ज्ञानग्राह्यस्तज्जनकत्वादिति चेत् ? न , वर्तमानतावभासविरोधादिन्द्रियस्यापि ग्राह्यत्वप्रसङ्गाच्च ।

ईदृश एवार्थस्य स्वकारणसामग्रीकृतः स्वभावो येन जनकत्वाविशेषेऽप्ययमेव ग्राह्यो नेन्द्रियादिकम् , तदनन्तरक्षणविषयश्च वर्तमानतावभास इति चेत् ? कि पुनरिदमस्य ग्राह्यत्वम् ? ज्ञानं प्रति हेतुत्वमिति चेत् ? पुनरपीन्द्रियस्थ ग्राह्यत्वमापतितम् , हेतुत्वमात्रस्य तत्राप्यविशेषात् । ज्ञानस्य स्वसंवेदनमेवान्यस्य ग्राह्यतेति चेत् ? अन्यस्य स्वरूपसंवेदन मन्यस्य ग्राह्यतेत्यतिचित्रमेतत् । न चित्रम् , स्वभावस्यापर्यनुयोज्यत्वात् । अर्थावग्रहस्वभावं हि विज्ञानम् ।

तेनास्य स्वरूपसंवेदनमेवार्थस्य ग्रहणं भवति । यदर्थजं चेदं तस्यैवायमवग्रहो न सर्वस्येति नातिप्रसक्तिः ? न एकार्थत्वात् । अर्थजत्वं नाम ज्ञानस्यार्थादुत्पत्तिः । सा चैका । न च ज्ञानार्थयोर्धर्म इति नार्थ नियमयेत् । अथार्थस्य न ज्ञानम् अन्यधर्मत्वात् , उभयनियमाच्च तयोः परस्परग्राह्यग्राहकभावव्यवस्था नैकसम्बन्धिनियमात् । न चातीतानागतयोरर्थयोर्ज्ञानं प्रत्यस्ति कारणत्वम् असत्त्वात् । विषयविषयिभावनियमाद् ग्राह्यग्राहकभावनियम इति चेन्न , अभेदात् ।

ग्राह्यत्वमेव विषयत्वम् , विशेषात् । तां तु सारूप्यमाविशत् सरूपयितुं घटयेदिति । अत्रोच्यतेसाकारेण ज्ञानेन किमर्थोऽनुभूयते ? किं वा स्वाकारः ? किमुतोभयम् ? न तावदुभयम् , नीलमेतदित्येकस्यैवाकारस्य सर्वदा संवेदनात् । अर्थस्य च ज्ञानेनानुभवो न युक्तः , तस्य स्वरूपसत्ताकाले ज्ञानानुत्पादाज्ज्ञानकाले चातीतस्य वर्तमानता - वभासायोगात् । ज्ञानसह भाविनः क्षणस्यायं वर्त्तमानतावभास इति स्वसिद्धान्त - श्रद्धालुतेयम् , तस्य तदग्राह्यत्वात् ।

कश्चात्र हेतुर्यद्विज्ञानं नियतमर्थं बोधयति न सर्वम् ? नहि तयोरस्ति तादात्म्यम् , तदुत्पत्तिश्च न व्यवस्थाहेतुरित्युक्तम् । तदाकारता नियमहेतुरिति चेत् ? किमित्येको नीलक्षणः समानाकारं नीलान्तरं न गृह्णाति ? ग्राहकत्वं ज्ञानस्यैव स्वभावो नार्थस्येति चेत् ? तथाप्येकं नीलज्ञानं सर्वेषां नीलक्षणानां ग्राहकं स्यात् , तदाकारत्वाविशेषात् । तदुत्पत्तिसारूप्याभ्यां स्वोत्पादकस्यैवार्थक्षणस्य ग्राह्यता न सर्वेषामिति इन्द्रियसमनन्तरप्रत्यययोरपि ग्राह्यतापत्तिः ।

ताभ्यामपि हि ज्ञानमुत्पद्यते , बिर्भात च तयोर्यथास्वं विषयग्रहणप्रतिनियमं बोधात्मकं च सारूप्यम् । अथ मतं देतद्विषयग्रहणप्रतिनियतत्वमिन्द्रियसारूप्यं विज्ञानस्य यदपि समनन्तरप्रत्ययसारूप्यं बोधात्मकत्वम् , तदुभयमपि सर्वज्ञानसाधारणम् , असाधारणं तु विषयसारूप्यम् , नीलजे एव नीलज्ञाने नीलाकारस्य संभवात् । यश्चासाधारणो धर्मः स एव नियामक इत्येतावता विशेषेण ज्ञानमर्थं गृह्णाति नेन्द्रियसमनन्तरप्रत्ययाविति । तदप्यसारम् समानविषयस्य समनन्तरप्रत्ययस्य ग्रहणप्रसङ्गात् ।

यो विज्ञाने नीलाद्याकारमर्पयति स एव तस्य ग्राह्यः , न च धारावाहिक विज्ञाने समनन्तरप्रत्ययान्नीलाद्याकारस्योत्पत्तिः , किन्त्वर्थादस्यैव , तदुत्पत्तावन्वयव्यतिरेकाभ्यां सर्वत्र सामर्थ्योपलब्धेर्बोधाकारोत्पत्तावेव बोधस्य सामर्थ्यावगमादिति चेत् ? नीलाद्याकार समर्पको ग्राह्म इति कस्येयमाज्ञा ? नान्यस्य कस्यचित् , तस्यैव तु ग्राह्यत्वस्वभावनियमो नियामकः । एवं चेत् स्वभावनियमादेव नियमो s स्तु , ज्ञानं हि स्वसामग्रीप्रतिनियतार्थ संवेदनात्मकमेवोपजायते ।

अर्थोऽपि संवेद्यस्वभावनियमादेव संवेद्यते , नेन्द्रियादिकमित्यकारणमाकारः । नहि छिदिक्रिया वृक्षाकारवती येनेयं वृक्षेण सह सम्बद्धयते न कुठारेण किन्त्वस्या वृक्षस्य च तादृशः स्वभावो मित्रैव नियम्येत नान्यत्र । अस्येदं संवेदनमिति च व्यवस्था तदवभासमात्रनिबन्धनैवेति तदर्थमप्याकारो न मृग्यः ।

अथ साकारेण ज्ञानेनार्थो न संवेद्यत एव किन्तु स्वाकारमात्रम् । तदर्थ सद्भावो निष्प्रमाणको न तावदर्थस्य ग्रहणम् , न चाध्यवसायो विकल्पो वशिष्यते स चोत्प्रेक्षामात्रव्यापारो भवन्नपि प्रत्यक्षपृष्ठभावित्वाद्यत्र प्रत्यक्षं प्रवृत्तं तत्र स्वव्यापारं परित्यज्य कारणव्यापारमुपाददानो वस्तु साक्षात्करोति । यत्र तु प्रत्यक्षमेवाप्रवृत्तं तत्र विकल्पोऽप्यसमर्थ एव , कारणाभावात् । ज्ञानाकारः स्वसदृशं कारणं व्यवस्थापयन्नर्थसिद्धौ प्रमाणमिति चेत् ? तत्किमिदानीं स्थूलाकारस्य समर्पकोऽप्यर्थो बहिरस्ति ? का गतिरस्य वचनस्य --

तस्मान्नार्थेन विज्ञाने स्थूलाभासस्तदात्मनः ।

एकत्र प्रतिषिद्धत्वाद् बहुष्वपि न सम्भवः ।। इति ।

अथायमनर्थजः ? कुतश्चिन्निमित्तात् कदाचिद्भवति , असन्नेव वा प्रतीयते , तद्वदितराकारोऽपि भविष्यति , असन्नेव वा प्रत्येष्यते , न चाकारवादे ज्ञानाकाराणां भ्रान्ताम्रान्तत्वविवेकः सुगम इति निरूपितप्रायम् ।

किञ्च तदानीं बोधाकारः सदृशमर्थं कारणं कल्पयति , यदि यादृशो बोधाकारस्तादृश एवाकारस्य कारणमित्यवगतम् । न चार्थस्यासंवेद्यत्वे तथा प्रतीतिः संभवति हेतुत्वसादृश्ययोविनिश्चयस्यो भयग्रहणाधीनत्वादिति नाकारादर्थसिद्धिः । तदेवं न हेतुत्वं ग्राह्यलक्षणं नाप्याकारार्पणक्षमस्य हेतुत्वम् , तस्माद् ग्राह्यलक्षणाभावाद् बुद्धेरन्योऽनुभाव्यो नास्तीति साधूक्तम् ।

saise बुद्धिव्यतिरिक्तोऽर्थो नास्ति , यद्यसौ जडो न स्वयं प्रकाशेत । न च तस्य प्रकाशकान्तरमुपलभामहे , सर्वदैवैकस्यैवाकारस्योपलम्भात् । अथास्ति प्रकाशम् , न तत्स्वयमप्रकाशमानमप्रकाशस्वभावं विषयमपि प्रकाशयेत् । यदव्यक्तप्रकाशं तदव्यक्तम् , यथा कुड्यादिव्यवहितं वस्तु , अव्यक्त प्रकाशश्च परस्य बाह्यर्थः । तथा यत्परस्य प्रकाशकं तत्स्वप्रकाशे सजातीयपरानपेक्षम् , यथा प्रदीपः , प्रकाशकं च परस्य ज्ञानमिति । अतः प्रकाशमानस्यैव बोधस्य विषयप्रकाशकत्वमिति न्यायादनपेतम् । तथा सति सहोपलम्भनियमात् सर्वज्ञासर्वज्ञयोरिव वेद्यवेदकयोरभेदः , भेदस्य सहोपलम्भानियमो व्यापको नीलपीतयो - युगपदुपलम्भनियमाभावात् । सहोपलम्भानियमविरुद्धश्च सहोपलम्भनियम इति व्यापकविरुद्धोपलब्ध्या भेदादनियमव्याप्त्या व्यावर्तमानो नियमोऽभेदे व्यवतिष्ठत

प्रतिबन्धसिद्धिः । न च ' सह ' शब्दस्य साहाय्यं यौगपद्यं वार्थः , तयोश्च भेदेन व्याप्तत्वाद्विरुद्ध इति वाच्यम् , आभिमानिकस्य सहभावस्य हेतुविशेषणत्वेनोपादानात् दृष्टान्ते द्विचन्द्रे आभिमानिकः सहभावो न तात्त्विकः , चन्द्रस्यैकत्वात् । सार्वज्ञ्यवित्तक्षणः स्वेनात्मना सह सर्वान् प्राणिनो युगपदुपलभ्यते । न च तेषां सार्वज्ञज्ञानाभेद इत्यनैकान्तिकत्वमिति चेत् ? न , अनियमात् । क्षणाभिप्रायेण तावद् ययोः सहोपलम्भस्तयोरसौ नियत एव , क्षणयोः प्रत्येकं पुनरनुपलम्भात् ।

किन्तु सन विवक्षितः सन्तानाभिप्रायेण सहोपलम्भनियमः । न च सर्वज्ञसन्तानस्य चित्तान्तरसन्तानेन सह युगपदुपलम्भोऽस्ति , सर्वज्ञस्य कदाचित् स्वात्ममात्रप्रतिष्ठस्यापि सम्भवात् । न च तदानीमसर्वज्ञः सर्वज्ञात् सामर्थ्यसम्भवात् । अपचन्नपि पाचको यथा , तथा यद्वेद्यते येन वेदनेन तत्ततो न भिद्यते , यथात्मा ज्ञानस्य , वेद्यन्ते च नीलादयः । भेदे हि ज्ञानेनास्य वेद्यत्वं न स्यात् तादात्म्यस्य नियमहेतोरभावात् , तदुत्पत्तेरनियामकत्वात् ।

अन्येनान्यस्यासम्बद्धस्य वेद्यत्वे चातिप्रसङ्गादिति भेदे नियमहेतोः सम्बन्धस्य व्यापकस्यानुपलब्ध्या भेदाद्विपक्षाद् व्यावर्तमानं वेद्यत्वमभेदेन व्याप्यत इति हेतोः प्रतिबन्धसिद्धिरिति । एतेनाहमित्याकारस्यापि ज्ञानादभेदः समर्थितः । यश्चायं ग्राह्यग्राहकसंवित्तीनां पृथगवभासः स एकस्मिरचन्द्रमसि द्वित्वावभास इव भ्रमः । तत्राप्यनादिरविच्छिन्नप्रवाहाभेदवानैव निमित्तम् । यथोक्तम्-

" भेदश्चाभ्रान्तिविज्ञाने दृश्येतेन्दाविव द्वये " इति ।

ननु बाह्याभावे येयं नीलाद्याकारवती बुद्धिरुदेति तस्याः किं कारणम् ? यथोक्तम्-

अर्थबुद्धिस्तदाकारा सा त्वाकारविशेषणा |

सा बाह्यादन्यतो वेति विचारमिममर्हति ॥

अत्रापि वदन्ति - बाह्मसद्भावेऽपि तस्याः किं कारणम् ? नीलादिरर्थ इति चेत् ? न तावदयं दृश्यतेऽर्थस्य सदातीन्द्रियत्वात् । कार्यवैचित्र्येण कल्पनीयश्चेत् ? दृश्यस्य समनन्तरप्रत्ययस्यैव शक्तिवैचित्र्यं कल्प्यताम् , येन स्वप्न- घटते , देशकालव्यवहितानामर्थानां ज्ञानेऽप्याकारवैचित्र्यं तत्र

अपरे तु ज्ञानाकारस्याप्यनादिवासनावशेन प्रतिभासमानस्य विचारा . क्षमत्वमलीकत्वमेव तत्त्वमाहुः । तथा च यः प्रत्यय : स बाह्यांनालम्बनो यथा स्वप्नादिप्रत्ययः प्रत्ययश्चायं जाग्रतः स्तम्भादिप्रत्ययः , निरालम्बनता हि प्रत्ययत्वमात्रानुबन्धिनी स्वप्नादिषु दृष्टा , जाग्रतः प्रत्ययस्यापि प्रत्ययत्वमेव स्वभावः , यदि निरालम्बनत्वं परित्यजति तदा स्वभावमेव परित्यजेत् । ननु सर्वप्रत्ययानामनालम्बनत्वे धर्महेतुदृष्टान्तादिप्रत्ययानामनालम्बनत्वम् , ततश्च धर्महेत्वाद्यभावान्नानुमानप्रवृत्तिः । अथ ते सालम्बनास्तैरेवास्य हेतोर्व्यभिचारः ? नैवम् तेषां बहिरनालम्बनानां संवृतिमात्रेणानुमानप्रवृत्तिहेतुत्वात् । दृष्टा

विद्यात विद्याप्राप्तिः , यथा लिप्यक्षरेभ्यो वर्णप्रतीतिः , वर्णप्रतिपादक रेखादयोऽपि स्वरूपेण सत्याः । सत्यं सत्याः , न तु तेन रूपेण प्रतिपादकाः । ककारादिरूपाध्यारोपेण प्रतिपादकाः , तदेषां कार्योपयोगित्वमसत्यमेवेति पूर्वपक्षसंक्षेपः ।

यत्तावदुक्तं ग्राह्यलक्षणायोगादिति न तदर्थाभावसाधनसमर्थम् , ग्राह्यलक्षणो ह्यर्थो ग्राह्यो न भवेन्न तु तस्यासद्भावः , ग्रहणाभावस्य पिशाचादिवत् स्वरूपविप्रकर्षेणाप्युपपत्तेः । ग्रहणयोग्ये सत्यग्रहणादभावसिद्धिरिति चेत् ? कथं पुनरस्य योग्यता संप्रधारिता ? नहि तस्य ग्रहणं क्वचिदभूत् , भूतं चेन्न ग्राह्यलक्षणायोगः । किञ्च , ग्राहकाधीनं ग्रहणम् , ग्राहकं च ज्ञानं स्वात्ममात्रनियतमित्येतावतैव तदन्यस्याग्राह्यता , ग्राह्याभावादेव चेदमग्रहणमिति साध्याविशिष्टम् ।

अपि चेदं भवान् पृष्टो व्याचष्टां का ज्ञानाकारस्य ग्राह्यता ? नहि तस्यास्ति ज्ञानहेतुत्वं तदव्यतिरेकात् । नाप्याकाराधायकत्वम् , आकारद्वयाननुभवात् । न च ज्ञानात्मकत्वमेव ग्राह्यत्वम् , सुषुप्तावस्थायां ज्ञानात्मभूतस्य ज्ञानसन्तानवदनुवर्तमानस्यापि ग्रहणाभावात् । अवभासमानत्वमेव तस्य ग्राह्यत्वमिति चेत् ? कोऽयमाकारस्यावभासः ? ज्ञानप्रतिबद्धहाना दिव्यवहारयोग्यतापत्तिश्चेत् ? बाह्यस्यापि सेव योग्यता ।

तथा हि - नीलं पीतमेतदिति संवादिना बाह्यमेवोपाददते जहत्युपेक्षन्ते वा , नान्तरमाकारमित्यसिद्धो ग्राह्यलक्षणायोगः , कथमन्यस्योत्पत्त्यान्यस्य व्यवहारयोग्यतेति चेत् ? तस्य स्वरूपकारणसामग्रीनियमेन तद्विषयव्यवहारानुगुणस्वभावस्योत्पादनादिति यत्किञ्चिदेतत् । वेद्यत्वमपि भेदेऽपि ज्ञानस्वभावकारणसामग्री-

एतेन प्रत्युक्तम् । नियमादेव तस्योपपत्तेः , सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वात् । यदपि जडस्य प्रकाशायोग इति , तदपि प्रकाशानात्मकत्वाभिप्रायेण । सिद्धसाधनं संसर्गाभिप्रायेण निरुपपत्तिकम् । नहि जडस्य प्रकाशसंसर्गेण न भवितव्यमित्यस्ति राजाज्ञा , यथा छिदिक्रिया छेद्येन सम्बध्यते भिद्यते च , तथा ज्ञानक्रियापि ज्ञेयेन सह संभन्त्स्यते भेत्स्यते च । सहोपलम्भनियमस्यापि विपक्षाद् व्यावृत्तिः सन्दिग्धा , ज्ञानस्य स्वपरसंवेद्यतामात्रेणैव नीलतद्धियोर्युगपद्ग्रहणनियमस्योपपत्तेः ।

बाह्याभावाज्ज्ञानं परस्य संवेदकं न भवतीति चेत् ? बाह्याभावसिद्धौ हेतोर्विपक्षाद् व्यावृत्तिसिद्धिः , तत्सिद्धौ चास्य विपक्षाभावं प्रति हेतुत्वमित्यन्योन्यापेक्षित्वम् ? तदेवास्तु किमनेन ? असिद्धश्च सहोपलम्भनियमो नीलमेतदिति बहिर्मुखतयार्थऽनुभूयमाने तदानीमेवान्तरस्य तदनुभवस्यानुभवात् । ज्ञानस्य स्वसंवेदनता सिद्धौ सहोपलम्भनियम सिद्धिरिति चेत् ? स्वसंवेदनसिद्धौ किं प्रमाणम् ? यत्प्रकाशं तत्स्वप्रकाशे परानपेक्षं यथा प्रदीप इति चेत् ?

प्रदीपस्य तद्देशवर्तितमोपनयने व्यापारः , स चानेन स्वयमेव कृत इति तदर्थं प्रदीपान्तरं नापेक्षते , वैयर्थ्यात् । स्वप्रतिपत्तौ तु चक्षुरादिकमपेक्षत एवेति साध्यविकलता दृष्टान्तस्य । अथ प्रकाशकत्वं ज्ञानत्वमभिप्रेतम् ? तस्मात् परानपेक्षा , तदानीमसाधारणो हेतुः ।

चोक्तं यस्याव्यक्तः प्रकाशः तत्स्वयमव्यक्तं यथा पिहितं वस्त्विति , तत्र पिहितस्याव्यक्तता अप्रकाशः , तन्न , स्वयमव्यक्तत्वात् किन्त्वभावादेवेति व्याप्त्यसिद्धिः । यच्च प्रत्ययत्वादिति तदप्यसारं दृष्टान्तासिद्धेः । स्वप्नादिप्रत्यया अपि समारोपित बाह्यालम्बना न स्वात्ममात्रपर्यवसायिनः , जाग्रदवस्थोपयुक्तानामेवार्थानां संस्कारवशेन तथा प्रतिभासनात् , अन्यथा दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु तदुत्पत्तिनियमायोगात् । किञ्च , यदि बाह्यं नास्ति किमिदानीं नियताकारं प्रतीयते नीलमेतदिति । विज्ञानाकारोऽयमिति चेन्न , ज्ञानाद्वहिर्भूतस्य संवेदनात् । ज्ञानाकारत्वे त्वहं नीलमिति प्रतीतिः स्यान्न त्विदं नीलमिति । ज्ञानानां प्रत्येकमाकारभेदात् कस्यचिदहमिति प्रतीतिः कस्यचिदिदं नीलमिति चेत् ? नीलाद्याकारवदहमित्याकारस्य व्यवस्थितत्वाभावात् । तथा च यदेकेनाहमिति प्रतीयते तदपरेण त्वमिति प्रतीयते , स्वयं स्वस्य संवेदनेऽहमिति प्रतिभास इति चेत् ? कि वै परस्यापि संवेदनमस्ति ? स्वरूपस्यापि भ्रान्त्या भेदप्रतीतिरिति चेत् ? प्रत्यक्षेण प्रतीतो भेदो वास्तवो न कस्मात् ? भ्रान्तं प्रत्यक्षमिति चेत् ? यथोक्तम्-

परिच्छेदान्तरं योऽयं भागो बहिरवस्थितः ।

ज्ञानस्याभेदिनो भेदप्रतिभासो ह्यपप्लवः ॥ इति ।

कुत एतत् ? अनुमानेनाभेदसाधनादिति चेत् ? प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वेनाबाधितविषयत्वादनुमानस्यात्मलाभः , लब्धात्मके चानुमाने प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमित्यन्योन्यापेक्षितादोषः । अस्तु वा भेदो विप्लवो नियतदेशाधिकरणप्रतीतिः , कुतः ? नहि तत्रायमारोपयितव्यो नान्यत्रेत्यस्ति नियमहेतुः । वासनानियमात् तदापनियमः स्यादिति चेन्न तस्या अपि तद्देशनियमकारणाभावात् । सति ह्यर्थसद्भावे यद्देशोऽर्थस्तद्देशानुभवस्तद्देशा च तत्पूर्विका वासना , बाह्याभावे तु तस्याः किंकृतो देशनियम : ?

न च कारणविशेषमन्तरेण कार्यविशेषो घटते , बाह्यचार्थो नास्ति । तेन वासनानामेव वैचित्र्यं तद्वैचित्र्यस्यार्थवत्तत्कारणानां वैचित्र्यादित्यनादिरिति चेत् ? वासनावैचित्र्यं यदि बोधाकारादनन्यत् कस्तासां परस्परतो विशेषः ? अथान्यदर्थे कः प्रद्वेषः ? येन सर्वलोकप्रतीतिरपह्वयते । न चायमाकारो बहिरारोप्यते ? ज्ञानेन चेत् ? किं तस्य स्वात्मन्याकारसंवित्तिरेव बहिरारोपस्तदन्यो वा ?

आद्ये कल्पे संव तस्य सम्यक्प्रतीतिः , सैव च मिथ्येत्यापतितम् , ज्ञानगतत्वेनाकारग्रहणस्य सत्यत्वात् , बाह्यतासंवित्तेश्चायथार्थत्वात् । अन्यत्वे तु तयोर्न क्रमेण भावः , तत्कारणस्य ज्ञानस्य क्षणिकत्वात् । न चैकस्य युगपत्सत्यत्वेन मिथ्यात्वेन च प्रतीतिसम्भवः । न च क्रमयौगपद्याभ्यामन्यः प्रकारोs स्ति , यत्र वर्तमानं ज्ञानं स्वात्मन्याकारं गृह्णीयाद्व हिश्च तमारोपयति ।

अपि च यदि ज्ञानाकारी नीलादिरर्थो यस्यैवायमाकारः स एव तं प्रतीयात् न पुरुषान्तरं प्रतीयात् । प्रतीयते चायं बहुभिरेकः , सर्वेषां तदाभिमुख्येन युगपत्प्रवृत्तेः , यस्त्वया दृष्टः स मयापीति प्रतिसन्धानात् । तस्मादर्थोऽयं न ज्ञानाकारः ।

ये तु ज्ञानाकारमप्यपहृवाना अलीका एव नीलादयः प्रतिभासन्ते इत्याहुः , तेषां कारणनियमादुत्पत्तिनियमोऽर्थ क्रियानियमश्च न प्राप्नोति , अर्थाभावेन किञ्चित् कस्यचित् कारणम् , सर्वं वा सर्वस्य , नार्थक्रियासंवादो न वा विसंवादो विशेषाभावात् । यथोक्तं गुरुभिः-

आमोदकता ये ये चोपार्जितमोदकाः ।

रसवीर्यविपाकादि तेषां तुल्यं प्रसज्यते ॥ इति ।

वासनाविशेषात् तद्विशेषसिद्धिरिति चेत् ? सा यदि बाह्यार्थक्रियाविशेषहेतुः ? संज्ञाभेदमात्रम् , अर्थो वासनेति । अथ ज्ञानात्मिका ? अर्थाभावे तस्या विशेष निर्निबन्धनो बोधमात्रस्योपादानस्य सर्वत्राविशेषात् बोधाकारस्य व्यतिरिक्तस्य च विशेषस्याभ्युपगमेऽर्थ सद्भावाभ्युपगमप्रसङ्गादित्युक्तम् । न चास्मिन् पक्ष नीलादिप्रत्ययस्य कादाचित्कत्वं स्यात् , तज्जननसमर्थक्षणसन्तानस्य सर्वदा - नुवृत्तेः , अननुवृत्तौ वा कालान्तरेऽपि तत्प्रत्ययानुपपत्तिः स्वव्यतिरिक्तस्यापेक्षणी यस्याभावात् । कारणपरिपाकस्य कादाचित्कत्वात् तत्कार्यस्य कादाचित्कत्वमिति चेत् ? कारणस्य परिपाकः कार्यः , कार्यजननं प्रत्याभिमुख्यम् , सोऽपि स्वसंवेदनमात्राधीनो न कादाचित्को भवितुमर्हति । अस्ति चायं कादाचित्कः प्रत्यक्षप्रतिभासः , स एव प्रतीतिविषयं देशकालकारणस्वभावनियतं बाह्यं वस्तु व्यवस्थापयंस्तदभावसाधनं बाधत इति कालात्ययापदिष्टत्वमपि हेतुनामित्युरम्यते । समधिगता संख्या ।

सम्प्रति परिमाणनिरूपणार्थमाह- परिमाणं मानव्यवहारकारणमिति । मानव्यवहारोऽणु महद् दीर्घं ह्रस्वमित्यादिज्ञानं शब्दश्व , तस्य कारणं परिमाणमित्यनेन प्रत्यक्षसिद्धस्यापि परिमाणस्य विप्रतिपन्नं प्रति कार्येण सत्तां दर्शयति । यथा तावज्ज्ञानस्य ज्ञेयप्रसाधकत्वं तथोक्तम् ।

शब्दस्य तु कथम् ? न सावर्थात्मा , अन्नाग्न्यसिशब्दोच्चारणे भुखस्य पूरणदाहपाटनप्रसङ्गात् । नाप्यर्थजः , कौष्ठयवायुकण्ठाद्यभिघातजत्वात् अतदात्मनोऽतदुत्पन्नस्य प्रतिपादकत्वे चातिप्रसङ्गात् । तदयुक्तम् , यदि कण्ठाद्यभिघातमात्रज एव शब्दो न वक्तुविवक्षामपि प्रतिपादयेत् तदुत्पत्त्यभावात् । तथा च वक्तुविवक्षामपि न सूचयेयुः शब्द इति प्रमत्तगीतं स्यात् । पारम्पर्येण विवक्षापूर्वकत्वाच्छन्दस्य विवक्षाप्रतिपादकत्वमिति चेत् ? एवमर्थानुभवप्रतिपादकत्वमपि विवक्षाया अर्थानुभवअसत्यामपि तदर्थविवक्षायां भ्रान्तस्य तदर्थविषयं पूर्वकत्वात् । असत्यप्यर्थानुभवे विप्रलम्भकस्य तदर्थविवक्षाप्रतीतिरिति चेत् ?

वाक्यमुपलब्धम् । यथाहु राचार्या : - -

' भ्रान्तस्यान्यविवक्षायामन्यद् वाक्यं हि दृश्यते । ' इति ।

नान्यविवक्षातोऽन्याभिधानसम्भवः , अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यद् यस्य कारणमवगतं तस्य तद्वयभिचारे विश्वस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गात् , अतो भ्रान्तस्याप्रतीयमानापि तदर्थविवक्षा सहसोपजाता गच्छत्तृणसंस्पर्शज्ञानवदस्पष्टरूपा कार्येण कल्पनीयेति चेत् ? विप्रलम्भकस्यापि विवक्षाविशेषेण तदर्थानुभवः कल्प्यताम् , असं विदितेऽर्थे तद्विषयस्य विवक्षाविशेषस्यायोगात् । तदानीं विप्रलम्भकस्य तदर्थानुभवो नास्तीति चेत् ? मा स्म भूत् , स्मरणं तावद्विद्यते विप्रलम्भको हि पूर्वानुभूतमेवार्थमन्यथाभूतमन्यथा च कथयति । तत्रास्य तदर्थविवक्षा स्मरणकारणिका भवन्ती पारम्पर्येण तदनुभवकारणिकेति नास्ति व्यभिचार :, मिथ्यानुभवपूविकाया अपि विवक्षायाः पारम्पर्येण सत्यानुभवपूर्वकत्वात् । अनुभवश्चार्थाव्यभिचारीति शब्दादर्थसिद्धिः । अन्यथा वाक्यश्रुतौ श्रोतुरर्थप्रतीत्यभावाद् विवक्षामात्रप्रतीतेश्चापुरुषार्थत्वाच्छाब्दो व्यवहार उच्छिद्येत , वादिप्रतिवादिनोर्जयपराजयव्यवस्थानुपपत्तिः , विवक्षामात्रं प्रत्युभयोरपि भूतार्थवादित्वात् ।

यच्चोक्तं द्रव्यादव्यतिरिक्तं परिमाणम् , द्रव्याग्रहे तद्बुद्धयभावदिति , तदसिद्धम् । दूराद् द्रव्यग्रहणेऽपि तत्परिमाणविशेषस्याग्रहणात् । अत एव महानप्यणुरिव भ्रान्त्या दृश्यते ।

एवं व्यवस्थिते परिमाणे तस्य भेदं कथयति तच्चतुर्विधमिति । येन रूपेण चातुविध्यं तद्दर्शयति- अणु महद् दीर्घं ह्रस्वं चेति । चतुरस्रादिकं त्ववयवानां संस्थानविशेषो न परिमाणान्तरम् । दीर्घत्वादयोऽपि तथा भवन्तु ? न अवयवसंस्थानानुपलम्भेऽपि दूराद् दीर्घादिप्रत्ययत्य दर्शनात् । अपि च भोः ! द्व्यणुकपरिमाणं तावदणु , महत्परिमाणोत्पत्तौ कारणाभावात् । तस्माच्च परमाणुपरिमाणमपकृष्टम् , कार्यपरिमाणात् कारणपरिमाणस्य होनत्वदर्शनात् । ततश्च परमाणोः परिमाणं द्वयणुकपरिमाणाद्भिन्नम् । एवं घटादीनां परिमाणादन्यदेव प्रकर्षपर्यन्तप्राप्तमाकाशादिपरिमाणम् , तथा दीर्घं ह्रस्वं चेति परिमाणमष्टविधमेव , कुतश्चातुविध्यमित्याह -- तत्रेति । तेषु चतुर्षु परिमाणेषु मध्ये महद् द्विविधं नित्यमनित्यं चेति । केषु नित्यमित्याह - नित्यमाकाशकालदिगात्मसु । तच्च परममहत्त्वमित्युच्यते । अनित्यं महत्परिमाणं त्र्यणुकादावेव नाकाशादिष्वित्यर्थः ।

परिमाणं मानव्यवहारकारणम् तच्चतुर्विधम् - अणु महद् दीर्घं ह्रस्वं चेति । तत्र महद् द्विविधम् - नित्यमनित्यं च । नित्यमा-

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — द्रव्य को छोड़कर दोनों गुण रूप एकत्वों के स्मरण रूप प्रमाण से ही यह समझते हैं कि ' उक्त अपेक्षाज्ञान संस्कार का कारण नहीं है ' । एवं गुणविशिष्ट द्रव्य के स्मरण रूप प्रमाण से ही यह भी समझते हैं कि गुणविशिष्टद्रव्य का ज्ञान संस्कार का कारण है ' ।

किसी का कहना है कि ( प्र ० ) अगर एक ज्ञान उत्पन्न होकर पहिले उत्पन्न दूसरे ज्ञान को ( अपने अगले ही क्षण में , नष्ट करता है तो फिर इस ( वध्यघातक ) पक्ष में उन दोनों ज्ञानों की एक हो ( विनाशक ज्ञानोत्पत्ति ) क्षण में स्थिति प्राप्त हो जाती है । ऐसा होने पर ' ज्ञानायोगपद्यात् यह सूत्र विरुद्ध होता है । यही आक्षेप ' ज्ञानायौगपद्यप्रसङ्गः स्यान्मतम् ' इत्यादि से करते हैं । ' ननु ' इत्यादि से इसी आक्षेपोक्ति की व्याख्या करते हैं ।

' न ' इत्यादि से इस आक्षेप का समाधान इस प्रकार करते हैं कि एक क्षण में विनाश्य एवं विनाशक इन दो ज्ञानों की अवस्थिति से ज्ञानयोगपद्य रूप दोष नहीं होता है । ज्ञानायौगपद्यात् ' इस सूत्र के द्वारा विनाश्यविनाशकभावानापन्न परस्पर निरपेक्ष दो ज्ञानों की एक क्षण में सत्ता का ही निषेध महर्षि कणाद को उक्त सूत्र से अभीष्ट है । ' ज्ञानायौगपद्यवचनेन ' इत्यादि भाष्य के द्वारा यही उपपादन किया गया है ।

अर्थात् वध्यघातक पक्ष में अनेक ज्ञानों की एक क्षण में ( एक आत्मा में ) उत्पत्ति की आपत्ति नहीं है , एवं विनाश्यविनाशकभावानापन्न परस्पर निरपेक्ष अनेक ज्ञानों की स्थिति की भी आपत्ति नहीं है , क्योंकि एक ( विनाशक ) ज्ञान की उत्पत्ति के समय दूसरे ( ( विनाश्य ) ज्ञान की विनाशावस्था हो जाती है । यही बात ' नहि ' इत्यादि से कहते हैं । इस ' इति ' शब्द का अर्थ समाप्ति है ।

( प्र ० ) द्वित्व की उत्पत्ति या नाश अथवा ज्ञान , इन सबों का निरूपण हो गलत है , क्योंकि द्वित्वादि संख्याओं की सत्ता ही प्रमाणशून्य है । ( उ ० ) ' द्वे ' ( यह दो है ) इस आकार का ज्ञान ही द्वित्व संख्या की सत्ता में प्रमाण है । ( प्र ० ) नहीं , क्योंकि ' द्वित्व ' ग्राह्य लक्षण ( ज्ञान से गृहीत होने योग्य ) नहीं है । ( उ ० ) अभिप्राय यह है कि उत्पन्न वस्तुओं का या अनुत्पन्न वस्तुओं का ही ज्ञान से ग्रहण होगा ।

इन दोनों में से किसी भी प्रकार द्वित्वादि विषयक ज्ञान की उपपत्ति नहीं हो सकती है , क्योंकि उत्पन्न वस्तुओ की स्थिति रहती हैं , एवं अनुत्पन्न वस्तुओं का अस्तित्व ही नहीं होता है । ( उ ० ) अतीत वस्तु ही ज्ञान से गृहीत होता है , क्योंकि वही अर्थज्ञान का कारण है । ( ४० ) नहीं , क्योंकि इससे वर्त्तमानत्व की स्वाभाविक प्रतीति विरुद्ध हो जाएगी । एवं ( ज्ञान के कारण होने से ही अगर ज्ञान से ग्राह्य भी हो तो फिर ) इन्द्रियो के भी ( प्रत्यक्ष ) ज्ञान की आपति होगी ।

यह कहें कि ( उ ० ) वस्तुओं के अपने उत्पादक कारणों से यही स्वभाव प्राप्त हैं कि घटादि और इन्द्रियादि इन दोनों प्रकार की वस्तुओं में ज्ञान की कारणता समान रूप से रहने पर भी घटादि वस्तुएँ ही ग्राह्य हैं इन्द्रियादि वस्तुएँ नहीं । एवं वस्तु की उत्पत्ति के अव्यवहित आगे के क्षण का ज्ञान ही वस्तु के वर्तमानत्व का अवभास है । ( प्र ० ) घटादि वस्तुओं में रहनेवाला एवं इन्द्रियादि वस्तुओं में न रहनेवाला यह ' ग्राह्यत्व ' क्या वस्तु है !

अगर ( उ ० ) ज्ञान के प्रति कारणत्व ही यह ग्राह्यत्व है तो ( प्र ० ) इन्द्रियादि में फिर ग्राह्यत्व की आपत्ति होगी , क्योंकि ज्ञान का हेतुत्व भर तो इन्द्रियादि में भी समानरूप से है । ( उ ० ) ज्ञान का ' स्वसंवेदन ' ही घटादि वस्तुओं की ग्राह्यता है । ( ० ) यह तो बड़ी विचित्र बात है कि एक वस्तु के स्वरूप का ज्ञान दूसरे की ग्राह्यता हो । ( उ ० ) नहीं , इसमें कोई विचित्रता नहीं है , क्योंकि वस्तुओं का स्वभाव अभियोग की सीमा से बाहर है ।

विज्ञान अर्थग्रहण स्वरूप ही है अतः विज्ञान के स्वरूप के संवेदन से ही अर्थ का ग्रहण होता है । इनमें से जो अर्थ विज्ञान का ( विषयविषया कारण होता है , उस अर्थ का ग्रहण ही विज्ञान है , सभी अर्थों का ग्रहण विज्ञान नहीं है , अतः इन्द्रियज्ञान की आपत्ति नहीं है । ( प्र ० ) नहीं , क्योंकि वह एक ही काम कर सकती है ।

अथं से ज्ञान की उत्पत्ति ही ज्ञान का अर्थजन्बत्व है . अतः वह अर्थ और ज्ञान दोनों का धर्म नहीं हो सकता ( वह ज्ञान का हो धर्म है , अतः ) ज्ञानों का ही नियमन कर सकता है , अर्थों का नहीं । अगर अर्थ का धर्म है तो फिर ज्ञानों का ही नियमन नहीं कर सकता , क्योंकि वह दूसरे का धर्म है । दोनों के नियम से ही ' ग्राह्यग्राहक व्यवस्था ' की , अर्थात् घटविषयकज्ञान का ग्राह्य घट ही है , घटजन्य ही घटज्ञान है - इस व्यवस्था की उपपत्ति हो सकती है , किसी एक के नियम से नहीं ।

एवं भूत और भविष्य अर्थ ज्ञान के कारण मी नहीं हैं , क्योंकि उस समय उनका अस्तित्व ग्राहकत्वमेव विषयित्वम् , तयोः प्रतिनियमे एव कारणे पृष्टे तदेवोत्तरमुच्यत इति सर्वोत्तरधियां परिस्फुरति । नियतार्थावग्राहितापि ज्ञानस्य स्वभाव इति चेत् ? स पुनरस्य स्वभावो यदि निर्हेतुको नियमो न प्राप्नोति । अथ कारणवशात् ? तदेवोच्यतां कि स्वभावपरिघोषणया , न च तदुत्पत्तेरन्यत् पश्यामः । अथोच्यते यदुत्पादयति सरूपयति ज्ञानम् , तदस्य ग्राह्यं नेतरत् ।

अवश्यं चार्थाकारो ज्ञानेऽप्येषितव्यः , अन्यथा निराकारस्य बोधमात्रस्य सर्वार्थं प्रत्यविशेषाद् नीलस्येदं पीतस्येदमिति व्यवस्थानुपपत्तौ ततोऽर्थविशेषप्रतीत्यभावात् । अत एव विषयाकारं प्रमाणमाहुः । स चासाधारणो ज्ञानमर्थविशेषेण सह घटयति , न साधारणमिन्द्रियादिकम् । तदुक्तम्-

अर्थेन घटयत्येनां नहि मुक्त्वार्थरूपताम् ।

तस्मात् प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपता ॥

अपरत्र चोक्तम्- नहि वित्तिसत्तैव तद्वेदना युक्ता तस्याः सर्वत्राही नहीं है । ( उ ० ) ' विषयविषयिभाव ' से ही ' ग्राह्यग्राहकभाव ' की व्यवस्था होगी । ( प्र ० ) नहीं , क्योंकि दोनों एक ही बात है । ग्राह्यत्व और विषयत्व एक ही वस्तु है । एवं ग्राहकत्व और विषयित्व इन दोनों में भी कोई अन्तर नहीं है । इन दोनों के कारण के पूछने पर उन्हीं दोनों को उपस्थित करते हैं । इस प्रकार का उत्तर तो किसी लोकोतर बुद्धिवाले को ही सूझ सकता है ।

( उ ० ) ज्ञान का यह भी स्वभाव है कि वह किसी नियत अर्थ को ही ग्रहण करे ( प्र ० ) यह ( नियतविषयग्राहकत्व ) ज्ञान का स्वभाव तभी हो सकता है जब कि वह बिना किसी कारण के ही ज्ञान में रहे । अगर यह स्वभावनियम भी किसी कारण से ही ज्ञान में रहे तो फिर उसी का उल्लेख क्यों नहीं करते , स्वभाव की घोषणा क्यों करते हैं ? अगर ज्ञान की उत्पत्ति को छोड़कर ज्ञान के ( विषय ) नियम का और किसी को कारण ही नहीं समझते ?

अगर यह कहें कि ( उ ० ) जो जिस ज्ञान को उत्पन्न करती है और आकार प्रदान करती है , वही वस्तु उस ज्ञान की ग्राह्य है और कोई वस्तु नहीं । एवं ज्ञान अर्थाकारता भी माननी ही पड़ेगी , क्योंकि ज्ञान को अगर निराकार मानें तो फिर वह सभी विषयों के प्रति समान ही होगा । इससे ' यह ज्ञान नील विषयक हैं , एवं वह पीत विषयक ' इस व्यवस्था की उपपत्ति नहीं होगी , अत : इस पक्ष में ज्ञानविशेष से अर्थविशेष का बोध नहीं होगा । अतः विषय के आकार को ही प्रमाण कहते हैं ।

वह असाधारण आकार ही ज्ञान को अर्थविशेष के साथ सम्बद्ध करता है , साधारण इन्द्रियादि नहीं । जैसा कहा है कि इस अर्थरूपता ( अर्थाकारता ) को छोड़कर ज्ञान को अर्थ के साथ कोई सम्बद्ध नहीं करता है , अतः ज्ञान की प्रमेयाकारता को छोड़कर प्रमेय के यथार्थ ज्ञान का कोई दूसरा करण ( प्रमाण ) नहीं है । दूसरी जगह और भी कहा है कि वित्ति ( ज्ञान ) की सत्ता मात्र

३८ से वस्तुओं का ज्ञान सम्भव नहीं है , क्योंकि वह सभी वस्तुओं में समान रूप से है । किन्तु उसमें विषयाकारता का प्रवेश होने पर उसी से विषयों का अवभास होता है । ( प्र ० ) इस प्रसङ्ग में मेरा कहना है कि आकार से युक्त ज्ञान के द्वारा अर्थ की अनुभूति होती है ? या उसके अपने आकार का ही अनुभव होता है ? अथवा आकार एवं वस्तु दोनों का ही अनुभव होता है ? दोनों का अनुभव तो उससे होता नहीं , क्योंकि ' यह नील है ' इससे एक ही आकार का अनुभव होता है ।

एवं ज्ञान के द्वारा अर्थ का अनुभव सम्भव भी नहीं है , क्योंकि अर्थ के अस्तित्व के समय ज्ञान को उत्पत्ति नहीं हो सकती । एवं ज्ञान के अस्तित्व के समय वस्तुएं अतीत हो जाती हैं , अतः वर्त्तमानत्व विषयक वस्तुओं की ' घटोऽस्ति ' इत्यादि प्रतीतियाँ असम्भव हैं ।

' घटोऽस्ति ' इत्यादि आकार की प्रतीतियों में भासित होनेवाला वर्त्तमानत्व घटादि अर्थों का नहीं , किन्तु ज्ञान के साथ उत्पन्न होनेवाले क्षण का है , यह कहना केवल अपने सिद्धान्त में अत्यन्त श्रद्धा प्रकट करना है क्योंकि वर्तमानत्व उस ज्ञान का ग्राह्य ही नहीं है । एवं इसमें भी कारण कहना पड़ेगा कि एक ज्ञान किसी नियत विषय को ही ग्रहण करे , सभी विषयों को नहीं । पहिले कह चुके हैं कि वस्तु विज्ञान से अभिन्न नहीं है ।

यह भी कह चुके हैं कि विज्ञान की उत्पत्ति ( यह ज्ञान इसी विषय का बोधक है , दूसरे ज्ञान का नहीं , इस ) व्यवस्था का कारण नहीं है । ( उ ० ) तदाकारता ही ( अर्थात् जिसमें जिस अर्थ की आकारता है , फलतः जो ज्ञान यदाकारक है वही उसका नियामक है ) इस नियम का कारण होगी । ( प्र ० ) तो क्या एक नील क्षण ( का ग्राहक विज्ञान ) समान आकार के दूसरे नील को भी ग्रहण नहीं करता है ? ( उ ० ) ग्राहकत्व अर्थात् अर्थ को ग्रहण करना तो ज्ञान का स्वभाव है , अर्थ का नहीं ।

( प्र ० ) फिर भी एक ही नील विज्ञान सभी मील क्षणों का ग्राहक होगा , क्योंकि सभी नील क्षणों के आकार में तो कोई अन्तर नहीं है | ( उ ० ) वस्तुओं की उत्पत्ति एवं ( ज्ञान में ) उसका आकारता रूप सादृश्य इन दोनों से अर्थ का ग्रहण होता है , अतः ज्ञान अपने उत्पादक अर्थक्षण का ही ग्राहक है और किसी का नहीं । ( प्र ० ) तो फिर इन्द्रिय और समनन्तरप्रत्यय ( मन ) इन दोनों में भी ग्राह्यता आएगी , क्योंकि वे दोनों मिलकर ज्ञान का उत्पादन करते हैं ।

एवं ज्ञान उन दोनों से ही क्रमशः विषयग्रहण का नियम और बोधात्मकत्वरूप सादृश्य का लाभ करता है । अगर यह कहें कि ( प्र ० ) ज्ञान में नियतविषयग्राहकत्व इन्द्रिय का सादृश्य एवं बोधात्मकत्वरूप समनन्तरप्रत्यय ( मन ) का सादृश्य है , तो फिर ये दोनों तो सभी ज्ञानों में समान रूप से हैं । ज्ञान में विषय से ही असाधारण्य होता है , क्योंकि नीलरूप विपयजन्य ज्ञान में हीनीलाकारता सम्भव है ।

असाधारण धर्म ही नियामक होता है , इसी विशेष के कारण ज्ञान ( अपने जनकों में ) विषय को ही ग्रहण करता है , इन्द्रिय और समनन्तरप्रत्यय ( मन ) को नहीं , किन्तु इस कथन में भी कुछ तत्त्व नहीं है , क्योंकि ( नीलादिविज्ञान से नीलादि वस्तुओं की तरह समान नीलादि विषयक ) समनन्तरप्रत्यय के ग्रहण की आपत्ति तब भी होगी । ( उ ० ) जो वस्तु विज्ञान में नीलादि विषय के आकार का सम्पादन करती है , वही वस्तु उस विज्ञान की ग्राह्य है ।

धारावाहिक ज्ञान में भी समनन्तरप्रत्यय नीलादि आकार की उत्पत्ति नहीं होती , किन्तु नीलादि अर्थों से ही होती है , क्योंकि आकार के प्रति अर्थ ही कारण है , चूँकि उसी के साथ आकार का अन्वय और व्यतिरेक है । एवं बोध में बोधाकार की उत्पत्ति का सामर्थ्यं भी देखा जाता है । ( प्र ० ) यह किसकी आज्ञा है कि विज्ञान में नीलादि आकार का जो सम्पादक हो वही विज्ञान का ग्राह्य हो ? ( उ ० ) विज्ञान के साथ विषय ग्रहण का जो नियम है , वही उक्त नियम का सम्पादक है ।

किसी की आज्ञा से यह नियम नहीं बनाया गया है | ( प्र ० ) फिर स्वभाव के नियम से हो उक्त नियम मानिए । ज्ञान अपने कारणों से नियमित विषय से ही उत्पन्न होता है । एवं अर्थ भी अपने ग्राह्यत्व रूप स्वभाव से ही विज्ञान के द्वारा गृहीत होता है , अत : विज्ञान में आकार का कोई उत्पादक नहीं है । जैसे कि वृक्ष की कुठारजनित छेदन - क्रिया वृक्ष रूप आकार से युक्त नहीं है , फिर भी वह वृक्ष के साथ ही सम्बद्ध होती है , कुठार के साथ नहीं ।

अतः यह कल्पना सुलभ है कि छेदनक्रिया और वृक्ष दोनों का ही यह स्वभाव है कि वह छेदनक्रिया वृक्ष में ही नियमित रहे , अतः ' यह ज्ञान इसी विषयक है ' इस नियम के लिए भी किसी आकार को खोजने की आवश्यकता नहीं है ।

अगर यह कहें कि साकार विज्ञान से अर्थ गृहीत नहीं होता है , केवल विज्ञान का अपना आकार ही गृहीत होता है , अतः अर्थ की सत्ता ही अप्रामाणिक है , क्योंकि अर्थों का ग्रहण ज्ञानरूप भी नहीं हो सकता अध्यवसाय रूप भी नहीं , किन्तु अर्थों का केवल विकल्प रूप ज्ञान ही हो सकता है । वह अगर होता भी है तो प्रत्यक्ष के पीछे होता है जहाँ प्रत्यक्ष प्रवृत्त भी होता है , वहाँ अपने व्यापार को छोड़कर अपने कारणादि के व्यापार को ( विकल्परूप ज्ञान के द्वारा ) ग्रहण कर वस्तु का साक्षात्कार करा देता है ।

जहां प्रत्यक्ष को प्रवृत्ति नहीं होती है , वहाँ कारण के न रहने से विकल्प भी असमर्थ ही है । ( उ ० ) ज्ञान का आकार ही अपने सदृश कारण को सिद्ध करते हुए अर्थसिद्धि का भी जनक प्रमाण है । प्र ० ) क्या यह कहना चाहते हैं कि घटादि स्थूल आकार का सम्पादक भी बाहर ही है ? तो फिर आपके इस वाक्य की क्या गति होगी ? अतः विज्ञान में विज्ञानात्मक स्थूल वस्तु का अवभास नहीं होता है । इस प्रकार एक विज्ञान में आकार के खण्डित हो जाने पर वह और विज्ञानों में भी सम्भव नहीं है ।

( उ ० ) अगर नीलादि आकार के विज्ञान अर्थ के बिना ही उत्पन्न होते हैं तो फिर औरही किसी कारण से कभी उत्पन्न होते हैं , या नीलादि आकारों के afra के बिना ही प्रतीत होते हैं तो फिर और आकार भी वैसे ही होंगे या बिना अस्तित्व के हो प्रतीत होंगे । यह तो उपपादित सा है कि ' आकारवाद ' में ज्ञान के आकारों से किसी आकार को भ्रान्त या अभ्रान्त समझना सहज नहीं हैं ।

दूसरी बात यह है कि बोध का आकार अपने सदृश हो कारण की कल्पना करता है तो फिर इससे यह समझा जाय कि ' इस बोध का जो आकार है उसी तरह का आकार उसका कारण है , ' किन्तु यह आकार को अग्राह्य मानने पर सम्भव नहीं है , क्योंकि कारणत्ब और सादृश्य इन दोनों का ग्रहण उनके प्रतियोगी और अनुयोगी रूप दो सम्बन्धियों के ग्रहण के बिना सम्भव नहीं है । एवं विज्ञान का कारण उससे ग्राह्य नहीं हो सकता , एवं विज्ञान में जो आकार को उत्पन्न करेगा वह विज्ञान का कारण नहीं हो सकता । अतः हमने ठीक कहा था कि बुद्धि के ग्राह्य स्वरूप को छोड़कर और कोई बुद्धि का ग्राह्य नहीं है ।

बुद्धि से भिन्न अर्थ की स्वतन्त्र सत्ता इसलिए भी नहीं है कि अर्थ अगर जड़ है तो फिर स्वयं प्रकाशित नहीं हो सकता , एवं उसके दूसरे प्रकाशक की उपलब्धि होती नहीं है , बराबर एक आकार की ही प्रतीति होती है । अगर कोई दूसरा प्रकाशक है तो फिर वह या तो स्वयं अप्रकाश स्वभाव का होगा ? या प्रकाशस्त्रभाववाला होगा ? इन दोनों में से किसी से भी अर्थों का प्रकाश सम्भव नहीं है , क्योंकि जो स्वयं अप्रकाश स्वभाव का होगा वह अप्रकाशस्वभाव की ही किसी दूसरी वस्तु को कैसे प्रकाशित कर सकता है ?

अगर यह कहें कि विज्ञान और उसके विषय दोनों ही प्रकाशस्वभाव के ही है , किन्तु इनमें विज्ञान का यह स्वभाव व्यक्त है और विषयों का अव्यक्त , अतः प्रकाशस्वभाव वाले विज्ञान में विषयों के प्रकाशस्वभाव अभिव्यक्त होकर विषयों को प्रकाशित करते हैं , तो इस विषय में यह कहना है कि जिसका प्रकाश अव्यक्त रहता है वह स्वयं भी अव्यक्त ही रहता है , जैसे दीवाल से घिरी हुई वस्तु । पूर्वपक्षवादी के मत से वस्तुओं का प्रकाशस्वभाव अव्यक्त है , अतः उसके मत से वे वस्तु कभी प्रकाशित हो ही नहीं सकतीं ।

रही विज्ञान के प्रकाशस्वभाव की बात - इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि जो दूसरे का प्रकाशक होता है , बह अपने प्रकाश के लिए किसी दूसरे प्रकाशस्वभाववाले की अपेक्षा नहीं रखता है , जैसे कि प्रदीप । ज्ञान भी दूसरे का प्रकाशक है अतः विज्ञान ' स्वयं प्रकाश ' हैं ।

विज्ञान दूसरे का प्रकाशक है यह बात न्याय से विरुद्ध भी नहीं है | चूँकि ' सहोपलम्भनियम ' के कारण अर्थात् ज्ञान और अर्थ नियमतः साथ ही प्रकाशित होते हैं इस नियम के कारण ( वे दोनों एक ही हैं ) जैसे कि एक ही पुरुष ( काल भेद से ) सर्वज्ञ एवं असर्वज्ञ दोनों होने पर भी अभिन्न ही होता है , सुतराम् सहोपलम्भ का अनियम भेद का व्यापक है ( अर्थात् यह अव्यभिचरित नियम है ।

कि जिन वस्तुओं का नियमतः साथ साथ प्रकाशन नहीं होता वे अवश्य ही परस्पर भिन्न होती हैं ) जैसे कि नील और पीत नियमतः साथ प्रकाशित नहीं होते और वे दोनों भिन्न होते हैं ।

सहोपलम्भ का यह अनियम कथित —– सहोपलम्भ नियम का विरोधी है , अतः भेद के ) व्यापक ( सहोपलम्भ के अनियम ) के विरुद्ध ( सहोपलम्भ की ) उपलब्धि ( ज्ञान ) और अर्थों के भेद को मिटाकर दोनों को अभिन्न रूप में व्यवस्थित कर देती है , ( अतः विज्ञान से भिन्न किसी वस्तु की वास्तविक सत्ता नहीं है ) , इस प्रकार सहोपलम्भनियम में अभेद की व्याप्ति सिद्ध है । ( उ ० ) सहोपलम्भ शब्द में प्रयुक्त ' सह ' शब्द का साहाय्य अर्थ है ? या एककालिकत्व १ ये दोनों ही विषयों के भेद के साथ सम्बद्ध हैं ।

( प्र ० ) ' सहोपलम्भ ' में आभिमानिक ( सांवृत , अतात्त्विक ) साहित्य को ही विशेषण मानते हैं । इसके दृष्टान्त द्विचन्द्र ज्ञान में भी सांवृत साहित्य ही है , तात्त्विक नहीं , क्योंकि चन्द्र वस्तुतः एक ही है । ( उ ० ) सर्वज्ञत्वविषयक ज्ञान का क्षण तो अपने साथ सभी आत्माओं को ग्रहण करता है , किन्तु सर्वज्ञत्वविषयक ज्ञान और आत्माओं में तो अभेद नहीं है , अत : ' सहोपलम्भनियम ' रूप हेतु व्यभि चरित है ।

( प्र ० ) यह व्यभिचार दोष नहीं है , क्योंकि यह कोई नियम नहीं है कि सर्वज्ञ - चित्त - विषयक ज्ञान के साथ और सभी चित्त अवश्य ही गृहीत हों । क्षण प्रत्येक विज्ञान में भासित होनेवाले प्रत्येक क्षण में स्थित चित्त या आत्मा ) के अभिप्राय से जिन दोनों ( सन्तानियों के समूह में स्थित प्रत्येक व्यक्ति ) के सहोपलम्भ का नियम है उन दोनों में अभेद भी अवश्य ही है , क्योंकि उन दोनों में से प्रत्येक की अलग से उपलब्धि नहीं होती है ।

किन्तु सर्वज्ञत्व ज्ञान के समय जो और सभी आत्माओं की उपलब्धि होती हैं , वह सन्तान के अभिप्राय से है , सन्तान ( समूह ) में स्थित प्रत्येक के अभिप्राय से नहीं , क्योंकि कभी सर्वज्ञत्व की प्रतीति अगर आत्माओं को छोड़कर केवल स्वमात्र विषयक भी हो सकती है , किन्तु इससे उस समय भी वह असर्वज्ञ नहीं हो जाता , क्योंकि उस समय भी उस पुरुष से सर्वज्ञ पुरुष से होनेवाले असाधारण कार्य के सम्पादन की सम्भावना बनी रहती है । जैसे कि पाक न करते समय भी रसोइया ' पाचक ' कहलाता ही है ।

अतः जिस ज्ञान के द्वारा जो गृहीत होता है , वह उससे भिन्न नहीं है । जैसे कि आत्मा ज्ञान से भिन्न नहीं है । नीलादि भी ज्ञात होते हैं । अतः नीलादि और उनके ज्ञान अगर भिन्न हों तो फिर नीलादि उनसे ज्ञात ही नहीं होंगे ।

( घट विषयक ज्ञान से घट ही ज्ञात होता है इस ) नियम का कारण ( उक्त ज्ञान और घटादि विषयों का ) तादात्म्य तो है नहीं और उसकी उत्पत्ति भी नियामक नहीं है ( उत्पत्ति और अभेद ये दो ही व्याप्ति के ग्राहक हैं ) , परस्पर असम्बद्ध दो वस्तुओं में से एक को अगर दूसरे का ज्ञापक मानें ( घट ज्ञान से पट भी ज्ञात हो इत्यादि ) आपत्तियाँ होंगी , अतः ज्ञान और विषय इन दोनों में भेद का ज्ञापक और भेद का व्यापक दोनों के सम्बन्ध को उपलब्धि नहीं होती है ।

ज्ञान के द्वारा समझ में आनेवाले घटादि ज्ञान से भिन्न नहीं हो सकते । इस प्रकार वेद्यत्व भेदरूप विपक्ष से हट जाता है एवं अभेद के साथ व्याप्त हो जाता है । ' अहम् ' इस आकार के ज्ञान का विषय ( आत्मा ) और ज्ञान के अभेद का भी समर्थन हो जाता है । विषय , प्रमाण एवं ज्ञान इनमें जो परस्पर भिन्नत्व की प्रतीति होती है , वह एक ही चन्द्रमा में द्वित्व के अवभास की तरह भ्रम है । इस भ्रम में भी अनादि एवं सतत प्रवाहित होनेवाली वासना ही कारण हैं ।

जैसा कहा है कि भ्रान्तिरूप ज्ञान में ही चन्द्रमा में द्वित्व की तरह भेद भासित होता है । अगर नीलादि बाह्य विषयों की सत्ता ही नहीं है तो फिर नीलादि आकारों से युक्त इन विविध बुद्धियों का कारण कौन है ? जैसा कहा है कि " अर्थ विषयक बुद्धि अर्थाकार होती है , अतः बुद्धि आकार रूप विशेषण से युक्त अवश्य है , अतः यह विचार उठता है कि यह आकार विशिष्ट बुद्धि बाह्य वस्तु से होती है या और किसी वस्तु से ?

इस विषय में विज्ञानवादी कहते हैं कि ( प्र ० ) बाह्य वस्तुओं की सत्ता मान लेने के पक्ष में आकारविशिष्ट बुद्धि का कारण कौन होगा ? अगर नीलादि अर्थों को कारण मानें तो वह हो नहीं सकता , क्योंकि वे कभी देखे नहीं जाते । क्योंकि अर्थ सदा ही इन्द्रिय के अगोचर हैं । अगर कार्यों की विचित्रता से उसका अनुमान करते हैं तो फिर अतीन्द्रिय अर्थ में उस शक्ति की कल्पना की अपेक्षा दृश्य समनन्तरप्रत्यथ में ही विचित्र शक्ति की कल्पना क्यों नहीं कर लेते ?

जिससे कि स्वप्नज्ञान में भी आकार की विचित्रता की उपपत्ति हो सके । स्वप्नज्ञान में भासित होनेवाले एवं देश और काल से व्यवहित विषयों में सामर्थ्यम् अविद्यमानत्वात् । नन्वेवं विचित्रप्रत्ययोऽपि न स्याज्ज्ञानस्यैकत्वेन तदव्यतिरेकिणामप्येकत्वप्रसङ्गात् प्रत्याकारं च ज्ञानभेदे ज्ञानानां प्रत्येकं स्वाकारमात्रनियतत्वात् , तेभ्यो व्यतिरिक्तस्य सर्वाकारग्राहकस्याभावात् । अत्र ब्रूमः न तावच्चित्रं रूपं न प्रकाशते ? संवित्तिविरोधात् । जडस्य च प्रकाशायोगः ।

तेनेदं ज्ञानात्मकमेव रूपम् , न चाकारभेदेन ज्ञानभेद , चित्ररूपस्यैकस्याकारभेदाभावात् । यथा नीलस्टयैको नीलस्वभाव आकार :, तथा वैचित्र्यस्यैकस्य चित्रस्वभाव एवाकारः । तस्मिश्चात्मभूते ज्ञानं प्रवर्तमानं कृत्स्न एव प्रवर्तते , यदि वा न प्रवर्तत एव । न तु भागेन प्रवर्तते तस्य निर्भागत्वात् । ये त्वमी भागाः परस्परविविक्ताः प्रतिभान्ति , न ते चित्रं रूपमिति न काचिदनुपपत्तिः । स्थूलाकारोऽप्यनयैव दिशा समर्थनीयः । अवयवी त्वेकः स्थूलो वा नोपपद्यते ।

नानावयववृत्तित्वेन तस्य नानात्वापातात् । ज्ञानाकारस्त्वेकमिन् ज्ञाने वर्तमान एकः स्थूलो भवत्येव । कम्पाकम्पादिविरोधस्तु संविद्विरोधो व्युदसनीय इति केचित् । स्वप्नज्ञान की कारणता सम्भव ही नहीं है , क्योंकि उस समय उनका अस्तित्व ही नहीं है । ( उ ० ) ज्ञान और अर्थ यदि एक हों तो फिर चित्र रूप की प्रतीति नहीं हो सकेगी , क्योंकि चित्र रूप विषयक प्रतीति एक है , उससे अभिन्न रूप भी एक ही होगा ।

आकार के भेद से यदि ज्ञानों का भेद मानें तो फिर प्रत्येक ज्ञान आकार में नियत होगा , उनसे अतिरिक्त सभी रूपों का एक आकार का कोई एक ग्राहक सम्भव नहीं होगा । ( ० ) यह कहना अनुभव से विरुद्ध है कि चित्र रूप की प्रतीति ही नहीं होती है । चूंकि जड़ में प्रकाश का सम्बन्ध सम्भव नहीं है , अतः प्रकाशित होनेवाला चित्र रूप भी ज्ञान रूप ही है । चित्र रूप एक है , उसके विभिन्न आकार नहीं हैं ।

अतः यह कहना भी सम्भव नहीं है कि चित्र रूप की प्रतीति वस्तुतः अनेक रूपों की विभिन्न आकार की अनेक प्रतोतियाँ ही हैं । जैसे कि नील का नीलस्वभाव रूप एक ही आकार है , वैसे ही वैचित्र्य का भी चित्र स्वभाव रूप एक ही आकार है ।

इस स्वतन्त्र एक आकार की वस्तु में यदि ज्ञान प्रवृत्त होगा तो सम्पूर्ण में ही प्रवृत्त होगा अथवा प्रवृत्त ही नहीं होगा , किन्तु उसके किसी एक अंश में प्रवृत्त नहीं हो सकता , क्योंकि वह अंशों से शून्य है , उसके जो परस्पर भिन्न भाग मालूम होते हैं वे चित्र रूप नहीं है । अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है । वस्तुओं के स्थूल आकारों का भी समर्थन इसी रास्ते से करना चाहिए ।

किसी बौद्ध विशेष का मत है कि सभी अवयवों में रहनेवाला एक स्थूल अवयवी का मानना ठीक नहीं जँचता , क्योंकि अनेक अवयवों से सम्बद्ध रहने के कारण उसमें भी अनेकस्व की ही आपत्ति होगी । उसको अगर ज्ञान का आकार मान लेते हैं तो फिर एक आकार के ज्ञान में आरूढ़ वस्तु में स्थूलत्व और एकत्व दोनों का रहना असम्भव नहीं होता । नाना अवयवों से एक स्थूलाकार वस्तु मानने में एक ही वस्तु में कम्प और अकम्प रूप होनेवाले विरोध रूप दोष तो वस्तुतः ज्ञानों का ही विरोध है , जिसका परिहार कर लेना चाहिए ।

BT

कोई ( माध्यमिक ) बोद्ध मतावलम्बी कहते हैं कि ज्ञानाकार से वस्तुओं का प्रतिभास भी अनादि वासना से ही होता है , अतः इसका निर्वाचन भी असम्भव है । अतः ' विचारक्षमत्व ' रूप ' शून्यत्व ' ही तत्त्व है । जितने भी ज्ञान हैं , उनका कोई बाह्य वस्तु विषय नहीं है 1 । जैसे कि स्वप्न ज्ञान का कोई बाह्य विषय नहीं होता । जाग्रदवस्था के पुरुषों का स्तम्भादि विषयक ज्ञान भी केवल ज्ञान होने के नाते ही बाह्य विषय शून्य है ।

क्योंकि स्वप्नज्ञान को केवल ज्ञान होने के नाते ही विषयशून्य और ज्ञान दोनों समझा जाता है ।

अतः जागते हुए व्यक्ति का ज्ञान भी केवल ज्ञानत्व स्वभाव का ही है , उसका भी स्वभाव सविषयकत्व नहीं है , ( अर्थात् स्वप्न ज्ञान की तरह जाग्रदवस्था का ज्ञान भी निर्विषयक ही है , जिससे सभी विषयों की सत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती ) अतः स्तम्भादि विषयक ज्ञान यदि निर्विषयकत्व को छोड़ेगा तो अपने ज्ञानत्व को भी खो बैठेगा | ( प्र ० ) अगर सभी ज्ञान निर्विषयक ही हों उो ( आपके अभिमत का साधक ) पक्ष , हेतु , दृष्टान्तादि विषयक ज्ञान भी विषय शून्य ही होंगे , फिर पक्ष साध्य प्रभृति के अभाव से ( आपकी अभिमत ) अनुमिति की ही प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी ।

वे पक्षादि यदि सविषयक हैं तो फिर उन्हीं ज्ञानों में ( निर्विषयकत्व का साधक ज्ञानत्व रूप ) आपका हेतु व्यभिचरित होगा । ( उ ० ) नहीं , यह बात नहीं है , क्योंकि वे पक्षादि विषयक ज्ञान वस्तुतः निर्विषयक होने पर भी केवल संवृति ( अविद्या ) के कारण ही अनुमानप्रवृत्ति के कारण हैं । अविद्या से भी विद्या ( यथार्थज्ञान ) की उत्पत्ति देखी जाती है । जैसे कि लिपि से वर्णों की प्रतीति होती है । ( प्र ० ) वर्ण की ज्ञापक रेखादि रूप वे लिपियाँ भी तो स्वरूपतः सत्य ही हैं ?

( उ ० ) यह सत्य है कि वे रेखादि रूप से सत्य हैं , किन्तु वे अपने रेखात्व रूप से तो वर्णों के ज्ञापक नहीं हैं । उन रेखाओं में जब ककार दि वर्णों का आरोप किया जाता है , तब उसी आरोपित रूप से वे वर्ण की प्रतीति को उत्पन्न करती हैं । अतः स्वरूपतः सत्य होते हुए भी कार्योपयोगित्व रूप से असत्य ही हैं । इतना तक बाह्य अर्थ की यथार्थ सत्ता माननेवाले हम लोगों पर बाह्य अर्थ की यथार्थ सत्ता को न माननेवाले बौद्धों के आक्षेप रूप पूर्वपक्ष का संक्षेप में वर्णन

( अब इस प्रसङ्ग में हम लोगों का उत्तर सुनिये ) यह जो कहा गया है कि ' ग्राह्यलक्षण ' के अयोग से बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं हैं यह इसलिए गलत है कि ग्राह्यलक्षण का अयोग रूप यह हेतु बाह्य वस्तु के स्वतन्त्र अस्तित्व के खण्डन का सामर्थ्य नहीं रखता है । इससे इतना ही हो सकता है कि बाह्य वस्तुएँ ज्ञात न हो सकेंगी , किन्तु इससे इनके अस्तित्व का लोप नहीं हो सकता , क्योंकि वस्तुओं के ग्रहण ( ज्ञान ) का न होना स्वरूपविप्रकर्ष ( ज्ञान होने की योग्यता के अभाव ) से भी हो सकता है ।

जैसे कि पिशाचादि की सत्ता रहते हुए भी उनका ग्रहण नहीं होता । ( प्र ० ) ग्रहण की योग्यता रहने पर भी कभी - कभी कोई विषय गृहीत नहीं होता है , इससे समझते हैं कि उसकी सत्ता नहीं है । ( उ ० ) आपने इसकी योग्यता कैसे निश्चित की ? क्योंकि आपको तो उसका भी ज्ञान नहीं है । अगर है तो फिर उसमें ग्राह्यलक्षण रूप हेतु ही नहीं है । और भी बात है , ग्रहण ग्राहक से होता है । ज्ञान ही ग्राहक है ।

वह केवल अपने स्वरूप में ही नियत है , ( अर्थात् उसमें किसी बाह्य वस्तु का सम्बन्ध नहीं है ) , केवल इसीलिए ज्ञान से अतिरिक्त वस्तुको आप अग्राह्य कहते हैं । एवं ( आप ही कहते हैं कि ) वस्तुओं का ग्रहण इसलिए नहीं होता कि वह अग्राह्य हैं । अतः यह ग्राह्यलक्षण का अयोग रूप हेतु साध्याविशिष्ट है , ( अर्थात् सिद्ध नहीं है , किन्तु हेतु को सिद्ध होना चाहिए ) । और भी मुझे पूछना है कि ज्ञानाकार में यह ग्राह्यता क्या है ?

उस आकार में ज्ञान की कारणता तो ग्राह्यता नहीं है , क्योंकि वह आकार ज्ञान से अभिन्न है | ( अतः उक्त ग्राह्यता ज्ञानकारणत्व रूप नहीं है ) । ज्ञान में आकार सम्पादन की क्षमता भी ग्राह्यता नहीं हो सकती , क्योंकि विषयों के आकार से भिन्न ज्ञानाकार नाम की किसी दूसरी वस्तु का अनुभव नहीं होता । ज्ञान रूपत्व भी ग्राह्यत्व नहीं है , क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में ज्ञान रूप ज्ञान है ।

समूह की तरह बराबर रहनेवाले विषय रूप ज्ञान की भी उपलब्धि नहीं होती यदि अवभासमानत्व को ही ग्राह्यत्व कहें तो फिर यह पूछना है कि आकारों का यह अवभासमानत्व क्या वस्तु है ?

यदि वह ज्ञान के साथ नियमित रूप से सम्बद्ध ग्रहण करने की योग्यता या त्याग करने की योग्यता ही है तो फिर बाह्य वस्तुओं में • अर्थात् वस्तुओं को बाह्य मान लेने पर ) भी उक्त दोनों प्रकार की योग्यतायें हैं ही , क्योंकि “ यह नील है , यह पीत है " इत्यादि यथार्थ ज्ञानों से युक्त पुरुष उन ज्ञानों से बाह्य वस्तुओं को ही लेता है , छोड़ता है , या उपेक्षा कर देता है , किसी आन्तर वस्तु से नहीं । तस्मात् ' ग्राह्यलक्षण ' का अयोग रूप आपका हेतु ही सिद्ध नहीं है ।

( प्र ० ) एक ( ज्ञान ) की उत्पत्ति से दूसरे ( उस ज्ञान के विषय बाह्य वस्तु ) में व्यवहार की योग्यता कैसे होती है ? ( प्र ० ) इसमें कोई बात नहीं है , क्योंकि अपनी सामग्री रूप नियमित कारणों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है , वह उसके विषय में व्यवहार योग्यता सम्पादन की क्षमता रूप स्वभाव को लेकर ही उत्पन्न होता है ।

इसी से ज्ञान और विषय के अभेद का साधक वेद्यत्व हेतु भी खण्डित हो गया , क्योंकि ज्ञान और विषय को भिन्न मान लेने पर भी ज्ञान का स्वभाव और सामग्री का नियम इन दोनों से ही ( घटज्ञान से ही घट समझा जाय ) इस नियम की उपपत्ति हो जाएगी । उक्त वेद्यत्व हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति भी सन्दिग्ध है । एवं प्रकाश का ' योग ' सम्बन्ध ) असम्भव है , इस कथन से ( योग शब्द के द्वारा ) यदि जड़ और प्रकाश का अभेद ( सम्बन्ध ) आपको अभीष्ट है , तो फिर यह सिद्धसाधन है ।

यदि इससे जड़ में प्रकाश के सम्बन्ध का असम्भव कहना अभिप्रेत है , तो फिर इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि यह युक्ति से शून्य है , एवं किसी राजा की आज्ञा भी नहीं है कि जड़ और प्रकाश में सम्बन्ध न हो । जैसे कि छेदन किया छेद्य वस्तु से भिन्न होती हुई भी उसके साथ सम्बद्ध होती है , उसी प्रकार ज्ञान रूप क्रिया भी ज्ञेय वस्तु से भिन्न होने पर भी उसके साथ सम्बद्ध होगी ।

एवं कथित ' सहोपलम्भनियम ' रूप हेतु में भी विपक्ष की व्यावृत्ति सन्दिग्ध ही है , क्योंकि ज्ञान को ' स्व ' एवं ' स्व ' से भिन्न ( अपना विषय ) दोनों का प्रकाशक मान लेने से ही उक्त ' सहोपलम्भ ' नियम की उपपत्ति हो जाएगी । ( प्र ० ) बाह्य वस्तु की तो सत्ता ही नहीं हैं , फिर ज्ञान दूसरे का ज्ञापक कैसे होगा ।

( उ ० ) यह कहना तो स्पष्ट ही अन्योन्याश्रय से दूषित है , क्योंकि बाह्य वस्तु को सत्ता के उठ जाने पर सहोपलम्भ रूप हेतु में विपक्षव्यावृत्ति का निश्चय होगा , और विषक्षव्यावृत्ति के सिद्ध हो जाने पर सहोपलम्भनियम रूप हेतु के विपक्ष । बाह्य वस्तु ) के अभाव की सिद्धि होगी । ( प्र ० ) उक्त हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति के न रहने से ही क्या ? ( उ ० ) वस्तुतः सहोपलम्भनियम रूप हेतु ही असिद्ध है , क्योंकि नील और नीलविषयक ज्ञान इन दोनों का अनुभव एक समय में नहीं होता ।

नील को बहिर्मुख प्रतीति हो जाने के अव्यवहित उत्तर क्षण में नील ज्ञान की अन्तर्मुखतया उपलब्धि होती है । ( प्र ० ) ज्ञान को स्वतः प्रकाश मान लेने से ही सहोपलम्भनियम की सिद्धि होगी । ( उ ० ) ज्ञान को स्वसंवेदन ( स्वतः प्रकाश ) मानने में ही क्या युक्ति है ? ( प्र ० ) जो प्रकाश रूप होता है वह अपने प्रकाश के लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता , जैसे कि प्रदीप | ( उ ० ) प्रत्यक्ष के उत्पादन में प्रदीप का इतना ही उपयोग है कि वह विषयदेश के अन्धकार को हटाता है ।

प्रदीप अपने प्रत्यक्ष के लिए भी अन्धकार को हटाने का काम स्वयं कर लेता है , अतः प्रदीप के प्रत्यक्ष में दूसरे प्रदीप की आवश्यकता नहीं होती है , किन्तु चक्षुरादि को अपेक्षा तो रहती ही हैं । अतः प्रदीप रूप दृष्टान्त में स्वतः प्रकाशकत्व का ज्ञापक परानपेक्षत्व रूप हेतु नहीं है । यदि ज्ञानत्व को ही प्रकाशकत्व रूप मानें तो फिर ' स्वतः प्रकाशत्व ' का साधक परानपेक्षत्व हेतु उस समय असाधारण नाम का हेत्वाभास होगा ।

यह जो आप ने कहा कि- ' ढँकी हुई चीज की तरह जिसका प्रकाश अव्यक्त रहता है वह स्वयं भी अव्यक्त ही रहता है । " इस प्रसङ्ग में कहना है कि आवृत वस्तु का अप्रकाश ही उसकी अव्यक्तता है , जो वस्तुतः उस वस्तु के प्रकाश का अभाव मात्र है । उस वस्तु के प्रकाशक की अव्यक्तता उस वस्तु की अव्यक्तता नहीं है । अतः ज्ञान के स्वतः प्रकाशत्व की साधक उक्त व्यतिरेक व्याप्ति भी सिद्ध नहीं है ।

( बाह्य वस्तुओं की असत्ता के साधक या ज्ञान में विषय शून्यत्व या निराल - म्बनत्व का साधक ) प्रत्यक्षत्व ( ज्ञानत्व ) हेतु में भी कुछ बल नहीं है , क्योंकि इस हेतु का ( स्वप्न ज्ञान रूप ) दृष्टान्त ही असिद्ध है । स्वप्नज्ञान भी बाह्य विषयक है ही । वहाँ वे केवल अपने स्वरूप में नहीं हैं । जाग्रत् अवस्था के ज्ञान में भासित होने योग्य विषयों का ही संस्कारवश स्वप्नज्ञान में भान होता है ।

अगर यह बात न हो तो स्वप्नज्ञान में नियमतः उसी विषय का भान कैसे हो जो वस्तु पहिले से ही श्रुत या दृष्ट हो । दूसरी बात यह है कि अगर बाह्य वस्तु नहीं है तो फिर यह नील है ' इत्यादि प्रतीतियों में नियमित रूप से किसका भान होता है ? ( प्र ० ) प्रतीतियों में भासित होनेवाले आकार विज्ञान के हैं ? ( उ ० ) ऐसा नहीं हो सकता , क्योंकि उक्त प्रतीतियाँ ज्ञान से भिन्न अर्थ विषयक ही होती हैं ।

अगर उक्त प्रतीतियों में भासित होनेवाले आकार भी विज्ञान के ही हों तो फिर उन प्रतीतियों का अभिलाप " यह नील है " इस प्रकार का न होकर ' मैं नील हूँ ' इत्यादि आकार का होगा । ( प्र ० ) ज्ञानों के प्रत्येक आकार भिन्न भिन्न हैं । इनमें से किसी आकार को प्रताति ' अहम् ' के साथ होती है , एवं किसी आकार की प्रतीति ' इदम् ' के साथ | ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है , क्योंकि नीलादि आकारों की तरह ' अहम् ' आकार नियमित नहीं है ।

जिसको एक आकार की प्रतीति ' अहम् ' रूप से होती है , उसी आकार की प्रतीति किसी दूसरे को ' त्वम् ' रूप से या ' इदम् ' रूप से होती है । ( प्र ० ) ( यह नियम है कि ) स्वयं की प्रतीति अपने को ' अहम् ' आकार से होती है । ( उ ० ) ' स्वयं ' से भिन्न का भी तो संवेदन होता है । ( प्र ० ) वह संवेदन भी वस्तुतः ' स्व ' रूप का ही है , किन्तु भ्रान्तिवश उसमें भेद की प्रतीति होती है । ( उ ० ) प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाला यह भेद वास्तविक ही क्यों नहीं है ।

( प्र ० ) चूँकि प्रत्यक्ष भ्रान्त है । जैसा कहा है कि जो अंश ज्ञान से भिन्न एवं बाह्य मालूम होता है , वह भी ज्ञान से अभिश्न ही है , उसमें ज्ञान भेद की प्रतीति भ्रान्ति है । ( उ ० ) यह क्यों ? ( प्र ० ) चूँकि अनुमान से ज्ञान और अर्थ का अभेद सिद्ध है । ( उ ० ) उक्त कथन असङ्गत है , क्योंकि यह अन्योन्याश्रय से दूषित है । कथित अभेद का साधक अनुमान इस लिए प्रमाण है भेद का साधक प्रत्यक्ष भ्रान्त है । प्रत्यक्ष इसलिये भ्रान्त है कि अभेद का साधक अनुमान प्रमाण है ।

अगर यहमान भी लें कि उक्त भेद की प्रतीति भ्रान्ति है , फिर भी नियमित देश रूप अधिकरणकी प्रतीति कैसे उपपन्न होगी ? क्योंकि इसका नियामक कोई नहीं है कि अमुक आकार के विज्ञान का आरोप अमुक आकार के विज्ञान में ही हो , विज्ञान के दूसरे आकारों में नीं ? ( प्र ० ) वासना के नियम से आरोप का नियम होगा ? ( उ ० ) वासना में मी तद्देशविषयकत्व का कोई नियामक नहीं है ।

बाह्य वस्तुएँ जब रहती हैं , तब जो अर्थ जिस देश में रहता है उस अर्थ विशिष्ट उस देश का अनुभव होता है , एवं उस देश विषयक इस अनुभव से ही उस देश विषयक ' वासना ' ( संस्कार ) उत्पन्नहोती है । अगर बाह्य अर्थ ही न रहेंगे तो फिर वासना में भी यह विशेष किससे उपपन्न होगा ? विना विशेष कारण के विशेष कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती । ( प्र ० ) चूँकि बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं है , अतः वासना में ही वैचित्र्य की कल्पना करते हैं ।

प्रयोजन से युक्त ( उस पहिलो वासना में स्थित ) कारणों का वैचित्र्य ही उक्त वासना के वैचित्र्य का कारण है | ( उ ० ) वासनाओं के ये वैचित्र्य भी अगर केवल विज्ञान रूप ही हैं तो फिर उनमें परस्पर भेद क्या है ? अगर ये वैचित्र्य विज्ञान से भिन्न हैं तो फिर नीलादि वस्तुओं को ही विज्ञान से भिन्न मानने में आपको क्यों द्वेष है १ जिससे कि सर्वजनीन प्रतीतियों का आप अपलाप करते हैं । ( एवं ) विज्ञान के आकारों का यह आरोप कौन करता है ? अगर ज्ञान ही ?

अगर आकार से अभिन्न विज्ञान में ही आकार का भान होता है और वही आरोप कहलाता है , तो फिर इस पक्ष में एक ही ज्ञान को सत्य और मिथ्या दोनों ही कहने को आपत्ति होगी , क्योंकि ज्ञान हो आकार के ग्रहण रूप होने से सत्य है , एवं उसमें बाह्यत्व का आरोप होने से मिथ्या है । अगर आकार विज्ञान और आकाराधायक विज्ञान दोनों को भिन्न मानें तो फिर उक्त कारणविज्ञान और कार्यविज्ञान दोनों की क्रमशः सत्ता नहीं रहेगी , क्योंकि कारणविज्ञान क्षणिक है ।

( अगर दोनों विज्ञानों को एक मानें तो फिर ) एक ही विज्ञान एक ही समय सत्य और मिथ्या दोनों नहीं हो सकता । क्रम और यौगपद्य को छोड़कर कोई तीसरा प्रकार नहीं है कि जिस रूप में विद्यमान आकार अपने से अभिन्न आकार का भी ग्रहण करे और अपने आकार को बाहर आरोपित भी करे ।

और भी बात है । अगर ये नीलादि वस्तुएँ विज्ञान के ही आकार हों तो फिर जिस पुरुष के विज्ञान के ये आकार होंगे केवल उसी पुरुष से गृहीत हो सकेंगे , दूसरे पुरुषों से नहीं , किन्तु एक ही वस्तु अनेक पुरुषों से गृहीत होती है , क्योंकि एक ही वस्तु की ओर एक हो समय अनेक व्यक्ति प्रवृत्त दीख पड़ते हैं । एवं इस प्रकार की प्रतीति भी होती है कि ' जिसको मैंने देखा था उसी को तुमने भी देखा है ' अतः नीलादि ( कोई भी ) बाह्य वस्तु ज्ञान रूप नहीं है ।

जो कोई ( माध्यमिक ) विज्ञान के इस आकार का भी अपलाप करते हुए ' अलीक ' ( शून्य ) वस्तु को ही नीलादिबुद्धि का विषय मानते हैं , उनके मत से कारण के नियम से ( कपालादि कारण समूह से घट की ही उत्पत्ति हो पटादि की नहीं ) कार्य ( इस ) नियम की उपपत्ति नहीं होगी । एवं अर्थ - क्रिया ( प्रवृत्ति ) का नियम भी अनुपपन्न हो जाएगा , क्योंकि अर्थक्रिया की सत्ता ही नहीं है । अतः यही कहना पड़ेगा कि किसी का कोई कारण नहीं है या सभी वस्तुएं सभी वस्तुओं के कारण हैं । एवं अर्थक्रिया की सफलता भी नहीं होगी विफलता भी नहीं होगी , क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । जैसा कि गुरुओं ने कहा है कि ( अगर शून्यता ही तत्त्व हो तो ) मन के लड्डू खाने से तृप्त पुरुष के एवं यथार्थ मोदक का उपार्जन कर उसे खानेवाले पुरुष के रस , वीर्य और विपाकादि सभी समान ही होने चाहिए ।

( प्र ० ) वासना के विशेष से दोनों में जो विशेष है , उससे उन दोनों पुरुषों के रस वीर्यादि के अन्तर की उपपत्ति होगी । ( उ ० ) वासना अगर प्रयोजन विशेष के सम्पादन में समर्थ है ? तो फिर नाम का ही अन्तर रह जाता है कि हम उसे अर्थ कहते हैं और आप वासना कहते हैं । अगर वह भी ज्ञान स्वरूप ही है तो अर्थों के न रहने के कारण उसमें वैशिष्ट्य असम्भव है , क्योंकि बोधरूप कारण सभी जगह समान है । पहिले कहा जा चुका है कि बोधाकार से भिन्न किसी विशेष को प्रयोजक मानना वस्तुतः बाह्य वस्तुओं

Iø

मान ( तौल और नाप ) के व्यवहार का असाधारण कारण ही ' परिमाण ' है । वह अणु , महत् , दीर्घ और ह्रस्व भेद से चार प्रकार का है । को ही मानना है । एवं इस पक्ष में नीलादि प्रतीतियों का कादाचित्कत्व ( कभी होना कभी न होना ) को उपपत्ति भी ठीक नहीं बैठती है , क्योंकि नीलादि विज्ञान के प्रयोजक क्षणसन्तान की सत्ता तो बराबर है ही । अगर सदा उसकी अनुवृत्ति नहीं रहती है तो फिर आगे नीलादि की प्रतीतियाँ नहीं होंगी । ( प्र ० ) ( यद्यपि ) कार्य को अपने भिन्न किसी की अपेक्षा नहीं है फिर भी कारण का परिपाक कदाचित् ही होता है , अतः कार्य भी कभी होता है कभी नहीं । ( उ ० ) कार्य के प्रति उन्मुख होना हो कारणों का परिपाक है , वह भी स्वसंवेदन रूप विज्ञान से भिन्न कुछ भी नहीं है , अतः उसका भी कादाचित्कत्व उचित नहीं है । किन्तु कार्यों का कादाचित्कत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है । यह प्रत्यक्ष ज्ञान देश , काल और स्वभाव से नियत अपने बाह्य विषय का स्थापन करते हुए उसके अभाव के साधक को भी बाधित करता है । इस प्रकार बाह्य अर्थ को सत्ता का लोप करनेवाले ये सभी हेतु कालात्ययापदिष्ट हैं । ( इस प्रकार ) संख्या को अच्छी तरह समझा ।

' परिमाणं मानव्यवहारकारणम् ' इत्यादि पक्ति से अब परिमाण का निरूपण करते हैं । अणु , महत् , दीर्घ , ह्रस्व इन सबों के ज्ञान एवं इन सबों के प्रतिपादक शब्दों के प्रयोग ये दोनों ही प्रकृत ' मानव्यवहार ' शब्द से अभिप्रेत हैं । प्रत्यक्ष के द्वारा सिद्ध परिमाण को जो नहीं मानना चाहते , उन्हें ( परिमाण के उक्त व्यवहार रूप ) कार्य लिङ्गक अनुमान की सूचना ' तस्य परिमाणम् ' इत्यादि से देते हैं । जिस प्रकार ज्ञान अपने ज्ञेय अर्थ का सोधक है उसे ( संख्याप्रकरण में ) दिखला चुके हैं ।

( प्र ० ) किन्तु ' शब्द ' अपने बोध्य अर्थ का साधक किस तरह से है ? शब्द स्वयं अर्थ स्वरूप नहीं है , अगर ऐसी बात हो तो अन्य शब्द के उच्चारण से ही पेट भर जाय , ' अग्नि ' शब्द के उच्चारण से मुँह जल जाय , एवं असि ( तलवार ) शब्द के उच्चारण से मुँह कट जाय । अर्थ से शब्द की उत्पत्ति भी नहीं होती है , क्योंकि कोष्ठसम्बन्धी वायु के कण्ठादि देशों के साथ अभिघात से शब्द की उत्पत्ति होती है ।

शब्द से भिन्न होने पर भी एवं शब्द का कारण न होने पर भी अगर शब्द से अर्थ का प्रतिपादन माना जाय तो अतिप्रसङ्ग होगा । ( उ ० ) किन्तु यह ठीक नहीं है , क्योंकि अगर शब्द की उत्पत्ति कण्ठादि के अभिघात से ही हो ( विवक्षा वक्ता के अर्थ प्रतिपादन की इच्छा से नहीं ) तो फिर शब्द विवक्षा का भी ज्ञापक नहीं होगा , क्योंकि विवक्षा से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है । अगर विवक्षा की सूचना भी शब्दों से नहीं होगी तो फिर शब्दों का प्रयोग केवल पागल का प्रलाप ही होगा ।

( प्र ० ) ( विवक्षा साक्षात् शब्द का उत्पादक न होने पर भी ) परम्परा से शब्द का उत्पादक है , अतः शब्द विवक्षा का ज्ञापक है | ( उ ० ) इस प्रकार तो शब्द अर्थानुभव का भी सूचक है ही , क्योंकि विवक्षा अर्थानुभव से ही उत्पन्न होती है । ( प्र ० ) अर्थ का अनुभव न रहने पर भी वक पुरुष में अर्थ की विवक्षा देखी जाती है । ( उ ० ) विवक्षा के न रहने पर भी भ्रान्त व्यक्ति के द्वारा उस अर्थ के बोधक शब्द का प्रयोग भी तो देखा जाता है ।

जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि ' भ्रान्तपुरुष कहना कुछ चाहता है , किन्तु कहता कुछ और ही है ' ( प्र ० ) एक की विवक्षा से दूसरा पुरुष शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता , क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से जिसमें कारणता निश्चित है , उसके रहते हुए भी अगर कार्य की उत्पत्ति कभी न भी हो तो फिर संसार की सभी रचनाएँ अनियमित हो जाएँगी ।

अतः ( भ्रान्तपुरुष के शब्द प्रयोग रूप ) कार्य से ही यह अनुमान करते हैं कि ( शब्द प्रयोग से पहिले ) भ्रान्त पुरुष को भी अज्ञात अर्थ विषयक अस्फुट विवक्षा सहसा उत्पन्न होती है । जैसे कि राह चलते आदमी को तृण के स्पर्श का हठात् अस्पष्ट प्रतिभास होता है | ( उ ० ) तो फिर उस प्रतारक के विशेष प्रकार की विवक्षा से उसके उस अर्थविषयक अनुभव की भी कल्पना कीजिए , क्योंकि अज्ञात अर्थ की विवक्षा कभी भी नहीं उत्पन्न होती । ( प्र ० ) उस समय ठगनेवाले पुरुष को उस विषय का अनुभव तो नहीं है ।

( उ ० ) अनुभव न रहे , स्मरण तो रह सकता है । पहिले समझी हुई वस्तु को ही वह प्रतारक दूसरों से कहता है । इस प्रकार प्रकृत में भी चूँकि अर्थ विषयक विवक्षा स्मरण का कारण है . अतः परम्परा से वह अनुभव का भी कारण होती है । सुतराम् ( शब्द और विवक्षा के कार्यकारणभाव में ) व्यभिचार नहीं है । अतः मिथ्या अनुभव से उत्पन्न होनेवाली विवक्षा का सत्यानुभव भी परम्परा से कारण है । तस्मात् विवक्षा एवं यथार्थानुभव इन दोनों के कार्यकारणभाव में भी व्यभिचार नहीं है !

अगर ऐसी बात न होती तो वाक्य के सुनने से सुननेवाले को अर्थ की प्रतीति न होकर विवक्षा की ही प्रतीति होती , किन्तु यह वाक्य का प्रयोग करनेवाले को अभीष्ट नहीं है , अतः शब्द से होनेवाले व्यवहार का ही उच्छेद हो जाएगा । वादी एवं प्रतिवादी में हार - जीत की व्यवस्था भी उठ जाएगी , क्योंकि विवक्षा के प्रसङ्ग में तो दोनों बराबर ही कहते हैं ।

यह जो आपने कहा कि ( प्र ० ) द्रव्य और उसके परिमाण दोनों अभिन्न हैं , क्योंकि द्रव्यज्ञान के बिना उसके परिमाण का ज्ञान नहीं होता है , ( उ ० ) सो ठीक नहीं है , क्योंकिदूर से द्रव्य का ज्ञान होने पर भी उसके विशेष प्रकार के परिमाण का ज्ञान नहीं होता है , अतः भूल से बड़ी चीज भी छोटी प्रतीत होती है ।

इस प्रकार परिमाण की सत्ता सिद्ध हो जाने पर ' तच्चतुविधम् ' इत्यादि से उसके भेद कहे गये हैं । जिन भेदोंसे परिमाण के चार भेद हैं यह ' अणु महद्दीर्घ ह्रस्वञ्चेति ' इस पङ्क्ति से कहा गया है । चौकोर आदि आश्रय द्रव्यों के अवयवों के विशेष प्रकार के विन्यास ही हैं , कोई स्वतन्त्र परिमाण नहीं ।

( उ ० ) फिर दीर्घत्वादि भी अवयवों के विशेषविन्यास ही हों स्वतन्त्र परिमाण नहीं | ( उ ० ) संस्थाव की अर्थात् अवयवों के विशेष विन्यास की प्रतीति दूर से नहीं होती है , किन्तु दीर्घत्वादि की प्रतीति दूर से भी होती है । ( प्र ० ) द्वयणुक ' अणु ' परिमाण वाला है , क्योंकि वह महत्परिमाण का कारण नहीं । एवं परमाणु का परिमाण ( अणु होते हुए भी ) द्वयणुक के परिमाण से न्यून है क्योंकि कार्य के परिमाण से कारण का परिमाण न्यून ही देखा जाता है ।

अतः परमाणु के परिमाण और द्वयणुक के परिमाण ( दोनों ही अणु होते हुए भी ) भिन्न प्रकार के हैं । एवं घटादि के महत्परिमाण एवं महत्परिमाण के अन्तिम अवधि आकाशादि का महत्परिमाण दोनों ही ( महत्त्वत्वेन समान होने पर भी ) भिन्न प्रकार के हैं । इसी प्रकार दीर्घ और ह्रस्व में भी समझना चाहिए । अतः परिमाण का आठ भेद होना ही उचित है चार भेद नहीं ' । इसी प्रश्न का उत्तर ' तत्र ' इत्यादि से देते हैं ।

टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ३१७) १. मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक में षड्विधमेव ' ऐसा पाठ है , किन्तु सो असङ्गत मालूम होता है , क्योंकि जैसे द्वथणुक और परिमाणु के अणुत्व में अन्तर है , वैसे ही दोनों के ह्रस्वश्व में भी अन्तर है । एवं जैसे कि घट और आकाशादि के महत्परिमाण में अन्तर है ,

In English

Classification of Qualities in Vaisheshika Philosophy

This commentary by Prashastapada explains the different types of qualities (gunas) found in reality. It categorizes them into concrete qualities belonging to physical substances, abstract qualities of the mind and soul, universal qualities, and special qualities.

This article answers

  • Types of guna in vaisheshika philosophy?
  • Difference between murta and amurta guna?
  • What are ubhaya guna?
  • Classification of qualities in prashastapada bhashya?

प्रामाणिकता

उद्धरण
0
संस्करणसे मिले
0
पाठभेद
0
छोड़े गये
0

मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — प्रशस्तपादभाष्य।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

मूल ग्रन्थ पढ़ें