श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

धर्म–आचरण

कर्तव्य और सदाचरण

734 पद्य · 13 ग्रन्थ

देवी भागवत — उत्तरार्द्ध

साधक का आहार

श्रौतस्मार्तादिकं कर्म क्रियते मोक्षकाङ्क्षिभिः ।

साग्निकश्च सदाचारो विद्वद्भिश्च सुशिक्षितः ॥

ततः कुर्यात्प्रयत्नेन फलमूलोदकादिभिः ।

भिक्षान्नं शुद्धमश्नीयादष्टौ ग्रासान्स्वयं भुजेत् ॥

मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुष श्रौत और स्मार्त आदि कर्म करते हैं । साधकको फल, मूल तथा जल आदिके आहारपर रहते हुए विद्वानोंके द्वारा सम्यक् शिक्षा प्राप्त करके सदाचारी तथा अग्निहोत्री होकर प्रयत्नपूर्वक जप करना चाहिये । भिक्षामें प्राप्त शुद्ध अन्न ही ग्रहण करे, जिसमें स्वयं मात्र आठ ग्रास ही भोजन करे ।

भगवान् नारायण ने नारदजी से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 21, श्लोक 53-54 देवी भागवत — उत्तरार्द्ध पृ. 756 साधना–योग

महाभारत — खण्ड १

धर्म की महत्ता

सौति उवाच

धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानां ।

स ह्येक एव परलोकगतस्य बन्धुः ॥

अर्थाः स्त्रियश्च निपुणैरपि सेव्यमाना ।

नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ॥

तपस्वी महर्षियो! (तथा महाभारतके पाठको!) आप सब लोग सदा सांसारिक आसक्तियोंसे ऊँचे उठें और आपका मन सदा धर्ममें लगा रहे; क्योंकि परलोकमें गये हुए जीवका बन्धु या सहायक एकमात्र धर्म ही है । चतुर मनुष्य भी धन और स्त्रियोंका सेवन तो करते हैं, किंतु वे उनकी श्रेष्ठतापर विश्वास नहीं करते और न उन्हें स्थिर ही मानते हैं ।

सौतिजी ने अनुक्रमणिका के अन्त में ऋषियों से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 2, श्लोक 391 महाभारत — खण्ड १ पृ. 132 वैराग्य
क्रोध का त्याग

शमीक उवाच

स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् ।

चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ॥

तुम मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें तत्पर होकर जंगली कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए इस क्रोधको मिटाकर उत्तम आचरण करो; ऐसा करनेसे तुम्हारे धर्मकी हानि नहीं होगी ।

शमीक मुनि ने अपने पुत्र शृंगी को समझाते हुए कहा।

आदिपर्व, अध्याय 42, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड १ पृ. 324 काम–क्रोध–लोभ–मोह
क्रोध का विनाशकारी प्रभाव

शमीक उवाच

क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम् ।

ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥

क्रोध प्रयत्नशील साधकोंके अत्यन्त दुःखसे उपार्जित धर्मका नाश कर देता है । फिर धर्महीन मनुष्योंको अभीष्ट गति नहीं मिलती है ।

शमीक मुनि ने अपने पुत्र शृंगी को समझाते हुए कहा।

आदिपर्व, अध्याय 42, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड १ पृ. 324 काम–क्रोध–लोभ–मोह
महाभारत से मोक्षबुद्धि

वैशम्पायन उवाच

अस्मिन्नर्थश्च धर्मश्च निखिलेनोपदिश्यते ।

इतिहासे महापुण्ये बुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ॥

अक्षुद्रान् दानशीलांश्च सत्यशीलाननास्तिकान् ।

कार्ष्णं वेदमिमं विद्वाञ्छ्रावयित्वार्थमश्नुते ॥

इसमें अर्थ और धर्मका भी पूर्णरूपसे उपदेश किया जाता है । इस परम पावन इतिहाससे मोक्षबुद्धि प्राप्त होती है । जिनका स्वभाव अथवा विचार खोटा नहीं है, जो दानशील, सत्यवादी और आस्तिक हैं, ऐसे लोगोंको व्यासद्वारा विरचित वेदस्वरूप इस महाभारतका जो श्रवण कराता है, वह विद्वान् अभीष्ट अर्थको प्राप्त कर लेता है ।

आदिपर्व, अध्याय 62, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड १ पृ. 425 ज्ञान–विवेक

महाभारत — खण्ड १ के सब 62 पद्य

महाभारत — खण्ड २

धर्म के आठ मार्ग

शौनक उवाच

इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः ।

अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥

यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग — ये धर्मके आठ मार्ग हैं ।

शौनकजी ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 75 महाभारत — खण्ड २ पृ. 47 साधना–योग
धर्मनिष्ठ बुद्धि

द्रौपदी उवाच

अनन्या हि नरव्याघ्र नित्यदा धर्ममेव ते ।

बुद्धिः सततमन्वेति च्छायेव पुरुषं निजा ॥

नरश्रेष्ठ! जैसे अपनी छाया सदा मनुष्यके पीछे चलती है, उसी प्रकार आपकी बुद्धि सदा अनन्यभावसे धर्मका ही अनुसरण करती है ।

वनपर्व, अध्याय 30, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड २ पृ. 230
निस्वार्थ धर्मपालन

युधिष्ठिर उवाच

धर्मं चरामि सुश्रोणि न धर्मफलकारणात् ।

आगमाननतिक्रम्य सतां वृत्तमवेक्ष्य च ॥

धर्म एव मनः कृष्णे स्वभावाच्चैव मे धृतम् ।

धर्मवाणिज्यको हीनो जघन्यो धर्मवादिनाम् ॥

सुश्रोणि! मैं धर्मका फल पानेके लोभसे धर्मका आचरण नहीं करता, अपितु साधु पुरुषोंके आचार-व्यवहारको देखकर शास्त्रीय मर्यादाका उल्लंघन न करके स्वभावसे ही मेरा मन धर्मपालनमें लगा है । द्रौपदी! जो मनुष्य कुछ पानेकी इच्छासे धर्मका व्यापार करता है, वह धर्मवादी पुरुषोंकी दृष्टिमें हीन और निन्दनीय है ।

युधिष्ठिर ने द्रौपदी से कहा।

वनपर्व, अध्याय 31, श्लोक 4–5 महाभारत — खण्ड २ पृ. 236
धर्म का निश्चय

युधिष्ठिर उवाच

यस्तु नित्यं कृतमतिर्धर्ममेवाभिपद्यते ।

अशङ्कमानः कल्याणि सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ॥

कल्याणी! जो सदा धर्मके विषयमें पूर्ण निश्चय रखनेवाला है और सब प्रकारकी आशंकाएँ छोड़कर धर्मकी ही शरण लेता है, वह परलोकमें अक्षय अनन्त सुखका भागी होता है अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 31, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड २ पृ. 238

महाभारत — खण्ड २ के सब 92 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

सत्य का पालन

श्रीकृष्ण उवाच

शक्तैर्विजेतुं तरसा महीं च ।

सत्ये स्थितैः सत्यरथैर्यथावत् ।

पाण्डोः सुतैस्तद् व्रतमुग्ररूपं ।

वर्षाणि षट् सप्त च चीर्णमग्र्यैः ॥

पाण्डव सदा सत्यपर आरूढ़ रहते हैं । सत्य ही इनका रथ (आश्रय) है । इनमें वेगपूर्वक समस्त भूमण्डल-को जीत लेनेकी शक्ति है तथापि इन वीराग्रगण्य पाण्डु-कुमारोंने सत्यका खयाल करके तेरह वर्षोंतक वनवास और अज्ञातवासके उस कठोर व्रतका धैर्यपूर्वक पालन किया है, जिसका स्वरूप बड़ा ही उग्र है ।

श्रीकृष्ण ने उपस्थित सुहृद्गणों को सम्बोधित करते हुए पाण्डवों के सत्यनिष्ठ चरित्र और उनके कठिन वनवास व अज्ञातवास का वर्णन किया।

उद्योगपर्व, अध्याय 1, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 27
ब्राह्मण धर्म और सत्यनिष्ठा

बृहस्पति उवाच

नाकार्यं कर्तुमिच्छामि ब्राह्मणः सन् विशेषतः ।

श्रुतधर्मा सत्यशीलो जानन् धर्मानुशासनम् ॥

नाहमेतत् करिष्यामि गच्छध्वं वै सुरोत्तमाः ।

अस्मिंश्चार्थे पुरा गीतं ब्रह्मणा श्रूयतामिदम् ॥

विशेषतः ब्राह्मण होकर मैं यह न करने योग्य कार्य नहीं कर सकता । मैंने धर्मकी बातें सुनी हैं और सत्यको अपने स्वभावमें उतार लिया है । शास्त्रोंमें जो धर्मका उपदेश किया गया है, उसे भी जानता हूँ; अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा! सुरश्रेष्ठगण! आपलोग लौट जायँ। इस विषयमें ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जो गीत गाया था, वह इस प्रकार है, सुनिये ।

बृहस्पति ने देवताओं से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 12, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 106
पाण्डवों का धर्मनिष्ठ आचरण

धृतराष्ट्र उवाच

दोषं ह्येषां नाध्यगच्छं परीच्छन् ।

नित्यं कंचिद् येन गर्हेय पार्थान् ।

धर्मार्थाभ्यां कर्म कुर्वन्ति नित्यं ।

सुखप्रिये नानुरुध्यन्ति कामात् ॥

मैंने सदा ढूँढ़ते रहनेपर भी कुन्तीपुत्रोंका कोई ऐसा दोष नहीं देखा है, जिससे उनकी निन्दा करूँ । वे सदा धर्म और अर्थके लिये ही कर्म करते हैं, कामनावश मानसिक प्रीति और स्त्री-पुत्रादि प्रिय वस्तुओंमें नहीं फँसते हैं-कामभोगमें आसक्त होकर धर्मका परित्याग नहीं करते हैं ।

राजा धृतराष्ट्र ने सभा में सञ्जय को सम्बोधित करते हुए पाण्डवों की प्रशंसा की।

उद्योगपर्व, अध्याय 22, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 155
धर्म की प्रधानता

संजय → तात

धर्मं कृत्वा कर्मणां तात मुख्यं ।

महाप्रतापः सवितेव भाति ।

हीनो हि धर्मेण महीमपीमां ।

लब्ध्वा नरः सीदति पापबुद्धिः ॥

तात! धर्म, अर्थ और काम तीनोंमें धर्मको प्रधान मानकर तदनुसार चलनेवाला पुरुष महाप्रतापी होकर सूर्यकी भाँति चमक उठता है; परंतु जो धर्मसे हीन है और जिसकी बुद्धि पापमें ही लगी हुई है, वह मनुष्य इस सारी पृथ्वीको पाकर भी कष्ट ही भोगता रहता है ।

संजय ने युधिष्ठिर से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 27, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 188

महाभारत — खण्ड ३ के सब 57 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

सदाचार और पुण्य की गति

संजय उवाच

राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती ।

चतुराश्रमिणां पुण्यैः पावितानां सुरक्षितैः ॥

दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् ।

पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

पुत्र! सदाचारके पालनसे राजाओंको तथा सुरक्षित पुण्यके प्रभावसे पवित्र हुए चारों आश्रमोंके लोगोंको जो सनातन गति प्राप्त होती है; दीनोंपर दया करनेवाले, उत्तम वस्तुओंको घरमें बाँटकर उपयोगमें लेनेवाले तथा चुगलीसे दूर रहनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति तुम्हें भी मिले ।

द्रोणपर्व, अध्याय 78, श्लोक 27–28 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 514 नीति–व्यवहार
मित्रता और दान का पुण्य

युधिष्ठिर उवाच

यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत् तनुम् ।

पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात् स समो भवेत् ॥

शैनेय! जो मित्रके लिये युद्ध करते हुए शरीरका त्याग करता है तथा जो ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान कर देता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ।

युधिष्ठिर ने सात्यकि से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 110, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 732 कर्म–प्रारब्ध
कर्ण का धर्म

श्रीवासुदेव उवाच

ब्रह्मण्यः सत्यवादी च तपस्वी नियतव्रतः ।

रिपुष्वपि दयावांश्च तस्मात् कर्णो वृषः स्मृतः ॥

कर्ण ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, तपस्वी, नियम और व्रतका पालक तथा शत्रुओंपर भी दया करनेवाला है; इसीलिये उसे वृष (धर्मात्मा) कहा गया है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 180, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1353
अहिंसा का श्रेष्ठ धर्म

भीमसेन उवाच

अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः ।

तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥

प्राणियोंकी हिंसा न करनेको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना गया है । उसकी जड़ है ब्राह्मण और आप तो उन ब्राह्मणोंमें भी सबसे उत्तम ब्रह्मवेत्ता हैं ।

भीमसेन ने द्रोणाचार्य से युद्ध के अवसर पर कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 192, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1452 ज्ञान–विवेक

महाभारत — खण्ड ४ के सब 30 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

ऋषियों के कर्तव्य

नकुल उवाच

शमो दमस्तथा धैर्यं सत्यं शौचमथार्जवम् ।

यज्ञो धृतिश्च धर्मश्च नित्यमार्षो विधिः स्मृतः ॥

शम, दम, धैर्य, सत्य, शौच, सरलता, यज्ञ, धृति तथा धर्म — इन सबका ऋषियोंके लिये निरन्तर पालन करनेका विधान है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 12, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 93
धर्म के लक्षण

व्यास उवाच

अदत्तस्यानुपादानं दानमध्ययनं तपः ।

अहिंसा सत्यमक्रोध इज्या धर्मस्य लक्षणम् ॥

बिना दी हुई वस्तुको न लेना, दान, अध्ययन और तपमें तत्पर रहना, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, क्रोध त्याग देना और यज्ञ करना — ये सब धर्मके लक्षण हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 36, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 249
लोकहित हेतु त्याग

भीष्म उवाच

यथा हि गर्भिणी हित्वा स्वं प्रियं मनसोऽनुगम् ।

गर्भस्य हितमाधत्ते तथा राज्ञाप्यसंशयम् ॥

वर्तितव्यं कुरुश्रेष्ठ सदा धर्मानुवर्तिना ।

स्वं प्रियं तु परित्यज्य यद् यल्लोकहितं भवेत् ॥

जैसे गर्भवती स्त्री अपने मनको अच्छे लगने वाले प्रिय भोजन आदिका भी परित्याग करके केवल गर्भस्थ बालकके हितका ध्यान रखती है, उसी प्रकार धर्मात्मा राजाको भी चाहिये कि निःसंदेह वैसा ही बर्ताव करे । कुरुश्रेष्ठ! राजा अपनेको प्रिय लगनेवाले विषयका परित्याग करके जिसमें सब लोगोंका हित हो वही कार्य करे ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 56, श्लोक 45–46 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 374 नीति–व्यवहार
धर्म द्वारा परस्पर रक्षा

भीष्म उवाच

न वै राज्यं न राजाऽऽसीन्न च दण्डो न दाण्डिकः ।

धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥

पहले न कोई राज्य था, न राजा, न दण्ड था और न दण्ड देनेवाला, समस्त प्रजा धर्मके द्वारा ही एक-दूसरेकी रक्षा करती थी ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 59, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 390

महाभारत — खण्ड ५ के सब 203 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

अतिथि सत्कार का फल

भीष्म उवाच

अतिथिः पूजितो यद्धि ध्यायते मनसा शुभम् ।

न तत् क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीषिणः ॥

यदि अतिथि पूजित होकर मन-ही-मन गृहस्थके कल्याणका चिन्तन करे तो उससे जो फल मिलता है उसकी सौ यज्ञोंसे भी तुलना नहीं हो सकती अर्थात् सौ यज्ञोंसे भी बढ़कर है । ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 92 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 52
मन के तीन कर्तव्य

भीष्म उवाच

अनभिध्या परस्वेषु सर्वसत्त्वेषु सौहृदम् ।

कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत् ॥

दूसरेके धनको लेनेका उपाय न सोचना, समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखना और कर्मोंका फल अवश्य मिलता है, इस बातपर विश्वास रखना — ये तीन मनसे आचरण करने योग्य कार्य हैं । इन्हें सदा करना चाहिये । (इनके विपरीत दूसरोंके धनका लालच करना, समस्त प्राणियोंसे वैर रखना और कर्मोंके फलपर विश्वास न करना — ये तीन मानसिक पाप हैं — इनसे सदा बचे रहना चाहिये)

अनुशासनपर्व, अध्याय 13, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 135 कर्म–प्रारब्ध
धर्म के लक्षण

भीष्म उवाच

अहिंसा सत्यमक्रोध आनृशंस्यं दमस्तथा ।

आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम् ॥

भीष्मजीने कहा — राजेन्द्र! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, कोमलता, इन्द्रियसंयम और सरलता — ये धर्मके निश्चित लक्षण हैं ।

युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्मजी ने धर्म के लक्षण बताए।

अनुशासनपर्व, अध्याय 22, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 323
स्वर्गगामी पुरुषों के लक्षण

भीष्म उवाच

क्षमावन्तश्च धीराश्च धर्मकार्येषु चोत्थिताः ।

मङ्गलाचारसम्पन्नाः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥

जो क्षमावान्, धीर, धर्मकार्यके लिये उद्यत रहनेवाले और मांगलिक आचारसे सम्पन्न हैं, वे पुरुष भी स्वर्गगामी होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 23, श्लोक 88 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 340

महाभारत — खण्ड ६ के सब 122 पद्य

लिङ्ग महापुराण

अधर्मी मनुष्यों का स्वभाव

न प्रामाण्यं श्रुतेरस्ति नृणां चाधर्मसेवनम् ।

अधार्मिकास्त्वनाचारा महाकोपाल्पचेतसः ॥

लोग वेदोंकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करेंगे तथा अधर्मका आचरण करेंगे । मनुष्य धर्मच्युत होकर अनाचारमें रत रहेंगे और महान् क्रोधी तथा मन्द बुद्धिवाले होंगे ।

नन्दी ने महामुने से कहा।

पूर्वभाग, अध्याय 39, श्लोक 3 लिङ्ग महापुराण पृ. 178

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

राजधर्म और प्रजा रक्षा

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् ।

पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा ॥

प्रजापालक नरेशको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरतारहित, पातकयुक्त अथवा सदोष कर्म भी करना पड़े तो कर लेना चाहिये । यह बात उसे सदा ही ध्यानमें रखनी चाहिये ।

विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 25, श्लोक 18 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 128 नीति–व्यवहार
क्षमा का महान कार्य

क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम् ।

ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम ॥

पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है । यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है । तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादापर ही दृष्टि रखी है-कामभावको अपने मनमें स्थान नहीं दिया है — यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है ।

राजा कुशनाभ ने अपनी कन्याओं से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 6 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 143 नीति–व्यवहार
सज्जन के लक्षण

दृढभक्तिः स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वचः ।

निस्तन्द्रीरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित् ॥

गुरुजनोंके प्रति उनकी दृढ़ भक्ति थी । वे स्थितप्रज्ञ थे और असवस्तुओंको कभी ग्रहण नहीं करते थे । उनके मुखसे कभी दुर्वचन नहीं निकलता था । वे आलस्यरहित, प्रमादशून्य तथा अपने और पराये मनुष्योंके दोषोंको अच्छी प्रकार जाननेवाले थे ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 235 नीति–व्यवहार
श्रीराम के सद्गुण

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः ।

क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः ॥

मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः ।

प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः ॥

श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान्, अदोषदर्शी, शान्त, दीन-दु: खियोंको सान्त्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 31–32 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 239 नीति–व्यवहार

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ के सब 45 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

दया का धर्म

आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव मया श्रुतम् ।

जानामि त्वां महावीर्य महोत्साहं महाबलम् ॥

दया करना सबसे बड़ा धर्म है, यह मैंने आपसे ही सुना है । मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ । आपका बल, पराक्रम और उत्साह महान् है ।

सीता जी ने श्री राम से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 38, श्लोक 39 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 142
धर्म की प्रधानता

त्रिषु चैतेषु यच्छ्रेष्ठं श्रुत्वा तन्नावबुध्यते ।

राजा वा राजमात्रो वा व्यर्थ तस्य बहुश्रुतम् ॥

धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंमें धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः विशेष अवसरोंपर अर्थ और कामकी उपेक्षा करके भी धर्मका ही सेवन करना चाहिये — इस बातको विश्वसनीय पुरुषों-से सुनकर भी जो राजा या राजपुरुष नहीं समझता अथवा समझकर भी स्वीकार नहीं करता, उसका अनेक शास्त्रोंका अध्य व्यर्थ ही है ।

युद्धकाण्ड, अध्याय 63, श्लोक 10 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 428
धर्मनिष्ठों की सामर्थ्य

नहि धर्माभिरतानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥

‘क्योंकि जो धर्म में अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है’

विभीषण ने ब्रह्माजी से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 10, श्लोक 33 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 693 ज्ञान–विवेक
राजधर्म का कर्तव्य

नावसीदन्ति राजानो विप्रवासेषु राघव ।

प्रजा च परिपाल्या हि क्षात्रधर्मेण राघव ॥

रघुकुलभूषण! राजालोग परदेशमें रहनेपर भी दुखी नहीं होते हैं । रघुवीर! राजाको क्षत्रिय धर्मके अनुसार प्रजाका भलीभाँति पालन करना चाहिये ।

श्रीरामचन्द्रजी ने शत्रुघ्न से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 72, श्लोक 14 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 842

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ के सब 20 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

सात्त्विक भक्त की पहचान

कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् ।

यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः ॥

जो व्यक्ति पापोंका क्षय करनेके लिये, परमात्माको अर्पण करनेके लिये और पूजन करना कर्तव्य है — इस बुद्धिसे मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है ।

कपिल ने माता देवहूति से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 29, श्लोक 10 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 631 भक्ति
सच्ची साधुता

श्रीशुकदेव → परीक्षित

प्रतिजग्राह तद्वाढं नारदः साधुसम्मतः ।

एतावान् साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वरः स्वयम् ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित्! संतशिरोमणि देवर्षि नारदने ‘बहुत अच्छा’ कहकर दक्षका शाप स्वीकार कर लिया । संसारमें बस, साधुता इसीका नाम है कि बदला लेनेकी शक्ति रहनेपर भी दूसरेको किया हुआ अपकार सह लिया जाय ।

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 44 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1151
भगवान् के कर्मयोग

तमीहमानं निरहङ्कृतं बुधं ।

निराशिषं पूर्णमनन्यचोदितम् ।

नॄन् शिक्षयन्तं निजवर्त्मसंस्थितं ।

प्रभुं प्रपद्येऽखिलधर्मभावनम् ॥

भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, इसलिये उनमें अहंकारका लेश भी नहीं है । वे सर्वतः परिपूर्ण हैं, इसलिये उन्हें किसी वस्तुकी कामना नहीं है । वे बिना किसीकी प्रेरणाके स्वच्छन्दरूपसे ही कर्म करते हैं । वे अपनी ही बनायी हुई मर्यादामें स्थित रहकर अपने कर्मोंके द्वारा मनुष्योंको शिक्षा देते हैं । वे ही समस्त धर्मोंके प्रवर्तक और उनके जीवनदाता हैं । मैं उन्हीं प्रभुकी शरणमें ।

श्रीशुकदेवजी परीक्षित को उपदेश देते हुए कहते हैं।

अष्टमस्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 16 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1427 ज्ञान–विवेक
असत्य का अधर्म

बलि उवाच

न ह्यसत्यात् परोऽधर्म इति होवाच भूरियम् ।

सर्वं सोढुमलं मन्ये ऋतेऽलीकपरं नरम् ॥

इस पृथ्वीने कहा है कि ‘असत्यसे बढ़कर कोई अधर्म नहीं है । मैं सब कुछ सहनेमें समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्यका भार मुझसे नहीं सहा जाता’

राजा बलि ने शुक्राचार्य जी के प्रति यह कहा।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 20, श्लोक 4 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1575

श्रीमद्भागवत महापुराण — १ के सब 6 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

तप और विद्या का प्रभाव

तपो विद्या च विप्राणां निःश्रेयसकरे उभे ।

ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥

इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणोंके लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणके साधन हैं । परन्तु यदि ब्राह्मण उद्दण्ड और अन्यायी हो जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं ।

भगवान ने दुर्वासाजी को यह उपदेश दिया।

नवमस्कन्ध, अध्याय 4, श्लोक 70 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 40
ब्राह्मण हत्या का पाप

राज्ञो मूर्धाभिषिक्तस्य वधो ब्रह्मवधाद् गुरुः ।

तीर्थसंसेवया चांहो जह्यंगाच्युतचेतनः ॥

बेटा! सार्वभौम राजाका वध ब्राह्मणकी हत्यासे भी बढ़कर है । जाओ, भगवान्का स्मरण करते हुए तीर्थोंका सेवन करके अपने पापोंको धो डालो ।

नवमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 41 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 135
धर्म और सद्व्यवहार

धर्मेण पालयन्नुर्वीं प्रजाः शीलेन रंजयन् ।

वर्तमानः समः स्वेषु श्रेयः कीर्तिमवाप्स्यसि ॥

आप धर्मसे पृथ्वीका पालन कीजिये । अपने सद्व्यवहारसे प्रजाको प्रसन्न रखिये और अपने स्वजनोंके साथ समान बर्ताव कीजिये । ऐसा करनेसे ही आपको लोकमें यश और परलोकमें सद्गति प्राप्त होगी ।

अक्रूरजी ने महाराज धृतराष्ट्रजी से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 49, श्लोक 18 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 660 नीति–व्यवहार
अनासक्ति और दया का अभ्यास

सर्वतो मनसोऽसंगमादौ संगं च साधुषु ।

दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥

पहले शरीर, सन्तान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखे । फिर भगवान्‌के भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिये — यह सीखे । इसके पश्चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करे ।

योगीश्वरों ने राजा निमि को उत्तर देते हुए कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 23 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1065 वैराग्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २ के सब 6 पद्य

श्रीरामचरितमानस

कीर्ति का परोपकारी स्वरूप

कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥

राम सुकीरति भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥

कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गङ्गाजीकी तरह सबका हित करनेवाली हो । श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्ति तो बड़ी सुन्दर (सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है । यह असामञ्जस्य है (अर्थात् इन दोनोंका मेल नहीं मिलता), इसकी मुझे चिन्ता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 14(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 37 नीति–व्यवहार
भक्ति और ज्ञान का स्वरूप

भगति निरूपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥

सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पद रति रस बेद बखाना ॥

नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रियनिग्रह) लताओंके मण्डप हैं । मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है । ऐसा वेदोंने कहा है ।

बालकाण्ड, चौपाई 37.7 श्रीरामचरितमानस पृ. 62 साधना–योग
समर्थ की निर्दोषता

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं । रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥

गङ्गाजीमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता । सूर्य, अग्नि और गङ्गाजीकी भाँति समर्थको कुछ दोष नहीं लगता ।

बालकाण्ड, चौपाई 69.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 89 नीति–व्यवहार
आज्ञा का पालन

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥

तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥

माता, पिता, गुरु और स्वामीकी बातको बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिये । फिर आप तो सब प्रकारसे मेरे परम हितकारी हैं । हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिरपर है ।

शिवजी ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 77.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 95 गुरु महिमा

श्रीरामचरितमानस के सब 89 पद्य

In English

Dharma: Duty and Righteous Conduct

These verses from various texts like the Mahabharata, Ramayana, and Puranas define the characteristics of righteous living. They cover topics such as social duties, the importance of truth and self-control, and the spiritual merits of charity and temple construction.

These verses answer

  • What are the signs of dharma according to manusmriti?
  • Benefits of donating books and knowledge in agni purana?
  • Sins and wrongdoings listed in mahabharata?
  • Duties of a king and a brahmin in mahabharata?
  • Merit of building temples according to agni purana?