श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

सेवा–करुणा–विनय

सेवा, दया और नम्रता

76 पद्य · 10 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड १

क्षमाशीलता का कल्याण

विदुर उवाच

एष वै सर्वकल्याणः समाधिस्तव भारत ।

नैनं शत्रुर्विषहते शक्रेणापि समोऽप्युत ॥

भारत! तुम्हारा यह क्षमाशीलताका नियम सब प्रकारसे कल्याणकारी है । इन्द्रके समान पराक्रमी शत्रु भी इसका सामना नहीं कर सकता ।

सभापर्व, अध्याय 78, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड १ पृ. 2223 धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड २

अतिथि सत्कार

युधिष्ठिर उवाच

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् ।

अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥

अतिथिको नेत्र दे (उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे), मन दे (मनसे हित-चिन्तन करे) तथा मधुर वाणी प्रदान करे (सत्य, प्रिय, हितकी बात कहे) । जब वह जाने लगे तब कुछ दूरतक उसके पीछे-पीछे जाय और जबतक वह घरपर रहे तबतक उसके पास बैठे (उसकी सेवामें लगा रहे) । यह पाँच प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त अतिथि-यज्ञ है ।

युधिष्ठिर ने शौनकजी से कहा।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 61 महाभारत — खण्ड २ पृ. 45
दीन के प्रति करुणा

सुरभि उवाच

यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे ।

दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ॥

सुरभि बोली — देवेन्द्र! यदि मेरे सहस्रों पुत्र हैं, तो मैं उन सबके प्रति समानभाव ही रखती हूँ; परंतु दीन-दुःखी पुत्रके प्रति अधिक दया उमड़ आती है ।

सुरभि ने इन्द्र से कहा।

वनपर्व, अध्याय 9, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड २ पृ. 97 भक्ति
दया का महत्त्व

दमयन्ती उवाच

तत् कुरुष्व नरव्याघ्र दयां मयि नरर्षभ ।

आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतः ॥

‘नरव्याघ्र! नरोत्तम! मुझपर दया करो। मैंने तुम्हारे ही मुखसे सुन रखा है कि दयालुता सबसे बड़ा धर्म है’

दमयन्ती ने नल के लिए यह सन्देश ब्राह्मणों के हाथ भेजा।

वनपर्व, अध्याय 69, श्लोक 43 महाभारत — खण्ड २ पृ. 499
शरणगत की रक्षा

उशीनर उवाच

प्रस्पन्दमानः सम्भ्रान्तः कपोतः श्येन लक्ष्यते ।

मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हितः ॥

यो हि कश्चिद् द्विजान् हन्याद् गां वा लोकस्य मातरम् ।

शरणागतं च त्यजते तुल्यं तेषां हि पातकम् ॥

बाज! देखो तो यह बेचारा कबूतर किस प्रकार भयसे व्याकुल हो थर-थर काँप रहा है । इसने अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये ही मेरी शरण ली है । ऐसी दशामें इसे त्याग देना बड़ी ही निन्दाकी बात है । जो मनुष्य ब्राह्मणोंकी हत्या करता है, जो जगन्माता गौका वध करता है तथा जो शरणमें आये हुए को त्याग देता है, इन तीनोंको समान पाप लगता है ।

राजा उशीनर ने बाज से कहा।

वनपर्व, अध्याय 131, श्लोक 5–6 महाभारत — खण्ड २ पृ. 889
ब्राह्मणों की सेवा

वामदेव → राजन

नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति ।

वाचा राजन् मनसा कर्मणा वा ।

यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वांस्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥

वामदेवने कहा — राजन्! मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा कोई भी अनुशासन या दण्ड ब्राह्मणोंपर लागू नहीं हो सकता । जो इस प्रकार जानकर कष्टसहनपूर्वक ब्राह्मणकी सेवा करता है; वह उस ब्राह्मणसेवारूप कर्मसे ही श्रेष्ठ होता और जीवित रहता है ।

वामदेव ने राजा से कहा।

वनपर्व, अध्याय 192, श्लोक 56 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1339 धर्म–आचरण
पातिव्रत धर्म का पालन

द्रौपदी उवाच

अहंकारं विहायाहं कामक्रोधौ च सर्वदा ।

सदारान् पाण्डवान् नित्यं प्रयतोपचराम्यहम् ॥

मैं अहंकार और काम-क्रोधको छोड़कर सदा पूरी सावधानीके साथ सब पाण्डवोंकी और उनकी अन्यान्य स्त्रियोंकी भी सेवा करती हूँ ।

द्रौपदी ने सत्यभामा से कहा।

वनपर्व, अध्याय 233, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1604 काम–क्रोध–लोभ–मोह

महाभारत — खण्ड २ के सब 9 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

योग्य सेवक का चयन

विदुर उवाच

अभिप्रायं यो विदित्वा तु भर्तुः ।

सर्वाणि कार्याणि करोत्यतन्द्री ।

वक्ता हितानामनुरक्त आर्यः ।

शक्तिज्ञ आत्मेव हि सोऽनुकम्प्यः ॥

जो सेवक स्वामीके अभिप्रायको समझकर आलस्यरहित हो समस्त कार्योंको पूरा करता है, जो हितकी बात कहनेवाला, स्वामिभक्त, सज्जन और राजाकी शक्तिको जाननेवाला है, उसे अपने समान समझकर उसपर कृपा करनी चाहिये ।

उद्योगपर्व, अध्याय 37, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 307
युधिष्ठिर के सद्गुण

संजय उवाच

मायोपधः प्रणिपातार्जवाभ्यां ।

तपोदमाभ्यां धर्मगुप्त्या बलेन ।

सत्यं ब्रुवन् प्रतिपन्नो नृपो नस्तितिक्षमाणः क्लिश्यमानोऽतिवेलम् ॥

हमारे महाराज युधिष्ठिर नम्रता, सरलता, तप, इन्द्रिय-संयम, धर्मरक्षा और बल — इन सभी गुणोंसे सम्पन्न हैं । वे बहुत दिनोंसे अनेक प्रकारके क्लेश उठाते हुए भी सदा सत्य ही बोलते हैं तथा कौरवोंके कपटपूर्ण व्यवहारों तथा वचनोंको सहन करते रहते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 48, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 395 धर्म–आचरण
भाई-बन्धुत्व के कर्तव्य

विदुर उवाच

सम्भोजनं संकथनं सम्प्रश्नोऽथ समागमः ।

एतानि ज्ञातिकार्याणि न विरोधः कदाचन ॥

साथ बैठकर भोजन करना, आपसमें प्रेमसे वार्तालाप करना, एक-दूसरेके सुख-दुःखको पूछना और सदा मिलते-जुलते रहना — ये ही भाई-बन्धुओंके काम हैं, परस्पर विरोध करना कदापि उचित नहीं है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 64, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 516 नीति–व्यवहार
परम भक्त की विशेषता

श्रीभगवान् उवाच

निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ।

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।

मय्यर्पितमनोबुद्धियों मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंकी प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है ± ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1559 भक्ति

महाभारत — खण्ड ५

क्षत्रधर्म के कर्तव्य

इन्द्र उवाच

आत्मत्यागः सर्वभूतानुकम्पा ।

लोकज्ञानं पालनं मोक्षणं च ।

विषण्णानां मोक्षणं पीडितानां ।

क्षात्रे धर्मे विद्यते पार्थिवानाम् ॥

युद्धमें अपने शरीरकी आहुति देना, समस्त प्राणियोंपर दया करना, लोकव्यवहारका ज्ञान प्राप्त करना, प्रजाकी रक्षा करना, विषादग्रस्त एवं पीड़ित मनुष्योंको दुःख और कष्टसे छुड़ाना — ये सब बातें राजाओंके क्षात्रधर्ममें ही विद्यमान हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 64, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 439 धर्म–आचरण
रक्षक का सम्मान

भीष्म उवाच

यमाश्रित्य नरा राजन् वर्तयेयुर्यथासुखम् ।

अनाथास्तप्यमानाश्च दस्युभिः परिपीडिताः ॥

तमेव पूजयेयुस्ते प्रीत्या स्वमिव बान्धवम् ।

अभीरभीक्ष्णं कौरव्य कर्ता सन्मानमर्हति ॥

डाकुओंसे पीड़ित होकर कष्ट पाते हुए अनाथ मनुष्यगण जिसकी शरणमें जाकर सुखपूर्वक रह सकें, उसीको अपने बन्धु-वान्धवके समान मानकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसका आदर-सत्कार करना उनके लिये उचित है; क्योंकि कुरुनन्दन! जो निर्भय होकर बारंबार दूसरोंका संकट निवारण कर सके, वही राजोचित सम्मान पानेके योग्य है ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 78, श्लोक 39–40 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 536 नीति–व्यवहार
जाति-बन्धुओं का सम्मान

भीष्म उवाच

सम्मानयेत् पूजयेच्च वाचा नित्यं च कर्मणा ।

कुर्याच्च प्रियमेतेभ्यो नाप्रियं किञ्चिदाचरेत् ॥

राजाका कर्तव्य है कि वह सदा अपने जातीय बन्धुओंका वाणी और क्रियाद्वारा आदर-सत्कार करे । वह प्रतिदिन उनका प्रिय ही करता रहे । कभी कोई अप्रिय कार्य न करे ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 80, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 546 नीति–व्यवहार
शील का स्वरूप

धृतराष्ट्र उवाच

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।

अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ॥

मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दया करना और यथाशक्ति दान देना — यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं ।

धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को शील के स्वरूप और उसे पाने के उपाय के विषय में बताया।

शान्तिपर्व, अध्याय 124, श्लोक 66 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 827 नीति–व्यवहार
तप और माता-पिता की सेवा

यम → ब्रह्मन

तपः शौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च ।

मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा ॥

यमराजने कहा — ब्रह्मन्! मनुष्य तप करे, बाहर-भीतरसे पवित्र रहे और सदा सत्यभाषणरूप धर्मके पालनमें तत्पर रहे । यह सब करते हुए ही उसे नित्यप्रति माता-पिताकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ।

यमराज ने ऋषि गौतम को धर्मचर्चा के अवसर पर माता-पिता के ऋण से मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 129, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 845 धर्म–आचरण
समानता और सत्कर्म

पराशर → राजन

दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो ।

भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत् ।

गरीयसः पूजयेदात्मशक्त्या ।

सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ॥

राजन्! प्रत्येक पुरुषको इन्द्रियसंयमी और धर्मात्मा होकर समस्त प्राणियोंको अपने ही समान समझना चाहिये । जो विद्या, तप और अवस्थामें अपनेसे बड़े हों अथवा गुरु-कोटिके लोग हों, उन सबकी यथाशक्ति पूजा करनी चाहिये। सत्यभाषण और अच्छे आचार-विचारसे ही सुख मिलता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 291, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1922 धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड ५ के सब 18 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

दया का महत्व

भीष्म उवाच

अनुक्रोशो हि साधूनां महद्धर्मस्य लक्षणम् ।

अनुक्रोशश्च साधूनां सदा प्रीतिं प्रयच्छति ॥

श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये दूसरोंपर दया करना ही महान् धर्मका सूचक है । दयाभाव श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा ही आनन्द प्रदान करता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 5, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 79
परोपकारी एवं मृदु स्वभाव

भीष्म उवाच

अपराधिषु सस्नेहा मृदवो मृदुवत्सलाः ।

आराधनसुखाश्चापि पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥

जो अपराधियोंके प्रति भी दया रखते हैं, जिनका स्वभाव मृदुल होता है, जो मृदुल स्वभाववाले व्यक्तियोंपर प्रेम रखते हैं तथा जिन्हें दूसरोंकी आराधना (सेवा) करनेमें ही सुख मिलता है, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 23, श्लोक 95 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 341
दया का महत्व

भीष्म उवाच

आनृशंस्यं परो धर्म इति तस्मै प्रदीयते ।

यत्र तत्र समुत्पन्नं गुणायैवोपपद्यते ॥

दया सबसे बड़ा धर्म है । यह समझकर ही उसे धनका भाग दिया जाता है । दया जहाँ भी उत्पन्न हो, वह गुणकारक ही होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 47, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 485
शत्रु पर दया

भीष्म उवाच

अमित्रमपि चेद् दीनं शरणैषिणमागतम् ।

व्यसने योऽनुगृह्णाति स वै पुरुषसत्तमः ॥

शत्रु भी यदि दीन होकर शरण पानेकी इच्छासे घरपर आ जाय तो संकटके समय जो उसपर दया करता है, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 59, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 567
गुरुशुश्रूषा का फल

भीष्म → राजन

शुश्रूषते यः पितरं न चासूयेत् कदाचन ।

मातरं भ्रातरं वापि गुरुमाचार्यमेव च ॥

तस्य राजन् फलं विद्धि स्वर्लोके स्थानमर्चितम् ।

न च पश्येत नरकं गुरुशुश्रूषयाऽऽत्मवान् ॥

राजन्! जो पिता-माता, बड़े भाई, गुरु और आचार्यकी सेवा करता है और कभी उनके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं करता है, उसको मिलनेवाले फलको जान लो । उसे स्वर्गलोकमें सर्वसम्मानित स्थान प्राप्त होता है । मनको वशमें रखनेवाला वह पुरुष गुरुशुश्रूषाके प्रभावसे कभी नरकका दर्शन नहीं करता ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 75, श्लोक 40–41 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 673
श्रेष्ठ पुरुषों का बर्ताव

ब्राह्मण उवाच

दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तं ब्रह्मधारणम् ।

दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम् ॥

संयमाश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम् ।

व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि ॥

मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् ।

गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः ॥

प्रवर्तनं शुभानां च तत् सतां वृत्तमुच्यते ।

ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वतीः ॥

दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना — यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है । इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है ।

सिद्ध ब्राह्मण ने काश्यप से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 18, श्लोक 15–18 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1667 धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड ६ के सब 10 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

प्रजा का रञ्जन

अमात्यप्रभृतीः सर्वाः प्रजाश्चैवानुरञ्जय ।

कोष्ठागारायुधागारैः कृत्वा संनिचयान् बहून् ॥

इष्टानुरक्तप्रकृतिर्यः पालयति मेदिनीम् ।

तस्य नन्दन्ति मित्राणि लब्ध्वामृतमिवामराः ॥

मन्त्री, सेनापति आदि समस्त अधिकारियों तथा प्रजाजनोंको सदा प्रसन्न रखना । जो राजा कोष्ठागार (भण्डारगृह) तथा शस्त्रागार आदिके द्वारा उपयोगी वस्तुओंका बहुत बड़ा संग्रह करके मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंको प्रिय मानकर उन्हें अपने प्रति अनुरक्त एवं प्रसन्न रखते हुए पृथ्वीका पालन करता है, उसके मित्र उसी प्रकार आनन्दित होते हैं, जैसे अमृतको पाकर देवता प्रसन्न हुए थे ।

राजा दशरथ ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 3, श्लोक 44–45 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 244 नीति–व्यवहार
पितृसेवा का महत्त्व

न सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणाः ।

तथा बलकराः सीते यथा सेवा पितुर्मता ॥

सीते! पिताकी सेवा करना कल्याणकी प्राप्तिका जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञ ही हैं ।

श्रीराम ने सीता से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 30, श्लोक 35 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 332 धर्म–आचरण
माता के प्रति आदर

कामा वा तात लोभाद् वा मात्रा तुभ्यमिदं कृतम् ।

न तन्मनसि कर्तव्यं वर्तितव्यं च मातृवत् ॥

‘तात! माता कैकेयीने कामनासे अथवा लोभवश तुम्हारे लिये जो कुछ किया है, उसको मनमें न लाना और उसके प्रति सदा वैसा ही बर्ताव करना जैसा अपनी पूजनीया माताके प्रति करना उचित है’

श्रीराम ने भरत से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 112, श्लोक 19 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 547
मन्त्री का कर्तव्य

सम्पृष्टेन तु वक्तव्यं सचिवेन विपश्चिता ।

ॐॐॐ ।

उद्यताञ्जलिना राज्ञो य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥

जो अपना कल्याण चाहता हो, उस बुद्धिमान् मन्त्रीको उचित है कि वह राजासे उसके पूछनेपर ही अपना अभिप्राय प्रकट करे और वह भी हाथ जोड़कर नम्रताके साथ ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 40, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 659 नीति–व्यवहार
परम शरण और राजधर्म

युक्तदण्डा हि मृदवः प्रशान्ता वसुधाधिपाः ।

सदा त्वं सर्वभूतानां शरण्यः परमा गतिः ॥

क्योंकि राजालोग अपराधके अनुसार ही उचित दण्ड देनेवाले, कोमल स्वभाववाले और शान्त होते हैं । आप तो सदा ही समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले तथा उनकी परम गति हैं ।

लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 65, श्लोक 10 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 725 धर्म–आचरण

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

अहङ्कार का त्याग

नाशापयितुमीशोऽहं युवराजोऽस्मि यद्यपि ।

अयुक्तं कृतकर्माणो यूयं धर्षयितुं बलात् ॥

‘यद्यपि मैं युवराज हूँ तो भी आपलोगोंपर हुक्म नहीं चला सकता । आपलोग बहुत बड़ा कार्य पूरा करके आये हैं, अतः बलपूर्वक आपपर शासन चलाना कदापि उचित नहीं है’

अङ्गद ने वानरों से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 64, श्लोक 17 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 221 नीति–व्यवहार
राम सेवा का महत्त्व

रामं शुश्रूष भद्रं ते सुमित्रानन्दवर्धन ।

रामः सर्वस्य लोकस्य हितेष्वभिरतः सदा ॥

सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण! तुम्हारा कल्याण हो । तुम श्रीरामकी निरन्तर सेवा करते रहो । ये श्रीराम सदा सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर रहते हैं ।

राजा दशरथ ने लक्ष्मण से कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 119, श्लोक 30 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 632

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

दया और सौहृद

तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।

आसुरं भावमुन्मुच्य यया तुष्यत्यधोक्षजः ॥

इसलिये तुमलोग अपने दैत्यपनेका, आसुरी सम्पत्तिका त्याग करके समस्त प्राणियोंपर दया करो । प्रेमसे उनकी भलाई करो । इसीसे भगवान् प्रसन्न होते हैं ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 24 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1324 धर्म–आचरण
अतिथि सत्कार और दान

दक्षिण गुरवे दद्यादृत्विग्भ्यश्च यथार्हतः ।

अन्नाद्येनाश्वपाकांश्च प्रीणयेत्समुपागतान् ॥

भुक्तवत्सु च सर्वेषु दीनान्धकृपणेषु च ।

विष्णोस्तत्प्रीणनं विद्वान्भुञ्जीत सह बन्धुभिः ॥

गुरु और ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणा देनी चाहिये । जो चाण्डाल आदि अपने-आप वहाँ आ गये हों, उन सभीको तथा दीन, अंधे और असमर्थ पुरुषोंको भी अन्न आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये । जब सब लोग खा चुकें, तब उन सबके सत्कारको भगवान्की प्रसन्नताका साधन समझते हुए अपने भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे ।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 16, श्लोक 55–56 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1551 धर्म–आचरण

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

परोपकारी जीवन की सफलता

एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।

प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा ॥

मेरे प्यारे मित्रो! संसारमें प्राणी तो बहुत हैं; परन्तु उनके जीवनकी सफलता इतनेमें ही है कि जहाँतक हो सके अपने धनसे, विवेक-विचारसे, वाणीसे और प्राणोंसे भी ऐसे ही कर्म किये जायँ, जिनसे दूसरोंकी भलाई हो ।

श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 22, श्लोक 35 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 426 नीति–व्यवहार

श्रीरामचरितमानस

श्रीराम की उदारता

प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आप समान ॥

तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥

प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी) तो वृक्षके नीचे और बंदर डालीपर (अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ोंकी शाखाओंपर कूदनेवाले बंदर) । परन्तु ऐसे बंदरोंको भी उन्होंने अपने समान बना लिया । तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 29(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 53 भक्ति
भक्ति और विनय का फल

बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥

सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ । बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ॥

सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहि मन कामना तुम्हारी ॥

नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ॥

गिरिजाजी सीताजीके विनय और प्रेमके वशमें हो गयीं । उन (के गले) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुसकरायी । सीताजीने आदरपूर्वक उस प्रसाद (माला) को सिरपर धारण किया । गौरीजीका हृदय हर्षसे भर गया और वे बोलीं, हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मन:कामना पूरी होगी । नारदजीका वचन सदा पवित्र (संशय, भ्रम आदि दोषोंसे रहित) और सत्य है । जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा ।

पुष्पवाटिका में गौरी-पूजन के समय सीताजी की विनय से प्रसन्न होकर गिरिजाजी ने आशीर्वाद दिया।

बालकाण्ड, चौपाई 236.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 233 भक्ति
सगे-सम्बन्धियों की सेवा

गुरपितु मातु बंधु सुर साईं । सेइअहिं सकल प्रान की नाईं ॥

रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही के ॥

गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राणके समान करनी चाहिये । फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणोंके भी प्रिय हैं, हृदयके भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं ।

सुमित्राजी ने वन जाते लक्ष्मणजी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 75.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 407 धर्म–आचरण
सेवाधर्म की कठिनता

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । सेवाधरमु कठिन जगु जाना ॥

स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू । बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू ॥

वेद, शास्त्र और पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है । स्वामिधर्ममें (स्वामीके प्रति कर्तव्यपालनमें) और स्वार्थमें विरोध है (दोनों एक साथ नहीं निभ सकते) । वैर अंधा होता है और प्रेमको ज्ञान नहीं रहता [मैं स्वार्थवश कहूँगा या प्रेमवश, दोनोंमें ही भूल होनेका भय है] ।

भरतजी ने समाज के सम्मुख श्री रामचन्द्रजी से यह वचन कहे।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 293.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 591 नीति–व्यवहार
निस्वार्थ स्वामी सेवा

सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥

अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा ॥

वह रुचि है — कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना । और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है । हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय ।

भरतजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी से यह विनती की।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 301.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 597 भक्ति
परहित का फल

परहित बस जिन्ह के मन माहीं । तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

तनु तजि तात जाहु मम धामा । देउँ काह तुम्ह पूरनकामा ॥

जिनके मनमें दूसरेका हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिये जगत्में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है । हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाममें जाइये । मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)

श्रीरामचन्द्रजी ने जटायु से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 31.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 665 धर्म–आचरण

श्रीरामचरितमानस के सब 24 पद्य

In English

Service, Compassion, and Humility

These verses from the Agni Purana, Mahabharata, Valmiki Ramayana, Shrimad Bhagavata Purana, and Ramcharitmanas describe the virtues of kindness and service. They teach that one should show compassion to all living beings, respect guests and elders, and act with humility toward others.

These verses answer

  • How should a person treat guests and elders?
  • What are the duties of a righteous king or leader?
  • Why is showing compassion to those seeking refuge important?
  • What qualities define a virtuous and noble person?
  • How can one show kindness to the poor and needy?