श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य

प्रशस्तपादभाष्य — गुण: स्मृति से शब्द तक

36 मूल पद्य

स्मृतिनिरूपणम्

पृ. ६२५

भाष्य २२२

लिङ्गदर्शनेच्छानुस्मरणाद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगविशेषात् पट्वाभ्यासादर प्रत्ययजनिताच्च संस्काराद् दृष्टश्रुतानुभूतेष्व- शेषानुव्यवसायेच्छानुस्मरण द्वेषहेतु रतीत विषया स्मृतिरिति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६२५प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 700

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — लिङ्ग ( हेतु ) के दर्शन एवं इच्छा , स्मृति प्रभृति ( उद्बोधकों ) से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के विशेष प्रकार के संयोग और संस्कार इन दोनों से उत्पन्न ज्ञान ही स्मृति है । यह प्रत्यक्ष , अनुमिति एवं शाब्दबोध के द्वारा ज्ञात विषयों की होती है , अतः स्मृति अतीत विषयक ही होती है । ( स्मृतिजनक उक्त संस्कार ) अत्यन्तस्फुटज्ञान , अभ्यास और आदर से उत्पन्न होता है । वह ( स्मृति रूप ज्ञान ) अनुमिति , इच्छा , स्मृति और द्वेष का ( उत्पादक ) कारण है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

स्मृतिलक्षणां विद्यामाचष्टे – लिङ्गदर्शनेच्छेत्यादिना । लिङ्गदर्शनं चेच्छा . नुस्मरणं च । आदिशब्देन न्यायसूत्रोक्तानि प्रणिधानादीनि संगृह्यन्ते , तान्यपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगविशेषादिति स्मृतिकारणकथनम् । आत्ममन : - संयोगस्य च लिङ्गदर्शनादिसहकारितैव विशेषः , केवलादस्मात् स्मरणानुत्पत्तेः । लिङ्गदर्शनवत् संस्कारोऽपि स्मृतेनिमित्तकारणमित्याह - पट्वाभ्यासादरप्रत्ययजनितात् संस्काराज्जायते पटुप्रत्ययः स्फुटतरप्रत्ययस्तस्मात् संस्कारो जायते । तेन गच्छत्तृणसंस्पर्शज्ञानात् क्वचित् पटुप्रत्ययोत्पादेऽपि ग्रहणयोग्यः संस्कारो न भवति । यथा साक्षात् पठितेऽनुवाके । तेन गृहीतस्यावृत्त्या - पुनः पुनर्ग्रहणलक्षणोऽभ्यासः संस्कारकारणम् , तस्मिन् सत्यनुवाकस्य ग्रहणदर्शनात् । क्वचिच्चात्यन्ताश्चर्यतरे वस्तुनि सकृदुपलब्धे कालान्तरे स्मृतिदर्शनादादरग्रहणमपि संस्कारनिमित्तम् । दृष्टश्रुतानुभूतेष्विति विषयसङ्कीर्तनं कृतम् ।

दृष्टेष्विति प्रत्यक्षीकृतेषु श्रुतेष्विति शब्दावगतेषु , अनुभूतेष्वनुमितेष्वित्यर्थः । शेषानुव्यवसायेच्छास्मरणद्वेषहेतुरिति कार्यनिरूपणम् । शिष्यते परिशिष्यते इति ' शेष ' | ' अनु ' पश्चाद् व्यवसितिः व्यवसायः । शेषश्चासावनुव्यवसायश्चेति शेषानुव्यवसायः , प्रथमोपजातलिङ्गज्ञानापेक्षया तदनन्तर्भा व्यनुमेयज्ञानम् , तस्य हेतुर्व्याप्तिस्मरणम् । सुखसाधनत्वस्मृतिरिच्छाहेतुः । प्रथमपदस्मृतिद्वितीयपदानुस्मरणहेतुः । दुःखसाधकस्मरणं द्वेषहेतुः । तदित्येव स्मृतेराकारः , तत्र चार्थस्यातीतत्वं पूर्वानुभूतत्वं प्रतीयत इत्यतीतविषया स्मृतिः । अत एव न प्रमाणम् , तस्याः पूर्वानुभवविषयत्वोपदर्शनेनार्थं निश्चिन्वत्या अर्थ परिच्छेदे पूर्वानुभवपारतन्त्र्यात् । अनुमानज्ञानं तत्पत्तौ परापेक्षम् , स्वविषये स्वतन्त्रमेव , स्मृतिरिव । तस्मात् पूर्वानुभवानुसन्धानेनार्थप्रतीत्यभावात् । यथाहुस्तन्त्रटीकायां सर्वोत्तरबुद्धयो गुरव : --

पूर्वविज्ञानविषयं विज्ञानं स्मृतिरिष्यते ।

पूर्वज्ञानाद् विना तस्याः प्रामाण्यं नावगम्यते ।। इति ।

यथा चेदमाहुः कारिकायाम्-

तत्र यत् पूर्व विज्ञानं तस्य प्रामाण्यमिष्यते ।

तदुपस्थानमात्रेण स्मृतेश्च चरितार्थता ॥ इति ।

ये त्वनर्थजत्वात् स्मृतेरप्रामाण्यमाहुः तेषामतीतानागतविषयस्यानुमानस्याप्रामाण्यं स्यादिति दूषणम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' लिङ्गदर्शनेच्छा ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा स्मृति ' रूप विद्या ( प्रमा ) का निरूपण करते हैं । ( उक्त वाक्य में प्रयुक्त ' लिङ्गदर्शनेच्छानुस्मरण ' शब्द से ) लिङ्गदर्शन , इच्छा च , अनुस्मरणव ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार , लिङ्गज्ञान , इच्छा और बार बार स्मरण को , एवं उक्त वाक्य में ही प्रयुक्त ' आदि ' शब्द से न्यायसूत्र ( अ ० ३ आ ० २ सू ० ४४ ) में कथित स्मृति के प्रणिधानादि कारणों को संगृहीत समझना चाहिए ।

' तान्यपेक्षमाणादात्ममनसो संयोगविशेषात् ' इस पूर्वानुवृत्तिवाक्य से स्पृति का कारण प्रदर्शित हुआ है | आत्मा और मन के संयोग को स्मृति के उत्पादन में जो कथित ' प्रणिधानादि ' सहायकों की अपेक्षा होती है , वही उस संयोग का ' विशेष ' है ( जो प्रकृत वाक्य में प्रयुक्त ' संयोगविशेष ' शब्द के द्वारा व्यक्त किया गया है ) । क्योंकि ( प्रणिधानादि के न रहने पर ) केवल आत्मा और मन के संयोग से स्मृति की उत्पत्ति नहीं होती है ।

‘ पट्वाभ्यासाद र प्रत्ययजनितात् संस्कारात् ' इस वाक्य के द्वारा लिङ्गदर्शन की तरह संस्कार में भी स्मृति की निमित्तकारणता कही गयी है । ' पटुप्रत्यय ' शब्द का अर्थ है स्फुटतर ( उपेक्षान्य ) प्रत्यय , उससे हो संस्कार को उत्पत्ति होती है । ' पटुप्रत्यय ' शब्द का स्फुटतर प्रत्यय रूप अर्थ इसलिए कर दिया गया है कि राह चलते हुए पुरुष को किसी तृण के स्पर्श का यद्यपि पटुप्रत्यय होता है , फिर भी उससे स्मृति के उत्पादन में क्षम

GT संस्कार को उत्पत्ति नहीं होती है । जैसे कि पढ़े हुए भी अनुवाक के अध्ययन से स्मृतिक्षम संस्कार की उत्पत्ति होती है । इसकी पटुप्रत्यय की ' आवृत्ति ' अर्थात् बार बार ग्रहणरूप ' अभ्यास ' भी संस्कार का कारण है , क्योंकि अभ्यास के रहने पर ही अनुवाक का स्मरण होता है । किसी अत्यन्न अद्भुत वस्तु को एक बार देखने पर बहुत समय बाद भी उसकी स्मृति होती है , अतः ' आदरपूर्वक ग्रहण ' भी संस्कार का कारण है । किन प्रकार की वस्तुओं की स्मृति होती है ?

इस प्रश्न का उत्तर ' दृष्टानुभूतेषु ' इस वाक्य के द्वार दिया गया है । ' दृष्टेषु ' अर्थात् प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात वस्तुओं की , ' श्रुतेषु ' अर्थात् शब्द प्रमाण के द्वारा ज्ञात विषयों की ' अनुभूतेषु ' अर्थात् अनुमान प्रमाण के द्वारा ज्ञात विषयों की स्मृति उत्पन्न होती है , ' शेषानुव्यवसायेच्छास्मरणद्वेषहेतु : ' इस वाक्य के द्वारा स्मृति से होनेवाले कार्य दिखलाये गये हैं । प्रकृत ' शेष ' शब्द ' शिष्यते परिशिष्यते इति शेष : ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न है ।

एवं प्रकृत ' अनुव्यवसाय ' शब्द ' अनु पश्चात् व्यवसितिरनुव्यवसाय : ' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न है । एवं शेषानुव्यवसाय ' शब्द ' शेषश्चानुव्यवसायश्च ' इस ( कर्मधारय ) समास से बना है ।

फलतः प्रकृत में ' शेष ' और ' अनुव्यवसाय ' ये दोनों शब्द एक ही अर्थ के बोधक 1 वह अर्थ है ) अनुमेय का ज्ञान ( अनुमिति ) , क्योंकि ( अनुमिति के लिए प्रथम लिङ्गदर्शन से जो ज्ञानों की परम्परा है उसमें ) उक्त प्रथम लिङ्ग की अपेक्षा अनुमेयज्ञान अर्थात् साध्य का ज्ञान ही ' शेष ' है अर्थात् अन्तिम हैं , एवं वह ' अनुव्यवसाय ' भी है , क्योंकि लिङ्गज्ञान रूप व्यवसाय के बाद उत्पन्न होता है ।

इस प्रकार शेषानुव्यवसाय भी अर्थात् अनुमिति भी स्मृति का कार्य हैं , क्योंकि उक्त शेषानुव्यवसाय की उत्पत्ति व्याप्ति की स्मृति से होती है । किसी भी वस्तु में ' इससे सुख होगा ' इस प्रकार की स्मृति के रहने पर उस विषय की इच्छा उत्पन्न होती है , अतः स्मृति इच्छा का भी कारण है ।

आर्षज्ञानम्

पृ. ६२७

भाष्य २२३

आम्नाय विधातृणामृषीणामतीतानागतवर्तमानेष्वतीन्द्रियेष्वर्थेषु धर्मादिषु ग्रन्योपनिबद्धेष्वनुपनिबद्धेषु चात्ममनसोः संयोगाद् धर्मविशेषाच्च यत् प्रातिभं यथार्थनिवेदनं ज्ञानमुत्पद्यते तदार्ष - मित्याचक्षते ।

तत् तु प्रस्तारेण देवर्षीणाम् , कदाचिदेव लौकिकानाम् , यथा कन्यका ब्रवीति ' श्वो मे भ्राताऽऽगन्तेति हृदयं मे कथयति ' इति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६२७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 702

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वेदों की रचना करनेवाले महर्षियों को उनके विशेष प्रकार के पुण्य से आगमग्रन्थों में कहे हुए या उनमें न कहे हुए भूत , भविष्य और वर्तमान ( तीनों कालों में से किसी में भी रहनेवाले ) अतीन्द्रिय धर्मादिविषयक एवं उनके स्वरूप के परिचायक जो ' प्रातिभ ' ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ' आर्ष ' कहते हैं । यह प्रायः देवताओं और महर्षियों को ही होता है । कदाचित् ही साधारण जन को यह ज्ञान होता है । जैसे कि बालिका कहती है कि , मेरा मन कहता है कि ' कल मेरे भाई आयेंगे ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

आर्ष व्याचष्टे -- आम्नायविधातृणामिति । आम्नायो वेदस्तस्य विधातारः कर्तारो ये ऋषयस्तेषामतीतेष्वनागतेषु वर्तमानेष्वतीन्द्रियेषु धर्माधदिक्कालप्रभृतिषु ग्रन्थोपनिबद्धेष्वागमप्रतिपादितेष्वनुपनिबद्धेष्वागमाप्रतिपादितेषु चात्ममनसोः संयोगाद् यत् प्रातिभं ज्ञानं यथार्थनिवेदनं यथास्वरूपसंवेदनं संशयविपर्ययरहितं ज्ञानमुत्पद्यते तदार्षमित्याचक्षते विद्वांसः । इन्द्रियलिङ्गाद्यभावे यदर्थप्रतिभानं सा प्रतिभा , प्रतिभैव प्रातिभमित्युच्यते तत्र भवद्भिः । तस्योत्पत्तिरनुपपन्ना कारणाभावादित्यतु ( प ) योगे सति इदमुक्तम् - धर्मविशेषादिति ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — एक वाक्य में प्रयुक्त एक पद की स्मृति से उसी वाक्य में प्रयुक्त दूसरे पद की ' पश्चात् स्मृति ' की उत्पत्ति होती है , इस प्रकार स्मृति अनुस्मरण ' का भी कारण है । दुःख देनेवाली किसी वस्तु का स्मरण उस वस्तु में ' द्वेष ' का भी कारण है । ' वह था ' स्मृति का यही आकार होता है । इस आकार से स्मृति के विषय का अतीत होना और पहिले से अनुभूत होना लक्षित होता है , अतः भाष्यकार ने स्मृति को ' अतीतविषया ' कहा है । यही कारण है कि स्मृति को प्रमाण नहीं माना जाता , क्योंकि वह पूर्व में अनुभूत विषय को हो पुनः निश्चित करती है , अतः स्मृति अपने विषय को निश्चित करने में अपने कारण पूर्वानुभव के अधीन है । यद्यपि अनुमिति भी अपनी उत्पत्ति के लिए परामर्शादि दूसरे ज्ञानों के अधीन है । किन्तु साध्य रूप अपने असाधारण विषय के ज्ञापन में उसे किसी दूसरे की अपेक्षा नहीं है ( अतः अनुमान उत्पत्ति में परापेक्ष होने पर भी ज्ञप्ति में परापेक्ष नहीं है , अतः वह प्रमाण है ) क्योंकि अनुमिति से साध्य की प्रतीति में स्मृति की तरह किसी ( स्वविषयविषयक ) पूर्वानुभव की अपेक्षा नहीं है । जैसा कि तन्त्रटीका में लोकोत्तरबुद्धिमान् गुरु ने कहा है कि-

' जिस विज्ञान में पूर्वानुभव का विषय ही विषय हो उसी विज्ञान को ' स्मृति ' कहते हैं , उस पहिले ज्ञान के प्रामाण्य के बिना स्मृति प्रमाण नहीं होती । उन्होंने ही ( लोकवार्तिक में इस प्रसङ्ग में ) कहा है कि ' कारणीभूत पूर्वानुभव में जो प्रामाण्य है , उसी का व्यवहार स्मृति से होता है , स्मृति का इतना ही काम है कि अपने कारणीभूत पूर्व विज्ञान के विषय को उपस्थित कर दे ।

जो सम्प्रदाय स्मृति को इस हेतु से अप्रमाण मानते हैं कि वह अर्थ जनित नहीं है ( अर्थात् उसके अव्यवहित पूर्वक्षण में विषय की सत्ता नहीं रहती है , अतः वह प्रमाण नहीं है ) उनके मत में भूत और भविष्य विषयक अनुमान में अप्रामाण्य रूप दोष होगा ।

' आम्नायविधातॄणाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' आ ' विद्या की व्याख्या करते हैं ! वेदों को ' आम्नाय ' कहते हैं । उसके जो ' विघ । तागण ' अर्थात् रचना करनेवाले ऋषि लोग , उन्हें अतीत , अनागत और वर्त्तमान काल के ' अतीन्द्रिय ' वस्तुओं का अर्थात् धर्म , अधर्म एवं दिशा और काल प्रभृति पदार्थों का , एवं ' ग्रन्थोपनिबद्ध ' अर्थात् आगमों के द्वारा कथित , एवं ' ग्रन्थानुपनिवद्ध ' अर्थात् आगम के द्वारा अप्रतिपादित अर्थों का जो आत्मा और मन के संयोग से ' प्रातिभ ' ' यथार्थनिवेदन ' रूप अर्थात् संशय और विपर्यय से भिन्न विषयानुरूप ज्ञान उत्पन्न होता है , उसे विद्वान् लोग ' आर्ष ' कहते हैं । इन्द्रिय एवं हेतु प्रभृति यथार्थज्ञान के साधनों के न रहते हुए भी जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ' प्रतिभा ' कहते हैं । इस ' प्रतिभा ' को ही आदरणीय विद्वद्गण ' प्रातिभ ' कहते हैं ।

सिद्धदर्शनम्

पृ. ६२९

भाष्य २२४

सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम् , कस्मात् १ प्रयत्नपूर्वकमञ्जनपादलेपखङ्गगुलिकादिसिद्धानां सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टेष्वर्थेषु यद् दर्शनं तत् प्रत्यक्षमेव ।

अथ दिव्यान्तरिक्षभौमानां प्राणिनां ग्रहनक्षत्र सञ्चारादिनिमित्तं धर्माधर्मविपाकदर्शनमिष्टम् , तदप्यनुमानमेव ।

अथ लिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनमिष्टं तदपि प्रत्यक्षायोरन्तरस्मिन्नन्तर्भूतमित्येवं बुद्धिरिति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६२९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 704

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( सिद्धजनों के अस्मदादि से विलक्षण ज्ञान रूप ) ' सिद्धदर्शन ' नाम का कोई ( प्रत्यक्ष और अनुमिति से ) भिन्न ज्ञान नहीं है , क्योंकि यत्नपूर्वक ( विशेष प्रकार के ) स्नान , पैर में विशेष प्रकार के लेप , खड्ग गुलिका ( आदि पद से मण्डूकवशाञ्जन ) से ( विशेषदर्शन का सामर्थ्य रूप ) सिद्धि से युक्त पुरुषों को सूक्ष्म , व्यवहित एवं अत्यन्त दूर की वस्तुओं का जो ( अस्मदादिविलक्षण ) ज्ञान उत्पन्न होता है वह प्रत्यक्ष ही है । दिव्यलोक , अन्तरिक्षलोक तथा भूलोक में रहनेवाले प्राणियों को ग्रहों और नक्षत्रों की विशेष प्रकार की गति देखकर जो धर्म , अधर्म और उनके परिणामों का ( अस्मदादि से विलक्षण ) ज्ञान होता है , उसे भी यदि सिद्धदर्शन कहना इष्ट हो तो वह भी वस्तुतः अनुमान ही है । यदि हेतु की अपेक्षा के बिना ही धर्म ( अधर्म एवं इनके परिणामों ) का ज्ञान मानें ( तो वे यह अनुमान नहीं होंगे ) फिर भी प्रत्यक्ष या आर्षज्ञान में अन्तर्भूत हो जाऐंगे । इस प्रकार विद्यारूप बुद्धि ( मूलतः चार प्रकार की ही ) है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

विशिष्यते इति विशेषः , धर्म एव विशेषो धर्मविशेषः , विद्यातपः समाधिजः प्रकृष्टो धर्मस्तस्मात् प्रतिभोदयः । तत्तु प्रस्तारेण बाहुल्येन देवर्षीणां भवति , कदाचिदेव लौकिकानामपि । यथा कन्यका ब्रवीति — श्वो मे भ्राताऽऽगन्तेति हृदयं मे कथयतीति । न चेदं संशयः , उभयकोटिसंस्पर्शाभावात् । न च विपर्यय :, संवादादतः प्रमाणमेव ।

सिद्धदर्शनमपि विद्यान्तरमिति केचिदिच्छन्ति तन्निवृत्त्यर्थमाह - सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम् । एतदेवोपपादयति — कस्मादित्यादिना । प्रयत्नपूर्वकमञ्जनपादलेपादिसिद्धानां दृश्यानां दर्शनयोग्यानां स्वरूपवतां पदार्थानां द्रष्टारो ये ते ' सिद्धाः ' उच्यन्ते । तेषां दृश्यद्रष्टृ णामञ्जनादिसिद्धानां सूक्ष्मेषु व्यवहितेषु विप्रकृष्टेषु यद् दर्शनमिन्द्रियाधीनानुभवस्तंत् प्रत्यक्षमेव । अथ दिव्यान्तरिक्ष भौमानां प्राणिनां ग्रहनक्षत्र सञ्चारनिमित्तं धर्माधर्मविपाकदर्शनं सिद्धज्ञानमिष्टं तदप्यनुमानमेव , ग्रहसश्वारादीनां लिङ्गत्वात् । अथ लिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनमिष्टं तत् प्रत्यक्षार्षयोरन्यतरस्मिन्नन्तर्भूतम् । यदि धर्मादिदर्श . नमिन्द्रियजं तदा प्रत्यक्षम् । अथेन्द्रियानपेक्षं तदार्षमित्यर्थः । उपसंहरति — एवं बुद्ध । एवमनन्तरोक्तेन क्रमेण । बुद्धिरिति बुद्धिर्व्याख्यातेत्यर्थः । इतिशब्दः परिसमाप्ति सूचयति ।

बुद्धिकार्यत्वात् सुखं बुद्धयनन्तरं व्याचष्टे - - अनुग्रहलक्षणं सुखमिति । अनुगृह्यतेऽनेनेत्यनुग्रहः , अनुग्रहलक्षणमनुग्रहस्वभावमित्यर्थः ह्यनुकूल . । सुखं स्वभावतया स्वविषयमनुभवं कुर्वन् पुरुषान्तरमनुगृह्णाति । एतदेव व्याचष्टेगादीति । त्रचन्दनवनितादयो येऽभिप्रेता विषयास्तेषां सान्निध्ये सति सन्निकर्षे सतीष्टोपलब्धीन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् धर्माद्यपेक्षादि यदुत्पद्यते तत् सुखम् । सन्निहितेऽप्यभिमतेऽर्थे विषयान्तरव्यासक्तस्य सुखानुत्पादादिष्टोपलब्धेः कारणत्वं गम्यते ।

वियुक्तस्य सुखाभावाद् विषयसन्निकर्षस्यापि कारणत्वावगमः । धर्मादीत्यादिपदेन स्वस्थतादिपरिग्रहः । अनुग्रहाभिष्वङ्गनयनादिप्रसादजनकमिति कार्योपवर्णनम् । अनुग्रहः सुखविषयं संवेदनम् । अभिष्वङ्गोऽनुरागः , नयनादि - प्रसादो वैमल्यम् | आदिशब्दान्मुख प्रसादस्य ग्रहणम् । एतेषां सुखं जनकम् । सुखेनोत्पन्नेन स्वानुभवो जन्यते स एवात्मनोऽनुग्रहः , सुखे चोपजाते मुखादीनां प्रसन्नता स्यात् । सुखसाधनेष्वनुरागः सुखाद् भवति ।

अतीतेषु स्मृतिजम् अतीतेषु सुखसाधनेष्वनुभूतेषु सुखं पूर्वानुस्मरणाद् भवति । अनागतेष्विदं मे भविष्यतीति सङ्कल्पाज्जायते । यत्तु विदुषामात्मज्ञानवतामसत्सु विषयानुस्मरणसङ्कल्पेव्वसति विषयेऽसति चानुस्मरणे असति च सङ्कल्पे चाविर्भवति तद् विद्याशमसन्तोषधर्म विशेषनिमित्तमिति । विद्या आत्मज्ञानम् , शमो जितेन्द्रियत्वम् , सन्तोषो देहस्थितिहेतुमात्रातिरिक्तानभिकाङ्क्षित्वम् , धर्मविशेषः प्रकृष्टो धर्मो निवर्तकलक्षणः , एतच्चतुष्टयनिमित्तम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इस प्रसङ्ग में कोई आक्षेप कर सकता है कि ( यदि इन्द्रिय या लिङ्ग उसका कारण नहीं है तो फिर ) कारण के न रहने से उसकी आपत्ति ही सम्भव नहीं है ? इसी आक्षेप का समाधान ' धर्मविशेषात् ' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । ' विशिष्यते इति विशेषः , धर्म एव विशेषः धर्मविशेष : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विद्या , तपस्या और समाधि से उत्पन्न प्रकृष्टधर्म ही उक्त ' धर्मविशेष ' शब्द का अर्थ है | इस प्रकृष्टधर्म से ही प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति होती है । तत्तु प्रस्तारेण ' अर्थात् यह प्रातिभ ज्ञान ' प्रस्तार ' से अर्थात् अधिकतर देवषियों को ही होता है । लौकिकव्यक्तियों ( साधारण मनुष्यों ) को कदाचित् ही होता है । जैसे कि कभी कोई बालिका कहती है कि ' मेरा मन कहता है , कल मेरे भैया आयेंगे ' यह ज्ञान संशय रूप नहीं है , क्योंकि इसमें उभयकोटि का सम्बन्ध नहीं है । यह विपर्यय भी नहीं है , क्योंकि इस ज्ञान के अनुसार काम देखा जाता है ।

किसी सम्प्रदाय के लोग ' सिद्धदर्शन ' नाम का एक अलग प्रमाज्ञान मानते हैं , उन लोगों के मत का खण्डन ही ' सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम् ' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । ' कस्मात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी का विवरण देते हैं । ' प्रयत्नपूर्वक्रमञ्जनपादलेपादिसिद्धानाम् ' इत्यादि सन्दर्भ में प्रयुक्त ' दृश्यद्रष्टृणाम् ' इस पद की यह व्युत्पति है कि ' दृश्यानाम् ये द्रष्टारः तेषां दृश्यद्रष्टृणाम् ।

इस व्यत्पत्ति के अनुसार देखने योग्य ( घटादि स्थूल ) वस्तुओं के देखनेवाले पुरुष ही उक्त ' दृश्यद्रष्टृ ' शब्द से अभिप्रेत हैं । वे ही जब प्रयत्नपूर्वक ( मण्डूकवशाञ्जन , पादलेपादि के द्वारा ) विशेष सामर्थ्य रूप ' सिद्धि ' को प्राप्त करते हैं , तो वे ' सिद्ध ' कहलाते हैं ।

उन्हें भी जो अत्यन्त सूक्ष्म , या दीवाल प्रभृति से घिरे हुए या अतिदूर के वस्तुओं का इन्द्रियों से अनुभव होता है वह तो ' प्रत्यक्ष ' ही है , यदि ' सिद्धदर्शन ' शब्द से धर्म , अधमं और उनके विपाकों के वे ज्ञान ही अभीष्ट हों , जो दिव्यलोक में , अन्तरिक्षलोक में या भूमि में रहनेवाले सिद्धों को ग्रहसश्वारादि को समझकर होता है , तो फिर ये सिद्धदर्शन रूपसभी ज्ञान अनुमान ही हैं , क्योंकि इनकी उत्पत्ति ग्रहसश्वारादि लिङ्गों से होती है ।

( अतः धर्मादि के उक्त ज्ञान अनुमान में अन्तर्भूत हो जाते हैं ) । अर्थलिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनमिष्टं तत्प्रत्यक्षार्षयोरन्यतरस्मिन्नन्तर्भूतम् ' अर्थात् यदि धर्माधर्मादि के उक्त ज्ञान इन्द्रियों से होते हैं , तो वे प्रत्यक्ष ही हैं । यदि उन ज्ञानों को इन्द्रियों की अपेक्षा नहीं है , तो फिर वे ' आषंज्ञान ' ही हैं । एवं बुद्धि : ' इस वाक्य के द्वारा बुद्धि निरूपण का उपसंहार करते हैं । ' एवम् ' अर्थात् कथित क्रम से ' बुद्धि : ' अर्थात् बुद्धि की व्याख्या की गयी है ।

उक्त वाक्य का ' इति ' शब्द प्रकरण समाप्ति का सूचक है ।

सुख यतः बुद्धि से उत्पन्न होता है , अतः बुद्धि निरूपण के वाद ' अनुग्रहलक्षणं सुखम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सुख का निरूपण करते हैं । ( प्रकृत ) सन्दर्भ का ' अनुग्रह ' पद ' अनुगृह्यते अनेन ' इस व्युत्पत्ति से निधन्न हैं । तदनुसार ' अनुग्रहलक्षण ' शब्द का अर्थ है ' अनुग्रहस्वभाव ' । सुख स्वभावतः ( जीव को प्रिय होने के कारण उसके ) अनुकूल है । अत : सुख अपने अनुभव के द्वारा पुरुष को अनुगृहीत करता है । ' गादि ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा इसी की व्याख्या करते हैं । माला , चन्दन , स्त्री प्रभृति जितने भी प्रिय विषय हैं , उनका सान्निध्य रहने पर अर्थात् उनका सम्बन्ध रहने पर ,

अभिप्रेत विषय की उपलब्धि एवं इन्द्रियों का उन अर्थों के साथ सम्बन्ध प्रभृति कारणों के द्वारा धर्म के साहाय्य से जिसकी उत्पत्ति होती है वही ' सुख ' हैं । विषय अभिप्रेत भी हो उसका सान्निध्य भी हो किन्तु भोक्ता का चित्त यदि दूसरे विषय में लगा रहे तो उसे विषय से उत्पन्न होनेवाला सुख नहींमिलता , अतः सुख के प्रति इष्ट विषय की उपलब्धि को भी कारण माना गया है ।

और सभी कारणों के रहने पर भी यदि स्रगादि विषयों के साथ पुरुष का सम्बन्ध नहीं है , तो फिर विषय से वियुक्त उस पुरुष को सुख नहीं मिलता , अतः सुख के प्रति भोक्ता और विषय के संनिकर्ष को भी कारण मानना पड़ेगा । कथित ' धर्मादि ' पद में प्रयुक्त आदि ' पद से स्वास्थ्य प्रभृति सहायकों को समझना चाहिए । ' अनुग्रहाभिष्वङ्गनयनादिप्रसादजनकम् ' इस वाक्य के द्वारा सुख से होनेवाले कार्यों का वर्णन किया गया है । सुख का प्रत्यक्ष ही प्रकृत ' अनुग्रह ' शब्द का अर्थ है ।

भभिष्वङ्ग ' शब्द से अनुराग अभिप्रेत है । ' नयनादिप्रसाद ' शब्द से आँखो की स्वच्छता को समझना चाहिए । ' नयनादिप्रसाद ' शब्द में प्रयुक्त ' आदि ' शब्द से मुँह की प्रसन्नता प्रभृति को समझना चाहिए । इन सबों का कारण सुख है । सुख उत्पन्न होकर अपने आश्रयीभूत आत्मा में जो अपने अनुभव का उत्पादन करता है , वही आत्मा के साथ सुख का अनुग्रह है । सुख के उत्पन्न होने पर मुख पर प्रसन्नता छा जाती है । सुख के कारणों में जो अनुराग उत्पन्न होता है , उसका कारण भी सुख हो है ।

' अतीतेषु स्मृतिजम् ' अर्थात् पूर्व में अनुभूत के अतीतसाधनों में सुख की स्मृति से अनुराग उत्पन्न होता है ।

सुखनिरूपणम्

पृ. ६३०

भाष्य २२५

अनुग्रहलक्षणं सुखम् ।

गाद्यभिप्रेतविषय सान्निध्ये सतीष्टोपलब्धीन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् धमांद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगाद नुग्रहाभिष्वङ्गनयनादिप्रसादजनकमुपद्यते तत् सुखम् ।

अतीतेषु विषयेषु स्मृतिजम् ।

अनागतेषु ङ्कल्पजम् ।

यत्तु विदुषामसत्सु " विषयानुस्मरणेच्छासङ्कल्पेष्वानिर्भवति तद् विद्याशमसन्तोषधर्म विशेषनिमित्तमिति ॥

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६३०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 705

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जिसका अनुभव अनुकूल जान पड़े वही ' सुख ' है ( विशदार्थ यह है कि ) माला प्रभृति अभिप्रेत विषयों का सान्निध्य होने पर ( मालादि उन ) ssc विषयों का ज्ञान , उन विषयों के साथ ( त्वक् घ्राणादि ) इन्द्रियों के संनिकर्ष , एवं धर्म से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के संयोग इन सबों से धर्म की उत्पत्ति होती है । यह ( सुख स्वविषयक ज्ञान रूप ) अनुग्रह , अनुराग एवं नयन ( मुख ) प्रभृति की विमलता इन सबों का कारण है 1

हुए विषयों का सुख उन विषयों की स्मृति से उत्पन्न होता है , एवं होनेवाले विषयों से यह उन विषयों के संकल्प से उत्पन्न होता है । आत्मतत्त्वज्ञानियों को जो सुख बिना विषयों के , विषयों के स्मरण के न रहने पर भी बिना इच्छा और बिना संकल्प के ही उत्पन्न होता है , उस पुरुष का आत्मतत्त्वज्ञान , शम , सन्तोष एवं विशेष प्रकार के धर्म उस सुख के कारण हैं ।

दुःखनिरूपणम्

पृ. ६३३

भाष्य २२६

उपघातलक्षणं दुःखम् ।

विषाद्यनभिप्रेतविषय सान्निध्ये सत्यनिष्टोपलब्धीन्द्रियार्थसन्निकर्षादधर्माद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगाद् यदमर्षोपघातदैन्यनिमित्तमुत्पद्यते तद् दुःखम् ।

अतीतेषु सर्पव्याघ्रचौरादिषु स्मृतिजम् ।

अनागतेषु सङ्कल्पजमिति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६३३प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 708

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उपघातस्वभाव अर्थात् प्रतिकूलवेदनीय ही दुःख है । वह विष प्रभृति अनभिप्रेत विषयों के सामीप्य , उनके साथ इन्द्रियों का संयोग , एवं अधर्म सहकृत आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होता है । वह असहिष्णुता , दुःख का अनुभव एवं दीनता का कारण है । अतीत सर्प , व्याघ्र एवं चोर इत्यादि से जो दुःख उत्पन्न होता है , उसका कारण उनकी स्मृतियाँ हैं । एवं भविष्य में आनेवाले विषयों से जो दुःख उत्पन्न होता है , उसका कारण उन ( अनभिप्रेत ) विषयों का सङ्कल्प है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

ये तु दुःखाभावमेव सुखमाहुस्तेषामानन्दात्मनानुभवविरोधः , हितमा . स्यामि , अहितं हास्यामीति प्रवृत्तिद्वैविध्यानुपपत्तिश्च ।

सुखप्रत्यनीकतया तदनन्तरं दुःखं व्याचष्टे - उपघातलक्षणं दुःखम् । उपहन्यतेऽनेनेत्युपधातः , उपघातलक्षणम् उपधातस्वभावम् । दुःखमुपजातं प्रतिकूलस्वभावतया स्वात्मविषयमनुभवं कुर्वदात्मानमुपहन्ति । एतद् विवृणोति-अनिष्टोपलब्धीत्यादिना । अमर्षोऽसहिष्णुता द्वेष इति यावत् । उपघातो दुःखानुभवः , दैन्यं विच्छायता , तेषां निमित्तम् । दुःखे सति तदनुभवलक्षण आत्मोपघातः स्यात् । अतीतेषु सर्पादिषु स्मृतिजम् , अनागतेषु सङ्कल्पजमिति पूर्ववद् व्याख्यानम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' यह मुझे मिलेगा ' इस आकार के संकल्प से सुख के भविष्यसाधनों में अनुराग उत्पन्न होता है । ' विदुषाम् ' अर्थात् आत्मज्ञानी विद्वानों में ' असद्विषयानुस्मरण संकल्पेषु ' अर्थात् विषयों के न रहने पर , अनुस्मरण के न रहने पर , एव संकल्प के न रहने पर भी जो दिव्य सुख का आविर्भाव होता है वह ' विद्याशमसन्तोषधर्म विशेष निमित्तम् ' अर्थात् विद्या , शम , सन्तोष , और प्रकृष्ट धर्म ये सब उसके कारण हैं । ' विद्या ' है तत्त्वज्ञान , शम ' है इन्द्रियों का जय करना , जितने धन से शरीरयात्रा चले उससे अधिक धन की आकाङ्क्षा न करना ही ' सन्तोष है । ' धर्मविशेष ' शब्द से निवृत्ति रूप प्रकृष्टधर्म अभीष्ट है । इन चारों कारणों से आत्मज्ञानियों में उक्त सुख की उत्पत्ति होती है ।

जो सम्प्रदाय दुःखाभाव को ही सुख मानते हैं उनके मत में इन दोषों को आपत्ति होगी । एक तो आनन्द का सभी जनों को जो अनुभव होता है , वह विरुद्ध होगा । एवं ' मैं हित को प्राप्त करूँ एवं ' अहित को छोड़ " ये दो प्रकार की जो प्रवृत्तियाँ होती हैं , वे अनुपपन्न हो जाएंगी ।

दुःख सुख का विरोधी है , अतः सुख के निरूपण के बाद ' उपघातलक्षणं दुःखम् '

इच्छानिरूपणम्

पृ. ६३४

भाष्य २२७

स्वार्थ परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा ।

सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते ।

प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६३४प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 709

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अपने लिए या दूसरों के लिए अप्राप्तवस्तु की प्रार्थना ही ' इच्छा ' है | यह ( इच्छा ) सुख अथवा स्मृति से साहाय्यप्राप्त आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती है । वह प्रयत्न , स्मृति , धर्म और अधर्म का कारण है

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — 10 इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दुःख की व्याख्या करते हैं । प्रकृत में ' उपघात ' शब्द ' उपहन्यते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा सिद्ध है । ' उपघातलक्षण ' अर्थात् दुःख उपघातस्वभाव का है । दुःख की उत्पत्ति ही अपने आश्रयीभूत आत्मा की इच्छा के प्रतिकूल होती है , अतः वह अपनी उत्पत्ति के द्वारा आत्मा का ' उपहनन ' करती है । ' अनिष्टोपलब्धि ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसी का विवरण देते हैं । ' अमर्ष ' शब्द का अर्थ है असहिष्णुता , फलतः द्वेष । ' उपघात ' शब्द का अर्थ है दुःख का अनुभव | दैन्य शब्द का अर्थ है दीनता । दुःख इन सबों का कारण है । दुःख के रहने पर आत्मा का दुःखानुभव रूप उपघात होता है । अतीत साँप प्रभृति वस्तुओं से उनकी स्मृति के द्वारा दुःख उत्पन्न होता है । अनागत अनिष्ट वस्तुओं के संकल्प से दुःख उत्पन्न होता है । इस प्रकार सुख प्रकरण में कथित रीति से यहाँ भी व्याख्या करनी चाहिए ।

' स्वार्थं परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा ' अर्थात् अपने लिए या दूसरों के लिए किसी अप्राप्त वस्तु की जो ' प्रार्थना ' अर्थात् यह मुझे मिळे ' या ' यह इस व्यक्ति को मिले ' इस प्रकार की जो प्रार्थना वही ' इच्छा ' है । ' सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद्वोत्पद्यते ' सुख के साघनीभूत भविष्य वस्तु की इच्छा होती है , अतः उस विषय से होनेवाला सुख भी अनात ही रहता है ( वर्तमान नहीं ) फिर भी वह भविष्य सुख भी बुद्धि के द्वारा सिद्ध होने के कारण इच्छा का निमित्तकारण होता है ।

पृ. ६३५

भाष्य २२८

कामोऽभिलाषः , रागः सङ्कल्पः , कारुण्यम् , वैराग्यमुपधा भावः इत्येवमादय इच्छाभेदाः ।

मैथुनेच्छा कामः ।

अभ्यवहारेच्छामिलाषः ।

पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः ।

अनासन्नक्रियेच्छा सङ्कल्पः | स्वार्थमनपेक्षा परदुःख प्रहाणेच्छा कारुण्यम् ।

दोषदर्शनाद् काम , अभिलाषा , राग , संकल्प , वैराग्य , उपधा एवं भाव प्रभृति इच्छा विषयत्यागेच्छा वैराग्यम् ।

परवश्चनेच्छा उपधा ।

अन्तर्निगूढेच्छा भावः ।

चिकीर्षाजिहीर्षेत्यादिक्रियाभेदादिच्छा भेदा भवन्ति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६३५प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 710

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — केही भेद हैं । ( जैसे कि ) मैथुन की इच्छा ही ' काम ' है । भोजन करने की इच्छा ही ' अभिलाषा है । बार बार विषयों को भोगने की इच्छा ही ' राग ' है । शीघ्र किसी काम को करने की इच्छा ही ' संकल्प ' है । अपने कुछ स्वार्थ के बिना दूसरों के दुःख को छुड़ाने की इच्छा ही ' कारुण्य ' है । दोष के ज्ञान से विषय को छोड़ने की इच्छा ही ' वैराग्य ' है । दूसरे को ठगने की इच्छा ही ' उपधा ' है । भीतर छिपी हुई इच्छा ही ' भाव ' है । ( इसी प्रकार ) चिकीर्षा ( कुछ करने की इच्छा ) जिहीर्षा ( छोड़ने की इच्छा ) इत्यादि भी ( अपने अन्तर्गत ) क्रियाओं के भेद के रहने पर भी ( वस्तुतः ) इच्छा के ही प्रभेद हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

स्वार्थं परार्थं वा s प्राप्तप्रार्थनेच्छा । अप्राप्तस्य वस्तुनः स्वार्थ प्रति या प्रार्थना इदं मे भूयादिति परार्थं वा प्रार्थना अस्येदं भवत्विति सेच्छा । सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । अनागते सुखसाधने वस्तुनीच्छा उपजायते , तदुत्पत्तौ च तद्विषयसाध्यं सुखमनागतमपि बुद्धिसिद्धत्वान्निमित्तकारणम् । यदाह न्यायवात्तिककारः -- " फलस्य प्रयोजकत्वात् ” इति । अतिक्रान्ते सुखहेताविच्छोत्पत्तेः स्मृतिः कारणम् । प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः । उपादानेच्छातस्तदनुगुणः प्रयत्नो भवति , स्मरणेच्छातः स्मरणम् , विहितेषु ज्योतिष्टोमादिषु फलेच्छया प्रवृत्तस्य धर्मो जायते । प्रतिषिद्धेषु रागात् प्रवृत्तस्याधमः । कामादयोऽपि सन्ति ते कस्मान्नोक्ताः ? अत आह--

इत्यादि ।

कामादय इच्छाप्रभेदाः , न तत्त्वान्तरमिति यदुक्तं तदेव दर्शयतिमैथुनेच्छा काम इति । निरुपपदः कामशब्दो मैथुनेच्छायामेव प्रवर्तते , अन्यत्र तस्य पदान्तरसमभिव्याहारात् प्रवृत्तिः , यथा स्वर्गकामो यजेत इति । अभ्यवहारेच्छा अभिलाषः । अभ्यवहारो भोजनम् , तत्रेच्छा अभिलाषः । पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः । पुनविषयाणां भोगेच्छा राग इत्यर्थः । अनासन्नक्रियेच्छा सङ्कल्पः । अनागतस्यार्थस्य करणेच्छा सङ्कल्पः । स्वार्थमनपेक्ष्य परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् । स्वार्थप्रयोजनं किमप्यनभिसन्धाय या परदुःखप्रहाणे अपनयने इच्छा सा कारुण्यम् । दोषदर्शनाद् दुःखहेतुत्वावगमे विषयाणां परित्यागे इच्छा वैराग्यम् । परवश्वनेच्छा परप्रतारणेच्छा उपधा । अन्तर्निगूढच्छा लिङ्गराविर्भाविता येच्छा सा भावः । चिकीर्षा जिहीर्षा इत्यादिक्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति । करणेच्छा चिकीर्षा , हरणेच्छा जिहीर्षा गमनेच्छा जिगमिषेत्येवमादय इच्छाभेदाः क्रियाभेदाद् भवन्ति ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — जैसा कि न्यायवार्तिककार ने ' फलस्य प्रयोजकत्वात् ' इत्यादि ग्रन्थ से कहा है कि सुख के कारणीभूत विषयों के नष्ट हो जाने पर भी जो उन विषयों की इच्छा होती है , उस इच्छा के प्रति उन विषयों की स्मृति कारण है । ' प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः ' विषयीभूत वस्तु की इच्छा से उसे प्राप्त करने या त्याग करने के उपयुक्त प्रयत्न की उत्पति होती है ( इस प्रकार इच्छा प्रयत्न का भी कारण है ) । स्मरण की इच्छा से भी स्मृति होती है । स्वर्गादि के लिए वेदों से निर्दिष्ट ज्योतिष्टोमादि यागों में स्वर्गादि फलों की इच्छा से जो प्रवृत्ति होती हैं , उस इच्छा से धर्म होता है । एवं राग से जो प्रतिषिद्ध हिंसादि में किसी की प्रवृत्ति होती है , उससे अधर्म को उत्पत्ति होती है , उस अधर्म के प्रति उक्त राग रूप इच्छा कारण है । इस प्रकार इच्छा प्रयत्नादि का हेतु है ) ।

काम प्रभृति गुण भी तो है , वे क्यों नहीं कहे गए ? इसी प्रश्न का उत्तर ' काम : ' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । यह जो कहा है कि" कामादि इच्छा के ही प्रभेद हैं , स्वतन्त्र गुण नही " उसी का उपपादन " मैथुनेच्छा कामः " इत्यादि सन्दर्भ से करते हैं । बिना विशेषण का केवल ' काम ' शब्द मैथुन की इच्छा में ही प्रयुक्त होता है , दूसरी तरह की इच्छाओं में ' काम ' शब्द की प्रवृत्ति दूसरे पदों के साथ रहने से ही होती है । जैसे कि ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि ।

' अभ्यवहारेच्छा अभिलाष : ' इस वाक्य के ' अभ्यवहार ' शब्द का अर्थ है भोजन , उसकी इच्छा ही ' अभिलाष ' शब्द से कही जाती है । ' पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः ' अर्थात् विषयों को बार बार भोगने की इच्छा हो राग ' है । ' अनासन्न कियेच्छा संकल्पः ' अर्थात् भविष्य काम को करने की इच्छा ही ' संकल्प ' है | ' स्वार्थमनपेक्ष्य दुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् ' अपने किसी प्रयोजन के साधन की अभिसन्धि के बिना जो दूसरों को दुःख से छुड़ाने की इच्छा , उसे ही ' कारुण्य ' कहते हैं ।

दोषदर्शनात् ' अर्थात् दुःख के कारणों को अनिष्ट समझने पर विषयों को छोड़ने की इच्छा हो ' वैराग्य ' है । ' परवश्वनेच्छा ' दूसरों को ठगने की इच्छा को हो ' उपधा ' कहते हैं । ' अन्तर्निगूढेच्छा ' ' अर्थात् लिङ्गो से हो ज्ञात होनेवाली इच्छा को ' भाव ' कहते हैं । ' चिकीर्षा ' जिहीर्षा ' इत्यादि क्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति ' काम करने को इच्छा को ही ' चिकीर्षा ' कहते हैं । किसी की वस्तु को अपहरण करने की इच्छा को ही ' जिही ' कहते हैं । जाने की इच्छा ही ' जिगमिषा ' है ।

क्रियाओं की इस विभिन्नता से ही ये इच्छायें विभिन्न होती हैं ।

द्वेषनिरूपणम्

पृ. ६३७

भाष्य २२९

प्रज्वलनात्मको द्वेषः ।

यस्मिन् सति प्रज्वलितमिवात्मानं मन्यते स द्वेषः ।

स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखापेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते ।

यत्नस्मृतिधर्माधर्मस्मृतिहेतुः ।

क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमामर्प इति द्वेषभेदाः ||

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६३७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 712

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — द्वेष प्रज्वलन रूप है । ( अर्थात् ) जिसके रहते हुए प्राणी अपने को जलता हुआ सा अनुभव करे वही ' द्वेष ' है । दुःख या स्मृति से सापेक्ष आत्मा और मन के संयोग से यह उत्पन्न होता है । प्रयत्न , स्मृति , धर्म और अधर्म का यह कारण है । क्रोध , द्रोह , मन्यु , अक्षमा और अमर्ष ये ( पाँच ) द्वेष के प्रभेद हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

प्रज्वलनात्मको द्वेषः । एतद् विवृणोति -- यस्मिन् सतीत्यादिना । तद् व्यक्तम् । स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखापेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । अतीते दुःखहेतौ तज्जदुःखस्मृतिजो द्वेषः । प्रयत्नधर्माधर्म स्मृतिहेतुः । एनमहं हन्मीति प्रयत्नो द्वेषात् वेदार्थविप्लवकारिषु द्वेषाद् धर्मः , तदर्थपरिपालन परेषु द्वेषादधर्मः । स्मृतिरपि द्वेषादुपजायते , यो यं द्वेष्टि स तं सततं स्मरति । क्रोध द्रोहो मन्युरक्षमाऽमर्ष इति द्वेषभेदाः । शरीरेन्द्रियादिविकारहेतुः क्षणमात्रभावी द्वेषः क्रोधः । अलक्षित विकार विचरानुबद्धापकारावसानो द्वेषो द्रोहः । अपकृतस्य प्रत्यपकारासमर्थस्यान्तनिगूढो द्वेषो मन्युः । परगुणद्वेषोऽक्षमा । स्वगुणपरिभवसमुत्थो द्वेषोऽमर्षः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ‘ प्रज्वलनात्मको द्वेषः ' इस लक्षणवाक्य को ही व्याख्या ' यस्मिन् सति ' इत्यादि से किया गया है । ' स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखापेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद्वा उत्पद्यते ' जहाँ दुःख के कारणों का नाश हो गया रहता है ऐसे स्थलों में उन कारणों से उत्पन्न दुःख की स्मृति से हो उन कारणों में द्वेष उत्पन्न होता है । ' प्रयत्नधर्माधर्म स्मृतिहेतु : ' ' मैं इसे मारता हूँ इस प्रकार का प्रयत्न द्वेष से उत्पन्न होता है ।

वेदों से प्रतिपादित अर्थों को विपरीत दिशा में ले जानेवाले के ऊपर किये गये द्वेष से धर्म उत्पन्न होता है । वेदों की आज्ञा पालनेवाले के ऊपर द्वेष करने से अधर्म उत्पन्न होता है । द्वेष से स्मृति भी उत्पन्न होती है , क्योंकि जिसके ऊपर जिसे द्वेष रहता है , उसे उसका सदा स्मरण होता रहता है । " क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमामर्ष इति द्वेषभेदाः " एक क्षण मात्र रहनेवाले ' द्वेष ' का नाम ही ' क्रोध ' है , जिससे शरीर एवं इन्द्रियादि अपने स्वरूप से च्युत दीख पड़ते हैं ।

जिससे शरीरादि में विकार परिलक्षित न हो , किन्तु जिसका बहुत दिनों के बाद अपकार में पर्यवसान हो , उस द्वेष को ही ' द्रोह ' कहते हैं । ' मन्यु ' उस ' द्वेष ' का नाम है , जो प्रतीकार करने से असमर्थ व्यक्ति में अत्यन्त गूढ़ रूप से रहता है । दूसरे के गुण के प्रति द्वेष को ही ' अक्षमा ' कहते हैं | अपने गुण के पराजय से जो द्वेष उत्पन्न होता है उसे ' अमर्ष ' कहते हैं ।

प्रयत्ननिरूपणम्

पृ. ६३८

भाष्य २३०

प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः ।

स द्विविध : - जीवनपूर्वकः , इच्छाद्वेषपूर्वकश्च ।

तत्र जीवनपूर्वकः सुप्तस्य प्राणापान सन्तानप्रेरकः , प्रबोधकाले चान्तःकरणस्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुः ।

अस्य जीवन- " पूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः ।

इतरस्तु हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः शरीरविधारकश्च ।

स चात्ममनसोः संयोगादिच्छापेक्षाद् द्वेषापेक्षाद् वोत्पद्यते ॥

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६३८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 713

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रयत्न , संरम्भ , उत्साह ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं । यह ( प्रयत्न ) ( १ ) जीवनपूर्वक ( जीवनयोनि ) और ( २ ) इच्छाद्वेषपूर्वक भेद से दो प्रकार का है । प्राणियों की सुप्तावस्था में प्राणवायु अपानवायु प्रभृति ( शरीरान्तर्वर्त्ती ) वायु समूह को ( उचित रूप से ) प्रेरित करनेवाला एवं अन्तःकरण ( मन ) को दूसरी इन्द्रियों से सम्बद्ध करनेवाला प्रयत्न ही जीवनपूर्वक प्रयत्न है । धर्म और अधर्म से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के संयोग से इस ( जीवनपूर्वक प्रयत्न ) की उत्पत्ति होती है । दूसरा ( इच्छा द्वेषमूलक ) प्रयत्न हितों की प्राप्ति एवं अहितों का परिहार इन दोनों की उपयुक्त क्रिया एवं शरीर की स्थिति इन दोनों का कारण है । यह ( इच्छाद्वेषमूलकप्रयत्न ) इच्छा या द्वेष से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होता है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविधो जीवनपूर्वक इत्यादि । सदेहस्यात्मनो विपच्यमानकर्माशयसहितस्य मनसा सह संयोगः सम्बन्धो जीवनम् , तत्पूर्वक : प्रयत्नः कामर्थक्रियां करोति ? इत्यत आह -- तत्र जीवपूर्वक इति । सुप्तस्य प्राणापानक्रिया प्रयत्नकार्या क्रियात्वात् । न च तदानीमिच्छाद्वेषौ प्रयत्नहेतू सम्भवतः , तस्माज्जीवनपूर्वक एव प्रयत्नः प्राणापान प्रेरको गम्यते । न केवलं जीवनपूर्वक एव प्रयत्नः प्राणापानप्रेरकः , किन्तु प्रबोधकालेऽन्तःकरणस्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुश्च । विषयोपलम्भानुमितान्तःकरणेन्द्रिसंयोगः प्रयत्नपूर्वकान्तःकरणक्रियाजन्यः , अन्तःकरणेन्द्रियसंयोगत्वात् , जागरान्तः करणेन्द्रियसंयोगवदिति प्रयत्नपूर्वकतासिद्धिः । अस्य जीवनपूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः , धर्माधर्मापेक्ष आत्ममनसोः संयोगो जीवनम् तस्मादस्योत्पत्तिरित्यर्थः ।

इतरस्तु इच्छाद्वेषपूर्वकश्च हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यायामस्य व्यापारस्य हेतुः शरीर विधारकश्च । गुरुत्वे सत्यपततः शरीरस्येच्छापूर्वकः प्रयत्नो विधारकः । स चात्ममनसोः संयोगादिच्छाद्वेषापेक्षादुत्पद्यते । हितसाधनोपादानेषु प्रयत्न इच्छापूर्वकः , दुःखसाधनपरित्यागे प्रयत्नो द्वेषपूर्वकः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः , स द्विविधो जीवनपूर्वक इत्यादि ' देह्सम्बद्ध आत्मा का मन के साथ उस अवस्था का संयोग अर्थात् सम्बन्ध हो ' जीवन ' है , जिस अवस्था में वर्त्तमानकालिक विपाक से युक्त कर्माशय की सत्ता उसमें रहे । जीवनपूर्वक प्रयत्न से कौन सा विशेष कार्य होता है ! इसी प्रश्न का समाधान ' तत्र जीवनपूर्वकः ' इत्यादि से किया गया है । ( जीवनपूर्वक प्रयत्न का साधक यह अनुमान है कि ) सोते हुए पुरुष की प्राणक्रिया और अपान क्रिया भी यतः क्रिया हैं , अतः वे भी प्रयत्न से ही उत्पन्न होती हैं । सोते समय की उन क्रियाओं की उत्पत्ति इच्छा और द्वेष से नहीं हो

C सकती , अतः यह सिद्ध होता है कि जीवनपूर्वक यत्न होउन क्रियाओं का कारण है । जीवनपूर्वक प्रयत्न से केवल उक्त प्राणापानादि को प्रेरणा देनेवाली क्रियायें ही नहीं होती हैं , किन्तु उससे सोकर उठते समय मन का और इन्द्रिय का संयोग भी उत्पन्न होता है । विषय की उपलब्धि से अन्तःकरण का अन्य इन्द्रियों के साथ संयोग का अनुमान होता है । यह अन्तःकरण एवं अन्य इन्द्रियों का अनुमित संयोग भी जाग्नत अवस्था के अन्तःकरण एवं इन्द्रियसंयोग की तरह अन्तःकरण और इन्द्रिय का संयोग ही है । अतः इसकी उत्पत्ति भी प्रयत्न से उत्पन्न अन्तःकरण की क्रिया से ही होती है । अतः प्रबोधकालिक अन्तःकरण और इन्द्रियों के प्रबोधकालिक संयोग का भी प्रयत्न से उत्पन्न होना सिद्ध होता है । ' अस्य जीवन पूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः ' अर्थात् धर्म और अधर्म से उत्पन्न आत्मा और मन का संयोग ही जीवन है । इस जीवन से ही उक्त प्रयत्न की उत्पत्ति होती है ।

' इतरस्तु ' अर्थात् ( जीवनयोनि यत्न से भिन्न ) इच्छा और द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न ' हिताहित प्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः शरीरविधारकश्च ' । शरीर में ( पतन के कारण ) गुरुत्व के रहने पर भी जो शरीर का पतन नहीं होता है उसमें इच्छा जनित प्रयत्न ही कारण है , ( इस प्रकार इच्छापूर्वक प्रयत्न विधारक है ) । ' स चात्ममनसोः संयोगादिच्छ द्वेषापेक्षादुत्पद्यते ' इनमें हित को साधन करनेवाली वस्तुओं के ग्रहण का इच्छा - जनित प्रयत्न कारण है , एवं दुःख के कारणों को हटाने में द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न कारण है ।

गुरुत्वनिरूपणम्

पृ. ६४०

भाष्य २३१

गुरुत्वं जलभूम्योः पतनकर्मकारणम् ।

अप्रत्यक्षं पतनकर्मानुमेयं संयोग प्रयत्न संस्कारविरोधि ।

अस्य चावादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः |

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६४०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 715

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जिससे पृथिवी और जल में पतनक्रिया की उत्पत्ति हो , वही गुरुत्व है । पतन क्रिया रूप हेतु से इसका अनुमान ही होता है , इसका प्रत्यक्ष नहीं होता । यह संयोग , प्रयत्न और संस्कार का प्रतिरोधक है । जलादि के परमाणु और जलादि कार्यद्रव्य में रहनेवाले रूपादि के नित्यत्व और अनित्यत्व की तरह गुरुत्व के नित्यत्व और अनित्यत्व की स्थिति समझनी चाहिए ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

गुरुत्वं जलभूम्योरित्याश्रयकथनम् । पतनकर्मकारणमिति तस्य कार्यनिरूपणम् । अप्रत्यक्षमिति स्वभावोपवर्णनम् , न केनचिदिन्द्रियेण गुरुत्वं गृह्यत इत्यर्थः । ये तु त्वगिन्द्रियग्राह्यं तेषामधः स्थितस्य द्रव्यस्य

गुरुत्वमाहुः , स्पर्शोपलम्भवद् गुरुत्वोपलम्भप्रसङ्गः " त्वगिन्द्रियस्यार्थोपलम्भे स्वसन्निकर्षव्यतिरेकेणान्यापेक्षा सम्भवात् । यत्तूपरिस्थितस्य गुरुत्वं प्रतीयते , तद्धस्तादीनामधोगमनानुमानात् । अतीन्द्रियं चेत् कथमस्य प्रतीतिः ? इत्यत आह - पतनकर्मानुमेयमिति । यदवयविद्रव्यस्य पतनं तेन यदेकार्थसमवेतासमवायिकारणं तदेव हि नो गुरुत्वम् । एतेनैतत् प्रत्युक्तं यदुक्तमपरैः -- " अवयविगुरुत्व कार्य स्यावनतिविशेषस्यानुपलम्भादवयविनि गुरुत्वाभावः " इति , अवयविन : पतनाभावप्रसङ्गात् । अथावयवानां गुरुत्वादेव तस्य पतनम् ? तदावयवानामपि स्वावयवगुरुत्वात् पतनमिति सर्वत्र कार्ये तदुच्छेदः । अथ व्यधिकरणेभ्यः स्वावयव गुरुत्वेभ्योऽवयवानां पतनासम्भवात् तेषु गुरुत्वं कल्प्यते , तदा अवयविन्यपि कल्पनीयम् , न्यायस्य समानत्वात् । यत् पुनरवयविगुरुत्वस्य न गृह्यते ,

कार्यातिरेको तदवयवावयविगुरुत्व भेदस्यात्पान्तरत्वात् । यथा महति द्रव्ये उन्मीयमाने तत्पतितसूक्ष्मद्रव्यान्तरगुरुत्वकार्याग्रहणम् ।

संयोगप्रयत्नसंस्कारविरोधि । गुरुत्वस्य संयोगेन प्रयत्नेन वेगाख्येन च संस्कारेण सह विरोधो विद्यते , तैः प्रतिबद्धस्य स्वकार्याकरणात् । तथा च दोलारूढस्य संयोगेन प्रतिबन्धादपतनम् , प्रयत्नेन प्रतिबन्धादपतनं च शरीरस्य , वेगेन प्रतिबन्धादपतनं बहिः क्षिप्तस्य शरशलाकादेः ।

अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । यथाप्यपरमाणुरूपादयो नित्यास्तथा पार्थिवाप्यपरमाणुष्वपि गुरुत्वम् । यथा चाबादिकार्यद्रव्ये कारणगुणपूर्वप्रक्रमेण रूपादयो जायन्ते , आश्रयविनाशाच्च विनश्यन्ति तथा गुरुत्वमपि ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' गुरुत्वं जलभूभ्यो : ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' जलभूम्यो : ' इस पद से गुरुत्व के आश्रय दिखलाये गये हैं । पतनकर्मकारणम् ' इस वाक्य से गुरुत्व के द्वारा होनेवाले कार्यों को दिखलाया गया है । ' अप्रत्यक्षम् ' इस पद से गुरुत्व का ( अतीन्द्रियत्व रूप ) स्वभाव दिखलाया गया है । अर्थात् गुरुत्व का ग्रहण किसी भी इन्द्रिय से नहीं होता ।

जिस सम्प्रदाय के लोग त्वगिन्द्रिय से गुरुत्व का प्रत्यक्ष मानते हैं , उनके मत में जिस प्रकार नीचे रक्खे हुए द्रव्य के स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है , उसी प्रकार उस द्रव्य गुरुत्व विषयक स्पार्शनप्रत्यक्ष की आपत्ति होगी । क्योंकि त्वगिन्द्रिय से प्रत्यक्ष के लिए उसका त्वगिन्द्रिय के साथ सम्बन्ध को छोड़ कर और किसी के साहाय्य की अपेक्षा मानना सम्भव नहीं है । ( तब रहा यह प्रश्न कि उसी द्रव्य को ऊपर उठाने पर गुरुत्व की उपलब्धि किस प्रमाण से होती है ? इस प्रश्न का यह उत्तर है कि ) द्रव्य उठानेवाले हाथ प्रभृति द्रव्यों का ( उस अवस्था में ) नीचे की तरफ जाने से उस द्रव्य के गुरुत्व का अनुमान होता है । जिस अवयवी रूप द्रव्य का पतन होता है , उस पतन के साथ एक अर्थ ( उसी अवयवी द्रव्य ) में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले ( पतन का ) असमवायिकारण ही ' गुरुत्व ' है । किसी सम्प्रदाय के लोग अवयवी में गुरुत्व नहीं मानते है , क्योंकि अवयवों के गुरुत्व से जितनी अवनति होती है , उन अवयवों से बने अवयवी के द्वारा उससे अधिक अवनति नहीं देखी जाती है , अतः अवयवों में ही गुरुत्व है , अवयवी नहीं ।

द्रवत्वनिरूपणम्

पृ. ६४१

भाष्य २३२

द्रव्यत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् ।

त्रिद्रव्यवृत्ति | तत्तु द्विविधम् ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६४१प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 716

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जिस गुण से स्यन्दन ( अर्थात् फैलने की ) क्रिया उत्पन्न हो वही ' द्रवत्व ' है । यह ( १ ) सांसिद्धिक ( स्वाभाविक ) और ( २ ) नैमित्तिक

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् । यत् स्यन्दनकर्मकारणं तद् द्रवत्वमित्यर्थः । त्रिद्रव्यवृत्ति पृथिव्युदकज्वलनवृत्तीत्यर्थः । तत्तु द्विविधमिति । गुरुत्वमेकविधं द्रवत्वं तु द्विविधमिति तुशब्दार्थः । नेमित्तिकं सांसिद्धिकं च । निमित्तं च वह्निसंयोगः , तस्येदं कार्यमिति नैमित्तिकम् । सांसिद्धिकं च स्वभावसिद्धम् , वह्निसंयोगानपेक्षमिति यावत् । सांसिद्धिकमपां विशेषगुणः अन्यत्राभावात् । नैमि त्तिक पृथिवोतेजसोः सामान्यगुणः , साधारणत्वात् । सांसिद्धिकस्य द्रवत्वस्य गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । यथा नित्यद्रव्यसमवेतं गुरुत्वं नित्यम् , अनित्यद्रव्यसमवेतं च कार्यकारणगुणपूर्वक माश्रयविनाशाद् विनश्यतीति तथा सांसि - किं द्रवत्वमपि ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — गुरुत्व के उक्त लक्षण से उनके उक्त मत का भी खण्डन हो जाता है ( क्योंकि उस लक्षण में गुरुत्व ' को अवयवी में रहना मान लिया गया है ) क्योंकि अवयवी में गुरुत्व यदि न मानें तो अवयवी का पतन न हो सकेगा । यदि अवयवों के गुरुत्व से ही अवयवी का भी पतन मानें , तो फिर उन अवयवों का पतन भी उनके अवयवों से ही होगा । उनमें भी गुरुत्व का मानना व्यर्थ होगा । फलतः किसी भी कार्य द्रव्य में गुरुत्व का मानना सम्भव न होगा ।

यदि यह कहें कि एक अधिकरण में रहनेवाले गुरुत्व से उससे भिन्न द्रव्य में पतन का होना सम्भव नहीं है , अतः अवयवों में गुरुत्व मानते हैं ( क्योंकि अवयवों से उसके अवयव भिन्न हैं ) तो फिर इसी युक्ति से अययवी में भी गुरुत्व का मानना अनिवार्य है , क्योंकि अवयवों के अवयत्र भी तो अपने अवयवी से भिन्न हैं , अतः अवयवों में रहनेवाला गुरुत्व अवयवों से भिन्न अवयवी में पतन का उत्पादन कैसे कर सकता है ?

यह जो आक्षेप किया गया है कि अवयवों के गुरुत्व कार्य अवनति - विशेष से अवयवी के कार्य अवनतिविशेष में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता ' अतः अवयवों में ही गुरुत्व है अवयवी में नहीं ) इस आक्षेप के उत्तर में कहना है कि अवयवी के गुरुत्व से अवयवों के गुरुत्व में अत्यन्त अल्प अन्तर हैं , अतः उन दोनों से होनेवाले कार्यों का अन्तर गृहीत नहीं हो पाता ।

जैसे किसी भारी द्रव्य को दूसरी बार तौलने पर उससे कुछ कणों के झड़ जाने के बाद भी उसके गुरुत्व के कार्य अवनतियों में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता है ।

पृ. ६४२

भाष्य २३३

सांसिद्धिकम् नैमित्तिकं च ।

सांसिद्धिकमपां विशेषगुणः ।

नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः ।

सांसिद्धिकस्य गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः ।

सङ्घातदर्शनात् सांसिद्धिकमयुक्तमिति चेन्न , दिव्येन तेजसा संयुक्तानामाप्यानां परमाणूनां परस्परं संयोगो द्रव्यारम्भकः सङ्घा- ताख्यः , तेन परमाणुद्रवत्वप्रतिबन्धात् कार्ये हिमकरकादौ द्रवत्वानुत्पत्तिः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६४२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 717

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — भेद से दो प्रकार का है । इनमें सांसिद्धिकद्रवत्व जल का विशेषगुण है और नैमित्तिकद्रवत्व पृथिवी और तेज का सामान्यगुण है । द्रवत्व के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय गुरुत्व की तरह समझना चाहिए । ( प्र ० ) ( जल में भी ) सङ्घात अर्थात् काठिन्य देखा जाता है , अतः यह कहना अयुक्त है कि जल का द्रवत्व सांसिद्धिक है । ( उ ० ) यह बात नहीं है , क्योंकि दिव्यतेज के साथ संयुक्त परमाणुओं द्रव्य का उत्पादक संयोग ही सङ्घात रूप होता है ( अर्थात् उक्त परमाणुओं का ही संयोग कठिन होता है ) इसी से जल का स्वाभाविक द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है , जिससे जल से उत्पन्न होनेवाला पाला और बरफ में सांसिद्धिक द्रवत्व की उत्पत्ति नहीं हो पाती ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अत्र चोदयति - सङ्घातदर्शनात् सांसिद्धिकद्रवत्वमयुक्तमिति चेत् आप्यस्य हिमकरकादेर्द्रव्यस्य सङ्घातदर्शनात् काठिन्यदर्शनादपां स्वभावसिद्धं द्रवत्वमित्ययुक्तम् । समाधत्ते - - दिव्येनेति । सर्वत्रोदके स्वभावसिद्धस्य द्रवत्वस्योप लम्भादपां स्वभावसिद्धमेव द्रवत्वं तावन्निश्चितम् । यत्र तु हिमकरकादौ कार्ये द्रवत्वानुत्पत्तिस्तत्र दिव्येन तेजसा सम्बद्धानामाप्यपरमाणूनां परस्परसंयोगो द्रव्यारम्भकः सङ्घाताख्य :, तेन हिमकरकारम्भकाणां परमाणूनां द्रवत्वप्रतिबन्धात् । तेज : संयोगेन परमाणूनां द्रवत्वं प्रतिबद्ध मित्यन्यत्राप्यद्रव्यस्य लवणस्य वह्निसंयोगेन द्रवत्वप्रतिबन्धदर्शनादनुमितम् । लवणस्याप्यत्वमपि हिमकरका - दिवत् कालान्तरेण द्रवीभावदर्शनादवगतम् । विलयनं तु हिमकरकादेर्भी माग्निसंयोगाद् यद् विलयनं कठिनद्रव्यस्य , तद् वह्निसंयोगादवगतम् , यथा सुवर्णादीनाम् । हिमकरकादिविलयनमपि विलयनमेव । तस्मादिहापि दृष्टसामर्थ्यो वह्निसंयोग एव निमित्तमाश्रीयते ।

सांसिद्धिकं द्रवत्वं व्याख्याय नैमित्तिकं व्याचष्टे -- नमित्तिकं पृथिवी - तेजसोरग्निसंयोगजमिति । कथमित्यज्ञेन पृष्टः सन्नुपपादयति -- सर्पिरित्यादिना । सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां पार्थिवानां कारणषु परमाणुष्वग्निसंयोगात् क्रियोत्पत्तौ सत्यां कर्मजेभ्यो विभागेभ्यः सर्पिराद्यारम्भकसंयोगविनाशात् सपिरादिद्रव्य निवृत्तौ सत्यां स्वतन्त्रेषु परमाणुषु वह्निसंयोगाद् द्रवत्वमुत्पद्यते । तदनन्तरमुत्पन्नद्रवत्वेषु परमाणुषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्मपरमाणु संयोगात् क्रियोत्पत्तौ सत्यां कर्मजेभ्यः परमाणूनां परस्परसंयोगेभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेण कार्यद्रव्ये जाते रूपाद्युत्पत्तिकाले एवं कारगद्रवत्वेभ्यो द्रवत्वमुत्पद्यते । हिमकरकादिविलयनेऽप्येवमेव न्यायः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' संयोगप्रयत्न संस्कारविरोधी ' । गुरुत्व का विरोध ( अर्थात् अपने आश्रय के अधःपतन रूप कार्य में अक्षमता ) संयोग , प्रयत्न , और वेगाख्यसंस्कार इन तीन गुणों से होता है । क्योंकि इनमें से किसी के साथ भी सम्बन्ध रहने पर गुरुत्व से पतन की उत्पत्ति नहीं होती है । संयोग से प्रतिरुद्ध होने के कारण हो पालकी पर चढ़े हुए मनुष्य का पतन नहीं होता है । प्रयत्नरूप प्रतिबन्धक से ही शरीर का पतन नहीं होता है । केवल वेग के हो कारण बाहर फेंका हुआ तीर ( कुछ देर तक ) रुका रहता है ।

' अस्य चानादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः ' अर्थात् जिस प्रकार जलीय का गुरुत्व भी नित्य है । जैसे कार्य रूप जल रूपादि की उत्पत्ति परमाणुओं के रूपादि नित्य होते हैं , उसी प्रकार पार्थिवपरमाणु और जलीयपरमाणु

कारणगुणक्रम से होती है , एवं आश्रय के विनाश से उनका विनाश होता है , उसी प्रकार कार्य रूप पार्थिव द्रव्य और जलीय द्रव्य इन दोनों के गुरुत्व भी कारणगुणक्रम से ही उत्पन्न होते हैं , और आश्रय के विनाश से ही विनष्ट होते हैं ।

' द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् ' अर्थात् प्रसरण क्रिया का जो कारण वही ' द्रवत्व ' है । ' त्रिद्रव्यवृत्ति ' अर्थात् पृथिवी , जल और तेज इन तीन द्रव्यों में द्रवत्व रहता है । ' तत्तु द्विविधम् ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' तु ' शब्द से यह सूचित किया गया है कि गुरुत्व तो एक ही प्रकार का है , किन्तु द्रवत्व दो प्रकार का है ।

' नैमित्तिकं सांसिद्धिकञ्च ' इस वाक्य में ' प्रयुक्त ' नैमित्तिक ' शब्द ' निमित्तस्येदं कार्यं नैमित्तिकम् ' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न है , एवं इस ' निमित्त ' शब्द का अर्थ है वह्नि का संयोग । ( फलतः वह्निप्रभृति तैजस द्रव्य के संयोग रूप निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही नैमित्तिक द्रवत्व है ) स्वाभाविक द्रवत्व को सांसिद्धिक द्रवत्व कहते हैं । फलतः वह्नि प्रभृति तैजस पदार्थों के संयोग के बिना ही जो द्रवत्व उत्पन्न हो उसे सांसिद्धिकद्रवत्व कहते हैं ।

' सांसिद्धिकोऽयं विशेषगुणः ' सांसिद्धिकद्रवत्व जल का विशेष गुण है , क्योंकि वह अन्य द्रव्यों में नहीं है । नैमित्तिकं पृथिवी तेजसोः सामान्यगुण : ' नैमित्तिकद्रवत्व पृथिवी और तेज का सामान्य ही गुण हैं . क्योंकि वह दो द्रव्यों में समानरूप से रहता है ।

' सांसिद्धिकस्य ' अर्थात् सांसिद्धिद्रवत्व का गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः ' अर्थात् जिस प्रकार नित्यद्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला गुरुत्व नित्य ही होता है , और अनित्यद्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला गुरुत्व कारणगुणक्रम से उत्पन्न होनेवाला कार्य होता है . एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है , उसी प्रकार द्रवत्व में भी समझना चाहिए ।

( अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाला द्रवत्व भी नित्य है , एवं कार्य द्रव्य में रहनेवाले द्रवल की उत्पत्ति कारणगुणक्रम से होती है , एवं विनाश आश्रय के विनाश से होता है ) |

' संघात दर्शनात् सांसिद्धिकद्रवत्वमयुक्तम् ' इस सन्दर्भ के द्वारा आक्षेप किया गया हैं कि हिम , करका प्रभृति जलीय द्रव्यों में ' संघात ' अर्थात् काठिन्य देखा जाता है , अतः जल में रहनेवाले द्रवत्व को स्वाभाविक मानना ठीक नहीं है । दिव्येन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । सभी जलों में स्वाभाविक द्रवत्व को उपलब्धि होती है , इससे समझते हैं कि जल का द्रवत्व स्वाभाविक ही है ।

हिम कारकादि जलीय द्रव्यों में द्रवत्व की जो उत्पत्ति नहीं होती है उसका हेतु यह है कि दिव्य तेज के साथ उन द्रव्यों के उत्पादक परमाणु सम्बद्ध रहते हैं , अतः उन परमाणुओं के द्रव्योत्पादक संयोग संघातात्मक होते हैं , जिससे हिमकरकादि के सांसिद्धिकद्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाते हैं । ( प्र ० ) ' तेज के संयोग से सांसिद्धिक द्रवत्व का प्रतिरोध होता है ' यह किस प्रमाण से समझते हैं ?

( उ ० ) अनुमान के द्वारा समझते हैं , क्योंकि हिमकरकादि से भिन्न लवणरूप द्रव्य में वह्नि के संयोग से ( सांसिद्धिक ) द्रवस्त्र का प्रतिरोध देखा जाता है , अतः लवण रूप दृष्टान्त से तेज के संयोग में सांसिद्धिक द्रवत्व के प्रतिरोध की जनकता का अनुमान करते हैं । हिम , करकादि की तरह कुछ समय के बाद लवण को पिघलते देखा जाता है , अतः समझते हैं कि लवण भी जलीय द्रव्य है । वह्नि संयोग से कठिन द्रव्य का पिघलना सुवर्णादि द्रव्यों में प्रत्यक्ष देखा जाता है ।

हिम , कारकादि का पिघलना भी कठिन द्रव्य का पिघलना ही है , अत : समझते हैं कि वह वह्नि के संयोग से ही पिघलता है । तस्मात् पिघलने की कारणता जिसमें प्रत्यक्ष के द्वारा निश्चित है , उसी वह्निसंयोग में हिम , करकादि के पिघलने की भी कारणता स्वीकार कर लेते हैं ।

पृ. ६४४

भाष्य २३४

नैमित्तिकं च पृथिवीतेजसोरग्निसंयोगजम् ।

कथम् ? सर्पिर्जतु मधूच्छिष्टादीनां कारणेषु परमाणुध्वग्निसंयोगाद् वेगापेक्षात् कर्मोत्पत्ती तज्जेभ्यो विभागेभ्यो द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् कार्यद्रव्यनिवृत्तावग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षात् स्वतन्त्रेषु परमाणुषु द्रवत्वमुत्पद्यते , ततस्तेषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्मानुसंयोगात् कर्मोत्पत्तौ कर्मोत्पत्तौ तज्जेभ्यः संयोगेभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते , तस्मिंश्च रूपाद्युत्पत्तिसमकालं कारणगुणप्रक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यत इति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६४४प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 719

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अग्नि के संयोग से पृथिवी और तेज ( इन दोनों ही ) में नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) किस प्रकार ? ( इनमें नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है ? ) उ ० ) घृत , लाह , मोम ( मधूच्छिष्ट ) प्रभृति द्रव्यों के उत्पादक परमाणुओं में बेग की सहायता से अग्निसंयोग के द्वारा क्रिया की उत्पत्ति होती है । उस क्रिया से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते । इस विभाग से उक्त परमाणुओं में रहनेवाले ( द्व्यणुक के ) उत्पादक संयोग का विनाश होता है । इस ( संयोगविनाश ) से घृतादि कार्य द्रव्यों के नाश हो जाने के बाद उष्णता की सहायता से अग्निसंयोग के द्वारा स्वतन्त्र ( परस्परासम्बद्ध ) परमाणुओं में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । इसके बाद भोग करनेवाले जीवों के अदृष्ट की सहायता से आत्मा और मन के संयोग से ( उन स्वतन्त्र परमाणुओं में ) क्रिया की उत्पत्ति होती है । इस क्रिया से ( द्रवत्व से युक्त परमाणुओं में द्रव्योत्पादक ) संयोग की उत्पत्ति होती है । इस संयोग से द्व्यणुकादि क्रम से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति होती है । इस कार्यद्रव्य में जिस समय रूपादिगुणों की उत्पत्ति होती है , उसी समय द्रवत्व की भी उत्पत्ति होती है ।

स्नेहनिरूपणम्

पृ. ६४५

भाष्य २३५

स्नेहो si विशेषगुणः ।

संग्रहमृजादिहेतुः ।

अस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६४५प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 720

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — केवल जल में ही रहनेवाला विशेषगुण ' स्नेह ' है । वह संग्रह सत्तू प्रभृति चूर्ण द्रव्यों को गोले का आकार बनाने का , एवं मर्दन प्रभृति क्रिया का हेतु है । उसके नित्यत्व और अनित्यत्व की व्यवस्था गुरुत्व की तरह जाननी चाहिए ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

स्नेहोऽपां विशेषगुणः संग्रहमृजादिहेतुः । संग्रहः परस्परमयुक्तानां सक्त्वादीनां पिण्डीभावप्राप्तिहेतुः संयोगविशेष मृजा कायस्योद्वर्तनादिकृता शुद्धिः | आदिशब्दान्मृदुत्वं च तेषां हेतुः । स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । गुरुत्वं च परमाणुषु नित्यम् , कार्ये च कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशाद् विनाशि , तथा स्नेहोऽपीति ।

संस्कारनिरूपणम्

पृ. ६४६

भाष्य २३६

संस्कारस्त्रिविध : - - वेगो - भावना स्थितिस्थापकश्च ।

तत्र वेग वेगो मूर्तिमत्सु पश्च सु द्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते नियतदिकक्रियाप्रबन्धहेतुः स्पर्शवद्रव्यसंयोगविशेषविरोधी क्वचित् कारणगुणपूर्वक्रमेणोत्पद्यते ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६४६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 721

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( ) वेग ( २ ) भावना और ( ३ ) स्थितिस्थापक भेद से संस्कार तीन प्रकार का है । इनमें वेग मूर्त्तद्रव्यों में ही विशेष प्रकार के निमित्तकारणों की सहायता से क्रिया के द्वारा उत्पन्न होता है । वह ( वेग ) किसी नियमित देश में ही क्रियासमूह का कारण है । स्पर्श से युक्त द्रव्यों का विशेष प्रकार का संयोग उसका विनाशक है । कहीं वह अपने आश्रय के समवायिकारण में रहनेवाले वेग से भी उत्पन्न होता है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति । तत्र वेगो मूर्तिमत्सु पञ्चद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते । पञ्चसु द्रव्येषु पृथिव्य - तेजोवायुमनस्सु कर्म वेगं करोति नान्यत्र , स्वयमभावात् । नोदनाभिघातादिनिमित्तविशेषापेक्षं न केवलम् मन्दगतौ वेगाभावात् । नियतदिक्क्रियाप्रबन्धहेतुः । यद्दिगाभिमुख्येन क्रियया वेगो जन्यते तद्दिगभिमुखतयैव क्रियासन्तानस्य हेतुरित्यर्थः । स्पर्शवदिति । विशिष्टेन स्पशवद्द्रव्यसंयोगेनात्यन्तनिबिडावयववृत्तिना वेगो विनाश्यते , यः स्वयं विशिष्टः । मन्दस्तु वेगः स्पर्शवद्रव्यसंयोगमात्रेण विनश्यति यथातिदूरं गतस्येषोस्स्तमितवायुप्रतिबद्धस्य । क्वचिदिति । बाहुल्येन तावद्वेगः कर्मजः क्वचिद् वेगवदवयवारब्धे जलावयविनि कारणवेगेभ्योऽपि जायते ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — सांसिद्धिकद्रवत्व की व्याख्या करने के बाद ' नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोरग्निसंयोगजम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अन कमप्राप्त नैमित्तिक द्रवत्व की व्याख्या करते हैं । ' कथम् ' अर्थात् नैमित्तिकद्रवत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है , किसी अज्ञ के द्वारा यह पूछे जाने पर ' सर्पिः ' इत्यादि से उस प्रश्न का उत्तर देते हैं ।

घृत , लाह , एवं मोम प्रभृति ( नैमित्तिक द्रवत्व वाले पार्थिव अवयवी द्रव्यों के ) कारणीभूत परमाणुओं में अग्नि के संयोग से क्रिया उत्पन्न होती है , क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं । कर्मजनित इन विभागों से परमाणुओं में रहनेवाले ( द्वयणुकों के ) उत्पादक पूर्वसंयोगों का नाश होता है । इन संयोगों के विनाश से घृतादि अवयवी द्रव्यों का परमाणुपयन्त विनाश हो जाता है ।

इस प्रकार उन परमाणुओं के स्वतन्त्र हो जाने पर इन स्वतन्त्र परमाणुओं में वह्नि के संयोग से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । भोग जनक अदृष्ट की सहायता से आत्मा और परमाणु के संयोग से ( द्रवत्वयुक्त ) परमाणुओं में क्रिया की उत्पत्ति होती है । फिर परमाणुओं के कर्मजनित इन संयोगों से द्वणुकादि क्रम से कार्य द्रव्यों की उत्पत्ति होती है , फिर आगे क्षण में रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है , उसी क्षण में समवायिकारणों में रहनेवाले द्रवत्वों से कार्यद्रव्यों में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है ।

हिमकरकादि में द्रवत्वविलय के प्रसङ्ग में भी इसी रीति का अनुसरण करना चाहिए ।

' स्नेहोऽपां विशेषगुणः संग्रहमृजादिहेतुः । ' संग्रह ' उस विशेष प्रकार के संयोग का नाम है , जिससे परस्पर असंयुक्त सत्तू प्रभृति द्रव्यों का गोला बन जाता है । ' मृजा ' शब्द से शरीर की वह शुद्धि अभिप्रेत है , जो शरीर में ( उबटन प्रभृति के ) मर्दन से प्राप्त होती है । आदि शब्द से मृदुत्वादि को समझना चाहिए । ' स्नेह ' इन सबों का कारण है । ' स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः अर्थात् गुरुत्व जिस प्रकार परमाणुओं में नित्य है , उसी प्रकार स्नेह भी परमाणुओं में नित्य है । जिस प्रकार कार्यद्रव्य में ' गुरुत्व ' कारणगुणक्रम से उत्पन्न होता है , एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है , उसी प्रकार कार्यद्रव्य में स्नेह भी कारणगुणक्रम से उत्पन्न होता है , एवं आभय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है ।

संस्कारस्त्रिविधोवेगो सवना स्थितिस्थापकश्चेति , तत्र वेगो मूर्तिमत्सु पञ्वद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते । ' पाँच द्रव्यों में अर्थात् पृथिवी , जल , तेज , वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में क्रिया से वेग को उत्पत्ति होती है , और किसी वस्तु में नहीं , क्योंकि इन पांच द्रव्यों को छोड़कर क्रिया स्वयं अन्यत्र कहीं नही है । क्रिया को वेग के उत्पादन में नोदन या अभिघात प्रभृति कारणों का साहाय्य आवश्यक है , वह स्वतन्त्र होकर केवल अपने ही बल से वेग का उत्पादन नहीं कर सकती . क्योंकि मन्दगति रूप क्रिया के रहने पर भी वेग की उत्पत्ति नहीं होती है ।

पृ. ६४७

भाष्य २३७

भावनासंज्ञकस्त्वात्मगुणो स्मृतिप्रत्यभिज्ञानहेतुर्भवति ज्ञानमददुःखादिविरोधी ।

पट्वभ्यासादरप्रत्ययजः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६४७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 722

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( २ ) पहिले देखे हुए , सुने हुए , एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों की स्मृति और प्रत्यभिज्ञा का कारणीभूत संस्कार ही ' भावना ' है । ज्ञान , मद एवं दुःखादि से उसका नाश होता है । पटु , अभ्यास , आदर और

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

भावनेत्यादि । भावनासंज्ञकस्तु संस्कार आत्मगुणः । दृष्टश्रुतानुभूतेष्विति । दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु स्मृतेः प्रत्यभिज्ञानस्य च हेतुरिति तस्य कार्यकथनम् । दृष्टश्रुतानुभूतेष्विति विपर्ययावगतोऽप्यर्थो बोद्धव्यः , तत्रापि स्मृतिदर्शनात् । ज्ञानेति । प्रतिपक्षज्ञानेन संस्कारो विनाश्यते । द्यूतादिव्यसनापन्नस्य पूर्वाधीत विस्मरणात् । मदेनापि संस्कारस्य विनाशः सुररामत्तस्य पूर्वस्मृतिलोपात् । मरणादिदुः खादपि संस्कारो विनश्यति , जन्मान्तरानुभूतस्मरणाभावात् । आदिशब्देन सुखादिपरिग्रहः , भोगासक्तस्य कुपितस्य वा पूर्ववृत्तस्मृत्यभावात् । पट्वभ्यासेति । पटुप्रत्ययादभ्यासप्रत्ययादादरप्रत्ययाच्च संस्कारो जायते । पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगविशेषादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारो जायते ।

पृ. ६४८

भाष्य २३८

पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारातिशयो जायते ।

यथा दाक्षिणात्यस्योष्ट्र दर्शनादिति ।

विद्या शिल्पव्यायामादिभ्यस्यमानेषु तस्मिन्नेवार्थे पूर्व पूर्वसंस्कारमपेक्षमाणादुत्त रोत्तरस्मात् प्रत्ययादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६४८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 723

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ज्ञान से इसकी उत्पत्ति होती है । पटु ( अनुपेक्षात्मक ) ज्ञान एवं आत्मा और मन के संयोग से अद्भुत विषयों में पटु ' नाम के विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । जैसे कि दक्षिण देश के रहनेवाले को ऊँट के देखने से ( ऊँट का पटु संस्कार होता है ) । विद्या , शिल्प एवं व्यायाम प्रभृति वस्तुओं का बार बार अभ्यास करते रहने से उन्हीं विषयों के पूर्वपूर्व संस्कारों से उत्पन्न प्रतीतियों ( स्मृतियों ) के कारण आत्मा और मन

संयोगसे एक विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

यथेति । उष्ट्रो दाक्षिणात्यस्यात्यन्ताननुभूताकारत्वादाश्चर्य भूतोऽर्थः । तद्दर्शनात् तस्य पटुः संस्कारो जायते , कालान्तरेऽप्युष्ट्रानुभवस्मृतिजननात् । अभ्यासप्रत्ययजं संस्कारं दर्शयति - विद्याशिल्पेत्यादि । विद्या शास्त्रागमादिका , शिल्पं पत्त्रभङ्गादिक्रिया , व्यायाम आयुषादिश्रमः , तेष्वभ्यस्यमानेषु तस्मिन्नेवार्थे पूर्वगृहीते । पूर्वेत्यादि । यतः सुचिरमनुवर्तते , स्फुटतरं च स्मरणं करोति । न ह्याद्यानुभव एव संस्कारविशेषमाधत्ते , प्रथमं तदर्थस्मरणाभावात् । नाप्युत्तर एव हेतु :, पूर्वाभ्यासवैयर्थ्यात् । तस्मात् पूर्वसंस्कारापेक्षोत्तरोत्तरानुभवाहिताधिकाधिक संस्कारोत्पत्तिक्रमेणोपान्त्यसंस्कारापेक्षादन्त्यानुभवात् तदुत्पत्तिः ।

इदं त्विह निरूप्यते । विद्यायामभ्यस्यमानायां किं तदर्थो वाक्येन प्रतिपाद्यते ? किं वा स्फोटेन ? कुतः संशयः ? विप्रतिपत्तेः । एके वदन्ति स्फोटोर्थं प्रतिपादयतीति । अपरे त्वाहुर्वाक्यं प्रत्यायकमिति । अतो युक्तः संशयः । किं तावत्प्राप्तम् ? स्फोटोऽर्थप्रत्यायक इति । यदि हि वर्णानतिरिक्तं पदम् पदानतिरिक्तं च वाक्यम् , तदार्थप्रत्यय एव न स्यादिति । तथाहि न वर्णाः प्रत्येकमर्थविषयां धियमाविर्भावयन्ति , शेषवर्णवैयर्थ्यात् । समुदायश्च तेषां न सम्भवति , अन्त्यवर्णग्रहणसमये पूर्वेषामसम्भवात् । नित्यत्वाद् वर्णानामस्ति समुदाय इति चेत् ? तथापि न तेषां प्रतीतिरनुवर्तते , अप्रतीयमानानां च प्रत्यायकत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । नहि प्रतीत्य अप्रतीयमानानां सर्वथा अप्रतीयमानानां च कश्चिद् विशेषः । पूर्वावगता वर्णाः स्मृत्यारूढाः प्रतीतिहेतव इति चेत् ? यदि हि स्मृतिरपि क्रमभाविनी ? तदा नास्ति वर्णसाहित्यम् , तृतीयवर्णग्रहणकाले प्रथमवर्णस्मृतिविलोपात् युगपदुत्पादस्तु स्मृतीनामनाशङ्कनीय एव , ज्ञानयोगपद्यप्रतिषेधात् ।

अथ प्रथममाद्यवर्णज्ञानम् , तदनु संस्कारः , तदनु तृतीयवर्णज्ञानम् , तेन प्राक्तनेन संस्कारेणान्त्यो विशिष्टः संस्कारो जन्यत इत्यनेन क्रमेणान्ते निखिल वर्णविषय : संस्कारो जातो निखिल वर्ण विषयामेकामेव स्मृति युगपत् करोतीत्याश्रीयते , तदा क्रमो हीयेत । क्रमो हि पौर्वापर्यम् , तच्च देशनिबन्धनं कालनिबन्धनं वा स्यात् उभयमपि तद्वणेषु नावकाशं लभते तेषां सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च । बुद्धिक्रमनिबन्धनस्तु वर्णानां क्रमो भवेत् स चैकस्यां स्मृतिबुद्धौ परिवर्तमानानां प्रत्यस्तमित इत्यक्रमाणामेव प्रतिपादकत्वम् । अतश्च सरो रसो वनं नवं नदी दोनेत्यादिष्वर्थभेदप्रत्ययो न स्याद् , वर्णानामभेदात् क्रमस्य प्रतीत्यनङ्गत्वाच्च । अस्ति चायं प्रतीतिभेदः सवर्णेष्वनुपपद्यमानः ? तर्ह्यतिरिक्तं निमित्तान्तरमाक्षिपतीति स्फोटसिद्धिः ।

फोटो s पि नाभिव्यक्तोऽर्थं प्रतिपादयति , सर्वदार्थोपलब्धिप्रसङ्गात् । अभिव्यक्तिश्च न तस्य वर्णेभ्यः सम्भवति , उक्तेन न्यायेन तेषामेकैकतः समुदितानां चासामर्थ्यात् तस्मात् स्फोटादपि दुर्लभा अर्थप्रतीतिः ।

अत्र वदन्ति । प्रयत्नभेदानुपातिनो वायवीया ध्वनयः प्रत्येकमेव तद्वर्णात्मकतया स्फोटमस्फुटमभिव्यञ्जयन्तः पूर्वं विषयसंस्कारसाचिव्यलाभादन्ते स्फोटमाभासयन्ते । तथा चान्ते प्रत्यस्तमित निखिल वर्णं विभागोल्लेखक्रममनवयवमेकं विस्पष्टमर्थतत्त्वमनुभूयते । यदि हि वर्णा एव पदम् ? न तदेकबुद्धि - निर्ग्राह्यमिति अनालम्बना बुद्धिः पर्यवस्यति । ' शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे ' इति च व्यपदेशो न घटते । तस्माद् वर्णव्यतिरिक्तः कोऽपि सम्भवत्येको यस्मादर्थः स्फुटीभवतीति ।

एवं प्राप्तेऽभिधीयते । गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदास इत्यादिषु पदेषूच्चार्यमाणेषु क्रमभाविनो वर्णाः परं प्रतीयन्ते न त्वन्ते वर्णव्यतिरिक्तस्य कस्यचिदर्थस्य संवेदनमस्ति । यदि हि तस्य पूर्व वर्णात्मकतया संविदितस्यान्ते स्वरूप संवेदनम् , पूर्वज्ञानस्य मिथ्यात्वमवसीयते रजतज्ञानस्येव शुक्तिकासंवित्तौ । न चैवं प्रतिपत्तिरस्ति नायं वर्णः , किं तु स्फोटः ' इति । या चेयमेकार्थावर्माशनो बुद्धि :, सापि नार्थान्तरमवभासयति , किन्तु वनप्रत्ययवद् वर्णसमुदायमात्रयवलम्बते । ' शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे ' इति वर्णसमुदायमेवोररीकृत्य लोकः प्रयुङ्क्ते ।

न च प्रत्यक्षेणाप्रतीयमानः प्रमाणान्तरतः शक्यो निरूपयितुम् , उपायाभावात् । अर्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्तिस्तदुपाय इति चेत् ? किमप्रतीयमानः स्फोटो sधिमे हेतुः समर्थितो भवद्भिः ? प्रतीयमानो वा ? अप्रतीयमानस्य हेतुत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । प्रतीतिश्च तस्य नास्तीत्युक्तम् , अर्थप्रत्ययो वर्णानामेव तद्भावभावितामनुगच्छति तेनैषामेव वरं व्युत्पत्त्यनुसारेणार्थप्रतिपादने कश्चिदुपाय आश्रीयताम् , न पुनरप्रतीयमानस्य गगनकुसुमस्येव कल्पना युक्ता । न चेदं वाच्यं वर्णानां प्रतिपादकत्वे क्रमभेदे कर्त्तृभेदे व्यवधान च प्रतीतिप्रसङ्ग इति । नहि ते विपरीतक्रमाः कर्त्तृभेदानुपातिनो देशकाल - व्यवहितास्तदर्थधियः कारणम् , , यथा तेभ्यः

कार्योन्या हि शक्तयो भावानाम् कार्यं दृश्यते , तथैव तेषां शक्तयः कल्प्यन्ते । यथोपदिशन्ति सन्तः -

यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने ।

वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति

सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः । अत एव नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः क्रमभेदात् । वर्णेषु क्रमो नास्ति स कथमेषामङ्ग स्यादिति चेन्न तेषामुत्पत्तिभाजामव्याप्यवृत्तीनां देशकालकृतस्य पौर्वापर्यस्य सम्भवात् । यच्चेदमुक्तम् प्रत्येकशः समुदितानां च न सामर्थ्यमिति , तदपि न परस्य मतमालोचितम् । यद्यपि वर्णा अनवस्थायिनस्तथापि तद्विषयाः क्रमभाविनः संस्काराः संभूय पदार्थधियमातन्वते । यद्वा पूर्ववर्णसंस्कारस्मरणयोरन्यतरसापेक्षोऽन्त्यो वर्णः प्रत्यायकः , यथा चानेकसंस्काराः संभूय स्मरणं जनयन्ति तथोपपादितं द्वित्वे । अथ मन्यसे वर्णविषयात् संस्कारादर्थप्रतीतिरयुक्ता , संस्कारा हि यद्विषयोपलम्भसम्भावितजन्मानस्तद्विषयामेव स्मृतिमाधातुमीशते न कार्यान्तरम् । यथाह मण्डनः स्फोटसिद्धौ–

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' नियतदिक्रियाप्रबन्धहेतुः ' वेग नियत दिशा में ही क्रियासमूह का उत्पादक है । अर्थात् जिस दिशा की तरफ क्रिया से वेग उत्पन्न होता है , उसी दिशा की तरफ क्रियासमूह को वेग उत्पन्न करता है । ' स्पर्शवदिति ' स्पर्श से युक्त द्रव्य के विशेष प्रकार के एवं निबिड़ अवयव के द्रव्य में रहनेवाले संयोग से तीव्र वेग का विनाश होता है । मन्द वेग का विनाश तो स्पर्श से युक्त किसी भी द्रव्य के संयोग से हो जाता है , जैसा कि अन्यत्र दूर ये हुए बाण के वेग का विनाश मन्द गति के वायु से भी हो जाता है । ' क्यचिदिति ' अर्थात् अधिकांश वेगों की उत्पत्ति तो क्रिया से ही होती है , किन्तु कुछ वेगों की उत्पत्ति

श्रीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले वेग से भी होती है , जैसे कि जल में कारणगुणक्रम से भी वेग की उत्पत्ति होती है ।

' भावनेत्यादि ' अर्थात् भावना नाम का जो संस्कार वह आत्मा का गुण है । ' दृष्टानुभूतेषु ' इस वाक्य के द्वारा इस संस्कार से उत्पन्न होनेवाले कार्यों को दिखलाया गया है कि इससे प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थ को स्मृति और प्रत्यभिज्ञान नाम का विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है ।

' दृष्टानुभूतेषु ' इस पद से ( केवल प्रत्यक्ष प्रमा और अनुमानप्रभा के द्वारा ज्ञात अर्थ ही नहीं , किन्तु ) विपर्यय के द्वारा ज्ञात अर्थों का भी ग्रहण करना चाहिए , क्योंकि उनके विषयों को भी स्मृति होती है । ' ज्ञानेति ' विरोधिज्ञान से संस्कार का विनाश होता है , क्योंकि जुआ प्रभृति व्यसनों में लगे हुए व्यक्तिको पहिले के अधीत विषयों का विस्मरण हो जाता है । मद से भी संस्कार का विनाश होता है , क्योंकि सुरापान से मत्त व्यक्ति के पूर्वस्मृति का लोप देखा जाता है ।

मरणादि दुःखों से भी संस्कार का नाश होता है , क्योंकि दूसरे जन्म की बातों का स्मरण नहीं होता । ( ' ज्ञानमददुःखादि ' पद में प्रयुक्त ) ' आदि ' पदसे सुखादि का ग्रहण करना चाहिए , क्योंकि भोग में आसक्त पुरुषों को या अत्यन्त क्रुद्ध पुरुषों को पहिले की बातों की विस्मृति हो जाती है । ' पट्वभ्यासेति ' पटुप्रत्यय से , अभ्यासप्रत्यय से एवं आदरप्रत्यय से संकार की उत्पत्ति होती है । ' पटुप्रत्यायादात्ममनसोः संयोगविशेषादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारो जायते यथेति ' |

( दक्षिण देश में ऊँट नहीं होता , अतः ) दाक्षिणात्यों को ऊँट का कभी अनुभव नहीं रहता , अतः कभी देखने पर अत्यन्त आश्चर्य होता है ; जिससे ऊँट को एक बार देखने पर भी उसे ऊँट विषयक ' पटुसंस्कार ' ही उत्पन्न होता है | अतः बहुत दिनों के बाद भी ऊँट की उन्हें स्मृति होती है । ' विद्या शिल्पेत्यादि इस सन्दर्भ के द्वारा अभ्यासप्रत्यय से उत्पन्न संस्कार का निरूपण किया गया है । इस सन्दर्भ के ' विद्या ' शब्द से शास्त्र एवं आगम प्रभृति अभिप्रेत हैं ।

' शिल्प ' शब्द से पत्रभङ्गादि ' क्रियाओं को समझना चाहिए । ' व्यायाम ' शब्द से अस्त्रशस्त्रादि चलाने का श्रम लेना चाहिए | इन सबों का अभ्यास करने पर , ' तस्मिन्नेवार्थे ' अर्थात् पहिले अनुभूत उसी अर्थ में ( संस्कार की उत्पत्ति होती है ) । ' पूर्वपूर्वेत्यादि ' यतः वह संस्कार बहुत दिनों तक रहता है , एवं अत्यन्त स्पष्ट स्मृति का उत्पादन करता है । पहिले बार के ही अनुभव से विशिष्ट संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती , क्योंकि उस संस्कार से स्मृति की उत्पत्ति नहीं होती हैं ।

केवल आगे के अनुभव ही संस्कार के उत्पादक नहीं हैं , क्योंकि ( ऐसा मानने पर ) पहिले के सभी अभ्यास व्यर्थ हो जाएँगे । ' तस्मात् ' पूर्व संस्कार से युक्त आत्मा में आगे के अनुभवों से संस्कारों की उत्पत्ति को धारा चलती है , इस प्रकार उपान्त्य ( अर्थात् अन्तिम संस्कार से अव्यवहितपूर्व वृत्ति ) संस्कार की सहायता से अन्तिम अनुभव के द्वारा विशिष्ट संस्कार की उत्पत्ति होती है ।

इस प्रसङ्ग में इस विषय का विचार उठाता कि शास्त्र या आगम रूप कथित विद्या के अभ्यास से जो उनके अर्थों का प्रतिपादन होता है , वह वाक्य से उत्पन्न होता है ? या स्फोट से उत्पन्न होता है ? ( प्र ० ) यह संशय ही उपस्थित क्यों हुआ ? ( 30 ) परस्पर विरोधी मतों के कारण संशय उपस्थित होता है । किसी सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि स्फोट से अर्थ की प्रतीति होती है । दूसरे सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि वाक्य से ही अर्थ का बोध होता है । तो फिर इस प्रसङ्ग में क्या होना उचित है ?

( १० ) स्फोट से ही अर्थ की प्रतीति उचित है । क्योंकि पदों का समूह ही वाक्य है । एवं वर्णों का समूह ही पद है , इस वस्तुस्थिति के अनुसार वाक्य के अर्थबोध का होना सम्भव नहीं है । ( विशदार्थ यह है कि वाक्य के ) हर एक वर्णं अर्थविषयक बोध के उत्पादक नहीं हैं , क्योंकि ऐसा मानने पर उनमें से किसी एक ही वर्ण से अर्थ विषयक बोध का सम्पादक हो जाएगा फिर अवशिष्ट वर्णों का प्रयोग व्यर्थ हो जाएगा ।

वर्णों का एक समुदाय होना सम्भव ही नहीं है , क्योंकि अन्तिम वर्ण के प्रत्यक्ष के समय पूर्व के सभी वर्णों का रहना सम्भव नहीं है | ( प्र ० ) वर्ण तो नित्य हैं , अतः सभी अमयों में उनकी सत्ता सम्भावित है , सुतराम् वर्णों का समुदाय असम्भव नहीं है । ( उ ० ) फिर भी किसी एक समय में सभी वर्णों का ग्रहण सम्भव नहीं है । वर्णं गृहीत होकर ही अर्थप्रत्यय के कारण है ।

यदि वर्ण स्वरूपतः अर्थप्रत्यय के कारण हों तो फिर उनसे विंदा अर्थ की प्रतीति होनी चाहिए , क्योंकि एकबार ज्ञात वर्ण के अज्ञान में और वर्णों के सर्वया अज्ञान में कोई अन्तर नहीं है । अतः इस प्रकार भी वर्ण समूह से सर्वप्रत्यय का उपपादन नहीं किया जा सकता ।

( प्र ० ) पद या वाक्य के जितने वर्ण पहिले ज्ञात हैं , वे सभी पुन : स्मृतिपथ में आकर अर्थ बोध का उत्पादन करते हैं । ( उ ० ) ( इस प्रसङ्ग में पूछना है कि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्णं की अलग २ स्मृति होती है ? या सभी वर्णों का एक ही स्मरण होता है ? ) इनमें यदि यह प्रथमपक्ष मानें कि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण की स्मृति क्रमशः होती है , तो फिर स्मृति मे भी वर्णों का एकत्र होना सम्भव नहीं है , क्योंकि तीसरे वर्णं की स्मृति के समय प्रथम वर्ण की स्मृति अवश्य ही विनष्ट हो जाएगी ।

प्रत्येक वर्णविषयक सभी स्मृतियों का एक ही समय उत्पन्न होना तो सम्भव ही नहीं है क्योंकि एक समय अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि इस प्रकार की कल्पना करें कि ( प्र 0 ) पहिले प्रथम वर्ण का ज्ञान होता है , उसके बाद उस वर्ण विषयक संस्कार की उत्पत्ति होती है , उसके बाद तृतीय वर्ण का ज्ञान , इसके बाद उसी क्रम से पहिले पहिले के संस्कारों से अन्तिम वर्णविषयक विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है ।

अन्त में सभी वर्णों के इस एक ही संस्कार से एक ही समय सभी वर्णविषयक एक ही स्मृति की उत्पत्ति होती है । ( उ ० ) तो फिर वर्णों में क्रम ही नहीं रह जाएगा , क्योकि पूर्वापरीभाव ( एक के बाद दूसरा ) को ही क्रम कहते हैं । यह क्रम दो प्रकारों से सम्भव है ( १ ) देशमूलक और ( २ ) क . लमूलक । वर्णों में इन दोनों में से एक भी प्रकार के क्रम की सम्भावना नहीं है । क्योंकि वर्ण व्यापक हैं , इस लिए दैशिक पूर्वापरीभाव रूप क्रम सम्भव नहीं है । वर्ण नित्य ( अविनाशी ) हैं , इसीलिए कालिक पूर्वा-

भाव की सम्भावना भी नहीं है । अतः वर्णों में क्रम को उपपत्ति का एक ही मार्ग बच जाता है कि बुद्धिक्रम के अनुसार वर्णों का क्रम मानें । किन्तु सभी वर्षों का एक ही संस्कार मान लेने से वह मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है । अतः इस पक्ष में यह आपत्ति आ खड़ी होती है कि ' बिना क्रम के ही वर्णों से अर्थ का बोध होता है ' । जिससे ' सर ' शब्द और ' रस ' शब्द से , एवं ' वन ' शब्द से और ' नव ' शब्द से अथवा ' नदी ' शब्द से और ' दीन ' शब्द से समानविषयक बोधों की आपत्ति होगी , क्योंकि दोनों शब्दों के वर्ण समान ही हैं , क्रम को बोध का कारण मान नहीं सकते । किन्तु उन दोनों शब्दों के समुदायों में से प्रत्येक पद के द्वारा विभिन्न बोध ही होता है । अतः समान वर्ण के उक्त पदों से विभिन्न प्रकार की उक्त प्रतीति की उपपत्ति स्फोट के बिना नहीं हो सकती , अतः ' स्फोट ' का मानना आवश्यक है ।

( प्र ) स्फोट भी तो ज्ञात होकर ही अर्थ विषयक बोध का उत्पादन कर सकता है , यदि ऐसा न मानें स्वरूपतः ही स्फोट को अर्थबोध का कारण मानें तो सर्वदा अर्थ विषयक बोध की आपत्ति होगी । ( अब यह देखना है कि स्फोट की अभिव्यक्ति किससे होती है ? ) वर्णों से स्फोट को अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है , क्योंकि

या वाक्य के प्रत्येक वर्ण से यदि स्फोट की अभिव्यक्ति मानेंगे , तो अवशिष्ट वर्ण ही व्यर्थ हो जाएँगे । यदि वर्णनमुदाय से स्फोट की अभिव्यक्ति मानें , तो सो भी सम्भव नहीं है , क्योंकि सभी वर्णों में दैशिक या कालिक साहित्य सम्भव ही नहीं है । तस्मात् स्फोट से भी अर्थ का बोध सम्भव नहीं है ।

इस आक्षेप के प्रसङ्ग में स्फोट से अर्थबोध माननेवालों का कहना है कि स्फोट पहिले से ही रहते हैं , किन्तु अनभिव्यक्त रहते हैं , किन्तु तत्तद्वर्णों के उच्चारण के उक्त प्रयत्न से निष्पन्न ( कोष्ठय ) वायु की ध्वनियाँ उक्त अनभिव्यक्त स्फोट को ही पहिले तत्तद्वर्णं स्वरूप से अस्फुट रूप में अभिव्यक्त करती हुई पश्चात् अर्थविषयक संस्कार की सहायता से अति स्फुट रूप से भी अभिव्यक्त करती हैं । यही कारण है कि अन्त में वर्णों के अलग अलग स्वरूप नहीं रह जाते , एवं वर्णों का अलग अलग उल्लेख भी नहीं रह जाता , इन सबों से अलग एक सम्पूर्ण और अत्यन्त स्पष्ट अर्थ तत्व का बोध होता हूं । यदि वर्णों का समुदाय ही पद हो ( वर्णों का कोई एक स्फोठ न हो ) तो फिर पद में एकत्व की प्रतीति न हो सकेगी , अत : ' एकं पदम् ' इत्यादि बुद्धियाँ निर्दिषयक हो जाएँगी । एवं ' शब्दात् अर्थ प्रतिपद्यामहे ' ( एक अखण्ड शब्द से अर्थ को हम समझते हैं । यह व्यवहार न हो सकेगा ( किन्तु ' बहुत से शब्दों से हम अर्थ को समझते हैं ' इस प्रकार का व्यवहार होगा ) | अतः वर्णों से भिन्न कोई एक वस्तु है , जिससे अर्थ ' प्रस्फुटित ' होता है ( उसी को अन्वर्थसंज्ञा ' स्फोट है ) ।

इन सब युक्तियों से स्फोट की सत्ता की सम्भावना उपस्थित होने पर सिद्धान्तियों का कहना है कि ' गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदास ' ( अर्थात् पाण्डुदास कायस्थ कुल के तिलक रूप हैं एवं गुण रूपी रत्न ही उनके भूषण हैं ) इन सब वाक्यों के उच्चारण करने पर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले वर्णों की ही प्रतीति होती है , किन्तु उच्चारण के अन्त में इन वर्णों से भिन्न किसी ( स्फोट रूप ) अर्थ का भान नहीं होता है ।

यदि ऐसा कहें कि ( प्र ० ) प्रथमतः वर्ण का जो भान होता है , वह वस्तुतः स्फोट का ही वर्ण रूप से भान होता है और अन्त में स्फोट का स्फोटत्व रूप से भान होता है । ( उ ) तो फिर जैसे कि शुक्तिका में रजत ज्ञान को मिथ्या मानना पड़ता है , वैसे ही स्फोट में वर्णत्व विषयक प्रथम ज्ञान को मिथ्या ही मानना पड़ेगा । ( किन्तु आगे ) यह बाघज्ञान भी नहीं होता कि ' ज्ञात होनेवाला यह वर्ण नहीं है , किन्तु स्फोट है ' ।

वर्णों के समुदाय में जो एकत्व की प्रतीति होती है , उस प्रतीति का भी विषय उन वर्णों के समुदाय से भिन्न कुछ भी नहीं है , जैसे कि ' यह वन है ' इस प्रतीति का विषय वृक्षसमुदाय से भिन्न स्वतन्त्रवन नाम की कोई व तु नहीं है । ' शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे ' यह पञ्चमी एकवचन से युक्त वाक्य का प्रयोग भी उन वर्णों के समुदाय को ही एक वस्तु मान कर किया जाता है ।

प्रत्यक्ष के द्वारा जिसका सर्वथा ज्ञान होना ही असम्भव उस ( स्फोट ) का अन्य प्रमाणों के द्वारा निरूपण सम्भव नहीं है , क्योंकि उसके ज्ञान का कोई दूसरा उपाय ही नहीं है । अर्थ की प्रतीति से वर्णों में हो उसके अन्वय और व्यतिरेक का आक्षेप होता है , अतः वर्णों से ही अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए कोई उपाय ढूंढ़ निकालना ही युक्त है । यह अनुचित है कि इनके लिए आकाश कुसुम की तरह सर्वथा अप्रतोत होनेवाले किसी ( स्फोट रूप ) अर्थ की कल्पना की जाय ।

( वर्गों से ही अर्थ का बोध मानने के पक्ष में ) इन दोषों का उद्भावन करना अयुक्त है कि ( प्र ० ) ( वर्णों से ही यदि अर्थ की प्रतीति हो तो ) ( १ ) विभिन्न क्रम से पठित शब्दों से अर्थात् रस सर , वन नव नदी दीन , प्रभृति शब्दयुगलों से समान अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी , क्योंकि दोनों में समान ही वर्ण है । ( २ ) एवं विभिन्न कर्त्ताओं से उच्चरित विभिन्न वर्णों से ( अर्थात् देवदत्त से उच्चरित ' घ ' और यज्ञदत्त से उच्चरित ' ट ' शब्द से घट विषयक ) बोध की आपत्ति होगी ।

एवं ( ३ ) व्यवहित वर्णो से ( अर्थात् ' घ ' के उच्चारण के बाद ककारादि वर्णों का उच्चारण और उसके बाद उच्चरित ' ट ' वर्ण से ) घट विषयक बोध की आपत्ति होगी । ( उ ० ) ये आपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि उक्त विभिन्न क्रमों से पठित , या विभिन्न कत्र्ताओं से पठित या व्यवहित होकर पठित वर्णों को समान अर्थविषयक बोध का कारण ही नहीं मानते , क्योंकि किस प्रकार की वस्तुओं में किसकी कारणता है ? यह केवल कार्य से ही अनुमान किया जा सकता है ।

जिन वस्तुओं से जिन प्रकार के कार्यों की उत्पत्ति देखी जाती है , उन वस्तुओं को ही उन कार्यों का कारण माना जाता है । जैसा कि विद्वानों का उपदेश है कि जितने एवं जिन वर्णों के जिस प्रकार के विन्यास में जिन अर्थों के बोध का सामर्थ्य ( कार्य से ) निश्चित है , वे ही वर्ण उसी विन्यास - क्रम से उस अर्थ के बोधक हैं । "

अत एव इसी क्रमभंद के कारण नद शब्द से और दोन शब्द से विभिन्न विषयक बोध होते हैं । ( प्र ० ) वर्ण नित्य और व्यापक हैं , अतः उनका क्रम ही सम्भव नहीं है , फिर शब्दों का क्रम शब्दबोध का अङ्ग कैसे होगा ? ( उ ० ) १ नहीं , ऐसी बात नहीं है , क्योंकि वर्ण उत्पत्तिशील हैं , और अव्याप्यवृत्ति हैं ( अर्थात् आकाश में किसी प्रदेश में रहते हैं , अपने आश्रयीभूत कहीं और किसी प्रदेश में नहीं ) अतः उनमें कालिक और दैशिक दोनों ही प्रकार के क्रम हो सकते हैं । यह जो कहा गया था कि ( प्र ० ) पद या वाक्य घटक प्रत्येक वर्ण में अर्थबोध की हेतुता मानने से अवशिष्ट वर्गों का प्रयोग व्यर्थ हो जाएगा , एवं वर्णों के समुदाय में अर्थबोध की जनकता सम्भव नहीं है क्योंकि सभी वर्णों की कहीं एकत्र स्थिति ही सम्भव नहीं है फिर उनका समुदाय हो कैसा ? इस प्रकार वर्णन प्रत्येकशः ही अर्थबोध के कारण हो सकते हैं , न समूहापन्न होकर ही ( अत : स्फोट हो अर्थबोध के कारण हैं , वर्ण नहीं ) | ( उ ० ) यह कहना भी वर्ण को ही अर्थबोध का कारण माननेवाले प्रतिपक्षी के मत की आलोचना किये बिना ही मालूम होता है ।

टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ६५५) १. यहाँ मुद्रित स्थायकन्दली पुस्तक का पाठ कुछ अशुद्ध और व्यत्यस्त मालूम पड़ता है । ' एवं प्राप्तेऽभिधीयते ' इत्यादि वाक्यों से स्फोट का खण्डन और ' वाक्य से हो अर्थबोध की उत्पत्ति का सिद्धान्त ' उपपादित हुआ है , जिसका उपसंहार ' यावन्तो यादृशाः ' इत्यादि श्लोकात के श्लोक को उद्धृत कर किया गया है । इसके बाद ' सवंगत - त्वात्यित्वाच्च वर्णानां क्रमभाव ' ऐसी पक्ति है ।

यहीं कुछ त्रुटि मालूम होती है , क्योंकि वर्णों का सर्वगतत्व उनके क्रमभाव का बाधक है , जिसका अनुपद ही ' क्रमो हि पौर्वापर्यम् ' इत्यादि से उपपादन किया गया है । तदनुसार वर्णों का असर्वगतत्व और अनित्यत्व ये हो वर्णों के क्रमभाव के ज्ञापक होंगे । अतः उक्त पक्ति को यदि सिद्धान्तपक्षीय मानें तो ' सर्वगतत्वात् ' इत्यादि पाठ के स्थान पर उसके विरुद्ध ' अनित्यत्वादसवंगतत्वाच्च वर्णानां कमलावः ' ऐसा पाठ मानना पड़ेगा ।

दूसरा उपाय वह है कि उक्त पङ्क्ति को सिद्धान्तपक्षीय न मान कर पूर्वपक्षीय ही मान लें , और उस वाक्य के ' क्रमभाव : ' इस पद को क्रमाभावः ' में परिवर्तित कर दें । तदनुसार " सर्वगतत्वानित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमाभावः । अत एव " इतने अंश को ' वर्णेषु क्रमो नास्ति ' इस पूर्वपक्षवाक्य के पहिले पाठ करें । एवं ' पावन्तो यादृशा ये च इस श्लोक के नीचे सिद्धान्त पक्ष का ' नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः क्रमात् इतना ही रक्खें । इनमें द्वितीय पक्ष के अनुसार ही मैंने अनुवाद किया है ।

1 किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि ( अन्यत्र स्मृति और संस्कार के कार्यकारणभाव में समानविषयत्व का नियम यद्यपि ठीक है तथापि ) पदों में या वाक्यों में प्रयुक्त होनेवाले वर्णों के हर एक अनुभव से आत्मा में जिस संस्कार का आधान होता है , वह संस्कार स्मृति के कारणीभूत संस्कारों से कुछ विलक्षण प्रकार का होता है , जिस संस्कार में पद के अर्थविषयक अनुभव कराने की शक्ति होती है . उस संस्कार के कार्य

पृ. ६५६

भाष्य २३९

प्रयत्नेन मनश्चक्षुपि स्थायित्वाऽपूर्वमर्थं दिदृक्षमाणस्य विद्युत्स- म्पातदर्शनवदादरप्रत्ययः तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते ।

यथा देवहदे राजतसौवर्णपद्मदर्शनादिति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६५६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 731

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रयत्न के द्वारा मन को चक्षु में सम्बद्ध कर विशेष प्रकार की वस्तु को देखने की इच्छावाले पुरुष को विद्युत् सम्पात के देखने की तरह ( उक्त विशेष वस्तु में ) आदरबुद्धि उत्पन्न होती है । इस आदरबुद्धि एवं आत्मा और मन के संयोग , इन दोनों से विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है । जैसे देवताओं के सरोवर में चाँदी और सोने के कमलफूल देखने से ( विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है ) ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

संस्काराः खलु यद्वस्तुरूपप्रख्याविभाविताः ।

फलं तत्रैव जनयन्त्यतोऽर्थे धोर्न कल्प्यते ॥ इति ।

तदप्यसमीचीनम् । यतः पदार्थप्रतीत्यनुगुणतया प्रत्येकमनुभवराधीयमाना वर्णविषयाः संस्काराः स्मृतिहेतुसंस्कार विलक्षणशक्तय एवाधीयन्ते , तथाभूतानामेव तेषां कार्येणाधिगमात् । सन्तु वा भावनारूपाः संस्कारातथापि तेषामर्थप्रतिपादनसामर्थ्यमुपपद्यते , तद्भावभावित्वात् । यो हि स्फोट कल्पयति , तेन स्फोटस्यार्थप्रतिपादनशक्तिरपि कल्पनीयेति कल्पनागौरवम् । उभयसिद्धस्य संस्कारस्य सामर्थ्य मात्र कल्पनायां लाघवमस्तीत्येतदेव कल्पयितुमुचितम् । यथोक्तं न्यायवादिभिः-

यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं संस्कारस्य व्यवस्थितम् ।

कार्यान्तरेऽपि सामथ्यं न तस्य प्रतिहन्यते ॥ इति ।

तदेवं वर्णेभ्य एव संस्कारद्वारेणार्थप्रत्ययसम्भवादयुक्ता स्फोटकल्पनेति ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — यह ठीक है कि वर्णं चिरस्थायी नहीं हैं ( क्षणित्र हैं ) फिर क्रमशः उत्पन्न उनके सभी संस्कार मिलकर पदार्थ षयक बोध को उत्पन्न करेंगे । अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि पहिले पहिले वर्ण के संस्कार अथवा पहिले पहिले वर्ण की स्मृति इन दोनों में से किसी एक के साहाय्य से केवल अन्तिम वर्ण से भी अर्थ का बोध मान सकते हैं । अनेक संस्कार मिलकर एक ही स्मरण को रीति से सम्पादन करते हैं वह रीति द्वित्वनिरूपण

जिस के प्रसङ्गमें लिख आये हैं । यदि यह कहना चाहते हों कि( प्र ० ) जिस विषयक अनुभव से जिस संस्कार की उत्पत्ति होगी , वह संस्कार उसी विषयक स्मृति को उत्पन्न कर सकती है , जिससे एक विषयक संस्कार से अपर विषयक स्मृतिरूप भी दूसरा कार्य नहीं हो सकता । अतः वर्णविषयक संस्कार से अर्थविषयक बोध रूप दूसरे कार्य की उत्पत्ति कैसे होगी ? ( क्योंकि वर्णविषयक संस्कार से तो वर्ण विषयक स्मृतिरूप कार्यं ही उत्पन्न हो सकता है ) ।

जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने ' स्फोटसिद्धि ' नामक ग्रन्थ में कहा है कि संस्कार जिन विषयों की प्रख्या ' अर्थात् अनुभव से उत्पन्न होंगे , उन्हीं विषयों में वे स्मृति को उत्पन्न कर सकते हैं , अतः वर्णविषयक संस्कारों से अर्थविषयक ' धी ' अर्थात् बोध उत्पन्न नहीं हो सकता । ( उ ० ) से ऐसा ही निश्चय करना पड़ता है ।

मान लिया कि वह भावनाख्य संस्कार है ( जिससे सामान्य नियम के अनुसार समानविषयक स्मृति ही हो सकती है ) तथापि पदार्थबोध के साथ उसके अन्वय ( और व्यतिरेक ) से इस संस्कार में अर्थ को प्रतिपादन करने की शक्ति की कल्पना अयुक्त नहीं कही जा सकती ।

जो कोई स्फोट नाम की अतिरिक्त वस्तु की कल्पना करते हैं , उन्हें उस वस्तु की कल्पना और स्फोट नाम की उस वस्तु में अर्थबोध के सामर्थ्य की कल्पना , ये दो कल्पनायें करनी पड़ती हैं | स्फोट न माननेवाले को वर्ण विषयक संस्कार में अर्थविषयक बोध के सामर्थ्यरूप धर्म की कल्पना करनी पड़ती है , क्योंकि वर्णविषयक संस्कार रूप धर्मी को तो दोनों पक्षों को मानना ही है । अतः लाघव की दृष्टि से भी वर्णों से ही अर्थविषयक बोध का मानना उचित है ।

जैसा कि न्यायवादियों ( भट्टकुमारिल ने ) कहा है कि " यद्यपि यह निर्णीत है कि संस्कार स्मृति का कारण है , फिर भी उसमें दूसरे कार्य की शक्ति का निराकरण नहीं किया जा सकता " । तस्मात् वर्णों से ही उनके संस्कार रूप व्यापार के द्वारा अर्थबोध हो सकता है , अतः स्फोट की कल्पना अयुक्त है ।

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पृ. ६५८

भाष्य २४०

स्थितिस्थापकस्तु स्पर्शवद्रव्येषु वर्तमानो घनावयवसन्निवेशविशिष्टेषु कालान्तरावस्थायिषु स्वाश्रयमन्यथाकृतं यथावस्थितं स्थापयति ।

स्थावरजङ्गमविकारेषु धनुःशाखाशृङ्गदन्तास्थिसूत्रवस्त्रा- दिषु भुग्न संवर्तितेषु स्थितिस्थापकस्य कार्य संलक्ष्यते ।

नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो s स्यापि गुरुत्ववत् ।

कार्यरूप धनुष , शाखा , शृङ्ग , दाँत , अस्थि , सूत्र एवं वस्त्र प्रभृति वस्तुओं पुरुषगुणः ।

कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः , अतीन्द्रि धर्मः योऽन्त्य सुखसंविज्ञानविरोधी पुरुषान्तःकरणसंयोग विशुद्धाभिसन्धिजः , वर्णाश्रमिणां प्रतिनियतसाधन निमित्तः ।

तस्य तु साधनानि श्रतिस्मृतिविहितानि वर्णाश्रमिणां सामान्यविशेषभावेनावस्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६५८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 733

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — स्पर्श से युक्त द्रव्यों में रहनेवाले संस्कार का नाम स्थितिस्थापकसंस्कार ' है , जो कालान्तर में भी रहनेवाले एवं अवयवों के कठिन संयोग से उत्पन्न अपने आश्रय द्रव्य को दूसरे प्रकार की स्थिति से अपनी स्वरूपस्थिति में ले आता है । स्थितिस्थापक संस्कार का यह ( अपने आश्रय को पूर्वस्थिति में ले आने का ) कार्य टेढ़े किये हुए स्थावर या जङ्गम द्रव्यों के को सीधा होने पर लक्षित होता है । गुरुत्व के सदृश ही इसके नित्यत्व और अनित्यत्व के प्रसङ्ग में भी जानना चाहिए । धर्म पुरुष ( जीवात्मा ) का गुण है । वह अपने उत्पादक जीव के प्रिय हित और मोक्ष का कारण है , एवं अतीन्द्रिय है । अन्तिम सुख और तत्त्वज्ञान इन दोनों से इसका नाश होता है । पुरुष और अन्तःकरण ( मन ) के संयोग और संकल्प इन दोनों से इसकी उत्पत्ति होती है । वर्णों और आश्रमियों के लिए विहित कर्म ( भी ) उसके साधन हैं । वेद एवं धर्मशास्त्रादि ग्रन्थों में वर्णों और आश्रमियों के साधारण धर्मों और विशेषधर्मों के साधन के लिए कहे गये द्रव्य , गुण और कर्म भी इसके कारण हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

आदर प्रत्ययजं संस्कारं दर्शयति - प्रयत्नेनेत्यादिना । आदरः प्रयत्नातिशयः , तस्मादपूर्वमर्थं द्रष्टुमिच्छतो यद् विद्युत्सम्पातदर्शनवदर्थदर्शनं तदादरप्रत्ययः , तमेवापेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते , चिरकालातिक्रमेऽपि तस्यानुच्छेदात् । अत्रोदाहरणम् - यथा देवहदे इत्यादि ।

देवदे चैत्रमासस्य चित्रानक्षत्रसंयुक्तायां पौर्णमास्यामर्धरात्रे राजतानि सौवर्णानि च पद्मानि दृश्यन्त इति वार्तामवगम्य तस्यां तिथौ दिदृक्षया मिलितानां सन्निधीयमानेऽर्धरात्रे प्रयत्नातिशयाच्चक्षुषि मन : स्थापयित्वा स्थितानामुत्थि तेषु पद्मेषु क्षणमात्रदर्शनादादरप्रत्ययात् संस्कारातिशयः कालान्तरेऽपि स्फुटतरस्मृतिहेतुरुपजायते । स्थितिस्थापकं कथयतिस्थितिस्थापक स्त्विति ।

अस्पर्शव द्रव्यवृत्तेर्भावनाख्यात् संस्कारात् स्पर्शवद्द्रव्यवृत्तित्वेन स्थितिस्थापकस्य विशेषमाख्यातुं तुशब्दः । ये घना निविडा अवयवसन्निवेशा : तैर्विशिष्टेषु स्पर्शवत्सु द्रव्येषु वर्तमानः स्थितिस्थापकः स्वाश्रयमन्यथाकृतमवनामितं यथावत् स्थापयति पूर्ववदृजुं करोति । ये प्रत्यक्षतोऽनुपलम्भात् स्थितिस्थापकस्याभावमिच्छन्ति तान् प्रति तस्य कार्येण सद्भावं दर्शयन्नाह - स्थावरजङ्गमविकारेष्विति ।

भुग्नाः कुब्जीकृताः संवर्तताः पूर्वावस्थां प्रापिताः , भुग्नाश्च ते संवर्तिताश्चेति भुग्न संवतिता :, तेषु स्थितिस्थापकस्य कार्यं लक्ष्यते । किमुक्तं स्यात् ? धनु : - शाखादिष्ववनामितविमुक्तेषु यत् पूर्वावस्थाप्राप्तिहेतोराद्यस्य कर्मणः एकार्थसमवेतसमवायिकारणं स स्थितिस्थापकः संस्कारः , अन्यस्यासम्भवात् । अन्ये तु भुग्नसंवर्तितेष्विति सूत्रवस्त्रादिष्विति अस्येदं विशेषणमिति मन्यमाना भुग्नानि यानि सूत्रादीनि संवर्तितानि तेष्विति व्याचक्षते ।

तस्य नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो गुरुत्ववत् । यथा गुरुत्वं परमाणुषु नित्यं कार्येष्वनित्यं कारणगुणपूर्वकं च , तथा स्थितिस्थापकोऽपीत्यर्थः ।

धर्मः पुरुषेति । यो धर्मः , स पुरुषस्य गुणो न कर्मसामर्थ्यमित्यर्थः । कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः । प्रियं सुखम् , हितं सुखसाधनम् , मोक्षो नवानामात्मविशेषगुणानामत्यन्तोच्छेदस्तेषां हेतुः । कर्तुः प्रियादीनामेव यो हेतु : स धर्म इति व्याख्येयम् । न तु कर्तुरेव यः प्रियादिहेतुः स धर्म इति व्याख्या , पुत्रेण कृतस्य श्राद्धस्य पितृगामितृप्तिफलश्रवणात् । वृष्टिकामेन कार्यं कृतायां तदन्यस्यापि समोपदेशवर्तिनो वृष्टिफलसम्बन्धदर्शनात् ।

स्वर्गकामो यजेतेत्यादिवाक्ये यागेन स्वर्गं कुर्यादिति कर्मणः श्रेयःसाधनत्वं श्रूयते । यश्च निःश्रयसेन पुरुषं संयुनक्ति स धर्मः , तस्माद् यागादिकमेव धर्मः , न पुरुषगुणः । तथा हि , यो यागमनुतिष्ठति तं धार्मिकमित्याचक्षते । एतदयुक्तम् । क्षणिकस्य कर्मणः कालान्तरभाविफलसाधनत्वासम्बन्धात् । अथोच्यते । क्षणिकं कर्म , कालान्तरभावि च स्वर्गफलम् , विनष्टाच्च कारणात् कार्यस्यानुत्पत्तिः श्रुतं च यागादेः कारणत्वम् , तदेतदन्यथानुपपत्त्या फलोत्पत्त्यनुगुणं किमपि कालान्तरावस्थायि कर्मसामर्थ्यं कल्प्यते यद्द्द्वारेण कर्मणां श्रुता फलसाधनता निर्वहति । तच्च प्रमाणान्तरागोचरत्वादपूर्वमिति व्यपदिश्यते ।

यथोक्तम्-

फलाय विहितं कर्म क्षणिकं चिरभाविने ।

तत्सिद्धिर्नान्यथेत्येतदपूर्वमपि कल्प्यते ॥

अत्रोच्यते । न कर्मसामर्थ्यं क्षणिके कर्मणि समवैति , शक्तिमति विनष्टे निराश्रयस्य सामर्थ्यस्यावस्थानासंभवात् । स्वर्गादिकं च फलं तदानी - मनागतमेव , न शक्तेराश्रयो भवितुमर्हति । यदि त्वनुष्ठानानन्तरमेव स्वर्गी भवति ? अपूर्वकल्पनावैयर्थ्यम् , तदुपभोगश्च दुर्निवारः । विशिष्टशरीरेन्द्रियादिविरहादननुभवश्चेत् ? तर्ह्ययं तदानीमनुपजात एव स्वर्गस्योपभोग्यैकस्वभावत्वात् । अनुपभोग्यमपि सुखस्वरूपमस्तीति अदृष्टकल्पनेयम् । तस्मान्न फलाश्रयमपूर्वम् । न चाकाशादिसमवेतादपूर्वादात्मगामिफलसम्भवः । वस्तुभूतं च कार्यमनाधारं नोपपद्यते , तस्मादात्मसमवेतस्यैव तस्योत्पत्तिरभ्यनुज्ञेया । तथा सति न तत्कर्मसामर्थ्यं स्यात् , अन्यसामर्थ्यस्यान्यत्रासमवायात् । अथान्यस्याप्यन्यसमवेता शक्तिरिष्यते , तस्याः कार्यानुमेयत्वादिति चेत् ?

यथोक्तम् -

शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैवोपलभ्यते ।

तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च ॥ इति ।

तदयुक्तम् । विनष्टे शक्तिमति तन्निरपेक्षस्य शक्तिमात्रस्य कार्यजनक त्वानुपलम्भादेव । तेनैतदपि प्रत्युक्तम् । यदुक्तं मण्डनेन विधिविवेके - " तदाहितत्वात् तस्य शक्तिरिति " यागेनाहितत्वादपूर्वं यागस्य कार्यं स्यान्न तु शक्तिः , अपूर्वोपकृतात् कर्मणः फलानुत्पत्तेः तस्माच्चिरनिवृत्ते कर्मणि देशकालावस्थादिसहकारिणोऽपूर्वादेव फलस्योत्पत्तेरपूर्वमेव श्रेयः साघनम् । कारणत्वश्रुतिस्तु यागादरपूर्वजननद्वारेण न साक्षादिति प्रमाणानुरोधादाश्रयणीयम् । तथा सति युक्तं धर्मः पुरुषगुण इति । योऽपि यागादौ धर्मव्यपदेश :, सोऽप्यपूर्वसाधनतया प्रीतिसाधन इव स्वर्गशब्दप्रयोगः । स्वर्गसाधने हि चोदितस्य ज्योतिष्टोमस्य निरन्तरं प्रीतिसाधनतयार्थवादेन स्तुतेश्चन्दनादौ च प्रीतियोगे सति प्रयोगात् , तदभावे चाप्रयोगात् , प्रीतिनिबन्धनः स्वर्गशब्दः , यस्य यथालक्षणया प्रीतिसाधने प्रयोगः प्रीतिमात्राभिधानेऽपि तस्मात् प्रीतिसाधनप्रतीत्युत्पत्तेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनावयर्थ्यात् । एवं धर्मशब्दस्यापि लक्षणया तत्साधने प्रयोगः , एकाभिधानादेवोभयप्रतीतिसिद्धेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनानवकाशादिति तार्किकाणां प्रक्रिया |

अतीन्द्रियः केनचिदिन्द्रियेणायोगिभिर्न गृह्यत इत्यतीन्द्रियो धर्मः । अन्त्यसुखसंविज्ञानविरोधी । धर्मस्तावत् कार्यत्वादवश्यं विनाशी , न च निर्हेतुको विनाशः कस्यचिद् विद्यते । अन्यतस्ततो विनाशे चास्य नियमेन फलोत्पत्तिकालं यावदवस्थानं न स्यात् । फलं च धर्मस्य कस्यचिदनेकसंवत्सरसहस्रोपभोग्यम् , तस्य यदि प्रथमोपभोगादपि नाशः , कालान्तरे फलानुत्पादः । न चैकस्य निर्भागस्य भागशो नाशः सम्भाव्यते , तस्मादन्त्यस्यैव । सम्यग्विज्ञानेन धर्मो विनाश्यते ।

येतु नित्यं धर्ममास्तेषां प्रायेणानुपपत्तिः , धर्माधर्मक्षयाभावात् । पुरुषान्तःकरणेति । आत्मविशेषगुणत्वात् सुखादिवत् । विशुद्धेति । विशुद्धोऽभिसन्धिः दम्भादिरहितः संकल्पविशेषः , तस्माद्धर्मो जायते । वर्णाश्रमिणामिति । वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः । आश्रमिणो ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थयतयः । तेषां धर्मः प्रतिवर्णं प्रत्याश्रमं चाधिकृत्य विहितः साधनैर्जन्यत इत्यर्थः । अतीन्द्रियस्य धर्मस्य साधनानि कुतः प्रत्येतव्यानि तत्राहतस्य त्विति ।

विशिष्टेनानुष्ठानेनाचार्य मुखाच्छ्रयत एव न लिखित्वा गृह्यत इति श्रुतिवेदः , स्मृतिर्मन्वादिवाक्यम् , ताभ्यां विहितानि प्रतिपादितानि वर्णाश्र मिणां सामान्यविशेषभावेनावस्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि सामान्यानि धर्मसाधनानि । तत्र सर्वेषां वर्णाश्रमिणां च सामान्यरूपतया धर्मसाधनानि कथ्यन्ते । धर्मे श्रद्धा धर्मे मनःप्रसादः | अहिंसा भूतानामनभिद्रोहसंकल्पः । प्रतिषिद्धस्याभिद्रोहस्य निवृत्तेरधर्मो न भवति , न धर्मो जायते । अनभिद्रोहसंकल्पस्य विहितत्वात् स्यादेव धर्मसाधनम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' प्रयत्नेन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' आदरप्रत्यय ' से उत्पन्न होनेवाले संस्कार का निरूपण करते हैं । प्रकृत में ' आदर ' शब्द का अर्थ है विशेष प्रकार का प्रयत्न । इस आदर के द्वारा अपूर्व वस्तु को देखने की इच्छा से युक्त पुरुष को गिरती हुई बिजली को देखने की तरह जिस वस्तु का ज्ञान हो , वह ज्ञान ही ' आदर प्रत्यय ' है । इसके साहाय्य से ही आत्मा और मन के संयोग से वह विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है , जो चिरकाल तक विनष्ट नहीं होता । इसी का उदाहरण ' यथा देवह्रदे ' इत्यादि से दिखलाया गया है । ' चैत्र पूर्णिमा की आधी रात को यदि चित्रा नक्षत्र पड़ता है , तो उस समय देवहद में चाँदी और सोने के कमल दीख पड़ते हैं ' यह सुनकर उन कमलों को देखने के लिए उस रात को उस समय विशेष प्रयत्न के द्वारा मन को चक्षु में सम्बद्ध कर जो देवहद के किनारे खड़ा रहता है , वह यदि एक क्षण भर भी उन कमलों को देख लेता है , फिर भी उसका यह देखना यतः ' आदरप्रत्यय ' है , अतः इससे होनेवाला संस्कार चिरकाल में भी स्मृति को उत्पन्न कर सकता है ।

' स्थितिस्थापकस्तु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' स्थितिस्थापक ' संस्कार का निरूपण करते हैं । भावना नाम के संस्कार के आश्रय में स्पर्श नहीं है और स्थितिस्थापक संस्कार स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण है , आश्रयों के ( अस्पर्शवत्व और स्पर्शवत्त्व ) इन दोनों अन्तर के द्वारा दोनों संस्कारों में अन्तर दिखलाने के लिए प्रकृत सन्दर्भ में ' तु ' शब्द का प्रयोग किया गया है ।

अवयवों के ' घन ' अर्थात् कठिन संनिवेशयुक्त स्पर्शवाले द्रव्य में विद्यमान ' स्थितिस्थापक ' संस्कार ' अन्यथा कृत ' अर्थात् नमाये हुए अपने आश्रयभूत द्रव्य को ' यथावत्स्थापन ' अर्थात् पहिले की तरह सीधा कर देता है । जो समुदाय प्रत्यक्ष न होने के कारण ' स्थितिस्थापक ' संस्कार को मानना ही नहीं चाहते , उन्हें कार्यहेतुक अनुमान के द्वारा स्थितिस्थापक संस्कार की सत्ता को समझाने के लिए ही ‘ स्थावरजङ्गमविकारेषु ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है ।

' भुग्न ' शब्द का अर्थ है टेढ़ा किया हुआ ( तिय्र्यक्कृत ) , और संवत्तित ' शब्द का अर्थ है पहिली अवस्था को प्राप्त । प्रकृत सन्दर्भ का भुग्न संवत्तितेषु ' पद ' भुग्नाश्च ते संवत्तिताश्च भुग्नसंवत्तिताः तेषु ' इस प्रकार के समास से निष्पन्न है । इस शब्द के द्वारा स्थितिस्थापक संस्कार से उत्पन्न कार्य दिखलाये गये हैं । इससे फलितार्थ क्या निकला ?

यही कि धनुष या वृक्ष की डॉल प्रभृति जब अवनमित होकर फिर जिन क्रियाओं के द्वारा पहिली अवस्था को प्राप्त होते हैं , उन क्रियाओं में से पहिली क्रिया का असमवायिकारण एवं उस क्रिया के साथ ( उसके आश्रय रूप ) एक अर्थ में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला संस्कार ही स्थितिस्थापक संस्कार ' है । क्योंकि अवनमित शाखादि की पुन : पूर्वावस्था की प्राप्ति का कोई दूसरा कारण नहीं हो सकता ।

कुछ अन्य लोग इस सन्दर्भ के ' भुग्न संवत्ततेषु ' इस पद को इसी सन्दर्भ के ' सूत्रवस्त्रादिषु ' इसका विशेषण मानते हैं , ( तदनुसार इस वाक्य का ऐसा अर्थ करते हैं ) कि संवतित जो सूत्रादि , उनमें रहनेवाला संस्कार ही ' स्थितिस्थापक संस्कार ' है । ' तस्य नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो गुरुत्वत् ' अर्थात् जैसे कि परमाणुओं में रहनेवाला गुरुत्व नित्य है , एवं कार्यद्रव्यों में रहनेवाला गुरुत्व अनित्य है , उसी प्रकार ' स्थितिस्थापक संस्कार ' को भी समझमा चाहिए ।

( अर्थात् परमाणुओं में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार नित्य है , एवं कार्यद्रव्यों में रहनेवाला अनित्य ) ।

' धर्मः पुरुषेति ' । अर्थात् धर्म ( नाम का ) जो गुण है वह ' पुरुष ' का अर्थात् जीव का ही गुण है , ( ज्योतिष्टोमादि ) क्रियाओं का शक्तिरूप नहीं है । ' कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः ' ( इस वाक्य में प्रयुक्त ) प्रिय शब्द का अर्थ है सुख , ' हित ' शब्द सुख के साधनों को समझाने के लिए लिखा गया है , एवं ' मोक्ष ' शब्द जीव के बुद्धि प्रभृति नो विशेषगुणों का अत्यन्त विनाश रूप अर्थ का बोधक है । इन सबों का हेतु ( ही ' धर्म ' है ) । ' कर्तुः प्रियहितमोक्ष हेतु : ' इस वाक्य की व्याख्या इस रीति करनी चाहिए कि ( धर्मजनक क्रियाओं के ) कर्ता के ' प्रियादि ' का जो हेतु वही ' धर्म ' है । इस प्रकार की व्याख्या नहीं करनी चाहिए , क्योंकि पुत्र के द्वारा अनुष्ठित श्राद्धरूप क्रिया से पिता में ही प्रीतिरूप फल का होना शास्त्रों में उपलब्ध होता है । एवं वृष्टि की कामना से ' कारीरी ' नाम के याग के अनुष्ठान से जो वृष्टिरूप फल उत्पन्न होता है , उससे याग करनेवाले और उनके समीप के और लोग भी प्रीति का लाभ करते हैं ।

( प्र ) ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि वाक्यों से याग ' के द्वारा स्वर्ग का सम्पादन करना चाहिए ' इस प्रकार यागादि श्रेय कर्म ही स्वर्गादि इष्टों के साधक के रूप में सुने जाते हैं । ' धर्म ' उसी का नाम है जो पुरुष को श्रेयस के साथ सम्बद्ध करे । तस्मात् यागादि कर्म ही धर्म हैं , धर्म जीव का गुण नहीं है । एवं जो यागादि कर्मों का अनुष्ठान करता है उसे ही लोग ' धार्मिक ' कहते भी हैं ।

( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि कर्म क्षण भर ही रहते हैं , उनसे बहुत काल बाद होनेवाले स्वर्गादि का सम्पादन सम्भव नहीं है । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) यागादि क्रियायें क्षणिक हैं । उनके स्वर्गादि फल उनसे बहुत समय बाद होते हैं । यह भी निर्णीत है कि विनाश को प्राप्त हुए कारणों से कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है । फिर भी यागादि क्रियाओं में स्वर्गादि फलों को हेतुता वेदों से श्रुत है । किन्तु यह हेतुता तब तक उपपन्न नहीं हो सकती , जब तक की यागादि के बाद और स्वर्गादि की उत्पत्ति से पहिले तक रहनेवाले किसी व्यापार की कल्पना न कर लें , जिससे यागादि में वेदों के द्वारा श्रुत स्वर्गादि जनकता का निर्वाह हो सके । वही व्यापार और किसी प्रमाण के द्वारा गम्य न होने के कारण ' अपूर्व ' कहलाता है । जैसा कहा गया है कि ' बहुत दिनों बाद होनेवाले स्वर्गादि फलों के लिए जो क्षण मात्र रहनेवाले यागादि का विधान किया गया है , वह विधान तब तक उपपन्न नही हो सकता , जब तक कि ' अपूर्व ' की कल्पना न कर ली जाय । अतः ' अपूर्व ' की कल्पना करते हैं ।

) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि यह कर्म का सामर्थ्य रूप

( उ ० अपूर्वं ( जिसे स्वर्गसाधत पर्यन्त रहना है ) यागादि क्रियाओं में तो रह नहीं सकता , क्योंकि क्षणिक । अतः उनके नाश हो जाने पर बिना आश्रय के अपूर्व ( स्वर्गोत्पादन पर्यन्त ) की अवस्थिति ही सम्भव नहीं है । स्वर्गादि फल भी अपूर्व के आश्रय नहीं हो सकते , क्योंकि अपूर्व की उत्पत्ति के समय स्वर्गादि भविष्य के गर्भ में ही रहते हैं ।

यदि यागादि के अनुष्ठान के तुरंत बाद ही स्वर्गादि को उत्पत्ति ( आश्रय को उपपन्न करने के लिए ) मानें , तो उनका उपयोग भी ( उसी समय ) मानना पड़ेगा | यदि ऐसा कहें कि उस समय ( यागादि के अनुष्ठान के तुरंत बाद ) स्वर्गादि भोगों के उपयुक्त शरीर या इन्द्रियाँ नहीं इसी से स्वर्ग की उत्पत्ति नही होती है , तो फिर यही मानना पड़ेगा कि स्वर्गादि उस समय उत्पन्न ही नहीं होते , क्योंकि स्वर्गादि उपभोगस्वभाव के ही हैं ।

यह कल्पना अभूतपूर्व होगी कि स्वर्ग की सत्ता तो उस समय भी है , किन्तु वह स्वर्ग उपभोग्य नहीं है । यह भी सम्भव नहीं है कि ( पुरुष से भिन्न ) आकाशादि कोई भी वस्तु उसके आश्रय हों , क्योंकि आकाशादि में रहनेवाले अपूर्व से आत्मा में स्वर्ग की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यह भी सम्भव नहीं है कि अपूर्व रूप कार्य की उत्पत्ति बिना आश्रय के ही हो , क्योंकि वह भावरूप कार्य है | अतः अपूर्व को यदि मानना है , तो उसकी उत्पत्ति आत्मा में ही माननी पड़ेगी ।

यदि ऐसा कहें कि ( प्र ० ) हम यह भी मान लेंगे कि एक वस्तु की ऐसी भी शक्ति हो सकती है , जो समवाय सम्बन्ध से दूसरी वस्तु में रहे , क्योंकि शक्ति की सत्ता तो उससे उत्पन्न कार्यरूप लिङ्ग के द्वारा ही अनुमित हो सकती है । जैसा कहा गया है कि " कार्यरूप हेतु से अनुमित होनेवाली शक्ति जहाँ जिस आश्रय में उपलब्ध होगी , उसी में उसकी सत्ता माननी पड़ेगी " अतः उस कारण को शक्ति उसी कारण में ही रहेगी , कभी उससे भिन्न आश्रय में नहीं रह सकती ।

( उ ० ) किन्तु यह भी अयुक्त ही हैं , क्योंकि शक्ति के आश्रय का विनाश हो जाने पर उस आश्रय से सर्वथा निरपेक्ष केवल शक्ति से कार्य की उत्पत्ति की उपलब्धि नहीं होती है । आगे कहे हुए इस समाधान से आचार्य मण्डन मिश्र की विधिविवेक ग्रन्थ की यह उक्ति भी खण्डित हो जाती है कि " उससे ( याग से ) जिस लिए कि ' उसका ' अपूर्व का आधान होता है , अतः ' अपूर्व ' याग की शक्ति कहलाती है " । क्योंकि याग से ' आहित ' अर्थात् उत्पन्न होने के कारण अपूर्व याग से उत्पन्न हुआ कार्य है ।

अपूर्व याग की शक्ति नहीं है , क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि याग से ही स्वर्ग की उत्पत्ति होती है , और इस उत्पादन कार्य में अपूर्व याग का साहाय्य करता है ( क्योंकि स्वर्ग की उत्पत्ति के अव्यवहित पूर्व क्षण में याग की सत्ता ही नहीं है , फिर अपूर्व किसका साहाय्य करेगा ? ) 1 तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि यागादि कर्मों के नाश हो जाने के बहुत पीछे उनसे उत्पन्न अपूर्व से ही स्वर्गादि फलों की उत्पत्ति होती है , जिसमें उसे उपयुक्त देश कालादि का भी सहयोग प्राप्त होता है ।

अतः प्रमाण के द्वारा इसी पक्ष का अवलम्बन करना पड़ेगा कि अपूर्व ही स्वर्गादि श्रेयों का साक्षात् कारण है । यागादि क्रियाओं में जो स्वर्गादि फलों के हेतुत्व की चर्चा श्रुतियों में है वह हेतुता ' अपूर्व का उत्पादक होने से परम्परया यागादि भी स्वर्गादि के साधन हैं , इसी अभिप्राय से समझना चाहिए । तस्मात् भाष्य की यह उक्ति ठीक है कि ' धर्म पुरुष काही गुण है ' । यागादि क्रियाओं में जो ' धर्म ' शब्द का व्यवहार होता है , उसे अपूर्व या धर्म के साधनरूप अर्थ में लाक्षणिक समझना चाहिए ।

जैसे कि प्रीति के चन्दनवनितादि साधनों में ' स्वर्ग ' शब्द का प्रयोग किया जाता है । स्वर्ग के साघनीभूत अपूर्व के लिए विहित ज्योतिष्टोमादि क्रियाओं का जो धर्मशब्द से नियमित व्यवहार होता है , वह उसका स्तुति रूप अर्थवाद है । एवं चन्दनादि साधनों में जब प्रीति का सम्बन्ध रहता है तभी ' स्वर्ग ' शब्द का प्रयोग होता है , जब जिसे उन साधनों से सुख नहीं मिलता है , तब उससे चन्दनादि में स्वर्गशब्द का प्रयोग नहीं होता ।

अतः यही समझना चाहिए कि प्रीति के साधनों में स्वर्गशब्द लाक्षणिक है , और प्रीति में हो उसकी अभिधा शक्ति है । क्योंकि प्रोति और उसके साधन इन दोनों में स्वर्गशब्द को अभिधा की कल्पना व्यर्थ है । इसी प्रकार धर्म के ज्योतिष्टोमादि साधनों में धर्मशब्द का प्रयोग लक्षणा के द्वारा ही होता है । क्योंकि धर्म को अपूर्वरूप एक ही अर्थ में अभिधा मान लेने से ही अपूर्वरूप उसके मुख्यार्थं का और ज्योतिष्टोमादि रूप लक्ष्यार्थं दोनों के बोध की उपपत्ति हो जाएगी ।

अपूर्व में और अपूर्व के कारण ज्योतिष्टोमादि , दोनों में धर्म शब्द की अभिधा शक्ति की कल्पना व्यर्थ है । यहीं तार्किक लोगों की रीति है ।

' अतीन्द्रियः ' अर्थात् योगियों से भिन्न कोई भी साधारण पुरुष धर्म को किसी भी इन्द्रिय से नहीं देख सकता , अतः धर्म अतीन्द्रिय ' है । ' अन्त्यसुखसं विज्ञान विरोधी ' धर्म यतः उत्पत्तिशील वस्तु है , अतः वह विनाशशील भी है । किन्तु कोई भी विनाश बिना किसी कारण के नहीं होता । यदि अन्त्यसुख और संविज्ञान इन दोनों से भिन्न किसी से धर्म का विनाश मानें तो नियमपूर्वक स्वर्गादि फलों की उत्पत्ति से पहिले तक उसकी सत्ता नहीं रह सकेगी ।

( यदि किसी भी उपभोग से धर्मं का विनाश मानें तो ) किसी किसी धर्म के फल का उपभोग हजारों साल चलता है , अतः उनमें पहिले उपभोग से ही उसका विनाश हो जाएगा , आगे उससे उपभोग हों रुक जाएगा । यह भी सम्भव नहीं है कि एक अखण्ड वस्तु में उसके किसी एक भाग का विनाश हो ( और अवशिष्ट भाग बचा रहे ) , तस्मात् अन्तिम सुख हो धर्म का नाशक है ( अवान्तर सुख नहीं ) संविज्ञान अर्थात् सम्यग् विज्ञान ( तत्त्वज्ञान ) से भी धर्म का नाश होता है ।

जो कोई धर्म को नित्य मानते हैं , उनके मत में मोक्ष को उत्पत्ति नहीं हो सकेगी , क्योंकि उसके लिए धर्म और अधर्म दोनों ही का विनाश आवश्यक है , जो धर्म को नित्य मानने से सम्भव नहीं है । ' पुरुषान्तःकरणेति ' ( धर्म पुरुष और अन्तःकरण के संयोग से उत्पन्न होता है क्योंकि ) वह भी सुखादि की तरह आत्मा का विशेषगुण है । विशुद्धेति ' विशुद्ध जो अभिसन्धि अर्थात् दम्भादि से रहित जो विशेष प्रकार का संकल्प , उससे धर्म की उत्पत्ति होती है ।

' वर्णाश्रमिणामिति ' ' वर्ण ' शब्द से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र अभिप्रेत हैं । ' आश्रमी ' हैं-- ब्रह्मचारी , गृहस्थ , वानप्रस्थी और संन्यासी । अर्थात् इन सबों के तथ्यतः प्रत्येक वर्ण के मनुष्यों के लिए एवं प्रत्येक आश्रम के मनुष्यों के लिए शास्त्रों में विहित जो साधन हैं , उनसे धर्म की उत्पत्ति होती है । धर्म तो अतीन्द्रिय है , फिर उसके कारणों का ज्ञान कैसे होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर ' तस्य तु ' इत्यादि से दिया गया है ।

विहित विशेष प्रकार के अनुष्ठान से आचार्य के मुख से जिसे सुना ही जाता है , अर्थात् जिसका लिप्यादि से ज्ञान नहीं होता , वही है ' श्रुति ' अर्थात् वेद । ' स्मृति ' शब्द से मन्वादि ऋषियों के वाक्य अभिप्रेत हैं । श्रुति और स्मृति इन दोनों से ' विहित ' अर्थात् प्रतिपादित जो सभी वर्णों और सभी आश्रमवाले पुरुषों के लिए सामान्यभाव और विशेषभाव से स्थित द्रव्य , गुण और क्रिया , वे सभी धर्म के सामान्यसाधन हैं ।

इनमें सभी वर्णों और सभी आश्रमियों के लिए समान रूप से जो धर्म के साधन हैं , उनका निरूपण ' धर्मे श्रद्धा ' इत्यादि से करते हैं । धर्म के प्रसङ्ग में चित्त की प्रसन्नता ही धर्म में श्रद्धा है । सभी प्राणियों के प्रति द्रोह न करने का संकल्प अहिंसा हैं । जो द्रोह निषिद्ध हैं , उस द्रोह के न करने से इतना ही होता है कि ' अधर्म ' नहीं होता । किन्तु उससे धर्म की उत्पत्ति नहीं होती है ।

धर्मनिरूपणम्

पृ. ६६६

भाष्य २४१

तत्र सामान्यानि - धर्मे श्रद्धा , अहिंसा , भूतहितत्वम् , सत्यवचनम् , अस्तेयम् , ब्रह्मचर्यम् अनुपधा , कोधवर्जनमभिषेचनम् , शुचिद्रव्य सेवनम् विशिष्टदेवताभक्तिरुपवासोऽप्रमादश्च ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६६६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 741

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उन ( सामान्यधर्मों के और विशेषधर्मों के साधनों ) में धर्म में श्रद्धा , अहिंसा , प्राणियों का उपकार , सत्यवचन , अस्तेय ( दूसरे की वस्तु को विना उसकी आज्ञा के न लेना ) ब्रह्मचर्य , दूसरे को ठगने की अनिच्छा ( अनुपधा ) अक्रोध , स्नान , पवित्रवस्तुओं का सेवन , इष्ट देवता में भक्ति , उपवास और अप्रमाद ये ( १३ ) सभी वर्णों और सभी आश्रमियों क लिए समान रूप से धर्म के साधन हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

भूतहितत्वं भूतानामनुग्रहः । सत्यवचनं यथार्थवचनम् । अस्तेयमशास्त्रपूर्वकं परस्वग्रहणं मया न कर्तव्यमिति संकल्पः , न तु परस्वादाननिवृत्तिमात्रमभावरूपम् । ब्रह्मचर्यम् स्त्रीसेवापरिवर्जनम् । एतदपि संकल्परूपम् । अनुपधा भावशुद्धिः , विशुद्धेनाभिप्रायेण कृतानां कर्मणां धर्मसाधनत्वात् । क्रोधवर्जनं क्रोधपरित्यागः , सोऽपि संकल्पात्मक एव । अभिषेचनं स्नानम् । शुचिद्रव्यसेवनं शुचीनां तिलादिद्रव्याणां क्वचित् पर्वणि नियमेन सेवनं धर्मसाधनम् । विशिष्टदेवताभक्ति : त्रयीसंमतायां देवतायां भक्तिरित्यर्थः । उपवास एकादश्यादिभोजननिवृत्तिसंकल्पः । अप्रमादो नित्यनैमित्तिकानां कर्मणामवश्यम्भावेन करणम् । एतानि सर्वेषामेव समानानि धर्मसाधनानि । इज्या यागहोमानुष्ठानम् । अध्ययनं वेदपाठः । दानं स्वद्रव्यस्य परस्वत्वापत्ति संकल्पविशेषः । शूद्रस्यापि दानमस्त्येव तेन यज्ञादिषु यद्दानं तदभिप्रायेणेदं त्रैवर्णिकानां विशिष्टं धर्मसाधनमुक्तम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — द्रोह न करने का कथित जो संकल्प है उससे अवश्य ही धर्म उत्पन्न होगा . क्योंकि उसका विधान किया गया है । ' भूतहितत्व ' शब्द से प्राणियों के प्रति अनुग्रह अभीष्ट है । ' सत्यवचन ' शब्द का अर्थ है सच बोलना । ' दूसरे व्यक्ति के जिस धन क लेना शास्त्र में विहित नहीं है , वह घन मुझे नहीं लेना चाहिए ' इस प्रकार का संकल्प ही ' अस्तेय ' है । अस्तेय शब्दसे ' दूसरे के धन का न लेना ' केवल यह अभावरूप अर्थ नहीं है ।

' ब्रह्मचर्य्य ' शब्द का अर्थ हैं , ' स्त्री से उपभोगसम्बन्ध का परित्याग ' यह भी संकल्प रूप ही है । ' अनुपधा ' शब्द से ' अभिप्रायशुद्धि ' अभीष्ट है , यतः विशुद्ध बुद्धि के द्वारा अनुष्ठित कर्म ही धर्म के कारण हैं । ' क्रोधवर्ज । ' है क्रोध का परित्याग , यह भी संकल्प रूप ही है । ' अभिषेचन ' है स्नान | ' शुचिद्रव्य का सेवन ' अर्थात् किसी विशेष पर्व में तिल प्रभृति पवित्र द्रव्यों का सेवन धर्म का कारण है ।

' विशिष्टदेवता में भक्ति ' अर्थात् तीनों वेदों के द्वारा प्रतिपादित किसी देवता में भक्ति । ' उपवास ' शब्द से एकादशी प्रभृति विशेष तिथियों में भोजन न करने का संकल्प अभिप्रत है । ' अप्रमाद ' शब्द का अर्थ है , ' नित्य एवं नेमित्तिक कर्मो का अवश्य अनुष्ठान करना ' ये सभी वर्णों और सभी आश्रमों के व्यक्तियों के लिए धर्म के साधन हैं । ' इज्या ' शब्द से याग एवं होम का अनुष्ठान समझना चाहिए ।

पृ. ६६७

भाष्य २४२

ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामिज्याध्ययनदानानि

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६६७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 742

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यज्ञ वेदों का अध्ययन , और दान ये तीन ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य ( द्विजों ) इन तीनों वर्णों के लिए समान रूप से धर्म के साधन हैं ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' अध्ययन ' शब्द का अर्थ है वेदों का पाठ । ' दान ' शब्द से वह विशेष प्रकार का संकल्प अभीष्ट है , जिससे अपने स्वत्ववाले न में दूसरे के स्वत्व की उत्पत्ति हो सके । यज्ञादि में जो दान किये जाते हैं , यहाँ उन्हीं दानों को समझना चाहिए , यदि ऐसी बात न हो , किन्तु दान शब्द से सामान्यतः सभी दान अभीष्ट हों ( तो फिर ) वणिकों के लिए निर्दिष्ट विशेष धर्मो में इसकी गणना असङ्गत हो जाएगी , क्योंकि केवल दान तो शूद्रों के लिए भी धर्म का साधन है ही ।

ब्राह्मणों के ' विशिष्ट ' अर्थात् असाधारण धर्म के जो साधन हैं ( अर्थात् जो साधन केवल ब्राह्मणों में ही धर्म का उत्पादन कर सकते हैं ) उनका प्रतिपादन प्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । विहित एवं विशेष व्यक्ति से दान का ग्रहण ही ' प्रतिग्रह ' शब्द से लेना चाहिए । अध्यापन शब्द का अर्थ प्रसिद्ध हो है । याजन ' शब्द का अर्थ है ऋत्विक् का कार्य करना । ' एतानि ब्राह्मणस्य धर्मसाधनानि ' ब्राह्मणों को इन्हीं उपायों से प्राप्त धन के द्वारा धर्म सम्पादन का अधिकार है । ' स्ववर्ण विहिताश्च संस्कारा : ' अर्थात् ब्राह्मणों के लिए विहित अड़तालिस प्रकार के संस्कार भी उनमें वेदों से निद्दिष्ट अनुष्ठान करने की योग्यता सम्पादन के द्वारा धर्म के माधन है ।

पृ. ६६७

भाष्य २४३

ब्राह्मणस्य विशिष्टानि प्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि , स्वर्णविहिताश्च संस्काराः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६६७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 742

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रतिग्रह , अध्यापन ( वेदों का पढ़ाना ) यज्ञ कराना ( याजन ) अपने वर्ण ( ब्राह्मण ) के लिए विहित संस्कार , ये सभी ब्राह्मणों के लिए विशेषधर्म के साधन हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

ब्राह्मणस्य विशिष्टान्यसाधारणानि धर्मसाधनानि प्रतिपादयतिप्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि । प्रतिग्रहो विशिष्टाद् द्रव्यग्रहणम् । अध्यापनं तु प्रसिद्धमेव । याजनमात्विज्यम् । एतानि ब्राह्मणस्य धर्मसाधनानि , तस्यामीभिरेवोपायैरजितानां द्रव्याणां धर्माधिकारात् । स्ववर्णविहिताश्चाष्टचत्वारिंशत् संस्काराः वैदिककर्मानुष्ठानयोग्यतापादनद्वारेण ब्राह्मणस्य धर्मसाधनम् ।

पृ. ६६८

भाष्य २४४

क्षत्रियस्य सम्यक् प्रजापालनमसाधुनिग्रहो युद्धेष्वनिवर्त्तनं स्वकीयाश्च संस्काराः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६६८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 743

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अच्छी तरह प्रजा का पालन करना , दुष्टों का दमन , युद्ध से न लौटना ( अनिवृत्ति ) और अपने ( क्षत्रियों ) के लिए शास्त्रों में विहित संस्कार ये सभी क्षत्रियों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

क्षत्रियस्य विशिष्टानि धर्मसाधनानि । सम्यक् प्रजापालनं न्यायवृतीनां प्रजानां परिरक्षणम् । असाधुनिग्रहः , दुष्टानां यथाशास्त्रं शासनम् । युद्धेष्वनिवर्त्तनं युद्धेषु विजयावधिः प्राणावधिर्वा आयुधव्यापारः । स्वकीयाश्च संस्काराः ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' क्षत्रियस्य विशिष्ट नि धर्मसाधनानि ' | ' सम्यकं प्रजापालन ' अर्थात् उचित न्याय की रीति से चलनेवाली प्रजाओं का पालना करना , ' असाधुनिग्रह ' अर्थात् शास्त्रों में कही गयी रीति के अनुसार दुष्टों को दण्ड देना , युद्धेष्वनिवर्त्तनम् ' अर्थात् जब तक विजय प्राप्त न हो जाय , था जब तक प्राण रहे तब तक अस्त्र शस्त्रों को चलाते रहना , एवं क्षत्रियों के लिए विहित संस्कार , य सभी क्षत्रियों के लिए धर्म कं साधन है ।

' वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि ' । मूल्य देकर दूसरों से द्रव्य लेना ' क्रय ' कहलाता है । मूल्य लेकर दूसरे को अपना द्रव्य देना ही ' विक्रय है । जोती हुई भूमि में बीजों को बोना या रोपना ही ' कृषि ' है । गाय बकरी प्रभृति को पालना ही पशुपालन ' है । ये सभी वैश्यों के लिए ही धर्म के साधन हैं । इन्हीं उपायों से प्राप्त धन वैश्यों के धर्म के साधक हैं ।

पृ. ६६८

भाष्य २४५

वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि स्वकीयाश्च संस्काराः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६६८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 743

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — खरीद , बिक्री , खेती करना , पशुओं का पालन , अपने ( वैश्यों के ) लिए शास्त्रों के द्वारा विहित संस्कार ये सभी वैश्यों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि । मूल्यं दत्त्वा परस्त्राद् द्रव्यग्रहणं क्रयः , मूल्यमादाय परस्य स्वद्रव्यदानं विक्रयः । कृषिः परिकषिताय भूमौ बीजस्य वपनं रोपणं च पशुपालनं गोऽजाविकादिपरिरक्षणम् । एतानि वैश्यस्य धर्मसाधनानि , तस्यामीभिरेवोपायैरजितानां धनानां धर्माङ्गत्वात् ।

पृ. ६६९

भाष्य २४६

शूद्रस्य पूर्ववर्णपारतन्त्र्य ममन्त्रिकाश्च क्रियाः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६६९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 744

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कथित तीनों वर्णों की पराधीनता , एवं बिना मन्त्र की क्रिया , ये शूद्रों के विशेष धर्म के सावन हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

शूद्रस्य पूर्वेषु वर्णेषु पारतन्त्र्यममन्त्रिकाश्च क्रिया धर्मसाधनम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' शूद्रस्य पूर्ववर्णेषु परतन्त्र्यममन्त्रिकारच क्रियाः ' अर्थात् पहिले कहे हुए ब्राह्मणादि वर्णों की अधीनता , बिना मन्त्र के ही विवाहादि क्रियाओं के अनुष्ठान प्रभृति ही शूद्रों के धर्म के साधन हैं । का साधन कहते हैं । यहाँ ' गुरु ' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को ननझना चाहिए जो शिष्य का उपनयन संस्कार कराकर अङ्गों सहित वेदों के रहस्य को समझावें । ऐसे ' गुरु ' के गृह में सम्पूर्ण अध्ययनकाल तक नियमतः निवास कर अध्ययन करनेवाले ' ब्रह्मचारी ' के लिए ' स्वशास्त्रविहितानि ' अर्थात् विशेषकर ब्रह्मचारी के लिए ही शास्त्रों में विहित ( जो ' गुरुशुश्रूषादि ' ) । ' गुरुशुश्रूषान्नभैक्ष्याचरणानि ' यह वाक्य ' गुरुशुश्रूषा च अग्निश्चेन्धनञ्च भैक्ष्यं च तेषामाचरणानि ' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से सिद्ध है । गुरु की शुश्रूषा ( सेवा ) करना ही गुरुशुश्रूषा का आचरण है । भिक्षा माँगना हो भिक्षाचरण है । प्रतिदिन अग्नि में होम करना ही अग्नि का आचरण है । होम के लिए वन से लकड़ी लाना ही इन्धनाचरण है । इस प्रकार का विभाग प्रकृत में जानना चाहिए ।

पृ. ६६९

भाष्य २४७

आश्रमिणां तु ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिनः स्वशास्त्रविहितानि गुरुशुश्रूषाग्नीन्धनमैक्ष्याचरणानि मधुमांसदिवास्वप्नाञ्ज नाभ्यञ्जनादिवर्जनं च ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६६९प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 744

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आश्रमियों में गुरुकुलनिवासी ब्रह्मचारियों के लिए शास्त्रों में विहित गुरु और अग्नि की सेवा , ( होम के लिए ) लकड़ी लाना , भिक्षा माँगना , एवं मधु , मांस , दिन की निद्रा , अञ्जन और अभ्यङ्ग ( मालिश ) , इन सबों को छोड़ना ( ये सभी ) उनक विशेष ( असाधारण ) धर्म के साधन हैं |

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

आश्रमिणां तु धर्मसाधनमुच्यते । ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिन इति । उपनीय यः शिष्यं साङ्गं सरहस्यं च वेदमध्यापयति स गुरुः , तस्य कुले गृहे वसनशीलस्य ब्रह्मचारिणः स्वशास्त्रविहितानि ब्रह्मचारिणमधिकृत्य शास्त्रेण विहितानि । गुरुशुश्रूषा गुरोः परिचर्या , गुरुशुश्रूषा च अग्निश्चेन्धनं च भैक्ष्यं च तेषामाचरणानि । गुरुशुश्रूषाभक्ष्ययोः करणमेवाचरणम् । अग्नेराचरणम् , प्रत्यहमग्नौ होम :, इन्धनस्याचरणमग्न्यर्थं वनादिन्धनस्याहरणमिति विवेकः ।

पृ. ६७०

भाष्य २४८

विद्याव्रतस्नातकस्य कृतदारस्य गृहस्थस्य शालीनयायावरवृत्त्युपार्जितैरथैर्भूतमनुष्यदेवपितृब्रह्माख्ानां पञ्चानां महायज्ञानां सायम्प्रातरनुष्ठानम् ; एकाग्निविधानेन पाकयज्ञसंस्थानां च नित्यानां शक्तौ विद्यमानायामग्न्याधेयादीनां च हविर्यज्ञसंस्थानामग्निष्टोमादीनां सोमयज्ञसंस्थानां च ।

ऋत्वन्तरेषु ब्रह्मचर्यमपत्योत्पादनं च |

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६७०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 745

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शालीनवृत्ति एवं यायावरवृत्ति के द्वारा उपार्जित धन से प्रातःकाल और सायंकाल भूतयज्ञ ( काकादि प्राणियों के लिए अन्न उत्सर्ग करना ) , मनुष्ययज्ञ ( अतिथिसेवा ) , देवयज्ञ ( होम ) , पितृयज्ञ ( नित्यश्राद्ध ) , ब्रह्मयज्ञ ( वेदपाठ ) एवं सामर्थ्य के रहने पर एकाग्निविधान ( विवाह के समय गृहीत अग्नि ) से पाकयज्ञसंस्थाओं ( अष्टका , पार्वणी , चैत्र्य , आश्वयुज्य प्रभृति ) का अनुष्ठान , अग्निहोत्र एवं विशेष प्रकार के हविर्यज्ञ संस्था के ( दर्श , पौर्णमास , चातुर्मास्य एवं आश्रयण प्रभृति ) इष्टियों का , सोमयज्ञ संस्था के अग्निष्टोम रक्थ्य , षोडशी , वाजपेय , अतिरात्र एवं आप्तोर्याम ) यज्ञों का अनुष्ठान एवं ( पत्नी के ) ऋतुकाल से भिन्न समय में ब्रह्मचर्य का पालन एवं पुत्र का उत्पादन , ये सभी विद्याव्रतस्नातक ( वेदाध्ययन के लिए स्वीकार किये गये व्रतों को अध्ययन के समाप्त हो जाने के कारण छोड़ देनेवाले ) विवाहित गृहस्थों के विशेष धर्म के साधन हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

गृहस्थस्य धर्मसाधनं कथयति-- विद्याव्रतस्नातकस्येति । यो वेदा-

' ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिनः ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब आश्रमियों के धर्मं ध्ययनार्थं गृहीतं व्रतमधीते वेदे विसर्जितवान् स विद्याव्रतस्नातकः , तस्य कृतदारस्य कृतपत्नोपरिग्रहस्य गृहस्थस्य शालीनयायावरवृत्त्युपार्जितैरथैर्भूतमनुष्यदेवपितृब्रह्माख्यानां पञ्चानां महायज्ञानां सायं प्रातरनुष्ठानम् । यावता धान्येन कुशूलपात्रं कुम्भीपात्रं वा परिपूर्यते , त्र्यहमेकाहं वा वर्तनं भवति , तावन्मात्रस्य परेण स्वयमानीयमानस्य श्रद्धया दीयमानस्य यः परिग्रहः सा शालीना वृत्तिः ।

परस्मादप्रतिग्रहगतश्चक्रमादाय यत् प्रत्यङ्गनं भिक्षाटनं सा यायावरवृत्तिः । ताभ्यामुपाजितैरर्थः पञ्चानां महायज्ञानां सायं प्रातरपराह्णे चानुष्ठानं गृहस्थस्य धर्मसाधनम् । भूतेभ्यो बलिदानं भूतयज्ञः । अतिथिपूजनं मनुष्ययज्ञः । होमो देवयज्ञ । श्राद्धं पितृयज्ञः । ब्रह्मयज्ञो वेदपाठः । एकाग्निविधानेन पाकयज्ञसंस्थानामिति । अनुष्ठानम् । एकाग्निरिति औपासनिकः । तस्य विधानं विवाहकाले परिग्रह ।

तेन पाकयज्ञसंस्थानां पाकयज्ञविशेषाणामष्टकापार्वणीचं त्र्याश्वयुज्यादीनां नित्यानामवश्यकरणीयानां सति सामर्थ्येऽनुष्ठानम् । अग्न्याधेयादीनामिति अनुष्ठानं धर्मसाधनम् , अग्न्याधेयशब्दे - नाग्न्याधानस्याभिधानम् , यद् ब्राह्मणेन वसन्ते क्रियते । हविर्यज्ञसंस्था हविर्यज्ञविशेषा दार्शपौर्णमासचातुर्मास्याग्रायणादिका इष्टयः कथ्यन्ते । अग्निष्टोमादीति अग्निष्टोमोक्थ्यषोडशीवाजपेयातिरात्राप्तोर्यामाः सप्तसोमयज्ञविशेषाः सोमयज्ञसंस्था उच्यन्ते । ऋत्वन्तरेष्विति ।

ऋतुकालादन्यकालेषु ब्रह्मचर्यं व्रतरूपेण स्त्रीसेवापरिवर्जनं धर्मसाधनम् : अपत्योत्पादनमपि धर्मसाधनम् , पुत्रेण लोकाञ्जयतीति श्रुतेः !

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' विद्याव्रतस्नातकस्य ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गृहस्थाश्रमी के लिए जो धर्म के साधन हैं , वे कहे गये हैं । ' विद्याव्रतस्नातक ' शब्द से वे पुरुष अभिप्रेत हैं , जिन्होंने वेदाध्ययन का व्रत लिया हो , एवं वेदाध्ययन के सम्पन्न हो जाने पर ही उसकी समाप्ति की हो । वे हो जब ' कृतदार ' हो जाँय अर्थात् विवाह कर लें , ऐसे गृहस्थों के लिए ही जो धर्म के साधन हैं , वे ' शालोमयायादर इत्यादि सन्दर्भ से गिनाये गये हैं ।

जितने अन्न से एक कुशूलपात्र ( कच्ची मिट्टी की कोठी ) या एक घड़ा भर जाय , अथवा तीन दिनों तक या एक ही दिन का भोजन चल सके , उतने ही अन्न को स्वयं ले आने पर या श्रद्धापूर्वक दूसरों के देने पर जो ग्रहण किया जाता है , उस वृत्ति को ' शालीना वृत्ति ' कहते हैं । दूसरों से प्रतिग्रह न लेकर बारी - बारी से प्रत्येक आँगन में भिक्षा माँगने को ' यायावरवृत्ति ' कहते हैं । इन दोनों वृत्तियों से ही उपार्जित धन के द्वारा ।

सायङ्काल , प्रात काल और अपराह्न काल में पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान गृहस्थों के लिए धर्म का साधन है । काकादि प्राणियों के लिए बलि देने को ' भूतयज्ञ ' कहते हैं । अतिथियों की पूजा को ही ' मनुष्य यज्ञ ' कहते हैं । होम ही ' देवयज्ञ ' है । श्राद्ध को ' पितृयज्ञ ' कहते हैं । वेदों का पाठ ही ' ब्रह्मयज्ञ ' है । ' एकाग्निविधानेन पाकयज्ञसंस्थानाम् ' अर्थात् इनके अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं ।

' एकाग्नि ' शब्द से ओपासनिक अग्नि को समझना चाहिए , जिसका ग्रहण विवाह के समय किया जाता है । उस अग्नि के द्वारा ' पाकयज्ञसंस्था ' के होमों का अर्थात् अष्टका , पार्वणी , चैत्र्य एवं आश्वयुज्य प्रभृति नित्यकर्मों का अर्थात् अवश्य करणीय कर्मों का सामर्थ्य रहने पर जो अनुष्ठान ( वे भी धर्म के साधन हैं ) , ' अग्न्य घेगादीनाम् ' अर्थात् अग्न्याधेयादि के अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं ।

' अग्न्याधेय ' शब्द से अग्नि का प्रधान समझना चाहिए , जो वमन्त के समय ब्राह्मणों के द्वारा अनुष्ठित आग्रायण प्रभृति इष्टियाँ कही जाती है । ' अग्निष्टोमादीति ' , उक्थ्य , होता है । ' हविर्यज्ञ संस्था ' शब्द से विशेष प्रकार के दर्श , पौर्णमास , चातुर्मास्य ,

पृ. ६७२

भाष्य २४९

ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा ग्रामान्निर्गतस्य वनवास वल्कला जिन केशश्मश्रुनखरोमधारणं च ; वन्यहुतातिथिशेषभोजनानि वानप्रस्थस्य ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६७२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 747

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ग्रामों को छोड़ कर वनों में रहना , वल्कल , अजिन , केश , दाढ़ीमूँछ , नख और रोम इन सबों को धारण करना ( कभी त्याग न करना ) एवं वनों के कन्दमूल फलों एवं होम से और अतिथियों से अवशिष्ट अन्नों का भोजन करना , ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम दोनों में से किसी भी आश्रम वानप्रस्थ लिए हुए सभी जनों के लिए विशेषधर्म के साघन हैं ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

वनस्थस्य धर्मसाधनं कथयति — ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वेति “ यदहरेवास्य श्रद्धा भवति तदहरेवायं प्रव्रजेत् ” इति श्रवणात् सति श्रद्धोपनये ब्रह्मचारिणो वनवासो भवति । गृहस्थस्य वा तस्य वानप्रस्थव्रतमाचरतो वल्कलाजिनकेशश्मश्रुनखरोमधारणम् , वन्यस्य फलमूलस्य भोजनं हुतशेषभोजनम् ,

' ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वानप्रस्थाश्रमियों के धर्म के अतिथिशेष भोजनं च धर्मसाधनम् । यः प्राजापत्यामिष्ट निरूप्य सर्वस्वं दक्षिणां दत्त्वात्मन्यरिंन समाधाय पुत्रे भार्यां निक्षिप्य प्रव्रजितः , न तस्थ होमो न तस्यातिथिपरिग्रहः । यस्तु सह पत्न्या सहैवाग्निना वनं प्रस्थितः , तस्य हुतशेष भोजनमतिथिशेष भोजनं च धर्मसाधनम् ।

यतिधर्मं निरूपयति - त्रयाणामिति । यत्याश्रमपरिग्रहेऽपि नियमो नास्ति , श्रद्धोपगमे सति ब्रह्मचार्यव यतिर्भवति , गृहस्थो वा भवति , वानप्रस्थो वेत्यनेनाभिप्रायेणोक्तं त्रयाणामन्यतमस्येति । श्रद्धावतः चित्तप्रसादवतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा भूतानि मया न जातु हिंसितव्यानीति अद्रोहसङ्कल्पं गृहीत्वा , स्वानि कर्माणि काम्यानि संन्यस्य परित्यज्य यमनियमेष्वप्रमत्तस्य । अहिंसा - सत्यादयो यमाः । यथाह भगवान् पतञ्जलिः - अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा इति । तपः शौचादयस्तु नियमाः । यथाह स एव भगवान् - शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा इति । न्यायभाष्यकारस्तु प्रत्याश्रमं विशिष्टं धर्मसाधन नियममाह । तेष्वप्रमत्तस्य ताननतिक्रमतः । षट्पदार्थप्रसंख्यानात् षण्णां पदार्थानां तत्त्वज्ञानाद् योगस्यात्मज्ञानोत्पादनसमर्थस्य समाधिविशेषस्य प्रसाधनमुत्पादनं प्रव्रजितस्य धर्मसाधनम् । यथैतानि धर्मं साधयन्ति , तथा कथयति - दृष्टं चेति । लाभ पूजादि प्रयोजनमनुद्दिश्यानभिसन्धाय देतानि साधनानि क्रियन्ते , तदेतानि साधनानि भावप्रसादं चाभिप्रायविशुद्धि चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्मोत्पत्तिरिति ।

प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य तत्त्वतो विज्ञातेषु दुःखेकनिदानेषु विषयेषु विरक्तस्यात्यन्तिकं दुःखवियोगमिच्छतः " आत्मख्यातिरविप्लवा हानोपायः " ' तस्याश्च समाधिविशेषो निबन्धनम् ' इति श्रुतवतः " संन्यस्य सर्वकाम्यकर्माणि समाधिमनुतिष्ठामः " तत्प्रत्यनीकभूयिष्ठं ग्रामं परित्यज्य वनमाश्रितस्य यमनियमाभ्यां कृतात्मसंस्कारस्य समाध्यभ्यासान्निवर्त्तको धर्मो जायते । तस्मादस्य प्रकृष्टः समाधिस्ततोऽन्यः प्रकृष्टतरो धर्मः , तस्मादप्यन्यः प्रकृष्टतमः समाधिरित्यनेन क्रमेणान्त्ये जन्मनि स तादृशः समाधिविशेषः परिणमति यो द्वन्द्वेनाप्यभिभवितुं न शक्यते । दृष्टो हि किञ्चिदभिमतं विषयमादरेणानुचिन्तयतः तदेकाग्रीभूतचित्तस्य सन्निहितेषु प्रबलेष्वपि विषयेषु संबाधः , यथेषुकार इषौ लब्धलक्ष्याभ्यासो गच्छन्तमपि राजानं न बुद्धयते । तथा च भगवान् पतञ्जलिः -- ' अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ' इति । एवं परिणते समाधावात्मस्वरूप साक्षात्कारिविज्ञानमुदेति । यथाहुः कापिलाः-

एवं तत्त्वाभ्यासान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् ।

अविपर्ययाद् विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ इति ।

अत आत्मज्ञानार्थिना यतिना योगसाधनमनुष्ठीयते । ज्ञानं ज्ञेयादिप्राप्तिमात्रफलम् श्रौतात्मज्ञानेनाप्यात्मस्वरूपं प्राप्यते किमस्य ध्यानाभ्यासात् प्रत्यक्षीकरणेनेति चेत् ? न , परोक्षस्य प्रत्यक्षसाधने सामर्थ्याभावात् । स्वरूपतस्तावदात्मा न कर्ता , न भोक्ता , किन्तूदासीन एव । तत्र देहेन्द्रियसम्बन्धाद्युपाधिकृतोऽहं ममेति — कर्तृत्वभोक्तृत्वप्रत्ययो मिथ्याऽतस्मिंस्तदिति भावात् । एतत्कृतश्चानुकूलेषु रागः प्रतिकूलेषु द्वेष :, ताभ्यां प्रवृत्तिनिवृत्ती , ततो धर्माधर्मे , ततश्च संसारः । यथोक्तं सौगतैः-

आत्मनि सति परसंज्ञा स्वपरविभागात् परिग्रहद्वेषौ ।

अनयोः संप्रतिबद्धाः सर्वे भावाः प्रजायन्ते ||

अनादिवासनावासित इति प्रबलो निसर्गबद्धः सर्वः सांव्यवहारिकः प्रत्यक्षेणैवैष प्रत्ययः । श्रतमात्मतत्त्वज्ञानं क्षणिकमनुपलब्धसंवादं परोक्षं च । न च दृढतरः प्रत्यक्षावभासः परोक्षावभासेन शक्यते निषेद्धम् । नहि शतशोऽपि प्रमाणान्तरावगते गुडस्य माधुर्ये दुष्टेन्द्रियजः तिक्तप्रतिभासस्तत्कृतश्च दुःखावगमो निवर्तते तस्मात् प्रत्यक्षज्ञानार्थं समाधिरुपासितव्यः । प्रचिते समाधौ तत्सामर्थ्यात् कर्तृत्वभोक्तृत्वपरिपन्थिन्यात्मतत्त्वे स्फुटीभूते समाने विषये विद्याविद्ययोविरोधादहङ्कार - ममकारवासनोच्छेदे सन्नपि प्रपञ्चो नात्मानं स्पृशति । तथा च कापिलैरुक्तम् -

तेन निवृत्तप्रसवार्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्तौ ।

प्रकृतिं पश्यति पुरुषः प्रेक्षकवदवस्थितः स्वस्थः ॥

तेन तत्त्वज्ञानेन सता निवृत्तप्रसवां निवृत्तोपभोगजननसामर्थ्याज् ज्ञानधर्मवैराग्यैश्वर्याधर्माज्ञानावैराग्यानैश्वर्येभ्यः सप्तरूपेभ्यो विनिवृत्तां प्रकृति पुरुष : प्रेक्षकवदुदासीनः स्वस्थो रजस्तमोवृत्तिकलुषतया बुद्धया असम्भिन्नः पश्यतीत्यर्थः । यद्यप्यनादिरियं मोहवासना आदिमांश्च तत्त्वसाक्षात्कार :, तथाप्यनेन सा निरुद्धयते , तत्त्वावग्रहो हि धियां परमं बलम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अग्निष्टोम षोड़शी , वाजपेय , अतिरात्र और आप्तोर्याम ये सात विशेष प्रकार के सात सोमयज्ञ ही ' सोमयज्ञसंस्था ' कहलाते हैं । ' ऋत्वन्तरेषु ' स्त्री के ऋतुकाल से भिन्न समय में व्रतरूप से ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थात् स्त्रीसङ्ग का त्याग भी धर्म का साधन है । पुत्र को उत्पन्न करना भी धर्म का साधन है , क्योकि ' पुत्रेण लोकान् जयति ' यह श्रुति है । साधन कहे गये हैं ।

' यदहरेवास्य श्रद्धा भवति तदहरेवायं प्रव्रजेत् ' ऐसी श्रुति है , तद्नुसार उपयुक्त श्रद्धा के उत्पन्न होने पर ब्रह्मचर्याश्रम से भी सीधे वानप्रस्थाश्रम में जा सकता हैं इसी अभिप्राय से ' ब्रह्मचारिणः ऐसा कहा गया है | ' गृहस्थस्य वा ' अर्थात् यदि गृहस्थ वानप्रस्थाश्रमी हो जाय तो ' वल्कला जिन केश श्मश्रुनखरोमधारणम् ' अर्थात् वल्कल और अजिन का परिधान एवं केश और दाढ़ी मूछों का रखना ये सभी गृहस्थवानप्रस्थाश्रमियों के धर्म के समान हैं ।

एवं ' वन्य ' जो फलमूल उसका भोजन , होम से बचे हुए हवि का भोजन एवं अतिथि को देकर उससे बचे हुए अन्न का भोजन ( वानप्रस्थियों के ) धर्म के साधन हैं । जो गृहस्थ प्राजापत्य नाम की इष्टि करके अपने सर्वस्व को दक्षिणा रूप में देकर एवं पत्नी का भार पुत्र को सौंप कर वानप्रस्थ को ग्रहण करते हैं उनके लिए होम और अतिथि की सेवा निर्दिष्ट नहीं हैं ( अतः उनके लिए ये दोनों धर्म के साधन नहीं हैं ) ।

जो पत्नी और अग्नि को साथ लेकर हो वानप्रस्थाश्रम को ग्रहण करते हैं , उनके लिए ही होम से बचे हुए हवि का भोजन और अतिथि से बचे हुए अन्न का भोजन ये दोनों धर्म के साधन हैं ।

' त्रयाणाम् ' इत्यादि ग्रन्थ से यतियों ( संन्यासियों ) के धर्म का निरूपण करते हैं । सन्यासाश्रम ग्रहण करने का भी कोई नियम नहीं है ( कि किस आश्रम से संन्यास ग्रहण करे ) क्योंकि उपयुक्त श्रद्धा के रहने पर ब्रह्मचारी और गृहस्थ ये दोनों ही संन्यास ले सकते हैं । वानप्रस्थाश्रमी तो ले ही सकते हैं , इसी नियम को दृष्टि में रखकर लिखा गया है कि ' त्रयाणामन्यतमस्य ' ।

' श्रद्धावतः ' चित्त प्रसाद से युक्त पुरुष के लिए ' सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा ' अर्थात् मुझसे किसी प्राणी की हिंसा न हो ' इस प्रकार से अद्रोह का संकल्प करके ' स्वानि कर्माणि ' अर्थात् अपने काम्य कर्मों को ' संन्यस्य ' अर्थात् छोड़कर , ' यमनियमेष्वप्रमत्तस्य ' इनमें अहिंसा सत्यप्रभृति ' यम ' कहलाते हैं । जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि : - अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( ये पाँच ) ' यम ' हैं । प्रकृत में ' नियम ' शब्द से तपस्या शौंच प्रभृति इष्ट है ।

जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ही कहा है कि - शीच सन्तोष तपस्या , स्वाध्याय और ईश्वर का प्रणिधान ( ये पाँच ) ' नियम ' ' हैं | न्यायभाष्यकार ने प्रत्येक आश्रम के लिए निर्दिष्ट धर्म के नियमित अनुष्ठान को ही नियम बतलाया है । ' तेष्वप्रमत्तस्य ' अर्थात् यम और नियम के विरुद्ध आचरण न करनेवाले

८५ पुरुषों के लिए ये आचरण धर्म के साधन हैं । ' षट्पदार्थ प्रसंख्यानात् ' द्रव्यादि छः पदार्थों के तत्वज्ञान के द्वार योग का अर्थात् आत्मज्ञान में पूर्ण क्षम विशेष प्रकार के समाधि का जो उत्पादन वह ' प्रत्रजितों ' के लिए धर्म का साधन है । ' दृष्टञ्च ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह उत्पादन करते कि ये साधन किस प्रकार धर्म का सम्पादन करते हैं । अर्थात् ' दृष्ट ' लाभ पूजादि प्रयोजनों का उद्देश्य न रखकर जब यमनियमादिसाधनों का अनुष्ठान किया जाता है , उस समय ये साधन ' भावशुद्धि ' अर्थात् अभिप्राय की विशुद्धि के साहाय्य से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा धर्म का उत्पादन करते हैं |

जिस पुरुष का चित्त दुःखों से प्रतिदिन अभिहत होता रहता है , उसे यदि दुःखों के कारणीभूत विषय यथार्थ रूप से ज्ञात हो जाते हैं तो फिर उन विषयों से उसे वैराग्य हो जाता है | ऐसा पुरुष दुःखों से सदा के लिए छूटने की इच्छा करता है । ( अन्वेषण करने पर ) उसे यह ज्ञात होता है कि ' आत्मा का तत्त्वज्ञान ही दुःख के आत्यन्तिक निवृत्ति का अर्थ साधन है , एवं वह तत्त्वज्ञान विशेष प्रकार की समाधि ' से ही प्राप्त हो सकता है ।

तो फिर सभी काम्य कर्मों का त्याग कर मैं समाधि का ही अनुष्ठान करूँ ' वह ऐसा संकल्प करता है । फिर समाधि के अधिकतर विघ्नों से युक्त होने के कारण वह ग्राम को छोड़ देता है , और वन का आश्रय ले लेता है । ऐसा पुरुष यम और नियम से आत्मा को सुसंस्कृत कर लेता है । ऐसी स्थिति में जब वह समाधि का अभ्यास करता है , तो उससे ( संसार को निबृत्त करनेवाले ) निवर्त्तक धर्म की उत्पत्ति होती है । इस निवर्त्तक धर्मं के द्वारा पहिले की समाधि से उत्कृष्ट समाधि की उत्पत्ति होती है ।।

इस उत्कृष्ट समाधि से उत्पन्न निवर्तक धर्म से उत्कृष्टतर निवर्त्तक धर्म की उत्पत्ति होती है । इस उत्कृष्ट निवर्त्तक धर्म से उत्कृष्टतम समाधि की उत्पत्ति होती है , इस प्रकार अन्तिम जन्म में वह समाधि इतनी उत्कृष्टता को प्राप्त कर लेती है कि वह पुरुष ( शीतोष्ण रूप ) द्वन्द्व से भी अभिभूत नहीं होता । यह तो सांसारिक इष्ट विषय को आदर के साथ चिन्तन करते हुए पुरुषों में भी देखा जाता है कि अत्यन्त समीप के प्रबल विषयों को भी वे नहीं देख पाते हैं ।

जैसे कि तीर का अभ्यास करता हुआ पुरुष आगे से जाते ' हुए राजा को भी नही देख पाता है । जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि ' अभ्यास और वैराग्य इन दोनों से चित्तनिवृत्ति रूप योग निष्पन्न होता है । ' इस प्रकार जब समाधि का परिपाक हो जाता है . तब उससे आत्मा का साक्षात्कार रूप विज्ञान उदित होता है । जैसा कि सांख्य शास्त्र के आचार्यों ने कहा है कि-

" इस तस्व के अभ्यास से ' ये विषय मेरे नहीं हैं ' मैं इन विषयों से सम्बद्ध नहीं हूँ ' इस आकारका विषयरहित केवल ( प्राकृत विषयों से असम्बद्ध ) आत्मा का ज्ञान होता है । " यही कारण है कि आत्मज्ञान को इच्छा से यती लोग योग का अभ्यास करते ! ( प्र ० ) ज्ञान का तो एक मात्र यही फल है कि उससे ज्ञेय विषय की प्राप्ति हो ।

श्रुति के द्वारा जो आत्मा का ज्ञान होता है उससे भी उसके विषय आत्मा के स्वरूप की प्राप्ति तो होगी ही . फिर ध्यान और अभ्यास के द्वारा आत्मा को प्रत्यक्ष करने को क्या आवश्यकता है ? ( उ ० ) यतः प्रत्यक्षात्मक ज्ञान से ही सांसारिक विषयों का प्रत्यक्ष रूप मिथ्याज्ञान निवृत्त हो सकता है । श्रुति से उत्पन्न आत्मा का ज्ञान परोक्ष है , अतः आत्मा के प्रत्यक्ष की आवश्यकता होती है , जिसके लिए ध्यान और अभ्यास की पूरी आवश्यकता है । आत्मा तो स्वयं उदासीन है , न वह कर्ता है , न भोक्ता ।

उसमें जब शरीर , इन्द्रिय प्रभृति विषयों का सम्बन्ध होता है , तभी उसे ' अहं कर्त्ता , अहं भोक्ता ' इत्यादि ज्ञान होने लगते हैं वे ' जो जहाँ नहीं है वहीं तद्विशेषणक ' होने के कारण मिथ्याज्ञान होते हैं । इस मिथ्याज्ञान से ही अनुकूल विषयों में राग और प्रतिकूल विषयों में द्वेष उत्पन्न होता है । राग और द्वेष इन दोनों से ही क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति उत्पन्न होती है ।

विहित विषयों में प्रवृत्ति से धर्म और निषिद्ध विषयों की प्रवृत्ति से अधर्म , एवं विहित विषयों की निवृत्ति से अधर्म और निषिद्ध विषयों की निवृत्ति से धर्म की उत्पत्ति होती है । घमं और अधर्म इन्हीं दोनों से संसार की उत्पत्ति होती है । जैसा बौद्धों ने भी कहा है कि--

आत्मा को सत्ता मान लेने पर ही ' पर ' इस नाम का व्यवहार होता है । ' स्व ' और ' पर ' का जो यह व्यवहार है , उसी से राग और द्वेष उत्पन्न होता है । धर्माधर्मादि सभी भाव राग और द्वेष इन्हीं दोनों के साथ सम्बद्ध हैं ।

अनादि वासना से वासित होने के कारण ये सभी स्वाभाविक मिथ्याप्रत्यय संवृति ( अविद्या ) से उत्पन्न होते हैं , एवं वे प्रत्यक्षात्मक हैं । श्रुति से जो आत्मा का क्षणिक ज्ञान होता है , उसका प्रमात्व निर्णीत नहीं है , एवं वह परोक्ष भी है । अत : उससे दृढ़तर एवं प्रत्यक्षात्मक मिथ्याज्ञान की निवृत्ति नहीं हो सकती । जिस पुरुष की जिह्वा में दोष आ गया है , उसे यदि सैकड़ों प्रमाणों से गुड़ की मधुरता को समझावें , उससे उसे जो गुड़ में तिक्तता का भान है , एवं इस भान से जो दुःख होता है , इन दोनों से वह छूट नहीं सकता । तस्मात् आत्मा के प्रत्यक्ष के लिए समाधि की पूरी आवश्यकता है । इस प्रकार समाधि की वृद्धि हो जाने पर , उसके सामर्थ्य से ( बन्धन के प्रयोजक ) कर्तृत्व और भोक्तृत्व के विरोधी आत्मतत्त्व का स्फुट प्रतिभास होता है । तद्विषयक मिथ्याज्ञान ( अविद्या ) और तद्विषयक यथार्थज्ञान ( विद्या ) ये दोनों परस्पर विरोधी हैं , अतः आत्मविषयक तत्त्वज्ञान रूप विद्या की उत्पत्ति हो जाने पर आत्मा का कर्तृत्व भोक्तृत्वादि रूप से जितने भी मिथ्याज्ञान एवं तज्जनित वासनायें रहतीं हैं , वे सभी नष्ट हो जाती हैं , जिससे प्रपञ्च की ( किसी प्रकार की ) सत्ता रहने पर भी आत्मा को वे छू नहीं सकते ।

पृ. ६७२

भाष्य २५०

त्रयाणामन्यतमस्य श्रद्धावतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा , संन्यस्य स्वानि कर्माणि यमनियमेष्वप्रमत्तस्य षट्पदार्थ प्रसंख्यानाद योगप्रसाधनं प्रव्रजितस्येति ।

दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्यैतानि साधनानि भावप्रसादं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्मोत्पत्तिरिति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६७२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 747

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ब्रह्मचर्याश्रम , गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम इन तीनों में से किसी भी आश्रम से कोई भी श्रद्धाशील पुरुष ( जब ) सभी प्राणियों को सदा के लिए अपनी ओर से अभय देकर अपने ( और ) सभी कर्मों से छूट जाते हैं , फिर भी यमनियमादि का बिना प्रमाद के पालन करते रहते हैं ( वे ही ) परिव्राजक ( कहलाते हैं ) उनके लिए ( इस शास्त्र में वर्णित ) षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा योग का अनुष्ठान ही विशेष धर्म का साधन है । धर्म के ये साधन ( लाभ पूजादि ) दृष्ट प्रयोजनों के बिना अनुष्ठित होने के बाद विशुद्ध अभिप्राय की सहायता से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा धर्म को उत्पन्न करते हैं ।

अधर्मनिरूपणम्

पृ. ६७७

भाष्य २५१

अधर्मोऽप्यात्मगुणः 1 कर्त्तुरहितप्रत्यवाय हेतुरतीन्द्रियोऽन्त्यदुःखसंविज्ञान विरोधी ।

तस्य तु साधनानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधन विपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि ।

विहिताकरणं प्रमादश्चैतानि दुष्टाभिसन्धिं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगादधर्मस्योत्पत्तिः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६७७प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 752

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अधर्म भी आत्मा का ही गुण है । वह ( अधर्माचरण करनेवाले ) कर्त्ता के दुःख और दुःख के साधनों का कारण है । वह अतीन्द्रिय है । एवं अन्तिम दुःख और तत्वज्ञान इन दोनों से उसका नाश होता है । शास्त्रों में निषिद्ध एवं धर्म साधन के विरोधी हिंसा , असत्य प्रभृति इसके साधन हैं । शास्त्रों में अनुष्ठान के लिए निर्दिष्ट कामों को न करना एवं प्रमाद ये दोनों भी अधर्म के हेतु हैं । ( अधर्म के ) ये सभी हेतु एवं कर्त्ता के दुष्ट अभिप्राय इन सबों की सहायता से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा अधर्म की उत्पत्ति होती है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

अधर्मोऽप्यात्मगुणः । न केवलं धर्मोऽधर्मोऽप्यात्मगुणः । कर्तुरिति । कर्तुरहितं दुःखसाधनम् , प्रत्यवायो दु : खम् , तयोरधर्मो हेतुः । अन्त्यदुःखसं विज्ञानेति । अन्त्यस्य दुःखस्य सम्यग् विज्ञानं तेन विनाश्यते । तस्य साधनानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधन विपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि । हिंसा परा - भिद्रोह : । अनृतं मिथ्यावचनम् । स्तेयमशास्त्रपूर्वं परस्वग्रहणम् । एवमादीनि धर्मसाधन विपरीतानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि यानि तान्यधर्मसाधनानि । विहिताकरणं विहितस्यावश्यं करणीयस्या कर्त्तव्यता । प्रमादोऽबुद्धिपूर्व कोऽतिक्रमः , एतदपि द्वयमधर्मसाधनम् । यथैतेभ्यो धर्मस्योत्पत्तिस्तद् दर्शयति-- एतानीति । यत्र कामनापूर्वकमधर्मसाधनानुष्ठानं तत्र दुष्टोऽभिसन्धिरधर्मकारणम् । अकामकृते तु प्रमादेनास्य हेतुत्वम् ।

एवमधर्मस्य साधनमभिधाय संप्रति साध्यं कथयति-- अविदुष इत्यादिना। यः कर्त्ता भोक्तास्तीत्यात्मानमभिमन्यते परमार्थतो दुःखसाधनं च बाह्याध्यात्मिकविषयं सुखसाधनमित्यभिमन्यते सोऽविद्वान् । स च स्वोपभोगतृष्णापरिप्लुतः सुखसाधनत्वारोपिते विषये रज्यते , तदुपरोधनि च द्विष्टो भवति । तस्य प्रवर्त्तकाद् धर्माद् देवो वा स्यां गन्धर्वो वा स्यामिति पुनर्भवप्रार्थनया कृताद् धर्मात् प्रकृष्टात् फलातिशयहेतोराज्ञयानुरूपैः कर्मानुरूपेरिष्टशरीरादिभिः सम्बन्धो भवति ब्रह्मेन्द्रादिस्थानेऽपि मात्रया दुःखसम्भेदोऽस्ति । न चाधर्मादन्यद् दुःखसंवेदोऽस्ति । न चाधर्मादन्यद् दुःखस्य कारणमतः स्वल्पाधर्मसहितादित्युक्तम् । यस्य प्रकृष्टो धर्मस्तस्य प्रकृष्टानि शरीरादीनि भवन्ति , यस्य प्रकृष्टतरो धर्मः , तस्य प्रकृष्टतराणि भवन्ति , भूयासमिति मे भूयासुः ” इति फलाकाङ्क्षया विना निवृत्तसाधनतया विहितमपरं चावश्यकरणीयं कर्म करोति ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — जैसा सांख्यशास्त्र के आचार्यों ने ' तेन निवृत्तप्रसवाम् ' इत्यादि आर्या के द्वारा कहा है कि- ' तेन ' अर्थात् उस तत्त्वज्ञान से ' निवृत्त प्रसवाम् ' उपभोग के सामर्थ्य से रहित प्रकृति ' अर्थवशात् ' पुरुष के अपवर्ग रूप प्रयोजन से वशीभूत होकर ' सप्तरूप विनिवृत्ति ' को प्राप्त होती है , अर्थात् ज्ञान अज्ञान , धर्म , अधर्म , वैराग्य , अवैराग्य , ऐश्वर्य और अनैश्वर्य्यं इन अष्टविध भावों में से ज्ञान को छोड़कर सृष्टिजनक अज्ञानादि सातों प्रकार के भावों से निवृत्त हो जाती है । इसी प्रकार की प्रकृति को ' पुरुष ' प्रेक्षक की तरह अर्थात् उदासीन की तरह ' स्वस्थ ' होकर अर्थात् रजोगुण और तमोगुण की कलुषित वृत्तियों से सर्वथा असम्बद्ध रहकर देखता है । यद्यपि यह ठीक सा लगता है कि मिथ्याज्ञानरूप मोहरूप वासना अनादि है , और तत्त्वज्ञान उत्पत्तिशील है , ( अतः वासना ही बलवती है ) फिर भी सादि भी तत्त्वज्ञान से अनादि मिथ्याज्ञान का नाश होता है , क्योंकि तत्त्व का ग्रहण करना हो ज्ञानों का सबसे बड़ा बल है ।

' अधर्मोप्यात्मगुण : ' अर्थात् केवल धर्म ही आत्मा का गुण नहीं है , किन्तु अधर्म भी आत्मा का गुण है इसी अर्थ की अभिव्यक्ति प्रकृत वाक्य के ' अपि ' शब्द से हुई है ) । ' कर्तुरिति ' कर्त्ता का जो ' अहित ' अर्थात् दुःख का साधन एवं प्रत्यवाय अर्थात् दुःख , अधर्म इन दोनों का ' हेतु ' है । ' अन्त्यदुःखसं विज्ञानेति ' अन्त्य अर्थात् अन्तिम दुःख और ' संविज्ञान ' अर्थात् सम्यग्विज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान इन दोनों से अधर्म का विनाश होता है ।

' तस्य तु साधनानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधनविपरीतानि हिसानुतस्तेयादीनि ' दूसरों के साथ अभिद्रोह करना ही ' हिंसा ' है । मिथ्याभाषण ही ' अमृत ' शब्द का अर्थ है । शास्त्रों में कहे हुए उपायों से विपरीत उपायों के द्वारा दूसरे के धन का ग्रहण करना ही ' स्तेय ' है । धर्म के साधनों के विरुद्ध एवं शास्त्रों से निषिद्ध जो हिंसादि उपाय हैं , वे ही अधर्म के साधन हैं । शास्त्रों के द्वारा अवश्य करने के लिए निर्दिष्ट कर्मों का न करना ही ' विहिताकरण ' है ।

अनजान में शास्त्रीय मर्यादा के अतिक्रम को ही ' प्रमाद ' कहते हैं । ( विहिताकरण और प्रमाद ) ये दोनों भी अधर्म के साधन हैं । ' एतानि ' इस वाक्य के द्वारा इन साधनों के द्वारा किस रीति से अधर्म की उत्पत्ति होती है ? वह दिखलायी गयी है । जहाँ किसी कामना के वशीभूत होकर अधर्म के साधनों का अनुष्ठान किया जाता है , वहाँ ' दुष्टाभिसन्धि ' अधर्म का कारण है । जहाँ अधर्म के साधनों का अनुष्ठान अनजाने होता है , वहाँ प्रमाद के द्वारा उन साधनों में हेतुता आती है ।

उक्त सन्दर्भ के द्वारा अधर्म के साधनों को कहने के बाद ' अविदुष ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अधर्म से होनेवाले कार्यो का निरूपण करते हैं । ' अविद्वान् ' उस ( मूढ़ ) पुरुष को कहते हैं , जो अपने को हो कर्त्ता और भोक्ता समझता है , एवं दुःखों के बाह्य एवं आन्तरिक साधनों को सुखों का साधन समझता है ।

वह ( अविद्वान् पुरुष ) अपनी उपभोग की तृष्णा के वशीभूत होकर दुःख के जिन साधनों को सुख का साधन समझता है , उन विषयों में अनुरक्त हो जाता है , और उसके विरोधी विषयों के साथ द्वेष रखने लगता है ।

' प्रवर्त्तकाद्धर्मात् ' अर्थात् ' मैं देव हो जाऊं , मैं गन्धर्व हो जाऊँ इस प्रकार की हेतुभूत पुनर्जन्म की वासना से किये गये प्रवर्तक एवं उत्कृष्ट फलों के हेतु उत्कृष्ट धर्म के द्वारा ( कुछ अधर्म की सहायता से ) आशय के अनुरूप अर्थात् पहिले किए हुए कर्म के अनुरूप अभीष्ट शरीरादि के साथ वह जीव सम्बद्ध होता है । ब्रह्मा प्रभृति के शरीर धारण करने पर भी थोड़ा सा दुःख का सम्बन्ध रहता ही है ।

बिना अधर्म के दुःख का अनुभव नहीं होता , एवं अधर्म को छोड़कर दुःख का भी कोई दूसरा ( असाधारण ) कारण नहीं है , अतः ' स्वल्पाधर्मसहितात् ' यह वाक्य जोड़ा गया है । ' आशयानुरूपैः ' यह वाक्य इस तारतम्य को समझाने के लिए लिखा गया है कि जिसका धर्म उत्कृष्ट रहता है . उसे उत्कृष्ट शरीर मिलता है , जिसका धर्म उससे उत्कृष्टतर ६८० हो जाता है ।

पृ. ६७८

भाष्य २५२

अविदुषो रागद्वेषवतः प्रवर्त्तकाद् धर्मात् प्रकृष्टात् स्वल्पाधर्मसहिताद् ब्रह्मेन्द्र प्रजापतिपितृ मनुष्यलोकेष्वाशयानुरूपैरिष्टशरीरेद्रियविषयसुखादिभिर्योगो भवति ।

तथा प्रकृष्टादधर्मात् स्वल्पधर्म- सहितात् प्रेततिर्यग्योनिस्थानेष्वनिष्टशरीरेन्द्रिय विषयदुःखादिभिर्योगो भवति ।

एवं प्रवृत्तिलक्षणाद् धर्मादधर्मसहिताद् देवमनुष्य तिर्यनारकेषु पुनः पुनः संसारबन्धो भवति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६७८प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 753

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रवृत्तिजनक उत्कृष्ट धर्म के द्वारा थोड़े से अधर्म की सहायता स ब्रह्मलोक , इन्द्रलोक , प्रजापतिलोक , पितृलोक एवं मनुष्यलोक में उपयुक्त भोग के अनुरूप इन्द्रिय विषय एवं सुखादि के साथ तत्त्वज्ञान से रहित एवं राग और द्वेष से युक्त पुरुष का सम्बन्ध होता है । इसी प्रकार थोड़े से धर्म से युक्त बड़े अधर्म से प्रेत , तिर्यग्योनि में भोग के उपयुक्त शरीर , इन्द्रिय , विषय और दुःख के साथ ( उक्त पुरुष ) का सम्बन्ध होता है । इसी प्रकार थोड़े से अधर्म से युक्त प्रवृत्तिस्वरूप धर्म के द्वारा देव तिर्यग्योनि एवं नारकीय शरीरों के सम्बन्ध से जीव को बारबार संसार रूप बन्धन मिलता है ।

पृ. ६८०

भाष्य २५३

ज्ञानपूर्वकात्तु कृताद संकल्पितफलाद विशुद्धे कुले जातस्य दुःखविगमोपाय जिज्ञासोराचार्यमुपसङ्गम्योत्पन्नषट्पदार्थतत्वज्ञानस्याज्ञाननिवृत्तौ विरक्तस्य रागद्वेषाद्यभावात् तज्जयोर्धर्माधर्मयोरनुत्पत्तौ ज्ञानपूर्वक किये हुए निष्काम कर्मों के अनुष्ठान के द्वारा उत्पन्न

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६८०प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 755

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — धर्म से जीव विशुद्ध कुल में जन्म लेता है । इससे पुरुष को दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति के उपाय को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है । इस जिज्ञासा से प्रेरित होकर वह आचार्य के चरणों में बैठकर उनसे षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान का लाभ करता है । जिससे अज्ञान निवृत्ति के द्वारा उसे वैराग्य यस्य प्रकृष्टतमो धर्मस्तस्य प्रकृष्टतमानीति प्रतिपादयितुमाशयानुरूपैरित्युक्तम् । इष्टशब्दः प्रत्येकं शरीरादिषु सम्बद्धयते , द्वन्द्वानन्तरं प्रयोगात् । तथा प्रकृष्टादधर्मात् प्रेतयोनीनां तिर्यग्योनीनां च स्थानेष्वनिष्टैः शरीरादिभिर्योगो भवति । प्रेतादिस्थानेऽपि मनाक् सुखमस्ति तच्च धर्मस्य कार्यम् , अतः स्वल्पधर्मसहितादित्युक्तम् । उपसंहरति - एवमिति ।

एवं धर्मात् संसारं प्रतिपाद्यापवर्ग प्रतिपादयति - ज्ञानपूर्वकात् त्विति । " स्वरूपतश्चाहमुदासीनो बाह्याध्यात्मिकारच विषयाः सर्व एवैते दुःखसाधनम् ” इति यस्य ज्ञानमभूत् स दृष्टानुश्रविक विषयसुखवितृष्णः “ एबमहं होता है , उसे उस शरीर से भी अच्छा शरीर मिलता है , एवं जिसका धर्म इन दोनों प्रकार के धर्मो से उत्कृष्टतम रहता है , उसे तदनुरूप ही शरीर भी उत्कृष्टतम मिलता है । प्रकृत वाक्य का ' इष्ट ' शब्द द्वन्द्वसमास के अन्त में प्रयुक्त है , अतः उसके पहिले के ' शरीरादि ' प्रत्येक शब्द के साथ उसका अन्वय है । इसी प्रकार प्रकृष्ट अधर्म से प्रेत तिर्यग्योनि के अनिष्ट शरीरादि के साथ आत्मा सम्बद्ध होता है । प्रेतलोक प्रभृति में भी थोड़ा सा सुख का सम्बन्ध है , एवं सुख धर्म से ही उत्पन्न होता है , अतः ' स्वल्पधर्मसहितात् ' ऐसा लिखा गया है । ' एवम् ' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।

इस प्रकार धर्म से संसार की उत्पत्ति का वर्णन कर ' ज्ञानपूर्वकात्तु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा धर्म से मोक्ष की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं । " मैं वस्तुतः अपने यथार्थरूप में उदासीन हूँ , एवं बाह्य और अभ्यन्तर जितने भी विषय हैं , वे सभी दुःख के हो साधन हैं " इस प्रकार का ज्ञान जिस पुरुष को हो जाता है वह ' दृष्ट ' चन्दनवनितादि जनित सुखों से एवं ' आनुश्रविक ' स्वर्गादि सुखों की तृष्णा से निवत्त

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

तस्मात् कर्मणो ज्ञानपूर्वकात् कृतादस्य विशुद्धे कुले जन्म भवति । अकुलीनस्य श्रद्धा न भवति । न चाश्रद्दधानस्य जिज्ञासा सम्पद्यते । न चाजिज्ञासोस्तत्त्वज्ञानम् तद्विकलस्य च नास्ति मोक्षप्राप्तिः । अतो मोक्षानुगुणमसंकल्पितफलं कर्म विशुद्धे कुले जन्म ग्राहयति , विशुद्धे कुले जातस्य प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य दुःखविगमोपाये जिज्ञासा सम्पद्यते " कुतो नु खल्वयं मम दुःखोपरमः स्यात् " इति ।

स चैवमाविर्भूतजिज्ञास आचार्यमुपगच्छति , तस्य चाचार्योपदेशात् षण्णां पदार्थानां श्रौतं तत्त्वज्ञानं जायते । तदनु श्रवणमनननिदिध्यासनादिक्रमेण प्रत्यक्षं भवति । उत्पन्नतत्त्वज्ञानस्याज्ञाननिवृत्तौ सवासन विपर्ययज्ञाननिवृत्तौ विरक्तस्य विच्छिन्नरागद्वेषसंस्कारस्य रागद्वेषयोरभावात् तज्जयोर्धमाधर्मयोरनुत्पादः । क्लेशवासनोपनिबद्धा हि प्रवृत्तयस्तुषावनद्धा इव तण्डुलाः प्ररोहन्ति । क्षीणेषु क्लेशेषु निस्तुषा इव तण्डुलाः कार्यं न प्रतिसन्दधते ।

यथाह भगवान् पतञ्जलिः-“ सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः " इति । यथाह भगवानक्षपादः – “ न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य " इति । पूर्वसश्वितयोश्च धर्माधर्मयो . निरोध उपभोगात् , निवृत्तिफलहेतोश्च कर्मान्तरात् । सन्तोषसुखं शरीरपरि . च्छेदं चोत्पाद्य रागादिनिवृत्तौ निवृत्तिलक्षणः केवलो धर्मः परमार्थदर्शनजं सुखं कृत्वा निवर्त्तते ।

निवर्त्यते संसारोऽनयेति निवृत्तिः , निवृत्तिलक्षणं यस्यासौ निवृत्तिलक्षणो निवृत्तिस्वभावो धर्मो रागादिनिवृत्तौ भूतायां केवलो व्यवस्थितः सन्तोषसुखं शरीरपरिच्छेदं चोत्पाद्य परमार्थदर्शनजमात्मदर्शनजं सुखं करोति , तत्कृत्वा निवर्त्तते । आभिमानिक कार्यविनिरोधात् तदा निर्बीजस्यात्मनः शरीरादिनिवृत्तौ पुनः शरीराद्यनुत्पत्तौ दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्षः ।

यदा परमार्थदर्शनं कृत्वा निवृत्तो धर्मः , तदा निर्बीजस्यात्मनः शरीरादिबीजधर्माधर्मरहितस्यात्मन उत्पन्नानां शरीरादीनां कर्मक्षयान्निवृत्तौ भूतायामनागतानां कारणाभावादनुत्पत्तौ यथा दग्धेन्धनस्यानलस्योपशमः पुनरनुत्पादः , एवं पुनः शरीरानुत्पादो मोक्षः ।

इदं निरूप्यते । किं ज्ञानमात्रान्मुक्तिः ? उत ज्ञानकर्मसमुच्चयात् ? ज्ञानकर्मसमुच्चयादिति वदामः । निवृत्तेतराभिलाषस्य काम्यकर्मभ्यो निवृतस्यापि नित्यनैमित्तिककर्माधिकारो न निवर्त्तते तानि ह्युपनीतं ब्राह्मणमात्रमधिकृत्य विहितानि । मुमुक्षुरपि ब्राह्मण एव , जातेरनुच्छेदात् । स यद्यधिकारित्वे सत्यवश्यकरणीयान्यतिक्रमेत् प्रत्यवायोऽस्य प्रत्यहमुपचीयेत , तदुपचयाच्च बद्धो न मुच्यते । यथोक्तम् -

यानि काम्यानि कर्माणि प्रतिषिद्धानि यान्यपि ।

तानि बध्नन्त्यकुर्वन्तं नित्यनैमित्तिकान्यपि ॥ इति ।

विहिताकरणमभावः , न चाभावो भावस्य हेतुरपि , अतो नास्मात् प्रत्यवायोत्पत्तिरिति चेत् ? न विहिताकरणेऽन्यकरणात् प्रत्यवायस्य सम्भवात् । अभावस्य हि स्वातन्त्र्येण हेतुत्वं नेष्यते , न तु भावोपसर्जनतया । न च शरोरी सन्ध्यादिकाले कायेन वाचा मनसा वा किञ्चिन्न करोति , शरीरधारणादीनामपि करणात् । यथोक्तम्-

कर्मणां प्रागभावो यो विहिताकरणादिषु ।

न चानर्थकरत्वेन वस्तुत्वान्नापनीयते ॥

स्वकाले यदकुर्वंस्तत् करोत्यन्यदचेतनः ।

प्रत्यवायो s स्य तेनैव नाभावेन स जन्यते ॥ इति ।

अभावेन केवलेन नासौ जन्यत इत्यर्थः । प्रतिषिद्धाचरणात् प्रत्यवायः , शरीरधारणादिकं च न प्रतिषिद्धम् । तत्कुर्वन्नपि यदि संध्यया योगमभ्यस्यति को दोष इति चेत् ? न , तत्काले विहितस्यावश्यकर्तव्यताविधेरर्थात् केवलस्य शरीरधारणादेः करणं प्रतिषिद्धमिति । तदाचरतो भवत्येव प्रतिषिद्धाचरणनिमित्त : प्रत्यवायः अथोच्यते । दीर्घकालादरनैरन्तर्य सेवितभावनाहितविशदभावमात्मज्ञानमेव रागद्वेषौ मोहं च समूलकाषं कषद्विहिताकरणनिमित्तं प्रत्यवायमपि कषतीति चेत् ? तदयुक्तम् । यत्र ह्यभ्यासः प्रसीदति , तत्र तत्त्वग्रहो जातः संशयविपर्ययौ व्युदस्यति , न त्वस्य वस्त्वन्तरनिर्वहणे सामर्थ्यं दृष्टपूर्वम् । यदि पुनरात्मज्ञानं कर्माणि निरुणद्धि उपारूढफलभोगमपि कर्म निरुन्ध्यात् , ततः सुदुरं गता जीवन्मुक्तिः ? तत्त्वदर्शनानन्तरमेव विलीनाखिलकर्मणो देहपातात् । अस्ति चायं परमार्थदृष्टिनिरुद्धाखिलाविद्यो s पि चित्रलिखितमिवाभासमात्रेण सर्वं जगत् पश्यन्नेकत्राप्यनारूढाभिनिवेशः कर्मविशेषमुपभुञ्जानः कुलालव्यापारविगमे चक्रप्रारब्धफलं भ्रान्तिवत् संस्कारवशादनुवर्त्तमानस्य देहपातमुदीक्षमाणः । तथा च श्रुतिः जीवन्नेव हि विद्वान् संहर्षायासाभ्यां विप्रमुच्यते इति । तथा चाहु : कापिला : -

सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ ।

तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमवद् धृतशरीरः ॥ इति ।

धर्मादीनामकारणप्राप्ताविति तत्त्वज्ञानेनोच्छिन्नेषु सवासनक्लेशेषु धर्मादीनां सहकारिकारणप्राप्त्यभावे सतीत्यर्थः । अलब्धवृत्तीनि कर्माणि तत्त्वज्ञानाद् विलीयन्त इति चेत् ? न तेषामपि कर्मत्वादारब्धफलकर्मवज् ज्ञानेन विनाशाभावात् । योऽपि ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ' इत्युपदेशः , तस्याप्ययमर्थ : - ज्ञाने सति अनागतानि कर्माणि न क्रियन्त इति । न पुनरयमस्यार्थःउत्पन्नानि कर्माणि ज्ञानेन विनाश्यन्त इति । तथा चागमान्तरम् ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ' इत्यादि । ज्ञानं यदि न क्षिणोति कर्माणि ? अनेकजन्म सहस्रसञ्चितानां कर्मणां कुतः परिक्षयः ? भोगात् कर्मभिश्च । तदर्थं चोदितैरनन्तानां कथमेकस्मिन् जन्मनि परिक्षय इति चेत् ? न , कालानियमात् । यथैव तावत् प्रतिजन्म कर्माणि चीयन्ते तथैव भोगात् क्षीयन्ते च । यानि त्वपरिक्षीणानि तान्यात्मज्ञेनापूर्वं सञ्चिन्वता च क्रमेणोपभोगात् कर्मभिश्च नाश्यन्ते । यथोक्तम्-

कुर्वन्नात्मस्वरूपज्ञो भोगात् कर्मपरिक्षयम् ।

युगकोटिसहस्रेण कश्चिदेको विमुच्यते ।। इति ।

तदेवं विहितमकुर्वतः प्रत्यायोत्पत्तेस्तस्य च बन्धहेतुत्वादन्यतो विरामाभावात् , प्रत्यवायनिरोधार्थं मुक्तिमिच्छता योगाभ्यासाविरोधेन भिक्षाभोजनादिवद् यथाकालं विहितान्यनुष्ठेयानि यावदस्यात्मतत्त्वं न स्फुटीभवति । स्फुटीकृतात्मतत्त्वस्यापि जीवन्मुक्तस्य तावत्कर्माणि भवन्ति , यावद्यात्रानुवर्तते । आत्मैकप्रतिष्ठस्य त्वभ्यर्णमोक्षस्य परिक्षीणप्रायकर्मणः तानि नश्यन्त्येव , बहिः संवित्तिविरहात् । परिणतसमाधिसामर्थ्य विशदीकृतमुपचितवैराग्याहितपरिपाकपर्यन्तमापादितविषयाद्वैतमुन्मूलित निखिलविपर्ययवासन मेकाग्रीकृतान्तःकरणकारणमात्मतत्त्वज्ञानमेव केवलं तदानों सञ्जायते , न बहिः संवेदनम् , बाह्येन्द्रियव्यापारोपरमात् । तत्र कः संभवः कर्मणाम् ? तथा च श्रुतिः- : - ' न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवतीत्यादि । तदा चाकरणनिमित्त : प्रत्यवायोऽपि नास्ति सन्ध्येयमुपस्थितेत्यादिकमजानतो ब्राह्मणोऽस्मीति प्रतीतिरहितस्य कर्माधिकारपरिभ्रंशात् । यथोक्तम्-

ब्राह्मणत्वानहमानी कथं कर्माणि संसृजेत् ॥ इति ।

न चास्योपरत समस्तव्यापारस्य काष्ठवदवस्थितस्यापि प्राणिहिंसापि संभवति । यत् पुनरस्य दृष्टद्रष्टव्यस्य क्षीण ेतव्यस्य वशीकृतमनसो विषयावबोधस्मरणसंकल्पसुखदुःखबहिष्कृतस्य ब्रह्मलग्नसमाधेरपि शरीरं कियन्तञ्चित् ( कालमनुवर्तते ) तच्छरीरस्थितिमात्र हेतोरायुविपाकस्य कर्मग्रन्थेरनुच्छेदात् । यदा तु यावन्तं कालमायुविपाकेन कर्मणा शरीरं धारयितव्यं तावत्कालप्राप्तिरभूत् , तदा स्वकार्यकरणात् कर्मसमुच्छेदे तत्कार्यस्य शरीरस्य निवृत्तिः ।

किं पुनरात्मनः स्वरूपं येनावस्थितिर्मुक्तिरुच्यते ? आनन्दात्मतेति केचित् । तदयुक्तम् । विकल्पासहत्वात् । स किमानन्दो मुक्तावनुभूयते वा ? न वा ? यदि नानुभूयते ? स्थितोऽप्यस्थितान्न विशिष्यते , अनुपभोग्यत्वात् । अनुभूयते चेत् ? अनुभवस्य कारणं वाच्यम् । न च कायकरणादिविगमे तदुत्पत्तिकारणतां पश्यामः । अन्तःकरणसंयोगः कारणमिति चेत् ? न , धर्माधर्मोपगृहीतस्य हि मनसः सहायत्वात् , तदखिलशुभाशुभबीजनाशोपगतं नात्मानुकूल्येन वर्त्तते । योगजधर्मानुग्रहादात्मानमनुकूलयति चेत् ? योगजोऽपि धर्मः कृतकत्वादवश्यं विना . शीति तत्प्रक्षये मनसः कोऽनुग्रहीता ? अथ मतम् - अचेतनस्यात्मनो मुक्तस्यापि पाषाणादविशेषः , सोऽपि हि न सुखायते न दुःखायते । मुक्तोऽपि यदि तथैव , को s नयोविशेषः ? तस्मादस्त्यात्मनः स्वाभाविकी चितिः , सा यदेन्द्रियैर्बहिरा - कृष्यते , तदा बहिर्मुखीभवति । यदा त्विन्द्रियाण्युपरतानि भवन्ति , तदा स्वात्मन्येवानन्दस्वभावे निमज्जति ।

अयं हि चितेरात्मा यदि यं कश्विदवभासयति , यदि पुनरियं मुक्तावस्थायामुदास्ते , तहि स्थितोऽप्यस्थित एव । वरमात्मा जड एवं कल्प्यतामिति चेत् ? अत्रोच्यते - किं चितेरानन्दात्मता स्वाभाविकी ? कारणान्तरजन्या वा ? न तावदवभासकारणं मुक्तावस्ति , कायकरणादीनां तत्कारणानां विलयादित्युक्तम् । स्वाभाविकी चेत् ? संसारावस्थायामप्यानन्दोऽनुभूयेत , चितिचैत्ययोरुभयोरपि सम्भवात् । अविद्याप्रतिबन्धादननुभव इति चेत् ? न , नित्यायाश्चितेरानन्दानुभवस्वभावायाः स्वरूपस्याप्रच्युतेः कः प्रतिबन्धार्थः ? प्रच्युतौ वा स्वरूपस्य का नित्यता ? तस्मान्नित्य आनन्दो नित्यया चित्या चेत्यमानो द्वयोरप्यवस्थयोरविशेषेण चेत्यते । न चैवमस्ति संसारावस्थायामुत्पन्नापवगिणो विषयेन्द्रियाधीनज्ञानस्य सुखस्यानुभवात् । अतो नास्त्यात्मनो नित्यं सुखं तदभावान्न तदनुभवो मोक्षावस्था , किन्तु समस्तात्म विशेषयु जोन्छे बोपलक्षिता स्वरूपस्थितिरेव । यथा चायं पुरुषार्थस्तथोपपादितम् ।

निवृत्तौ तत्कार्यस्य तत्त्वज्ञानस्यापि विनाशादात्मा कैवल्य मापद्यते । तत्रात्मतत्वज्ञानस्य विहितानां च कर्मणां बन्धहेतु कर्मप्रतिबन्धव्यापारादस्ति सम्भूयकारिता | शरीरादिविविक्तमात्मानं जानतश्च तदुपकारापकारावात्मन्यप्रतिसन्दधानस्याहङ्कार - ममकारयोरुपरमे सत्युपकारिण्यपकारिणि च रागद्वेषयोरभावादुदासीनस्याप्रवृत्तावनागतयोः कुशलेतरकर्मणोरसश्वयात् सश्वितयोश्चोपभोगेन कर्मभिश्च परिक्षयाद् विहिताकरणनिमित्तस्य प्रत्यवायस्य च विहितानुष्ठानेनंव प्रतिबन्धात् । क्षीणे कर्मण्यैहिकस्य देहस्य निवृत्तौ कारणान्तराभावादामुष्मिकस्य देहस्य पुनरुत्पत्त्यभावे सत्यात्मनः स्वरूपेणावस्थानम् । यथोक्तम्-

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — फिर भी ' अहं भूयासम् ' , ' मे भूयासुः ' ( मैं बराबर रहूँ और मेरे इष्ट विषय बराबर मुझे प्राप्त होते रहें ) इस प्रकार की भावना बनी ही रहती है । फलाकाङ्क्षा की इस भावना से प्रेरित होकर वह नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान करता ही रहता है , क्योंकि उनको छोड़ने का कोई हेतु तब तक उपस्थित नहीं रहता । ये ही कर्म जब उक्त पुरुष के द्वारा ज्ञानपूर्वक किये जाते हैं , तो उस पुरुष को विशुद्ध कुल में जन्म प्राप्त होता है ।

क्योंकि अकुलीन पुरुष में श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती , एवं बिना श्रद्धा के जिज्ञासा नहीं होती । जिसे जिज्ञासा नहीं , उसे तत्त्वज्ञान प्राप्त होना असम्भव है । बिना तत्त्वज्ञान के मोक्ष की प्राप्ति सम्भव नहीं है । अतः निष्कामकर्म मोक्ष का सहायक है । तस्मात् वह पुरुष विशुद्ध कुल में जन्म लेता है । विशुद्ध कुल में उत्पन्न वह पुरुष जब प्रतिदिन के दुःख से पीड़ित होने लगता है , तो उसे दुःखनाश के कारणों के प्रसङ्ग में यह जिज्ञासा उठती है ।

कि ' किन साधनों से इन दुःखों को निवृत्ति होगी ? जब पुरुष में इस प्रकार की जिज्ञासा उठती है तो वह आचार्य के पास जाता है । आचार्य के उपदेश से उसे वेदवाक्यों के द्वारा आत्मतत्व का ( परोक्ष ) ज्ञान होता है । फिर श्रवण के बाद मनन और मनन के बाद निदिध्यासन इस रीति से उसे आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है । प्रत्यक्षात्मक इस आत्मतत्त्वज्ञान के उत्पन्न हो जाने पर संसार के निदान भूत विपर्यय ( मिथ्याज्ञान ) का जड़मूल से विनाश हो जाता है । जिससे विषयों से वैराग्य उत्पन्न होता है ।

विरक्त पुरुष के राग और द्वेष के संस्कार भी छूट जाते हैं । राग और द्वेष के छूट जाने पर

८६ पूर्व सञ्चितयोश्चोपभोगान्निरोधे सन्तोषसुखं प्रशस्तपादभाष्यम्

शरीरपरिच्छेद चोत्पाद्य रागादिनिवृत्तौ निवृत्तिलक्षणः केवलो धर्मः परमार्थदर्शनजं सुखं कृत्वा निवर्त्तते । तदा निरोधात् निर्बीज स्यात्मनः शरीरादिनिवृत्तिः , पुनः शरीराद्यनुत्पत्तौ दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्ष इति । होता है । विरक्त पुरुष में राग और द्वेष की सम्भावना न रहने के कारण राग और द्वेष से होनेवाले धर्म और अधर्म की आगे उत्पत्ति रुक जाती है ।

पहिले से सञ्चित धर्म और अधर्म का उपभोग से नाश हो जाने के बाद सन्तोषात्मक सुख एवं शरीरपरिच्छेद ( शरीर के प्रति घृणा ) इन दोनों की उत्पत्ति होती है । इनसे रागादि की निवृत्ति होती है । इसके बाद निवृत्तिजनक केवल ( अधर्म से सर्वथा असम्बद्ध ) धर्म आत्मतत्त्वज्ञान की सहायता से ( परम ) सुख को उत्पन्न कर स्वयं भी निवृत्त हो जाता है ।

निवृत्तिलक्षण उस धर्म की निवृत्ति से उस समय आत्मा संसार के बीज ( धर्माधर्मादि ) से रहित हो जाता है , अतः उसके उपभोग के पूर्व - आयतन ( वर्त्तमान शरीर ) की निवृत्ति हो जाती है , एवं आगे शरीर की उत्पत्ति रुक जाती है । लकड़ी के जल जाने के कारण अग्नि की निवृत्ति की तरह उस समय शरीर का फिर से उत्पन्न न होना ही मोक्ष है । इन दोनों से उत्पन्न होनेवाले धर्म और अधर्म की उत्पत्ति भी रुक जाती है ।

जिस प्रकार छिलके से युक्त धान से ही अङ्कुर उत्पन्न होता है उसी प्रकार क्लेश और वासना से युक्त प्रवृत्ति से हो जन्म रूप कार्य की उत्पत्ति होती है । प्रबृत्तियों से जब वासना और क्लेश का सम्बन्ध छूट जाता है , तब उससे आगे जन्म का कार्य उसी प्रकार रुक जाता है , जिस प्रकार छिलके के न रहने से धान के द्वारा अङ्कुर का होना रुक जाता है । जैसा कि ' न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य ' इस सूत्र के द्वारा भगवान् अक्षपाद ने भी कहा है ।

पूर्वसञ्चितों का अर्थात् पूर्वसञ्चित धर्म और अधर्मं का ' निरोध ' उपभोग से होता है । संसारनिवृत्ति रूप फल के कारणीभूत ( निवृत्ति रूप ) धर्म का विनाश दूसरे धर्म से होता है । ' सन्तोषसुखम ' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ' निवृत्ति ' शब्द ' निवर्त्यते संसारोऽनया ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न है ( जिसका अर्थ है कि संसार की निवृत्ति जिससे हो ) ।

इस प्रकार से निष्पन्न निवृत्ति शब्द के साथ ' लक्षण ' शब्द का ' निवृत्तिलक्षणं यस्य असो निवृत्तिलक्षण : ' इस प्रकार का समास है , अर्थात् निवृत्तिस्वभाव का जो धर्म वह रागादि की निवृत्ति होने पर ' केवल ' अर्थात् व्यवस्थित हो जाता है । वह ( केवल धर्म ) सन्तोषसुख और शरीर सञ्चालन इन दोनों का उत्पादन कर ' परमार्थदर्शनजम् ' अर्थात् आत्मज्ञान जनित सुख को उत्पन्न कर स्वयं भी निवृत्त हो जाता है , क्योंकि आभिमानिक सभी कार्यों का वह विरोधी है ।

' तदा ' इत्यादि सम्दर्भ से कहते हैं कि यह निवृत्तिस्वभाव का धर्म जब आत्मज्ञान जनित धर्मं को उत्पन्न कर स्वयं निवृत्त हो जाता है ' तदा निर्बीजस्य ' अर्थात् तब शरीरादि के उत्पादन के बीज प्रवृत्तिलक्षण धर्माधर्मादि से रहित आत्मा के शरीरादि का कर्मक्षय से नाश हो जाता है , और कारणों के न रहने से आगे होनेवाले शरीरादि की उत्पत्ति रुक जाती है ।

जिस प्रकार लकड़ी के जल जाने के बाद अग्नि का भी नाश हो जाता है , और पुनः उत्पत्ति भी नहीं होती है , उसी प्रकार शरीर का पुनः उत्पन्न न होना ही ' मुक्ति ' है ।

अब इस विषय का विचार करते हैं कि केवल ज्ञान से ही मुक्ति होती है ? अथवा ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर मोक्ष का सम्पादन करते हैं ? हम लोग तो कहते हैं । कि ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर ही मोक्ष का सम्पादन करते हैं । क्योंकि जिन्हें सांसारिक विषयों की अभिलाषा नहीं है , वे यद्यपि काम्य कर्म से निवृत्त हो जाते हैं , फिर भी वे अपने नित्य और नैमित्तिक कर्मों की अवश्यकर्तव्यता से मुक्त नहीं हो सकते , क्योंकि नित्य और नैमित्तिक कर्मों का विधान उपनीत सभी ब्राह्मणों के लिए किया गया है । मोक्ष के इच्छुक भी ब्राह्मण ही हैं , क्योंकि जाति का कभी नोश नहीं होता । यदि अधिकार रहने पर भी अपने अवश्य कर्त्तव्य ( नित्य नैमित्तिक ) कर्मों का अनुष्ठान वे नहीं करते , फिर उनका प्रत्यवाय बढ़ता ही जाएगा । प्रत्यवाय को इस वृद्धि के कारण बद्धपुरुष कभी मुक्त नहीं होगा । जैसा आचार्यों ने कहा है कि-

जितने भी काम्य , निषिद्ध , नित्य और नैमित्तिक कर्म हैं , सभी अनुष्ठान न करनेवाले अधिकारो को संसार में बाँधते हैं ।

( प्र ० ) विहित कर्मों का न करना अभाव पदार्थ है , अभाव किसी का कारण नहीं हो सकता , अतः विहित कर्मों के न करने से प्रत्यवाय की उत्पत्ति नहीं हो सकती । ( उ ० ) यह कोई बात नहीं है , जिस समय अधिकारी विहित कर्म का अनुष्ठान न करेगा उस समय कोई दूसरा कर्म तो करेगा ही , इस दूसरे कर्म रूप भाव पदार्थ ) से ही प्रत्यवाय की उत्पत्ति होगी । अभाव स्वतन्त्र होकर ही किसी का कारण नहीं होता , किन्तु भाव पदार्थ रूप कारण का उपसर्जन तो होता ही है । जितने भी शरीरी हैं , वे सन्ध्यावन्दनादि के समय ( उसके न करने पर भी ) शरीर से वचन से या से कोई न कोई काम अवश्य ही करते हैं । क्योंकि शरीर को धारण करना भी तो कर्म ही है , जैसा कि आचार्यों ने कहा है-

विहित कर्म का न करना यतः कर्मों का प्रागभाव है , अतः भाव पदार्थ न होने के कारण वह प्रत्यवाय के उत्पादन से सर्वथा विरत नहीं हो सकता , क्योंकि मूढ़ भी विहित कर्म के काल में उसे न करने पर भी अन्य कोई कर्म अवश्य हो करता है , उस दूसरे कर्म से प्रत्यवाय की उपत्ति होती है , विहिताकरण रूप प्रागभाव से ही नहीं ।

अर्थात् केवल उक्त प्रागभाव से प्रत्यवाय की उत्पत्ति नहीं होती है | ( प्र ० ) निषिद्ध कर्मों के आचरण से प्रत्यवाय होता है , शरीर धारण रूप कर्म तो निषिद्ध नहीं है , फिर विहिताकरण के समय शरीर धारण से प्रत्यवाय की उत्पत्ति क्यों कर होगी ! शरीरधारण करते हुए यदि संध्या वन्दन के समय कोई योग का ही अभ्यास करता है , तो उसे प्रत्यवाय क्यों होगा ?

( प्र ० ) ' सन्ध्यावन्दन अवश्य करें ' यह विधान है , इस विधान से ही इस प्रतिषेध का भी आक्षेप होता है कि उस समय केवल शरीरका धारण न करे ( सन्ध्यावन्दन से युक्त शरीर का ही धारण करे ) अतः उस समय केवल शरीर का धारण प्रतिषिद्ध है । सुतराम् उससे प्रत्यवाय होना उचित है ।

यदि यह कहें कि ( प्र ० ) दीर्घकाल से आदरपूर्व किये गये अभ्यास के कारण आत्मा का विशद तत्त्वज्ञान जिस प्रकार राग , द्वेष , मोह प्रभृति को मूल सहित विनष्ट कर देता है , उसी प्रकार वही आत्मतत्त्वज्ञान विहित सन्ध्यावन्दनादि के न करने से होनेवाले प्रत्यवाय को भी विनष्ट कर देगा ।

30 ) तो उक्त कथन भी सङ्गत नहीं होगा , क्योंकि उपयुक्त अभ्यास केवल विषयों के तत्त्व को ही पूर्ण रूप में समझा सकता है , जिससे उसमें जो संशय या विपर्यय रहता है , उसका विनाश हो जाय | अभ्यासजनित तत्वग्रह में यह सामर्थ्य कहीं उपलब्ध नहीं है कि किसी दूसरी वस्तु को भी वह उत्पन्न करे । यदि यह मान भी लें कि आत्मज्ञान से कर्मों का नाश होता है , तो फिर उससे सारे प्रारब्ध कर्मों का भी नाश हो जाएगा , जिससे जीवन्मुक्ति की बात ही छोड़ देनी पड़ेगी ।

क्योंकि तत्त्वज्ञान के बाद ही प्रारब्ध सहित सभी कर्मों कानाश हो जाएगा , जिससे कि आत्मज्ञानवाले पुरुष के शरीर का भी नाश हो जाएगा । किन्तु ऐसे महापुरुषों की सत्ता अवश्य है जिनको सभी अविद्यायें आत्मतत्त्वज्ञान से नष्ट हो चुकी हैं , जो सम्पूर्ण विश्व को चित्रलिखित आभासमात्र की तरह देखते हैं , किसी भी एक विषय में अभिनिवेश न रखकर , अपने प्रारब्ध को भोगते हुए संस्कार के कारण कुम्हार के चाक के भ्रमण की तरह देहपात की प्रतीक्षा करते हैं ।

जैसा श्रुति कहती है कि ' आत्मज्ञानी पुरुष शरीर को धारण करते हुए भी हर्ष और शोक से विमुक्त रहते हैं " इसी प्रसङ्ग में सांख्यदर्शन के आचार्य ने भी कहा है कि--

' सम्यग्ज्ञान ( आत्मतत्त्व ज्ञान ) की प्राप्ति से धर्मादि से संसार के उत्पादक सहकारी ( वासनादि ) नष्ट हो जाते हैं , फिर भी संस्कार के कारण कुम्हार के चाक के भ्रमण की तरह तत्त्व ज्ञानी शरीर को धारण किये ही रहते हैं ।

उक्त आर्या में प्रयुक्त ' धर्मादीनामकारणप्राप्ती ' इस वाक्य का अर्थ है कि ' तत्त्वज्ञान से जब वासना सहित सभी क्लेशों का नाश हो जाता है , जब संसार के कारणीभूत धर्मादि भावों के सहकारी नष्ट हो जाते हैं , उस समय ' | ( प्र ० तत्वज्ञान के द्वारा प्रारब्ध से भिन्न सभी कर्मो का विनाश हो जाता है । ( उ ० ) यह भी ठीक नहीं है , क्योंकि प्रारब्ध कर्म की तरह वे भी कर्म ही हैं अतः तस्वज्ञान से उनका भी नाश नहीं हो सकता ।

' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' इत्यादि वाक्य का जो यह उपदेश है कि " आत्मतत्त्वज्ञान के हो जाने पर उसके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं " उसका इतना ही अभिप्राय है कि ज्ञान हो जाने के बाद कर्म की धारा रुक जाती है । फिर भविष्य में कर्म अनुष्ठित नहीं होते । उसका यह अर्थ नहीं है कि जो कर्म उत्पन्न हो गये हैं , तत्त्वज्ञान से उनका भी विनास होता है । जैसा कि दूसरे आगम के द्वारा कहा गया है । कि बिना भोग के कर्मों का नाश नहीं होता है , चाहे सौ करोड़ कल्प ही क्यों न बीत जाय ।

( प्र ० ) ज्ञान से यदि कर्मों का नाश नहीं होता है , तो फिर कई हजार वर्षो से सश्चित कर्मों का नाश किससे होता है ? ( उ ० ) भोग से और नाशक दूसरे कर्मों से ही ( उन सश्चित कर्मों का ) नाश होता है । ( प्र ० ) कर्मनाश के लिए विहित कर्मों से अनन्तजन्मों से सश्चित कर्मों का एक ही जन्म में विनाश किस प्रकार होगा ? ( उ ० ) ऐसी कोई बात नहीं है , कर्मक्षय के लिए काल का कोई नियम नहीं है । जिस प्रकार प्रत्येक जन्म में कर्म का सचय होता है उसी प्रकार भोग से उनका विनाश भी होता रहता है ।

उनमें जितने कर्म भोग से बच जाते हैं , उन कर्मों को आगे आत्मज्ञ पुरुष अपूर्व कर्मों का सश्चय करते हुए ही भोग से और ( प्रतिरोधक ) कर्म से क्रमशः नष्ट कर देते हैं । जैसा कहा गया है कि-

आत्मज्ञान से भोग के द्वारा कर्मों का नाश करते हुए हजारों कोटियुगों में कोई एक पुरुष मुक्त होता है ।

इन सब कारणों से यह मानना पड़ता है कि यतः विहित कर्मों को न करने से प्रत्यवाय होता है , एवं प्रत्यवाय बन्ध का कारण है , इस प्रत्यवाय की निवृत्ति विहित कर्मों के अनुष्ठान के बिना सम्भव नहीं है , अतः जिन्हें मुक्ति पाने की अभिलाषा हो , उन्हें योगाभ्यास को क्षति पहुँचाये बिना विहित कर्मों का अनुष्ठान तब तक करते रहना चाहिए , जब तक आत्मतत्त्व पूर्ण रूप से अवगत न हो जाय । जैसे कि ज्ञान न हो जाने तक भिक्षा भोजन प्रभृति कर्मों का अनुष्ठान अन्त तक करना पड़ता है ।

आत्मा का परिस्फुट ज्ञान हो जाने पर भी यदि वे जीवनमुक्त हैं , तो जब तक यह शरीर है , तब तक नित्य नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान उन्हें भी करना पड़ेगा । जिस महापुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान रह जाता है , और इस कारण जो परममुक्ति के समीप पहुंच जाते हैं , उनसे कर्म स्वयं छूट जाते हैं , क्योंकि उन्हें बाह्य विषयों का ज्ञान हो नहीं रह जाता । उन्हें तो केवल आत्मा का हो विशिष्ट ज्ञान रह जाता है ।

परिणत समाधि के द्वारा उत्पन्न होने के कारण जिस आत्मज्ञान में पूरी स्वच्छता आ गयी है , तीव्र वैराग्य से जिसमें पूरी परिपक्वता आ गयी है । एवं जिस आत्मज्ञान में दूसरे सभी विषयों का सम्बन्ध पूर्णतः समाप्त हो गया जिससे सभी विपर्यय रूप मिथ्या ज्ञान का विनाश हो गया है । जिस आत्मज्ञान की उत्पत्ति एकाग्र अन्तःकरण से होता है । ऐसे आत्मज्ञानवाले पुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान उस समय होता है ।

बाह्य किसी विषय का भान उन्हें नहीं रह जाता , क्योंकि बाह्य विषयों के साथ उनकी इन्द्रियों का सम्बन्ध हो नहीं रह जाता है । ऐसी स्थिति में उनसे कर्म सम्पादन की कौन सी आशा की जा सकती है ? इसी स्थिति को श्रुति ने ' न शृणोतीत्याहुरेकीभवति ' इत्यादि वाक्यों से कहा है । उस समय उनसे विहित कर्मों का अनुष्ठान न होने पर भी उन्हें प्रत्यवाय नहीं होता ।

क्योंकि जिन्हें कर्माधिकार का सूचक ' अभी सन्ध्या उपस्थित हो गयी , मैं ब्राह्मण हूँ इत्यादि ज्ञान नहीं है , उनका कर्म करने का अधिकार भी छूट जाता है । जैसा कहा गया है कि--

' मैं ब्राह्मण हूँ ' जिनको इस प्रकार का अहङ्कार नहीं है , वे ब्राह्मणोचित कर्म के साथ कैसे सम्बद्ध हो सकते हैं ?

इस प्रकार सभी कर्म छूट जाने के कारण जो काठ की तरह हो गये हैं , उनसे किसी भी प्राणी की हिंसा सम्भव नहीं है । जिन्होंने जानने योग्य सभी विषयों को जान लिया है , छोड़ने योग्य सभी विषयों को छोड़ दिया है ! जिन्होंने मन को वशीभूत कर विषयों के अनुभव , स्मरण , संकल्प , सुख एवं दुःख सभी से छुटकारा पा लिया है , वे यदि ब्रह्म के ध्यान में समाधिस्थ भी हैं तथापि उनकी शरीर की अनुवृत्ति जो थोड़े समय के लिए भी चलती है , उसका कारण वह कर्मग्रन्थि रूप विपाक है जो केवल शरीर स्थिति का ही कारण है । जितने समय के आयु तक उक्त कर्मविपाक से शरीर की स्थिति आवश्यक है , वह समय जब समाप्त हो जाता है , तब अपना कर्तव्य समाप्त होने के कारण कर्म भी समाप्त हो जाता है । कर्म की समाप्ति से शरीर की समाप्ति , और शरीर की समाप्ति से तत्त्वज्ञान की भी समाप्ति हो जाती है , जिससे आत्मा को कैवल्य प्राप्त होता है ।

नित्यनैमित्तिकैरेव कुर्वाणो दुरितक्षयम् ।

ज्ञानं च विमलीकुर्वन्नभ्यासेन तु पाचयेत् ॥

अभ्यासात् पक्वविज्ञानः कैवल्यं लभते नरः ॥ इति ।

तथा परैरप्ययं गृहीतो मार्गः ।

कर्मणा सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानेनात्मविनिश्चयः ।

भवेद् विमुक्तिरभ्यासात् तयोरेव समुच्चयात् ॥ इति ।

इस प्रकार आत्मतत्त्वज्ञान और विहितकर्मों का अनुष्ठान ये दोनों मिलकर ( ज्ञानकर्मसमुच्चय ) हो बन्ध के कारणीभूत कर्मों के प्रतिरोध करने की क्षमता रखते हैं । जिस पुरुष को ' शरीरादि से आत्मा भिन्न है ' इस प्रकार का ज्ञान और शरीरादि में किये गये उपकार और अपकार को आत्मा का उपकार और अपकार न समझने की बुद्धि है , उस पुरुष के अहङ्कार और ममकार का विलोप हो जाता है । फिर उपकारी के प्रति राग और अपकारी के प्रति द्वेष ये दोनों भी स्वतः निवृत्त हो जाते हैं । जिससे आत्मा को प्रवृत्ति रुक जाती है , और वह उदासीन हो जाता है । जिससे आगे पाप और पुण्य का प्रवाह रुक जाता है , और पहिले किये गये ( सचित ) पापपुण्य का भोग और दूसरे कर्मों से विनाश हो जाता है । एवं विहित कर्मों के न करने से जो प्रत्यवाय होगा , उसका प्रतिरोध विहित कर्मों के अनुष्ठान से ही हो जाएगा । इस प्रकार सभी कर्मों का विनाश हो जाने पर इहलोक का शरीर तो नष्ट हो ही जाएगा , और कारणों के न रहने पर पारलौकिक शरीर भी उत्पन्न नहीं होगा । ऐसी स्थिति में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाएगा । जैसा कहा गया है कि-

नित्य और नैमित्तिक कर्म के अनुष्ठान से सभी पापों को नष्ट करते हुए ज्ञान को स्वच्छ कर लेना चाहिए । इसके बाद अभ्यास के द्वारा उक्त स्वच्छ ज्ञान को परिपक्व कर लेना चाहिए । इस प्रकार अभ्यास से परिपक्व ज्ञानवाले पुरुष को ही कैवल्य प्राप्त होता है ।

अन्य सम्प्रदाय के लोगों ने भी इस मार्ग को अपनाया है , जैसा कि इस श्लोक से स्पष्ट है-

कर्म से अन्तःकरण को शुद्धि होती है और ज्ञान से आत्मा का ( साक्षात्कारात्मक ) विनिश्चय होता है । इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनों के ही अभ्यास से मुक्ति प्राप्त होती है ।

८७

आत्मा का वह कौन सा स्वरूप है जिस स्वरूप से आत्मा की स्थिति मुक्ति कहलाती है ? ( इस प्रश्न का उत्तर ) कुछ लोग इस प्रकार देते हैं कि वह स्थिति आत्मा की आनन्दस्वरूपता ही है । किन्तु यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि इस पक्ष के सम्भावित कोई भी विकल्प युक्त नहीं ठहरता । ( पहिला विकल्प यह है कि ) मुक्तावस्था में इस आनन्द का अनुभव होता है ? अथवा नहीं ? यदि अनुभव नहीं होता है , तो फिर उस आनन्द का रहना और न रहना दोनों बराबर है । क्योंकि उस आनन्द का उपभोग नहीं किया जा सकता ।

यदि कहें कि उस आनन्द का अनुभव होता है ? तो फिर उस अनुभव का कारण कौन है— यह कहना पड़ेगा । शरीर एवं इन्द्रियादि के नष्ट हो जाने पर और किसी को उस अनुभव का कारण मानना सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) अन्तःकरण ( मन ) का संयोग उसका कारण होगा ? ( उ ० 1 ) सो भी सम्भव नहीं है क्योंकि धर्म और अधर्म से प्रेरित मन हो अनुभव का सहायक है । जिसके सभी धर्म और अधर्म नष्ट हो चुके हैं , उसके मन से आत्मा को दुःख का अनुभव नहीं हो सकता ।

( प्र ० ) योगज धर्म के साहाय्य से वह मन आत्मा के अनुकूल होता है ( अर्थात् आत्मा सुखानुभव उ ० के का उत्पादन करता है ) । ( ) किन्तु योगज धर्म भी तो उत्पत्तिशील हो है , अतः उसका भी अवश्य नाश होगा , फिर उसके नष्ट हो जाने पर मन का सहायक कौन होगा ? यदि यह कहें कि ( प्र ० ) मुक्त भो हो यदि उसमें चैतन्य न रहे , तो फिर पत्थर के समान ही होगा , क्योंकि पत्थर में भी सुख दुःख को चेतनायें नहीं होतीं ।

यदि मुक्त पुरुष को भी सुख और दुःख को चेतनाओं से रहित मान लिया जाय , तो पत्थर और मुक्त आत्मा में क्या अन्तर रहेगा ? अतः यह मानना पड़ेगा कि आत्मा में एक स्वाभाविक चैतन्य होता है । वह चैतन्य जब इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों की तरफ खींचा जाता है , तब वह चैतन्य बहिर्मुख होता है ( अर्थात् बाह्य विषयक ज्ञान में परिणत होता है ) । जब इन्द्रियाँ अपने व्यापार से निवृत्त हो जाती हैं , उस समय वह ( चैतन्य ) अपने आनन्द स्वभाव में ही निमग्न रहता हैं ।

चित्स्वरूप इस आत्मा का यह स्वभाव है कि किसी को भासित करे । यदि मुक्तावस्था में वह इस काम से उदासीन हो जाता है , तो फिर उस समय चैतन्य का उसमें रहना और न रहना बराबर है । इससे अच्छा है कि आत्मा को जड़ ही मान लिया जाय । इस प्रसङ्ग में हम लोगों ( सिद्धान्तियों ) का कहना है कि आत्मा में जो आनन्द की अभिन्नता है वह स्वाभाविक है ? या किसी दूसरे कारण से उत्पन्न होती है ( यदि कारणान्तरजन्य मानें तो ) मुक्तावस्था में वे कारण नहीं हैं ।

क्योंकि कह चुके हैं कि अवभास के कारण शरीर इन्द्रियादि का उस समय विलय हो जाता है । यदि उसको स्वाभाविक मानें तो फिर संसारावस्था में भी उसका अवभास होना चाहिए , क्योंकि उस समय भी अवभास्य और अवभासक दोनों विद्यमान हैं । ( प्र ० ) संसारावस्था में अविद्या रूप प्रतिबन्धक के कारण उस आनन्द का भान नहीं होता है । ( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि चिति नित्य है , एवं आनन्द 1. उसका स्वरूप है , अतः चिति अपने उस आनन्द स्वरूप से विच्युत हो ही नहीं सकती ।

फिर उक्त प्रतिबन्ध के लिए कोई अवसर ही नहीं रह जाता । यदि चिति कभी ( संसारावस्था में ) अपने आनन्दस्वरूपता से प्रच्युत हो सकती हैं , तो फिर वह नित्य हो नहीं रह जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि आनन्द भी नित्य है , एवं नित्य चिति के द्वारा ही उसका अनुभव होता । यदि ऐसी बात है , तो फिर संसार और अपवर्ग दोनों ही अवस्थाओं में समान रूप से नित्य आनन्द का अनुभव होना चाहिए ।

किन्तु सो नहीं होता , क्योंकि संसारावस्था में जब तक अपवर्ग की प्राप्ति नहीं होती , तब तक विषय एवं इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान और सुख का ही अनुभव होता है । तस्मात् आत्मा का नित्यसुख नाम का कोई गुण ही अनुभव में नहीं आता । अतः आत्मा का नित्यसुख नाम का कोई गुण नहीं है । सुतरामु नित्यसुख के अनुभव की अवस्था मुक्ति नहीं है । आत्मा के सभी विशेषगुणों के आत्यन्तिकविनाश से युक्त आत्मा की स्वरूपस्थिति ही मोक्ष ' है । यह अवस्था पुरुष के लिए काम्य क्यों है ?

इसका उपपादन ( मङ्गलश्लोक की व्याख्या में ) कर चुके हैं ।

शब्दनिरूपणम्

पृ. ६९२

भाष्य २५४

श्रोत्रग्राह्यः , क्षणिकः , कार्य कारणोभय- शब्दोऽम्बरगुणः विरोधी , संयोगविभागशब्दजः प्रदेशवृत्तिः , समानासमानजातीय- कारणः ।

स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च ।

तत्र अकारादिर्वर्णलक्षणः शङ्खादिनिमित्तो ध्वनिलक्षणश्च ।

तत्र वर्ण- लक्षणस्योत्पत्तिरात्ममनसोः संयोगात् स्मृत्यपेक्षाद् वर्णोच्चारणेच्छा , तदनन्तरं प्रयत्नः , तमपेक्षमाणादात्मवायुसंयोगाद् वायौ कर्म जायते ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६९२प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 767

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आकाश का गुण ही शब्द है । उसका प्रत्यक्ष श्रोत्र से होता हैं । वह क्षणिक है , एवं उसके कार्य और उसके कारण दोनों ही उसके विनाशक हैं । संयोग , विभाग और शब्द ( इन तीनों में से किसी ) से उसकी उत्पत्ति होती है । वह अपने आश्रयद्रव्य के किसी एक देश में ही रहता है । वह अपने समानजातीय ( शब्द ) और विजातीय ( संयोग और विभाग इन दोनों ) से उत्पन्न होता है । यह ( १ ) वर्ण और ( २ ) ध्वनि भेद से दो प्रकार का है । उनमें अकारादि शब्द वर्णरूप हैं , और शङ्खादि से उत्पन्न शब्द ध्वनिरूप हैं । वर्णात्मक शब्द की उत्पत्ति इस प्रकार होती है कि स्मृतिसहकृत आत्मा और मन के संयोग के द्वारा वर्ण के उच्चारण की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस प्रयत्न के द्वारा आत्मा एवं वायु के संयोग से वायु में क्रिया उत्पन्न होती है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

शब्दोऽम्बरगुणः आकाशगुणः । ननु संख्यादयोऽप्याकाशगुणाः सन्ति , कथमिदं शब्दस्य लक्षणं स्यादत आह- श्रोत्रग्राह्य इति । श्रोत्रग्राह्यत्वे सत्यम्बरगुणो यः स शब्द इत्यर्थः । परस्य विप्रतिपत्तिनिराकरणार्थमाहक्षणिक इति । आशुतरविनाशी शब्दो न तु नित्यः , उच्चारणादूर्ध्वमनुपलम्भात् । सद्भावे प्रमाणाभावेन व्यञ्जकत्वकल्पनानवकाशात् । प्रत्यभिज्ञानस्य ज्वा लादिवत् सामान्यविषयत्वेनोपपतेस्तीव्रमन्दतादिभेदस्य च व्यक्ति भेदप्रसाधकत्वात् । कार्यकारणोभयविरोधी आद्यः शब्दः स्वकार्येण विरुध्यते अन्त्यः स्वकारणेनोपान्त्यशब्देन विरुध्यते , अन्त्यस्य विनाशकारणस्याभावात् । मध्यवर्तनस्तुभयथा विरुध्यन्ते । संयोगविभागशब्दजः । आद्यः शब्दः संयोगाद् शब्दादिति विवेकः । विभागाच्च जायते , पूर्व

प्रदेशवृत्तिः अव्याप्यवृत्तिरित्यर्थः । एतच्चोपपादितम् । समानासमान -

1 शब्दः समानजातीयकारणः । संयोगजविभागजश्च अस जातीयेति । शब्दजः मानजातीथकारणः । सद्विविधो वर्णलक्षणः , ध्वनिलक्षणश्च । अकारादिर्वर्णलक्षणः , शङ्खादिनिमित्तो ध्वनिलक्षणः । तत्र तयोर्मध्ये , वर्णलक्षणस्योत्पत्तिरुच्यते । आत्ममनसोः संयोगात् पूर्वानुभूतवर्णस्मृत्यपेक्षात् तत्सदृशवर्णोच्चारणे कर्तव्ये इच्छा भवति । ततः प्रयत्नस्तं प्रयत्नं निमित्तकारणमपेक्षमाणादात्मवायुसंयोगादसमवायिकारणात् कौष्ठयवायौ कर्म जायते । स च वायुरूर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति हृत्कण्ठताल्वादीन् प्रदेशानभिहन्ति । ततो s भिघातानन्तरं स्थानस्य कण्ठादेः कौष्ठयवायुना सह यः संयोगस्तन्निमित्तकारणभूतमपेक्षमाणात् स्थानाकाशसंयोगात् समवायिकारणाद् वर्णोत्पत्तिः ।

अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्डसंयोगाद् दण्डगतं वेगमपेक्षमाणाद् भेर्याकाशसंयोगादुपजायते । भेर्याकाशसंयोगोऽसमवायिकारणम् , भेरीदण्डसंयोगो दण्डगतश्च वेगो निमित्तकारणम् । वेणुपर्वविभागाद् वेण्वाकाशविभागाच्च शब्दो जायते । शब्दाच्च शब्दनिष्पत्ति कथयति - शब्दात् संयोगविभागनिष्पन्नाद् वीचीसन्तानवच्छब्द सन्तानः , यथा जलवीच्या तदव्यवहिते देशे वीच्यन्तरमुपजायते , ततोऽप्यन्यत् , ततोऽप्यन्यदित्यनेन क्रमेण वीचीसन्तानो भवति , तथा शब्दादुत्पन्नात् तदव्यवहिते देशे शब्दान्तरम् , ततोऽप्यनयोर्गमनागमनाभावात् प्राप्तस्यैवोपलब्धिरिति , ततोऽप्यन्यत् , ततोऽप्यन्यदित्यनेन क्रमेण शब्दसन्तानो भवति । एवं सन्तानेन श्रोत्रदेशे समागतस्यान्त्यशब्दस्य ग्रहणम् ।

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' शब्दोऽम्ब र गुणः ' अर्थात् आकाश का गुण ही शब्द है । संख्यादि भी तो आकाश के -गुण हैं , फिर आकाश का गुण होना शब्द का लक्षण कैसे हो सकता है ? इसी आक्षेप के समाधान के लिए ' श्रोत्रग्राह्य ' पद का उपादान किया गया है । अर्थात् जो श्रोत्र के द्वारा ग्रहण के योग्य हो , और आकाश का गुण भी हो वही ' शब्द ' है । शब्द में नित्यत्व पक्ष के निराकरण के लिए ही ' क्षणिक : ' यह पद प्रयुक्त हुआ है ।

अर्थात् उत्पत्ति के बाद शब्द अतिशीघ्र विनष्ट हो जाता है , अतः वह नित्य नहीं है क्योंकि उच्चारण के बाद फिर उसकी उपलब्धि नहीं होती है । ( प्र ० उच्चारण के बाद शब्द की अभिव्यक्ति का कोई साधन नहीं रहता , अतः शब्द की उपलब्धि नहीं होती , किन्तु उस समय भी शब्द है ही । ( उ ० ) उच्चारण के बाद शब्द की सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है , अतः शब्द के व्यञ्जक की कल्पना करने का कोई अवकाश नहीं है ।

' सोऽयं गकारः ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा को सादृश्यमूलक मान लेने से भी काम चल सकता है | एवं शब्दों में एक दूसरे में तीव्र और मन्द का व्यवहार होता है । ( वह भी नित्यश्व पक्ष में उपपन्न नहीं होता ) इससे अनेक शब्दों की कल्पना आवश्यक होती है । ' कार्यकारणोभयविरोधी ' अर्थात् प्रथम शब्द अपने द्वारा उत्पन्न द्वितीय शब्द से विनष्ट होता हैं , एवं अन्तिम शब्द अपने कारणीभूत अपने से अव्यवहितपूर्व के शब्द से विनष्ट होता है , क्योंकि अन्तिम शब्द के विनाश का कोई और कारण नहीं हो सकता ।

बीच के जो शब्द हैं , कार्यशब्द और कारणीभूत शब्द दोनों ही उनके विरोधी हैं । ' संयोगविभागशब्दज : ' अर्थात् प्रथम शब्द ( कभी संयोग से और कभी ) विभाग उत्पन्न होता है , अत : उनके दोनों ही कारण हैं । मध्य के सभी शब्द शब्द से ही जन्म लेते हैं । प्रदेशवृत्तिः ' अर्थात् शब्द अव्याप्यवृत्ति है ( अपने आश्रय के सभी देशों में नहीं रहता ) । ' शब्द किस प्रकार अव्याप्यवृत्ति है ' इसका उपपाटन ( शब्द के साधर्म्यप्रकरण में ) कर चुके हैं ।

' समानासमानजातीयेति ' शब्द से जिस शब्द की उत्पत्ति होती है , वह समानजातीयकारणक है । संयोग और विभाग से जिन शब्दों की उत्पत्ति होती है , उनके कारण शब्द के असमानजातीय हैं ।

' स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च ' अकारादि वर्णलक्षण शब्द है , एवं शङ्ख प्रभृति से जो शब्द उत्पन्न होते हैं , वे ध्वनिलक्षण शब्द हैं । ' तत्र ' अर्थात् उनके दोनों प्रकार के शब्दों में वर्णलक्षण शब्द की उत्पत्ति ( की रीति ) कहते हैं । अनुभूत वर्ण की स्मृति के साहाय्य से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा सर्वप्रथम उस वर्ण के समानवर्ण के उच्चारण की इच्छा होती है । इसके बाद ' प्रयत्न ' अर्थात् समानवर्ण के उच्चारण के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । उस प्रयत्न रूप निमित्त कारण के साहाय्य से आत्मा और वायु के संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा पुरुष के कोष्ठगत वायु में क्रिया उत्पन्न होती है । वह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ आते हुए कण्ठादि स्थानों में आघात उत्पन्न करता है अर्थात् हृदय , कण्ठ तालु प्रभृति वर्णों के जो उच्चारणस्थान हैं , वहाँ आघात करता है । इस अभिघात के वाद कौष्ठय वायु के साथ कण्ठादि स्थानों का जो संयोग होता है , उस संयोग रूप निमित्त कारण के साहाय्य से कण्ठादि स्थान और आकाश इन दोनों के संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा वर्ण रूप शब्द की उत्पत्ति होती है ।

अवर्णरूप शब्द ( ध्वनि ) भी दण्ड में उत्पन्न वेग के साहाय्य से भेरी और आकाश के संयोग के द्वारा उत्पन्न होता है । ( अर्थात् इस ध्वनि रूप शब्द के प्रति ) भेरी और आकाश का संयोग असमवायिकारण है , एवं भेरी और दण्ड का संगोग और दण्ड में रहनेवाला वेग ये दोनों निमित्त कारण हैं । बाँस और उसके गाँठ इन दोनों के विभाग एवं बाँस और आकाश के विभाग , इन दोनों से भी शब्द की उत्पत्ति होती है ।

पृ. ६९५

भाष्य २५५

स चोर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति ततः स्थानवायु संयोगापेक्षमाणात् स्थानाकाशसंयोगात् वर्णोत्पत्तिः ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६९५प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 770

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ जाते समय कण्ठ में अभिघात को उत्पन्न करता है । इसके वाद ( कण्ठादि ) स्थान और वायु का संयोग , एवं ( कण्ठादि ) स्थान और आकाश के संयोग इन दोनों संयोगों से वर्णात्मक शब्द की उत्पत्ति होती है ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

नन्वेषा कल्पना कुतः सिद्धयतीत्यत आह- श्रोत्रशब्दयोरिति । न श्रोत्रं शब्ददेशमुपगच्छति , नापि शब्दः श्रोत्रदेशम् , तयोनिष्क्रियत्वात् । अप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वात् । प्रकारान्तरेण चोपलब्धिर्न घटते । दृष्टा च वीचीसन्ताने स्वोत्पत्तिदेशे विनश्यतामपि स्वप्रत्यासत्तिमपेक्ष्य तदकल्प्यते निमित्तकारणभूतः कौष्ठ्यवायुरनुवर्त्तते , व्यवहिते देशे सदृशकार्यारम्भपरम्परया देशान्तरप्राप्तिः , तेन शब्दसन्तानः

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' शब्दात् संयोगविभागनिष्पन्नाद्वीची सन्दान वच्छन्द सन्तान : ' इस सन्दर्भ से शब्दजनित शब्द का निरूपण करते हैं । अर्थात् जिस प्रकार जल के एक तरङ्ग से उसके अति निकट के जल प्रदेश में दूसरा तरङ्ग उत्पन्न होता है , उसी प्रकार ( संयोग और विभाग से उत्पन्न ) शब्द के द्वारा उसके अति समीप के आकाश प्रदेश में दूसरे तत्सदृश शब्द की उत्पत्ति होती है । ( यह इसलिए मानना पड़ता है कि ) श्रोत्र और शब्द दोनों ही ( यत : व्य नहीं है ) अतः अन्यत्र नहीं जा सकते , एवं जब तक इन्द्रिय के साथ बिषय का सम्बन्ध नहीं होगा तब तक विषय का ग्रहण सम्भव नहीं है । अतः दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति , तीसरे शब्द से चौथे शब्द की उत्पत्ति , इस प्रकार शब्दसन्तान ( समूह ) की उत्पत्ति होती है । इस सन्तान का अन्तिम शब्द श्रोत्र प्रदेश में जब उत्पन्न होता है , तब उस सन्तान के उसी अन्तिम शब्द का ग्रहण होता है । इस प्रकार के शब्दसन्तान की कल्पना क्यों आवश्यक होती है ? इसी प्रश्न का समाधान ' श्रोत्रशब्दयोः ' इत्यादि से किया गया है ।

पृ. ६९५

भाष्य २५६

अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्ड संयोगापेक्षाद् भेर्याकाशसंयोगादुत्पद्यते ।

वेणुपर्वविभागाद् वेण्वाकाश विभागाच्च शब्दाच्च संयोगविभागनिष्पन्नाद् वीची सन्तानवच्छन्द सन्तान इत्येवं सन्तानेन श्रोत्र प्रदेशमागतस्य

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६९५प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 770

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — भेरी ( प्रभृति ) और दण्ड ( प्रभृति ) का संयोग एवं भेरी ( प्रभृति ) और आकाश का संयोग , इन दोनों संयोगों से अवर्ण ( ध्वनि ) रूप शब्द की उत्पत्ति होती है । बाँस और उसकी सन्धि ( गाँठ ) के विभाग एवं बाँस और आकाश का विभाग इन दोनों विभागों से शब्द की उत्पत्ति होती है । संयोग और विभाग से निष्पन्न शब्द के तरङ्गों के समूह की तरह शब्द भी शब्द के तरङ्गों के समूहों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार शब्द के

पृ. ६९६

भाष्य २५७

ग्रहणम् ।

श्रोत्रशब्दयोर्गमनागमनाभावादप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति , परिशेषात् सन्तानसिद्धिरिति ।

प्रशस्तपादभाष्य · पृ. ६९६प्रशस्तपादभाष्य, न्यायकन्दली सहित, हिन्दी अनुवाद (सम्पूर्णानन्द सं. वि. वि.)पृ. 771

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( उक्त समूहों के द्वारा ) श्रोत्र प्रदेश में पहुँचने के बाद श्रोत्र के द्वारा उसका प्रत्यक्ष होता है । यतः श्रोत्रेन्द्रिय और शब्द इन दोनों में से कोई भी गतिशील नहीं है , और श्रोत्र से असम्बद्ध शब्द का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है , अतः परिशेषानुमान से ( शब्दजनित ) शब्दसन्तान ( समूह ) की सिद्धि होती है ।

प्रशस्तपादभाष्य में गुणों का निरूपण समाप्त हुआ ।

न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट

। न चानवस्था , यावद्वरं तावद्वरं शब्दसन्तानानुवृत्तिः । अत एव प्रतिवातं शब्दानुपलम्भ :, कौष्ठयवायुप्रतिघातात् । अतीवायं मार्गस्ताकिकैः क्षुण्णस्तेनास्माभिरिह भाष्यतात्पर्यमात्रं व्याख्यातम् , नापरा युक्तिरुक्ता ।

गुणोपबद्धसिद्धान्तो युक्तियुक्तिप्रभावितः ।

मुक्ताहार इव स्वच्छो हृदि विन्यस्यतामयम् ||

इति भट्ट श्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेश न्यायकन्दलीटीकायां गुणपदार्थः

समाप्तः ।

जगदङ्कुरबीजाय संसारार्णवसेतवे ।

नमो ज्ञानामृतस्यन्दिचन्द्रायार्धेन्दुमौलये ||

न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अर्थात् न शब्द ही श्रोत प्रदेश में जा सकता है , और न श्रोष ही शब्द प्रदेश में आ सकता है , क्योंकि दोनों ही क्रिया से सर्वथा रहित हैं । यतः इन्द्रियाँ विषय के साथ सम्बद्ध होकर ही विषय को ग्रहण करती हैं ( यही इन्द्रियों का प्राप्यकारित्व है ) । अतः शब्दसन्तान की कल्पना के बिना शब्द की उपलब्धि उपपन्न नहीं हो सकती । जल के तरङ्ग अपनी उत्पत्ति के प्रदेश में विनाशप्राप्त होने पर भी उससे अव्यवहित उत्तर प्रदेश में अपने सदृश ही दूसरे तरङ्गव्यक्ति को उत्पन्न करते हुए देखे जाते हैं ? इसी दृष्टान्त के बल से शब्दसन्तान की कल्पना करते हैं । इसमें अनवस्था दोष भी नहीं है , क्योंकि शब्द के निमित्तकारण कोष्ठ सम्बन्धी वायु की कल्पना करेंगे । यही कारण हैं कि रहने पर शब्द की उपलब्धि नहीं अनुवृत्ति जितनी दूर तक रहेगी , उतनी ही दूर तक शब्दसन्तान की अनुवृत्ति की होती है , क्योंकि कोष्ठ सम्बन्धी वायु हो जाता है । इस मार्ग को तार्किकों प्रतिकूल वायु के

उससे प्रतिहत ने अनेक प्रकार से रौंद डाला है . अत : हम लोगों ने भाष्य का तात्पर्य मात्र ही लिखा , कोई दूसरी युक्ति नहीं दिखलायी ।

मोती के माला की तरह ( गुणनिरूपण रूप ) यह स्वच्छ हार विद्वान् लोग हृदय में धारण करें । यह हार युक्ति स्वरूप शुक्तिका में उत्पन्न मोतियों से बना है , एवं सिद्धान्त सिद्धगुण ( डोरी में ) गुंथा हुआ है ।

भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रची गयी एवं पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टोका का गुणपदार्थों का विवेचन समाप्त हुआ ।

In English

Definition of Memory and Rishi Knowledge

This text from the Prashastapadabhashya explains the nature of memory (smriti) and its role in causing inference, desire, and aversion. It also defines Arsha knowledge, which is the intuitive, truthful perception possessed by sages regarding eternal truths.

This article answers

  • What causes memory according to prashastapadabhashya?
  • Difference between memory and inference in prashastapadabhashya?
  • Definition of arsha knowledge in prashastapadabhashya?
  • Why is memory not considered a valid source of proof?

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — प्रशस्तपादभाष्य।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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