व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य
प्रशस्तपादभाष्य — गुण: अनुमानके अवयव, हेत्वाभास, निदर्शन
20 मूल पद्य
अवयवनिरूपणम्
पृ. ५६५
अवयवाः पुनः प्रतिज्ञापदेश निदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ये अवयव ( १ ) प्रतिज्ञा , ( ) अपदेश ( हेतु ) , ( ३ ) निदर्शन ( उदाहरण ) , ( ४ ) अनुसंधान ( उपनय ) और ( ५ ) प्रत्याम्नाय ( निगमन ) भेद से पाँच प्रकार के हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अत्र समाधिः- न शब्दस्य परार्थत्वात् तद्द्वारमनुमानप | रार्थ्यमिति वदामः , अपि तु यत् परार्थं पञ्चावयवं वाक्यं तल्लिङ्गप्रतीतिद्वारेणानुमितिहेतुत्वादनुमानमिति ब्रूमः । नन्वेवमपि लिङ्गप्रतिपादकस्य प्रत्यक्षस्यानुमानतावतारप्रसङ्गः ? न प्रसङ्गस्तत्र लौकिकशब्दप्रयोगाभावात् ।
पश्चावयवं वाक्यमित्युक्तम् । के पुनस्ते पश्चावयवाः तत्राह अवयवाः पुनः प्रतिज्ञापदेशनिदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः । पुनः शब्दो वाक्यालङ्कारे , तत्र तेषां मध्येऽनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा । एतत् स्वयमेव विवृणोति - प्रतिपिपादयिषितेत्यादिना । प्रतिपादयितुमिष्टो यो धर्मस्तेन विशिष्टो धर्मी अनुमेय : पक्ष इति कथ्यते । तस्य यदुद्देशमात्रं सङ्कीर्तनमात्रं साधनरहितं सा प्रतिज्ञेति । यथोपदिशन्ति सन्तः--
" वचनस्य प्रतिज्ञात्वं तदर्थस्य च पक्षता " इति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का यह समाधान है कि इस युक्ति से हम अनुमान को परार्थ नहीं मानते कि सामान्यतः सभी शब्द दूसरों को समझाने के लिए ही प्रयुक्त होते हैं , अतः अपने उपस्थापक या ज्ञापक पञ्चावयववाक्य रूप शब्द के द्वारा हेतु वा हेतु ज्ञान रूप अनुमान भी पराथं है , किन्तु ( हम लोगों का यह कहना है कि ) चूंकि परार्थ ( दूसरों को समझाने के लिए प्रयुक्त ) जो पञ्चावयव वाक्य वह अपने द्वारा उपस्थित उपयुक्त हेतु के द्वारा या अपने से उत्पन्न हेतु के ज्ञान द्वारा ही अनुमिति का कारण है , अतः अनुमान परार्थ है । ( प्र ० ) इस प्रकार तो जहाँ हेतु का ज्ञान प्रत्यक्ष के ज्ञापक शब्द के द्वारा उत्पन्न होगा , वहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण भी ( परार्थ ) अनुमान होगा ? ( उ ० > यह आपत्ति नहीं है , क्योंकि ऐसे स्थलों में कहीं भी शब्दों का प्रयोग लोक में नहीं देखा जाता है ।
यह कहा गया है कि परार्थानुमान के उत्पादक महावाक्य के पाँच अवयव हैं । किन्तु वे पाँच अवयव कोन कौन हैं ? इस प्रश्न का समाधान ' अवयवाः पुनः प्रतिज्ञापदेश निदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नाया । ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । इस वाक्य में ' पुनः ' शब्द का प्रयोग केवल वाक्य को अलङ्कृत करने के लिए है । ' तत्र ' अर्थात् उन पाँचों अवयवों में प्रतिज्ञा का यह लक्षण किया गया है , ' अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा ' । ' प्रतिपिपादयिषित ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा प्रतिज्ञा के उस ( अपने ) लक्षण वाक्य की हो
पृ. ५६६
तत्रानुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा ।
प्रतिपिपादयिषितधर्मविशिष्टस्य धर्मिणोपदेश विषय मापादयितुमुद्देशमात्रं प्रतिज्ञा |
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इनमें ' अनुमेय ' का अर्थात् अनुमान के लिए अभिप्रेत विषय का प्रतिपादक वह वाक्य ही ' प्रतिज्ञा ' है , जिसका और किसा भी प्रमाण से विरोध न रहे । ( विशदार्थ यह है कि ) जिस धर्म ( साध्य ) का प्रतिपादन पक्ष में अभिप्रेत हो उस धर्म ( साध्य ) से युक्त धर्मी ( पक्ष ) ही अनुमेय है । ( साध्य से युक्त उस ) धर्मी पक्ष ) में हेतु के सम्बन्ध को दिखलाने के लिए प्रयुक्त ( साध्य से युक्त पक्ष के बोधक ) वाक्य ही ' प्रतिज्ञा ' है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
यदि हेतुरहितमुद्देशमात्रं प्रतिज्ञा नैव तस्याः साध्यसिद्धिरस्तीति असाधनाङ्गत्वान्न प्रयोगमर्हति । यथा वदन्ति तथागताः --
शक्तस्य सूचकं हेतुर्वचोऽशक्तमपि स्वयम् ।
साध्याभिधानात् पक्षोक्तिः पारम्पर्येण नाप्यलम् ।। इति । हेतुः प्रयुज्यते , तस्य सिद्धत्वात् अपि तु कस्मिश्चिद्धमणि प्रतिनियते , तस्मिन्ननुपन्यस्यमाने निराश्रयो हेतुर्न प्रवर्तेत । तस्याप्रवृत्तौ न साध्यसिद्धिरतः प्रतिज्ञया धर्मग्राहकं प्रमाणमुपदर्शयन्त्या हेतोराश्रयो धर्मी सन्निधाप्यते , इत्याश्रयोपदर्शनद्वारेण हेतुं प्रवर्तयन्ती प्रतिज्ञा साध्यसिद्धेरङ्गम् । तथा च न्यायभाष्यम् – " असत्यां प्रतिज्ञायामनाथया हेत्वादयो न प्रवर्तेरन् " इति । उपनयादेव तोराश्रयः प्रतीयत इति चेन्न , असति प्रतिज्ञावचने तस्याप्यप्रवृत्तेः । उपनयः साधनस्य पक्षधर्मतालक्षणं सामर्थ्यमुपदर्शयति । न प्रत्येतुः प्रथममेव साधनं प्रत्याकाङ्क्षा , किन्तु साध्ये , तस्य प्रधानत्वात् । आकाङ्क्षिते साध्ये तत्सिद्धयर्थं पश्चात् साधनमाकाङ्क्षते , तदनु साधनसामर्थ्यमिति प्रथमं साध्यवचनमेवोपतिष्ठते , न पुनरग्रत एव साधनसामर्थ्यमुच्यते , तस्य तदानी - मनपेक्षितत्वात् ।
प्रतिपिपादयिषितेन धर्मेण विशिष्टो धर्मीति विप्रतिषिद्धमिदम् अप्रतीतस्याविशेषकत्वादिति चेत् ? सत्यम् , अप्रतीतं विशेषणं न भवति , प्रतीतस्तु साध्यो धर्मः सपक्षे विप्रतिपन्नं प्रति ज्ञापनाय धर्मिविशेषणतया प्रतिज्ञायते । अत एव धर्मिणः पक्षता वास्तवी , तस्य स्वरूपेण सिद्धस्यापि प्रतिपाद्यधर्मविशिष्टत्वेनाप्रसिद्धस्य तेन रूपेण आपाद्यमानत्वसम्भवात् पक्षधर्मतापि हेतोरित्थमेव , यदि केवलमेवानित्यत्वं साध्यते भवेच्छब्दधर्मस्य । कृतकत्वस्यापक्षधर्मता , शब्दे एव त्वनित्ये साध्ये नायं दोषः । यथाहुराचार्याः -
स एव चोभयात्मायं गम्यो गमक एव च ।
असिद्धेनैकदेशेन गम्यः सिद्धो न बोधकः ॥ इति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — तत्राह - अपदेशविषयमापादयितुमिति । अपदेशो हेतुस्तस्य विषयमाश्रयमापादयितुं प्रतिपादयितुं प्रतिज्ञाने ' , ( न ) खलु यत्र क्वचन साध्यसाधनाय व्याख्या भाष्यकार स्वयं करते हैं । जिस धर्म ( वस्तु ) का प्रतिपादन ( पञ्चावयव वाक्य के प्रयोक्ता को ) अभिप्रेत हो उस धर्म से युक्त धर्मी ही ' अनुमेय ' या ' पक्ष ' कहलाता है | उसका जो ' उद्देशमात्र ' केवल कथन अर्थात् हेतु वाक्य के सांनिध्य से रहित वाक्य का प्रयोग ही ' प्रतिज्ञा ' है । जैसा कि विद्वानों का कहना है कि " उक्त वाक्य ही प्रतिज्ञा है और प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा कथित अर्थ हो पक्ष है " ।
( प्र ० ) यदि हेतु वाक्य से सर्वथा असम्बद्ध केवल पक्ष का बोधक वाक्य ही प्रतिज्ञा है , तो फिर साध्य सिद्धि का उपयोगी अङ्ग न होने से उसका प्रयोग ही उचित नहीं है । जैसा कि तथागत के अनुयायियों का कहना है कि - हेतु ही साध्य का ज्ञापक हैं । ( केवल प्रतिज्ञा रूप ) वचन में साध्य को समझाने का सामर्थ्य नहीं है , अतः परम्परा से साध्य को उपस्थित करने के कारण भी प्रतिज्ञा अनुमान का अङ्ग नहीं है ।
इसी आक्षेप के समाधान के लिए ' अपदेश विषयमापादयितुम् ' यह वाक्य लिखा गया है | ' अपदेश ' शब्द का अर्थ है ' हेतु ' उसका ' विषय ' अर्थात् आश्रय के ' आपादन ' के लिए अर्थात प्रतिपादन के लिए ही प्रतिज्ञा वाक्य का उपयोग है ।
अभिप्राय यह है कि जिस किसी आश्रय में साध्य के साधन के लिए हेतु का प्रयोग नहीं होता , क्योंकि सामान्यतः किसी स्थान में साध्य तो सिद्ध है हीं , अतः किसी विशेष धर्मों में साध्यसिद्धि के लिए ही हेतु का प्रयोग होता है ( जहाँ पहिले से साध्य सिद्ध नहीं है और वहाँ साध्य का साधन इष्ट है ) वह ( विशेष प्रकार का धर्मी ) यदि प्रतिपादित न हो तो फिर बिना आश्रय ( विषय ) के होने के कारण हेतु की प्रवृत्ति ही नहीं होगी । हेतु की प्रवृत्ति के बिना साध्य को सिद्धि भी न हो सकेगी ।
अतः प्रतिज्ञा पक्ष रूप धर्मी के ज्ञापक प्रमाण को उपस्थित करती हुई हेतु के आश्रय रूप धर्मी को उसके समीप आती है । इस आश्रय के प्रदर्शन के द्वारा ही हेतु की प्रवृत्ति में निमित्त होने के कारण प्रतिज्ञा भी साध्य - सिद्धि का उपयोगी अङ्ग है । जैसा कि न्यायभाष्यकार ने कहा है कि ' यदि प्रतिज्ञा न रहे तो फिर हेतु प्रभृति अवयवों की प्रवृत्ति ही न हो सकेगी ' | ( प्र ० ) उपनय से ही हेतु के उस आश्रय ( विषय ) की प्रतीति होगी ?
( उ ० ) प्रतिज्ञा के न रहने पर उपनय की भी प्रवृत्ति नहीं हो सकती , क्योंकि हेतु के पक्षधर्मता - रूप सामर्थ्य का प्रदर्शन ही उपनय का काम है । किन्तु साध्य के प्रधान होने के कारण ज्ञाता पुरुष को पहिले साध्य के प्रसङ्ग में हो जिज्ञासा होती है , साधन के सामर्थ्य के प्रसङ्ग में नहीं 4 । एक ' न ' कार का रहना आवश्यक हैं । एवं पूर्ववाक्य के अन्त भी प्रतिज्ञाया उपयोगः ' इस अर्थ को समझाने के लिए भी कोई शब्द चाहिए ।
प्रकृत ग्रन्थ में जो ' प्रतिज्ञाने ' शब्द है , उसका भी कुछ ठीक अर्थ नहीं बैठता है । अतः यह तय करना पड़ा कि ' प्रतिज्ञाने ' इस पद में ' ए ' कार प्रमाद से लिखा गया है । अवशिष्ट ' प्रतिज्ञान ' भी एक शब्द नहीं है , किन्तु ' प्रतिज्ञा ' और ' न ' ये दो अलग शब्द हैं । जिनमें पहिला पहिले वाक्य के अन्त में और दूसरा दूसरे वाक्य के आदि में मान लिया गया है । तदनुसार प्रकृत पाठ इस प्रकार निष्पन्न होता है ' अपदेशो हेतु :, तस्य विषयमाश्रयमापादयितुं प्रतिज्ञा ।
न खलु यत्र क्वचन साध्यसाधनाय हेतु : प्रयुज्यते , तस्य सिद्धत्वात् । अपि तु कस्मिंश्चिद्धमिणि प्रतिनियते " इसी पाठ के अनुसार अनुवाद किया गया है । साध्य की आकाङ्क्षा निवृत्त हो जाने पर फिर साध्य की सिद्धि के लिए साधन और उसके प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा जागती है , बाद में साधन के ( पक्षधर्मतादि ) सामर्थ्य के प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा उठती है । अतः पहिले प्रतिज्ञा रूप साध्य वचन की ही उपस्थिति उचित होती है ।
यह नहीं होता कि पहिले ( उपनय के द्वारा ) साधन के सामर्थ्य का ही प्रदर्शन हो , क्योंकि उस समय उसकी अपेक्षा ही नहीं है :
( प्र ० ) धर्मी का यह लक्षण ठीक नहीं मालूम पड़ता कि जिस धर्म का प्रतिपादन इष्ट हो , उस धर्म रूप विशेषण से युक्त ही धर्मी ' ( या पक्ष ) है , क्योंकि ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं कि एक ही वस्तु प्रतिपादन के लिए अभीष्ट भी हो , एवं वही ( अप्रतिपादित ) वस्तु विशेषण भी हो , क्योंकि विशेषण के लिए यह आवश्यक है कि वह पहले से ज्ञात हो ( पहिले से ज्ञात वस्तु कभी प्रतिपाद्य नहीं हो सकता ) यह ठीक है कि विशेषण को ( स्व से युक्त धर्मी के ज्ञान से ) पहिले ज्ञात होना ही ( 30 ) चाहिए | किन्तु प्रकृत में भी तो साध्य रूप धर्मपहिले से सपक्ष ( इष्टान्त ) में ज्ञात ही रहता है ।
सपक्ष में ज्ञात साध्य के प्रसङ्ग मेंजिस पुरुष को पक्ष में विप्रतिपत्ति है उसे समझाने के लिए ही साध्यरूप विशेषण से युक्त धर्मी का निर्देश प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा कियो जाता है | चूँकि ( पर्वतत्वादि ) अपने स्वरूप से सिद्ध रहने पर भी प्रतिपाद्य ( वह्नि प्रभृति ) साध्य रूप धर्म से युक्त होकर वह पहिले से प्रसिद्ध नहीं है , अतः उस रूप से पक्ष का प्रतिदन सम्भव है । इसी कारण धर्मी का पक्ष होना ( धर्मी को पक्षता ) वास्तविक है ( काल्पनिक नहीं ) ।
इसी प्रकार हेतु की पक्षता भी ठीक ही है , क्योंकि ( शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात् , घटादिवत् - इत्यादि स्थलों में ) यदि केवल अनित्यत्व का ही साधन करें तो शब्द में रहनेवाले कृतकत्व में पक्षधमंता नहीं रह सकेगी , किन्तु अनित्यत्व से युक्त को हो यदि साध्य मान लेते हैं , तो फिर उक्त ( कृतकत्व हेतु में अपक्षधर्मत्व रूप ) दोष की आपत्ति नहीं होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि--
धर्मी के दो भेद हैं , पहिला है साध्य रूप धर्म से युक्त , जो पक्ष कहलाता है । दूसरा है केवल धर्मी , जो ' धर्मी ' ही कहलाता है । इनमें पहिला ( पहिले से सिद्ध न होने के कारण ) ' गम्य ' है अर्थात् साध्य है । दूसरा ' गमक ' अर्थात् ( अपने ज्ञान के द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा ) ' गमक ' अर्थात साध्य ज्ञान का कारण है । अर्थात् धर्मी के दो स्वरूप हैं , एक साध्य से सम्बद्धवाला , दूसरा केवल अपने स्वरूपवाला , इनमें पहिले स्वरूप से वह ' गम्य ' अर्थात् साध्य है , ( क्योंकि उस रूप से पहिले वह सिद्ध नहीं है ) दूसरे स्वरूप से वह ' गमक ' अर्थात् स्वज्ञान के द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा साधक है ।
' द्रव्यं वायु : ' इस वाक्य के द्वारा प्रतिज्ञा का उदाहरण कहा गया है । जो व्यक्ति वायु को समझता है , किन्तु उसे द्रव्य नहीं समझता , उसको वायु में द्रव्यत्व को समझाना अभिप्रेत है । उसके लिए द्रव्यत्व से युक्त वायु को समझाने के लिए ' द्रव्यं वायु ' ऐसी प्रतिज्ञा की जाती है । ' अविरोधिग्रहणात्प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगत स्वशास्त्रस्ववचनविरोघिनो निरस्ता भवन्ति ' इस वाक्य के द्वारा ( प्रतिज्ञा के लक्षण वाक्य में ) ' अविरोधि ' शब्द के प्रयोग का हेतु दिखलाया गया है । वादी को जिस वस्तु का साधन अभिप्रेत होता है , उसे ' साध्य ' कहते हैं । ऐसे भी वादी हैं जो भ्रान्ति से वशीभूत होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधित अर्थों के साधन के लिए भी प्रवृत्त हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में यदि सामान्य रूप से ' अनुमेयोद्देशः प्रतिज्ञा ' ( अर्थात् अनुमेय के बोधक सभी वाक्य प्रतिज्ञा हैं ) ऐसा ही प्रतिज्ञा का लक्षण किया जाय , तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरुद्ध ( ' वह्निरनुष्णः ' इत्यादि ) वाक्य भी प्रतिज्ञा हो जाएँगे , किन्तु उस प्रकार के वाक्य प्रतिज्ञा नहीं हैं , क्योंकि उनके द्वारा कथित विषय का साधन सम्भव नहीं है । अतः ऐसे वाक्यों में प्रतिज्ञात्व के निराकरण के लिए ही भाष्यकार ने प्रतिज्ञा लक्षण में ' अविरोधि '
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ५६६) १. मुद्रित पुस्तक में यहाँ न्यायकन्दली का पाठ है ' अपदेशी हतुः तस्य विषय माश्रयमापादयितुं प्रतिज्ञाने यत्र क्वचन सध्यसाधनाय हेतुः प्रयुज्यते तस्य सिद्धत्वात् , अपि च कस्मिश्चिर्द्धामणि प्रतिनियते " इसमें ' यत्र क्वचन ' इत्यादि का उत्तर वाक्य में
पृ. ५७०
यथा द्रव्यं वायुरिति ।
अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्वशास्त्रस्ववचनविरोधिनो निरस्ता भवन्ति ।
यथाऽनुष्णोऽग्निरिति प्रत्यक्ष- विरोधी , धनमम्बरमित्यनुमानविरोधी , ब्राह्मणेन सुरा पेयेस्यागम- विरोधी , वैशेषिकस्य सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी , न शब्दो - S र्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जैसे ' द्रव्यं वायुः ' इत्यादि वाक्य । ( प्रतिज्ञा के लक्षणवाक्य में ) ' अविरोधि ' पद के देने से ( १ ) प्रत्यक्षविरुद्ध , ( २ ) अनुमानविरुद्ध , ( ३ ) आगमविरुद्ध , ( ४ ) स्वशास्त्रविरोधी एवं ( ५ ) स्ववचनविरोधी उक्त प्रकार के वाक्यों में प्रतिज्ञा लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण होता है । ( इनमें ) प्रत्यक्षविरोधी वाक्य का उदाहरण है ' अनुष्णोऽग्निः ' । अनुमानविरोधी प्रतिज्ञावाक्य का उदाहरण है ' घनमम्बरम् ' | ' ब्राह्मणेन सुरा पेया ' यह वाक्य आगमप्रमाण से विरुद्ध है । वैशेषिकशास्त्र को मानने- वाले यदि ' सत्कार्यम् ' इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह स्वशास्त्रविरोधी प्रतिज्ञा होगी । यदि कोई इस प्रतिज्ञा वाक्य का प्रयोग करे कि ' शब्दो नार्थप्रत्यायकः ' तो यह स्ववचनविरोधी प्रतिज्ञा होगी ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
प्रतिज्ञाया उदाहरणमाह -- द्रव्यं वायुरिति । यो वायुं प्रतिपद्यमानोऽपि तस्य द्रव्यत्वं न प्रतिपद्यते , तं प्रति साधयितुमिष्टेन द्रव्यत्वेन विशिष्टस्य वायोरभिधानं प्रतिज्ञा क्रियते द्रव्यं वायुरिति । अविरोधिग्रहणस्य तात्पर्यं कथयति --- अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्वशास्त्रस्ववचनविरोधिनो निरस्ता भवन्तीति । वादिना साधयितुमभिप्रेतोऽर्थः साध्य इत्युच्यते । प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि कदाचिदनेन भ्रमात् साधयितुमिष्यते , तद् यद्यविशेषेणानुमेयोद्देशः प्रतिज्ञेत्येतावन्मात्रमुच्यते , प्रत्यक्षादिविरुद्धमपि वचनं प्रतिज्ञा स्यात् । न चेयं प्रतिज्ञा , तदर्थस्य साधयितुमशक्यत्वात् , अतोऽविरोधिग्रहणं कृतम् । न विद्यते प्रत्यक्षादि .. विरोधो यस्यानुमेयोद्देशस्य असावप्रत्यक्षादिविरोधस्तस्य वचनं प्रतिज्ञा , यस्य तद्विरोधोऽस्ति न सा प्रतिज्ञेत्यर्थः । किमनेनोक्तं भवति ? न वाद्यभिप्रायमात्रेण साध्यता , किं तु यत् साधनमर्हति तत् साध्यम् , स एव पक्षस्तदितर : पक्षाभास इति ।
प्रत्यक्षादिविरोधोदाहरणं यथा - अनुष्णोऽग्निरिति । अनुष्ण इत्युष्णस्पर्शप्रतिषेधोऽयम् । अवगतं च प्रतिषिध्यते नानवगतम् । न चोष्णत्वस्य वह्नेरन्यत्रोपलम्भसम्भवः , वह्नावपि तस्य प्रतीतिर्नानुमानिकी , प्रत्यक्षाभावे अनुमानस्याप्रवृत्तेः । प्रत्यक्ष प्रतीतस्य च प्रतिषेधे प्रत्यक्षप्रामाण्याभ्युपगमेन प्रवर्तमानं प्रतिषेधानुमानं तद्विपरीतवृत्ति तेनैव बाध्यते , विषयापहारात् । को विषयस्यापहारः ? तद्विपरीतार्थप्रवेदनम् , तस्मिन् सत्यनुमानस्य किं भवति ? उत्पत्त्यभाव , प्रथमप्रवृत्तेनाबाधित विषय प्रत्यक्षेण वरुणत्वे प्रतिपादिते तत्प्रतीत्यवरुद्धे च तस्यानुष्णत्वप्रतीतिर्न भवति । हेतोरप्ययमेव बाधो यदयमनुष्णत्वप्रतिपादनाय प्रयुक्तः , तत्प्रतीति न करोति , प्रत्यक्षविरोधात् । यथोक्तम् -
वैपरीत्यपरिच्छेदे नावकाशः परस्य तु ।
मूले तस्य ह्यनुत्पन्ने पूर्वेण विषयो हृतः ॥ इति ।
बाधाविनाभावयोविरोधादविनाभूतस्य बाधानुपपत्तिरिति चेत् ? यदि त्रैरूप्यमविनाभावोऽभिमत : ? तदास्त्येवाविनाभूतस्य बाधः यथानुष्णोऽग्निः कृतकत्वादित्यस्यैव | अथाबाधितविषयत्वे सति त्रैरूप्यमविनाभाव इत्यभिप्रायेणोच्यते-- अविनाभूतस्य नास्ति बाधेति , तदोमित्युच्यते । किन्त्वबाधितविषयत्वमेव रूपं कथयितुं प्रत्यक्षाद्यविरोधिग्रहणं कृतम् ।
प्रत्यक्षविरोधः किं पक्षस्य दोषः ? किं वा हेतो : ? न पक्षस्य , धर्मिणस्तादवस्थ्यात् । नापि हेतोः , स्वविषये तस्य सामर्थ्यात् विषयान्तरे सर्वस्यैवासामर्थ्यात् । किन्तु प्रतिपादयितुरिदं दूषणम् , योऽविषये साधनं प्रयुङ्क्ते । यदि प्रतिज्ञातार्थप्रतीतियोग्यताविरहस्तत्प्रतिपादनम् ? योग्यताविरहश्च दूषणमभिमतम् ? तदा कर्मकरणयोरप्यस्ति दोषः ।
घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी । येन प्रमाणेनाकाशमवगतं तेनैवाकाशस्य नित्यत्वं निरवयवत्वं च प्रतिपादितम् , अतो निविडावयवमम्बर मिति प्रतिज्ञा धर्मग्राहकानुमानविरुद्धा |
ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी । ब्राह्मणस्य सुरा पीता पापसाधनं न भवतीति प्रतिज्ञार्थः । अत्र क्षीरमुदाहरणम् क्षीरस्य च पापसाधनत्वाभावः श्रुतिस्मृत्यागमैकसमधिगम्यः । येनैवागमेन क्षीरपानस्य पापसाधनत्वाभावः प्रतिपादितः तेनैव सुरापानस्य पापसाधनत्वं प्रतिपादितमिति ब्राह्मणेन सुरा पेयेति प्रतिज्ञाया दृष्टान्तग्राहकप्रमाणविरोधः ।
वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी । वैशेषिको हि वैशेषिकशास्त्रप्रामाण्याभ्युपगमेन वादादिषु प्रवर्तते । तस्य ' प्रागुत्पादात् सत् कार्यम् ' इति ब्रुवतः प्रतिज्ञायाः शास्त्रेण विरोधः , वैशेषिकशास्त्रे ' असदुत्पद्यते इति प्रतिपादनात् ।
शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी । यदि शब्दस्यार्थप्रत्यायकत्वं नास्ति तदा ' शब्दो नार्थं प्रतिपादयति ' इत्यस्यार्थस्य प्रतिपादनाय शब्दप्रयोगोS नुपपन्नः । अथैतदर्थः शब्दः प्रयुज्यते ? तदभ्युपगतं शब्दस्यार्थप्रतिपादकत्वमिति प्रतिज्ञायाः स्ववचनविरोधः ।
प्रत्यक्षानुमानावगतवस्तुतत्त्वान्वाख्यानं शास्त्रम् । तद्विरोधः प्रत्यक्षानुमानविरोध एव तथा तद्भावभावित्वानुमानसमधिगम्यं शब्दस्यार्थप्रत्यायकत्वं प्रतिषेधयतोऽनुमानविरुद्धेव प्रतिज्ञा , कस्मात् स्वशास्त्रवचनविरोधयोः पृथगभिधानम् ? अत्रोच्यते-- प्रमाणाभासमूलमपि शास्त्रं भवति शाक्यादीनाम् अत्र बौद्धस्य ' सर्वमक्षणिकम् ' इति प्रतिजानतः स्वशास्त्रविरोध एव न प्रमाणविरोधः । स्ववचनम् ( अपि ) कदाचिदप्रमाणमूलमपि स्यात् , अतस्तद्विरोधो न प्रमाणविरोध :, किन्तु स्ववचनविरोध एव ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ७२ पद का उपादान किया है । ' अनुमेपोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा ' प्रतिज्ञा के इस लक्षण वाक्यमें ' प्रयुक्त ' अविरोधि ' पद का विवरण इस प्रकार है कि ' न विद्यते ( प्रत्यक्षादि ) विरोधो यस्यानुमेयोद्देशस्यासावप्रत्यक्षादिविरोधी , तस्य वचनं प्रतिज्ञा ' तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि जिस ' अनुमेयोद्देश ' में प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विरोध न रहे उसके बोधक वाक्य हो प्रतिज्ञा है , अर्थात् जिस अनुमेथोद्देश में प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विरोध रहे उसका बोधक वाक्य प्रतिज्ञा नहीं है । ( प्र ० ) इससे क्या निष्पन्न हुआ ? ( उ ० ) यही कि साधन के लिए वादी के अभिप्रेत होने से ही कोई विषय साध्य नहीं हो जाता । साध्य वही है जिसका साधन करना सम्भव हो , वही साध्य पक्ष भी है , तद्भिन्न को अर्थात् प्रत्यक्षादि विरोध के कारण जिसका सांधन सम्भव न हो उसे ' पक्षाभास ' कहते हैं ।
' अनुष्णो वह्निः ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विरोधी प्रतिज्ञावाक्यों के उदाहरण दिखलाये गये हैं । प्रकृत में ' अनुष्ण ' शब्द उष्णस्पर्श के प्रतिषेध का बोधक है ( उष्णस्पर्श विरोधी शीतस्पर्श का नहीं ) । ज्ञात वस्तु का ही प्रतिषेध भी किया जाता है , अज्ञात वस्तु का नहीं । एवं उष्णता की प्रतीति वह्नि को छोड़ और कहीं सम्भव नहीं है ।
वह्नि में उष्णता की प्रतीति अनुमान से तब तक नहीं हो सकती , जब तक वह्नि में उष्णता को प्रत्यक्षवेद्य न मान लिया जाय , क्योंकि बिना प्रत्यक्ष के अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती है । प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होने योग्य वस्तु के प्रतिषेध के लिए उस प्रत्यक्ष का प्रामाण्य स्वीकार कर ही लिया जाता है , अतः उक्त स्वीकृति से प्रवृत्त होनेवाले वह्नि में उष्णता के प्रतिषेध का अनुमान उस प्रत्यक्ष से ही बाधित हो जाता है , जो प्रकृत प्रतिषेध के विरोधी उष्णता का ज्ञापक है ।
क्योंकि इस प्रत्यक्ष के द्वारा अनुमान के विषय रूपी उष्णता के प्रतिषेध का अपहरण कर लिया जाता है । ( प्र ० ) विषय का यह ' अपहरण ' क्या वस्तु है ? ( उ ० ) प्रकृत अनुमान के द्वारा ज्ञाप्य विषय के विरोधी विषय का ज्ञापन ही प्रकृत में विषय का अपहरण है | ( प्र ० ) इस विषयापहरण से अनुमान के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है ?
( उ ० ) यही कि उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो पाती , किन्तु उष्णता के बोधक प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति अनुष्णत्व के अनुमान से पहिले होती है , उसका विषय उष्णत्व किसी दूसरे प्रमाण से बाधित भी नहीं है , अतः इस प्रत्यक्ष के द्वारा जब बह्नि में उष्णता की प्रतिपत्ति हो जाती है , उसके बाद उस प्रत्यश्च के द्वारा ज्ञात वह्नि में अनुष्णता की प्रतीति नहीं होती है ।
हेतु में बाघ की प्रतीति का भी यही रहस्य है कि वह्नि में अनुष्णत्व को समझाने के लिए प्रयुक्त होने पर भी इस प्रत्यअविरोध के कारण वह्नि में उष्णता की प्रतीति का उत्पादन नहीं कर सकता ।
जैसा कहा गया है कि विपरीत ( अभाव ) विषयक निश्चय के उत्पन्न हो जाने पर उसके विरोधी के ज्ञान का अवकाश नहीं रह जाता , क्योंकि उसके उत्पन्न होने के पहिले ही पहिले के प्रमाण से उसके विषय का अपहरण हो जाता है ।
( प्र ० ) साध्य की व्याप्ति और साध्य का अभाव ये दोनों परस्पर विरोधी हैं , अतः साध्य का व्याप्य हेतु कभी बाधित नहीं हो सकता । ( उ ० ) व्याप्ति या अविनाभाव को यदि हेतु में ( पक्षसत्त्व , सपक्ष सत्त्व और विपक्षासत्त्व इन ) तीनों रूपों का रहना समझें , जो फिर इन तीनों रूपों के रहने पर भी हेतु में ' बाध ' रह ही सकता है , क्योंकि ' अग्निरनुष्णः कृतकत्वात् ' इस स्थल में कृतकत्व रूप हेतु में उक्त तीनों रूप हैं । ( क्योंकि कृतकत्व वह्नि में है और वायु में भी है एवं आकाश में नहीं हैं ) और अग्निरूप पक्ष में अनुष्णत्वरूप साध्य का अभाव स्वरूप बाध भी है । यदि जो हेतु बाधित न होकर पक्ष सत्त्वादि तीनों रूपों से युक्त हो उन हेतु को ही साध्य का व्याप्य या अविनाभूत मानकर यह कहते हों कि व्याप्ति से युक्त हेतु कभी बाधित नहीं हो सकता , तो हम इस के उत्तर में ' हाँ ' कहेंगे ( अर्थात इस प्रकार का हेतु कभी बाधित नहीं होता ) किन्तु व्याप्ति के लिए जिम अवाधितत्व या अबाधितविषयत्व को आप प्रयोजक मानते हैं , हेतु में उस अबाधितविषयत्व की सत्ता की आवश्यकता को समझाने के लिए ही प्रतिज्ञालक्षण में ' अविरोधि ' पद का उपादान किया गया है ।
यह ' प्रत्यक्ष विरोध ' किसका दोष है ? पक्ष का या हेतु का ? पक्ष का दोष तो वह हों नहीं सकता , क्योंकि पक्ष तो ज्यों का त्यों रहता है । हेतु का भी वह दोष नहीं हो सकता क्योंकि अपने ( व्यापक ) साध्य रूप विषय के ज्ञापन की क्षमता तो उस है हो ? दूसरे हेतु के साध्य को समझाने की क्षमता तो किसी भी हेतु में नहीं होती । अतः यह प्रत्यक्षादि विरोध रूप दोष वस्तुतः प्रयोग करनेवाले पुरुष का है , जो ऐसे साध्य के ज्ञापन के लिए ऐसे हेतु का प्रयोग करता है , जिस साध्य के ज्ञापन की क्षमता जिस हेतु में नहीं होती है ।
घ'नमम्बरमित्यनुमानविरोधी ' जिस प्रमाण से आकाश के अस्तित्व का ज्ञान होता है , उसी प्रमाण से उसमें नित्यत्व एवं अवयवशुन्यत्व भी निश्चित है , अत : ' आकाश के अवयव घन हैं , अर्थात् परस्पर निविड़ संयोग से युक्त है , यह प्रतिज्ञा आकाश रूप धर्मी के ज्ञापक अनुमान के ही विरुद्ध है ।
' ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी ' | ' ब्राह्मणेन सुरा पेया ' इस प्रतिज्ञा वाक्य का यह अर्थ है कि ब्राह्मण के द्वारा पी गयी सुरा ( मद्य ) पाप का कारण नहीं होती । इसका उदाहरण है दूध । ( अर्थात् जिस प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया दूध पाप का कारण नहीं है , उसी प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया मद्य भी पाप का कारण नहीं है ) ' दूध स्वपान के द्वारा पाप का साधन नहीं है ' यह क ेवल श्रुति एवं स्मृति रूप ' आगम प्रमाण से ही समझा जा सकता है | आगम के द्वारा ही ' दूध का पीना पाप का कारण नहीं है ' यह कहा गया है , एवं आगम ( शब्द ) प्रमाण से ही यह निश्चित है कि सुरापान पाप का साधन है ' इस प्रकार ' ब्राह्मण को सुरापान करना चाहिए ' यह प्रतिज्ञा दुग्धपान रूप अपने दृष्टान्त के ज्ञापक प्रमाण का विरोधी है ।
' वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी ' वैशेषिक दर्शन के अनुयायी वैशेषिक दर्शन रूप शास्त्र को प्रमाण मान कर ही वादादि कथाओं में प्रवृत्त होते हैं । वे यदि इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें कि ' कार्य अपनी उत्पत्ति के पहिले भी विद्यमान हो रहता है ' तो उनकी यह प्रतिज्ञा वैशेषिक दर्शन रूप अपने शास्त्र के ही विरुद्ध होगी , क्योंकि वैशेषिकदर्शन में यह प्रतिपादन किया गया है कि ' पहिले से अविद्यमान कार्य की ही उत्पत्ति होती है ' ।
' शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी ' शब्द से यदि अर्थ का बोध ही नहीं होता है , तो फिर ' शब्द अर्थ का बोध का कारण नहीं है ' इस अर्थ को समझाने के लिए ' शब्दो नार्थप्रत्यायक : ' इस वाक्य का भी प्रयोग करना उचित नहीं होगा । यदि उक्त अर्थ को समझाने के लिए उक्त वाक्य का प्रयोग वादी करते हैं , यो फिर वादी शब्द को अर्थबोध का कारण स्वयं मान ही लेते हैं । इस प्रकार उक्त प्रतिज्ञा स्ववचन विरोधी है ( क्योंकि वादो अपने अभीष्ट अर्थ को समझाने के लिए शब्दों का प्रयोग भी करें , और शब्द को अर्थप्रत्यायक भी न मानें ये दोनों बातें नहीं हो सकतीं ) ।
( प्र ० ) प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा निर्णीत तत्त्व का ही ' अन्वाख्यान ' अर्थात् पश्चात् कथन तो शास्त्र ' है , अतः शास्त्र का विरोध वस्तुतः प्रत्यक्ष और अनुमान का ही विरोध है ।
एवं शब्द में अर्थबोध की कारणता इस अनुमान के द्वारा ही निश्चित होती है कि ' चूँकि शब्दप्रयोग के ' भाव ' अर्थात् सत्ता के कारण हो अर्थबोध की सत्ता देखी जाती है , अतः शब्द ही अर्थ का बोधक है ' सुतराम् शब्द में अर्थबोध के निषेध करनेवाले पुरुष की शब्दो नार्थप्रत्यायकः ' यह प्रतिज्ञा भी वस्तुतः अनुमान के हो विरुद्ध है । ( इस प्रकार स्वशास्त्रविरोध और स्ववचनविरोध ये दोनों ही प्रत्यक्ष विरोध या अनुमानविरोध में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं ) उनका अलग से परिगगन क्यों ?
( उ ० ) इस आक्षेप के उत्तर में हम लोग कहते हैं कि सभी शास्त्र प्रमाणमुलक ही नहीं होते , ऐसे भी शास्त्र हैं जिनका अनुमोदन प्रमाण से नहीं किया जा सकता , जैसे कि बौद्धों के आगम हैं । अतः बौद्ध यदि ' सभी वस्तुयें अक्षणिक हैं ' इस आशय के प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण के विरुद्ध नहीं होगी , किन्तु उसमे ' स्वशास्त्र विरोध ' ही होगा । इसी प्रकार स्ववचन भी कभी कभी अप्रमाणमूलक होता है ।
ऐसे स्थलों की प्रतिज्ञा में प्रमाणविरोध तो होगा नहीं , स्ववचन विरोध ही होगा ( अतः स्वशास्त्रविरोध और स्ववचनविरोध का अलग से उल्लेख किया गया है ) ।
पृ. ५७५
लिङ्गवचनमपदेशः ।
यदनुमेयेन सहचरितं तत्समानजातीये सर्वत्र सामान्येन प्रसिद्धं तद्विपरीते च सर्वस्मिन्नसदेव तल्लिङ्ग- मुक्तम् , तस्य वचनमपदेशः : यथा क्रियावच्त्वाद् गुणवत्चाच्चेति , तथा च तदनुमेयेऽस्ति तत्समानजातीये च सर्वस्मिन् गुणवत्त्वम सर्वस्मिन् क्रियावत्त्वम् ।
उभयमप्येतदद्रव्ये नास्त्येव ।
तस्मात् तस्य वचनमपदेश इति सिद्धम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — हेतुबोधक वाक्य ही ' अपदेश ' है । ( विशदार्थ ) जो अनुमेय ( पक्ष ) में साध्य के साथ रहे एवं सभी तत्सजातीयों में अर्थात् सभी दृष्टान्तों में सामान्य रूप से ( साध्य के साथ ) ज्ञात हो , एवं उसके विपरीत अर्थात् सभी विपक्षों में जो कदापि न रहे उसे ' लिङ्ग ' अर्थात् हेतु कहा गया है , एतेनासिद्धविरुद्धसन्दिग्धानध्यवसितवचनानामनपदेशत्वमुक्तं भवति । इस प्रकार के हेतु का प्रतिपादक वाक्य ही ' अपदेश ' है । जैसे कि ( ' द्रव्यं वायुः ’ इस प्रतिज्ञा के उपयुक्त ) क्रियावत्त्वात् गुणवत्त्वाच्च ' ये वाक्य । इनमें गुणवत्त्व हेतु तो वायुरूप द्रव्य में भी है , एवं और सभी द्रव्यों में है । क्रियावत्त्व हेतु वायु में रहने पर भी ( एवं सभी द्रव्यों में न रहने पर भी ) मूर्त्तद्रव्यों में तो है ही । किन्तु ये दोनों ही विपक्षीभूत सभी अद्रव्य पदार्थों में नहीं हैं , अतः इससे सिद्ध होता है कि चूंकि ये दोनों ही हेतु के उक्त लक्षणों से युक्त हैं , अतः इनके बोधक उक्त वाक्य ' अपदेश ' हैं 1
इससे ( अर्थात् हेतु के अनुमेयसम्बद्धत्वादि लक्षणों के कहने से ) ( १ ) असिद्ध , ( २ ) विरुद्ध , ( ३ ) सन्दिग्ध , ( ४ ) अनध्यवसित ( हेत्वाभासों में ) अनपदेशत्व अर्थात् हेत्वाभासत्व कथित हो जाता है । इनमें ( १ ) उभयासिद्ध , ( २ )
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
लिङ्गवचनमपदेशः । अस्यार्थं कथयति - यदनुमेयेनेत्यादिना । तत्सुगमम् । उदाहरणमाह- क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्चेति । द्रव्यं वायुरिति प्रतिज्ञायाः क्रियावत्त्वादिति क्रियावत्त्वस्य लिङ्गस्य वचनमपदेशः , तस्यामेव प्रतिज्ञायां गुणवत्त्वस्य लिङ्गस्य गुणवत्त्वादिति वचनमपदेशः , तयोरुपन्यासः सपक्षैकदेशवृत्तेः सपक्षव्यापकस्य च हेतुत्वप्रदर्शनार्थः । यदुक्तं लिङ्गलक्षणं तत् क्रियावत्त्वस्य गुणवत्त्वस्य चास्तीत्याह - तथा च तदिति । तद् गुणवत्त्वमनुमेयेऽस्ति तत्समानजातीये सपक्षे द्रव्ये सर्वस्मिन्नस्ति , असर्वस्मिन् सपक्षैकदेशे मूर्तद्रव्यमात्रे क्रियावत्त्वमस्ति , उभयमप्येतत् क्रियावत्त्वं गुणवत्त्वं चाद्रव्ये विपक्षे नास्त्येव तस्योभयस्य वचनं क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वादित्येवं रूपमपदेश इति हेतुरिति सिद्धं व्यवस्थितं निर्दोषत्वात् । मुक्तम् । तत्समानजातीये च प्रसिद्धमित्यनेन विरुद्धानध्यवसितवचनयोरनपदेशत्वम् । तद्विपरीते नास्त्येवेत्यनेन सन्दिग्धवचनस्यान पदेशत्वमिति विवेकः ।
एषामसिद्धविरुद्ध सन्दिग्धानध्यवसितानां मध्ये असिद्धं कथयति - तत्रासिद्धश्चतुर्विध उभयासिद्ध इत्यादि ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' यनुमेयेन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' लिङ्गवचनमपदेश : ' इस वाक्य का अर्थ स्वयं कहते है । इस ( स्वपदवर्णन रूप भाष्य ) का अर्थ सुगम है । क्रियावत्त्वाद् गुणवस्वाच्च ' इस वाक्य के द्वारा ' अपदेश ' रूप दूसरे अवयव का उदाहरण दिखलाया गया है । ( प्रतिज्ञा प्रन्थ में उल्लिखित ) ' द्रव्यं वायुः ' इस प्रतिज्ञा के ही ' क्रियावत्त्व ' रूप हेतु का प्रतिपादक ' क्रियावत्त्वात् ' इस वाक्य का प्रयोग हो प्रकृत में ' अपदेश ' है ।
उसी प्रतिज्ञा में ' गुणवत्वात् ' इस वाक्य के द्वारा गुणवत्त्व रूप लिङ्ग का जो निर्देश किया गया है वह वचन भी ' अपदेश ' है ।
इन दोनों हेतुओं का निर्देश इस विशेष को समझाने के लिए किया गया है कि कुछ ही सपक्षों में रहने वाला भी ' हेतु ' है ( जैसे कि क्रियावस्व रूप हेतु पृथिवी प्रभृति कुछ सपक्षों में ही है सभी सपक्षों में नहीं , क्योंकि आकाशादि पक्षों में क्रियावत्त्व नहीं है ) एवं कुछ ऐसे भी हेतु होते हैं जो सभी सपक्षों में रहते हैं , जैसे कि प्रकृत ' गुणवत्त्व ' हेतु ( क्योंकि वह सभी द्रव्यों में है ) ।
' तथा च तदनुमेयेऽस्ति ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कहते हैं कि लिङ्ग के जितने भी लक्षण कहे गये हैं , वे सभी क्रियावत्त्व और गुणवत्त्व रूप दोनों हेतुओं में हैं । ' तत् ' अर्थात् गुणवत्त्व और क्रियावत्त्व रूप दोनों हेतु अनुमेय में अर्थात् वायु रूप पक्ष में हैं । इनमें गुणवत्त्व हेतु ' सर्वस्मिन् ' अर्थात् द्रव्य रूप सभी सपक्षों में है । और ' क्रियावत्त्व ' रूप हेतु ' असर्वस्मिन् ' अर्थात् ' सपक्षैकदेश ' में अर्थात् मूर्त्तद्रव्य रूप कुछ ही सपक्षों में है ।
किन्तु गुणवत्त्व और क्रियावत्त्व रूप दोनों हेतु ' अद्रव्य ' अर्थात् विपक्षों में द्रव्य से भिन्न सभी पदार्थों में कभी भी नहीं
एतेन अपदेशलक्षणकथनेन अर्थादसिद्धविरुद्धसन्दिग्धानध्यवसितवचनानामनपदेशत्वमुक्तं भवति । अनुमेयेन सहचरितमित्यनेनासिद्धवचनस्यान पदेशत्वहैं । अतः इससे सिद्ध होता है कि इन दोनों के बोधक क्रियावत्त्वात् ' और ' गुणवत्त्वात् ' इस आकार के दोनों वाक्य ' अपदेश ' हैं , अर्थात् हेतु रूप अवयव हैं , क्योंकि इस निर्णय में कोई दोष नहीं है ।
' एतेन ' अर्थात् अपदेश के ' अनुमेयेन सहचरितम् ' इत्यादि लक्षण के कहने से ही असिद्धवचन , विरुद्धवचन , सन्दिग्धवचन और अनध्यवसितवचनों में ' अनपदेशत्व ' अर्थात् हेत्वाभासत्व का भी अर्थतः कथन हो जाता है । इस प्रसङ्ग में ऐसा विभाग समझना चाहिए कि हेतु के लक्षण में प्रयुक्त ' अनुमेयेन सहचरितम् ' इस पद से ‘ असिद्धः वचन ' मे हेत्वाभासत्व का आक्षेप होता है । एवं ' तत्समानजातीये च नास्ति ' इस वाक्य के द्वारा ' विरुद्धवचन ' और ' अनध्यवसितवचन ' इन दोनों का हेत्वाभास व्यञ्जित होता है । एवं तद्विपरीते च नास्त्येव ' इस वाक्य के द्वारा सन्दिग्धवचन ' की हेत्वाभासता ध्वनित होती है ।
हेत्वाभासनिरूपणम्
पृ. ५७७
तत्रासिद्धश्चतुर्विधः – उभयासिद्धः , अन्यतरासिद्धः , तद्भावासिद्ध :, अनुमेयासिद्धश्चेति ।
तत्रोभयासिद्ध उभयोर्वादिप्रतिवादिनोरसिद्धः , शब्दः , यथाऽनित्यः सावयवत्वादिति ।
अन्यतरासिद्धो यथा- अनित्यः शब्दः , कार्यस्वादिति ।
तद्भावासिद्धो यथा - धूमभावेनाग्न्यधिगतौ कर्त्तव्यायामुपन्यस्यमानो बाष्पो धूमभावेनासिद्ध इति ।
अनुमेयासिद्धो यथा - पार्थिवं द्रव्यं तमः , कृष्णरूपवत्त्वादिति ।
यो ह्यनुमेयेऽ- विद्यमानोऽपि तत्समानजातीये सर्वस्मिन्नास्ति , तद्विपरीते चास्ति , स विपरीत साधनाद् विरुद्धः , यथा यस्माद् विषाणी तस्मादश्व इति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अन्यतरासिद्ध , ( ३ ) तद्भावासिद्ध और ( ४ ) अनुमेयासिद्ध भेद से ' असिद्ध ' चार प्रकार के हैं । इनमें जो हेतुवादी और प्रतिवादी दोनों में से किसी के द्वारा पक्षादि में सिद्ध न हो उसे ' उभयासिद्ध ' हेत्वाभास कहते हैं । जैसे कि शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए प्रयुक्त ' सावयवत्वात् ' इस वाक्य से बोध्य सावयवत्व हेतु ( उभयासिद्ध हेत्वाभास ) है ।
शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए ही यदि कार्यत्व हेतु का कोई प्रयोग करे तो वह ' अन्यतरासिद्ध ' हेत्वाभास होगा , क्योंकि वादी ( वैशेषिक ) ही शब्द को कार्य मानते हैं । प्रतिवादी ( मीमांसक ) उसे कार्य नहीं मानते । ( ३ ) जिस रूप ( हेतुतावच्छेदक ) से युक्त हेतु के द्वारा साध्य की अनुमिति अभिप्रेत हो , हेतु का वह रूप या धर्म जिस हेतु में न रहे वह हेतु तद्भवसिद्ध हेत्वाभास है ।
जैसे धूमत्व रूप से युक्त ( धूम ) से वह्नि की अनुमिति के अभिप्राय से यदि कोई बाष्प को धूम समझकर हेतु रूप से कोई उपस्थित करे तो वह वाष्प हेतु धूमभाव से ( अर्थात् धूमत्व रूप से ) सिद्ध न होने कारण ( अर्थात् बाष्प में घूमत्व के न रहने के कारण ) तद्भावासिद्ध हेत्वाभास होगा । ( ४ ) जहाँ अनुमेय अर्थात् अभीष्ट पक्ष ही असिद्ध रहे उसके लिए प्रयुक्त हेतु अनुमेयासिद्ध हेत्वाभास होगा ।
जैसे कि ' तमो द्रव्यं पार्थिवं कृष्णरूपवत्त्वात् इस अनुमान का कृष्णरूप हेतु अनुमेयासिद्ध हेत्वा- भास है ( क्योंकि तम यदि द्रव्य होगा तभी वह पार्थिव हो सकता है , किन्तु तम में द्रव्यत्व ही सिद्ध नहीं है , चूँकि वह अभाव रूप है , अतः द्रव्यत्व विशिष्ट तम रूप अनुमेय असिद्ध होने के कारण उसमें पार्थिवत्व के साधन के लिए प्रयुक्त कृष्णरूपवत्त्व हेतु अनुमेयासिद्ध है ) |
( २ ) जो हेतु अनुमेय अर्थात् साध्य में एवं उसके सजातीयों में भी न रहे एवं अनुमेय के विपरीत वस्तुओं में रहे वह हेतु साध्य के विपरीत वस्तु का साधक होने के कारण ' विरुद्ध ' नाम का हेत्वाभास है । जैसे गो में ( अभेद सम्बन्ध से ) अश्व के साधन के लिए प्रयुक्त विषाण ( सींग ) हेतु ( विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है ) , क्योंकि अश्व रूप अनुमेय में विषाण हेतु
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
तत्रोभयासिद्धः - उभयोर्वादिप्रतिवादिनो रसिद्धः , यथाऽनित्यः शब्दः , सावयवत्वादिति शब्दे सावयवत्वं न वादिनो नापि प्रतिवादिनः सिद्धमित्युभयासिद्धः ।
अन्यतरासिद्धो यथा कार्यत्वादनित्यः शब्द इति । यद्यपि शब्दे वस्तुतः कार्यत्वमस्ति तथापि विप्रतिपन्नस्य मीमांसकस्यासिद्धम् । अन्यतरासिद्धं साध्यं न साधयति यावन्न प्रसाध्यते ।
तद्भावासिद्धो यथा धूमभावेनाग्न्यधिगतौ कर्त्तव्यायामुपन्यस्यमानो बाष्पो धूमभावेन धूमस्वरूपेणासिद्धस्तद्भावासिद्ध इत्युच्यते ।
अनुमेयासिद्धो यथा पार्थिवं तमः कृष्णरूपवत्त्वात् । तमो नाम द्रव्यान्तरं नास्ति , आरोपितस्य कार्यमात्रस्य प्रतीतेः अतस्तमो द्रव्यं पार्थिवम् , कृष्णरूपवत्त्वादित्यनुमेयासिद्धमाश्रयासिद्धम् । अनुमेयमसिद्धं यस्येत्यसिद्धानुमेयमिति प्राप्तावाहिताग्न्यादित्वान्निष्ठायाः पूर्वनिपातः ।
यथा हेतुरन्यतरासिद्ध उभयासिद्धो वा भवति , एवमाश्रयासिद्धिरप्युभयथा । यथा च हेतोर्वादिप्रतिवादिनोः प्रत्येकं समुदितयोर्वा अज्ञानात् सन्देहाद् विपर्ययाद् वा असिद्धो भवति , तथाश्रयोऽपि । यथा च हेतुः कश्चिद् वादिनोज्ञानादसन्दिग्धः प्रतिवादिनः सन्दिग्धासिद्ध इति । यद्वा वादिनो sज्ञानासिद्धः , यदि वा प्रतिवादिनो विपर्ययासिद्धः । यद्वा वादिन : सन्देहासिद्धः प्रतिवादिनोऽज्ञानासिद्धः । यद्वा विपर्ययासिद्धो भवति वादिनः , प्रतिवादिनः सन्देहासिद्धः । एवमाश्रयोऽपीति योजनीयम् । विशेषणासिद्धादयः , अन्यतरासिद्ध उभयासिद्धेष्वेवान्तर्भवन्तीति पृथङ् नोक्ताः ।
विरुद्ध हेत्वाभासं कथयति - यो ह्यनुमेय इति । यदा कश्चिद् वनान्तरिते गोपिण्डे विषाणमुपलभ्य ' अयं पिण्डोऽश्वो विषाणित्वात् ' इति साधयति , तदा विषाणित्वमश्वजातीये पिण्डान्तरेऽविद्यमानमश्वविपरीते गवि महिष्यादौ च विपक्षे विद्यमानं व्याप्तिबलेनाश्वत्वविरुद्ध मनश्वत्वं साधयदभिमतसाध्यविपरीतसाधनाद् विरुद्धमित्युच्यते । इदं विपक्षैकदेश वृत्तविरुद्धस्योदाहरणम् विषाणित्वस्य सर्वत्रानश्वे स्तम्भादावसम्भवात् । समस्त विपक्षव्यापकस्य विरुद्धस्योदाहरणम् - नित्यः शब्दः कृतकत्वादिति द्रष्टव्यम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' तत्रासिद्धश्चतुर्विधः ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इन असिद्ध , विरुद्ध , सन्दिग्ध और अनध्यवसितों में से असिद्ध नाम के हेत्वाभास का विवरण देते हैं । इनमें वादी और प्रतिवादी ये दोनों ही जिस हेतु की सत्ता पक्ष में न मानते हों , वह हेतु ' उभयानिद्ध ' नाम का हेत्वाभास है । जैसे कि ' शब्दोऽनित्यः सावयवत्वात् ' इस अनुमान का सावयवत्व हेतु उभयासिद्ध हेत्वाभास है । इस अनुमान के प्रयोग करनेवाले ( नैयायिकादि ) हैं वादी , वे भी शब्द को सावयव नही मानते , एवं शब्द को नित्य माननेवाले मीमांसक हैं प्रतिवादी , वे भी शब्द को द्रव्य मानते हुए भी सावयव नहीं मानते , अतः उक्त सावयवत्व हेतु ' उभयासिद्ध ' हेत्वाभास है ।
७३
' अन्यतरासिद्ध ' का उदाहरण है ' शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात् ' इस अनुमान का कार्यत्व हेतु । वैशेषिक नैयायिकादि के मत से शब्द में यद्यपि कार्यता सिद्ध हैं , किन्तु मोमांसक लोग शब्द को कार्य नहीं मानते , नित्य मानते हैं ; अतः यह हेतु वादी और प्रतिवादी इन दोनों में से एक के द्वारा असिद्ध होने के कारण ' अन्यतरा सिद्ध ' नाम का हेत्वाभास है , क्योंकि अन्यतर के द्वारा भो असिद्ध हेतु तब तक साध्य का साधन नहीं कर सकता , जब तक कि वह दूसरे के द्वारा सिद्ध नहीं माना जाता |
' तद्भावासिद्ध ' का उदाहरण वह बाष्प हेतु है , जो धूम समझकर वह्निसाधन के लिए प्रयुक्त होता है , क्योंकि ' तद्भाव ' अर्थात् धूम का धूमत्व रूप धर्म बाष्प में सिद्ध नहीं है | अतः उक्त बाष्प हेतु ' तद्भावासिद्ध ' हेत्वाभास है ।
' अनुमेवासिद्ध ' का उदाहरण है ' पार्थिवं तमः कृष्णरूपवत्त्वात् ' इस अनुमान का ' कृष्णरूपवत्त्व ' रूप हेतु । तम नाम का कोई द्रव्य ही नहीं है , क्योंकि कृष्णरूप ( गुण ) का तेज के अभाव में आरोप मात्र होता है ( चूंकि पार्थिवत्वविशिष्ट तम रूप अनुमेय ही उक्त स्थल में प्रसिद्ध नहीं है अतः ) ' पार्थिवं तमः कृष्णरूपवत्त्वात् ' इस अनुमान का ' अनुमेय ' अर्थात् आश्रय सिद्ध न होने के कारण इस अनुमान का ( कृष्णरूपवत्त्व ) हेतु अनुमेयासिद्ध या आश्रयासिद्ध हेत्वाभास है । यद्यपि ' अनुमेयमसिद्धं यस्य ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न होने के कारण अनुमेयासिद्ध ' न होकर ' असिद्धानुमेय ' शब्द का प्रयोग उचित है , तथापि आहिताग्न्यादि गण में पठित होने के कारण ' अनुमेय ' शब्द का पूर्वप्रयोग मानकर ( असिद्धानुमेय न लिखकर ) अनुमेयासिद्ध ' शब्द लिखा गया है ।
जैसे कि हेतु वादी और प्रतिवादी दोनों से असिद्ध होने के कारण ' उभयासिद्ध ' और उन दोनों में से केवल एक से असिद्ध होने के कारण ' अन्यतरासिद्ध ' कहलाता है , अर्थात् हेतु की सिद्धि दो प्रकार की होने से ' असिद्ध ' हेत्वाभास भी दो प्रकार का होता है ; उसी प्रकार अनुमेय रूप आश्रय जहाँ वादी और प्रतिवादी दोनों के द्वारा असिद्ध होगा , वहाँ अनुमेयासिद्ध या आश्रयासिद्ध भी उभयासिद्ध रूप होगा ।
एवं जहाँ अनुमेय केवल वादी या प्रतिवादी किसी एक ही के द्वारा असिद्ध होगा , वहाँ अनुमेयासिद्ध भी अन्यतरासिद्ध नाम का आश्रयासिद्ध हेत्वाभास होगा ।
कहने का अभिप्राय है कि वादी और प्रतिवादी दोनों में से किसी एक के हेतुविषयक अज्ञान , या हेतुविषयक सन्देह या हेतुविषयक विपर्यय के कारण ' असिद्ध ' नाम का हेत्वाभास होता है , उसी प्रकार आश्रयासिद्ध ' नाम के हेत्वाभाग के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए कि साध्यविशिष्ट पक्ष रूप आश्रय या अनुमेय विषयक वादी और प्रतिवादी दोनों के अज्ञान या सन्देह या विपर्यय एवं वादी और प्रतिवादी दोनों में से एक के उक्त अनुमेय या आश्रय के अज्ञान या सन्देह या विपर्यय के कारण ही आश्रयासिद्ध या अनुमेयासिद्ध नाम का हेत्वाभास भी होता है ।
( अन्यतरासिद्ध के प्रसङ्ग में यह विशेष ' योजना या अतिदेश आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए | जैसे कि कोई हेतु वादी के द्वारा अज्ञात होने के कारण असन्दिग्ध होने पर भी प्रतिवादी के लिए सन्दिग्धासिद्ध होता है , वैसे ही आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए । अथवा कोई हेतु वादी के लिए सन्दिग्धासिद्ध होने पर भी प्रतिवादी के लिए विपर्ययासिद्ध होता है ।
अथवा जिस प्रकार कोई हेतु वादी के लिए सन्दिग्धासिद्ध है , किन्तु प्रतिवादी के लिए अज्ञानासिद्ध होता है , वैसे ही आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए | अथवा जिस तरह कोई हेतु वादी के लिए ही विपर्ययासिद्ध और प्रतिवादी के लिए हो सन्दिग्धा सिद्ध होता है , वैसे ही आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए । ' विशेषणासिद्ध ' प्रभृति हेत्वाभास कथित अन्यतरासिद्ध और उभयासिद्धों में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं , अतः उनका अलग से उल्लेख नहीं किया गया ।
' यो ह्यनुमेये ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' विरुद्ध ' नाम के हेत्वाभास का निरूपण करते हैं । जिस समय कोई पुरुष वन में छिपे हुए गो रूप अवयवी के केवल सींग को देखकर इस अनुमान वाक्य का प्रयोग करता है कि ' यह दीखनेवाला पिण्ड घोड़ा है , क्योंकि इसे सींग है ' उस समय यह ' विषाणित्व ' हेतु विरुद्ध नाम का हेत्वाभास होता है , क्योंकि अश्व रूप पक्ष के सजातीय गदहे प्रभृति में विषाणित्व हेतु नहीं है , एवं अश्व के विपरीत गो महिषादि विपक्षों में विषाणित्व हेतु विद्यमान हैं । इस व्याप्ति के कारण विषाणित्व हेतु वन में दीखनेवाले उक्त पिण्ड में अश्वत्व के विरुद्ध अश्वभिन्नत्व काही साधक होने के कारण ' विरुद्ध ' कहलाता है । यह उदाहरण कुछ ही विपक्षों में रहनेवाले विरुद्ध ( हेत्वाभास ) का है ।
पृ. ५८१
यस्तु सन्ननुमेये तत्समानासमानजातीययोः साधारणः सन्नेव स सन्देहजनकत्वात् सन्दिग्धः , यथा - यस्माद् विषाणी तस्माद् गौरिति ।
एक- स्मिश्च द्वयोर्हत्वोर्यथोक्तलक्षणयोर्विरुद्धयोः सन्निपाते सति संशयदर्शनादयमन्यः सन्दिग्ध इति केचित् ।
यथा - - मूर्त त्वामूर्तत्वं प्रति मनसः
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — नहीं है , एवं अश्व के सजातीय रासभादि भी वह नहीं है , किन्तु अश्व के विपरीत महिषादि में विषाण हेतु है , अत : गो में अश्व के विपरीत अश्वभेद का ही वह साधक है ।
( ३ ) जो हेतु अनुमेय में ( साध्य में ) एवं उसके सजातीय और विरुद्धजातीय दोनों प्रकार के वस्तुओं में समान रूप से सम्बद्ध रहे . वह ( पक्ष में साध्य के ) सन्देह का कारण होने से ' सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास है ।
जैसे कि किसी वस्तु में केवल विषाण के देखने से गो के अनुमान का विषाण हेतु ( सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास है ) , क्योंकि विषाण रूप हेतु दर्शन के विषय किसी पक्षीभूत वस्तु में एवं उसके समानजातीयों में एवं विजातीय महिषादि में साधारण रूप से रहने के कारण पक्षीभूत वस्तु में यह ' गो ' है या ' महिष ' इस सन्देह का उत्पादक है ।
( पूर्वपक्ष ) कोई कहते हैं कि उक्त रीति से ही यदि समानबल के एवं परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं के साधक दो हेतुओं का समावेश जहाँ एक धर्मी में होता है वहाँ वह हेतु उस धर्मी में उक्त परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं के सन्देह का हेतु होने के कारण एक और ही प्रकार का सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास व्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिरनैकान्तिकः । सपक्षविपक्षयोर्व्यापको नित्यः शब्दः , प्रमेयत्वादिति । सपक्षविपक्षैकदेशवृत्तिः , नित्यमाकाशममूर्तत्वादिति ।
सपक्षेकदेशवृत्तिविपक्षव्यापको द्रव्यं शब्दो निरवयवत्वादिति । समानासमानजातीययोः साधारण इति यत् साधारणपद तस्य विवरणं सन्नवेति । गो से भिन्न महिष एवं अश्त्र प्रभृति जो सभी उसके विपक्ष हैं , उनमें से महिषादि में ही विषाण रूप हेतु है , अश्वादि में नहीं ) ।
( २ ) सभी सपक्षों और सभी विपक्षों में व्यापक रूप से रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का उदाहरण ' नित्यः शब्दः प्रमेयत्वात् ' इस अनुमान का ' प्रमेयत्व ' हेतु है ( क्योंकि प्रमेयत्व सभी वस्तुओं में रहने के कारण नित्य रूप सभी सपक्षों में और अनित्य रूप सभी विपक्षों में विद्यमान है ) ।
( ३ ) कुछ ही विपक्षों में एवं कुछ ही सपक्षों में रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का दृष्टान्त है ' नित्यमाकाशममूर्तस्वात् ' इस अनुमान का ' अमूर्त्तत्व ' हेतु , ( क्योंकि आत्मा प्रभृति कुछ ही सपक्षों में अमूर्त्तत्व है , एवं अनित्य पृथिवी प्रभृति कुछ ही सपक्षों में ही अमृत्तत्व है ) ( ४ ) सभी विपक्षों में एवं कुछ ही सपक्षों में रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का उदाहरण है ' द्रव्यं शब्दो निरवयवत्वात् ' इस अनुमान का ' निरवयवत्व ' हेतु क्योंकि द्रव्यत्व शून्य सभी वस्तुओं में निरवयवत्व है , एवं सपक्षीभूत कुछ हो द्रव्यों में निरवयवत्व है ।
' समानासमानजातीययोः साधारणः ' इस वाक्य में जो ' साधारण ' पद है , उसी की व्याख्या ' सन्नेव ' इस वाक्य के द्वारा की गई है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
यस्तु सन्ननुमेये धर्मिणि , तत्समानजातीययोः सपक्षविपक्षयोः , साधारणः स सन्देहजनकत्वात् सन्दिग्धः । यथा यस्माद् विषाणी , तस्माद् गौरिति । यदायं पिण्डो गौविषाणित्वादिति साध्यते , तदा विषाणित्वं गवि महिषे च दर्शनात् सन्देहमापादयन् सन्दिग्धो हेत्वाभासः स्यात् । अयं सपक्ष-
अर्थको धर्मः सपक्षविपक्षयोर्दर्शनाद् धर्मिणि सन्देहं कुर्वन् सन्दिग्धो हेत्वाभासः स्यात् एवमेकस्मिन् धर्मिणि द्वयोर्हेत्वोस्तुल्यबलयोविरुद्धार्थप्रसाधकयोः सन्निपाते सति संशयदर्शनादयं विरुद्धद्वयसन्निपातोऽन्यः सन्दिग्धो हेत्वाभास इति कैश्चिदुक्तम् , तद् दूषयितुमुपन्यस्यति - एकस्मिश्चेति । तस्योदाहरणमाहयथा मूर्तत्वामूर्तत्वं प्रति मनसः क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोरिति । मूर्त मनः क्रियावत्त्वाच्छ्रादिवत् , अमूर्तं मनोऽस्पर्शवत्त्वादाकाशादिवदिति विरुद्धार्थप्रसाधकयोः क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोर्हत्वोः सन्निपाते मनसो सूर्त्तत्वामूर्त्तत्वं प्रति संशयः , नोभयोरपि साधकत्वम् , वस्तुनो द्वयात्मकत्वासम्भवात् । नापि परस्परविरोधादुभयोरप्यसाधकत्वम् मूर्तामूर्तत्वव्यतिरेकेण प्रकारान्तराभावात् । न चान्यतरस्य हेतोविशे षोऽवगम्यते येनैकपक्षावधारणं स्यात् । अतः क्रियावत्वास्पर्शवत्त्वाभ्यां मनसि संशयो भवति , कि मूर्तं किं वामूर्तमिति । अयमेव च विरुद्धाव्यभिचारिणः प्रकरणसमाद् भेदो यदयं संशयं करोति , प्रकरण समस्तु सन्दिग्धेऽर्थे प्रयुज्यमानः संशयं न निवर्तयतीति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( सभी विपक्षो में रहनेवाले विरुद्ध का नहीं ) क्योंकि प्रकृत अनुमान के विपक्षीभूत स्तम्भादि द्रव्यों में विषाणित्व हेतु नहीं है I । सभी विपक्षों में व्यापक रूप से रहनेवाले विरुद्ध हेत्वाभास का उदाहरण ' नित्यः शब्दः कृतकत्वात् ' इस अनुमान में प्रयुक्त ' कृतकत्व ' को समझना चाहिए ( क्योंकि नित्यत्व रूप साध्य के अनाश्रयभूत सभी वस्तुओं में कृतकत्व हेतु आवश्य है ) ।
' यस्तु सन्ननुमेये ' ( इस वाक्म में प्रयुक्त ' अनुमेये ' शब्द का अर्थ है ) ' धर्मी में ' अर्थात् जो हेतु पक्ष में रहते हुए ' तत्समानासमानजातीययोः ' अर्थात् सपक्ष और विपक्ष दोनो में भी समान रूप से रहे , वह हेतु ' सन्देहजनक ' होने के कारण ' सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास है । यस्माद् विषाणी तस्माद् गोः ' अर्थात् जिस समय वन में छिपे हुए कथित पिण्ड में ही केवल विषाण के देखने से कोई इस प्रकार के अनुमान का प्रयोग करे कि ' यह गो है क्योंकि इसे सींग है ' उस समय यह विषाण रूप हेतु गो रूप पक्ष और महिष रूप विपक्ष दोनों में समान रूप से रहने के कारण इस सन्देह को उत्पन्न करता है कि ' यह गो है या महिष ' । इस सन्देह को उत्पन्न करने के कारण ही उक्त विषाण हेतु सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास होता है । ( भाष्योक्त सन्दिग्ध हेत्वाभास का यह उदाहरण ) ( १ ) सपक्ष का व्यापक और कुछ ही विपक्षों में रहनेवाले ' सन्दिग्ध ' नाम के हेत्वाभास का है , ( क्योंकि विषाण रूप हेतु विषाणित्व रूप से निश्चित सभी गो रूप सपक्ष में है , किन्तु
किसी सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि जिस प्रकार सपक्ष और विपक्ष दोनों में यदि एक हो धर्म ( हेतु ) देखा जाय तो वह धर्मी ( पक्ष ) में सांध्य के सन्देह को उत्पन्न करने के कारण ' सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास होगा , उसी प्रकार परस्पर विरुद्ध दो साध्यों के साधक एवं समानबल के दो हेतु यदि एक धर्मी में देखे जाँय तो भी उस धर्मी में उक्त दोनों विरुद्ध साध्यों का संशय होगा । अतः यह ' विरुद्धद्वयसंनिपात ' मूलक एक अलग ही ' सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास है ।
इस पक्ष को खण्डन करने का ही उपक्रम ' एकस्मिश्च ' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । इसी ( विशेष प्रकार के ) सन्दिग्ध का उदाहरण ' यथा मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वं प्रति मनसः क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोः ' इस वाक्य के द्वारा प्रदर्शित हुआ है ।
अभिप्राय यह है कि ' जिस प्रकार घट शरावादि क्रिया से युक्त होने के कारण मूर्त्त हैं , उसी प्रकार मन भी मूर्त है , क्योंकि वह भी क्रियाशील है ' एवं ' जिस प्रकार आकाश स्पर्श से रहित होने के कारण मूर्त नहीं है , उसी प्रकार मन भी स्पर्श से विहीन होने के कारण अमूर्त है ' इस रीति से मूर्त्तत्व और अमूत्तंत्व रूप दो विरुद्ध साध्य को सिद्ध करनेवाले क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व रूप दोनों हेतुओं का एक ही मन रूप धर्मी में यदि सम्मिलन होता है , तो मन रूप धर्मी में यह संशय होता है कि ' मन मूर्त है ?
अथवा अमूर्त ? " । चूंकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती हैं , परस्पर विरोधी दो प्रकार को नहीं ( सुतरामु मन मूर्त ही होगा या अमूर्त ही ) , अतः वे दोनों हेतु मन रूप अपने एक ही पक्ष में अपने अपने साध्य ( अर्थात् मूर्त्तत्व एवं अमूर्त्तत्व के ) निश्चय का उत्पादन नहीं कर सकते ।
यह कहना भी सम्भव नहीं है कि ( प्र ० ) चूंकि मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों परस्पर विरोधी हैं , अतः मन रूप एक ही धर्मों में उक्त दोनों साध्यों को साधन करने का सामर्थ्य उन दोनों हेतुओं में से किसी में भी नहीं है । ( उ ० ) क्योंकि मन को मूर्त या अमूर्त इन दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार का होना सम्भव नहीं है , ( अतः उन दोनों में से एक हेतु मन में अपने साध्य का साधक अवश्य है ) ।
इन दोनों हेतुओं में से किसी एक हेतु में ' विशेष ' बल का भी निश्चय नहीं है कि उन दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का अवधारण हो जाय । अतः कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों हेतुओं से मन में यह संशय उत्पन्न होता है कि ' मन मूर्त है या अमूत्तं ? विरुद्धाव्यभिचारी ( प्रस्तुत विलक्षण सन्दिग्ध ) हेत्वाभास
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ५८२) १. अर्थात् यह ' सन्दिग्ध ' हेत्वाभास चार प्रकार का है - ( १ ) सपक्षव्यापक और विपक्षैकदेशवृति ( २ ) सपक्ष और विपक्ष दोनों का व्यापक , ( ३ ) सपक्षकदेशवृत्ति एवं विपक्षैकदेशवृति , ( ४ ) विपक्षव्यापक और सपक्षेकदेशवृत्ति । मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक के इस सन्दर्भ में जो ' अयं सपक्ष विपक्षयोर्ध्यापको विपक्षैकदेश वृत्तिरनैकान्तिकः ' यह पाठ है उसमें ' विपक्षयोः ' यह प्रमाद से लिखा गया जान पड़ता है ।
पृ. ५८४
क्रियावच्चास्पर्शवत्वयोरिति ।
नन्वयमसाधारण एवाचाक्षुषत्व प्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात् ।
ततश्चानध्यवसित
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — है । जैसे कि मन में मूर्त्तत्व के साधक क्रियावत्त्व और अमूर्त्तत्व के साधक अस्पर्शवत्त्व ये दोनों ही हेतु विद्यमान हैं , अतः संशय होता है कि क्रियाशील होने के कारण मूर्त है या अस्पर्शयुक्त ( द्रव्य ) होने के कारण ( आकाशादि की तरह ) अमूर्त है ? मन में उक्त सन्देह का कारण होने
उक्त दोनों ही हेतु सन्दिग्ध नाम के हेत्वाभास हैं । ( अवान्तर उत्तरपक्ष ) जिस प्रकार अवाक्षुषत्व ( चक्षु से गृहीत न होना ) एवं प्रत्यक्षत्व ( इन्द्रिय से गृहीत होना ) इन दोनों में से एक - एक गुण से भिन्न दूसरी जगह पृथक् रूप से रहने पर भी मिलित होकर केवल गुण में ही रहने के
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
नन्वयमसाधारण एव , अचाक्षुषत्व प्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवादिति । क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वे प्रत्येकं न तावत् संशयं जनयतः , निर्णयहेतुत्वात् । सन्निपातश्च तयोरयमसाधारण एव संहतयोस्तयोर्मनोव्यतिरेकेणान्यतरपक्षे सपक्षे विपक्षे वाऽसम्भवात् , यथाऽचाक्षुषत्व प्रत्यक्षत्वयोः प्रत्येकं गुणव्यभिचारेऽपि समुदितयोर्गुणव्यतिरेकेणान्यत्रासम्भवः । यद्यपि विरुद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातो s साधारणो धर्मः , तथापि संशयहेतुत्वमेव । व्यतिरेकिणो हि विपक्षादेव कस्माद् व्यावृत्तिनियता , तेन पक्षे निर्णयहेतुत्वम् । असाधारणस्य तु व्यावृत्तिरनकान्तिकी , विपक्षादिव सपक्षादपि तस्याः सम्भवात् । तत्र यदि गन्धवत्त्वमनित्यव्यावृत्तत्वान्नित्यत्वं साधयति , नित्यादपि गगनाद् व्यावृत्तेरनित्यत्वमपि साधयेत् ? न चास्त्युभयोः सिद्धिः , वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् । नाप्युभयोरसिद्धिः प्रकारान्तराभावात् । अतो गन्धवत्त्वात् पृथिव्यां संशयो भवति किमियं नित्या ? किं वानित्या ? इति । यदाहुर्भट्टमिश्राः -
यत्रासाधारणो धर्मस्तदभावमुखेन तु ।
द्वयासत्त्वविरोधाच्च मतः संशयकारणम् ||
यच्चाह न्यायवात्तिककारः — विभागजत्वं विभागजविभागासमवायिकारणकत्त्वं नर्ते शब्दात् सम्भवतीति सर्वतो व्यावृत्तेः संशयहेतुरिति ।
अत्राह - ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्याम इति । विरुद्धयोः सन्निपातोS साधारणोऽसाधारणत्वाच्चानध्यवसितोऽयमिति वक्ष्यामः । किमुक्तं स्यात् ? असाधारणो धर्मोऽध्यवसायं न करोतीति वक्ष्याम इत्यर्थः ।
विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेत्वभावे प्रतिपादिते शास्त्रविरोध चोदयति -- नन्विति । उभयथा दर्शनमिति । उभाभ्यां विरुद्धधर्माभ्यां सहैकस्य धर्मिणो दर्शनं संशयकारणमिति शास्त्रे तत्र तत्र स्थाने कथितम् ' दृष्टं च दृष्टवद् दृष्ट्वा ' संशयो भवति ( वै ० अ ० २ आ ० २ सू ०१८ ) । अमूर्तत्वेन सहात्मनि दृष्टमस्पर्शवत्त्वं यथा मनसि दृश्यते , तथा मूर्तत्वेन सह परमाणौ दृष्टं क्रियावस्त्वमपि दृश्यते , अतोऽमूर्तत्वेन सह दृष्टमस्पर्शवत्त्वमिव मूर्तत्वेन सह दृष्टं क्रियावत्त्वमपि दृष्ट्वा संशयो भवति किं मनो मूर्तम् ? किमुतामूर्तम् ? इति । ' यथा दृष्टमयथा दृष्टमुभयथादृष्टत्वात् संशय : ' ( अ ० २ आ ० २ सु ० १ ९ ) । यथा येन धर्मेण मूर्तत्वाव्यभिचारिणा क्रियावत्त्वेन समं ' दृष्टम् ' मनस्तस्मात् ' अयथादृष्टम् ' अमूर्तत्वाव्यभिचारिणा स्पर्शवत्वेन समं दृष्टम् , अत : ' उभयथादृष्टत्वात् ' संशयः किं क्रियावत्त्वान्मूर्तं मनः ? उतास्पर्शवत्त्वादमूर्त्तम् ? इति सूत्रार्थः । तेन विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेतुत्वं निराकुर्वतः शास्त्रविरोधः । शास्त्रविरोध इति , संशयो विषयद्वैतदर्शनाद् भवति । एतत् परिहरति न संशयः , विषयद्वैतदर्शनादिति । यत् त्वयोक्तं
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — प्रकरण ( सत्प्रतिपक्ष ) हेत्वाभास से यही अन्तर है कि विरुद्धाव्यभिचारी हेत्वाभास पक्ष में प्रकृत साध्य के संशय का उत्पादन करता है . किन्तु प्रकरणसम उस साध्य में प्रवृत्त होता है जो सन्दिग्ध है , जिससे कि वह पक्ष में साध्य के सन्देह को दूर नहीं कर पाता ।
' नन्वयमसाधारण एव , अचाक्षुषत्व प्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात् ' इस ( पूर्वपक्ष भाष्य ) का अभिप्राय है कि यह ( विरुद्धाव्यभिचारी या सन्दिग्धविशेष ) असाधारण हेत्वाभास ही है , क्योंकि कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों में कोई एक हेतु संशय को उत्पन्न नहीं कर सकता , क्योंकि प्रत्येकशः वे दोनों निश्चय के ही उत्पादक हैं ।
दोनों हेतुओं का सम्मिलन ( जिससे संशय हो सकता है ) असाधारण ही है , क्योंकि क्रियावस्त्र और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों का सम्मिलन तो केवल मन रूप पक्ष में ही सम्भव है , मन को छोड़कर उन दोनों का सम्मिलन प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १८५ किसी भी सपक्ष में या किसी भी विपक्ष में सम्भव नहीं है ।
जैसे कि अचाक्षुषत्व ( आँखों से न देखे जाने योग्य ) और प्रत्यक्षत्व इन दोनों में से अलग अलग प्रत्येक का गुण में व्यभिचार ( गुण से भिन्न पदार्थ में विद्यमानत्व ) है , ( क्योंकि गुण से भिन्न आकाशादि द्रव्य चक्षु से नहीं देखे जाते एवं गुण से भिन्न होने पर भी घटादि द्रव्यों का प्रत्यक्ष होता है ) , किन्तु अचाक्षुषत्व और प्रत्यक्षत्व दोनों मिल कर केवल गुण में ही हैं ( क्योंकि गन्धादि गुणों का चक्षु से ग्रहण न होने पर भी प्रत्यक्ष होता है ) ।
यद्यपि दो धर्मों का एक में रहना असाधारण धर्म है , विरुद्धाव्यभिचारी आश्रय फिर भी वह संशय का ही उत्पादक है । निर्णय का नहीं ) | ( अन्वय ) व्यतिरेकी हेतु में केवल विपक्ष में न रहना ( विपक्षव्यावृत्ति ) ही केवल निश्चित है ( सपक्षव्यावृत्ति नहीं ) , अतः वह हेतु पक्ष में साध्य के निश्चय का उत्पादन कर सकता है । असाधारण हेतु में सपक्ष या विपक्ष इन दोनों में से किसी एक की भी व्यावृत्ति नियमित नहीं है , क्योंकि विपक्ष की तरह सपक्ष में भी उसका न रहना निर्णीत ही है ।
अतः गन्धवत्त्व रूप असाधारण हेतु सभी अनित्यों में न रहने के कारण पृथिवी में नित्यत्व का अगर साधन कर सकता है , तो फिर गगनादि नित्य पदार्थों में न रहने के कारण पृथिवी में अनित्यत्व का भी वह साधन कर ही सकता है । किन्तु एक ही पृथिवी व्यक्ति में नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की सिद्धि नहीं हो सकती , क्योंकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती है , दो प्रकार की नहीं ।
( वस्तुओं का किसी एक ही प्रकार का होना निश्चित होने के कारण ही ) नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की असिद्धि भी नहीं कही जा सकती , क्योंकि किसी एक वस्तु का नित्यत्व और अनित्यत्व से भिन्न कोई तीसरा प्रकार हो ही नहीं सकता । अतः पृथिवी में गन्ध के रहने के कारण यह संशय होता है कि ' यह नित्य है अथवा अनित्य ? जैसा कि भट्टमिश्र ( कुमारिलभट्ट ) ने कहा
पृ. ५८६
वक्ष्यामः ।
ननु शास्त्रे तत्र तत्रोभयथा दर्शनं संशयकारणमपदिश्यत इति " न संशयो विषयद्वैतदर्शनात् ।
संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं कारणम् , तुल्यबलत्वे च तयोः परस्परविरोधान्निर्णयानुत्पादकत्वं
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कारण असाधारण होते हैं , इसी प्रकार क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व ये दोनों स्वतन्त्र रूप से अलग - अलग मन से भिन्न वस्तुओं में रहते हुए भी मिलित होकर केवल मनरूप पक्ष में ही हैं , अतः क्रियावत्त्व से युक्त अस्पर्शवत्त्व असाधारण ही हैं , सन्दिग्ध नहीं । ( सिद्धान्तपक्ष ) हम आगे कहेंगे कि कथित स्थिति में अचाक्षुषत्व विशिष्ट प्रत्यक्षत्व या क्रियावत्त्वविशिष्ट अस्पर्शवत्त्व ' अनध्यवसित ' होगा , सन्दिग्ध नहीं ।
( पूर्वपक्ष ) शास्त्र ( वैशेषिक सूत्रों अ ० २ आ ० २ सू ० १८ तथा १६ ) में एक धर्मी में विरुद्ध दो धर्मों के ज्ञान को संशय का कारण कई स्थानों में कहा गया है । अतः उक्त कथन शास्त्र के विरुद्ध है । ( सिद्धान्त ) नहीं , यहाँ कोई भी शास्त्रविरोध नहीं है क्योंकि एक ही विषय के दो विरुद्ध प्रकार के ज्ञान से संशय होता है , ( एक धर्मी में दो विरुद्ध धर्मों के ज्ञान से नहीं ) । अर्थात् विषय का द्वैतदर्शन ( दो प्रकारों से देखने ) से ही संशय की उत्पत्ति होती है । उन ( क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व ) दोनों
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
तन्न , यस्मात् एतदेव विवृणोति - संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं कारणमिति । यादशे धर्मिण्यूर्ध्वस्वभावे संशयो जायते , ' स्थाणुर्वा पुरुषो वा ' इति , तादृशस्य विषयस्य पूर्वं द्वैतदर्शनमुभयथादर्शनं स्थाणुत्वपुरुषत्वाभ्यां सह दर्शनं संशयकारणम् , न त्वेकस्य धर्मिणो विरुद्धधर्मद्वयसन्निपातस्तस्य कारणम् , तस्मान्नायं सूत्रार्थी यद्विरुद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातात् संशय इत्यभिप्रायः ।
तथा च दृष्टं च दृष्टवद्दृष्ट्वेत्यस्यायमर्थः - पूर्वमेव ' दृष्टम् ' पदार्थ स्थाणु ं वा पुरुषं वा , ' दृष्टवद् ' दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषान्तराभ्यां तुल्यं वर्त्तमानं दृष्टम् , स्थाणुपुरुषान्तरसमानमिति यावत् देशान्तरे कालान्तरे वा पुनर्दृष्ट्वा कुतश्चिन्निमित्ताद्विशेषानुपलम्भे सति संशयो भवति । दृष्टं चेति चशब्देन पूर्वमदृष्टमपि पदार्थं दृष्टवद् दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषान्तराभ्यां समानं दृष्ट्वा संशय इत्यर्थः ।
सूत्रान्तरं च यथादृष्टमयथादृष्ट मुभयथादृष्टमित्येक धर्मविशेषानुस्मरणकृतं संशयं दर्शयति । पूर्वदृष्टमेव पुरुषं ' यथादृष्टम् ' येन येनावस्थाविशेषेण दृष्टं मुण्डं जटिलं वा , तस्मादयथादृष्टमन्येनान्येनावस्थाभेदेन दृष्टम् , कालान्तरे दृष्ट्वा , अवस्थाविशेषमपश्यतः स्मरतश्चैवं तस्यैव प्राक्तनीमवस्थितामुभयीमवस्थां किमयमिदानीं मुण्डः किं वा जटिल इति संशयः स्यादिति सूत्रार्थ : ।
न तु विरुद्धाव्यभिचारी संशयहेतुः , प्रयोगाभावात् । यदि तावदाद्यस्य तोर्यथोक्तलक्षणत्वमवगतं तदा तस्माद्योऽर्थोऽवधारितः स तथैवेति न द्वितीयस्य प्रयोग :, प्रतिपत्तिबाधितत्वात् । अथायं यथोक्तलक्षणो न भवति , तदानीमयमेव दोषो वाच्यः , किं प्रत्यनुमानेन ? विरुद्धं प्रत्यनुमानं न व्यभिचरति , नातिवर्तत इति विरुद्धाव्यभिचारी प्रथमो हेतुस्तस्यायमेव दोषो यद्विपरीतानुमानसम्भवः । द्वितीयेन प्रतिपक्षे उपस्थाप्यमाने प्रथमस्य साध्यसाधकत्वाभावादिति चेत् ? यदि द्वितीयवत् प्रथममप्यनुमानलक्षणोपपन्नम् , न प्रथमस्यासाधकत्वम् । तदसाधकत्वेऽन्यत्राप्यनुमाने के आश्वास ? वस्तुनो द्वैरूप्याभावादसाधकत्वमिति चेत् ? वस्तु द्विरूपं न भवतीति केनैतदुक्तम् यथा हि प्रमाणमर्थं गमयति , तदेव हि तस्य तत्त्वम् ।
अर्थकं वस्तूभयात्मकं न भवतीति सुदृढप्रमाणावसितोऽयमर्थो न शक्यतेऽन्यथा कर्तुम् , तर्हि तयोस्तुल्यबलत्वं नास्त्येव एकस्य यथार्थत्वादिति , कुतः संशयः ? यद्यपि वस्तुवृत्त्या द्वयोर्यथार्थता नास्ति , तथाप्यन्यतरस्य विशेषानुपलम्भेन भवेत् तुल्यबलत्वाभिमान इति चेदस्त्वेवम् , तथापि तुल्यबलत्वाद्यथोत्तरेणाद्यं प्रतिबध्यते , तथाद्येनाप्युत्तरं प्रतिबध्यत इति परस्परं स्वसाध्यसाधकत्वं न स्यात् , न तु संशयकर्तृत्वम् , विशेषानुपलम्भमात्रेण विरुद्धोभयविशेषोपस्थापनाभावादित्याह - तुल्यबलत्वे चेति ।
ननु यद्वस्तु तन्मूर्तं भवत्यमूर्तं वा , न मूर्तीमूर्ताभ्यां प्रकारान्तरमुपलब्धम् , अतो मनसि मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वत्योरनुपलम्भेऽपि द्वयोरभावं द्वयोरपि भावमसम्भावयतो भवत्येवान्यतरपक्षे स संशयः । सत्यं भवत्येव • न तु विरुद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयसन्निपातात् किन्तु वस्तुत्वात् । यन्मूर्तत्वामूर्तत्वाभ्यां दृष्टसाहचर्यं मनसि प्रतीयमानं स्मृतिद्वारेण तयोरुपस्थापनं करोति ।
तुल्यबलत्वमभ्युपगम्य विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेतुत्वं निरस्तम् , न त्वनयोस्तुल्यबलत्वमस्ति , अन्यतरस्यानुमेयोद्देशस्य ' अमूर्तं मनः ' इत्यस्यागमेन तदभावादणु मनः ' ( अ ० ७ भा ० १ सू ० २३ ) इति सूत्रेण बाधितत्वात् । अथेदं सूत्रमप्रमाणम् ? व्यापकमेव मनः , तदा मनः सद्भावे न किञ्चित् प्रमाणमस्तीत्यमूर्तं मनः अस्पर्शत्वादिति हेतुराश्रयासिद्धः । अथ युगपज्ज्ञानानुत्पत्त्या सिद्धं मनस्तदा धर्मिग्राहकप्रमाणबाधितो युगपज्ज्ञानानुत्पत्तेर्मनसोऽणुपरिमाणत्वे सति सम्भवात् व्यापकत्वे मनसो युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धाद्युगपदेव ज्ञानानि प्रसज्यन्ते ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ७४ है कि ( गन्धवत्वादि ) असाधारण धर्म भी ( पृथिवी में नित्यत्व एवं अनित्यत्व के ) संशय का कारण है । ( उसकी रीति यह है कि ) उक्त असाधारण धर्म किसी सपक्ष में एवं किसी भी विपक्ष में न रहने के कारण पृथिवी में नित्यत्व का अभाव अनित्यस्व और अनित्यत्व का अभाव नित्यत्व इन दोनों का साधन कर सकता है , क्योंकि दो विरुद्ध धर्मों की सत्ता एक धर्मी में सम्भव नहीं है , अतः पृथिव्यादि में गन्धवत्त्वादि रूप असाधारण धर्मों से नित्यत्वादि का संशय ही होता है ।
जैसा कि न्यायवार्तिककार ( उद्योतकर ) ने भी कहा है कि - विभागजस्व अर्थात् , विभागजविभागरूप असमवायिकारण से उत्पन्न होना शब्द से भिन्न किसी दूसरी वस्तुमें सम्भव नहीं है , अतः सपक्ष और विपक्ष इन दोनों में से किसी में भी न रहने के कारण उक्त विभागजत्व रूप असाधारण धर्म शब्द में संशय का कारण है ।
इसी आक्षेप का समाधान ' ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्यामः ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । ( अर्थात् ) चूँकि विरुद्ध दो धर्मों का एक आश्रय में समावेश ही असाधारण है , अतः इसी असाधारण्य के कारण वह ' अनध्यवसित ' नाम का हेत्वाभास हैं , यह हम आगे कहेंगे । ( प्र ० ) इससे क्या अभिप्राय निकला ? ( उ ० ) यही कि हम आगे कहेंगे कि ' असाधारण धर्म ' ( हेतु ) ' अध्यवसाय ' ( निश्चय ) को उत्पन्न नहीं करता ।
' विरुद्धाव्यभिचारी ' हेतु ( असाधारण धर्म ) संशय का कारण नहीं है । कथित इस पक्ष के ऊपर ' ननु ' इत्यादि ग्रन्थ से ( वैशेषिक सूत्र ) रूप शास्त्र के विरोध का उद्भावन किया गया है । ' उभयथा दर्शनम् ' इत्यादि सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि ' उभाभ्याम् ' अर्थात् ' विरुद्ध दो धर्मों के साथ एक धर्मी का ज्ञान संशय का कारण है । यह जो शास्त्र ( वैशेषिक सूत्र ) में उन सब स्थानों में कहा गया है उसका विरोध होगा !
जैसे कि ' दृष्टं च दृष्टवत् ' ( वै ० सू ० अ ० २ ० २ सू ० १८ ) इस सूत्र के द्वारा कहा गया है कि ' दृष्ट्वा संशयो भवति ' ( अभिप्राय यह है कि ) मन में अमूर्त्तत्व के साथ आत्मा में रहनेवाला अस्पर्शवत्त्व भी है , एवं परमाणु मूर्त्तत्व के साथ रहनेवाला क्रियावत्त्व भी मन में है , अतः यह संशय होता है कि ' मन मूर्त है या अमूर्त ?
' यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथा दृष्टत्वाच्च ' ( वै . सू . अ . २ सु . १६ ) के द्वारा यह प्रतिपादन किया गया है कि ' यथादृष्ट ' और ' अयथादृष्ट ' इन दोनों प्रकार से ज्ञात धर्म के द्वारा संशय होता है | कहने का तात्पर्य है कि ' यथा ' अर्थात् जिस प्रकार मूर्त्तत्व की व्याप्ति से युक्त क्रियावत्त्व के साथ मन की उपलब्धि होती है , एवं ' अयथादृष्ट ' अर्थात् उसी प्रकार इससे विरुद्ध अमूर्त्तत्व के साथ अवश्य रहने वाले क्रियावत्त्व के साथ भी मन की उपलब्धि होती है , अतः ' उभयथादृष्ट ' अर्थात् मन की उक्त दोनों प्रकार से उपलब्धि होने के कारण यह संशय होता है कि ' यतः मन क्रियाशील है , अतः मूर्त है ?
अथवा ' मन में स्पर्श नहीं है , अत : मन अमूर्त है ? यही उक्त दोनों वैशेषिक सूत्रों के अर्थ हैं । जो कोई विरुद्धाव्यभिचारी ( असाधारण ) धर्म को संशय का कारण नहीं मानते , उन्हें उक्त दोनों सूत्र रूप शास्त्रों के विरोध का सामना करना पड़ेगा ।
' न विषयद्वैतदर्शनात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सिद्धान्ती इस विरोध का परिहार करते हैं । अर्थात् आप ( पूर्वपक्षी ) ने जो यह कहा है कि ' शास्त्र - विरोध है ' , सो नहीं है , क्योंकि उक्त दोनों सूत्रों से यही कहा गया है कि विषय दो प्रकार से जानने के कारण ( विषयद्वैतदर्शन से ) संशय उत्पन्न होता है । ( संशयो विषयद्वैतदर्शनाद् भवति ) अपने इस वाक्य का ही ' संशयोत्पत्ती विषयद्वैतदर्शनं कारणम् ' इस वाक्य के द्वारा विवरण देते हैं । अभिप्राय यह है कि ( स्थाणुर्वा पुरुष : में ) ऊँचाई वाले जिस घर्मी में ' स्थाणुर्वा पुरुष : ' इस आकार का संशय होता है , उस संशय के प्रति पहिले ' विषय ' का ' द्वैतदर्शन ' अर्थात् ' उभयथा दर्शन ' फलतः पुरुष और स्थाणु दोनों में समान रूप से ऊँचाई का देखना ही कारण है । उस संशय के प्रति एक धर्मी में विरुद्धाव्यभिचारी दो धर्मों का सम्मिलन कारण नहीं है । अतः उक्त सूत्र का यह अभिप्राय नहीं है कि विरुद्धाव्यभिचारी दो धर्मों का एक धर्मों में समावेश संशय का कारण है ।
तदनुसार ' दृष्टञ्च दृष्टवद् दृष्ट्वा ' इस सूत्र का यह अभिप्राय है कि पूर्वकाल ' दृष्ट ' स्थाणु या पुरुष को हो ' दृष्टवत् ' अर्थात् वर्त्तमान काल में दूसरे स्थाणु या दूसरे पुरुष के ' तुल्य ' देखकर अर्थात् दूसरे काल या दूसरे देश में दूसरे पुरुष का दूसरे स्थाणु के समान फिर से देखकर , किसी कारणवश उन दोनों के स्थाणुत्व और पुरुषत्व रूप असाधारण धर्मं को न समझने के कारण संशय उत्पन्न होता है । ' दृष्टञ्च ' इस वाक्य के ' च ' शब्द से भी यही अर्थ व्यक्त होता है कि जो पदार्थ ( स्थाणु या पुरुष में ) पहिले से ज्ञात नहीं है , अगर उसका भी दूसरे स्थाणु वा दूसरे पुरुष को तरह ज्ञान होता है , तो उस ज्ञान के बाद भी संशय की उत्पत्ति होती है ।
' यथा दृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टम् ' इस दूसरे सूत्र के द्वारा वह संशय दिखलाया गया है कि जिसकी उत्पत्ति एक धर्मी में ( अनेक धर्मों की ) स्मृति से होती है । पहिले देखा हुआ पुरुष ही अगर ' यथादृष्ट ' हो , अर्थात् जिन जिन विशेष अवस्थाओं से — जटी अथवा मुण्डी प्रभृति अवस्थाओं से युक्त होकर जो पूर्व में देखा गया हो , वही पुरुष अगर उससे ' अयथादृष्ट ' अर्थात् ( उन पूर्वदृष्ट अवस्थाओं से ) दूसरी दूसरी अवस्थाओं से युक्त रूप में दूसरे समय देखा जाता है , एवं ( उसको वर्तमान ) विशेष प्रकार की अवस्था की उपलब्धि नही होती है , एवं पूर्व की जटी और मुण्डी दोनों अवस्थाओं का स्मरण होता हैं , तो इस स्थिति में इसी संशय की उत्पत्ति होती है कि यह ' जटाधारी है मुण्डित - मस्तक ?
( विरुद्धाव्यभिचारी हेतु में संशय की कारणता सूत्रों से नहीं कही गयी है इतनी ही नहीं वस्तुतः ) विरुद्धाव्यभिचारी हेतु संशय का कारण हो ही नहीं सकता , क्योंकि उसका प्रयोग ही सम्भव नहीं है । ( ' मूर्त्त मनः अस्पर्शवत्त्वात् , अमूर्तं मनः क्रियावत्त्वात् ' इत्यादि स्थलों में ) साध्य के ज्ञापकत्व के प्रयोजक जितने जिन प्रकार के ( सपक्ष सत्त्वादि धर्म ) हैंपहिले हेतु में उन सबों का ज्ञान है , तो फिर इस हेतु से जो निश्चित होगा , वह उसी प्रकार का होगा । अतः ( उस विरुद्ध साध्य के साधन के लिए ) दूसरे हेतु का प्रयोग ही नहीं हो सकेगा , क्योंकि वह प्रथम हेतुजनित प्रथम साध्य की अनुमिति ( प्रतिपत्ति ) से बाधित है । ऐसी स्थिति में अगर प्रथम हेतु में साध्य ज्ञान के प्रयोजक ( सपक्ष सत्त्वादि ) धर्मों का ज्ञान ही नहीं है तो फिर उस धर्मविहीनता के प्रयोजक हेत्वाभास का हो उद्भावन करना चाहिए , ( उस हेतु को दूषित करने के लिए ) प्रमथानुमान ( के विरोधी अनुमान ) के प्रयोग से क्या प्रयोजन ? ( प्र ० ) ' विरुद्धं न व्यभिचरति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' विरुद्धाव्यभिचारी ' शब्द का यह अर्थ है कि जो हेतु अपने विरोधी अनुमान की उत्पत्ति को न रोक सके वही हेतु ' विरुद्धाव्यभिचारी ' है ।
पृ. ५९०
स्यान्न तु संशयहेतुत्वम् , न च तयोस्तुस्यबलवच्च मस्ति , अन्यतरस्यानुमेयोद्देशस्यागमबाधितत्वादयं तु विरुद्धभेद एव ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — के ज्ञान समान बल के हैं , इससे इतना ही होगा कि दोनों में से कोई भा निश्चय का उत्पादन न कर सकेगा । इससे ( निश्चय की इस अनुपत्पदता ) से उनमें संशय की कारणता नहीं आ सकती । वस्तुतः मूर्त्तत्त्व का साधक क्रियावत्त्व और अमूर्त्तत्व का साधक अस्पर्शवत्त्व ये दोनों हेतु समानबल के हैं भी नहीं , क्योंकि इन दोनों में से एक ( अस्पर्शवत्त्व ) का साध्य ( अमूर्त्तत्त्व ) मन में तद्भावादणु मन : ' ( अ ० ६ ० १ - २३ ) इस वैशेषिकसूत्र रूप आगम से बाधित है | अतः ( जिसे पूर्वपक्षी दूसरे प्रकार का सन्दिग्ध हेत्वाभास कहते हैं ) , वह विरुद्ध हेत्वाभास का ही एक प्रभेद है ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — तदनुसार पूर्व में प्रयुक्त हेतु हा ' विरुद्धाव्यभिचारी है । इस हेतु में यही ' दोष ' है कि इसके रहते भी दूसरे हेतु विपरीत अनुमिति की उत्पत्ति होती है , क्योंकि द्वितीय ( प्रति ) हेतु के द्वारा जब विरोधी पक्ष की उपस्थिति हो जाती है , तो अपने साध्य के साधन करने की क्षमता पहिले हेतु से जाती रहती है ।
( उ ० ) अगर दूसरे हेतु की तरह पहले हेतु में अनुमान के उत्पादक ( सपक्षसवादि ) सभी लक्षण हैं , तो फिर पहले हेतु अपने साध्य के साधन में अक्षम ही नहीं है , क्योंकि सपक्षसत्त्वादि रूपी बलों के रहते हुए भी यदि प्रथम हेतु में साध्य के साधन का सामर्थ्य न माना जाय , तो और अनुमान प्रमाणों में हो कैसे विश्वास किया जा सकेगा कि वह अपने साध्य का साधन करेगा ही ? अगर यह कहें कि ( प्र ० ) चूँकि कोई भी वस्तु ( विरुद्ध ) दो प्रकार की नहीं हो सकती , अतः एक ( पहिले ) हेतु को असाधक मान लेते हैं ।
( उ ० ) यह किसने कहा कि एक वस्तु ( विरुद्ध ) दो प्रकार की नहीं हो सकती ? प्रमाण से जिस प्रकार की वस्तु की सिद्धि होगी , वही प्रकार उस वस्तु का ' तत्त्व ' होगा ( यथार्थ रूप होगा । अगर सुदृढ़ प्रमाण के द्वारा यह निश्चित है कि वस्तु दो प्रकार की नहीं हो सकती , अतः उसका निराकरण नहीं किया जा सकता , तो फिर दोनों हेतु समानबल के है ही नहीं , क्योंकि उनमें एक यथार्थ ( अनुमिति का साधक ) है | अतः संशय किस प्रकार होगा ?
( प्र ० ) यद्यपि वस्तुस्थिति यही है कि ( परस्पर विरोधी साध्यों के साधक ) दोनों हेतु यथार्थ ( ज्ञान के साधक नहीं हो सकते ) फिर भी दोनों पक्षों में से किसी एक में ( यथार्थ के प्रयोजक विशेष धर्म को उपलब्धि नहीं होती है , अतः दोनों हेतुओं में समान बल होने का अभिमान होता है । ( उ ० ) अगर दोनों हेतुओं को समानबल का मान भी लें , तो भी जैसे कि पहला हेतु दूसरे हेतु को प्रतिरुद्ध करता है , वैसे ही ( उसी के समानबल होने के कारण ) दूसरा हेतु भी पहिले हेतु को प्रतिरुद्ध कर सकता है ।
इस प्रकार दोनों परस्पर एक दूसरे से प्रतिरुद्ध होने के कारण केवल अपने अपने साध्य का साधन भर न कर सकेंगे । इससे वह सम्भव नहीं है कि दोनों मिलकर संशय का उत्पादन करें , क्योंकि ' दोनों के विशेष ( असाधारण ) धर्म उपलब्ध नहीं है ' केवल इतने से ही दोनों हेतुओं से परस्पर विरुद्ध दो साध्यों की उपस्थिति नहीं हो सकती । यही बात ' तुल्यबलत्वे च ' इत्यादि भाष्य के द्वारा कही गयी है ।
( प्र ० ) जो कोई भी वस्तु वह या तो मूर्त ही होगी या फिर अमूर्त ही होगी , क्योंकि ( परस्पर विरोधी ) दो प्रकारों में से किसी एक ही प्रकार की होगी , दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार की नहीं , ( जैसे कि कोई भी वस्तु द्रव्य ही होगी वा अद्रव्य हो , द्रव्य भी न हो और अद्रव्य भी न हो ऐसे किसी तीसरे प्रकार की वस्तु की उपलब्धि नहीं होती है ) , अतः मूर्त या अमूर्त इन दोनों को छोड़ कर वस्तुओं का कोई तीसरा प्रकार उपलब्ध नहीं है ।
अतः मन में मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व इन दोनों में से किसी एक के निश्चित न होने पर भी जिस पुरुष के मन में मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों की सम्भावना या दोनों के अभाव की भी सम्भावना नहीं है , उस पुरुष को मूत्तंत्व और अमूर्त्तत्व इन दोनों में से एक पक्ष का यह संशय होता है कि मन मुत्तं है या अमूतं ?
' ( उ ० ) यह ठीक है कि उस पुरुष को उक्त प्रकार का संशय होता है , किन्तु वह इस कारण नहीं होता कि मन रूप धर्मी में विरुद्धाव्यभिचारी मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व रूप दोनों धर्मों का सन्निवेश है । वह तो इस वस्तुस्थिति के कारण होता है कि क्रियावत्व और अस्पर्शवत्त्व रूप जो दोनों धर्म मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व के साथ क्रमशः घटादि और आकाशादि में ज्ञात हो चुके हैं , उन दोनों की जब मन में प्रतीति होती है , तो वे मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व इन दोनों को मनरूप धर्मी में उपस्थित कर देते हैं ।
विरुद्धाव्यभिचारी दोनों हेतुओं को समानबल का मान कर उनमें संशय की हेतुता का खण्डन किया गया है ; किन्तु यथार्थ में वे दोनों समानबल के हैं ही नहीं , क्योंकि उन दोनों में से पहिला ' अनुमेयोद्देश ' अर्थात् ' अमूत्तं मनः ' यह प्रतिज्ञावाक्य ' तदभावादणु मन : ' इस सूत्र रूप आगमन से बाधित होने के कारण ' आगमविरोधी ' है ।
अगर उक्त सूत्र को प्रमाण न मानें , तो फिर मन ( आकाशादि की तरह ) व्यापक द्रव्य ही होगा , ऐसी स्थिति में मन की सत्ता में कोई प्रमाण न रहने के कारण ( अमूत्तं मनः , अस्पर्शवत्त्वात् ) यह हेतु आभयासिद्ध होगा ।
अगर एक ही समय दो ज्ञानों की उत्पत्ति न होने के कारण मन की सिद्धि मान लें तो मन का अमूर्त्तत्र रूप साध्य मन रूप धर्मी के ज्ञापक ' युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति ' रूप प्रमाण से ही बाधित होगा , क्योंकि , ' युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति ' अर्थात् एक ही समय दो ज्ञानों की अनुत्पत्ति तभी उपपन्न हो सकती है जब कि मन अणु ( मूर्त ) हो , क्योंकि मन अगर व्यापक होगा तो एक ही समय सभी इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध हो सकेगा , जिससे एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति सम्भव हो जाएगी ।
' अनुमेयोद्देश ' अर्थात् ज्ञान आगम के विरोध से कौन सा दोष होगा ? इसी प्रश्न का समाधान ' अयं तु विरुद्धभेद इति ' इस भाष्य वाक्य से किया गया है । अर्थात् ' अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा'इस प्रतिज्ञा लक्षण में ' अविरोधि ' पद के उपादान से जिन प्रत्यक्षादि विरुद्ध प्रतिज्ञाभासों का निराकरण किया गया है , उन्हीं ( निराकृत प्रतिज्ञाभासों में से ही ) ' अमूर्त मनः' यह आगमविरोधी प्रतिज्ञा भी है । अतः यहाँ प्रतिज्ञाभास ही दोष है , सन्दिग्ध रूप हेत्वाभास नहीं ।
प्रकृत भाष्य वाक्य में प्रयुक्त ' तु ' शब्द के द्वारा यह व्यक्त किया गया है कि ( अमूर्त्तत्व का साधक अस्पर्शवत्त्व हेय ) विरुद्ध हेत्वाभास का ही एक प्रभेद है ( सन्दिग्ध नहीं ) ।
पृ. ५९३
यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानासमानजातीययोरसन्नेव सोऽन्यतरासिद्धोऽनध्यवसायहेतुत्वादनध्यवसितः " " यथा सत्कार्यमुत्पत्तेरिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( ४ ) कथित अन्यतरासिद्ध हेत्वाभास ही यदि अनुमेय ( पक्ष ) में रहे किन्तु सपक्ष और विपक्ष में न रहे , तो वही ' अनध्यवसाय ' रूप ज्ञान का हेतु होने से ' अनध्यवसित ' नाम का हेत्वाभास कहा जाता है । जैसे कि ( कार्यं सत् उत्पत्तिमत्त्वात् ' इस अनुमान का उत्पत्तिमत्त्व ) हेतु
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अनुमेयोद्देशस्यागमविरोधः किं दूषणमत आह- अयं तु विरुद्धभेद इति । अयमागमविरुद्धोऽनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञेत्यविरोधिग्रहणेन निर्वाततानां प्रत्यक्षादिविरुद्धानां प्रतिज्ञाभासानां प्रभेद एव , नायं सन्दिग्धो हेत्वाभासः । किन्तु विरुद्धप्रभेद एवेति तु शब्दार्थः ।
अनध्यवसित इत्यसाधारणो हेत्वाभासः कथ्यते । तं व्युत्पादयतियश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानासमानजातीययोरित्यादि । सर्वं कार्यमुत्पादात् पूर्वमपि सदिति साध्यते , उत्पत्तेरिति हेतु : सांख्यानाम् । सति सपक्षे व्योमादावसति विपक्षे गगनकुसुमादावभावान्नैकत रपक्षाध्यवसायं करोति । विशिष्टार्थक्रियाजननयोग्येन रूपेण पूर्वमनभिव्यक्तस्य पश्चादभिव्यक्तिरेवोत्पत्तिरिति सांख्याः , तेन तेषामुत्पत्तेरिति हेतोर्न स्वतोऽसिद्धता ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' असाधारण ' नाम का हेत्वाभास ही ( इस शास्त्र में ) ' अनध्यवसित ' शब्द से कहा गया है । ' यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानजातीययोः इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसी ( असाधारण ) को समझाते हैं । ' सभी कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी ' सत् ' अर्थात् विद्यमान ही है इसको सिद्ध करने के लिए सांख्याचार्यगण ' उत्पत्तेः ' इस हेतुवाक्य का प्रयोग करते हैं । इस वाक्य के द्वारा उपस्थापित यह ' उत्पत्ति ' रूप हेतु ' असाधारण ( या अनध्यवसित ) नाम का हेत्वाभास है , क्योंकि ( सदा से विद्यमान ) आकाश रूप सपक्ष में भी यह हेतु नहीं है , एवं ( सर्वदा असत् ) आकाशकुसुमादि में भी यह ' उत्पत्ति ' रूप हेतु नहीं है , ( क्योंकि आकाश और आकाशकुसुम इन दोनों से किसी की उत्पत्ति नहीं होती ) , अत : यह हेतु ( कार्यों को उत्पत्ति से पूर्व सत्त्व और असत्त्व ) इन दोनों में से किसी भी पक्ष का साधन नहीं कर सकता । गगनादि नित्य पदार्थों की तरह घटादि अनित्य पदार्थ भी अगर पहिले से ही हैं , तो फिर ' उत्पत्ति ' रूप हेतु कहाँ रहेगा ? कहीं पर निश्चित न रहने के कारण सांख्याचार्यों के इस
पृ. ५९४
अयमप्रसिद्धोऽनपदेश इति वचनादवरुद्धः ।
ननु चायं विशेषः संशयहेतुरभिहितः शास्त्रे तुम्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथा दृष्टत्वादिति ( अ , २ आ . २ सू . ७ ) नान्यार्थत्वाच्छब्दे - विशेषदर्शनात् ।
संशयानुत्पत्तिरित्युक्ते नायं द्रव्यादीनामन्यतमस्य विशेषः स्याच्छ्रावणत्वं किन्तु सामान्यमेव सम्पद्यते , कस्मात् ? तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु द्रव्यादिभेदानामेकैकशो विशेषस्योभयथादृष्टत्वादित्युक्तम् , न संशय- कारणम् ।
अन्यथा षट्स्वपि पदार्थेषु संशयप्रसङ्गात् ।
तस्मात् सामान्यप्रत्ययादेव संशय इति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अनध्यवसित नाम का हेत्वाभास है । सूत्रकार ने इसे ' अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्चानपदेशः ( अ ० ३ आ ० १ सू ० १५ ) इस सूत्र के द्वारा संग्रह किया है ।
( प्र ० ) ( सपक्ष और विपक्ष में न रहनेवाले एवं केवल पक्ष में ही रहनेवाले ) हेतु को ' तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथादृष्टत्वात् ' ( अ ० २ आ ० २ सू ० २२ ) इस वैशेषिक सूत्र में संशय का कारण कहा गया है , अतः कथित अनध्यवसित हेत्वाभास असाधारण के उक्त लक्षण से युक्त होने के कारण संशय रूप ज्ञान का ही कारण होगा अनध्यवसाय रूप ज्ञान का नहीं , क्योंकि वस्तुओं के विशेष ( व्यक्तिगत ) धर्म ही उनके सजातीयों और विजातीयों की अपेक्षा ' असाधारण ' समझ जाते हैं ।
( उ ० ) यह आक्षेप युक्त नहीं है , क्योंकि उस सूत्र का कुछ दूसरा ही र्थ है । किसी ने आक्षेप किया था कि शब्द में श्रावणत्व ( कान से सुनना ) रूप उसका असाधारण ( विशेष ) धर्म देखा जाता है , अत : कान से सुने जानेवाले एवं सत्ता जाति से सम्बद्ध शब्द में ' यह द्रव्य है ? या गुण है ? ' अथवा कर्म है ? ' इस प्रकार का संशय नहीं होगा । इसी आक्षेप के समाधान में उक्त सूत्र के द्वारा कहा गया है कि श्रावणत्व द्रव्य , गुण और कर्म इन तीनों में से किसी का ' विशेष ' अर्थात् असाधारण धर्म नहीं है । उनका वह साधारण धर्म ही प्रतीत होता है , क्योंकि द्रव्य , गुण और कर्म इन तीनों से प्रत्येक द्रव्य , प्रत्येक गुण , एवं प्रत्येक कर्म के असाधारण धर्म अपने सजातीयों के ( अर्थात् अपने में और अपने सजातीयों में समान रूप से रहनेवाले ) सामान्य धर्म के साथ ही देखा जाता है । उक्त सूत्र के द्वारा यह नहीं कहा गया है कि त्रिशेष ( आसाधारण ) धर्म संशय का कारण है । अगर ऐसी बात न हो तो ( शब्द में गुणत्व के संशय की तरह ) छः पदार्थों में भी अविराम संशय की आपत्ति होगी । अत : सामान्य ( साधारण ) धर्म के ज्ञान से ही संशय होता है ( असाधारण धर्म के ज्ञान से नहीं ) ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अयमध्यवसितो हेत्वाभासः केन वचनेन सूत्रकृता संगृहीत इत्याहअययप्रसिद्धोऽनपदेश ( अ ० ३ आ ० १ सू ० १५ ) इति । अनैकान्तिकवदसाधारणो धर्मः संशयं करोति , तेनास्य ' सन्दिग्धश्चानपदेश : ' इत्यनेन संग्रहो युक्तो न पुनरप्रसिद्धवचनेनेत्यभिप्रायेणाह - ननु ि तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेष्विति पञ्चम्यर्थे सप्तमी । पदार्थानां विशेषस्तुल्यजातीयेभ्यो भवति , अर्थान्तरभूतेभ्यश्च भवति । यथा पृथिव्यां गन्धवत्त्वं विशेषो द्रव्यान्तरेभ्योऽपि स्याद् गुणकर्मभ्यश्च भवति ।
शब्दे च श्रावणत्वं विशेषो दृश्यते । तत् किं शब्दस्य रूपादिभ्यः समानजातीयेभ्योऽयं विशेष : ? किं वा विजातीयेभ्यः ? यदि शब्दो गुणस्तदा रूपादिभ्यः सजातीयेभ्यो विशेषोऽयम् , अथ द्रव्यं कर्म वा ? तदा विजातीयेभ्य इति शब्दे श्रावणत्वाद् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशय इति पूर्ववादिना सूत्र विरोधे दर्शिते सत्याह - नान्यार्थत्वादिति । नायं सूत्रार्थी यदसाधारणो धर्मः संशयहेतुरिति किन्त्वस्यान्य एवार्थः । तमेवार्थं दर्शयतिशब्दे विशेषदर्शनादित्यादिना ।
श्रोत्रग्रहणो योऽर्थः स शब्द इति प्रतिपाद्य तस्मिन् द्रव्यं गणः कर्मेति संशय इत्यभिहितं सूत्रकारेण । तस्यायमर्थः - तस्मिन् श्रोत्रग्रहणेऽर्थे संशयः किं द्रव्यं किं वा गुणः किमुत कर्मेति । अत्र परेणोक्तम्- - श्रोत्रग्रहणे शब्दे संशयं वदता त्वया श्रोत्रग्राह्यत्वमेव संशयकारणत्वमुक्तम् । श्रोत्रग्राह्यत्वं च विशेषः , तस्य दर्शनात् संशयानुपपत्तिः ।
विरुद्धोभयस्मृतिपूर्वको हि संशयः , स्मृतिश्च नासाधारणधर्मदर्शनाद्भवति , तस्थ केनचिद्विशेषेण सहानुपलम्भादिति परेणोक्ते सति सूत्रकारेण प्रतिविहितमेतत् , नायं द्रव्यादीनामन्यतमस्य विशेषः श्रावणत्वम् , द्रव्यगुणकर्मणां मध्येऽन्यतमस्य द्रव्यस्य गुणस्य कर्मणो वा श्रावणत्वं विशेषो न भवति , किन्तु तेषां सामान्यमेवेदं सम्पद्यते , कस्मात् ? तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु च द्रव्यादिभेदानामेकैकशो विशेषस्योभयथा दृष्टत्वादित्युक्तम् ।
भिद्यन्ते इति भेदाः , द्रव्यादय एव भेदा द्रव्यादिभेदा द्रव्यगुणकर्माणि तेषां मध्ये एकैकस्य द्रव्यस्य गुणस्य कर्मणो वा तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यो विशेष ' उभयथादृष्टः ' । पृथिव्याः स्वसमानजातीयेभ्यो विशेषः पृथिवीत्वं द्रव्यत्वेन सह दृष्टम् ? रूपस्य विशेषो रूपत्वं गुणत्वेन सह दृष्टम् , उत्क्षेपणस्य विशेष उत्क्षेपत्वं कर्मत्वेन सह दृष्टम् । शब्दस्यापि श्रावणत्वं विशेष : गुणत्वेन , तस्मादेतदपि विशेषत्वेन रूपेण द्रव्यदीनां सामान्यमेव ।
ततश्चास्य तेन रूपेण संशयहेतुत्वं युक्तम् । यत् पुनरसाधारणं रूपं न तत् संशयकारणम् , विशेषस्मारकत्वाभावादित्याह - न संशयकारणमिति । तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यइति वक्तव्ये सूत्रे सप्तम्यभिधानादेषोऽप्यर्थो गम्यते । शब्दे श्रावणत्वविशेषदर्शनाद् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशयः । द्रव्यादिभेदानामेकैकशो विशेषस्य तुल्यजातीयेषु सपक्षेष्वर्थान्तरभूतेषु विपक्षेषु दर्शनादिति । किमुक्तं स्यात् ? विशेषो द्रव्ये गुणे कर्मणि च दृष्टः ।
शब्दे च श्रावणत्वं विशेषो दृश्यते , तस्माद्विशेषत्वाद् द्रव्यादिविषयः संशयः । यदि चासाधारणमपि रूपं संशयकारणम् , तदा षट्स्वपि पदार्थेषु संशयप्रसङ्गः ? सर्वेषामेव तेषामसाधारणधर्मयोगित्वात् , ततश्च संशयस्याविरामप्रसङ्ग इत्याह- अन्यथेति । उपसंहरति तस्मादिति । साधारणो धर्मो विरुद्धविशेषाभ्यां सह दृष्टसाहचर्य :, तयोः स्मरणं शक्नोति कारयितुमतस्तद्दर्शनादेव संशयो भवति , नासाधारणधर्मदर्शनादित्युपसंहारार्थः ।
निदर्शनस्वरूपनिरूपणार्थमाह - द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधम्र्येण चेति । साध्यसाधनयोरनुगमो निदर्यते येन वचनेन तद्वचनं साधर्म्यनिदर्शनम् , साध्यव्यावृत्त्या साधनव्यावृत्तिर्येन वचनेन निदश्यते तद्वैधम्र्म्यनिदर्शनमिति भेदः । तत्र तयोर्मध्ये साधर्म्यनिदर्शनं कथयति - तत्रानुमेयेत्यादिना । तद्वयक्तमेव । वैधर्म्यनिदर्शनं कथयति - अनुमेयविपर्यय इत्यादिना । तदपि व्यक्तमेव ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ७५ उत्पत्ति रूप हेतु में असत्कार्यवादियों को स्वतः असिद्धता का आक्षेप करना उचित नहीं है , क्योंकि ( जल हरणादि ) विशेष कार्यों के उपयोगी रूप से अनभिव्यक्त ( किन्तु सर्वदा विद्यमान घटादि ) कार्यों को अभिव्यक्ति ही सांख्याचार्यों के मत से कार्यों की ' उत्पत्ति ' है ।
इस ' अनध्यवसित ' हेत्वाभास का संग्रह सूत्रकार ने किस सूत्र ( वचन ) से किया है ? इसी प्रश्न का समाधान ' अयमप्रसिद्धोऽनपदेश : ' भाष्य के इस वाक्य के द्वारा किया गया है । अनैकान्तिक ( सव्यभिचार ) हेत्वाभास की तरह यह असाधारण ( अनध्यवसित ) हेत्वाभास भी ( साध्य ) संशय को उत्पन्न करता है , अतः इसका संग्रह ' सन्दिग्धश्चानपदेशः ' सूत्र के इस अंश के द्वारा ही होना उचित है , ' अप्रसिद्धवचन ' अर्थात् ' अप्रसिद्धोऽनपदेश : ' इस अंश के द्वारा नहीं ।
' तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु ' इस वाक्य के दोनों पदों में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग पञ्चमी विभक्ति के अर्थ में किया गया है । ( अभिप्राय यह है कि ) पदार्थों का अपने सजातीय और विजातीय दोनों प्रकार के पदार्थों को अपेक्षा ' विशेष ' अर्थात् असाधारण धर्म होता है ।
जैसे कि पृथिवी का गन्धवत्त्व रूप ' विशेष ' उक्त दोनों ही प्रकार से पृथ्वी का विशेष है , क्योंकि गन्धवत्त्व पृथिवी के ( द्रव्यत्व रूप से ) सजातीय जलादि द्रव्यों में भी नहीं है , और उसके विजातीय गुणादि पदार्थों में भी नहीं है । इसी प्रकार शब्द में भी श्रावणत्व ( श्रवणेन्द्रिय से गृहीत होना ) रूप ' विशेष ' है ।
उसके प्रसङ्ग में यह वितर्क उपस्थित होता है कि शब्द में क्या उसके सजातीय रूपादि गुणों की अपेक्षा यह ' श्रावणत्त्र , रूप विशेष है , अथवा द्रव्यकर्मादि विजातीय पदार्थों की अपेक्षा यह ' विशेष ' है ? शब्द अगर गुण है तो फिर रूपादि उसके सजातीयों की अपेक्षा ही श्रावणत्व उसका विशेष है । शब्द अगर द्रव्य या कर्म है ? तो फिर विजातीय की अपेक्षा ही यह श्रावणत्व रूप विशेष शब्द में है । इस रीति से श्रावणत्व रूप असाधारण धर्म के द्वारा शब्द में ' यह द्रव्य है ? या गुण है ? अथवा कर्म है ?
इस प्रकार के संशय की आपत्ति के द्वारा सूत्रविरोध का प्रसङ्ग पूर्वपक्षवादियों के उठाने पर उसके समाधान के लिए ही भाष्यकार ने ' न , अन्यार्थत्वात् ' यह वाक्य लिखा है ।
अर्थात् उक्त सूत्र का यह अभिप्राय नहीं है कि ' असाधारण धर्मं संशय का कारण है ' उस सूत्र का कोई दूसरा ही अर्थ है ' शब्दे विशेषदर्शनात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वही दूसरा अर्थ प्रतिपादित हुआ | ' जो वस्तु श्रवणेन्द्रिय के द्वारा गृहीत हो वही शब्द है ' यह प्रतिपादन करने के बाद सूत्रकार ने कहा कि ( श्रोत्रग्राह्य ) उस वस्तु में यह संशय होता है कि ' यह द्रव्य है ? या गुण है ? अथवा कर्म है ?
" इस पर पूर्वपक्षवादी ने कहा कि श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले शब्द रूप अर्थ में जिन संशयों का तुमने उल्लेख किया है उससे ' श्रोत्रग्राह्यत्व ' रूप असाधारण धर्म में ही उक्त संशयों की कारणता व्यक्त होती है । किन्तु सो ठीक नहीं है , क्योंकि श्रोत्रग्राह्यत्व शब्द का ' विशेष ' अर्थात् असाधारण धर्म है , अतः उसके ज्ञान से संशय नहीं हो सकता ।
चूँकि विरुद्ध दो कोटियों की उपस्थिति स्मृति का कारण है , यह स्मृति असाधारण धर्म के ज्ञान से सम्भव नहीं है , क्योंकि किसी भी विशेष धर्म के साथ उनकी उपलब्धि नहीं होती है ।
पूर्वपक्षवादियों के द्वारा यह आक्षेप किये जाने पर महर्षि कणाद ने यह समाधान किया है कि जिस श्रावणत्व धर्म का उल्लेख किया गया है , वह द्रव्यादि में से किसी एक का ' विशेष ' नहीं है , अर्थात् द्रव्य या गुण अथवा कर्म इन तीनों में से श्रावणत्व किसी एक का ' विशेष ' नहीं है , किन्तु उन तीनों का वह सामान्य ही प्रतिपन्न होता । अपने इस उत्तर के प्रसङ्ग में ' कस्मात् ' अर्थात् किस हेतु से आप यह बात कहते हैं ?
यह पूछे जाने पर सूत्रकार ने “ तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु द्रव्यादिभेदानामनेकैकशो विशेषस्योभयथादृष्टत्वात् " इत्यादि सूत्र के द्वारा इसका उत्तर दिया है । भिद्यन्त इति भेदा : द्रव्यादय एव भेदा द्रव्यादिभेदा : इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त में ' द्रव्यादिभेद ' शब्द से द्रव्य कर्म , ये तीनों ही सूत्र प्रयुक्त गुण और अभिप्रेत हैं ।
उन तीनों में से एक एक का अर्थात् द्रव्य या गुण अथवा कर्म का इनमें से सभी में ' तुल्यजातीयों ' से अर्थात् समानजातीयों एवं ' अर्थान्तरभूत वस्तुओं ' से अर्थात् भिन्नजातीयों से , दोनों प्रकार की वस्तुओं से ' विशेष ' अर्थात् व्यावृत्ति देखी जाती है । दोनों प्रकार से व्यावृत्ति या विशेष का यह देखा जाना ही सूत्र के ' उभयथादृष्ट ' शब्द से अभिप्रेत है । पृथिवी का ' विशेष ' है पृथिवीत्व , जो ( उसके समानजातीय जलादि द्रव्यों में रहनेवाले ) द्रव्यत्व के साथ ही पृथिवी में है ।
रूप का ' विशेष ' है रूपत्व , जो रूप में गुणत्व के साथ ही देखा जाता है । एवं उत्क्षेपण रूप क्रिया का विशेष हे उत्क्षेपणत्व , जो कर्मत्व के साथ ही देखा जाता है । इसी तरह शब्दों का श्रावणत्व रूप विशेष भी गुणत्व के साथ ही रहेगा ।
अतः यह श्रावणत्व रूप धर्म ( गन्धवत्त्वादि अन्य सभी विशेषों के समान होने के कारण ' सामान्य ' ही है ( साधारण धर्म ही है ) ' विशेष ' अर्थात् असाधारण धर्म नहीं , अतः श्रावणत्व शब्द में द्रव्यत्वादि संशय का अवश्य ही कारण है , किन्तु असाधारण धर्म होने के नाते नहीं किन्तु साधारण धर्म होने के नाते ही । असाधारण धर्म कभी संशय का कारण होता ही नहीं क्योंकि वह किसी व्यावृत्ति का ( अभाव का ) स्मारक नहीं है । यही बात भाष्यकार ने ' न संशयकारणम् ' इस वाक्य से कही है ।
' तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु ' इत्यादि सूत्र में साधारण रीति से प्राप्त पञ्चमी विभक्ति से युक्त ' तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यः ' इस प्रकार के पदों का प्रयोग न कर उक्त सप्तमी विभक्ति से युक्त पदों के प्रयोग से भी यही मालूम होता है कि शब्द में श्रावणत्व रूप विशेष के ज्ञान से यह संशय होता है कि ' शब्द द्रव्य है ? अथवा गुण है ? कि वा कर्म है ?
' क्योंकि ' द्रव्यादि भेदों ' के अर्थात् द्रव्य ' गुण और कर्म में से प्रत्येक के ' विशेष ' से अपने आश्रय को तुल्यजातीयों से अर्थात् सपक्षों से , और विपक्षों से अर्थात् भिन्नजातीयों से , दोनों से व्यावृत्तिबुद्धि का उत्पादन देखा जाता है । इस का फलितार्थ क्या हुआ ? यही कि द्रव्य , गुण और कर्म तीनों में ही ' विशेष ' देखे जाते हैं , एवं शब्द में भी श्रावणत्व रूप विशेष देखा जाता है , अतः संशय होता है कि ' शब्द द्रव्य है ? अथवा गुण है ? कि वा कर्म है ?
' अगर असाधारण धर्म भी संशय का कारण हो तो फिर छः पदार्थों में ही संशय की आपत्ति होगी , क्योंकि वे सभी असाधारण धर्म से युक्त है । जिससे संशय की अनन्त धारा की आपत्ति होगी । यही बात ' अन्यथा ' इत्यादि ग्रन्थ से आचार्य ने कही है । ' तस्मात् ' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । इस उपसंहार ग्रन्थ का आशय है कि परस्परविरुद्ध दो विशेष धर्मों के साथ दृष्ट होने के कारण साधारण धर्म हो उन परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मों की स्मृति को उत्पन्न कर सकता है ।
अत : साधारण धर्म के ज्ञान से ही संशय होता है , असाधारण धर्म के ज्ञान से नहीं |
' द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधर्म्येण च ' भाष्य का यह वाक्य ' निदर्शन ' के स्वरूप को समझाने के लिए लिखा गया है । ' साध्य और हेतु का एक जगह रहना ' जिस वाक्य से ' निर्देशित ' हो , उसे ' साधम्र्म्यनिदर्शन ' कहते हैं । एवं जिस वाक्य से साध्य के अभाव के द्वारा हेतु का अभाव निर्दिष्ट हो , उसे ' वैधर्म्यनिदर्शन ' कहते हैं , यही दोनों ( निदर्शनों ) में अन्तर है । ' तत्र ' अर्थात् उन दोनों में ' तत्रानुमेयसामान्येन ' इत्यादि वाक्य के द्वारा ' साधर्म्यनिदर्शन ' का उपपादन हुआ है । इस वाक्य का अर्थ स्पष्ट है । ' अनुमेय विपर्यय ' इत्यादि वाक्य के द्वारा " वैधर्म्य निदर्शन ' का उपपादन हुआ है , उस वाक्य का भी अर्थ स्पष्ट ही है । ' अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति ' जो वस्तुतः ' निदर्शन ' नहीं है , वह भी निदर्शन के किसी सादृश्य के कारण निदर्शन की तरह प्रतीत होते हैं , इस प्रकार जो निदर्शनाभास अर्थात् निदर्शन न होने पर भी निदर्शन के समान हैं , वे ' अनेन ' अर्थात् निदर्शन के इस प्रकार के लक्षण के निर्देश से निदर्शन की श्रेणी से अलग हो जाते हैं , क्योंकि उन निदर्शनाभासों में निदर्शन का यह लक्षण नहीं है ।
निदर्शननिरूपणम्
पृ. ५९८
द्विविधं निदर्शनं साधम्र्येण वैधम्र्येण च ।
तत्रानुमेयसामान्येन लिङ्गसामान्यस्यानुविधानदर्शनं साधर्म्य निदर्शनम् ।
तद्यथा यत् क्रियावत् तद् द्रव्यं दृष्टं यथा शर इति ।
अनुमेयविपर्यये च लिङ्गस्याभावदर्शनं वैधर्म्य निदर्शनम् , तद्यथा यदद्रव्यं तत् क्रियावन्न भवति यथा सत्तेति ।
अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( अन्वय ) साधर्म्य एवं ( व्यतिरेक ) वैधर्म्य भेद से निदर्शन ( उदाहरण ) भी ( १ ) साधम्र्योदाहरण और ( २ ) वैधम्र्योदाहरण भेद से दो प्रकार का है । इनमें अनुमेय ( साध्य ) सामान्य के साथ लिङ्ग ( हेतु ) सामान्य की अनुगति जहाँ देखी जाए वह साधर्म्य निदर्शन है । जैसे कि जिसमें क्रिया देखी जाती है , वह द्रव्य ही होता है , जैसे कि तीर ( में क्रिया देखी जाती है और वह द्रव्य है ) ।
अनुमेय ( साध्य ) के अभाव के साथ लिङ्ग ( हेतु ) के अभाव का आनुगत्य जहाँ देखा जाए वह ' वैधर्म्य निदर्शन ' है । जैसे कि ( क्रिया युक्त किसी वस्तु को देख कर उसमें द्रव्यत्व के अनुमान के लिए प्रयुक्त ) जो द्रव्य नहीं है , उसमें क्रिया भी नहीं रहती है , जैसे कि सत्ता ( जाति द्रव्य नहीं है , अतः उसमें क्रिया भी नहीं है ) । अतः उक्त अनुमान में सत्ता वैधर्म्य निदर्शन है । निदर्शनों के इन लक्षणों से ( जो वस्तुतः निदर्शन नहीं हैं , किन्तु अज्ञ के द्वारा निदर्शन रूप से प्रयुक्त होने के कारण निदर्शन की तरह प्रतीत होते हैं उन ) निदर्शनाभासों में निदर्शनत्व खण्डित हो जाता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति । अनिदर्शनान्यपि केनचित् साधर्म्येण निदर्शनवदाभासन्त इति निदर्शनसदृशाः , अनेन निदर्शनलक्षनार्थान्निरस्ता भवन्ति , तल्लक्षणरहितत्वात् । यावन्निदर्शनाभासानां स्वरूपं न ज्ञायते तावत् तेषां स्ववाक्ये वर्जनं परवाक्ये चोपालम्भो न शक्यते कर्तुम् , अतस्तेषां स्वरूपं कथयति - यथा नित्यः शब्दोऽमूर्तत्वात् यदमूर्तं तन्नित्यं दृष्टम् , यथा परमाणुः , यथा कर्म , यथा स्थाली , यथा तमोऽम्बरवत् यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति च लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगतविपरीतानुगताः साधर्म्यनिदर्शनाभासाः । नित्यः शब्दोऽमूर्तत्वात् , यथा परमाणुरिति लिङ्गासिद्धो निदर्शनाभासः परमाणोरमूर्तत्वाभावात् । यथा कर्मेत्यनुमेयासिद्ध :, कर्मणो नित्यत्वाभावात् । यथा स्थालीत्युभया सिद्ध :, न स्थाल्यां साध्यं नित्यत्वमस्ति , नापि साधनममूर्तत्वम् । यथा तम इत्याश्रयासिद्धः । परमार्थतस्तमो नाम न किञ्चिदस्ति , क्व साध्यसाधनयोर्व्याप्तिः कथ्यते ? अम्बरवदित्यननुगतोऽयं निदर्शनाभासः । यद्यप्यम्बरे नित्यत्वममूर्त्तत्वमुभयमप्यस्ति तथापि यदमूर्तं तन्नित्मेवं न ब्रूते , किन्त्वम्बरवदित्येतावन्मात्रमाह । न चेतस्माद् वचनादप्रतिपन्नसाध्यसाधनयोरम्बरे सद्भावप्रतीतिरस्ति , तस्मादननु .
पृ. ६००
तद्यथा - नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात् यदमूर्त्त दृष्टं तभिस्यम् , यथा परमाणुर्यथा कर्म , यथा स्थाली , यथा तमः अम्बरवदिति , यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति च लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगतविपरीतानुगताः साधर्म्य निदर्शनाभासाः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अगर कोई शब्द में नित्यत्व के साधन के लिए अमूर्त्तत्व हेतु को उपस्थित कर ( शब्दो नित्यः , अमूर्त्तत्वात् ) ( १ ) परमाणु , ( २ ) क्रिया , ( ३ ) वर्त्तन , ( ४ ) अन्धकार , ( ५ ) आकाश जैसी वस्तुओं को ( साधर्म्य ) निदर्शन के लिए उपस्थित करे तो ( उक्त अनुमान के लिए ) ये सभी ( साधर्म्य ) निदर्शना भास ' होंगे । एवं आकाशादि निष्क्रिय द्रव्यों में केवल द्रव्यत्व हेतु से अगर कोई क्रियावत्त्व
अनुमान के लिए ( ६ ) तीर प्रभृति सक्रिय द्रव्य को उपस्थित करे तो वह भी साधर्म्य निदर्शनाभास ही होगा । कथित ये ( छ : ) वस्तु कथित अनुमान के लिए प्रयुक्त होने पर साधर्म्य निदर्शन के निम्नलिखित छः दोषों में से क्रमशः एक से युक्त होने कारण ' साधर्म्य निदर्शनाभास ' ही होंगे , इन दोषों के ( १ ) लिङ्गासिद्धि , ( २ ) अनुमेयासिद्धि , ( ३ ) उभयासिद्धि , ( ४ ) आश्रयासिद्धि , ( ५ ) अननुगत और विपरीतानुगत ( ये छ : नाम हैं ) ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
तोऽयं निदर्शनाभासः । यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति विपरीतानुगतः , द्रव्यं वायुः क्रियावत्त्वादित्यत्रापि व्याप्यं क्रियावत्त्वं व्यापकं च द्रव्यत्वम् । यच्च व्याप्यं तदेकनियता व्याप्तिर्न संयोगवदुभयत्र व्यासज्यते , व्यापकस्य व्याप्यव्यभिचारात् । यत्रापि समव्याप्ति के कृतकत्वानित्यत्वादौ व्याप्यस्यापि व्यापकत्वमस्ति तत्रापि व्याप्यत्वरूपं समाश्रित्यैव व्याप्तिर्न व्यापकत्वरूपाश्रयत्वात् , व्यभिचारिण्यपि तद्रूपस्यापि सम्भवात् ।
यथोपदिशन्ति गुरवः -
व्यापकत्वगृहीतस्तु व्याप्यो यद्यपि वस्तुत : ।
आधिक्येऽप्यविरुद्धत्वाद् व्याप्यं न प्रतिपादयेत् ॥ इति ।
व्यापक तत्र तस्या अभावात् , अतो विपरीतानुगतोऽयम् । लिङ्गं अतो व्याप्तिर्व्याप्यगतत्वेन दर्शनीया ' यत् क्रियावत् तद् द्रव्यमिति । चानुमेयं चोभयं चाश्रयश्च लिङ्गानुमेयोभयाश्रयाः , तेऽसिद्धा येषां ते लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाः , लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाश्चाननुगताश्च विपरी तानुगताश्चेति योजना ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — निदर्शनाभासों का स्वरूप जबतक ज्ञात न हो जाए , तबतक न तो अपने द्वारा किये जानेवाले प्रयोगों में उनसे बचा जा सकता है , और न दूसरे यदि उनका प्रयोग करें तो उन वाक्यों में ( निदर्शनाभास रूप ) दोष का दिखाना ही सम्भव हो सकता हैं . अतः ' तद्यथा ' इत्यादि वाक्यों से उनके उदाहरण और अन्त में उनके भेद दिखलाये गये हैं । अर्थात् ( १ ) लिङ्गासिद्ध , ( २ ) अनुमेयासिद्ध , ( ३ ) उभयासिद्ध , ( ४ ) आभयासिद्ध , ( ५ ) अननुगत और ( ६ ) विपरीतानुगत ये छ : भेद ' निदर्शनाभास ' के हैं ।
( १ ) ' नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात् यथा परमाणु : ' अर्थात् शब्द में अमूर्त्तत्व हेतु से निरवयत्व के साधन के लिए कोई अगर ' यदमूर्तं तन्नित्यम् , यथा परमाणु : ' इस प्रकार के निदर्शन वाक्य का प्रयोग करे तो वह ' लिङ्गासिद्ध ' निदर्शनाभास होगा , क्योंकि परमाणु के मूर्त होने के कारण उसमें अमूर्त्तत्व नाम का हेतु ही सिद्ध नहीं है । ( निदर्शन में साध्य की तरह हेतु का निश्चित रहना भी आवश्यक है ) ।
( २ ) नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात् ' इसी अनुमान में अगर कोई ' यदमूतं दृष्टं तन्नित्यम् , यथा कर्म ' इस निदर्शन वाक्य का प्रयोग करे तो वह अनुमेयासिद्ध ' निदर्शनाभास होगा , क्योंकि क्रिया में नित्यत्व रूप अनुमेय अर्थात् साध्य ही सिद्ध नहीं है ।
( ३ ) उसी अनुमान में ' यदमूर्त्तं दृष्टं तन्नित्यम् , यथा स्थाली इस प्रकार के निम्दर्शनवाक्य का अगर कोई प्रयोग करे तो वह ' उभयासिद्ध ' नाम का निदर्शनाभास होगा , क्योंकि स्थाली ( बटलोही ) में नित्यत्व रूप अनुमेय और अमूर्त्तत्व रूप लिङ्ग दोनों हो सिद्ध नहीं हैं ।
( ४ ) उसी अनुमान में कोई अगर ' यदमूर्त्तं दृष्टं तन्नित्यम् , यथा तमः ' इस प्रकार से निदर्शन वाक्य का प्रयोग करे , तो वह आश्रयासिद्ध ' नाम का निदर्शनाभास होगा , क्योंकि तम नाम का कोई ( भाव ) पदार्थ वस्तुत : है ही नहीं , साध्य और हेतु की व्याप्ति का प्रदर्शन कहाँ होगा ? ( क्योंकि निदर्शन का यही प्रयोजन है कि वहाँ साध्य और हेतु को व्याप्ति निश्चित रहे , जिससे कि प्रकृत पक्ष में साध्य की सिद्धि के लिए उसका प्रयोग किया जा सके । )
( ५ ) ' शब्दो नित्यः , अमूर्त्तत्वात् ' इसी स्थल में अगर उदाहरण को दिखाने के लिए ' अम्बरवत् ' केवल इतने ही अंश का कोई प्रयोग करे ' यदमूर्तं तन्नित्यम् ' इस अंश का प्रयोग न करे तो वह ' अननुगत ' नाम का निदर्शनाभास होगा । यद्यपि आकाश में नित्यत्व और अमूर्त्तत्व ये दोनों ही हैं , फिर भी ' यदमूर्त्त तन्नित्यम् ' इस अंश का प्रयोग नहीं किया गया है , किन्तु केवल ' अम्बरवत् ' इतना ही कहा गया है , केवल इसी त्रुटि से यह ' अननुगत ' नाम का हेत्वाभास होगा । क्योंकि इस वाक्य के बिना पहिले से अज्ञात साध्य और हेतु इन दोनों की सत्ता का ज्ञान आकाश में नहीं हो सकेगा , अतः यह ( साध्य और हेतु आकाश रूप अधिकरण में अनुगत रूप से ज्ञापक न होने के कारण ) ' अननुगत ' नाम का निदर्शनाभास है ।
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( ६ ) ' द्रव्यं वायुः क्रियावत्वात् ' इस अनुमान के लिए अगर कोई ' यद्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टम् ' इस प्रकार ( ' यत् क्रियावत् तत् द्रव्यं दृष्टम् ' इस प्रकार से निदर्शन वाक्य प्रयोग न करके ) उसके विपरीत वाक्य का कोई प्रयोग करे , तो वह निदर्शन न होकर ' विपरीतानुगत ' नाम का निदर्शनाभास होगा । क्योंकि इस अनुमान में ' क्रियावत्त्व ' हेतु है , अतः वही व्याप्य है , एवं साध्य होने के कारण द्रव्यत्व ही व्यापक है ।
अनुमान की उपयोगी व्याप्ति केवल व्याप्त ( हेतु ) में ही रहती है , व्यापक ( साध्य ) में नहीं । एक ही व्याप्ति संयोग की तरह व्यापक और व्याप्य अपने दोनों सम्बन्धियों में व्याप्त होकर रहनेवाली वस्तु नहीं है । क्योंकि ( साध्य ) व्यापक में व्याप्य ( हेतु ) की व्याप्ति नहीं ( भी ) रहती है , क्योंकि साध्य हेतु के बिना भी देखा जाता है ।
जिन समव्याप्तिक ( जिस अनुमान के साध्य और हेतु दोनों समान आश्रयों में हों , साध्य का आश्रय हेतु के आश्रय से अधिक न हो ) स्थलों में जैसे कि ' घटोऽनित्यः कृतकत्वात् ' इत्यादि अनुमान के कृतकत्व हेतु में व्याप्यत्व की तरह साध्य का व्यापकत्व भी हैं , फिर भी कृतकत्व हेतु में जो अनित्यत्वरूप साध्य की व्याप्ति है , वह इसी कारण है कि वह साध्य का व्याप्य है । इसलिए कृतकत्व हेतु में अनित्यत्व रूप साध्य की व्याप्ति नहीं है कि कृतकत्वरूप हेतुमित्यत्वरूप साध्य का व्यापक है ।
अगर साध्य के व्यापक होने के कारण ही साध्य की व्याप्ति हेतु में मानें तो ( ' धूमवान् वह्नेः ' इत्यादि ) व्यभिचारी स्थलों के हेतुओं में भी साध्य की व्याप्ति माननी होगी । क्योंकि व्याप्ति के प्रयोजक साध्य का व्यापकत्व तो वहाँ भी है ही ( वह्नि धूम का व्यापक है ही ) ।
जैसा कि गुरुचरणों का उपदेश है कि : - ( किसी ) व्याप्य ( हेतु ) में भी साध्य की व्यापकता वस्तुतः रहने पर भी वह हेतु व्यापक होने के कारण व्याप्य का ( अपने से व्याप्य साध्य का केवल उसके व्याप्य होने के कारण ) ज्ञापन नहीं कर सकता , क्योंकि साध्य की व्यापकता ( केवल समव्याप्त हेतु में ही नहीं , किन्तु ) साध्य से अधिक स्थानों में रहनेवाले ( व्यभिचारी ) हेतु में भी है ।
पृ. ६०३
यदनित्यं तन्मूर्त दृष्टम् , यथा कर्म यथा परमाणुर्यथाकाशं यथा तमः , घटवत् , यन्निष्क्रियं तदद्रव्यञ्चेति लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्ताश्रयासिद्धाव्यावृत्तविपरीतव्यावृत्ता वैधर्म्यनिदर्शनाभासा इति ॥
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( रूपादि अनित्य गुणों में यदि कोई अनित्यत्व हेतु से मूर्त्तत्व के साधन के लिए प्रस्तुत होकर वैधर्म्यनिदर्शन के लिए ( १ ) क्रिया , ( २ ) परमाणु ( ३ ) आकाश , ( ४ ) अन्धकार और ( ५ ) घट जैसी वस्तुओं को उपस्थित करे तो ये सभी वस्तुयें ( उक्त अनुमान के लिए प्रयुक्त होने पर ) ' वैधर्म्यनिदर्शनाभास ' होंगे । एवं ( आकाशादि निष्क्रिय द्रव्यों में द्रव्यत्व हेतु से क्रियावत्त्व के अनुमान के लिए प्रयुक्त सत्ता जाति भी ) जिसमें क्रिया नहीं है , वह द्रव्य भी नहीं है , जैसे कि ( ६ ) ' सत्ता ' इस प्रकार से प्रयुक्त होने पर वैधर्म्यनिदर्शनाभास ' ही होगा । ( वैधर्म्यनिदर्शनाभास रूप दोषों के ये छ : नाम हैं - ( १ ) लिङ्गाव्यावृत्त ( २ ) अनुमेयाव्यावृत्त , ( ३ ) उभयाव्यावृत्त , ( ४ आश्रयासिद्ध , ( ५ ) अव्यावृत्त और ( ६ ) विपरीत व्यावृत्त ( तदनुसार वैधर्म्यनिदर्शनाभास रूप दुष्ट निदर्शन भी छ : हैं )
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
वैधर्म्यनिदर्शनाभासान् कथयति - यदनित्यमित्यादिना । नित्यः शब्दोऽ . मूर्त्तत्वाद् यदनित्यं तन्मूर्तं यथा कर्मेति लिङ्गाव्यावृत्तो वैधर्म्यनिदर्शनाभासः , कर्मणो मूर्त्यभावात् । यथा परमाणुरित्यनुमेयाव्यावृत्तः , अनुमेयं नित्यत्वं परमाणोरव्यावृत्तम् । यथाकाशमित्युभयव्यावृत्तः , नाकाशादमूर्तत्वं नापि नित्यत्वं व्यावृत्तम् । यथा तम इत्याश्रयासिद्धः । परमार्थतस्तु तम एव नास्ति , किमाश्रया साध्यसाधनयोर्व्यावृत्तिः स्यात् । घटवदित्यव्यावृत्तः । यद्यपि घटे साध्यसाधनयोरस्ति व्यावृत्तिः , तथापि यदनित्यं तन्मूर्तमित्येवं न वदति , न च तथानभिधाने साध्यसाधनयोर्व्यावृत्तिप्रतिपत्तिविप्रतिपन्नस्य भवति , अतोऽयमव्यावृत्तः । यन्निष्क्रियं तदद्रव्यमिति विपरीतव्यावृत्तः । यथा साध्यं व्यापकं साधनं व्याप्यम् , तथा साध्याभावो व्याप्यः साधनाभावश्च व्यापकः ।
यथोक्तम्-
नियम्यत्वनियन्तृत्वे भावयोर्यादृशे मते ।
विपरीते प्रतीयेते ते एव तदभावयोः ॥ इति ।
तत्र द्रव्यं वायुः क्रियावत्त्वादित्यत्र विपर्ययव्याप्तिप्रदर्शनार्थं यदद्रव्यं तदक्रियमिति वाच्यम् , अयं तु न तथा ब्रूते , किन्त्वेवमाह - यन्निष्क्रियं तदद्रव्यमिति । एवं च न व्याप्तिरस्ति , आकाशस्य क्रियारहितत्वेऽपि द्रव्यत्वात् । तस्माद् विपरीतव्यावृत्तोऽयं वैधर्म्यनिदर्शनाभासः । लिङ्गं चानुमेयं चोभयं च लिङ्गानुमेयोभयानि तान्यव्यावृत्तानि येषां ते तथोक्ताः । आश्रयोऽसिद्धो यस्य स आश्रयासिद्धः , लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्तश्चाश्रयासिद्धश्च अव्यावृत्तश्च विपरीतव्यावृत्तश्चेति व्याख्या ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अतः व्याप्य ( हेतु ) में ही व्याप्ति की वर्तमानता दिखानी चाहिए , जैसे कि ' यत् क्रियावत् तद् द्रव्यम् ' इस प्रकार के वाक्यों से होता है । व्यापक में व्याप्ति को नहीं दिखाना चाहिए , क्योंकि व्यापकीभूत वस्तु में रहनेवाली व्याप्ति ( अनुमिति की उपयोगी ) नहीं है । अत : ' यत् द्रव्यं तत् क्रियावत् ' इत्यादि प्रकार के निदर्शनवाक्य ' विपरीतानुगत ' निदर्शनाभास ही हैं । ' लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगत विपरीतानुगताः ' इस समस्तवाक्य का विग्रह ' लिङ्गञ्चानुमेयश्वोभयश्वाश्रयश्च लिङ्गानुमेयोभयाश्रयाः , ते असिद्धा येषां ते लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाः , लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाश्चाननुगताश्च विपरीतानुगताश्च ' इस प्रकार समझना चाहिए ।
' यदनित्यम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वैधर्म्य निदर्शनाभासों का उपपादन करते ! वैधम्यं निदर्शनाभास भी निम्नलिखित छ : प्रकार के हैं , ( १ ) लिङ्गाव्यावृत्त , ( २ ) अनुमेयाव्यावृत्त , ( ३ ) उभयाव्यावृत्त , ( ४ ) आश्रयासिद्ध , ( ५ ) अव्यावृत्त और ( ६ ) विपरीतव्यावृत्त ।
( १ ) ' नित्यः शब्दः , अमूर्त्तत्वात् ' रूप में इस अनुमान के लिए कोई यदि ' यदनित्यं तन्मूर्त्तम् , यथा कर्म ' इस प्रकार से कर्म को वैधर्म्यनिदर्शन न उपस्थित करे तो वहाँ कर्म ' लिङ्गाव्यावृत्त ' नाम का वैधर्म्यनिदर्शनाभास होगा । क्योंकि क्रिया रूप विपक्ष में अमूर्त्तत्व रूप लिङ्ग की अव्यावृत्ति अर्थात् अभाव नहीं है । क्रिया में नित्यत्त्र रूप साध्य तो नहीं है , किन्तु अमूर्त्तत्व रूप हेतु है ।
( ६ ) ' नित्यः शब्दः , अमूर्त्तत्वात् ' इसी अनुमान में यदि कोई यदनित्यं तन्मूर्त्त दृष्टम् , यथा परमाणु : ' इस प्रकार से परमाणु को वैधर्म्य निदर्शन के लिए उपस्थित करे तो वह ' अनुमेयाध्यावृत्त निदर्शनाभास ' होगा , क्योंकि परमाणु में नित्यत्व रूप अनुमेय अर्थात् साध्य की व्यावृत्ति ( अभाव ) नहीं है |
( ३ ) उसी अनुमान में यदि कोई ' यदनित्यं तन्मूर्त्तं दृष्टम् , यथाकाशम् ' इस प्रकार से आकाश को वैधर्म्य निदर्शनाभास के लिए उपस्थित करे तो वह ' उभयाव्यावृत्त ' निदर्शनाभास होगा , क्योंकि आकाश में नित्यत्वरूप साध्य का अभाव और अमूर्त्तत्व रूप हेतु का अभाव , अर्थात् अनित्यत्व और मूर्त्तत्व इन दोनों में से कोई भी नहीं है , अतः आकाश में साध्यभाव और हेत्वभाव दोनों की ही व्यावृत्ति ( अभाव ) न रहने के कारण प्रकृत में आकाश ' उभयाव्यावृत्त ' निदर्शनाभास है ।
( ४ ) उसी अनुमान में ' यथा तम : ' इस प्रकार से तम ( अन्धकार को यदि वैधर्म्य दृष्टान्त रूप से उपस्थित किया जाय तो वह ' आश्रयासिद्ध ' नाम का निदर्शनाभास होगा | क्योंकि तम नाम की कोई वस्तु ही नहीं है , फिर साध्यव्यावृत्ति ( साध्य का $ भाव ) और हेतुव्यावृत्ति ( हेतु का अभाव ) इन दोनों का किसमें प्रदर्शन होगा ?
( ५ ) ' नित्यः शब्दः , अमूर्त्तत्वात् इसी अनुमान में वैधर्म्यनिदर्शन को दिखलाने के लिए यदि ' घटवत् ' केवल इसी वाक्य का प्रयोग करे ( ' यदनित्यं तन्मूर्त्तम् ' इस अंश का प्रयोग ' घटवत् ' इस वाक्य के पहिले न करे ) तो वह ' अव्यावृत्त ' नाम का निदर्शनाभास होगा । यद्यपि घट में साध्य की व्यावृत्ति ( अर्थात् अनित्यत्व ) और हेतु की व्यावृत्ति ( मूर्त्तत्व ) ये दोनों ही हैं , फिर भी ' यदनित्यं तन्मूर्तम् ' ( जो अनित्य होता है वह अवश्य ही मूर्त होता है ) इस अंश का प्रयोग न करने के कारण इस प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवाले पुरुष को साध्य के अभाव और हेतु के अभाव की ( उपयुक्त ) प्रतीति नहीं हो पाती है , अतः उक्त स्थल में घट ' अव्यावृत्त ' नाम का निदर्शनाभास समझना चाहिए ।
( ६ ) ' द्रव्यं वायुः क्रियावत्त्वात् ' इस अनुमान के लिए यदि कोई ' निष्क्रियं तदद्रव्यम् ' इस प्रकार से वैधर्म्यं निदर्शन का प्रयोग करना चाहे , तो वह ' विपरीतव्यावृत्ति ' नाम का ( वैधर्म्य ) निदर्शनाभास होगा , क्योंकि ' यद् द्रव्यं न भवति ' इत्यादि प्रकार से साध्याभाव के बोधक वाक्य का प्रयोग पहिले न कर उसके ' विपरीत ' अर्थात् उल्टा पहिले हेतु के अभाव का बोधक ' यन्निष्क्रियम् ' इस वाक्य का ही प्रयोग पहिले किया गया है । जैसे कि साध्य व्यापक है और साधन व्याप्य है ( अतः साधर्म्य निदर्शन वाक्य में पहिले हेतु बोधक पद का प्रयोग होता है , बाद में साध्य बोधक पद का , उसी प्रकार ) साध्याभावव्याप्य है और हेत्वभाव व्यापक ( अतः वैधर्म्य निदर्शन वाक्य में पहिले साध्याभाव के बोधक वाक्य का ही प्रयोग होना चाहिए , बाद में हेत्वभाव के बोधक वाक्य का , अर्थात् दोनों ही प्रकार के निदर्शन वाक्यों में व्याप्य के बोधक वाक्य का पहिले प्रयोग चाहिए , बाद में व्यापक के बोधक वाक्य का , प्रकृत में इसके विपरीत हुआ है । अतः ' विपरीतव्यावृत्त ' नाम का निदर्शनाभास है ।
जैसे कि ( अनुमिति के लिए ) साध्य का हेतु से व्यापक होना और हेतु का साध्य से व्याप्य होना सहायक है , उसी प्रकार ( अन्वयव्यतिरेकी और केवलव्यतिरेकी हेतु का अनुमानों में ) हेतु के अभाव से साध्य के अभाव का व्यापक होना और साध्य के अभाव का हेतु के अभाव का व्याप्य होना भी सहायक है । जैसा कहा गया है कि जिस प्रकार के हेतु में नियन्तृत्व ( व्याप्यत्व ) एवं जिस प्रकार के साध्य में नियम्यत्व ( व्यापकत्व ) रहता है , उसके विपरीत उन दोनों के अभावों में हेतु का अभाव ही व्यापक और साध्य का अभाव ही व्याप्य होता है । इस स्थिति में ' द्रव्यं वायुः क्रियावस्त्वात् ' इस अनुमान में यदि विपर्यय ( व्यतिरेक ) व्याप्ति का दिखाना आवश्यक हो तो ' यदद्रव्यं तदक्रियम् ' इस प्रकार से निदर्शन वाक्य का प्रयोग करना चाहिए । प्रकृत में वह पुरुष ( जो निदर्शनाभास का प्रयोग करता है ! इस प्रकार न कह कर , उसका उल्टा ( विपरीत ) ऐसा कहता है कि ' यन्निष्क्रियं तदद्रव्यम् ' अर्थात् जिसमें क्रिया नहीं है , वह द्रव्य ही नहीं है , किन्तु ऐसी व्याप्ति नहीं है , क्योंकि आकाशादि द्रव्य तो हैं , किन्तु उनमें क्रियावस्त्व नहीं है ।
पृ. ६०६
निदर्शनेऽनुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य लिङ्गसामान्यमनुमेयेऽन्वानयनमनुसन्धानम् ।
अनुमेयधर्ममात्रत्वेनाभिहितं लिङ्गसामान्य-
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — निदर्शन ( उदाहरण ) में साध्यसामान्य के साथ ज्ञात हुए लिङ्ग ( हेतु ) सामान्य की सत्ता का पक्ष में बोध करानेवाला वाक्य ही साधर्म्या - नुसन्धान ' ( साधर्म्यापनय ) है । ( विशदार्थ यह है कि ) लिङ्गसामान्य पक्ष ( अनुमेय ) में है ' इस प्रकार केवल पक्षमात्रवृत्तित्व रूप से कथित हेतु
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
निदर्शनेऽनुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेयेऽन्वानयनमनुसन्धानम् । निदर्श्यते निश्चिता साध्यसाधनयोर्व्याप्तिरस्मिन्निति निदर्शनं दृष्टान्तः तस्मिन्ननुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य प्रतीतस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेये साध्यधमण्यन्वानयनं सद्भावोपदर्शनं येन वचनेन क्रियते तदनुसन्धानम् । दृष्टान्ते साध्याविनाभूतत्वेन दर्शितं लिङ्गं पक्षेऽनुसन्धीयते प्रतिपाद्यते अनेनेति व्युत्पत्त्या । एतदेव स्वोक्तं विवृणोति - अनुमेयधर्ममात्रत्वेनाभिहितं लिङ्गसामान्यमिति । प्रतिज्ञानन्तरं हेतुवचनेन लिङ्गं वस्तुव्यावृत्त्यानुमेयेऽस्तीत्येतावन्मात्रतया हेतुत्वेनाभिहितम् , न तु धर्मिणि तस्य सद्भावः कथित इत्यभिप्रायः । लिङ्गस्य साध्यप्रतिपादने शक्तिरन्वयव्यतिरेकी पक्षधर्मता च , सा पूर्व प्रतिज्ञाहेतुवचनाभ्यां तस्य नावगतेत्यनुपलब्धशक्तिकं निदर्शने साध्यधर्मसामान्येन सह दृष्टमनुमेये येन वचनेनानुसन्धीयते तदनुसन्धानमिति ।
अयमन्त्राभिसन्धिः - परार्थः शब्दो यथा यथा परस्य जिज्ञासोदयते तथा तथा प्रयुज्यते , प्रत्येतुश्च साध्येऽभिहिते साधने भवत्याकाङ्क्षा – कुत इदं सिद्धयति ? न तु साधनस्य सामर्थ्यम् , स्वरूपावगतिपूर्वकत्वात् सामर्थ्य जिज्ञासायाः । साधने चाकाङ्क्षिते प्रयुज्यमानं हेतुवचनं हेतुस्वरूपमात्रं कथयति , न तस्य पक्षधर्मताम् , एकस्य शब्दस्योभयार्थवाचकत्वाभावात् ।
विज्ञाते हेतौ कथमस्य हेतुत्वमिति सामर्थ्य जिज्ञासायां साध्यप्रतीतेरविनाभावप्रतीतिनान्तरीयकत्वाद् व्याप्तिवचनेनाविनाभावे कथिते सत्यवधारितसामर्थ्यस्य हेतोः पक्षे पश्चात् सम्भवो जिज्ञास्यत इत्युदाहरणानन्तरं पक्षधर्मतावगमार्थमुपगन्तव्ध उपनयः , हेतुत्वाभिधानसामर्थ्यादेव पक्षधर्मत्वं प्रतीयते , व्यधिकरणस्यासाधकत्वादिति चेत् ? तदभिधानसामर्थ्याद् व्याप्तिरपि लप्स्यते , अनन्वितस्य हेतुत्वाभावादित्युदाहरणमपि न वाच्यम् ।
असाधारणस्यापि भ्रान्त्या हेतुत्वाभिधानोपपत्तेर्न तस्मादेकान्ते . नान्वयप्रतीतिरस्तीत्युदाहरणेन व्याप्तिरुपदश्यंत इति चेद् ? धर्मिण्यविद्यमान स्यापि भ्रमेण हेतुत्वाभिधानोपलम्भान्न ततः पक्षधर्मतासिद्धिरस्तीत्युदाहरणस्थस्य लिङ्गस्य पक्षेऽस्तित्वनिश्चयार्थमुपनयो वाच्यः । असिद्धस्य भ्रमादुपनयोऽपि दृश्यते कथं तस्मादपि पक्षधर्मतासिद्धिरिति चेत् ? असिद्धाविनाभावस्यापि भ्रान्त्या व्याप्तिवचनं दृश्यते कथं तस्मादन्वयसिद्धिः ?
उदाहरणे व्याप्तिग्राहकप्रमाणानुसारेणान्वयनिश्चयो न वचनमात्रेण , तस्य सर्वत्राविशेषादिति चेत् ? उपनयेऽपि पक्षधर्मताग्राहकप्रमाणानुसारादेव तद्धर्मता निश्चयो न वचनमात्रत्वात् । हेत्वभिधानान्यथानुपपत्त्यैव पक्षधर्मताग्राहिप्रमाणानुसारो भवतीति चेत् ? तदन्यथानुपपत्त्यैव व्याप्तिग्राहकप्रमाणानुसारो भविष्यति । हेतुवचनस्यान्यार्थत्वान्न तदुपनयनसामर्थ्यमस्तीति तदुपस्थापनमुदाहरणेन क्रियत इति चेत् ? इहापि सैव रीतिरनुगम्यताम् , अलमन्यथा सम्भावितेन ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अतः प्रकृत अनुमान में ' यनिष्क्रियं तदद्रव्यम् ' यह वाक्य विपरीतव्यावृत्त ' नाम का वैधर्म्य निदर्शनाभास होगा । ' लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्ति ' शब्द ' लिङ्गश्वानुमेयं चोभयं च लिङ्गानुमेयोभयानि , तान्यव्यावृत्तानि येषाम् ' इस व्युत्पत्ति से बना है , और ' आश्रयोऽसिद्धो यस्य ' इस व्युत्पत्ति से प्रकृत ' आश्रयासिद्ध ' शब्द बना है । ( इस प्रकार दोनों शब्दों के निष्पन्न होने के बाद ) ' लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्तश्चाश्रयासिद्धश्चाव्यावृत्तश्च विपरीतव्यावृत्तश्च ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार व्याख्या करनी चाहिए ।
निदर्शनेऽनुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेयेऽन्वानयनमनुसन्धानम् ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' निदर्शन ' शब्द का ' विदिश्यते निश्चिता साध्यसाधनयोर्व्याप्तिरस्मिन्निति निदर्शनम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार पर्यायवाची ' दृष्टान्त ' शब्द है । तदनुसार दृष्टान्त में साध्य सामान्य के साथ दृष्ट अर्थात् ज्ञात लिङ्ग ( हेतु ) सामान्य का अनुमेय में अर्थात् साध्य के धर्मी में ( पक्ष में ) ' अन्वानयन ' अर्थात् सत्ता का प्रदर्शन जिस वाक्य के द्वारा किया जाय वही ' अनुसन्धान ' है ।
' अनुसन्धीयते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दुष्टान्त में साध्य की व्याप्ति से युक्त एवं उसी रूप में देखे हुए हेतु का पक्ष ( रूप अनुमेय ) में सत्ता का प्रदर्शन जिस वाक्य के द्वारा हो वही ' अनुसन्धान ' है , वही बात ' निदर्शने ' इत्यादि से भाष्यकार ने स्वयं कही है जिसकी व्याख्या ' अनुमेय मात्रत्वेनाभिहितं लिङ्गसामान्यम् ' इत्यादि से भाष्यकार स्वयं करते हैं ।
अभिप्राय यह है कि प्रतिज्ञावाक्य के प्रयोग के बाद प्रयुक्त हेतुवाक्य के विपक्षव्यावृत्ति के आक्षेप द्वारा सामान्य रूप से ही यह समझा जाता है कि ' यह हेतु अनुमेय ( पक्ष ) में है ' । इससे हेतु केवल हेतुत्व रूप से ही प्रतिपादित होता है । इससे पक्ष रूप धर्मी में हेतु की सत्ता प्रतिपादित नहीं होती है । हेतु में साध्य का अन्वय और व्यतिरेक एवं पक्ष में हेतु का रहना ( पक्षधर्मता ) ये दोनों ही वस्तुतः हेतु में रहनेवाली साध्य के ज्ञापन की शक्ति है ।
( यह शक्ति हेतु में ज्ञात होकर ही साध्यज्ञान रूप अनुमिति को उत्पन्न करती है ) यह शक्ति ( निदर्शन वाक्य के प्रयोग के ) पहिले प्रतिज्ञा वाक्य और हेतु वाक्य इन दोनों के द्वारा ज्ञात नहीं हो पाती । इस प्रकार अज्ञात शक्ति से युक्त हेतुसामान्य ही साध्यसामान्य के साथ निदर्शन ( उदाहरण ) में देखा जाता है । इस रूप से देखे हुए हेतु का अनुमेय ( पक्ष ) में अनुसन्धान ( प्रतिदन ) जिस वाक्य के द्वारा हो वही प्रकृत में अनुसन्धान ' है ।
गूढ़ अभिप्राय यह कि जिस क्रम से बोद्धा पुरुष की जिज्ञासा उठती है , उसी क्रम से दूसरे के लिए ( प ) शब्द का प्रयोग होता है । तदनुसार ( वक्ता के द्वारा प्रयुक्त प्रतिज्ञा वाक्य से ) साध्य के प्रतिपादित हो जाने पर बोद्धा को हेतु के प्रसङ्ग में यही जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से होनी है कि ' इस साध्य की सिद्धि किस हेतु से होती है ?
' ( प्रतिज्ञा वाक्य के प्रयोग के बाद हेतु विषयक इस जिज्ञासा से पहिले ) हेतु की शक्ति के प्रसङ्ग में जिज्ञासा नहीं होती है , क्योंकि हेतु के स्वरूप का ज्ञान हेतुगत सामर्थ्य को जिज्ञासा का कारण है ( प्रतिज्ञा वाक्य से साध्यावगति के बाद ) केवल हेतु की आकाङ्क्षा से जिस हेतु वाक्य का प्रयोग होता है , उससे केवल हेतु के स्वरूप काही बोध होता है , हेतु के पक्षधर्मता रूप सामर्थ्य का नहीं । क्योंकि ( एक बार प्रयुक्त शब्द एक ही अर्थ को समझा सकता है ) , दो अर्थों को नहीं ।
साधारण रूप से हेतु का ज्ञान हो जाने पर स्वाभाविक रूप से यह जिज्ञासा होती है कि ' इससे साध्य का ज्ञान किस रीति से उत्पन्न होता है ? ' बोद्धा की इस जिज्ञासा से प्रेरित होकर ही व्याप्तिवचन ( उदाहरण ) का प्रयोग किया जाता है , जिस हेतु में साध्य की जो व्याप्ति है , उसका प्रदर्शन हो सके , क्योंकि हेतु में साध्य की व्याप्ति के ज्ञात होने पर ही साध्य की अनुमिति होती है ।
इस क्रम से हेतु में साध्य के अविनाभाव का निश्चय हो जाने पर स्वाभाविक क्रम से पक्ष में साध्य की व्याप्ति से युक्त हेतु के रहने की जिज्ञासा उठती है , जिसको मिटाने के लिए ही उदाहरणवाक्य के बाद ' उपनय ' वाक्य का प्रयोग करना पड़ता है ।
( प्र ० ) ( साध्य के साथ एक आश्रय में रहनेवाले हेतु से ही साध्य का बोध होता है ) साध्य के आश्रय से भिन्न आश्रय में रहनेवाले हेतु से नहीं , इस रीति से हेतु वाक्य के द्वारा हेतुत्व का जो प्रतिपादन होता है . उसी से हेतु में पक्षधर्मता का भी बोध हो ही जाएगा । अतः पक्षधर्मता के लिए उपनयवाक्य का प्रयोग व्यर्थ है ।
( उ ० ) इस प्रकार तो हेतु वाक्य के द्वारा हेतुत्व के अभिधान से ही व्याप्ति का लाभ भी सम्भव है , क्योंकि व्याप्ति के बिना भी हेतु में हेतुता सम्भावित नहीं है , अतः हेतु वाक्य से ही व्याप्ति का भी लाभ हो जाएगा । यतः साध्य की व्याप्ति ( अन्वय ) के बिना किसी में हेतुता नहीं आ सकती , अतः उदाहरण वाक्य का प्रयोग करना आवश्यक होता है । यदि यह कहें कि भ्रान्तिवश असाधारण हेतु ( केवल पक्ष में ही रहनेवाला हेतु जो वस्तुतः हेत्वाभास है ) भी हेतु वाक्य के द्वारा अभिहित हो सकता है ।
हेतु वाक्य से ही व्याप्ति का भी लाभ हो जाएगा , क्योंकि साध्य को व्याप्ति के बिना किसी में हेतुता नहीं आ सकती , अतः उदाहरण वाक्य का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए | यदि यह कहें कि भ्रान्तिवश असाधारण हेतु ( केवल पक्ष में ही रहनेवाले हेत्वाभास ) का भी हेतु वाक्य के द्वारा अभिधान किया जा सकता है | अतः हेतु वाक्य के द्वारा हेतु में व्याप्ति की निश्चित प्रतीति नहीं हो सकती हैं , अतः उदाहरण के द्वारा व्याप्ति का प्रदर्शन किया जाता है ।
( उ ० ) तो फिर उपनय के प्रसङ्ग में भी इसी प्रकार यह कह सकते हैं कि पक्ष में न रहनेवाली ( अपक्ष ) वस्तु में भी भ्रान्तिवश हेतुवाक्य के द्वारा हेतुत्व का प्रतिपादन हो सकता है , अतः उदाहरण में निश्चित रूप से विद्यमान हेतु को पक्ष में निश्चित रूप से समझाने के लिए उपनय का प्रयोग भी आवश्यक है । ( प्र ० ) पक्ष में अनिश्चित हेतु के बोधक उपनय वाक्य का भ्रान्ति से भी प्रयोग होता है , अतः उपनय से पक्षधर्मता की सिद्धि कैसे होगी ?
( उ ० ) जिस हेतु में व्याप्ति निश्चित नहीं है , भ्रान्तिवश उसमें व्याप्ति को समझाने के लिए भी ' व्याप्तिवचन अर्थात् उदाहरण वाक्य का प्रयोग होता है , फिर उदाहरण से ही व्याप्ति की सिद्धि किस प्रकार होगी ? ( प्र ० ) उदाहरण वाक्य केवल वाक्य होने के कारण ही व्याप्ति का बोधक नहीं हैं , क्योंकि वाक्यत्व तो सभी वाक्यों में समान रूप से है । किन्तु उदाहरण वाक्य में यतः व्याप्ति के बोधक प्रमाण रूप शब्दों का प्रयोग होता है , अतः उदाहरण वाक्य से व्याप्ति का बोध होता है ।
( उ ० ) उपनय के प्रसङ्ग में भी इसी प्रकार कहा जा सकता है कि उपनयवाक्य केवल वाक्य होने के कारण ही पक्षधर्मता का बोधक नहीं है , क्योंकि वाक्यत्व तो सभी वाक्यों में समान रूप से है , किन्तु उपनय वाक्य में जिस लिए कि हेतु में पक्षधर्मता के बोधक प्रमाण रूप शब्दों का प्रयोग होता है , इसीलिए उपनय वाक्य से पक्षधर्मता का बोध होता है ।
( प्र ० ) हेतु वाक्य से ( उपयुक्त ) हेतुत्व का बोध तब तक सम्भव नहीं है , जबतक कि उसे हेतु में पक्षधर्मता का बोधक प्रमाण न मान लिया जाय , अतः हेतु वाक्य से ही पक्षधर्मत्व का बोध हो जाएगा ( उसके लिए उपनय वाक्य के प्रयोग की आवश्यकता नहीं है ) | ( उ ० ) यही बात व्याप्ति के प्रसङ्ग में भी कही जा सकती है कि हेतु में उपयुक्त हेतुत्व का बोध तब तक सम्भव नहीं है , जबतक हेतुवाक्य को व्याप्ति का भी बोधक प्रमाण न मान लिया जाय , ऐसी स्थिति में यह भी कहा जा सकता है कि व्याप्ति के बोध के लिए उदाहरण वाक्य की आवश्यकता नहीं है ( हेतुवाक्य से ही व्याप्ति का भी बोध हो जाएगा ) यदि यह कहें कि ( प्र ० ) हेतु वाक्य ( हेतु रूप ) दूसरे अर्थ का बोक है , अतः उसमें व्याप्ति को समझाने का सामर्थ्य नहीं है , अतः व्याप्ति को समझाने के लिए उपनय वाक्य की अलग से आवश्यकता होती है ।
( उ ० )
पृ. ६१०
मनुपलब्धशक्तिकं निदर्शने साध्यधर्म सामान्येन सह दृष्टमनुमेये येन वचनेनानुसन्धीयते तदनुसन्धानम् ।
तथा च वायुः क्रियावानिति ।
अनुमेयाभावे च तस्यासत्वमुपलभ्य न च तथा वायुर्निष्क्रिय इति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सामान्य में साध्य सामान्य को साधन करने का सामर्थ्य उपलब्ध नहीं होता है । उसके लिए यह आवश्यक है कि उदाहरण में साध्यसामान्य के साथ वृत्तित्व रूप से ज्ञात हेतुसामान्य का ( केवल हेतुसामान्य का नहीं ) पक्ष में सत्ता का ज्ञापन हो । यह ज्ञापन जिस वाक्य से होता है , वही ' साधर्म्यानुसंधान ' है । ( वायु में क्रियावत्त्व हेतु से द्रव्यत्व के अनुमान के लिए यदि तीर को निदर्शन रूप से उपस्थित किया जाय , एवं उसके बाद तीर रूप निदर्शन में द्रव्यत्व के साथ ज्ञात क्रियावत्त्व का वायु रूप पक्ष में सत्ता दिखाने के लिए ) ' वायु में ( भी ) क्रिया है ' इस वाक्य का प्रयोग किया जाय तो ( उक्त अनुमान के लिए ) यह वाक्य ' साधर्म्यानुसन्धान ' होगा |
( वैधर्म्यनिदर्शन या विपक्ष में ) अनुमेय अर्थात् साध्य के अभाव के साथ ज्ञात हेतु के अभाव का पक्ष में जिस वाक्य से असत्ता प्रतिपादित हो , वही वाक्य ' वैधर्म्यानुसन्धान है । जैसे कि ( कोई वायु में क्रियावत्त्व हेतु से द्रव्यत्व के अनुमान के लिए ही इस वैधर्म्य निदर्शनवाक्य का प्रयोग करे कि ' जो द्रव्य नहीं है उसमें क्रिया भी नहीं है जैसे कि सत्ता , सत्ता में द्रव्यत्व नहीं है तो क्रिया भी नहीं है ' इस रीति से उक्त वाक्य से सत्ता में द्रव्यत्वाभाव के साथ ज्ञात ) क्रियावत्त्व के अभाव का वायु में असत्ता को प्रतिपादन करनेवाले सत्ता की तरह ' वायु क्रियाशून्य नहीं है ' इत्यादि वाक्य ' वैधर्म्यानुसन्धान हैं ' ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अस्तु तहर्युपनयः , व्यर्थं हेतुवचनम् ? न असति हेतुवचने साधनस्वरूपानवबोधात् तत्सामर्थ्यजिज्ञासाया अनुपपत्तौ उदाहरणादिवचनानां प्रवृत्त्य भावात् । तथा च न्यायभाष्यम् – ' असति हेतौ कस्य साधनभावः प्रदश्यते ' इति ।
चेति । धनुसन्धानं दर्श-
अनुसन्धानस्योदाहरणमाह – तथा यति - अनुमेयाभावे चेति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ७७ तो फिर उपनय के प्रसङ्ग में भी वही रीति अपनाइए ? उसके लिए अलग रीति अपनाना व्यर्थ है ।
( प्र ० ) ऐसी स्थिति में उपनय को ही मान लीजिए , हेतु वाक्य को ही छोड़ दीजिए ? ( उ ० ) सो सम्भव नहीं है क्योंकि यदि हेतुवाक्य न रहे , तो हेतु के स्वरूप का बोध कैसे होगा ? हेतु के स्वरूप का बोध न होने पर हेतु की सामर्थ्य के प्रसङ्ग में कोई जिज्ञासा ही न उठ सकेगी , जिससे उदाहरणादि वाक्यों की प्रवृत्तियाँ ही अनुपपन्न हो जाएंगी । जैसा न्यायभाषा में कहा गया है कि ' हेतु के न रहने पर किसका ( साध्यबोधक जनक ) सामर्थ्य ( उदाहरणादि वाक्यों से ) दिखलाया जायगा ?
पृ. ६११
अनुमेयत्वेनोद्दिष्टे चानिश्चिते च परेषां निश्चयापादनार्थं प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं प्रत्याम्नायः ।
प्रतिपाद्यत्वेनोद्दिष्टे चानिश्चिते च परेषां हेत्वादिभिरवयवैराहितशक्तीनां परिसमाप्तेन वाक्येन निश्चयापादनार्थं प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं प्रत्याम्नायः 1 तस्माद् द्रव्यमेवेति ।
न ह्येतस्मिन्नसति परेषामवयवानां समस्तानां व्यस्तानां वा तदर्थवाचकत्वमस्ति " गम्यमानार्थत्वादिति चेन्न , अति- प्रसङ्गात् ।
तथाहि प्रतिज्ञानन्तरं हेतुमात्राभिधानं कर्तव्यम् , विदुषामन्वयव्यतिरेकस्मरणात् तदर्थावगतिर्भविष्यतीति , तस्मादत्रैवार्थपरिसमाप्तिः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( प्रथमतः प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा ) अनुमेय रूप से कथित होने पर भी ( समर्थ हेतु सम्बन्ध के प्रतिपादन के बिना ) अनिश्चित साध्य को दूसरों को निश्चित रूप से समझाने के लिए फिर से प्रयुक्त ( उपयुक्त हेतु के सम्बन्ध से युक्त साध्य के बोधक ) प्रतिज्ञा वाक्य ही प्रत्याम्नाय ' ( निगमन ) है | ( विशदार्थ यह है कि सर्वप्रथम प्रयुक्त ) केवल प्रतिज्ञावाक्य से साध्य अनुमेयत्व रूप से निर्दिष्ट होने पर भी बोद्धा पुरुष के लिए अनिश्चित ( सन्दिग्ध ) ही रहता है ( क्योंकि हेतु में पक्षधर्मता और व्याप्ति के निश्चय के बिना ) पक्ष में उसके निश्चयात्मक ज्ञान को अपनी आत्मा में उत्पादन का सामर्थ्य बोद्धा पुरुष को नहीं रहता है ।
हेतु प्रभृति अवयव जब समझानेवाले पुरुष से प्रयुक्त होते हैं , तब समझनेवाले पुरुष में साध्य को पक्ष में निश्चित रूप से समझने का सामर्थ्य उत्पन्न होता है ।
इस प्रकार की शक्ति से सम्पन्न पुरुष को पक्ष में साध्य को निश्चित रूप से समझाने के लिए प्रयुक्त प्रतिज्ञावाक्य ही ' प्रत्याम्नाय ' ( निगमन ) है | जैसे कि ( क्रियावत्त्व हेतु से वायु में द्रव्यत्व की अनुमिति के लिए प्रयुक्त न्यायवाक्यों का ) ' तस्मात् वायु द्रव्य ही है ' यह वाक्य ( प्रत्याम्नाय है ) | इस ( प्रत्याम्नाय ) के न रहने पर शेष चार अवयव वाक्य परस्पर- मिलित होकर या स्वतन्त्र रूप से भी प्रत्याम्नाय के द्वारा प्रतिपाद्य अर्थ का प्रतिपादन नहीं कर सकते ( अतः उन चारों के रहते हुए भी प्रत्याम्नाय का असाधारण प्रयोजन है ।
सुतराम् इसके वैयर्थ्य की आशंका अयुक्त है )
( प्र ० ) ( यदि प्रतिज्ञावाक्य को फिर से दुहराना ही प्रत्याम्नाय है तो फिर ) ज्ञात अर्थ के ही ज्ञापक होने के कारण ( प्रत्याम्नाय की कोई आवश्यकता नहीं है ) ? ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है , यदि ऐसी बात हो तो फिर उक्त पक्ष में ( केवल प्रतिज्ञा और हेतु वाक्य को छोड़कर निदर्शन और अनुसन्धान इन दोनों के भी वैयथ्य की आपत्ति होगी ) , क्योंकि ( पूर्वपक्षवादी की रीति के अनुसार ) प्रतिज्ञावाक्य के बाद केवल हेतु वाक्य के प्रयोग से ही प्रकृत प्रयोजन की निष्पत्ति हो जाएगी , क्योंकि ( व्याप्ति से ) अभिज्ञ पुरुष को ( व्याप्ति के कारणीभूत अन्वय और व्यतिरेक का स्मरण यों ही ( बिना निदर्शनवाक्य और अनुसन्धानवाक्य के सुने ही ) हो जाएगा । ( प्रतिज्ञावाक्य के प्रयोग के बाद हेतुवाक्य का प्रयोग होने के बाद ही ) अभीष्ट अर्थ का बोध सम्पन्न हो जाएगा । अतः ( प्रतिज्ञादि चार अवयवों के प्रयोग को पूर्व पक्षी जिस दृष्टि से आवश्यक मानते हैं , उसी दृष्टि से उन्हे मानना होगा कि ( प्रत्याम्नाय पर्यन्त पाँच अवयववाक्यों के प्रयोग से ही अभीष्ट अर्थ के ज्ञान की समाप्ति हो सकती है ) ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
प्रत्याम्नायं व्याचष्टे -- अनुमेयत्वेनोद्दिष्टे इति । प्रतिज्ञावचनेन पक्षे अनुमेयत्वेन प्रतिपाद्यत्वेनोद्दिष्टे साध्यधर्मेऽनिश्विते तस्यैव धर्मिणि प्रत्याम्नायः प्रत्यावृत्त्याभिधानम् येन वचनेन क्रियते तत्प्रत्यास्नायः । अभिहितस्य पुनरभिधानं किमर्थमत आह- परेषां निश्चयापादनार्थमिति । प्रथमं साध्यमभिहितं न तु तन्निश्चितम् प्रतिज्ञामात्रेण साध्यसिद्धेरभावात् । तस्योपदशिते तो , कथिते च हेतोः सामर्थ्य , निश्चयः प्रत्याम्नायेन क्रियत इत्यस्य साफल्यम् । एतदेव दर्शयति- प्रतिपाद्यत्वेनोद्दिष्ट इत्यादिना । प्रथमं वचनमात्रेण परेषां साध्यनिश्चयो न भूतः , तेषां हेतूदाहरणोपनयेरवयवैर्हेतोस्त्ररूप्ये दशिते सञ्जातानुमेय प्रतिपत्तिसामर्थ्यानां प्रत्याम्नाये कृते परिसमाप्तेन ' परिपूर्णन ' वाक्येन ' निश्चयो जायत इत्येतदर्थं प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं प्रत्याम्नायः प्रवर्त्तते ।
तस्योदाहरणम् – तस्माद् द्रव्यमेवेति । हेत्वादिभिरवयवैरेव साध्यं निश्चीयते किं प्रत्याम्नायेन ? इत्यत आह --- नह्येतस्मिन्नसतीति । प्रतिज्ञादयो sarar : प्रत्येकं स्वार्थमात्रेण पर्यवसायिनोऽसति प्रत्याम्नाये नैकमर्थं प्रत्याययितुमीशते , स्वतन्त्रत्वात् । सति त्वेतस्मिन्नाकाङ्क्षोपगृहीताः अङ्गाङ्गिभावमुपगच्छन्तः शक्नुवन्तीति युक्तः प्रत्याम्नायः ।
पुनश्चोदयति गम्यमानार्थत्वादिति । अयमभिप्रायः स्वार्थानुमाने यैव प्रतिपत्तिसामग्री , सैव परार्थानुमानेऽपि । इयांस्तु विशेषः , स्वप्रतीतावियं स्वयमनुसन्धोयते , परप्रतीतौ च परेण बोध्यते । स्वयं च लिङ्गसामर्थ्यादर्थोऽवगम्यते , परस्यापि तदेव गमकम् । वाक्यं तु लिङ्गोपक्षेपमात्रे चरितार्थम् । प्रतिपादितं च हेत्वादिभिरवयवैः पक्षधर्मतान्वयव्यतिरेकोपपन्नं लिङ्गम् । तावतेव च तस्मादर्थावगतिसम्भवात् कृतं निगमनेनेति । समाधत्ते - नातिप्रसङ्गादिति ।
वाक्यं लिङ्गसामर्थ्यमेव बोधयति न साध्यम् । किं तु न तस्य सामर्थ्यं बहिर्व्याप्तिपक्षधर्मतामात्रम् , सत्यपि तस्मिन् प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टयोर साधकत्वात् , अपि त्वबाधितविषयत्वमसत्प्रतिपक्षत्वमपि सामर्थ्यम् । तत्सद्भावो यावत्प्रमाणेन न प्रतिपाद्यते तावत्प्रतिपक्षसम्भवाशङ्काया अनिवर्तनात् । धर्मिण्युपसंहृतेऽपि साधने साध्यप्रतीतेरयोग इति विपरीतप्रमाणाभावग्राहकं प्रमाणमुपदर्श्यते ।
तदभावे प्रतिपादिते , प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टत्वाभावे निश्चिते , प्रख्यापितसामर्थ्यं साधनं साध्यं समर्थयतीति प्रत्याम्नायोपयोगः । तत्र यद्यनुक्तमपि सामर्थ्यमर्थाद् गम्यत इत्यस्य प्रतिक्षेपः क्रियते , तदोदाहारणादिकमपि प्रतिक्षेप्तव्यम् । प्रतिज्ञानन्तरं हेत्वभिधाने कृते विदुषां स्वयमेवान्व यव्यतिरेकस्मरणादर्थावगतिसम्भवात् ।
एतदुक्तं भवति । न प्रतिपन्नं प्रति परार्थानुमानम् , वैयर्थ्यात् । न च प्रतिपाद्यस्य कियत्यङ्ग प्रतिपत्तिरस्ति , कियति नास्तीति शक्यमवगन्तुम् , परचित्तवृत्ते रुन्नेयत्वात् । नापि तच्छक्त्यनुरोधाद् वाक्यकल्पना ,
युक्ता प्रतिपत्तॄणां विचित्रशक्तिमत्त्वात् । तस्मात् परं बोधयता यावता हेतोः साधकत्वं वस्तुवृत्त्योपपद्यते तावानर्थो वचनेन प्रतिपादनीयः , न प्रतिपत्तृविशेषानुरोधेन
व्यम् ।
यथोक्तम्-
वस्तु प्रत्यभिधातव्यम् सिद्धार्थो न परान् प्रति 1
को हि विप्रतिपन्नायास्तद्बुद्धेरनुधावति ॥
उपसंहरति- तस्मादत्रैवार्थपरिसमाप्तिरिति । सति हेतोः समग्रं सामर्थ्यं प्रतीयते तस्मादत्रैव निगमने अर्थस्य साध्यस्य परिसमाप्तिः प्रतीतिपर्यवसानम् ।
यद्वैवं योजना , यस्मान्निगमनमन्तरेण विपरीतप्रमाणाभावो नावगम्यते , तस्मादेतस्मिन्नेवार्थस्य सम्यग् हेतुसामर्थ्यस्य परिसमाप्तिः पर्यवसानमिति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' तथा च ' इत्यादि वाक्य के द्वारा अनुसन्धान ( उपनय ) का उदाहरण कहा गया है । ' अनुमेयाभावे ' इस सन्दर्भ से ' वैधर्म्यानुसन्धान ' का उदाहरण दिखलाया गया है ।
' अनुमेयत्वेनोद्दिष्टे ' इत्यादि वाक्य के द्वारा ' प्रत्याम्नाय ' ( निगमन ) की व्याख्या करते हैं । प्रतिज्ञावाक्य के द्वारा ' उद्दिष्ट ' अर्थात् कहने के लिए अभीष्ट जो ' अनिश्चित ' साध्य रूप धर्म , उसी साध्य रूप धर्म का उसी पक्ष में जो ' प्रत्याम्नाय ' अर्थात् दूसरी बार कहना , जिस वाक्य के द्वारा हो उसी को प्रत्यास्नाय ' कहते हैं । ( प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा ) कहे हुए साध्य रूप धर्म को ही फिर से क्यों कहते हैं ?
इसी प्रश्न का उत्तर ' परेषां निश्चयापादनार्थम् ' इस वाक्य से दिया गया है । पहिले ( प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा ) केवल साध्य कहा जाता है , किन्तु उससे साध्य का निश्चय नहीं हो पाता , क्योंकि केवल प्रतिज्ञा वाक्य से साध्य का निश्चय ( सिद्धि ) नहीं होता है । जब हेतु वाक्य के द्वारा हेतु का प्रदर्शन हो जाता है एवं ( उदाहरण और उपनय के द्वारा ) हेतु का ( व्याप्ति और पक्षधर्मता रूप ) सामर्थ्य कथित हो जाता है , तब प्रत्थाम्नाय के द्वारा साध्य का निश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है ।
इस प्रकार प्रत्याम्नाय की सार्थकता स्पष्ट है । यही बात ' प्रतिपाद्यत्वेनोद्दिष्डे ' इत्यादि से कही गई है ।
अभिप्राय यह है कि बोद्धा को पहिले केवल ( प्रतिज्ञा ) बचन के द्वारा साध्य का निश्चय नहीं हो पाता , किन्तु हेतु , उदाहरण और उपनय इन तीन अवयवों के द्वारा ( अनुमान के प्रयोजक ) हेतु के ( पक्षसत्त्व , सपक्षसत्त्व और विपक्षासव इन ) तीनों रूपों का ज्ञान जब बोद्धा पुरुष को हो जाता है , तब उसो पुरुष को अर्थात् कथित रीति से अनुमेय के ज्ञान के सामथ्यं से युक्त हेतु के ज्ञान से युक्त पुरुष को प्रत्याम्नाय वाक्य के प्रयुक्त होने पर ' परिसमाप्त ' अर्थात् सम्पूर्ण वाक्य से निश्चयात्मक ज्ञान होता है ।
इसी निश्चयात्मक ज्ञान के लिए प्रतिज्ञा वाक्य का पुनः प्रयोग रूप प्रत्याम्नाय प्रवृत्त होता है ।
' तस्माद् द्रव्यमेव ' इस वाक्य के द्वारा प्रत्याम्नाय का उदाहरण दिखलाया गया है | हेतु प्रभृति अवयवों से ही साध्य की सिद्धि हो जाएगी , अतः प्रत्याम्नाय का कोई प्रयोजन नहीं है इसी आक्षेप का समाधान ' न तु तस्मिन्नसति ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है । अभिप्राय यह है कि प्रतिज्ञादि चारों अवयव अलग अलग स्वतन्त्र रूप से केवल अपने अपने अर्थों का ही प्रतिपादन कर सकते हैं , स्वतन्त्र होने के कारण प्रत्याम्नाय के बिना किसी एक विशिष्ट अर्थ को उनमें से कोई भी एक अवयव नहीं समझा सकता । प्रत्याम्नाय वाक्य के प्रयोग से ही प्रतिज्ञादि अवयव परस्पराकाङ्क्षा के द्वारा एक दूसरे से अङ्गाङ्गिभाव को प्राप्त कर एक विशिष्ट अर्थ विषयक बोध का सम्पादन कर सकते हैं , अतः प्रत्याम्नाय का प्रयोग आवश्यक है ।
' गम्यमानार्थत्वात् ' इस वाक्य के द्वारा फिर से आक्षेप करते हैं । आक्षेप करनेवाले का अभिप्राय है कि कारणों के जिस समुदाय से स्वार्थानुमान की उत्पत्ति होती है , परार्थानुमान भी उसी कारण समुदाय से उत्पन्न होता है । अन्तर इतना ही है कि स्वार्थानुमान वाले पुरुष को स्वयं ही उस कारण समूह का अनुसन्धान करना पड़ता है , और परार्थानुमान स्थल में उस समूह का अनुसन्धान दूसरे के द्वारा कराया जाता है ।
जिस प्रकार स्वार्थानुमान स्थल में हेतु के पक्ष सत्त्वादि सामथ्र्य के द्वारा ' अर्थावगम ' अर्थात् अनुमिति होती है , उसी प्रकार परार्थानुमान स्थल में भी हेतु के उन सामर्थ्यो सेही अनुमिति होती है । ( अवयव ) वाक्यों का तो अनुमिति में इतना ही उपयोग है कि वे ( उक्त सामर्थ्य से युक्त ) हेतु को उपस्थित कर देवें ।
अन्वय और व्यतिरेक ( व्याप्ति ) एवं पचधर्मता इन दोनों से युक्त हैतु की उपस्थिति तो हेतु उदाहरण और उपनय इन्हीं अवयवों से सम्पन्न हो जाती है , फिर कौन सी आवश्यकता अवशिष्ट रह जाती है , जिसके लिए निगमनवाक्य का प्रयोग आवश्यक होता है ? " न , अतिप्रसङ्गात् " इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस आक्षेप का समाधान करते हैं ।
( उदाहरणादि अवयव ) वाक्यों से लिङ्ग के ( व्याप्ति और पक्षधर्मता रूप ) सामर्थ्य का ही बोध होता है साध्य का नहीं , किन्तु केवल व्याप्ति और पक्षधर्मता ये ही दोनों हेतु के सामर्थ्य नहीं हैं , क्योंकि उक्त सामर्थ्य के रहने पर भी प्रकरणसम ( सत्प्रतिपक्षित ) और कालात्ययापदिष्ट ( बाधित ) हेतु से साध्य को सिद्धि नहीं होती ।
अतः हेतु में साध्यसिद्धि के उपयुक्त सामर्थ्य के लिए यह भी आवश्यक है कि पक्ष में उसके साध्य को बाध न हो , एवं पक्ष में उसके साध्य के अभाव साधक का कोई दूसरा हेतु न रहे , फलतः अबाधितविषयत्व और असत्प्रतिपक्षितत्व ये दोनों भी हेतु के सामर्थ्य हैं | प्रमाण के द्वारा जब तक इन दोनों सामर्थ्यो का प्रतिपादन नहीं होगा , तब तक प्रतिपक्ष को सम्भावना बनी ही रहेंगी । इस प्रकार ( व्याप्ति और पक्षधर्मता से युक्त हेतु का पक्ष में उपसंहार होने पर भी साध्य की ( प्रमा ) प्रतीति नहीं हो पाती है ।
अत : साध्य के विपरीत अर्थात् साध्याभाव के साधक प्रमाणों के अभाव के ग्राहक प्रमाण का भी प्रदर्शन किया जाता है । इस प्रकार विपरीत अर्थात् उक्त प्रमाणाभाव की उपपत्ति से ही हेतु में प्रकरणसमत्वाभाव ( असत्प्रतिपक्षितत्व ) और कालात्ययापदिष्टत्वाभाव ( अबाधितत्व ) इन दोनों का भी निश्चय होता है । इस रीति से हेतु में साध्य के साधक उक्त सभी सामर्थ्यो के ज्ञान से ही हेतु साध्य का साधन करता है , अतः प्रत्याम्नाय ( निगमन ) का प्रयोग आवश्यक है ।
ऐसी स्थिति में यदि प्रत्याम्नाय वाक्य के बिना कहे हुए भी हेतु के उक्त प्रकरणसमत्वाभाव और कालात्ययापदिष्टत्वाभाव रूप सामथ्यं का आक्षेप से बोध मांन कर प्रत्याम्नाय ( निगमन ) वाक्य का खण्डन करें , तो फिर ( व्याप्ति और पक्षधर्मता के बोधक ) उदाहरणादि वाक्यों का भी खण्डन करना होगा । क्योंकि प्रतिज्ञा वाक्य के बाद हेतु वाक्य का प्रयोग कर देने से ही बोद्धा को स्वयं हेतु का साध्य के साथ जो अन्वय और व्यतिरेक है , उसका स्मरण हो जाएगा , जिससे साध्य की अनुमिति हो जाएगी ।
सिद्धान्तियों के इस सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि सर्वथा व्युत्पन्न पुरुष के लिए परार्थानुमान का प्रयोग व्यर्थ होने के कारण अपेक्षित ही नहीं है । यतः दूसरे की चित्तवृत्ति को यथार्थ रूप से समझना भी बहुत कठिन है । अतः बोद्धा को ' अनुमिति के उत्पादक कितने अङ्गों का ज्ञान है एवं कितने अङ्गों का नहीं ' यह समझना भी असम्भव साही है ।
यह भी सम्भव नहीं है कि बोद्धा के सामर्थ्य के अनुसार अवयव वाक्यों का प्रयोग हो , क्योंकि बोद्धाओं के प्रत्येक व्यक्ति में अलग अलग प्रकार की शक्ति होती है । अतः वस्तुस्थिति के अनुसार हेतु की जितनी शक्तियों से साध्य का प्रतिपादन सम्भव है , उन सभी को समझाने के लिए जितने वाक्यों की आवश्यकता जान पड़े , उन सभी वाक्यों का प्रयोग सभी परार्थानुमानों में कर देना चाहिए ।
यह नहीं कि जहाँ जिस बोद्धा की जितनी शक्ति है , उसके अनुसार उन उन जगहों में अलग अलग संख्या के वाक्यों का प्रयोग किया जाय । जैसा कहा गया है कि " दूसरों को किसी वस्तु को समझाने के लिए ' सिद्धार्थवाक्य ' का ( अर्थात् जितने वाक्यों से उस अर्थ की सिद्धि की सम्भावना हो उन सभी वाक्यों का ) प्रयोग करना चाहिए ( समझनेवाले पुरुष की बुद्धि के अनुसार वाक्यों का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि ) बोद्धा की विविध बुद्धियों का अनुगमन कौन कर सकता है ? "
' तस्मादत्रैवार्थपरिसमाप्ति : ' इस वाक्य से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । यतः निगमन वाक्य के प्रयोग के होने पर ही हेतु के पूर्णसामर्थ्य की प्रतीति होती है ' तस्मादत्रैव ' अर्थात् अतः ' यहीं ' निगमनवाक्य में ही ' अर्थ ' को अर्थात् साध्य की ' परिसमाप्ति ' अर्थात् प्रतीति की अन्तिम परिणति होती है । अथवा ' तस्मात् ' इत्यादि उपसंहार वाक्य को इस प्रकार लगाना चाहिए कि यतः निगमन के बिना विपरीत प्रमाण को असत्ता की प्रतीति नहीं होती है ' तस्मात् ' निगमनवाक्य में ही ' अर्थ ' की अर्थात् सद्धेतु के सामर्थ्य की परिसमाप्ति ' अर्थात् पर्यवसान ( अन्तिम परिणति ) होता है ।
अलग अलग कहे गए प्रत्येक अवयव के स्वरूप को एक स्थान में संग्रह कर प्रश्नोत्तर रूप से ' कथम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कहते हैं । शब्द के प्रसङ्ग में नित्यत्व और अनित्यत्व इन दोनों में से ' यह नित्य है ? अथवा अनित्य ? ' इस प्रकार की एक ही आकाङ्क्षा उठती है । उसी के शमन के लिए ' अनित्यः शब्द : ' इस आकार का प्रतिज्ञावाक्य प्रयुक्त होता है , जिससे ' शब्द उस अनित्यत्व रूप धर्मं से युक्त है , जो अनिश्चित है ' इस आकार का बोध होता है । ' शब्द अनित्य ही है ' इसमें क्या हेतु है ? इस प्रकार की आकाङ्क्षा के उठने पर उसके शमन के लिए ' प्रयत्नानन्तरीयकत्वात् ' इस हेतुवाक्य का प्रयोग किया जाता है ।
पृ. ६१७
कथम् ? अनित्यः शब्द इत्यनेनानिश्चितानित्यत्वमात्र विशिष्टः शब्दः कथ्यते ।
प्रयत्नानन्तरीयकत्वादित्यनेनानित्यत्वसाधनधर्ममात्रमभिधीयते ।
' इह यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्यं दृष्टम् , यथा घटः ' इत्यनेन साध्य सामान्येन साधनसामान्यस्यानुगममात्रमुच्यते ।
नित्यम- प्रयत्नानन्तरीयकं दृष्टम् , यथाकाशमित्यनेन साध्याभावेन साधनस्यासत्त्वं प्रदर्श्यते ।
तथा च प्रयत्नानन्तरीयकः शब्दो दृष्टो न च तथाकाशवदप्रयत्नानन्तरीयकः शब्द इत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां दृष्टसामर्थ्यस्य साधनसामान्यस्य शब्देऽनुसन्धानं गम्यते ।
तस्मादनित्यः शब्द इत्यनेनानित्य एव शब्द इति प्रतिपिपादयिषितार्थ परिसमाप्तिगंम्यते : तस्मात् पञ्चावयवेनैव वाक्येन परेषां स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं क्रियत इत्येतत्परार्थानुमानं सिद्धमिति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) ( प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों की आवश्यकता ) किस प्रकार है ? ( उ ० ) ' अनित्यः शब्द : ' ( शब्द अनित्य है ) इस प्रतिज्ञावाक्य से अनिश्चित अनित्यत्व से युक्त शब्द का ही बोध होता है । प्रतिज्ञावाक्य के बाद प्रयुक्त ' प्रयत्नानन्तरीयकत्वात् ' ( यतः प्रयत्न के बाद ही शब्द की सत्ता उपलब्ध होती है ) इस हेतु वाक्य से ' शब्द में अनित्यत्व का साधक प्रयत्नान्तरीयकत्व की सत्ता है ' केवल इतना ही बोध होता है ।
( इसके बाद प्रयुक्त ) ' प्रयत्न के बाद जो सत्ता लाभ करते हैं , वे सभी अनित्य ही देखे जाते हैं जैसे कि घटादि ' इस ( साधर्म्य ) निदर्शन वाक्य सभी साध्यों के साथ सभी हेतुओं के केवल अन्वय का बोध होता है ' जितने भी नित्य पदार्थ उपलब्ध हैं , उन सभी की सत्ता बिना प्रयत्न के ही देखी जाती है जैसे कि आकाश की ' इस ( वैधर्म्य ) निदर्शन वाक्य से साध्य के अभाव के साथ हेतु के अभाव की नियमित सत्ता रूप व्यतिरेक ही प्रतिपादित होता है " शब्द घटादि की तरह प्रयत्न के बाद ही सत्ता लाभ करते दीखते हैं ' एवं ' आकाशादि की तरह बिना प्रयत्न के ही सत्ता लाभ करते नहीं दीखते ' इस अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा ( प्रयत्नानन्तरीयकत्व रूप ) हेतु में अनित्यत्व रूप साध्य के साधन का व्याप्ति रूप सामर्थ्य ज्ञात होता है ( इस प्रकार ) ज्ञान के सामर्थ्य ( व्याप्ति ) से युक्त हेतु सामान्य का शब्द रूप पक्ष में अनुसन्धान ही अनुसन्धान - वाक्य से किया जाता है ।
( अर्थात् निदर्शन के द्वारा ज्ञात व्याप्ति विशिष्ट हेतु का पक्ष के साथ सम्बन्ध रूप पक्षधर्मता ही अनुसन्धान वाक्य से प्रतिपादित होती है ) इसके बाद ' अनित्यः शब्दः ' इस प्रत्याम्नाय वाक्य से ' शब्द अनित्य ही है ' इस प्रकार प्रतिपादन के लिए इच्छित अर्थ की परिसमाप्ति होती है । अतः पाँच अवयव वाक्यों से ही कोई समझानेवाला अपने निश्चित अर्थ को दूसरे को समझा सकता है । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि पाँच अवयव वाक्य ही ' परार्थानुमान ' हैं ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
प्रत्येकमुक्तमेवावयवानां रूपमेकत्र संहृत्य प्रश्नपूर्वकं कथयति -- कथमित्यादिना । किं शब्दो नित्यः किं वा अनित्य इत्यन्यतरधर्मजिज्ञासायां प्रतिज्ञावचनेना निश्चितेनानित्यत्वमात्रेण विशिष्टः शब्दः कथ्यते ' अनित्यः ' इति । तत्र को हेतुरित्यपेक्षायां प्रयत्नानन्तरीयकत्वात् पूर्वमसतः प्रयत्नानन्तरमुपलभ्यमानत्वादिति हेतुवचनेनानित्यत्वसाधनधर्ममात्रमभिधीयते । मात्रग्रहणेन पक्षधर्मताया अन्वयव्यतिरेकयोश्चानभिधानं दर्शयति ।
अवगतसाधनस्य कथमिदं साध्यं गमयतीति साधनसामर्थ्यापेक्षायाम् ' इह जगति यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्यं दृष्टम् ' इत्युदाहरणेन साध्यसामान्येन साधनसामान्यस्यानुगममात्रं करोति , न तु स्वरूपान्तरमिति मात्रशब्दार्थः । नित्यमयत्नानन्तरीयकमिति वैधर्म्य - निदर्शनेन साध्याभावे साधनाभावः प्रदर्श्यते - यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्यमिति । दृष्टमेतत् किं तु शब्दे तदस्ति नवेति जिज्ञासायाम् - तथाच प्रयत्नानन्तरीयकः शब्द इति ।
यथा घटः प्रयत्नानन्तरीयकः , तथा शब्दोऽपि प्रयत्नानन्तरीयकः न चाकाशवदप्रयत्नानन्तरीक इत्यनुसन्धानेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां दृष्टसामर्थ्यस्य दृष्टाविनाभावस्य प्रयत्नानन्तरीकत्वस्य शब्दे धर्मिण्यनुसन्धानमुपस्थापनं गम्यते । यथा यत् कृतकं तदनुष्णं दृष्टम् , यथा घट इति सत्यपि बहिर्व्याप्तिसम्भवे कृतकस्तेजोऽवयवी अनुष्णो न भवति , प्रमाणविरोधात् ।
तथा यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्यमिति बहिर्व्याप्तिसम्भवे कदाचित् प्रयत्नानन्तरीयकः शब्दोऽनित्यो न भवेदिति विपक्षाशङ्कायां हेतोरसाधकत्वे तस्मादनित्यः शब्द इति प्रत्याम्नायः यस्मान्नित्यत्वप्रतिपादकं प्रमाणं नास्ति तस्माच्छब्दो नित्यो न भवतीत्यर्थः ।
अनेनान्यव्यावृत्तिवाचिना विपरीतप्रमाणाभावग्राहकं प्रमाणमुपस्थाप्यते , उपस्थापिते च तदभावे प्रतिपादिते विपरीतशङ्कानिवृत्तौ दर्शिताविनाभावाद्धेतोर्धमिण्युपसंहृताद् ब्याप्तिग्राहक प्रमाणबलेन निर्विचिकित्सः साध्यं प्रत्येति , नापरं किञ्चिदपेक्ष्यत इत्यनेन प्रत्याम्नायेनानित्य एव शब्द इति प्रतिपिपादयिषितस्यार्थस्य परिसमाप्तिनिश्चयो गम्यते ।
साध्यवाक्यार्थवादिनस्तु – निगमनस्येत्यमर्थवत्त्वं समर्थयन्ति -- अन्यदेव घटस्य कृतकत्वमन्यच्छब्दस्य , तत्र यदि नाम घटस्य कृतकत्वमनित्यत्वेन व्याप्तं किमेतावता शब्दगतेनापि तथा भवितव्यम् ? इति व्यामुह्यतो दर्शितयोरपि लिङ्गस्य पक्षधर्मत्वाविनाभावयोः साध्यप्रतीत्यभावे सति निगमनेन तस्मादिति सर्वनाम्ना सामान्येन प्रवृत्तव्याप्तिग्राहकं प्रमाणमनुस्मार्य शब्दे अनित्यत्वं प्रतिपाद्यते यस्माद् यत् कृतकं तदनित्यमिति सामान्येन प्रतीतं न विशेषतः , तस्मात् कृतकत्वेनानित्यः शब्दः इति । एतस्मिन् पक्षे च प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टत्वाभावः पक्षवचनेनैवोपदर्श्यते , असत्प्रतिपक्षत्वाबाधितविषयत्वयोः पक्षलक्षणत्वात् ।
अपरे तु तस्मादिति त्रैरूप्यमेव परामृशन्ति ' यस्माद् यत् कृतकं तदनित्यं दृष्टम् , यस्मात् कृतकः शब्दः , यस्माच्च प्रतिपक्षबाधयोरसम्भवस्तस्मात् कृतकत्वादनित्यः शब्दः ' इति ।
उपसंहरति - तस्मादिति । यस्मात् पञ्चस्वावयवेषु समग्रस्य साधनसामथ्र्यस्य प्रतीतौ साध्यप्रतीतिः पर्यवस्यति , नापरं किश्विदपेक्षते , तस्मात् पञ्चावयवेनैवान्यूनाधिकेन वाक्येन स्वनिश्चितस्यार्थस्य प्रतिपादनं क्रियत इति कृत्वा एतत्पश्वावयवं वाक्यं परार्थानुमानमिति सिद्धं व्यवस्थितम् ।
ये तु प्रत्यक्षमेवैकं प्रमाणमिच्छन्तो नानुमानं प्रमाणमिति वदन्ति त इदं प्रष्टव्याः , किमेकमेव प्रत्यक्षं स्वलक्षणं प्रमाणं यत्स्वरूपं प्रतीयते ? किं वा सर्वमेव ? न तावदेकमेव प्रमाणम् , अपरस्य तत्तुल्यसामग्रीकस्याप्रामाण्यकारणाभावात् । अथातीतमनागतं च पुरुषान्तरर्वात सर्वमेव प्रत्यक्षं स्वलक्षणं प्रमाणम् ? कथमिदं निश्चीयते ? प्रतीयमानप्रमाणव्यक्तिसजातीयत्वादिति चेत् ? अङ्गीकृतं स्वभावानुमानस्य प्रामाण्यम् ।
एवमनुमानप्रमाणत्वमपि विकल्प्य वाच्यम् । कश्च प्रत्यक्षं प्रमाणं प्रतिपाद्यते ? न तावत् स्वात्मैव प्रतिपादकत्वात् । परश्चेत् ? स किं प्रतिपन्नः प्रतिपाद्यते ? विप्रतिपन्नो वा ? न प्रतिपन्नः प्रतिपन्नस्य प्रतिपादनवैयर्थ्यात् । विप्रतिपन्नश्चेत् ? पुरुषान्तरगता विप्रतिपत्तिश्च न प्रत्यक्षेण गम्यते । वचनलिङ्गेनानुमीयते चेत् ? सिद्धं कार्यानुमानस्य प्रामाण्यम् ।
( न ) अनुमानं प्रमाणमिति केन प्रमाणेन साध्यते ? प्रत्यक्षं विधिविषयम् , न कस्यचित् प्रतिषेधे प्रभवति । अनुपलब्ध्या गम्यते चेत् ? तर्ह्यनुपलब्धिलिङ्गकमनुमानं स्यात् । तथा चोक्तं सौगते : -
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — प्रयत्न के बाद ही पहिले से अविद्यमान वस्तु की उपलब्धि होती है । इस हेतु वाक्य के द्वारा शब्द में अनित्यत्व के साधक ' प्रयत्नानन्तरीयकत्व ' ही केवल उपस्थित किया जाता है । इस वाक्य में ' मात्र ' शब्द का प्रयोग यह समझाने के लिए किया गया है कि इस वाक्य से हेतु का अन्वय और व्यतिरेक अर्थात् व्याप्ति और पक्षधर्मता का प्रतिपादन नहीं होता है ( केवल हेतु का ही अभिधान होता है ) । बोद्धा को जब हेतु का ज्ञान हो जाता है , तब उसे जिज्ञासा होती है कि किस रीति से यह हेतु इस साध्य की अनुमिति का उत्पादन कर सकता है ? ' हेतु के सामर्थ्य के प्रसङ्ग की इस जिज्ञासा की निवृत्ति के लिए ही ( उक्त स्थल में ) ' इह ' इत्यादि उदाहरण वाक्य का प्रयोग किया जाता है । जिनका अभिप्राय है कि ' इह ' अर्थात् संसार में प्रयत्न के बाद हो जिसकी उपलब्धि होती है , वह अर्थ अनित्य ही देखा जाता है । उदाहरण वाक्य से सभी साधनों में सभी साध्यों की केवल अनुगति अर्थात् व्याप्ति ही केवल दिखलायी जाती है , पक्षधर्मता नहीं । यही बात उक्त सन्दर्भ में ' मात्र ' शब्द के प्रयोग से दिखलायी गई है । ' नित्यमप्रयत्नानन्तरीयकम् ' इस वैधभ्यंनिदर्शन वाक्य के द्वारा साध्य के अभाव में हेतु के अभाव
७८ ( की व्याप्ति ) दिखलायी गयी है । ' यत् प्रयत्नानन्तरीयकम् , तदनित्यम् ' इस साधर्म्य निदर्शन वाक्य से " यह तो समझा कि प्रयत्न को सत्ता के अधीन जिनकी सत्ता होती है , वे सभी अनित्य होते हैं , किन्तु शब्द में यह प्रयत्नानन्तरीयकत्व है कि नहीं ? यह जानने की इच्छा तब भी बनी ही रहती है , इसी इच्छा को निवृत्ति के लिये " तथा च प्रयत्नानन्तरीयकः शब्दः " इस वाक्य का प्रयोग किया जाता है ।
अर्थात् जिस प्रकार घट में प्रयत्नानन्तरीयकत्व है , उसी प्रकार शब्द में भी प्रयत्नानन्तरीयकत्व है । एवं आकाश की तरह शब्द प्रयत्नानन्तरीयक नहीं है । इस प्रकार दोनों अनुसन्धान वाक्यों से अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा दृष्टसामर्थ्य ' अर्थात् जिस प्रयत्नानन्तरीयकत्व हेतु की व्याप्ति ज्ञात हो गयी है , उसी प्रयत्नानन्तरीयकत्व का ' शब्द ' में अर्थात् पक्ष में ' अनुसन्धान ' अर्थात् उपस्थापन होता है ।
जिस प्रकार " जो कृति से उत्पन्न होता है , वह अनुष्ण होता है " इस प्रकार की बाह्य व्याप्ति की सम्भावना इससे मिट जाती है कि तेज के अवयव कृतिजन्य होते हुए भी अनुष्ण नहीं होते क्योंकि ऐसा मानने पर प्रत्यक्ष प्रमाण का विरोध होगा ।
उसी प्रकार ' जो प्रयत्नानन्तरीयक है वह अनित्य है ' इस बाह्य व्याप्ति की सम्भावना में भी यह आपत्ति की जा सकती है कि शब्द यद्यपि प्रयत्नानन्तरीयक है , फिर भी अनित्य नहीं भी हो सकता है ' इस प्रकार शब्द में अनित्यत्व के साधक ' प्रयत्नानन्तरीयकत्व ' में असाधकत्व ( साध्य को साधन करने की अक्षमता ) की जो आपत्ति उपस्थित होती है , उसी को मिटाने के लिए ' तस्मादनित्यः शब्द : ' इस प्रत्यामाय वाक्य का प्रयोग किया जाता है ।
इसका यह अभिप्राय है कि यतः शब्द में नित्यत्व का साधक कोई प्रमाण नहीं है , अतः शब्द नित्य नहीं हो सकता । अन्यव्यावृत्ति के बोधक इस प्रत्याम्नाय वाक्य के द्वारा प्रकृत अनित्यत्व रूप साध्य के विपरीत अर्थात् नित्यत्व के साधक प्रमाण का अभाव उपस्थित किया जाता है । उसकी उपस्थिति हो जाने पर प्रकृत साध्य के विपरीत साध्य को शङ्का मिट जाती है , जिससे कथित व्याप्ति से युक्त हेतु का प्रकृत पक्ष में उपसंहार के द्वारा व्याप्ति के बोधक प्रमाण की निर्बाध उपस्थिति होती है ।
विपरीत प्रमाणाभाव को इस उपस्थिति से साध्य के विपरीत अर्थात् साध्याभाव की शङ्का भी मिट जाती है । इससे पूर्व में कथित व्याप्ति से युक्त हेतु का पक्ष में उपसंहार के कारण उस व्याप्ति रूप ज्ञापक प्रमाण से साध्य का निःशङ्क ज्ञान हो जाता है । फिर साध्यज्ञान के लिए और किसी की अपेक्षा नहीं रह जाती । इस प्रकार प्रत्याम्नाय के द्वारा ' शब्द अनित्य हो है ' इस प्रतिपाद्य अर्थ की ' परिसमाप्ति ' अर्थात् अन्तिम ज्ञान होता है ।
साध्यवाक्यार्थ वादिगण ( निगमन को साध्य का ज्ञापक माननेवाले ) निगमन को सार्थकता की पुष्टि इस प्रकार करते हैं कि ( दृष्टान्तभूत ) घट में रहनेवाला कृतकत्व और शब्द में रहनेवाला कृतकत्व दोनों भिन्न हैं ।
अतः कथित व्याप्ति और पक्षधर्मता को समझनेवाले पुरुष को भी यह भ्रान्ति हो सकती है कि घट में रहनेवाले कृतकत्व में अनित्यत्व की व्याप्ति के रहने पर भी यह निश्चित रूप से नही कहा जा सकता कि शब्द में रहनेवाले कृतकत्व में भी अनित्यत्व की व्याप्ति है हो | इस प्रकार के पुरुष को ( घट में रहनेवाले अनिश्यत्व में कृतकत्व को व्याप्ति का ज्ञान रहने पर भी ) शब्द में अनित्यत्वरूप साध्य की अनुमिति नहीं हो सकती ।
इसी के लिए तस्मात् ' इत्यादि सर्वनाम घटित निगमनवाक्य के द्वारा कृतकत्व सामान्य में अनित्यत्व सामान्य की व्याप्ति का स्मरण कराया जाता है , जिससे उसे भी शब्द में अनित्यत्व का ज्ञान हो । अभिप्राय यह है कि उक्त उदाहरण वाक्य से सामान्य रूप से ही यह प्रतोति होती है कि जितनी भी वस्तुयें कृति से उत्पन्न होती है , वे सभी अनित्य होती हैं । उदाहरण वाक्य का यह विशेष अभिप्राय ही नहीं है कि ' घट कृति से उत्पन्न होता है । अतः वही अनित्य है ' । तस्मात् शब्द भी कृतिजन्य है , वह भी अनित्य है ।
इस मत में अबाधितत्व और असत्प्रतिपक्षितत्व हेतु के ये दोनों ही सामर्थ्य पक्षवचन ( प्रतिज्ञावाक्य ) से ही प्रदर्शित होते हैं । क्योंकि ये दोनों वस्तु पक्ष के स्वरूप के ही अन्तर्गत हैं ।
दूसरे सम्प्रदाय के लोग निगमन वाक्य के तस्मात् ' इस ( सर्वनाम पद ) से हेतु की व्याप्तिपक्षधर्मता और अबाधितत्व असत्प्रतिपक्षितत्व इन तीनों रूपों का ही ग्रहण करते है , तदनुसार ' तस्मादनित्यः शब्द . ' इस निगमन वाक्य का अर्थ इस प्रकार करते हैं कि ' यस्मात् ' अर्थात् जिस लिए कि जितनी भी कृति से उत्पन्न वस्तुयें हैं , वे सभी अनित्य हो देखो जाती हैं , एवं ' यस्मात् ' अर्थात् यतः शब्द भी कृति जन्य वस्तु है , एवं ' यस्मात् अर्थात् उक्त स्थल में बाघ और सत्प्रतिपक्ष को सम्भावना नहीं है ' तस्मात् ' अर्थात् कृति जन्य होने से शब्द भी अनित्य है ।
' तस्मात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा भाष्यकार इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । ( इस उपसंहार वाक्य का अभिप्राय यह है कि ) ' यस्मात् ' अर्थात् जिस कारण कथित पाँच अवयववाक्यों से ही हेतु के सभी सामथ्र्य की प्रतीति होती है , और उसके बाद ही साध्य की अनुमिति रूप प्रतीति उपपन्न हो जाती है और किसी की अपेक्षा उसे नहीं रह जाती , अत : ' पञ्चावयवेनैव ' अर्थात् न उन पाँच अवयव वाक्यों से अधिक वाक्य की अपेक्षा रहती है , और न उनसे एक की भी कमी से काम ही चलता है , फलतः उन्हीं पञ्चावयव वाक्यों से वक्ता अपने पूर्व निश्चित अर्थ का प्रतिपादन करता है , इस रीति से यह ' सिद्ध ' हुआ अर्थात् व्यवस्थित हुआ कि ये पाँच अवयव वाक्य ही ' परार्थानुमान ' हैं ।
जो सम्प्रदाय एक मात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने के अभिप्राय से कहते हैं कि ' अनुमान प्रमाण नही है ' उनसे पूछना चाहिए कि ' केवल स्ववृत्ति एक वही प्रत्यक्ष व्यक्ति प्रमाण है ? जिससे कि उसके विषय के स्वरूप का बोध होता है , ( अर्थात् वर्त्तमान विषय को ग्रहण करनेवाला स्वगत ज्ञान ही प्रत्यक्ष है ) अथवा जितने भी ( वर्त्तमान , भूत और भविष्य ) विषयों के ज्ञान होते हैं , वे सभी प्रमाण हैं १ ऐसा कहना तो सम्भव नहीं है कि एक ( वर्त्तमान विषय का ग्राहक ) ही प्रकार का ज्ञान प्रत्यक्ष है , क्योंकि समान कारणों से उत्पन्न ज्ञानों में से एक को ही प्रमाण मानकर और सभी को अप्रमाण मानने का कोई हेतु नहीं है । यदि भूत और भविष्य विषयक प्रत्यक्ष अथवा दूसरे पुरुष में रहनेवाले प्रत्यक्ष ये सभी प्रमाण हैं , तो फिर यह पूछता है कि यह कैसे निश्चय करते हैं कि ' वे सब भी प्रमाण हैं यदि यह कहें कि ( प्र ० ) अपने द्वारा ज्ञात प्रत्यक्षप्रमाण का सादृश्य उन ज्ञानों में देखा जाता है , अत : उन्हें भी प्रत्यक्ष प्रमाण समझते हैं ' ( उ ० ) तो फिर आपने भी स्वभावलिङ्गक अनुमान को मान ही लेते हैं ।
इसी प्रकार अनुमान प्रमाण के प्रसङ्ग में भी इस प्रकार के विकल्पों को उपस्थित कर पूछना चाहिए कि ( जिन अनुमानों को आप प्रत्यक्ष मानते हैं ) उन प्रत्यक्षों के द्वारा किसे समझाना है ? प्रतिपादन करनेवाला अपने को तो समझा नहीं सकता , क्योंकि वह स्वयं ही प्रतिपादक है । ( प्रतिपाद्य और प्रतिपादक कभी एक नहीं हो सकता ) यदि दूसरे को समझाना है तो इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि वह समझनेवाला प्रमाज्ञान से युक्त है ? अथवा भ्रमात्मकज्ञान से युक्त है ? प्रमाज्ञान से युक्त पुरुष को समझाना ही व्यर्थ है , क्योंकि वह स्वयं प्रतिपाद्य विषय को अच्छी तरह जानता है । अतः उसे समझाने का प्रयास ही व्यर्थ है । यदि उसे भ्रमात्मक ज्ञान से युक्त मानते हैं ( तो फिर इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि उस पुरुष में रहनेवाले भ्रम को आपने कैसे जाना ? क्योंकि दूसरे पुरुष में रहनेवाले भ्रम का तो प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है । मदि उस पुरुष के वचन से उसके भ्रम को समझते हैं ? तो फिर कार्य हेतुक अनुमान का प्रामाण्य ही सिद्ध हो जाता है ।
' अनुमान प्रमाण नहीं है ' यह आप किस प्रमाण से सिद्ध करना चाहते हैं ? प्रत्यक्ष प्रमाण तो केवल भाव विषयक है , उससे किसी का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता ! यदि अनुपलब्धि के द्वारा अनुमान के प्रामाण्य का प्रतिषेध करते हैं , तो फिर अनुपलब्धि लिङ्गक अनुमान को मानना ही पड़ेगा | जैसा कि ' प्रमाणेतर ' इत्यादि वार्तिक के द्वारा बौद्धों ने कहा है-
पृ. ६२३
विशेषदर्शन जमवधारणज्ञानं संशय विरोधी निर्णयः ।
एतदेव प्रत्यक्षमनुमानं वा ।
यद् विशेषदर्शनात् संशयविरोध्युत्पद्यते ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — विशेष विषयक ज्ञान उत्पन्न एवं संशय का विरोधी अवधारण ' रूप ज्ञान ही ' निर्णय ' है । प्रत्यक्ष और अनुमिति दोनों निर्णय रूप ही
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
प्रमाणेतर सामान्य स्थितेरन्यधियो गतेः ।
प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिषेधाच्च कस्यचित् । इति ।
प्रमाणतदभावसामान्यव्यवस्थापनात् , परबुद्धेरधिगमात् कस्यचिदर्थस्य प्रतिषेधाच्च प्रत्यक्षात् प्रमाणान्तरस्य स्वभावकार्यानुपलब्धिलिङ्गस्यानुमानस्य सद्भाव इति वार्त्तिकार्थ इति ।
निर्णयं केचित् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां प्रमाणान्तरमिच्छन्ति , तान् प्रत्याहविशेषदर्शनजमित्यादि । यत्र विशेषानुपलम्भात् संशयः संजातः , तत्र विशेष - दर्शनाज्जायमानमवधारणज्ञानं निर्णयः । स च संशयविरोधी , तस्मिन्नुपजायमाने संशयस्योच्छेदात् । यथाह मण्डनो विभ्रमविवेके-
निश्चिते न खलु स्थाणावूर्ध्वत्वेन विशेरते । इति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' प्रत्यक्ष ही प्रमाण है , अनुमानादि नहीं ' इस प्रकार प्रत्यक्ष के प्रामाण्य की सत्ता से , एवं अनुमानादि के प्रामाण्य की असत्ता से दूसरे पुरुष में रहनेवाली बुद्धियों को समझने से एवं घटादि किसी भी विषय के प्रतिषेध से यह समझते हैं कि ' प्रत्यक्ष से भिन्न और भी प्रमाण हैं ' ।
उक्त वार्तिक का अभिप्राय है कि प्रमाण और प्रमाणाभाव की व्यवस्था से , दूसरे पुरुष की बुद्धि को समझने से एवं किसी वस्तु के प्रतिषेध से समझते हैं कि प्रत्यक्ष से भिन्न कोई दूसरा प्रमाण अर्थात् स्वभावलिङ्गक , कार्यलिङ्गक , एवं अनुपलब्धि - लिङ्गक अनुमान प्रमाण भी अवश्य है ।
किसी सम्प्रदाय के लोग प्रत्यक्ष और अनुमान से भिन्न एक ' निर्णय ' नाम का अलग प्रमाण मानने की अभिलाषा रखते हैं , उन्हीं लोगों के मत का खण्डन करने के लिए विशेषदर्शनजम् ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । जहाँ असाधारण धर्म की अनुपलब्धि से संशय हो चुका है , वहाँ विशेषधर्म ( अपाधारण धर्म ) की उपलब्धि से उत्पन्न होनेवाला अवधारणात्मक ज्ञान ही ' निर्णय ' है । यह सशय का प्रतिबन्धक है , क्योंकि इसके उत्पन्न होते ही संशय छूट जाता है । जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने विभ्रमविवेक नाम के ग्रन्थ में कहा है कि - ( पुरोवत्ति पदार्थ का ) जब ' यह स्थाणु है ' इस आकार से निश्चय हो जाता है , तब फिर उसकी उँचाई ( साधार धर्म के ) ज्ञान से " यह स्थाणु है ? या पुरुष इस आकार का संशय किसी को भी नहीं होता । ( उक्त आधे श्लोक में प्रयुक्त ) ' विशेरते ' इस पद का अर्थ है ' संशेरते ' अर्थात् संशय का होना ।
पृ. ६२४
स प्रत्यक्षनिर्णयः ।
यथा स्थाणुपुरुषयोरुतामात्र सादृश्यालोचनाद् विशेषेष्व प्रत्यक्षेषूभय वि शेषानुस्मरणात् , किमयं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति संशोत्पत्तौ शिरःपाण्यादिदर्शनात् पुरुष एवायमित्यवधारणज्ञानं प्रत्यक्ष निर्णयः ।
विषाणमात्र दर्शनाद् गौर्गवयो वेति संशयोत्पत्तौ सास्नामात्रदर्शनाद् गौरवायमित्यवधारणज्ञानमनुमाननिर्णय इति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — होते हैं । अत : ( १ ) प्रत्यक्ष निर्णय और ( २ ) अनुमाननिर्णय भेद से निर्णय दो प्रकार का है । ( १ ) ( धर्मी के असाधारण धर्म रूप ) विशेष के प्रत्यक्ष से जो संशय का विरोधी ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ' प्रत्यक्षनिर्णय ' कहते हैं । जैसे कि स्थाणु और पुरुष दोनों में साधारण रूप से रहनेवाली उच्चता ( उँचाई ) रूप सादृश्य के आलोचन ( साधारण ) ज्ञान से एवं स्थाणु और पुरुष दोनों के असाधारण धर्मों के ज्ञात न रहने के कारण केवल उन दोनों के असाधारणधर्म रूप विशेषों के स्मरण से यह स्थाणु है ? या पुरुष ? ' इस आकार के संशय की उत्पत्ति होती है इसके बाद ( केवल पुरुष में ही रहनेवाले शिर पैर प्रभृति ) पुरुष के असाधारण धर्मों के देखने से यह पुरुष ही है ' इस आकार का जो निश्चय रूप ज्ञान उत्पन्न होता है वही ' प्रत्यक्ष निर्णय ' है । ( २ ) केवल सींग के देखने के कारण यह संशय होता है कि यह गो है या गवय ? ' ( इसके बाद केवल गाय में ही रहनेवाली ) सास्ना के देखने से जो " यह गाय ही है ' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है वही ' अनुमाननिर्णय ' है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
संशेरत इत्यर्थः । यद्यपि सर्वमेव निश्चयात्मकं ज्ञानं निर्णय :, तथापि संशयोत्तरकालभावित्वेन प्रसिद्धिप्राबल्यात् संशयविरोधीत्युक्तम् - - स्वोक्तं संग्रहवाक्यं विवृण्वन्निर्णस्य प्रत्यक्षानुमानयोरन्तर्भावं दर्शयति – एतदेवेत्यादि । प्रत्यक्षविषये यदवधारणात्मकं ज्ञानं स प्रत्वक्षनिर्णयः । यच्चानुमानविषये sa धारणज्ञानं सोऽनुमाननिर्णय इति उपरितनेन ग्रन्थसन्दर्भेण कथयति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — यद्यपि सभी प्रकार के निश्चयात्मक ज्ञान निर्णय हैं फिर भी संशय के बाद होनेवाले निश्चयात्मक ज्ञान में ही ' निर्णय ' शब्द का अधिकतर प्रयोग होता है , अतः निर्णय के लक्षणवाक्य में ' संशयविरोधि ' पद का प्रयोग किया गया है | ' एतदेव ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अपने - हो संक्षिप्त लक्षण वाक्य की व्याख्या करते हुए भाष्यकार ने ' निर्णय ' का प्रत्यक्ष और अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया है । ऊपर कहे हुए सन्दर्भ का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का अवधारणात्मक ज्ञान ' प्रत्यक्ष निर्णय ' है , एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का जो अवधारणात्मक ज्ञान वह ' अनुमाननिर्णय ' है ।
In English
Explanation of the Five Members of Inference
This text explains the Prashastapadabhashya commentary regarding the five members of a syllogism. It focuses on defining the 'pratijna' (proposition) and explaining why it is a necessary step to introduce the subject before applying the reason.
This article answers
- What are the five members of inference in prashastapadabhashya?
- Definition of pratijna in nyaya logic?
- Why is the proposition necessary for inference?
- Difference between paksha and anumeya?