श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

सत्सङ्ग–सन्त महिमा

सङ्ग का प्रभाव और सन्त-स्वभाव

72 पद्य · 8 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड १

धर्म में स्थिर बुद्धि

दास्यामि हि वरं तेऽद्य प्रीतिर्मे परमा त्वयि ।

दिष्ट्या बुद्धिश्च ते धर्मे निविष्टा पन्नगोत्तम ।

भूयो भूयश्च ते बुद्धिर्धर्मे भवतु सुस्थिरा ॥

‘तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम है; अतः आज मैं तुम्हें अवश्य वर दूँगा । पन्नगोत्तम! यह सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारी बुद्धि धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगी हुई है । मैं भी आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारी बुद्धि उत्तरोत्तर धर्ममें स्थिर रहे’

ब्रह्माजी ने शेषजी से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 36, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड १ पृ. 297 धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड २

सत्सङ्ग का प्रभाव

वैशम्पायन उवाच

येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च ।

ते सेव्यास्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी ॥

निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु ।

पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात् ॥

जिन पुरुषोंके विद्या, जाति और कर्म — ये तीनों उज्ज्वल हों, उनका सेवन करना चाहिये; क्योंकि उन महापुरुषोंके साथ बैठना शास्त्रोंके स्वाध्यायसे भी बढ़कर है । हमलोग अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करते, तो भी पुण्यात्मा साधुपुरुषोंके समुदायमें रहनेसे हमें पुण्यकी ही प्राप्ति होगी । इसी प्रकार पापीजनोंके सेवनसे हम पापके ही भागी होंगे ।

वनपर्व, अध्याय 1, श्लोक 27–28 महाभारत — खण्ड २ पृ. 32
नगर की वास्तविक परिभाषा

मार्कण्डेय → राजन

वेदाढ्या वृत्तसम्पन्ना ज्ञानवन्तस्तपस्विनः ।

यत्र तिष्ठन्ति वै विप्रास्तन्नाम नगरं नृप ॥

राजन्! वेदज्ञ, सदाचारी, ज्ञानी और तपस्वी ब्राह्मण जहाँ निवास करते हों, उसीका नाम नगर है ।

मार्कण्डेयजी ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 200, श्लोक 91 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1387
श्रेष्ठ सङ्ग का प्रभाव

व्याध उवाच

पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु ।

यस्त्वेतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥

कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते ।

तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धर्मेषु राजते ॥

इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है । अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो । जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है । अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है ।

धर्मव्याध ने ब्राह्मण को धर्म की प्राप्ति के विषय में बताया।

वनपर्व, अध्याय 210, श्लोक 11–12 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1465 ज्ञान–विवेक
धर्मोपदेश की प्रशंसा

युधिष्ठिर → ब्रह्मन

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् धर्माख्यानमनुत्तमम् ।

सर्वधर्मविदां श्रेष्ठ कथितं मुनिसत्तम ॥

युधिष्ठिर बोले — ब्रह्मन्! आपने धर्मके विषयमें यह अत्यन्त अद्भुत और उत्तम उपाख्यान सुनाया है । मुनिवर! आप समस्त धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं ।

युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय मुनि से धर्म के विषय में अद्भुत उपाख्यान सुनने के बाद उनसे कहा।

वनपर्व, अध्याय 216, श्लोक 36 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1502
सत्पुरुष सङ्ग की महिमा

सावित्री उवाच

सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं ।

ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते ।

न चाफलं सत्पुरुषेण सङ्गतं ।

ततः सतां सन्निवसेत् समागमे ॥

सत्पुरुषोंका एक बारका समागम भी अत्यन्त अभीष्ट होता है । उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर बताया गया है । साधु पुरुषका संग कभी निष्फल नहीं होता; अतः सदा सत्पुरुषोंके ही समीप रहना चाहिये ।

सावित्री ने यमराज से कहा।

वनपर्व, अध्याय 297, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1991
सन्तों पर विश्वास

सावित्री उवाच

आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः ।

तस्मात् सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणयमिच्छति ॥

मनुष्यको अपने-आपपर भी उतना विश्वास नहीं होता है, जितना संतोंपर होता है । इसलिये सब लोग संतोंसे विशेष प्रेम करना चाहते हैं ।

सावित्री ने यमराज से कहा।

वनपर्व, अध्याय 297, श्लोक 42 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1994
सत्पुरुषों की धर्मनिष्ठता

सावित्री उवाच

सतां सदा शाश्वतधर्मवृत्तिः ।

सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति ।

सतां सद्भिर्नाफलः सङ्गमोऽस्ति ।

सद्भयो भयं नानुवर्तन्ति सन्तः ॥

सावित्रीने कहा — सत्पुरुषोंकी वृत्ति निरन्तर धर्ममें ही लगी रहती है । श्रेष्ठ पुरुष कभी दुःखी या व्यथित नहीं होते । सत्पुरुषोंका संतोंके साथ जो समागम होता है, वह कभी निष्फल नहीं होता है । श्रेष्ठ पुरुष संतोंसे कभी भय नहीं मानते हैं ।

सावित्री ने यमराज से कहा।

वनपर्व, अध्याय 297, श्लोक 47 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1995
सत्पुरुषों की महिमा

सावित्री उवाच

न च प्रसादः सत्पुरुषेषु मोघो ।

न चाप्यर्थो नश्यति नापि मानः ।

यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं ।

तस्मात् सन्तो रक्षितारो भवन्ति ॥

सत्पुरुषोंका प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं जाता । वहाँ किसीको स्वार्थकी हानि नहीं उठानी पड़ती है और न मान-सम्मान ही नष्ट होता है । ये तीनों (प्रसाद, अर्थ और मान) संतोंमें नित्य-निरन्तर बने रहते हैं; इसलिये वे सम्पूर्ण जगत्के रक्षक होते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 297, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1996 धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड २ के सब 9 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

सज्जनों का सङ्ग

ऋषिगण उवाच

दृढं सतां संगतं चापि नित्यं ।

ब्रूयाच्चार्थं ह्यर्थकृच्छ्रेषु धीरः ।

महार्थवत् सत्पुरुषेण संगतं ।

तस्मात् सन्तं न जिघांसेत धीरः ॥

सज्जनोंका रंग सुदृढ़ एवं चिरस्थायी होता है । धीर संत-महात्मा संकटके समय हितकर कर्तव्यका ही उपदेश देते हैं । साधु पुरुषोंका संग महान् अभीष्ट वस्तुओंका साधक होता है । अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह सज्जनोंको नष्ट करनेकी इच्छा न करे ।

ऋषियों ने वृत्रासुर से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 10, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 93
दुष्टों का सङ्ग

विदुर उवाच

असंत्यागात् पापकृतामपापांस्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात् ।

शुष्केणार्द्र दह्यते मिश्रभावात् ।

तस्मात् पापैः सह सन्धिं न कुर्यात् ॥

पापाचारी दुष्टोंका त्याग न करके उनके साथ मिले रहनेसे निरपराध सज्जनोंको भी उन (पापियों)-के समान ही दण्ड प्राप्त होता है, जैसे सूखी लकड़ीमें मिल जानेसे गीली भी जल जाती है; इसलिये दुष्ट पुरुषोंके साथ कभी मेल न करे ।

उद्योगपर्व, अध्याय 34, श्लोक 70 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 270
सङ्गति का प्रभाव

हंस उवाच

यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं ।

तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव ।

वासो यथा रङ्गवशं प्रयाति ।

तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥

जैसे वस्त्र जिस रंगमें रँगा जाय, वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असज्जन, तपस्वी अथवा चोरकी सेवा करता है तो वह उन्हींके वशमें हो जाता है — उसपर उन्हींका रंग चढ़ जाता है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 36, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 291
शास्त्रज्ञान और वृद्धों की सेवा

विदुर उवाच

न वै श्रुतमविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य वा ।

धर्मार्थौ वेदितुं शक्यौ बृहस्पतिसमैरपि ॥

बृहस्पतिके समान मनुष्य भी शास्त्रज्ञान अथवा वृद्धोंकी सेवा किये बिना धर्म और अर्थका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते ।

उद्योगपर्व, अध्याय 39, श्लोक 39 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 327 ज्ञान–विवेक
ब्राह्मण की पहचान

सनत्सुजात उवाच

अनाढ्या मानुषे वित्ते आढ्या दैवे तथा क्रतौ ।

ते दुर्धर्षा दुष्प्रकम्प्यास्तान् विद्याद् ब्रह्मणस्तनुम् ॥

जो लौकिक धनकी दृष्टिसे निर्धन होकर भी दैवी सम्पत्ति तथा यज्ञ-उपासना आदिसे सम्पन्न हैं, वे दुर्धर्ष हैं और किसी भी विषयसे चलायमान नहीं होते । उन्हें ब्रह्मकी साक्षात् मूर्ति समझना चाहिये ।

उद्योगपर्व, अध्याय 42, श्लोक 39 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 353
वृद्धों की सङ्गति

विदुर उवाच

ये स्म काले सुमनसः सर्वे वृद्धानुपासते ।

सिंहगुप्तमिवारण्यमप्रधृष्या भवन्ति ते ॥

जो शुद्ध हृदयवाले मनुष्य समय-समयपर बड़े-बूढ़ोंकी सेवा एवं संग करते रहते हैं, वे सिंहसे सुरक्षित वनके समान दूसरोंके लिये दुर्धर्ष हो जाते हैं (शत्रु उनके पास आनेका साहस नहीं करते हैं)

उद्योगपर्व, अध्याय 64, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 516 धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड ५

धर्माचरण और सत्सङ्ग

कामन्दक उवाच

जपेदुदकशीलः स्यात् सततं सुखमास्थितः ।

धर्मान्वितान् सम्प्रविशेद् बहिः कृत्वेह दुष्कृतीन् ॥

वह जलमें खड़ा होकर गायत्रीका जप करे । सदा प्रसन्न रहे । पापियोंको राज्यसे बाहर निकालकर धर्मात्मा पुरुषोंका संग करे ।

कामन्दक ने आंगरिष्ठ से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 123, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 816
श्रेष्ठों का सङ्ग

भीष्म उवाच

कामक्रोधव्यपेता ये निर्ममा निरहंकृताः ।

सुव्रताः स्थिरमर्यादास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥

जो काम और क्रोधसे रहित, ममता और अहंकारसे शून्य, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्ममर्यादाको स्थिर रखनेवाले हैं, उन्हीं महापुरुषोंका संग करो और उनसे अपना संदेह पूछो ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1037
मात्सर्य दोष का निवारण

भीष्म → तात

सत्यत्यागात् तु मात्सर्यमहितानां च सेवया ।

एतत् तु क्षीयते तात साधूनामुपसेवनात् ॥

सत्यका त्याग और दुष्टोंका साथ करनेसे मात्सर्य-दोषकी उत्पत्ति होती है । तात! श्रेष्ठ पुरुषोंकी सेवा और संगति करनेसे उसका नाश हो जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 163, श्लोक 15 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1057 नीति–व्यवहार
सङ्गति और संस्कार का प्रभाव

सत्यवान् उवाच

असाधुश्चैव पुरुषो लभते शीलमेकदा ।

साधोश्चापि ह्यसाधुभ्यः शोभना जायते प्रजा ॥

दुष्ट पुरुष भी कभी साधुसंगसे सुधरकर सुशील बन जाता है तथा बहुत-से दुष्ट पुरुषोंकी संतानें भी अच्छी निकल जाती हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 267, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1723
सत्सङ्ग और सत्कर्म का प्रभाव

भीष्म उवाच

य एतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ।

कुशलः सुखदुःखानां साधूंश्चाप्यथ सेवते ।

तस्य साधुसमाचारादभ्यासाच्चैव वर्धते ॥

जो पुरुष अपनी बुद्धिसे राग आदि दोषोंको पहले ही देख लेता है, वह सुख-दुःखको समझनेमें कुशल होता है । फिर वह श्रेष्ठ पुरुषोंका सेवन करता है । सत्पुरुषोंकी सेवा या सत्संगसे और सत्कर्मोंके अभ्याससे उस पुरुषकी बुद्धि बढ़ती है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 273, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1771 ज्ञान–विवेक
सत्सङ्ग और आत्म-नियन्त्रण

हंस उवाच

सदाहमार्यान्निभृतोऽप्युपासे ।

न मे विधित्सोत्सहते न रोषः ।

न वाप्यहं लिप्समानः परैमि ।

न चैव किंचिद् विषयेण यामि ॥

यद्यपि मैं सब प्रकारसे परिपूर्ण हूँ (मुझे कुछ जानना या पाना शेष नहीं है) तो भी मैं श्रेष्ठ पुरुषोंकी उपासना (सत्संग) करता रहता हूँ। मुझपर न तृष्णाका वश चलता है न रोषका । मैं कुछ पानेके लोभसे धर्मका उल्लंघन नहीं करता और न विषयोंकी प्राप्तिके लिये ही कहीं आता-जाता हूँ ।

शान्तिपर्व, अध्याय 299, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1969 वैराग्य
सङ्ग का प्रभाव

हंस उवाच

यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं ।

तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव ।

वासो यथा रंगवशं प्रयाति ।

तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥

जैसे वस्त्र जिस रंगमें रँगा जाय, वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असज्जन, तपस्वी अथवा चोरका सेवन करता है तो वह उन्हीं-जैसा हो जाता है अर्थात् उसपर उन्हींका रंग चढ़ जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 299, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1971
सत्पुरुषों का सङ्ग

हंस उवाच

सदा देवाः साधुभिः संवदन्ते ।

न मानुषं विषयं यान्ति द्रष्टुम् ।

नेन्दुः समः स्यादसमो हि वायुरुच्चावचं विषयं यः स वेद ॥

देवतालोग सदा सत्पुरुषोंका संग — उन्हींके साथ वार्तालाप करते हैं; इसीलिये वे मनुष्योंके क्षणभंगुर भोगोंकी ओर देखने भी नहीं जाते । जो विभिन्न विषयोंके नश्वर स्वभावको ठीक-ठीक जानता है, उसकी समानता न चन्द्रमा कर सकते हैं न वायु ।

शान्तिपर्व, अध्याय 299, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1972 वैराग्य

महाभारत — खण्ड ५ के सब 9 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

गुरुसेवा और स्वाध्याय

नारद उवाच

गुरुप्रसादे स्वाध्याये यतन्तो ये स्थिरव्रताः ।

शुश्रूषवोऽनसूयन्तस्तान् नमस्यामि यादव ॥

यदुकुलतिलक! जो गुरुको प्रसन्न रखने और स्वाध्याय करनेके लिये सदा यत्नशील रहते हैं, जिनका व्रत कभी भंग नहीं होने पाता, जो गुरुजनोंकी सेवा करते और किसीके भी दोष नहीं देखते उनको मैं प्रणाम करता हूँ ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 31, श्लोक 15 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 398
सत्पुरुषों की महिमा

भीष्म उवाच

नानाकर्मसु रक्तानां बहुकर्मोपजीविनाम् ।

धर्मज्ञानां सतां तेषां नित्यमेवानुकीर्तयेत् ॥

नाना प्रकारके कर्मोंमें संलग्न तथा अनेक कर्मोंसे जीविका चलानेवाले उन धर्मज्ञ एवं सत्पुरुष ब्राह्मणोंका सदा ही गुण गाना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 33, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 412
ब्राह्मणों की महिमा

भीष्म उवाच

य एवं नैव कुप्यन्ते न लुभ्यन्ति तृणेष्वपि ।

त एव नः पूज्यतमा ये चापि प्रियवादिनः ॥

जो ब्राह्मण कभी क्रोध नहीं करते, जिनके मनमें एक तिनके भरका लोभ नहीं होता तथा जो प्रिय वचन बोलनेवाले हैं, वे ही हमलोगोंके परम पूज्य हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 59, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 569
सन्तों की सेवा

भीष्म उवाच

यावतः साधुधर्मान् वै सन्तः संवर्धयन्त्युत ।

सर्वस्वैश्चापि भर्तव्या नरा ये बहुकारिणः ॥

जो संत पुरुष सदा समस्त सद्धर्मोंका प्रचार और विस्तार करते रहते हैं, अपना सर्वस्व देकर भी उनका भरण-पोषण करना चाहिये; क्योंकि वे राजाके अत्यन्त उपकारी होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 61, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 577
वृद्धों की सेवा

भीष्म उवाच

सायं प्रातश्च वृद्धानां शृणुयात् पुष्कला गिरः ।

श्रुतमाप्नोति हि नरः सततं वृद्धसेवया ॥

सायंकाल और प्रातःकाल वृद्ध पुरुषोंकी कही हुई बातें पूरी-पूरी सुननी चाहिये । सदा वृद्ध पुरुषोंकी सेवासे मनुष्यको शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त होता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 162, श्लोक 48 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1532

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

सत्सङ्ग का प्रभाव

न ह्यद्भुतं त्वच्चरणाब्जरेणुभिर्हतांहसो भक्तिरधोक्षजेऽमला ।

मौहूर्तिकाद्यस्य समागमाच्च मे ।

दुस्तर्कमूलोऽपहतोऽविवेकः ॥

आपके चरणकमलोंकी रजका सेवन करनेसे जिनके सारे पाप ताप नष्ट हो गये हैं, उन महानुभावोंको भगवान्की विशुद्ध भक्ति प्राप्त होना कोई विचित्र बात नहीं है । मेरा तो आपके दो घड़ीके सत्संगसे ही सारा कुतर्कमूलक अज्ञान नष्ट हो गया है ।

राजा रहूगण ने जड़ भरत से कहा।

पञ्चमस्कन्ध, अध्याय 13, श्लोक 22 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1012

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

ब्रह्मवेत्ता वाणी की सत्यता

अहो ब्रह्मविदां वाचो नासत्याः सन्ति कर्हिचित् ।

गर्गो यदाह भगवानन्वभावि तथैव तत् ॥

सच है, ब्रह्मवेत्ता महात्माओंके वचन कभी झूठे नहीं होते । देखो न, महात्मा गर्गाचार्यने जितनी बातें कही थीं, सब की-सब सोलहों आने ठीक उतर रही हैं ।

नन्दबाबा ने कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 57 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 322
सन्तों की सेवा

भवद्विधा महाभागा निषेव्या अर्हसत्तमाः ।

श्रेयस्कामैर्नृभिर्नित्यं देवाः स्वार्था न साधवः ॥

अपना परम कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको आप जैसे परम पूजनीय और महाभाग्यवान् संतोंकी सर्वदा सेवा करनी चाहिये । आप जैसे संत देवताओंसे भी बढ़कर हैं; क्योंकि देवताओंमें तो स्वार्थ रहता है, परन्तु संतोंमें नहीं ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 48, श्लोक 30 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 655 गुरु महिमा
सत्सङ्ग से भक्ति

सत्संगलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता ।

स वै मे दर्शितं सद्भिरंजसा विन्दते पदम् ॥

भक्तिकी प्राप्ति सत्संगसे होती है; जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्निध्यका अनुभव करता है । इस प्रकार जब उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतोंके उपदेशोंके अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपदको — वास्तविक स्वरूपको सहजहीमें प्राप्त हो जाता है ।

श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 25 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1143 भक्ति
शुकदेवजी की लीला-अनुभूति

स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् ।

व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं ।

तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥

श्रीशुकदेवजी महाराज अपने आत्मानन्दमें ही निमग्न थे । इस अखण्ड अद्वैत स्थितिसे उनकी भेददृष्टि सर्वथा निवृत्त हो चुकी थी । फिर भी मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरकी मधुमयी, मंगलमयी, मनोहारिणी लीलाओंने उनकी वृत्तियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्होंने जगत्के प्राणियोंपर कृपा करके भगवत्तत्त्वको प्रकाशित करनेवाले इस महापुराणका विस्तार किया । मैं उन्हीं सर्वपापहारी व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ ।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 68 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1417

श्रीरामचरितमानस

सन्त समाज की महिमा

मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू ॥

राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा । सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ॥

संतोंका समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत्में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है । जहाँ (उस संतसमाजरूपी प्रयागराजमें) रामभक्तिरूपी गङ्गाजीकी धारा है और ब्रह्मविचारका प्रचार सरस्वतीजी हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 2.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 23
सत्सङ्ग की महिमा

मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई ॥

सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुँ बेद न आन उपाऊ ॥

उनमेंसे जिसने जिस समय जहाँ कहीं भी जिस किसी यत्नसे बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पायी है, सो सब सत्संगका ही प्रभाव समझना चाहिये । वेदोंमें और लोकमें इनकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है ।

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 24
सत्सङ्ग का महत्व

बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥

सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥

सत्संगके बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजीकी कृपाके बिना वह सत्संग सहजमें मिलता नहीं । सत्संगति आनन्द और कल्याणकी जड़ है । सत्संगकी सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 24 ज्ञान–विवेक
सत्सङ्गति का प्रभाव

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधात सुहाई ॥

बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं । फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ॥

दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारसके स्पर्शसे लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है) । किन्तु दैवयोगसे यदि कभी सज्जन कुसंगतिमें पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँपकी मणिके समान अपने गुणोंका ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साँपका संसर्ग पाकर भी मणि उसके विषको ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाशको नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टोंके संगमें रहकर भी दूसरोंको प्रकाश ही देते हैं, दुष्टोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता)

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 24
सन्तों की महिमा

बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ॥

सो मोसन कहि जात न कैसें । साक बनिक मनि गुन गन जैसें ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितोंकी वाणी भी संत-महिमाका वर्णन करनेमें सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचनेवालेसे मणियोंके गुणसमूह नहीं कहे जा सकते ।

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 24
सन्त और असन्त का अन्तर

बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥

बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥

अब मैं संत और असंत दोनोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ; दोनों ही दुःख देनेवाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है । वह अन्तर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं । (अर्थात् संतोंका बिछुड़ना मरने समान दु:खदायी होता है और असंतोंका मिलना)

बालकाण्ड, चौपाई 5.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 26
सत्पुरुष का विवेक

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ॥

संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥

विधाताने इस जड-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 6 श्रीरामचरितमानस पृ. 28 ज्ञान–विवेक
सत्सँग का परम सुख

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ॥

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥

हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़ेपर रखे हुए] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण)-मात्रके सत्सङ्गसे होता है ।

लङ्किनी ने हनुमान जी से कहा।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 4 श्रीरामचरितमानस पृ. 720

श्रीरामचरितमानस के सब 37 पद्य

In English

The Glory of Holy Company and Saints

These verses from the Mahābhārata, Shrimad Bhagavata Purana, and Ramcharitmanas explain the power of satsang (the company of good people). They teach that associating with virtuous, wise, and selfless saints leads to spiritual wisdom, purity, and devotion, whereas associating with the wicked brings ruin.

These verses answer

  • Benefits of satsang in mahabharata?
  • How to identify a true saint according to puranas?
  • Importance of serving elders and gurus in hinduism?
  • Can holy company change a person's character?
  • Ramcharitmanas verses on the importance of saints?