श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

308 पद्य · 12 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड १

धर्मयुक्त कर्म का पालन

वैशम्पायन → राजन

स्वकर्मनिरताश्चासन् सर्वे वर्णा नराधिप ।

एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न हसते क्वचित् ॥

राजन्! उस समय सब वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मके पालनमें लगे रहते थे । नरश्रेष्ठ! इस प्रकार उस समय कहीं भी धर्मका ह्रास नहीं होता था ।

आदिपर्व, अध्याय 64, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड १ पृ. 453
अधर्म का उदय

वैशम्पायन उवाच

प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात् ।

अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः ॥

तदनन्तर एक समय ऐसा आया जब प्रजा भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे एक-दूसरेको मारकर खाने लगी, उस समय वहाँ अधर्म प्रकट हुआ, जो समस्त प्राणियोंका नाश करनेवाला है ।

आदिपर्व, अध्याय 66, श्लोक 53 महाभारत — खण्ड १ पृ. 473 माया–संसार
पाप का फल

पुत्रेषु वा नप्तृषु वा न चेदात्मनि पश्यति ।

फलत्येव ध्रुवं पापं गुरु भुक्तमिवोदरे ॥

‘यदि वह (पापसे उपार्जित द्रव्यका) दुष्परिणाम अपने ऊपर नहीं दिखायी देता तो उस अन्यायोपार्जित द्रव्यका उपभोग करनेके कारण पुत्रों अथवा नाती-पोतोंपर अवश्य प्रकट होता है । जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है’

शुक्राचार्य जी ने वृषपर्वा से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 80, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड १ पृ. 605
दैव और पुरुषार्थ

पाण्डु उवाच

दैवे पुरुषकारे च लोकोऽयं सम्प्रतिष्ठितः ।

तत्र दैवं तु विधिना कालयुक्तेन लभ्यते ॥

यह संसार दैव तथा पुरुषार्थपर अवलम्बित है । इनमें दैव तभी सुलभ (सफल) होता है, जब समयपर उद्योग किया जाय ।

पाण्डु ने कहा।

आदिपर्व, अध्याय 122, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड १ पृ. 876
कर्म का महत्व

दुर्योधन उवाच

भयं परिहरन् मन्द आत्मानं परिपालयन् ।

वर्षासु क्लिन्नकटवत् तिष्ठन्नेवावसीदति ॥

मूर्ख मनुष्य भयका त्याग और आत्मरक्षा करते हुए भी यदि चुपचाप बैठा रहे, उद्योग न करे, तो वह वर्षाकालमें भींगी हुई चटाईके समान नष्ट हो जाता है ।

दुर्योधन ने पिता धृतराष्ट्र से कहा।

सभापर्व, अध्याय 56, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड १ पृ. 2082 नीति–व्यवहार

महाभारत — खण्ड १ के सब 13 पद्य

महाभारत — खण्ड २

सत्त्वगुणियों का धैर्य

बृहदश्व उवाच

विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते ।

विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः ॥

जब दैव (प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते ।

बृहदश्व मुनि ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 79, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 554 वैराग्य
कर्मफल का सिद्धान्त

धर्म → राजन

नान्यः कर्तुः फलं राजन्नुपभुङ्क्ते कदाचन ।

इमानि तव दृश्यन्ते फलानि वदतां वर ॥

धर्मने कहा — राजन्! कर्ताके सिवा दूसरा कोई उसके किये हुए कर्मोंका फल कभी नहीं भोगता है । वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप जो ये पुण्य लोक प्राप्त हुए हैं, प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं ।

धर्मराज ने राजर्षि सोमक से कहा।

वनपर्व, अध्याय 128, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 878
कर्मों का फल

मार्कण्डेय उवाच

तत्रास्य स्वकृतं कर्म छायेवानुगतं सदा ।

फलत्यथ सुखार्हो वा दुःखार्हो वाथ जायते ॥

कृतान्तविधिसंयुक्तः स जन्तुर्लक्षणैः शुभैः ।

अशुभैर्वा निरादानो लक्ष्यते ज्ञानदृष्टिभिः ॥

वहाँ दूसरे स्थूल शरीरमें उसके पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म छायाकी भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है । इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगनेके योग्य होकर जन्म लेता है । यमराजके विधान (पुण्य और पापके फल-भोग)-में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणोंद्वारा अपनेको मिले हुए सुख अथवा दुःखका निवारण करनेमें असमर्थ है । यह बात ज्ञान-दृष्टिवाले महात्मा पुरुषोंद्वारा देखी जाती है ।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 78–79 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1249
कर्म का फल

व्याध उवाच

यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम ।

अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥

सज्जनशिरोमणे! मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है ।

वनपर्व, अध्याय 209, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1454
कर्मफल की निश्चितता

वैशम्पायन उवाच

ध्रुवं प्रवास्यत्यसमीरितोऽपि ।

ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या ।

ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाशस्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः ॥

निश्चय ही बिना किसी प्रेरणाके भी हवा चलेगी ही, जो गर्भिणी है, वह समयपर अवश्य ही बच्चा जनेगी । दिनके आदिमें रजनीका नाश अवश्यम्भावी है तथा रात्रिके प्रारम्भमें दिनका भी अन्त होना निश्चित है । (इसी प्रकार पापका फल भी किसीके टाले नहीं टल सकता)

वनपर्व, अध्याय 236, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1624

महाभारत — खण्ड २ के सब 38 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

सत्कर्म का समय

संजय उवाच

इह क्षेत्रे क्रियते पार्थ कार्यं ।

न वै किञ्चित् क्रियते प्रेत्य कार्यम् ।

कृतं त्वया पारलौक्यं च कर्म ।

पुण्यं महत् सद्भिरतिप्रशस्तम् ॥

कुन्तीनन्दन! इस शरीरके रहते हुए ही कोई भी सत्कर्म किया जा सकता है । मरनेके बाद कोई कार्य नहीं किया जा सकता । आपने तो परलोकमें सुख देनेवाला महान् पुण्यकर्म किया है, जिसकी साधु पुरुषोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 27, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 189
कर्म का प्रधानत्व

वासुदेव उवाच

या वै विद्याः साधयन्तीह कर्म ।

तासां फलं विद्यते नेतरासाम् ।

तत्रेह वै दृष्टफलं तु कर्म ।

पीत्वोदकं शाम्यति तृष्णयाऽऽर्तः ॥

जो विद्याएँ कर्मका सम्पादन करती हैं, उन्हींका फल दृष्टिगोचर होता है, दूसरी विद्याओंका नहीं । विद्या तथा कर्ममें भी कर्मका ही फल यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है । प्याससे पीड़ित मनुष्य जल पीकर ही शान्त होता है (उसे जानकर नहीं; अतः गृहस्थाश्रममें रहकर सत्कर्म करना ही श्रेष्ठ है)

उद्योगपर्व, अध्याय 29, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 201 ज्ञान–विवेक
कर्म और ज्ञान का सम्बन्ध

वासुदेव उवाच

सोऽयं विधिर्विहितः कर्मणैव ।

संवर्तते संजय तत्र कर्म ।

तत्र योऽन्यत् कर्मणः साधु मन्येन्मोघं तस्यालपितं दुर्बलस्य ॥

संजय! ज्ञानका विधान भी कर्मको साथ लेकर ही है; अतः ज्ञानमें भी कर्म विद्यमान है । जो कर्मसे भिन्न कर्मोंके त्यागको श्रेष्ठ मानता है, वह दुर्बल है, उसका कथन व्यर्थ ही है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 29, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 201 ज्ञान–विवेक
कर्म और काल का प्रभाव

संजय उवाच

एतान् गुणान् कर्मकृतानवेक्ष्य ।

भावाभावौ वर्तमानावनित्यौ ।

बलिर्हि राजा पारमविन्दमानो ।

नान्यत् कालात् कारणं तत्र मेने ॥

ये शौर्य, विद्या आदि गुण अपने पूर्वकर्मके अनुसार ही प्राप्त होते हैं और प्राणियोंकी वर्तमान उन्नति तथा अवनति भी अनित्य हैं । यह सब सोचकर राजा बलिने जब इसका पार नहीं पाया, तब यही निश्चय किया कि इस विषयमें काल (दैव)-के सिवा और कोई कारण नहीं है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 32, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 235
कर्मफल का सिद्धान्त

संजय → राजन

आत्मनैव कृतं कर्म आत्मनैवोपभुज्यते ।

इह च प्रेत्य वा राजंस्त्वया प्राप्तं यथातथम् ॥

राजन्! इहलोक अथवा परलोकमें अपने किये हुए कर्मका फल अपने-आपको ही भोगना पड़ता है; अतः आपको जैसेका तैसा प्राप्त हुआ है ।

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 77, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1961

महाभारत — खण्ड ३ के सब 32 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

पाण्डवों के क्रोध का फल

अभिमन्यु उवाच

परवित्तापहारस्य क्रोधस्याप्रशमस्य च ।

लोभस्य ज्ञाननाशस्य द्रोहस्यात्याहितस्य च ॥

पितॄणां मम राज्यस्य हरणस्योग्रधन्विनाम् ।

तत् त्वयेदमनुप्राप्तं प्रकोपाद् वै महात्मनाम् ॥

दूसरोंके धनका अपहरण, क्रोध, अशान्ति, लोभ, ज्ञानलोप, द्रोह, दुःसाहसपूर्ण बर्ताव तथा मेरे उग्र धनुर्धर पितरोंके राज्यका अपहरण — इन सभी बुराइयोंके फलस्वरूप उन महात्मा पाण्डवोंके क्रोधसे तुझे आज यह बुरा दिन प्राप्त हुआ है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 40, श्लोक 5–6 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 317 काम–क्रोध–लोभ–मोह
मित्रता और दान का पुण्य

युधिष्ठिर उवाच

यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत् तनुम् ।

पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात् स समो भवेत् ॥

शैनेय! जो मित्रके लिये युद्ध करते हुए शरीरका त्याग करता है तथा जो ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान कर देता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ।

युधिष्ठिर ने सात्यकि से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 110, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 732 धर्म–आचरण
सङ्कट और पद का प्रभाव

युधिष्ठिर उवाच

सर्वो विमृशते जन्तुः कृच्छ्रस्थो धर्मदर्शनम् ।

पदस्थः पिहितं द्वारं परलोकस्य पश्यति ॥

प्रायः सभी प्राणी जब स्वयं संकटमें पड़ जाते हैं तो अपनी रक्षाके लिये धर्मशास्त्रकी दुहाई देने लगते हैं और जब अपने उच्च पदपर प्रतिष्ठित होते हैं, उस समय उन्हें परलोकका दरवाजा बंद दिखायी देता है ।

युधिष्ठिर ने दुर्योधन से कहा।

शल्यपर्व, अध्याय 32, श्लोक 59 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2708 धर्म–आचरण
प्रारब्ध और पुरुषार्थ

कृप उवाच

आबद्धा मानुषाः सर्वे निबद्धाः कर्मणोर्द्वयोः ।

दैवे पुरुषकारे च परं ताभ्यां न विद्यते ॥

सभी मनुष्य प्रारब्ध और पुरुषार्थ दो प्रकारके कर्मोंसे बँधे हुए हैं । इन दोके सिवा दूसरा कुछ नहीं है ।

कृपाचार्य ने अश्वत्थामा से कहा।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 2, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2985
प्रमाद का विनाश

सूत उवाच

न हि प्रमादात् परमस्ति कश्चिद् ।

वधो नराणामिह जीवलोके ।

प्रमत्तमर्था हि नरं समन्तात् ।

त्यजन्त्यनर्थाश्च समाविशन्ति ॥

प्रमादसे बढ़कर इस संसारमें मनुष्योंके लिये दूसरी कोई मृत्यु नहीं । प्रमादी मनुष्यको सारे अर्थ सब ओरसे त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं ।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 10, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3057

महाभारत — खण्ड ४ के सब 22 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

कर्म का महत्व

भीष्म उवाच

अल्पं हि सारभूयिष्ठं यत् कर्मोदारमेव तत् ।

कृतमेवाकृताच्छ्रेयो न पापीयोऽस्त्यकर्मणः ॥

कोई काम देखनेमें छोटा होनेपर भी यदि उसमें सार अधिक हो तो वह महान् ही है । न करनेकी अपेक्षा कुछ करना ही अच्छा है; क्योंकि कर्तव्य-कर्म न करनेवालेसे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 75, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 518 नीति–व्यवहार
पाप का फल

उतथ्य उवाच

यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पौत्रेषु नप्तृषु ।

न हि पापं कृतं कर्म सद्यः फलति गौरिव ॥

यदि पापका फल अपनेको नहीं मिला तो वह पुत्रों तथा नाती-पोतोंको अवश्य मिलता है । जैसे पृथ्वीमें बोया हुआ बीज तुरंत फल नहीं देता, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी तत्काल फल नहीं देता (समय आनेपर ही उसका फल मिलता है)

शान्तिपर्व, अध्याय 91, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 617
प्रारब्ध की प्रधानता

मुनि उवाच

अनागतं यन्न ममेति विद्यादतिक्रान्तं यन्न ममेति विद्यात् ।

दिष्टं बलीय इति मन्यमाना ।

स्ते पण्डितास्तत्सतां स्थानमाहुः ॥

जो वस्तु भविष्यमें मिलनेवाली है, उसे यही माने कि ‘वह मेरी नहीं है’ तथा जो मिलकर नष्ट हो चुकी हो, उसके विषयमें भी यही भाव रखे कि ‘वह मेरी नहीं थी ।’ जो ऐसा मानते हैं कि ‘प्रारब्ध ही सबसे प्रबल है,’ वे ही विद्वान् हैं और उन्हें सत्पुरुषोंका आश्रय कहा गया है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 104, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 697 वैराग्य
धन वृद्धि के आठ साधन

भीष्म उवाच

धृतिर्दाक्ष्यं संयमो बुद्धिरात्मा ।

धैर्यं शौर्यं देशकालाप्रमादः ।

अल्पस्य वा बहुनो वा विवृद्धौ ।

धनस्यैतान्यष्ट समिन्धनानि ॥

धारणाशक्ति, चतुरता, संयम, बुद्धि, शरीर, धैर्य, शौर्य तथा देश-कालकी परिस्थितिसे असावधान न रहना — ये आठ गुण थोड़े या अधिक धनको बढ़ानेके मुख्य साधन हैं अर्थात् धनरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये ईंधन हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 120, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 790 नीति–व्यवहार
कर्मफल का व्यक्तिगत भोग

भीष्म उवाच

येन येन यथा यद् यत् पुरा कर्म समीहितम् ।

तत्तदेकतरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ॥

जिस-जिस मनुष्यने अपने-अपने पूर्वजन्मोंमें जैसे-जैसे कर्म किये हैं, वह अपने ही किये हुए उन कर्मोंका फल सदा अकेला ही भोगता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 181, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1179

महाभारत — खण्ड ५ के सब 81 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

कर्म का फल

ब्रह्मा उवाच

शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा ।

कृतं फलति सर्वत्र नाकृतं भुज्यते क्वचित् ॥

शुभ कर्म करनेसे सुख और पाप कर्म करनेसे दुःख मिलता है । अपना किया हुआ कर्म सर्वत्र ही फल देता है । बिना किये हुए कर्मका फल कहीं नहीं भोगा जाता ।

ब्रह्माजी ने वसिष्ठजी से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 6, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 84
पुरुषार्थ का महत्त्व

ब्रह्मा उवाच

यथा बीजं विना क्षेत्रमुप्तं भवति निष्फलम् ।

तथा पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥

जैसे बीज खेतमें बोये बिना फल नहीं दे सकता, उसी प्रकार दैव (प्रारब्ध) भी पुरुषार्थके बिना नहीं सिद्ध होता ।

ब्रह्माजी ने वसिष्ठजी से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 6, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 84
कर्मफल का सिद्धान्त

ब्रह्मा उवाच

कर्मणः फलनिर्वृत्तिं स्वयमश्नाति कारकः ।

प्रत्यक्षं दृश्यते लोके कृतस्यापकृतस्य च ॥

कर्म करनेवाला मनुष्य अपने भले या बुरे कर्मका फल स्वयं ही भोगता है । यह बात संसारमें प्रत्यक्ष दिखायी देती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 6, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 84
पुरुषार्थ की प्रधानता

ब्रह्मा उवाच

न च फलति विकर्मा जीवलोके न दैवं ।

व्यपनयति विमार्गं नास्ति दैवे प्रभुत्वम् ॥

गुरुमिव कृतमग्र्यं कर्म संयाति दैवं ।

नयति पुरुषकारः संचितस्तत्र तत्र ॥

इस जीव-जगत्में उद्योगहीन मनुष्य कभी फूलता-फलता नहीं दिखायी देता । दैवमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह उसे कुमार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगा दे । जैसे शिष्य गुरुको आगे करके चलता है उसी तरह दैव पुरुषार्थको ही आगे करके स्वयं उसके पीछे चलता है । संचित किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवको जहाँ चाहता है, वहाँ-वहाँ ले जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 6, श्लोक 47 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 89
मन के तीन कर्तव्य

भीष्म उवाच

अनभिध्या परस्वेषु सर्वसत्त्वेषु सौहृदम् ।

कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत् ॥

दूसरेके धनको लेनेका उपाय न सोचना, समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखना और कर्मोंका फल अवश्य मिलता है, इस बातपर विश्वास रखना — ये तीन मनसे आचरण करने योग्य कार्य हैं । इन्हें सदा करना चाहिये । (इनके विपरीत दूसरोंके धनका लालच करना, समस्त प्राणियोंसे वैर रखना और कर्मोंके फलपर विश्वास न करना — ये तीन मानसिक पाप हैं — इनसे सदा बचे रहना चाहिये)

अनुशासनपर्व, अध्याय 13, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 135 धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड ६ के सब 50 पद्य

लिङ्ग महापुराण

कर्म का प्रभाव

योगिनः सर्वतत्त्वज्ञाः परं वैराग्यमास्थिताः ।

प्राणायामादिभिश्चाष्टसाधनैः सहचारिणः ॥

करुणादिगुणोपेताः कृत्वापि विविधानि ते ।

कर्माणि नरकं स्वर्गं गच्छन्त्येव स्वकर्मणा ॥

सभी तत्त्वोंको जाननेवाले, परम वैराग्यको प्राप्त, प्राणायाम आदि योगके आठ साधनोंसे युक्त तथा करुणा आदि गुणोंसे सम्पन्न बड़े-बड़े योगिजन नानाविध कर्म करके भी अपने कर्मानुसार नरक तथा स्वर्गमें जाते हैं ।

पूर्वभाग, अध्याय 6, श्लोक 2-3 लिङ्ग महापुराण पृ. 37 ज्ञान–विवेक

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

दैव का विधान

सुखदुःखे भयक्रोधौ लाभालाभौ भवाभवौ ।

यस्य किंचित् तथाभूतं ननु दैवस्य कर्म तत् ॥

सुख-दुःख, भय-क्रोध (क्षोभ), लाभ-हानि, उत्पत्ति और विनाश तथा इस प्रकारके और भी जितने परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका कोई कारण समझमें नहीं आता, वे सब दैवके ही कर्म हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 22, श्लोक 22 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 310
धर्म का त्याग

ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम ।

केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम् ॥

जो तेरा आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं । तूने केवल धनमें आसक्त होकर धर्मका त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ ।

राजा दशरथ ने कैकेयी से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 42, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 366 वैराग्य
कर्म के फल का विचार

अविज्ञाय फलं यो हि कर्म त्वेवानुधावति ।

स शोचेत् फलवेलायां यथा किंशुकसेचकः ॥

जो क्रियमाण कर्मके फलका ज्ञान या विचार न करके केवल कर्मकी ओर ही दौड़ता है, उसे उसका फल मिलनेके समय उसी तरह शोक होता है, जैसा कि आम काटकर पलाश सींचनेवालेको हुआ करता है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 63, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 422
लोकविरुद्ध कर्म का परिणाम

गजाश्वरथसम्बाधे बले महति तिष्ठता ।

कृतं ते दारुणं कर्म सर्वलोकजुगुप्सितम् ॥

उद्वेजनीयो भूतानां नृशंसः पापकर्मकृत् ।

त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति ॥

कर्म लोकविरुद्धं तु कुर्वाणं क्षणदाचर ।

तीक्ष्णं सर्वजनो हन्ति सर्पं दुष्टमिवागतम् ॥

निशाचर! हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई विशाल सेनाके बीचमें खड़े रहकर (असंख्य राक्षसोंके स्वामित्वका अभिमान लेकर) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकोंद्वारा निन्दा हुई है । जो समस्त प्राणियोंको उद्वेगमें डालनेवाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकोंका ईश्वर हो तो भी अधिक कालतक टिक नहीं सकता । जो लोकविरोधी कठोर कर्म करनेवाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्पकी भाँति मारते हैं ।

श्रीराम ने खर से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 29, श्लोक 2–4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 632
कर्म और फल का सम्बन्ध

अदृष्टगुणदोषाणामध्रुवाणां तु कर्मणाम् ।

नान्तरेण क्रियां तेषां फलमिष्टं च वर्तते ॥

जिनके गुण-दोष देखे या जाने नहीं गये हैं तथा जो अध्रुव हैं-फल देकर नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसे कर्मोंका शुभाशुभ फल उन्हें आचरणमें लाये बिना नहीं प्राप्त होता है ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 66, श्लोक 17 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 727

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ के सब 16 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

पापी का विनाश

स्वतैन्यमानस्य रावणादीर्घदर्शिनः ।

अभिनन्दन्ति भूतानि विनाशे पापकर्मणः ॥

रावण! जब कोई अदूरदर्शी पापाचारी अपने कुकर्मों से मारा जाता है, उस समय उसका विनाश होने पर समस्त प्राणियोंको प्रसन्नता होती है ।

सीता ने रावण से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 13 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 93
अनुचित कर्मों का दोष

अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च ।

क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥

जो कर्म उचित उपायका अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्र के विपरीत होते हैं, वे पाप-कर्म उसी तरह दोषकी प्राप्ति कराते हैं, जैसे अपवित्र आभि-चारिक यज्ञों में होमे गये हविष्य ।

कामातुर रावण का यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्ण को क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 12, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 266 ज्ञान–विवेक
पापकर्म का फल

उत्से केनाभिपन्नस्य गर्हितस्याहितस्य च ।

कर्मणः प्राप्नुहीदानीं तस्याद्य सुमहत् फलम् ॥

अभिमानपूर्वक किये गये उन निन्दित और अहितकर पापकर्मका जो महान् फल है, उसे तू आज अभी प्राप्त कर ले ।

श्रीराम ने रावण से कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 103, श्लोक 16 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 584
कर्मों का फल

राजसंश्रयवश्यानां कुर्वतीनां पराशया ।

विधेयानां च दासीनां कः कुप्येद् वानरोत्तम ।

भाग्यवैषम्यदोषेण पुरस्तादुष्कृतेन च ।

मयैतत् प्राप्यते सर्व स्वकृतं ह्यपभुज्यते ।

मैवं वद महाबाहो देवी ह्येषा परा गतिः ॥

कपिश्रेष्ठ! ये बेचारी राजाके आश्रय में रहने के कारण पराधीन थीं । दूसरोंकी आज्ञासे ही सब कुछ करती थीं, अतः स्वामीकी आशाका पालन करनेवाली इन दासियोंपर कौन क्रोध करेगा? मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं था तथा मेरे पूर्वजन्मके दुष्कर्म अपना फल देने लगे थे, इसीसे मुझे यह सब कष्ट प्राप्त हुआ है; क्योंकि सभी प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका ही फल भोगते हैं, अतः महाबाहो! तुम इन्हें मारनेकी बात न कहो । मेरे लिये दैवका ही ऐसा विधान था ।

युद्धकाण्ड, अध्याय 113, श्लोक 38–40 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 618
कर्मफल की व्यवस्था

अपश्यत् स यमं तत्र देवमग्निपुरस्कृतम् ।

विधानमनुतिष्ठन्तं प्राणिनो यस्य यादृशम् ॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा, यमदेवता अग्निको साक्षीके रूपमें सामने रखकर बैठे हैं और जिस प्राणीका जैसा कर्म है, उसीके अनुसार फल देनेकी व्यवस्था कर रहे हैं ।

राक्षसराज ने यमलोक जाकर देखा कि यमदेवता अग्निको साक्षी रखकर जीवों को उनके कर्मों के अनुसार फल देने की व्यवस्था कर रहे हैं।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 2 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 721

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ के सब 6 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

कर्मों का समर्पण

एतत्संसूचितं ब्रह्मंस्तापत्रयचिकित्सितम् ।

यदीश्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम् ॥

सत्यसंकल्प व्यासजी! पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके प्रति समस्त कर्मोंको समर्पित कर देना ही संसारके तीनों तापोंकी एकमात्र ओषधि है, यह बात मैंने आपको बतला दी ।

देवर्षि नारद ने व्यासजी को यह बात बताई।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 32 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 188 भक्ति
ईश्वरेच्छा का पालन

तस्मादिदं दैवतन्त्रं व्यवस्य भरतर्षभ ।

तस्यानुविहितोऽनाथा नाथ पाहि प्रजाः प्रभो ॥

युधिष्ठिर! संसारकी ये सब घटनाएँ ईश्वरेच्छाके अधीन हैं । उसीका अनुसरण करके तुम इस अनाथ प्रजाका पालन करो; क्योंकि अब तुम्हीं इसके स्वामी और इसे पालन करनेमें समर्थ हो ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 9, श्लोक 17 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 218
संसार मार्ग की दुर्गमता

सदस्यगण उवाच

उत्पत्त्यध्वन्यशरण उरुक्लेशदुर्गेऽन्तकोग्रव्यालान्विष्टे विषयमृगतृष्यात्मगेहोरुभारः ।

द्वन्द्वश्वभ्रे खलमृगभये शोकदावेऽज्ञसार्थः ।

पादौकस्ते शरणद कदा याति कामोपसृष्टः ॥

सदस्योंने कहा — जीवोंको आश्रय देनेवाले प्रभो! जो अनेक प्रकारके क्लेशोंके कारण अत्यन्त दुर्गम है, जिसमें कालरूप भयंकर सर्प ताकमें बैठा हुआ है, द्वन्द्वरूप अनेकों गढ़े हैं, दुर्जनरूप जंगली जीवोंका भय है तथा शोकरूप दावानल धधक रहा है — ऐसे, विश्राम-स्थलसे रहित संसारमार्गमें जो अज्ञानी जीव कामनाओंसे पीड़ित होकर विषयरूप मृगतृष्णाजलके लिये ही देह-गेहका भारी बोझा सिरपर लिये जा रहे हैं, वे भला आपके चरणकमलोंकी शरणमें कब आने लगे ।

यज्ञ के सदस्यों ने भगवान् विष्णु से कहा।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 28 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 719 माया–संसार
कर्म और फल का अन्तर

यथा वार्तादयो ह्यर्था योगस्यार्थं न बिभ्रति ।

अनर्थाय भवेयुस्ते पूर्तमिष्टं तथासतः ॥

जैसे खेती, व्यापार आदि और उनके फल भी योग-साधनाके फल भगवत्प्राप्ति या मुक्तिको नहीं दे सकते — वैसे ही दुष्ट पुरुषके श्रौतस्मार्त कर्म भी कल्याणकारी नहीं होते, प्रत्युत उलटा फल देते हैं ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 29 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1414 ज्ञान–विवेक
समर्पित कर्म का सुख

क्लेश भूर्यल्पसाराणि कर्माणि विफलानि वा ।

देहिनां विषयार्तानां न तथैवार्पितं त्वयि ॥

विषयोंके लोभमें पड़कर जो देहाभिमानी दुःख भोग रहे हैं, उन्हें कर्म करनेमें परिश्रम और क्लेश तो बहुत अधिक होता है; परन्तु फल बहुत कम निकलता है । अधिकांशमें तो उनके विफलता ही हाथ लगती है । परन्तु जो कर्म आपको समर्पित किये जाते हैं, उनके करनेके समय ही परम सुख मिलता है । वे स्वयं फलरूप ही हैं ।

देवताओं ने परम पुरुष भगवान की स्तुति की।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 47 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1462

श्रीमद्भागवत महापुराण — १ के सब 8 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

भाग्य का महत्व

नूनं ह्यदृष्टनिष्ठोऽयमदृष्टपरमो जनः ।

अदृष्टमात्मनस्तत्त्वं यो वेद न स मुह्यति ॥

इसमें सन्देह नहीं कि प्राणियोंका सुख-दुःख भाग्यपर ही अवलम्बित है । भाग्य ही प्राणीका एकमात्र आश्रय है । जो जान लेता है कि जीवनके सुख-दुःखका कारण भाग्य ही है, वह उनके प्राप्त होनेपर मोहित नहीं होता ।

नन्दबाबा ने वसुदेवजी से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 30 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 248
शुद्ध मन और परम गति

यस्मिञ्जनः प्राणवियोगकाले ।

क्षणं समावेश्य मनो विशुद्धम् ।

निर्हृत्य कर्माशयमाशु याति ।

परां गतिं ब्रह्ममयोऽर्कवर्णः ॥

जो जीव मृत्युके समय अपने शुद्ध मनको एक क्षणके लिये भी उनमें लगा देता है, वह समस्त कर्म-वासनाओंको धो बहाता है और शीघ्र ही सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्रह्ममय होकर परमगतिको प्राप्त होता है ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 46, श्लोक 32 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 628 ज्ञान–विवेक
जीव की परताश्रिता

अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदुःखयोः ।

नानात्वमथ नित्यत्वं लोककालागमात्मनाम् ॥

मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी यथा ।

तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धीः ॥

एवमप्यंग सर्वेषां देहिनां देहयोगतः ।

कालावयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत् ॥

अत्रापि कर्मणां कर्तुरस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते ।

भोक्तुश्च दुःखसुखयोः को न्वर्थो विवशं भजेत् ॥

प्यारे उद्धव! यदि तुम कदाचित् कर्मोंके कर्ता और सुख-दुखोंके भोक्ता जीवोंको अनेक तथा जगत्, काल, वेद और आत्माओंको नित्य मानते हो; साथ ही समस्त पदार्थोंकी स्थिति प्रवाहसे नित्य और यथार्थ स्वीकार करते हो तथा यह समझते हो कि घट-पट आदि बाह्य आकृतियोंके भेदसे उनके अनुसार ज्ञान ही उत्पन्न होता और बदलता रहता है; तो ऐसे मतके माननेसे बड़ा अनर्थ हो जायगा । (क्योंकि इस प्रकार जगत्के कर्ता आत्माकी नित्य सत्ता और जन्म-मृत्युके चक्करसे मुक्ति भी सिद्ध न हो सकेगी ।) यदि कदाचित् ऐसा स्वीकार भी कर लिया जाय तो देह और संवत्सरादि कालावयवोंके सम्बन्धसे होनेवाली जीवोंकी जन्म-मरण आदि अवस्थाएँ भी नित्य होनेके कारण दूर न हो सकेंगी; क्योंकि तुम देहादि पदार्थ और कालकी नित्यता स्वीकार करते हो । इसके सिवा, यहाँ भी कर्मोंका कर्ता तथा सुख-दुःखका भोक्ता जीव परतन्त्र ही दिखायी देता है; यदि वह स्वतन्त्र हो तो दुःखका फल क्यों भोगना चाहेगा? इस प्रकार सुख भोगकी समस्या सुलझ जानेपर भी दुःख-भोगकी समस्या तो उलझी ही रहेगी । अतः इस मतके अनुसार जीवको कभी मुक्ति या स्वतन्त्रता प्राप्त न हो सकेगी । जब जीव स्वरूपतः परतन्त्र है, विवश है, तब तो स्वार्थ या परमार्थ कोई भी उसका सेवन न करेगा । अर्थात् वह स्वार्थ और परमार्थ दोनोंसे ही वञ्चित रह जायगा ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 10, श्लोक 14–17 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1133
स्मरण का फल

यशःश्रियामेव परिश्रमः परो ।

वर्णाश्रमाचारतपःश्रुतादिषु ।

अविस्मृतिः श्रीधरपादपद्मयोर्गुणानुवादश्रवणादिभिर्हरः ॥

वर्णाश्रमके अनुकूल आचरण, तपस्या और अध्ययन आदिके लिये जो बहुत बड़ा परिश्रम किया जाता है, उसका फल है-केवल यश अथवा लक्ष्मीकी प्राप्ति । परन्तु भगवान्के गुण, लीला, नाम आदिका श्रवण, कीर्तन आदि तो उनके श्रीचरणकमलोंकी अविचल स्मृति प्रदान करता है ।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 53 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1414 वैराग्य

श्रीरामचरितमानस

ईश्वरीय विधान की स्वीकार्यता

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥

अस कहि लगे जपन हरिनामा । गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥

जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा । तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे । [मनमें] ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुखके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ।

सतीजी को राम की परीक्षा लेने से रोक न पाकर शिवजी ने मन ही मन ऐसा कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 52.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 75 शरणागति भक्ति
परमेश्वर की महिमा

रघुपति बिमुख जतन कर कोरी । कवन सकइ भव बंधन छोरी ॥

जीव चराचर बस कै राखे । सो माया प्रभु सों भय भाखे ॥

श्रीरघुनाथजीसे विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसारबन्धन कौन छुड़ा सकता है । जिसने सब चराचर जीवोंको अपने वशमें कर रखा है, वह माया भी प्रभुसे भय खाती है ।

बालकाण्ड, चौपाई 200.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 201 माया–संसार
मन्थरा का प्रतिशोध

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा । बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा ॥

कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥

विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरेको क्या दोष] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ । कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! (अर्थात् रानी तो होनेसे रही)

मन्थरा ने कैकेयी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 16.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 358 नीति–व्यवहार
कर्म का फल

सुभ अरु असुभ करम अनुहारी । ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी ॥

करइ जो करम पाव फल सोई । निगम नीति असि कह सबु कोई ॥

शुभ और अशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वर हृदयमें विचारकर फल देता है । जो कर्म करता है वही फल पाता है । ऐसी वेदकी नीति है, यह सब कोई कहते हैं ।

राजा ने श्रीरघनाथजी की बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 77.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 409
स्मरण का वास्तविक फल

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ । सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ ॥

सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू । तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू ॥

इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्गका सारा श्रम (थकावट) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया । जिनके स्मरणमात्रसे [बार-बार जन्मने और मरनेका] महान् श्रम मिट जाता है, उनको ‘श्रम’ होना — यह केवल लौकिक व्यवहार (नरलीला) है ।

श्रीरामजी ने मन्त्री, लक्ष्मणजी और सीताजी को देवनदी गङ्गाजी की महिमा सुनायी।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 87.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 417

श्रीरामचरितमानस के सब 37 पद्य

In English

Karma and its Fruits

These verses from various texts like the Mahabharata, Puranas, and Ramayana explain how actions (karma) shape a person's destiny and future experiences. They describe how good deeds, such as building temples or helping others, lead to spiritual rewards, while bad actions result in suffering across different lifetimes.

These verses answer

  • What are the spiritual benefits of building a temple?
  • How does karma affect a person's destiny and rebirth?
  • Can good deeds be done after death?
  • What is the relationship between fate and human effort?
  • How can one escape the cycle of karma?