व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य
प्रशस्तपादभाष्य — सामान्य, विशेष, समवाय
19 मूल पद्य
सामान्यनिरूपणम्
पृ. ७४१
सामान्यं द्विविधम — परमपरं च स्वविषय सर्वगत- मभिन्नात्मकमनेकवृत्ति एकद्विवहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्यय का रि स्वरूपाभेदेनाधारेप प्रबन्धेन वर्तमानमनुवृत्तिप्रत्ययकारणम् ।
कथम् ? प्रतिपिण्डं सामान्यापेक्षं प्रबन्धेन ज्ञानोत्पत्तावभ्यासप्रत्यय- जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' पर ' और अपर ' भेद से सामान्य दो प्रकार का है । वह अपने विषयों ( आश्रयों ) में रहता है । वह अभिन्नस्वभाव का है । एक , दो या बहुत सी वस्तुओं में एक आकार की बुद्धि का कारण है अपने एक ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में बराबर ( बिना विराम को ) रहता हुआ ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' का , अर्थात् अपने आश्रय रूप विभिन्न व्यक्तियों में एक सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा
तत्र परस्पर विशिष्टेषु चर्मवस्त्रकम्वलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धान्नीलं आकार की बुद्धि का कारण है । ( प्र ० ) यह किस प्रकार समझते हैं ( कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) | ( उ ० ) प्रथमतः अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान जब बार बार होता है । ( जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं ) , तब उससे ( दृढतर ) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान समूहों का स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के विषयभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म हं वही सामान्य ' है ।
इन ( पर और अपर सामान्यों ) में सत्ता नाम का सामान्य केवल
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — -- :: - मणियों का चोर की ओर जाना , एवं ' अय सोऽयस्कान्ताभिसर्पणम् ' अर्थात् साधारण लौह का चुम्बक की ओर जाना ये भी सभी क्रियायें अदृष्ट से होती हैं ।
सुख और उसके उपाय की प्राप्ति , एवं दुःख और उसके उपाय का परिहार , ये दोनों ही क्रिया से होते हैं , अतः इस क्रियातत्त्व को यत्न से हृदय में धारण करना चाहिए ।
भट्ट श्री श्रीधर की रची हुई पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का
कर्मनिरूपण समाप्त हुआ ।
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जगत् की उत्पत्ति के हेतु ब्रह्मा , एवं स्थिति के हेतु विष्णु और संहार के हेतु महेश्वर , विश्व के परमात्मस्वरूप इन तीनों की जय हो ।
' द्विविधं सामान्यं परमपरञ्च ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सामान्य का निरूपण करतेहैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या पदार्थोद्देश प्रकरण में ( पृ ० २६ पं ० ११ ) कर चुके हैं । किसी सम्प्रदाय का मत है कि ' सभी सामान्य सभी वस्तुओं में रहते हैं ' इस मत के खण्डन के लिए ही ' स्वविषय सर्वगतम् ' यह वाक्य लिखा गया है । जिस सामान्य की प्रतीति जिस आश्रय में हो , वही उनका ' स्वविषय ' है ।
वह सभी विषयों में ' गत ' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहता है . क्योंकि उन सभी विषयों में उस ( सामान्य ) की प्रतीति होती है । ' सामान्यं सर्वसर्वगतं ' ( अर्थात् सभी सामान्य सभी सामान्य के विषयों में ) क्यों नहीं है ? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि सर्वत्र सभी सामान्यों की प्रतीति नहीं होती है । ' अभिनात्मकम् ' शब्द का अर्थ है ' अभिन्नस्वभाव ' अर्थात् जिस वरूप से वह अपने एक आश्रय में रहता है , उसी स्वरूप से वह अपने और आश्रयों में भी रहता है ।
क्योंकि एक आश्रय में सामान्य की प्रतीति में एवं दूसरे आश्रयों में उसी सामान्य की प्रतीति में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता । ' अनेकवृत्ति ' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है ' अनेकेषु वृत्तिर्यस्य ' अर्थात् अनेक आश्रयों में जो रहे वही ' अनेकवृत्ति है । सामान्य ' अभिन्नस्वभाव ' का है , और अनेक आश्रयों में रहता है ' इन दोनों बातों का समर्थन तदनुकूल प्रामाणिक प्रनीतियों से करना चाहिए । क्योंकि प्रमाण के द्वारा निर्णीत अर्थ में किसी प्रकार की अनुपपत्ति की शङ्का नहीं की जा सकती ।
द्विश्वादि ( व्यासज्यवृत्ति गुण ) भी अनेक वृत्ति हैं , और अभिन्न स्वभाव के भी हैं , अतः द्वित्वादि में सामान्य लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण उन दोनों विशेषणों से नहीं हो सकता , अतः एक द्विबहुषु ' इत्यादि वाक्य लिखा गया है । अर्थात् ( द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है कि ) ' सामान्य ' अपने एक आश्रय में दो आश्रयों में , अथवा बहुत से आश्रयों में प्रतीत होता है ।
अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार एक हो गोपिण्ड में ' अयं गो : ' इस प्रकार से ' सामान्य ' की प्रतीति होती है , उसी प्रकार दो गोपिडों में भी ' इमौ गावौ ' या बहुत से गोपिण्डों में भी ' इमे गावः ' इत्यादि श्राकार से ' सामान्य ' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि ( व्यासज्यवृत्ति गुणों ) में ऐसी बात नहीं है । उनकी प्रतोति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती है , तद्घटक किसी एक अभय में नहीं ) द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है ।
( सामान्य के लक्षणवाक्य कासार मर्म यह है कि ) जो स्वयं एक होकर भी अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहें , एवं ( अपने आश्रयीभूत ) एक व्यक्ति में , दो व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत एक आकार के प्रत्यय का कारण हो , वही ' सामान्य ' है । यही बात ' एनदेव ' इत्यादि से कही गयी हैं ।
एक वस्तु का जो स्वरूप है , उस जाति की दूसरी वस्तु का भी वही स्वरूप है , सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में ' प्रबन्ध से ' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहिले पहिले के अपने आश्रय रूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए हो जो ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' का अर्थात् अनेक वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति का कारण हो वही ' सामान्य ' है । ' कथम् ' इत्यादि से प्रतिवादी का प्रश्न सचित किया गया है ।
जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है ? ' प्रतिपिण्डम् ' इत्यादि से इसी प्रश्न का समाधान किया गया है ।
पृ. ७४४
नीलमिति प्रत्ययानुवृतिः , तथा परस्पर विशिष्टेषु द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः ।
सा चार्थान्तराद् भवितुमर्हतीति यत् तदर्थान्तरं सा सत्तेति सिद्धा ।
सत्तानुसम्बन्धात् सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः , तस्मात् सा सामान्यमेव ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' अनुवृति प्रत्यय ' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस रीति से होता है कि जिस प्रकार नीलचर्म , नीलवस्त्र और नील कम्बलों में परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्गके सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में ' यह नील है ' इस एक आकार की प्रतीतियाँ होती हैं , उसी प्रकार परस्पर विभिन्न द्रव्यों , गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में ' यह सत् है ' इस एक आकार की प्रतीति होती है । यह प्रतीति द्रव्य , गुण और कर्म इनसे भिन्न किसी वस्तु से ही होनी चाहिए । वही वस्तु है सत्ता ' । इस सत्ता जाति के सम्बन्ध से ' यह सत् हैं , यह सत् है , इत्यादि आकारों के अतुवृत्तिप्रत्यय ही हो सकते हैं ( कोई भी व्यावृत्तिप्रत्यय नहीं ) , अतः सत्ता सामान्य ही है , विशेष नहीं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानों विविच्य कथयति -- तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण प्रतीयते सत्ता , तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह - यथा परस्परविशिष्टेष्विति । तद् व्यक्तम् । द्रव्यादिषु सत्सदितिप्रत्ययानुवृत्तिः व्यतिरिक्तप्रत्ययनिबन्धना , भिन्नेषु प्रत्ययानुवृत्तित्वात् चर्मवस्त्रादिषु नीलप्रत्ययानुवृत्तिवत् ।
यस्मात् सत्ता त्रिषु द्रव्यादिषु प्रत्ययानुवृतिं करोति न व्यावृत्तिम् तस्मात् सामान्यमेव , न विशेष इत्युपसंहारार्थः । अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च भवति । द्रव्यत्वं द्रव्येष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम् , गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । गुणत्वं गुणेष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम् , द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिप्रत्यय हेतुत्वाद् विशेषः । तथा स्वरूपं वास्तवम् ? किं वा विशेषस्वरूपता ? आहोस्विदुभयस्वरूपता ?
अत्राह - एतानीति । समानानां भावः सामान्यमिति सामान्यलक्षणं द्रव्यत्वादिषु विद्यते , स्वाश्रयं सर्वतो विशिनष्टीति विशेष इति तु लक्षणं नास्ति । अत एतानि मुख्यया वृत्त्या सामान्यान्येव न विशेषाः , विशेषसंज्ञां तूपचारेण लभन्ते । विशेषो हि स्वाश्रयं सर्वतो विशिनष्टि , द्रव्यत्वादिकमपि विजातीयेभ्यः स्वाश्रयस्य विशेषणमित्येतावता साधर्म्येणोपचारप्रवृत्तिः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' पिण्डं पिण्डं यथा स्यात् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत प्रतिपिण्ड ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस रीति से सामान्य का ज्ञान होता है , उसी रीति से जब सामान्य की ' अभ्यासप्रतीति ' अर्थात् बार बार प्रतीति होती है , तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत ' ज्ञानप्रबन्ध ' का अर्थात् ज्ञानसमूह का ' प्रत्यवेक्षण ' अर्थात् स्मृति होती है , इस स्मृति के द्वारा ( विभिन्न व्यक्तियों में ) जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है , वही ' सामान्य ' है । इससे निष्कर्ष क्या निकला ? ( यही कि ) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य अनेक वस्तुओं में रहता है । अत एव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं ।
पहिले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का है । ' तत्र परं सत्ता ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें ' सत्ता ' पर सामान्य ( ही ) है । अर्थात् केवल ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है ।
सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध , है , फिर भी जो कोई उसे प्रत्यक्षवेद्य नहीं मानते , उनके सन्तोष के लिए ' परस्पर विशिष्टेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान भी उपस्थित करते हैं । इस अनुमान प्रयोग का अर्थ स्पष्ट है ।
जिस प्रकार नीलवस्त्र के नीलधर्म प्रभृति में एक नीलवर्ग के हो कारण ' यह नील ' है , इस एक आकार की प्रतीतियाँ ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' रूप होती हैं , उसी प्रकार द्रव्य , गुण और कर्म इन तीनों में ' यह सत् है ' इस एक आकार की प्रतीति भी होती हैं , इन तीनों से भिन्न किसी वस्तु का ज्ञान उक्त प्रतीतियों का कारण है , क्योंकि उक्त सदाकारक प्रतोतियाँ भी अनुवृत्तिप्रत्यय हैं ।
( जिसका ज्ञान उक्त अनुवृत्तिप्रत्ययों का कारण है वही ' सत्ता ' है ) प्रकृत उपसंहार ग्रन्थ का यह अभिप्राय है कि यतः सत्ता द्रव्यादि तीनों पदार्थों में यह सत् है ' इस आकार के अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है , किसी भी व्यावृत्ति ( प्रत्यय ) का नहीं , अतः ' सत्ता ' सामान्य ही है , विशेष नहीं । द्रव्यत्व , गुणत्व , कर्मत्वादि जातियाँ अनुवृत्तिप्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय दोनों के ही कारण हैं , अतः वे ' सामान्य ' और विशेष ' दोनों ही हैं ।
जैसे कि द्रव्यत्व जाति सभी द्रव्यों में ' यह द्रव्य है ' इस अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण है , अतः ' सामान्य ' है । उसी प्रकार द्रव्य में ही ' यह गुण और कर्म से भिन्न है ( क्योंकि इसमें द्रव्यत्व है ) इस व्यावृत्तिप्रत्यय का भी कारण है , अतः ' विशेष ' भी है । एवं गुणत्व जाति सभी गुणों में ' यह गुण है ' इस प्रकार की
पृ. ७४६
अपरं द्रव्यत्वगुणत्व कर्मत्वादि अनुवृधिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च भवति ।
तत्र द्रव्यत्वं परस्परविशिष्टेषु पृथिव्यादिष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम् , गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः ।
तथा गुणत्वं परस्परविशिष्टेषु रूपादिष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम , द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः ।
तथा कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्यय हेतुत्वात् सामान्यम , द्रव्यगुणेभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः ।
एवं पृथिवीत्वरूपत्वोत्क्षेपणत्व गोत्वघटत्वपटत्वादीनामपि प्राण्य प्राणिगतानामनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यविशेषभावः सिद्धः ! एतानि तु द्रव्यत्वादीनि प्रभूतविषयत्वात् प्राधान्येन सामान्यानि स्वाश्रयविशेषकत्वाद् भक्त्या विशेषाख्यानीति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — द्रव्यत्व , गुणत्व , कर्मत्वादि जातियाँ अपर है । ये अनुवृत्तिप्रत्यय के कारण होने से ' सामान्य ' और व्यावृत्तिप्रत्यय के कारण होने से ' विशेष ' दोनों ही हैं । इनमें द्रव्यत्व परस्पर विभिन्न पृथिवी प्रभृति नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में ' यह द्रव्य है ' इस एक आकर की प्रतीति के हेतु होने से सामान्य ' है , एवं उन्हीं नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में ' यह गुण और कर्म से भिन्न है ' इस व्यावृत्तिबुद्धि के हेतु होने से ' विशेष ' भी है । इसी प्रकार गुणत्व भी रूपादि चौबीस गुणों में से प्रत्येक में यह गुण है ' इस एक आकार के प्रत्ययों का हेतु होने से ' सामान्य ' है एवं ' ये रूपादि द्रव्य और कर्म से भिन्न हैं , इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण होने से ' विशेष ' भी है । इसी प्रकार कर्मत्व जाति भी उत्क्षेपणादि विभिन्न क्रियाओं में से प्रत्येक में " यह क्रिया है ' इस अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण होने से सामान्य है , एवं उत्क्षेपणादि क्रियाओं में से प्रत्येक में ‘ यह द्रव्य और गुण से भिन्न है ' इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण
न्याकन्दली कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यं द्रव्यगुणेभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । द्रव्यत्वादिवत् पृथिवीत्वादीनामप्यनुवृत्तिव्यावृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यविशेषभावोऽस्तीत्याह - एवमिति । प्राणिगतानि सामान्यानि गोत्वाश्वत्वादीनि अप्राणिगतानि घटत्वपटत्वादीनि । किं द्रव्यत्वादीनां सामान्यअनुवृत्तिप्रतीति का कारण है . अतः सामान्य है ।
एवं द्रव्य और कर्म इन दोनों से ' गुण भिन्न है ' ( क्योंकि वह गुण है ) इस व्यावृत्तिबुद्धि का भी कारण है , अत : ' विशेष ' भी है । इसी प्रकार परस्पर विभिन्न उत्क्षेपणादि क्रियाओं में ' ये कर्म हैं ' इस समान आकार की प्रतीति ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) कर्मत्व से होती है , अतः वह सामान्य है और उन्हीं कर्मों में ' ये द्रव्य और गुण से भिन्न हैं ' इस व्यावृत्ति बुद्धि की हेतु होने से ' विशेष ' भी है ।
' एवम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रव्यत्वादि जातियों की तरह पृथिवीत्वादि जातियों में भी कथित सामान्यविशेषभाव का अतिदेश करते हैं । गोत्व , अश्वत्व प्रभृति होने से ' विशेष ' भी है । इसी प्रकार प्राणियों में रहनेवाले और अप्राणियों में रहनेवाले पृथिवीत्व , रूपत्व , उत्क्षेपणत्व , गोत्व , घटत्व , पटत्व प्रभृति जातियों में भी अनुवृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से सामान्यत्व और व्यावृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से विशेषत्व की सिद्धि समझनी चाहिए ।
द्रव्यत्वादि जातियाँ सामान्य के पूर्णलक्षण से युक्त होने के कारण वस्तुतः सामान्य ही हैं । किन्तु अपने आश्रयों को अपने से भिन्न वस्तुओं से पृथक् रूप में समझाने की योग्यता भी उनमें किसी अंश में संघटित होती है , अतः उनमें ' विशेष ' शब्द का भी गौणप्रयोग होता है ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — I प्राणियों में रहनेवाली जातियाँ हैं . एवं घटत्व , पटत्व प्रभृति अप्राणियों में रहनेवाली जातियाँ हैं । ( प्र ० ) ( द्रव्यत्वादि सामान्य और विशेष दोनों कहे गये हैं ) इस प्रसङ्ग में प्रश्न उठता है कि वे वास्तव में ' सामान्य ' रूप हैं ? या वास्तव में वे ' विशेष ' रूप ही हैं ? अथवा उनके दोनों ही स्वरूप वास्तव हैं ? इन्हीं विकल्पों का समाधान ' एतानि ' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है ।
अर्थात् ' समानानां भावः सामान्यम् ' सामान्य का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में पूर्ण रूप से है , किन्तु ' स्वाश्रयं सर्वतो विशिनष्टिीति विशेष : ' ( जो अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से अलग करे , वही विशेष ' है ) विशेष का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में नहीं है ( क्योंकि द्रव्यत्वादि अपने आश्रयीभूत एक द्रव्य व्यक्ति से अपने आश्रयीभूत दूसरी द्रव्य व्यक्ति को अलग नहीं समझा सकता ) , अतः द्रव्यत्वादि जातियाँ ' सामान्य ' शब्द के ही मुख्यार्थ हैं ।
उनमें ' विशेष ' शब्द का लक्षणावृत्ति से ही प्रयोग होता है । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार ' विशेष ' पदार्थ अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से अलग रूप में रखता है , उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सामान्य भी अन्ततः अपने आश्रय को दूसरी जाति के आश्रयीभूत पदार्थों से तो अलग करते ही हैं , केवल इतने ही सादृश्य के कारण द्रव्यत्वादि सामान्यों में भी ' विशेष ' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है ।
पृ. ७४८
लक्षणभेदादेषां द्रव्यगुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वं सिद्धम् ।
।
अत एव च नित्यत्वम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — द्रव्य , गुण और कर्म इन तीनों से इसका स्वरूप ( लक्षण ) भिन्न है , अतः सिद्ध होता है कि यह सामान्य ( द्रव्यादि की तरह ) दूसरा ही ( स्वतन्त्र ) पदार्थ है । यतः लक्षणभेद के कारण द्रव्यादि से यह भिन्न है , अतः यह सिद्ध होता है , सामान्य नित्य है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
द्रव्यत्वादीनि द्रव्यादिव्यतिरिक्तानि न भवन्ति , अतस्तेषां पृथक् कार्यनिरूपणमन्याय्यमित्यत्राह -- लक्षणभेदादिति । अनुगताकारबुद्धिवेद्यानि द्रव्यत्वादीनि व्यावृत्तिबुद्धिवेद्याश्च द्रव्यादिव्यक्तयः , तस्मादेषां द्रव्यत्वादीनां लक्षणभेदात् प्रतीतिभेदाद् द्रव्यगुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वम् । अत एव च नित्यत्वम् । यत एव सामान्यस्य द्रव्यादिभ्यो भेद :, अत एव नित्यत्वम् । द्रव्याद्यभेदे सामान्यस्य द्रव्यादिविनाशे विनाशस्तदुत्पादे चोत्पादः स्यात् , भेदे तु नायं विधिरवतिष्ठत इति ।
अत्र वदन्ति । भिन्नेष्वनुगता बुद्धिः सामान्यं व्यवस्थापयति । सा च प्रतिपिण्डं दण्डपुरुषाविव न स्वातन्त्र्येण सामान्यविशेषलक्षणे द्वे वस्तुनी प्रतिभासयति । नापि तयोविशेषणविशेष्यभावः , गोत्वा ' गोत्ववा - नित्येवमनुदयात् । किं तु तादात्म्यग्राहिणी प्रतितिरियम् , गौरयमित्येकात्मतापरामर्शात् , उभयोरन्योन्यप्रहाणेन स्वरूपान्तराभावाच्च । अनुवृत्तता हि गोत्वस्येव सामान्यान्तरस्यापि स्वरूपम् , व्यावृत्ततापि गोव्यक्तेर्व्यक्त्यन्तराणामपि स्वभाव : ।
सामान्यान्तरव्यावृत्तं तु गोत्वस्य स्वरूपम् , व्यक्त्यन्तरव्यावृत्तिश्च गोव्यक्तेः स्वभावः परस्परात्मतामन्तरेणान्यो न शक्यते निर्देष्टुम् । न च तस्य स एव स्वभाव : स एव च सम्बन्धीत्युपपद्यते , निःस्वभावस्य सम्बन्धाभावात् । तस्माज्जातिव्यक्त्योः परस्परात्मतेव तत्त्वम् । एवं सति भेदाभेदवादोऽपि सिद्धयति । यथा हि शाबलेयो गौरित्येवं प्रतीयते तथा बाहुलेयोऽपि । न चास्ति कस्यचिद् बाधः शाबलेय एव गौर्न बाहुलेय इति । किन्तु सर्वेषामेकमतित्वमेव ' स गौरयमपि गौरिति ।
तत्र प्रतीतिबलेन शाबलेयात्मकस्य गोत्वस्य बाहुलेयात्मकत्वे सिद्धे शाबलेयाद् भेदोऽपि सिद्धयति । अयमेव हि सामान्यस्य पूर्वपिण्डाद् भेदो यत् पिण्डान्तरात्मकत्वम् । इदमेव च सामान्यरूपत्वं यदुभयात्मकत्वम् । भेदाभेदावेकस्य विरुद्धाविति चेत् ? न , युक्तिज्ञस्य भवतः साम्प्रतमेतदभिधातुम् । तद्विरुद्धं यत्र बुद्धिविपर्येति । यत्तु सर्वदा प्रमाणेन तथैव प्रतीयते , तत्र विरोधाभिधानमेव विरुद्धम् ।
अन्यत्रैवं न दृष्टमिति चेत् ? किं वै प्रत्यक्षमपि अनुमानमिव दृष्टमनुसरति ? हतं तर्होदमनवस्थया । अथेदं स्वसामर्थ्यात् प्रवर्तते ? तदा यथा यद् वस्तु यद् दर्शयति तथैव तत् , न त्वेतदन्यत्रादर्शनेन प्रत्याख्यानमर्हति सर्वभावप्रत्याख्यानप्रसङ्गात् । तस्मात् सामान्यं व्यक्त्युत्पादविनाशयोरुत्पादविनाशवत्त्वाद् व्यक्त्यन्तरावस्थाने चावस्थानान्नित्यमनित्यं च न पुनर्नित्यमेव ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते - कि जातिव्यक्त्योर विलक्षणमाकारं गृह्णाति तत्प्रतीतिः ? उत तयोरभेदं गृह्णाति ? आहोस्वित् परस्पर विलक्षणावाकारौ ? आद्ये कल्पे तावदेकमेव वस्तु स्यात् , नोभयोरेकात्मकत्वम् , अविलक्षणाकार बुद्धिवेद्यत्वस्याभेदलक्षणत्वात् । द्वितीये तु कल्पे व्याहतिरेव विलक्षणाकार संवित्तिरेव हि भेदसंवित्तिः । तस्याः सम्भवे सति तयोरभेदप्रतिपत्तिरेव नास्ति , कथं भिन्नयोरभेदो व्यवस्थाप्यते ? कथं तर्हि तादात्म्यप्रतीति : ? न कथञ्चिदिति वदामः ।
यदि तावदेक आकारोऽनुभूयते , एकस्यैव वस्तुनः प्रतीतिरियं नोभयोः । अथ द्वावाकारावनुभूयेते तदास्याः प्रतीतेरसम्भव एव । यत् पुनगो रित्ययमविभागेन संवेदनं तत् समवायसामर्थ्यात् । संयोगे हि द्वयोः संसर्गावभासः , समवायस्य पुनरेष महिमा यदत्र सम्बन्धिनावयः पिण्डवह्निवत् पिण्डीभूतावेव प्रतीयेते जातिरेव न च व्यक्तेः स्वरूपम् । तेन सत्यपि भेदे बदरादिवत् कुण्डस्य जातितो व्यक्तेः स्वरूपं पृथग् न निष्कृष्यते । परस्परपरिहारेण तूपलम्भोऽस्त्येव , दूरे गोत्वाग्रहणे s पि पिण्डस्य ग्रहणात् । पूर्व पिण्डाग्रहणेऽपि पिण्डान्तरे गोत्वग्रहणात् । तस्माद् व्यक्तेरत्यन्तं भिन्नमेव सामान्यमिति ताकिकाणां प्रक्रिया |
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — किसी सम्प्रदाय का मत है कि द्रव्यत्वादि जातियाँ आश्रयीभूत द्रव्यादि व्यक्तियों से भिन्न नहीं हैं , अतः उनका अलग से निरूपण करना उचित नहीं है । इसी आक्षेप का समाधान ' लक्षणभेदात् ' इत्यादि से किया गया है । अनुगत आकार की प्रतीति के द्वारा ही द्रव्यत्वादि सामान्य समझे जाते हैं । द्रव्यादि व्यक्तियों का बोध व्यावृत्तिबुद्धि से होता है । तस्मात् ' एषाम् ' अर्थात् द्रव्यत्वादि सामान्यों के लक्षण ( द्रव्यादि व्यक्तियों के ) लक्षण से भिन्न हैं , अत एव द्रव्यत्वादि सामान्य द्रव्यादि व्यक्तियों से अलग स्वतन्त्र पदार्थ हैं । अत एव नित्यत्वम् ' अर्थात् द्रव्यत्वादि सामान्य यदि द्रव्यादि व्यक्तियों से अभिन्न होते , तो फिर द्रव्यादि के विनाश से उनका भी विनाश होता , एवं उनको उत्पत्ति से उनकी भी उत्पत्ति होती । यदि द्रव्यत्वादि सामान्य और द्रव्यादि व्यक्ति इन दोनों को भिन्न पदार्थ मान लेते हैं , तो यह स्थिति नहीं उत्पन्न होती है , ( अतः उनको नित्य मानते हैं ) ।
इसी प्रसङ्ग में किसी सम्प्रदाय के लोगों का कहना है कि ( प्र ० ) विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की बुद्धि ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) से ही सामान्य की सिद्धि की जाती है , किन्तु जिस प्रकार ' दण्डी पुरुषः ' इत्यादि विशिष्टबुद्धियों में दण्ड और पुरुष दोनों में से एक सामान्यविधया और दूसरा व्यक्तिविधया स्पष्ट रूप से प्रतिभासित होता है , उस प्रकार से ' अयं गोः , अयं गौः ' इत्यादि आकार के अनुवृत्तिप्रत्ययों में गोत्वादि सामान्य रूप से और गोप्रभृति विशेष ( व्यक्ति ) रूप से प्रतिभासित नहीं होते ।
एवं उक्त प्रतीतियों में गो विशेष्य रूप से और गोत्व विशेषण रूप से भी प्रतिभासित नहीं होते , क्योंकि ऐसी बात होती तो प्रतीति का अभिलाप ' गौ : गोत्ववान् ' इस आकार का होता ( ' अयं गौः इस आकार का नहीं ) । तस्मात् ' अयं गौः ' यह प्रतीति तादात्म्यविषयक है । क्योंकि ' अयम् ' पदार्थ और ' गौ ' पदार्थ दोनों के एकरूपत्व का ही उससे परामर्श होता है । दूसरी युक्ति यह भी है कि गो को छोड़कर गोत्व का कोई अपना स्वरूप नहीं है , एवं गोत्व को छोड़कर गो का भी कोई स्वरूप नहीं है ।
क्योंकि केवल अनुवृत्तत्व जैसे गोत्व जाति में है , वैसे ही अश्वत्वादि जातियों में भी है । एवं केवल व्यावृत्तत्व ( अर्थात् स्वभिन्नभिन्नत्व ) जैसे गो व्यक्ति में है , वैसे ही अश्वादि व्यक्तियों में भी है , अतः गोत्व का ऐसा ही स्वरूप मानना पड़ेगा जो दूसरे सामान्यों में न रहे । एवं गोव्यक्ति का स्वरूप भी ऐसा ही मानना पड़ेगा जो अश्वादि व्यक्तियों में न रहे । अतः इन दोनों स्वरूपों का उपयुक्त निर्णय तभी हो पायेगा , जब कि गोव्यक्ति और गोत्व जाति दोनों में तादात्म्य मान लें ।
अर्थात् ऐसा मान लें कि गोत्वाभिन्नत्व ही गोव्यक्ति का स्वभाव है , एवं गोव्यक्तियों से अभिन्न रहना ही गोत्व जाति का स्वभाव है । ऐसा तो हो नहीं सकता कि वही उसका स्वभाव भी हो , और वहीं उसका सम्बन्धी भी हो क्योंकि किसी स्वभाव से युक्त वस्तु में ही किसी का सम्बन्ध होता है । बिना स्वभाव के में
वस्तु किसी का सम्बन्ध सम्भव नहीं है । तस्मात् ' जाति व्यक्तिस्वरूप है , और व्यक्ति भी जातिस्वरूप ही है ' यही सिद्धान्त ठीक है । ऐसा मान लेने पर जाति और व्यक्ति में परस्पर भेद और अभेद दोनों की ही सिद्धि ( प्रतीतियों के भेद से ) हो सकती है । जिस प्रकार शाबलेय गो में ' यह गो है ' इस आकार की प्रतीति होती है , उसी प्रकार बाहुलेय नामके गो में भी ' यह गो है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है ।
ऐसी कोई बाधबुद्धि भी नहीं है कि शाबलेय ही गो है , बाहुलेय नहीं किन्तु यही सबों का अनुभव है कि ' शाबलेय ' भी गो है , एवं ' बाहुलेय ' भी गो है । इस स्थिति में शाबलेय गो के स्त्ररूप गोत्व में बाहुलेय गो की स्वरूपता जिस प्रकार सिद्ध होती है , उसी प्रकार गोत्व में शाबलेय गो के भेद की भी सिद्धि होती | ( गोत्व रूप ) सामान्य में पूर्व पिण्ड ( शाबलेय गो रूप पिण्ड का भेद इसी लिए है कि सामान्य ( गोत्र ) पिण्डान्तर ( बाहुलेय गोरूप दूसरा पिण्ड ) स्वरूप है ।
सामान्यरूपता इस लिए है कि वह उभयात्मक है । ( उ ० ) एक ही वस्तु में एक ही वस्तु का भेद और अभेद दोनों का रहना परस्पर ' विरुद्ध ' है ? ( प्र ० ) युक्तियों से अभिज्ञ आप जैसे व्यक्ति का ऐसा कहना उचित नहीं है , क्योंकि ' विरुद्ध ' वही कहलाता है जिसमें कि बुद्धि का विपर्यास हो । जो बराबर प्रमाण के द्वारा उसी प्रकार का प्रतात होता है , उसको विरुद्ध कहना ही ' विरुद्ध ' है । यदि यह कहें कि ( उ ० ) एक ही वस्तु के भेद और अभेद इन दोनों की अवस्थिति एक ही वस्तु में कहीं नहीं देखी जाती है ।
अतः उक्त भेदाभेद पक्ष अयुक्त है , ( प्र ० तो इसके उत्तर के लिए यह पूछना है कि क्या अनुमान की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण को भी अपने विषय की सिद्धि के लिए उसका अन्यत्र देखा जाना आवश्यक है ? यदि ऐसी बात मानें तो अनवस्थादोष के कारण प्रत्यक्ष प्रमाण का ही लोप हो जाएगा । यदि प्रत्यक्ष अन्यत्र दर्शन की अपेक्षा न करके ) केवल अपने बल से ही अपने विषय को दिखाने के लिए प्रवृत्त होता है , तो फिर यही मानना पड़ेगा कि अपने जिस वस्तु को वह जिस रूप में दिखलाता है , वह वस्तु उसी रूप का है ।
इस वस्तुस्थिति का केवल इस हेतु से निरादर नहीं किया जा सकता कि ' अन्यत्र इस प्रकार से देखा नहीं जाता ' । प्रत्यक्ष का यदि यह स्वभाव न मानें तो संसार से सभी वस्तुओं को सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि सामान्य यतः अपने आश्रय रूप व्यक्तियों के उत्पन्न होने पर ही उत्पन्न होता है , और उनके विनष्ट होने पर विनष्ट भी होता है , अतः ' अनित्य ' है । एवं उस व्यक्ति के नाश के बाद भी उसी जाति की दूसरी व्यक्ति में रहता है , अतः वह ' नित्य ' भी है ।
तस्मात् सामान्य नित्य एवं अनित्य दोनों ही है , केवल नित्य ही नहीं है ।
( उ ० ) ऐसी स्थिति में हम ( तार्किक ) लोग पूछते हैं कि ( १ ) ' अयं गोः ' यह प्रतीति जाति और व्यक्ति दोनों को एक ही आकार में ग्रहण करती है । ( २ ) अथवा दोनों के अभेद का ग्रहण करती है ? ( ३ ) अथवा जाति और व्यक्ति दोनों को परस्पर विभिन्न आकारों में ग्रहण करती है ?
इनमें यदि पहिला पक्ष मानें तो फिर जाति या व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक का मानना ही सम्भव होगा दूसरे का नहीं , जाति और व्यक्ति एतदुभयात्मक किसी वस्तु की कल्पना सम्भव नहीं होगी , क्योंकि अभिन्नता का यही लक्षण है कि जो अविलक्षण आकार की बुद्धि के द्वारा ज्ञात हो । यदि दूसरा पक्ष मानें तो परस्पर विरोध ही उपस्थित होगा । क्योंकि किन्हीं दो वस्तुओं का परस्पर विभिन्न आकारों से गृहीत होना ही उन दोनों के भेद का ज्ञान है ।
भेद का यह ज्ञान यदि सम्भव है , तो फिर उन दोनों में तादात्म्य की प्रतीति कैसी ? अतः हम लोग कहते हैं कि जाति और व्यक्ति इन दोनों के तादात्म्य की प्रतीति किसी भी प्रकार से नहीं होती , क्योंकि यदि एक ही आकार का अनुभव होता है तो फिर वह अनुभव एक ही वस्तु की प्रनीति होगी , दो वस्तुनों की नहीं । यदि दो आकारों का अनुभव होता है . तो फिर उस एक आकार की प्रतीति की सम्भावनाही मिट जाती है ।
' गौरयम् ' इत्यादि प्रतीतियों में जो गोत्वजाति और गोव्यक्ति विना अलग हुए से प्रतीत होते हैं , वह तो दोनों के समवाय का सामर्थ्य है । संयोग की प्रतीति में उसके प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के सम्बन्धियों का भान होता है । समवाय की ही यह विशेष महत्ता है कि इसमें उसके दोनों सम्बन्धी ( प्रतियोगी और अनुयोगी ) परस्पर एक होकर ही प्रतीत होते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड वस्तुतः पृथक् होते हुए भी एक होकर ही ज्ञान में भासित होते हैं ।
सुतराम् ( व्यक्ति सम्बद्ध ) जाति की ही प्रतीति होती है , केवल व्यक्ति के स्वरूप की नहीं । अतः जाति और व्यक्ति में वस्तुतः भेद रहते हुए भी जैसे कि ( संयोग युक्त ) कुण्ड और बेर को अलग कर दिखलाया जा सकता है उस प्रकार जाति से व्यक्ति के स्वरूप को अलग नहीं किया जा सकता । कुछ स्थानों में जाति और व्यक्ति की प्रतीति एक दूसरे को छोड़कर भी होती है । जैसे दूर में गोपिण्ड ( व्यक्ति ) की प्रतीति तो होती है , ( किन्तु ' यह गो हैं इस प्रकार से ) गोत्व की प्रतीति वहाँ नहीं होती ।
एवं पूर्वपिण्ड का ग्रहण न रहने पर भी दूसरे पिण्ड में गोत्व का ग्रहण होता है । तस्मात् तार्किकोंकी रीति के अनुसार जाति और व्यक्ति अत्यन्त भिन्न हैं । ( किसी भी प्रकार वास्तव में अभिन्न नहीं है ) ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ७४९) १. मुद्रित न्यायकन्दली में ' गोत्वा गोत्ववान् ' ऐसा पाठ है । यह तो स्पष्ट है कि इसमें एक ' ए ' का चिह्न छूट गया है । अतः ' गोत्वो गोत्ववान् ' ऐसा पाठ संशोधक को अभिप्रेत मालूम होता है । किन्तु सो भी ठीक नहीं जँचता , क्योंकि प्रथम विकल्प में कहा गया है कि ' अयं गौ : ' इस आकार को प्रतीति में गो का व्यक्तिविधया और गोत्व का जातिविधया भान नहीं होता है । इसके बाद ' नापि तथेः ' इत्यादि से जो विकल्प किया गया है , उसमें द्विवचनान्त ' तयोः ' पद से गो और गोत्व इन्हीं दोनों का ग्रहण समुचित जान पड़ता है । ' किन्तु तादात्म्यग्राहिणी ' इत्यादि से इस विकल्प का खण्डन किया गया है कि ' अयं गौः ' यह प्रतीति ' इदम् ' पदार्थ में गो के तादात्म्य विषयक ही है । इससे भी इसी प्रतिषेध का आक्षेप होता है कि ' अयं गौः ' यह प्रतीति गोविशेष्यक एवं गोत्वविशेषणक नहीं है । ऐसी यदि बात है तो फिर ' गोः गोत्ववान् ' ऐसा ही पाठ उचित है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।
पृ. ७५३
द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम् ।
प्रत्येकं स्वाश्रयेषु लक्षणाविशेषाद् विशेषलक्षणाभावाच्चैकत्वम् | यद्यध्यपरिच्छिन्न देशानि सामान्यानि भवन्ति , तथाप्युपलक्षण नियमात
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — द्रव्यत्वादि कोई भी सामान्य द्रव्यादि कुछ आश्रयों में ही नियत रूप से रहते हैं , एवं भिन्न रूप से प्रतीत भी होते हैं , अतः ( द्रव्यत्वगुणत्वादि ) सामान्य परस्पर विभिन्न हैं । एवं प्रत्येक सामान्य अपने आश्रयों में समान रूप से प्रतीत होता है , एवं उसको अनेक मानने में कोई प्रमाण भी नहीं है , इससे सिद्ध होता है कि द्रव्यादि नियत आश्रयों में रहनेवाले द्रव्यत्वादि सामान्यों में से प्रत्येक सामान्य एक एक ही है । यद्यपि सामान्य अनन्त ( प्रकार के ) आश्रयों में रहता है , फिर भी उसकी अभिव्यक्ति के कारणों की एक रूपता , और उसके आश्रयों की
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम् , द्रव्यत्वादयः प्रत्येकं द्रव्यादिष्वेव नियताः । प्रत्यय भेदश्चैतेषु दृश्यते , तस्माद् द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्यय भेदाच्च द्रव्यत्वादीनां परस्परतो भेदः ।
अभेदात्मकं सामान्यमिति पूर्वं प्रतिज्ञामात्रेणोक्तं तदिदानीं प्रमाणसिद्धं तस्य करोति -- प्रत्येकं स्वाश्रयेष्विति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणमनुगताकारज्ञानम् । प्रत्येकं प्रतिपिण्डम विशेषाद् वैलक्षण्याभावाद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च सामान्यस्य स्वाश्रयेष्वेकत्वमभिन्नस्वभावमित्यर्थः । स्वविषये सर्वत्र सामान्यं समवैति नान्यत्रेति यत् पूर्वमुक्तं तस्य कारणमाह - यद्यपीति । यद्यपि सामान्यानि यत्र तत्रोपजायमानेन पिण्डेन सम्बन्धादपरिच्छिन्नदेशान्यनियत देशानि तथाप्युपलक्षणस्याभिव्यञ्जकस्यावयवसंस्थानविशेषस्य नियमान्नियतत्वात् पिण्डोत्पादक कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषये सर्वत्र समवयन्ति नान्यत्रेति ।
एतदुक्तं भवति - सास्नादिसंस्थानविशेषो गोत्वस्य व्यञ्जकः , केसरादिसंस्थानविशेषोऽश्वत्वस्य , विशिष्टग्रीवादिसंस्थान विशेषो घटत्वस्य , प्रतीतिनियमात् । एते च संस्थानविशेषा न सर्वेषु पिण्डेषु साधारणाः , अपि तु प्रतिनियतेषु भवन्ति । तत्र यद्यपि सर्वं सामान्यं सर्वत्रोपजायमानेन स्वविषयेणैव पिण्डान्तरेणापि सम्बद्ध क्षमते , तथापि यस्याभिव्यञ्जकं यत्र
I यद्यपि सामान्य जहाँ तहाँ उत्पन्न पिण्डों के साथ सम्बद्ध होने के कारण ' अपरिच्छिन्न देश ' पिण्डे सम्भवति तस्य तत्रैव समवायो नान्यत्र । एवं सामग्रया नियमादपि सामान्य सम्बन्धनियमः । एष हि तन्त्वादीनां कारणानां स्वभावो यदेतैरुत्पद्यमाने द्रव्ये पटत्वमेव समवैति नान्यत् । एष हि मृत्पिण्डादीनां महिमा यत् तैः क्रियमाणे द्रव्ये घटत्वमेव समवैति नान्यत् ।
न तावत् सामान्यमन्यतो गत्वान्यत्र सम्बध्यते निष्क्रियत्वात् । तत्रापि यदि पूर्वं नासीत् ? तत्रोपजायमानेन पिण्डेनास्य सम्बन्धो न स्यात् । दृश्यते च सर्वत्रोपजायमानेन पिण्डेन सम्बन्धः , तस्मात् सर्वं सर्वत्रास्तीति कस्यचिन्मतं तन्निराकुर्वन्नाह - अन्तराले
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — द्रव्यत्वादि सामान्य यतः नियमित रूप से द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही रहते हैं , एवं प्रत्येक सामान्य की प्रतीति भिन्न भिन्न आकार की होती है , अतः समझते हैं कि द्रव्यत्व गुणत्वादि सामान्य परस्पर भिन्न हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यत्वादि सामान्यों में से प्रत्येक सामान्य यतः द्रव्यादि व्यक्तियों में ही नियमित रूप से रहता है एवं इनमें इनकी प्रतीतियां भी विभिन्न आकार की होती हैं । तस्मात् द्रव्यादि में ही नियमित रूप से रहने के कारण और उक्त प्रतीति भेद के कारण समझते हैं कि द्रव्यत्वादि जातियाँ परस्पर भिन्न हैं ।
' प्रत्येकं स्वाश्रयेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पहिले केवल प्रतिज्ञावाक्य के द्वारा सिद्धवत् कही हुई सामान्य की अभिन्नता को प्रमाण के द्वारा प्रत्येकं स्वाश्रयेषु ' इत्यादि वाक्य से सिद्ध करते हैं । लक्ष्यते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत में ' लक्षण ' शब्द का अर्थ है अनुगत एक आकार का ज्ञान । उसका ' प्रत्येक में ' अर्थात् गोप्रभृति प्रत्येक व्यक्ति में ' अविशेष से ' अर्थात् विभिन्नता के न रहने से एवं ' विशेष में ' अर्थात् द्रव्यत्वादि प्रत्येक जाति के भेद में अर्थात् अनेकत्व में ' लक्षण ' अर्थात् किसी प्रमाण के न रहने से समझते हैं कि एक सामान्य अपने सभी आश्रयों में एक ही है , अर्थात् अभिन्नस्वभाव का है । पहिले जो यह कहा है कि ' सामान्य अपने विषयों अर्थात् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहता है , गया नहीं ' उसी के हेतु का प्रतिपादन ' यद्यपि ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया अन्यत्र है ।
पृ. ७५४
कारण सामग्री नियमाच्च स्वविषय सर्वगतानि ।
अन्तराले च संयोगसमवायवृन्यभावादव्यपदेश्यानीति ।
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भाष्यका हिन्दी अनुवाद — नियमित रूप से समान कारणों से उत्पन्न होना इन दोनों से समझते हैं कि सामान्य अपने सभी आश्रयों में समानरूप से रहता है । ( कार्योत्पत्ति के ) बीच के द्रव्यों में उस कार्य में रहनेवाले सामान्य का न संयोग सम्बन्ध है , न समवाय सम्बन्ध , अतः उनमें सामान्य का व्यवहार नहीं होता । अतः ( सन्निहित होने पर भी उनमें वह नहीं रहता है ) ।
प्रशस्तपाद भाष्य का सामान्यनिरूपण समाप्त हुआ ।
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न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
संयोगसमवायवृत्त्यभावादव्यपदेश्यानीति । अन्तरालमिति आकाशं वा दिग्द्रव्यं वा स्तिमितवेगमूर्त्तद्रव्याभावो वा तेषु गोत्वादिसामान्यानां न संयोगो नापि समवायः । न चासम्बद्धानामेव तेषामवस्थाने प्रमाणमस्ति । अतोऽन्तराले न सामान्यानि व्यपदिश्यन्ते न सन्तोत्यर्थः । कथं तहि तत्रोपजायमानेन पिण्डेन सम्बध्यन्ते ? कारणसामर्थ्यात् । संयोगो ह्यन्यतः समागतस्य भवति , तत्रैवावस्थितस्य वा भवति । तस्माद् विलक्षणस्तु समवायो यत्र यत्रैव पिण्डोत्पत्तौ कारणानि व्याप्रियन्ते तत्र तत्रैव कारणानां सामर्थ्यात् पिण्डेऽन्यतोऽनागतस्य तत्र स्थितस्यापि सामान्यस्य भवति , वस्तुशक्तेरपर्यनुयोज्यत्वात् ।
अत्राहुः सौगता : - प्रतीयमानेषु भेदेषु मणिसूत्र देकस्याकारस्यानुपलम्भात् सामान्यं नास्त्येवेति । तदयुक्तम् , अनेकासु गोव्यक्तिष्वनुभूयमानास्वश्वादिव्यक्तिविलक्षणतया सामान्याकारप्रतीतिसम्भवात् । यदि शाबलेयादिषु परस्परभिन्नेष्वेकमनुवृत्तं न किञ्चिदस्ति , यथा गवाश्वव्यक्तयः परस्परविलक्षणाः संवेद्यन्ते तथा गोव्यक्तयोऽपि संवेद्याः स्युः । यथा वा गोव्यक्तयः सरूपाः प्रतीयन्ते तथा गवाश्वव्यक्तयोऽपि प्रतीयेरन् , विशेषा भावात् । नियमेन तु गोव्यक्तयः प्रतीयमानाः सरूपाः स्ववर्ग साधारणमश्वादिव्यावृत्तं किश्विदेकं रूपमाक्षिपति , १ एकार्थक्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च । गोव्यक्तीनामेकत्वमिति चेत् ? नासति सामान्ये व्यक्तीनामिव व्यक्तिहेतुनां व्यक्तिकार्याणामपि परस्परव्यावृत्तानामेकत्वात् २ । किश्व , यद्येकहेतुत्वादेकत्वम् , भिन्नकारणप्रभवाणां व्यक्तीनामेकत्वं न स्यात् । दृश्यते चाभिन्नस्वभावानामपि कारणभेदो यथा वह्नेर्दारुनिर्मथनाद् विद्युत आदित्यगभस्तिक्षोभितात् सूर्यकान्तादपि मणेरुत्पत्तिः । एककार्यत्वादेकत्वे च विजातीयानामप्येकत्वापत्तिः , दृष्टा हि वाहदोहनादिक्रिया गवादिव्यक्तीनामिव महिष्यादिव्यक्तीनामपि । या च गौर्न दुह्यते न च वाह्यते सा गौर्न स्यात् ।
अपि च सामान्याभावे कोऽर्थः शब्दसंसर्गविषयः ? न तावत् स्वलक्षणम् , तस्य क्षणिकस्य सर्वतो व्यावृत्तस्य सङ्केतविषयत्वाभावात् । नापि विकल्प : शब्दार्थः , तस्य क्षणिकत्वादसाधारणत्वाच्च । विकल्पाकारः शब्दार्थ इति चेत् ? किं विकल्पाकारो विकल्पव्यतिरिक्तः ? अव्यतिरिक्तो वा ? यदि भिन्नः , स किं सर्वविकल्पसाधारणः , किं वा प्रतिविकल्पं भिद्यते ? साधारणत्वे तावदेतस्य सामान्यादभेदः , यदि परम् ? तव ज्ञानधर्माऽयमस्माकं चार्थधर्म : ( इति ) बहिर्मुखतया प्रतीयमानत्वादिति ( न ) कश्चिद् विशेषः । यदि व्यतिरिक्तोऽयमाकार : प्रतिज्ञानं भिद्यते , अथवा ज्ञानादव्यतिरिक्त एव , उभयथापि न शब्दसंसर्गयोग्यता , ज्ञानवदशक्यसङ्केतत्वात् । विकल्पः पारम्पर्येण तदुत्पत्तिप्रतिबन्धाद् बाह्यात्मतया स्वाकारमारोप्य विकल्पयति , तत्रायं शब्दसंसर्ग इति चेत् ? बाह्यत्वेनारोपितो विकल्पाकार एकाधीनस्वभावत्वाद् विकल्पे जायमाने जायमान इव , विनश्यति विनश्यन्निव प्रतीयमानः प्रतिविकल्पं भिन्न एवावतिष्ठते । न च भेदानुपातिनि सङ्केतप्रवृत्तिरित्युक्तम् ।
अथोच्यते - यादृशमेको गोविकल्पे बाह्यात्मतया स्वप्रतिभासमारोपयति गोविकल्पान्तरमपि तादृशमेवारोपयति , विकल्पाश्च प्रत्येकं स्वाकारमात्रग्राहिणो न परस्परारोपितानामाकाराणां भेदग्रहणाय पर्याप्नुवन्ति , तस्योभयग्रहणाधीनत्वात् । तदग्रहणाच्च विकल्पारोपितानामाकाराणामेकत्वमारोप्य विकल्पानामेको विषय इत्युच्यते । तदेव च सामान्यं बहिरारोपितेभ्यो विकल्पाकारेभ्यो- इत्यन्तभेदाभावेनाभावरूपं स्वलक्षणज्ञानतदाकारारोपितैश्चतुभिः सहोभिः समस्यार्द्धपञ्चमाकार इत्युच्यमानमारोपितबाह्यत्वं शब्दाभिधेयं शब्दसंसर्गविषयः । तदध्यवसाय एव स्वलक्षणाध्यवसायः , तदात्मतया तस्य समारोपात् । अन्यव्यावृत्तिस्वभावं भावाभावसाधारणं चेदम् गौरस्ति नास्तीति प्रयोगात् । भावात्मकत्वे ह्यस्य गौरस्तीति प्रयोगासम्भवः , पुनरुक्तत्वात् । नास्तीति च न प्रयुज्यते , विरोधात् । एवं तस्याभावात्मकत्वे नास्तीति पुनरुक्तम् , अस्तीति विरुध्यते । यथोक्तम्—
घटो नास्तीति वक्तव्यं सन्नेव हि यतो घटः ।
नास्तीत्यपि न वक्तव्यं विरोधात् सदसत्त्वयोः ॥ इति ।
एतस्मादेव च भिन्नानामपि व्यक्तीनामेकतावभासः । इदं हि सर्वेषा - मेव विकल्पानां विषयोऽस्यैकत्वाद् विकल्पानामप्येकत्वम् । तेषामेकत्वाच्च तत्कारणानां प्रतिपिण्डभाविनां निर्विकल्पकानामप्येत्कवम् । तेषामेकत्वाच्च तत्कार- : णानां व्यक्तीनामेकत्वावगमः । यथोक्तम् -
एकप्रत्यवमर्षस्य हेतुत्वाद् धीरभेदिनी ।
एकधहेतुभावेन व्यक्तीनामप्यभिन्नता ॥ इति ।
एतदप्ययुक्तम् विकल्पानुपपत्तेः । विकल्पाकाराणां भेदाग्रहणादारोपितमैक्यं सामान्यमाचक्षते भिक्षवः । अत्र ब्रमः । किमाकाराणां भेदाग्रहणमेवाभेदसमारोपः ? आहोस्विदभेदग्रहणमभेदारोपः ? न तावदाद्यः कल्पः , भेदसमारोपितस्यापि प्रसङ्गात् । यथा विकल्पाकाराणां भेदो न गृह्यते , तद्वदभेदोऽपि न गृह्यते । तत्र भेदाग्रहणादभेदारोपवदभेदाग्रहणाद् भेदारोपस्यापि प्रसक्तावभेदोचितव्यवहारप्रवृत्त्ययोगात् । अभेदग्रहणमभेदारोप इत्यपि न युक्तम् , आत्मवादे एको ह्यनेकदर्शी तेषां भेदाभेदौ प्रत्येति । नैरात्म्यवादे त्वेकोS नेकार्थद्रष्टा न कश्चिदस्ति , विकल्पानां प्रत्येकं स्वाकारमात्रनियतत्वात् । अस्तु वाऽनेकार्थदर्शी कश्चिदेकस्तथाप्येकं निमित्तमन्तरेण भिन्नेष्वाकारेषु नाभेदग्रहणमस्ति । भवद्वा गवाश्वमहिषाद्याकारेष्वपि भवेदविशेषात् । गवाकारेष्वप्यगोव्यावृत्तिरेकं निमित्तमस्तीति चेत् ? के पुनरगावो यद्वद्यावृत्त्या गवाका रेष्वेकत्वमारोप्यते ? ये गावो न भवन्ति तेऽगाव इति चेत् ? गावः के ? ते येऽगावो न भवन्तीति चेत् ? गवाश्वस्वरूपे निरूपिते तद्वद्यावृत्तत्वेनागवां स्वरूपं निरूप्यते , अगवां स्वरूपे निरूपिते तद्वयावृत्त्या गवां स्वरूपनिरूपणमित्येकाप्रतिपत्तावितराप्रतिपत्तेरुभयाप्रतिपत्तिः । यथाह तत्रभवान् -
' सिद्धश्च गौरपोह्येत गोनिषेधात्मकश्च सः ।
तत्र गौरेव वक्तव्यो नञा यः प्रतिषिध्यते ।
गव्यसिद्धे त्वगौर्नास्ति तदभावे तु गौः कुतः ॥ इति
अथान्यापोहः शब्दार्थोऽनारोपितबाह्यत्वम् ? तत्राप्युच्यते , कोऽयमपोहो नाम ? किमगोरपोहो भावोऽभावो वा ? यदि भावः , स कि गोपिण्डस्वभावोऽथागोपिण्डात्मकः ? गोपिण्डात्मकत्वे तावदस्यासाधारणता , न चासाधारणात्मकेऽथ शब्दप्रवृत्तिरित्युक्तम् । अगोपिण्डात्मकेऽप्ययमेव दोषो दूषणान्तरं चैतदधिकम् । यद् गोशब्दस्य गौरित्ययमर्थो न प्राप्नोति । यदि तु पिण्डव्यतिरिक्तमनेकसाधारणं वस्तुभूतमपोहतत्त्वमिष्यते ? शब्दमात्रविषया विप्रतिपत्तिः । अथापोहो sन्यव्यावृत्तिरूपत्वादभावस्वभाव इष्यते ? तदास्य प्रत्ययत्वेन ग्रहणं न स्यात् , ज्ञानजनकस्यैव ग्राह्यलक्षणत्वात् । अभावस्य च समस्तार्थक्रियाविरहलक्षणत्वात् । न च प्रत्यक्षागृहीतेऽर्थे सङ्केतग्रहणमस्तीत्यभावे शब्दस्याप्रवृत्तिरेव । न च तस्मिन् प्रतीयमाने श्रोतुरर्थविषया प्रवृत्तिः स्यात् भावाभावयोरन्यत्वादसम्बन्धाच्च ।
स्वलक्षणात्मकत्वेनाभावप्रतीताव विवेकेन स्वलक्षणे प्रवृत्तिरिति चेत् ? ' दृश्य विकल्प्यावर्थावेकीकृत्यातत्सन्निवेशिभ्यो भ्रान्त्या प्रतिपत्तिः प्रतिपत्तॄणाम् इति । तदयुक्तम् । अप्रतीते तदात्मकतया अभाव समारोपानुपपत्तेः । न च श्रोतुस्तदानीमर्थप्रतिपत्तिरस्ति शब्दस्यातद्विषयत्वात् प्रमाणान्तरस्याभावात् । अस्ति च शब्दादर्थे प्रवृत्तिस्तस्मान्नाभावोऽपि शब्दार्थः । न चान्यदेकं निमित्तं किञ्चिदस्ति । सर्वमिदमर्थजातं परस्परव्यावृत्तं प्रतिक्षणमपूर्वमपूर्वमनुभूयमानं न शब्दात् प्रतीयते । नापि प्रत्यक्षाप्रतीतमपि हानोपादानविषयो भवेत् , अपरिज्ञातसामर्थ्यत्वात् । अस्ति च शाब्दो व्यवहारः अस्ति च प्राण-
प्रत्यक्ष पूर्विका हिताहितप्राप्तिपरिहारार्था लोकयात्रा । सेव च भिन्नासु व्यक्तिषु सामान्यमेकं व्यवस्थापयति । यद्विषयाः शब्दात् प्रत्ययाः प्रवृत्तयश्चोपलभ्यन्ते , तज्जातीयत्वेन तदर्थक्रियोपयोग्यतां विनिश्चित्यापूर्वावगतेऽप्यर्थे लोकः प्रवर्तत इति ।
भिन्नेष्वनुगताकारा बुद्धिर्जातिनिबन्धना ।
अस्या अभावे नैवेयं लोकयात्रा प्रवर्तते ॥ इति ।
इति भट्टश्रीश्रीधरविरचितायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां
सामान्यपदार्थः समाप्तः ॥
टीका का सामान्य निरूपण समाप्त हुआ ।
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चतुर्युगचतुविद्या चतुर्वर्णविधायिने ।
नमः पञ्चत्वशून्याय चतुर्मुखभृते सदा ॥
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ६५ में अर्थात् अनियत देशों में रहनेवाले हैं । फिर भी उसके ' उपलक्षण ' अर्थात् अभिव्यञ्जक जो अवयवों के विशेष प्रकार के संयोग हैं , वे नियमित हैं । इस नियम के कारण और आश्रयीभूत पिण्डों के कारणों के नियमित होने से वे अपने ही विषयों में समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होते हैं ।
इससे यह अभिप्राय निकला कि सास्ता प्रभृति अवयवों का विशेष प्रकार का संयोग ( संस्थान ) ही गोत्व जाति की अभिव्यक्ति का कारण है । एवं केसर प्रभृति संस्थान अश्वत्व जाति की अभिव्यक्ति का हेतु हैं । इसी प्रकार विशेष प्रकार के ग्रीवादि संस्थान घटत्व के ज्ञापक हैं , क्योंकि नियमित रूप से तत्तत् संस्थान से युक्त पिण्डों में ही तत्तत् सामान्य का प्रतिभास होता है । ये कथित संस्थान सभी पिण्डों में समान रूप से नहीं रहते , किन्तु अपने नियमित पिण्डों में ही रहते हैं ।
इस प्रकार सभी सामान्य जिस प्रकार सभी जगह उत्पन्न होनेवाले अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होंगे . उसी प्रकार दूसरे पिण्डों के साथ भी जिन किसी सम्बन्ध से सम्बद्ध हो सकते हैं । फिर भी जिस सामान्य का ज्ञापक जो संस्थान है , उस संस्थान से युक्त पिण्ड में ही उस सामान्य का समवाय है , अन्य पिण्डों में नहीं ।
इसी प्रकार आश्रयोभूत किसी व्यक्ति के उत्पादक कारणसमूह के नियमन से ही सामान्य के समवाय रूप सम्बन्ध का भी नियमन हो सकता है , जैसे कि ( पट के उत्पादक ) तन्तु प्रभृति कारणों का ही यह स्वभाव है कि इनसे उत्पन्न द्रव्य में पटत्व समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होता है , अन्य सामान्य नहीं । एवं मिट्टी प्रभृति कारणों की ही यह महिमा है । कि इनसे उत्पन्न द्रव्य में घटत्व का ही समवाय हो , किसी दूसरे सामान्य का नहीं ।
' सामान्य ' यतः क्रिया रहित है अतः एक जगह से दूसरी जगह जाकर अपने विषय के साथ सम्बद्ध नहीं हो सकता । ( व्यक्ति की उत्पत्ति के देश में उसके रहने पर भी उस व्यक्ति के साथ सम्बन्ध के प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठता है कि ) सामान्य यदि उस देश में पहिले से नहीं था , तो फिर इस समय उत्पन्न हुए अश्वादि के साथ उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता । किन्तु सभी देशों में उत्पन्न व्यक्तियों के साथ उसका सम्बन्ध होता है । तस्मात् यह मानना पड़ेगा कि सामान्य सभी स्थानों में है ।
किसी सम्प्रदाय के इसी सिद्धान्त का निराकरण करने के लिए ' अन्तराल ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । प्रकृत में ' अन्तराल ' शब्द आकाशादि का स्तिमितवायु का , अथवा अमूर्त द्रव्य प्रभृति का बोधक है । इनमें से किसी में भी गोत्यादि सामान्यों का न समवाय सम्बन्ध है , और न संयोग सम्बन्ध है । ' गोत्वादि जातियाँ बिना किसी सम्बन्ध के हो रहती हैं ' इस प्रसङ्ग में भी कोई प्रमाण नहीं है । अत : कथित ' अन्तराल ' में गोत्वादि सामान्य का व्यवहार नहीं होता है । फलतः वह अन्तराल में नहीं है ।
( प्र ० ) तो फिर उन देशों में अपने गवादि विषयों ( व्यक्तियों ) के साथ वे किस प्रकार सम्बद्ध होते हैं ? इसका यह उत्तर है कि व्यक्ति के उत्पादक कारणों के विशेष सामर्थ्य के द्वारा ही गोत्वादि सामान्य अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होते हैं । संयोग दूसरे देश से आये हुए व्यक्ति का , अथवा उसी स्थान में पहिले से विद्यमान वस्तु का होता है ।
किन्तु समवाय में संयोग से यह अन्तर है कि जिन जिन देशों में उनके विषयों के उत्पादक कारण अपने कार्य को करने के लिए क्रियाशील होते हैं , उन्हीं उन्हीं देशों में उन्हीं कारणों के विशेष सामर्थ्य के द्वारा उस सामान्य का सम्बन्ध हो जाता है , जो किसी दूसरी जगह से नहीं आता , उसी देश में विद्यमान रहता है | क्योंकि वस्तुओं की स्वाभाविक शक्तियाँ सभी अभियोगों के बाहर हैं ।
इस प्रसङ्ग में बौद्ध लोगों का कहना है कि ( प्र ० ) सामान्य नाम को कोई वस्तु नहीं है , क्योंकि जिस प्रकार मणियों के विभिन्न होते हुए भी उन सबों में एक माला का व्यवहार इसलिए होता है कि सबों को एक व्यवहार में लानेवाला सूत्र नाम का एक पदार्थ है , उस प्रकार विभिन्न गोव्यक्तिओं में एक प्रकार के व्यवहार के कारण गोम से भिन्न किसी वस्तु की उपलब्धि नहीं होती ।
( उ ) किन्तु उन लोगों का यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि सभी गोव्यक्ति में ' ये गो हैं ' इस एक प्रकार की प्रतीति होती हैं , जो अश्वादि व्यक्तियों में नहीं होती है । यदि परस्पर विभिन्न शाबलेय ( बाहुलेय ) प्रभृति सभी गोव्यक्ति में समान रूप से रहनेवाली कोई वस्तु नहीं हैं , तो फिर जिस प्रकार गो और अश्व दोनों परस्पर विभिन्न रूप में प्रतीत होते हैं , उसी प्रकार सभी गोव्यक्ति भी परस्पर विभिन्न रूप में ही प्रतीत होंगी ।
अथवा जिस प्रकार सभी गोव्यक्ति की प्रतीति एक रूप से होती है , उसी प्रकार गोव्यक्तियों और अश्वव्यक्तियों की प्रतीतियाँ भी एक रूप से होंगी , क्योंकि स्थितियों में अन्तर का कोई कारण नहीं है । किन्तु नियमतः सभी गोव्यक्ति एक ही आकार से प्रतीत होती हैं , अतः अश्वादि सभी व्यक्तियों में न रहनेवाले एवं सभी गोव्यक्तियों में रहनेवाले किसी एक धर्म की कल्पना आवश्यक हो जाती है ।
( प्र ० ) सभी व्यक्ति यतः एक ही प्रकार के कार्यों के सम्पादक हैं . एवं एक ही प्रकार की सामग्रियों से उत्पन्न होती हैं , अतः सभी गोव्यक्ति एक ही हैं ( इसी एकत्व के कारण एकाकार की प्रतीतियाँ होती हैं ) | ( उ ० ) जिस प्रकार सामान्य के न रहने पर व्यक्तियों की एकता सम्भव नहीं है , उसी प्रकार व्यक्ति रूप कार्यों और व्यक्ति के कारणों की एकता भी सम्भव नहीं है , क्योंकि व्यक्तियों की तरह उनके कार्य और उनके कारण भी तो परस्पर विभिन्न हैं , उनमें रहनेवाले सामान्यों के बिना उनमें भी एकत्व का सम्पादक कौन होगा ?
दूसरी बात यह है कि यदि एक प्रकार की सामग्री से उत्पन्न होना ही व्यक्तियों में एकरूपता का कारण हो तो फिर भिन्न प्रकार की सामग्री से एक प्रकार के कार्य की उत्पत्ति न हो सकेगी , किन्तु सभी अग्नियों का एक प्रकार का स्वभाव होते हुए भी उनके कारण भिन्न भिन्न हैं , यतः कभी काष्ठों के मन्थन से कभी विद्युत् से और कभी सूर्य की किरणों से क्षुभित सूर्यकान्त मणि से वह्नि की उत्पत्ति होती है ।
इसी प्रकार यदि एक प्रकार के कार्यों के उत्पादक होने से ही व्यक्तियों में एकता मानी जाय तो कुछ विजातीय वस्तुओं में भी एकता माननी पड़ेगी , क्योंकि दोहन , वाहनादि क्रियायें समान रूप से गोप्रभृति व्यक्तियों से और महिषादि व्यक्तियों से भी उत्पन्न होती हैं । ( एवं एककार्यकारित्व को यदि एकता का प्रयोजक मानें तो फिर ) जिन गोव्यक्तियों से दोहन भारवाहनादि क्रियायें सम्पादित ही नहीं होतीं , उनमें एक आकार की कथित प्रतीति नहीं होगी ।
एवं जिस गाय से न दूध मिलता है और न माल ढोया जाता है वह गाय ही नहीं रह जाएगी ।
दूसरी बात यह है कि यदि सामान्य नाम की कोई वस्तु ही न हो तो शब्दों का ( सङ्केत रूप ) सम्बन्ध कहां मानेंगे ? घटादि विषयों के ' स्वलक्षण ' में घटादि शब्दों का सम्बन्ध मान नहीं सकते , क्योंकि उक्त ' स्वलक्षण ' तो क्षणिक है , एवं और किसी भी वस्तु में वह नहीं रहता है , अत : उसमें किसी भी शब्द का ( सङ्केत या ) सम्बन्ध नहीं हो सकता । उसका विकल्प भी शब्दसङ्केत का विषय नहीं हो सकता , , क्योंकि ' विकल्प ' भी क्षणिक है , और साथ साथ असाधारण ( एकमात्र पुरुषवृत्ति ) भीहै ।
( प्र ० ) एक विकल्पव्यक्ति क्षणिक और असाधारण है , किन्तु विकल्पों के आकार तो असाधारण हैं , ( क्योंकि एक आकार के अनेक विकल्प अनेक पुरुषों में देखे जाते हैं ) , अतः विकल्प का आकार शब्दसङ्कत का विषय हो सकता है । ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि विकल्प का यह आकार विकल्प से भिन्न कोई स्वतन्त्र वस्तु है ? या यह विकल्प से अभिन्न ( वस्तुतः विकल्प हो ) है ?
यदि पहिला पक्ष मानें ( कि विकल्प का आकार विकल्प से भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है ) तो फिर इस प्रथम पक्ष के प्रसङ्ग में भी यह पूछता है कि यह ' आकार ' सभी विकल्पों में साधारण रूप से रहनेवाली एक ही वस्तु है ? या प्रत्येक विकल्प में रहनेवाला आकार अलग अलग है ? यदि सभी विकल्पों में साधारण रूप से रहनेवाले एक ' आकार ' को स्वीकार कर लिया जाय , तो वह सामान्य से अभिन्न ही होगा । फलतः सामान्य स्वीकृत ही हो गया ।
थोड़ा अन्तर इतना रह जाता है कि उसे ( आकार को आप ज्ञानों का धर्म मानते हैं , और हम लोग उसे बहिर्मुखतया प्रतीत होने से ( सामान्य को ) विषयों का धर्म मानते हैं । यदि आकार को विकल्प से भिन्न मानें तो फिर वह ज्ञान से भिन्न हो होगा या ज्ञान स्वरूप ही होगा । दोनों ही स्थितियों में उनमें शब्दों के सम्बन्ध की सम्भावना नहीं रहेगी , क्योंकि ज्ञान की तरह ( उससे भिन्न या अभिन्न आकार भी क्षणिक होने के कारण ) शब्दसङ्केत का विषय नहीं हो सकता ।
( प्र ० ) वह परम्परया बाह्यविषयों के साथ भी है , अतः विकल्प स्वयं अपने में ही बाह्यस्व का आरोप कर अपने में बाह्यत्वाकार के विकल्प को भी उत्पन्न करता है । इसी बाह्यविषयक विकल्प में शब्दों का सङ्केत है । ( उ ० ) बाह्यत्व विषयक यह आरोप प्रत्येक बाह्य विषय में अलग अलग ही मानना पड़ेगा । क्योंकि इस बाह्यविषयक विकल्प की उत्पत्ति केरल कथित आन्तर विकल्पमात्र से होती है , अतः इसके उत्पन्न होने पर वह वस्तुविषयक विकल्प उत्पन्न सा और विनष्ट होने रविष्ट सा दीखता है ।
इस प्रकार वस्तुविषयक वह विकल्प असाधारण और क्षणिक भी होगा । पहिले ही कह चुके हैं कि सजातीय भिन्न व्यक्तियों में ही शब्द का सङ्केत हो सकता है , असाधारण किसी एक मात्र व्यक्ति में नहीं । ( प्र ० ) एक गोविषयक विकल्प बाह्यत्वविषयक अपने जिस आकार को उत्पन्न करता है , गोविषयक दूसरा विकल्प भी उसी तरह के बाह्यत्व विषयक अपने आकार के विकल्प को उत्पन्न करता है । विकल्पों का यह स्वभाव है कि वे केवल अपने आकारों का ही आरोप करें ।
समान आकारों में जो आरोपित परस्पर भेद हैं , उन भेदों को ग्रहण कराने का सामर्थ्य उनमें नहीं है । क्योंकि भेद को समझने के लिए उसके प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों को समझना आवश्यक है । भेद के इस अज्ञान के कारण ही एक आकार के विकल्प से कल्पित आकारों में एकत्व का आरोप होता है । एकत्व के इसी आरोप के कारण ' इयं गौः ' ' इस आकार के सभी विकल्पों का विषय एक ही है ' इस प्रकार का व्यवहार होता है । इसी को ( वैशेषिकादि ) ' सामान्य ' कहते हैं ।
किन्तु यह ' सामान्य ' अभाव रूप है ( भाव रूप नहीं ) क्योंकि बाह्य वस्तुओं में , एवं आरोपित विकरूपों में जो परस्पर भेद है , उनका अत्यन्ताभाव ही वह सामान्य है | ( १ ) स्वलक्षण कम्बुग्रीवादिमत्त्व प्रभृति ) , ( २ ) उसका ज्ञान ( ३ ) ज्ञान के आकार , एवं ( ४ ) आकार का बाह्यत्वारोप इन चार सहायकों के साथ मिलकर ( इन चारों से कुछ ही भिन्न होने के कारण ) उसे अर्द्धपञ्चमाकार ' कहा जाता है । उसी अर्द्धपश्चमाकार वस्तु में शब्द का ( सङ्केतरूप ) संसर्ग होता है ।
शब्द से उसी का व्यवहार होता है , एवं उसी का बाह्य अर्थ रूप में भी व्यवहार होता है , उसे ही ' स्वलक्षण ' भी कहते हैं । इसी ' स्वलक्षणाध्यवसाय ' रूप से उसका आरोप होता है । इस ( अर्द्धपश्चमाकार ) का अध्यवसाय ही स्वलक्षणाध्यवसाय ' कहा जाता है , क्योंकि विकल्प का इसी रूप से आरोप होता है । यह ( अपोह ) अन्यव्यावृत्ति स्वभाव का है , अर्थात् इसका स्वभाव है कि अपने विषय को अन्यों से भिन्न रूप में समझावे । एवं भाव और अभाव दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान रूप से रहना भी इसका स्वभाव है ।
क्योंकि ' गौरस्ति ' और ' गौर्नास्ति ' इन दोनों ही प्रकार के प्रयोग होते हैं । यदि यह केवल भाव रूप ही होता , तो फिर पुनरुक्ति के कारण ' गौरस्ति ' यह प्रयोग सम्भव न होता । ' गौर्नास्ति ' यह प्रयोग भी नहीं हो सकता , क्योंकि अस्तित्व और नास्तित्व दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । इसी प्रकार इसको केवल अभाव रूप ही मानें तो ' गोर्नास्ति ' यह प्रयोग पुनरुक्ति के कारण नहीं हो सकेगा और ' गौरस्ति ' यह प्रयोग विरोध के कारण असम्भव होगा । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-
१ " यतः घट सत् है अतः ' घटोऽस्ति ' यह प्रयोग ठीक नहीं है , ( क्योंकि इससे पुनरुक्ति होती है ) । ' घटो नास्ति ' यह प्रयोग भी ठीक नहीं है , क्योंकि ( घटशब्द से बोध्य ) सत्त्व और ( नास्तिशब्द से बोध्य ) असत्त्व दोनों परस्पर विरोधी हैं । "
इसी ( अर्द्धपञ्चमाकार ) से विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति होती है । यही सभी विकल्पों का विषय है , और इसी की एकता से सभी विकल्पों में भी एकता की प्रतीति होती है । विकल्पों के एकत्व से ही उसके कारणीभूत एवं प्रत्येक पिण्ड में उत्पन्न होनेवाले निर्विकल्पक ज्ञानों में भी एकता की प्रतीति होती है । निर्विकल्पक ज्ञानों की इस एकता से ही उनके कारणीभूत विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-
एकत्व ज्ञान के कारण ही परस्पर विभिन्न व्यक्तियों में अभेद बुद्धि उत्पन्न होती है , एवं उस एकत्वविषयक बुद्धि को हेतु होने से ही व्यक्तियों में अभिन्नता होती है ।
( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि इस पक्ष के सम्भावित सभी विकल्प अनुप पन ठहरते हैं । विकल्प के आकारों में जो परस्पर भेद है , उस भेद के अज्ञान से उनमें जिस एकत्व का आरोप होता है , उसे ही भिक्षुगण ' सामान्य ' कहते हैं । इस प्रसङ्ग में सिद्धान्तियों का पूछना है कि -- ( १ ) आकारों के भेद का जो अग्रह क्या वही अभेद ( एकत्व ) का आरोप है ? या ( २ ) अभेद के ग्रहण को ही अभेद का आरोप कहते हैं ? ( १ ) इनमें यदि प्रथम पक्ष मानें तो जिन व्यक्तियों में परस्पर भेद निश्चित है , उन दोनों में भी अभेद व्यवहार की आपत्ति होगी । दूसरी बात यह है कि , जिस प्रकार विकल्प के आकारों में भेद का ज्ञान नहीं होता है , उसी प्रकार उन आकारों में जो अभेद है , उसका भी भान नहीं होता है । इस स्थिति में भेद के अज्ञान से अभेद के आरोप की तरह अभेद के अज्ञान से भेद का आरोप भी होगा । फिर विकल्प के आकारों में अभेद व्यवहार की कथित रीति अयुक्त हो जाएगी । ( २ ) ' अभेद का ग्रहण ही अभेद का आरोप है ' यह पक्ष भी ठीक नहीं है , क्योंकि ' आत्मवाद ' में अनेक विषयों का एक द्रष्टा स्वीकृत है , अतः उस पक्ष में एक ही पुरुष विकल्पों के भेद और अभेद दोनों
६६ को क्रमशः समझ सकता है । किन्तु ' नैरात्म्यवाद ' में अनेक वस्तुओं को देखनेवाला कोई एक पुरुष स्वीकृत नहीं है , क्योंकि विकल्प केवल अपने अपने आकार मात्र में पर्यवसित हैं । अनेक वस्तुओं के एक द्रष्टा को यदि स्वीकार भी कर लें , फिर भी अनेक वस्तुओं में अभेद की प्रतीति तब तक नहीं हो सकती , जब तक उन अनेक वस्तुओं में रहनेवाले किसी एक निमित्त को न मान लिया जाय ।
बिना एक किसी पदार्थ को माने भी यदि उक्त अभेद की प्रतीति मानें तो गो , महिष प्रभृति आकारों में भी उक्त एकत्व की प्रतीति होगी , क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । ( प्र ० ) गो के सभी आकारों में ' अगोव्यावृत्ति ' ( गोभिन्नभिन्नत्व ) रूप एक धर्म के रहने से सभी गोव्यक्तियों में एकत्व का आरोप होता है ? ( उ ० ) ' अगो ' शब्द से कौन सब वस्तुएँ अभिप्रेत हैं , जिनकी व्यावृत्ति के कारण सभी गो व्यक्तियों में एकत्व का आरोप करते हैं ?
( प्र ) गायों से भिन्न जितनी भी वस्तुएँ हैं , वे ही प्रकृति में ' अगो ' शब्द से अभिप्रेत हैं ? उ ०) ' गो ' कौन सी वस्तु है ? यदि यह कहें कि ( प्र ० ) वे ही गो हैं , जो गोभिन्न वस्तुओं से भिन्न है ? ( उ ० ) तो फिर गो , अश्व प्रभृति वस्तुओं का स्वरूप जब ज्ञात होगा , तब तद्भिन्नत्व रूप से ' गो ' के स्वरूप का निर्णय होगा । एवं ' अगो ' के स्वरूप का जब निर्णय होगा , तब उनकी व्यावृत्ति से गो के स्वरूप का निर्णय होगा ।
इस प्रकार इस ( अपोहवाद के ) पक्ष में एक के बिना दूसरे की प्रतिपत्ति न होने के कारण फलतः ' गो ' और ' अगो ' दोनों का ज्ञान ही असम्भव होगा ।
जैसा कि इस प्रसङ्ग में ' तत्रभवान् ' कुमारिलभट्ट ने कहा है कि( किसी प्रमाण के द्वारा ) सिद्ध ' अगो ' से ही सभी गोव्यक्ति में व्यावृत्ति बुद्धि उत्पन्न हो सकती है । किन्तु ' अगो ' वस्तुतः गो का निषेध रूप है । किन्तु यह निर्वचन करना पड़ेगा कि ' अगो ' शब्द में प्रयुक्त ' नन् ' के द्वारा जिसका निषेध किया जाता है , वह ' गो ' पदार्थ क्या है ?
( फलतः ) गो की सिद्धि के बिना ' अगो ' को सत्ता सिद्ध नहीं की जा सकती । एवं ' अगो ' की सिद्धि के बिना ( तद्वयावृत्तिबुद्धि के विषय ) गो की सत्ता ही किस प्रकार सिद्ध की जा सकती है ?
( प्र ० ) अपोह शब्द के द्वारा आरोपित बाह्यत्व से भिन्न किसी ऐसे अर्थं का बोध होता है जिसका बाह्यत्व रूप से आरोप न हो । ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि ' अगो ' का यह ' अपोह ' कोन सी वस्तु है ? भाव रूप है ? अथवा अभाव है ? यदि भाव रूप है ' तो फिर प्रसङ्ग में पूछना है कि ( यह रूप इस भाव रूप अपोह ) गो व्यक्तिस्वभाव का है ? अथवा ' अगो ' व्यक्तियों के स्वभाव का है । यदि उसे ' गोव्यक्ति ' स्वरूप मानें , तो यह अपोह ' असाधारण ' ( एक मात्र पुरुषग्राह्य ) होगा ।
पहिले कह चुके हैं कि असाधारण अर्थ में शब्द की प्रवृत्ति नहीं होती है । यदि ' अगो ' पिण्ड स्वरूप माने तो फिर उक्त असाधारण्य रूप दोष तो है । ही , यह दोष और अधिक है कि ' गो ' शब्द से ' गो ' रूप अर्थ का ग्रहण नहीं होगा । यदि सभी गो पिण्डों में रहनेवाला अथ च गोपिण्डों से भिन्न कोई ' भाव ' पदार्थ ही ' अपोह ' हो तो फिर हम दोनों का विवाद ' सामान्य ' शब्द और ' अपोह ' शब्द के प्रसङ्ग में ही रह जाएगा ।
यदि अपोह को अन्यव्यावृत्ति रूप होने के कारण अभाव रूप मानें , तो फिर विज्ञानत्व रूप से उसका ग्रहण न हो सकेगा , क्योंकि विज्ञान वही है जो किसी ज्ञान का जनक हो । किसी भी अर्थक्रिया के सामर्थ्य से शुन्य को ही ' अभाव ' कहते हैं । इस प्रकार अभाव रूप अपोह में किसी शब्द की प्रवृत्ति ही नहीं होगी । ( अपोह में शब्दों की प्रवृत्ति मान लेने पर भी ) श्रोता को उस शब्द से किसी भी भावार्थ में प्रवृत्ति नहीं होगी , क्योंकि ( घटादि ) भाव और उनमें रहनेवाला ( अपोह रूप ) अभाव दोनों भिन्न हैं ।
एवं परस्पर विरोधी होने से अपोह एवं घटादि पदार्थ दोनों का सम्बन्ध भी सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) घटादि की स्वलक्षणा प्रतीति और अपोह की प्रतीति दोनों में भेद बुद्धि न रहने के कारण ( अपोह के वाचक घटादि शब्दों से घटादिविषयक ) प्रवृत्तियाँ होती हैं । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-
' दृश्य अर्थ और समारोपित अर्थ जो वस्तुतः परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं , उन दोनों को एक समझकर ही सुननेवाले की तद्विषयक प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । ' ( उ ० ) किन्तु यह कहना भी अयुक्त है । अज्ञात वस्तु ( भाव ) में अभिन्न रूप से अभाव ( अपोह ) का आरोप भी नहीं किया जा सकता । उस समय ( शब्द को सुनने के बाद ) श्रोता को अर्थ का ज्ञान नहीं है , क्योंकि शब्द प्रामाणिक ( गवादि ) अर्थों का बोधक प्रमाण नहीं है | एवं उस समय शब्द को छोड़ दूसरा प्रमाण उपस्थित भी नहीं है । किन्तु शब्द से ( घटादि ) अर्थों में प्रवृत्ति होती है । अतः ( घटादि शब्दों के घटत्वादि रूप से घटादि भाव हो अर्थ हैं , अपोह रूप से ) अभाव नहीं । ( घटत्वादि ) सामग्रियों को छोड़कर शब्दों का कोई एक ( प्रवृत्ति ) निमित्त नहीं है । यह कहना भी सम्भव नहीं है कि जितने भी अर्थ उत्पन्न होते हैं वे सभी परस्पर भिन्न हैं , और प्रतिक्षण नये नये ही उत्पन्न होते हैं , और उन्हीं अर्थों का शब्द से अनुभव होता है । एवं ( सामान्य के न मानने पर ) प्रत्यक्ष के द्वारा अज्ञात व्यक्तियों में प्रवृत्ति और निवृत्ति नहीं होगी , ( किन्तु प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात व्यक्ति के सजातीय ) उन
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ७५४) १. यहाँ ' स्वविषयेणैव ' के स्थान में ' स्वविषयेणेव ' ऐसा इवकार ' घटित पाठ ही उचित जान पड़ता है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।
(पृ. ७५७) १. मुद्रित पुस्तक में ' रूपमाक्षिपति ' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम नहीं है । ' एकाथ क्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च ' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम है , जिससे सङ्गति ठीक नहीं बैठती है । अत : ' रूपमाक्षिपति ' इसी वाक्य के आगे पूर्णविराम देकर और आगे के वाक्य को पूर्वपक्षियों के साधक हेतुओं का बोधक मानकर अनुवाद किया गया है 1
(पृ. ७५७) २. इस सन्दर्भ में ' परस्परव्यावृत्तानामेकत्वात् ' यह मुद्रित पाठ उचित नहीं जान पड़ता , इसे प्रथमान्त होना चाहिए । आगे के ' भिन्नकारणप्रभवाणामेकत्वम् ' इस प्रथमान्त पाठ से यह और स्पष्ट हो जाता है । अतः उक्त पाठ को प्रथमान्त मान कर ही अनुवाद किया गया है ।
(पृ. ७६०) १. यह श्लोक मुद्रित पुस्तक में ' घटो नास्तीति वक्तव्यम् ' इस प्रकार से मुद्रित है । किन्तु विषय विवेचन की दृष्टि से ' घटोऽस्तीति न वक्तव्यम् ' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है । यह पाठ पाठान्तरों की सूची में भी है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।
(पृ. ७६२) १. यह पद्य श्लोकवार्त्तिक का है । मुद्रित न्यायकन्दली में इसका पाठ ' सिद्धश्च गौरपोह्यत ' इस प्रकार है । किन्तु विषयविवेचन की दृष्टि से ' सिद्धश्चागौरपोह्येत ' ऐसा पाठ उचित है । चौखम्भा से मुद्रित श्लोकवात्तिक में ऐसा ही पाठ है भी । तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । T
(पृ. ७६४) १. यहाँ मुद्रित पाठ को यथावत् मानना उचित नहीं जान पड़ता । अतः “ दृश्यविकल्प्यौ ” इसके पहिले ' यथोक्तम् ' इतना अधिक जोड़कर , एवं ' प्रतिपत्तिः ' इसके स्थान में ' प्रवृत्तिः ' ऐसा पाठ मानकर अनुवाद किया गया है । ये दोनों ही पाठभेद नीचे के पाठभेदों में भी मुद्रित हैं ।
विशेषनिरूपणम्
पृ. ७६५
अन्तेषु भवा अन्त्याः , स्वाश्रयविशेषकत्वाद् विशेषाः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अन्त ' ' में अर्थात् नित्य द्रव्यों में रहने के कारण इसको ' अन्त्य ' कहते हैं । एवं अपने आश्रय को अपने से भिन्न पदार्थों से अलग रूप में
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
विशेषव्याख्यानार्थमाह - अन्तेषु भवा अन्त्या इति । उत्पादविनाशयोरन्तेऽवस्थितत्वादन्तशब्दवाच्यानि नित्यद्रव्याणि तेषु भवाः स्थिता इत्यर्थः । स्वाश्रयस्य सर्वतो विशेषकत्वाद् भेदकत्वाद् विशेषाः । एतद् विवृणोति - विनाशारम्भरहितेष्वित्यादिना । विनाशारम्भर हितेष्वित्यन्त्यपदस्य विवरणम् । अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतव इति च स्वाश्रयस्य विशेषकत्वादित्यस्य विवरणम् । प्रतिद्रव्यमेकैकशो वर्तमाना इति । द्रव्यं द्रव्यं प्रत्येकैको विशेषो वर्तत इत्यर्थः । एकेनैव विशेषेण स्वाश्रयस्य व्यावृत्तिसिद्धेरनेकविशेषकल्पनावैयर्थ्यात् । यथा चेदं विशेषाणां लक्षणं भवति तथा पूर्वं व्याख्यातम् ।
सिद्धे विशेषसद्भावे तेषां लक्षणाभिधानं युक्तं नासिद्धे , इत्याशङ्कय विशेषाणां सद्भावं प्रतिपादयितुं ग्रन्थमवतारयति - यथेत्यादिना । यथा गवादिष्वश्वाविभ्यस्तुल्याकृतिनिमित्ता गौरिति गुणनिमित्ता शुक्ल इति क्रियानिमित्ता शीघ्रगतिरिति अवयवनिमित्ता पीनककुद्मानिति , संयोगनिमित्ता महाघण्ट इति , अस्मदादीनां प्रत्ययव्यावृत्तिर्दृष्टा । तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां तुल्याकृतिगुणक्रियेषु तुल्याकृतिषु तुल्यगुणेषु तुल्यक्रियेषु परमाणुषु मुक्तात्ममनस्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमित्तेभ्यः प्रत्याधारमयमस्माद् विलक्षण प्रत्ययव्यावृत्तिर्भवति तेऽन्त्या विशेषाः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — – :: अप्रत्यक्ष व्यक्तियों में भी प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है । किन्तु प्रत्यक्ष के द्वारा अज्ञात अर्थ का शब्द से व्यवहार होता है , एवं सभी प्राणियों में प्रत्यक्ष से होनेवाली हित की प्राप्ति के लिए प्रवृत्ति और अहित की निवृत्ति से ही ' लोकयात्रा ' का निर्वाह देखा जाता है । यह ' लोकयात्रा ' ही भिन्न व्यक्तियों में एक जाति को सिद्ध करती है । ( लोकयात्रा के निर्वाह में सामान्य की उपयोगिता इस प्रकार है कि ) जिस शब्द से जिस विषय को समझकर प्रवृत्ति होती है , उस जाति के और व्यक्तियों में भी केवल उस जाति के होने के नाते ही उस कार्य की क्षमता का बोध हो जाता है । इससे प्रथमतः ज्ञात उस जाति के दूसरे विषयों में भी लोक प्रवृत्त होता है । तस्मात् —
भिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति जाति से ही होती है । अतः इसके न मानने पर ' लोकयात्रा ' का निर्वाह न हो सकेगा ।
भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित पदार्थों के बोध को उत्पन्न करनेवाली
सत्यादि चारों युगों , आन्वीक्षिकी प्रभृति चारों विद्याओं , ब्राह्मणादि चारों वर्णों की रचना करनेवाले और स्वयं चार मुखवाले ब्रह्मा जी को प्रणाम करता हूँ , जो इस प्रकार चतुष्ट्व संख्याओं से युक्त होने के कारण पश्चत्व ' शून्य हैं ( अर्थात् मृत्यु से रहित हैं ) ।
पृ. ७६६
विनाशारम्भरहितेषु नित्यद्रव्येष्वण्वाकाशकाल देगात्ममनस्तु प्रतिद्रव्यमेकैकशो वर्तमाना अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतवः ।
यथास्मदादीनां गवादिष्वश्वादिभ्यस्तुल्या कृतिगुणक्रियावयवसंयोगनिमित्ता प्रत्ययव्यावृत्तिर्दृष्टा , गौः शुक्लः शीघ्रगतिः पीनककुद्मान् महाघण्ट इति ।
तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां नित्येषु तुल्याकृतिगुणक्रियेषु परमाणुषु मुक्तात्ममनस्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमित्तेभ्यः प्रत्याधारं विलक्षणोऽयं विलक्षणोऽयमिति प्रत्ययव्यावृत्तिः , देशकालविप्रकर्षे च परमाणौ स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानं च भवति , विशेषाः ।
यदि पुनरन्त्यविशेषमन्तरेण योगिनां योगजाद धर्मात् योगजाद् धर्मात् प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च स्यात् ? ततः किं स्यात् ? नैवं भवति ।
यथा न योगजादू धर्माशुक्ले शुक्लप्रत्ययः सञ्जायते , अत्यन्तादृष्टे च प्रत्यभिज्ञानम् ।
यदि स्यान्मिथ्या भवेत् ।
तथेहाप्यन्त्य विशेषमन्तरेण योगिनां न योगजादू धर्मात् प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं वा भवितुमर्हति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — समझने के कारण इसे ' विशेष ' कहते हैं । सभी प्रकार के परमाणु , आकाश , काल , दिक् , आत्मा और मन ये सभी द्रव्य यतः उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं , अतः इन सबों में ' विशेष ' की सत्ता माननी पड़ती है । क्योंकि इनमें से प्रत्येक को अपने सजातीयों और विजातीयों से भिन्न रूप में समझानेवाला ( अत्यन्त व्यावृत्ति - बुद्धि का ) कोई दूसरा कारण नहीं है ।
जिस प्रकार हम साधारण जनों को गो में अश्व से कुछ सादृश्य के रहते हुए भी विशेष आकृति , विशेष गुण , विशेष प्रकार की क्रिया , एवं अवयवों के विशेष प्रकार के संयोगों के कारण ( गो में अश्व से ) ये व्यावृत्तिप्रत्यय होते हैं कि ' यह गो है , ( अश्व नहीं , क्योंकि यह ) विशेष प्रकार का शुक्ल है , यह विशेष प्रकार से दौड़ता है , या इसका ककुद् बहुत बड़ा है , या इसके गले में बहुत बड़ा घण्टा है ।
इसी प्रकार हम लोगों से सर्वथा उत्कृष्ट योगियों को सभी परमाणुओं में नित्य एवं समान आकृति के रहते हुए भी यह परमाणु उस परमाणु से भिन्न है ' इस प्रकार की व्यावृत्ति की प्रतीति जिस कारण से होती है , वही ' विशेष ' है । मुक्त आत्माओं में सर्वथा साम्य के रहते हुए भी ' यह आत्मा उस आत्मा से भिन्न है ' इस आकार की व्यावृत्ति प्रतीति जिस हेतु से होती है वही ' विशेष ' है ।
इसी प्रकार सभी मनों में परस्पर सादृश्य के रहते हुए भी योगियों को जिस कारण से ' यह मन उस मन से भिन्न है ' इस आकार की व्यावृत्ति - बुद्धि उत्पन्न होती है वही ' विशेष ' है । इसी प्रकार विभिन्न समयों में या विभिन्न देशों में रहनेवाले परमाणुओं में भी ' यह वही है ' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा योगियों को जिन हेतुओं से होती है , वे अन्त्यों में रहनेवाले विशेष ' ही हैं ।
योग से उत्पन्न केवल विशेष प्रकार धर्म से ही योगियों की व्यावृत्ति की उक्त प्रतीति और प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति सम्भव नहीं है , क्योंकि जिस प्रकार शुक्ल रूप से शून्य द्रव्य में शुक्ल की प्रतीति एवं पहिले से न देखे हुए वस्तुओं में प्रत्यभिज्ञा ये दोनों ही योगियों को भी नहीं होती हैं , यदि हों तो वे मिथ्या ही होंगी । इसी प्रकार कथित स्थलों में भी व्यावृत्ति प्रतीतियाँ और प्रत्यभिज्ञ ! ये दोनों बिना अन्त्य - विशेष के केवल योगजनित उत्कृष्ट धर्म से योगियों को भी नहीं हो सकतीं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
यथास्मदादीनां गवादिव्यक्तिषु प्रत्ययभेदो भवति , तथा परमाण्वादिष्वपि शिनां परस्परापेक्षया प्रत्ययभेदेन भवितव्यम् , व्यक्तिभेदसम्भवात् । न चास्य व्यक्तिभेद एव निमित्तम् । तदुपलम्भेऽपि स्थाण्वादिषु संशयदर्शनात् । निमित्तान्तरं च नास्ति , आकृतेर्गुणस्य क्रियायाश्च तुल्यत्वात् । न च निनिमित्तः प्रत्ययभेदो दृष्टः , तस्माद् यदस्य निमित्तं स विशेष इति । देशविप्रकर्षेण कालविप्रकर्षेण च दृष्टाः परमाणवः कस्यचित् प्रत्यभिज्ञाविषयाः सामान्यविशेषत्त्वाद् घटादिवत् । न च पूर्वदृष्टेऽर्थे प्रत्यभिज्ञानं विशेषावगतिमन्तरेण भवति , अतोऽस्ति तस्य निमित्तं विशेषः ।
अत्र चोदयति - यदि पुनरिति । यथा योगजधर्मसामर्थ्याद् योगिनामतीन्द्रियार्थदर्शनं भवति , तथा विशेषमन्तरेणैव प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च भविष्यतीति चोदनार्थः ।
समाधत्ते - नैवमिति । यथा योगिनामशुक्ले शुक्लप्रत्ययो न भवति , अत्यन्तादृष्टे च प्रत्यभिज्ञानं न स्यात् । यदि स्यात् ? मिथ्याप्रत्ययो भवेत् । तथा अन्त्यविशेषमन्तरेण प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च न भवितुमर्हति । योगजाद् धर्मादतीन्द्रियार्थदर्शनं न पुनरस्मानिनिमित्त एवं प्रत्ययो भविष्यतीत्यभिप्रायः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' अन्तेषु भवा अन्त्याः ' यह वाक्य विशेष पदार्थ की व्याख्या के लिए लिखा गया है । ( ' अन्त्येषु भवा अन्त्याः ' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न ' अन्त्य ' शब्द में जो ) ' अन्त ' शब्द है , उससे नित्यद्रव्य अभिप्रेत हैं , क्योंकि वे उत्पत्ति और विनाश के अन्त में रहते हैं । ' तेषु भवा अन्त्याः ' अर्थात् विशेष नित्य द्रव्यों में ही रहते ' विशेष '
इसका नाम इस अभिप्राय से रक्खा गया है कि यह अपने आश्रय को और सभी वस्तुओं से अलग करता है । ' विशेष ' पद का यही विवरण ' विनाशारम्भरहितेषु ' इत्यादि से किया गया है | उक्त वाक्य का ' विनाशारम्भ रहितेषु ' यह अंश ' अन्त्य ' पद का विवरण है , और ' अत्यन्तव्यावृत्तिहेतवः ' यह अंश ' स्वाश्रयस्य विशेषकत्वात् इस वाक्य का विवरण है । ' प्रतिद्रव्यमेकैकशो वर्त्तमानाः ' अर्थात् प्रत्येक ( नित्य ) द्रव्य में एक एक विशेष है । एक नित्य द्रव्य में एक ही विशेष पदार्थ की कल्पना करते हैं , क्योंकि एक ही विशेष को स्वीकार कर लेने से हो उसके आश्रय द्रव्य में और सभी पदार्थों की व्यावृत्ति बुद्धि उत्पन्न हो जाएगी । अतः एक द्रव्य में अनेक विशेषों की कल्पना व्यर्थ है । ' अन्त्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्त्तका विशेषाः ' विशेष का यह लक्षण जिस प्रकार उपपन्न होता है इसका विवरण पहिले ही दे चुका हूँ |
पहिले विशेष पदार्थ की स्वतन्त्र सत्ता में प्रमाण दिखला कर बाद में उसका लक्षण कहना उचित है , उससे पहिले नहीं । अतः विशेष पदार्थ की सत्ता में प्रमाण दिखलाने के लिए ही ' यथा ' इत्यादि सन्दर्भ का अवतार हुआ है । अभिप्राय यह है कि ( योगियों से भिन्न ) साधारण पुरुषों को सभी गो व्यक्तियों में समान आकृति के कारण उनसे भिन्न अश्वादि सभी पदार्थों से भिन्नत्व ( व्यावृत्ति ) की प्रतीति होती है । एवं उसी गो में ' शुक्ल ' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि शुक्लवर्ण रूप गुण के कारण होती है ।
उसी गो में ' यह शीघ्र चलनेवाला है ' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि ' शीघ्रचलन ' रूप क्रिया के कारण होती है । ' इसका ककुद् बहुत स्थूल है ' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि ककुद् रूप अवयव के कारण होती है , एवं ' यह बड़ा घण्टावाला है ' इस प्रकार की व्यावृत्तिबुद्धि घण्टा के संयोग के कारण होती है ।
इसी प्रकार अस्मदादि से विशेष सामर्थ्य वाले योगियों को मादृश साधारण जनों से अत्यन्त दिव्यदृष्टि रूप वैशिष्ट्य के कारण समान आकृतिवाले , समान गुणवाले एवं समान क्रियावाले परमाणुओं में , मुक्त आत्माओं में और उनके मनों में जो परस्पर व्यावृत्ति की बुद्धियाँ होती हैं , आकृति भेद ( गुणभेदादि ) उनके कारण नहीं हो सकते ।
अतः ( यह कल्पना करनी पड़ती है कि कथित परमाणु प्रभृति ) प्रत्येक आधार में ' यह इससे विभिन्न प्रकार का है इस आकार की व्यावृत्ति बुद्धि जिन कारणों से होती है वे ही ' विशेष ' हैं ।
अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार हम जैसे साधारण जनों को गो प्रभृति व्यक्तियों विभिन्न प्रकार की प्रतीतियाँ होती हैं , क्योंकि वे व्यक्तियां परस्पर विभिन्न होती हैं । इसी प्रकार परमाणु प्रभृति व्यक्तियों में भी परस्पर भेद रहने के कारण उन्हें प्रत्यक्ष देखनेवाले योगियों को उनमें से प्रत्येक में परस्पर व्यावृत्ति - बुद्धि होनी ही चाहिए । परमाणु प्रभृति में योगियों के इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण उनका परस्पर भेद नहीं हो सकता ।
क्योंकि स्थाणु प्रभृति में पुरुषादि का भेद उपलब्ध होने पर ' अयं स्थाणुः पुरुषो वा ' इत्यादि संशय ही होते हैं । योगियों की उन व्यावृत्ति - बुद्धियों का कोई दूसरा कारण उपलब्ध नहीं होता है , क्योंकि परमाणु प्रभृति की आकृति और क्रिया प्रभृति समान है , ( अतः उनसे यहाँ व्यावृत्ति -बुद्धि उपपन्न नहीं हो सकती ) । बिना विशेष कारण के प्रतीतियों की विभिन्नता कहीं उपलब्ध नहीं होती । तस्मात् योगियों की उन व्यावृत्ति - बुद्धियों के जो कारण हैं वे ही ' विशेष ' हैं ।
( इस प्रसङ्ग में यह अनुमान भी है कि ) जिस प्रकार परसामान्य और विशेष अपर सामान्य से युक्त होने के कारण किसी व्यक्ति की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा घटादि ज्ञात होते हैं , उसी प्रकार एवं उन्हीं हेतुओं से विभिन्न स्थानों और विभिन्न समयों में देखे गये परमाणु भी किसी की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा ही ज्ञात होते हैं । किसी ' विशेष ' ज्ञान के बिना पहिले देखी हुई वस्तु का प्रत्यभिज्ञान नहीं हो सकता , अतः परमाण्वादि विषयक प्रत्यभिज्ञानों का जो असाधारण कारण है , वही ' विशेष ' है ।
यदि पुन : ' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । आक्षेप करनेवालों
अभिप्राय है कि जिस प्रकार योग से उत्पन्न विशेष धर्म रूप विशेष सामर्थ्य के कारण योगियों को परमाण्वादि अतीन्द्रिय विषयों का भी प्रत्यक्ष होता है , उसी विशेष सामर्थ्य के द्वारा योगियों को उक्त व्यावृत्तिबुद्धि और उक्त प्रत्यभिज्ञान दोनों ही हो सकते हैं , इसके लिए विशेष पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है । ' नैवम् ' इत्यादि से इसी का समाधान करते हैं । अर्थात् जिस प्रकार योगियों को भी अशुक्ल द्रव्य में शुक्ल की प्रतीति नहीं होती है , उसी प्रकार पहिले बिना देखी हुई वस्तु की प्रत्यभिज्ञा योगियों को भी नहीं हो सकती । यदि होगी ( योगियों को शुक्ल में अशुक्ल की प्रतीति और अज्ञात वस्तु की प्रत्यभिज्ञा यदि होगी ) तो वह मिथ्या ही होगी । अतः योगियों को कथित परमाण्वादि में उक्त परस्पर यावृत्ति को प्रतीति ' विशेष ' पदार्थ को माने बिना केवल योगजनित विशेष धर्म से नही हो सकती । योगज धर्म से योगियों के अतीन्द्रिय अर्थों के ज्ञानों में भी योगजधर्म के अतिरिक्त विषयादि निमित्तों की अपेक्षा होती है ।
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' अथान्त्यविशेषेषु ' इत्यादि ग्रन्थ से इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । अर्थात् कथित ' अन्त्यविशेषों ' में दूसरे ' विशेष ' की सम्भावना नहीं है , क्योंकि ( ऐसी कल्पना करने पर ) अनवस्थादोष होगा । यह जो आक्षेप किया गया है कि विशेषों में दूसरे विशेषों के न रहने पर भी जैसे कि स्वतः उनमें परसर व्यावृत्ति - बुद्धि योगियों को होती है . वैसे ही परमाणु प्रभृति में स्वतः ही व्यावृत्ति बुद्धि होगी । इसके लिए ' विशेष ' नाम के स्वतन्त्र पदार्थ को मानने की क्या आवश्यकता हैं ? उसी ( आक्षेप ) के समाधान के लिए ' न ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् तुमने जो आक्षेप किया है वह ठीक नहीं है , क्योंकि परमाणु प्रभृति में ' परस्पर तादात्म्य ' है । इसी ' तादात्म्य ' हेतु का विवरण ' इह ' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है ।
पृ. ७७०
अथान्त्य विशेषेष्विव परमाणुषु कस्मान्न स्वतः प्रत्ययव्यावृत्तिः कल्प्यत इति चेत् ? न तादात्म्यात् ।
इहातदात्मकेष्वन्यनिमित्तः प्रत्ययो
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) यह कल्पना क्यों नहीं करते कि अन्त्य - विशेषों की तरह उक्त परमाणुओं में भी व्यावृत्ति प्रतीतियाँ स्वतः ( बिना और किसी
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
पुनश्चोदयति - अथान्त्यविशेषेष्विति । न तावदन्त्यविशेषेष्वपि विशेषान्तरसम्भवोऽनवस्थानात् । यथा च तेषु विशेषान्तरमन्तरेण स्वत एव प्रत्ययव्यावृत्तिर्भवति योगिनां तथा परमाणुष्वपि भविष्यति ? कि विशेषकल्पनयेत्यत्रोत्तरमाह - नेति ।
पृ. ७७१
भवति यथा घटादिषु प्रदीपात् , न तु प्रदीपे प्रदीपान्तरात् ।
यथा गवाश्वमांसादीनां स्वत एवाशुचित्वं तद्योगादन्येषाम , तथेहापि तादात्म्यादन्त्य विशेषेषु स्वत एव प्रत्ययव्यावृत्तिः , तद्योगात् परमाण्वादिष्विति ।
-- :: -
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कारण के ही ) होंगी । ( उ ० ) यह नहीं हो सकतीं , क्योंकि परमाणु में परमाणु का तादात्म्य है । जो वस्तु जिस स्वरूप का नहीं है , उस वस्तु में उक्त अन्य वस्तु की बुद्धि उस वस्तु से भिन्न वस्तु रूप कारण से ही उत्पन्न होती है , जैसे कि घटादि की प्रतीति प्रदीप से होती है , किन्तु प्रदीप की प्रतीति के लिए दूसरे प्रदीप की अपेक्षा नहीं होती । जिस प्रकार गो और अश्व के मांसों में अशुचित्व स्वतः ( बिना किसी और सम्बन्ध के ही ) है , किन्तु उनसे सम्बद्ध वस्तुओं में उसी के सम्बन्ध से अशुचित्व होता है । उसी प्रकार यहाँ भी अन्त्य - विशेषों में तादात्म्य से अर्थात् और किसी के सम्बन्ध के बिना ही व्यावृत्ति प्रतीति होती है , किन्तु परमाणुओं में अन्त्यविशेष के सम्बन्ध से ही व्यावृत्ति प्रतीति होती है ।
प्रशस्तपाद भाष्य में विशेष का निरूपण समाप्त हुआ ।
10 : 1
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
यत्त्वयोक्तं तन्न , कुतस्तादात्म्यात् । एतदेव विवृणोति - इहेति । अतदात्मकेष्वन्यनिमित्तः प्रत्ययो भवति , न तदात्मकेषु । यथा घटादिष्वप्रकाशस्वभावेषु प्रदीपादेः प्रकाशस्वभावात् प्रकाशो भवति , न तु प्रदीपे प्रदीपान्तरात् प्रकाशः किन्तु स्वत एव । यथा गवाश्वमांसादीनां स्वत एवाशुचित्वम् , स्प्रष्टुः प्रत्यवायकरत्वं तद्योगात् । तत्सम्बन्धादन्येषामशुचित्वम् । तथेहापि तादात्म्यादत्यन्तव्यावृत्तिस्वभावत्वादन्त्य विशेषेषु स्वत एव स्वरूपादेव प्रत्ययव्यावृत्तिर्न विशेषान्तरसम्भवात् । अतदात्मकेषु तु परमाणुषु सामान्यधर्मकेषु विशेषयोगादेव प्रत्ययव्यावृत्तिर्युक्ता न स्वरूपमात्रादिति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अभिप्राय यह है कि जिन दो वस्तुओं में तादात्म्य नहीं है , उनमें से एक में अन्य दूसरे के सम्बन्ध के लिए अन्य कारण की अपेक्षा होती है । जो अभिन्न हैं उनमें से किसी में सम्बन्ध के लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं होती है । जैसे कि घटादि प्रकाश - स्वभाव के नहीं हैं ( प्रकाश के साथ उनका तादात्म्य नहीं है ) अतः घट में प्रकाश के लिए प्रकाश स्वभाव के प्रदीप रूप अन्य पदार्थ की अपेक्षा होती है । किन्तु प्रदीप के प्रकाश के लिए किसी दूसरे प्रदीप की अपेक्षा
---- :: - नहीं होती है , क्योंकि प्रदीप में स्वतः प्रकाश होता है । इसी प्रकार गो , अश्व प्रभृति के मॉस अपने तो वे स्वतः ‘ अशुचि ' हैं , किन्तु निषिद्ध मांसों को छूनेवाले पुरुष में प्रत्यवाय की कारणता उन ( मांसों ) के स्पर्श से आती है । एवं उस पुरुष से सम्बन्ध रखनेवाली वस्तुओं में जो अशुचिता होगी , उसका कारण उन वस्तुओं के साथ उस पुरुष का सम्बन्ध है । इसी प्रकार प्रकृत में भी अत्यन्तव्यावृत्ति स्वभाव के अन्त्य - विशेषों में व्यावृत्ति प्रत्यय ' स्वतः ' अर्थात् उनके अत्यन्तव्यावृत्ति स्वभाव के कारण ही होता है । इसके लिए दूसरे विशेष के सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं है । ' अतदात्मक ' अर्थात् एक सामान्य धर्मवाले परमाणुओं में जो व्यावृत्तिबुद्धि होगी उसके लिए उनमें विशेष पदार्थ का सम्बन्ध ही कारण है । उसको उत्पत्ति स्वतः नहीं हो सकती ।
एक साधारण धर्म से युक्त सभी नित्य द्रव्यों में से प्रत्येक में परस्पर भेद ( व्यावृत्ति ) के लिए , उनमें से प्रत्येक में अलग विशेष का मानना आवश्यक है , क्योंकि वे ही उनमें व्यावृत्ति बुद्धि के कारण हैं ।
भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित एवं पदार्थों के सम्यक् ज्ञान में समर्थ न्याय-
कन्दली नाम की टीका का विशेषनिरूपण समाप्त हुआ ।
1 : 0 : 1
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ७७२) १. यहाँ ' न विशेषान्तरसम्भवात् ' इसके स्थान में ] ' न विशेषान्तरसम्बन्धात् ' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है , अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।
समवायनिरूपणम्
पृ. ७७३
अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्यय हेतुः स समवायः ।
द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणां कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानां वाऽयुतसिद्धानामाधार्याधार- भावेनावस्थिताना मिहेदमिति बुद्धिर्यतो भवति यतश्चासर्वगतानामधिगतान्यत्वानामविष्वग्भावः स समवायाख्यः सम्बन्धः ।
कथम् १ यथेह कुण्डे दधीति प्रत्ययः सम्बन्धे सति दृष्टः , तथेह तन्तुषु पटः , इह वीरणेषु कटः , इह द्रव्ये गुणकर्मणी , इह द्रव्यगुणकर्मसु सत्ता , इह द्रव्ये द्रव्यत्वम् , इह गुणे गुणत्वम् , इह कर्मणि कर्मत्वम् , इह नित्यद्रव्येऽन्त्या विशेषा इति प्रत्ययदर्शनादस्त्येषां सम्बन्ध इति ज्ञायते ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — एक आश्रय एवं दूसरा आश्रित इस प्रकार के दो अयुतसिद्धों का जो सम्बन्ध ' यह ( आश्रित ) यहाँ ( आश्रय में ) है ' इस प्रकार के प्रत्यय का कारण हो , वही सम्बन्ध ' समवाय ' है ( विशदार्थ यह है कि ) द्रव्य गुण , कर्म , सामान्य और विशेष इन सभी पदार्थों ( में से जो दो वस्तु यथासम्भव ) कार्यकारणभावापन्न हों अथवा स्वतन्त्र ही हों किन्तु अयुतसिद्ध हों , एवं आधार आधेय रूप हों उन दोनों में से एक ( आधेय ) का दूसरे ( आधार में ) ' यह यहाँ है ' इस आकार का प्रत्यय जिससे हो वही ( सम्बन्ध ) ' समवाय ' है ।
( एवं ) नियमित देश में ही रहनेवाले एवं परस्पर भिन्न रूप में ज्ञात होनेवाले दो वस्तुओं की स्वतन्त्रता जिस सम्बन्ध से जाती रहे वही ( सम्बन्ध ) ' समवाय ' है ।
( प्र ० ) इस सम्बन्ध की सत्ता में प्रमाण क्या है जिस ( उ ० ) ( यह अनुमान प्रमाण है कि ) प्रकार इस ' मटके में दही है ' यह प्रतीति ( दधि और मटके में संयोग ) सम्बन्ध के रहते ही होती है , उसी प्रकार ' इन तन्तुओं में पट है , इन वीरणों ( तृणविशेषों ) में चटाई है , इस द्रव्य में गुण और कर्म हैं , द्रव्य गुण और कर्मों में सत्ता है द्रव्य में द्रव्यत्व है , गुण में गुणत्व है , कर्म में कर्मत्व है , इन नित्यद्रव्यों में विशेष है , इत्यादि प्रतीतियाँ भी होती हैं , अतः समझते हैं कि ( प्रतीति के विषय इन आधार और आधेय में भी ) कोई सम्बन्ध अवश्य है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
नित्यद्रव्येषु सर्वेषु परस्परसधर्मसु ।
प्रत्येकमनुवर्तन्ते विशेषा भेदहेतवः ॥
इति श्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलोटीकायां
विशेषपदार्थः समाप्तः ॥
अन्तर्ध्वान्तभिदे विश्वसंहारोत्पत्तिहेतवे ।
निर्मलज्ञानदेहाय नमः सोमाय शम्भवे ॥
समवायनिरूपणार्थमाह - अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः । तदेतत्कृतव्याख्यानमुद्देशावसरे । के ते अयुत सिद्धा येषां सम्बन्धः समवायो भवेत् ? अत आह—- द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणामिति । कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानामिति नियमकथनम् । अवयवावयविनामनित्यद्रव्यतद्गुणानां नित्यद्रव्यतत्समवेतानामनित्यगुणानां कर्मद्वतां कार्यकारणभूतानां समवायः , नित्यद्रव्यतद्गुणानां सामान्यतद्वतामन्त्यविशेषतद्वतां चाकार्यकारणभूतानां समवायोऽयुत सिद्धानामिति नियमः । एवमाधार्याधारभावेनावस्थितानामित्यपि नियम एव । इहेदमिति बुद्धिर्यतः कारणाद् भवति यतश्चासर्वगतानां नियतदेशावस्थितानामधिगतान्यत्वानामधिगतस्वरूपभेदानामविष्वग्भावोऽपृथग्भावोऽस्वातन्त्र्यं स समवायः , भिन्नयोः परस्परोपश्लेषस्य सम्बन्धकृतत्वोपलम्भात् । एतदेव कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकमुपपा . दयति - यथा इह कुण्डे दधीति प्रत्ययः कुण्डदघ्नोः सम्बन्धे सति दृष्टः , तथेह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययानां दर्शनादस्त्येषां तन्तुपटादीनां सम्बन्ध इति ज्ञायते । इह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययाः सम्बन्धनिमित्तका अवधारितप्रत्ययत्वात् , इह कुण्डे दधीतिप्रत्ययवत् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अन्तःकरण के मालिन्य को समूल नाश करनेवाले , एवं विश्वको उत्पत्ति , स्थिति और विनाश के हेतु एवं विशुद्ध विज्ञान रूप शरीरवाले ( क्षित्यादि आठ मूर्तिक शिवों में से ) सोममूर्ति स्वरूप भगवान् शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ ।
' अयुत सिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः ' यह सन्दर्भ समवाय के निरूपण के लिए लिखा गया है । इस पङ्क्ति की व्याख्या इसी ग्रन्थ के उद्देश प्रकरण में कर दी गयी है । ' अयुत सिद्ध ' कौन कौन से पदार्थ हैं ? जिनका सम्बन्ध समवाय होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर ' द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणाम् ' इत्यादि से दिया गया है ।
इस वाक्य में ' किन वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध होता है ' इस प्रसङ्ग में ' नियम ' को दिखलाने के लिए ' कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानाम् ' यह वाक्य लिखा गया है ।
उक्त वाक्य के ' कार्यकारणभूतानाम् ' इस पद के द्वारा यह नियम दिखलाया गया है कि कारणों में कार्य का समवाय होता है , अर्थात् कार्यकारणभावापन्न वस्तुओं में से अवयव रूप कारणों में से अवयवी रूप कार्य का , एवं अनित्य द्रव्यरूप कारण और उनमें होनेवाले गुणों का एवं नित्य द्रव्य और उनमें उत्पन्न होनेवाले गुणों का एवं क्रियाश्रय और क्रिया का ही समवाय सम्बन्ध होता है ।
एक दूसरे का कार्य या कारण न होते हुए भी जिन वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध होता है वे हैं सामान्य ( जाति ) और उनके आश्रय एवं अन्त्यविशेष और उनके आश्रय । ( इनमें भी समवाय सम्बन्ध होता है ) । समवाय के ये कार्यकारणभूत और अकार्यकारणभूत प्रतियोगी और अनुयोगी यतः ' अयुतसिद्ध ' हैं , अतः यह ' नियम ' उपपन्न होता है - समवाय अयुत सिद्धों का ही सम्बन्ध है । इसी प्रकार ' आधार्याधारभावेनावस्थितानाम् ' यह वाक्य भी नियमार्थक ही है ।
अर्थात् यतः विभिन्न दो वस्तुओं में विशेष्यविशेषणभाव की प्रतीति किसी सम्बन्ध से ही होती है अतः ' इहेदम् ' यह प्रतीति जिस कारण के द्वारा होती है ( वही समवाय है ) , एवं जिसके द्वारा अव्यापक अथवा नियत आश्रय में रहनेवाले उन वस्तुओं में जिनमें कि परस्पर भेद पहिले से ज्ञात है , अर्थात् जिनके अलग अलग स्वरूप ज्ञात हैं उन्हें ' अविष्वग्भाव ' अर्थात् अपृथगभाव फलतः अस्वातन्त्र्य जिसके द्वारा हो वही ' समवाय ' है । क्योंकि वस्तुओं का उक्त " अविष्वग्भाव ' किसी सम्बन्ध से ही देखा जाता है ।
यही बात ' कथम् ' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न कर ' यथेह कुण्डे ' इत्यादि वाक्य से उत्तर रूप में कहते हैं । अर्थात् जिस प्रकार ' इस मटके में दही है ' इस आकार की प्रतीति मटका और दही के सम्बन्ध रहने पर ही देखी जाती हैं , उसी प्रकार ' इन तन्तुओं में पट है ' इस आकार की प्रतीति भी होती है । इससे समझते हैं कि तन्तु और पट ( प्रभृति अयुतसिद्धों ) में भी कोई सम्बन्ध अवश्य है ।
इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार इस मटके में दही है ' यह निश्चयात्मक प्रतीति दही और कुण्ड में संयोग सम्बन्ध के रहने पर ही होती है , उसी प्रकार ' इन तन्तुओं में पट है ' इस प्रकार की निश्चयात्मक प्रतीति भी उन दोनों में किसी सम्बन्ध के कारण ही उत्पन्न होती है ( वही सम्बन्ध समवाय है ) |
( मटके और दही के संयोग की तरह ) ' तन्तुओं में पट है ' इत्यादि प्रतीतियों का नियामक सम्बन्ध भी संयोग ही होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर ' न चासौ संयोगः ' इत्यादि से दिया गया है । ' असो ' अर्थात् तन्तु और पट का सम्बन्ध , संयोग क्यों नहीं है ? इसी प्रश्न का उत्तर ' सम्बन्धिनामयुत सिद्धत्वात् इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । अर्थात् संयोगसम्बन्ध युतसिद्ध वस्तुओं में ही होता है , और यह ( समवाय ) सम्बन्ध अयुतसिद्धों में होता है ।
क्योंकि संयोग अपने प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों में से एक के कर्म से होगा , या उक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के कर्म से होगा , अथवा संयोग से ही होगा । तन्तु एवं पट के इस सम्बन्ध के लिए कथित अन्यतर कर्म प्रभृति कारणों में से किसी की भी अपेक्षा नहीं होती है । यह तो अपने श्रीभूत पदार्थों के उत्पादक कारणों की सत्ता से स्थिति को लाभ करता है ।
संयोग का अन्त अर्थात् विनाश विभाग से देखा जाता है , किन्तु समवाय विनाश का ही नहीं होता , ( अतः संयोग से समवाय गतार्थ नहीं हो सकता ) एवं संयोग स्वतन्त्र ( आधा राधेयभावानापन्न ) वस्तुओं में भी होता है , जैसे कि ऊपर उठी हुई दो अङ्गलियों में संयोग होता है । समवाय सम्बन्ध आधार और आधेयभूत दो वस्तुओं में ही होता है । तस्मात् समवाय संयोग नहीं हैं , उससे अलग ही वस्तु है ।
इस प्रकार संयोग से समवाय की स्वतन्त्र सत्ता के सिद्ध हो जाने पर ' स द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरम् ' इस वाक्य के द्वारा समवाय में द्रव्यादि पदार्थों के भेद का उपपादन करते हैं । समवाय द्रव्यादि - पदार्थों से भिन्न क्यों है ? इस प्रश्न का उत्तर ' भाववल्लक्षणभेदात् ' इस सन्दर्भ के द्वारा दिया गया है । इस सन्दर्भ के ' भावस्य ' इस पद का ' भाव ' शब्द सत्ता रूप जाति का बोधक है । एवं ' द्रव्यत्वादि ' पद में प्रयुक्त ' आदि ' शब्द से गुणत्वादिजातियों का संग्रह समझना चाहिए | ( तदनुसार उक्त सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि ) सत्ता रूप जाति का स्वाधार में अर्थात् द्रव्य , गुण और कर्म इन तीनों में आत्मानुरूप प्रत्यय अर्थात् द्रव्य सत् है , गुण सत् है , कर्म सत् है इत्यादि आकार के ज्ञान होते हैं , एवं द्रव्यत्व का अपने आश्रय में अर्थात् सभी द्रव्यों में ' इदं द्रव्यम् ' इस आकार की प्रतीति होती है , एवं गुणत्व जाति की ' आत्मानुरूप ' प्रतीति अर्थात् सभी गुणों में ' यह गुण है ' इस आकार की प्रतीति होती है । एवं कर्मस्व जाति का अपने आश्रय सभी कर्मों में ' आत्मानुरूपप्रत्यय ' अर्थात् ' यह कर्म है ' इस आकार की प्रतीति होती है । इन आत्मानुरूप
पृ. ७७५
न चासौ संयोगः , सम्बन्धिनामयुतसिद्धत्वात् अन्यतर- कर्मादिनिमित्तासम्भवात् विभागान्तत्वादर्शनात् , अधिकरणाधि कर्तव्ययोरेव भावादिति ।
स ' च द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरं भाववल्लक्षणभेदात् ।
यथा भावस्य द्रव्यत्वादीनां स्वाधारेषु आत्मानुरूपप्रत्यय- कर्तृत्वात् स्वाथयादिभ्यः परस्परतश्चार्थान्तरभावः , तथा समवायस्यापि पञ्चसु पदार्थेष्विहेति प्रत्ययदर्शनात् तेभ्यः पदार्थान्तरत्वमिति ।
न च संयोगवन्नानात्वम् , भाववल्लिङ्गाविशेषाद् विशेषलिङ्गाभावाच्च ।
तस्माद् भाववत् सर्वत्रैकः समवाय इति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कथित प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं हो सकती , क्योंकि उन प्रतीतियों में विशेष्य और विशेषण रूप से भासित होनेवाले प्रतियोगी और अनुयोगी अयुतसिद्ध हैं , एवं अन्यतर कर्म या उभयकर्म या विभाग उस सम्बन्ध के कारण नहीं हो सकते । एवं विभाग से इस सम्बन्ध का नाश भी नहीं देखा जाता एवं यह ( समवाय ) अधिकरण एवं आधेय रूप दो वस्तुओं में ही देखा जाता है , ( अतः उन प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं हो सकती ) ।
यह ( समवाय ) द्रव्यादि पाँचों पदार्थों से ( सर्वथा भिन्न ) स्वतन्त्र पदार्थ ही क्योंकि जिस प्रकार सत्ता रूप सामान्य या द्रव्यत्वादि रूप सामान्य स्वसदृश ( यह सद् है , यह द्रव्य है , यह गुण है ) इत्यादि प्रतीतियों के उत्पादक होने के कारण द्रव्यादि अपने आश्रयों से भिन्न हैं , उसी प्रकार समवाय के अनुयोगी द्रव्य , गुण , कर्म , सामान्य और विशेष इन पाँचों पदार्थों में यथासम्भव ' यह यहाँ है ' इस आकार की प्रतीतियाँ होती हैं , अतः समवाय भी द्रव्यादि पाँचों पदार्थो से भिन्न स्वतन्त्र पदार्थ ही है । संयोग की तरह यह ( समवाय ) अनेक भी नहीं है , क्योंकि जिस प्रकार द्रव्य , गुण और कर्म सभी में ' यह सत् है यह सत् है ' इस साधारण आकार की प्रतीति होती है और इसी कारण द्रव्य गुण और कर्म इन तीनों में रहनेवाला ' सत्ता ' नाम का सामान्य एक ही है , उसी प्रकार द्रव्यादि अपने अनुयोगियों में अपने प्रतियोगियों का ' यह यहाँ है ' इस एक प्रकार की
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
नन्वयं संयोगो भविष्यतीत्यत आह- न चासौ संयोग इति । असौ तन्तुपटादीनां सम्बन्धो न संयोगो भवति , कुतः ? इत्यत्राह - सम्बन्धिनामसिद्धत्वादिति । संयोगो हि युतसिद्धानामेव भवति । अयं त्वयुतसिद्वानामिति । तथा संयोगोऽन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजो वा स्यादिति । इह तु अन्यतरकर्मादीनां निमित्तानामभावो भावोत्पादककारणसामर्थ्य भावित्वात् । संयोगस्य विभागान्तत्वं विभागविनाश्यत्वं दृश्यते न समवायस्य । संयोगः स्वतन्त्रयोरपि भवति , ययोर्ध्वावस्थितयोरगुल्योः । अयं त्वधिकरनाधिकर्तव्योरेव भवति , तस्मान्नायं संयोगः , किन्तु तस्मात् पृथगेव ।
एवं स्थिते समवाये तस्य द्रव्यादिभ्यो भेदं प्रतिपादयति -- स च द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरमिति । कुत इत्यत आह- भाववल्लक्षणभेदादिति । एतद् विवृणोति - यथेति । भाव इति सत्तासामान्यमुच्यते । द्रव्यत्वादीत्यादिपदेन गुणत्वादिपरिग्रहः । यथा भावस्य स्वाधारेषु द्रव्यगुणकर्मसु आत्मानुरूपः प्रत्ययः सत्सदितिप्रत्ययः , द्रव्यत्वस्य स्वाश्रयेषु द्रव्येष्वात्मानुरूपः प्रत्ययः द्रव्यं द्रव्यमितिप्रत्ययः , गुणत्वस्य स्वाश्रयेषु गुणेष्वात्मानुरूपः प्रत्ययो गुण इति प्रत्ययः कर्मत्वस्य स्वाश्रयेषु कर्मसु आत्मानुरूपः प्रत्ययः कर्मेतिप्रत्ययः , तस्य कर्तृत्वाद् भावद्रव्यत्वादीनां स्वाश्रयादिभ्यः परस्परतश्चार्थान्तरभाव :, तथा समवायस्यापि पञ्चसु पदार्थ ष्विहेति प्रत्ययदर्शनात् तेभ्यः पञ्चभ्यः पदार्थान्तरत्वम् ।
पृ. ७७८
समवायः १ द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यत्वगुण- ननु यद्येकः सह सम्बन्धैकत्वात् पदार्थसङ्करप्रसङ्ग स्वकर्मत्वादिविशेषणैः इति ।
न , आधाराधेय नियमात् ।
यद्यप्येकः समवायः सर्वत्र स्वतन्त्रः , तथाप्याधाराधेय नियमोऽस्ति ।
कथं द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वम् , गुणेष्वेव गुणत्वम् , कर्मस्वेव कर्मत्वमिति ।
एवमादि कस्मात् ? अन्वयव्यतिरेकदर्शनात् ।
इहेति समवाय निमित्तस्य ज्ञानस्यान्वयदर्शनात् सर्वत्रैकः समवाय इति गम्यते ।
द्रव्यत्वादिनिमित्तानां व्यतिरेकदर्शनात् प्रतिनियमो ज्ञायते ।
यथा कुण्डदघ्नोः संयोगैकत्वे भवत्याश्रयाश्रयिभावनियमः ।
तथा द्रव्यत्वादीनामपि समवायैकत्वेऽपि व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदादाधाराधेय नियम इति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रतीति ही है । एवं समवाय में
का कारण होने से समवाय भी एक अवान्तर भेद का ज्ञापक कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं होता है । अतः अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है ।
( प्र ० ) ( यदि अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला ) समवाय एक ही है , तो फिर द्रव्य गुण और कर्म इन तीनों में से प्रत्येक का द्रव्यत्वादि सभी विशेषों के साथ समवाय सम्बन्ध एक ही है , अतः द्रव्यादि में भी यह गुण हे या कर्म है इस प्रकार के अनियमित व्यवहार होने लगेंगे । ( उ ० ) समवाय को एक मान लेने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य नहीं होगा ( क्योंकि एक ही समवाय सम्बन्ध से ) कौन किसका आधार है और कौन किसका आधेय है ? ये दोनों नियमित हैं ।
विशदार्थ यह है कि द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में यद्यपि एक ही समवाय स्वतन्त्र रूप से है फिर भी इस सम्बन्ध से आधेय और आवार नियमित हैं । ( प्र ० ) सभी में समवाय के एक होने पर नियम ( क्यों कर है ? ) यतः द्रव्यों में ही द्रव्यत्व है ( गुणादि में नहीं ) गुणों में ही गुणत्व हे , एवं कर्मों में ही कर्मत्व है : ( प्र ० ) इस प्रकार का अवधारण किस हेतु से सिद्ध होता है ? ( उ ० ) प्रतीतियों के अन्वय और व्यतिरेक से ही उसकी सिद्धि होती है ।
( विशदार्थ यह है कि ) द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में एक ही समवाय है ' इसका हेतु है सभी अनुयोगियों में ' यह यहाँ है ' इस एक प्रकार की आकार की प्रतीतियों की सत्ता या अन्वय , इस अन्वय से ही समझते हैं कि समवाय अपने सभी आश्रयों में एक ही है । एवं ' गुणादि में द्रव्यत्व है ' इस प्रकार की प्रतीतियों के अभाव रूप व्यतिरेक से भी समझते हैं कि द्रव्यत्वादि समवाय सम्बन्ध से अपने द्रव्यादि आश्रयों में ही हैं , गुणादि में नहीं ।
जिस प्रकार कुण्ड और दधि दोनों में एक ही संयोग के रहते हुए भी आधार कुण्ड ही होता है दधि नहीं , एवं आधेय दधि ही होता है कुण्ड नहीं , उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी ( समवेत ) वस्तुओं का समवाय एक होने पर भी कथित संयोग की तरह अभिव्यक्त करनेवाले एवं अभिव्यक्त होनेवाले की विभिन्न शक्ति के कारण प्रत्येक समवेत वस्तुओं का आधार आधेय भाव नियमित होता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
किमयमेक आहोस्विदनेक इत्यत्राह - न च संयोगवन्नानात्वमिति । यथा संयोगो नाना नैवं समवायः । कुत इत्यत्राह - भाववल्लिङ्गाविशेषाद् विशेषलिङ्गाभावाच्च । यथा सत्सदितिज्ञानस्य लक्षणस्य सर्वत्राविशेषादवलक्षण्याद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च सर्वत्रको भावः , तद्वदितिप्रत्ययस्य लक्षणस्य सवत्रावैलक्षण्याद् भेदे प्रमाणाभावाच्च सर्वत्रैकः समवाय इति । उपसंहरति- तस्मादिति ।
चोदयदि - यद्येक इति । समवायस्यैकत्वे य एव द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिषु योगः , स एव गुणत्वस्य गुणेषु , कर्मत्वस्य च कर्मसु । तत्र यथा द्रव्यत्वस्य योगः पृथिव्यादिष्वस्तीति तेषां द्रव्यत्वम् , तथा तद्योगस्य गुणादिष्वपि सम्भवात् तेषामपि द्रव्यत्वम् । यथा च गुणत्वस्य योगो रूपादिष्वस्तीति रूपादीनां तथा, तद्योगस्य द्रव्यकर्मणोरपि भावात् तयोरपि गुणत्वं स्यात् । एवं च कर्मस्वपि पदार्थानां सङ्कीर्णता दर्शयितव्या । समाधत्ते - नेति । न च पदार्थानां सङ्कीर्णता , कुतः ? आधाराधेयनियमात् । न समवायसद्भावमात्रेण द्रव्यत्वम् , किन्तु द्रव्यसमवायाद् द्रव्यत्वम् , समवायश्च द्रव्ये एव न गुणकर्मसु अतो न तेषां द्रव्यत्वम् । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् । एतत्सङ्ग्रहवाक्यं विवृणोतियद्यप्येकः समवाय इत्यादिना । स्वतन्त्रः संयोगवत् सम्बन्धान्तरेण न वर्तत इत्यर्थः । व्यक्तमपरम् ।
पुनश्चोदयति - एवमादि कस्मादिति । द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं वर्तते , गुणेष्वेव गुणत्वम् , कर्मस्वेव कर्मत्वमित्येवमादि कस्मात् त्वया ज्ञातमित्यर्थः । उत्तरमाह - अन्वयव्यतिरेकदर्शनादिति । द्रव्यत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य द्रव्ये - cara यो गुणकर्मभ्यश्च व्यतिरेकः , गुणत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य गुणेष्वन्वयो द्रव्यकर्मभ्यश्च व्यतिरेकः , तथा कर्मत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य कर्मस्वन्वयो द्रव्यगुणेभ्यश्च व्यतिरेको दृश्यते , तस्मादन्वयव्यतिरेकदर्शनाद् द्रव्यत्वादीनां नियमो ज्ञायते । अस्य विवरणं सुगमम् । समवायाविशेषे कुत एवायं नियमो द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिष्वेव समवायो गुणत्वस्य रूपादिष्वेव कर्मत्वस्योत्क्षेपणादिष्वेव , नान्यत्र ? इत्यत आह - यथेति । संयोगस्यैकत्वेऽपि कुण्डदघ्नोराश्रयाश्रयिभावस्य नियमो दृष्टः , शक्तिनियमात् । कुण्डमेवाश्रयो दध्येवाश्रयि । एवं
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ६५ प्रत्ययों का कर्त्ता रूप कारण होते से जिस प्रकार सत्ता और द्रव्यत्वादि जातियों में से प्रत्येक में परस्पर एक दूसरे से भेद की सिद्धि होती है , एवं उनके द्रव्यादि आश्रय से भी उन जातियो में भेद की प्रतीति होती है , उसी प्रकार समवाय भी द्रव्य , गुण , कर्म , सामान्य और विशेष इन पांच पदार्थों में ' इह प्रत्यय ' का कर्त्ता रूप कारण है , अतः समवाय इन पाँचों पदार्थों से भिन्न पदार्थ है ।
इस प्रकार से सिद्ध समवाय रूप स्वतन्त्र पदार्थ एक है ? या अनेक ? इसी प्रश्न का उत्तर ' न च संयोगवन्नानात्वम् ' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् संयोग की तरह समवाय अनेक नहीं है । क्यों अनेक नहीं है ? इस प्रश्न का उत्तर ' भाववल्लि - ङ्गा विशेषालिङ्गाभावाच्च ' इन दोनों वाक्यों से दिया गया है । अर्थात् द्रव्य , गुण और कर्म इन तीनों में ' सत् ' इस आकार का ज्ञान रूप लिङ्ग अर्थात् लक्षण समान रहने से जिस प्रकार तीनों में रहनेवाली एक ही सत्ता जाति की सिद्धि होती है । एवं उन तीनों में रहनेवाली सत्ता जाति में परस्पर भेद के साधक किसी प्रमाण के उपलब्ध न होने से समझते हैं कि सत्ता जाति सर्वत्र एक ही है । उसी प्रकार द्रव्यादि पाँचों पदार्थों में कथित ' इह प्रत्यय ' रूप लक्षण समान रूप से है एवं प्रत्येक में रहनेवाले समवाय में परस्पर भेद का साधक कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है । अतः समझते हैं कि अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है । ' तस्मात् ' इत्यादि वाक्य के द्वारा इसी प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
' यद्येकः ' इत्यादि वाक्यों के द्वारा एक ही समवाय के मानने पर यह आक्षेप किया गया है कि यदि समवाय एक ही है तो यह मानना पड़ेगा कि पृथिवी प्रभृति द्रव्यों में द्रव्यत्व का जो समवाय है , वही समवाय गुणों में गुणत्व का भी है । एवं कर्मों में कर्मत्व का भी है ।
ऐसी स्थिति में जिस प्रकार पृथिव्यादि में द्रव्यत्व के समवाय रूप सम्बन्ध ( योग ) के कारण ( पृथिव्यादि में ) द्रव्यत्व की सत्ता रहती है , उसी प्रकार गुरगादि में भी द्रव्यत्व का समवाय रूप योग के कारण गुणादि में भी द्रव्यत्व की सत्ता माननी पड़ेगी । एवं जैसे कि रूपादि में गुणत्व के समवाय रूप योग के कारण गुणत्व की सत्ता रहती है उसी प्रकार द्रव्य में और कर्म में भी गुणत्व की सत्ता माननी पड़ेगी , क्योंकि उनमें भी गुणत्व का समवाय है ।
इसी प्रकार कर्मादि पदार्थों में भी द्रव्यत्व कर्मत्वादि का साङ्कर्य दिखलाया जा सकता है । ' न ' इत्यादि से इसी आक्षेप का समाधान करते हैं । अर्थात् समवाय को एक मानने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य दोष नहीं है , क्योंकि ( समवाय एक होने पर भी ) उसका आधाराधेयभाव नियमित है । गुणादि में द्रव्यत्व के समवाय के रहने से ही द्रव्यत्व की सत्ता नहीं मानी जा सकती , क्योंकि ( द्रव्यत्व की सत्ता का नियामक ) द्रव्यानुयोगिक समवाय है , केवल समवाय नहीं ।
( अतः गुणादि में केवल समवाय के रहने पर भी द्रव्यानुयोगिकत्वविशिष्ट समवाय के न रहने के कारण गुणादि में द्रव्यत्व की आपत्ति नहीं दी जा सकती ) इसी प्रकार द्रव्य में गुणकमादि के और कर्म में गुणद्रव्यादि के दिये गये साङ्कर्य दोष का भी परिहार करना चाहिए । ' यद्यप्येकः समवायः ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा उक्त अर्थ के बोक ( यद्येकः समवाय इत्यादि ) संक्षिप्त वाक्य का ही विवरण दिया गया है ।
समवाय ' स्वतन्त्र ' है अर्थात् संयोग की तरह किसी दूसरे सम्बन्ध के द्वारा अपने आश्रय में नहीं रहता है ( वह अपने स्वरूप से ही द्रव्यादि आश्रयों में रहता है ) । ( उक्त स्वपद वर्णन रूप भाष्य के ) और अंश स्पष्ट हैं । ' एवमादि कस्मात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । अर्थात् किस हेतु से तुमने ये सब बातें समझों कि द्रव्यत्व द्रव्यों में ही रहता है , गुणत्व गुणों में ही रहता है , एवं कर्मस्व क्रियाओं में ही रहता है ।
' अन्वयव्यतिरेकदर्शनात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । अभिप्राय यह है कि द्रव्यत्व के द्वारा उत्पन्न ( द्रव्यत्व विषयक ) प्रत्यय का ' अन्वय ' ( विशेष्यता सम्बन्ध से ) द्रव्यों में ही देखा जाता हैं , एवं द्रव्यत्व के उक्त प्रत्यय का ' व्यतिरेक ' भी गुणकर्मादि में देखा जाता है । इसी प्रकार गुणत्वजनित ( गुणत्वविषयक ) प्रतीति का अन्वय गुणो में ही देखा जाता है , और द्रव्यकर्मादि में गुणत्वविषयक उक्त प्रतीति का व्यतिरेक भी देखा जाता है ।
एवं कर्मत्व से होनेवाली ( कर्मत्व विषयक ) प्रतीति का अन्वय कर्मों में ही देखा जाता है , और उक्त प्रतीति का ब्यतिरेक भी द्रव्यगुणादि में देखा जाता है । इन अन्वयों और व्यतिरेकों के दर्शन से समझते हैं कि द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से द्रव्यत्वादि नियमित हैं | ( इहेति समवायनिमित्तस्य इत्यादि स्वपदवर्णन रूप भाष्य का ) अभिप्राय समझना सुगम है ।
द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यदि समवाय एक ही है तो फिर यह नियम किस प्रकार उपपन्न होगा कि ब्रव्यत्व का समवाय पृथिव्यादि द्रव्यों में ही रहे , एवं गुणत्व का समवाय रूपादि गुणों में ही रहे , एवं कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि कर्मों में ही रहे , पृथिव्यादि से अन्यत्र द्रव्यत्व का समवाय न रहे , एवं गुणत्व का समवाय रूपादि से अन्यत्र न रहे और कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि से भिन्न वस्तुओं में न रहे ।
पृ. ७८२
संयोगवदनित्यत्वं भाववद- सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपि न कारणत्वात् ।
यथा प्रमाणतः कारणानुपलब्धेर्नित्यो भाव इत्युक्तं तथा समवायोऽपीति ।
नास्य किञ्चित् कारणं प्रमाणत उप- लभ्यत इति ।
कया पुनर्वृच्या द्रव्यादिषु समवायो वर्तते ? न संयोगः सम्भवति , तस्य गुणत्वेन द्रव्याश्रितत्वात् ।
नापि समवायः , तस्यैकत्वात् ।
न चान्या वृत्तिरस्तीति ? न , तादात्म्यात् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रतियोगियों और अनुयोगियों के अनित्य होने पर भी संयोग की तरह समवाय अनित्य नहीं है , क्योंकि सत्ता जाति की तरह उसके भी कारण नहीं दीखते हैं । ( विशदार्थ यह है कि ) जिस प्रकार किसी भी प्रमाण से कारणों की उपलब्धि न होने से सत्ता जाति में नित्यत्व का व्यवहार होता है , उसी प्रकार समवाय में भी समझना चाहिए | ( प्र ० ) समवाय कौन से सम्बन्ध से अपने अनुयोगी में रहता है ? अपने आश्रय के साथ संयोग सम्बन्ध तो उसका हो नहीं सकता क्योंकि संयोग गुण है , अतः संयोग केवल द्रव्यों में ही रह सकता है । समवाय सम्बन्ध से भी समवाय नहीं रह सकता , क्योंकि समवाय एक है . संयोग और समवाय को छोड़कर कोई तीसरा सम्बन्ध नहीं है ( अतः समवाय है ही नहीं ) | ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है , क्योंकि समवाय स्वरूप ( तादात्म्य ) सम्बन्ध से ही
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
द्रव्यत्वादीनामाधाराधेयनियमो व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदात् । किमुक्तं स्यात् ? द्रव्यत्वाभिव्यञ्जिका शक्तिद्रव्याणामेव , तेन द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं समवैति नान्यत्रेति । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् ।
किं पुनरयमनित्य आहोस्विन्नित्यः ? इति संशये सत्याह- सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपीति । यथा सम्बन्धिनोरनित्यत्वे संयोगस्यानित्यत्वम् , न तथा समवायिनोरनित्यत्वे समवायस्यानित्यत्वं भाववदकारणत्वादिति । एतद् विवृणोति - यथेत्यादिना ।
युक्तो हि सम्बन्धिविनाशे संयोगस्य विनाशः , तदुत्पादे सम्बन्धिनोः समवायिकारणत्वात् । समवायस्य तु सम्बन्धिनौ न कारणम् , सम्बन्धिमात्रत्वात् । यथा न कारणं तथोपपादितम् । तस्मादेतस्य सम्बन्धिविनाशेऽप्यविनाशः , सत्तावदाश्रयान्तरेपि प्रत्यभिज्ञेयमानत्वात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इन्हीं प्रश्नों का समाधान ' यथा ' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् मटका और दही दोनों में संयोग बराबर है , फिर भी मटका ही दही का आश्रय कहलाता है , एवं दही आधेय ही कहलाता है । इस सार्वजनिक प्रतीति से जिस प्रकार उक्त एक ही संयोग से मटके में आश्रयत्व व्यवहार को उत्पन्न करने की एक शक्ति और दही में आधेयत्व व्यवहार की उससे भिन्न शक्ति की कल्पना की जाती है । उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यद्यपि एक ही समवाय है , फिर भी पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व की अभिव्यक्ति होती है , अन्यत्र नहीं । अतः पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति माननी पड़ती है एवं पृथिव्यादि में द्रव्यत्व ही अभिव्यक्त होता है , अतः पृथिव्यादि में ही अभिव्यक्त होने की शक्ति की वल्पना द्रव्यत्व में ही करनी पड़ती है । एवं गुणत्व की अभिव्यक्ति रूपादि में ही होती है , अतः गुणत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति रूपादि में ही माननी पड़ती है , अन्यत्र नहीं । एवं रूपादि में ही गुणत्व अभिव्यक्त होता है , अतः रूपादि में अभिव्यक्ति होने की शक्ति की कल्पना गुणत्व में करनी पड़ती है अन्य जातियों में नहीं । उपर्युक्त भाष्य की इस प्रकार से व्याख्या करनी चाहिए ।
यह समवाय नित्य है ? अथवा अनित्य ? इस संशय के उपस्थित होने पर ( उसकी निवृत्ति के लिए ) ' सम्बन्धनित्यत्वेऽपि ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जिस प्रकार संयोग के सम्बन्धियों ( अनुयोगी और प्रतियोगी ) के अनित्य होने पर संयोग भी अनित्य होता है , उसी प्रकार सम्बन्धियों के अनित्य होने पर समवाय अनित्य नहीं होता | क्योंकि भाव सत्ता जाति ) की तरह समवाय का भी कोई उत्पादक कारण नहीं है । ' यथा ' इत्यादि सन्दर्भ से उक्त भाष्य सन्दर्भ की ( स्वपदवर्णन रूप ) व्याख्या की गयी है ।
यह ठीक है कि सम्बन्धियों के विनाश से संयोग का विनाश हो , क्योंकि वे ही संयोग के समवायिकारण हैं । समवाय के अनुयोगी और प्रतियोगी तो उसके केवल सम्बन्धी हैं , उसके कारण नहीं ( अतः उनके विनाश से समवाय का विनाश संभव नहीं है ) । ये समवाय के कारण क्यों नहीं हैं ? इस प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं ।
अतः समवाय के सम्बन्धियों के विनष्ट होने पर भी समवाय का विनाश नहीं होता , क्योंकि जिस प्रकार सत्ता जाति के आश्रय के विनष्ट होने पर भी दूसरे आश्रयों में प्रतीति के कारण सत्ता जाति को अविनाशी मानना पड़ता है , उसी प्रकार समवाय के एक या दोनों आश्रयों के विनष्ट होने पर भी दूसरे सम्बन्धियों में समवाय की प्रतीति होती है , अतः उसे भी अविनाशी मानना आवश्यक है ।
पृ. ७८४
यथा द्रव्यगुणकर्मणां सदात्मकस्य भावस्य नान्यः सत्तायोगोऽस्ति ।
एवमविभागिनो वृत्यात्मकस्य समवायस्य नान्या वृत्तिरस्ति , तस्मात् स्वात्मवृत्तिः ।
अत एवातीन्द्रियः सत्ता-
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अपने सम्बन्धियों में रहता है । जैसे कि द्रव्य गुण और कर्म में सत्ता जाति के लिए दूसरे सत्तासम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है , इसी प्रकार एक ही स्वरूप के एवं सम्बन्धाभिन्न समवाय की सत्ता के लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है । अतः यह स्वरूप सम्बन्ध से ही रहता है । यतः प्रत्यक्ष होनेवाले पदार्थो में सत्तादि सामान्यों की तरह कोई अलग सम्बन्ध नहीं है , अतः समवाय का प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
किमसम्बद्ध एव समवायः सम्बन्धिनौ सम्बन्धयति ? सम्बद्धो वा ? न तावदसम्बद्धस्य सम्बन्धकत्वं युक्तम् , अतिप्रसङ्गात् । सम्बन्धश्चास्य न संयोगरूपः सम्भवति , तस्य द्रव्याश्रितत्वात् । नापि समवायः , एकत्वात् । न च संयोगसमवायाभ्यां वृत्त्यन्तरमस्ति । तत् कथमस्य वृत्तिरित्यत आहकया पुनर्वृत्त्या द्रव्यादिषु समवायो वर्तत इति । वृत्त्यभावान्न वर्तत इत्यभिप्रायः । समाधत्ते नेति । वृत्त्यभावान्न वर्तत इत्येतन्न , तादात्म्याद् वृत्त्यात्मकत्वात् स्वत एवायं वृत्तिरिति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' कया पुनर्वृत्त्या ' इत्यादि ग्रन्थ से आक्षेप करते हैं कि क्या समवाय अपने सम्बन्धियों में किसी दूसरे सम्बन्ध से न रह कर ही अपने दोनों सम्बन्धियों को परस्पर सम्बद्ध करता है ? अथवा अपने सम्बन्धियों में किसी अन्य सम्बन्ध से रहकर ही ( संयोग की तरह ) अपने सम्बन्धियों को सम्बद्ध करता है ? इन दोनों में ' सम्बन्धियों में न रहकर ही उन्हें परस्पर सम्बद्ध करता है ' यह पहिला पक्ष अति प्रसङ्ग के कारण ( अर्थात् पट और तन्तु की तरह कपास और पट एवं तन्तु और पट भी परस्पर सम्बद्ध हों इस आपत्ति के कारण असङ्गत है ) क्योंकि सर्वत्र समवाय की असत्ता समान है । समवाय का अपने सम्बन्धियों में रहने के लिए संयोग सम्बन्ध उपयोगी नहीं हो सकता , क्योंकि संयोग द्रव्यों में ही हो सकता है । समवाय भी उसके लिए पर्याप्त नहीं है , क्योंकि समवाय एक ही है । सम्बन्ध को ( सम्बन्धियों से भिन्न होना चाहिए , अतः एक ही समवाय सम्बन्ध और उसका प्रतियोगी दोनों नहीं हो सकता ) संयोग और समवाय को छोड़कर दूसरी कोई ' वृत्ति ' सम्बन्ध ) नहीं है , तो फिर कौन सो ' वृत्ति ' से समवाय की सत्ता द्रव्यादि में रहती है ? अर्थात् समवाय को रहने के लिए जब किसी सम्बन्ध की सम्भावना नहीं है तो समचाय है ही नहीं ।
पृ. ७८५
प्रत्यक्षेषु वृश्यभावात् , स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्च ।
तस्मादिह बुद्धयनुमेयः समवाय इति ।
समाप्तः ॥
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसके प्रत्यक्ष न होने का यह हेतु भी है कि ( संयोगादि की तरह अनुयोगी और प्रतियोगी से भिन्न रूप में इसका ) भान नहीं होता है । तस्मात् ' यह यहीं है ' इस कथित प्रतीति से समवाय का अनुमान ही होता है ।
प्रशस्तपादभाष्य में समवाय पदार्थ का
निरूपण समाप्त हुआ ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
कृतको हि संयोगस्तस्य वृत्त्यात्मकस्यापि वृत्यन्तरमस्ति , कारणसमवायस्य कार्यलक्षणत्वात् । समवायस्य वृत्त्यन्तरं नास्ति । तस्मादस्य स्वात्मना स्वरूपेणैव वृत्तिर्न वृत्त्यन्तरेणेत्यर्थः । अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यक्षेषु वृत्त्यभावात् । यथा सत्तादीनां प्रत्यक्षेष्वर्थेषु वृत्तिरस्ति तेन ते संयुक्तसमवायादिन्द्रियेषु गृह्यन्ते , नैवं समवायस्य वृत्तिसम्भवः । अतोऽतीन्द्रियोऽयम् , संयोगसमवायापेक्षस्यैवेन्द्रियस्य भावग्रहणसामर्थ्योपलम्भात् । यदि समवायविषयमैन्द्रियकं संवेदनमस्ति ? सम्बन्धाभावाभिधानं प्रलापः । अथ नास्ति , तदेव वाच्यमित्यत्राह - स्वात्मगत संवेदनाभावाच्चेति । यथेन्द्रियेण संयोगप्रतिभासो नैवं समवायप्रतिभासः , सम्बन्धिनो : पिण्डी भावोपलम्भात् , अतोऽयमप्रत्यक्षः । उपसंहरति-- तस्मादिति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( पूर्व पक्षी से ) ' पर ' अर्थात् सिद्धान्ती उक्त आक्षेप का समाधान ' न ' इत्यादि सन्दर्भ से करते हैं । अर्थात् द्रव्यादि में समवाय के रहने के लिए किसी सम्बन्ध की सम्भावना नहीं है , इससे समवाय द्रव्यादि में नहीं है सो बात नहीं । क्योंकि समवाय में ' सम्बन्ध ' का ' तादात्म्य ' है , अर्थात् वह स्वयं ' वृत्त्यात्मक ' है , फलतः समवाय स्वयं ही सम्बन्ध स्वरूप है ।
संयोग यतः उत्पत्तिशील वस्तु है , अतः सम्बन्धात्मक होने पर भी उसके रहने के लिए दूसरा सम्बन्ध आवश्यक है । क्योंकि उपादान में समवाय ही कार्य का स्वरूप है , अतः समवायिकारण रूप सम्बन्धियों में संयोग का समवाय रूप दूसरा सम्बन्ध न मानें तो संयोग समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न होनेवाला कार्य ही नहीं रह जाएगा । समवाय तो नित्य हैं , उसके लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं है । अतः समवाय स्वात्मक सम्बन्ध से ही फलतः स्वरूपसम्बन्ध से ही अपने सम्बन्धियों में रहता है , किसी दूसरे सम्बन्ध से नहीं ।
' अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यक्षेषु वृत्त्यभावात् ' अर्थात् प्रत्यक्ष दीखनेवाले घटादि विषयों के साथ सत्तादि पदार्थों का ( स्वभिन्न समवाय नाम की ) वृत्ति ( सम्बन्ध ) है , अतः संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष से उनका प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार समवाय का कोई भी स्वभिन्न एवं प्रत्यक्षप्रयोजक सम्बन्ध अपने सम्बन्धियों के साथ नहीं है , अतः समवाय अतीन्द्रिय है ।
क्योंकि संयोग और समवाय इन दोनों में से किसी एक की सहायता से ही इन्द्रियों में किसी भावपदार्थं को ग्रहण करने का सामर्थ्य है । ( प्र ० ) यदि समवाय का इन्द्रियों से
पृ. ७८६
योगाचारविभूत्या यस्तोषयित्वा महेश्वरम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — योग के अभ्यास से उत्पन्न अपनी विभूति के द्वारा उन्होंने महेश्वर को प्रसन्न कर वैशेषिकशास्त्र का निर्माण किया , उन कणाद ऋषि को मैं प्रणाम करता हूँ ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
परस्परोपसंश्लेषो भिन्नानां यत्कृतो भवेत् ।
समवायः स विज्ञेयः स्वातन्त्र्यप्रतिरोधकः ||
श्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां
समवायपदार्थः समाप्तः ॥
सुवर्णमयसंस्थानरम्या सर्वोत्तरस्थितिः ।
सुमेरोः शृङ्गवीथीव टीकेयं न्यायकन्दली ॥ १ ॥
अक्षीणनिजपक्षेषु ख्यापयन्ती गुणानसौ |
परप्रसिद्ध सिद्धान्तान् दलति न्यायकन्दली ॥ २ ॥
आसीद् दक्षिणराढायां द्विजानां भूरिकर्मणाम् ।
भूरिसृष्टिरिति ग्रामो भूरिश्रेष्ठिजनाश्रयः ॥ ३ ॥
अम्भोराशेरिवेतस्माद् बभूव क्षितिचन्द्रमाः ।
जगदानन्दनाद् वन्द्यो बृहस्पतिरिव द्विजः ॥ ४ ॥
तस्माद् विशुद्धगुणरत्नमहासमुद्रो विद्यालतासमवलम्बनभूरुहोऽभूत् ।
स्वच्छाशयो विविधकीत्तिनदी प्रवाहप्रस्पन्दनोत्तमबलो बलदेवनामा ॥ ५ ॥
तस्याभूद् भूरियशसो विशुद्धकुलसम्भवा ।
सच्छायः स्थूलफलदो बहुशाखो द्विजाश्रयः ।
तस्यां श्रीधर इत्युच्चैरथिकल्पद्रुमोऽभवत् ॥ ७ ॥
असौ विद्याविदग्धानामसूत श्रवणोचिताम् ।
षट्पदार्थहितामेतां रुचिरां न्यायकन्दलीम् ॥ ८ ॥
त्र्यधिकदशोत्तरनवशतशाकाब्दे न्यायकन्दली रचिता
श्री पाण्डुदायाचितभट्ट श्रीश्रीधरेणेयम् ।। ६ ।।
समाप्तेयं पदार्थप्रवेशन्याय कन्दली टीका |
समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ६६ ज्ञान होता है ? तो फिर यह कहना प्रलाप सा ही है कि अपने सम्बन्धियों के साथ उसका ( प्रत्यक्ष के उपयुक्त ) सम्बन्ध नहीं है । यदि इन्द्रियों से उसका ज्ञान नहीं होता है , तो फिर यही कहिए कि समवाय अतीन्द्रिय है । इसी प्रश्न के उत्तर में ' स्वात्मगत संवेदना भावाच्च ' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् जिस प्रकार इन्द्रियों से संयोग का ग्रहण होता है , उस प्रकार इन्द्रियों से समवाय का ग्रहण नहीं होता है , क्योंकि उसके दोनों सम्बन्धियों की उपलब्धि ऐक्यबद्ध होकर ही होती है ( अर्थात् सम्बन्धियों में समवाय की सत्त्व दशा में सम्बन्धियों की पृथक् से उपलब्धि नहीं होती है , किन्तु सम्बन्ध के प्रत्यक्ष के लिए उसके दोनों सम्बन्धियों का स्वतन्त्र रूप से प्रत्यक्ष होना आवश्यक है , सो प्रकृत में नहीं होता है ) , अतः समवाय अतीन्द्रिय है । ' तस्मात् ' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग का उपसंहार किया गया है ।
अपने सम्बन्धियों के स्वातन्त्र्य को अपहरण करनेवाला वही सम्बन्ध ' समवाय ' कहलाता है , जिससे परस्पर भिन्न दो वस्तुओं का परस्पर अति नैकट्य का सम्पादन हो ।
भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित और पदार्थ को समझानेवाली न्यायकन्दली
टीका का समवाय निरूपण समाप्त हुआ ।
10+
realhea गुणा गुणिनो गृहमेधिनी ॥ ६ ॥
( १ ) यह ' न्याय कन्दली ' टीका सुमेरु के शृङ्गों की पङ्क्तियों की तरह मनोरम है , क्योंकि सुमेरु के शृङ्ग भी सुवर्ण ( हिरण्य ) के संस्थानों से रचित होने के कारण रमणीय हैं । यह टीका भी सुवर्णों अर्थात् सुन्दर अक्षरों के विन्यास से रचित होने के कारण अति रमणीय है । सुमेरु का शृङ्ग भी सभी वस्तुओं की अपेक्षा उत्तर दिशा में रहने के कारण ' सर्वोत्तर स्थिति ' है । यह टीका भी ( प्रशस्तपाद भाष्य की ) अन्य टीकाओं से उत्कृष्ट होने के कारण ' सर्वोत्तरस्थिति ' अर्थात् सर्वातिशायिनी है ।
( २ ) इस टीका का नाम ' न्यायकन्दली ' इस लिए है कि इसमें कथित न्याय अपने सिद्धान्तों की पूर्ण रक्षा और विरोधी सिद्धान्तों का सम्यक् रूप से ' दलन ' करते हैं ।
( ३ ) राढ़ देश के दक्षिण भाग में ' भूरिसृष्टि ' नाम का एक गाँव था , जिसमें अनेक सत्कर्मों के अनुष्ठान करनेवाले ब्राह्मणों का एवं अनेक सेठों का निवास था ।
( ४ ) इसी गाँव में पृथ्वीतल के चन्द्रमा स्वरूप एवं बृहस्पति के समान ( बुद्धिमानू ) एक द्विज उत्पन्न हुए जो समुद्र से उत्पन्न आकाश के चन्द्रमा की तरह विश्व के सभी प्राणियों को सुख देने के कारण सभी के वन्दनीय थे ।
( ५ ) उन्हीं से अनेक प्रकार के यशों की नदी के सतत गतिशील प्रवाह से प्राप्त उत्कृष्ट बल से युक्त ( होने के कारण ) अन्वर्थ नाम के निर्मल अन्तःकरणवाले ' बलदेव ' उत्पन्न हुए , जो विद्या रूपी लता के आश्रयीभूत वृक्ष के समान एवं विशुद्ध अनेक सद्गुण रूपी रत्नों के ( आकर ) महासमुद्र के समान थे ।
( ६ ) अत्यन्त यशस्वी और गुणी उन्हीं ( बलदेव ) की अत्यन्त कुलीना , गुणानुरागिणी एवं गृहकार्यदक्षा ' अब्बोका ' नाम की पत्नी थीं ।
( ७ ) उन्हीं से ' श्रीधर ' उत्पन्न हुए जो ( इन सादृश्यों के कारण ) अर्थियों के लिए कल्पवृक्ष के समान थे । क्योंकि कल्पवृक्ष भी अपनी घनी छाया से अर्थियों के ताप को दूर करता है । इनसे भी अर्थियों के अनेक विघ्न ताप दूर होते थे । कल्पवृक्ष भी बहुत बड़े फल का दाता है , इनसे भी मोक्ष रूप महान् ( उपदेशादि के द्वारा ) फल प्राप्त होता था । कल्पवृक्ष की भी अनेक शाखायें हैं । उनके भी शिष्य प्रशिष्य की अनेक शाखायें थीं । कल्पवृक्ष भी अनेक द्विजों ( पक्षियों ) का आश्रय है , ये भी अनेक द्विजातियों के आश्रय थे ।
( ८ ) उन्हीं के द्वारा तत्त्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली और विद्याप्रेमियों के सुनने योग्य यह अतिरमणीय ' न्यायकन्दली ' टीका रची गयी ।
( 8 ) श्री पाण्डुदास कायस्थ की प्रार्थना ( से प्रेरित होकर ) भट्ट श्री श्रीधर ने ६ ९ ३ शकाब्द में ' न्यायकन्दली ' की रचना की ।
षट् पदार्थों के तत्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली न्यायकन्दली टीका
समाप्त हुई ||
पृ. ७८६
चक्रे वैशेषिकं शास्त्रं तस्मै कणभुजे नमः ॥
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रशस्तपाद के द्वारा रचित छः पदार्थों के प्रतिपादक वैशेषिक सूत्रों का यह
पृ. ७८६
पदार्थभाष्यं समाप्तम् ॥
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — भाष्य समाप्त हुआ ।
In English
Explanation of Universals and Particulars
This text explains the concepts of 'samanya' (universal) and 'vishesha' (particular) through the commentary of Nyayakandali on Prashastapada's Bhashya. It distinguishes between universals, which exist across many objects to provide a consistent perception, and particulars, which belong to a single specific object.
This article answers
- Definition of samanya and vishesha in nyaya philosophy?
- Difference between universal and particular in sanskrit logic?
- How is sattva or existence considered a universal?
- Explanation of anuvritti pratya in nyaya?