श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

धर्म–आचरण

कर्तव्य और सदाचरण

6 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

तप और विद्या का प्रभाव

तपो विद्या च विप्राणां निःश्रेयसकरे उभे ।

ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥

इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणोंके लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणके साधन हैं । परन्तु यदि ब्राह्मण उद्दण्ड और अन्यायी हो जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं ।

भगवान ने दुर्वासाजी को यह उपदेश दिया।

नवमस्कन्ध, अध्याय 4, श्लोक 70 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 40
ब्राह्मण हत्या का पाप

राज्ञो मूर्धाभिषिक्तस्य वधो ब्रह्मवधाद् गुरुः ।

तीर्थसंसेवया चांहो जह्यंगाच्युतचेतनः ॥

बेटा! सार्वभौम राजाका वध ब्राह्मणकी हत्यासे भी बढ़कर है । जाओ, भगवान्का स्मरण करते हुए तीर्थोंका सेवन करके अपने पापोंको धो डालो ।

नवमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 41 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 135
धर्म और सद्व्यवहार

धर्मेण पालयन्नुर्वीं प्रजाः शीलेन रंजयन् ।

वर्तमानः समः स्वेषु श्रेयः कीर्तिमवाप्स्यसि ॥

आप धर्मसे पृथ्वीका पालन कीजिये । अपने सद्व्यवहारसे प्रजाको प्रसन्न रखिये और अपने स्वजनोंके साथ समान बर्ताव कीजिये । ऐसा करनेसे ही आपको लोकमें यश और परलोकमें सद्गति प्राप्त होगी ।

अक्रूरजी ने महाराज धृतराष्ट्रजी से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 49, श्लोक 18 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 660 नीति–व्यवहार
भगवत-धर्म का उपदेश

धर्मान् भागवतान् ब्रूत यदि नः श्रुतये क्षमम् ।

यैः प्रसन्नः प्रपन्नाय दास्यत्यात्मानमप्यजः ॥

योगीश्वरो! यदि हम सुननेके अधिकारी हों तो आप कृपा करके भागवत-धर्मोंका उपदेश कीजिये; क्योंकि उनसे जन्मादि विकारसे रहित, एकरस भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और उन धर्मोंका पालन करनेवाले शरणागत भक्तोंको अपने-आपतकका दान कर डालते ।

राजा निमि ने नौ योगीश्वरों से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 31 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1054 शरणागति
अनासक्ति और दया का अभ्यास

सर्वतो मनसोऽसंगमादौ संगं च साधुषु ।

दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥

पहले शरीर, सन्तान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखे । फिर भगवान्‌के भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिये — यह सीखे । इसके पश्चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करे ।

योगीश्वरों ने राजा निमि को उत्तर देते हुए कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 23 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1065 वैराग्य
शास्त्रों में श्रद्धा

श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।

मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥

भगवान्की प्राप्तिका मार्ग बतलानेवाले शास्त्रोंमें श्रद्धा और दूसरे किसी भी शास्त्रकी निन्दा न करना, प्राणायामके द्वारा मनका, मौनके द्वारा वाणीका और वासनाहीनताके अभ्याससे कर्मोंका संयम करना, सत्य बोलना, इन्द्रियोंको अपने-अपने गोलकोंमें स्थिर रखना और मनको कहीं बाहर न जाने देना सीखे ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 26 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1065 साधना–योग