श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

भक्ति

प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध

355 पद्य · 11 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड १

परमेश्वर के दिव्य स्वरूप

देवगण उवाच

त्वं महानभिभूः शश्वदमृतं त्वं महद्यशः ।

त्वं प्रभास्त्वमभिप्रेतं त्वं नस्त्राणमनुत्तमम् ॥

आप ही महत्तत्त्व और अहंकार हैं । आप ही सनातन, अमृत और महान् यश हैं । आप ही प्रभा और आप ही अभीष्ट पदार्थ हैं । आप ही हमलोगोंके सर्वोत्तम रक्षक हैं ।

आदिपर्व, अध्याय 23, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड १ पृ. 240
आत्म-प्रशंसा का निषेध

गरुड उवाच

कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्तः स्वबलसंस्तवम् ।

गुणसंकीर्तनं चापि स्वयमेव शतक्रतो ॥

शतक्रतो! साधु पुरुष स्वेच्छासे अपने बलकी स्तुति और अपने ही मुखसे अपने गुणोंका बखान अच्छा नहीं मानते ।

गरुड ने इन्द्र से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 34, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड १ पृ. 287 नीति–व्यवहार
कृष्ण की सर्वोच्चता

भीष्म उवाच

नास्मै देयो ह्यनुनयो नायमर्हति सान्त्वनम् ।

लोकवृद्धतमे कृष्णे योऽर्हणां नाभिमन्यते ॥

भीष्मजीने कहा — धर्मराज! भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्में सबसे बढ़कर हैं । वे ही परम पूजनीय हैं । जो उनकी अग्रपूजा स्वीकार नहीं करता है, उसकी अनुनय-विनय नहीं करनी चाहिये । वह सान्त्वना देने या समझाने-बुझानेके योग्य भी नहीं है ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

सभापर्व, अध्याय 38, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1868 ज्ञान–विवेक

महाभारत — खण्ड २

अनन्य भक्ति का फल

युधिष्ठिर उवाच

न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा ।

ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम् ॥

भगवन्! जो अनन्य चित्तसे आपकी अर्चना और वन्दना करते हैं, उनपर कभी आपत्ति नहीं आती । वे मानसिक चिन्ताओं तथा रोगोंसे भी ग्रस्त नहीं होते ।

वनपर्व, अध्याय 3, श्लोक 65 महाभारत — खण्ड २ पृ. 58
दीन के प्रति करुणा

सुरभि उवाच

यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे ।

दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ॥

सुरभि बोली — देवेन्द्र! यदि मेरे सहस्रों पुत्र हैं, तो मैं उन सबके प्रति समानभाव ही रखती हूँ; परंतु दीन-दुःखी पुत्रके प्रति अधिक दया उमड़ आती है ।

सुरभि ने इन्द्र से कहा।

वनपर्व, अध्याय 9, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड २ पृ. 97 सेवा–करुणा–विनय
यतियों का उपासना

बालमुकुन्द उवाच

यतयः शान्तिपरमा यतात्मानो बुभुत्सवः ।

कामक्रोधद्वेषमुक्ता निःसंगा वीतकल्मषाः ॥

सत्त्वस्था निरहङ्कारा नित्यमध्यात्मकोविदाः ।

मामेव सततं विप्राश्चिन्तयन्त उपासते ॥

शान्तिपरायण, संयमी, जिज्ञासु, काम-क्रोध-द्वेषरहित आसक्तिशून्य, निष्पाप, सात्त्विक, नित्य अहंकारशून्य तथा अध्यात्मज्ञानकुशल यति एवं ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं ।

बालमुकुन्द भगवान् ने मार्कण्डेय मुनि से कहा।

वनपर्व, अध्याय 189, श्लोक 15–16 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1303 साधना–योग
महात्मन् का स्वरूप

मार्कण्डेय उवाच

सूक्ष्मं तपस्तत् परमं त्वमेव ।

परावरज्ञोऽसि परावरस्त्वम् ।

धर्मस्य कामस्य परस्य चैव ।

त्वत्तेजसा कृत्स्नमिदं महात्मन् ॥

जो सर्वोत्कृष्ट सूक्ष्म तप है, वह आप ही हैं। आप ही कार्य-कारण-तत्त्वके ज्ञाता तथा कार्यकारणस्वरूप हैं । धर्म, काम तथा इन दोनोंसे परे जो मोक्षतत्त्व है, उसके भी आप ही ज्ञाता हैं । महात्मन्! यह सम्पूर्ण जगत् आपके तेजसे प्रकाशित होता है ।

वनपर्व, अध्याय 232, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1598 ज्ञान–विवेक
परमेश्वर का स्वरूप

द्रौपदी उवाच

नीलोत्पलदलश्याम पद्मगर्भारुणेक्षण ।

पीताम्बरपरीधान लसत्कौस्तुभभूषण ॥

त्वमादिरन्तो भूतानां त्वमेव च परायणम् ।

परात्परतरं ज्योतिर्विश्वात्मा सर्वतोमुखः ॥

नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर! कमलपुष्पके भीतरी भागके समान किंचित् लाल नेत्रोंवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण! तुम्हारे वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिमय आभूषण शोभा पाता है । प्रभो! तुम्हीं समस्त प्राणियोंके आदि और अन्त हो । तुम्हीं सबके परम आश्रय हो । तुम्हीं परात्पर, ज्योतिर्मय सर्वात्मा एवं सब ओर मुखवाले परमेश्वर हो ।

द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 263, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1760 ज्ञान–विवेक

महाभारत — खण्ड २ के सब 12 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

सत्य और धर्म की विजय

संजय उवाच

यतः सत्यं यतो धर्मो यतो हीरार्जवं यतः ।

ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥

जिस ओर सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता है, उसी ओर भगवान् श्रीकृष्ण रहते हैं और जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 68, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 529 लीला–रहस्य
परमेश्वर के गुण

वैशम्पायन उवाच

यो वै न कामान्न भयान्न लोभान्नार्थकारणात् ।

अन्यायमनुवर्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुपः ॥

धर्मज्ञो धृतिमान् प्राज्ञः सर्वभूतेषु केशवः ।

ईश्वरः सर्वभूतानां देवदेवः सनातनः ॥

जो कभी कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा अन्य किसी प्रयोजनके कारण भी अन्यायका अनुसरण नहीं कर सकते, जिनकी बुद्धि स्थिर है, जो लोभ-रहित, धर्मज्ञ, धैर्यवान्, विद्वान् तथा सम्पूर्ण भूतोंके भीतर विराजमान हैं, वे भगवान् केशव देवताओंके भी देवता, सनातन परमेश्वर तथा समस्त प्राणियोंके ईश्वर हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 83, श्लोक 34–35 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 603 ज्ञान–विवेक
परम भक्त की विशेषता

श्रीभगवान् उवाच

निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ।

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।

मय्यर्पितमनोबुद्धियों मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंकी प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है ± ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1559 सेवा–करुणा–विनय
समत्व बुद्धि का महत्व

श्रीभगवान् उवाच

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है, वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1559 वैराग्य
तपस्या और भक्ति का फल

भीष्म उवाच

तपसा नियतो देवं विधानं सर्वदेहिनाम् ।

ब्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च ।

योगभूतं परिचरन् केशवं महदाप्नुयात् ॥

जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर हो संयम-नियमका पालन करते हुए अमावास्या और पूर्णिमाको समस्त देहधारियोंके आश्रय, ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान् केशवकी आराधना करता है, वह परम पदको प्राप्त कर लेता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 67, श्लोक 19–20 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1911 साधना–योग

महाभारत — खण्ड ३ के सब 14 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

कृष्ण के आदर्श

युधिष्ठिर उवाच

सोऽभिजात्या च भक्त्या च सख्यस्याचार्यकस्य च ।

सौहृदस्य च वीर्यस्य कुलीनत्वस्य माधव ॥

सत्यस्य च महाबाहो अनुकम्पार्थमेव च ।

अनुरूपं महेष्वास कर्म त्वं कर्तुमर्हसि ॥

महाबाहु महाधनुर्धर माधव! वही तुम हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये ही उत्तम कुलमें जन्म-ग्रहण, अर्जुनके प्रति भक्तिभाव, मैत्री, गुरुभाव, सौहार्द, पराक्रम, कुलीनता और सत्यके अनुरूप कर्म करो ।

द्रोणपर्व, अध्याय 110, श्लोक 66–67 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 734 गुरु महिमा
द्रोणाचार्य का योग

संजय उवाच

तथोक्त्वा योगमास्थाय ज्योतिर्भूतो महातपाः ।

पुराणं पुरुषं विष्णुं जगाम मनसा परम् ॥

वे महातपस्वी द्रोण पूर्वोक्त बात कहकर योगका आश्रय ले ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मसे अभिन्नताका अनुभव करते हुए मन-ही-मन सर्वोत्कृष्ट पुराणपुरुष भगवान् विष्णुका ध्यान करने लगे ।

धृष्टद्युम्न के प्रहार के अवसर पर महातपस्वी द्रोण ने योग का आश्रय लेकर भगवान विष्णु का ध्यान किया।

द्रोणपर्व, अध्याय 192, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1454
ब्रह्मज्ञान और भक्ति

अश्वत्थामा उवाच

आत्मानं त्वामात्मनोऽनन्यबोधं ।

विद्वानेवं गच्छति ब्रह्म शुक्रम् ।

अस्तौषं त्वां तव सम्मानमिच्छन् ।

विचिन्वन् वै सदृशं देववर्य ।

सुदुर्लभान् देहि वरान् ममेष्टानभिष्टुतः प्रविकार्षीश्च मायाम् ॥

आप जीवात्मासे अभिन्न अनुभव किये जानेवाले सबके आत्मा हैं, ऐसा जाननेवाला विद्वान् पुरुष विशुद्ध ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। देववर्य! मैंने आपके सत्कारकी शुभ इच्छा लेकर यह स्तवन किया है । स्तुतिके सर्वथा योग्य आप परमेश्वरका मैं चिरकालसे अन्वेषण कर रहा था । जिनकी भलीभाँति स्तुति की गयी है ऐसे आप अपनी मायाको दूर कीजिये और मुझे अभीष्ट दुर्लभ वर प्रदान कीजिये ।

द्रोणकुमार ने नारायण की इस प्रकार स्तुति की।

द्रोणपर्व, अध्याय 201, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1557 ज्ञान–विवेक
ज्ञानस्वरूप ईश्वर की महिमा

व्यास उवाच

ज्ञानात्मानं ज्ञानगम्यं ज्ञानश्रेष्ठं सुदुर्विदम् ।

दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान् वरान् ॥

वे ज्ञानस्वरूप, ज्ञानगम्य तथा ज्ञानमें श्रेष्ठ हैं । उनके स्वरूपको समझ लेना अत्यन्त कठिन है । वे अपने भक्तोंको कृपापूर्वक मनोवांछित उत्तम फल देनेवाले हैं ।

द्रोणपर्व, अध्याय 202, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1565 ज्ञान–विवेक
शिव भक्ति का फल

व्यास उवाच

चरितं महात्मनो नित्यं सांग्रामिकमिदं स्मृतम् ।

पठन् वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः ॥

भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा ।

वरान् कामान् स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः ॥

परमात्मा शिवका यह चरित सदा संग्राममें विजय दिलानेवाला है, जो सदा उद्यत रहकर शतरुद्रियको पढ़ता और सुनता है तथा मनुष्योंमें जो कोई भी निरन्तर भगवान् विश्वेश्वरका भक्तिभावसे भजन करता है, वह उन त्रिलोचनके प्रसन्न होनेपर समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 202, श्लोक 151–152 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1582

महाभारत — खण्ड ४ के सब 8 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

श्रेष्ठ पुरुष का निवास

लक्ष्मी उवाच

धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि ।

प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥

नित्य धर्माचरण करनेवाले, परम बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, विनयी तथा दानशील पुरुषमें भी मैं सदा ही निवास करती हूँ ।

शान्तिपर्व, अध्याय 228, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1510
अनन्य भक्ति का फल

श्रीभगवान् उवाच

ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः ।

एतदभ्यधिकं तेषां यत् ते तं प्रविशन्त्युत ॥

जो सदा उसका स्मरण करते तथा अनन्य भावसे उसकी शरण लेते हैं, उन्हें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वे उसके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ।

भगवान् नारायण ने नारदजी से इस प्रकार कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 334, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2241 शरणागति
नारायण की सर्वोच्चता

ब्रह्मा उवाच

नारायणपरा वेदा यज्ञा नारायणात्मकाः ।

तपो नारायणपरं नारायणपरा गतिः ॥

वेदोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है । यज्ञ नारायणके ही स्वरूप हैं । तपस्याके परम फल भगवान् नारायण ही हैं तथा नारायणकी प्राप्ति ही सर्वोत्तम गति है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 347, श्लोक 81 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2377 ज्ञान–विवेक
अनन्य भक्ति का श्रेष्ठ धर्म

जनमेजय उवाच

नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रियः ।

अगत्वा गतयस्तिस्रो यद् गच्छत्यव्ययं हरिम् ॥

निश्चय ही यह अनन्यभावसे भगवान्का भजनरूप धर्म श्रेष्ठ एवं श्रीनारायणको परम प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेनेवाले भक्तजन उक्त तीन गतियोंको प्राप्त न होकर सीधे चौथी गतिमें पहुँचकर अविनाशी श्रीहरिको प्राप्त कर लेते हैं ।

जनमेजय ने वैशम्पायनजी से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 348, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2380 धर्म–आचरण
अनन्य भक्तों की दुर्लभता

वैशम्पायन उवाच

एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप ।

यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात् कुरुनन्दन ॥

अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतैः ।

भवेत् कृतयुगप्राप्तिराशीःकर्मविवर्जिता ॥

नरेश्वर! भगवान्‌के अनन्य भक्त दुर्लभ हैं, क्योंकि ऐसे पुरुष बहुत नहीं हुआ करते । कुरुनन्दन! यदि सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले, आत्मज्ञानी, अहिंसक एवं अनन्य भक्तोंसे जगत् भर जाय तो यहाँ सर्वत्र सत्ययुग ही छा जाय और कहीं भी सकाम कर्मोंका अनुष्ठान न हो ।

वैशम्पायनजी ने जनमेजय से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 348, श्लोक 62–63 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2387

महाभारत — खण्ड ५ के सब 20 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

शिव भक्ति का महत्त्व

अम्बा उवाच

हरचरणनिरतमतिना ।

भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य ।

संसारभयं न भवति ।

हरभक्तिरसायनं पीत्वा ॥

कुटिल कलिकालको पाकर सभी पुरुषोंको अपना मन भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा देना चाहिये । शिव भक्तिरूपी रसायनके पी लेनेपर संसाररूपी रोगका भय नहीं रह जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 184 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 188 वैराग्य
पापमुक्ति और भक्ति

उपमन्यु उवाच

जन्मकोटिसहस्रेषु नानासंसारयोनिषु ।

जन्तोर्विगतपापस्य भवे भक्तिः प्रजायते ॥

कोटि सहस्र जन्मोंतक नाना प्रकारकी संसारी योनियोंमें भटकते-भटकते जब कोई जीव सर्वथा पापोंसे रहित हो जाता है, तब उसकी भगवान् शिवमें भक्ति होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 17, श्लोक 164 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 270
गङ्गा भक्ति का फल

सिद्ध उवाच

तद्भावस्तद्गतमनास्तन्निष्ठस्तत्परायणः ।

गङ्गां योऽनुगतो भक्त्या स तस्याः प्रियतां व्रजेत् ॥

जो गंगाजीमें श्रद्धा रखता, उन्हींमें मन लगाता, उन्हींके पास रहता, उन्हींका आश्रय लेता तथा भक्तिभावसे उन्हींका अनुसरण करता है वह भगवती भागीरथीका स्नेह-भाजन होता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 26, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 366
अहङ्कारहीनता और भक्ति

भीष्म उवाच

तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते ।

नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मता ।

शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः ॥

किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है । भगवान् नारायण अथवा भगवान् शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है । पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 108, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 967 ज्ञान–विवेक
भक्तों का निर्भय पद

ईश्वर उवाच

भुवनेऽभ्यर्चितो नित्यं देवैरपि सनातनः ।

अभयेनानुरूपेण युज्यन्ते तमनुव्रताः ॥

वे सनातन देवता हैं, अतः इस त्रिभुवनमें देवता भी सदा उन्हींकी पूजा करते हैं । जो उनके अनन्य भक्त हैं, वे अपने भजनके अनुरूप ही निर्भय पद प्राप्त करते हैं ।

महेश्वर ने श्रीकृष्ण के माहात्म्य का वर्णन किया।

अनुशासनपर्व, अध्याय 147, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1406

महाभारत — खण्ड ६ के सब 20 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

रामभक्ति की महिमा

गर्ग उवाच

रामध्यानपराणां च कः समर्थः प्रबाधितुम् ।

रामभक्तिपरो यत्र तत्र ब्रह्मा हरिः शिवः ।

तत्र देवाश्च सिद्धाश्च रामायणपरा नराः ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ध्यानमें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको बाधा पहुँचानेमें कौन समर्थ हो सकता है । जहाँ श्रीरामका भक्त है, वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव विराजमान हैं । वहीं देवता, सिद्ध तथा रामायणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य हैं ।

गर्ग मुनि ने राक्षसराज को रामायण की कथा सुनाते हुए कहा।

उत्तरखण्ड, अध्याय 2, श्लोक 64 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 50 शरणागति
रामायण का माहात्म्य

नारद उवाच

अन्यमासं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः ।

सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् ॥

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषिताम् ।

समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम् ॥

दुःस्वप्ननाशनं धन्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ।

रामायणस्य माहात्म्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः ॥

नारदजी कहते हैं — महर्षियो! अब मैं रामायणके पाठ और श्रवणके लिये उपयोगी दूसरे मासका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ।

नारदजी महर्षियों से कहते हैं।

उत्तरखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 1–3 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 56 वैराग्य
नवाह कथा का महत्व

उत्तङ्क उवाच

चैत्रे मासि सिते पक्षे कथा रामायणस्य च ।

नवाह्ना किल श्रोतव्या भक्तिभावेन सादरम् ।

यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

चैत्रमासके शुक्लपक्षमें तुम्हें भक्तिभावसे आदरपूर्वक रामायणकी नवाह कथा सुननी चाहिये । उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।

उत्तङ्क मुनि ने कलिक व्याध से कहा।

उत्तरखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 35–36 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 58
रामकथा का प्रभाव

नारद उवाच

श्रुत्वा नरो रामकथामतिदीप्तोऽतिभक्तितः ।

ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्रैव परिमोदते ॥

रामकथाको अत्यन्त भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य महान् तेजसे उद्दीप्त हो उठता है और ब्रह्मलोकमें जाकर वहीं आनन्दका अनुभव करता है ।

उत्तरखण्ड, अध्याय 5, श्लोक 37 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 61
सिद्धाश्रम की महिमा

तेनैव पूर्वमाक्रान्त आश्रमः श्रमनाशनः ।

मयापि भक्त्या तस्यैव वामनस्योपभुज्यते ॥

उन्हीं भगवान्ने पूर्वकालमें यहाँ निवास किया था; इसलिये यह आश्रम सब प्रकारके श्रम (दुःख-शोक) का नाश करनेवाला है । उन्हीं भगवान् वामनमें भक्ति होनेके कारण मैं भी इस स्थानको अपने उपयोगमें लाता हूँ ।

विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 29, श्लोक 22 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 136

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ के सब 6 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

परस्पर प्रेम और धर्म

अस्या देव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्ठितम् ।

तेनेयं स च धर्मात्मा मुहूर्तमपि जीवति ॥

इन देवीका मन श्रीरघुनाथजी में और श्रीरघुनाथजीका मन इनमें लगा हुआ है, इसीलिये ये तथा धर्मात्मा श्रीराम जीवित हैं । इनके मुहूर्तमात्र जीवन में भी यही कारण है ।

सीता जी के दर्शन पाकर हनुमान जी ने भगवान श्रीरघनाथजी के प्रति अपनी भावना व्यक्त की।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 15, श्लोक 52 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 81 धर्म–आचरण
श्रीराम के गुण

अर्चिष्मानर्चितोऽत्यर्थ ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ।

साधूनामुपकारशः प्रचारशश्च कर्मणाम् ॥

सर्वत्र अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा होती है । ये कान्तिमान् एवं परम प्रकाशस्वरूप हैं, ब्रह्मचर्य व्रत के पालनमें लगे रहते हैं, साधु पुरुषोंका उपकार मानते और आचरणोंद्वारा सत्कर्मों के प्रचारका ढंग जानते हैं ।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 35, श्लोक 12 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 127 धर्म–आचरण
सीता की धर्मपरायणता

तपसा सत्यवाक्येन अनम्यत्वाच्च भर्तरि ।

असौ विनिर्दहेदग्निं न तामग्निः प्रधक्ष्यति ॥

वे सोचने लगे ‘तपस्या, सत्य भाषण तथा पतिमें अनन्य भक्तिके कारण आर्या सीता ही अग्निको जला सकती हैं, आग उन्हें नहीं जला सकती’

हनुमान्जी ने मन-ही-मन विचार किया।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 55, श्लोक 28 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 189
सीता का अनन्य प्रेम

अनुरक्ता हि वैदेही रामे सर्वात्मना शुभा ।

अनन्यचित्ता रामेण पौलोमीव पुरन्दरे ॥

कल्याणी सीता श्रीराममें सम्पूर्ण हृदयसे अनुरक्त हैं, जैसे शची देवराज इन्द्र में अनन्य प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार सीताका चित्त अनन्यभावसे श्रीरामके ही चिन्तनमें लगा हुआ है ।

हनुमान्जी ने वानरों से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 59, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 211
भक्ति का फल

ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् ।

प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥

‘आप पुराणपुरुषोत्तम हैं । दिव्यरूपधारी परमात्मा हैं । जो लोग आपमें भक्ति रक्खेंगे, वे इस लोक और परलोक में अपने सभी मनोरथ प्राप्त कर लेंगे’

ब्रह्माजी ने श्रीराम की स्तुति करते हुए कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 117, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 628

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ के सब 6 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

कथा का महत्व

कृष्णप्रियं सकलकल्मषनाशनं च ।

मुक्त्येकहेतुमिह भक्तिविलासकारि ॥

सन्तः कथानकमिदं पिबतादरेण ।

लोके हि तीर्थपरिशीलनसेवया किम् ॥

संतजन! आपलोग आदरपूर्वक इस कथामृतका पान कीजिये । यह श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला मुक्तिका एकमात्र कारण और भक्तिको बढ़ानेवाला है । लोकमें अन्य कल्याणकारी साधनोंका विचार करने और तीर्थोंका सेवन करनेसे क्या होगा ।

सूतजी ने सन्तों से यह कहा।

उत्तरखण्ड, अध्याय 6, श्लोक 98 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 152 नाम महिमा
अनन्य आत्मभाव का महत्त्व

अथेह धन्या भगवन्त इत्थं ।

यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे ।

कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं ।

न यत्र भूयः परिवर्त उग्रः ॥

शौनकादि ऋषियो! आपलोग बड़े ही सौभाग्यशाली तथा धन्य हैं जो इस जीवनमें और विघ्न-बाधाओंसे भरे इस संसारमें समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे वह सर्वात्मक आत्मभाव, वह अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं, जिससे फिर इस जन्म-मरणरूप संसारके भयंकर चक्रमें नहीं पड़ना होता ।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 174 शरणागति
महाप्रयाण की पवित्र कथा

यः श्रद्धयैतद् भगवत्प्रियाणां ।

पाण्डोः सुतानामिति सम्प्रयाणम् ।

शृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं ।

लब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम् ॥

भगवान्के प्यारे भक्त पाण्डवोंके महाप्रयाणकी इस परम पवित्र और मंगलमयी कथाको जो पुरुष श्रद्धासे सुनता है, वह निश्चय ही भगवान्की भक्ति और मोक्ष प्राप्त करता है ।

सूतजी शौनकजी से कहते हैं।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 51 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 277
सर्वान्तर्यामी परमात्मा का भजन

स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व ।

आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः ।

तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत ।

नान्यत्र सज्जेद् यत आत्मपातः ॥

जैसे स्वप्न देखनेवाला स्वप्नावस्थामें अपने-आपको ही विविध पदार्थोंके रूपमें देखता है, वैसे ही सबकी बुद्धि-वृत्तियोंके द्वारा सब कुछ अनुभव करनेवाला सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी एक ही है । उन सत्यस्वरूप आनन्दनिधि भगवान्का ही भजन करना चाहिये, अन्य किसी भी वस्तुमें आसक्ति नहीं करनी चाहिये । क्योंकि यह आसक्ति जीवके अधःपतनका हेतु है ।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 322 ज्ञान–विवेक
अहैतुकी भक्ति

श्रीभगवान् उवाच

देवानां गुणलिंगानामानुश्रविककर्मणाम् ।

सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या ।

अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।

जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥

श्रीभगवान्ने कहा — माता! जिसका चित्त एकमात्र भगवान्‌में ही लग गया है, ऐसे मनुष्यकी वेदविहित कर्मोंमें लगी हुई तथा विषयोंका ज्ञान करानेवाली (कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय — दोनों प्रकारकी) इन्द्रियोंकी जो सत्त्वमूर्ति श्रीहरिके प्रति स्वाभाविकी प्रवृत्ति है, वही भगवान्की अहैतुकी भक्ति है । यह मुक्तिसे भी बढ़कर है; क्योंकि जठरानल जिस प्रकार खाये हुए अन्नको पचाता है, उसी प्रकार यह भी कर्मसंस्कारोंके भण्डाररूप लिंगशरीरको तत्काल भस्म कर देती है ।

भगवान् कपिल ने माता देवहूति से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 25, श्लोक 32–33 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 600

श्रीमद्भागवत महापुराण — १ के सब 16 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

भगवान् की भक्ताधीनता

श्रीभगवान् उवाच

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।

साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥

श्रीभगवान्ने कहा — दुर्वासाजी! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ । मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है । मेरे सीधे-सादे सरल भक्तोंने मेरे हृदयको अपने हाथमें कर रखा है । भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे ।

श्रीभगवान् ने दुर्वासाजी से कहा।

नवमस्कन्ध, अध्याय 4, श्लोक 63 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 39
चरण-चिन्तन का महत्व

आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं ।

योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः ॥

संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं ।

गेहञ्जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥

उन्होंने कहा — हे कमलनाभ! अगाधबोध-सम्पन्न बड़े-बड़े योगेश्वर अपने हृदयकमलमें आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं । जो लोग संसारके कुएँमें गिरे हुए हैं, उन्हें उससे निकलनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र अवलम्बन हैं । प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपका वह चरणकमल, घर-गृहस्थके काम करते रहनेपर भी सदा-सर्वदा हमारे हृदयमें विराजमान रहे, हम एक क्षणके लिये भी उसे न भूलें ।

गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 82, श्लोक 49 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 943 शरणागति
उत्तम भगवद्भक्त के लक्षण

न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भवः ।

वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः ॥

जिसके मनमें विषय-भोगकी इच्छा, कर्म-प्रवृत्ति और उनके बीज वासनाओंका उदय नहीं होता और जो एकमात्र भगवान् वासुदेवमें ही निवास करता है, वह उत्तम भगवद्भक्त है ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 50 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1058 वैराग्य
अनन्य भक्ति का फल

स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य ।

त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः ।

विकर्म यच्चोत्पतितं कथंचिद् ।

धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥

जो प्रेमी भक्त अपने प्रियतम भगवान्‌के चरण-कमलोंका अनन्यभावसे — दूसरी भावनाओं, आस्थाओं, वृत्तियों और प्रवृत्तियोंको छोड़कर-भजन करता है, उससे, पहली बात तो यह है कि पापकर्म होते ही नहीं; परन्तु यदि कभी किसी प्रकार हो भी जायँ तो परमपुरुष भगवान् श्रीहरि उसके हृदयमें बैठकर वह सब धो-बहा देते और उसके हृदयको शुद्ध कर देते हैं ।

योगीश्वर करभाजन ने राजा निमि से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 42 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1086
सत्सङ्ग से भक्ति

सत्संगलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता ।

स वै मे दर्शितं सद्भिरंजसा विन्दते पदम् ॥

भक्तिकी प्राप्ति सत्संगसे होती है; जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्निध्यका अनुभव करता है । इस प्रकार जब उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतोंके उपदेशोंके अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपदको — वास्तविक स्वरूपको सहजहीमें प्राप्त हो जाता है ।

श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 25 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1143 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

श्रीमद्भागवत महापुराण — २ के सब 18 पद्य

श्रीरामचरितमानस

रामनाम की महिमा

बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ॥

राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥

श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और ‘राम’ नामके दो सुन्दर अक्षर सावन-भादोंके महीने हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 19 श्रीरामचरितमानस पृ. 43 नाम महिमा
नामजप की महिमा

जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ॥

राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृती चारिउ अनघ उदारा ॥

[संकटसे घबराये हुए] आर्त भक्त नामजप करते हैं तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं । जगत्में चार प्रकारके (- अर्थार्थी-धनादिकी चाहसे भजनेवाले, - आर्त — संकटकी निवृत्तिके लिये भजनेवाले, -जिज्ञासु — भगवान्‌को जाननेकी इच्छासे भजनेवाले, ४-ज्ञानी-भगवान्‌को तत्त्वसे जानकर स्वाभाविक ही प्रेमसे भजनेवाले) रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 22.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 46
नाम की महिमा

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार ॥

कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार ॥

इस प्रकार निर्गुणसे नामका प्रभाव अत्यन्त बड़ा है । अब अपने विचारके अनुसार कहता हूँ कि नाम [सगुण] रामसे भी बड़ा है ।

बालकाण्ड, दोहा 23 श्रीरामचरितमानस पृ. 47 नाम महिमा
श्रीराम की उदारता

प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आप समान ॥

तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥

प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी) तो वृक्षके नीचे और बंदर डालीपर (अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ोंकी शाखाओंपर कूदनेवाले बंदर) । परन्तु ऐसे बंदरोंको भी उन्होंने अपने समान बना लिया । तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 29(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 53 सेवा–करुणा–विनय
मन्त्र और महामणि की महिमा

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥

हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥

विषयरूपी साँपका जहर उतारनेके लिये मन्त्र और महामणि हैं । ये ललाटपर लिखे हुए कठिनतासे मिटनेवाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं । अज्ञानरूपी अन्धकारके हरण करनेके लिये सूर्यकिरणोंके समान और सेवकरूपी धानके पालन करनेमें मेघके समान हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 32(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 57 साधना–योग ज्ञान–विवेक

श्रीरामचरितमानस के सब 232 पद्य

In English

Devotion and Connection to the Divine

These verses from the Agni Purana, Mahābhārata, Valmiki Rāmāyaṇa, Śrīmad Bhāgavata Purāṇa, Devī Bhāgavata, and Rāmacaritmānasa explore the theme of Bhakti. They teach how to perform worship, the importance of sincere love for God, and how devotion protects a person from worldly suffering.

These verses answer

  • How to perform puja and havan according to agni purana?
  • Benefits of bhakti in mahabharata and shrimad bhagavatam?
  • What does valmiki ramayana say about shri ram devotion?
  • How can one attain moksha through devotion?
  • Importance of listening to divine stories in bhagavatam?