व्याख्या · प्रशस्तपादभाष्य
प्रशस्तपादभाष्य — गुण: अनुमान
18 मूल पद्य
अनुमाननिरूपणम्
पृ. ४७६
' लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — हेतु के ज्ञान से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान ही ' लैङ्गिक ' ज्ञान ( अनुमिति ) है |
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् । दर्शनशब्द उपलब्धिवचनो न चाक्षुषप्रतीतिवचनः अनुमितानुमानस्यापि सम्भवात् । लिङ्गदर्शनालिङ्गविषयः संस्कारो जायते किन्त्वस्य न परिग्रहः , बुद्धघधिकारेण विशेषितत्वात् । संशब्देन सम्यगर्थवाचिना संशयविपर्ययस्मृतीनां व्युदासः । लिङ्गस्य दर्शनाज्ज्ञानात् सम्यग् जायमानं लैङ्गिकमिति वाक्यार्थः । तस्य च ज्ञानस्य सम्यग्जातीयस्य यथार्थपरिच्छेदकतयोत्पाद :, सर्वधियां यथार्थपरिच्छेदकत्वस्य कुलधर्मत्वात् । संशयविपर्ययौ तावद्यथा सावर्थो न तथा परिच्छिन्तः । स्मृतिरप्यर्थपरिच्छेदिका न भवति , अनुभवपारतन्त्र्यादिति वक्ष्यामः । अन्ये तु विद्याधिकारेण संशय विपर्ययौ व्युदयन्ति । अनर्थजायाश्च स्मृतेव्युदासार्थं तद्धि द्रव्यादिषु पदार्थेषूत्पद्यते ' इत्यावर्त्तयन्ति । तदयुक्तम् , वाक्यलभ्येऽर्थे प्रकरणस्यानपेक्षणात् , अनर्थजत्वात् स्मृतिव्युदासे चातीतानागतविषयस्य लैङ्गिकज्ञानस्यापि व्युदासप्रसङ्गात् ।
लिङ्गस्य लक्षणमाह - लिङ्गं पुनरिति । अनुमेय : प्रतिपिपादयिषितधर्मविशिष्टो धर्मी , तेन यत् सम्बद्धं तस्मिन् वर्तत इत्यर्थः । यथा विपक्षैकदेशे वर्तमानमपि च लिङ्ग विपक्षवृत्ति भवति , एवं पक्षैकदेशे वर्तमानमनुमेयेन सम्बद्धमेव । ततश्चतुविधाः परमाणवो s नित्या गन्धवत्त्वादित्यस्यापि भागासिद्धस्य हेतुत्वं प्राप्नोतीति चेत् न , वैधर्म्यात् । यः साध्यसाधनव्यावृत्तिविषयोऽर्थः स विपक्षः । साध्यसाधनयो-
वृत्तिर्न समुदितेभ्यः , किन्तु प्रत्येकमेव सभ्भवतीति प्रत्येकमेव विपक्षता । पक्षस्तु स भवति यत्र वादिना साध्यो धर्मः प्रतिपादयितुमिष्यते । न च वादिना पार्थिवपरमाणावेकस्मिन्ननित्यत्वं प्रतिपादयितुमिष्यते , किन्तु चतुर्ष्वपि परमाविति समुदितानामेव पक्षत्वे स्थितेऽसिद्धवद् भागासिद्धस्यापि व्युदासः , अनुमेयसम्बन्धाभावात् । प्रसिद्धं च तदन्वित इति । तदिति योग्यत्वात् साध्यधर्मः परामृश्यते । तदन्वि साध्यधर्मान्विते सपक्षे प्रसिद्धं परिज्ञातमिति विरुद्धासाधारणयोर्व्यवच्छेदः । तदभावे च नास्त्येवेति । अत्रापि तदिति साध्यधर्मस्यैव परामर्शः , तस्य साध्यधर्मस्याभावे नास्त्येव न पुनरेकदेशेऽस्त्यपीत्यनंकान्तिकव्यवच्छेदः । तल्लिङ्गमनुमापकम् अनुमेयस्य ज्ञापकम् ।
लिङ्गं व्याख्याय लिङ्गाभासं व्याचष्टे - विपरीतमतो यत् स्यादिति । अत उक्तलक्षणाल्लिङ्गाद् यदेकेन द्वितयेन लिङ्गलक्षणेन विपरीतं रहितं विरुद्धसिर्द्ध सन्दिग्धम् , तत् कश्यपात्मजोऽलिङ्गमनुमेयाप्रतिपादकमब्रवीत् । असिद्धमनुमेये नास्ति , अनैकान्तिकं विपक्षादव्यावृत्तमित्यनयोरेकेन लिङ्गलक्षणेन विपरीतत्वम् । विरुद्धं सपक्षे नास्ति , विपक्षादव्यावृत्तमिति तस्य द्वितयेन लिङ्गलक्षणेन रहितत्वम् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि ( घटादि ) अर्थों का ' इससे सुख मिलता है ' इस आकार का जो ( सुखसाधनत्व ) का ज्ञान होता है , वही गुणदर्शन है , एवं ' उपादेयत्व का ज्ञान ' भी वही है । एवं ( कण्टकादि ) विषयों का जो ' इससे दुःख मिलता है , इस आकार का ( दुःखसाधनत्व ) का ज्ञान होता है , वही ' दोषदर्शन ' है , एवं ' हेयत्वज्ञान ' भी वही है । हवामें उड़ते हुए पत्ते प्रभृति ) विषयों में जो ' इससे न सुख ही मिलेगा न दुःख ही ' इस आकार का ज्ञान होता है , उसी को ' माध्यस्थ्य दर्शन ' कहते हैं । ( उपादेयत्वादि के ) ये सभी ज्ञान चूंकि अपने विषयों को अपरोक्षरूप से ही प्रकाशित करते हैं और इनकी उत्पत्ति में ( अनुमिति के प्रयोजक ) लिङ्गदर्शन एवं व्याप्ति स्मरणादि की भी अपेक्षा नहीं होती है , अतः ये ( सविकल्पक ) प्रत्यक्षरूप प्रत्यक्ष प्रमाण के ही फल हैं । इतना अवश्य है कि इन ज्ञानों के उत्पन्न होने में अभ्यास जनित पटुता भी अपेक्षित होती है , अतः वह भी उन प्रमितियों का सहकारिकारण है ।
लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' दर्शन ' शब्द का अर्थ केवल चक्षु से उत्पन्न ज्ञान ही नहीं है , किन्तु सभी ज्ञान या उपलब्धि उसके अर्थ हैं , क्योंकि अनुमान के द्वारा ज्ञात हेतु से भी अनुमान होता है ( अर्थात् अनुमितानुमान भी होता है ) ।
यद्यपि ( कथित ) लिङ्गदर्शन से लिङ्गविषयक संस्कार भी उत्पन्न होता है , ( जिससे लिङ्ग की स्मृति उत्पन्न होती है , अतः उसमें अनुमिति का लक्षण अतिव्याप्त हो जाएगा , किन्तु यह बुद्धि ( अनुभव ) का प्रकरण है , अतः ' प्रकरण ' के द्वारा ' लिङ्गदर्शनात् संजायमानम् ' के बाद ' ज्ञानम् ' पद का अध्याहार स्वभावतः प्राप्त है । ( अतः संस्कार को ज्ञानरूप न होने के कारण अतिव्याप्ति दोष नहीं है ) ।
( ' सञ्जायमानम् ' इस पद में प्रयुक्त ) ' सम् ' शब्द ' सम्यक् ' अर्थ में प्रयुक्त है , ( अतः ' लिङ्गदर्शन से उत्पन्न ' सम्यक् ' ज्ञान ही अनुमान है ' ऐसा लक्षण निष्पन्न होने के कारण ) संशय , विपर्यय एवं स्मृति इन तीनों की अनुमान से व्यावृत्ति हो जाती है ।
क्योंकि ये ( ज्ञान होते हुए भी ) सम्यग् ज्ञान अर्थात् यथार्थ ज्ञान नही हैं | सभी सम्यग् ज्ञानों का यह स्वभाव है कि अपने विषयों को उनके यथार्थ स्वरूप में उपस्थित करें , चूँकि अपने विषयों को यथार्थरूप में उपस्थित करना सभी ( यथार्थ ) ज्ञानों का मौलिक धर्म है । संशय और विपर्यय तो अपने विषयों को उसी रूप में उपस्थित नहीं करते जो कि उनका यथार्थ स्वरूप है । स्मृति के प्रसङ्ग में हम आगे कहेंगे कि स्मृति चूँकि अनुभव के अधीन है अतः वह अपने विषयों की परिच्छेदिका नहीं है ।
( पूर्वानुभव ही स्मृति के विषयों का परिच्छेदक है ) । कोई कहते हैं कि यह विद्या ( यथार्थ ज्ञान ) का प्रकरण है , अतः प्रकरण के बल से बुद्धि विद्या रूप ही होगी , इसी से संशय और विपर्यय इन दोनों की अनुमिति से व्यावृत्ति हो जाएगी । स्मृति में अनुमिति लक्षण की अतिव्याप्ति के लिए वे लोग ( प्रत्यक्ष प्रकरण में पठित ) ' तद्धि द्रव्यादिषु पदार्थेषूत्पद्यते ' इस वाक्य की यहाँ आवृत्ति करते हैं । अतः स्मृति अर्थजनित न होने के कारण अनुमिति के अन्तर्गत नहीं आती ।
किन्तु ये ( दोनों ही बातें ) असङ्गत हैं , क्योंकि वाक्य के द्वारा जिस अर्थ का लाभ हो सकता है , उसे प्रकरण की अपेक्षा नहीं होती । एवं अर्थजनित न होने के कारण यदि स्मृति की व्यावृत्ति करें , तो फिर भूत और - भविष्य विषयक अनुमान की भी अनुमिति से व्यावृत्ति हो जायगी ।
१- अभिप्राय यह है कि संशय और विपर्यय में अनुमिति लक्षण की अतिव्याप्ति हटानी है । ' सञ्जायमानम् ' पद घटक ' सम ' शब्द को सम्यगर्थक मान लेने से भी उक्त
पृ. ४७८
लिङ्ग पुनः- यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्विते ।
तदभावे च नास्त्येव तल्लिङ्गमनुमापकम् ॥
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो अनुमिति में प्रधानरूप से विषय होनेवाली वस्तु के साथ अर्थात् पक्ष के साथ सम्बद्ध हो ( इसे पक्षसत्त्व कहते हैं ) , एवं जो साध्यरूप धर्म से युक्त ( दृष्टान्त ) में यथार्थरूप से ज्ञात हो ( इसे सपक्षसत्त्व कहते हैं ) , साध्य का न रहना जिसमें निश्चित
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' लिङ्ग पुनः ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा ' लिङ्ग ' का लक्षण कहा गया है । ( ' यदनुमेयेन ' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ) ' अनुमेय ' शब्द का अर्थ वह ' धर्मी ' है जिसमें ( अनुमान प्रयोग करनेवाले को अपने अभीष्ट वस्तु अर्थात् साध्यरूप ) धर्म का प्रतिपादन इष्ट हो ।
( फलत : प्रकृत में ' अनुमेय ' शब्द से पक्ष अभिप्रेत है ) ' तेन यत् सम्बद्धम् ' उस ( पक्ष ) में जो विद्यमान रहे ( वह हेतु है ) | ( प्र ० ) जिस प्रकार विपक्षीभूत किसी एक वस्तु में यदि ( हेतु ) रहता है तो वह हेतु ' विपक्षवृत्ति ' ( हेत्वाभास ) हो जाता है , उसी प्रकार किसी एक पक्ष में भी यदि हेतु की सत्ता है , तो फिर वह हेतु ' अनुमेय सम्बद्ध ' ( पक्षवृत्ति ) होगा ।
( इस वस्तु स्थिति के अनुसार यदि कोई इस अनुमान का प्रयोग करे कि ) चारों प्रकार के ( अर्थात् पृथिवी , जल , तेज और वायु इन चारों द्रव्यों के ) परमाणु नित्य हैं , क्योंकि उन सभी में गन्ध है , तो फिर इस अनुमान का उक्त गन्ध दोनों अतिव्याप्तियाँ हट सकती हैं । एवं अनुमिति चूँकि विद्यारूप सम्यग्ज्ञान के प्रकरण में पठित है , अतः लिङ्गदर्शन से उत्पन्न ज्ञान में सम्यक्त्व का लाभ प्रकरण से भी हो सकता है ।
फलतः अनुमिति लक्षणघटक ज्ञान में सम्यक्त्व विशेषण देने से ही दोनों मतों में संशय और विपर्यय में अतिव्याप्ति का वारण हो जाता है । यह सम्यक्त्व प्रथम पक्ष में वाक्य लभ्य है , दूसरे पक्ष में प्रकरण लभ्य है । प्रकरण की अपेक्षा वाक्य बलवान् है । ( देखिए बलाबलाधिकरण ) । अतः प्रकरणापेक्षी द्वितीय पक्ष असङ्गत है ।
हेतु भी पक्षवृत्ति होगा , क्योंकि उन चारों प्रकार के परमाणुओं में से एक पार्थिव परमाणु में वह विद्यमान है , किन्तु वह हेतु तो भागासिद्ध हेत्वाभास है , ( अतः ' हेतु ' का वह ' अनुमेयसम्बद्धत्व ' रूप लक्षण ठीक नहीं है ) | ( उ ० ) जिसमें साध्य और हेतु दोनों का अभाव निश्चित हो वही ' विपक्ष ' है ।
यह विपक्षता ( विपक्षतावच्छेदकाश्रयीभूत ) प्रत्येक विपक्ष व्यक्ति में है ( विपक्षतावच्छेदकाश्रयीभूत ) सभी विपक्ष व्यक्ति समूह में ही नहीं , ( अतः किसी भी विपक्ष व्यक्ति में रहनेवाला हेतु विपक्षवृत्ति होने के कारण भागासिद्ध हेत्वाभास होता है ) ' पक्ष ' के प्रसङ्ग में सो बात नहीं है , क्योंकि पक्ष वही है जिसमें वादी को साध्य सिद्धि की इच्छा हो , प्रकृत में वादी की यह इच्छा नहीं है कि केवल पार्थिव परमाणु में ही अनित्यत्व की सिद्धि करे , किन्तु वादो की यह इच्छा है कि चारों प्रकार के परमाणुओं में ही अनित्यत्व की सिद्धि करे ।
तदनुसार उक्त चारों परमाणुओं का समूह हो पक्ष है , तदन्तर्गत एक पार्थिव परमाणु नहीं , अत : जिस प्रकार पक्षाभिमत सभी वस्तुओं में हेतु के न रहने से हेतु ( हेतु नहीं रह जाता स्वरूपासिद्ध या ) असिद्ध नाम का हेत्वाभास हो जाता है . उसी प्रकार ( पक्षान्तर्गत पार्थिव परमाणुरूप पक्ष में गन्धरूप हेतु के रहने पर भी पक्षान्तर्गत जलादि के तीनों परमाणुओं में गन्ध के न रहने से वह हेतु न होकर ) भागासिद्ध नाम का हेत्वाभास ही होगा , क्योंकि उसमें पक्षान्तर्गत जलादि परमाणुओं का सम्बन्ध न रहने के कारण पक्षान्तर्गत ही पार्थिव परमाणु का सम्बन्ध रहते हुए भी अनुमेय स्वरूव चारों परमाणुओं के साथ सम्बन्ध नहीं है ।
इस प्रकार हेतु के लक्षण में ' अनुमेयेन सम्बद्धम् ' इस विशेषण से स्पष्ट ही पक्ष में कहीं भी न रहनेवाला हेतु स्वरूपासिद्ध या भागासिद्ध हेत्वाभास होगा ।
' प्रसिद्धच तदविते ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' तत् ' शब्द से साध्यरूप धर्म ही गृहीत होता है , क्योंकि उसी का ग्रहण प्रकृत में उपयोगी है । ' तदन्विते ' अर्थात् साध्यरूप धर्म से युक्त अर्थात् ' पक्ष ' में ' प्रसिद्ध ' अर्थात् अच्छी तरह से ज्ञात ( होना हेतु के लिए आवश्यक है ) | ( हेतु के इस सपक्षवृत्तित्व रूप लक्षण से ) विरुद्ध और असाधारण नाम के हेत्वाभासों में हेतुत्व का व्यवच्छेद होता है , अर्थात् उनमें हेतु लक्षण की अतिव्याप्त नहीं हो पाती ।
पृ. ४८०
विपरीतमतो यत् स्यादेकेन द्वितयेन वा ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यदनुमेयेनार्थेन देशविशेषे कालविशेषे बा सहचरितम हो , ऐसे आश्रयों में जो कदापि न रहे ( इसे विपक्षासत्त्व कहते हैं ) , वही ( पक्षसत्त्व , सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व से युक्त ) हेतु साध्य का ज्ञापक है । ( सपक्षसत्त्वादि इन तीन ) लक्षणों में से एक या दो लक्षणों से भी रहित हेतु को काश्यप ने असिद्ध , विरुद्ध और सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास कहा है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
यदनुमेयेन सम्बद्धमिति श्लोकार्थं विवृणोति - यदनुमेयेनेति । अनुमेयेनार्थेन साध्यधर्मिणा सह यद्देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितं सम्बद्धम् , अनु-
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' तदभावे च नास्त्येव ' इस वाक्य के ' तत् ' शब्द से साध्यरूप धर्म का ही ग्रहण करना चाहिए | ( तदनुसार ) इस वाक्य का यह अर्थ है कि साध्यरूप धर्म का अर्थात् साध्य का अभाव जिन आश्रयों में रहे उन सभी आश्रयों में जो कदापि न रहे वही ( सपक्षवृत्ति और पक्षवृत्ति ) ' हेतु ' है । उक्त वाक्य में प्रयुक्त ' एवं ' शब्द के द्वारा यह सूचित किया गया है कि ऐसे किसी भी आश्रय में हेतु को न रहना चाहिए जिसमें कि साध्य न रहे । इस प्रकार इस विशेषण के द्वारा अनैकान्तिक नाम के हेत्वाभास में हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण होता हैं । ' तल्लिङ्गमनुमापकम् ' ( अर्थात् उक्त पक्षवृत्तित्व , सपक्षवृत्तित्व और विपक्षावृत्तित्व इन ) तीनों लक्षणों से युक्त हेतु ही साध्य का ज्ञापक है ।
लिङ्ग के लक्षण के कहने के बाद अब ' विपरीतमतो यत् स्यात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा लिङ्गाभास ( हेत्वाभास ) का लक्षण कहते हैं । ' अत . ' अर्थात् हेतु के कथित तीनों लक्षणों में से हेतु के एक या दो लक्षणों से ' विपरीत ' अर्थात् शून्य हेतु को ' काश्यप ' ने अर्थात् कश्यप के पुत्र ने क्रमशः विरुद्ध , असिद्ध और सन्दिग्ध नाम का ' अलिङ्ग ' ( हेत्वाभास ) कहा है , क्योंकि ये अनुमेय के ज्ञापक नहीं हैं । इनमें ' असिद्ध ' नाम का हेत्वाभास अनुमेय ( पक्ष ) में रहीं रहता , ( अर्थात् उसमें पक्षवृत्तित्व रूप एक धर्म का अभाव है ) , ' अनैकान्तिक ' नाम का हेत्वाभास विपक्ष से अव्यावृत्त है , अर्थात् विपक्षावृत्तित्वरूप हेतु के एक ही लक्षण से रहित होने के कारण हेत्वाभास है ( इस प्रकार असिद्ध और अनैकान्तिक ये दोनों हेतु के एक ही लक्षण से रहित होने के कारण हेत्वाभास है ) । विरुद्ध नाम का हेत्वाभास सपक्ष में नहीं रहता और विपक्ष में रहता है , अतः विरुद्ध सपक्षवृत्तित्व और विपक्षव्यावृत्तत्व हेतु के इन दोनों लक्षणों से रहित हेत्वाभास है ।
पृ. ४८०
विरुद्धासिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत् ॥
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( लिङ्ग के लक्षण बोधक कथित पहिले श्लोक का यह अभिप्राय है कि ) जो साध्य के साथ किसी समयविशेष में एवं देशविशेष में सम्बद्ध
पृ. ४८१
नुमेयधर्मान्विते चान्यत्र सर्वस्मिनेकदेशे वा प्रसिद्धमनुमेयविपरीते च सर्वस्मिन् प्रमाणतोऽसदेव , तदप्रसिद्धार्थस्यानुमापकं लिङ्गं भवतीति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रहे , अनुमेयरूप धर्म के किसी ( निश्चित ) अधिकरण में या सभी अधिकरणों में जिसकी सत्ता प्रमाण के द्वारा सिद्ध रहे , एवं साध्य अभाव के निर्णीत अधिकरण में जिसकी असत्ता भी प्रमाण के द्वारा निश्चित ही हो , वही वस्तु पूर्व में अज्ञात साध्य के अनुमिति का लिङ्ग है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
धर्मान्विते चान्यत्र सपक्षे सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धं प्रमाणेन प्रतीतम् , अनुमेयविपरीते च साध्यव्यावृत्तिविषये चार्थे सर्वस्मिन् प्रमाणतोऽसदेव तदप्रसिद्धार्थस्य साध्यधर्मिणोऽप्रतीतस्यार्थस्य साध्यधर्मस्यानुमापकं लिङ्ग भवति । यावति देशे काले वा दृष्टान्तधर्मणि लिङ्गस्य साध्यधर्मेणाविनाभावो निदशितस्तावत्येव देशे काले वा साध्यर्धामणि प्रतीयमानस्य गमकमिति प्रतिपादनार्थमुक्तम् - देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितमिति । सर्वसपक्षव्यापकवत् पक्षैकदेशवृत्तेरपि हेतुत्वार्थं सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धमित्युक्तम् । समस्तविपक्षव्यापक द्विपक्षैकदेशवृत्तेरप्यहेतुत्वावद्योतनार्थं सर्वस्मिन्नसदेवेति पदम् ।
केचित् प्रवादुका एवं वदन्ति - नावश्यं प्रमाणसिद्धो वैधर्म्यदृष्टान्त एव द्रष्टव्यः " , यत्रेदं नास्ति तत्रेदमपि नास्ति इति वचनादपि साध्यव्यावृत्त्या साधनव्यावृत्तिप्रतीतिसम्भवात् । तथा च तेषां ग्रन्थः-
तस्माद् वैधर्म्यदृष्टान्तोऽनिष्टोऽवश्यमिहाश्रयः ।
तदभावेऽपि तन्नेति वचनादपि तद्गतेः ॥ इति ।
तन्निवृत्त्यर्थं प्रमाणत इति । साध्यविपरीते यत् प्रमाणतोऽसल्लिङ्ग न तु वाङ्मात्रेणेत्यर्थः । प्रमाणशून्यस्य वचनमात्रस्य सर्वत्र सम्भवे हेतुहेत्वाभासव्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गः । अतिव्यापकमिदं लिङ्गलक्षणम् , प्रकरणसमे कालात्ययापदिष्टे च भावादिति चेत् ? अत्राह कश्चित् - प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टावनैकान्तिक एवान्तर्भवतः , संदिग्धविपक्षे साध्यधर्मिणि प्रकरणसमस्य भावान्निferfar च कालात्ययापदिष्टस्य वृत्तेः ।
तथा च प्रकरणसमः ' यतः प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रकरणसमः ' प्रक्रियते प्रस्तूयत इति प्रकरणं पक्षप्रतिपक्षौ तयोश्चिन्ता विचारः , सा यत्कृता स निर्णयार्थमुपदिष्ट उभयपक्षसाम्यान्न प्रकरणसाम्येऽन्यतरपक्षनिर्णयाय कल्पते । यथा नित्यः शब्दोनित्यधर्मानुपलब्ध :, अनित्यः शब्दो नित्यधर्मानुलब्धेरिति शब्दे नित्यानित्यधर्म योरनुपलम्भान्नित्यानित्यत्वसंशये सति तद्विचारोऽभूत् , अन्यतरधर्मग्रहणे तत्त्वनिश्चयाद् विचारस्याप्रवृत्तेः ।
तत्रानित्यधर्मानुपलम्भो नित्यत्वविनिश्चयार्थमुपदिष्टः , नित्यधर्मानुपलम्भोऽनित्यत्वविनिश्चयार्थमुपदिष्टः , नित्यधर्मानुपलम्भं प्रतिपक्षमनतिवर्तमानो न निर्णयाय कल्पते , तत्प्रतिबन्धात् । स चायं संभवत्प्रतिपक्षे धर्मिणि वर्तमान एकस्मिन्नन्ते नियतो न भवतीत्यनैकान्तिक : । एवं कालात्ययापदिष्टोऽप्यनैकान्तिकः , प्रत्यक्षनिश्चितोष्णत्वे वह्नौ विपक्षे कृतकत्वस्य भावात् । एतदयुक्तम् ।
यदि पक्षव्यापकत्वे सति सपक्षे सद्भावो विपक्षाच्च व्यावृत्तिरित्येतावतैव हेतोर्गमकत्वम् , तदास्तु नाम साध्यधर्मिणि प्रतिपक्षसम्भावना , तथापि प्रकरणसमेन स्वसामर्थ्यात् साध्यं साधयितव्यमेव । अथ न शक्नोति साधयितुं प्रतिपक्षसंशयाक्रान्तत्वात् ? न तहिं रूप्यमा त्रेण गमकत्वमिति असत्प्रतिपक्षत्वमपि रूपान्तरमास्थेयम् , सति प्रतिपक्षे हेतुत्वाभावादसति तद्भावात् । एवं कालात्ययापदिष्टेऽपि वाच्यम् । यदि त्रैरूप्य मात्रेण लिङ्गत्वं कृतकत्वाद् वह्नावनुष्णत्वमस्त्येवेति कथमनैकान्तिकत्वम् ?
अथ सत्यपि कृतकत्वे वह्नावनुष्णत्वं न भवति प्रत्यक्षेणोष्णताप्रतीतेः , तदा प्रत्यक्षाविरोधे सति प्रतिपादनं न तद्विरोध इत्यबाधितविषयत्वमपि रूपान्तरमनुसरणीयम् । तस्मादन्यथोच्यते , पक्षो नाम साध्यपर्यायः , साध्यं च तद् भवति यत् साधनमर्हति सम्भाव्यमानप्रतिपक्षश्चार्थो न साधन मर्हति वस्तुनो द्वैरूप्याभावादित्ययमपक्षधर्म एव । तथा प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि पक्षो न भवति , रूपान्तरेण सिद्धस्य रूपान्तरेण साधनानर्हत्वात् ।
अतः प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टावुभौ ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इत्यन्तेनैव निराकृतौ अनुमेयाभासाश्रयत्वात् ।
नन्वेवमप्यलक्षणमिदमव्यापकत्वात् । त्रिविधो हि हेतुः - अन्वयी , व्यतिरेकी , अन्वयव्यतिरेकी चेति । तत्रान्वयी विशेषोऽभिधेयः , प्रमेयत्वात् , सामान्यवत् । अस्य हि पक्षादन्यः सर्व एव सदसत्प्रभेदः सपक्षः , प्रमातृमात्रस्य प्रमाणमात्रापेक्षयाऽनभिधेयस्याप्रमेयस्याभावात् । यश्च पुरुषमात्रस्थानभिधेयोऽप्रमेयश्च स वाजिविषाणवदसन्नेव , न वा सपक्षो विपक्षो वा स स्यात् , निःस्वभावत्वात् । यश्च सत् स सर्वः सपक्ष एवेति तदभावे च नास्त्येवेत्यव्यापकं लक्षणम् , व्यतिरेकाभावात् ।
अगमकमेव तदिति चेन्न , अन्वयाव्यभिचारात् । अन्यस्य सद्भावादन्यस्य सिद्धिरित्यत्रान्वयः कारणम् , तस्य तु व्यभिचारप्रतीतिरपवादिका । अस्ति तावत् प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोरन्वयः , सर्वत्र प्रमेयेऽभिधेयत्वस्य दर्शनात् । न च व्यभिचारो दृष्टो नापि शङ्कामारोहति , यं यं व्यतिरेकविषयं बुद्धिगोचरीकरोति परस्य च वक्तुमिच्छति तस्य सर्वस्य प्रमेयत्वाभिधेयत्वप्राप्तेः । न चास्ति विशेषो विपक्षे सत्यव्यभिचारः कारणं न विपक्षाभावादिति । तेन प्रमेयत्वमभिधेयत्वं गमयति ।
व्यतिरेकी च सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणादिमत्त्वादिति । अस्य पक्षादन्यः सर्व एव विपक्ष :, तथापि हेतुत्वं विपर्यय सम्बन्धाव्यभिचारात् । घटादिप्राणादिमत्त्वेन निरात्मकत्वस्य व्याप्तिरवगता , अप्राणादिमत्त्वस्य न जीवच्छरे निवृत्तिः प्रतीयते । तत्प्रतीत्या व्याप्तस्य निरात्मकत्वस्य निवृत्त्यनुमाम् ।
अथ मन्यसे योऽर्थो नवागतस्तद्वय तिरेकोऽपि न शक्यते प्रत्येतुम् , प्रतिषेधस्य विधिविषयत्वात् । आत्मा च न क्वचिदवगतः , कथं तस्य घटादिभ्यो व्यावृत्तिप्रतीतिरिति । तदयुक्तम् । परस्य तावत् समस्तवस्तुविषयं नैरात्म्यमिच्छतो घटादिभ्यः सिद्धैवात्मव्यावृत्तिः । स्वस्यापि जीवच्छरीरेष्वेवात्मनो बुद्धघादिभिः कार्यैः सह कार्यकारणभावे सिद्धे घटादिभ्यो बुद्धयादिव्यावृत्त्या तदुत्पादनसमर्थस्य विशिष्टात्मसम्बन्धस्याभावसिद्धिः । यथा धूमाभावे क्वचित् तदुत्पादनयोग्यस्य वह्नेरभावसिद्धिः ।
यद्येवमात्मापि जीवच्छरीरेषु सिद्ध एव सम्बन्धिप्रतीतिमन्तरेण सम्बन्धप्रतीतेरसम्भवात् । ततश्च व्यतिरेक्यनुमानवैयर्थ्यम् , निष्पादितक्रिये कर्मणि साधनस्य साधनन्यायातिपातात् । नेवम् , स्वसिद्धस्यात्मनः परं प्रत्यसिद्धस्य साध्यत्वात् । न चान्वयाव्यभिचारः प्रतिपादको न व्यतिरेकाव्यभिचार इत्यस्ति नियमहेतुः । तस्माद् व्यतिरेकिणोऽपि हेतुत्वात् तेन प्रसिद्धं च तदन्विते इत्यव्यापकम् ।
अत्रैके समानतन्त्रप्रसिद्धया केवलान्वयिनः केवलव्यतिरेकिणश्च परिग्रह इति वदन्ति अपरे व्यस्तसमस्तं लक्षणं । तु वदन्ति । अनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्वित इति अन्वयिनो लक्षणम् । अनुमेयेन सम्बद्धं तद्विपरीते च नास्त्येवेति व्यतिरेकिण इति । समस्तं लक्षणमन्वयव्यतिरेकिण इति । साध्यसाधनत्वं सामान्यलक्षणं त्रयाणाम् । यथा प्रमाणानां यथार्थपरिच्छेदकत्वं सामान्यलक्षणम् । अनपदेश इति । अपदेशो हेतुर्न विपरीतमतो यत् स्यादिति द्वितीयश्लोकस्यार्थं विवृणोति - यत्त्विति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' यदनुमेयेनार्थेन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इत्यादि श्लोक की व्याख्या करते हैं । पहिले से अज्ञात अर्थ स्वरूप साध्य ( धर्म ) की अनुमिति का जनक वह ' लिङ्ग ' है , जो अनुमेव अर्थ के साथ अर्थात् साध्य के धर्मी ( पक्ष ) के साथ किसी देश विशेष में एवं कालविशेष मे ' सहचरित ' अर्थात् सम्बद्ध हो , एवं अनुमेय ( साध्य ) रूप धर्म से युक्त( पक्ष से भिन्न ) किसी आश्रयरूप सपक्ष के .... किसी एक देश में या उसके सभी देशों में ' प्रसिद्ध ' हो , अर्थात् प्रमाण के द्वारा निश्चित हो , एवं अनुमेय के विपरीत अर्थात् साध्य का अभाव जिनमें निश्चित हो उन सभी आश्रयों में प्रमाण के द्वारा जिसको असत्ता भी निश्चित ही हो ( वहाँ लिङ्ग है ) । ' देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितम् ' यह वाक्य इस लिए लिखा गया है कि दृष्टान्तरूप धर्मी के जितने देश में एवं जितने काल में हेतु का साध्यरूप धर्म के साथ ' अविनाभाव ' ( व्याप्ति ) देखा जाय , उन्हीं देशों में और उन्हीं कालों में साध्य के धर्मी ( अ ) में जाते हुए साध्य का वह हेतु ज्ञापक होता है I । ' सर्वस्मिन्नकदेशे या प्रसिद्धम् ' यह वाक्य इस
६१ लिए लिखा गया है कि जिस प्रकार सभी सपक्षों ( दृष्टान्तों ) में रहनेवाली वस्तु में ( साध्य के ज्ञापन करने का सामर्थ्यरूप ) हेतुत्व है उसी प्रकार कुछ ही सपक्षों में रहनेवाली वस्तु में भी उक्त हेतुत्व है । ' सर्वस्मिन्नसदेव ' यह वाक्य इसलिए दिया गया है । कि जिस प्रकार सभी विपक्षों में रहनेवाला पदार्थ साध्य का ज्ञापक हेतु नहीं हो सकता , उसी प्रकार कुछ थोड़े से विपक्षों में रहनेवाला पदार्थ भी साध्य का ज्ञापक हेतु नहीं हो सकता ।
किसी सम्प्रदाय के लोगों ( बौद्धों ) का कहना है कि ' वैधर्म्यं दृष्टान्त में प्रमाण के द्वारा हेतु की असत्ता सिद्ध ही हो ' यह कोई आवश्यक नहीं है , क्योंकि ' जहाँ साध्य नहीं है , वहाँ हेतु भी नहीं है ' इस प्रकार के साधारण वाक्य से ही साध्य से शून्य सभी आश्रयों ( सभी विपक्षों ) में हेतु की असत्ता की प्रतीति हो सकती है ।
जैसा कि उन लोगों का ( उक्त सिद्धान्त का समर्थक ) यह वचन है कि ' तस्मात् अनुमान के लिए वैधम्यं दृष्टान्तरूप आश्रय ( प्रयोजक ) का मानना आवश्यक नहीं है , क्योंकि ' जहाँ साध्य नहीं है वहीं हेतु भी नहीं है ' इस वाक्य से भी उस ( साध्यशून्य आश्रय में हेतु अभाव ) की प्रतीति हो जाएगी ' इस सिद्धान्त के खण्डन के लिए ही प्रकृत वाक्य में ' प्रमाणतः ' पद दिया गया है ।
अर्थात् विपक्ष में हेतु की असत्ता प्रमाण से ही सिद्ध होनी चाहिए , प्रमाणशून्य केवल वचन मात्र के प्रयोग से प्रकृत में समाधान नहीं होगा , क्योंकि प्रमाणशून्य वचनों का प्रयोग तो सभी जगह सम्भव है , इससे ' यह हेतु है और हेत्वाभास है ' इस प्रकार की व्यवस्था ही नहीं रह जाएगी । ( प्र ० ) हेतु का यह लक्षण तो ' प्रकरणसम ' और ' कालात्ययापदिष्ट ' नाम के हेत्वाभासों में भी रहने के कारण अतिव्यापक ( अतिव्याप्त ) है ।
इसके उत्तर कोई कहते हैं कि ( उ ० ) प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों का अन्तर्भाव भी ' अनैकान्तिक ' नाम के हेत्वाभास में ही हो जाता है , क्योंकि सन्दिग्धविपक्ष रूप साध्य के धर्मी में ( अर्थात् पक्ष में ) प्रकरणसम हेत्वाभास की सत्ता रहती है । एवं निश्चित विपक्ष में ' कालात्ययापदिष्ट ' हेत्वाभास की सत्ता रहती है । अभिप्राय यह है कि ( न्यायसूत्र में ) प्रकरणसम के लक्षण के लिए यह सूत्र निर्दिष्ट है कि ' यस्मात् प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रकरणसमः ।
' ' प्रक्रियते प्रस्तूयते इति प्रकरणम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उपस्थित किये जानेवाले पक्ष और प्रतिपक्ष ये दोनों ही इस सूत्र में प्रयुक्त ' प्रकरण ' शब्द के अर्थ हैं । ' तयोश्चिन्ता प्रकरणचिन्ता ' अर्थात् कथित पक्ष और प्रतिपक्ष की जो ' चिन्ता ' अर्थात् विचार , फलतः संशय जिससे उत्पन्न हो , उन दोनों में से किसी एक पक्ष के निश्चय के लिए प्रयुक्त हेतु ही प्रकरणसम नाम का हेत्वाभास है , क्योंकि वह हेतु दोनों पक्षों के साधन के लिए समान ही है , ( अतः प्रकरणसम है ) ।
उन दोनों में से कोई एक हेतु एक पक्ष का निर्णायक नहीं हो सकता । जैसे कि एक ने यह पक्ष उपस्थित किया कि ' शब्द नित्य है , क्योंकि अनित्य वस्तुओं में रहनेवाले धर्मों की उपलब्धि शब्द में नहीं होती है । दूसरा पक्ष उपस्थित हुआ कि ' शब्द अनित्य है , क्योंकि नित्य पदार्थों में रहनेवाले धर्म की उपलब्धि उसमें नहीं होती ।
इस प्रकार नित्यों में रहनेवाले धर्म को ज्ञापन करने का सामर्थ्य मान लिया जाय तो फिर साध्य के धर्मी पक्ष में साध्य के अभाव रूप धर्मों एवं अनित्यों में रहनेवाले धर्मों की अनुपलब्धि से शब्द में नित्यस्व और अनित्वका संशय उपस्थित होगा । इस संशय के कारण ही ' प्रकरण ' का उक्त ' चिन्ता ' रूप विचार उपस्थित होता है । उन दोनों में से एक ( नित्य या अनित्य ) धर्म का निर्णय रूप विचार उपस्थित होता है ।
उन दोनों में से एक ( नित्य या अनित्य ) धर्म का निर्णय हो जाने पर तो उक्त विचार की प्रवृत्ति ही नहीं होगी । इन दोनों में शब्द में नित्यत्व के निश्चय के लिए अनित्य धर्म के अनुपलब्धिरूप हेतु का प्रयोग होता है , एवं शब्द में अनित्यत्व के निश्चय के लिए नित्यधर्मानुपलब्धिरूप हेतु का प्रयोग होता है ।
इनमें अनित्यधर्मानुपलब्धि रूप हेतु नित्यधर्म के अनुपलब्धिरूप प्रतिपक्ष को पराजित नहीं कर सकता , ( इसी प्रकार नित्यधर्मानुपलब्धिरूप हेतु अनित्यधर्मानुपलब्धिरूप प्रतिपक्ष को भी पराजित नहीं कर सकता ) , अतः शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व का निर्णय नहीं हो सकता , क्योंकि दोनों ही अपने प्रतिपक्ष के द्वारा प्रतिहत हैं ।
अतः यह हेतु ( अर्थात् शब्द में नित्यत्व का साधक और अनित्यत्व का साधक हेतु ) साध्य संशयवाले पक्ष में विद्यमान होने के कारण एक अन्त में , किसी एक कोटि के निश्चय के लिए नियत नहीं है , अतः ' प्रकरणसम ' अनैकान्तिक ही है ।
इसी प्रकार ' कालात्ययापदिष्ट ' अर्थात् बाधित हेत्वाभास भी अनैकान्तिक ही है , क्योंकि ' वह्निरनुष्णः कृतकत्वात् ' इत्यादि अनुमान का कृतकत्व रूप कालात्ययापदिष्ट हेतु बह्निरूप उस विपक्ष में ही विद्यमान है , जिसमें कि ( अनुमान से बलवान् ) प्रतिपक्ष के द्वारा ( अनुष्णत्वरूप साध्य के अभावरूप ) उष्णत्व की सत्ता निर्णीत है ।
( उ ० ) ( किन्तु प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट का इस प्रकार अनैकान्तिक में अन्तर्भाव करना ) अयुक्त है , क्योंकि यदि सभी पक्षों में रहने से , एवं सपक्षों में रहने से , और विपक्षों में न रहने से हो हेतु में साध्य की अनुमिति का सामर्थ्य मान लिया जाय तो साध्य की सम्भावना रहने पर भी प्रकरणसम हेत्वाभास से साध्य का साधन होगा ही , क्योंकि उसमें साध्य को ज्ञापन करने का ( पक्षसत्त्वादि ) उक्त सामर्थ्य तो है ही ।
यदि प्रतिपक्ष संशय के कारण वह अपने साध्य का साधन नहीं कर सकता , तो फिर यह कहना ठीक नहीं है कि ( पक्षसत्त्वादि ) तीनों धर्मों का रहना ही हेतु में साध्य के साधन का सामर्थ्य है , इसके लिए ' असत्प्रतिपक्षितत्व ' नाम का एक और प्रयोजक हेतु में साध्य साधन के लिए मानना पड़ेगा । क्योंकि प्रतिपक्ष के रहने पर हेतु में साध्य साधन की क्षमता नहीं रहती है , और उसके न रहने से हेतु में वह क्षमता रहती है ।
इसी प्रकार कालात्ययापदिष्ट के प्रसङ्ग में भी कहना चाहिए कि यदि पक्षसत्वादि तीनों रूपों के रहने से ही हेतु साध्य का साधन कर सके तो फिर कृतकत्व के रहने के कारण वह्नि में अनुष्णता का अनुमान भी हो सकता है सुतराम् यह प्रश्न रह जाता है कि वह्नि में अनुष्णता का साधक कृतकत्व हेतु अनैकान्तिक ' कैसे है ?
यदि वह्नि में कृतकत्व के रहने पर भी उष्णता की प्रत्यक्ष प्रतीति वह्नि में होती है , अतः अनुष्णत्व को उक्त अनुमति नहीं होती है , तो यह कहना पड़ेगा कि पक्ष सत्त्वादि की तरह ( अबाधितविषयत्व हेतु में अबाधितत्व का रहना भी ज्ञान के लिए आवश्यक है । या ) साध्य अतः ( अर्थात् पक्षसत्त्वादि तीनों रूपों को ही हेतुत्व का प्रयोजक मानें तो प्रकरणमम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में हेतुत्व का वारण किस प्रकार होगा ?
अतः इस प्रश्न का हम लोग ( सिद्धान्ती ) दूसरा समाधान कहते हैं कि ( हेतु के बल रूप ) पक्षवृत्तित्यादि के घटकीभूत ' पक्ष ' शब्द और ' साध्य ' शब्द दोनों एक ही अर्थ के बोधक हैं । साध्य वह है जिसका कि साधन हो सके । किन्तु जिस साध्य के प्रतिपक्ष की सम्भावना रहती है , उसका साधन नहीं किया जा सकता , क्योंकि वस्तुओं के ( परस्पर विरुद्ध ) दो रूप नहीं हो सकते .१ ।
अतः प्रकरणसम हेतु ' पक्षधर्म ' ही नहीं है , अर्थात् साध्य से युक्त पक्षरूप अनुमेय से अभिन्न साध्य के साथ सम्बद्ध ही नहीं है , इसी प्रकार कालात्ययापदिष्ट हेतु भी ' पद्मधर्म ' न होने के ही कारण ' हेतु ' नहीं है , क्योंकि वह्नि की अनुष्णता प्रत्यक्ष से विरुद्ध है , एक प्रकार से सिद्ध वस्तु का दूसरे ( विरुद्ध ) रूप से साधन करना सम्भव नहीं है , अतः प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों हेत्वाभासों में हेतु का ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इस वाक्य के द्वारा निर्दिष्ट विशेषण ही नहीं है ।
अत : ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इसके उपादान से ही प्रकरण म और कालात्ययापदिष्ट दोनों हेत्वाभासों में हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति हट जाती है ।
( प्र ० ) प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में अतिव्याप्ति के न होने पर भी हेतु का यह लक्षण ' तदभावे च नास्त्येव ' इस विशेषण के कारण केवलान्वयि हेतु में अव्याप्त अव्यापक है ही । अभिप्राय यह है कि ( १ ) अन्वयी ( केवलान्वयी ) , ( २ ) ( केवल ) व्यतिरेकी , एवं ( ३ ) अन्वयव्यतिरेकी भेद से हेतु तीन प्रकार के हैं । इनमें ' विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् सामान्यवत् ' ' इस अनुमान का हेतु अन्वयी ( केवलान्वयी ) ।
इस अनुमान के पक्ष से अतिरिक्त जितने भी भाव और अभाव पदार्थ हैं , वे सभी सपक्ष हैं , क्योंकि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित नहीं है ( अर्थात् प्रमेय नहीं है ) और किसी ( शब्द ) प्रमाण का अभिधेय नहीं है । जो न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा शब्द से निर्दिष्ट होता है और न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित ही होता है , वह घोड़े के सींग की तरह सर्वथा असत् होने के कारण न सपक्ष ही हो सकता है न विपक्ष ही , क्योंकि असत् वस्तुओं का कोई स्वभाव नहीं होता ।
जितने भी पदार्थ ' सत् ' हैं वे सभी इस अनुमान के सपक्ष हो हैं । अतः इस अनुमान में व्यतिरेक नहीं है , अर्थात् कोई विपक्ष नहीं है । सुतराम् ' तदभावे च नास्त्येव ' हेतु लक्षण का यह अंश उक्त केवलान्वयी हेतु में नहीं रहने के कारण हेतु का उक्त लक्षण अव्याप्ति से दुष्ट हूँ । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) केवलान्वयी हेतु से अनुमान होता ही नहीं ।
( उ ० ) तो यह कहना सम्भव नहीं होगा , क्योंकि एक की सत्ता से दूसरे की जो सिद्धि होती है , इसमें ' अन्वय ' ही कारण है , चूंकि इस कार्यकारणभाव में कोई व्यभिचार उपलब्ध नहीं है , ( अतः ' केवलान्वयि हेतु से अनुमिति नहीं होती ' यह नहीं कहा जा सकता ) , क्योंकि व्यभिचार की प्रतीति ही अन्वयी हेतु से साध्य की अनुमिति होने में बाधक है , सो प्रकृत में नहीं है । प्रमेयत्व और अभिधेयत्व दोनों में अन्वय या सामानाधिकरण्य अवश्य है क्योंकि सभी प्रमेयों में अभिधेयत्व को प्रतीति होती है ।
इन दोनों में व्यभि चार ( एक को छोड़कर दूसरे का रहना ) कहीं नहीं देखा जाता । एवं उन दोनों में कहीं व्यभिचार की शङ्का भी नहीं है , क्योंकि जो कोई भी स्थल व्यभिचार के लिए कोई सोचेगा या दूसरे को कहना चाहेगा , उन सभी स्थलों में अभिधेयत्व और प्रमेयत्व दोनों ही देखे जाते हैं ( अत : इस अनुमान में कोई विपक्ष है ही नहीं ) । जिस प्रकार जिन सब स्थलों में विपक्ष प्रसिद्ध है , उन सब स्थलों में यदि व्यभिचार नहीं है , तो वह हेतु अनुमिति का कारण होता है ।
उसी प्रकार जिन सब स्थलों में विपक्ष की सत्ता ही नहीं है , उन सब स्थलों में भी यदि व्यभिचार की उपलब्धि नहीं होती है तो वह हेतु साध्य का साधक क्यों नहीं होगा ? क्योंकि दोनों स्थितियों में कोई तास्विक अन्तर नहीं है । अतः प्रमेयत्व अवश्य ही अभिधेयत्व का ज्ञापक हेतु है ।
' जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्वात् ' इस अनुमान का हेतु ( केवल ) व्यतिरेकी है , क्योंकि पक्ष को छोड़कर और सभी पदार्थ इसके ' विपक्ष ' हैं , फिर भी यह ' हेतु ' है ही , क्योंकि ( साध्य के ) विपर्यय ( अर्थात् अभाव का हेत्वभाव के साथ ) व्यभिचार नहीं हैं । ( साध्य का निरात्मकत्वरूप अभाव घटादि में है , उनमें हेतु का अप्राणादिमत्त्वरूप अभाव भी अवश्य हा है , इस प्रकार ) अप्राणादिमस्वरूप हेत्वभाव के साथ निरात्मकत्वरूप साध्याभाव की व्याप्ति गृहीत है ।
इससे जीवित शरीर रूप ( प्रकृत पक्ष में ) अप्राणादिमत्त्वरूप ( हेत्वभाव की ) निवृत्ति अर्थात् अभाव का बोध होता है । जीवित शरीर में ( अप्राणादिमत्त्वाभाव की ) इस प्रतीति से उसमें निरात्मकत्व रूप साध्याभाव की निवृत्ति का अनुमान होता है ।
अगर यह समझते हों कि ( प्र ० ) जिस वस्तु का ज्ञान नहीं होता है , उसके अभाव का भी ज्ञान नहीं हो सकता , क्योंकि जिसकी कहीं सत्ता रहती है , उसी का कहीं प्रतिषेध भी हो सकता है । आत्मा कहीं पर ज्ञात नहीं है , अतः घटादि पदार्थों में भी उसके अभाव कीप्रतीति क्यों होगी ? ( उ ० ) तो यह समझना भूल होगी , क्योंकि ( बौद्धादि ) परमत के अनुसार भी तो घटादि में नैरात्म्य सिद्ध ही है , क्योंकि वे तो सभी वस्तुओं में नैरात्म्य की अभिलाषा करते हैं ।
स्वमत ' वैशेषिकादिमत ) में भी जीवित शरीर में ही आत्मा का सम्बन्ध बुद्धि प्रभृति का कारण है , अतः ( अवच्छेदकत्व सम्बन्ध ) से शरीर में बुद्धियादि कार्यों की उत्पत्ति होती है ( मृत शरीर एवं घटादि में नहीं ) , इस प्रकार आत्मा से सम्बद्ध जीवित शरीर और बुद्धि प्रभृति में कार्यकारण भाव की सिद्धि हो जाने पर घटादि में बुद्धि का अभाव सिद्ध हो जाएगा , क्योंकि आत्मा का उक्त विशेष प्रकार का सम्बन्ध ही बुद्धि की उत्पत्ति का कारण है , सो घटादि में नहीं है , अतः उसमें कथित सात्मकत्व भी नहीं है ।
इस ' स्व ' मत में भी निरात्मकत्वरूप साध्याभाव का ज्ञान सम्भावित है । जैसे कि धूम के न रहने पर कहीं पर धूम को उत्पादन करनेवाले वह्नि के अभाव की सिद्धि होती है । ( प्र ० ) ( जीवित शरीर में जिस सात्मकत्व की सिद्धि करना चाहते हैं , वह सात्मकत्व आत्मा का सम्बन्ध ही है ) सम्बन्व का ज्ञान बिना प्रतियोगी और अनुयोगी रूप दोनों सम्बन्धियों के ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है | अतः जौवित शरीर में आत्मा तो सिद्ध ही है ।
तस्मात् उक्त व्यतिरेकी अनुमान व्यर्थ है , क्योंकि निष्पन्न कामों में साधन अपना साधनत्व छोड़ बैठता है ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है , क्योंकि अपने मत से जीवित शरीर में आत्मा के सिद्ध रहने पर भी नास्तिकों के मत में वह सिद्ध नहीं है । अतः परमत से असिद्ध आत्मा के सम्बन्ध का अनुमान ही प्रकृत में व्यतिरेकी हेतु से किया गया है । यह नियम मान लेने में कोई युक्ति नहीं है कि अन्वय का अव्यभिचार ( अन्वयव्याप्ति ) हो साध्य का ज्ञापक है और व्यतिरेक का अव्यभिचार ( व्यतिरेक ) व्याप्ति नहीं ।
अतः ( केवल ) व्यतिरेकी भी हेतु अवश्य है । तस्मात् ' प्रसिद्धञ्च तदन्विते ' इत्यादि से कथित सपक्षवृत्तित्व रूप विशेषण के न रहने से हेतु का प्रकृतलक्षण ( केवल ) व्यतिरेकी हेतु में अव्याप्त है ।
केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु इन दोनों में कथित अव्याप्ति का समाधान कोई इस प्रकार करते हैं कि केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु इन दोनों में हेतुत्व का व्यवहार समानतन्त्र ( न्याय दर्शन ) के अनुसार समझना चाहिए ( सिद्धान्ततः वैशेषिक मत से वे दोनों हेतु नहीं है ) ।
कोई ( इन दोनों को वैशेषिक मत से भी हेतु मानते हुए ) हेतु के लक्षणवाक्य को सम्पूर्ण और खण्डशः दोनों प्रकार से लक्षण का बोधक मान कर उनमें अव्याप्ति दोष का परिहार करते हैं । तदनुसार ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इत्यादि श्लोक से निम्न लिखित तीन लक्षणवाक्य निष्पन्न होते हैं-
( १ ) यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धञ्च तदन्विते । ( अर्थात् जो पक्ष और सपक्ष दोनों में ही रहे वही हेतु है ) । हेतु का यह लक्षण ( केवल ) अन्वयी ( ' विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् ' इस अनुमान के प्रमेयत्व ) हेतु का है ( अर्थात् हेतु के इस लक्षण में ' तदभावे च नास्त्येव ' इस वाक्य से कथित विपक्षावृत्तित्व का प्रवेश नहीं है , अतः केवलान्वयि स्थल में विपक्ष की अप्रसिद्धि से हेतु लक्षण की अव्याप्ति नहीं है ) ।
( २ ) यदनुमेयेन सम्बद्धं तदभावे च नास्त्येव । अर्थात् पक्ष में रहे और विपक्ष में न रहे वही ' हेतु ' है । हेतु का यह लक्षण ( केवल ) व्यतिरेकी हेतु के लिए है । अतः ' जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात् ' इत्यादि व्यतिरेकी हेतु में सपक्ष की अप्रसिद्धि के कारण अव्याप्ति नहीं है । क्योंकि हेतु के इस लक्षण में ' प्रसिद्धश्च तदन्विते ' इस वाक्य के द्वारा कथित ' सपक्षसत्त्व ' का निवेश नहीं है ) ।
( ३ ) ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इत्यादि संपूर्ण श्लोक के द्वारा कथित लक्षण अन्वयव्यतिरेकी हेतु का है , क्योंकि इसमें पक्षसत्त्व , सपक्षसत्त्व एवं विपक्ष सत्त्व हेतु के ये तीनों ही लक्षण विद्यमान रहते हैं ।
कथित तीनों हेतुओं में समान रूप से रहनेवाला लक्षण यही है कि ' जो साध्य का साधन करे वही हेतु हैं ' जैसे ' जो यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करे वही प्रमाण है ' यह सभी प्रमाणों का साधारण लक्षण है ।
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टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ४८५) १. अभिप्राय यह है कि ' शब्दो नित्योऽनित्यधर्मानुपलब्धेः ' एवं ' शब्दोऽनित्यो नित्यधर्मानुपलब्धे : ' इत्यादि प्रकरणसम के स्थल में नित्यत्वविशिष्ट शब्द और अनित्यत्वविशिष्ट शब्द हो ' साध्य ' है । शब्दरूप पक्ष का नित्यत्व या अनित्यत्व दो में से कोई एक ही स्वरूप सत्य हो सकता है . अर्थात् शब्द नित्य ही हो सकता है या अनित्य हो , वह नित्य और अनित्य दोनों नहीं हो सकता ।
चूंकि अनुमान के समय शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व कोई भी सिद्ध नहीं है , अतः नित्यधर्मानुपलब्धि या अनित्यधर्मानुपलब्धि इन दोनों में से कोई भी हेतु ' अनुमेय ' अर्थात् नित्यत्व या अनित्यत्वविशिष्ट शब्दरूप ' पक्ष ' में विद्यमान नहीं है । अतः प्रकरणसम हेतु में हतुत्व का प्रयोजक ' पक्षवृत्तित्व ' रूप धर्म ही नहीं है । सुतराम् ' अपक्षधर्म ' होने के कारण ही प्रकरणसम ' असिद्ध ' ( स्वरूपासिद्ध ) हेत्वाभास है , जिसकी सूचना ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इस वाक्य से ही दे दी गयी है ।
इसी प्रकार बाधित ( कालात्ययापदिष्ट ) हेतु भी ' असिद्ध ' हेत्वाभास में ही अन्तभूत हो जाता है , क्योंकि वह्निरनुष्णी द्रव्यत्वात् ' इत्यादि स्थलों में वह्नि में यद्यपि द्रव्यत्व है , किन्तु उसमें अनुष्णत्व के विरुद्ध उष्णत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है , अतः अनुष्णत्व बाधित है । अनुष्णस्वविशिष्ट वह्निरूप पक्ष में द्रव्यत्व की सत्ता नहीं है , क्योंकि अनुष्णत्व विशिष्ट वह्नि नाम की कोई वस्तु ही नहीं है । इसको भी सूचना ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इसी वाक्य से दे दी गयी है ।
(पृ. ४८६) १. अनुमान प्रयोग का आशय है कि जिस प्रकार घटत्वादि जातियाँ प्रमेय होते के कारण अभिधेय है , उसी प्रकार ' विशेष ' अर्थात् घटादि व्यक्ति भी प्रमेय होने के कारण अभिधेय हैं ।
पृ. ४९०
यत्तु यथोक्तात् त्रिरूपान्लिङ्गादेकेन धर्मेण द्वाभ्यां वा विपरीतं तदनुमेयस्याधिगमे लिङ्गं न भवतीति ।
एतदेवाह सूत्रकारः" अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च " ( अ . ३ आ . १ सू . १५ ) इति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उक्त प्रकार से कहे गये ( ( पक्षसत्त्व , सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व रूप हेतुत्व के सम्पादक ) तीनों धर्मों में से एक या दो धर्मों से रहित कोई वस्तु साध्य क अनुमिति का नहीं ( किन्तु हेत्वाभास ) है ।
बात ( उनका हेत्वाभासत्व ! सूत्रकार ने ' अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च ' इस सूत्र के द्वारा कही है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
भवतीत्यपदेशोऽहेतुरित्यर्थः । अप्रसिद्ध इति विरुद्धासाधारणयोः परिग्रहः , तयोः साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धयभावादहेतुत्वम् । असन्नित्यसिद्धस्यावरोधः , स हि सपक्षे साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धोऽपि धर्मिणि वृत्त्यभावादहेतुः । सन्दिग्धश्चेत्यनैकान्तिकाभिधानम् । स हि धर्मिणि दृश्यमानः किं साध्यधर्मसहचरितः किं वा तद्रहित इति सन्दिग्धो भवति , न पुमरेकं धर्ममुपस्थापयितुं शक्नोति । उभयथा दृष्टत्वादहेतुः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' यत्तु ' इत्यादि से ' विपरीतमतो यत् स्यात् ' इस दूसरे श्लोक की व्याख्या करते हैं । कथित ' अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च ' इस सूत्र में प्रयुक्त ' अनपदेश ' शब्द का ' अपदेशो हेतुर्न भवति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' अहेतु ' ( अर्थात् हेत्वाभास ) अर्थ है । उक्त सूत्र के ' अप्रसिद्ध ' शब्द से विरुद्ध और असाधारण इन दोनों को ( ' हेत्वाभास के अन्तर्गत ) समझना चाहिए ।
ये दोनों इस लिए अहेतु हैं कि साध्य रूप धर्म के साथ इनकी ' प्रसिद्धि ' नहीं है , अर्थात् निश्चय नहीं है , फलतः सपक्षसत्त्व नहीं है । ' असन् ' शब्द से ' असिद्ध ' नाम का हेत्वाभास अभिप्रेत है , क्योंकि असिद्ध हेत्वाभास सपक्ष में साध्य धर्म के साथ रहते हुए भी अर्थात् सपक्षवृत्ति होते हुए भी ' धर्मी ' में अर्थात् पक्ष में ही नहीं रहता है , अतः वह हेतु न होकर हेत्वाभास है । ' सन्दिग्धश्च ' इस पद से ' अनैकान्तिक ' को हेत्वाभास कहा गया है ।
अनैकान्तिक यद्यपि पक्ष में देखा जाता है , किन्तु यह सन्देह बना ही रहता है कि वह साध्य के साथ रहनेवाला है ? या साध्याभाव के साथ ? इसी सन्देह के कारण वह साध्या साध्याभाव रूप किसी एक धर्म को निश्चितरूप से उपस्थित नहीं कर सकता , क्योंकि वह दोनों के साथ देखा जाता है . अतः वह हेतु नहीं है ।
पृ. ४९१
विधिस्तु यत्र धूमस्तत्राग्निरग्न्यभावे धूमोऽपि न भवतीत्येवं प्रसिद्धसमयस्यासन्दिग्धधूमदर्शनात् साहचर्यानुस्मरणात् तदनन्तरमग्न्यव्यवसायो भवतीति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( अनुमिति की उत्पत्ति को यह ) रीति है कि ' जहाँ जहाँ धूम है , उन सभी स्थानों में वह्नि भी अवश्य ही है , एवं जहाँ जहाँ अग्नि नहीं है , उन सभी स्थानों में घूम भी नहीं है ' इस प्रकार से ' समय ' अर्थात् व्याप्ति का निश्चय जिस पुरुष को है , उसी पुरुष को धूम के असन्दिग्ध दर्शन अर्थात् निश्चय , और उसके बाद उत्पन्न घूम और वह्नि के सामानाधिकरण्य ( एके अधिकरण में रहने ) के स्मरण के बाद अग्नि का ( अनुमिति रूप ) निश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
इदमनेनाविनाभूतमिति ज्ञानं यस्य नास्ति तं प्रति धर्मिणि धर्मस्यान्वयव्यतिरेकवतोऽपि लिङ्गत्वं न विद्यते , तदर्थमविनाभावस्मरणमनुमेयप्रतीतावनुमानाङ्गमिति दर्शयति - विधिस्त्विति ।
विधिस्तु अनुमेयप्रतीतिप्रकारस्तु , यत्र धूमस्तत्राग्निरग्न्यभावे धूमो न भवतीति । एवं प्रसिद्धसमयस्य प्रसिद्धाविनाभावस्य पुरुषस्या सन्दिग्धधूमदर्शनाद् धूम एवायम् , न बाष्पादिकमिति ज्ञानात् साहचर्यांनुस्मरणाद् यत्र धूमस्तत्राग्निरित्येवमनुस्मरणात् , तदनन्तरमग्न्यनुमानं भवति । नन्वेवं द्वितीयो लिङ्गपरामर्शो न लभ्यते ? मालम्भि नहि नस्तेन प्रयोजनम् , लिङ्गदर्शनव्याप्तिस्मरणाभ्यामेवानुमेयप्रतीत्युपपत्तेः । न च स्मृत्यनन्तरभावित्वादनुमेयप्रतीतिरनियतदिग्देशा स्यात् ? लिङ्गदर्शनस्य नियामकत्वात् । नाप्युपनय वयर्थ्यम् , अवयवान्तरैरप्रतिपादितस्य पक्षधर्मत्वस्य प्रतिपादनार्थ परार्थानुमा तस्योपन्यासात् ।
अपि भोः । कोऽयमविनाभावो नाम ? अव्यभिचारः । स कस्माद्भवति ?
तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामिति सौगताः । यादृच्छिकः सम्बन्धो यथैव भवति , न भवत्यपि तथा च नियमहेतोरभावः । तत्र यदि नाम सपक्षे दर्शनमदर्शनं च विपक्षे , तथाप्यव्यभिचारो न शक्यते ज्ञातुम् , विपक्षवृत्तिशङ्काया अनिवारणात् । तदुत्पत्तिविनिश्चये तु शङ्का निवार्यते , कारणेन विना कार्यस्यात्मलाभासंभवात् । तदुत्पत्तिविनिश्चयोऽपि कार्यहेतुः पञ्चप्रत्यक्षोपलम्भानुपलम्भसाधनः । कार्यस्योत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः , कारणोपलम्भे सत्युपलम्भः , उपलब्धस्य पश्चात् कारणानुपलम्भादनुपलम्भ इति कार्यस्य द्वावनुपलम्भावेक उपलम्भः , कारणस्य चोपलम्भानुपलम्भाविति । एवमुपलम्भानुपलम्भैः पञ्चभिः सत्ये - वाग्नौ धूमस्य भावोऽसत्यभाव इति निश्चीयते । कार्यस्यैतदेव कार्यत्वं यत् तस्मिन् सत्येव भावोऽसत्यभाव इति तादात्म्यप्रतीत्याप्यविनामावो निश्चीयते । भावस्य न स्वभावव्यभिचारः , निःस्वभावत्वप्रसङ्गात् ।
तादात्म्यनिश्चयो विपक्षे बाधकस्य प्रमाणप्रवृत्त्या सिद्धयति । अप्रवृत्ते तु बाधके शतशः सहभावदर्शनेऽपि कदाचिदेत द्विपक्षे स्यादिति शङ्कायाः को निवारयिता प्रभवति ?
तदुक्तम्-
कार्यकारणभावाद् वा स्वभावाद् वा नियामकात् ।
अविनाभावनियमोऽदर्शनान्न तु दर्शनात् ॥ इति ।
कार्यकारणभावान्नियामकात् स्वभावाद् वा नियामकादविनाभावनियमः , न सपक्षे दर्शनाद् विपक्षे चादर्शनादिति ।
अत्रोच्यते - किं यत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती तत्राव्यभिचारः ? कि वा यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती ? न तावदाद्यः कल्पः , सत्यपि तदुत्पादे धूमधर्मस्य पार्थिवत्वादेरग्निव्यभिचारात् । सत्यपि तादात्म्ये वृक्षत्वस्य विशेषाद् व्यभिचारात् । अथ यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती , तर्ह्यव्यभिचारसत्त्वे तयोर्गमकत्वम् । एवं चेत् , अव्यभिचार एवास्तु गमकः , किं तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्याम् ? कार्यमपि हि न कार्यमित्येव गमयतीति , नापि स्वभावः स्वभाव इति , किं तर्हि ? तदव्यभिचारीति , अव्यभिचार एव गमकत्वे कारणं न तादात्म्यतदुत्पत्ती , व्यभिचारात् । न चैवमुपपत्तिमारोहति धूमो वह्निना क्रियते न पार्थिवत्वादयस्तद्धर्मा इति वस्तुनो निर्भागत्वात् । नान्येतदुपलब्धं शिशपा वृक्षात्मिका न वृक्ष : शिशपात्मकः , धवखदिरादिसाधारणत्वादिति , तयोरभेदात् ।
यदि धवादिसाधारणी वृक्षता न शिशपात्वम् , तदा नानयोरेकत्वं स्वभावमेदस्य मेदलक्षणत्वात् । अभेदे तु यथा वृक्षत्वं सर्ववृक्षसाधारणं तथा शिशपात्वमपि स्यात् । न च तादात्म्ये गम्यगमकभावे व्यवस्था युक्ता , तस्याभेदाश्रयत्वात् । यदि शिशपात्वे गृह्यमाणे वृक्षत्वमगृहीतम् , क्व तादात्म्यम् ? गृहीतं चेत् ? ( तत् ) क्वानुमानम् ?
अथोच्यते - यथावस्थितो धर्मी , शिशपात्वं वृक्षत्वं च त्रयमेकात्मकमेव , तत्र धर्मिणि गृह्यमाणे शिशपात्वं वृक्षत्वमपि गृहीतमेव । यथोक्तम्-
तस्माद् दृष्टस्य भावस्य दृष्ट एवाखिलो गुणः ।
भागः कोऽन्यो न दृष्टः स्याद् यः प्रमाणैः परीक्ष्यते ॥ इति ।
यदेवं शिशपाविकल्पो जातो न वृक्षविकल्पः , स वृक्षशब्दस्मृत्यभावापराधात् शिशपाशब्दसंस्कारप्रबोधजन्मना शिशपाविकल्पेन चाशिशपाव्यावृत्तिपर्यव सितेन नावृक्षव्यावृत्तिरुपनीयते , सर्वविकल्पानां पर्यायत्वप्रसङ्गात् । गम्यगमकभावश्च व्यावृत्त्योरेव नानयोर्न वस्तुनः , तस्यान्वयाभावात् । अवृक्षव्यावृत्यशिशपाव्यावृत्ती च परस्परं भिन्ने , व्यावर्त्यभेदात् । अतो यथोक्तदोषानुपपत्तिरिति । अहो पूर्वापरानुसन्धाने परं कौशलं पण्डितानाम् ?
तादात्म्यमनुमानबीजम् , साध्यसाधनभूतयोर्व्यावृत्त्योः परस्परं भेद इति किमिदमिन्द्रजालम् ? वृक्षशशपयोस्तादात्म्यं तदात्मतया च व्यवस्थितयोरवृक्षव्यावृत्यशिशपाव्यावृत्त्योः सत्यपि भेदे यथाध्यवसायं तादात्म्यमिति चेत् ? सिद्धे तादात्म्ये सत्यशिशपाव्यावृत्त्या धर्मिण्यवृक्षव्यावृत्तिरध्यवसेया , तत्राध्यवसितायामवृक्षव्यावृत्तौ यथाध्यवसायं तादात्म्यसिद्धिरित्यन्योन्याश्रयदोषः 1 व्याप्तिग्रहणवेलायामेकात्मतयाध्यवसितयोर्व्यावृत्त्योस्तादात्म्यसिद्धिरिति चेत् ?
तथाध्यवसितयोरभेद : काल्पनिकः । यद्यनुमानं कल्पनासमारोपेणापि प्रवर्त्तेत , न कश्चिदहेतुर्नाम | प्रमेयत्वानित्यत्वयोरप्येकात्मतयाध्यवसितयोर्यथाध्यवसायं तादात्म्यसंभवात् । विपक्षव्यावृत्त्यभावात् प्रमेयत्वस्यानित्यत्वेन सह तादात्म्याभाव इति चेत् ? सत्यम् , वास्तवं तादात्म्यं नास्ति , कल्पनासमारोपितं तावदस्त्येव , तदेवानुमानोदयबान्धवं समर्थितवन्तो यूयमिति विपक्षादव्यावृत्तिरसत्समा ।
अपि च तादात्म्ये तदुत्पादे च यस्य प्रतीतिविपक्षे हेत्वभावप्रतीत्या , तदभावप्रतीतिरपि दृश्यानुपलब्धेः , अनुपलब्धिश्चानुमानभूतत्वात् स्वसाध्येन विपक्षे हेत्वभावेन सह तादात्म्यप्रतीत्या तदुत्पादप्रतीत्या वा प्रवर्तते , तस्या अपि स्वसाध्येन तादात्म्यतदुत्पादनिश्चयो विपक्षे वृत्त्यभावप्रतीत्या , तदभावप्रतीतिश्चानुपलबध्यन्तरसापेक्षा यावान् प्रतिषेधः स सर्वोऽप्यनुपलब्धिविषय इत्यभ्युपगमात् । ततश्चानवस्थापाताद् व्यतिरेकासिद्धौ तादात्म्यतदुत्पादासिद्धेर्न स्वभावः कार्य वा हेतुः ।
किञ्च तादात्म्यतदुत्पत्त्योरभावेऽपि कृत्तिकोदयरोहिण्यस्तङ्गमनयोगम्यगमकभावः प्रतीयते । तस्मात् कार्यकारणभावाद वा नियमः स्वभावाद् वेत्यनालोचिताभिधानम् ।
स्वभावेन हि कस्यचित् केनचित् सह सम्बन्धो नियतो निरुपाधिकत्वात् उपाधिकृतो हि सम्बन्धः तदपगमार्थं निवर्तते , न स्वाभाविकः । यदि धूमस्योपाधिकृतो वह्निसम्बन्ध : ? उपाधय उपलब्धाः स्युः , शिष्या . चार्ययोरिव प्रत्यासत्तावध्ययनम् । नहि वह्निधूमयोरसकृदुपलभ्यमानयोस्तदुपाधीनामनुपलम्भे किञ्चिद् बीजमस्ति । न चोपलभ्यमानस्य नियमेनानुपलम्या भवन्त्युपाधयः , ते हि यदि स्वरूपमात्रानुबन्धिनस्तथाप्यव्यभिचारसिद्धिः , तत्कृतस्यापि सम्बन्धस्य यावद्द्रव्यभावित्वात् । अथागन्तवः ?
तत्कारणान्यपि प्रती . येरन् । उपाधयस्तत्कारणानि च सर्वाण्यतीन्द्रियाणीति गुर्वीयं कल्पना । यस्य चोपाधयो न सन्ति स धूमः कदाचित् स्वतन्त्रोऽप्युपलभ्येत , यथेन्धनोपाधिकृतधूमसम्बन्धो वह्निः शुष्केन्धनकृताधिपत्यो विधूमः प्रत्यवमृश्यते । न च तथा संविदन्तरे धूमः कदाचिन्निरग्निराभाति ।
तस्मादुपलब्धिलक्षणप्राप्तानामुपाधीनामनुपलम्भादभावप्रतीतौ ( उपलब्धानामनुपलम्भादभावप्रतीतौ ) उपलब्धानां शेषकालेन्धनावस्थाविशेषाणां पुनः पुनर्दर्शनेषु व्यभिचारादहेतुत्वनिश्चये सति निखिल देशकालादिविशेषाध्याहारेण न उपाध्यभावोपलब्धिदोषः । सहभावदर्शनजसंस्कार सहकारिणा निरस्त प्रतिपक्षशङ्केन चरमप्रत्यक्षेण धूमसामान्यस्याग्निसामान्येन स्वभावमात्राधीनं सहभावं निश्चित्य इदमनेन नियतमिति नियमं निश्चिनोति ।
यद्यपि प्रथमदर्शनेऽपि सहभावो गृहीतः , तथापि न नियमग्रहणम् । नहि सहभावमात्रान्नियमः अपि तु निरुपाधिकसहभावात् । निरुपाधिकत्वं च तस्य भूयो दर्शनाभ्यासावशेषमित्यतो भूयः सहभावग्रहणबलभुवा सविकल्पकप्रत्यक्षेण सोऽध्यवसीयत इति । एतेन प्रत्यक्ष उपलब्धविद्यमानविषयत्वादतीतानागतासु व्यक्तिषु कथं नियमग्रहणमिति प्रत्युक्तम् । विशेषनिष्ठं व्याप्तिग्रहणमाचक्ष्महे । विशेषहान्या सामान्येन व्याप्तिग्रहणे तु सर्वत्रैव निर्विशङ्कः प्रत्ययः , तस्य सर्वत्रैकरूपत्वात् । किं व्यक्तयो व्याप्तावप्रविष्टा एव ? को वै ब्रूते न प्रविष्टा इति । किन्तु सामान्यरूपतया न विशेषरूपेण । अत एव धूमसंवित्या वह्निमात्रमेवानुसन्दधानस्तमनुधावति न विशेषमाद्रियते । यदि तु सामान्येन सर्वत्र निश्चितेऽपि नियमे निष्प्रामाणिकैराशङ्का क्रियते , तदा त्वत्पक्षेऽपि प्रत्यक्षेण दृष्टासु वह्निधूमव्यक्तिषु गृहीतेऽपि कार्यकारणभावे देशकालव्यवहितात् तद्भावसन्देहादत्रानुमानाप्रवृत्ति को निवारयति ?
अथोच्यते - भूयोदर्शनेन कार्यकारणभावो निर्द्धार्यते , सकृद्दर्शनेन तदुपाधिजत्वशङ्काया अनिवर्तनात् । भूयोदर्शनं च सामान्यविषयम् , क्षणिकानां व्यक्तीनां पुनः पुनर्दर्शनाभावात् । तेनानग्निव्यावृत्तस्याधूमव्यावृत्तस्य च सामान्यविषय : कार्यकारणभाव एकत्र निश्चीयमानः सर्वत्र विनिश्चितो भवति , सामान्यस्यैकत्वादिति चेत् ? अस्माभिरपीत्थमेव सर्वत्र निश्चीयमानो नियमः किं भवद्भ्यो न रोचते ? किञ्च भवतां प्रत्यक्षागोचरः सामान्येन कार्यकारणभावः , अनुभवतोऽवस्तुत्वात् व्यक्तयस्तादृश्यः । तासु सर्वाणि प्रत्यक्षेण गृह्यन्ते । न चातीतानागतानां व्यक्तीनां मनसा संकलनमिति न्याय्यम् , मनसो बहिरर्थे स्वातन्त्र्येऽन्धबधिराद्यभावप्रसङ्गात् । दृष्टासु व्यक्तिषु कार्यकारणभावोऽध्यवसायश्चादृष्टासु नानुमानोदयस्तदन्यत्वात् । नापि व्यक्तीनां साध्यसाधनभावो युक्तः , परस्परमनन्वितत्वात् । न च तासामेकेन सामान्येनोपग्रहः , वस्त्ववस्तुनोः सम्बन्धाभावात् असम्बद्धस्योपग्राहकत्वे चातिप्रसङ्गात् । तत्किविषय : प्रत्यक्षसाधनस्तदुत्पादविनिश्चयः यस्मादनुमानप्रवृत्तिरिति न विद्मः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — धर्मी ( हेतु ) में धर्म ( साध्य ) की अन्वयव्याप्ति एवं व्यतिरेकव्याप्ति इन दोनों के रहने पर भी बोद्धा पुरुष को यदि ' यह हेतु इस साध्य से व्याप्त है ' इस प्रकार से ' अविनाभाव ' रूप व्याप्ति का भान नहीं रहता है , तो फिर उस हेतु में उस साध्य का हेतुत्व ( अर्थात् ज्ञापकत्व ) नहीं रहता है । अतः अविनाभाव ( व्याप्ति ) का स्मरण भी अनुमेय की प्रतीति ( अनुमिति ) का सहकारिकारण है । यही बात विधिस्तु ' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलायी गयी है ।
' विधि ' अर्थात् अनुमिति की उत्पत्ति की रोति यह है कि ' जहाँ धूम है वहाँ अग्नि है , एवं जहाँ अग्नि नहीं है वहाँ धूम भी नहीं है ' इस प्रकार से ' समय ' अर्थात् अविनाभाव ( व्याप्ति ) की प्रतीति जिस पुरुष को है , उसे जब धूम का ' असन्दिग्ध ' ज्ञान अर्थात् ' यह धूम ही है , बाष्पादि नहीं ' इस आकार का ज्ञान होता है , तब ' साहचर्य के अनुस्मरण से ' अर्थात् जहाँ धूम है वहाँ वह्नि है ' इस प्रकार के स्मरण के बाद अग्नि की अनुमिति होती है | ( प्र ० ) यदि अनुमिति का यही क्रम निर्धारित हो जाता है तो फिर ' द्वितीय लिङ्गपरामर्श ' में ( अर्थात् ' साध्यव्याप्तिविशिष्टहेतुमान् पक्षः ' इस आकार के परामर्श में ) अनुमिति की कारणता का लाभ न होगा ?
( उ ० ) न हो , क्योंकि व्याप्ति का स्मरण और पक्षधर्मता का ज्ञान , इन दोनों से ही अनुमिति की उत्पत्ति हो जाएगी । ( प्र ० ) अनुमिति यदि ( व्याप्ति ) स्मरण के अव्यवहित उत्तर काल में ही उत्पन्न हो तो फिर वह कब किस देश ( पक्ष में उत्पन्न होगी - इसका कोई नियामक नही होगा ? ( उ ० ) ' लिङ्गदर्शन ' ही उसका नियामक होगा ( अर्थात् अनुमिति का पक्षधर्मताज्ञान रूप लिङ्गदर्शन ) जिस पक्ष में होगा , अनुमिति भी नियमतः उसी पक्ष में होगी ।
एवं उपनय रूप अवयव वाक्य के वैयर्थ्य की आपत्ति भी नहीं होगी , क्योंकि पक्षमता का प्रतिपादन अन्य अवयव वाक्यों से सम्भव नहीं है , अतः पक्षधर्मता का प्रतिपादन करने के लिए ही उपनय वाक्य का परार्थानुमान में प्रयोग होता है ।
( प्र ० ) यह ' अविनाभाव ' क्या वस्तु है ? यदि यह कहें कि ( उ ० ) अव्यभिचार
अविनाभाव है | ( प्र ० ) तो फिर यह पूछना है कि यह अव्यभिचार किससे ज्ञात ) होता है ?
इस प्रसङ्ग में बौद्धों का कहना है कि ( १ ) तादात्म्य और ( २ ) कार्य की उत्पत्ति इन दोनों से ही अव्यभिचार ( व्याप्ति ) गृहीत होती है । ( १ ) ( तदुत्पत्तिमूलक व्याप्ति के मानने में यह युक्ति है कि ) दो वस्तुओं का आकस्मिक ( यादृच्छिक ) सम्बन्ध जिस प्रकार कभी होता है । उसी प्रकार कभी नहीं भी होता है । अतः यह सम्बन्ध व्याप्ति का नियामक नहीं हो सकता ।
( २ ) यदि उसी हेतु में साध्य की व्याप्ति मानें , जिसकी प्रतीति सपक्ष ( दृष्टान्त ) में हो और विपक्ष में उसकी प्रतीति न हो तो यह भी सम्भव नहीं होगा , क्योंकि इस ( सपक्षदर्शन और विपक्षादर्शन ) के बाद भी हेतु के विपक्ष में होने की सम्भावना का निराकरण नहीं हो सकता । किन्तु जब यह निश्चय हो जाता है कि ' इस हेतु की उत्पत्ति उस साध्य से हुई है ' तो फिर उक्त शङ्का , ( सम्भावना ) का निराकरण हो जाता है , क्योंकि कारण के बिना कार्य की स्वरूपस्थिति ही नहीं हो सकती ।
' हेतु रूप कार्यं साध्य रूप कारण से उत्पन्न होता है ' इस प्रकार का निर्णय रूप ' तदुत्पत्ति विनिश्चय ' प्रत्यक्ष रूप उपलम्भ और अनुपलम्भ को मिला कर पांच कारणों से उत्पन्न होता है | ( इनमें तीन कार्य सम्बन्धी हैं ) । ( १ ) उत्पत्ति से पहिले कार्य की अनुपलब्धि , ( २ ) कारण के उपलब्ध होने पर कार्य की उपलब्धि , एवं ( ३ ) उपलब्ध होने के बाद भी कारण की अनुपलब्धि से कार्य की ( पुन : ) अनुपलब्धि , इस प्रकार कार्य का एक उपलम्भ और दो अनुपलम्भ ये तीन होते हैं ।
एवं कारण का ( १ ) उपलम्भ और ( २ ) कारण का अनुपलम्भ ये दो हैं । इन उपलम्भों और अनुपलम्भों को मिलाकर इन्हीं पाँच कारणों के रहने पर यह निश्चय होता है कि वह्नि के रहने से ही धूम की सत्ता है , और वह्नि के न रहने से धूम की सत्ता नहीं रहती है ।
कोई भी वस्तु ' कार्य ' नाम से इसी लिए अभिहित होती है कि कारण के रहने से ही उसकी सत्ता होती है , और कारण के न रहने से उसकी सत्ता नहीं रहती है ( अर्थात् ' कार्य ' वही है जिसकी सत्ता कारण को सत्ता के अधीन हो , और कारण को सत्ता न रहने पर जो सत्ता का लाभ न कर सके ) हेतु में साध्य की तादात्म्य प्रतीति से भी अविनाभाव ( या व्याप्ति ) का निश्चय होता है । यह नहीं हो सकता कि वस्तुओं का स्वभाव उनमें कभी रहे और कभी नहीं , ऐसा मानने पर तो वस्तुओं का कोई स्वभाव हो नहीं रह जाएगा ।
जिस धर्म के बिना भी धर्मी रह सके वह धर्म उस धर्मी का ' स्वभाव ' कैसे होगा ? विपक्ष में बाधकप्रमाण की प्रवृत्ति से ही हेतु में साध्य का तादात्म्य निश्चित्त होता है । यदि विपक्ष में बाधक प्रमाण की प्रवृत्ति न हो तो फिर सैकड़ों स्थानों में साध्य और हेतु दोनों को साथ देखने पर भी ' जहाँ साध्य नहीं है , वहां भी यह हेतु कभी रह सकता है इस शङ्का का निवारण कौन करेगा ?
यही बात ' कार्यकारणभावाद्वा ' इत्यादि श्लोक के द्वारा इस प्रकार कही गयी है । कि कार्यकारणभाव रूप नियामक और स्वभाव ( तादात्म्य ) रूप नियामक इन दोनों से ही अविनाभाव का निश्चय होता है , हेतु का सपक्ष में दर्शन और विपक्ष में अदर्शन से ( अविनाभाव का निश्चय नहीं होता है ) ।
इस प्रसङ्ग में हम ( वैशेषिक ) लोग पूछते हैं कि ( १ ) क्या जिस साध्य का तादात्म्य जिस हेतु में रहता है , उसी हेतु उस साध्य का अव्यभिचार ( व्याप्ति ) रहता है ? एवं जिस साध्य से जिस हेतु की उत्पत्ति होती है , उसी हेतु में उस साध्य का अव्यभिचार ( व्याप्ति ) रहता है ? ( २ ) अथवा जिस हेतु में साध्य की व्याप्ति रहती है , उसी हेतु में उस साध्य का तादात्म्य या जन्यत्व रहता है ?
इन दोनों में प्रथम कल्प इस लिए ठीक नहीं है कि वह्नि से धूम की उत्पत्ति होने पर भी धूम के पार्थिवत्वादि धर्मों के साथ वह्नि का व्यभिचार है ( अतः पार्थिवत्वादि धर्म से अभिन्न धूम के साथ वह्नि का व्यभिचार भी है ही , क्योंकि धर्म और धर्मी आपके मत से एक हैं ) ।
एवं ( ' वृक्षः शिशपाया : ' इत्यादि स्थलों में ) शिशपा में यद्यपि वृक्ष का तादात्म्य है , फिर भी वृक्षत्व में ' विशेष ' का अर्थात् शिशपा का व्यभिचार है ( क्योंकि विल्वादि वृक्ष होने पर भी शिशपा नहीं है | ) यदि उसका यह अर्थ करें कि जिस हेतु में साध्य का अव्यभिचार है , वहाँ साध्य निरूपित उत्पत्ति ( साध्य रूप कारण जन्यत्व ) या साध्य का तादात्म्य अवश्य है ।
तो फिर इसका अभिप्राय यह हुआ कि हेतु में साध्य के अव्यभिचार के रहने के कारण ही उस हेतु में रहनेवाले साध्य के तादात्म्य या साध्य रूप कारणजन्यत्व दोनों में साध्य की ज्ञापकता है । यदि यह स्थिति है तो फिर अव्यभिचार को ही साध्य का ज्ञापक मानिए ? साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति को इन सबों को बीच लाने का क्या प्रयोजन है ?
क्योंकि हेतु साध्य से उत्पन्न होता है या साध्य से अभिन्न है , इन दोनों में से किसी भी कारण से हेतु में साध्य की ज्ञापकता नहीं है , किन्तु हेतु इस लिए साध्य का ज्ञापक है कि उसमें साध्य का अव्यभिचार है । ( प्र ० ) धूम की उत्पत्ति तो वह्नि से होती है किन्तु धूम के पार्थिवत्वादि धर्म तो वह्नि से उत्पन्न नहीं होते ।
( उ ० I ) यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि वस्तु का एक ही स्वरूप होता है ( अतः धूम को यदि वह्नि जन्य मानना है , तो उसमें रहनेवाले वस्तुतः तदभिन्न पार्थिवत्वादि को भी वह्नि जन्य मानना ही होगा ) अतः कथित व्यभिचार है ही ।
यह भी निश्चय नहीं है कि शिशपा तो वृक्ष रूप है , किन्तु ( वृक्षत्व के आश्रय
खदिरादि अन्य वृक्षों में भी साधारण रूप से रहने के कारण वृक्षत्व शिशपा स्वरूप नहीं है क्योंकि वृक्ष और शिशपा दोनों अभिन्न हैं । यदि ( प्र ० ) यह कहें कि वृक्षत्व ( शिशपा की तरह उससे भिन्न ) धवादि में भी है किन्तु शिशपात्व तो केवल शिशपा में ही है , धवादि में नहीं । ( उ ० ) तो फिर वृक्षत्व और शिशपात्व दोनों एक नहीं हो सकते , क्योंकि स्वभावों की विभिन्नता ही वस्तुओं की विभिन्नता है । यदि शिशपात्व और वृक्षत्व को अभिन्न मानें तो फिर जिस प्रकार वृक्षत्व सभी वृक्षों में रहता है , उसी प्रकार ( वृक्षत्व से अभिन्न ) शिशपास्व की सत्ता भी सभी वृक्षों में माननी ही पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि यदि वृक्षत्व और शिशपात्व में अभेद मानें तो यह निर्द्धारण नहीं हो सकता कि शिशपात्व ही वृक्षत्व का ज्ञापक है , वृक्षत्व शिशपात्व का ज्ञापक नहीं । क्योंकि ज्ञाप्यज्ञापकभाव भेदों के अधीन है ( अर्थात् ज्ञाप्य और ज्ञापक को परस्पर भिन्न ही होना चाहिए ) । शिशपात्व का ज्ञान हो जाने पर भी यदि वृक्षत्व अज्ञात ही रहता है , तो फिर शिशपात्व और वृक्षत्व में तादात्म्य कहाँ ? यदि शिशपात्व के गृहीत होने पर उसी ज्ञान से वृक्षत्व भी गृहीत हो जाता है , तो फिर वृक्षत्व के अनुमान की ही कौन सी सम्भावना है ?
यदि यह कहें कि ( प्र ० ) अपने स्वरूप में अवस्थित शिशपावृक्ष रूप धर्मी एवं वृक्षत्व और शिशपात्व रूप दोनों धर्मं , ये तीनों वस्तुतः एक ही हैं । अतः धर्मी के गृहीत होने पर वृक्षत्व और शिशपात्व रूप उसके धर्म भी उसी ज्ञान से गृहीत हो जाते हैं । जैसा कहा गया है कि " तस्मात् किसी भी धर्मी के प्रत्यक्ष होने पर उसी प्रत्यक्ष के द्वारा उसके सभी धर्मों का भी प्रत्यक्ष हो जाता है । अतः उसका कौन सा अंश देखने से बच जाता है , जिसकी परीक्षा अन्य प्रमाणों से की जाय । "
तब यह बात रही कि ( उस ज्ञान में शिवपात्व की तरह वृक्षत्व भी यदि भासित होता है तो फिर ) उस विकल्प ( विशिष्ट ज्ञान ) का अभिलाप ' यह शिशपा है ' इस शब्द के द्वारा क्यों होता है ? ' यह वृक्ष है ' इस प्रकार के शब्दों के द्वारा क्यों नहीं ? इस प्रश्न का यह उत्तर है कि उस समय वृक्ष शब्द की स्मृति नहीं रहती है । इसी स्मृति के न रहने के ' अपराध ' से हो वृक्ष शब्द से उसका अभिलाप नहीं हो पाता ।
शिशपा शब्द की स्मृति से जिस शिशपा विषयक विकल्प ज्ञान की उत्पत्ति होती है , उसका पर्यवसान ' अशिशपाव्यावृत्ति ' रूप ' अपोह ' में हो होता है , उससे ' अवृक्षव्यावृत्ति ' रूप ' अपोह ' का ज्ञान नहीं होता । यदि ऐसा हो तो सभी विशिष्ट ज्ञानों के बोधक शब्द एकार्थक हो जएँगे ( अर्थात् सभी ज्ञान एक विषयक हो जाएँगे ) ।
एक की व्यावृत्ति ( अपोह ) ही दूसरी व्यावृत्ति की ज्ञापिका हो सकती है ( फलतः ज्ञाप्यज्ञापकभावसम्बन्ध दो अपोहो में ही हो सकता है ) किन्तु व्यावृत्ति के आश्रयों में ज्ञाप्यज्ञापकभाव नहीं हो सकता , क्योंकि ( क्षणिक होने के कारण उनमें परस्पर सामानाधिकरण्य रूप ) अन्वय हो सम्भव नहीं है ।
( वृक्ष और शिशपा इन दोनों के अभिन्न होने पर भी ) अवृक्षव्यावृत्ति और अशिंशपाव्यावृत्ति ये दोनों अपोह तो भिन्न हैं क्योंकि दोनों अपोहों के व्यवच्छेद्य भिन्न हैं अतः कथित ( सभी ज्ञानों में एक विषयत्व की ) आपत्ति नहीं है ।
( उ ० ) यह तो आप जैसे पण्डितों का आगे और पीछे अनुसन्धान करने की अपूर्व ही चतुरता है , जिससे यह इन्द्रजाल सम्भव होता है कि तादात्म्य ( अभेद ) को तो अनुमान का प्रयोजक मानते हैं , और कहते हैं कि साध्य और साध्य से अभिन्न हेतु इन दोनों की व्यावृत्तियाँ ( अपोह ) भिन्न हैं ।
( प्र ० ) वृक्ष और शिशपा इन दोनों में यद्यपि तादात्म्य है , किन्तु वृक्ष और शिशपा इन दोनों से क्रमशः अभिन्न रूप से निश्चित अवृक्षव्यावृत्ति ( वृक्षभिन्नभिन्नत्व ) और अशिशपाव्यावृत्ति ( शिशपा- भिन्नभिन्नत्व ) ये दोनों व्यावृत्तियाँ परस्पर भिन्न हैं ।
अतः दोनों व्यावृत्तियों में वास्तविक भेद रहते हुए भी ज्ञानीय अभेद ( अर्थात् ' दोनों अभिन्न हैं ' इस आकार के भ्रमात्मक ज्ञान के द्वारा गृहीत अभेद ) है , और इसी अभेद के कारण अशिशपाव्यावृत्ति रूप हेतु के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होता है | ( उ ० ) यह कहना भी सम्भव नहीं है ( क्योंकि इससे अन्योन्याश्रय दोष होगा ) चूँकि तादात्म्य के रहने पर अशिशपाव्यावृत्ति के द्वारा वृक्ष रूप धर्मी में अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होगा , कथित साध्य साधनभूत दोनों व्यावृत्तियों में तादात्म्य तब होगा जब कि पक्ष रूप शिशपा में अनुमान के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति की प्रतीति हो जाएगी , अतः अन्योन्याश्रय दोष होगा ।
( प्र ० ) व्याप्ति ज्ञान के समय में ही जो दोनों व्यावृत्तियों का अभेद गृहीत होता है , उसी से तादात्म्य की सिद्धि होती है अतः ( अनुमितिमूलक उक्त अन्योन्याश्रय दोष नहीं है ) | ( उ ० ) तो फिर यह कहिए कि अभिन्न रूप से ज्ञायमान दोनों व्यावृत्तियों का अभेद काल्पनिक है , वास्तविक नहीं । यदि हेतु प्रभृति के काल्पनिक ज्ञान से भी अनुमान को प्रवृत्ति मानें तो हेत्वाभास नाम की कोई वस्तु ही नहीं रह जाएगी ।
इस प्रकार तो प्रमेयत्व एवं अनित्यत्व इन दोनों में भी एकात्मता ( अभेद ) का विपर्यय हो ही सकता है , और इस विपर्यय रूप अध्यवसाय के द्वारा प्रमेयत्व और अनित्यत्व में भी काल्पनिक अभेद रहेगा ही । ( प्र ० ) ( जहाँ अनित्यत्वं नहीं है , वहाँ भी प्रमेयत्व है , इस प्रकार ) विपक्षव्यावृत्ति के न रहने के कारण प्रमेयत्व के साथ अनित्यत्व का तादात्म्य नहीं है ।
( उ ० ) यह सत्य है कि उन दोनों में प्रामाणिक तादात्म्य नहीं है , किन्तु काल्पनिक तादात्म्य तो है , तुम लोगों ने काल्पनिक तादात्म्य को ही तो अनुमानोदय के परम सहायक रूप में समर्थन किया है ? अतः प्रकृत में विपक्षव्यावृत्ति का रहना और न रहना दोनों ही बराबर हैं ।
और भी बात है कि व्याप्ति के प्रयोजक तादात्म्य और उत्पत्ति के रहने पर विपक्ष में हेतु के जिस अभेद की प्रतीति से जिसकी प्रतीति होगी , उस हेत्वभाव की प्रतीति के लिए भी श्यानुपलब्धि की आवश्यकता होगी , क्योंकि अभाव विषयक सभी प्रतीतियों के लिए दृश्यानुपलब्धि को कारण माना गया है । दृश्यानुपलब्धि भी कोई अतिरिक्त प्रमाण नहीं है , किन्तु अनुमान ही है ।
अत : इस दृश्यानुपलब्धि रूप अनुमान प्रमाण के लिए भी विपक्ष में हेत्वभाव के साथ - साथ हेतु में साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति की प्रतीति आवश्यक होगी । इस तादात्म्य और उत्पत्ति की प्रतीति के लिए भी विपक्ष में हेत्वभाव की प्रतीति आवश्यक होगी । एवं इस हेत्वभाव की प्रतीति के लिए फिर दूसरी दृश्यानुपलब्धि आवश्यक होगी , क्योंकि जितने भी प्रतिषेध हैं , सभी को अनुपलब्धि प्रमाण का विषय माना गया है ।
इस अनवस्था दोष के कारण विपक्ष में हेतुव्यतिरेक ( हेत्वभाव ) की सिद्धि सम्भव न होने के कारण कथित तादात्म्य एवं उत्पत्ति की सिद्धि हो सम्भव नहीं है , अतः हेतु में साध्य का तादात्म्य या हेतु का साध्य से उत्पन्न होना ही हेतु में साध्य की व्याप्ति का कारण नहीं हो सकता ।
दूसरी बात यह है कि कृत्तिका नक्षत्र का उदय एवं रोहिणी नक्षत्र का अस्त इन दोनों में ज्ञाप्यज्ञापकभाव की प्रतीति होती है , किन्तु इन दोनों में से न किसी का किसी में तादात्म्य है और न किसी की उत्पत्ति ही किसी से होती है । तस्मात् बिना पूर्ण आलोचन के ही यह कह दिया गया है कि ' नियम ' अर्थात् व्याप्ति की प्रतीति हेतु में साध्य की जन्यता या तादात्म्य की प्रतीति से ही होती है ।
अभिप्राय यह है कि स्वभाव के द्वारा ही किसी भी वस्तु का किसी वस्तु के साथ जो सम्बन्ध स्थापित होता है वही उपाधि से शून्य होने के कारण ' नियम ' कहलाता है । उपाधिमूलक सम्बन्ध हो उपाधि के हटने पर टूटता है , स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं 1 । यदि धूम में वह्नि का सम्बन्ध भी उपाधिमूलक ही हो तो फिर उन उपाधियों की उपलब्धि उसी प्रकार होनो उचित है , जिस प्रकार कि शिष्य और आचार्य की उपलब्धि के बाद अध्ययन रूप उपाधि की उपलब्धि होती है ।
इसका कोई हेतु नहीं मालूम होता कि बार बार उपलब्ध होनेवाले वह्नि और धूम के सम्बन्ध की उपलब्धि तो हो , किन्तु उसकी प्रयोजिका उपाधि की उपलब्धि न हो । इसमें भी कोई हेतु नहीं है , कि उपलब्ध होनेवाली वस्तुओं के सम्बन्ध की उपाधियाँ नियमतः अनुपलभ्य ही हों । ये ( उपाधियाँ ) यदि अपनी स्वरूपसत्ता के कारण ही अपने उपधेयों ( साध्य और हेतुओं ) के सम्बन्ध के कारण हैं , फलतः नित्य हैं ।
तो भी व्याप्ति की सिद्धि हो ही जाती है , क्योंकि यह औपाधिक सम्बन्ध अपने उपधेय रूप सम्बन्बियों की सत्ता तक विद्यमान ही रहता है । यदि ये आगन्तुक हैं ? अर्थात् कारणों से उत्पन्न होते हैं तो फिर उनके कारणों की भी प्रतीति होनी चाहिए । यह कल्पना तो बहुत गौरवपूर्ण होगी कि उपाधियाँ और उनके कारण सभी अतीन्द्रिय ही हैं । जिन हेतुओं के उपाधि नहीं होते , वे कदाचित् स्वतन्त्र रूप से ( साध्य सम्बन्ध के बिना ) भी उपलब्ध होते हैं ।
किन्तु उपाधि से रहित धूम हेतु कभी भी स्वतन्त्र रूप से ( वह्नि को छोडकर ) उपलब्ध नहीं होता है , जैसे कि उपाधिमूलक सम्बन्ध के योग्य वह्नि ही जब सूखी हुई लकड़ियों से उत्पन्न होती है तो बिना धूम सम्बन्ध के भी देखी जाती है , यद्यपि वह्नि ही जब गीली लकड़ी से उत्पन्न होती तब उसमें धूम के उपाधिमूलक सम्बन्ध की भी योग्यता है , किन्तु धूम की कोई भी प्रतीति वह्नि सम्बन्ध को छोड़कर नहीं होती है ।
तस्मात् जिन उपाधियों में उपलब्ध होने की योग्यता है ( अर्थात् जिनकी उपलब्धि हो सकती हैं ) उनकी अनुपलब्धि से ही उपाधियों के अभाव की सिद्धि होती है । इस प्रकार उपाधि के अभाव की प्रतीति हो जाने पर आर्द्रेन्धन संयोग रूप उपाधि से युक्त वह्नि हेतु में बार बार धूम का व्यभिचार देखे जाने पर वह्नि हेतु में अहेतुत्व ( हेत्वाभासत्व ) का निश्चय हो जाता है ।
अत : ' सभी देशों में या सभी कालों में उपाधि के अभाव की उपलब्धि नहीं हो सकती ' केवल इसी कारण सभी हेतुओं में उपाधि संशय की आपत्ति नहीं दी जा सकती । अतः धूम सामान्य में वह्नि सामान्य का जो स्वाभाविक सामानाधिकरण्य है , उसके निश्चय से हो ' यह ( धूम ) इससे ( वह्नि से ) नियत है ' इस प्रकार से ( व्याप्ति रूप ) नियम का ज्ञान होता है ।
( व्याप्ति के कारणीभूत उक्त सामानाधिकरण्य का निश्चय ) प्रतिपक्ष शङ्का से रहित उस अन्तिम प्रत्यक्ष से होता है , जिसमें उसे सहभाव विषयक प्रत्यक्ष से उत्पन्न संस्कार के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । यद्यपि प्रथमतः ही जब धूम और वह्नि साथ साथ देखे जाते हैं , तब भी दोनों का सामानाधिकरण्य गृहीत ही रहता है , तथापि उससे नियम ( व्यासि ) का ग्रहण नहीं होता । किन्तु उपाधिरहित सहभाव से ही व्याति का ग्रहण होता है ।
बार बार साध्य और हेतु को साथ देखने से ही उपाधि के अभाव का निश्चय होता है | अतः बार बार सामानाधिकरण्य के दर्शन के द्वारा बलप्राप्त ( सामानाधिकरण्य विषयक ) सवि - कल्पक प्रत्यक्ष से हो वह ( नियम ) गृहीत होता है ।
इससे नियम ( ब्याप्ति ) ग्रहण के प्रसङ्ग में इस आपत्ति का भी समाधान हो जाता है कि ( प्र ० ) प्रत्यक्ष केवल वर्तमान काल की वस्तुओं का हो होता है , अतीत में बीते हुए एवं भविष्य काल में होनेवाले अनन्त हेतु ( धूमादि ) व्यक्तियों में ( वह्नि आदि ) साध्य के नियम ( व्याप्ति ) का ( प्रत्यक्ष रूप ) ग्रहण कैसे होगा ?
( उ ० 1 ) हम लोग विशेष व्यक्तियों में अलग अलग व्याप्तिग्रहण नहीं मानते , किन्तु विशेष को ोड़कर केवल हेतुसामान्य में साध्यसामान्य की व्याप्ति का ग्रहण मानने से ही सभी हेतुओं में व्याप्ति का शङ्का से सर्वथा रहित निश्चय हो जाएगा । क्योंकि सामान्यमुखी व्याप्ति सभी व्यक्तियों में समान । ( प्र ० ) तो क्या व्याप्तिग्रहण में विशेष्य रूप से ( हेतु ) व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता ? ( उ ० ) कौन कहता है कि व्याप्ति के ग्रहण में व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता है ।
' व्याप्ति सामान्य विषयक ही है , विशेष विषयक नहीं ' इसका इतना ही अभिप्राय है कि व्याप्तिबुद्धि में विशेष भी सामान्य रूप से ही भासित होते हैं , अपने असाधारण तत्तद्वयक्तित्वादि रूपों से नहीं । अत एव धूम के ज्ञान से वह्नि सामान्य की अनुमिति के द्वारा प्रमाता वह्नि सामान्य का ही अनुधावन करता है , किसी विशेष प्रकार के वह्नि का आदर वह नहीं करता ।
यदि हेतु सामान्य में साध्य सामान्य की व्याप्ति के निश्चित हो जाने पर भी अत्रामाणिक लोग यह शङ्का करें कि तुम्हारे मत में भी यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत धूम और प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत
इन दोनों में कार्यकारणभाव के गृहीत होने पर भी विभिन्न देशों के धूमों और वह्नियों में एवं विभिन्न काल के धूमों और वह्नियों में कार्यकारणभाव का सन्देह बना ही रहेगा तो फिर इस सन्देह के कारण सभी अनुमानों के उच्छेद का निवारण कौन कर सकेगा ?
यदि यह कहें कि ( प्र ० ) हेतु और साध्य को बार बार एक स्थान में देखने ( भूयो दर्शन ) से दोनों में कार्यकारणभाव का निश्चय होता है । कहीं एक बार हेतु और साध्य दोनों में सामानाधिकरण्य के देखने पर भी यह संशय रह ही जाता है कि इन दोनों का सम्बन्ध स्वाभाविक है , या औपाधिक ? बार बार का यह देखना ( भूयो - दर्शन ) साध्य सामान्य का हेतु सामान्य के साथ ही हो सकता है , एक साध्य व्यक्ति का एक हेतु व्यक्ति के साथ नहीं , क्योंकि व्यक्ति क्षणिक हैं । अतः उनको बार बार साथ देखना सम्भव नहीं है ।
तस्मात् अनग्निव्यावृत ( अपोह या अग्नित्व जाति ) अधूम व्यावृत्त ( अपोह या धूमत्व जाति ) इन दोनों का सामान्य विषयक कार्यकारणभाव ही गृहीत होता है । ' धूम सामान्य की उत्पत्ति वह्निसामान्य से होती है ' यह निश्चित हो जाने पर सभी घूमों और सभी वह्नियों में कार्यकारणभाव गृहीत हो जाता है , क्योंकि सामान्य ( अपोह ) एक ही है । ( उ ० ) इसी प्रकार जब हम हेतु सामान्य में साध्य सामान्य के नियम ( व्याप्ति ) का उपपादन करते हैं , तो आप लोगों को क्यों पसन्द नहीं आता ?
आप लोगों का सामान्य ( अपोह ) चूंकि अभाव रूप है , अतः सामान्यों में आप लोग ( बौद्धगण ) कार्यकारणभाव का अनुभव नहीं कर सकते । व्यक्ति सभी प्रत्यक्ष के विषय हैं अतः उनमें कार्यकारणभाव का ग्रहण होता है ।
यह कहना भी उचित नहीं है कि ( प्र ० ) भूत और भविष्य व्यक्तियों का ( चक्षुरादि से ज्ञान सम्भव न होने पर भी ) मन से ग्रहण हो सकता है ( अतः अतीत और अनागत व्यक्तियों में भी कार्यकारणभाव का ग्रहण असम्भव नहीं है ) | ( उ ० ) ( यह सम्भव इस लिए नहीं है कि ) मन को यदि बाह्य अर्थों के ग्रहण में स्वतन्त्र ( अर्थात् चक्षुरादि निरपेक्ष ) मान लिया जाय तो जगत् में कोई गूँगा या बहरा न रह जाएगा ।
इस प्रकार भी बोद्धों के मत से उपपत्ति नहीं की जा सकती कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत व्यक्तियों में हो कार्यकारण भाव गृहीत हो सकता है , किन्तु ( व्याप्ति ) का निश्चय अदृष्ट व्यक्तियों में भी होता है , चूँकि व्यक्ति भिन्न भिन्न हैं । व्यक्तियों में परस्पर कार्यकारणभाव भी सम्भव नहीं है , क्योंकि वे परस्पर असम्बद्ध हैं ।
उन सभी व्यक्तियों का एक सामान्य धर्म ( अपोह ) के द्वारा संग्रह भी सम्भव नहीं है , क्योंकि वस्तु ( भाव ) और अवस्तु ( अभाव ) इन दोनों में सम्बन्ध हो ही नहीं सकता , यदि सम्बन्ध के न रहने पर भी संग्रह मानें तो ( अघटव्यावृत्ति रूप अपोह से पट व्यक्तियों का संग्रह रूप ) अतिप्रसङ्ग होगा । अतः यह समझ में ही नहीं आता कि प्रत्यक्ष के द्वारा किसमें उत्पत्ति का निश्चय होगा ? जिससे कि अनुमान की प्रवृत्ति होगी ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ४९५) १. अर्थात् वृक्ष और शिंशपा इन दोनों में अगर अभेद है एवं इस कारण शिंशपा वृक्षात्मक है तो फिर यह कैसे कह सकते हैं वृक्ष शिंशपात्मक नहीं है ।
(पृ. ४९६) १. उक्त विवरण के अनुसार शिंशपात्व का यह स्वभाव निष्पन्न होता है कि वह केवल शिशपा में ही रहे , और वृक्षत्व का यह स्वभाव निष्पन्न होता है कि वह शिंशपा में रहे और उससे भिन्न धवखदिरादि सभी वृक्षों में भी रहे , तो फिर विभिन्न स्वभाव की ये दोनों वस्तुएँ एक कैसे हो सकतीं हैं ?
(पृ. ४९७) १. अवृक्षव्यावृत्त हैं वृक्ष से भिन्न सभी पदार्थों के भेदों का समूह एवं अशिंशपाव्यावृत्त है शिंशपावृक्षमात्र को छोड़ और सभी पदार्थों के भेदों का समूह , इन दोनों भेदों के समूह भिन्न हैं , क्योंकि दोनों भेदों के प्रतियोगी समूह अलग अलग हैं , पहले प्रतियोगि समूह में शिंशपा नहीं है , क्योंकि शिंशपा भी वृक्ष ही है । दूसरे समूह में शिंशपा को छोड़कर और सभी वृक्ष भी हैं क्योंकि सभी वृक्ष शिंशपा नहीं हैं । ६३
पृ. ५०३
एवं सर्वत्र देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम् ।
शास्त्रे च निदर्शनार्थं कृतं नाव- कार्यादिग्रहणं धारणार्थम् , कस्मात् १ व्यतिरेकदर्शनात् ।
तद्यथा अध्वर्युरों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुर्लिङ्गम् , चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेः कुमुदविकासस्य च शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्येति ।
एवमादि तत् सर्वमस्येदमिति सम्बन्धमात्रवचनात् सिद्धम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसी प्रकार और सभी स्थानों में एक वस्तु में जिस किसी दूसरी वस्तु की दैशिक और कालिक व्याप्ति रहती है , वह एक वस्तु उस दूसरे का ज्ञापक हेतु होता है । वैशेषिक सूत्र में जो व्याप्ति के लिए कार्यादि सम्बन्धों का उल्लेख है , वह केवल उदाहरण के लिए ही है , अवधारण के लिए नहीं । क्योंकि ( कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से किसी के न रहने पर भी अनुमान होता है ) जैसे कि ओंकार को सुनाते हुए अध्वर्यु समूह अपने से व्यवहित भी होता हवन करनेवाले ) के अनुमापक होते हैं । अथवा चन्द्र का उदय समुद्र की वृद्धि और कुमुद के विकास का अनुमापक होता है । अथवा शरद् ऋतु में जल की स्वच्छता अगस्त्य नाम के नक्षत्र के उदय का ज्ञापक होती है । ( व्याप्ति के प्रयोजक ) कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों से भिन्न इन वस्तुओं में व्याप्ति के प्रयोजक अवशिष्ट सभी सम्बन्धों का संग्रह सूत्रकार ने उक्त सूत्र के ' अस्येदम् ' इस वाक्य के द्वारा किया है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
एवं देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम् , यथा धूमो वह्नेलिङ्गम् । एवं देशाविनाभूतं कालाविनाभूतं चेतरस्य साध्यधर्मस्य लिङ्गम् । यथा काश्मीरेषु सुवर्णभाण्डागारिक पुरुषैर्यववाटिकासंरक्षणं यवनालेषु हेमाङकुरोद्भेदस्य लिङ्गम् । कालाविनाभूतं यथा प्राग्ज्योतिषाधिपतेर्वेश्मनि प्रातर्गायनादीनि नृपतिप्रबोधस्य लिङ्गम् । यदि देशकालाविनाभावमात्रेण गमकत्वं ननु सूत्रविरोध : ? अस्येदं कार्यं कारणं संयोगि विरोधि समवायि चेति लैङ्गिकमिति , तत्राह - शास्त्रे च कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतं नावधारणार्थमिति । अस्येदमिति सूत्रे कार्यादीनामुपादानं लिङ्गनिदर्शनार्थं कृतम् , न त्वेतावन्त्येव लिङ्गानीत्यवधारणार्थम् । कथमेतदित्याह - कस्मादिति । उत्तरमाह - व्यतिरेकदर्शनादिति । कार्यादिव्यतिरेकेणाप्यनुमानदर्शनाद् नावधारणार्थम् । ( तत्र ) यत्र कार्यादीनां व्यतिरेकस्तद्दर्शयति - यथाध्वर्युरो श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गमिति । अध्वर्युर्होतारमोम् इत्येवं श्रावयति नान्यमित्येवं यस्य पूर्वमवगतिभूतस्य ओं इति श्रावयन्तमध्वर्यु प्रतीत्य कुडचादिव्यवहिते होतरि अनुमानं होताप्यत्रास्तीति । न चाध्वर्युः होतुः कार्यं न कारणं न संयोगे ( गी ) न च विरोधे ( धी ) न समवाये ( यी ) चेति व्यतिरेकः ।
उदाहरणान्तरमाह – चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेरित्यादि । यदा चन्द्र उदेति तदा समुद्रो वर्द्धते कुमुदानि च विकसन्तीति नियमो येनावगतः , तस्य चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेः कुमुदविकासस्य च लिङ्गं स्यात् । न च चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धिकुमुदविकासयोः कार्यम् । उदयो हि चन्द्रस्य विशिष्टदेशसंयोगः , स च चन्द्रक्रियाकार्य :, न समुद्रवृद्धयादिनिमित्तः । न चायं समुद्रवृद्धेः कारणं नापि कुमुदविकासस्य , उत्कल्लोललक्षणाया वृद्धेः , पत्राणां परस्परविभागलक्षणस्य च विकासस्य तत्कालसन्निहितकारणाधीनकर्मजन्यत्वादित्यादि वाच्यम् । शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्य प्रसादो वैशद्यम् , तच्छरदि प्रतीयमानमगस्त्योदयस्य लिङ्गम् , न कालान्तरे , व्यभिचारात् ।
कार्यादिव्यतिरिक्तमपि यदि लिङ्गमस्ति तहि नूनं तत्र सर्वलिङ्गानामनवरोधात आह— एवमादि तत् सर्वमस्येदमिति सम्बन्धमात्रवचनात् सिद्धमिति । अध्वर्यु श्रावयतीत्येवमादिपदाविनाभूतं लिङ्गं तत् सर्वमस्येदमिति पदेन सम्बन्धमात्रवचनात् सिद्धं परिगृहीतम् । अर्थान्तरमर्थान्तरस्य लिङ्गमिति न युज्यते ( इति ) प्रसक्तिः स्यादिति पर्यनुयोगमाशङ्कयेदमुक्तं सूत्रकारेणास्येदमिति । लिङ्गमित्यन्यत्वाविशेषेऽप्यस्य साध्यस्येदं सम्बन्धीति कृत्वा अस्येदं लिङ्ग न सर्वस्येति सामान्येन सम्बन्धिमात्रस्य लिङ्गत्वप्रतिपादनात् । यद्यस्य देशकालाद्यविनाभूतं तत् तस्य लिङ्गमित्युक्तम् , तदेव हि तस्य यद् यस्याव्यभिचारि ( a ) ( यद्यस्थ व्यभिचारि न तत् तस्य , अन्यत्रापि भावात् । अपि भोः ! किमस्येदं कार्यमिति न सम्बध्नातीति ब्रूनहे , कार्यादिग्रहणं तर्हि किमर्थम् ? निदर्शनार्थमित्युक्तम् । अवश्यं हि शिष्यस्योदाहरणनिष्ठं कृत्वा किमप्यव्यभिचारि लिङ्गं दर्शनीयमिति सूत्रे कार्यादिकमुदाहृतम् । न तावन्त्येव लिङ्गानीत्यर्थः ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — इसी प्रकार ( साध्य की ) दैशिक या कालिक व्याप्ति से युक्त एक पदार्थ ( हेतु ) दूसरे ( साध्य ) का ज्ञापक हो जाता है । जैसे कि धूम वह्नि का ज्ञापक हेतु है | ( अभिप्राय यह है कि ) दैशिक और कालिक व्याप्ति से युक्त ' एक ' ( हेतु ) पदार्थ ' इतर ' का अर्थात् साध्य रूप धर्म का ज्ञापक हेतु होता है ।
( दैशिक व्याप्ति से युक्त हेतु का उदाहरण यह है ) जैसे कि काश्मीर देश में जब यह देखा जाता है कि यव के क्यारियों का संरक्षण सोने के खजाने के अधिकारी लोग कर रहे हैं , तब यह समझा जाता है कि यब की क्यारियों में केसर के अङ्कुर उग आये हैं अतः काश्मीर देश की यव की क्यारियों का सोने के खजाने के अधिकारियों द्वारा संरक्षण ( रूप क्रिया ) यव को का उदाहरण यह है ) जैसे कि प्राग्ज्योतिषपुर ( आसाम ) के में क्यारियों में केसर के अङ्कुर का ज्ञात हेतु है ।
( एवं कालिक व्याप्ति से युक्त हतु प्रातःकालिक गाना बजाना वहाँ के राजा के जागरण का ज्ञापक हेतु है ।
राजगृह ( प्र ० ) यदि दैशिक व्याप्ति और कालिक व्याप्ति केवल इन दोनों सम्बन्धों में से किसी के रहने से ही हेतु में साध्य को समझाने का सामर्थ्य माना जाय तो फिर अस्येदं कार्यम् ' इस सूत्र का विरोध होगा ( क्योंकि इस सूत्र के द्वारा कार्यत्व , कारणत्व , संयोग , विरोध एवं समवाय इतने सम्बन्धों को ही हेतु में साध्य के ज्ञापन के सामर्थ्य का प्रयोजक माना गया है दैशिक और कालिक व्याप्ति को नहीं ) ।
इसी प्रश्न का समाधान ' शास्त्रे कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतम् , नावधारणार्थम् ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । अर्थात् वैशेषिक सूत्र रूप शास्त्र में जो कार्यत्वादि ' सम्बन्ध का उपादान किया गया है : उसका यह अवधारण रूप अर्थ अभिप्रेत नहीं है कि कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से ही किसी के रहने से हेतु साध्य का ज्ञापक होता है ।
किन्तु साध्य के ' व्याप्ति रूप सम्बन्ध से युक्त हेतु हो ज्ञापक होता है ' इस नियम के उदाहरण रूप में ही कार्यत्वादि सम्बन्धों का उल्लेख किया गया है कि साध्य के इन कार्यत्वादि सम्बन्धों से युक्त हेतु में साध्य की व्याप्ति रहती है । ' कस्मात् ' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न किया गया है कि कैसे समझते हैं कि उक्त सूत्र में ' कार्यादि ' का उपादान अवधारण के लिए नहीं है ? ' व्यतिरेकदर्शनात् ' इस वाक्य से उक्त प्रश्न का उत्तर दिया गया है ।
अर्थात कथित कार्यत्वादि सम्बन्ध के न रहने पर भी हेतु से साध्य का बोध होते देखा जाता है , अतः समझते हैं कि कार्यत्वादि सम्बन्धों का उल्लेख ' अवधारण ' के लिए नहीं है । इन कार्यत्वादि सम्बन्धों के न रहने पर भी जहाँ अनुमिति होती है , उसका प्रदर्शन ' यथाऽध्वर्यु ' रों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गम् ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है ।
जिस पुरुष को यह नियम पहिले से अवगत है कि होता को ही अध्वर्यु ओंकार सुनाते हैं किसी दूसरे को नहीं , वही पुरुष यदि अध्वर्यु को ओंकार का उच्चारण करते हुए देखता है और दीवाल से छिपे रहने के कारण होता को नहीं देखता , तब भी ' होता ' का यह अनुमान उसे होता है कि यहाँ होता भी अवश्य हैं । किन्तु अध्वर्युरूप हेतु होतारूप साध्य का न कार्य है , न कारण न संयोगी है , न विरोधी और न समवायी ।
अतः ( सूत्र में कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से अध्वर्यु में होता का कोई भी सम्बन्ध नहीं है , किन्तु उक्त अध्वर्युं से होता का अनुमान होता है , अतः ' कथित कार्यत्वादि सम्बन्ध के कारण ही हेतु ज्ञापक होता है ' इस नियम में यही व्यतिरेक व्यभिचार हैं ) ।
' चन्द्रोदयः समुद्रवृद्ध : ' इस वाक्य के द्वारा भाष्यकार ने उक्त व्यतिरेक व्यभिचार का दूसरा उदाहरण कहा है । ' जिस समय चन्द्रमा का उदय होता है , उस समय समद्र बढ़ जाता है और कुमुद के पुष्प प्रफुल्लित हो जाते हैं । यह नियम जिस पुरुष को ज्ञात है , उसके लिए चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि और कुमुदिनी के विकास का अवश्य ही ज्ञापक लिङ्ग होगा , किन्तु चन्द्रमा का उदय न समुद्र की वृद्धि से उत्पन्न होता है , न कुमुद के विकास से , क्योंकि चन्द्रमा का किसी विशेष देश के साथ संयोग ही चन्द्रमा का उदय है , चन्द्रमा का यह संयोग चन्द्रमा में रहनेवाली क्रिया से ही उत्पन्न होगा , समुद्र की वृद्धि प्रभृति कारणों से नहीं , ( अतः चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि का या कुमुद के विकास का कार्य नहीं है ) एवं चन्द्रमा का उदय न समुद्र की वृद्धि का कारण है , न कुमुद के विकाश का , क्योंकि समुद्र को वृद्धि है उसका उफान एवं कुमुद का विकास है
६४ उसके पत्रों का एक दूसरे से विभाग , ये दोनों ही उस समय अपने कारणों से उत्पन्न होनेवाले कर्मों से ही उत्पन्न होंगे ( चन्द्रमा की वृद्धि से नहीं , अतः चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि का कार्य भी नहीं है ) । ' शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्य लिङ्गम् ' ( इस वाक्य में प्रयुक्त ) ' प्रसाद ' शब्द का अर्थ है वैशद्य ( स्वच्छता ) , यह वैशद्य शरद् ऋतु में ( ही ) ज्ञात होकर अगस्त्य नाम के नक्षत्र के उदय का ज्ञापक लिङ्ग होता है , अन्य ऋतु में ज्ञात होने पर भी नहीं , क्योंकि व्यभिचार देखा जाता है ( अर्थात् ग्रीष्मादि ऋतुओं में जल में स्वच्छता का भान होने पर भी अगस्त्योदय की प्रतीति नहीं होती ) है ।
( प्र ० ) ( यदि साध्य के ) कार्यादि न होने पर भी कोई हेतु साध्य का ज्ञापक हो सकता है , तो फिर ' अस्येदं कार्यम् ' इत्यादि सूत्र द्वारा लिङ्ग के जिन प्रकारों का उल्लेख किया गया है , उनसे सभी हेतुओं का संग्रह नहीं होता है ? ( जिससे सूत्रकार की न्यूनता होती है ) इसी प्रश्न का समाधान भाष्यकार ने ' एवमादि ' इत्यादि भाष्यसन्दर्भ के द्वारा दिया है । ' एवमादि ' अर्थात् साध्य के कार्यादि से भिन्न और सभी हेतु उक्त सूत्र के ' अस्येदम् ' इस सम्बन्धबोधक वाक्य के द्वारा संगृहीत होते हैं ।
अभिप्राय यह है कि ' अध्वर्युरों श्रावयति ' इत्यादि वाक्यों के द्वारा जिन हेतुओं का उल्लेख किया गया है वे सभी हेतु उक्त सूत्र के ही अस्पदम् ' इस सम्बन्धबोधक वाक्य के द्वारा ' सिद्ध ' हैं , अर्थात् संगृहीत हैं । किन्तु " अर्थान्तर ( साध्य के कार्यत्वादि सम्बन्धों से रहित कोई भी अर्थ अर्थान्तर का ( अर्थात् हेतु के कारणत्वादि सम्बन्धों से शून्य किसी दूसरे अर्थ का ) साधक हेतु नहीं हो सकता " उक्त सूत्र में कार्यत्वादि सम्बन्धों के उल्लेख से इस अवधारण की स्थिति हो जाएगी ।
इस अभियोग की सम्भावना को हटाने के लिए हो सूत्रकार ने उक्त सूत्र में ( कार्यत्वादि सम्बन्धों के बोधक वाक्यों के अतिरिक्त ) ' अस्येदम् ' इस वाक्य का भी प्रयोग किया है । ' इतरस्य लिङ्गम् ' इत्यादि भाष्य के द्वारा लिङ्ग का भेद और सभी पदार्थों ( साध्यों ) में समान रूप से रहने पर भी ' इस साध्य का सम्बन्ध इसी हेतु में है , इस नियम के अनुसार यह नियम भी उपपन्न होता है कि इस साध्य का यही लिङ्ग है ' !
इस प्रकार सामान्य रूप से साध्य के सभी सम्बन्धियों में लिङ्गत्व का प्रतिपादन एवं सर्वत्र देशकाला विनाभूतमितरस्य लिङ्गम् ' इस भाष्य के द्वारा किया गया है ।
पृ. ५०७
तत्तु द्विविधम् - दृष्टं सामान्यतोदृष्टं च ।
दृष्टं प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजात्य मेदेऽनुमानम् | यथा गव्येव तत्र देशान्तरेऽपि सास्नामात्र दर्शनाद् सास्नामात्रमुपलभ्य प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेद लिङ्गान मेयधर्मप्रतिपत्तिः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ( १ ) दृष्ट और ( २ ) सामान्यतोदृष्ट भेद से अनुमान दो प्रकार
है । जिस हेतु के साथ पूर्व में ज्ञात साध्य और वर्तमान में उसी हेतु के ज्ञाप्य साध्य दोनों अभिन्न हों , उस हेतु से उत्पन्न अनुमान ही ' दृष्ट ' अनुमान है । जैसे कि पहिले एक स्थान में गाय में ही केवल सास्नारूप हेतु को देखकर , दूसरे स्थान में सास्ना को देखने के बाद गोविषयक प्रतिपत्ति ( अनुमिति ) होती है । जिस हेतु के साथ पूर्व में ज्ञात साध्य और उसी हेतु के द्वारा वर्त्तमान में ज्ञाप्य साध्य , दोनों विभिन्न जाति के हों , उस हेतु सामान्य और ( वर्तमान में अनुमेय ) साध्यसामान्य की व्याप्ति से जो अनुमान उत्पन्न होता है , उसे ' सामान्यतोदृष्ट ' अनुमान कहते हैं । जैसे कि कृषक ,
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
भेदं कथयति तत्तु द्विविधं दृष्टं सामान्यतोदृष्टं चेति । चशब्दोऽवधारणार्थः । तदनुमानं द्विविधमेव दृष्टमेकमपरं सामान्यतोदृष्टम् । तत्र तयोर्मध्ये दृष्टं प्रसिद्धसाध्ययोर्जात्यभेदेऽनुमानम् । प्रसिद्धं यत् पूर्वं लिङ्गेन सह दृष्टं साध्यं यत् सम्प्रत्यनुमेयं तयोरत्यन्तजात्यभेदे सति यदनुमानं तद् दृष्टम् Toda
। यथा सास्नामात्रमुपलभ्य देशान्तरे गवि प्रतिपत्तिः । पूर्वं गोत्वजातिविशिष्टायामेव गोव्यक्त सानोपलब्ध्या सम्प्रत्यपि गोत्वजातिविशिष्टायामेव गोव्यक्तेरनुमानमत्यन्त जात्यभेदे । इदं च दृष्टमित्याख्यायते ।
सास्नामात्र दर्शनाद् वनान्तरे यदनुमीयते गोत्वसामान्यं तस्य स्वलक्षणं पूर्व नगरे दृष्टमिति कृत्वा प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्मसामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतोदृष्टम् । प्रसिद्धं लिङ्गेन सह प्रतीतं साध्यमनुमेयं तयोरत्यन्तजातिभेदे सति , लिङ्गं चानुमेयधर्मश्च लिङ्गानुमेयधर्मो , तयोः सामान्ये लिङ्गानुमेयधर्मसामान्ये , तयोरनुवृत्तिः लिङ्गानुमेयधर्मसामान्यानुवृत्तिः , ततो लिङ्गसामान्यस्य साध्यसामान्येन सहाविनाभावाद् यदनुमानं तत् सामान्यतोदृष्टम् । यथा कर्षकवणिग्राजपुरुषाणां प्रवृत्तेः फलत्वमुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य प्रवर्तमानानां फलानुमानम् । कर्षकादिप्रवृत्तेः फलं दृष्ट्वा वर्णाश्रमिणां प्रवृत्तेरपि फलानुमानम् , कर्षकस्य प्रवृत्तेः फलं शस्यादिकम् , वणिग्राजपुरुषस्य च प्रवृत्तेः फलं काञ्चनमणिमुक्तावाजिवारणादिकम् वर्णाश्रमिणां च प्रवृत्तेः फलं स्वर्गादिकमित्यनयोरत्यन्तजातिभेदः । अनुमानोदयस्तु प्रवृत्तित्वसामान्यस्य फलवत्त्वसामान्येनाविनाभावात् । अत
चेदं सामान्यतोदृष्टमुच्यते , सामान्येन नियमदर्शनात् । एव
यः पुनरत्रानुमेयः स्वर्गादिलक्षणः फलविशेषो नैतज्जातीयस्य फलस्य नियमो दृष्टो वर्णाश्रमिणां प्रवृत्तेरपि जीविकामात्रमेव प्रयोजनमिति बार्हस्पत्याः , तदर्थमाह- दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्येति । सन्त्येव तथाविधाः पुरुषा ये खलु दृष्टनिस्पृहा वानप्रस्थादिकं व्रतमाचरन्ति तेषां प्रवृत्तेरिदं फलानुमानमिति न सिद्धः साध्यत इत्यर्थः ।
प्रमाणशब्दः करणव्युत्पत्तिसिद्धो न फलं विना पर्यवस्यति , अतः प्रमाणफलविभागं दर्शयति - तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणमिति । तत्रानुमाने लिङ्गज्ञानं प्रमाणं प्रमीयतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या प्रमितिः प्रमाणस्य फलमग्निज्ञानम् । यद्यपि लिङ्गलिङ्गिज्ञानयोरुत्पत्त्यपेक्षया विषयभेदस्तथापि लिङ्गज्ञानस्यापि लिङ्गिनि ज्ञानोत्पत्तौ व्यापारालिङ्गिविषयत्वम् , ततश्च प्रमाणफलयोर्न व्यधिकरणत्वम् । प्रकारान्तरमाह – अथवेति । अग्निज्ञानं प्रमाणम् , प्रमितिः प्रमाणस्य फलम् । अग्नौ गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम् - गुणदर्शनं सुखसाधनमेतदिति ज्ञानम् , दोषदर्शनं दुःखसाधनत्वज्ञानम् , माध्यस्थ्यदर्शनं सुखदुःखसाधनत्वाभावज्ञानम् , अग्निज्ञाने सति तथाप्रतीत्युत्पादात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अर्थात् जिसमें जिस दूसरे वस्तु की दैशिकी या कालिको व्याप्ति है , वही उसका हेतु है । जिसमें जिसका व्यभिचार है , वह उसका हेतु नहीं है . क्योंकि उसके न रहने के स्थान में भी वह रहता है । ( प्र ० ) तो क्या उक्त सूत्र में ' कमस्येदं कार्यम् ' इस वाक्य के द्वारा यह कहते हैं कि ' साध्य का सम्बन्ध हेतु में नहीं है ' ? यदि ऐसी बात है तो फिर ' कार्यादि ' का उपादान ही उक्त सूत्र में व्यर्थ है ? इसी प्रश्न का उतर निदर्शनार्थम् ' इस वाक्य से दिया गया | अभिप्राय यह है कि शिष्यों को उदाहरण के द्वारा पूर्ण अभिज्ञ बनाकर ही यह समझना होगा कि ' साध्य का अव्यभिचारी ही उसका लिङ्ग है ' । अतः सूत्र में कार्यादि सम्बन्धों का उल्लेख केवल उदाहरण के लिए है । इसका यह अभिप्राय नहीं है कि सूत्र में कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों से युक्त ही हेतु हैं , साध्य के और सम्बन्धों से युक्त भी हेतु हो सकते हैं , यदि वह सम्बन्ध अव्यभिचरित हो ।
' तत्तु द्विविधम् - दृष्टम् , सामान्यतो दृष्टञ्च ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान के अवान्तर प्रकारों का निरूपण किया गया है । उक्त वाक्य में प्रयुक्त ' च ' शब्द ' अवधारण ' अर्थ का है । ( तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि ) कथित अनुमान दो ही प्रकार का है , एक है ' हट ' और दूसरा है ' सामान्यतोट ' | ' तत्र ' अर्थात् उन दोनों अनुमानों में से ' दृष्टं प्रसिद्धसाध्ययोजत्यिभेदेऽनुमानम् ' ' प्रसिद्ध ' अर्थात् हेतु के साथ पहिले जो साध्य ज्ञात है और जो साध्य अभी अनुमेय है , इन दोनों के जातितः अत्यन्त अभि होने पर जो अनुमान होता है , वही ' दृष्ट ' अनुमान है । जैसे कि पहिले किसी गाय में ही सास्ना को देखकर दूसरे देश में गो का अनुमान होता है । पहिले गोव जाति सेयुक्त गो व्यक्ति में ही सास्ना की उपलब्धि हुई , अभी भी सास्ना से जो गो अनुमिति होती है , वह गोत्र जाति से युक्त गो व्यक्ति में ही होती है , अतः गो विषयक दोनों ज्ञानों में विषय होनेवाला गोत्व अत्यन्त अभिन्न ( एक ही ) है , तस्मात् यह ' दृष्ट ' अनुमान कहलाता है । इसे दृष्ट अनुमान होने की युक्ति यह है कि वन में केवल सास्ता के देखने से जिस गोत्व जाति का अनुमान होता है , वह उस स्वरूप से नगर में पहिले से ही गो में देखा जा चुका है ।
“ प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्त जातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्मं सामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतोदृष्टम् ” ( इस भाष्यवाक्य के ) प्रसिद्धसाध्ययो : ' इस पद से ' प्रसिद्धं लिङ्गेन सह प्रतीतं साध्यमनुमेयं ययोः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनुमान का साध्य एवं हेतु के साथ पहिले गृहीत होनेवाला साध्य ये दोनों साध्य अभिप्रेत हैं । इन दोनों साध्यों में परस्पर अत्यन्त भेद के रहने पर भी हेतु सामान्य में साध्यसामान्य की व्याप्ति से जो अनुमान उत्पन्न होता है , वही ' सामान्यतोदृष्ट ' अनुमान है । ( इस अर्थ के बोधक लिङ्गानुमेयधर्म सामान्यवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतो दृष्टम् ' इस भाष्यवाक्य का विग्रह इस प्रकार है कि ) लिङ्गं चानुमेयधर्मश्च लिङ्गानुमेयधम तयोः सामान्ये लिङ्गानुमेयधर्मसामान्ये , तयोरनुवृत्तिः लिङ्गानुमेयसामान्यानुवृत्तिः , ततो लिङ्गसामान्यस्य साध्यसामान्येन सहाविनाभावात् यदनुमानं तत् ' सामान्यतोदृष्टम् ' ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ५०९) १. अभिप्राय यह है कि ' शिष्ट जनों की सभी प्रवृत्तियाँ सफल ही होती हैं ' इस सामान्य ति के बल से ही उक्त अनुमान होता है । किन्तु इस व्याप्ति के अवधारण के लिए प्रकृत में साव्यभूत वर्णाश्रमियों को सफलता को उपस्थित नहीं किया जा सकता , क्योंकि वह सिद्ध नहीं है ; एवं प्रत्यक्ष के द्वारा उसका सिद्ध होना सम्भव भी नहीं है , क्योंकि उसके स्वर्गादि फल अतीन्द्रिय हैं । अतः प्रकृत फल से सर्वथा विपरीत अर्थात् कृषकादि के प्रत्यक्ष फलों को दृष्टान्त रूप से उपस्थित किया गया है ।
पृ. ५०९
सामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं ।
सामान्यतोदृष्टम् ।
यथा कर्षकवणिग्राजपुरुषाणां च प्रवृत्तेः फलवत्वमुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य प्रवर्तमानानां फलानुमानमिति ।
तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणं प्रमितिरग्निज्ञानम् ।
अथवाग्निज्ञानमेव प्रमाणं त्रमितिरग्नौ गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनमित्येतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वणिक् और राजपुरुषों की सभी सफल प्रवृत्तियों को देखकर वर्णाश्रमियों की उन धार्मिक प्रवृत्तियों से भी फल का अनुमान होता है , जिन प्रवृत्तियों के कोई प्रत्यक्ष फल नहीं दीख पड़ते । इनमें लिङ्ग ( हेतु ) का ज्ञान ही ( अनुमान प्रमाण है ) एवं ( उससे उत्पन्न ) अग्नि का ज्ञान ही ( फलरूपा ) प्रमिति है । अथवा ( कथित ) अग्नि का ज्ञान ही ( अनुमान ) प्रमाण है । अग्नि में उपादेयत्व , हेयत्व या उपेक्षा की बुद्धि ही प्रमिति ( अनुमिति ) है ये सभी अनुमान करनेवाले पुरुष में ही निश्चय ( अनुमिति ) के उत्पादक ( स्वार्थानुमान ) हैं ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' यथा कर्षकवणिग्राजपुरुषाणां प्रवृत्तेः फलवस्वमुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य प्रवर्त्तमानानां फलानुमानम् ' । अर्थात् कृषकादि की प्रवृत्तियों की सफलता को देखकर वर्णाश्रमियों की उन प्रवृत्तियों में भी सफलता का अनुमान होता है , जिन प्रवृत्तियों की उत्पत्ति के लिए वे दृष्ट ( सांसारिक ) फलों का अनुसन्धान नहीं करते । अभिप्राय यह है कि भूमि जोतने की किसानों को प्रवृत्ति के फल है अन्न प्रभृति , एवं बनियों की एवं राजसेवा में लगे व्यक्तियों की प्रवृत्तियों के फल है , सुवर्ण , मणि , मुक्ता , हाथी , घोड़े प्रभृति ; किन्तु वर्णाश्रमियों के ( सन्ध्यावन्दनादि ) प्रवृत्तियों के फल हैं स्वर्गादि । इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि साध्य और दृष्टान्त दोनों अत्यन्त विभिन्न जाति के हैं । फिर भी उक्त दृष्टान्त के द्वारा अनुमान की उत्पत्ति उस सामान्यमुखी व्याप्ति से होती है , जो प्रवृत्तिसामान्य का फलसामान्य के साथ है । इसीलिए इस अनुमान को ' सामान्यतोदृष्ट ' कहा जाता है , चूंकि सामान्यमुखी व्याप्ति के दर्शन से ही इसकी उत्पत्ति होती है !
बार्हस्पत्य ' ( चार्वाक ) लोग ( इस अनुमान में सिद्धसाधन दोष का उद्भावन इस प्रकार करते हैं कि ) वर्णाश्रमियों को प्रवृत्ति से स्वर्गादि जिस प्रकार के अलौकिक फलों का यहाँ अनुमान किया जाता है , उस प्रकार के फलों का नियम नहीं देखा जाता है ( क्योंकि वे अतीन्द्रिय हैं ) अतः वर्णाश्रमियों की उन प्रवृत्तियों का अपनी जीविका चलाना ही फल है , वह तो दृष्ट ही है । अतः इसमें अनुमान की प्रवृत्ति नहीं हो सकती , क्योंकि इसका विषय पहिले से ही सिद्ध है । इसी सिद्धसाधन दोष को मिटाने के लिए प्रकृत भाष्यसन्दर्भ में ' दुष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य ' यह वाक्य लिखा गया है । इस वाक्य से यह कहना अभिप्रेत है कि इस प्रकार के भी महापुरुष हैं जो वर्णाश्रमियों के लिये निर्दिष्ट वानप्रस्थादि व्रतों का आचरण करते हैं , जिनको जीविकादि दृष्ट फलों के प्रति स्नेह नहीं है । वर्णाश्रमियों की इस प्रकार की प्रवृत्तियों से फल का अनुमान ही प्रकृत में सामान्यतोदृष्ट अनुमान के उदाहरण के लिए उपस्थित किया गया है . अतः सिद्धसाधन दोष नहीं है ।
' प्रमीयतेऽनेन ' इस करणव्युत्पत्ति के द्वारा प्रकृत में ' प्रमाण ' शब्द का प्रयोग किया गया है । प्रमाकरणरूप इसका निरूपण प्रमारूप फल के निर्देश के विना अधूरा ही रहेगा । अतः तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणम् ' इस वाक्य के द्वारा प्रमाण और फल का विभाग दिखलाया गया है । ' तत्र ' अर्थात् अनुमान स्थल में ' लिङ्गज्ञान ' ही ' प्रमाण ' है चूंकि यहाँ ' प्रमाण ' शब्द ' प्रमीयतेऽनेन ' इस व्युत्पत्ति द्वारा सिद्ध है । ' प्रमिति ' अर्थात् प्रमाण का फल है अग्नि का ज्ञान ।
यद्यपि यह ठीक है कि ( प्र ० ) लिङ्गज्ञान और लिङ्गी ( साध्य ) का ज्ञान दोनों की उत्पत्ति भिन्न विषयक होती हैं , अतः दोनों व्यधिकरण हैं , किन्तु कार्य और कारण को समान अधिकरण का होना चाहिये ) | ( उ ० ) फिर भी लिङ्गी ( साध्य ) में जो ( विधेयता सम्बन्ध से ) ज्ञान की उत्पत्ति होती हैं , उसमें लिङ्गज्ञान व्यापार ( रूप कारण ) है , अतः लिङ्गज्ञान भी लिङ्गिरूप विषय से सर्वथा असम्बद्ध नहीं है | अतः लिङ्गज्ञानरूप प्रमाण और लिङ्गि ( साध्य ) ज्ञानरूप फल इन दोनों में सर्वथा विपरीतविषयत्व रूप वैयधिकरण्य की आपत्ति नहीं है ।
' अथवा ' इत्यादि सन्दर्भ से ( प्रमाण फल विभाग का दूसरा प्रकार दिखलाया गया है । अग्नि ( साध्य ) का ज्ञान ही ' प्रमाण ' है , और ' प्रमिति ' अर्थात् उस प्रमाण का फल है अग्नि ' गुण , दोष , और माध्यस्थ्य का ज्ञान । ( अग्नि में ) ' यह सुख का साधन है ' इस प्रकार का ज्ञान है ' गुणदर्शन ' एवं ' यह दुःख कासाधन है ' इस आकार को बुद्धि
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ५१०) १. इसी प्रसङ्ग में बार्हस्पत्यों का यह श्लोक सर्वदर्शनसंग्रहादि ग्रन्थों में उल्लिखित है : - ही ' दोषदर्शन ' है । और ' न यह सुख का साधन है न दुःख का ' इस प्रकार का ज्ञान ही ' माध्यस्थ्यदर्शन ' है । चूँकि अग्नि ज्ञान के बाद ही उक्त गुणदर्शनादि उत्पन्न होते हैं ( अतः ये गुणदर्शनादि अग्निज्ञान रूप प्रमाण के फल हैं ) । अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् । बुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः ||
पृ. ५१२
समानविधित्वात् ।
यथा शब्दादीनामप्यनुमानेऽन्तर्भावः , प्रसिद्धसमयस्यासन्दिग्धलिङ्गदर्शन प्रसिद्धयनुस्मरणाभ्यामतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानमेवं शब्दादिभ्योऽपीति ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — शब्दादि प्रमाण भी इसी ( अनुमान ) के अन्तर्गत हैं ( वे स्वतन्त्र अलग प्रमाण नहीं हैं ) , क्योंकि शब्दादि प्रमाणों से भी उसी रीति से ( व्याप्ति के बल पर ) प्रमिति की उत्पत्ति होती है , जिस प्रकार अनुमान प्रमाण से प्रमिति की उत्पत्ति होती है । जैसे कि जिस पुरुष को पूर्व में व्याप्ति गृहीत है , उसी पुरुष को हेतु के निश्चय और व्याप्ति के स्मरण इन दोनों से अप्रत्यक्ष अर्थ की अनुमिति होती है । उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों से भी अतीन्द्रिय अर्थ का ज्ञान होता है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
एतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् । निश्चितमिति भावे निष्ठा , स्वनिश्चितार्थं स्वनिश्चयार्थमेतदनुमानमित्यर्थः ।
शब्दादीन्यपि प्रमाणान्तराणि सङ्गिरन्ते वादिनः तानि कस्मादिह नोक्तानि ? इति पर्यनुयोगमाशङ्कय तेषामत्रैवान्तर्भावान्न पृथगभिधानमित्याहशब्दादीनामपीति । शब्दादीनामनुमानेऽन्तर्भावोऽनुमानाव्यतिरेकित्वम् , समानविधित्वात् समानप्रवृत्तिप्रकारत्वात् । यथा व्याप्तिग्रहणबलेनानुमानं प्रवर्तते , तथा शब्दादयोऽपीत्यर्थः । शब्दोऽनुमानं व्याप्तिबलेनार्थप्रतिपादकत्वाद् धूमवत् । समानविधित्वमेव दर्शयति - यथेति । प्रसिद्धः समयोऽविनाभावो यस्य पुरुषस्य तस्य लिङ्गदर्शन प्रसिद्ध्यनुस्मरणाभ्यां लिङ्गदर्शनम् , यत्र धूमस्तत्राग्निरित्येवंभूतायाः प्रसिद्धेरनुस्मरणं च । ताभ्यां यथाऽतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानं तथा शब्दादिभ्योऽपीति । तावद्धि शब्दो नार्थं प्रतिपादयति यावदयमस्याव्यभिचारीत्येवं नावगम्यते , ज्ञाते त्वव्यभिचारे प्रतिपादयन् धूम इव लिङ्गं स्यात् ।
अत्राह कश्चित् - अनुमाने साध्यधर्मविशिष्टो धर्मी प्रतीयते , शब्दादर्थानुमाने को धर्मी ? न तावदर्थः , तस्य तदानीमप्रतीयमानत्वात् । शब्दो धर्मोति चेत् ? किमस्य साध्यम् ? अर्थवत्त्वं चेत् ? न पर्वतादेरिव वह्नयादिना शब्दस्यार्थेन सह संयोगसमवायादिलक्षणः कश्चित् सम्बन्धो निरूप्यते , येनायमर्थविशिष्टः साधनीयः । प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव एव हि तयोः सम्बन्धः सोऽर्थप्रतीत्युत्तरकालीन नार्थप्रतिपादनात् पूर्वं सम्भवति । नाप्यग्निधूमयोरिव शब्दार्थयोरस्त्यविनाभावनियमः , देशकालव्यभिचारात् ; तद्वयभिचारश्चासत्यपि युधिष्ठिरे कलौ युधिष्ठिरशब्दप्रयोगात् , असत्यामपि लङ्कायां जम्बुद्वीपे लङ्का शब्दश्रवणात् । वैलक्षण्याच्छब्दो देशविशेषेऽर्थव्यभि तस्मादनुमानसामग्री नानुमानम् , चारात् । न धूमो ह्न क्वचिद् व्यभिचरति , शब्दस्तु स्वार्थं व्यभिचरति । तथा हि चौर इति भक्ताभिधानं दाक्षिणात्यानाम् , आर्यावर्तनिवासिनां तु तस्कराभिधानम् ।
यदि च शब्दोऽनुमानं त्रैरूप्यप्रतीत्याऽस्य प्रामाण्यनिश्चयः स्यात् , नाप्तोक्तत्वप्रतीत्या ; तत्प्रतीत्या तु निश्चीयमाने प्रामाण्येऽनुमानाद् व्यतिरिच्यत एव । एवं वैधर्म्यात् ।
अत्रोच्यते - यदूवकृतायां तर्जन्यां देशकालव्यवहितेष्वर्थेषु दशसंख्यानुमानं न तत्र संख्या धर्मिणी , अप्रतीयमानत्वात् । नापि तर्जनीविन्यासो धर्मी , तस्थ प्रतिपाद्यमानतया दशसंख्यया सह सम्बन्धान्तराभावेन तद्विशिष्ट प्रतिपादनायोगात् । नाप्यनयोरेकदेशता , नाप्येकका लत्वम् , कथमनुमानप्रवृत्ति : ? क्रयविक्रयव्यवहारे वणिजां तथाविधतर्जनीविन्यासस्य दशसंख्या प्रतिपादनाभिप्रायाव्यभिचारोपलम्भात् । कर्त्तुस्तत्प्रतिपादनाभिप्रायावगतिमुखेनास्य दश संख्याप्रतीतिहेतुत्वमिति चेत् ?
शब्दस्याप्येवमेव । प्रथमं गोशब्दादुच्चारिताद् वक्तुः ककुदादिमदर्थविवक्षा गम्यते , स्वसन्ताने गोशब्दोच्चारणस्य पदार्थविवक्षापूर्वकत्वोपलम्भात् । तदर्थविवक्षया चार्थानुमानम् । अयं चात्र प्रयोगः - पुरुषो धर्मी ककुदादिमदर्थविवक्षावान् , गोशब्दोच्चारणकर्त्त त्वादहमिवेति । अर्थाभावेऽप्यनाप्तानां विवक्षोपलब्धेर्न विवक्षातोऽर्थसिद्धिरिति चेत् ? शब्दादपि कथं तत्सिद्धिः ? सम्बन्ध इति चेत् ? शब्दस्यैकस्य देशभेदेन नानार्थेषु प्रयोगात् ।
यत्रायमायैः प्रयुज्यते तत्रास्य वाचकत्वम् , इतरत्र सङ्केतानुरोधात् प्रवृत्तस्य लिङ्गत्वमिति चेत् ? न तुल्य एव तावच्चीरशब्दस्तस्करे भक्ते च प्रतीतिकरः , तत्रास्य तस्करे वाचकत्वं भक्ते च लिङ्गत्वमिति नास्ति विशेषहेतुः । आर्याणामपि चौरशब्दादर्थप्रतीतिः लिङ्गपूर्वका , चौरशब्दजनितप्रतिपत्तित्वात् , उभयाभिमतदाक्षिणात्य प्रयुज्यमानचौरशब्दजनितप्रतिपत्तिवत् । न च स्वाभाविकसम्बन्धसद्भावे प्रमाणमस्ति ।
शब्दस्य वाच्यनिष्ठा स्वाभाविकी वाचकशक्तिरेवोभयत्र दत्तपदत्वात् सम्बन्ध इत्युच्यते भवद्भिः । तथा चोक्तम् - " शक्तिरेव सम्बन्धः " इति । शब्दशक्तेश्च स्वभावादेव वाच्यनिष्ठत्वे व्युत्पन्नवदन्युत्पन्नोऽपि शब्दादर्थं प्रतीयात शब्दस्यार्थस्य तयोः सम्बन्धस्य च संभवात् । ज्ञातः सम्बन्धोऽर्थप्रत्यय हेतुर्न सत्तामात्रेणेति चेत् ? यथाहु : -
स्वात्मज्ञानमपेक्षते ।
तेनासौ विद्यमानोऽपि नागृहीतः प्रकाशकः ॥ इति । सम्बन्धः
कीदृशं तस्य सम्बन्धस्य ज्ञानम् ? अस्य शब्दस्यायमर्थों वाच्य इत्ये . वंभूतमिति चेत् ? तत् कस्माद् भवति ? वृद्धव्यवहारादिति चेत् ? एतदेवाभिधानाभिधेयालम्बनज्ञानं परस्परं व्यवहरद्भिर्वृद्धः पार्श्वस्थस्य बालकस्य क्रियमाणं सङ्केत व्युत्पत्तिरिति चाभिधीयमानं संस्कारद्वारेणार्थप्रतीतिकारणमस्तु किं सम्बन्धान्तरेण ? शब्दस्य हि निजं सामर्थ्यं शब्दत्वम् , आगन्तुकं च सामथ्यं सङ्केतो विशिष्टा चानुपूर्वी । तस्मादेव सामर्थ्यद्वितयात् तदर्थप्रत्ययो - पपत्तिः , सम्बन्धान्तरकल्पनावैयर्थ्यम् , दृष्टात् कार्योपपत्तावदृष्टकल्पनानवकाशात् । सूत्रे प्रतिपादितस्यास्मद्विशिष्टस्य वक्तुः परामर्शः , तद्वचनात् तेन विशिष्टेन पुरुषेण प्रणयनादास्नायस्य वेदस्य प्रामाण्यम् ।
यस्तु सत्यपि लिङ्गत्वे देशविशेषे शब्दस्यार्थ ( स्य ) व्यभिचारो न धूमस्य , तत्रैष न्यायः । धूमः स्वाभाविकेन सम्बन्धेनाग्नेलिङ्गम् । शब्दस्तु चेष्टावत् पुरुषेच्छाकृतेन सङ्केतेन प्रवर्तमानो यत्र यत्रार्थे पुरुषेण सङ्केत्यते तस्य तस्यैवार्थस्य विवक्षावगतिद्वारेण लिङ्गम् । अत एवास्मादाप्तप्रयुक्तत्वानुसारेण चेष्टादिवत् तावदर्थनिश्चये सातत्योर्ध्वगत्यादिधर्मविशिष्टस्येव धूमस्याप्तोक्तस्यैव शब्दस्यार्थाव्यभिचारसम्भवात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' एतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् ' इस भाष्यवाक्य का ' निश्चित ' शब्द ' भाव ' अर्थ में निष्ठा प्रत्यय से निष्पन्न है । तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि यह कथित अनुमान अपने आश्रय पुरुष में ही निश्चयात्मक ज्ञान को उत्पन्न करने के लिए है ( दूसरों को समझाने के लिए नहीं ) ।
( प्रत्यक्ष और अनुमान के अतिरिक्त ) शब्दादि प्रमाणों को भी अन्य दार्शनिक गण स्वीकार करते हैं कि वे शब्दादि प्रमाण इस भाष्य में क्यों नहीं कहे गये ? अपने ऊपर इस अभियोग की आशङ्का से भाष्यकार ने ' शब्दादीनामपि ' इत्यादि ग्रन्थ से यह कहा है कि ' उन शब्दादि प्रमाणों का भी अनुमान में ही अन्तर्भाव हो जाता है ' ।
शब्दादि प्रमाणों का अनुमान में हो अन्तर्भाव होता है अर्थात् शब्दादि प्रमाण अनुमान से अभिन्न हैं ( अनुमान ही हैं ) , क्योंकि ( अनुमान और शब्दादि ) समानविधि ' के हैं , अर्थात् अनुमान और शब्दादि की सभी प्रवृत्तियां समान हैं । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार अनुमान की प्रवृत्ति व्याप्ति के बल से होती है , उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों को प्रवृत्ति भी व्याप्ति के बल से ही होती है ।
( इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि ) जिस प्रकार व्याप्ति के बल से धूम वह्नि का ज्ञापक है , उसी प्रकार शब्द भी व्याप्ति के बल से ही अर्थ का ज्ञापन करता है , अतः ( घूम की तरह ) शब्द भी अनुमान रूप से ही प्रमाण है । ' यथा ' इत्यादि से कथित ' समानविधि ' का प्रदर्शन करते हैं । ' प्रसिद्धः समयो यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष को समय ( व्याप्ति ) पूर्व से ज्ञात है , वही पुरुष प्रसिद्धसमय ' शब्द का अर्थ है ।
' लिङ्गदर्शन प्रसिद्धयनुस्मरणाभ्याम् ' इस वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि लिङ्गदर्शन ( अर्थात् पक्षधर्मता ज्ञान ) और जहाँ धूम है वहाँ वह्नि भी अवश्य ही है ' इस प्रकार की ' प्रसिद्धि ' अर्थात् व्याप्ति का स्मरण , इन दोनों से उक्त ' प्रसिद्धसमय ' पुरुष को जिस प्रकार इन्द्रियों के द्वारा अज्ञेय वस्तु का ज्ञान होता है , उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों से भी कथित पुरुष को ही ज्ञान होता है ( अतः शब्दादि प्रमाण भी वस्तुतः अनुमान ही हैं ) ।
शब्द तब तक अर्थ के बोध का उत्पादन नहीं कर सकता , जब तक कि अर्थ के साथ उसका अव्यभिचार ( व्याप्ति ) गृहीत न हो जाय , ज्ञात अव्यभिचार के द्वारा ही जब ( धूम की तरह ) शब्द भी अर्थ का ज्ञापक है , तो फिर धूम की तरह वह भी ज्ञापक लिङ्ग ( अनुमान ) ही होगा ।
यहाँ कोई ( शब्द को अलग स्वतन्त्र प्रमाण माननेवाले ) यह विचार उठाते हैं कि अनुमान में तो साध्य रूप धर्म से युक्त धर्मों की प्रतीति होती है , किन्तु शब्द से जो अर्थं का अनुमान होगा उसमें धर्मी रूप से किसका भान होगा ? अर्थ तो उस अनुमान का धर्मी ( पक्ष ) हो नहीं सकता , क्योंकि वह तब तक अज्ञात है ( पक्ष को पहिले से निश्चित रहना चाहिए ) । शब्द को ही यदि उस अनुमान का पक्ष मानें , तो फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इस अनुमान का साध्य कौन होगा ? अर्थवत्त्व को साध्य मानना सम्भव नहीं है , क्योंकि पर्वतादि पक्षों का वह्नि प्रभृति साध्यों के साथ जिस प्रकार का संयोगसमवायादि सम्बन्ध है , शब्द के साथ अर्थ का उस प्रकार के किसी सम्बन्ध का निर्वाचन सम्भव नहीं है , जिस सम्बन्ध के द्वारा अर्थ से युक्त शब्द रूप धर्मी का साधन किया जा सके । शब्द और अर्थ में प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध ही केवल हो सकता है , किन्तु इस सम्बन्ध का ज्ञान तो शब्द से अर्थ प्रतीति के बाद ही होगा , अर्थं प्रतीति के पहिले नहीं । एवं वह्नि और धूम तरह
६५ शब्द और अर्थ में ' अविनाभाव ' ( व्याप्ति ) सम्बन्ध है भी नहीं , क्योंकि जिस देश या जिस काल में शब्द या अर्थ है , उस देश और उस काल में अर्थ या शब्द अवश्य रहता ही नहीं है , क्योंकि कलिकाल में युधिष्ठिर रूप अर्थ की सत्ता न रहने पर भी युधिष्ठिर शब्द का प्रयोग होता है , एवं लङ्का नगरी की सत्ता जम्बुद्वीप में वत्तंमान काल में न रहने पर भी ' लङ्का ' शब्द का प्रयोग होता है । अतः यह मानना पड़ेगा कि शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न है , क्योंकि विशेष प्रकार के कई देशों में शब्द के साथ अर्थ का व्यभिचार देखा जाता है । धूमका वह्नि के साथ व्यभिचार कहीं नहीं देखा जाता , किन्तु शब्द के साथ अर्थ का व्यभिचार देखा जाता है । जैसे कि एक ही ' चौर ' शब्द का प्रयोग दाक्षिणात्य लोग भात के अर्थ में करते हैं , किन्तु उसी ' चौर ' शब्द को आर्य लोग ' तस्कर ' ( चोर ) अर्थ में प्रयोग करते हैं ।
दूसरी बात यह है कि शब्द यदि अनुमान रूप से ही प्रमाण होता तो उससे अर्थ बोध के लिए उसका पक्षमत्त्वादि ) तीनों रूपों से ज्ञान की ही अपेक्षा होती ( जैसे कि सभी अनुमानों में होता है ) , आप्तोक्तत्व निश्चय की नहीं । यदि शब्द में आसोक्तत्व के निश्चय के बाद ही प्रामाण्य का निश्चय होता है , तो फिर अवश्य ही शब्द अनुमान से भिन्न प्रमाण है , क्योंकि दोनों के स्वरूप भिन्न हैं ।
इस प्रसङ्ग में हम लोग कहते हैं कि ( यह सङ्केत कर लेने पर कि यदि केवल तर्जनी अंगुली को ऊपर उठावें तो उससे दश संख्या को समझना , इसके बाद तर्जनी अगुली को ऊपर उठाने पर उस सङ्केत को समझनेवाले को दश संख्या का अनुमान होता है , जिस दश संख्या का आश्रयीभूत द्रव्य उस बोद्धा पुरुष के आश्रयीभूत देश और काल से भिन्न देश और भिन्न काल का होता है । इस अनुमान में पक्ष कौन होता है ? संख्या तो इस अनुमान का पक्ष हो नहीं सकती , क्योंकि वह पहिले से प्रतीत नहीं है ।
तर्जनी का ऊपर उठाना ( विन्यास ) भी उस अनुमान का धर्मी नहीं हो सकता , क्योंकि इस अनुमान के द्वारा मुख्य ज्ञाप्य दश संख्या के साथ उसका कोई ( सङ्केत सम्बन्ध को छोड़कर ) दूसरा ( स्वाभाविक संयोग समवायादि ) सम्बन्ध नहीं है । अतः दशसंख्यारूप साध्य धर्म से युक्त तर्जनी विन्यास रूप धर्मी का बोध इस अनुमान के द्वारा नहीं हो सकता , क्योंकि तर्जनी विन्यास और प्रकृत दशसंख्या न एक काल के हैं , न एक देश के ।
अतः तर्जनी के उक्त विशेष प्रकार के विन्यास से दशसंख्या में जो अनुमान की प्रवृत्ति होती हैं , वह कैसे हो सकेगी ? यदि यह कहें कि ( प्र ० ) खरीद बिक्री के प्रसङ्ग में बनियों में यह अव्यभिचरित नियम प्रचलित है कि ' केवल तर्जनी को उठाने से दश संख्या को समझना , अतः उक्त वर्जनी विन्यास से तर्जनी को ऊपर उठानेवाले पुरुष के इस अभिप्राय का बोध होता है कि ' तर्जनी को ऊपर उठाने से इस पुरुष को दश संख्या का बोध , अभिप्रेत है ।
इसी रीति से इसके बाद तर्जनी के उक्त विन्यास से दश संख्या का अनुमान होता है । ( उ ० ) तो फिर शब्द से अर्थानुमान के प्रसङ्ग में भी यही रीति समझिए कि ( श्रोता ) पुरुष को वक्ता के द्वारा उच्चरित गो शब्द ( के श्रवण ) से ककुदादि धर्मों से युक्त ( बैल ) जीव को समझाने के लिए वक्ता के शब्द प्रयोग की इच्छा ( विवक्षा ) ज्ञात होती है , क्योंकि श्रोता अपनेज्ञात शब्द समूहों में से जब गोशब्द का उच्चारण करता है , उससे पूर्व उसे ककुदादि से युक्त अर्थ की विवक्षा का अपने में बोध होता है ।
इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि जिस प्रकार मेरे द्वारा गोशब्द के उच्चारण से पहिले मुझमें ककुदादि धर्मों से युक्त अर्थ की विवक्षा रहती है , उसी प्रकार यह गोशब्द को उच्चारण करनेवाला पुरुष रूप धर्मी भी ककुदादि धर्मों से युक्त अर्थ की विवक्षा से युक्त है , क्योंकि यह भी गोशब्द का उच्चारण का कर्ता है । ( प्र ० ) अर्थ की सत्ता न रहने पर भी अनाप्त ( अविश्वास्य ) लोगों में उस अर्थ को विवक्षा देखी जाती है , अतः विवक्षा से अर्थ की सिद्धि नहीं की जा सकती ।
( उ ० ) शब्द भ्रान्त्या विप्रलम्भधिया वार्थशून्यस्य शब्दस्य प्रयोगात् । आप्तोक्ताच्छब्दादर्थप्रतीतिरिति चेत् ? आप्ताभिप्रायादेवार्थस्याधिगतिरिति समानार्थः ।
शब्दस्यार्थप्रतिपादनं मुख्यया वृत्त्या किं न कल्प्यते ? सम्बन्धाभावात् , असम्बद्धस्य गमकत्वे चातिप्रसङ्गात् । अस्ति स्वाभाविकः ( को अलग प्रमाण मान लेने ) से ही अर्थ की सिद्धि क्यों कर होगी ? क्योंकि अभिधा को भ्रान्ति से अथवा श्रोता को ठगने के लिए ऐसे शब्दों का भी प्रयोग होता है , जिनके वे अर्थ सम्भावित नहीं रहते । ( प्र ० ) आप्तजनों के द्वारा उच्चरित शब्द से ही अर्थ की प्रतीति होती है । ( उ ० ) इसके बदले यह भी तो कह सकते हैं कि आप्तपुरुष के द्वारा प्रयुक्त शब्द के श्रवण से श्रोता को उनके अभिप्राय का बोध होता है , एवं उस अभिप्राय से अर्थ विषयक अधिगति ( अनुमिति ) होती है ।
यह जो कहा गया है कि " शब्द यद्यपि अर्थ का ( ज्ञापक ) लिङ्ग है , किन्तु किसी विशेष प्रकार के देश में शब्द का भी अर्थ के साथ व्यभिचार उपलब्ध होता है , किन्तु धूम में वह्नि का व्यभिचार कहीं भी उपलब्ध नहीं होता , ( अतः धूम से वह्नि का अनुमान होता है , किन्तु शब्द से अर्थ का अनुमान नहीं हो सकता ) " । इस प्रसङ्ग में यह युक्ति है कि धूम ( संयोग रूप ) स्वाभाविक सम्बन्ध से वह्नि का ज्ञापक हेतु है , किन्तु शब्द में यह बात नहीं है ।
जिस प्रकार पुरुषकृत सङ्क ेत के द्वारा तर्जन्यादि के विशेष विन्यास रूप चेष्टा से दश संख्या का अनुमान होता है , उसी प्रकार शब्द भी पुरुष की बोधनेच्छा रूप सङ्केत के द्वारा ही अर्थबोध के लिए प्रवृत्त होता है | अतः पुरुष का सङ्केत जिन अर्थों में जिन शब्दों का रहता है , उन्हीं अर्थों के वे शब्द विवक्षा के बोध के द्वारा ज्ञापक लिङ्ग होते हैं ।
जिस प्रकार चेष्टा रूप हेतु से ( बनियों के सङ्केत के द्वारा दश संख्या प्रभृति ) अर्थों का बोध होता है , उसी प्रकार शब्दों से उसके आप्तोक्तत्व के कारण हो अर्थ का बोध होता है । अत एव जिस प्रकार अविच्छिन्नमूला एवं ऊर्ध्वमुखी रेखा से युक्त धूम में वह्नि का अव्यभिचार सम्भव होता है , उसी प्रकार आप्त से उच्चरित शब्द में भी अर्थ का अव्यभिचार ( व्याप्ति ) भी सम्भव है ।
( प्र ० ) अभिधा रूप मुख्य वृत्ति से ही शब्द के द्वारा अर्थ का प्रतिपादन क्यों नहीं मान लेते ? ( उ ० ) चूंकि शब्द को अर्थ के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । ( प्र ० ) यदि वर्ष के साथ असम्बद्ध शब्द को ही अर्थ का बोधक मानें तो फिर ( घट पद से पट बोध की आपत्ति रूप ) अतिप्रसङ्ग होगा , अतः शब्द का अर्थ के साथ स्वाभाविक ( शक्ति रूप ) सम्बन्ध की कल्पना करते हैं । ( उ ० ) यह सम्भव नहीं है , क्योंकि एक ही शब्द का विभिन्न अर्थों के बोध के लिए प्रयोग होता है ।
( प्र ० ) जिस अर्थ में आर्यलोग जिस शब्द का प्रयोग करते हैं , उस अर्थ का तो वह शब्द वाचक है ( अर्थात् उस अर्थ में उस शब्द का स्वाभाविक सम्बन्ध है ) । उससे भिन्न जिन अर्थों में केवल सङ्केत से ही शब्द प्रवृत्त होता है , वहाँ वह ( धूम की तरह ) ज्ञापक लिङ्ग है ।
( उ ० ) यह भी कहना सम्भव नहीं है , क्योंकि एक ही ' चौर ' शब्द चोर और इन दोनों अर्थों में भात दोनों का समान रूप से बोधक है से चौर रूप अर्थ का तो चौर शब्द को वाचक माने और भात रूप अर्थ का उसे बोधक लिङ्ग माने , इसमें विशेष युक्ति नहीं है ।
( इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि ) जिस प्रकार दोनों पक्ष यह मानते कि दाक्षिणात्यों के द्वारा प्रयुक्त ' चोर ' शब्द से भात रूप अर्थ की प्रतीति उक्त शब्द रूप लिङ्ग से उत्पन्न ( होने का कारण अनुमिति रूप होती ) है , उसी प्रकार आर्यों के द्वारा प्रयुक्त चौर शब्द से तस्कर की प्रतीति भी चौर शब्द रूप लिङ्ग से ही होती है , क्योंकि यह प्रतीति भी चौर शब्द से उत्पन्न होती है ।
इसमें कोई प्रमाण भी नहीं है कि शब्द और अर्थ दोनों में कोई स्वाभाविक सम्बन्ध है , क्योंकि केवल शब्द में ही रहनेवाला जो वाच्य ( अर्थ ) का वाचकत्व सम्बन्ध है , उसी सम्बन्ध को अर्थ और शब्द दोनों में कल्पना कर लेते हैं , और केवल शब्द में रहनेवाले उस सम्बन्ध को ही आप ( मीमांसक ) लोग दोनों का ' सम्बन्ध ' कहते हैं | जैसा कहा गया है कि ' शक्ति ही सम्बन्ध है ' ।
शब्द के शक्ति रूप सम्बन्ध को यदि स्वाभाविक रूप से ही वाच्य अर्थ में भी मान लें तो फिर जिस प्रकार व्युत्पन्न ( अर्थ में शब्दसङ्केत को जाननेवाले पुरुष को शब्द से अर्थ का बोध होता है , उसी प्रकार अव्युत्पन्न ( उक्त सङ्केत को न जाननेवाले ) पुरुष को भी शब्द से अर्थ के बोध की आपत्ति होगी , क्योंकि वहाँ भी शब्द और अर्थ इन दोनों का शक्ति रूप सम्बन्ध है ही ।
( प्र ० > उक्त सम्बन्ध ज्ञात होकर ही अर्थ बोध के प्रति कारण हैं , केवल सत्ता मात्र से नहीं ( अतः अव्युत्पन्न पुरुष को अर्थबोध नहीं होता है ) । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि चूंकि शब्द का शक्ति रूप सम्बन्ध ज्ञापक हेतु है ( उत्पादक नहीं ) , अतः वह अपने अर्थज्ञान रूप कार्य के उत्पादन में अपने ज्ञान की अपेक्षा रखता है , यही कारण है कि शब्द में विद्यमान रहने पर भी जब तक वह ज्ञात नहीं हो जाता , तब तक अर्थ को प्रकाशित नहीं कर सकता ।
( उ ० ) शक्ति रूप सम्बन्ध का कैसा ज्ञान अर्थबोध के लिए अपेक्षित है ? ' यदि यह कहें कि ' इस शब्द का यह अर्थ वाच्य है ' इस प्रकार का ज्ञान अपेक्षित है , तो फिर यह पूछना है कि यह ज्ञान किससे उत्पन्न होता है ? यदि इसका यह उत्तर दें कि ' यह ज्ञान वृद्धों के व्यवहार से उत्पन्न होता है ' तो फिर ' अभिधानाधेय ' के इस ज्ञान को ही अपने संस्कार के द्वारा कारण क्यों नहीं मान लेते ?
जो शब्दों का व्यवहार करते हुए वृद्धजनों से बालकों में उत्पन्न होता है , और जिसे ' सङ्केत ' एवं ' व्युत्पत्ति ' भी कहते हैं । इसके लिए शब्द का अर्थ में विलक्षण सम्बन्ध मानने का क्या प्रयोजन है ? कहने का अभिप्राय है कि शब्द की अपनी स्वाभाविक शक्ति शब्दत्व रून ही है , एवं पुरुषों के द्वारा उसमें दो शक्तियाँ उत्पन्न की जाती हैं , जिनमें पहिली है सङ्केत और दूसरी है विशेष प्रकार की आनुपूर्वी ( वर्णों का विन्यास ) | इन्हीं दोनों सामयों से शब्द के द्वारा अर्थ की उत्पत्ति हो जाएगी ।
अतः शब्द का अर्थ में स्वतन्त्र सम्बन्ध की कल्पना व्यर्थ है , क्योंकि दृष्ट कारणों से ही कार्य की उत्पत्ति संभावित होने पर अतीन्द्रिय कारणों की कल्पना उचित नहीं है । न्याय से आगे ' अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः ' इस सूत्र में कथित अस्मदादि साधारण जनों से उत्कृष्ट पुरुष का परामर्श अभिप्रेत है । ' तद्वचनात् ' उस विशिष्ट पुरुष के द्वारा निर्मित होने के कारण ही आम्नाय ' में अर्थात् वेद में प्रामाण्य है ।
पृ. ५१९
श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः , तद्वचनादाम्नाय - प्रामाण्यम् " ( वै . अ . १ आ . १ सू . ३ ) “ लिङ्गाच्चानित्यो बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे " ( वै . अ . ६ आ . १ सू . १ ) " बुद्धिपूर्वो ददातिः ” ( वै . अ . ६ आ . १ सू . ३ ) इत्युक्तत्वात् ! " बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे " , " बुद्धिपूर्वो ददातिः " इत्यादि सूत्रों के द्वारा कही गयी है ।
ननु यदि वक्तृद्वारेण शब्दोऽर्थावबोधकः , तदा वेदवाक्यादर्थप्रत्ययो न घटते , वक्तुरभावादत आह- श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याभ्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्ष इति ।
न केवलं लौकिक आम्नायः श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तुः प्रामाण्यसपेक्ष्य प्रत्यायकः ।
शब्दो वक्त्रधीनदोषः , न त्वयमसुरभिगन्धवत् स्वभावत एव दुष्टः ।
यथोक्तम्— नित्यत्वे वेदस्य वक्तुरभावाद् दोषाणामनवकाशे सति निराशङ्कं प्रामाण्यं सिद्धयति , पौरुषेयत्वे तु निविचिकित्सं प्रामाण्यं न लभ्यते , कदाचित् पुरुषाणां रागद्वेषादिभिरयथार्थस्यापि वाक्यस्य दर्शनात् ।
तत्राह - " तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ” इति ।
तदित्यनागतावेक्षणन्यायेन “ अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्ग मृषेः ” इति
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — श्रुति एवं स्मृति रूपशब्द प्रमाणों का भी प्रामाण्य उनके वक्ताओं के प्रामाण्य के हो अधीन है । यही बात ' तद्वचनादाभ्नायस्य प्रामाण्यम् ” “ लिङ्गाच्चानित्यः
शब्दे कारणवर्णादिदोषा वक्तृनराश्रयाः ।
नहि स्वभावतः शब्दो दुष्टोऽसुरभिगन्धवत् ।।
( प्र ० ) यदि वक्ता की विवक्षा के द्वारा ही शब्द अर्थ का बोधक है , तो फिर वेद वाक्यों से अर्थों का बोध न हो सकेगा , क्योंकि वेदों का कोई वक्ता नहीं है । इसी प्रश्न के समाधान के लिए " श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः ” भाष्य का यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् केवल लौकिक ' आम्नाय ' के द्वारा प्रमाबोध के उत्पादन के लिए ही वक्ता के प्रामाण्य की अपेक्षा नहीं है , किन्तु श्रुति एवं स्मृति रूप आम्नाय ( शब्द ) भी अपने द्वारा प्रमात्मक बोध के उत्पादन के लिए वक्ता के प्रामाण्य की अपेक्षा रखते हैं । क्योंकि शब्द दुर्गन्ध की तरह स्वतः ही दुष्ट नहीं है । उसमें तो वक्ता के दोष से ही दोष आते हैं । जैसा कहा गया है कि ' शब्द में कारणों के द्वारा वर्णों के जितने भी दोष भासित होते हैं , वे सभी वस्तुतः वक्ता पुरुष में रहनेवाले दोषों के कारण ही आते हैं । दुर्गन्ध की तरह शब्द स्वभावतः स्वयं दुष्ट नहीं हैं ' ।
( प्र ० ) वेदों को यदि नित्य मान लिया जाता है तो फिर उनमें निःशङ्क प्रामाण्य की सिद्धि होती है । यदि उन्हें पौरुषेय मानते हैं तो यह शङ्का बनी ही रहती है कि ' कदाचित् इसका कोई अंश अप्रमाण न हो ' । क्योंकि कभी कभी ऐसा देखा जाता है कि रागद्वेष के कारण मनुष्य अयथार्थ ( बोषजनक ) वाक्य का भी प्रयोग करता है । इसी प्रश्न का उत्तर ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ' इत्यादि सूत्रों का उल्लेख करते हुए भाष्यकार ने दिया है । ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ' इस सूत्र में ' तत् ' शब्द से ' आनेवाले भविष्यवस्तु को भी बुद्धि के द्वारा देखा जा सकता है ' ( अनागतावेक्षण ) इस
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अयमभिसन्धिः -- दोषाभावप्रयुक्तं प्रामाण्यं न नित्यत्वप्रयुक्तम् , सत्यपि नित्यत्वे श्रोत्रमनसोरागन्तुकदोषैः क्वचिदप्रामाण्यात् । असत्यपि नित्यत्वे प्रसृष्टदोषाणां चक्षुरादीनां प्रामाण्यात् । दोषाश्च पुरुषविशेषे नैव सन्तीत्युपपादितम् । तेनैतत्प्रोक्तस्याम्नायस्य सत्यपि पौरुषेयत्वे प्रामाण्यम् । नहि यथार्थद्रष्टा प्रक्षीणरागद्वेषः कृपावानुपदेशाय प्रवृत्तोऽयथार्थमुपदिशतीति शङ्कामारोहति ।
अथ पुरुषविशेषप्रणीतो वेद इति कुत एषा प्रतीतिरिति ? सर्वैर्वर्णाश्रमिभिरविगानेन तदर्थपरिग्रहात् । यत्किञ्चनपुरुष प्रणीतत्वे तु वेदस्य बुद्धादि - वाक्यवन सर्वेषां परीक्षकाणामविगानेन तदर्थानुष्ठानं स्यात् , कस्यचिदप्रामाण्यावबोधेन विसंवादप्रतीतेरपि सम्भवात् । यत्र च सर्वेषां संवादनियमस्तत्प्रमाणमेव , यथा प्रत्यक्षादिकम् । प्रमाणं वेदः सर्वेषामविसंवादिज्ञानहेतुत्वात् , प्रत्यक्षवत् । यत्तु दृष्टार्थेषु कर्मस्वनुष्ठानात् क्वचित् फलादर्शनं न तदस्य प्रामाण्यं प्रतिक्षिपति , सामग्रीवैगुण्य निबन्धनत्वात् । तन्निबन्धनत्वं च यथावत्सामग्री सम्भवे सति फलदर्शनात् ।
आप्तोक्तत्वादाम्नायस्येति न युक्तम् , तदर्थानुष्ठानकालेऽभियुक्तैरनुष्ठातृभिः स्मृत्ययोग्यस्य कर्तुरस्मरणादभावसिद्धेरत आह - लिङ्गाच्चानित्य इति । तद्वचनादाम्नाय प्रामाण्यमित्यत्रोक्तमाम्नायपदं प्रकृतत्वादिह सम्बध्यते , लिङ्गा . दाम्नायोऽनित्यो गम्यत इत्यर्थः । लिङ्गमुपन्यस्यति - बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेद इति । तावत् प्रेक्षावान्न प्रवर्तते , यावत् तद्विषये वाक्यस्य प्रामाण्यं नावधारयति । दृष्टं च लोके वचसः प्रामाण्यं वक्तृगुणावगतिपूर्वकम् तेन वेदेऽपि तथैव प्रामायान्निविचिकित्स मनुष्ठानं स्यात् ।
अत्र वदन्ति - नाप्तोक्तत्वनिबन्धनं वचसः प्रामाण्यम् , सर्वप्रमाणानां स्वत एव प्रामाण्यादिति । ते इदं प्रष्टव्याः , प्रामाण्यमेव तावत् किमुच्यते ? किमर्थाव्यभिचारः ? किं वा यथार्थपरिच्छेदकत्वम् ? न तावदर्थाव्यभिचारः ।
सत्यपि वह्निनियतत्वे धूमस्य प्रमत्तस्य कुतश्चिन्निमित्तादनुत्पादिताग्निज्ञानस्यप्रामाण्याभावात् , नीलपीतादिषु प्रत्येकं व्यभिचारेऽपि चक्षुषो यथार्थज्ञानजनकत्वेनैव प्रामाण्यात् ।
अथ यथार्थपरिच्छेदकत्वं प्रामाण्यम् ? तत् किं स्वतो ज्ञायते ? स्वतो वा जायते ? किं वा स्वतो व्याप्रियते ? यदि तावज्ज्ञानेन स्वप्रामाण्यं स्वयमेव ज्ञायेत , यथार्थपरिच्छेदकमहमस्मीति । न हि प्रमाणे यथार्थमिदमयथार्थं वेति संशयः कदाचिदपि स्यात् , विपर्ययज्ञाने च प्रवृत्तिर्न भवेत् । अथ स्वात्मनि क्रियाविरोधादात्मानमगृह्णद् विज्ञानमात्मनो यथार्थपरिच्छेदकत्वं न गृह्णाति तहि तत्परिच्छेदाय परमपेक्षितव्यम् , प्रमाणेन विना प्रमेयप्रतीतेरभावात् ।
प्रामाण्यस्यापि प्रमीयमानदशायां प्रमेयत्वादिति परतः प्रामाण्यमेव । परेण प्रामाण्ये ज्ञायमाने परेण प्रामाण्यं ज्ञेयम् , तस्यापि प्रामाण्यमपरेण ज्ञेयं तस्याप्यन्येनेत्यनवस्थेति चेत् ? नानवस्था , सर्वत्र प्रामाण्ये जिज्ञासाभावात् ।
प्रमाणं हि स्वोत्पत्त्यैवार्थं परिच्छिनत्ति न ज्ञातप्रामाण्यम् , तेन त्वर्थे परिच्छिन्नेऽपि यत्र कुतश्चिन्निमित्तात् प्रमाणमिदमप्रमाणं वेति संशये जाते विषयसन्देहात् पुरुषस्याप्रवृत्तिः , तत्रास्य प्रवृत्त्यर्थं करणान्तरात् प्रामाण्यजिज्ञासा भवति , अनवधारिते प्रामाण्ये संशयानुच्छेदात् । यत्र पुनरत्यन्ताभ्यासपाटवादखिलविशेषग्रहणाद् वा प्रमृष्टसन्देहकलङ्कलेखमेव प्रमाणमुदेति , तत्र तदुत्पत्त्यैवार्थनिश्चये प्रमातुर्निराकाङ्क्षत्वात् प्रतिपित्सेव नास्तीति न प्रमाणान्तरानुसरणम् ।
यस्तु तत्रापि ज्ञानस्योभयथा दर्शनेन सन्देहमारोपयति स न शक्नोत्यारोपयितुम् , तदर्थनिश्चयेनैव पराहतत्वात् । यथाह मण्डनो ब्रह्मसिद्धौ-
" अनाश्वासो ज्ञायमाने ज्ञानेनैवापबाध्यते " इति ।
यदि प्रवृत्त्यर्थं प्रामाण्यं विजिज्ञास्यते ? यत्रानवधारितप्रामाण्यस्यैवार्थसंशयात् प्रवृत्तिरभूत् तत्रार्थप्राप्तिपरितुष्टस्य प्रामाण्ये जिज्ञासा नास्ति , कथं प्रवृत्तिसामर्थ्यात् प्रमाणस्यार्थवत्त्वावधारणम् ? न तत्रापि कर्षकस्येव बीजपरीक्षार्थं प्रामाण्यपरीक्षार्थमेव प्रवृत्तिः अस्यास्त्येव तदर्थिता । यस्य प्रामाण्य सन्देहादर्थे सन्दिहानस्यार्थग्रहणार्थमेव प्रवृत्तिर्जाता , तस्यार्थप्राप्तिचरितार्थस्यानभिसंहितमपि प्रामाण्यावधारणं वस्तुसामर्थ्याद् भवति , प्रवृत्तिसामर्थ्यस्य प्रामाण्याव्यभिचारात् । तदेवं तावत् प्रामाण्यं स्वतो न ज्ञायते । नापि स्वतो जायते । यदि ज्ञानमुत्पद्य पश्चात् स्वात्मनि यथार्थपरिच्छेदकत्वं जनयति , प्रतिपद्येमहि तस्य स्वतः प्रमाणताम् । यथार्थावबोधस्वभावस्यैव तस्य कारणादुत्पत्ति पश्यन्तः परापेक्षमेव तस्य प्रामाण्यं मन्यामहे ।
अथ मन्यसे प्रमाणं स्वयमेव स्वकीयं प्रामाण्यं जनयतीति स्वतः प्रमाणत्वं न ब्रूमः अपि तु ज्ञानं प्रामाण्योत्पादाय स्वोत्पादककारणकलापादन्यन्नापेक्षत इति स्वतः प्रामाण्यम् । एतदप्यसत् । यदि ह्यन्यूनानतिरिक्तज्ञानोत्पादिकैव सामग्री प्रामाण्ये कारणम् , विपर्ययज्ञानं कुतः ? यथार्थज्ञानजननं कारणानां स्वभावः , स यदा दोषैः प्रच्याव्यते तदा तान्ययथार्यज्ञानं जनयन्ति , यदा तु स्वभावप्रच्युतिहेतवो दोषा न भवन्ति तदा तेषां यथार्थज्ञानजननमेव स्वभावो व्यवतिष्ठत इति चेत् ? तत् किं वक्तृज्ञानमात्रादेव तत्पूर्वके वाक्ये यथार्थतोत्पाद : ? एवं सति सर्वमेव वाक्यमवितथं स्यात् । अथ प्रमाणज्ञानाड् वाक्ये यथार्थतोत्पाद : ? न तर्हि कारणस्वरूपमात्रात् प्रामाण्यमपि तु तद्गुणात् । शब्दस्य कारणमर्थज्ञानम् , तस्य गुणो यथार्थत्वम् । अयथार्थत्वं च दोषः । तत्र यथार्थताया वाक्यप्रामाण्यहेतुत्वे कारणगुणादेव तस्य प्रामाण्यम् , न स्वरूपमात्रात् । शब्दस्य च गुणात् प्रामाण्ये ज्ञानान्तराणामपि तथैव स्यात् । विवादाध्यासितानि विज्ञानानि कारणगुणाधीनप्रामाण्यानि , प्रमाणज्ञानत्वाच्छन्दाधीनप्रमाणज्ञानवत् ।
शब्देऽपि कारणगुणस्य दोषाभावे व्यापारो न प्रामाण्योत्पत्ताविति चेत् ? न , गुणेन दोषप्रतिबन्धाद् दोषकार्यस्यायथार्थत्वस्योत्पत्तिर्मा भूत् , यथार्थत्वोत्पादस्तु कुतः ? कारणाभावे हि कार्याभावो न तु विपरीतस्य भावः । ज्ञानस्वरूपमात्रादिति चेत् ? न तस्याविशेषात् । अर्थसम्बन्धो हि ज्ञानस्य विशेषः , स चेद्दोषप्रतिबन्धमात्रोपक्षीणत्वाद् यथार्थतोत्पत्तावनङ्गम् , स्वरूपस्याविशेषाद् नार्थविशेषनियतं वाक्यं स्यादविशेषाद् विशेषसिद्धेरभावात् ।
अथ यदर्थविषयं ज्ञानं तदर्थविषयमेव वाक्यं जनयतीति , तदा ज्ञानस्य यथार्थतैव वाक्यस्य यथार्थताहेतुः , न बोधरूपतामात्रमित्यायातं तस्य गुणादेव प्रामाण्यम् । अस्तु वा गुणस्य दोषाभावे व्यापारस्तथापि परतः प्रामाण्यं न हीयते , तदुत्पत्तौ सर्वत्र कारणस्वभावव्यतिरिक्तस्य दोषाभावस्याप्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्यांवधारणात् । दोषाभावाद् विपर्ययाभाव :, प्रामाण्यं त्विन्द्रियादिस्वरूपमात्राधीनमिति चेत् ?
दोषः प्रामाण्योत्पत्तिः प्रतिबध्यते , विपर्ययः पुनरिन्द्रियादिस्वरूपाधीन इति कस्मान्न कल्प्यते ? दोषान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वाद् विपर्ययस्य नैवं कल्पनेति चेत् ? प्रामाण्यस्यापि दोषाभावान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वदर्शनान्न तत्कल्पनेति समानम् । हि तदस्ति प्रमाणं यद् दोषाणां प्रागभावं प्रध्वंसाभावं नापेक्षते ।
एवं प्रवृत्त्यादिकार्यजननव्यापारोऽपि प्रमाणस्य परत एव न स्वरूपमात्राधीनः , उपकारापकारादिसापेक्षस्य प्रवृत्त्यादिकार्यजनकत्वादित्येषा दिक् ।
हस्तस्यावाङ्मुखाकुञ्चनादाह्वानं प्रतीयते , पराङ्मुखोत्क्षेपणाच्च विसर्जनप्रतीतिर्भवति एतत्प्रमाणान्तरमिच्छन्ति केचित् । तान् प्रत्याह -- प्रसिद्धाभिनयस्येति । कराकुश्वनादिलक्षणोऽभिनयोऽनेनाभिप्रायेण क्रियत इत्येवं यत्पुरुषस्य प्रसिद्धोऽभिनयः , तस्य चेष्टया करविन्यासेनाह्वानविसर्जनादिप्रतीतिदृश्यते नान्यस्य , अतस्तदपि चेष्टया ज्ञानमनुमानमेव ।
उपमानस्यानुमानेऽन्तर्भावं कुर्वन्नाह - आप्तेनाप्रसिद्धस्य
६६ वाक्यस्य कृतिर्वेद इति - वाक्यस्य कृतिर्वाक्यरचना बुद्धिपूर्विका , वाक्यरचनात्वात् , लौकिकवाक्यरचनावत् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — गूढ़ अभिप्राय यह है कि किसी भी प्रमाण में प्रामाण्य के लिए उसका नित्य होना आवश्यक नहीं है । उसमें दोषों का न रहना ही उसके प्रामाण्य के लिए पर्याप्त है । क्योंकि श्रोत्रेन्द्रिय और मन ये दोनों ही नित्य हैं ( पोरुषेय नहीं हैं ) , किन्तु किसी कारण से जब इनमें दोष आ जाते हैं तो फिर ( ये नित्य होते हुए भी ) अप्रमाण हो जाते हैं । इसी प्रकार चक्षुरादि इन्द्रियाँ यद्यपि अनित्य हैं फिर भी जब तक दोषों से शून्य रहती हैं तब तक उनमें प्रामाण्य बना रहता है । अतः विशिष्ट पुरुष ( रूप ईश्वर ) के द्वारा रचित आम्नाय में उसके पौरुषेय होने पर भी प्रामाण्य के रहने में कोई बाधा नहीं है । इसकी तो शङ्का भी नहीं की जा सकती कि यथार्थ ज्ञान से युक्त और रागद्वेष से रहित कृपाशील महापुरुष जब उपदेश करने के लिए उद्यत होंगे तो वे अयथार्थ ( ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले ) वाक्यों का भी कभी प्रयोग करेंगे ।
( प्र ० ) यह कैसे समझते हैं कि विशिष्ट ( सर्वज्ञ ) पुरुष के द्वारा ही वेदों का निर्माण हुआ है ?
( उ ० ) चूंकि ब्राह्मणादि सभी वर्गों के लोग एवं ब्रह्मचर्यादि सभी आश्रमों के लोग बिना किसी विरोध के वेदों के द्वारा प्रतिपादित निर्देशों का पालन करते हैं | यदि किसी साधारण पुरुष से वेदों का निर्माण हुआ होता तो बुद्धिपूर्वक चलनेवाले इतने शिष्ट जनों के द्वारा वेदों के द्वारा कथित अर्थों का बिना विरोध के अनुष्ठान न होता , जैसे कि बुद्धादि के वाक्यों का अनुसरण कुछ ही व्यक्तियों के द्वारा हुआ , और वह भी बहुत विरोध के बाद | वेदों को बुद्धादि वाक्यों की तरह अप्रामाणिक मानने पर वर्णाश्रमियों में से भी किसी को अप्रामाण्य ज्ञान के द्वारा वेदों से अप्रमा ज्ञान भी होता ।
( इससे यह अनुमान होता है कि ) जिसमें सभी को प्रामाण्य यह होता है वह प्रमाण ही होता है ( अप्रमाण नहीं ) , जैसे कि प्रत्यक्षादि प्रमाण । अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों की तरह वेद भी सभी व्यक्तियों में प्रमा ज्ञान काही उत्पादक होने के कारण प्रमाण ही है ।
यह जो कोई आक्षेप करते हैं कि ' वेदों के द्वारा निर्दिष्ट अनुष्ठानों में से कुछ निष्फल भी होते हैं , जिससे निःशङ्क प्रामाण्य का विघटन होता है , यह आक्षेप तो उन अनुष्ठानों की यथाविहित सामग्री में वैगुण्य की कल्पना करके भी हटाया जा सकता है । ' उन अनुष्ठानों के विधान के अनुसार सामग्री का सम्बलन नहीं था ' यह इसी से समझ सकते हैं कि विधान के अनुसार सामग्री के द्वारा जो अनुष्ठान किया जाता है , वह अवश्य ही सफल होता दीखता है ।
( प्र ० ) आम्नाय ( वेद ) आप्तों से उक्त होने के कारण प्रमाण नहीं है , क्योंकि अनुष्ठान के समय अनुष्ठाताओं को वेदों के कर्त्ता का स्मरण नहीं होता है , अतः सत्ता के न रहने के कारण वे स्मृति के अयोग्य हैं ? इसी प्रश्न के समाधान के लिए ' लिङ्गाच्चानित्यः ' इस सूत्र का किया गया है । इस सूत्र के उल्लेख पूर्ववर्ती ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ' इस सूत्र के ' आम्नाय ' पद को प्रकृत में उपयुक्त होने के कारण ' लिङ्गाच्चानित्यः ' इस सूत्र में अनुवृत्त समझना चाहिए | तदनुसार इस सूत्र का यह अर्थ होता है कि हेतु से आम्नाय को अनित्य समझना चाहिए , ( अर्थात् हेतु से वेद में अनित्यत्व का अनुमान करना चाहिए ) | ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदें ' इस सूत्र के उल्लेख के द्वारा वेद में अनित्यत्व के साधक हेतु का हो निर्देश किया गया है । उक्त सूत्र का ' वाक्यकृतिः ' शब्द ' वाक्यस्य कृति : ' इस समास
लिङ्गान्तरमाह - बुद्धिपूर्वो ददातिरित्युक्तत्वात् । वेदे ददातिशब्द बुद्धिपूर्वको ददातिरित्युक्तत्वाल्लौकिकददातिशब्दवत् ।
यच्चेदमस्मर्यमाणकर्ता ' कत्वादिति , तदसिद्धम् , “ प्रजापतिर्वा इदमेक आसीनाहरासीन्न रात्रिरासीत् , स तपोऽतप्यत , तस्मात् तपसश्चत्वारो वेदा अजायन्त " इत्याम्नायेनैव कर्तृ स्मरणात् , जीर्णकूपादिभिर्व्यभिचाराच्च । तदेवमनित्यत्वे वेदस्य सिद्धे पुरुषवचसां द्वैतोपलम्भात् प्रामाण्यसन्देहे सति दृष्टे विषये कदाचिदर्थसन्देहात् प्रवृत्तिर्भवत्यपि अदृष्टे तु विषये प्रचुरवित्तव्ययशरीरायाससाध्ये के द्वारा निष्पन्न है , तदनुसार उक्त सूत्र से यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार लौकिक वाक्य की रचना केवल वाक्य को रचना होने के कारण ही पुरुष की बुद्धि से उत्पन्न होती है , उसी प्रकार वेदवाक्यों की रचना भी चूंकि वाक्य रचना ही है , अतः वह भी पुरुष की बुद्धि से ही उत्पन्न I
वेदों में अनित्यत्व के साधन के लिए ही दूसरे हेतु का प्रदर्शन करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि ' बुद्धिपूर्वो ददाति : ' इस सूत्र की रचना महर्षि कणाद ने की है । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार लोक में ' ददाति ' शब्द का प्रयोग ( पुरुष की ) बुद्धि के द्वारा निष्पन्न होता है , उसी प्रकार वेद के ' ददाति ' शब्द का प्रयोग भी केवल ' ददाति ' शब्द का प्रयोग होने के कारण ही बुद्धि के द्वारा उत्पन्न है ।
( वेद को नित्य माननेवालों ने ) यह जो ' अस्मय्यं माणकत्र्त्ती कत्व ' रूप हेतु का उल्लेख ( वेदों के नित्यत्व के लिए किया है , वह भी ठीक नहीं है , क्योंकि ) यह हेतु ही वेद रूप पक्ष में सिद्ध नहीं है । चूंकि ' प्रजापतिर्वा ' इत्यादि वेद वाक्यों में कर्त्ता का स्पष्ट उल्लेख है । एवं यह ' अस्मर्यमाणकर्तृकत्व ' रूप हेतु उन जीर्णकूपादि में व्यभिचरित भी है , जिनके बनानेवालों का नाम आज कोई नहीं जानता ।
इस प्रकार वेदों में अनित्यत्व के सिद्ध हो जाने पर ( यह उपपादन करना सुलभ है कि ) दृष्टान्तभूत लौकिक वाक्य प्रमाण और अप्रमाण दोनों ही प्रकार के उपलब्ध होते हैं , अत : उनमें प्रामाण्यसन्देह के कारण उन वाक्यों से निर्दिष्ट कार्यों में कदाचित् अर्थ के सन्देह से भी प्रवृत्ति हो सकती है , किन्तु वैदिक यागादि कार्यो में - जिनके फल स्वर्गादि सर्वथा अष्ट हैं , जिनके अनुष्ठान में बहुत से धन का व्यय होता है , शारीरिक परिश्रम भी बहुत अपेक्षित होता है तब तक प्रवृत्ति नहीं हो सकती जब तक कि उन अनुष्ठानों के बोधक वाक्यों में प्रामाण्य का अवधारण न हो जाय ।
शब्दों के प्रामाण्य के प्रसङ्ग में लोक में यह देखा जाता है कि उसका प्रामाण्य अपने ज्ञान के लिए वक्ता में यथार्थज्ञानादि गुणों के ज्ञान की अपेक्षा रखता है , अतः वेदों में भी उसी प्रकार से वक्ता में गुणावधारणमूलक प्रामाण्य जब तक अवधारित नहीं होगा , तब तक उनसे विहित यागादि का निःशङ्क अनुष्ठान नहीं हो सकेगा ।
इस प्रसङ्ग में एक सम्प्रदाय के ( मीमांसक ) लोग कहते हैं कि ( प्र ० ) शब्द आप्तजनों से उक्त होने के कारण प्रमाण नहीं हैं , क्योंकि सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः है | ( उ ० ) इन लोगों से यह पूछना चाहिए कि आप लोग प्रामाण्य किसे कहते हैं ? क्या ( १ ) अर्थ के साथ ज्ञान का अव्यभिचार ( नियत सम्बन्ध ) ही प्रामाण्य है ? अथवा ( २ ) वस्तुओं को अपने रूप में निश्चित करना ही प्रामाण्य है ?
( १ ) अर्थ का अव्यभिचार तो प्रामाण्य नहीं हो सकता , क्योंकि ऐसे कितने हो पागल दुनियाँ में हैं , जिन्हें जिस किसी प्रतिबन्ध के कारण धूम में वह्नि की व्याप्ति रहने पर भी धूमज्ञान से वह्नि का ज्ञान नहीं होता , फलतः उस धूम ज्ञान में प्रामाण्य नहीं रहेगा । एवं नील में सम्बद्ध चक्षु पीत में व्यभिचरित रहने पर भी यथार्थ ज्ञान का करण होने से ही प्रमाण माना जाता है ।
( २ ) यदि प्रामाण्य को यथार्थपरिच्छेदकत्व रूप मानें तो उस प्रसङ्ग में पहिले यह पूछना है कि यह यथार्थपरिच्छेदकत्व निम्नलिखित पक्षों में से क्या है ? ( १ ) प्रामाण्य स्वतः ज्ञात होता है ? या ( २ ) प्रामाण्य स्वतः उत्पन्न होता है ? अथवा ( ३ ) प्रामाण्य अपने अर्थपरिच्छेद रूप कार्य में स्वतः व्यापृत होता है ? ( १ ) यदि ज्ञान का प्रामाण्य अपने ही द्वारा ' यथार्थ परिच्छेदक मैं ही हूँ इस प्रकार से ज्ञात होता तो फिर ( प्रमा ज्ञान रूप ) प्रमाण में ' यह यथार्थ है ? या अयथार्थ ?
इस प्रकार का संशय कभी नहीं होता । एवं विपर्यय ज्ञान से जो ( विफला ) प्रवृत्ति होती है , वह भी कभी नहीं होती ( उससे भी सफल प्रवृत्ति ही होती ) । यदि यह कहें ( प्र ० ) ' स्व ' में क्रिया के विरोध के कारण अर्थात् एक ही वस्तु में एक क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का समावेश असम्भव होने के कारण एक ज्ञान व्यक्ति अपने उसी ज्ञान व्यक्ति का ग्रहण नहीं कर सकता , अतः ' स्व ' में रहनेवाले यथार्थपरिच्छेदकत्व का भी ग्रहण उससे नहीं होता है ।
( उ ० ) तो फिर अर्थ परिच्छेद के लिए किसी दूसरे प्रमाण की अपेक्षा होगी , क्योंकि प्रमाण के बिना प्रमेय का ज्ञान नहीं होता है । प्रमाण भी अपने प्रमा ज्ञान में विषय होने की दशा में प्रमेय है ही । अतः यथार्थपरिच्छेदकत्व भी ' परतः ' ही है । ( प्र ० ) दूसरी प्रमा से जिस समय प्रामाण्य गृहीत होता है , उस समय यह प्रामाण्य उस दूसरे प्रमाण का ज्ञेय विषय होता है । किन्तु जब यह दूसरा प्रमाण स्वयं ज्ञेय होता है , तब वह किसी तीसरे प्रमाण के द्वारा गृहीत होता है ।
इसी तरह उस तीसरे प्रमाण का भी ग्रहण किसी चौथे प्रमाण से होगा । इस प्रकार ' परतः प्रामाण्यम ' पक्ष में अनुवस्था दोष है । ( उ ० ) यह अनवस्था दोष ' परतः प्रामाण्य ' पक्ष में नहीं है , क्योंकि सभी ज्ञानों में प्रामाण्य का संशय उपस्थित नहीं होता । प्रमाण अपनी उत्पत्ति के द्वारा अपने अर्थों का अवधारण कर लेता है । अर्थ परिच्छेद के लिए प्रामाण्य के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है ।
प्रामाण्यसंशय के द्वारा अर्थ में प्रवृत्ति के न होने का यह कारण है कि प्रमाण के द्वारा अर्थ पच्छेिद के बाद जब किसी कारणवश अर्थ के परिच्छेदक इस प्रमाण में ' यह प्रमाण है या अप्रमाण ? ' इस आकार का संशय उपस्थित होता है । और इस संशय से अर्थविषयक संशय होता है ।
इस अर्थ संशय के कारण ही प्रवृत्ति का उक्त प्रतिरोध होता है , प्रवृत्ति के इस प्रतिरोध को हटाकर पुनः प्रवृति के सम्पादन के लिए ही दूसरे कारणों के द्वारा प्रामाण्य को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है , क्योंकि जब तक प्रामाण्य का अवधारण नहीं हो जाएगा , तब तक प्रामाण्य का उक्त संशय दूर नहीं हो सकेगा ।
जहाँ अभ्यास की अत्यन्त पटुता के कारण अथवा विषय के सभी अंशों को खूब अच्छी तरह देखने के कारण ऐसा ही प्रमाण उपस्थित होता है , जिसमें सन्देह कलङ्क की रेखा भी नहीं रहती है , वहाँ प्रमाण केवल अपनी उत्पत्ति के द्वारा ही अर्थ का अवधारण करा देता है ( इसी से प्रमाता पुरुष की प्रामाण्य ज्ञान की आकाङ्क्षा शान्त हो जाती है ) , अतः ऐसे स्थलों में प्रामाण्य ज्ञान के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती ।
जो कोई ज्ञान प्रमा और अप्रमा दोनों प्रकार का होता है ' केवल यह समझने के कारण ही ऐसे स्थलों में भी प्रामाण्य सन्देह का आरोप करते हैं , उनका यह आरोप भी सम्भव नहीं है , क्योंकि तदर्थं विषयक निश्चय हो जाने के कारण तदर्थ विषयक प्रामाण्य सन्देह नहीं हो सकता । जैसा कि आचार्य मण्डन ने ब्रह्मसिद्धि में कहा है कि किसी विषयक ज्ञान में उत्पन्न अविश्वास उस विषयक निश्चय के द्वारा ही पराभूत हो सकता है , ( अर्थात् इसके लिए ज्ञान गत प्रामाण्य का अवधारण अपेक्षित नहीं है ) ।
यदि प्रवृत्ति के लिए ज्ञान के प्रामाण्य की जिज्ञासा मानते हैं , तो फिर जो प्रवृत्ति अर्थ के संशय से ही होती है , जिस प्रवृत्ति के आश्रयीभूत पुरुष में प्रामाण्य का अवधारण है ही नहीं , ( उस प्रवृत्ति की उपपत्ति कैसे होगी ? ) क्योंकि वह पुरुष तो उसी संशयजनित प्रवृत्ति के द्वारा अभीष्ट अर्थ को पाकर सन्तुष्ट है , उसमें प्रामाण्य की जिज्ञासा क्यों कर उठेगी ? फिर कैसे कहते कि प्रवृत्ति की सफलता से प्रमाण में अर्थवत्त्व का अवधारण होता है ? जिस प्रकार कोई किसान बीज की परीक्षा को ही प्रधान प्रयोजन मानकर प्रवृत्त होता है , उस प्रकार की स्थिति प्रकृत में नहीं है , क्योंकि वह सन्दिग्ध पुरुष उस अर्थ का प्रार्थी है । किन्तु जहाँ प्रामाण्य - सन्देह के कारण उत्पन्न अर्थ सन्देह से ही अर्थ में
ग्रहण पुरुष प्रवृत्त होता है और उसकी प्रवृत्ति सफल भी होती है , उस प्रवृत्ति की सफलता से परितुष्ट पुरुष को भी प्रवृत्ति की सफलता से प्रामाण्य की अनुमिति अवश्य होती है , क्योंकि प्रवृत्ति की सफलता रूप हेतु में प्रामाण्य का अव्यभिचार ( व्याप्ति ) है ही , और वस्तु के सामर्थ्य को कार्य करने से कोई रोक नहीं सकता ? तस्मात् प्रामाण्य न स्वतः उत्पन्न होता है और न स्वतः ज्ञात ही होता है । यदि उत्पन्न होने के बाद ज्ञान अपने में यथार्थपरिच्छेदकत्व को उत्पन्न करता तो समझते कि वह ' स्वत : प्रमाण ' है । किन्तु हम देखते हैं कि यथार्थ बोध ( यथार्थपरिच्छेद ) स्वरूप ही तो उसकी उत्पत्ति होती है , अत । हम लोग उसके प्रामाण्य के लिए दूसरे कारणों की अपेक्षा मानते हैं ।
( प्र ० ) यदि यह मानते हो कि ( प्र ० गुरुमत ) प्रामाण्य के स्वतस्त्व का यह अर्थ नहीं है कि प्रमाण अपने प्रामाण्य का उत्पादन स्वयं करता है , किन्तु स्वतः प्रामाण्य यह है कि ज्ञान के जितने कारण हैं , उतने से ही ज्ञान के प्रामाण्य की भी उत्पत्ति होती है , प्रामाण्य की उत्पत्ति के लिए उन कारणों से न अधिक कारण की आवश्यकता है और न उन कारणों में से किसी को छोड़कर उसकी उत्पत्ति हो सकती है ।
( उ ० ) किन्तु यह भी असङ्गत है , क्योंकि यदि ज्ञान के लिए जितने कारण आवश्यक हैं , उतने ही कारण यदि ज्ञान के प्रामाण्य के लिए लपेक्षित हैं , प्रामाण्य के लिए न उनसे afe की आवश्यकता है , न उनमें से किसी को छोड़कर प्रामाण्य की उत्पत्ति हो सकती है , तो फिर विपर्यय रूप ज्ञान क्योंकर उत्पन्न होता है ?
( प्र ० ) यद्यपि यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करना ही उन कारणों का स्वभाव है , किन्तु दोषों से वे जिस समय अपने उस स्वभाव से प्रच्युत हो जाते हैं , उस समय उनसे ( दोष सांनिध्य के कारण ) अयथार्थ ज्ञान की भी उत्पत्ति होती है । जिस समय उन कारणों को उस स्वभाव से च्युत करनेवाले दोष उपस्थित नहीं रहते , उस समय ज्ञान के कारणों का अपना यथायं ज्ञान को उत्पन्न करनेवाला स्वभाव व्यवस्थित ही रहता है ।
( उ ० ) तो क्या वक्ता पुरुष में रहनेवाले ( प्रमा अप्रमा साधारण ) सभी ज्ञानों से उस पुरुष के द्वारा प्रयुक्त वाक्यों से उत्पन्न ज्ञानों में यथार्थता ( प्रमात्व ) की उत्पत्ति होती है ! यदि ऐसी बात हो तो सभी वाक्य प्रमाण ही होगे ।
अगर वक्ता में रहने वाले प्रमाज्ञान से ही तज्जनित वाक्य में प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है , अर्थात् वाक्यजनित ज्ञान में प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है , तो फिर ' ज्ञान के उत्पादक कारणों से ही प्रामाण्य की उत्पति होती है ' यह न कहकर यह कहिए कि उस ' कारणगुण ' से अर्थात् वक्तृज्ञान रूप कारण में रहनेवाले प्रमात्व रूप गुण से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है ।
शब्द का कारण है वक्ता में रहनेवाला ज्ञान , वक्ता के ज्ञान रूप इस कारण में रहनेवाला ( प्रमात्व का उत्पादक ) गुण है उस ज्ञान की ' यथार्थता ' और अयथार्थत्व का उत्पादक दोष है उस ज्ञान की अयथार्थता ।
इनमें वक्ता में रहनेवाले ज्ञान की यथार्थता रूप गुण को वाक्य के प्रामाण्य का कारण मानें तो फिर ( यही निष्पन्न होता है कि ) वक्तृज्ञान रूप कारण मे रहनेवाले उसके प्रमात्व रूप गुण से ही शब्द से उत्पन्न ज्ञान में प्रमाण्य की उत्पत्ति होती है , ज्ञान स्वरूपतः अपने सामान्य कारणों से प्रामाण्य को लिये हुए ही उत्पन्न नहीं होता है । इस प्रकार शब्द में परतः प्रामाण्य के स्वीकृत हो जाने पर अनुमानादि ज्ञानों में भी प्रामाण्य के ' परतस्त्व ' की यह स्थिति सुव्यवस्थ हो जाएगी ।
इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार वक्ता के ज्ञान रूप कारण में रहनेवाली यथार्थता रूप गुण से शब्द के द्वारा उत्पन्न ज्ञान में यथार्थता ( प्रमात्व ) की उत्पत्ति होती है , उसी प्रकार उन सभी ज्ञानों में -- जिनके प्रसङ्ग में ( स्वतः प्रामाण्यवादी मीमांसकों के साथ ) विवाद है - कारण में रहनेवाले कथित ' गुण ' से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है , चूँकि वे सभी ज्ञान प्रमाण हैं ।
( प्र ० ) शब्द प्रमाण स्थल में भी वक्ता के ज्ञान का प्रमात्वरूप ' गुण ' इतना ही करता है कि शब्द ज्ञान में अप्रमात्व को लानेवाले दोषों को हटा देता है , प्रामाण्य की उत्पत्ति के लिए वह ( गुण ) कुछ भी नहीं करता ( जो जिसकी उत्पत्ति के लिए कुछ भी नहीं करता , वह उसका कारण कैसे हो सकता है ? ) अतः शाब्दज्ञान को दृष्टान्त रूप से उपस्थित करना युक्त नहीं है ।
( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि गुण से दोष में कार्य को उत्पन्न करने की जो शक्ति है वही केवल प्रतिरुद्ध होती है , इससे दोष से होनेवाली जो ज्ञान की अयथार्थता या अप्रमात्व है , उसकी उत्पत्ति गुण के रहने से भले ही रुक जाय , किन्तु गुण के द्वारा उक्त ज्ञान में यथार्थत्व की उत्पत्ति कैसे हो जाएगी ?
( जब तक वह प्रमाज्ञान के उत्पादन के लिए कोई व्यापार न करे ) कारण के न रहने से इतना ही होगा कि उसका कार्य उत्पन्न न हो सकेगा , किन्तु कारण के न रहने पर विपरीत कार्य की उत्पत्ति कैसे हो जाएगी ? ( अभिमत कार्य की अनुत्पत्ति और विपरीत कार्य की उत्पत्ति दोनों बिलकुल पृथक् वस्तु हैं ) | ( प्र ० ) सभी ज्ञानों की उत्पादिका जो साधारण सामग्री है , उसी से प्रामाण्य की भी उत्पत्ति होती है ।
( उ ० ) यह तो विपर्ययादि ज्ञानों में भी समान ही है , अतः यह नहीं कह सकते कि ज्ञानों के साधारण कारणों से ( प्रामाण्य की ही उत्पत्ति होती है अप्रामाण्य की नहीं ) । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) अर्थ का सम्बन्ध हो ( प्रमा ) ज्ञान का ( अप्रमा ज्ञान ) से अन्तर है , गुण दोषों को हटाने के ही काम में लग जाने के कारण यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति का अङ्ग नहीं है ।
( उ ० ) ( घटादि ज्ञान और पटादिज्ञान दोनों का ज्ञानत्व रूप धर्म ) तो एक ही है , अतः किसी विशेष प्रकार के अर्थ की सिद्धि के लिए जो विशेष प्रकार के वाक्यों का प्रयोग का नियम है वह न रह सकेगा , क्योंकि विशेष वाक्य से विशेष प्रकार को सिद्धिआप मानते नहीं हैं ।
यदि यह कहें ( प्र ० ) वक्ता में जिस विषय का ज्ञान रहता है , तदर्थं विषयक बोध को उत्पन्न करनेवाले वाक्य की ही उत्पत्ति ( उस वक्तृज्ञान से ) होती है , ( उ ० ) तो फिर कारणीभूत वक्तृज्ञान की यथार्थता ही वाक्य के प्रामाण्य का कारण है , शब्द केवल इसलिए प्रमाण नहीं है कि वह जिस किसी ज्ञान को उत्पन्न कर देता है । इससे वही बात आ जाती है कि ( दोष से अप्रामाण्य की तरह ) गुण से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है ।
दूसरी बात यह है कि यदि गुण का उपयोग दोषों को हटाने भर के लिए मान भी लें , फिर भी प्रामाण्य के परतस्त्व में कोई बाधा नहीं आती है , क्योंकि प्रमात्व के प्रति उसके आश्रयीभूत ज्ञान के कारणों से अतिरिक्त दोषाभाव में भी कारणता अन्वय और व्यतिरेक से सिद्ध है ।
पृ. ५२९
प्रसिद्धाभिनयस्य चेष्टया प्रतिपत्तिदर्शनात् तदप्यनुमानमेव आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्थ गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — चेष्टा के साथ सङ्केतित अर्थ के ज्ञान से युक्त पुरुष को ही उस चेष्टा से अर्थ का बोध होता है , अतः चेष्टा भी अनुमान प्रमाण के ही अन्तर्गत है ( अतिरिक्त प्रमाण नहीं ) । ( अज्ञ पुरुष को ) सर्वथा अज्ञात गवय का ज्ञान अप्त पुरुष से उच्चारित ' गोसदृशो गवय : ' इस वाक्य से ही होता है । अत : उपमान भी आप्तवचन ( शब्द ) के ही ( अन्तर्गत ) है । ( फलतः उपमान भी अनुमान ही है )
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव । आप्तिः साक्षादर्थस्य प्राप्तिः , यथार्थोपलम्भ :, तया वर्त्तते इत्याप्तः साक्षात्कृतधर्मा यथार्थदृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयोक्तोपदेष्टा , तेनाप्तेन वनेचरेण विदितगवयेनाप्रसिद्धगवयस्याज्ञातगवयस्य नागरिकस्य कीदृग्गवय इति पृच्छतो गवा गोसारूप्येण गवयस्य प्रतिपादनादुपमानं यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यमाप्तवचनमेव , वक्तृप्रामाण्यादेव तथा प्रतीतेः । आप्तवचनं चानुमानम् । तस्मादुपमानमप्यनुमानाव्यतिरिक्तमित्यभिप्रायः ।
ये तावत् पूर्वमीमांसका वनेचरवचनमेवोपमानमाहुः , तेषामिदमनुमानमेव ।
शरस्वामिशिष्या अनुभूतस्य गोपिण्डस्य वने गवयदर्शनात् स्मृत्यारूढायां गवि ' मदीया गौरनेन सदृशी ' इति सारूप्यज्ञानमुपमानमाचक्षते , तदपि स्मरणमेव । सादृश्यं हि सामान्यवत् प्रत्येकं व्यक्तिसमाप्तं न संयोग . वदुभयत्र व्यासज्य वर्तते , गोपिण्डस्यादर्शनेऽपि वने गवयव्यक्तौ गौसदृशो - ऽयमिति प्रतीत्युत्पादात् । यथोक्तं मीमांसागुरुभिः-
सामान्यवच्च सादृश्यमेकैकत्र समाप्यते ।
प्रतियोगिन्यदृष्टेऽपि यस्मात् तदुपलभ्यते ॥ इति ।
प्रत्येकं परिसमाप्तत्वेऽपि सादृश्यं यद्यपि गवयग्रहणाभावाद् गवयसदृश इति गवि पूर्वं प्रतीतिर्नासीत् , तथापि स्वाधयसन्निकर्ष मात्र भाविनी सादृश्यप्रतीतिरुचितेव । यथा प्रतियोग्यन्तराग्रहणात् तस्मादिदं दीर्घमिदं ह्रस्वमिति प्रतीत्यभावेऽपि स्वाश्रयप्रत्यासत्तिमात्रेण परिमाणस्य स्वरूपतो ग्रहणम् । कथमन्यथा देशान्तरगतः प्रतियोगिनं गृहीत्वा अस्मात् तद्दीर्घं ह्रस्वमिति व्यवस्यति ।
यदि गवि पुरा सादृश्यमिन्द्रियापातमात्रेण न गृहीतम् ? सम्प्रत्यपि गवये न गृह्यते , गवयदर्शनादेव गव्येव च स्मरणमित्युभयनियमो न स्यादविशेषात् । यावतां खुरलाङ्गलित्वादिसामान्यानां गवि ग्रहणम् , तावतामेव गवयेऽपि ग्रहणात् स्मरणनियम इति चेत् ? भूयोऽवयवसामान्यान्येवोभयवृत्तित्वात् सादृश्यम् । तानि चेत् प्रत्येकमाश्रयग्रहणेन गृह्यन्ते , गृहीतमेव सादृश्यम् । तस्माद् गवयग्रहणे सत्यसन्निहितगोपिण्डावलम्बिनी सादृश्यप्रतीतिः सदृशदर्शनाभिव्यक्तसंस्कारजन्या स्मृतिरेव न प्रमाणान्तरम् । दृष्टा च निर्विकल्पक गृहीतस्यापि स्मृतिविषयता , अव्युत्पन्नेनैकपिण्डग्रहणे प्रथममविकल्पितस्य सामान्यस्य पिण्डान्तरग्रहणे प्रत्यभिज्ञानात् ।
sa देशवाक्यस्य गवयदर्शने गोसादृश्यप्रतीत्या ' अस्य गवयशब्दो नामधेयम् ' इति संज्ञासंज्ञि सम्बन्धप्रतीतिमुपमानमिच्छन्ति तेषामपि यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यं तज्जनिता च ' लोके यः खलु गवय इति श्रूयते स गोसदृशः ' इति बुद्धिरागम एव । यदपि गोसदृशस्य गव ५ शब्दवाच्यत्वज्ञानं तदप्यनुमानम् , तत्र तच्छब्दप्रयोगात् । यः खलु शब्दो यत्राभियुक्तैरविगानेन प्रयुज्यते स तस्य वाचकः । प्रयुज्यते चारण्यकेनाविगानेन गोसदृशे गवयशब्द इति । तस्मात् सोऽपि गवयशब्दवाच्य एवेति सामान्येन ज्ञानमनुमानमेव । प्रत्यक्ष गवये सादृश्यज्ञानं त्रैलोक्यव्यावृत्तपिण्ड बुद्धिरपि प्रत्यक्षफलम् । यच्च तद्गतत्वेन संज्ञासंज्ञिसम्बन्धानुसन्धानम् , तदपि सादृश्यग्रहणाभिव्यक्त पूर्वोपजातसामान्यप्रवृत्तगोसदृशगवयशब्दवाच्यत्वज्ञानजनितसंस्कारजत्वादेकत्रोपजातसामान्यविषयसङ्केतज्ञानसंस्कारकृततज्जातीयपिण्डान्तरविषयतच्छब्दवाच्यत्वानुसन्धानवत् स्मरणमेव । एवं हि तदायमनुसन्धत्ते ' अस्यैव तन्मया पूर्वमेव तच्छब्दवाच्यत्वमवगतम् ' इत्युपमानाभावः । णस्य पृथगभिधान साफल्यमुपपादयता परेणार्थापत्तिरुभयथोपपादिता दृष्टः श्रुतो वार्थोऽन्यथा नोपपद्यत इत्यर्थान्तरकल्पनार्थापत्तिः । श्रुतग्रहदृष्टार्थापत्ति : श्रुतार्थापत्तिश्च ।
यत्रार्थोऽन्यथानुपपद्यमानोऽर्थान्तरं गमयति सा दृष्टार्थापत्तिः । यथा जीवति चैत्रो गृहे नास्तीत्यत्राभावप्रमाणेन गृहे चैत्रस्याभावः प्रतीतो जीवतीतिश्रुतेश्च तत्र सम्भवोऽपि प्रतीयते , जीवतो गृहावस्थानोपलम्भात् । न चैकस्य युगपदेकत्र भावाभावसम्भवः , तयोः सहावस्थानविरोधात् । तदयमभावः प्रतीयमानो जीवतीति श्रवणान्नोपपद्यते , यद्ययं बहिर्न भवतीति । अनुपपद्यमानश्च यस्मिन् सति उपपद्यते तत्कल्पयति । जीवतो गृहाभावोऽन्यथा नोपपद्यते । यद्ययं बहिर्न भवतीति जीवतीत्यनेन सह विरोध एव तस्यानुपपत्तिः । सा चैत्रस्य बहिर्भावे प्रतीते निवर्तते । चैत्रो जीवति गृहे च नास्ति बहिःसद्भाभावादिति सावकाशनिरवकाशयोः प्रमाणयोविरोधे सति निरवकाशस्यानुपपत्तिमुखेन सावकाशस्य विषयान्तरोपपादनात् तयोर विरोधसाधनमर्थापत्तिः । या पुनर्देशादिनियतस्य सम्बन्धिनो दर्शनात सम्बन्धस्मरणद्वारेण सम्बन्ध्यन्तरप्रतीतिः सानुमानमित्यनयोर्भेदो ज्ञानोदयप्रकारभेदात । यथोक्तम्-
अन्वयाधीनजन्मत्वमनुमाने व्यवस्थितम् ।
अर्थापत्तिरियं त्वन्या व्यतिरेकप्रवर्तिनी ॥ इति ।
श्रुतार्थापत्तिरपि यत्रानुपपद्यमानः शब्दः शब्दान्तरं कल्पयति , यथा ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' इति वाक्याद् रात्रौ भुङ्क्त इति वाक्यैकदेशकल्पना ।
तत्र दृष्टार्थापत्ति तावदनुमानेऽन्तर्भावयति - दर्शनार्थादर्थापत्तिर्विरोध्येवेति । दृश्यत इति दर्शनम् , दर्शनं च तदर्थश्चेति दर्शनार्थः , पञ्चभिः प्रमाणैरवगतोऽर्थः । तस्माद् दर्शनार्थादर्थान्तरस्यापत्तिरर्थान्तरस्यावगतिर्विरोध्येव , विरोध्यनुमानमेव । यस्य यथा नियमस्तस्य तथैव लिङ्गत्वम् , इह तु प्रमाणान्तरविरुद्ध एवार्थोऽर्थान्तराविनाभूत इति विरोध्येव लिङ्गम् ।
अयमभिप्रायः -- गृहाभावो यद्यनुपपत्तिमात्रेण बहिर्भावं कल्पयति , नियम हेतोरभावाद् अर्थान्तरमपि कल्पयेत् । स्वोपपत्तये गृहाभावोऽर्थान्तरं कल्पयति , अन्यस्मिन् कल्पिते च न तस्योपपत्तिरिति चेत् ? बहिर्भावे सति तस्योपपत्तिरिति न तत् कथितम् ? वयं तु ब्रूमो बहिर्भावेऽपि सति गृहाभावस्यानुपपत्तिरेव । दृष्टमेतद् अव्यापकं द्रव्यमेकत्रास्ति तदन्यत्र नास्तीति । यथा प्राचीप्रतीच्योरेकत्रोपलभ्यमानः सविताऽन्यत्र न भवतीति इदं दर्शनबलेन वावधार्यते जीवतो गृहाभावो बहिर्भावे सत्युपपद्यते नान्यथेति । नन्वेवमन्वयावगतिपूर्विकैव तथोपपत्यवगति : ? तथा सति चार्थापत्तिरनुमानमेव , अन्वयाधीनजन्मत्वात् । यत्तु विरोधे सति प्रवर्तत इति तद् वैधर्म्यमात्रम् । तथा चात्र प्रयोगः - देवदत्तो बहिरस्ति , जीवनसम्बन्धित्वे सति गृहेऽनुपलभ्यमानत्वात् , अहमिवेति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ( प्र ० ) दीप के अभाव से तो विपर्यय ( अप्रमा ) का अभाव ही उत्पन्न होता है , प्रामाण्य तो ज्ञान सामान्य के लिए अपेक्षित इन्द्रियादि कारण समुदाय से ही उत्पन्न होता है । ( उ ० ) इसी प्रकार यह कल्पना भी तो की जा सकती है कि दोषों से प्रामाण्य की उत्पत्ति ही केवल प्रतिरुद्ध होती है , इन्द्रियादि साधारण कारणों से ही विपर्यय की उत्पत्ति होती है । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) विपर्यय के साथ ही दोष का अन्वय और व्यतिरेक दोनों हैं , अतः यह ( दोष से प्रामाण्य की उत्पत्ति के प्रतिरोध की ) कल्पना नहीं की जा सकती ? ( उ ० ) इसी प्रकार ' प्रामाण्य के साथ ही दोषाभाव का अन्वय और व्यतिरेक दोनों देखे जाते हैं , अतः दोषाभाव से प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है ' यह कल्पना भी तुल्य युक्ति से की जा सकती है ; क्योंकि ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं है जो अपने प्रमाज्ञान रूप कार्य के लिए दोषों के प्रागभाव या ध्वंस रूप अभाव की अपेक्षा नहीं करता ।
इसी प्रकार चूंकि प्रमाण विषय में उपकारकत्वबुद्धि की सहायता से ही प्रवृत्तियों को उत्पन्न करते है , विषय में अपकारकत्व बुद्धि के सहयोग से ही प्रमाण के द्वारा निवृत्ति की उत्पत्ति होती है , अतः प्रमाण प्रवृत्त्यादि कार्यों के उत्पादन में भी परापेक्षी ही है ( केवल प्रवृत्त्यादि कार्यों की उत्पत्ति भी स्वतः नहीं होती है ) , यही परतः प्रामाण्यवादियों की दृष्टि है ।
हाथ को अपनी तरफ मोड़ने की ' आकुञ्चन ' नाम की क्रिया से अपने तरफ बुलाने का बोध होता है , एवं हाथ को बाहर की तरफ फैलाने की प्रसारण नाम की क्रिया से बाहर जाने की आज्ञा का बोध होता है । इस बोध के लिए कोई उक्त क्रिया
६७ स्वरूप ' चेष्टा ' नाम का एक स्वतन्त्र प्रमाण मानते हैं । उसी के खण्डन के लिए जिस क्रियायें इन अभिप्रायों प्रसिद्धाभिनयस्य ' यह वाक्य कहा गया है । ' प्रसिद्धोऽभिनयो यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार
पुरुष को यह सङ्केत ज्ञात है कि ' हाथ की ये आकुञ्चनादि से की जाती हैं ' वही पुरुष प्रकृत में ' प्रसिद्धाभिनय ' शब्द से अभीष्ट है । उसी पुरुष को ' चेष्टा ' से अर्थात् हाथ के विशेष प्रकार के अभिनय या क्रिया से बुलाने या बाहर लौटने की क्रिया का बोध होता है , दूसरे को नहीं । अतः चेष्टा से उत्पन्न होनेवाला वह ज्ञान भी अनुमान ही है ।
' उपमान भी अनुमान ही है , वह कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है ' यह उपपादन करते हुए भाष्यकार ने ' आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनमुपमानमाप्तवचनमेव ' यह वाक्य लिखा है । ' आप्त्या वर्त्तते यः स आप्त : ' इस व्युत्पत्ति से ही ' आप्त ' शब्द बना है । साक्षात् ' अर्थ ' की प्राप्ति को ही ' आप्ति ' कहते हैं जो वस्तुतः यथार्थज्ञान रूप ही हैं ।
तदनुसार ' आप्त ' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को समझना चाहिये , जिसने विषयों को उनमें विद्यमान सभी धर्मों के साथ प्रत्यक्ष के द्वारा देखा है ( उनको पूर्ण रूप में यथार्थ रूप में समझा है ) और उस यथार्थज्ञान से ज्ञात वस्तु के ख्यापन ( लोगों को विदित ) करने की इच्छा के द्वारा ही जो उपदेश करते हैं ।
वनों में रहनेवाले इस प्रकार के किसी ' आप्त ' पुरुष से- जिन्हें गवय का ज्ञान है – जब ' अप्रसिद्धगवय ' अर्थात् गवय को न जाननेवाले नागरिक के द्वारा ' गवय किस तरह का होता है ' यह प्रश्न किया जाता है , तब उस पुरुष के द्वारा ' गा ' अर्थात् गो सादृश्य के द्वारा गवय को समझाने के लिए यथा गौस्तथा गवय : ( अर्थात गो को जिस प्रकार देख रहे हो गवय भी उसी प्रकार का होता है ) प्रयुक्त यह वाक्य आप्तवचन ' अर्थात् शब्द प्रमाण ही है , क्योंकि यहाँ भी वचनों के प्रामाण्य से ही अर्थ की प्रतीति होती है ।
आप्तवचन अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अत : उपमान भी अनुमान के ही अन्तर्गत है . यही उक्त भाग्य सन्दर्भ का अभिप्राय है ।
प्राचीन मीसांसकों ने वनवासी के उक्त आप्तपुरुष के वचन को हो उपमान प्रमाण माना है , उनका यह उपमान प्रमाण भी अनुमान में हो अन्तर्भूत हो जाता है ।
शबरस्वामी मीमांसासूत्र के भाष्य कर्ता ) के अनुयायी शिष्यगण यह कहते हैं कि जिस पुरुष ने गाय के शरीर को देखा है , वन में जाने पर वही जब गवय को देखता है तब उसे पहिले देखे हुए गो का स्मरण हो आता है । तब स्मरण किये हुए उस गो में यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि ' हमारी गाय इस गवय के समान है । यह सादृश्य ज्ञान ही उपमान प्रमाण है । इस प्रकार का उपमान प्रमाण रूप ज्ञान अनुमान के अन्तर्गत न आने पर भी स्मरण रूप हो सकता है । क्योंकि जिस प्रकार सामान्य ( जाति ) की अधिकरणता उसके प्रत्येक अधिकरण में अलग अलग होती है , उसी प्रकार सादृश्य की अधिकरणता भी उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में अलग अलग है । जिस प्रकार संयोग के अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में उसकी एक ही अधिकरणता रहती है उस प्रकार सादृश्य की एक ही अधिकरणता उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में नहीं है , किन्तु अलग अलग है । अतः गवय को देखने के समय गो का प्रत्यक्ष न रहने पर भी वन में गवय व्यक्ति रूप सादृश्य का ज्ञान उस समय अप्रत्यक्ष गो में भी हो सकता है ।
जैसा कि मीमांसा के आचार्यों ने कहा है कि चूंकि सादृश्य को उपलब्धि उसके ( एक आश्रय ) प्रतियोगी के न देखने पर भी होती है , अतः सामान्य की तरह उसकी आश्रयता प्रत्येक आश्रय में अलग अलग है ।
यद्यपि सादृश्य अपने प्रत्येक आश्रय में स्वतन्त्र रूप से ही रहता है , फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि गवय को देखने से पहिले उसका ज्ञान न रहने के कारण ( गो प्रत्यक्ष के समय ) गो में ' यह गवय के समान है ' इस आकार की प्रतीति नहीं थी , तथापि केवल सादृश्य के आश्रयीभूत गवय मे चक्षु के संनिकर्ष से , ( फलतः ज्ञानलक्षण सन्निकर्ष से सादृश्य का प्रत्यक्ष सम्भव न होने पर भी स्वसंयुक्तसमवाय सम्बन्ध से ही ) सादृश्य का ग्रहण होना अनुचित नहीं है । जैसे कि दीर्घत्वादि के आश्रयीभूत दण्डादि आश्रय जहाँ प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत रहते हैं , एवं इन दीर्घत्वादि परिमाणों के दूसरे अवधि द्रव्यों का ज्ञान नहीं रहता है , ऐसे स्थलों में ' यह इससे दीर्घ है या ' यह इससे छोटा है , इत्यादि विशिष्ट प्रतीतियाँ यद्यपि नहीं होती हैं , फिर भी ' यह दीर्घं है ' या ' यह ह्रस्व है ' इत्यादि आकारों से स्वरूपतः केवल परिमाण का ग्रहण तो होता ही है , यदि ऐसी बात न हो तो दूसरे देश में जाकर वह उसके दूसरे अवधि रूप प्रतियोगी को जब देख लेता है , उसके बाद ' यह उस द्रव्ब से बड़ा या छोटा है ' इस प्रकार की जो प्रतीति होती है , वह कैसे होगी ?
( प्र ० ) गी में यदि गोत्व की तरह गवय का सादृश्य भी रहता तो गवय को देखने से पहिले भी गो में इन्द्रिय सम्बन्ध के होते ही गवय के सादृश्य की भी प्रतीति हो जाती , सो नहीं होती है ? ( उ ० ) गवय के प्रत्यक्ष के समय भी तो गो में उस सादृश्य को प्रतीति नहीं होती है । अतः यह दोनों नियम नहीं किये जा सकते कि उक्त सादृश्य की प्रतीति ( १ ) गवय - प्रत्यक्ष ही उत्पन्न होती है और ( २ ) गो में ही उत्पन्न होती है । क्योंकि इससे विपरीत कल्पना के भी लिए स्थिति समान है ।
( प्र ० ) खुर पूँछ प्रभृति जितने धर्मों का पहिले गो में ग्रहण हो चुका है , उतने का ही जब गवय में भी ग्रहण होता है तभी गो में गवयसादृदय का स्मरण होता है , ऐसे नियम की कल्पना करेंगे | ( उ ० ) गो और गवय दोनों में जो अनेक अवयवों की समानतायें हैं , वे ही दोनों में रहने के कारण साय कहलाती हैं । ये समानतायें यदि गो और गवय इन दोनों में से एक मात्र के ग्रहण से भी गृहीत होती हैं , तो फिर सादृश्य भी उसी प्रकार गृहीत हो हो गया ।
तस्मात् प्रमाता पुरुष से दूर में रहनेवाले गोपिण्ड में जो गवय के सादृश्य की प्रतीति होती है , वह स्मरण रूप ही है । केवल इतनी सी बात है कि वह स्मरण उस संस्कार से उत्पन्न होता है , जिसका उद्बोधन गोसदृश गवय के दर्शन से होता है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत विषयों का भी स्मरण उपलब्ध होता है . जैसे कि अव्युत्पन्न पुरुष के द्वारा एक पिण्ड के ग्रहण के समय सविकल्पकज्ञान के द्वारा अगृहीत सामान्य का भी उसी जाति के दूसरे पिण्ड के ग्रहण के समय प्रत्यभिज्ञा होती है ।
नैयायिकों का कहना है कि जो प्रमाता पहिले किसी आप्त पुरुष से ' गोसदृशो गवय : ' इस अतिदेश वाक्य को सुन लेता है , बाद में वही जब गवय को देखता है तो उसे यह प्रतीत होती है कि ' इसी पिण्ड का नाम गवय है ' । यह प्रतीति चूँकि गवय शब्द रूप सज्ञा की गवय पिण्ड रूप संज्ञी में ( वाच्यवाचकरूप ) सम्बन्ध विषयक है । ( ' अयं गवयपदवाच्यः ' इस आकार की प्रतीति को संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध को प्रतीति कहते हैं ) , अतः यही उपमान है ।
किन्तु नैयायिकों का भी यह कहना ठीक नहीं है , क्योंकि यह भी वस्तुतः शब्द प्रमाण ही है , क्योंकि ' लोक में यह जो ' गवय ' का नाम सुनते हैं वह गोसदृश वस्तु काही बोधक है ' यह बुद्धि भी तो ' यथा गौस्तथा गवय : ' इस वाक्य से ही उत्पन्न होती है ।
एवं इससे गोसदृश पिण्ड में गवय शब्द के अभिधेय होने का जो ज्ञान होता हैं , वह ( उपमान न होकर ) शब्द ही है , क्योंकि गोसदृश पिण्ड में ही गवय शब्द का प्रयोग होता है , ( अतः नैयायिक गण जिसे उपमान कहते हैं , वह भी शब्द जनित होने के कारण अनुमान ही है ) , एवं गोसदृश ( गवय में ) जो गवय शब्द की वाच्यता का ज्ञान होता है वह भी अनुमान ही है , क्योंकि ( यहाँ अनुमान का यह आकार है कि ) आप्तगण एक स्वर से बिना विरोध के जिस शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं वह शब्द उस अर्थ का वाचक होता है , सभी आरण्यक आप्तजन गवय शब्द का प्रयोग उसी पिण्ड में करते हैं जो गो के समान है ।
तस्मात् गो - सहा उस पिण्ड का नाम अवश्य ही ' गवय ' है । एवं गवय में जो गोसादृश्य का ज्ञान अर्थात् ' यह गवय रूप पिण्ड संसार के और सभी पिण्डों से भिन्न ( स्वतन्त्र जीव ) है ' इस प्रकार का ज्ञान भी ( उपमान से उत्पन्न न होकर ) प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ही उत्पन्न होता है ।
पृ. ५३४
दर्शनार्थादर्थापत्तिर्विरोध्येव श्रवणादनुमितानुमानम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रमाणों के द्वारा ज्ञात अर्थ से र्थों की जो अवगति ( दृष्टार्थापत्ति ) होती है वह विरोधि ( व्यतिरेकी ) अनुमान ही है । वाक्य के श्रवण से जो अर्थावगति ( श्रुतार्थापत्ति ) होती है , वह भी अनुमितानुमान ही है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
श्रुतार्थापत्तिमन्तर्भावयति - श्रवणादनुमितानुमानमिति । ' पोनो दिवा न भुङ्क्ते इति वाक्यश्रवणाद् रात्रिभोजनकल्पना ' अनुमितानुमानम् ' । लिङ्गभूतेन वाक्येनानुमितात् पीनत्वात् तत्कारणस्य रात्रिभोजनस्यानुमानात् ।
इदमत्राकूतम् - अर्थाप्रतिपादकत्वं प्रमाणस्यानुपपत्तिः । ' दिवा न भुङ्क्ते ' इति वाक्यं च स्वार्थं बोधयत्येव , का तस्यानुपपन्नता ? पीनत्वं भोजनकार्यं दिवाभोजने सति नोपपद्यते , कारणाभावात् । तदनुपपत्तौ च वाक्यमप्यनुपपन्नम् , अनन्वितार्थत्वादिति चेत् ? तर्ह्यर्थानुपपत्तिर्वाक्यस्यानुपपन्नत्वमर्थोपपत्तिश्चोपपन्नत्वम् , न त्वस्य स्वरूपेणोपपत्त्यनुपपत्ती । दिवा न भुञ्जानस्य पीनत्वलक्षणश्चार्थो भोजनकार्यत्वाद् रात्रिभोजन रूपेणार्थेनोपपद्यते , न रात्रिभोजनवाक्येनेत्यर्थस्यानुपपत्त्या तस्य तद्वाक्यस्य चोपपत्तिहेतुरर्थ एवार्थनोयो न वाक्यम् , अनुपपादकत्वात् । उपपद्यमानश्चार्थोऽर्थेनैवावगम्यते , दिवा भोजनरहितस्य पीनत्वस्य रात्रिभोजनकार्यत्वाव्यभिचारादिति नास्त्यर्थापत्तिः शब्दगोचरा ।
अथ मतम् - अर्थोऽर्थेनैवोपपद्यत इति तदुपपत्त्यैव तच्छब्दस्याप्युपपन्नता , किन्तु शब्दोऽर्थः शाब्देनैवार्थेनोपपद्यते , प्रमाणान्तरावगतस्य तेन सहान्वयाभावात् । नहि पचतीत्युक्ते क्रियायाः कर्मणा विनानुपपत्तिः पच्यमानस्य कलायस्य प्रत्यक्षेणोपशाम्यति , तस्मिन् सत्यपि किं पचतीत्याकाङ्क्षाया अनिवृत्तेः । शब्दोपनीते तु कर्मणि निर्विचिकित्सः प्रत्ययो भवति ' शार्क } पचति कायं पचति ' इति । ' पोनो दिवा न भुङ्क्ते ' इत्यपि वाक्यार्थानुपपत्तिरियम् , तस्मादस्यापि शाब्देनैवार्थेनोपशान्तिर्भविष्यतीति प्रथममर्थापत्या रात्रिभोजनप्रतिपादकं वाक्यमेवार्थनीयम् , अन्यथा दिवावाक्यपदार्थः सह रात्रिभोजनस्यान्वयाभावात् । वाक्यविषये चार्थापत्तिपर्यवसाने रात्रिभोजनमर्थो नार्थापत्तिविषयतामेति , तस्य वाक्यादेवावगमात् । न चैतद्वाच्यम् , दिवावाक्यस्य तदर्थस्य वा रात्रिवाक्येन सह प्रत्यासत्त्यभावान्न ताभ्यां तदुपस्थापनमिति , अर्थप्रत्यासत्तिद्वारेण वाक्यस्यापि प्रत्यासन्नत्वात् । न चार्थापत्तावनुमानवत् प्रत्यासत्तिरपेक्षते , तस्या अनुपपत्तिमात्रेणैव प्रवृत्तेः । तदुक्तम्-
न चार्थेनार्थ एवायं द्वितीयो गम्यते पुनः ।
सविकल्पक विज्ञानग्राह्यत्वावृत्तिरोहितः ॥
शब्दान्तराण्यबुद्ध्वाऽसामर्थ्यमे वावगच्छति ।
तेनैषां प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचराः ।
वाक्यमेव तु वाक्यार्थं गतत्वाद् गमयिष्यति ।। इति ।
अत्रोच्यते - पदानि वाक्यार्थप्रतिपादनाय प्रयुज्यन्ते । तानि प्रत्येकं पदार्थ संस्पर्शात्मकं वाक्यार्थं प्रतिपादयितुमशक्नुवन्त्यपर्यवसितव्यापारत्वाद् एकार्थकारीणि पदान्तराण्यपेक्षन्ते । यत्र पुनरमीभिर्वाक्यार्थः प्रतिपादितः , तत्रैषां शब्दान्तरापेक्षा नास्त्येव , स्वव्यापारस्य कृतत्वात् । यस्तैरुपपादितोऽर्थः स नोपपद्यत इति चेत् ? नोपपादि , नह्यर्थस्याविरोधोपपादनमपि शब्दस्य व्यापारः , किन्तु प्रतिपादनम् । तच्चानेनासन्निहितेऽपि रात्रिवाक्ये कृतमेव । प्रतीयते हि दिवा s भोजनवाक्यात् पीनस्याभोजनम् , निःसन्दिग्धाऽभ्रान्ता चात्रेयं प्रतीतिः , अन्यथार्थापत्तेरपि प्रवृत्त्यभावात् । निश्चितस्यैव हि पोनस्य दिवाऽभोजन . प्रमाणसिद्धस्यानुपपत्तिर्न युक्तेति तदुपपादनमर्थ्यते , सन्दिग्धे विपरीतत्वेन चावधारिते तस्मिन् कस्योपपत्तयेऽर्थान्तरकल्पना स्यात ? न चार्थयोः पर स्परविरोध इति तयोः प्रतीतिरप्रतीतिर्भवति । तस्मादर्थप्रतीत्यैवोपपन्नः शब्दो न शब्दान्तरमपेक्षते , कर्तव्यतान्तराभावात् । अर्थ एव तु तेनाभिहितोऽर्थान्तरेण विनानुपपद्यमानः प्रतीत्यनुसारेण स्वोपपत्तये मृगयतीत्यव्याहतं शब्दश्रवणादनुमितानुमानमिति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — एवं ' गवय रूप यही अर्थ गवय शब्द रूप संज्ञा का संज्ञी ( वाच्य ) हैं इस प्रकार संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध का जो अनुसन्धान होता है , वह भी स्मरण ही है ( उपमान नहीं ) , क्योंकि ' गोसदृशो गवय : ' इस वाक्य के द्वारा पहिले उत्पन्न ग्रहणरूप संस्कार से ही इसकी उत्पत्ति होती है । यह संस्कार उक्त सादृश्यज्ञान से ही उदबुद्ध होता है । जैसे कि किसी एक ही घट व्यक्ति में घट पद का सङ्केत सामान्य रूप से गृहीत होने पर भी उससे उत्पन्न संस्कार के द्वारा दूसरे घट व्यक्ति में भी घट शब्द की वाच्यता का इस आकार का अनुसन्धान होता है कि ' इस व्यक्ति में जिस घटवाच्यता को मैं समझ रहा हूँ , उसको मैं पहिले जान चुका हूँ । इन सभी उपपत्तियों से यह सिद्ध होता है कि उपमान नाम का कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है ।
शब्द या और किसी प्रमाण के द्वारा निश्चित अर्थ की उपपत्ति जिस दूसरे अर्थ की कल्पना के विना न हो सके , उस दूसरे अर्थ को ही ' अर्थापत्ति ' कहते हैं । इस लक्षण में ( ' शब्द प्रमाण के द्वारा ' इस अर्थ के बोधक ) ' श्रुत ' पद का स्वतन्त्र रूप से साफल्य का उपपादन करते हुए मेरे प्रतिपक्षियों ( मीमांसकों ) ने ( १ ) दृष्टार्थापत्ति और ( २ ) श्रुतार्थापत्ति इसके ये दो भेद किये हैं ।
जहाँ प्रकृत अर्थ अनुपपन्न होकर दूसरे अर्थ का ज्ञापक होता है वहाँ ' दृष्टार्थापत्ति ' समझना चाहिए । जैसे ' जीवति चैत्रो गृहे नास्ति ' ( चैत्र जीते किन्तु घर में नहीं हैं ) इस स्थल में जीवित रहने के कारण चैत्र के घर में रहने की सम्भावना की भी प्रतीति होती है । क्योंकि जीवित व्यक्ति घर में भी देखे जाते हैं । एवं अनुपलब्धि रूप अभाव प्रमाण से घर में चैत्र का अभाव भी निश्चित है ।
किन्तु एक ही समय चैत्र का घर में रहना और न रहना दोनों सम्भव नहीं है , क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय सत्ता और असत्ता दोनों का रहना परस्पर विरोध के कारण सम्भव नहीं है । अतः अभाव प्रमाण के द्वारा चैत्र के घर में न रहने की जो प्रतीति होती है , वह तब तक उपपन्न नहीं हो सकती , जब तक कि चैत्र का घर से बाहर रहना निश्चित न हो । जिसकी अनुपपत्ति होती है , वह ऐसी ही किसी वस्तु की कल्पना करता है , जिससे कि उसकी उपपत्ति हो सके ।
जीते हुए का घर में न रहना अन्यथानुपपन्न है , अर्थात् यदि वह बाहर नहीं रहता है तो ठीक नहीं बैठता । ' जीवति ' के माथ ' गृहे नास्ति ' का यह ' विरोध ' ही उसकी ' अनुपपत्ति ' है । यह अनुपपत्ति तब हटती है जब कि चैत्र के इस प्रकार से बाहर रहने की प्रतीति होती है कि ' चैत्र घर में नहीं रहने पर भी बाहर हैं , क्योंकि वह जीवित है ' ।
( इससे अर्थापत्ति का यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ कि ) एक सावकाश प्रमाण के साथ दूसरे निरवकाश प्रमाण का विरोध उपस्थित होने पर निरवकाश प्रमाण की अनुपपत्ति के प्रदर्शन के द्वारा सावकाश प्रमाण को दूसरे विषय का ज्ञापक मानकर उक्त दोनों प्रमाणों में अविरोध का सम्पादन ही ' अर्थापत्ति ' है ।
एक देश या एक काल में नियमित रूप से रहनेवाले दो सम्बन्धियों में से एक को देखने से उनके ( नियम या व्याप्ति रूप ) सम्बन्ध की स्मृति के द्वारा जो दूसरे सम्बन्धी की प्रतीति होती है , वही अनुमान ( या अनुमिति ) है | इस प्रकार चूँकि अनुमान और अर्थापत्ति इन दोनों प्रमाणों से ज्ञान की उत्पत्ति को रीति भिन्न हैं , अतः ये दोनों दो भिन्न प्रमाण हैं । अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति की रीति दिखलायी जा चुकी है ) जैसा कहा गया है कि-
यह निश्चित है कि अन्वय ( व्याप्ति ) के द्वारा अनुमान प्रमाण अपने फल रूप ज्ञान का उत्पादन करता है , अतः व्यतिरेक ( व्याप्ति ) के द्वारा अपने ज्ञान को उत्पन्न करनेवाला अर्थापत्ति प्रमाण अनुमान से भिन्न है ।
जहाँ शब्द अनुपपन्न होकर दूसरे शब्द की कल्पना करता है , वहाँ ' श्रुतार्थापत्ति ' समझना चाहिए । जैसे कि ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' ( यह मोटा तो है , किन्तु दिन में भोजन नहीं करता है ) इस वाक्य के द्वारा ' रात्रौ भुङ्क्ते ' ( तो फिर रात में खाता है ) इस वाक्यखण्ड का कल्पक होता है ।
' दर्शनार्थापत्तिविरोध्येव ' इस वाक्य के द्वारा कथित ' दृष्टार्थापत्ति ' अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाते हैं । इस भाष्य में प्रयुक्त ' दर्शनार्थ ' शब्द की अभीष्ट व्युत्पत्ति इस प्रकार है , दृश्यत इति दर्शनम् दर्शनञ्च तदर्थश्च दर्शनार्थः तदनुसार प्रत्यक्ष , अनुमान , उपमान , अर्थापत्ति और अनुपलब्धि ( अभाव ) इन पाँच ग्रमाणों में से किसी के द्वारा निश्चित अर्थ ही उक्त ' दर्शनार्थ ' शब्द से अभिप्रेत है । इस ' दर्शनार्थ ' अर्थात् कथित पाँच प्रमाणों में से किसी के द्वारा अवगत अर्थ से जो दूसरे अर्थ की ' आपत्ति ' अवगति होती है , वह ' विरोधी ' ही अर्थात् विरोधी अनुमान ही है । हेतु में साध्य का जिस प्रकार का नियम रहेगा , उसी प्रकार से हेतु में साध्य की ज्ञापकता भी ( हेतुता ) होगी । यहाँ ( अर्थापत्ति स्थल में ) दूसरे प्रमाण से विरुद्ध अर्थ हो दूसरे अर्थ की व्याप्ति से युक्त है । अतः यहाँ विरोधी ही हेतु है ।
कहने का अभिप्राय यह है कि चैत्र का घर में न रहना ( गृहाभाव ) यदि केवल अपनी अनुपपत्ति से ही उसके बहिर्भाव ( बाहर रहने ) की कल्पना करे तो फिर वह तुल्ययुक्ति से दूसरे की भी कल्पना कर सकता है , क्योंकि ऐसे नियम का कोई कारण नहीं है कि वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करे और किसी की नहीं ।
( प्र ० ) चैत्र का गृह में न रहना ( गृहाभाव ) अपनी उपपत्ति के लिए ही दूसरे अर्थ की कल्पना करता है , यह काम चैत्र के बहिर्भाव रूप दूसरे अर्थ को कल्पना से ही सम्भव है और किसी दूसरे अर्थ की कल्पना से नहीं । अतः वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करता है , किसी और अर्थ की नहीं । ( उ ० ) यह आपसे किसने कहा कि चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर लेने से ही चैत्र के घर में न रहने की उपपत्ति हो जाएगी ?
यदि हम यह कहें कि जीवित चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर भी ली जाय , तो भी चैत्र का घर में न रहना अनुपपन्न ही रहेगा । यदि इसका यह उत्तर दें कि ( प्र ० ) ( व्यापक आकाशादि को छोड़कर ) जितने भी अव्यापक ( मूर्त ) द्रव्य हैं , उनको देखते हैं कि एक समय यदि एक आश्रय में रहते हैं तो दूसरे में नहीं । जैसे कि पूर्वदिशा और पश्चिम दिशा इन दोनों में से किसी एक में जिस समय सूर्य की उपलब्धि होती है , उस समय वे दूसरी दिशा में नहीं रहते ।
इसी से यह समझते हैं कि जीवित चैत्र का घर में न रहना , चैत्र के बाहर रहने से ही उपपन्न हो सकता है । ( उ ० ) यदि ऐसी बात है तो फिर चैत्र के बहिर्भाव में उसके गृह में न रहने की अन्वयव्याप्ति से ही अर्थापत्ति होती है । इससे यह सिद्ध होता है कि चूंकि अर्थापत्ति की उत्पत्ति अन्वयव्याप्ति से होती है , अतः वह अनुमान ही है । यह ( अर्थापत्ति रूप अनुमान ) जो विरोध के कारण अपने कार्य में प्रवृत्त होता है , इससे और अनुमानों से इसकी विचित्रता हो केवल व्यक्त होती
( इससे इसका अनुमान न होना निश्चित नहीं होता ) । प्रकृत में अनुमान का यह प्रयोग इष्ट है कि जैसे कि ' जीवन सम्बन्ध से युक्त मैं घर में न रहने पर बाहर अवश्य रहता हूँ उसी प्रकार जीवन के सम्बन्ध से युक्त देवदत्त घर में अनुपलब्ध होने के कारण अवश्य ही बाहर हैं ।
' श्रवणादनुमितानुमानम् ' इस वाक्य के द्वारा ' श्रुतार्थापत्ति ' को अनुमान में अन्तर्भूत करते हैं । ' श्रवणात् ' अर्थात् ' पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य को सुनने से जो
६८ देवदत्त के रात्रिभोजन की कल्पना होती है वह भी ' अनुमितानुमान ' ही है । अर्थात् ' पीनः ' इस वाक्य रूप लिङ्ग ( हेतु ) से अनुमित पीनत्व ( मोटाई ) के द्वारा पीनत्व के कारणीभूत रात्रि भोजन का वहाँ भी अनुमान ही होता है ।
गुढ़ अभिप्राय यह है कि अपने अर्थ को यथार्थ रूप सेन समझा पाना ही प्रमाणों की अनुपपत्ति है । ' दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य का अर्थ है दिन में अभोजन , इस अर्थ का ज्ञापन तो वह अवश्य ही करता है , फिर उसमें किस प्रकार की अनुपपत्ति है ? ( प्र ० ) भोजन से उत्पन्न होनेवाला पीनत्वरूप कार्य ही दिन को भोजन न करने से अनुपपन्न होता है . क्योंकि पीनत्व का कारण वही नहीं है ।
पीनत्व रूप अर्थ की इस अनुपपत्ति ' ही ' पीनः ' इत्यादि वाक्य अनुपपन्न होता है , क्योंकि ( योग्यता न रहने के कारण ) उसका अन्वय नहीं हो पाता है । ( उ ० ) तो फिर यह कहिए कि अर्थ की अनुपपत्ति हो वाक्य की अनुपपत्ति है और अर्थ को उपपत्ति ही उसकी उपपत्ति है , वाक्य स्वतन्त्र रूप से उपपन्न या अनुपपन्न नहीं होता ।
दिन को भोजन न करनेवाले ( देवदत्त ) में रहनेवालो पीनता भी भोजन से ही उत्पन्न हो सकती हैं , अतः प्रकृत में रात्रिभोजन रूप अर्थ से ही उसकी उपपत्ति होती है , ' रात्री भुङ्क्ते ' इस रात्रिभोजन वाक्य से नहीं ।
चूंकि पीनत्व रूप अर्थ की अनुपपत्ति से ही रात्रि भोजन रूप अर्थ और उसका बोधक ' रात्री - भुङ्क्ते ' यह वाक्य दोनों की ही उपपत्ति होती हैं , ' रात्रौ भुङ्क्ते इस वाक्य से इसकी उपपत्ति नहीं होती हैं , अतः इनके लिए ' रात्रिभोजन ' रूप अर्थ की कल्पना ही आवश्यक है , ' रात्रौ भुङ्क्ते ' इस वाक्य की कल्पना आवश्यक नहीं है ।
उपपन्न होनेवाला अर्थ ' ( अपने व्याप्त ) दूसरे अर्थ से ही उपपन्न होता है ; ( इस नियम के अनुसार ) चूंकि दिन में भोजन न करनेवाले देवदत्त की पीनता की व्याप्ति रात्रि भोजन रूप कार्य के साथ है , अतः दिन को न खानेवाले की पोनता रूप अर्थ की उपपत्ति रात्रि भोजन रूप अर्थ से ही होती है , तस्मात् कोई भी अर्थापत्ति ' शब्द ' विषयक नहीं है , ( अर्थात् श्रुतार्थापति नाम की कोई वस्तु नहीं है ) |
यदि यह कहें कि ( प्र ० ) यह तो ठीक है कि एक अर्थ की उपपत्ति उससे नियत दूसरे अर्थ से ही होती है , एवं अर्थ की उपपत्ति से ही तद्बोधक शब्द की भी उपपत्ति होती है । किन्तु इतना अन्तर है कि शब्द के द्वारा उपस्थित अर्थ की अनुपपन्नता शब्द के द्वारा उपस्थित दूसरे अर्थ से ही निवृत्त की जा सकती है , क्योंकि शब्द से भिन्न अन्य प्रमाणों के द्वारा उपस्थित अर्थ का अन्वय शब्द प्रमाण के द्वारा उपस्थित अर्थ के साथ नहीं होता है ।
जैसे कि केवल पचति ' पद के उच्चारण के बाद जो कर्म के बिना पाक क्रिया को अनुपपत्ति उपस्थित होती है , उसकी निवृत्ति प्रत्यक्ष के द्वारा पकते हुए मटर ( कलाय ) को देखकर भी नहीं होती । उसके प्रत्यक्ष के बाद भी कि पचति ' यह जिज्ञासा बनी ही रहती है । ' कलायम् ' ' शाकम् ' इत्यादि पदों के प्रयोग के बाद जब इन शब्दों से शाक या कलाय रूप कर्म उपस्थित हो जाता है , तभी कलाय पक रहा है ' या ' शाक पक रहा है ' इत्यादि आकार के निश्चयात्मक बोध होते हैं ।
' पीनो दिवा न भुते ' यहाँ वाक्य के द्वारा उपस्थित अर्थ की ही अनुपपत्ति है , अतः ' रात्री भुङ्क्ते ' इस वाक्य के द्वारा उपस्थित किये हुए रात्रिभोजन रूप अर्थ से ही उसकी निवृत्ति हो सकती है , ( दूसरे प्रमाणों के द्वारा उपस्थित किये हुए रात्रिभोजन रूव अर्थ से नहीं ) । अतः प्रकृत में अर्थापत्ति से रात्रिभोजन के बोधक ' रात्री भुङ्क्ते ' इस वाक्य की ही कल्पना करनी होगी ।
ऐसा न करने पर ( अर्थापत्ति के द्वारा सीधे रात्रि भोजन रूप अर्थ की ही कल्पना करने पर ) पोनो दिवा न भुङ्क्ते ' इस ( दिवा ) वाक्य के द्वारा उपस्थित पदार्थों के साथ ( दूसरे प्रमाण के द्वारा उपस्थित ) रात्रिभोजन रूप अर्थ का अन्वय नहीं हो सकेगा ।
( उ ० ) जब प्रकृति श्रुतार्थापत्ति की विषयता केवल वाक्य के द्वारा उपस्थित अर्थ में नियत हो जाती है , तो फिर रात्रिभोजन रूप अर्थ अर्थापत्ति प्रमाण से ग्राह्य हो नहीं रह जाता , क्योंकि ( अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा ' रात्रौ भुङ्क्ते ' इस ) वाक्य रूप शब्द प्रमाण से ही उसकी अवगति हो जाएगी ।
यह कहना भी उचित नही है कि ( प्र ० ) ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' यह वाक्य और इस वाक्य के अर्थ दोनों में से किसी का भी ' रात्री भुङ्क्ते ' इस वाक्य के साथ कोई नियत सम्बन्ध नहीं है , अतः इनमें से किसी के द्वारा ' रात्री भुङ्क्ते ' इस वाक्य की उपस्थिति नहीं हो सकती ।
( उ ० ) चूंकि ' पोनी दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य के अर्थ के साथ ' रात्रौ भुङ्क्ते ' इस वाक्य अर्थ का नियत सम्बन्ध है | इस सम्बन्ध के द्वारा ही ' पीनो दिवा न भुङ्ते ' इस वाक्य के साथ भी ' रात्रौ भुङ्क्ते , इस वाक्य का नियत सम्बन्ध अवश्य है । ( दूसरी बात है कि ) अर्थापत्ति को अपने प्रमेय में प्रवृत्त होने के लिए अनुमान की तरह नियत सम्बन्ध की अपेक्षा भी नहीं होती है उसका काम अर्थानुपपत्ति से ही चल जाता है । जैसा कहा गया है कि-
( १ ) ' पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य से भोजन न करने वाले देवदत्त की पीनता का शाब्दबोध रूप सविकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है ( इस सविकल्पक ज्ञान में विषयीभूत दिन में न खानेवाले देवदत्त की मोटाई रूप प्रथम ) अर्थ के द्वारा ( रात्रि भोजन रूप ) द्वितीय अर्थ ज्ञात नहीं होता है क्योंकि वह ( रात्रि भोजन रूप द्वितीय अर्थ ) ' वृत्ति रोहित ' नहीं है , अर्थात् किसी शब्द से ( अभिषादि ) ' वृत्ति ' के द्वारा उपस्थित नहीं है ।
( २ ) अतः ' पीनो दिवा न भुङवते ' इस वाक्य को सुनने के बाद ' रात्रिभोजन ' रूप दूसरे अर्थ को समझानेवाले ' रात्रो भुङक्ते ' इत्यादि किसी दूसरे शब्द को न सुनकर ( समझनेवाला पुरुष ) इतना ही समझता है कि ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य में रात्रि भोजन रूप अर्थ को समझाने का सामर्थ्य नहीं है ।
( ३ ) अत : ( श्रुतार्थापत्ति स्थल में ) अर्थापत्ति के द्वारा पहिले रात्रौ भुङ्क्ते ' इत्यादि वाक्यों का ही बोध होता है । इसके बाद अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञात ' रात्रो भुङ्क्ते ' यह वाक्य ही रात्रि भोजन रूप अर्थ विषयक बोध को उत्पन्न करेगा ।
इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि वाक्य के अर्थ को समझाने के लिए ही पदों का प्रयोग किया जाता है । वाक्य प्रयुक्त होनेवाले पदो के अर्थ ही परस्पर उपयुक्त सम्बन्ध से युक्त होकर ' वाक्यार्थ ' कहलाते हैं । इस विशिष्ट वाक्यार्थ को कोई एक पद नहीं समझा सकता , क्योंकि पदों में केवल अपने अपने ही अर्थ को समझाने का सामर्थ्य होता है । अतः एक पद अपने अर्थ के साथ और अर्थों के सम्बन्ध के लिए दूसरे पदों की अपेक्षा रखता है ।
जहाँ जितने ही पदों से वाक्यार्थं विषयक बोध का सम्पादन हो जाता है , वहाँ उनसे भिन्न पदों की अपेक्षा नहीं होती है ।
इन पदों के द्वारा उपस्थित अर्थ में यदि अनुपपन्नता या विरोध है तो इसको छुड़ाने का दायित्व पदों पर नहीं है , क्योंकि अपने अपने अर्थों का प्रतिपादन करना ही पदों का काम है , उनके विरोध को मिटाना नहीं | ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' यह वाक्य ' रात्रौ भुङ्क्ते ' इस वाक्य का सांनिध्य न पाने पर भी दिन को भोजन न करनेवाले में पीनत्व रूप अपने अर्थ का बोध रूप काम तो कर ही दिया है , क्योंकि ' दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य से दिन में भोजन न करनेवाले में पीनत्व की अभ्रान्त एवं निःसन्दिग्ध प्रतीति हो जाती है ।
यदि ' दिवा ' वाक्य से दिन को भोजन न करनेवाले में पोनत्व की अभ्रान्त और निःशङ्क प्रतीति न हो तो फिर आगे उससे अर्थापत्ति की प्रवृत्ति भी क्योंकर होगी ? दिन में न खाने पर भी देवदत्त में निश्चित पीनत्व की उपपत्ति ठीक नहीं बैठती है , उसकी उपपत्ति के लिए ही उसको प्रमाण सिद्ध रूप में समझाना आवश्यक होता है । दिन को न खाने पर भी देवदत्त में जो पीनता है , वह यदि इस स्थिति में सन्दिग्ध या विपरीत ही हो तो फिर उसकी उपपत्ति ही अपेक्षित नहीं है ।
अतः किसकी उपपत्ति के लिए रात्रिभोजन रूप दूसरे अर्थ की कल्पना आवश्यक होगी ? किन्हीं दो अर्थों में परस्पर विरोध है , केवल इसी लिए उनको प्रतीति ही नहीं होती ' यह कहना ठीक नहीं है ।
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ५४०) १. उपक्रम और उपसंहार की दृष्टि से इन श्लोकों का यथाश्रुत पाठ ठीक नहीं जँचता । इन श्लोकों का निम्नलिखित स्वरूप का होना उचित जान पड़ता है तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । न चार्थेनार्थ एवायं द्वितीयो गम्यते पुनः । सविकल्पक विज्ञानग्राह्येणावृत्तिरोहितः ॥ शब्दान्तराण्यबुद्ध्वाऽसामर्थ्य मे वावगच्छति । तेनैषा प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचरा । वाक्यमेव तु वाक्यार्थं गतत्वाद् गमयिष्यति ||
पृ. ५४२
सम्भवोऽप्य विनाभावित्वादनुमानमेव ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' सभ्भव ' प्रमाण से भी व्याप्ति के द्वारा ही अर्थ का बोध होता है , अतः वह भी अनुमान ही है ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
शतं सहस्रे सम्भवतीति सम्भवाख्यात् प्रमाणान्तरात् सहस्रेण शतज्ञानमिति केचित् । तन्निरासार्थमाह - सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव । सहस्रं शतेनाविनाभूतम् , तत्पूर्वकत्वात् । तेन सहस्राच्छतज्ञानमनुमानमेव । प्रमेयाभावप्रतीतौ भावग्राहकप्रत्यक्षादिपञ्चप्रमाणानुत्पत्तिरभावाख्यं प्रमाणान्तरं कैश्चिदिष्टम् । तद् व्युदस्यति - अभावोऽप्यनुमानमेव । कथमित्यत आह — यथोत्पन्नं कार्य कारणसद्भावे लिङ्गम् , एवमनुत्पन्नं कार्य कारणासद्भावे लिङ्गम् ।
योऽप्यभावं प्रमाणमिच्छति , तस्यापि न ज्ञानानुत्पादमात्रात् प्रमेयाभावज्ञानम् , स्वरूपविप्रकृष्टस्यापि वस्तुनोऽभावप्रतीतिप्रसङ्गात् । किन्तु ज्ञानकारणेषु सत्सु ज्ञानयोग्यस्य वस्तुनो ज्ञानानुत्पादोऽभावावगमनिमित्तम् । न चायोग्यानुपलम्भाद् योग्यानुपलम्भस्य कश्चित् स्वरूपतो विशेषः , अभावस्य निरतिशयत्वात् । तेन नायं स्वशक्त्यैवेन्द्रियवद् बोधकः , किन्तु योग्यानुपलम्भो ज्ञेयाभावं न व्यभिचरति । अयोग्यानुपलम्भस्तु व्यभिचरति , सत्यपि ज्ञेये तस्य सम्भवात् एतावता विशेषेण योग्यानुपलम्भ : प्रतिपादको नापरः । एवं सत्य - भावो लिङ्गमेव स्यादविनाभाव ग्रहण सापेक्षत्वात् । तदनपेक्षत्वे त्वविशेषेण तस्याभावस्याभावबोधकत्वमिति दुर्निवारणप्रसङ्गः ।
अपि चेन्द्रियसन्निकर्षादुपलभ्यमाने भूतलेऽभावज्ञानमपि भवति ' अघट भूतलम् ' इति , तत्र भूतलस्येवाभावस्यापि प्रत्यक्षता किं नेष्यते ? भावांशेनैवेन्द्रि यस्य सम्बन्धः , योग्यत्वादिति चेत् ? नेदमनुपपादितं सिध्यति । कार्यगम्या हि योग्यता , यथेन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधायि कार्यं भावे दृश्यते , तद्वदभावेऽपीति भाववदभावोऽपि इन्द्रियग्रहणयोग्य एव । कार्यदर्शनादेव चास्येन्द्रियसम्बन्धोऽपि कश्चित् कल्पयिष्यते ।
अथ मतम् - निरधिकरणो न कस्यचिदभावः प्रतीयते , देशादिनियमेन प्रवृत्तिनिवृत्तिदर्शनात् । यदधिकरणश्चायं प्रतीयते तस्य प्रतीताविन्द्रियव्यापारो नाभावग्रहणे , इन्द्रियव्यापारोपरमेऽप्यभावप्रतीतिदर्शनात् । तथा हि- कश्चित् स्वरूपेण देवकुलादिकं प्रतीत्य स्थानान्तरगतो देवकुले देवदत्तोऽस्ति नास्तीति केनचित् पृष्टः तदानीमेव ज्ञातजिज्ञासो नास्तीति प्रतीत्याऽभावं व्यवहरति नास्तीति । न च पूर्वमेव देवकुलग्रहणसमये देवदत्ताभावो निर्विकल्पेन गृहीतः , सम्प्रति स्मर्यमाण इति वाच्यम् , युक्तं घटादीनामिन्द्रियसन्निकर्षानिर्विकल्पेन ग्रहणम् , तेषां स्वरूपस्य परानपेक्षत्वात् । अभावस्य तु प्रतिषेधस्वभावस्य स्वरूपमेव यस्यायं ( एव ) प्रतिषेधः स्यात् तदधीनम् । अतस्तत्प्रतिषेधतामन्तरेण तदभावस्य स्वरूपान्तराभावात् । तत्रास्य प्रतियोगिस्वरूपनिरूपणमन्तरेण निरूपणमशक्यम् । अयमेव हि भावाभावयोविशेषो यदेकस्य विधिरूपतया ग्रहणम् , अपरस्य त्वन्यप्रतिषेधमुखेन । यदाह न्यायवात्तिककार : - " स्वतन्त्रपरतन्त्रोपलब्ध्यनुपलब्धिकारणभावाच्च विशेषः , सत्तु खलु प्रमाणस्यालम्बनं स्वतन्त्रम् , असत्तु परतन्त्रमन्यप्रतिषेधमुखेनेति " । यदि त्वभावस्यापि स्वातन्त्र्येण ग्रहणं तदा भावादविशेषः स्यात् । अतो नास्त्यभावस्य निर्विकल्पकेन ग्रहणम् ।
यदपि विकल्पितं किं देवदत्तसंकीर्णस्य देवकुलस्य पूर्वं प्रतीतिरासीत् ? तद्विविक्तस्य वा ? संकीर्णग्रहणे तावत् केवलस्य न स्मरणम् । विविक्तग्रहणे वाभावोऽगृहीत एव पश्चात् स्मर्यत इति प्राप्तम् । तदप्यसारम् , देवदत्तभावाभावयोर ग्रहणेऽपि देवकुलस्य स्वरूपेण ग्रहणात् । तस्मान्न पूर्वमभावग्रहणम् , तदभावान्न स्मृतिः , न च तदानों प्रमाणान्तरमुपलभ्यते तस्माद् व्यवहितेऽपि प्रतियोगिनि स्मृत्यारूढ भाव ग्रहणाय प्रत्यक्षादिप्रमाणपञ्चकव्यावृत्तिरेव प्रमाणम् ।
एकत्र चाभावस्याभावपरिच्छेद्यत्वे सिद्धेऽन्यत्रापि तेनैव सेत्स्यतीति सिद्धमभावस्य प्रमाणान्तरत्वम् ।
अत्रोच्यते - देशान्तरं गतः केनचित् पृष्टो देवकुले देवदत्तस्येदानीन्तनानुपलम्भेनेदानीन्तनाभावं प्रत्येति ' इदानीं नास्ति ' इति ? किं वा प्राक्तनानुपलम्भेन प्राक्तनाभावं देवकुलग्रहणसमये नासीदिति ? इदानीन्तनानुपलब्धिस्तावद् योग्यानुपलब्धिर्न भवति , देशव्यवधानात् । सम्प्रत्यभावो देवदत्तस्य सन्दिग्धः आगमनस्यापि सम्भवात् । प्राक्तनाभावपरिच्छेदयोग्या तु प्राक्तनानुपलब्धिर्नदानीमनुवर्तते , अवस्थान्तरप्राप्तेः । न चाविद्यमाना प्रतीतिकारणं भवितुमर्हति ।
नापि स्मृत्यारूढा व्याप्रियते , पूर्वमसंविदितत्वात् । नानुपलब्धिः प्रमाणान्तरसंवेद्या , अभावरूपत्वात् । अनुपलब्ध्यन्तरापेक्षायां चानवस्था स्यात् । तस्मादियमगृहीतैवेन्द्रियवदर्थपरिच्छेदिकेति राद्धान्तः , तथा सति कुतस्तस्याः स्मरणम् ? अनुभवाभावात् ।
अथ मतम् - देवकुले देवदत्तानुपलम्भो देवदत्तोपलम्भेन विनिवर्त्यते , न च देशान्तरगतस्य तदुपलम्भो जातः , तस्मादस्त्येव तदनुपलम्भः । यदि त्ववस्थान्तरमापन्नः , न चावस्थाभेदे वस्तुभेद इति । अस्तु तर्हि तावदिहैवम् । यत्र तु पूर्व प्रतियोगिस्मरणाभावाद् वस्त्वभावो न गृहीतः पश्चात् कालान्तरे वस्तुग्रहणादिहेदानीं नासीदिति प्राक्तनाभावज्ञानम् , तत्र कः प्रतीकार : ? निवृत्तो हि तद्वस्त्वनुपलम्भस्तस्योपलभ्भेन । न चानुपलम्भः पूर्वमासीदिति सम्प्रत्यविद्यमानोऽपि प्रतीतिहेतुः , प्रनष्टेन्द्रियस्यापि विषयग्रहणप्रसङ्गात् । अद्यतनेन तूपलम्भेनाद्यतनानुपलम्भस्तस्य निर्वार्तितः , प्राक्तनानुपलम्भस्त्वस्त्येव । तेन प्राक्कालीनाभावपरिच्छेदयोग्येन प्राक्तनाभावः परिच्छिद्यत इति चेत् ? अहो पाण्डित्यम् ? अहो नेपुण्यम् ? अनुपलम्भ उपलम्भप्रागभावः , स च वस्तुत्पत्त्यवधिक एव न प्राक्तनाद्यतनकालभेदेन भिद्यते , तत्राद्यतनानुपलम्भो निवृत्तः , प्राक्तनो न निवृत्त इति कः कुशाग्रीयबुद्धेरन्य इममतिसूक्ष्मविवेकमवगाहते । तस्मादभावोऽभावेनैव परिच्छिद्यत इति न बुद्धधामहे ।
कथं तहि स्वरूपमात्रं गृहीत्वा स्थानान्तरगतस्य स्मर्यमाणे प्रतियोगिन्यभावप्रतीतिः ? अनुमानात् , यो हि यस्मिन् स्मर्यमाणे स्मृतियोग्यः सत्यामपि सुमूर्षायां न स्मर्यते स तस्य ग्रहणकाले नासीदिति । यथा केवले प्रदेशे स्मर्यमाणे तत्र प्राप्रतीताभावो घटोऽस्मर्यमाणः । न च स्मर्यते देवकुले स्मर्यमाणे सत्यामपि सुमूर्षायां स्मृतियोग्योऽपि देवदत्तः । तस्मात् सोऽपि देवकुलग्रहणसमये नासीदिति स्मृत्यभावादनुमानम् । सहोपलब्धयोरपि वस्तुनोः संस्कारपाटवादिविरहादेकस्य स्मरणमपरस्यास्मरणं दुष्टम् , यथाधीतस्य श्लोकस्यैकस्य पदान्तरस्मरणेऽपि पदान्तरास्मरणम् । तत्र कथमेकस्य स्मरणे परस्यास्मरणाद् अभावानुमानमनेकान्तिकत्वादिति चेत् ? सहस्थितयोरपि पदार्थयोः कदाचित् कारणानुरोधादेक उपलभ्यते नापरः , तत्रापि कथं भूतलोपलम्भादनुपलभ्यमानस्य घटस्याभावसिद्धि : ?
अय मतम् – एकज्ञानसंसर्गिणोरेकोपलम्भेऽपरस्यानुपलम्भोऽभावसाधनं सर्वः । येन हि ज्ञानेन प्रदेशो गृह्यते तेनैव तत्संयोगी घटोऽपि गृह्यते , यैव प्रदेशग्रहणे सामग्री सैव घटस्यापि सामग्री । यदि प्रदेशे घटोऽभविष्यत् सोऽपि प्रदेशे ज्ञायमाने विज्ञास्येत तत्तुल्यसामग्रीकत्वात् । न ज्ञायते च तस्मान्नास्त्येव तदनुपलम्भस्य प्रकारान्तरेणासम्भवादिति । यद्येवमस्माकमप्येकज्ञानसंसगणोरेकस्मरणेऽपरस्यास्मरणमभावसाधनम् । यैव देवकुलग्रहणसामग्री सा देवदत्तस्यापि तत्संयुक्तस्य ग्रहणसामग्री , या च देवकुलस्य स्मरणसामग्री सा वदत्तस्यापि स्मृतिसामग्री , तदेकज्ञानसंसंगित्वाद् यदि देवकुलग्रहणकाले देवदत्तोs भविष्यत् सोऽपि देवकुले स्मर्यमाणे अस्मरिष्यत् तत्तुल्यसामग्रीत्वात् । न च स्मर्यते , तस्मान्नासीद् देवदत्तः , तदस्मरणस्य प्रकारान्तरेणासम्भवादिति समानम् । श्लोकस्य तु पदान्युच्चारणानुरोधात् क्रमेण पठ्यन्ते , नंकज्ञानसंसर्गीणि । तेषु यत्र तु बहुतरः संस्कारो जातस्तत् स्मर्यते , नापरमिति नास्त्यनुपपत्तिः ।
एवमुपलभ्यमानस्यापि वस्तुनो यत् प्राक्तनाभावज्ञानं प्रागिदमिह नासीदिति ज्ञानम् , तदपि प्रतियोगिनः प्राक्तनास्तित्वे स्मर्यमाणे तत्सत्तास्मृत्य - भावादनुमानम् ।
ये तु स्मृत्यभावमप्यभावं प्रमाणमाचक्षते तेषाम् " अभावोऽपि प्रमाणाभावः " इति भाष्यविरोधः , " प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपे न जायते " इत्यादिवात्र्तिकविरोधश्चेत्यलं बहुना ।
ये पुनरेवमाहुः - अभावरूपस्य प्रमेयस्याभावान्न साध्वी तस्य प्रमाणचिन्तेति । त इदं प्रष्टव्याः - नास्तीति संविदः किमालम्बनम् ? यदि न किञ्चित् ? दत्तः स्वहस्तो निरालम्बनं विज्ञानमिच्छतां महायानिकानाम् । अथ भूतलमालम्बनम् ? कण्टकादिमत्यपि भूतले कण्टको नास्तीति संवित्तिः तत्पूर्वकश्च निःशङ्कं गमनागमनलक्षणो व्यापारो दुर्निवारः । केवलभूतलविषयं ' नास्तोति ' संवेदनम् , कण्टकसद्भावे च कैवल्यं निवृत्तमिति प्रतिपत्तिप्रवृत्त्योरभाव इति चेत् ? ननु किं कैवल्यं भूतलस्य स्वरूपमेव ? किमुत धर्मान्तरम् ? स्वरूपं तावत् कण्टकादिसंवेदनेऽप्यपरावृत्तमिति स एव प्रतिपत्तिप्रवृत्त्योरविरामो दोषः । धर्मान्तरपक्षे च तत्त्वान्तरसिद्धिः ।
अथ मन्यसे भाव एकाकी सद्वितीयश्चेति द्वयीमवस्थामनुभवति । तत्रैकाकीभावः स्वरूपमात्रमिति केवल इति चोच्यते तादृशस्य तस्य दृश्ये प्रतियोगिनि घटादौ जिघृक्षिते सत्युपलब्धिर्घटाद्यभावव्यवहारं प्रवर्तयतीति ।
अत्रापि ब्रूमः - घटादेरभावाद् भूतलं च व्यतिरेच्यका किशब्दस्यार्थः कः समर्थतो भवद्धियों हि नास्तीति प्रतिषेधधिय आलम्बनम् ? नहि विषयवैलक्षण्यमन्तरेण विलक्षणाया बुद्धेरस्त्युदयः , नापि व्यवहारभेदस्य संभवः । स्वाभाविकं यदेकत्वं भावस्य तदेवैकाकित्वमिति चेत् ? किमेकत्वं प्रतियोगिरहितत्वम् ? एकत्वसंख्या वा ? एकत्वसंख्या तावद् यावदाश्रयभाविनी भावस्य सद्वितीयावस्थायामप्यनुवर्तते । अथ प्रतियोगिरहितत्वं स्वाभाविकमेकत्वमुच्यते , सिद्धं प्रमेयान्तरम् ।
नवभाववादिनोऽपि भूतल ग्रहणमभावप्रतीतिकारणम् , अप्रतीते भूतले तत्राभावप्रतीतेरयोगात् । तत्र न तावत् कण्टकादिसहितभूतलोपलम्भात् कण्टको नास्तीति प्रतीतिः । अभावविशिष्टभूतलग्रहणस्याभावप्रतीतिहेतुत्वे च ( भावग्रहणे ) तदभावग्रहणे तदभावविशिष्टभूतलग्रहणम् , तदभावविशिष्टाद् भूतलग्रहणाच्चाभावग्रहणमिति स्वयमेव स्वस्य कारणमभ्युपगतं स्यात् ।
तस्मादभावव्यतिरिक्ता प्रतियोगि संसर्गव्यतिरेकिणी भूतलस्य त्वयापि काचिदेकाकित्वावस्थाभ्युपगन्तव्या , यस्याः प्रतीतावभावप्रतीतिः स्यात् सैवास्माकं नास्तीति व्यवहारं प्रवर्तयतीति । तदप्ययुक्तम् , भूतलस्वरूपग्रहणस्यैवाभावप्रतीतिहेतुत्वात् । न च सद्वितीयग्रहणेऽप्येतत्प्रतीतिप्रसङ्गः , भूतलग्रहणवदभावेन्द्रियसन्निकर्षोऽप्यभावग्रहणसामग्री , कण्टकादिसद्भावे तदभावो नास्तीति विषयेन्द्रियसन्निकर्षाभावात् सत्यपि भूतलग्रहणे नाभावप्रतीतिः ।
नहि चक्षुरालोकादिकमुपलम्भकारणमस्तीति यद्यत्र नास्ति तदपि तत्र प्रतीयते । तदेवं सिद्धोऽभावः । प्रागभाव : ? यस्यार्थस्य यः प्रध्वंसः , तस्यार्थस्य स्वरूपस्थितिरेव तत्प्रध्वंसस्य प्रागभावः । यथा वस्तुत्पत्तिरेव तत्प्रागभावस्य विनाश :, तथा प्रध्वंसोत्पत्तिरेव तत्प्रागभावस्य विनाशः । यदसद्भूतं तस्य कथमभाव इति न परिचोद्यम् , कारणसामर्थ्यस्यापर्यनुयोज्यत्वात् ।
गव्यश्वाभाव issa च गोरभाव इतरेतराभावः । स च सर्वत्रैको नित्य एव , पिण्डविनाशेऽपि सामान्यवत् पिण्डान्तरे प्रत्यभिज्ञानात् । यथा सामान्यमदृष्टवशादुपजायमानेनैव पिण्डेन सह सम्बद्धयते , नित्यत्वं च स्वभावसिद्धम् , तथेतरेतराभावोऽपि । इयांस्तु विशेषः - पिण्डग्रहणमात्रेण सामान्यग्रहणम् , इततराभावग्रहणं तु प्रतियोगिसापेक्षम् , पररूपनिरूपणीयत्वात् ।
स च चतुर्व्यूहः - प्रागभावः प्रध्वंसाभावः , इतरेतराभाव :, अत्यन्ताभावश्चेति ।
प्रागुत्पत्तेः कारणेषु कार्यस्याभाव : प्रागभावः , तत्र प्राक् कार्योत्पत्तेः पूर्वमभावो विशेषस्य प्रागभावः स चानादिरप्यनित्य :, कार्यात्पादेन तस्य विनाशात् , अविनाशे च कार्यस्योत्पत्त्यभावात् । कः प्रागभावस्य विनाश : ? वस्तुत्पाद एव । निवृत्ते वस्तुनि प्रागभावोपलब्धिप्रसङ्ग इति चेत् ? वस्तुवद् वस्त्ववयवानामप्यारब्धकार्याणां प्रागभावविनाशलक्षणत्वात् ।
उत्पन्नस्य स्वरूपप्रच्युतिः प्रध्वंसाभावः । स चोत्पत्तिमानप्यविनाशी , भावस्य पुनरनुपलम्भात् । प्रागभूतस्य पश्चाद्भाव उत्पाद :, प्रध्वंसस्य कः
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — अतः ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' इत्यादि शब्द यदि दिन में न खानेवाले में ' पीनत्वादि ' रूप अपने अर्थ को अभ्रान्त और निःशङ्क रूप से समझा देते हैं , तो फिर वे अपना कर्त्तव्य कर ही लेते हैं , क्योंकि उन शब्दों का उन अर्थों को समझाना छोड़कर दूसरा कोई कर्त्तव्य नहीं है । अपने इस कार्य के सम्पादन के लिए उन्हें ' रात्री भुङ्क्ते ' इत्यादि किसी दूसरे शब्द की अपेक्षा नहीं है । तस्मात् दिन में न खानेवाले की पीनता रूप अर्थ ही रात्रि भोजन रूप दूसरे अथ के बिना अनुपपन्न होकर अपनी उपपत्ति के लिए उस दूसरे अर्थ की खोज करता है , अतः ' दिवा न भुङ्क्ते ' इस शब्द के श्रवण के बाद जो रात्रि भोजन रूप अर्थ का बोध होता है , वह ' अनुमितानुमान ' ही है । इसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है ।
' हजार में सौ के रहने की सम्भावना है ' इस प्रकार के सम्भव नाम के स्वतन्त्र प्रमाण से ही कोई सम्प्रदाय सहस्र संख्या से सो संख्या का ज्ञान मानते हैं । उनका खण्डन करने के लिए ही ' सम्भवोऽप्यविनाभावादनुमानमेव ' यह वाक्य लिखा गया है | अभिप्राय यह है कि सहस्र में सो की व्याप्ति रूप सम्बन्ध है । इस व्याप्ति रूप सम्बन्ध के द्वारा ही उक्त ज्ञान होता है , अतः सहस्र संख्या से जो शत संख्या का ज्ञान होता है , वह भी अनुमान हो है ।
किसी सम्प्रदाय के लोग किसी वस्तु के अभाव की प्रतीति के लिए एक ' अभाव ' नाम का और प्रमाण मानते हैं । एवं इस अभाव को भाव पदार्थों के ग्राहक प्रत्यक्षादि पांच प्रमाणों की अनुत्पत्ति रूप कहते हैं , उनके इस मत का खण्डन ही ' अभावोऽप्यनुमानमेव ' इत्यादि भाष्यसन्दर्भ के द्वारा किया गया है । किस युक्ति से यह अभाव नाम का प्रमाण मानते हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर ' यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गम् एवमनुत्पन्नं कार्यं कारणासद्भावे लिङ्गम् ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है ।
जो सम्प्रदाय उक्त अभाव को स्वतन्त्र प्रमाण मानने को इच्छुक हैं , उन्हें भी ज्ञान की केवल अनुत्पत्ति से ही किसी वस्तु के अभाव का ज्ञान नहीं होता , यदि ऐसी बात हो तो उन वस्तुओं के अभावों की भी प्रतीति की आपत्ति होगी , जिन वस्तुओं में प्रत्यक्ष की योग्यता नहीं है । अत : ( उन्हें भी ) यही कहना पड़ेगा कि ज्ञान के ( सामान्य ) कारणों के रहने पर ज्ञात होने योग्य वस्तुओं के ज्ञान की अनुत्पत्ति ही उन वस्तुओं के अभाव का ज्ञापक ' अभाव ' नाम का प्रमाण है ।
( उपलब्धि के ) योग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि और ( उपलब्धि के ) अयोग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि इन दोनों के स्वरूपों में कोई ऐसी वस्तु नहीं है , जिससे कि दोनों अनुपलब्धियों में भेद माना जाय , क्योंकि केवल अभाव रूप दोनों अनुपलब्धियों में कोई विशेष धर्म नहीं | अतः अभाव ( या प्रमाणों की कथित अनुत्पत्ति ) उस प्रकार केवल अपनी ही शक्ति से अपने ज्ञेय अभाव के ज्ञान को उत्पन्न नहीं कर सकते , जिस प्रकार इन्द्रियाँ केवल अपनी शक्ति से ही प्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न करती है ।
कथित अभाव प्रमाण से वस्तुओं के अभाव की प्रतीति की यह रीति है कि जिस वस्तु की जहाँ उपलब्धि हो सकती है , वहाँ यदि उसकी उपलब्धि नहीं होती है , तो समझते हैं कि वहाँ वह वस्तु नहीं है , इस प्रकार योग्यानुपलब्धि के साथ योग्य वस्तु के अभाव की व्याप्ति है , प्रत्यक्ष के अयोग्य वस्तुओं के अभाव के साथ उस वस्तु की अनुपलब्धि की व्याप्ति नहीं है , ( अर्थात् व्यभिचार है ) , क्योंकि ( अयोग्य पिशाचादि ) ज्ञेयों के रहने पर भी उनकी उपलब्धि नहीं होती है , ( अर्थात् अनुपलब्धि रहती है ) , इससे यह निष्कर्ष निकला कि योग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि हो उसके अभाव का ज्ञापक है , अयोग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि नहीं ।
अतः उक्त अभाव प्रमाण भी उक्त प्रमेयाभाव का ज्ञापक हेतु ही है , क्योंकि व्याप्ति के द्वारा ही उसका ज्ञापन कर सकता है , अन्यथा नहीं । यदि उसमें व्याप्ति की अपेक्षा न मानें तो सभी अभावों से सभी अभाबों की प्रतीति की आपत्ति होगी , जिसका वारण करना सम्भव न होगा ।
दूसरी बात यह है कि इन्द्रिय के द्वारा भूतल के उपलब्ध होने पर ही ' अघट भूतलम् ' इत्यादि आकारों से अभाव की प्रतीति भी होती है । यदि ऐसी बात है तो फिर भूतल की तरह उसमें विशेषण रूप से भासित होनेवाले घट के अभाव का इन्द्र के द्वारा प्रत्यक्ष ही क्यों नहीं मान लेते ? ( प्र ० ) भाव पदार्थ ही इन्द्रियों से प्रकाशित होने की क्षमता रखते हैं , अतः ( कल्पना करते हैं कि ) भाव पदार्थों के साथ ही इन्द्रियों का प्रत्यक्षोपयुक्त ) सम्बन्ध हो सकता है । ( उ ० ) ( भाव पदार्थों में इन्द्रियों के प्रत्यक्षोपयुक्त सम्बन्ध की योग्यता है ' यह सिद्धान्त ) युक्ति के द्वारा उपपादन किये बिना नहीं माना जा सकता । कार्य से हो कारण में कार्योत्पादन की योग्यता निर्धारित होती है । जिस प्रकार भाव पदार्थों के प्रत्यक्ष रूप कार्य के साथ इन्द्रियों का अन्वय और व्यतिरेक दोनों देखे जाते हैं , उसी प्रकार अभाव की उपलब्धि के साथ भी वे दोनों देखे जाते हैं , अतः भाव पदार्थों की तरह अभाव पदार्थों में भी इन्द्रियों से गृहीत होने की योग्यता है । इस प्रकार इन्द्रियों से अभाव के प्रत्यक्ष की उपपत्ति हो जाने पर अभाव पदार्थों के साथ भी इन्द्रियों के किसी उपयुक्त सम्बन्ध की कल्पना कर ली जाएगी ।
इस प्रसङ्ग में अभाव को प्रमाण माननेवालों का कहना है कि नियमतः किसी विशेष देश में ही अभाव के प्रसङ्ग में प्रवृत्ति या निवृत्ति होती है , इससे यह सिद्ध होता है कि किसी अधिकरण में ही अभाव की प्रतीति होती है , अधिकरण को छोड़कर केवल अभाव की प्रतीति नहीं होती है । तदनुसार जिस अधिकरण में अभाव की प्रतीति होती है , उस अधिकरण की प्रतीति में ही इन्द्रिय का व्यापार आपेक्षित होगा ।
( प्र ० ) उस अधिकरण में भी अभाव की प्रतीति के लिए इन्द्रिय का व्यापार अपेक्षित नहीं है , क्योंकि इन्द्रियों के व्यापार के हट जाने पर भी अभाव की प्रतीति होती है । जैसे किसी पुरुष को किसी देवालय को देखने के बाद किसी दूसरे स्थान में जाने पर कोई पूछता है कि ' वहाँ देवदत्त हैं या नहीं ? उसी समय उस पुरुष की जिज्ञासा को समझकर ' देवालय में देवदत्त नहीं हैं ' इस प्रतीति के द्वारा वह पुरुष ' नास्ति ' का व्यवहार ( अर्थात् ' देवकुले देवदत्तो नास्ति ' इस वाक्य का व्यवहार ) करता है ।
( प्र ० ) देवालय के देखने के समय ही उसे वहां देवदत्त के अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान हो गया था । अभी वह उसी निर्विकल्पक ज्ञान जनित स्मृति के द्वारा देवदत्त के अभाव का व्यवहार करता है । ( उ ० ) ऐसा कहना भी ठीक नहीं है , क्योंकि अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान सम्भव ही नहीं है । घटादि पदार्थों का निर्विकल्पक ज्ञान इस लिए सम्भव होता है कि उनके ज्ञान के लिए प्रतियोगी प्रभृति किसी दूसरे पदार्थों को जानने की अपेक्षा नहीं होती है ।
किन्तु अभाव तो किसी भाव पदार्थ का प्रतिषेध रूप है , अतः उसको जानने के लिए उस भाव पदार्थ को भी जानना आवश्यक है , जिसका कि वह प्रतिषेध है । क्योंकि भाव के प्रतिषेध को छोड़कर अभाव का कोई दूसरा स्वरूप ही नहीं है । तस्मात् प्रतिषेध्य ( प्रतियोगि ) ज्ञान के बिना अभाव का ज्ञान सम्भव ही नहीं है । ( अर्थात् अभाव का ज्ञान प्रतियोगी रूप विशेषण से युक्त होकर ही होगा , अतः अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान असम्भव है ) । भाव और अभाव में यही अन्तर है कि भाव का अपने भावत्व रूप से ही
६६ ग्रहण होता है , किन्तु अभाव का भाव के प्रतिषेध रूप से ग्रहण होता है । जैसा कि न्यायवार्तिककार उद्योतकर ने कहा है कि " भाव और अभाव में यहीं अन्तर है कि एक ( भाव ) स्वतन्त्र है , और दूसरा ( अभाव ) परतन्त्र । एवं एक की सत्ता का उसकी अपनी उपलब्धि ही नियामक है , और दूसरे की सत्ता के प्रतियोगी की अनुपलब्धि नियामक है । ' सत् ' अर्थात् भाव पदार्थ प्रमाण के द्वारा स्वतन्त्र ही गृहीत होता है , किन्तु ' असत् ' अर्थात् अभाव प्रतियोगी के प्रतिषेध रूप से , फलतः प्रतियोगी परतन्त्र होकर प्रमाण के द्वारा ज्ञात होता है " । यदि अभाव की भी स्वतन्त्र उपलब्धि ही हो तो भाव और अभाव दोनों में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा , फलतः दोनों अभिन्न हो जाएँगे । अतः निर्विकल्पक ज्ञान के अभाव का गृहीत होना सम्भव नहीं है ।
इस प्रसङ्ग में किसी ने जो यह विकल्प उपस्थित किया था कि पहले देवदत्त और देवालय ( देवकुल ) दोनों की साथ साथ प्रतीति थी ? या देवदत्त से असम्पृक्त केवल देवकुल को ही प्रतीति थी ? यदि साथ साथ प्रतीति मानें तो फिर केवल देवकुल का स्मरण नहीं होगा । ( उस स्मृति में देवदत्त भी अवश्य ही भासित होगा , एवं देवदत्त के भासित होने पर उसके अभाव की प्रतीति असम्भव होगी ) । यदि दूसरा पक्ष मानें तो ( यह अनिष्टापत्ति होगी कि ) पूर्व में अज्ञात ही देवकुल का स्मरण होता है ।
( उ ० ) इस विकल्प में भी कुल सार नहीं है , क्योंकि देवदत्त या उनका अभाव , इन दोनों में से किसी का ग्रहण न होने पर भी देवकुल अपने देवकुलत्व स्वरूप के साथ ही वहाँ ज्ञात होता है । देवदत्त के अभाव का उस पुरुष को पहिले सविकल्पक या निर्विकल्पक कोई भी ज्ञान नहीं था अतः देवदत्त के अभाव की स्मृति भी उस पुरुष को नहीं हो सकती ।
उस समय देवदत्त के अभाव का ज्ञापक कोई दूसरा प्रमाण भी नहीं उपलब्ध होता है , अतः यही कहना पड़ेगा कि उस पुरुष को देवदत्त की संनिधि न रहने पर भी प्रश्न कर्त्ता के पूछने पर देवदत्त की स्मृति हो जाती है । स्मृति के द्वारा उपस्थित देवदत्त के अनुभावक प्रत्यक्षादि पाँचों प्रमाणों में से कोई भी वहाँ उपस्थित नहीं है , अतः देवदत्त के ग्राहक प्रत्यक्षादि पाँच प्रमाणों का न रहना या व्यावृत्ति रूप अभाव प्रमाण से ही वहाँ देवदत्त के अभाव का बोध होता है ।
इस प्रकार एक स्थान में उक्त अभाव प्रमाण को अभाव का ज्ञापक मान लेने पर अन्य सभी स्थानों में अभाव की ज्ञापकता उसमें सिद्ध हो जाती है ।
इस प्रसङ्ग में ( अभाव को स्वतन्त्र प्रमाण न माननेवाले ) हम लोगों का कहना है कि दूसरे देश में जाने पर किसी पुरुष को किसी अन्य पुरुष के द्वारा पूछे जाने पर देवकुल में इस ( पूछने के ) समय की जो देवदत्त की अनुपलब्धि है , उस अनुपलब्धि के द्वारा ( १ ) देवदत्त का एतत्कालिक जो अभाव है , उसे पूछनेवाले को इस प्रकार समझाया जाता है कि ' अभी देवकुल में देवदत्त नहीं है ।
( २ ) अथवा जिस समय वह पुरुष देवकुल में था , उस समय की जो देवकुल में देवदत्त की अनुपलब्धि थी , उस अनुपलब्धि के द्वारा देवदत्त के तत्कालिक अभाव को ही इस प्रकार समझाते हैं कि ' उस समय देवकुल में देवदत्त नहीं थे ।
' इनमें इस समय की जो देवकुल में देवदत्त को अनुपलब्धि है . वह प्रत्यक्ष योग्य वस्तु की उपलब्धि ही नहीं है , क्योंकि इस समय बोद्धा ' पुरुष ' के देश और देवकुल इन दोनों में बहुत बड़ा व्यवधान है ( अतः देवदत्त उस देश में रहनेवाले पुरुष के द्वारा ज्ञात होने योग्य नहीं हैं ) , अतः यह योग्यानुपलब्धि न होने के कारण देवदत्त के अभाव का ग्राहक नहीं हो सकती । ' इस समय देवकुल में देवदश नहीं हैं ' यह भी सन्दिग्ध ही है , क्योंकि बीच में वह आ भी सकते हैं ।
पूर्वकाल में रहनेवाली अनुपलब्धि जो — पूर्वकालिक अभाव को ही समझा सकती है - उसका अभी रहना सम्भव नहीं है , क्योंकि स्थिति बदल गई है । अविद्यमान अनुपलब्धि अभावोपलब्धि का कारण नहीं हो सकती ।
यह कहना भी सम्भव नहीं है कि ( प्र ० ) स्मृति के द्वारा उपस्थापित अनुपलब्धि से ही वहाँ अभाव का बोध होगा , ( उ ) क्योंकि अनुपलब्धि का पहिले अनुभव न रहने के कारण उसकी स्मृति सम्भव नहीं है । अनुपलब्धि चूंकि अभाव रूप है , अतः प्रत्यक्षादि पाँचों ( भावबोधक ) प्रमाणों में से किसी से भी उसका बोध सम्भव नही है । दूसरी अनुपलब्धि से यदि प्रकृत प्रमाणभूत अनुपलब्धि का अनुभव मानें , तो फिर कारणीभूत उस अनुपलब्धि के अनुभव के लिए तीसरी अनुपलब्धि की आवश्यकता होगी , जो अन्त में अनवस्था में परिणत होगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि जिस प्रकार इन्द्रिय से प्रत्यक्ष के उत्पादन में उसके ज्ञात होने की आवश्यकता नहीं होती है , उसी प्रकार अनुपलब्धि रूप प्रमाण भी स्वयं बिना ज्ञात हुए हो केवल अपनी सत्ता के द्वारा ही अपने अभाव रूप अर्थ के निश्चय का उत्पादन करता है । तस्मात् पूर्व में अनुपलब्धि का अनुभव न रहने के कारण उसकी स्मृति किस प्रकार हो सकती है ?
यदि यह कहिए कि ( प्र ० ) देवकुल में देवदत्त की जो अनुपलब्धि है वह केवल देवदत्त की उपलब्धि से ही हट सकती है । देवकुल से आनेवाला पुरुष जब दूसरे देश में चला आता है , उस समय उसे देवदत्त की उपलब्धि तो हो नहीं जाती ।
अतः ( जिस समय वह दूसरे के पूछने पर देवकुल में देवदत्त के अभाव का प्रतिपादन करता है ) उस समय देवकुल में देवदत्त की अनुपलब्धि बनी हुई है | मान लिया कि उस समय की अनुपलब्धि से इस समय की अनुपलब्धि दूसरी अवस्था में है , किन्तु कोई भी वस्तु केवल अवस्था के बदल जाने से दूसरी वस्तु नहीं हो जाती ।
( उ ० ) यह मान भी लिया जाय कि उक्त रीति से देवकुल में देवदत्त के कथित अभाव के प्रतिपादन की इस प्रकार उपपत्ति की जा सकती है , तथापि जहाँ प्रतियोगी का स्मरण न रहने के कारण किसी एक अधिकरण में पहिले उस प्रतियोगी का अभाव ज्ञात न हो सका , फिर कुछ काल बीत जाने पर उसी अधिकरण में उस प्रतियोगी रूप वस्तु का ग्रहण हुआ ।
ऐसे अधिकरण में उस समय उसी वस्तु के पूर्वकालिक अभाव का इस प्रकार का ज्ञान होता है कि ' उस अधिकरण में उस समय यह वस्तु नहीं थी ' वहाँ ( अनुपलब्धि को प्रमाण माननेवाले ) आप क्या प्रतीकार करेंगे ? अर्थात् यहाँ अभाव का ग्रहण किससे होगा ? क्योंकि यहाँ वर्त्तमान काल के प्रतियोगी की उपलब्धि से प्रतियोगी की भूतकालिक अनुपलब्धि नष्ट हो चुकी है ।
( प्र ० ) उस अधिकरण में उस वस्तु की अनुपलब्धि तो पहिले से ही थी , किन्तु उसका ज्ञान भर नहीं था ; वही ( भूतकालिक ) अनुपलब्धि वर्त्तमान काल में उपलब्धि के द्वारा नष्ट हो जाने पर भी उस अधिकरण में उस वस्तु के अभाव का ग्राहक होगी । ( उ ० ) यह समाधान भी ठीक नहीं है , क्योंकि कार्य के अव्यवहित पूर्वक्षण में न रहने पर भी यदि भूत काल में कभी रहने से ही कोई किसी का उत्पादन कर सके , तो फिर जिसे कभी इन्द्रिय थी और अभी वह नष्ट हो गयी है , ऐसे व्यक्ति को भी रूपादि का प्रत्यक्ष होना चाहिए ।
( प्र ० ) आज की किसी वस्तु की उपलब्धि से आज की ही उस वस्तु की अनुपलब्धिविनष्ट होगी , उससे पूर्व की अनुपलब्धि नहीं , अतः पूर्वकाल की उस विषय को अनुपलब्धि तो इस ( उपलब्धि के ) समय भी है ही , इस अनुपलब्धि का तो विनाश नहीं हुआ है । पूर्वकालिक इसी अनुपलब्धि के द्वारा पूर्वकालिक उस वस्तु के अभाव का निश्चय होगा । ( उ ० ) इस पाण्डित्य और निपुणता का क्या कहना ?
( यह आप नहीं समझते कि ) अनुपलब्धि शब्द का अर्थ है उपलब्धि का प्रागभाव | वह अनादि काल से अपने प्रतियोगी की उत्पत्ति के समय तक बराबर रहनेवाली एक ही वस्तु है । वह वर्तमान काल और भूतकाल के भेद से भिन्न नहीं हो सकती । अतः प्रकृत में पूर्वकालिक अनुपलब्धि का नाश नहीं हुआ है , और एतत्कालिक अनुपलब्धि का नाश हो गया है , इस भेद को किसी कुशाग्रबुद्धि महापुरुष को छोड़कर और कौन समझ सकता है ? तस्मात् हम लोग इस बात को नहीं समझ पाते कि ( अनुपलब्धि रूप ) अभाव से ही अभाव का ग्रहण होता है ।
( प्र ० ) तब फिर जहाँ कोई व्यक्ति केवल भूतल रूप आश्रय को देखकर दूसरी जगह चला जाता है , वहीं कुछ काल के बाद घट रूप प्रतियोगी का स्मरण होने पर ' उस भूतल रूप अधिकरण में उस समय घट नहीं था ' इस प्रकार से उसे अभाव का ग्रहण होता है , उसकी उपपत्ति कैसे होगी ? ( उ ० ) उस अभाव का ग्रहण अनुमान प्रमाण से होगा । क्योंकि ( घट से असंयुक्त ) केवल भूतल के स्मरण की पूर्ण इच्छा रहने पर भी पहिले से ज्ञात भूतल में घट का स्मरण नहीं होता है , वहाँ यह निश्चित है कि घट नहीं था ।
इससे यह सामान्य नियम उपपन्न होता है , कि जिस एक वस्तु का स्मरण होने पर , और स्मरण की पूर्ण इच्छा रहने पर भी स्मृति के योग्य जिस दूसरी वस्तु का स्मरण नहीं होता है , उस ( एक ) वस्तु में वह ( दूसरी ) वस्तु नहीं है ।
तदनुसार देवालय का स्मरण होने पर देवदत्त के स्मरण की इच्छा रहने पर और देवदत्त में स्मृति को पूर्णयोग्यता रहने पर भी यदि उनकी स्मृति नहीं होती है , तो यह अनुमान सुलभ हो जाता है ' उस समय देवालय में देवदत्त नहीं थे ' ( प्र ० ) उक्त नियम में व्यभिचार रहने के कारण कथित रीति से भूतकालिक अभाव का अनुमान सम्भव नहीं है , क्योंकि साथ साथ अनुभव होनेवाले दो विषयों में से यदि एक विषयक संस्कार दृढ़ नहीं रहता है , या उसमें कुछ पटुता की कमी रहती है , तो फिर उसका स्मरण नहीं होता है ।
एवं दूसरे विषय का संस्कार यदि उन दोषों से दूर रहता है , तो उस विषय का स्मरण होता है । जैसे कि पढ़े हुए एक पद्य के एक अंश का स्मरण होता है , दूसरे का नहीं । इस प्रकार के स्थलों में एक का स्मरण न होने पर भी दूसरे का स्मरण किस प्रकार हो सकेगा ? ( उ ० ) ( जिस प्रकार एक साथ ज्ञात होनेवाले दो विषयों में से कभी एक का स्मरण होता है , दूसरे का नहीं उसी प्रकार ) एक साथ रहनेवाले दो पदार्थों में से भी एक का स्मरण होता है , चूँकि उसके सभी कारण ठीक रहते हैं ।
दूसरे का स्मरण नहीं होता , क्योंकि उसके स्मरण के कारणों में कुछ त्रुटि रहती है । ऐसी स्थिति में भूतल के स्मरण के बाद घट का स्मरण न होने से भूतल में घट के न रहने की सिद्धि किस प्रकार होगी ।
यदि यह कहें कि ( ० ) सभी अनुपलब्धियाँ अभाव की साधिका नहीं है , किन्तु एक ज्ञान में विषय होनेवाले दो विषयों में से एक को अनुपलब्धि ही दूसरे के अभाव की साधिका है । अतः जिस ज्ञान के द्वारा भूतल रूप प्रदेश का ग्रहण होता है , उसी ज्ञान के द्वारा भूतल में संयुक्त घट को भी ग्रहण होता है । जिन कारणों के समूह से प्रदेश का ज्ञान होता है , उसी कारण समूह से भूतल में संयोग सम्बन्ध से रहनेवाले घट का भी ज्ञान होता है ।
अतः भूतल में यदि घट रहता तो भूतल पर वह भी दीख पड़ता ही , क्योंकि भूतल और घट दोनों का ग्रहण एक ही प्रकार के कारणों से होता है । किन्तु भूतल के ज्ञात होने पर भी घट ज्ञात नहीं होता है । तस्मात् घट की उक्त अनुपलब्धि से समझते हैं कि वहाँ भूतल में घट है ही नहीं । क्योंकि भूतल में घटाभाव से बिना घट की इस अनुपलब्धि की सम्भावना नहीं है ।
( उ ० ) यदि ऐसी बात है तो समान रूप से हम भी कह सकते हैं कि एक ज्ञान में विषय होनेवाले दो विषयों में से एक विषय की स्मृति के न रहने की दशा में यदि दूसरे की स्मृति नहीं होती है , तो फिर यह अस्मरण ' ( या उस विषय की स्मृति का न होना ) ही उस दूसरे विषय के अभाव का साधक है । तदनुसार देवकुल को देखने की सामग्नी ( कारण समूह ) एवं देवकुल में संयोग सम्बन्ध से रहने वाले देवदत्त को देखने का कारण समूह चूँकि दोनों एक ही हैं ।
अतः जिस सामग्री से देवालय का स्मरण होगा , उसी सामग्री से देवदत्त का भी स्मरण होना चाहिए । इस उपपत्ति के अनुसार देवालय के दर्शन के समय यदि उसमें देवदत्त रहते तो देवकुल की स्मृति के बाद उनकी भी स्मृति अवश्य होती , क्योंकि देवकुल और देवदत्त दोनों की स्मृतियों के उत्पादक कारणसमूह समान रूप के हैं । किन्तु देवकुल की स्मृति होने पर भी देवदत्त का स्मरण नहीं होता है , अतः उस समय देवकुल में देवदत्त नहीं थे , क्योंकि उस समय देवकुल में देवदत्त के अभाव के बिना उसकी उपपत्ति नहीं हो सकती ।
किसी श्लोक के एक अंश की स्मृति और दूसरे अंश की देवदत्त की उक्त अस्मृति की स्थिति ही भिन्न है , क्योंकि श्लोक के प्रत्येक पद अलग अलग पढ़े जाते हैं , एवं उनके ज्ञान भी अलग अलग क्रमशः ही उत्पन्न होते हैं , अत : श्लोक रूप वाक्य के कोई भी अनेक अंश एक ज्ञान के द्वारा गृहीत नहीं होते । सुतराम् श्लोक के प्रत्येक पद के ज्ञान से उत्पन्न होनेवाला संस्कार अलग अलग ।
इन संस्कारों में से जिन पदों के संस्कारों में दृढ़ता अधिक होती है , उनके द्वारा उन पदों का स्मरण होता जाता है , और जिन पदों के संस्कार दुर्बल होते हैं , उनका स्मरण नहीं होता है । अतः श्लोक के प्रसङ्ग मेंभी कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
इसी प्रकार वर्तमान काल में जिस वस्तु को उपलब्धि है , उसके पूर्वकालिक अभाव की जो इस आकार की प्रतीति होती है कि ' यह पहिले नहीं था , वह ( प्रतीति ) भी अनुमान ही है । क्योंकि इस अभाव के प्रतियोगी का पूर्वकालिक अस्तित्व के स्मृत होने पर भी अधिकरण में उसकी सत्ता की स्मृति न होने से ही उक्त प्राक्तन अभाव की प्रतीति उत्पन्न होती है ।
( मीमांसकों का ) जो सम्प्रदाय स्मृति के अभाव को भी ' अभाव ' प्रमाण मानता है , उसको " अभावोऽपि प्रमाणाभावः ' " इस शाबरभाष्य और " प्रमाणपञ्चकं यत्र " इत्यादि उसके वासिक दोनों के विरोध का सामना करना पड़ेगा ?
जो कोई यह कहते हैं कि ( प्र ० ) अभाव नाम का कोई अलग प्रमेय ही नहीं है , अतः उसके प्रमाण की बात ही अनुचित है । ( उ ० ) उनसे यह पूछना चाहिए कि ' नास्ति ' इस आकार की बुद्धि का विषय ( प्रमेय ) कौन है ? इस प्रश्न के उत्तर में वे यदि यह कहें कि ( प्र ० ) उस बुद्धि का कोई भी विषय नहीं है , क्योंकि उक्त भाष्य और वार्तिक दोनों ही में ' प्रत्यक्षादि पाँचों प्रमाणों को अनुत्पत्ति ' को ही ' अभाव ' प्रमाण कहा गया है ।
किसी के भी मत से स्मृति प्रमाण नहीं है , अतः स्मृति के किसी भी अभाव का प्रामाण्य भाष्य और वार्तिक के द्वारा अनुमोदित नहीं हो सकता । ( उ ० ) तो फिर बिना विषय के ही विज्ञान की इच्छा करनेवाले महायान के अनुयायियों को हो तरफ आप अपना हाथ बढ़ाते हैं ।
यदि इस प्रश्न के उत्तर में यह कहें कि ( प्र ० ) ( कण्टकाभावादि का ) भूतल रूप आश्रय ही उक्त ' नास्ति ' प्रत्यय का विषय है , ( उ ० ) तो फिर काँट प्रभृति से युक्त भूतल में भी ' कण्टको नास्ति ' इस आकार को बुद्धि होगी , जिससे कि ( निष्कण्टक भूमि की तरह ) काँटों से युक्त भूतल में भी निःशङ्क होकर आना जाना सम्भव हो जाएगा । ( प्र ० ) ' नास्ति ' इस प्रकार की उक्त बुद्धि का ' केवल ' भूतल ही विषय ।
फाँट के रहने पर भूतल से यह ' कैवल्य ' हट जाता है अत भूतल में काँट के न रहने पर भूतल में ' कण्टको नास्ति ' न इस ' प्रतिपत्ति ' की आपत्ति ही होती है , और न गमन और आगमन को निःशङ्क प्रवृत्ति हो हो पाती हैं । ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि भूतल का यह ' कैवल्य ' भूतल स्वरूप है , या उससे भिन्न कोई दूसरा धर्म है ? ( यदि पहिला पक्ष मानें तो फिर ) भूतल में कण्टकादि ज्ञान के समय भी ( भूतल स्वरूप वह ) कैवल्य है हो ।
अतः इस पक्ष में भी उक्त निःशङ्क प्रवृत्ति की ओर कण्टक के रहने पर भी भूतल में ' कण्टको नास्ति ' इस ज्ञान को आपत्ति रहेगी ही । यदि कैवल्य को भूतल से भिन्न कोई दूसरा धर्म मानें तो ( अभाव की तरह ) किसी दूसरे पदार्थ का मानना आवश्यक ही होगा ।
यदि यह कहें कि ( प्र ० भाव की दो अवस्थायें होती हैं ( १ ) एकाकी अवस्था और ( २ ) सद्वितीयावस्था | इनमें ' एकाकी ' अवस्था से युक्त भूतल ही ' स्वरूप मात्र ' कहलाता है । इस केवल भूतल में ( घटभाव के ) प्रतियोगी
७० घटादि के ग्रहण की इच्छा से जब केवल भूतल की उपलब्धि होती है ( अर्थात् घटयुक्त भूतलकी उपलब्धि नहीं होती है ) तब ( भूतल की ) वही उपलब्धि भूतल में घटाभाव से व्यवहार को उत्पन्न करती है ।
( उ ० ) इस प्रसङ्ग में भी हम लोगों का कहना है कि भूतल शब्द के साथ प्रयुक्त ' एकाकी ' शब्द का भूतल और घटाभाव को छोड़कर और कौन सा अर्थ आप लोग मानते हैं , जिसे आप ' भूतले घटो नास्ति ' इस प्रतिषेधबुद्धि का विषय कहते हैं ? विषयों की विलक्षणता के बिना बुद्धियों की विलक्षणता सम्भव नहीं है । एवं बुद्धियों की विभिन्नता के बिना ( शब्द प्रयोग रूप विभिन्न व्यवहार भी सम्भव नहीं हैं । ( प्र ० ) ( भूतलादि आश्रय रूप ) भावों में जो स्वाभाविक ' एकत्व ' है वही उसका एकाकित्व ( या एकाकी अवस्था ) है । ( उ ० ) यह एकत्व ( भूतल में रहनेवाले घटाभाव के ) प्रतियोगी का ( भूतल में ) न रहना ही है ? या उसमें रहनेवाली एकत्व संख्या रूप है ? यदि एकत्व संख्या रूप मानें तो वह एकाकित्व भूतल रूप आश्रय जब तक रहेगा तब तक — घट की सत्ता के समय भी - भूतल में रहेगा ही ( अर्थात् भूतल में घट रहने की दशा में भी घटाभाव की प्रतीति की आपत्ति होगी ) । यदि उस स्वाभाविक एकत्व को भूतलादि में घटादि प्रतियोगियों का न रहना ही मानें , तो फिर अभाव रूप अलग स्वतन्त्र पदार्थ स्वीकृत ही हो गया ।
( प्र ० ) जो सम्प्रदाय अभाव को स्वतन्त्र पदार्थ मानते हैं , उनके मत से भी जब तक भूतल की प्रतीति नहीं होती , तब तक भूतल में अभाव की प्रतीति नहीं होती है । अत : उनके मत से भी भूतल की प्रतीति भूतल में अभाव प्रतीति का कारण है ही । किन्तु कण्टक सहित भूतल के ग्रहण से भूनल में ' कण्टको नास्ति ' इस अभाव की प्रतीति नहीं होती है ।
यदि कण्टकादि के अभाव से युक्त भूतल की प्रतीतिको भूतल में कण्टकाभाव को प्रतीति का कारण मानें , तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि ' भूतल में कण्टकाभाव के ग्रहण से ही कण्टकाभाव से युक्त भूतल का ग्रहण होता है ' एवं ' कण्टकाभाव विशिष्ट भूतल के ग्रहण से ही भूतल में कण्टकाभाव का ग्रहण होता है ' इन दोनों का इस अनिष्टापत्ति में पर्यवसान होगा कि ' वस्तु स्वयं ही अपना कारण हैं ' ।
तस्मात् आप ( अभाव को स्वतन्त्र पदार्थ माननेवाले ) को भी भूतल की कोई ऐसी ' एकाकी अवस्था ' माननी ही होगी , जो कण्टकाभावादि स्वरूप न हो , एवं भूतल में कण्टक रूप प्रतियोगी की मत्त्व दशा में न रहे , जिससे भूतल में कण्टकाभाव का व्यवहार हो सके ।
भूतल की वही एकाकी अवस्था भूतल में कण्टकाभाव के व्यवहार का कारण होगा ( इसके लिए अभाव को स्वतन्त्र पदार्थ मानने की आवश्यकता नहीं है | ( उ ० ) यह भी ठीक नहीं है , क्योंकि केवल भूतल का ग्रहण ही भूतल में होनेवाले कण्टकाभावादि के प्रत्ययों का कारण है । ( प्र ० ) तो फिर जिस समय भूतल में कण्टकादि दूसरी वस्तुओं का प्रत्यय होता है , उस समय कण्टकाभावादि की प्रतीतियाँ क्यों नहीं होतीं ?
( उ ० ) चूँकि भूतल में कण्टकाभाव के प्रत्यक्ष ( ग्रहण ) के लिए जिस कारण समूह की अपेक्षा है , उसमें भूतल ग्रहण की तरह कण्टकाभाव के साथ इन्द्रिय का संनिकर्ष भी निविष्ट है । भूतल में जिस समय कण्टक की सत्ता रहती है , उस समय कण्टकागाव रूप विषय नहीं रहता है । अतः उस समय कण्टकाभाव रूप विषय के साथ इन्द्रिय का संनिकर्ष सम्भव नहीं है । ( भूतल में कण्टक की सत्त्व दशा में ) भूतल का प्रत्यक्ष रहने पर भी , कण्टकाभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
यह तो सम्भव नहीं है कि प्रकाश एवं चक्षु प्रभृति प्रत्यक्ष के कारण विद्यमान हैं , केवल इसीलिए जो जहाँ नहीं भी है , उसका भी वहाँ प्रत्यक्ष हो । इस प्रकार यह सिद्ध है कि अभाव नाम का स्वतन्त्र पदार्थ अवश्य है ।
( १ ) प्रागभाव , ( २ ) प्रध्वंसाभाव ( ३ ) इतरेतराभाव ( अन्योन्याभाव या भेद ) और ( ४ ) अत्यन्ताभाव , अभाव के ये चार भेद हैं ।
( १ ) उत्पत्ति से पहिले ( समवायि ) कारणों में कार्य का जो अभाव रहता है वही प्रागभाव है ( प्रागभाव शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है कि ) ' प्राक् ' अर्थात् कार्य की उत्पत्ति से पहिले ' अभाव ' अर्थात् कार्यं रूप ' विशेष ' का अभाव ही ' प्रागभाव ' है । यह अनादि होने पर भी बिनाशशील है , यदि प्रागभाव को अविनाशी मानें तो कार्य की उत्पत्ति हो न हो सकेगी । अतः ( प्रतियोगिभूत ) कार्य की उत्पत्ति से उसका विनाश मानना आवश्यक है । ( प्र ० ) प्रागभाव का विनाश कौन सी वस्तु है ? ( उ ० ) प्रतियोगिभूत वस्तु की उत्पत्ति ही उसके प्रागभाव का विनाश है । ( प्र ० ) तो फिर उस वस्तु के विनष्ट हो जाने पर उस वस्तु के प्रागभाव की फिर से उपलब्धि होनी चाहिए ? ( उ ० ) ( प्रागभाव के विनाश को प्रतियोगी का उत्पत्ति स्वरूप मानने पर भी यह आपत्ति ) नहीं है क्योंकि प्रागभाव का विनाश जिस प्रकार प्रागभाव के प्रतियोगी रूप वस्तु का उत्पत्ति रूप है , उसी प्रकार उस वस्तु के कारणीभूत उन अवयवों के स्वरूप भी हैं , जिन अवयवों से कार्य की उत्पत्ति हो चुकी है ।
( २ ) उत्पन्न हुए कार्य का जपने स्वरूप से हटना ही ( उसका ) ' प्रध्वंसाभाव ' है । यह अभाव उत्पत्तिशील होने पर भी विनाशशील नहीं है , क्योंकि विनष्ट हुए भाव व्यक्ति की फिर कभी उपलब्धि नहीं होती है । ( प्र ० ) पहिले से जिसका प्रागभाव रहता है , बाद में उसकी सत्ता ही उस वस्तु की उत्पत्ति कहलाती है , किन्तु प्रध्वंस का प्रागभाव कौन सी वस्तु है ? ( उ ० ) प्रध्वंस के प्रतियोगिभूत वस्तु की सत्ता ही उस प्रध्वंस का प्रागभाव है । जिस प्रकार प्रतियोगिभूत वस्तु की उत्पत्ति ही उसके प्रागभाव का विनाश है , उसी प्रकार प्रध्वंस की उत्पत्ति हो उसके प्रागभाव का विनाश हैं । यह अभियोग करना युक्त नहीं है कि ( प्र ० ) जो ( प्रागभाव ) स्वयं अभाव स्वरूप है , उसका अभाव कैसे निष्पन्न होगा ? ( उ ० ) क्योंकि कारणों का सामर्थ्य सभी अभियोगों से बाहर है ।
( ३ ) गो में अश्व का अभाव और अश्व में गो का जो अभाव है , वही ' इतरेतराभाव ' हैं । वह समवाय की तरह अपने सभी आश्रयों में एक ही है , और नित्य भी हैं , क्योंकि आश्रयीभूत एक वस्तु के विनष्ट हो जाने पर भी उसी प्रकार की दूसरी वस्तु में उसका भान होता है । जैसे कि ( घटत्व ) सामान्य के आश्रयीभूत एक घट का नाश हो जाने पर भी दूसरे घट में उसका प्रत्यभिज्ञान होता है । एवं जिस प्रकार घटादि वस्तुओं के उत्पन्न होते ही अदृष्ट रूप कारणवश सामान्य उनके साथ सम्बद्ध हो जाता है । एवं जिस प्रकार सामान्य में नित्यत्व स्वभावतः प्राप्त है । उसी प्रकार ये सभी बातें इतरेतराभाव ( अन्योन्याभाव या भेद ) में भी समझना चाहिए । ( सामान्य और इतरेतराभाव इन दोनों में उक्त सादृश्यों के रहते हुए भी ) इतना अन्तर है कि केवल आश्रय का ज्ञान होते ही सामान्य का ज्ञान हो जाता है । किन्तु इतरेतराभाव को समझने के लिए ( उसके आश्रय के अतिरिक्त ) उसके प्रतियोगी के ज्ञान की भी अपेक्षा होती है । क्योंकि सभी अभाव को समझने के लिए प्रतियोगी रूप दूसरी वस्तु के ज्ञान की अपेक्षा होती है ।
सर्वथा अविद्यमान वस्तु का जो निषेध वही ' अत्यन्ताभाव ' है । ( प्र ० ) अत्यन्ताभाव इतरेतराभाव से भिन्न कोई वस्तु नहीं है । ( उ ० ) यह तो राजमार्ग में ही भूल होने जैसी बात है , क्योंकि जहाँ प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों की सत्ता रहती हैं , किन्तु परस्पर एक के तादात्म्य का दूसरे में निषेध किया जाता है , वहाँ इतरेतराभाव माना जाता है । किसी सिद्ध आश्रय में सर्वथा अविद्यमान किन्तु केवल बुद्धि में आरो-
टिप्पणी · अनुवादक — (पृ. ५५६) १. अर्थात् जिसकी उत्पत्ति होगी , उसका यदि प्रागभाव मानना आवश्यक हो तो प्रध्वंस का भी प्रागभाव मानना आवश्यक होगा , क्योंकि वह भी उत्पत्तिशील है । अतः प्रश्न उठता है कि प्रध्वंस का प्रागभाव क्या है ?
पृ. ५४२
अभावोऽप्यनुमानमेव , यथोत्पन्नं कार्य कारणसद्भावे लिङ्गम् , एवमनुत्पन्नं कार्य कारणासद्भावे लिङ्गम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अभाव प्रमाण भी अनुमान के ही अन्तर्गत है , क्योंकि जिस प्रकार उत्पन्न कार्य अपने कारण की सत्ता का ज्ञापक हेतु है , उसी प्रकार अनुत्पन्न कार्य भी अपने कारण की असत्ता का ज्ञापक हेतु ही है ।
पृ. ५५८
तथैवैतद्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एवेति ।
सर्वथा असद्भूतस्यैव वारोपितस्य देशकालानवच्छिन्नः प्रतिषेधः ।
यथा षट्पदार्थेभ्यो नान्यत् प्रमेयमस्तीति ।
यदि चात्यन्ताभावो नेष्यते , षडेव पदार्था इत्ययं नियमो दुर्घटः स्यात् ।
वितथमैतिह्यं तावत् प्रमाणमेव न भवति ।
अवितथमाप्तोपदेश एव ।
आप्तोपदेशश्चानुमानम् ।
तस्मादवितथमैतिह्यमनुमानान्न व्यतिरिच्यते इत्यभिप्रायः ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पञ्चावयवेन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानु
इसी प्रकार ' ऐतिह्य ' भी सत्य अर्थ के बोधक एवं आप्त से उच्चरित शब्द प्रमाण ही है ( फलतः अनुमान ही है ) ।
अपने निश्चित अर्थ को दूसरे को समझाने के लिए ( प्रसिद्ध ) पाँच अवयव ( पञ्चावयव ) वाक्यों का प्रयोग ही ' परार्थानुमान ' है । ( अर्थात् ) गवाश्वयोरितरेतरात्मताप्रतिषेधः । अत्यन्ताभावे तु बुद्धा- न्यायकन्दली
ऐतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एव ' इति है ' इति निपातसमुदाय उपदेशपारम्पर्ये वर्तते , तत्रायं स्वार्थिकः ष्यञ् प्रत्ययः , ऐतिह्यमिति ।
वाक्येन स्वनिश्चितार्थ-
परार्थानुमानव्युत्पादनार्थमाह-- पञ्चावयवेन प्रतिपादनं परार्थानुमानमिति । प्रतिपादनीयस्यार्थस्य यावति शब्दसमूहे प्रतीतिः पर्यवस्यति , तस्य पञ्चभागाः समूहापेक्षयावयवा इत्युच्यन्ते । स्वयं साध्यानन्तरीयकत्वेन निश्चितोऽर्थः स्वनिश्चितार्थः , साध्याविनाभूतं लिङ्गम् । पित वस्तु का इस आश्रय में यह कभी किसी भी प्रदेश में नहीं है ' इस प्रकार का प्रतिषेध ही अत्यन्ताभाव है । जैसे द्रव्यादि छः पदार्थों से अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है ( इस प्रकार का प्रतिषेध अत्यन्ताभाव रूप है ) यदि अत्यन्ताभाव न मानें तो ' पदार्थ छः ही हैं ' इस प्रकार का अवधारण कठिन होगा ।
' ऐतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एव ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' ऐतिह्य ' शब्द इति है इन दोनों निपातों से स्वार्थ में ' ष्यन् ' प्रत्यय से निष्पन्न होता है । ये दोनों निपात ' परम्परा से प्राप्त उपदेश ' रूप अर्थ के बोधक हैं !
अभिप्राय यह है कि जो ' ऐतिह्य ' रूप वचन ( या उपदेश ) असत्य है , वह तो प्रमाण ही नहीं है । जो ऐतिह्य प्रमा ज्ञान का उत्पादक है , वह आप्तवचन को छोड़कर औरकुछ भी नहीं है । ( यह उपपादन कर चुके हैं कि आतोपदेश अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अतः ऐतिह्य भी अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है ।
' पञ्चावयवेत वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानम् ' यह वाक्य परार्थानुमान को समझाने के लिए कहा गया है । अभीष्ट अर्थ की प्रतीति जिन शब्दों के समूह से सम्पन्न होती है , उसके पाँच खण्ड होते हैं । वाक्य के वे ही पाँच खण्ड वाक्यसमूह की अपेक्षा ( अर्थात् उक्त समूह को अवयवो मानकर ) उसके अवयव कहलाते हैं । ' स्वयं साध्यानन्तरीयकत्वेन निश्चितोऽर्थः स्वनिश्चितार्थः ' इस व्युत्पत्ति के
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
अत्यन्ताभावो यदसतः प्रतिषेध इति । इतरेतराभाव एवात्यन्ताभाव इति चेत् ? अहो राजमार्ग एव भ्रमः ? इतरेतराभावो हि स्वरूपसिद्धयोरेव तस्य पश्वावयवेन वाक्येन प्रतिपादनं तत्प्रतिपत्तिजननसमर्थपञ्चावयववाक्यप्रयोगः परार्थानुमानम् । पश्वावयवं हि वाक्यं यावत्सु रूपेषु लिङ्गस्य साध्याविनाभावः परिसमाप्यते तावद्रूपं लिङ्गं प्रतिपादयति । तत्प्रतिपादिताच्च लिङ्गात् साध्यसिद्धिः । न वाक्यमेव साध्यं बोधयति , तस्य शाब्दत्वप्रसङ्गात् । तस्मादविनाभूतलिङ्गाभिधायकवाक्यप्रयोग एव परार्थानुमानमुच्यते ।
अपरे तु यत्परः शब्दः स शब्दार्थः , वाक्यं च साध्यपरम् , तत्प्रतिपादनार्थमस्य प्रयोगात् । लिङ्गप्रतिपादनं त्ववान्तरव्यापारः , वचनमात्रेण विप्रतिपन्नस्य साध्यप्रतीतेरभावादिति वदन्त एवं व्याचक्षते - स्वनिश्चितार्थ : साध्यः , तस्य लिङ्गप्रतिपादनमेवावान्तर व्यापारीकृत्य पञ्चावयवेन वाक्येन प्रतिपादनं तत्प्रतिपादकवाक्यप्रयोगः परार्थानुमानमिति । मित्येके । त्र्यवयवमित्यपरे । तत्प्रतिषेधार्थमेव कारकरणम् – पञ्चावयवेनैवेति । प्रतिपाद्येऽर्थे यस्य संशयोऽस्ति स संशयितः यस्य विपर्ययज्ञानं स विपरीतः , यस्य न संशयो न विपर्ययः किन्तु स्वज्ञानमात्रं सोऽव्युत्पन्नः , प्रतिपादनार्हाः , तत्त्वप्रतीतिविरहात् ।
यो यानि पदानि समुदितानि प्रयुङ्क्ते स तत्पदार्थ संसर्गप्रतिपादनाभिप्रायवानिति सामान्येन स्वात्मनि नियमे प्रतीते पश्चात् पदसमूहप्रयोगाद् वक्तुस्तत्पदार्थ संसर्गप्रतिपादनाभिप्रायावगतिद्वारेण पदेभ्यो वाक्यार्थानुमानं न तु पदार्थेभ्यस्तत्प्रतीतिः । नहि पदार्थो नाम प्रमाणान्तरमस्ति मीमांसकानाम् । नापि वाक्यार्थप्रतिपादनाय पदैः प्रत्येकमभिधीयमानानां पदार्थानां वाक्यार्थप्रतिपादनशक्तिराविर्भवति , प्रमेयप्रतीतिमात्रव्यापारस्य प्रमाणस्य प्रमेयशक्त्याधायकत्वाभावात् । तस्मात् पदार्था वाक्यार्थं प्रतिपादयन्तो लिङ्गत्वेन वा प्रतिपादयेयुरन्यथानुपपत्त्या वा , उभयथाऽप्यशाब्दो वाक्यार्थः स्यात् ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — स्वोक्तं विवृणोति - पञ्चावयवेनैवेत्यादिना । द्वयवयवमेव वाक्यअनुसार साध्य की व्याप्ति से युक्त वस्तु हो ( प्रकृत वाक्य में प्रयुक्त ) ' स्वनिश्चित ' शब्द का अर्थ है । उस ( स्वनिश्चित अर्थ रूप साध्यव्याप्त हेतु ) का पञ्चावयव वाक्य के द्वारा जो ' प्रतिपादन अर्थात् साध्य की व्याप्ति से युक्त हेतु विषयक बोध के उत्पादन में क्षम पञ्चावयव वाक्य का प्रयोग , वही ' परार्थानुमान ' है । जिन धर्मों के द्वारा हेतु में साध्य की व्याप्ति पूर्ण रूप से समझी जाती है , उन धर्मों से युक्त हेतु का ही प्रतिपादन पञ्चावयव वाक्य से होता है । पञ्चावयत्र वाक्य के द्वारा प्रतिपादित उक्त हेतु से ही साध्य का बोध ( अनुमिति ) होता है , साक्षात् पञ्चावयव वाक्य से साध्य की अनुमिति नहीं होती है , यदि ऐसी बात हो तो साध्य का उक्त बोध अनुमिति न होकर शाब्दबोध हो जाएगा । अतः साध्य को व्याप्ति से युक्त हेतु के बोधक पञ्चावयव वाक्यों के प्रयोग को ही ' परार्थानुमान ' कहा जाता है ।
दूसरे सम्प्रदाय के कुछ लोग कहते हैं कि जिस विषय को समझाने के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया जाता है , वही विषय उस शब्द को अर्थ होता है । पञ्चावयव वाक्य साध्य को समझाने के लिए ही प्रयुक्त होता है , अतः साध्य हो पञ्चावयव वाक्य रूप शब्द का प्रतिपाद्य अर्थ है । चूंकि केवल पञ्चावयव रूप वाक्य के प्रयोग से भ्रान्त व्यक्ति को साध्य का बोध नहीं होता है , अतः मध्यवर्ती व्यापार के रूप में ( साध्यव्याप्य हेतु का ज्ञान ) आवश्यक होता है । ये लोग प्रकृत वाक्य की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि साध्य ही प्रकृत ' स्वनिश्चितार्थ ' शब्द से अभिप्रेत है । इसी ' साध्य ' का प्रतिपादन पञ्चावयव वाक्य से ( मुख्यतः ) होता है । इतना अवश्य है कि इस काम के लिए उसे साध्यव्याप्यहेतुज्ञान को बीच का व्यापार मानना पड़ता है । अतः साध्य के ज्ञापक पञ्चावयव वाक्यों का प्रयोग ही ' परार्थानुमान ' है ।
पृ. ५६०
मानम् ।
।
पञ्चावयवेनैव वाक्येन संशयितविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां परेषां स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानं विज्ञेयम् ।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अपने निश्चित अर्थ विषयक संशय या विपर्यय अथवा अव्युत्पत्ति से युक्त पुरुषों को पञ्चावयव वाक्य के द्वारा ही उस अर्थ को समझाने के लिए उक्त ( अपने निश्चित ) अर्थ का पञ्चावयव वाक्य के द्वारा ) प्रतिपादन ही ' परार्थानुमान ' समझना चाहिये ।
न्यायकन्दली · श्रीधर भट्ट
ननु किं पदानि प्रत्येकमेकैकमर्थं प्रतिपादयन्ति वाक्यार्थस्य लिङ्गम् ? किं वा परस्परान्वितं स्वाथं बोधयन्ति ? अत्रके तावदाहु : - व्युत्पत्त्यपेक्षया पदानामर्थ प्रतिपादनम् । व्युत्पत्तिश्च गामानय गां बधानेत्यादिषु वृद्धव्यवहारेषु क्रियान्वितेषु कारकेषु , कारकान्वितायां वा क्रियायाम् , न स्वरूपमात्रे । अतः परस्परान्विता एव पदार्थाः पदैः प्रतिपाद्यन्त इति ।
अत्र निरूप्यते - यदि गामानयेत्यादिवाक्ये गामिति पदेनैवानयेत्यर्थान्वितः स्वार्थोऽभिहितस्तदानयेतिपदं व्यर्थम् उक्तार्थत्वात् । आनयेतिपदेनानयनार्थेऽभिहिते सत्यानयेत्यर्थान्वितः स्वार्थी गोपदेनाभिधीयते , तेनानयेति पदस्य न वैयर्थ्यमिति चेत् ? तह्यनियेति पदं केवलं स्वार्थमात्रमाचक्षाणमनन्विताभिधायि प्राप्तम् । यथा चेदमनन्वितार्थं तथा पदान्तरमपि स्यादिति दत्तजलाञ्जलिरन्विताभिधानवादः ।
यदानयेति पदेनापि पूर्वपदाभिहितेनार्थेनान्वितः स्वार्थी - ऽभिधीयते , तदा यावत् पूर्वपदं स्वाथं नाभिधत्ते तावदुत्तरपदस्य पूर्वपदार्थान्वितस्वार्थाभिधानं नास्ति । यावच्चोत्तरपदं स्वार्थं नाभिधत्ते तावत् पूर्वपदस्यो . त्तरपदार्थान्वितस्वार्थप्रतिपादनं न भवतीत्यन्योन्याश्रयत्वम् । अथ मन्यसेप्रथमं पदानि केवलं पदार्थ स्मारयन्ति , पश्चादितरेतरस्मारितेनार्थेनान्वितं स्वार्थमभिदधतीति ततो नेतरेतराश्रयत्वम् ।
तदप्यसारम् , सर्वदेव हि पदान्यन्वितेन पदार्थेन सह गृहीतसाहचर्याणि नानन्वितं केवलं पदार्थमात्रं स्मारयितुमीशते , यथानुभवं स्मरणस्य प्रवृत्तेः । वृद्धव्यवहा रेष्वन्वयव्यतिरेकाभ्यां गोशब्दस्य ककुदादिमदर्थं नियमो गृहीतो न क्रियाकरणादिष्विति तेषां प्रत्येकं व्यभिचारेऽपि गोशब्दस्य प्रयोगदर्शनात् । तेनायं गोशब्दः श्रूयमाणोऽभ्यासपाटवादव्यभिचरितसाहचर्यं ककुदादिमदर्थमात्रं स्मारयति न क्रियाकरणादीनीति चेत् ?
एवं तहि यस्य शब्दस्य यत्रार्थे साहचर्यनियमो गृह्यते तत्रैव तस्याभिधायकत्वं नान्यत्रेत्यनन्विताभिधानेऽपि समानम् । न च स्मरणमनुमानवत् साहचर्य नियमपेक्ष्य प्रवर्तत इत्यपि सुप्रतीतम् , तद्धि संस्कारमात्र निबन्धनं प्रतियोगमा दर्शनादपि भवति । तथाहि – धूमदर्शनादग्निरिव रसवत्यादिप्रदेशोऽपि स्मर्यते , तद् यदि गोशब्दः सहभावप्रतीतिमात्रेणैव गोपिण्डं स्मारयति , गोपिण्डप्रतियोगिनोऽपि पदार्थान् कदाचित् स्मारयेत् ।
नियमेन तु गोपिण्डमेव स्मारयंस्तद्विषयं वाचकत्वमेवावलम्बते , तथासत्येव नियमसम्भवात् । किञ्च यथा वाक्ये पदानामन्विताभिधानं तथा पदेऽपि प्रकृतिप्रत्यययोरन्विताभिधानमिच्छन्ति भवन्तः , ताभ्यां चेत् परस्परान्वितः स्वार्थोऽभिहित : कस्तदन्यः पदार्थो यः पदेन पश्चात् स्मर्यते ? तदेतदास्तां नग्नाटकपक्षपतितं वचः ।
प्रकृतमनुसरामः - अस्त्वेवं पदानामर्थप्रतिपादनम् , इदं तु न सङ्गच्छते परार्थानुमानमिति । लिङ्गं तज्जनितं वा ज्ञानमनुमानम् । न च लिङ्गस्य ज्ञानस्य च परार्थत्वम् । अनुमानवाचकस्य शब्दस्य परार्थत्वादनुमानं परार्थमुच्यते चेत् प्रत्यक्षवाचकस्यापि शब्दस्य परार्थत्वात् प्रत्यक्षमपि परार्थमुच्येत ? तदुक्तम्-
ज्ञानाद् वा ज्ञानहेतोर्वा नान्यस्यास्त्यनुमानता ।
तयोश्च न परार्थत्वं प्रसिद्धं लोकवेदयोः ||
वचनस्य परार्थत्वादनुमानपरार्थता 1
प्रत्यक्षस्यापि पारार्थ्यं तद्द्वारं किं न कल्प्यते ॥ इति ।
न्यायकन्दलीका हिन्दी अनुवाद — ' पञ्चावयबेनैव वाक्येन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा भाष्यकार ने अपने ' पञ्चावयवेन वाक्येन ' इत्यादि अपनी ही पङ्क्ति की व्याख्या की हैं । किसी सम्प्रदाय के लोग दो ही अवयव मानते हैं । अन्य सम्प्रदाय के लोग तीन अवयव मानते हैं । इन दोनों मतों का खण्डन करने के लिए ही ' एवकार ' से युक्त ' पञ्चावयवेनैव ' यह वाक्य लिखा गया है । प्रतिपादन के लिए अभिप्रेत अर्थ में जिसे संशय रहता है , वही पुरुष प्रकृत में ' संशयित ' शब्द का अर्थ है । एवं जिसे उक्त अर्थ का विपर्यय रहता है , वहो व्यक्ति विपरीत ( या ' विपर्यस्त ' शब्द का अर्थ ) है । जिस पुरुष को प्रकृत अर्थ का न संशय ही है , न विपर्यय ही , केवल स्वज्ञान ही है , वही पुरुष प्रकृत में अव्युत्पन्न शब्द का अर्थ है । इन तीन प्रकार के पुरुषों को ही विषयों का समझना उचित है , क्योंकि इन्हें साध्य का तत्त्व ज्ञात नहीं रहता है ।
' जो पुरुष जिन अनेक पदों का साथ साथ प्रयोग करता है उसका यह अभिप्राय भी अवश्य ही रहता है , कि उनमें से प्रत्येक पद का अर्थ परस्पर सम्बद्ध होकर ज्ञात हो । अपने स्वयं इस नियम को समझने के बाद ही पद समूह ( रूप ) वाक्य के प्रयोग से वक्ता का यह अभिप्राय ज्ञात होता है कि वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद के अर्थ परस्पर सम्बद्ध होकर ज्ञात हों । वक्ता के इस अभिप्राय विषयक ज्ञान के द्वारा पदों से ही वाक्यार्थ का ज्ञान होता है , पद के अर्थों से वाक्यार्थ की प्रतीति नहीं होती है , क्योंकि मीमांसकों के मत में भी पदार्थ नाम का कोई प्रमाण नहीं है । यह कहना भी सम्भव नही है कि ( प्र ० ) वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद के द्वारा उपस्थित सभी अर्थों में उन पदों से वाक्यार्थ विषयक विशिष्ट बोध के लिए एक विशेष प्रकार की शक्ति उत्पन्न होती है । ( उ ० ) क्योंकि प्रमाण का इतना ही काम है कि वह प्रमेय के ज्ञान को उत्पन्न करे , उसमें यह सामर्थ्य नहीं है कि प्रमेय में अपने ज्ञान को उत्पन्न करने की शक्ति को भी उत्पन्न करे । तस्मात् पदों के अर्थ लिङ्ग बनकर वाक्यार्थ का प्रतिपादन करे या अन्यथानुपपत्ति के द्वारा दोनों ही प्रकार से यह निश्चित है कि ( इस पक्ष में ) शब्द के द्वारा वाक्यार्थ की उपस्थिति नहीं मानी जा सकती ।
( प्र ० वाक्य में प्रयुक्त ) प्रत्येक पद अलग २ अपने अपने अर्थों का प्रतिपादन करते हुए वाक्यार्थ के ज्ञापक हेतु हैं ? अथवा वे पद परस्पर अन्वित होकर वाक्यार्थ विषयक ज्ञान को उत्पन्न करते हैं ? इस प्रसङ्ग में एक सम्प्रदाय के ( अन्विताभिधानवादी ) लोगों का कहना है कि व्युत्पत्ति ( शक्ति या अभिधावृत्ति ) के सहारे ही पदों से अर्थं का प्रतिपादन होता है । यह व्युत्पत्ति ' गामानय , गां बन्धय ' इत्यादि स्थलों में वृद्धों के व्यवहार से गृहीत होती देखी जाती है । वृद्ध के इन व्यवहारों से क्रियाओं के साथ अन्वित कारकों में या कारकों के साथ अन्वित क्रियाओं में ही पदों की शक्ति ( व्युत्पत्ति ) गृहीत होती है , केवल कारकों में या केवल क्रियाओं में नहीं । अतः परस्पर अन्वित अर्थ ही पदों के द्वारा प्रतिपादित होते हैं । ( अर्थात् इतरान्वित स्वार्थ में ही पदों की शक्ति है , केवल स्वार्थ में नहीं )
इस प्रसङ्ग में हम ( अभिहितान्वयवादी ) लोग यह विचार करते हैं कि यदि ' गामानय ' इस वाक्य में प्रयुक्त केवल ' गाम् ' यह पद ही आनयन रूप अर्थ में अन्वित गो रूप अपने अर्थ को समझाता है , तो फिर आनय ' पद के प्रयोग का क्या प्रयोजन ? उसका आनयन रूप अर्थ तो ' गाम् ' पद से ही कथित हो जाता है । ( प्र ० ) ' आन ' पद से आनयन रूप अर्थ के कथित होने के बाद ही आनयन रूप अर्थ में अन्वित गो रूप के स्वार्थ का प्रतिपादन ' गो ' शब्द से होता है , अतः उक्त वाक्य में ' आन '
७१ पद का प्रयोग व्यर्थ नहीं है । ( उ ० ) तो फिर इससे यह निष्कर्ष निकला कि ' आनय ' पद से ( दूसरे अर्थ में अनन्वित ) केवल ' आनयन ' रूप स्वार्थ का ही बोध होता है । अतः यह कहना सुलभ हो जाएगा कि जिस प्रकार ' आनय ' पद से केवल ( इतरानन्दित ) स्वार्थ का बोध होता है , उसी प्रकार गो प्रभृति अन्य पदों से भी केवल स्वार्थ का बोध हो सकता है , इस प्रकार तो अन्विताभिधान को जलाञ्जलि ही मिल जाएगी । इस पर यदि यह कहें कि ( प्र ० ) पूर्वपद ( गाम् इस पद ) से अभिहित अर्थ के साथ अन्वित ही आनयन रूप अर्थ का अभिधान आनयन पद से होता है । ( उ ० ) तो यह भी मानना पड़ेगा कि जब तक ' आनय ' रूप उत्तर पद से आनयन रूप अर्थ का अभिधान नहीं होता है , तब तक ' गाम् ' इस पूर्वपद से उत्तरपद के अर्थ में अन्वित स्वार्थ का बोध नहीं हो सकता । इस प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य है ।
यदि यह मानते हों कि ( प्र ० पहिले पदों से उनके केवल ( इतरानन्वित ) अर्थों का ही स्मरण होता है , उसके बाद स्मरण किये गये अर्थों में से एक दूसरे के साथ अन्वित अपने अर्थ का प्रतिपादन पद ही करते हैं । अतः उक्त अन्योन्याश्रय दोष नहीं है । ( उ ० ) इस उत्तर में भी कुछ सार नहीं है , क्योंकि ( आपके मत से ) दूसरे अर्थ के साथ अनन्वित केवल अपने अर्थ का पद से स्मरण हो हो नहीं सकता , क्योंकि दूसरे पदों के अर्थों के साथ अन्वित अपने अर्थों के साथ ही सभी पदों का सामानाधिकरण्य गृहीत है ।
एवं अनुभव के अनुरूप ही स्मृति की उत्पत्ति होती है ।
( प्र ० ) ( इतरान्वित अर्थ में शक्ति मानने पर भी ) पदों से ( इतरानन्वित ) केवल अर्थ का स्मरण हो सकता है , क्योंकि वृद्धों के व्यवहारों के द्वारा गो शब्द का ककुदादि से युक्त अर्थों के साथ ही अन्वय और व्यतिरेक गृहीत है , उसके साथ अन्वित होनेवाले आनयनादि क्रियाओं के साथ या दण्डादि करणों के साथ नहीं , क्योंकि ककुदादि से युक्त अर्थ में ही उन क्रियाओं या करणादि के न रहने पर भी ( दूसरी क्रियाओं या करप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५६३ णादि के साथ अन्वित होनेवाले ) ककुदादि से युक्त अर्थ को समझाने के लिए गो शब्द का प्रयोग देखा जाता है ।
इस प्रकार सुना गया यह गो शब्द बार बार प्रयुक्त होने से प्राप्त पटुता के कारण ककुदादि से युक्त जिस अर्थ के साथ उसका व्यभिचार कभी उपलब्ध नहीं होता है , केवल उसी अर्थ का स्मरण करा सकता है , क्रियाओं का या करणादि अर्थों का नहीं , क्योंकि उनके साथ गो शब्द का कभी प्रयोग होता है कभी नहीं । ( उ ० ) तब तो समान रूप से अनन्विताभिधानवादी की ही तरह यह कहिए कि " जिस अर्थ को समझाने के लिए जिस शब्द का प्रयोग नियम से होता है , केवल उसी अर्थ में उस शब्द की शक्ति है " ।
दूसरी बात यह है कि जिस प्रकार अनुमान के द्वारा उसी अर्थ का ग्रहण होता है , जिसका साहचर्य हेतु में नियमतः गृहीत होता है । उस प्रकार स्मृति को साहचर्य नियम की अपेक्षा नहीं होती है , क्योंकि वह तो केवल संस्कार से उत्पन्न होनेवाली वस्तु है , अतः साहचर्य के किसी एक सम्बन्धी को देखने पर भी उत्पन्न हो कती है । जैसे कि धूम के देखने से वह्नि का स्मरण होता है , उसी तर वह्नि के आश्रय महानसादि प्रदेशों का भी स्मरण होता है ।
इस प्रकार गो शब्द से ककुदादि से युक्त गोरूप अर्थ का स्मरण यदि इस लिए मानेंगे कि गो शब्द का सामानाधिकरण्य उक्त गो रूप अर्थ के साथ है , तो फिर गो शब्द से कदाचित् ( वह्नि के आश्रयभूत महानसादि की तरह ) गो के आश्रयीभूत गोष्ठादि का भी स्मरण हो सकता है । ' गो पद से नियमतः गोपिण्ड का ही स्मरण हो , इसके लिए किसी भी दूसरी रीति से गो पिण्ड में गो शब्द को शक्ति को हो हेतु मानना पड़ेगा , क्योंकि उस नियम की उपपत्ति किसी दूसरी रीति से सम्भव नहीं है ।
दूसरी यह भी बात है कि जिस प्रकार वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद की शक्ति दूसरे अर्थ में अन्वित स्वार्थ में ही मानने की इच्छा आप लोगों की है , उसी प्रकार यह भी आप लोगों का अभिप्रेत होगा कि पद के शरीर में प्रयुक्त होनेवाले प्रकृति और प्रत्यय रूप दोनों अंशों में से प्रत्येक दूसरे अर्थ के साथ अन्वित हो अपने स्वार्थ का अभिधायक होगा ।
यदि प्रकृति और प्रत्यय ये दोनों ही एक दूसरे के साथ अन्वित अपने अर्थ का प्रतिपादन कर ही देते हैं , तो फिर कौन सा विलक्षण अर्थ समझने को अवशिष्ट रहता है , जिसका स्मरण पीछे पद के द्वारा होता है ? व्यर्थ बातों की यह प्रक्रिया अब यहीं तक रहे ।
अब फिर प्रकृत विषय का अनुसरण करते हैं । ( प्र ० ) मान लिया कि पदों से अर्थों का प्रतिपादन उसी ( अभिहितान्वयवादियों की ) रीति से होता है , किन्तु यह समझ में नहीं आता कि अनुमान ' परार्थ ' किस प्रकार है ? क्योंकि हेतु या पञ्चावयववाक्य जनित हेतु का ज्ञान इन दोनों में से ही कोई ' अनुमान ' है । इनमें से न लिङ्ग ही परार्थ है , न लिङ्ग का ज्ञान हो । यदि यह कहें कि ( उ ० ) उक्त लिङ्ग या लिङ्ग ज्ञान के वाचक ( पञ्चावयव के ) शब्द चूँकि परार्थ हैं ( अर्थात् दूसरे को समझाने के लिए प्रयुक्त होते हैं ) अतः हेतु या हेतुज्ञान रूप अनुमान को भी परार्थ कहा जाता है । ( प्र ० ) तो फिर प्रत्यक्ष के अभिधायक शब्द का भी प्रयोग तो दूसरे को समझाने के लिए ही किया जाता है । अत : प्रत्यक्ष भी ' परार्थ ' होगा । जैसा कहा गया है कि-
( १ ) हेतु का ज्ञान या हेतु इन दोनों से भिन्न कोई अनुमान नहीं हो सकता । इन दोनों की परार्थता न लोक में ही प्रसिद्ध है न वेद में ही ।
( २ ) यदि हेतु के ज्ञापक या हेतु ज्ञान के अभिलापक वाक्य दूसरों को समझाने के लिए प्रयुक्त होते हैं , इस हेतु से लिङ्ग या लिङ्गज्ञान रूप अनुमान परार्थ हैं , तो फिर प्रत्यक्ष प्रमाण के बोधक वाक्य भी तो दूसरों को समझाने के लिए ही प्रयुक्त होते हैं , इस हेतु से ( अनुमान की तरह ) प्रत्यक्ष को भी परार्थ क्यों नहीं मानते ?
In English
Definition of Inference and its Characteristics
This text is a commentary by Prashastapada on the nature of inference (anumāna). It explains how knowledge derived from observing a sign (liṅga) constitutes valid inference, distinguishing it from doubt, error, and memory.
This article answers
- Definition of anumana in prasastapada bhashya?
- Difference between inference and memory in nyaya?
- What is linga in the context of inference?
- Explanation of paksha and vipaksha in logic?