व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य
प्रशस्तपादभाष्य — कर्म
18 मूल पद्य
कर्मनिरूपणम्
पृ. ६९७
उत्क्षेपणादीनां पञ्चानामपि कर्मत्वसम्बन्धः ।
एकद्रव्यवत्वं क्षणिकत्वं मृद्रव्यवृत्तित्वमगुणवाचं गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नसंयोगवश्वं स्वकार्य संयोगविरोधित्वं संयोगविभागनिरपेक्ष- कारणत्वमसमवायिकारणत्वं स्वपराश्रयसमवेतकार्यारम्भकत्वं समानजातीयानारम्भकत्वं द्रव्यानारम्भकत्वं च प्रतिनियतजातियोगित्वम् ।
दिग्विशिष्टकार्यारम्भकत्वं च विशेषः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( १ ) कर्मत्व जाति के साथ सम्बन्ध , ( २ ) एक समय एक ही द्रव्य में रहना , ( ३ ) क्षणिकत्व , ( ४ ) मूर्त द्रव्यों में ही रहना , ( ५ ) गुणरहितत्व , ( ६ ) गुरुत्व , द्रवत्व , प्रयत्न और संयोग इन चार गुणों से उत्पन्न होना , ( ७ ) अपने द्वारा उत्पन्न संयोग से नष्ट होना , ( ८ ) किसी और के साहाय्य के बिना संयोग और विभाग को उत्पन्न करना , ( ६ ) असमवायिकारणत्व , ( १० ) अपने आश्रय रूप द्रव्य एवं उससे भिन्न द्रव्य इन दोनों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले ( संयोग और विभाग ) वस्तुओं को उत्पन्न करना , ( ११ ) अपने समानजातीय वस्तु को उत्पन्न न करना ( १२ ) ( प्रत्येक क्रिया में ) नियमित उत्क्षेपणत्वादि जातियों का सम्बन्ध ( १३ ) एवं दिग्विशिष्ट कार्य का कर्तृत्व ये तेरह उत्क्षेपणादि पाँचों कर्मो के असाधारण धर्म हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
उत्क्षेपणादीनां च परस्परं साधर्म्यमितरपदार्थवैधर्म्य च प्रतिपादयन्नाहउत्क्षेपणादीनामिति । कर्मत्वं नाम सामान्यम् , तेन सह सम्बन्ध उत्क्षेपणाबीनामेव । एकद्रव्यवत्त्वम् एकदा एकस्मिन् द्रव्ये एकमेव कर्म वर्तते , एकं कर्म एकत्रैव द्रव्ये वर्त्तत इत्येकद्रव्यवत्त्वम् । यद्येकस्मिन् द्रव्ये युगपद् विरुद्धो भयकर्मसमवायः स्यात् , तदा तयोः परस्परप्रतिबन्धाद् दिग्विशेषसंयोगविभागानुत्पत्तौ संयोगविभागयोरनपेक्षं कारणं कर्मेति लक्षणहानिः स्यात् । अथाविरुद्धकर्मद्वयसमावेशः , तदैकस्मादेव तद्देशद्रव्यसंयोगविभागयोरुपपत्तेः द्वितीयकल्पनावैयर्थ्यम् । एवमेकं कर्म नानेकत्र वर्त्तते , एकस्य चलने तस्मात् कर्मणोऽन्यस्य चलनानुपलम्भात् । क्षणिकत्वमाशुतरविनाशित्वम् । मूर्तद्रव्यवृत्तित्वम् अवच्छिन्नपरिमाणद्रव्यवृत्तित्वम् । अगुणवत्त्वं गुणवत्त्वरहितत्वम् । गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नसंयोगजत्वम् । स्वकार्येति । स्वकार्येण संयोगेन विनाश्यत्वं न विभागविनाश्यत्वम् , उत्तरसंयोगाभावप्रसङ्गात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — उन अर्द्धचन्द्रशेखर शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ जो जगत् रूप अङ्कुर के बीज , संसार समुद्र से पार उतरने के सेतु एवं ऐसे चन्द्रमा के स्वरूप हैं जिनसे ज्ञान रूप अमृत अनवरत स्रवित होता रहता है ।
उत्क्षेपणादि कर्मों के परस्पर साधर्म्यं और द्रव्यादि पदार्थों के वैषम्यं का प्रतिपादन करते हुए ' उत्क्षेपणादीनाम् ' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् कर्मत्व नाम की जो जाति है , उसके साथ उत्क्षेपणादि सभी कर्मों का सम्बन्ध है । ' एकroad ' शब्द से यह अभिप्रेत है कि एक समय तक द्रव्य में एक ही क्रिया रहती है । एवं एक क्रिया एक ही द्रव्य में रहती है ( इसलिए एक द्रव्यवत्त्व सभी कर्मों का साधम्यं है ) एक ही समय यदि विरुद्ध दो कर्मों की सत्ता एक द्रव्य में मानें , तो ' संयोग और विभाग का इतर निरपेक्ष कारण ही कर्म है ' कर्म का यह लक्षण न हो सकेगा , क्योंकि ( दो क्रियाओं के परस्पर प्रतिरोध के कारण ) किसी विशेष दिशा के साथ उस क्रियाश्रय द्रव्य का संयोग नहीं हो सकता । यदि ( विरुद्ध दो क्रियायें न मानकर ) अविरुद्ध दो क्रियाओं की सत्ता एक ही समय एक द्रव्य में मानें तो उनमें से एक ही क्रिया में अभिमत देश के साथ क्रियाश्रयद्रव्य का संयोग या विभाग उत्पन्न हो ही जाएगा ,
दह दूसरी क्रिया की कल्पना व्यर्थ होगी । एक ही कर्म अनेक आश्रयों में भी नहीं रहता है , क्योंकि जिस क्रिया से आश्रयीभूत एक द्रव्य का चालन होता है , उसी क्रिया से दूसरे द्रव्य का चालन कहीं नहीं देखा जाता । उत्पत्ति के बाद अतिशीघ्र विनष्ट होना ही ' क्षणिकत्व ' है । किसी अल्पपरिमाणवाले द्रव्य में रहना ही ' मूतं द्रव्यवृत्तित्व ' है । गुणवत्व का अभाव ( फलतः गुणों का न रहना ही ) ' अगुणवत्त्व ' है । यह गुरुत्व , द्रवश्व , प्रयत्न और संयोग इनमें से किसी से उत्पन्न होता है ।
' स्वकार्येति ' यह संयोग रूप अपने कार्य से ही विनष्ट होता है , विभाग रूप अपने कार्य से नहीं । यदि ऐसा मानेंगे तो क्रियाश्रय द्रव्य का उत्तरदेश के साथ संयोग न हो सकेगा । ' संयोगविभागेति ' अर्थात् क्रिया को वेग के उत्पादन में जिस प्रकार विशेष प्रकार के नोदनसंयोग या अभिघात संयोग की अपेक्षा होती है , उसी प्रकार संयोग और विभाग के उत्पादन में उसे नोदनादि किसी और वस्तु की अपेक्षा नहीं होती है ।
' असमवायिकारणत्वम् ' अर्थात् गुण असमवायिकारण होने के साथ - साथ निमित्तकारण भी हो सकता है , क्रिया में यह बात नहीं है , वह केवल असमवाविकारण ही होती है । ' स्वपराश्रयेति ' क्रिया अपने आश्रयीभूत द्रव्य और उससे भिन्न द्रव्य में समवायसम्बन्ध से रहनेवाले एक ही कार्य अर्थात् व्यासज्यवृत्ति संयोग और विभाग रूप कार्य का कारण है ।
पृ. ६९९
तत्रोत्क्षेपणं शरीरावयवेषु तत्सम्बद्धेषु च यदूर्ध्वभाग्भिः प्रदेशैः संयोगकारणमघोभाग्भिश्च प्रदेशैर्विभागकारणं कर्मोत्पद्यते गुरुत्व प्रयत्न संयोगेभ्यस्तदुत्क्षेपणम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इनमें उत्क्षेपण ( कहते हैं , जो कर्म ) शरीर के अवयव एवं उनसे संयुक्त और द्रव्यों का ऊपर के देश के साथ संयोग का कारण हो , एवं नीचे के प्रदेशों के साथ उन्हीं विभाग का भी कारण हो , एवं गुरुत्व , प्रयत्न और संयोग से उत्पन्न हो , उसी कर्म को ' उत्क्षेपण ' कहते हैं |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
संयोगविभागेति । यथा वेगारम्भे नोदनाभिघातविशेषापेक्षत्वं नैवं संयोगविभागारम्भे नोदनाद्यपेक्षत्वमित्यर्थः । असमवायिकारणत्वम् , यथा गुणानां निमित्तकारणत्वमपि नैवं कर्मणाम् , किं त्वसमवायिकारणत्वमेवेत्यर्थः । स्वपराश्रयेति । स्वाश्रये पराश्रये च व्यासज्य समवेतं यत् कार्यं संयोगविभागलक्षणं तदारम्भकत्वम् । समानेति । कर्मणः कर्मान्तरारम्भे गच्छतो गतिविनाशो न स्यात् । इच्छाप्रयत्नादिविरामादन्ते गतिविराम इति चेत् ? तच्छाप्रयत्नादिकमेवोत्तरोत्तरकर्मणामपि कारणम् , न तु कर्म । विवादाध्यासितं कर्म कर्मकारणं न भवति , कर्मत्वात् अन्त्यकर्मवत् । अथवा विवादाध्यासितं कर्म कर्मसाध्यं न भवति , कर्मत्वादाद्यकर्मवत् । द्रव्येति । उत्तरसंयोगान्निवृत्ते कर्मणि द्रव्यस्योत्पादनम् । प्रतिनियतेति । उत्क्षेपणादिषु प्रत्येकमुत्क्षेपणत्वादियोग इत्यर्थः । एतत् सर्वमपि पञ्चानां साधर्म्यम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' समानेति ' अर्थात् क्रिया यदि दूसरी क्रिया को उत्पन्न करे , तो फिर एक बार जो चल पड़ेगा वह बराबर चलता ही जाएगा , उसकी क्रिया कभी रुकेगी ही नहीं । क्योंकि उसकी गति का कभी विनाश नहीं होगा । ( प्र ० ) चलने की इच्छा या तदनुकूल प्रयत्न इन सबों के विराम से गति का विराम होगा ? ( उ ० ) तो फिर वह इच्छा या प्रयत्न ही उस दूसरी क्रिया का भी कारण होगा , कर्म नहीं तदनुकूल यह अनुमान भी है कि जैसे अन्तिम क्रिया किसी भी क्रिया का कारण नहीं होती है , उसी प्रकार कोई भी क्रिया केवल क्रिया होने के नाते ही दूसरी क्रिया को उत्पन्न नहीं करती । अथवा यह भी अनुमान किया जा सकता है कि जैसे क्रिया से पहिली क्रिया की उत्पत्ति नहीं होती है , वैसे ही कोई क्रिया केवल क्रिया होने से ही किसी क्रिया को उत्पन्न नहीं कर सकती है । ' द्रव्येति ' उत्तरदेश के साथ संयोग के उत्पन्न होने पर जब क्रिया का नाश हो जाता है , तभी द्रव्य की उत्पत्ति होती है । ' प्रतिनियतेति ' उत्क्षेपणादि प्रत्येक क्रिया में उत्क्षेपणत्वादि जाति का सम्बन्ध ( भी ) कर्म का साधर्म्य है । ये सभी पाँचों कर्मों के साधर्म्यं हैं । ' दिग्विशिष्टेति ।
पृ. ७००
तद्विपरीतसंयोगविभागकारणं कर्मापक्षेपणम् ।
ऋजुनो द्रव्यस्याग्रावयवानां तद्देशैर्विभागः संयोगश्च , मूलप्रदेशैर्येन कर्मणावयवी कुटिलः सञ्जायते तदाकुञ्चनम् ।
तद्विपर्ययेण संयोगविभागोत्पत्तौ येन कर्मणावयवी ऋजुः सम्पद्यते तत् प्रसारणम् ।
यदनियत दिक् प्रदेश संयोगविभागकारणं तद् गमनमिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — संयोग और विभाग के ( अन्यानपेक्ष ) कारणीभूत ( एवं उत्क्षेपण के ) विपरीत क्रिया को ही ' अपक्षेपण ' कहते हैं । कोमल द्रव्य के आगे के अवयवों का उनके आश्रय प्रदेश के साथ विभाग और मूल प्रदेशों के साथ संयोग जिस क्रिया से हो ( अर्थात् ) जिस क्रिया से अवयवी टेढ़ा हो जाय उसी को ' आकुञ्चन ' कहते हैं । जिस क्रिया से उक्त संयोग के विपरीत संयोग और उक्त विभाग के विपरीत विभाग की उत्पत्ति होने पर ( कुटिल ) अवयवी सीधा हो जाय उसी क्रिया को ' प्रसारण ' कहते हैं : जो क्रिया अनियमित रूप से जिस किसी दिक् प्रदेश के साथ संयोग और विभाग को उत्पन्न करे , उस क्रिया को गमन कहते हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
दिग्विशिष्टकार्यकर्त्ता त्वमेव कथयति -- तत्रेति । शरीरावयवेषु हस्तादिषु तत्सम्बद्धेषु मुसलादिषु च यदूर्ध्वभाग्भिः प्रदेशः संयोगकारणम् , अधोभाग्भिश्च विभागकारणं गुरुत्वसंयोगप्रयत्नेभ्यो जायते तदुत्क्षेपणम् । तद्विपरीतेति । अधोदेशसंयोगकारणमूर्ध्वदेश विभागकारणं कर्मापक्षेपणमित्यर्थः । ऋजुन इति । तद्देशैरग्रावयवसम्बद्धैराकाशादिदेशैः सञ्जायते इति , येन कर्मणेति सम्बन्धः । अग्रावयवानां मूलप्रदेशविभागादुत्तरदेशसंयोगोत्पत्तौ सत्यामित्यर्थः ।
सत्प्रत्ययमिति । प्रयत्नपूर्वकमप्रयत्नपूर्वकं च भवतीत्यर्थः । यदन्यदिति । एते शरीरावयवेषु मुसलादिष्वन्येषु वा द्रव्येषु यत् तदप्रत्ययजं कर्म जायते सत्प्रत्ययादन्यत् तद् गमनमेव । चोदयति कर्मणामिति उत्क्षेपणादीनां कर्मणां जातिपञ्चकत्वमयुक्तम् , गमनात् सर्वेषामविशेषादभेदादिति चोदनार्थः । सर्वेषां गमनादविशेषमेव कथयति - सर्वं होत्यादिना । उत्क्षेपणादिषूर्ध्वं गच्छति , अधो गच्छतीति प्रत्ययदर्शनात् सर्वमेवेदमुत्क्षेपणादिकं गमनमेव । समाधत्ते - नेति । यत् त्वयोक्तं तन्न , उत्क्षेपणादिषु वर्गशः प्रतिवर्ग प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्त्योदर्शनात् । गोवर्गे अश्वादिवर्गव्यावृत्त्या प्रत्ययानुगमदर्शनाद गोत्वं कल्प्यते यथा , तथोत्क्षेपणादिषु प्रतिवर्गमितरवर्गव्यावृत्त्या प्रत्ययानुगमदर्शनादुत्क्षेपणत्वादिसामान्य कल्पनेत्यभिप्रायः । अस्य विवरणं सुगमम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' तत्रोत्क्षेपणम् ' इत्यादि से दिग्विशिष्ट कार्यों के कर्त्तव्य का विवरण देते हैं । उत्क्षेपण उसे कहते हैं जिससे शरीर के हाथ प्रभृति अवयवों में एवं हाथ से युक्त मुसल प्रभृति द्रव्यों में ऊपर के देशों के साथ संयोग की उत्पत्ति हो , और वह स्वयं गुरुत्व , संयोग और प्रयत्न से उत्पन्न हो । ' तद्विपरीतेति ' अर्थात् नीचे के देशों के साथ संयोग का कारण और ऊपर के देशों से विभाग का कारण कर्म ही ' अपक्षेपण ' है । ' ऋजुन इति ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' तद्देश : ' इस शब्द के द्वारा " आगे के अवयवों से सम्बद्ध आकाशादि देशों के साथ संयोग उत्पन्न होता है जिस क्रिया से " ऐसा अभ्वय समझना चाहिए । अर्थात् आगे के अवयवों का मूल प्रदेश के साथ विभाग से जिस स्थिति में उत्तर देश संयोग की उत्पत्ति होती है उस स्थिति में ।
पृ. ७०१
एतत् पञ्चविधमपि कर्म शरीरावयवेषु तत्सम्बद्धेषु च सत्प्रत्ययमसत्प्रत्ययं च ।
यदन्यत् तदप्रत्ययमेव तेष्वन्येषु च तद् गमनमिति ।
कर्मणां जातिपञ्चकत्वमयुक्तम् , गमनाविशेषात् ।
क्षणिक कर्म गमनमात्रमुत्पन्नं स्वाश्रयस्योर्ध्वमधस्तिर्यग्वाष्यणुमात्रैः प्रदेशैः संयोगविभागान् करोति सर्वत्र गमनप्रत्ययो ऽविशिष्टस्तस्माद् गमनमेव सर्वमिति ।
न , वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनात् ।
इहोत्क्षेपणं परत्रापक्षेपणमित्येवमादि सर्वत्र वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती दृष्टे , तद्धेतुः सामान्यविशेषभेदोऽवगम्यते ।
तेषामुदाद्युपसर्गविशेषात् प्रतिनियत दिग्विशिष्टकार्यारम्भत्वादुपलक्षण- भेदो s पि सिद्धः ।
एवमपि पञ्चैवेत्यवधारणानुपपत्तिः ।
निष्क्रमणप्रवेशनादिष्वपि वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनात् ।
यद्युत्क्षेपणा- दिषु सर्वत्र वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनाज् जातिभेद इष्यते , एवं च निष्क्रमणप्रवेशनादिष्वपि कार्यभेदात् तेषु प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती इति चेत् ? न , उत्क्षेपणादिष्वपि कार्यभेदादेव प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिप्रसङ्गः ।
अथ समाने वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिसद्भावे उत्क्षेपणादीनामेव जातिभेदो न निष्क्रमणादीनामित्यत्र विशेषहेतुर- स्तीति ।
न , जातिसङ्करप्रसङ्गात् ।
निष्क्रमणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तौ जातिसङ्करः प्रसज्यते ।
कथम् ? द्वयोर्द्रष्ट्रोरेकस्मादपवरकादपवरकान्तरं गच्छतो युगपनिष्क्रमण प्रवेशनप्रत्ययौ दृष्टौ तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति च ।
यदा तु प्रतिसीराय - पनीतं भवति , तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः , किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति ।
तथा नालिकायां वंशपत्रादौ पतति बहूनां द्रष्टृणां युगपद् भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्यया दृष्टा इति जातिसङ्कर- प्रसङ्गः ।
न चैवमुत्क्षेपणादिषु प्रत्ययसङ्करो दृष्टः ।
तस्मादुत्क्षेपणादीनामेव जातिभेदात् प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती , निष्क्रमणादीनां तु कार्यभेदादिति ।
कथं युगपत् प्रत्ययभेद इति चेत् ? अथ मतं यथा जातिसङ्करो नास्ति , एवमनेककर्म समावेशोऽपि नास्तीत्येकस्मिन् कर्मणि युगपद् द्रष्टृणां भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्ययाः कथं भवन्तीति ? अत्र ब्रूमः - न , अवयवावयविनोर्दिग्विशिष्टसंयोग विभागानां भेदाद् | यो हि द्रष्टा अवयवानां पार्श्वतः पर्यायेण दिक्प्रदेशैः संयोगविभागान् पश्यति तस्य भ्रमणप्रत्ययो भवति , यो द्यवयविन ऊर्ध्वप्रदेशैर्विभागमधः संयोगं चावेक्षते तस्य पतनप्रत्ययो भवति ।
यः पुनर्नालि कान्तदेशे संयोगं बहिदेशे च विभागं पश्यति , तस्य प्रवेशनप्रत्ययो भवतीति सिद्धः कार्यभेदान्निष्क्रमणादीनां प्रत्ययभेद इति ।
भवतुत्क्षेपणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययभेदः , निष्क्रमणादीनां तु कार्यभेदादिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ये पाँचो ही प्रकार के कर्म शरीर के अवयवों में एवं उनसे सम्बद्ध दूसरे द्रव्यों में भी प्रयत्न से ( सत्प्रत्यय ) और बिना प्रयत्न के ( असत्प्रत्यय ) के भी उत्पन्न होते हैं । इन दोनों से भिन्न सभी प्रकार के कर्म ' अप्रत्यय ' कम हैं । ( अर्थात् ) शरीर के अवयवों या उनसे भिन्न द्रव्यों में रहनेवाले ये सभी अप्रत्यय - कर्म गमन रूप ही हैं ।
( प्र ० ) यतः सभी क्रियाओं में गमनत्व की प्रतीति समान रूप से होती है , अत : क्रियाओं में उत्क्षेपणत्वादि पाँच जातियों का सम्बन्ध मानना अयुक्त है | ( अर्थात् ) कियायें सभी क्षणिक हैं , वे प्रथमतः गमन रूप ही उत्पन्न होती हैं । उत्पन्न होने के बाद अपने आश्रयद्रव्यों के ऊपर के प्रदेश , नीचे के प्रदेश या पार्श्वप्रदेश के साथ संयोगों और विभागों को उत्पन्न करती हैं । किन्तु सभी कर्मों में ' यह गमन है ' इस प्रकार की प्रतीति समान रूप से होती है । अतः सभी क्रियायें गमन रूप ही हैं ।
( उ ) ऐसी बात नहीं है , क्योंकि उत्क्षेपणादि सभी क्रिया के समूहों में विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियाँ ( समानजातीय प्रतीति ) एवं व्यावृत्तिप्रतीतियाँ होती हैं । ( विशदार्थ यह है ) कि ' यहाँ उत्क्षेपण क्रिया है ' और ' दूसरी जगह अपक्षेपण क्रिया है ' इस प्रकार प्रत्येक क्रिया में भिन्नभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीति और व्यावृत्तिप्रतीति उपलब्ध होती है ।
इससे यह सिद्ध होता है कि उन विभिन्न प्रतीतियों के सामान्य और विशेष के भेद ही कारण हैं , अर्थात् गमनत्व रूप सामान्य जातियों और उत्क्षेपणत्वादि रूप विशेषजातियों की विभिन्नता ही कारण है । उत्क्षेपणादि शब्दों के ' उद् ' एवं ' अप ' प्रभृति उपसर्ग , एवं उन क्रियाओं के द्वारा किसी विशेष प्रदेश में ही नियम से किसी विशेष प्रकार के कार्यो का उत्पादन करना भी ' उपलक्षणभेद ' अर्थात् उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों के साधक हैं ।
( प्र ० ) तब फिर कर्म पाँच ही हैं ' यह नियम भी ठीक नहीं होगा , क्योंकि निष्क्रमण एवं प्रवेशन प्रभृति क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियाँ और व्यावृत्तिप्रतीतियाँ होती हैं । यदि उत्क्षेपणादि प्रत्येक क्रियासमूह में विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीति और व्यावृत्तिप्रतीति से उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों की कल्पना करते हैं , तो फिर उसी युक्ति से निष्क्रमण और प्रवेशनादि क्रियाओं में भी विभिन्न जातियों की कल्पना करनी होगी । यदि ( ऊपर के देश के साथ संयोगादि रूप ) कार्य की विभिन्नता से ( उनमें विभिन्न ) अनुवृत्तिप्रतीतियाँ और व्यावृत्तिप्रतीतियाँ होती हैं , तो फिर कार्य की विभिन्नता ही उन प्रतीतियों का कारण होगी ( जाति की विभिन्नता नहीं ) । उत्क्षेपणादि समान क्रियाओं के समूहों में अनुवृत्ति और व्यावृत्ति के कारण उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों की कल्पना की जाय , और निष्क्रमण प्रवेशनादि क्रियाओं में ठीक वही युक्ति रहने पर भी विभिन्न जातियों की कल्पना न की जाय , इसमें कोई विशेष युक्ति नहीं है ।
( उ ० ) ऐसी बात नहीं है , ( अर्थात् उत्क्षेपणत्वादि जातियाँ मानी जाँय और निष्क्रमणत्वादि जातियाँ नहीं , इसमें विशेष युक्ति है ) यदि उत्क्षेपणत्वादि की तरह निष्क्रमणत्वादि जातियाँ मानी जाँय तो इसमें साङ्कर्यं दोष होगा । ( विशदार्थ यह है कि ) निष्क्रमणादि क्रियाओं में यदि विभिन्न जातियों के कारण अनुवृत्ति की प्रतीति और व्यावृत्ति की प्रतीति मानें तो इसमें साङ्कर्य दोष होगा । ( प्र ० ) किस प्रकार ? ( साङ्कर्य दोष होगा ?
) | ( उ ० ) दो द्वारों को पार करते हुए किसी एक व्यक्ति के एक हि गमनकर्म को देखनेवाले दो पुरुषों में से एक को एक ही समय उसी गमन कर्म में निष्क्रमण की प्रतीति और दूसरे को प्रवेशन की प्रतीति होती है । जैसे कि एक ही द्वार में जाते हुए एक ही व्यक्ति में ( विरुद्ध दिशाओं में खड़े हुए दो व्यक्तियों को ) क्रमशः ' यह प्रवेश करता है ' एवं ' यह निकलता है ' इन दोनों प्रकार की प्रतीतियाँ होती हैं ।
( जब जाते हुए व्यक्ति के बीच की ) प्रतिसीरा ( पर्दा ) उठा दी जाती है , तब उन्हीं दोनों व्यक्तियों को न निष्क्रमण की प्रतीति होती है और न प्रवेशन की प्रतीति , केवल गमन की ही प्रतीति होती है । इसी प्रकार बहती हुई नाली में जब बाँस प्रभृति के पत्ते गिरते हैं , तब उन पत्तों में एक ही समय बहुत से देखनेवालों में से किसी को भ्रमण की प्रतीति होती है और किसी को प्रवेशन की प्रतीति होती है । अतः निष्क्रमणत्वादि जातियों के मानने पर जातिसङ्कर दोष होगा ।
उत्क्षेपणादि क्रियाओं में इस प्रकार का साङ्कर्य नहीं देखा जाता । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में अनुवृत्ति की प्रतीति और व्यावृत्ति की प्रतीति उत्क्षेपणत्वादि जातियों के भेद से होती हैं , किन्तु निष्क्रमणादि क्रियाओं में उक्त दोनों प्रतीतियाँ कार्यों की विभिन्नता होती हैं । ( प्र ० ) एक ही समय ( एक हि क्रिया में ) उक्त विभिन्न प्रतीतियाँ कैसे होती हैं ?
( विशदार्थ यह है कि ) जिस प्रकार ( उत्क्षेपणत्वादि जातियों के मानने में ) जातिसङ्कर रूप दोष सम्भव नहीं है , ( उसी प्रकार ) एक ही समय एक ही वस्तु ( निष्क्रमण प्रवेशनादि ) अनेक कर्मों का रहना भी सम्भव नही है , फिर एक ही समय एक ही द्रव्य में अनेक देखनेवाले को ( भी ) भ्रमण , पतन और प्रवेशन विषयक प्रतीतियाँ कैसे हो सकती हैं ?
( उ ० ) इस प्रश्न के समाधान में हम लोगों का कहना है कि नहीं , ( अर्थात् उक्त प्रतोतियाँ असम्भव नहीं हैं ) क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय भ्रमणादि की उक्त प्रतीतियाँ नाली में गिरे पत्ते प्रभृति अवयवी और उनके अवयवों की विभिन्न दिशाओं में उत्पन्न हुए संयोग विभागादि कार्यों की विभिन्नता से होती हैं । देखनेवालों में से जो व्यक्ति पार्श्व से क्रमशः प्रदेश के अवयवों का दिक्प्रदेशों के साथ संयोगों और विभागों को देखता है , उसे उनमें भ्रमण की प्रतीति होती है ।
जो पुरुष अवयवी का ऊपर के देशों के साथ विभाग और नीचे के प्रदेश के साथ संयोग इन दोनों को देखता है , उसे उनमें पतन क्रिया की प्रतीति होती है । जो पुरुष उस अवयवी का नाली के भीतर के प्रदेश के साथ संयोग एवं ऊपर के देश के साथ विभाग को देखता है , उसे उसी अवयवी में प्रवेशन की प्रतीति होती है । इस प्रकार कार्यों के भेद से विभिन्न प्रकार की अनुवृत्ति की प्रतीतियाँ और व्यावृत्ति की प्रतीतियाँ होती हैं ।
अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में उत्क्षेपणत्वादि जातियों की विभिन्नता से ही विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियों और व्यावृत्तिप्रतीतियों के होने पर भी निष्क्रमणादि क्रियाओं में कार्यों की विभिन्नता से ही अनुवृत्ति की प्रतीतियाँ और व्यावृत्ति की प्रतीतियाँ होती हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
तेषामिति । उपलक्षणभेदोऽपीत्यपिशब्दः कार्यारम्भादित्यस्मात् परो द्रष्टव्यः 1 उपलक्ष्यतेऽन्य विलक्षणतया प्रतिपाद्यते व्यक्तिरनयेत्युपलक्षणं जातिः I ।तदयमत्रार्थ : - - न केवलमनुवृत्तिव्यावृत्ति प्रत्ययदर्शनादुत्क्षेपणापक्षेपणादीनां जातिभेदः सिद्धः , उदाद्युपसर्गभेदात् प्रतिनियतदिग्विशिष्टकार्यारम्भादपि सिद्धः । अपरे तु तेषामुत्क्षेपणादीनामुदाद्युपसर्गविशेषाद् दिविशिष्ट कार्यारम्भादुपलक्षणभेदोऽपि प्रतिपत्तिभेदोऽपि सिद्ध इति । अभेदे हि यथोत्क्षेपणमूर्ध्वसंयोगविभागहेतुरेवमपक्षेपणादिकमपि स्यात् । पुनश्चोदयति — एवमपीति । यदि प्रतिवर्ग प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनादुत्क्षेपणादिषु सामान्यमभ्युपेयते , तदा निष्क्रमणादिष्वपि प्रतिवर्गं प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनान्निष्क्रमणत्वादिकमभ्युपेयम् , ततश्च पञ्चैवेत्यवधारणानुपपत्तिः । अथ निष्क्रमणादिषु कार्यभेदात् प्रत्ययभेदो न जातिभेदात् , तदोत्क्षेपणादिष्वपि तथा स्यादित्याह -- कार्यभेदात् तेष्विति । समाधत्ते नेति । यदि निष्क्रमणत्वादिजातय इष्यन्ते , तदा जातिसङ्करप्रसङ्गः । एकस्यां व्यक्तौ विरुद्धानेकजातिसमवायः प्रसज्यत इत्यर्थः ।
कथमिति पृष्टः सन्नाह- द्वयोर्द्वष्ट्रोरिति । द्वयोर्द्रष्ट्रोरेकस्मादपवरकादपवरकान्तरं गच्छतः पुरुषस्य यो द्रष्टारौ तयोरेकस्यां व्यक्तौ निष्क्रमणप्रवेशनप्रत्ययौ दृष्टौ । यतोऽपवरकात् पुरुषो निर्गच्छति तत्र स्थितस्य निर्गच्छतीति प्रत्ययः , यत्र प्रविशति तत्र स्थितस्य प्रविशतीति प्रत्ययः । यदि जातिकृताविमौ प्रत्ययौ दृष्टौ तदैकस्यां व्यक्तौ परस्परविरुद्ध निष्क्रमणत्वप्रवेशनत्वजातिद्वयसमावेशो दूषणं स्यात् ।
तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति यथैकस्मिन्नेव बहुप्रकोष्ठके गृहे प्रकोष्ठात् प्रकोष्ठान्तरं गच्छति पुरुषे पूर्वापरप्रकोष्ठस्थितयो ट्रोर्द्वारप्रदेशे निर्गच्छति प्रविशतीति प्रत्ययौ भवतः । यदा तु प्रतिसीराद्यपनीतं मध्यस्थितं जवनिकाद्यपनीतं भवति , तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः , किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति । तस्माद् गमनमेव , तत्रोपाधिकृतश्च प्रत्ययभेद इत्यभिप्रायः । उदाहरणान्तरमाह - तथा नालिकायामिति । गर्त्तस्याभिधानम् । स्वपक्षे विशेषमाह - न चैवमिति ।
उपसंहरति तस्मादिति । एकदेकस्मिन् द्रव्ये तावदेकमेव कर्म भवति , तत्र कथं युगपदनेककर्मप्रत्यय इत्याह- कथमिति । तद् विवृणोति- - अथ मतमित्यादिना । अत्र ब्रम इति सिद्धान्तोपक्रमः । यत् त्वयोक्तं तन्न , अवयवानामवयविनश्च दिग्देशविशिष्टानां संयोगविभागानां भेदात् । अस्य सुगमं विवरणम् । अवयवकर्मसु पार्श्वतः संयोगविभागकारणेषु भ्रमणप्रत्ययः , अवयविक्रियायां कार्यभेदात् पतनप्रवेशनप्रत्ययावित्यर्थः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' सत्प्रत्ययमिति ' अर्थात् ( कर्म दोप्रकार से उत्पन्न होते हैं ) एक तो प्रयत्न से उत्पन्न होता है , दूसरा बिना प्रयत्न के ही उत्पन्न होता है । ' यदन्यत् ' अर्थात् शरीर के अवयवों में एवं मूसल प्रभृति द्रव्यों में अथवा अन्य ही द्रव्यों में प्रयत्नजनित क्रिया से भिन्न जिस क्रिया की उत्पत्ति होती है , वह क्रिया गमन रूप ही है ।
' कर्मणाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा आक्षेप करते हैं । आक्षेप ग्रन्थ का यह आशय है कि उत्क्षेपणादि में रहनेवाली उत्क्षेपणत्वादि पांच जातियों का जो उल्लेख किया गया है , वह अयुक्त है , क्योंकि ' गमन ' रूप क्रिया से उत्क्षेपणादि शेष चार क्रियाओं में कोई अन्तर नहीं है । ' सर्व हि ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन का जो अभेद कहा गया है उसका समर्थन करते हैं ।
अर्थात् ' ऊपर की तरफ जाता है , नीचे की तरफ आता है ' इसी प्रकार की ही प्रतीतियाँ उत्क्षेपणादि की भी होती हैं , इससे समझते हैं कि उत्क्षेपणादि सभी क्रियायें वस्तुतः गमन रूप ही हैं । ' न ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसका समाधान करते हैं । अर्थात् तुमने जो उत्क्षेपणादि क्रियाओं को गमन रूप क्रिया से अभिन्न कहा है , वह ठीक नही है , क्योंकि ' वर्गश : ' अर्थात् उत्क्षेपणादि प्रत्येक वर्ग को क्रियाओं में समान आकार की प्रतीतियाँ ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) होती हैं ।
एवं उक्त वर्ग की उत्क्षेपणादि प्रत्येक व्यक्ति में अपक्षेपणादि अपर वर्ग की क्रिया से भिन्नत्व की प्रतीति रूप व्यावृत्तिबुद्धि भी होती है । जैसे कि गो वर्ग की प्रत्येक व्यक्ति में ' अयं गौ : ' इस आकार की समानकारक प्रतीति होती है , एवं अश्वादि वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति से भिन्नत्व की प्रतीति भी होती है , इन्हीं दोनों प्रतीतियों से ' गोत्र ' जाति की कल्पना करते हैं , उसी प्रकार उत्क्षेपणत्वादि बातियों की भी कल्पना करते हैं । इस भाष्य ग्रन्थ की व्याख्या सुबोध है ।
' तेषाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के ' उपलक्षणभेदोऽवि ' इस वाक्य में जो ' अपि शब्द है उसका पाठ ' कार्यारम्भात् ' इस वाक्य के बाद ही समझना चाहिए ( अर्थात् कार्यारम्भादप्युपलक्षणभेदः - वाक्य का ऐसा स्वरूप समझना चाहिए ) । ' उपलक्ष्यते अन्यविलक्षणतया प्रतिपाद्यते व्यक्तिरनया ' अर्थात् ( ' उपलक्षित हो ' अर्थात् व्यक्ति दूसरों से भिन्न रूप में समझी जाय जिससे ' ) इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' उपलक्षण ' शब्द से यहाँ ' जाति ' ही विवक्षित है ।
केवल अनुवृत्तिप्रत्यय ( अर्थात् सभी उत्क्षेपण क्रियाओं में ' यह उत्क्षेपण है ' इत्यादि एक आकार की प्रतीति ) एवं व्यावृत्तिप्रत्यय ( अर्थात् उत्क्षेपणादि प्रत्येक व्यक्ति में उससे भिन्न अपक्षेपणादि क्रियाओं से भिन्नत्व को बुद्धि ) ही उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों के साधक नहीं हैं , उद , अप प्रभृति उपसर्ग के भेद एवं विभिन्न नियत देशों में ही कार्यों को उत्पन्न करना भी उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों के साधक हैं ।
किसी सम्प्रदाय के लोग ' तेषामुदाद्युपसर्गविशेषात् ' इत्यादि सन्दर्भ की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि ' तेषाम् ' अर्थात उत्क्षेपणादि का ' उद् ' ' अप ' प्रभृति विभिन्न उपसर्गों के कारण एवं विशेष दिशाओं में कार्योत्पादक होने के कारण ' उपलक्षणभेदोऽपि ' अर्थात् प्रतिपत्ति ( प्रतीति ) का भेद भी सिद्ध होता है ( एवं प्रतिपत्ति के भेद से बस्तुओं का भेद सुतराम् सिद्ध है ) ।
उत्क्षेपणादि सभी कर्म यदि अभिन्न हों तो फिर जिस प्रकार उत्क्षेपण क्रिया ऊर्ध्वदेश में ही संयोग और विभाग को उत्पन्न करती है , वैसे ही अपक्षेपणादि क्रियायें भी ऊध्वंदेश में हो संयोगादि को उत्पन्न करतीं । ' एवमपि ' इत्यादि से पुनः आक्षेप करते हैं । आक्षेप करने वालों का यह अभिप्राय है कि यदि उत्क्षेपणादि प्रत्येक वर्ग में अलग अलग अनुवृत्ति- प्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय के कारण उत्क्षेपणादि अलग अलग की कल्पना
जातियों करें , तो फिर निष्क्रमण ( जाना ) और प्रवेशन ( आना ) प्रभृति प्रत्येक वर्ग के भी उक्त अनुवृत्तिप्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय विभिन्न प्रकार के हैं ही । अतः उनमें भी अलग अलग जाति का मानना आवश्यक होगा । जिससे पश्चैव कर्माणि ' यह अवधारण असङ्गत हो जाएगा । ' कार्यभेदात् तेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग में उपपत्ति देते है कि यदि निष्क्रमण प्रवेशन प्रभृति की प्रतीतियों की विभिन्नता जातिभेदमूलक न मानकर कार्यभेदमूलक मानें तो फिर विभिन्न उत्क्षेपणादि विषयक प्रतीतियों की उपपत्ति भी उन प्रतीतियों को कार्यभेदमूलक मान कर की जा सकती
' न ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । अभिप्राय यह है कि ( उत्क्षेपणत्वादि की तरह यदि निष्क्रमणत्वादि जातियाँ भी मानी जायँ तो ' जातिसङ्करप्रसङ्ग ' होगा , अर्थात् एक ही व्यक्ति में विरुद्ध अनेक जातियों का समवाय मानना पड़ेगा । ' कथम् इस पद के द्वारा पूछे जाने पर ( अर्थात् यह साङ्कर्य क्यों कर होगा ? ) ' द्वयोर्द्रष्ट्रो : ' इस सन्दर्भ के द्वारा उक्त साङ्कर्य दोष का उपपादन करते हैं । ' द्वयोर्द्रष्ट्रोः ' अर्थात् एक प्रकोष्ठ से दूसरे प्रकोष्ठ में जाते हुए पुरुष को जो दो देखनेवाले पुरुष हैं , उन दोनों में से एक पुरुष को उक्त गमन रूप क्रिया में निष्क्रमणत्व की और दूसरे पुरुष को प्रवेशनत्व ' की प्रतीति होती है । इस प्रकार एक ही क्रिया में दोनों की प्रतीति होती है , अर्थात् जिस प्रकोष्ठ से वह पुरुष जाता है , उस प्रकोष्ठ में रहनेवाले पुरुष को उससे जानेवाले पुरुष में ' निष्क्रामति ' इस आकार की प्रतीति होती है , एवं जिस प्रकोष्ठ में वह पुरुष जाता है , उस प्रकोष्ठ में रहनेवाले को
८० उसी पुरुष में ' प्रविशति ' यह प्रतीति होती है । यदि निष्क्रमण और प्रवेशन क्रियाओं को प्रतीतियाँ निष्क्रमणत्वादि जाति मूलक हों , तो फिर एक ही व्यक्ति में परस्पर विरुद्ध निष्क्रमणत्व और प्रवेशनत्वादि जातियों का समावेश रूप साङ्कर्यं दोष की आपत्ति होगी ।
' तथा द्वारदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति ' उक्त भाष्य सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि जैसे बहुत सी कोठरियों वाले भवन में यदि एक पुरुष एक कोठरी से दूसरी कोठरी में जाता है , तो जिस कोठरी से वह जाता है उस कोठरी में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उस जानेवाले पुरुष में ' यह निकलता है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है और जिस कोठरी में वह जाता है , उस कोठरी में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उसी पुरुष में ' यह आता है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है ।
' यदा तु प्रतिसीराद्यपनीतम् ' अर्थात् जब बीच का पर्दा ( या दीवाल जिससे कोठरियाँ बनती हैं ) हटा दिया जाता है , उस समय उसी पुरुष में न ' निकलने ' की ओर न ' आने ' को प्रतीति होती है , केवल ' चलते ' की ही प्रतीति होती है । अतः वह ' गमन ' रूप क्रिया ही है , उसी में उपाधि भेद से ' निष्क्रमण ' प्रत्यय और ' प्रवेशन ' प्रत्यय प्रभृति विभिन्न प्रत्यय होते हैं । ' तथा नालिकायाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में दूसरा दृष्टान्त दिखलाया गया है । ' नालिका ' गड्ढे को कहते हैं ।
' न चैवम् ' इत्यादि से पूर्व पक्ष की अपेक्षा अपने सिद्धान्त पक्ष में अन्तर दिखलाते हैं । ' तस्मात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । ' कथम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह आक्षेप करते हैं कि यदि एक समय एक द्रव्य एक ही क्रिया हो सकती है , तो फिर एक ही समय अनेक कर्मों की प्रतीति कैसे होगी ! ' अथ मतम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी ' आक्षेपग्रन्थ ' का विवरण देते हैं । ' अत्र ब्रूमः ' इत्यादि ग्रन्थ से इस प्रसङ्ग में अपना सिद्धान्त करने का उपक्रम करते हैं । अर्थात् तुमने जो आक्षेप किया है वह ठीक नहीं है , क्योंकि विभिन्न दिग्देशों में विद्यमान अवयवों और अवयवियों के संयोग और विभाग भी विभिन्न ही होते हैं । इस भाष्यग्रन्थ की व्याख्या सुलभ है । अभिप्राय यह है कि अवयवों के संयोग और विभाग इन दोनों की कारणीभूत क्रियायें जब पार्श्व में होती हैं तो उनमें ' भ्रमण ' का व्यवहार होता है । एवं अवयवी की क्रिया से होनेवाले विभिन्न कार्यों से उसी में ' पतन प्रवेशनादि ' की प्रतीतियाँ भी होती हैं ।
पृ. ७०९
कर्मस्वर्यायः १ आहोस्विदपरं अथ गमनत्वं किं सामान्यमिति १ कुतस्ते संशयः ? समस्तेषूत्क्षेपणादिषु कर्मप्रत्ययवद् गमनप्रत्ययाविशेषात् कर्मत्वपर्याय इति गम्यते ।
यतस्तत्क्षेपणादिवद् विशेषसंज्ञयाभिहितं तस्मादपरं सामान्यं स्यादिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) गमनत्व शब्द और कर्मत्व शब्द ये दोनों क्या एक ही अर्थ के वाचक हैं ? या गमनत्व नाम की ( कर्मत्व व्याप्य ) अलग स्वतन्त्र जाति है ? ( उ ० ) तुम्हें यह संशय ही क्यों कर हुआ ? ( प्र ० ) यतः उत्क्षेपणादि सभी क्रियाओं में ' यह कर्म है ' इस आकार की प्रतीति की तरह सभी क्रियाओं में समान रूप से गमनत्वकी भी प्रतीति होती है , इससे ऐसा आभास होता है कि कर्मत्व और गमनत्व ये दोनों शब्द एक ही अर्थ के वाचक हैं । एवं यतः उत्क्षेपणादि की तरह ' गमन ' नाम की भी एक अलग क्रिया कही गयी है , अतः यह भी अनुभव होता है कि उत्क्षेपणत्वादि की तरह गमनत्व नाम की भी कर्मत्व व्याप्य एक स्वतन्त्र जाति ही है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
भवतत्क्षेपणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययभेदः । अथ गमनत्वं किं कर्मत्वपर्यायः , आहोस्विदपरं सामान्यमिति । सिद्धान्ती पृच्छति - कुतस्ते संशयः ? संशयानुपपन्नइत्यभिप्रायः । परः संशयमुपपादयति – समस्तेष्विति । उत्क्षेपणादिषु सर्वेषु यथा कर्मप्रत्ययश्चलनात्मकताप्रत्ययस्तथा तेषु गमनप्रत्ययः , ऊध्वं गच्छत्यधो गच्छति मूलप्रदेशं गच्छत्यग्रदेशं गच्छतीति प्रत्ययो भवतीति । तेन गमनत्वं कर्मत्वर्याय इति गम्यते , समस्तभेदव्यापकत्वात् । यतस्तूत्क्षेपणादिवद् मनमपि पृथगभिहितं विशेषसंज्ञया , तस्माद् गमनत्वमपरं सामान्यं स्यात् , अवान्तरभेदनिरूपणावसरे तस्य संकीर्तनात् । एवमुपपादिते परेण संशये सति मुनिः प्राह - नेति । न कर्तव्यः संशयः , कुतः ? गमनत्वस्य कर्मत्वपर्यायत्वात् । एतद् विवृणोति - आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्वपर्याय एव गमनत्वमिति । यथात्मत्वस्य पर्याय : पुरुषत्वं समस्तभेदव्यापकत्वात् , तथा गमनत्वं कर्मत्वस्य पर्यायः । अथ किमर्थं विशेषसंज्ञया पृथग् गमनग्रहणं कृतम् ? इति चोदयति- अथेति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — पूर्वपक्षवादी ‘ अथ गमनत्वम् ' इत्यादि सन्दर्भ से पूछते हैं कि मान लिया कि उत्क्षेपणादि कर्मों की विभिन्न प्रतीतियाँ उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों के कारण ही होती हैं , किन्तु यह ' गमनत्व ' कौन सी वस्तु है ? क्या यह कर्मत्व जाति का ही दूसरा नाम है ? अथवा कर्मत्व जाति से भिन्न यह कोई अलग ही जाति है ? ' कुतस्ते संशय : ? इस वाक्य के द्वारा सिद्धान्ती पूर्वपक्षवादी से पूछते हैं कि तुम्हें यह संशय ही क्यों कर हुआ ? अर्थात् यह संशय यहाँ युक्त नहीं है । ' समस्तेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पूर्व - पक्षवादी अपने संशय का उपपादन करते हैं । अभिप्राय यह है कि उत्क्षेपणादि सभी क्रियाओं में जैसे कि ' कर्मप्रत्यय ' अर्थात् चलनस्वरूपता की प्रतीति होती है , उसी प्रकार ' गमनप्रत्यय ' अर्थात् ऊपर की ओर जाता है , नीचे की ओर जाता है , मूलप्रदेश में जाता है , अन प्रदेश में जाता है , इत्यादि गमनविषयक प्रतीतियां भी होती हैं , अतः समझते हैं कि कर्मत्व का ही दूसरा नाम गमनत्व है ।
पृ. ७१०
न कर्मत्वपर्यात्वात् ।
आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्व पर्याय एव गमनत्वमिति ।
अथ विशेषसंज्ञया किमर्थं गमनग्रहणं कृतमिति ? न , भ्रमणायचा . रोधार्थत्वात् ।
उत्क्षेपणादिशब्दैरनवरुद्धानां भ्रमणपतन स्पन्दनादी- नामवरोधार्थं गमनग्रहणं कृतमिति ।
अन्यथा हि यान्येव चत्वारि विशेषसंज्ञयोक्तानि तान्येव सामान्य विशेष संज्ञा विषयाणि प्रसज्येरन्निति ।
अथवा अस्त्वपरं सामान्यं गमनत्वम् , अनियत दिग्देश- संयोगविभागकारणेषु भ्रमणादिष्वेव वर्तते गमनशब्दश्चोत्क्षेपणादिषु भाक्तो द्रष्टव्यः , स्वाश्रयसंयोगविभागकर्तृत्वसामान्यादिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( उ ० ) नहीं ( अर्थात् उक्त संशय का यहाँ कोई हेतु नहीं है ) , क्योंकि गमनत्व और कर्मत्व दोनों ही शब्द एक ही जाति के वाचक हैं । जैसे कि आत्मत्व और पुरुषत्व ये दोनों ही शब्द एक ही जाति के वाचक हैं , उसी प्रकार गमनत्वशब्द और कर्मत्वशब्द दोनों एक ही जाति रूप अर्थ के वाचक हैं । ( प्र ० ) फिर ( उत्क्षेपणादि की तरह ' गमन ' रूप ) विशेष नाम के द्वारा गमन का उपादान क्यों किया गया है ?
( उ ० ) नहीं , ( अर्थात् गमन शब्द से गमन रूप क्रिया का अभिधान गमनत्व को कर्मत्वव्याप्य अतिरिक्त जाति रूप समझाने के लिए नहीं है , किन्तु ) भ्रमणादि क्रियाओं के संग्रह के लिए है । ( विशदार्थ यह है कि ) उत्क्षेपणादि नामों के द्वारा संगृहीत न होनेवाले भ्रमण , पतन , स्पन्दनादि क्रियाओं के संग्रह के लिए ही ' गमन ' शब्द का उपादान किया गया है ।
यदि ऐसी बात न होती -भ्रमणादि क्रियाओं के संग्रह के लिए ' गमन ' शब्द का उपादान न किया जाता तोजो भी चार कर्म उत्क्षेपण , अपक्षेपण आकुञ्चन , और प्रसारण इन चार नामों से कहे गये हैं , उतने ही कर्म समझे जाते ( फलतः उत्क्षेपणादि चार क्रियाओं से भिन्न भ्रमणादि क्रियाओं का अभाव ही समझा जाता ) । अथवा ( कर्मत्व से भिन्न ) गमनत्व नाम का अलग सामान्य ही मान लें , जो अनियमित्त दिशाओं और अनियत देशों में संयोगों और विभागों के उत्पादक भ्रमणादि क्रियाओं में ही नियमित रूप से रहता है ।
भ्रमणादि क्रियाओं में
वृत्ति के द्वारा प्रयुक्त होनेवाले ' गमन ' शब्द का जो प्रत्क्षेपणादि क्रियाओं में भी प्रयोग होता है , उसका कारण है दोनों क्रियाओं में समान रूप से संयोग और विभाग को उत्पन्न करने की स्वतन्त्रक्षमता , इसी क्षमता या कर्तृत्व रूप सादृश्य के कारण ही उत्क्षेपणादि में भी गमन शब्द का प्रयोग होता है । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन शब्द का प्रयोग गौण है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
उत्तरमाह - नेति । उत्क्षेपणादिशब्दैरनवरुद्धा न संगृहीता भ्रमणादयः । यदि गमनग्रहणं न क्रियेत , तदा तेषां कर्मत्वेन संग्रहो न स्यात् । किन्तु विशेषसंज्ञयोद्दिष्टानामुत्क्षेपणादीनामेव परं कर्मत्वसंज्ञाविषयत्वं भवेत् । भ्रमणादयो s पि च कर्मत्वेन लोकप्रसिद्धाः , अतस्तेषां परिग्रहार्थं पृथग् गमनग्रहणं कृतमिति ग्रन्थार्थः ।
अथवा अस्त्वपरं सामान्यं गमनत्वम् , तत् केषु वर्त्तते , तत्राह – अनियतेति । कुतस्तर्ह्यत्क्षेपणादिषु गमनप्रत्ययः ? अत आह— गमनशब्दश्चेति । गमनशब्दग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वाद् गमनप्रत्यय उत्क्षेपणादिषु भाक्तो द्रष्टव्यः । उपचारस्य बीजमाह - स्वाश्रयसंयोगविभागकर्तृत्वसामान्यादिति । गमनं स्वाश्रयस्य संयोगविभागौ करोति , उत्क्षेपणादयोऽपि कुर्वन्ति , एतावता साधर्म्येणोत्क्षेपणादिषु गमनव्यवहारः । अनेन साधम्र्येण गमने कस्मादुत्क्षेपणादिव्यवहारो न भवति ? पैङ्गव्यपाटलत्वादिसाधर्म्येण वह्नावपि माणवकव्यवहारः कस्मान्न भवति ? अथोच्यते । न कारणसद्भावे सत्युपचारकल्पना , किन्तु स्थिते व्यवहारे कारणकल्पनेति । एवं चेदत्रापि स एव परिहारः ।
सत्प्रत्ययकर्मविधिः- प्रयत्नपूर्वक कर्म प्रकारः कथ्यत इत्यर्थः । कथमिति पृष्टः सन्नाह - चिकीर्षितेष्विति । यज्ञादिषु कर्तुमभिप्रेतेषु सत्सु यदा पुरुषो हस्तमुत्क्षेप्तुमिच्छति , तदा हस्तवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नो जायते । तं प्रयत्नं निमित्तकारणभूतमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादसमवायिकारणाद्धस्ते कर्म भवति । सत्यपि प्रयत्ने गुरुत्वरहितस्य उत्क्षेपणापक्षेपणयोरशक्यकरणत्वाद् गुरुत्वस्यापि कारणत्वम् । हस्तवत्सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति । पादे कर्मोत्पतौ पादवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नो निमित्तकारणम् , पादात्मसंयोगोऽसमवायिकारणम् । एवं सर्वत्र शरीरावयवक्रियोत्पत्तौ द्रष्टव्यम् । शरीरक्रियोत्पत्तावपि शरीरात्मसंयोगोऽसमवायिकारणम् , शरीरवदात्मप्रदेशे प्रयत्नो निमित्तकारणम् ।
तत्सम्बद्धेषु शरीरसम्बद्धेषु , शरीरावयवसम्बद्धेष्वपि कथं कर्मोत्पत्तिरिति प्रश्नार्थः । यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति ' उत्क्षिपामि हस्तेन मुसलम् ' इति , तदनन्तरं तस्या इच्छाया अनन्तरम् , प्रयत्न हस्तेन मुसलमूर्ध्वमुत्क्षिपामीति हस्तमुसलयोर्युगपदुत्क्षेपणेच्छातः प्रयत्नो जायमानस्तयोर्युगपदुत्क्षेपणसमर्थो विशिष्ट एव जायते ।
तं प्रयत्नं विशिष्टं निमित्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगात् समवायिकारणाद् यस्मिन्नेव काले हस्ते उत्क्षेपणकर्मोत्पद्यते , तस्मिन्नेव काले तमेव प्रयत्नमुभयार्थमुत्पन्नमपेक्षमाणाद्धस्त मुसलसंयोग । दसमवायिकारणान्मुसलेऽपि कर्म भवति , कारणयौगपद्यात् । ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते उत्क्षेपणेच्छा निवर्तते । पुनरप्यपक्षेपणेच्छोत्पद्यते हस्तेन मुसलस्यापक्षेपर्णच्छोपजायत इत्यर्थः । तदनन्तरं प्रयत्नः सोऽपि जायमान उत्क्षेपणप्रयत्नवद् विशिष्ट एव जायते ।
तं च प्रयत्नमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् संयोगद्वयादात्महस्तसंयोगाद्धस्तमुसलसंयोगाद्धस्तमुसलयोर्युगपदपक्षेपणकर्मणी भवतः । ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणोलूखलमुसलयोरभिघाताख्यः संयोगः क्रियते । अपक्षिप्तस्य मुसलस्यान्येन कर्मणा उलूखलमुसलसमवेतो मुसलस्योत्पतनहेतुः संयोगः क्रियत इत्यर्थः । स संयोगो मुसलगत वेगमपेक्षमाणोऽप्रत्ययमप्रयत्नपूर्वकं मुसले उत्पतनकर्म करोति । वेगो निमित्तकारणम् , मुसलं समवायिकारणम् ।
तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते उत्पतनकर्म स्वकारणाभिघाताख्यं संयोगमपेक्षमाणं मुसले वेगमारभते । तं संस्कारमपेक्ष्य हस्तमुसलसंयोगोऽसमवायिकारणभूतोऽप्रत्ययम प्रयत्नपूर्वकं हस्तेऽप्युत्पतनकर्म करोति । योऽसौ प्राक्तनोऽपक्षेपणसंस्कारो मुसलगतः सोऽप्यभिघाताद् विनष्टः , तदभावे कथं मुसलेऽप्रत्ययमुत्पतनकर्मोत्पतन संस्कारमारभते ? अपेक्षाकारणाभावादत आहयद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्ट :, तथापि मुसलोलूखलसंयोगः पटुकर्मोत्पादकः संस्कारजनककर्मोत्पादकः । कुतः ?
संयोगविशेषभावात् संयोगविशेषत्वात् । किमतो यद्येवम् ? तत्राह - तस्य कर्मणः संस्कारारम्भे कर्तव्ये साचिव्यसमर्थो भवति , साहाय्ये समर्थो भवति । अस्मिन् पक्षे हस्तमुसल योरुत्पतनकर्मणी क्रमेण भवतः । आशुभावाच्च यौगपद्यग्रहणम् ।
सत्प्रत्यय कर्मविधिः । कथम् ? चिकीर्षितेषु यज्ञाध्ययनदानकृष्यादिषु यथा हस्तमुत्क्षेप्तुमिच्छत्यपक्षेप्तुं वा तदा हस्तवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नः सञ्जायते । तं प्रयत्नं गुरुत्वं चापेक्षमाणादात्महस्तसंयोगाद्धस्ते कर्म भवति , हस्तवत् सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अर्थात् गमनत्व और कर्मत्व एक ही वस्तु है । क्योंकि क्रियाओं के जितने भी प्रकार हैं , उन सबों में गमनत्व को प्रतीति होती है , अतः गमनत्व और कर्मत्व एक ही वस्तु हैं । ' गमनत्व और कर्मत्व दोनों विभिन्न जातियाँ हैं ' इस प्रसङ्ग में यह युक्ति है कि उत्क्षेपणादि विभिन्न क्रियाओं की पङ्क्ति में ही ' विशेष ' नाम के द्वारा गमन रूप क्रिया का भी अलग से उल्लेख किया गया है , अतः समझते हैं गमनत्व नाम की कोई कर्मत्वव्याप्य अलग हो जाति है ( अतः उक्त संशय होता है ) । क्योंकि क्रियाओं के अवान्तर भेदों का जहाँ निरूपण किया गया है , वहीं गमन का भी उल्लेख है ।
इस प्रकार पूर्वपक्षी के द्वारा संसय का उपपादन किये जाने पर ' न ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ( प्रशस्तदेव ) मुनि ने अपना उत्कृष्ट उत्तर कहा है कि उक्त प्रकार से संशय करना युक्त नहीं है , यतः गमनत्व और कर्मत्व ये दोनों ही एक ही जाति के विभिन्न नाम हैं । ' आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्व पर्याय एव गमनत्वम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी का विवरण देते हैं ।
अर्थात् जिस प्रकार पुरुष के जितने भी भेद हैं , उन सबों में आत्मत्व का व्यवहार होने के कारण आत्मत्व और पुरुषत्व एक ही जाति के दो नाम हैं , उसी प्रकार गमनत्व और कर्मत्व भी एक ही जाति के दो नाम हैं । ' अर्थ ' इत्यादि पङ्क्ति से पूर्व पक्षी यह आक्षेप करते हैं कि ( उत्क्षेपणादि की तरह ) विशेष नाम के द्वारा गमन का उल्लेख क्यों किया गया है ? ' न ' इत्यादि से इसी आक्षेप का उत्तर दिया है ।
अर्थात् यदि गमन शब्द का उल्लेख ( उत्क्षेपणादि शब्दों को पङ्क्ति में ) न किया जाता तो जिन भ्रमणादि क्रियाओं का अवरोध ( संग्रह ) उत्क्षेपणादि शब्दों के द्वारा सम्भव नहीं है , उन सबों का कर्म में संग्रह न हो सकता । ( गमनशब्दाघटित उक्त वाक्य से केवल ) उत्क्षेपणादि क्रियाओं का ही संग्रह होता । किन्तु उत्क्षेपणादि से भिन्न भ्रमणादि क्रियाओं में भी कर्मत्व का व्यवहार लोक में होता है । अतः उन सबों के संग्रह के लिए ही गमन ' शब्द का उल्लेख किया गया हैं ।
यही उक्त ( सिद्धान्त भाष्य ) ग्रन्थ का अभिप्राय I
' अथवा अस्त्वपरं सामान्यं गमनत्वम् ' ( अर्थात् गमनत्व को भी उत्क्षेपणत्वादि की तरह कर्मत्व का अवान्तर सामान्य हीं मान लें , तब भी कोई क्षति नहीं है ) । यह गमनश्व ( कर्मत्वव्याप्य ) जाति किन कर्मों में रहती है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' अनियत ' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । तो फिर उत्क्षेपणादि कर्मों में गमन की प्रतीति क्यों कर होती है ? इस प्रश्न का समाधान ' गमनशब्दस्तु ' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् उत्क्षेपणादि कर्मों में प्रयुक्त गमन शब्द उपलक्षणार्थक है , अतः उत्क्षेपनादि के प्रत्ययों के लिए गमन शब्द के प्रयोग को गौण ( लाक्षणिक ) ही समझना चाहिए | ' स्वाश्रयसंयोगविभाग कर्तृत्वसामान्यात् ' इस वाक्य के द्वारा प्रकृत में लक्षणा का प्रयोजक धर्म ( लक्ष्यतावच्छेदक ) दिखलाया गया है । अर्थात् जिस प्रकार गमन अपने
भूद्र में संयोग और विभाग को उत्पन्न करता है , उसी प्रकार उत्क्षेपणादि क्रियायें भी अपने आश्रयीभूत द्रव्यों में संयोगों और विभागों को उत्पन्न करती हैं , इस सादृश्य के कारण ही उत्क्षेपणादि क्रियाओं में भी गमन शब्द का गौण प्रयोग होता है ।
( प्र ० ) तो फिर इसी साधम्यं के कारण गमन में उत्क्षेपणादि शब्दों का भी गौण प्रयोग क्यों नहीं होता ? उ ० ) ' अग्निर्माणवकः ' इत्यादि प्रयोग के द्वारा जिस प्रकार माणवक में अग्निपद का गौण व्यवहार तेजस्वित्वादि धर्मों के कारण होता है , उसी प्रकार पिङ्गलवर्ण और रक्तवर्ण रूप सादृश्य के कारण अग्नि में माणवक का गौण व्यवहार भी क्यों नहीं होता ? यदि इसका यह परिहार उपस्थित करें कि केवल हेतु है , अतः उपचार की कल्पना नहीं की जाती , किन्तु उपचार या व्यवहार रहने पर ही कारण की कल्पना की जाती है ( अतः लोक में अग्नि में माणवक शब्द का व्यवहार न होने के
सत्प्रत्यय अर्थात् प्रयत्न से उत्पन्न क्रिया की उत्पत्ति की विधि कहते हैं । ( प्र ० ) कैसे ? अर्थात् यह सत्प्रत्यय रूप कर्म किस प्रकार उत्पन्न होता है ? यज्ञ , अध्ययन , दान अथवा कृषि प्रभृति कर्म
( उ ० ) के उत्पादन की इच्छा होने पर हाथ को नीचे या ऊपर करने के लिए आत्मा के हाथवाले प्रदेश में प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार इस प्रयत्न . गुरुत्व एवं आत्मा और हाथ के संयोग इन तीनों कारणों से हाथ में क्रिया की उत्पत्ति होती है 1 हाथ की तरह शरीर के पैर प्रभृति अवयवों में एवं शरीर रूप अवयवी में भी क्रिया की उत्पत्ति होती है । कारण उक्त प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता ) ! ( उ ) तो फिर प्रकृत में मेरे लिए भी यही परिहार है । अर्थात् लोक में उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन का व्यवहार होता है , अतः उस व्यवहार के लिए हेतु की कल्पना करते हैं । गमन में उत्क्षेपणादि का व्यवहार लोक में नहीं होता है , अत : उसके लिए किसी चर्चा की आवश्यकता नहीं है ।
' सत्प्रत्यय कर्मविधिः ' अर्थात् प्रयत्न के द्वारा उत्पन्न कर्म की उत्पत्ति की रीति कहते हैं । ' किस प्रकार ? " यह पूछे जाने पर ' चिकीर्षितेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसका उपपादन करते हैं । यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान पुरुष को अभिप्रेत रहने पर उसके लिए वह जिस समय हाथ को ऊपर की ओर उठाता है , उस समय आत्मा के हाथवाले प्रदेश में प्रयत्न उत्पन्न होता है । इस प्रयत्न रूप निमित्तकारण से हाथ में क्रिया उत्पन्न होती है , जिसका असमवायिकारण आत्मा और हाथ का संयोग है ।
पृ. ७१४
तत्सम्बद्धेष्वपि कथम् ? यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति ' उत्क्षिपामि हस्तेन मुसलम् ' इति , तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणा- दात्महस्तसंयोगाद् यस्मिन्नेव काले हस्ते उत्क्षेपणकर्मोत्पद्यते , तस्मिन्नेव काले तमेव प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्त मुसलसंयोगान्मु सलेऽपि कर्मेति ।
ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते ।
पुनरप्यपक्षेपणेच्छोत्पद्यते ।
तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् संयोगाद्धस्तमुसलयोयुगपदक्षेपणकर्मणी भवतः , ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणोलूखल- मुसल योरभिघाताख्यः संयोगः क्रियते , स संयोगो मुसलगतवेगमपेक्षमाणोऽप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म करोति ।
तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते ।
तमपेक्ष्य मुसलहस्तसंयोगोऽप्रत्ययं हस्तेऽप्युत्पतनकर्म करोति ।
यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टस्तथापि मुसलोलूखलयोः संयोगः पटुकर्मोत्पादकः संयोगविशेषभावात् तस्य संस्कारारम्भे साचिव्यसमर्थो भवति ।
अथवा प्राक्तन एव पटुः संस्कारोऽभिघाताद- विनश्यन्नवस्थित इति ।
अतः संस्कारवति पुनः संस्कारारम्भो नास्त्यतो यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म , तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्षमाणान्मुस लहस्तसंयोगादप्रत्ययं हस्ते ऽप्युत्पतनकर्मेति ।
पाणिमषु गमनविधिः • कथम् ? यदा तोमरं हस्तेन गृहीत्वो- तदनन्तरं प्रयत्नः , तमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् संयोगद्वयात् तोमरहस्तयोर्युगपदाकर्षणकर्मणी भवतः ।
प्रसारित च हस्ते तदाकर्षणार्थः प्रयत्नो निवर्तते ।
तदनन्तरं तिर्यगूर्ध्व दूरमासनं वा क्षिपामीतीच्छा सञ्जायते ।
तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नस्तमपेक्षमाणस्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यः ।
तस्मात् तोमरे कर्मोत्पन्नं नोदनापेक्षं तस्मिन् संस्कारमारभते ।
ततः संस्कारनोदनाभ्यां तावत् कर्माणि भवन्ति यावद्धस्ततोमरविभाग इति ।
ततो विभागान्भोदने निवृत्ते संस्कारादूर्ध्वं तिर्यग् दूरमासनं वा प्रयत्नानुरूपाणि कर्माणि भवन्त्यपतनादिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) शरीर और उनके अवयवों से संयुक्त द्रव्यों में कैसे ? ( क्रिया उत्पन्न होती है ? ) ( उ ० ) जब मूसल को हाथ में लेकर कोई यह इच्छा करता है कि ' मैं हाथ से मूसल को ऊपर की ओर उछालेँ ' उसके बाद प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस प्रयत्न और हाथ एवं आत्मा के संयोग इन दोनों से उसी समय हाथ में क्रिया उत्पन्न होती है । एवं उसी समय प्रयत्न और हाथ एवं यूसल के संयोग इन दोनों से मूसल में भी क्रिया उत्पन्न होती है ।
इसके बाद उस मूसल के दूर फेंके जाने पर उस मूसल विषयक इच्छा का नाश हो जाता है । फिर उसी के अपक्षेपण ( निचे ले आने ) की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद प्रयत्न एवं उक्त ( आत्मा और हाथ के ) संयोग इन दोनों से एक ही समय हाथ और मूसल दोनों में ही अपक्षेपणरूप क्रिया उत्पन्न होती है । मूसल की इस अन्तिम क्रिया से ऊखल में मूसल का अभिघात नाम का संयोग उत्पन्न होता है । उस कर्म और अभिघात इन दोनों से मूसल में संस्कार की उत्पत्ति होती है ।
इस संस्कार के साहाय्य से मूसल और हाथ के संयोग के द्वारा हाथ में ' अप्रत्यय ' अर्थात् बिना प्रयत्न के ही उत्क्षेपण क्रिया की उत्पत्ति होती है । यद्यपि पहिले का संस्कार नष्ट हो गया रहता है , फिर भी मूसल और उलूखल का संयोग पटु ( संस्कारजनक ) कर्म को उत्पन्न करता है । वह संयोग ही अपनी विशिष्टता के कारण संस्कार के उत्पादन का मुख्य अधिष्ठाता है । अथवा पहिले का ही विशेष कार्यक्षम संस्कार अभिघात नाम के संयोग नष्ट न होने के कारण तब तक विद्यमान रहता है ।
अतः एक संस्कार से युक्त वस्तु में पुन : दूसरे संस्कार की उत्पत्ति की सम्भावना न रहने पर भी जिस समय संस्कार और अभिघात ( संयोग ) इन दोनों से बिना प्रयत्न के मूसल में उत्पतन ( उत्क्षेपण ) क्रिया उत्पन्न होती है , उसी समय उसी संस्कार और मूसल एवं हाथ के संयोग इन दोनों से अप्रत्यय ( प्रयत्नाजन्य ) उत्पतन ( उत्क्षेपण ) क्रिया उत्पन्न होती है ।
( प्र ० ) हाथ से फेंकी हुई वस्तुओं में गमन क्रिया किस प्रकार उत्पन्न होती है ? ( उ ० ) जिस समय तोमर को हाथ में लेकर उसे उछालने की इच्छा ( पुरुष को ) होती है , उसके बाद प्रयत्न उत्पन्न होता है । आत्मा और हाथ के संयोग एवं हाथ और तोमर के संयोग इन दोनों संयोगों के द्वारा उक्त प्रयत्न के साहाय्य से तोमर और हाथ में एक ही समय दो आकर्षणात्मक क्रियायें उत्पन्न होती हैं । हाथ को पसार लेने पर आकर्षण का कारण वह प्रयत्न नष्ट हो जाता है I ।
इसके बाद ' इसको किसी पार्श्व में , या ऊपर बहुत दूर , या निकट में ही फेंक दूँ यह इच्छा उत्पन्न होती है । फिर ( इच्छाविषयी - भूत ) उस क्रिया के अनुकूल प्रयत्न उत्पन्न होता है । इसके बाद इस प्रयत्न के साहाय्य से तोमर और हाथ में नोदन नाम के संयोग की उत्पत्ति होती है । नोदन नाम के संयोग से तोमर में उत्पन्न क्रिया उस नोदन की सहायता से तोमर में संस्कार को उत्पन्न करती है ।
इसके बाद संस्कार और नोदन से तोमर में तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं , जब तक हाथ और तोमर का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । इसके बाद विभाग से जब नोदन नाम के संयोग का नाश हो जाता है , तब उस संस्कार ( वेग ) से पतन के समय तक पार्श्व में , दूर में , या समीप में फेंकी जाने की क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
प्रकारान्तरमाह – अथवा प्राक्तन एव पटुः , संस्कारोऽभिघातादविनश्यन्नवस्थित इति विशिष्टकारणजत्वादतिप्रबल : संस्कार : स्पर्शवद्रव्यसंयोगेनापि न विनश्यति । अतः संस्कारवति संस्कारान्तरारम्भो नास्ति , यतः प्राक्तनापक्षेपणसंस्कारो न विनष्टः , अतः प्राक्तनसंस्कारवति मुसले संस्कारान्तरारम्भो नास्तीति प्रतीयते । यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म , तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद्धस्तमुसलसंयोगादप्रत्ययं हस्तेऽप्युत्पतनकर्मेति । अस्मिन् पक्षे
हस्तमुसलोत्पतनकर्मणोर्वास्तवमेव यौगपद्यम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ६० प्रयत्न भी का ऊपर उठना या नीचे गिरना के रहते हुए गुरुव से सर्वथा रहित द्रव्य नहीं होता , अतः गुरुत्व भी उसका कारण है । ' हस्तवत् सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति ' अर्थात् पैर में जो क्रिया की उत्पत्ति होगी , उसमें आत्मा के पादवाले प्रदेश में उत्पन्न प्रयत्न निमित्तकारण होगा और पैर और आत्मा का संयोग असमवायिकारण होगा । इसी प्रकार शरीर के सभी अवयवों में क्रिया की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में समझना चाहिए । इसी प्रकार यह भी समझना चाहिए कि शरीर ( रूप अवयवी ) में जो क्रिया की उत्पत्ति होगी , उसका असमवायिकारण शरीर और आत्मा का संयोग ही होगा और आत्मा के शरीरवाले प्रदेश में उत्पन्न प्रयत्न उसका निमित्तकारण होगा |
' तत्सम्बद्धेषु ' इत्यादि प्रश्नवाक्य का अभिप्राय यह है कि शरीर के साथ और उसके अवयवों के साथ सम्बद्ध अन्य द्रव्यों में क्रिया की उत्पत्ति किस क्रम से होती है ?
' यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति - उत्क्षिपामि हस्तेन मुसलमिति ' अर्थात् जिस समय हाथ में मूसल को लेकर पुरुष यह इच्छा करता है कि ' मैं मूसल को ऊपर की तरफ उछालू ' ' तदनन्तरम् ' अर्थात् उसके बाद ' प्रयत्नः ' अर्थात् ' हाथ से मूसल को लेकर मैं ऊपर की तरफ उछालू ' हाथ और मूसल को एक ही समय ऊपर की तरफ उछालने की इस आकार की इच्छा से उत्पन्न होनेवाला प्रयत्न , हाथ और मूसल को एक ही समय ऊपर की ओर उछालने के सामथ्यं से युक्त ही उत्पन्न होता है ।
उस प्रयत्न रूप विशेष प्रकार के निमित्तकारण से जिस समय आत्मा और हाथ के संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा हाथ में उत्क्षेपण कर्म की उत्पत्ति होती हैं , उसी समय हाथ और मूसल दोनों की क्रिया के लिए उत्पन्न उक्त प्रयत्न रूप निमित्तकारण से ही हाथ और मूसल के संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा मूसल में भी कर्म की उत्पत्ति होती है , क्योंकि एक ही समय हाथ और मूसल दोनों में हो क्रियोत्पत्ति के सभी कारण वर्तमान हैं ।
' ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते ' अर्थात् उत्क्षेपण को इच्छा नहीं रह जाती । ' पुनरप्यपक्षेपणेच्छोत्पद्यते ' अर्थात् हाथ से मूसल को नीचे की ओर ले आने की इच्छा उत्पन्न होती है । ' तदनन्तरं प्रयत्नः ' यह अपक्षेपण का प्रयत्न भी उत्क्षेपण के उक्त प्रयत्न की तरह ( एक ही समय हाथ और मूसल को नीचे की ओर ले आने के सामर्थ्य से ) युक्त ही उत्पन्न होता है ।
उक्त विशिष्टप्रयत्न रूप निमित्तकारण के साहाय्य से कश्रित दोनों संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा अर्थात् आत्मा और हाथ के संयोग एवं हाथ और मूसल के संयोग इन दोनों संयोगों से एक ही समय दो अपक्षेपण क्रियायें ( अर्थात् हाथ और मूसल दोनों को नीचे की ओर ले आने की दो क्रियायें ) उत्पन्न होती हैं ।
" ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणा उलूखलमुसल योरभिघाताख्यः संयोगः क्रियते " अर्थात् अपक्षेपण क्रिया से युक्त मूसल की अन्तिम क्रिया से उलूखल और मूसल इन दोनों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले उस संयोग की उत्पत्ति होती है , जिससे मूसल का उत्पतन होता है । वह संयोग मुसल में रहनेवाले वेग के साहाय्य से अप्रत्यय ' अर्थात् बिना प्रयत्न के हो उस उत्पतन क्रिया को उत्पन्न करता है , जो मूसल में रहती है । इस ( अप्रत्ययक्रिया का ) वेग निमित्तकारण है और मूसल समवायिकारण है ।
' तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते ' अर्थात् वह उत्पतनरूपा क्रिया अपने कारणीभूत उक्त अभिघात नाम के संयोग के द्वारा मूसल में वेग को उत्पन्न करती है । इसी ( वेगाख्य ) संस्कार के साहाय्य से हाथ और मूसल का संयोग रूप असमवायिकारण हाथ में भी ' अप्रत्यय ' अर्थात् प्रयत्न से निरपेक्ष क्रिया को उत्पन्न करता है । ( प्र ० ) मूसल में पहिले की अपक्षेपण क्रिया से उत्पन्न वेग नाम का संस्कार अभिघात संयोग के द्वारा विनष्ट हो चुका है ।
उस संस्कार के न रहने पर मूसल की वह प्रयत्ननिरपेक्ष क्रिया मूसल में उत्पतनक्रिया से उत्पन्न होनेवाले संस्कार को कैसे उत्पन्न कर सकती है ? क्योंकि ( प्राक्तन संस्कार रूप ) आवश्यक कारण वहाँ नहीं है । इसी प्रश्न का समाधान ' यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टः ' इत्यादि से दिया गया है । इस सन्दर्भ के ' पटुकर्मोत्पादक : ' इस वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि ( मूसल और उलूखल का संयोग ) ऐसे कर्म का उत्पादक है कि जिसमें ( वेगाख्य ) संस्कार को उत्पन्न करने की शक्ति है । कुत : ?
' अर्थात् संयोग में ही संस्कार को कारणता क्यों हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर ' संयोगविशेषभावात् ' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् यतः वह संयोग अन्य संयोगों से विशेष प्रकार का है , ( अतः उससे संस्कार की उत्पत्ति होती है ) । उक्त संयोग में यदि विशिष्टता है भी तो इसका प्रकृत में क्या उपयोग है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' तस्य संस्कारारम्भे ' इत्यादि से दिया गया है । अर्थात् उस संयोग में यही विशिष्टता है कि उसमें कम के द्वारा वेग ( सस्कार ) उत्पादन में साहाय्य करने का सामर्थ्य है ।
इस पक्ष में हाथ में और मूसल में उत्पतन क्रियायें क्रमशः उत्पन्न होती हैं . ( युगपत् नही ) । ' हस्तमुसल योर्युगपदपक्षे पणकर्मणी ' इत्यादि वाक्य में जो यौगपद्य का ग्रहण किया गया है , उसका अर्थ केवल शीघ्रता है ( अर्थात् दोनों में अतिशीघ्र उत्पतन कर्म की उत्पत्ति होती है ।
' अथवा प्राक्तन एवं पटुःसंस्कारोऽभिघातादविनश्यन्नवस्थिन इति ' इस सन्दर्भ के द्वारा उक्त प्रश्न का ही दूसरे प्रकार से समाधान किया गया है । अभिप्राय यह है कि यह वेगाख्य संस्कार ( अन्य वेगाख्य संस्कारों के कारणों से ) विशेष प्रकार के कारणों से उत्पन्न होता है । अतः अत्यन्त बलवान होने के कारण ( अन्य संस्कारों के विनाशक ) स्पर्श से युक्त द्रव्य के संयोग से भी वह विनष्ट नहीं होता । यही कारण है कि उससे दूसरे संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती , क्योंकि पहिले अपक्षेपण क्रियाजनित संस्कार का विनाश नहीं हुआ है । इससे यह समझते हैं कि पहिले के संस्कार से युक्त मूसल में दूसरे संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती है । " यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म , तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद्धस्तमुसलसंयोगादप्रत्ययं हस्तेऽप्युत्पतनकर्मेति ” इस पक्ष में हाथ और मूसल दोनों प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१ ९ में ही उत्पन्न कर्म वास्तव में एक ही समय उत्पन्न होते हैं ( पहिले पक्ष की तरह यहाँ यौगपद्य का शीघ्रतामूलक गौण प्रयोग नहीं है ) |
' पाणिमुक्तेषु गमनविधिः कथम् ? हाथ से फेके हुए द्रव्यों को ' गमनविधि ' गमन की रीति अर्थात् गमनक्रिया को उत्पत्ति किस प्रकार होती है ? यह प्रश्न किये जाने पर ' यदा तोमरम् ' इत्यादि से समाधान किया गया है । ' युगपदाकर्षणेति ' क्योंकि बिना आकर्षण के फेंकना सम्भव नहीं हैं । ' प्रयत्नो निवर्तत इति ' अर्थात् हाथ और तोमर इन दोनों के आकर्षण रूप प्रयोजन का सम्पादन कर प्रयत्न निवृत्त हो जाता है । क्योंकि आकर्षण का विरोधी और प्रसारण का हेतुभूत प्रयत्न उत्पन्न हो गया रहता हैं ।
' तदनन्तरम् ' अर्थात् प्रसारण के बाद , टेढ़ा करके फेंके या ऊपर की ओर अथवा दूर फेंके अथवा समीप में फेंके , इस प्रकार की इच्छायें उत्पन्न होती हैं । ' तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्न : ' इसमें प्रयुक्त ' अनुरूप ' शब्द के द्वारा यह अर्थ व्यक्त होता है कि टेढ़ा कर फेंकने की इच्छा के होने पर प्रयत्न भी तदनुकूल हो उत्पन्न होता है । एवं ऊपर की ओर फेंकने की इच्छा होने पर ऊपर फेंकने के अनुकूल ही प्रयत्न भी उत्पन्न होता है । दूर फेंकने की इच्छा होने पर बहुत बड़ा प्रयत्न उत्पन्न होता है ।
समीप में फेंकने की इच्छा होने पर शिथिल प्रयत्न उत्पन्न होता है । ' तमपेक्षमाणस्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यः ' क्योंकि नोद्य जो तोमर एवं नोदक जो हाथ , इन दोनों के साथ साथ ही वह गमन का भी कारण है । ' तस्मात् ' अर्थात् कथित उस नोदन नाम के संयोग के द्वारा उक्त इच्छानुरूप प्रयत्न के साहाय्य से तोमर में क्रिया की उत्पत्ति होती है । यही क्रिया नोदन संयोग की सहायता से तोमर में संस्कार ( वेग को ) उत्पन्न करती है ।
' ततः संस्कारेति ' अर्थात् जब तक तोमर का पतन नहीं हो जाता , तब तक वेग से उसमें नोदन के अनुरूप क्रियाओं की उत्पत्ति होती है ।
जो पुरुष अस्त्र चलाने का अभ्यास किया हो वही पुरुष ' कृतव्यायामः ' शब्द से अभिप्रेत है । ' वामेन करेण धनुविष्टभ्य ' अर्थात् वह जब बायें हाथ से धनुष को दृढ़तापूर्वक पकड़कर ' दक्षिणेन शरं सन्धाय ' अर्थात् धनुष की डोरी में तीर को लगा कर , ' सशरां ज्याम् ' अर्थात् तीर में लगी हुई डोरी को , ' मुष्टिना गृहीत्वा ' अर्थात् मुट्ठी से पकड़ कर इच्छा करता है कि ' सज्येष्वाकर्षयाम्येतद्धनुरिति ' धनुष की डोरी का नाम ' ज्या ' है । ' इषु ' शब्द शर ( तीर ) का वाचक है । ' सज्येषुधनुः ' यह शब्द " ज्या च इषुश्च ज्येषू , सह ज्येषुभ्यां वर्तत इति सज्येषु धनु : ' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से निष्पन्न है । ' एतदाकर्षयामि इस वाक्य के द्वारा प्रकृत इच्छा का आकार दिखलाया गया है । ' तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्तशरसंयोगात् , प्रयत्नविशिष्टज्या हस्तसंयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्यां कर्मणी धनुष्कोट्योरित्येतत् सर्व
E ? युगपत् ' क्योंकि सब को सामग्री एक ही समय उपस्थित है । ' एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमनेन हस्तेन गन्तव्यमिति यज्ज्ञानम् ' अर्थात् उसी ज्ञान से ' तदाकर्षणार्थस्य ' धनुष को अपनी ओर खींचने के लिए जो प्रयत्न था उसका विनाश होता है ।
इसके बाद तीर और डोरी को छोड़ देने की इच्छा होती है , उसके बाद छोड़ने के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है ' तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म , तस्माज्ज्याङ्गुलिविभागः ' अर्थात् डोरी का शर से और अङ्गुली का डोरी से विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग से शर का और डोरी का संयोग और डोरी के साथ अङ्गुली का संयोग इन दोनों संयोगों का विनाश हो जाता है ।
इन संयोगों के विनष्ट होने पर जिस समय धनुष में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार किसी प्रतिबन्धक के न रहने के कारण नमे हुये धनुष को अपनी पहिली अवस्था में ले आता है , ( उसी समय ) इस स्थितिस्थापक संस्कार के साहाय्य से ही धनुष और डोरी के संयोग के द्वारा डोरी में और शर में क्रिया उत्पन्न होती है । ' तत् ' अर्थात् वह कर्म ' स्वकारणापेक्षम् ' अर्थात् धनुष और डोरी के संयोग का साहाय्य पाकर डोरी में संस्कार को अर्थात् वेग नाम के संस्कार को उत्पन्न करता है ।
उसी वेग से तीर और डोरी का ' नोदन ' संयोग उत्पन्न होता है , ( वह संयोग नोदन रूप इसलिए है कि ) नोद्य ( प्रेर्य ) जो तीर और नोदक ( प्रेरक ) जो डोरी इन दोनों में साथ साथ गमन क्रिया के उत्पादन का हेतु है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से पहिली क्रिया तीर में संस्कार को उत्पन्न करती है । नोदन से साहाय्यप्राप्त उस संस्कार से ही तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं , जब तक कि तीर और डोरी का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता ।
इस विभाग से जब उक्त नोदन संयोग का नाश हो जाता है , तब ' संस्कार ' से ही अर्थात् वेग नाम के संस्कार से ही तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं जब तक कि तीर का पतन नहीं हो जाता । यह पतन गुरुत्व के प्रतिबन्धक संस्कार के नाश से उत्पन्न होता है ।
' बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मात् ' इस वाक्य के द्वारा फिर आक्षेप करते हैं । उक्त आक्षेपभाष्य का यह अभिप्राय है कि डोरो से विभक्त तीर में मध्यवर्ती अनेक क्रियाओं की कल्पना किस हेतु से की जाती है ? एक ही कर्म की कल्पना क्यों नहीं की जाती १ ' संयोग बहुत्वात् ' इत्यादि से उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । यह निश्चित है कि क्रिया की सत्ता उत्तरदेश संयोग तक रहती है । एवं फेके हुए तीर के बीच में बहुत से संयोग देखे जाते हैं । अतः यह कल्पना करते हैं कि कर्म भी बहुत से उत्पन्न होते हैं । ' एकस्तु संस्कारोऽन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावात् ' नोदनसंयोग हो या अभिघातसंयोग हो इन दोनों में से किसी एक का साहाय्य पाकर ही कर्म संस्कार को उत्पन्न करता है , केवल कर्म से बेगाख्यसंस्कार की उत्पत्ति नहीं होती । बीच में न नोदनसंयोग की उत्पत्ति होती है , न अभिघातसंयोग की ।
पृ. ७२०
तथा यन्त्रमुक्तेषु गमनविधिः कथम् ? यो बलवान् कृतव्यायामो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य दक्षिणेन शरं सन्धाय सरां ज्यां मुष्टिना गृहीत्वा आकर्षणेच्छां करोति , सज्येष्वाकर्षयाम्येतद् धनुरिति ।
तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्ते यदैवोत्पद्यते तदैव तमेव प्रयत्नमपेक्षमाणाद्भस्तज्याशरसंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्म , प्रयत्नविशिष्टहस्तज्याशर संयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्यां कर्मणी भवतो धनुष्कोटयेोरित्येतत् सर्वं युगपत् ।
एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमनेन गन्तव्य - मिति यज्ज्ञानं ततस्तदाकर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाशस्ततः पुनर्मोक्षणेच्छा सज्जायते , तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्माङ्गलिसंयोगादङ्गलिकर्म तस्माज्ज्याङ्गुलि विभागः , ततो विभागात् संयोगविनाशः , तस्मिन् विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद् यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्यथावस्थितं स्थापयति , तदा तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुर्ज्या संयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते ।
तत् स्वकारणापेक्षं ज्यायां संस्कारं करोति ।
तमपेक्षमाण इपुज्यासंयोगो नोदनम् , तस्मादिषावाद्यं कर्म नोदनापेक्षमिषौ संस्कारमारभते ।
तस्मात् संस्कारान्नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्या- विभागः , विभागान्निवृत्ते नो कर्माण्युत्तरोत्तराणीषु- संस्कारादेवापतनादिति ।
बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मात् ? संयोगबहुत्वात् ।
एकस्तु संस्कारः , अन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावादिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसी प्रकार यन्त्र ( धनुषादि ) के द्वारा फेंकी हुई ( शरादि > ) वस्तुओं में भी गमन क्रिया की रीति जाननी चाहिए | ( प्र ० ) कैसे ? ( उ ० ) धनुषादि चालन में निपुण व्यक्ति जिस समय बायें हाथ से धनुषादि को जोर से पकड़ कर दाहिने हाथ से उसमें तीर को लगाता है और तीर सहित धनुष की डोरी को मुट्ठी से पकड़ कर उसे खींचने की इस प्रकार की इच्छा करता है कि मैं शर और डोरी सहित धनुष को खीचूँ ' उसके बाद प्रयत्न की उत्पत्ति होती है ।
आत्मा और हाथ के संयोग एवं उक्त प्रयत्न इन दोनों से जिस समय आकर्षणात्मक क्रिया की उत्पत्ति होती है , उसी समय उस प्रयत्न और हाथ का डोरी से संयोग और डोरी का तीर के साथ संयोग इन दोनों संयोग प्रभूति कारणों से डोरी और तीर दोनों में ही क्रियायें उत्पन्न होती हैं । धनुष के दोनों कोणों के साथ डोरी के दोनों संयोगों से धनुष के दोनों कोणों में दो क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इन दोनों क्रियाओं की उत्पत्ति में प्रयत्न से युक्त हाथ के साथ डोरी और तीर के संयोग भी सहायक हैं ।
ये सभी काम एक ही समय होते हैं । इस प्रकार कान तक धनुष के खींचे जाने पर ' इसको इससे आगे नहीं जाना चाहिए ' इस आकार का ( संकल्पात्मक ) ज्ञान ( उत्पन्न होता है ) । इस ज्ञान से आकर्षण के कारणीमूत प्रयत्न का विनाश हो जाता है । फिर उसे छोड़ने की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । आत्मा और अङ्गुलि के संयोग से अगुलि में क्रिया की उत्पत्ति होती है , जिसमें उक्त प्रयत्न का साहाय्य भी अपेक्षित होता है ।
अङ्गुलि की इस क्रिया से डोरी और अङ्गुलि में विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग से { डोरी और अङ्गुलि के ) संयोग का विनाश होता है । उस संयोग के नष्ट हो जाने पर किसी प्रतिबन्धक के न रहने के कारण धनुष में रहनेवाला ( स्थितिस्थापक ) संस्कार नमे हुये उस धनुष को पहिली अवस्था में ले आता है । उसी समय इस स्थितिस्थापक संस्कार एवं धनुष और डोरी के संयोग इन दोनों से तीर क्रिया उत्पन्न होती है ।
यह क्रिया अपने कारणीभूत ( धनुष और डोरी के संयोग ) के साहाय्य से डोरी में ( वेगाख्य ) संस्कार को उत्पन्न करती है । इस संस्कार के द्वारा तीर एवं डोरी इन दोनों में ' नोदन ' नाम के संयोग की उत्पत्ति होती है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से तीर की पहिली क्रिया तीर में ( वेगाख्य ) ( संस्कार को उत्पन्न करती है । यह संस्कार उक्त नोदनसंयोग की सहायता से तब तक क्रियाओं को उत्पन्न करता रहता है , जब तक डोरी और तीर का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता ।
विभाग से नोदन नाम के संयोग के विनष्ट हो जाने पर तीर के वेग नाम के संस्कार से ही आगे को क्रियायें तीर के गिरने तक होती रहती हैं । ( प्र ० ) बहुत सी क्रियायें क्रमशः क्यों उत्पन्न होती हैं ? ( उ ० > ) यतः संयोग बहुत से हैं । किन्तु संस्कार उसमें एक ही रहता है , क्योंकि बीच में ( संस्कार के उत्पादक प्रथम ) कर्म को अपेक्षित अन्य कारणों का ( सहयोग प्राप्त ) नहीं है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
पाणिमुक्तेषु गमनविधिः कथम् ? पाणिमुक्तेषु द्रव्येषु गमनविधिः गमनप्रकारः कथमुत्पद्यत इति प्रश्ने कृते सत्याह - यदा तोमरमिति । युगपदाकर्षणेति , अनाकृष्योत्क्षेप्तुमशक्यत्वात् । प्रयत्नो निवर्तत इति तयो - हंस्ततोमरयोराकर्षण प्रयोजनप्रयत्नो निवर्तते , तद्विरोधिप्रसारणप्रयत्नोत्पादादित्यर्थः । तदनन्तरमिति । प्रसारणानन्तरम् । तीर्यगूर्ध्वं वा दूरमासन्नं वा क्षिपामीतीच्छोत्पद्यते । तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नः तिर्यक्क्षेपणेच्छायां तिर्यक्क्षेपणप्रयत्नो जायत इति । ऊर्ध्वक्षेपणेच्छाया मूर्ध्वक्षेपणप्रयत्नो जायते । दूरक्षेपणेच्छायां महान् प्रयत्नः आसन्नक्षेपणेच्छायां च शिथिलः प्रयत्नो जायत इति तदनुरूपशब्दार्थः । तमपेक्षमाणस्तोमर हस्तसंयोगो नोदनाख्यो नोद्यस्य तोमरस्य नोदकस्य च हस्तस्य सहगमनहेतुत्वात् । तस्मान्नोदनाख्याद् यथोक्तादिच्छानुरूपप्रयत्नापेक्षात् तोमरे कर्मोत्पन्नम् । तत् कर्म नोदनापेक्षम् , तस्मिन् तोमरे संस्कारमारभते । ततः संस्कारेति । तोमरस्य पतनं यावत् संस्कारात् तदनुरूपाणि कर्माणि भवन्तीत्यर्थः ।
कृतव्यायामः कृतायुधाभ्यासो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य गाढं गृहीत्वा दक्षिणेन शरं सन्धाय ज्यायां शरं संयोज्य सशरां ज्यां शरेण सह वर्तमानां ज्यां मुष्टिना गृहीत्वा इच्छां करोति सज्येष्वाकर्षयाम्येतद् धनुरिति । ज्येति धनुर्गुणस्याख्या , इषुरिति शरस्याभिधानम् । ज्या च इषुश्च ज्येषू , सह ज्येषुभ्यां वर्तत इति सज्येषु धनुरेतदाकर्षयामीतीच्छाया आकारो दर्शितः । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्ते यदेवोत्पद्यते , तदैव तं प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्तज्याशरसंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्म हस्तशरसंयोगात् । प्रयत्न विशिष्टज्या हस्तसयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्या कोटिसंयोगाभ्यां कर्मणी धनुष्कोटचोरित्येतत् सर्वं युगपत् कारणयौगपद्यात् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमनेन हस्तेन गन्तव्यमिति यद् ज्ञानं तस्मात् । तदाकर्षणार्थस्त धनुराकर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाश इति ।
ततः शरस्य गुणस्य च मोक्षणेच्छा च । तदनन्तरं प्रयत्नो मोक्षणार्थ :, तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म । तस्माद् ज्याङ्गुलिविभागः , क्षरगुणाभ्याम् ततो विभागाच्छ्रगुणाङ्गुलिसंयोगविनाशस्तस्मिन् संयोगे विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद् यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्यथावस्थितं स्थापयति । तं संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुज्यसंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते । तत् कर्म स्वकारणापेक्षं धनुर्ज्या संयोगापेक्षं ज्यायां संस्कारं वेगाख्यं करोति तं च संस्कारमपेक्षमाण इषुज्यासंयोगो नोदनम् , नोद्यस्येपोर्नोदकस्य गुणस्य सहगमनहेतुत्वात् । तस्माद् नोदनादिषावाद्यं कर्म संस्कारमारभते । तस्मात् संस्काराद् नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्याविभागः । विभागान्निवृत्ते नोदने कर्माणि उत्तराणि संस्कारादेव वेगाख्याद् भवन्ति यावत् पतनम् , इषोरेतस्य च पातो गुरुत्वप्रतिबन्धकसं ह्कारक्षयात् ।
अत्र चोदयति - बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मादिति । ज्याविभक्तस्येषोरन्तराले क्रमशो बहूनि कर्माणि भवन्तीति कस्मात् कल्प्यते ? एकमेव कर्म कुतो न कल्पितमित्यभिप्रायः । समाधत्ते - संयोगबहुत्वादिति । उत्तरसंयोगान्तं कर्मेत्यवस्थितम् । क्षिप्तस्येषोरन्तराले बहवः संयोगा दृश्यन्ते । तेन बहूनि कर्माणि भवन्तीत्याश्रीयते । एकस्तु संस्कारः , अन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावात् । नोदनाभिघातयोरन्यतरापेक्षं कर्म संस्कारमारभते न कर्ममात्रम् , वेगाभावात् । न चान्तराले नोदनं नाप्यभिघातः , तस्मादेक एव शरज्यासंयोगापेक्षेण शरकर्मणा कृतो विशिष्टः संस्कारो यावत् पतनमनुवर्तते । यथा यथा चास्य कार्यकरणाच्छक्तिः क्षीयते , तथा तथा कार्यं मन्दतरतमादिभेदभिन्नमुपजायते । यथा तरोस्तरुणस्य फलं प्रकृष्यतेऽपकृष्यते च जीर्णस्य ।
पृ. ७२५
एवमात्माधिष्ठितेषु सत्प्रत्ययमसत्प्रत्ययं च कर्मोक्तम् ।
अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं कर्म गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति ।
तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्ववेगप्रयत्नान् समस्त- व्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेषः ।
नोदनम विभागहेतोरेकस्य कर्मणः कारणम् , तस्माच्चतुर्ष्वपि महाभूतेषु कर्म भवति ।
यथा पङ्काख्यायां पृथिव्याम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इस प्रकार आत्मा से अधिष्ठित द्रव्यों के प्रयत्नजनित और अप्रयत्नजनित दोनों ही प्रकार के कर्म कहे गये हैं । आत्मा की अध्यक्षता के बिना बाह्य चारों महाभूतों में बिना प्रयत्न के केवल नोदनादि से गमन रूप क्रिया की ही उत्पत्ति होती है ( उत्क्षेपणादि क्रियाओं की नहीं ) । यहाँ ( कथित ) ' नोदन ' उस संयोग विशेष का नाम है जो कभी गुरुत्व , द्रवत्व , वेग और प्रयत्न सम्मिलित इन चार गुणों से , कभी इनमें से एक दो या तीन गुणों से उत्पन्न होता है । यह विभाग को उत्पन्न न करनेवाले कर्म काही कारण है । इस ( संयोग ) से चारों महाभूतों में क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । जैसे कि पङ्क नाम की पृथिवी में ( नोदन संयोग से क्रिया की उत्पत्ति होती हैं ) ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
उपसंहरति - एवमिति । अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति । आत्मना असाधारणेन सम्बन्धिनानधिष्ठितेषु बाह्येष्वप्रयत्नपूर्वकं गमनाख्यमेव कर्म भवति , नोत्क्षेपणापक्षेपणादिकमित्यर्थः । महाभूतेषु नोदनादिभ्यः कर्म भवतीत्युक्तम् । अथ किं नोदनमत आहतत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नवेगान् समस्तव्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेषः । कथं संयोगविशेषो नोदनमुच्यते , तत्राह - नोदनमविभागहेतोः कर्मणः कारणमिति । नोद्यनोदकयोः परस्परविभागं न करोति यत् कर्म तस्य कारणं नोदनम् ।
किमुक्तं स्यात् ? अनेन संयोगेन सह नोदको नोद्यं नोदयति नान्यथा , तेनायं नोदनमुच्यते । नोदनं तु क्व कर्मकारणमत्राह- - यथा पङ्काख्यायां पृथिव्यामिति । यदा पङ्कस्योपरि मन्दव्यवस्थापिता प्रस्तरगुटिका क्रमशः पङ्केन सममधो गच्छति , तदा गुरुत्वापेक्षः प्रस्तरपङ्कसंयोगो नोदनम् । यदा प्रयत्नेन दूरमुत्थाप्य प्रस्तरेणाभिहन्यते पङ्कस्तदा गुरुत्वप्रयत्नवेगापेक्षः संयोगो नोदनम् , यदा जलेनाहन्यते तदा समस्तापेक्षः संयोगो नोदनमिति यथासम्भवमूह्यमिति ।
वेगापेक्षो यः सयोग एकस्य विभागकृतः कर्मणः कारणं सोऽभिघातः , अभिघात्याभिघातकयोः परस्परविभागो यतः कर्मणो जायते तस्यैवैकस्य हेतुर्यः संयोगविशेषः सोऽभिघातः । तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति । यथा पाषाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभिपतितेषु । नोदनं परस्परा विभागहेतोरेवेकस्य कर्मणः कारणं न परस्परविभागहेतोः , एवमभिघातोऽपि परस्परविभागहेतोरेवैकस्य कर्मणः कारणं न परस्पराविभागहेतोरिदमुक्त मे कस्य कर्मणः कारणम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अतः तीर और डोरी के एक ही संयोग के साहाय्य से तीर की क्रिया के द्वारा जिस विशेष प्रकार के वेगाख्य संस्कार की उत्पत्ति होती हैं , वही तीर के पतन होने तक बराबर बना रहता है । जैसे जैसे उससे कार्य होते जाते हैं , उसकी शक्ति क्षीण होती जाती हैं , एवं कार्य भी ( शक्ति की क्षीणता से ) क्रमशः मन्द मन्दतर और मन्दतम होते जाते हैं । जैसे कि तरुणवृक्ष का फल बढ़िया होता है , और जीर्णवृक्ष का फल घटिया ।
' एवम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति ' । अर्थात् आत्मा रूप असाधारण आश्रय से असम्बद्ध पृथिव्यादि बाह्य चारों द्रव्यों में बिना प्रयत्न ( अप्रयत्नपूर्वकम् ) के ( नोदनादि संयोगों के द्वारा ) गमन नाम का कर्म ही उत्पन्न होता है , उत्क्षेपण या अपक्षेपण प्रभृति कर्म नहीं ।
अभी कहा है कि पृथिव्यादि महाभूतों में नोदनादि से क्रिया की उत्पत्ति होती है , अतः प्रश्न उठता है कि यह ' नोदन कौन सी वस्तु है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नवेगान् समस्तव्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेष : ' इस वाक्य से दिया गया है । उक्त विशेष प्रकार के सयोग को ही नोदन क्यों कहते हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर ' नोदनमविभागहेतोः कर्मणः कारणम् ' इस वाक्य से दिया गया है । नोद्य और नोदक इन दो द्रव्यों में जिस क्रिया से विभाग की उत्पत्ति नहीं होती
नोदन ही उस क्रिया का हेतु है । इससे क्या निष्कर्ष निकला ? यही कि नोदन रूप संयोग के साथ ही नोदक अपने नोद्य का नोदन करता हैं , अन्यथा नहीं । इसी कारण यह संयोग ' नोदन ' कहलाता है । नोदनसंयोग से क्रिया की उत्पत्ति कहाँ होती है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' यथा पङ्काख्यायां पृथिव्याम् ' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । जिस समय पङ्क के ऊपर धीरे से रक्खा हुआ पत्थर का टुकड़ा क्रमशः पङ्क के साथ नीचे की ओर जाता है , वहाँ पत्थर और पङ्क का संयोग रूप नोदन केवल गुरुत्व से उत्पन्न होता है । जिस समय प्रयत्न के द्वारा पत्थर को दूर उछाल कर पङ्क को आघात पहुँचाया जाता है , वहाँ जिस नोदन संयोग की उत्पत्ति होती है , उसका गुरुत्व , प्रयत्न और वेग ये तीनों कारण हैं । जिस समय वही पङ्क जल के द्वारा आहत किया जाता है , वहाँ का नोदन उन सभी कारणों से उत्पन्न होता है । इसी प्रकार जहाँ जिस प्रकार की सम्भावना हो उसके अनुसार कल्पना करनी चाहिए ।
पृ. ७२७
वेगापेक्ष यः संयोगविशेषो विभागहेतोरेकस्य कर्मणः कारणं सोऽभिघातः ।
तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति , यथा पाषाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभिपतितेषु तथा पादादिभिर्नुद्यमानायामभिहन्यमानायां वा ।
पङ्काख्यायां पृथिव्यां यः संयोगो नोदनाभिघातयोरन्यतरापेक्ष उभयापेक्षो वास संयुक्तसंयोगः , तस्मादपि पृथिव्यादिषु कर्म भवति ।
ये च प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म जायते ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' अभिघात ' उस विशेष प्रकार के संयोग का नाम है जो वेग की सहायता से विभाग को उत्पन्न करनेवाले कर्म का कारण हो । अभिघात नाम के संयोग से भी चारों महाभूतों में क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । जैसे कि पत्थर प्रभृति कठिन द्रव्यों पर गिरे हुए द्रव्यों में ( क्रिया की उत्पत्ति होती है ) एवं पैर प्रभृति से केवल छुये जाने पर या अभिहत होने पर पङ्क नाम की पृथिवी में ( कथित ) नोदन और अभिघात नाम के दोनों संयोगों से या दोनों में से किसी एक संयोग से जिस संयोग की उत्पत्ति होती है , उसे ‘ संयुक्तसंयोग ' कहते हैं । इस सयुक्तसंयोग से भी पृथिव्यादि भूतों में क्रिया की उत्पत्ति होती है । जो प्रदेश किसी से छुये नहीं जाते , या
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — " वेगापेक्षो यः संयोग एकस्य विभागकृतः कर्मणः कारणं सोऽभिघातः " अर्थात् अभिघात्य और अभिघातक इन दोनों में परस्पर विभाग की उत्पत्ति जिस एक क्रिया से हो , उस क्रिया का कारणीभूत विशेष प्रकार का संयोग हो ' अभियात ' है । ' तस्मादपि चतुषु महाभूतेषु कर्म भवति , यथा पाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभिपतितेषु ' ( जिस प्रकार ) परस्पर विभाग के अकारणीभूत एक क्रिया का ही कारण ' नोदन ' है , परस्पर विभाग के कारणीभूत एक क्रिया का कारण नोदन नहीं है । उसी प्रकार ( ठीक उससे विप( त ) अभिघात भी परस्पर विभाग के हेतुभूत एक क्रिया का ही कारण है , वह परस्पर विभाग के अहेतुभूत एक क्रिया का कारण नही है ।
पृ. ७२८
पृथिव्युदयोर्गुरुत्व विधारक संयोगप्रयत्नवेगाभावे सति गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् ।
यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् ।
तत्राद्यं गुरुत्वात् , द्वितीयादीनि तु गुरुत्वसंस्काराभ्याम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अभिहत नहीं होते , उनमें भी क्रिया की उत्पत्ति होती है ।
गुरुत्व के विरोधी संयोग , प्रयत्न और वेग इन सबों के न रहने पर भी पृथिव्यादि द्रव्य केवल गुरुत्व के द्वारा जो नीचे की तरफ गिरते हैं , उस क्रिया को ही ' पतन ' कहते हैं । जैसा कि मुसल और तीर प्रभृति द्रव्यों में कह आये हैं । उनमें पहिली क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है और दूसरी क्रियायें गुरुत्व और वेग दोनों से उत्पन्न होती हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
संयुक्तसंयोगं व्याचष्टे - पादादिभिर्नुद्यमानायामिति । एकत्र पृथिव्यां पादेन नुद्यमानायामभिहन्यमानायां वा ये प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म दृश्यते । तत्र चलतां प्रदेशान्तराणां नुद्यमानाभिहन्यमानभूप्रदेशैः सह संयुक्तप्रदेशसंयोगः कारणम् । यत्राभिघातकं द्रव्यं भूप्रदेशमभिहत्य किञ्चिदधो नीत्वोत्पतति तत्र प्रदेशान्तरक्रियायामुभयापेक्षः संयुक्तसंयोगो हेतुः ।
गुरुत्वस्य कर्मकारणत्वमाह - पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्नवेगाभावे गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । गुरुत्वप्रतिबन्धकस्य हस्तसंयोगस्याभावे मुसलस्य यदधोगमनं तत् पतनं गुरुत्वाद् भवति । एवं गुरुत्वविधा रकप्रयत्नाभावे शरीरस्य पतनम् , क्षिप्तस्येषोरन्तराले वेगाभावात् पतनं गुरुत्वात् । तत्राद्यं कर्म गुरुत्वात् , द्वितीयादीनि तु गुरुत्वसंस्काराभ्याम् । तेषु मुसलादिष्वाद्यं कर्म गुरुत्वाद् भवति तेन कर्मणा संस्कारः क्रियते , तदनन्तरमुत्तरकर्माणि गुरुत्वसंस्काराभ्यां जायन्ते , द्वयोरपि प्रत्येकमन्यत्र सामर्थ्यावधारणात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' पादादिभिनु द्यमानायाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' संयुक्तसंयोग ' की व्याख्या करते हैं । पृथिवी का एक देश पैर के द्वारा छुये जाने पर या अभिहत होने पर ( उस देश से सम्बद्ध ) पृथिवी के अन्य प्रदेशों में भी- जो पैर से न छुवे गये हैं . और न अभिहत ही हुए हैं- क्रिया देखी जाती है । उस क्रिया का कारण वह संयुक्त संयोग है , जो क्रिया से युक्त भूप्रदेश के साथ पैर से छुए हुए या अभिहत हुए दूसरे भूप्रदेश का है । जहाँ अभिघात करनेवाला द्रव्य भूप्रदेश में अभिघात को उत्पन्न कर थोड़ा सा नीचे जाकर ऊपर की ओर उठता है । वहां जो दूसरे भूप्रदेश में क्रिया को उत्पत्ति होती है , उसका कारण ( वेग और संयोग ) इन दोनों से साहाय्यप्राप्त संयुक्त संयोग ही है ।
' पृथिव्युदकयो : ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गुरुत्व से कर्म की उत्पत्ति कही गयी है । मूसल में हाथ का जो संयोग है , वह गुरुत्व का प्रतिबन्धक है । उसके न रहने पर ही मूसल नीचे की ओर जाता है , मूसल की वह पतन क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है । गुरुत्व एवं शरीरधारण के उपयुक्त प्रयत्न का अभाव , इन दोनों के रहने पर जो शरीर का पतन होता है , उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इसी प्रकार फेंके हुए तीर में वेग के न रहने पर बीच में ही जो पतन हो जाता है , उसका कारण भी गुरुत्व ही है ।
पृ. ७२९
स्रोतोभूतानामपां स्थलानिम्नाभिसर्पणं यत तद् द्रवत्वात् स्यन्दनम् ।
कथम् ? समन्ताद् रोधः संयोगेनावयविद्रवत्वं प्रतिबद्धम् , अवयवद्रवत्वमध्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम् , उत्तरोत्तरावयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि ।
यदा तु मात्रा सेतुभेदः कृतो भवति , तदा समन्तात् प्रतिबद्धत्वादवयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति ।
सेतुसमीपस्थस्यावयवद्रवत्वस्योत्तरेषामवयवद्रवत्वानां प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः ।
तः क्रमशः संयुक्ताना- मेवाभिसर्पणम् ।
ततः पूर्वद्रव्यविनाशे सति प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैर्दीर्घं द्रव्यमारभ्यते ।
तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते ।
तत्र च कारणानां संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यदवयविनि कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यमिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — धारा रूपी जल का अपने आश्रय रूप स्थल से नीचे की ओर फैलना ही ' स्यन्दन ' नाम की क्रिया है , जो द्रवत्व से उत्पन्न होती है । ( प्र ० ) किस प्रकार ? ( उ ० ) नदी के जल किनारों के सभी अवयवों के साथ पूर्ण रूप से संयुक्त रहने के कारण अवयवी ( रूप जल ) का द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है । उस अवयवी के सभी अवयवों के द्रवत्व भी उस अवयवी में एकार्थसमवाय सम्बन्ध से रहने के कारण किनारों के उसी संयोग से प्रतिरुद्ध रहते हैं ।
उन अवयवों के आगे आगे के अवयवों के द्रवत्व भी उक्त संयुक्तसंयोगों से प्रतिरुद्ध रहते हैं । जब थोड़ा सा भी बाँध काट दिया जाता है , उस समय सभी किनारों के साथ संयुक्त रहने के कारण अवयवी के द्रवत्व प्रतिरुद्ध रहते हैं , अत : अपना ( स्यन्दन ) क्रिया रूप काम नहीं कर सकते । अतः कोई प्रतिबन्ध न रहने के कारण बाँध के समीप में रहनेवाले जलावयवों के द्रवत्व हा अपने कार्य करने को उन्मुख रहते हैं ।
उसके बाद बाँध से संयुक्त जलावयवों में ही ' अपसर्पण ' ( नीचे की तरफ फैलने की ) क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इसके बाद पहिले द्रव्य का विनाश हो जाने पर संयुक्त रूप से अवस्थित जलावयवों से ही बड़े द्रव्य की उत्पत्ति होती है । इस बड़े द्रव्य में कारणगुणक्रम से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । वहाँ पर किनारों के साथ सम्बद्ध अवयवों का संयुक्त रूप से गमन होने पर जो अवयवी में क्रिया उत्पन्न होती है , उसी का नाम ' स्यन्दन ' है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
द्रवत्वस्य कारणत्वं कथयति -- स्रोतोभूतानामपां स्थलान्निम्नाभिसर्पणं यत् तद् द्रवत्वात् स्यन्दनम् । अपां यत्र स्थलान्निम्नाभिसर्पणं तत् स्यन्दनं द्रवत्वादुपजायत इत्यर्थः । कथमिति प्रश्नः । समन्तादित्युत्तरम् । समन्तात् सर्वतो रोधः संयोगे कूलसंयोगे सति अवयविनो द्रवत्वं प्रतिबद्धं स्यन्दनं वा न करोति ।
अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम् , यस्मिन्नवयवे साक्षाद् रोधः संयोगोऽस्ति तदवयवगतद्रवत्वं तेनैव रोधःसंयोगेन प्रतिबद्धम् , उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगः प्रतिबद्धानि रोधः संयुक्तेनावयवेन सह संयोगादवयवान्तरस्य द्रवत्वं प्रतिबद्धमिति । तत्संयोगादपरस्य प्रतिबद्धमित्यनेनैव न्यायेनोत्तरोत्तरद्रवत्वानि प्रतिबद्धानि ।
यदा तु मात्रया सेतुभेद : कृतो भवति , तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति , दीर्घतरेण सेतुना समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविनो महापरिमाणस्यैकदेश कृतेनाल्पीयसा मार्गेण निर्गमाभावात् । सेतुसमीपस्थस्य त्ववयवद्रवत्वस्य वृत्तिलाभो भवति , अल्पस्यावयवस्य तेन मार्गेण निर्गतिसम्भवात् । तस्य वृत्तिलाभे चोत्तरेषामवयवद्रवत्वानामपि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभ : स्वकार्यकर्तृत्वं स्यात् । ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् ।
सेतुसमीपस्थोऽवयवः प्रथममभिसर्पति , तदनु तत्समीपस्थस्ततस्तत्समीपस्थ इत्यनेन क्रमेण सर्वेऽवयवा अभिसर्पन्ति । ते चाभिसर्पन्तो न परस्परभिन्नदेशा अभिसर्पन्ति , किं तु तथाभिसर्पन्ति यथा परस्परसंयुक्ता भवन्तीत्येतदवद्योतनामुक्तं संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । न पुनरस्यायमर्थोऽप्रच्युतप्राच्यसंयोगाना मेवाभिसर्पणमिति , संस्थानान्तरोपलम्भात् । ततः प्राक्तनसंयोगविनाशे पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः संयुक्तीभावेनावस्थितेरवयवैर्दीर्घं द्रव्यमारभ्यते ।
तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते ! अवयवद्रवत्वेभ्यो दीर्घतरेऽवयविनि द्रवत्वमुत्पद्यते । तत्र च कारणानां संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यदवयविनि कर्मोत्पद्यते द्रवत्वात् तत् स्यन्दनम् । तत्र तस्थिन् द्रवत्वे उत्पन्ने सति वारणानामवयवानां प्रबन्धन गमने पङ्क्तीभावेनाभिन्नदेशतया गमने यदवयविनि द्रवत्वात् कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इनमें पहिला कर्म गुरुत्व से उत्पन्न होता है और बाद के कर्म गुरुत्व और वेगाख्य संस्कार इन दोनों से उत्पन्न होते हैं । इनमें मूसल की पहिली क्रिया उसके गुरुत्व से उत्पन्न होती है । उस क्रिया से मूसल में वेग उत्पन्न होता । इसके बाद की मूसल की क्रियायें गुरुत्व और वेग इन दोनों से ही होती हैं क्योंकि इन दोनों में से प्रत्येक में क्रिया को उत्पन्न करने का सामर्थ्य अन्यत्र निश्चित हो चुका है ।
' स्रोतोभूतानामपाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रवत्व से स्यन्दन रूप क्रिया की उत्पत्ति की रीति कही गयी है । किसी ऊँची जगह से जल जो नीचे की ओर फैलता है , उसे ' स्यन्दन ' कहते हैं , यह स्यन्दन रूप क्रिया द्रवत्व से उत्पन्न होती है । ' कथम् ' यह पद प्रश्न का बोधक है , और ' समन्तात् ' इत्यादि से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है ।
II ' समन्तात् ' अर्थात् सभी कल के अवयवों में ' रोधः संयोगेन ' दोनों किनारे के साथ जल का संयोग उसके द्रवत्व को प्रतिरुद्ध कर देता है । ' अवयवद्रवत्वमध्ये कार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम् ' जिस अवयव का किनारे के साथ साक्षात् संयोग है , उस अवयव में रहनेवाला द्रवस्व भी अवयव और किनारे के संयोग से ही प्रतिरुद्ध हो जाता है । ' उत्तरोत्तराणि स्वयद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगेः प्रतिबद्धानि ' अर्थात् किनारे से संयुक्त अवयव के साथ संयोग के कारण ही अन्य अवयवों का द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होता है ।
उस अन्य अवयव के संयोग से तीसरे अवयव का द्रवत्व प्रतिरुद्ध होता है । इसी रोति से अन्य अवयवों के द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होते हैं । ' यदा मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति ' क्योंकि बहुत बड़े बाँध से घिरे हुए उस महत् परिमाणवाले अवयवी रूप जल का किसी एक ओर बनाये गये छोटे मार्ग से निकलना सम्भव नहीं है । किन्तु उस बाँध के समीप में जो थोड़े से जल के अवयव हैं , उनका उस छोटे से मार्ग से निकलना सम्भव है ।
इस प्रकार जल के कुछ अवयवों के द्रवत्व से कार्य करना सम्भव होने पर उत्तरेषामवयवद्रवत्वानामपि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभ :, अर्थात् अपने अपने कार्य करने में वे समर्थ होंगे । ' ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् ' अर्थात् पहिले बांध के समीप का अवयव निकलता है । उसके बाद उस अवयव के साथ संयुक्त दूसरा अवयव निकलता है । उनके बाद उस दूसरे अवयव के साथ सम्बद्ध तीसरा अवयव निकलता है । इसी क्रम से जल के सभी अवयव निकल जाते हैं ।
जल के वे अवयव ऐसे नहीं निकलते कि एक दूसरे से बिलकुल अलग होकर भिन्न देशों में चले जाँये , किन्तु इस प्रकार निकलते हैं कि जिससे परस्पर संयुक्त होकर ही निकलें । इसी वस्तुस्थिति को सूचित करने के लिए ' संयुक्तानामेवा - भिसर्पणम् ' यह वाक्य लिखा गया है ! उक्त वाक्य का यह अर्थ नहीं है कि पहिले के अविनष्ट संयोग से युक्त अवयवों का ही निःसरण होता है क्योंकि निःसरण के बाद दूसरे प्रकार के अवयवसंयोगों से युक्त अवयवियों की उपलब्धि होती है ।
' ततः ' अर्थात् पहिले के संयोग के विनष्ट हो जाने पर ' पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः ' अर्थात् परस्पर संयुक्त होकर अवस्थित अवयवों से ' दीघं द्रव्यमारभ्यते , तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते ' अर्थात् अवयवों में रहनेवाले द्रवत्वों से बड़े अवयवी द्रव्य में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है ।
पृ. ७३२
संस्कारात् कर्म इष्वादिषूक्तम् ।
तथा चक्रादिष्ववयवानां पार्श्वतः प्रतिनियत दिग्देश संयोगविभागोत्पत्तौ यदवयविनः संस्का- रादनियत दिग्देश संयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणमिति ।
एवमादयो गमनविशेषाः ।
प्राणाख्ये तु वायौ कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षा आग्रत इच्छानुविधानदर्शनात् सुप्तस्य तु जीवनपूर्वक- " प्रयत्नापेक्षात् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तीर प्रभृति में संस्कार के द्वारा कर्म की उत्पत्ति कह चुक हैं । उसी प्रकार चक्र ( मिट्टी के बर्त्तन बनाने की चक्की ) प्रभृति में उनके अवयवों का अनियत दिशाओं साथ संयोग और विभागों के जनक क्रियाओं की उत्पत्ति होती है , उसी प्रकार की क्रियाओं को ' भ्रमण ' कहते हैं । ये सभी ( स्यन्दन , भ्रमणादि ) कर्म विशेष प्रकार के गमन रूप ही हैं ।
जागते हुए व्यक्ति के प्राण नाम के वायु में आत्मा और वायु के संयोग से क्रिया उत्पन्न होती है , जिसमें ( उक्त संयोग को ) इच्छा या द्वेष से उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है , क्योंकि जगे हुए व्यक्ति की सभी क्रियाओं में इच्छा ( या द्वेष ) का अन्वय और व्यतिरेक देखा जाता है । सोये हुए व्यक्ति के प्राणवायु की क्रिया ( यद्यपि आत्मा और वायु के संयोग से ही होती है , किन्तु उसे ) जीवनयोनियन काही साहाय्य अपेक्षित होता है ( इच्छा पूर्वक या द्वेष पूर्वक प्रयत्न का नहीं ) ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
संस्कारात् कर्मेष्वादिषूक्तम् तथा चक्रादिषु । तथाशब्दो यथाशब्दमपेक्षते , यत्तदोनित्यसम्बन्धात् । यथा इष्वादिषु संस्कारात् कर्म कथितम् , तथा चक्रादिष्वपि भवतीत्यर्थः । एतदेव दर्शयति- अवयवानां पार्श्वतः प्रतिनियत दिग्देश संयोगविभागोत्पत्तौ यदवयविनः संस्कारादनियत दिग्देशसंयोग . विभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणम् । पाश्र्वतः प्रतिनियता ये दिग्देशास्तेः सहावयवानां संयोगविभागयोरुत्पत्तौ सत्यां यदवयविनः संस्कारादनियतदिग्देशैः सर्वतो दिक्कविभागसंयोगनिमित्तं कर्म जायते तद् भ्रमणम् । प्रथमं चक्रावयविनि दण्डसंयोगात् कर्मोत्पद्यते 1 उत्तरोत्तराणि कर्माणि नोदनादभिघातात् कर्मजात् संस्काराच्च भवन्ति । एवं वेगाद् दण्डसंयुक्ते चक्रावयवे आद्यं कर्म दण्डसंयोगात् , अवयवान्तरेषु च संयुक्तसंयोगात् , दण्डसंयुक्तस्यावयवस्योत्तरोत्तरकर्माणि संस्कारान्नोदनाच्च । अपरेषां संस्कारात् , संयुक्तसंयोगाच्च । दण्डविगमे तु चक्रे तदवयवेषु च संस्कारादेव केवलात् । उपसंहरति - एवमादयो गमनविशेषा इति ।
प्राणाख्ये वायो कर्म आत्मवायुसयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक प्रयत्नापेक्षाद् भवतीति । कथमिदं जातमत आह— इच्छानुविधानदर्शनात् । रेचकपूरकादिप्रयोगेष्विच्छानुविधायिनी प्राणक्रियोपलभ्यते । नासारन्ध्रप्रविष्टे रजसि तन्निरासार्थं प्राणक्रिया द्वेषादपि भवति , अतः प्रयत्नपूर्विकेत्यवगम्यते । सुप्तस्य जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षादात्मवायुसंयोगात् । सुप्तस्य प्राणक्रिया प्रयत्नकार्या प्राणक्रियात्वात् जाग्रतः प्राणक्रियावत् । स चेच्छाद्वेषपूर्वको न भवति , सुप्तस्येच्छाद्वेषयोरभावात् । तस्माज्जीवनपूर्वक एव निश्चीयते , प्राणधारणस्य तत्पूर्वकत्वात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' तत्र च कारणानां प्रबन्धेन गमने यदवयविनि कर्मोपद्यते द्रवत्वात् तत् स्यन्दनम् ' वहाँ बड़े द्रव्य में द्रवत्व के उत्पन्न होने पर ' कारणों का ' अर्थात् उसके अवयवों का ' प्रबन्ध से ' अर्थात् पङ्क्तिबद्ध होकर एक देश में गमन होने पर द्रवत्व से अवयवी में जो कर्म उत्पन्न होता है , उसी कर्म का नाम ' स्यन्दन ' है ।
' संस्कारात् कर्मेष्वादिपूक्तम् , तथा चक्रादिषु ' । ' तथा ' शब्द ' यथा ' शब्द की अपेक्षा रखता है , क्योंकि ' यत् ' शब्द और ' तत् ' शब्द परस्पर नित्यसाकाङ्क्ष हैं । तदनुसार उक्त भाग्यग्रन्थ का यह आशय है कि जिस प्रकार तीर प्रभृति में वेगाख्यसंस्कार के द्वारा कर्म की उत्पत्ति कही गयी है , उसी प्रकार चत्रादि में भी ( वेग से ही संस्कार की उत्पत्ति ) होती है ।
' अवयवानां पार्श्वतः प्रतिनियत दिग्देशसंयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणम् ' इस भाष्यसन्दर्भ के द्वारा इसी अर्थ का प्रतिपादन किया गया है ।
इस सन्दर्भ का अक्षरार्थ यह है कि ) अवयवी के चारों ओर नियत जो दिग्देश हैं , उन देशों के साथ उनके अवयवों के संयोग और विभाग उत्पन्न होते हैं , उनके उत्पन्न होने पर अवयवी में रहने वाले वेगाख्य संस्कार से अनियमित दिग्देशों के साथ अर्थात् सभी दिशाओं के साथ संयोग और विभाग को उत्पत्ति होती है , इस संयोग या विभाग से जिस कर्म को उत्पत्ति होती है वही ' भ्रमण ' हैं । पहिले चक्र रूप अवयवी में दण्ड के संयोग से क्रिया की उत्पत्ति होती है ।
आगे आगे की क्रियायें कर्मजनित अभिघात या नोदन से और संस्कार से उत्पन्न होती हैं । इसी प्रकार वेग के कारण दण्ड से संयुक्त चक्र के अवयवों में पहिली क्रिया की उत्पत्ति दण्ड के संयोग से होती है । अन्य अवयवों में पहिलो क्रिया संयुक्तसंयोग से होती है । दण्ड के साथ संयुक्त चक्र के अवयव को आगे आगे की क्रियायें संस्कार और नोदन से होती हैं । इससे भिन्न अवयवों को पहिली क्रिया संस्कार से और संयुक्तसंयोग से होती है ।
दण्ड के हटा लेने पर चक्र में और उसके अवयवों में जो क्रियायें होती रहती हैं , उनका कारण केवल संस्कार ही है । ' एवमादयो गमनविशेषाः ' इस सन्दर्भ से गमन रूप क्रिया के प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । प्राणवायु में उक्त प्रकार से क्रिया की उत्पत्ति कैसे होती है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' इच्छानुविधानदर्शनात् ' इस वाक्य से दिया गया है ।
पृ. ७३४
सत्यपि द्रव्यभावे आकाशकालदिगात्मनां निष्क्रियत्वं सामान्यादिवदमूर्तस्वात् ।
मूर्तिरसवंगत द्रव्य परिमाणम् , तदनुविधायिनी च क्रिया , सा चाकाशादिषु नास्ति ।
तस्मान्न तेषां क्रियासम्बन्धोऽस्तीति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आकाश , काल , दिशा और आत्मा ये सभी द्रव्य होने पर भी क्रिया से रहित हैं , क्योंकि ये सभी सामान्यादि पदार्थों की तरह अमूर्त हैं । सभी द्रव्यों के साथ असंयुक्त ( कुछ ही द्रव्यों के साथ संयुक्त ) द्रव्य के परिमाण को ' मूर्ति ' कहते हैं । यह मूर्ति ' जहाँ रहती है , क्रिया वहीं होती है | यह ( मूर्ति ) आकाशादि द्रव्यों में नहीं है , अतः उनमें क्रिया का सम्बन्ध भी नहीं है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
चतुर्षु महाभूतेष्विवाकाशादिषु कस्मात् क्रियोत्पत्तिर्न चिन्तितेत्याहआकाशकालदिगात्मनामिति । क्रियावत्त्वं मूर्तत्वेन व्याप्तं मूर्तत्वं चाकाशादिषु
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अर्थात् रेचक , पूरक प्रभृति प्राणायाम में प्राणवायु की क्रियायें इच्छा के अनुरूप देखी जाती हैं । इसी प्रकार नाक के छिद्र में जब धूल चली जाती है , तो उसे निकालने के लिए द्वेष से भी प्राणवायु में क्रिया देखी जाती है | अतः यह समझते हैं कि प्राणवायु की क्रिया का प्रयत्न कारण है । सुप्त पुरुष के प्राणवायु की क्रिया आत्मा और वायु के संयोग से उत्पन्न होती है , जिसमें उस संयोग को जीवनयोनियल का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । इस प्रसङ्ग में यह अनुमान भी है कि जिस प्रकार जाग्रत् पुरुष के प्राणवायु की क्रिया केवल प्राण को क्रिया होने के कारण ही प्रयत्न से उत्पन्न होती है , उसी प्रकार सुषुत पुरुष के प्राणवायु की क्रिया भी प्रयत्न से उत्पन्न होती है , क्यों के वह भी प्राण की ही क्रिया है । सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु में क्रिया का उत्पादक प्रयत्न , इच्छा और द्वेष से उत्पन्न नहीं हो सकता , क्योंकि सुषुप्त पुरुष में इच्छा और द्वेष का रहना सम्भव नहीं है । अतः सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु में क्रिया का उत्पादक जीवनपूर्वक प्रयत्न ही है । क्योंकि प्राण का धारण उसी प्रयत्न से होता है ।
' आकाशकालदिगात्मनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया हैं कि जिस प्रकार पृथिवी प्रभृति चार द्रव्यों में क्रिया की उत्पत्ति का विचार किया है , उसी प्रकार आकाश , काल , दिकू और आत्मा इन चार महान् द्रव्यों में भी क्रिया की उत्पत्ति का विचार क्यों नहीं किया गया ? इस प्रश्न के उत्तरग्रन्थ का अभिप्राय है कि यह व्याप्ति है कि क्रिया मूर्त्त द्रव्यों में ही रहे . आकाशादि कथित चारों द्रव्य मूर्त्त नहीं हैं , अतः उनमें क्रिया भी नहीं है । ' मूत्तिः ' इत्यादि सन्दर्भ से इसी का विवरण दिया गया है । इस भाष्य ग्रन्थ का अर्थ स्पष्ट है ।
' सविग्रहे ' इत्यादि सन्दर्भ से मन में जो कर्म उत्पन्न होता है , उसका कारण दिखलाया गया है । जागते हुए पुरुष के ' सविग्रहे मनसि ' अर्थात् शरीर सम्बन्ध से युक्त मन में इन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थ कर्म , आत्ममनः संयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक प्रयत्नापेक्षात् ' अर्थात् इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न ही जागते हुए पुरुष के मन में क्रिया का कारण है । यह कैसे समझा ? इसी प्रश्न का उत्तर ' अन्वभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषयोपलब्धिदर्शनात् ' इस वाक्य से दिया गया है ।
अर्थात् जाग्रत् अवस्था में इच्छा के अनुसार ही ' इन्द्रियान्तरेण अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि देखी जाती है । पुरुष जिस समय रूप को देखना चाहता है , उस समय रूप को ही देखता है । एवं जिस समय रस का अस्वादन करना चाहता है , उस समय रस का ही आस्वादन करता है । अन्तःकरण ( मन ) के सम्बन्ध के बिना वाह्य इन्द्रियों में विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य नहीं है । अतः समझते हैं कि इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न से ही मन में त्रिया उत्पन्न होती है ।
' सुप्तस्येति ' अर्थात् सोते हुए पुरुष के मन में दूसरी इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध के लिए जागते समय जो क्रिया उत्पन्न होती है , वह आत्मा और मन के संयोग से होती है , जिसे जीवनयोनियत्न के साहाय्य की भी अपेक्षा रहती है ।
' अपसर्पणेति ' मन में यह अपसर्पणादि क्रियायें किस प्रकार होती हैं ? यह प्रश्न कर उसका उत्तर देते हैं । आत्मा और मन का एक विशेष प्रकार का संयोग ही ' जीवन ' है । इस जीवन से जो कार्य उत्पन्न होंगे , धर्म और अधर्म उनके सहकारिकारण हैं ।
जिस समय उपभोग से उनका ' प्रक्षय ' अर्थात् विनाश हो जाएगा या ' अन्योन्याभिभव ' अर्थात् परस्पर एक दूसरे के प्रतिरोध के कारण दोनों अपने काम में अक्षय हो जाते हैं , उस समय जीवन ( उक्त आत्ममनः संयोग ) के सहायक धर्म और अधर्म के ' वैकल्य ' से अर्थात् अभाव के कारण ' तत्पूर्वक प्रयत्नवैकल्यात् ' अर्थात् जीवन से उत्पन्न होने वाले प्रयत्न के अभाव से प्राणवायु का निरोध हो जाता है ।
जिससे इसशरीर का पतन हो जाता है।इस शरीर के पतन के बाद जिन धर्मों और अधर्मो से दूसरे शरीर के द्वारा उपभोग करना है , उन धर्मों और अधर्मों में कार्य करने की क्षमता आ जाती है । वर्तमान शरीर के द्वारा उपभोग के कारणीभूत धर्म और अधर्म से प्रतिरुद्ध होने के कारण ही वे धर्म और अधर्म अपने उन उपभोग रूप कार्यों से विरत रहते हैं , जिनका सम्पादन दूसरे शरीर से होना है ।
जिस समय ऐहिक शरीर के धर्म और अधर्म नष्ट हो जाते हैं . या असमर्थ हो जाते हैं , उस समय दूसरे शरीर के द्वारा उपभुक्त होनेवाले धर्म और अधर्म अपना कार्य प्रारम्भ कर देते हैं , क्योंकि उनका कोई प्रतिबन्धक नहीं रह जाता । ऐहिक शरीर से उपभोग्य इन धर्म और अधर्म से भिन्न एवं जीवन रूप आत्ममन : संयोग के सहायक अथ च कार्यक्षम इन दूसरे धर्म और अधर्म से मन में अपसर्पण क्रिया उत्पन्न होती है , जिससे मृत शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है ।
६३
आत्मा और मन का संयोग मन की इस अपसर्पण क्रिया का असमवायिकारण है , एवं मन समवायिकारण है और कार्यक्षम धर्म और अधर्म उसके निमित्तकारण हैं । ' तत ' अर्थात् इसके बाद त शरीर से निकला हुआ वही मन अपने कार्य के उत्पादन में पूर्णक्षम उन्हीं धर्म और अधर्म से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के सय सम्बद्ध होता है | ' तत्सकान्तम् ' अर्थात् आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध मन स्वर्ग या नरक में चला जाता है । वहाँ जाकर आशय के अनुरूप अर्थात् अपने कर्मों के अनुसार फल भोग के अनुरूप शरीर के साथ सम्बद्ध हो जाता है । शरीर को उत्पत्ति स्वर्ग में हो या नरक में । उसमें मन का सम्बन्ध रहना आवश्यक है , उसके बिना स्वर्गादि देशों में भी भोग नहीं हो सकता । जिस कार नि होने के कारण आत्मा स्वर्गादि देशों में न जाकर भी उन देशों में उत्पन्न शरीरों के साथ सम्बद्ध हो जाता है , उसी प्रकार से मन को बिना वहाँ गये उन दूसरे शरीरों के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता , क्योंकि मन विभु नहीं है । इतनी दूर ( शरीर से असम्बद्ध ) केवल मन का जाना भी सम्भव नहीं है , क्योंकि महाप्रलय को छोड़कर और किसी भी समय शरीर से अम्बद्ध मन में क्रिया की उत्पत्ति नहीं होती है ।
पृ. ७३५
सविग्रहे मनसीन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं जाग्रतः कर्म आत्ममन : - संयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक प्रयत्नापेक्षात् , अन्वभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषया- न्तरोपलब्धिदर्शनात् ।
सुप्तस्य प्रबोधकाले जीवनपूर्वक प्रयत्नापेक्षात ।
अपसर्पणकर्मोपसर्पणकर्म चात्ममनः संयोगाददृष्टापेक्षात् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शरीर के सम्बन्ध से युक्त जागते हुए व्यक्ति के मन की क्रिया आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती है , जिसमें उसे इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है , क्योंकि इच्छा के बाद ही इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि होती है । ( किन्तु ) सोते हुए व्यक्ति के जागने के समय ( उसके मन की क्रिया यद्यपि ) आत्मा और मन के संयोग से ही उत्पन्न होती है , किन्तु उसमें जीवनयोनियन का साहाय्य भी अपेक्षित होता है ( इच्छाद्वेष या जनित प्रयत्न का नहीं ) ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
' प्राणाख्ये वायो कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक प्रयत्नापेक्षाद् भवतीति ' नास्ति , अतः क्रियावत्त्वमपि न विद्यत इत्यर्थः । एतदेव विवृणोति - मूर्त्तिरित्यादिना । तद् व्यक्तम् ।
मनसि कर्मकारणमाह- सविग्रह इति । जाग्रतः पुरुषस्य सविग्रहे मनसि सशरीरे मनसीन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं कर्म आत्ममनः संयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवति । इच्छाद्वेषपूर्वकः प्रयत्नो जाग्रतो मनसि क्रियाहेतुरिति । कथमेतदवगतं तत्राह - अन्वभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषयोपलब्धिदर्शनात् । जागरावस्थायामभिप्रायानतिक्रमेणेन्द्रियान्तरेण चक्षुरादिना विषयोपलब्धिदृश्यते । यदा रूपं जिघृक्षते पुरुषस्तदा रूपं पश्यति यदा रसं जिघृक्षते तदा रसं रसयति । न चान्तःकरणसम्बन्धमन्तरेण बाह्येन्द्रियस्य विषयग्राहकत्वमस्ति । तस्मादिच्छाद्वेषपूर्वकात् प्रयत्नात्मनसि क्रिया भूतेति गम्यते । सुप्तस्येति । सुप्तस्य पुरुषस्येन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं प्रबोधकाले मनसि क्रिया जीवनपूर्वक प्रयत्नापेक्षादात्ममनसोः संयोगात् ।
अपसर्पति । एतदपि कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकं कथयति । विशिष्टात्ममनः संयोगो जीवनम् तस्य स्वकार्यकरणे धर्माधर्मो सहकारिणौ । यदा तयोरुपभोगात् प्रक्षया विनाशोऽन्योन्याभिभवो वा परस्परप्रतिबन्धात् स्वकार्याकरणं वा ततो जीवनसहाययोः धर्माधर्मयोर्वैकल्येऽभावे सति तत्पूर्वक प्रयत्नवैकल्याद् जीवनपूर्वकस्य प्रयत्नस्य वैकल्यादभावात् प्राणवायोनिरोधे सति पतितेऽस्मिन् शरीरे याभ्यां धर्माधर्माभ्यां देहान्तरे फलं भोजयितव्यं तौ लब्धवृत्तिको भूतावैहिकशरीरोपभोग्यधर्माधर्मप्रतिबद्धत्वाद् देहान्तरभोग्याभ्यां धर्माधर्माभ्यां कार्यं न कृतम् । यदा त्वैहिकशरीरोपभोग्यौ धर्माधम प्रक्षीणों तदा देहान्तरोपभोग्यधर्माधर्मयोर्वृतिलाभः प्रतिबन्धाभावाज्जातः । ताभ्यां लब्धवृत्तिभ्यामैहिक देहोपभोग्यात् कर्मणोऽन्याभ्यामात्ममन : संयोगसहायाभ्यां मृत शरीरान्मनसो विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते ।
अपसर्पणकर्मोत्पत्तावात्ममनः संयोगोऽसमवायिकारणम् . मनः समवायिकारणम् , लब्धवृत्ती धर्माधर्मौ निमित्तकारणम् । ततस्तदनन्तरं तन्मनो मृतशरीराद् बहिर्निर्गतं ताभ्यामेव लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यां सकाशादुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बद्ध्यते । तत्संक्रान्तं तदातिवाहिकशरीरसंक्रान्तं मनः स्वर्गं नरकं वा गच्छति । तत्र गत्वा आशयानुरूपेण कर्मानुरूपेण शरीरेण सम्बद्धयते । स्वर्गे नरके वा यदुपजातं शरीरं तत्र तावन्मनःसम्बन्धेन भवितव्यम् , अन्यथा तस्मिन् देशे भोगासम्भवात् । न चात्मवदगत्वैव मनसो देहान्तरसम्बन्धोऽस्ति , अव्यापकत्वात् । गमनं च तस्यैतावद् दूरं केवलस्य न सम्भवति , महाप्रलयानन्तरावस्थाव्यतिरेकेणादारीरस्य मनसः कर्माभावात् । तस्मान्मृतशरीरप्रत्यासन्नमदृष्टवशादुपजात क्रिये रणुभिद्वंचणुकादिप्रक्रमेणारन्धमतिसूक्ष्ममनुपलब्धियोग्यं शरीरं परिकल्प्यते ।
पृ. ७३६
कथम् ? यदा जीवन सहकारिणोर्धर्माधर्मयो रुपभोगात प्रक्षयोऽन्योन्याभिभवो वा तदा जीवनसहाययोर्वैकल्यात् तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात् सत्यन्याभ्यां लब्धवृत्तिभ्यां प्राणनिरोधे धर्माधर्माभ्यामात्ममनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीराद् विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते ततः शरीराद् बहिरपगतं ताभ्यामेव धर्माधर्माभ्यां समुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बध्यते , तत्संक्रान्तं च स्वर्ग नरकं वा गत्वा आशयानुरूपेण शरीरेण सम्बद्धयते , तत्संयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — मन की ' उपसर्पण ' और ' अपसर्पण ' नाम की दोनों क्रियायें आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती हैं । जिसमें अदृष्ट का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । ( प्र ० ) किस प्रकार ? ( उ ० ) जिस समय भोग से जीवन के सहकारी धर्म और अधर्म का विनाश हो जाता है , अथवा परस्पर एक दूसरे से ही दोनों की कार्योत्पादन शक्ति अवरुद्ध हो जाती है , उस समय जीवन के दोनों सहायकों के अभाव के कारण उनसे उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न का भी विनाश हो जाता है । प्रयत्न के इस अभाव से ही प्राण का नाश होता है । इसके बाद अपने कार्य के उत्पादन में उन्मुख दूसरे धर्म और अधर्म से उस अपसर्पण नाम की क्रिया की उत्पत्ति होती है जिससे ( ऐहिक मृत ) शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग के उत्पादन में उन्हें आत्मा और मन के संयाग के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । इस विभाग से ही मन में ' अपसर्पण ' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है । उस शरीर से निकला हुआ मन उन्ही धर्मों और अथर्मो से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । उस शरीर के साथ सम्बद्ध होकर ही मन स्वर्ग या नरक को जाता है और वहाँ जाकर स्वर्ग या नरक के भोगजनक धर्म और अधर्म के अनुरूप दूसरे शरीर के साथ सम्बद्ध
पृ. ७३९
योगिनां च बहिरुचितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च , तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं कर्मादृष्टकारितम् ।
एवमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण-
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — होता है । इस शरीर के साथ मन के संयोग को उत्पन्न करनेवाली मन की क्रिया का नाम ' अपसर्पण ' क्रिया है ।
एवं बाहर ( विषय ग्रहण के लिए ) निकला हुआ योगियों का मन जो उनके अभिप्रेत देश में ही जाता है और वहीं से लौट आता है , मन की वह क्रिया अदृष्ट से उत्पन्न होती है । इसी प्रकार सृष्टि के आदि में शरीर के साथ मन का संयोग जिस क्रिया से होता है , उसका कारण
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
तच्च मृतशरीरमतिक्रम्य मनसः स्वर्गनरकादिदेशातिवाहनधर्मकत्वादातिवाहिक मित्युच्यते । मरणजन्मनोरन्तराले मनसः कर्म शरीरोपगृहीतस्यैवोपपद्यते , महाप्रलयानन्तरावस्थाभाविमनःकर्मव्यतिरिक्तत्वे सति मनःकर्मत्वाद् दृश्यमानशरीरवृत्तिमनः कर्मवत् । आगमश्चात्र संवादको दृश्यत इति । तत्संयोगार्थं च कर्मोपसर्पणमिति । तेन स्वर्गे नरके वा प्रत्यग्रजातेन शरीरेण मनःसयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अतः स्थूल मृत शरीर के ही समीप में एक अति सूक्ष्म , उपलब्धि के सर्वथा अयोग्य , आतिवाहिक शरीर की कल्पना करते हैं , जिसकी उत्पत्ति सक्रिय परमाणुओं के द्वारा द्वणुकादि क्रम से होती है । उन परमाणुओं में क्रिया की उत्पत्ति अदृष्ट से होती । उस सूक्ष्म शरीर का ' अतिवाहिक शरीर ' यह अर्थ नाम इसलिए है कि मन को इस मृतशरीर से छुड़ाकर स्वर्गादि देशों तक ' अतिवहन ' कर ले जाता है । इस वस्तुस्थिति के उपयुक्त यह अनुमान है कि शरीर से सम्बद्ध मन में ही वर्त्तमान में क्रिया देखी जाती है ( महाप्रलय रूप एक ही ऐसा समय है , जिस समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया रहती है ) , अतः अनुमान करते हैं कि मृत्यु बाद और पुनः जन्म लेने से पहिले इस बीच मन में जो क्रिया उत्पन्न होती है , उस समय भी मन का किसी शरीर के साथ सम्बन्ध अवश्य रहता है , क्योंकि मन की यह क्रिया भी महाप्रलयकालिक क्रिया से भिन्न मन की ही क्रिया है । इस सिद्धान्त को शास्त्ररूप शब्द प्रमाण का समर्थन भी प्राप्त है । ' तत्संयोगार्थञ्च कर्मोपसर्पणमिति ' सद्यः उत्पन्न उस स्वर्गीय या नारकीय शरीर के साथ सम्बन्ध के लिए ही मन में ' उपसर्पण ' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है ।
पृ. ७४०
मुपकारापकारसमर्थं च भवति तदप्यदृष्टकारितम् , यथा सर्गादावणुकर्म , अग्निवाय्बोरूर्ध्व तिर्यग्गमने , महाभूतानां प्रक्षोगणम् ।
अभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम् , अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं चेति ।
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भाष्यका हिन्दी अनुवाद — भी अदृष्ट ही है । इसी प्रकार जीवों के उपकार या अपकार करनेवाली महाभूतों की जिन कियाओं के कारणों का बोध प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं होता है , वे सभी क्रियायें अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं । जैसे कि सृष्टि के आदि में परमाणुओं की क्रियायें एवं अग्नि और वायु की ऊर्ध्वगति रूप क्रियायें , भूगोलकों की चलन क्रियायें एवं अभिमन्त्रित मणि जो चोर की ओर जाती है , या सामान्य लोह चुम्बक ओर जो जाता है , ये सभी क्रियायें भी अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं ।
प्रशस्तपादभाष्य में कर्मपदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ ।
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न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
योगिनां च बहिरुद्वेचितस्य बहिर्निःसारितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च । तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं मनःकर्मादृष्टकारितम् । न केवलमेतावत् सर्वमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारणमुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम् , यथा सर्गादावणुकर्म , अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने , महाभूतानां भूगोलकादीनां च प्रक्षोभणं चलनम् , परीक्षाकालेऽभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम् , अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं च सर्वमेतददृष्टकारितमिति ।
हिताहितफलोपायप्राप्तित्यागनिबन्धनम् ।
कर्मेति परमं तत्त्वं यत्नतः क्रियतां हृदि || इति भट्ट श्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां कर्मपदार्थः समाप्तः ।
जयन्ति जगदुत्पत्तिस्थितिसंहृतिहेतवः ।
विश्वस्य परमात्मानो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥
सामान्यं व्याचष्टे - द्विविधं सामान्यं परमपरं चेति । कृतव्याख्यानमेतदुद्देशावसरे । सर्व सर्वगतं सामान्यमिति केचित् । तन्निषेधार्थमाहस्वविषय सर्वगतमिति । यत् सामान्यं यत्र पिण्डे प्रतीयते स तस्य स्वो विषयः , तत्र सर्वस्मिन् गतं समवेतम् , सर्वत्र तत्प्रत्ययात् । सर्वसर्वगतत्वाभावे त्वनुपलब्धिरेव प्रमाणम् । अभिन्नात्मकम् अभिन्नस्वभावम् । येन स्वभावेनैकत्र पिण्डे वर्तते सामान्यं तेनेव स्वभावेन पिण्डान्तरेऽपि वतते , तत्प्रत्ययाविशेषादित्यर्थः । अनेकेषु पिण्डेषु वृत्तिर्यस्य तदनेकवृत्ति | अभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तत इति च प्रतीति सामर्थ्यात् समर्थनीयम् । नहि प्रमाणावगतेऽर्थे काचिदनुपपत्तिर्नाम । द्वित्वादिकमप्यभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तते तस्मात् सामान्यस्य पिण्डयोर्बहुषु वा पिण्डेष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययं करोति । पिण्डस्य विशेषो न लभ्यते तत्राह - एकद्विष्विति । सामान्यमेकस्मिन् पिण्डे द्वयोः
एकस्य द्वयोर्बहूनां वोपलम्भे सति गौरिति प्रत्ययस्य भावात् द्वित्वादिकं त्वेवं न भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्यमिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति - स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डान्तरेऽपि । तस्मादभेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्व पिण्डापरित्यागेन वर्तमान सदनुवृत्तिप्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीतिकारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु पिण्डेषु सामान्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह - प्रतिपिण्ड पिण्डं पिण्डं प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति , तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो जनितः , तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवे - क्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात् ? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकव त्तित्वमव . गम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्षविरोधादपास्यन्ते ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य ' अर्थात् योगी लोग जब अपने मन को पुनः अपने शरीर में लौट आने के लिए अभिप्रेत देश में जाने के लिए भेजते हैं ( उस समय ) उनके मन की क्रियायें अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं । मन की केवल वे ही क्रियायें नहीं , ' अन्यदपि महाभूतेषु यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारणमुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम् ' ( अर्थात् पृथिव्यादि महाभूतों की ही ) अन्य उन क्रियाओं की उत्पत्ति भी अदृष्ट से हो माननी पड़ेगी , जिनके कारणों की उपलब्धि प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा नहीं होती है . एवं जिनसे जिस किसी का कुछ उपकार या अपकार होता है । ' यथा सर्गादावणुकर्म , अग्निवाय्वोयंथासंख्यमूर्ध्वतियं ग्गमने ' जैसे सृष्टि के प्रथम क्षण की परमाणु की क्रिया एवं अग्नि की ऊपर की ओर जलने की क्रिया अथवा वायु की टेढ़े - मेढ़े चलने की क्रिया ( अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं ) । ' महाभूतानाम् ' अर्थात् भूगोल प्रभृति का ' प्रक्षोभण ' अर्थात् चलन , चोरों की परीक्षा के समय ' अभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम् ' अर्थात् उपयुक्त मन्त्र से अभिषिक्त
In English
Definition and Characteristics of Action (Karma)
This text is a commentary on the Prasastapada Bhasya regarding the nature of action (karma). It defines the essential characteristics of actions like throwing (utkshepana), such as being momentary, existing in a single substance, and being independent of external assistance for causing connection or separation.
This article answers
- Characteristics of karma in prasastapada bhasya?
- Definition of utkshepana and apakshepana?
- Difference between samsaragi and asamsaragi karma?
- What is the meaning of ekadravyatva in karma?