श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

ज्ञान–विवेक

आत्मबोध और विवेक

742 पद्य · 14 ग्रन्थ

देवी भागवत — उत्तरार्द्ध

पञ्चभूतों का आत्मिक विलय

विलाप्य खमहङ्कारे महत्तत्त्वेऽप्यहङ्कृतिम् ।

महान्तं प्रकृतौ मायामात्मनि प्रविलापयेत् ॥

इस प्रकारसे पंचभूतोंकी भावना करके प्रत्येकका अपने कारणरूप दूसरे भूतमें लय करे । पृथ्वीको जलमें, जलको अग्निमें अग्निको वायुमें, वायुको आकाशमें विलीन करनेका ध्यान करके पुनः आकाशको अहंकारमें, अहंकारको महत्तत्त्वमें, महत्तत्त्वको प्रकृतिमें और मायारूपी प्रकृतिको आत्मामें विलीन करना चाहिये ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 8, श्लोक 9 देवी भागवत — उत्तरार्द्ध पृ. 691 वैराग्य

महाभारत — खण्ड १

महाभारत से मोक्षबुद्धि

वैशम्पायन उवाच

अस्मिन्नर्थश्च धर्मश्च निखिलेनोपदिश्यते ।

इतिहासे महापुण्ये बुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ॥

अक्षुद्रान् दानशीलांश्च सत्यशीलाननास्तिकान् ।

कार्ष्णं वेदमिमं विद्वाञ्छ्रावयित्वार्थमश्नुते ॥

इसमें अर्थ और धर्मका भी पूर्णरूपसे उपदेश किया जाता है । इस परम पावन इतिहाससे मोक्षबुद्धि प्राप्त होती है । जिनका स्वभाव अथवा विचार खोटा नहीं है, जो दानशील, सत्यवादी और आस्तिक हैं, ऐसे लोगोंको व्यासद्वारा विरचित वेदस्वरूप इस महाभारतका जो श्रवण कराता है, वह विद्वान् अभीष्ट अर्थको प्राप्त कर लेता है ।

आदिपर्व, अध्याय 62, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड १ पृ. 425 धर्म–आचरण
परमात्मा के स्वरूप

वैशम्पायन उवाच

आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम् ।

पुरुषं विश्वकर्माणं सत्त्वयोगं ध्रुवाक्षरम् ॥

अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् ।

धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम् ॥

कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम् ।

पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः ॥

आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष (अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्गुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है । वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ।

आदिपर्व, अध्याय 63, श्लोक 101–103 महाभारत — खण्ड १ पृ. 445
आत्म-समर्पण की प्रधानता

दुष्यन्त उवाच

आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः ।

आत्मनो मित्रमात्मैव तथाऽऽत्मा चात्मनः पिता ।

आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः ॥

आत्मा ही अपना बन्धु है। आत्मा ही अपना आश्रय है । आत्मा ही अपना मित्र है और वही अपना पिता है, अतः तुम स्वयं ही धर्मपूर्वक आत्मसमर्पण करनेयोग्य हो ।

दुष्यन्त ने शकुन्तला से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 73, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड १ पृ. 527
ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग

यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु कर्हिचित् ।

कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥

‘जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी किसी भी प्राणीके प्रति बुरा भाव नहीं करता, तब वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है’

आदिपर्व, अध्याय 75, श्लोक 52 महाभारत — खण्ड १ पृ. 571

महाभारत — खण्ड १ के सब 19 पद्य

महाभारत — खण्ड २

आसक्ति का प्रभाव

शौनक उवाच

स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च ।

शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात् प्रवर्तते ॥

स्नेहाद् भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा ।

अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥

दुःखका मूल कारण है आसक्ति । आसक्तिसे ही भय होता है । शोक, हर्ष तथा क्लेश — इन सबकी प्राप्ति भी आसक्तिके कारण ही होती है । आसक्तिसे ही विषयोंमें भाव और अनुराग होते हैं । ये दोनों ही अमंगलकारी हैं। इनमें भी पहला अर्थात् विषयोंके प्रति भाव महान् अनर्थकारक माना गया है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 28–29 महाभारत — खण्ड २ पृ. 41 माया–संसार
परम कल्याण के मार्ग

शौनक उवाच

सम्यक्संकल्पसंबन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् ।

सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात् ॥

सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् ।

सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात् ॥

पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 78–79 महाभारत — खण्ड २ पृ. 48 साधना–योग गुरु महिमा
क्षमा का महत्व

युधिष्ठिर उवाच

क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमाः श्रुतम् ।

य एतदेवं जानाति स सर्वं क्षन्तुमर्हति ॥

क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है और क्षमा शास्त्र है । जो इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ क्षमा करनेके योग्य हो जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 36 महाभारत — खण्ड २ पृ. 225
सद्गुणों की प्रधानता

सर्प → राजन

ब्रह्म च ब्राह्मणत्वं च येन त्वाहमचूचुदम् ।

सत्यं दमस्तपो दानमहिंसा धर्मनित्यता ।

साधकानि सदा पुंसां न जातिर्न कुलं नृप ।

अरिष्ट एष ते भ्राता भीमसेनो महाबलः ।

स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ॥

राजन्! उनका ब्रह्म-ज्ञान और ब्राह्मणत्व देखकर भी मुझे बड़ा विस्मय हुआ । इसीलिये इस विषयमें मैंने तुमसे पहले प्रश्न किया था । राजन्! सत्य, इन्द्रियसंयम, तपस्या, दान, अहिंसा और धर्मपरायणता — ये सद्गुण ही सदा मनुष्योंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले हैं, जाति और कुल नहीं । ये रहे तुम्हारे भाई महाबली भीमसेन, जो सर्वथा सकुशल हैं । महाराज! तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं पुनः स्वर्गलोकको जाऊँगा ।

राजा नहुष ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 181, श्लोक 42–43 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1227 वैराग्य धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड २ के सब 56 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

पण्डित की परिभाषा

विदुर उवाच

तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम् ।

उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते ॥

जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थोंकी असलियतका ज्ञान रखनेवाला, सब कार्योंके करनेका ढंग जाननेवाला तथा मनुष्योंमें सबसे बढ़कर उपायका जानकार है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 33, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 245
ज्ञान का क्रियान्वयन

विदुर उवाच

असम्यगुपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि ।

उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुष्ठितम् ॥

अत्यन्त कुशल विद्वानोंके द्वारा भी उपदेश किया हुआ ज्ञान व्यर्थ ही है, यदि उससे कर्तव्यका ज्ञान न हुआ अथवा ज्ञान होनेपर भी उसका अनुष्ठान न हुआ ।

उद्योगपर्व, अध्याय 39, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 326 धर्म–आचरण
धर्म का त्याग न करना

विदुर → तात

इदं च त्वां सर्वपरं ब्रवीमि ।

पुण्यं पदं तात महाविशिष्टम् ।

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् ।

धर्म जह्याज्जीवितस्यापि हेतोः ॥

नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये ।

जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ।

त्यक्त्वानित्यं प्रतितिष्ठस्व नित्ये ।

संतुष्य त्वं तोषपरो हि लाभः ॥

तात! अब मैं तुम्हें यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं सर्वोपरि पुण्यजनक बात बता रहा हूँ — कामनासे, भयसे, लोभसे तथा इस जीवनके लिये भी कभी धर्मका त्याग न करे । धर्म नित्य है, किंतु सुख-दुःख अनित्य हैं । जीव नित्य है, पर इसका कारण अनित्य है । आप अनित्यको छोड़कर नित्यमें स्थित होइये और संतोष धारण कीजिये; क्योंकि संतोष ही सबसे बड़ा लाभ है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 40, श्लोक 12–13 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 335
ज्ञान ही मोक्ष मार्ग

सनत्सुजात → राजन

अन्तवतः क्षत्रिय ते जयन्ति ।

लोकान् जनाः कर्मणा निर्मलेन ।

ब्रह्मैव विद्वांस्तेन चाभ्येति सर्वं ।

नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥

राजन्! सकाम पुरुष अपने पुण्यकर्मोंके द्वारा नाशवान् लोकोंको ही प्राप्त करते हैं; किंतु जो ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् है, वही उस ज्ञानके द्वारा सर्वरूप परमात्माको प्राप्त होता है । मोक्षके लिये ज्ञानके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है ।

सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 44, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 372

महाभारत — खण्ड ३ के सब 61 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

पुत्र शोक का त्याग

नारद उवाच

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।

अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥

श्वैत्य सृजय! वे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य — इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी जीवित न रह सके, तब औरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम अपने उस पुत्रके लिये शोक न करो, जिसने न तो यज्ञ किया था और न दक्षिणा ही दी थी । ऐसा नारदजीने कहा ।

नारदजी ने राजा सृंजय से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 63, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 433 वैराग्य
शोक का त्याग

व्यास → राजन

एवं ज्ञात्वा स्थिरो भूत्वा जह्यरीन् धैर्यमाप्नुहि ।

जीवन्त एव नः शोच्या न तु स्वर्गगतोऽनघ ॥

राजन्! ऐसा जानकर सुस्थिर हो धैर्यका आश्रय लो और उत्साहपूर्वक शत्रुओंका वध करो । अनघ! हमें इस संसारमें जीवित पुरुषोंके लिये ही शोक करना चाहिये । जो स्वर्गमें चला गया है, उसके लिये शोक करना उचित नहीं है ।

व्यासजी ने युधिष्ठिर से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 71, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 464 कर्म–प्रारब्ध
अहिंसा का श्रेष्ठ धर्म

भीमसेन उवाच

अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः ।

तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥

प्राणियोंकी हिंसा न करनेको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना गया है । उसकी जड़ है ब्राह्मण और आप तो उन ब्राह्मणोंमें भी सबसे उत्तम ब्रह्मवेत्ता हैं ।

भीमसेन ने द्रोणाचार्य से युद्ध के अवसर पर कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 192, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1452 धर्म–आचरण
ज्ञानस्वरूप ईश्वर की महिमा

व्यास उवाच

ज्ञानात्मानं ज्ञानगम्यं ज्ञानश्रेष्ठं सुदुर्विदम् ।

दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान् वरान् ॥

वे ज्ञानस्वरूप, ज्ञानगम्य तथा ज्ञानमें श्रेष्ठ हैं । उनके स्वरूपको समझ लेना अत्यन्त कठिन है । वे अपने भक्तोंको कृपापूर्वक मनोवांछित उत्तम फल देनेवाले हैं ।

द्रोणपर्व, अध्याय 202, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1565 भक्ति

महाभारत — खण्ड ४ के सब 17 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

तप, ज्ञान और त्याग

युधिष्ठिर उवाच

तपसा महदाप्नोति बुद्ध्या वै विन्दते महत् ।

त्यागेन सुखमाप्नोति सदा कौन्तेय तत्त्ववित् ॥

कुन्तीनन्दन! तत्त्ववेत्ता पुरुष तपस्याद्वारा महान् पदको प्राप्त कर लेता है, ज्ञानयोगसे उस परमतत्त्वको उपलब्ध कर लेता है और स्वार्थत्यागके द्वारा सदा नित्य सुखका अनुभव करता रहता है ।

युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 19, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 135 साधना–योग
क्षेमाश्रम की महिमा

भीष्म उवाच

निराशीः स्यात् सर्वसमो निर्भोगो निर्विकारवान् ।

विप्रः क्षेमाश्रमं प्राप्तो गच्छत्यक्षरसात्मताम् ॥

आशा-तृष्णाका सर्वथा त्याग करके सबके प्रति समान भाव रखे । भोगोंसे दूर रहे और हृदयमें किसी प्रकारका विकार न आने दे । इन्हीं सब धर्मोंके कारण इस आश्रमको ‘क्षेमाश्रम’ (कल्याणप्राप्तिका स्थान) कहते हैं । इस आश्रममें आया हुआ ब्राह्मण अविनाशी ब्रह्मके साथ एकता प्राप्त कर लेता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 61, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 422 वैराग्य
समान भाव और आत्म-संयम

भीष्म उवाच

आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति मानवः ।

न्यस्तदण्डो जितक्रोधः प्रेत्येह लभते सुखम् ॥

जो मानव समस्त प्राणियोंके प्रति अपने समान ही भाव रखता है, दण्डका त्याग कर देता है, क्रोधको जीत लेता है, वह इस लोकमें और मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी सुख पाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 66, श्लोक 36 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 452 धर्म–आचरण
ज्ञान ग्रहण का प्रभाव

वामदेव उवाच

यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा ज्ञानं तत् प्रतिपद्यते ।

आत्मनो मतमुत्सृज्य तं लोकोऽनुविधीयते ॥

जो कल्याणकारी उपदेश सुनकर अपने मतका आग्रह छोड़ उस ज्ञानको ग्रहण कर लेता है, उसके पीछे यह सारा जगत् चलता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 93, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 631

महाभारत — खण्ड ५ के सब 227 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

आत्मा ही बन्धु और शत्रु

ब्रह्मा उवाच

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।

आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च ॥

आत्मा ही अपना बन्धु है, आत्मा ही अपना शत्रु है तथा आत्मा ही अपने कर्म और अकर्मका साक्षी है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 6, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 86
परमेश्वर की शरण

श्रीकृष्ण उवाच

त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये ।

ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्त्वा जितेन्द्रियाः ॥

आपमें बोध और मननकी शक्ति विद्यमान है । जो लोग आपकी शरणमें आकर सर्वथा आपके आश्रित रहते हैं, वे ध्यानपरायण, नित्य योगयुक्त, सत्यसंकल्प तथा जितेन्द्रिय होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 421 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 223 शरणागति
ब्रह्म का स्वरूप

तण्डि उवाच

मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम् ।

अग्राह्यमचलं शुद्धं बुद्धिग्राह्यं मनोमयम् ॥

वे ही मनु, इन्द्र, अग्नि, मरुद्गण, सम्पूर्ण विश्व तथा ब्रह्माजीकी भी गति हैं । मन और इन्द्रियोंके द्वारा उनका ग्रहण नहीं हो सकता । वे अग्राह्य, अचल, शुद्ध, बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य तथा मनोमय हैं ।

तण्डि मुनि ने ब्रह्म के दर्शन प्राप्त करने के बाद उनकी स्तुति की।

अनुशासनपर्व, अध्याय 16, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 230 माया–संसार
सत्य की श्रेष्ठता

भीष्म उवाच

मुनयः सत्यनिरता मुनयः सत्यविक्रमाः ।

मुनयः सत्यशपथास्तस्मात् सत्यं विशिष्यते ॥

ऋषि-मुनि सत्यपरायण, सत्यपराक्रमी और सत्यप्रतिज्ञ होते हैं । इसलिये सत्य सबसे श्रेष्ठ है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 75, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 672

महाभारत — खण्ड ६ के सब 88 पद्य

लिङ्ग महापुराण

कर्म का प्रभाव

योगिनः सर्वतत्त्वज्ञाः परं वैराग्यमास्थिताः ।

प्राणायामादिभिश्चाष्टसाधनैः सहचारिणः ॥

करुणादिगुणोपेताः कृत्वापि विविधानि ते ।

कर्माणि नरकं स्वर्गं गच्छन्त्येव स्वकर्मणा ॥

सभी तत्त्वोंको जाननेवाले, परम वैराग्यको प्राप्त, प्राणायाम आदि योगके आठ साधनोंसे युक्त तथा करुणा आदि गुणोंसे सम्पन्न बड़े-बड़े योगिजन नानाविध कर्म करके भी अपने कर्मानुसार नरक तथा स्वर्गमें जाते हैं ।

पूर्वभाग, अध्याय 6, श्लोक 2-3 लिङ्ग महापुराण पृ. 37 कर्म–प्रारब्ध

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

सत्य की प्रधानता

धर्ममूलमिदं राम विदितं च सतामपि ।

तत् सत्यं न त्यजेद् राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा ॥

राम! सत्य ही धर्मकी जड़ है, यह सत्पुरुषोंका भी निश्चय है । कहीं ऐसा न हो कि ये महाराज तुम्हारे कारण मुझपर कुपित होकर अपने उस सत्यको ही छोड़ बैठें । जैसे भी इनके सत्यका पालन हो, वैसा तुम्हें करना चाहिये ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 18, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 295 धर्म–आचरण
कर्मफल का विवेक

गुरुलाघवमर्थानामारम्भे कर्मणां फलम् ।

दोषं वा यो न जानाति स बाल इति होच्यते ॥

जो कर्मोंका आरम्भ करते समय उनके फलोंकी गुरुता या लघुताको नहीं जानता, उनसे होनेवाले लाभरूपी गुण अथवा हानिरूपी दोषको नहीं समझता, वह मनुष्य बालक (मूर्ख) कहा जाता है ।

राजा दशरथ ने कौसल्या से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 63, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 422
सत्य की सर्वोच्चता

सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः ।

सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥

जगत्में सत्य ही ईश्वर है । सदा सत्यके ही आधारपर धर्मकी स्थिति रहती है । सत्य ही सबकी जड़ है । सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 109, श्लोक 13 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 539
बुद्धि और विवेक का महत्व

बुद्धिविज्ञानसम्पन्न इङ्गितैः सर्वमाचर ।

नह्यबुद्धिं गतो राजा सर्वभूतानि शास्ति हि ॥

‘बुद्धि और विज्ञानसे सम्पन्न होकर आप दूसरोंकी चेष्टाओंके द्वारा उनका मनोभाव समझें और उसीके अनुसार सभी आवश्यक कार्य करें; क्योंकि जो राजा बुद्धि-बलका आश्रय नहीं लेता, वह सम्पूर्ण प्रजापर शासन नहीं कर सकता’

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 18 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 764 नीति–व्यवहार

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ के सब 18 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

अनुचित कर्मों का दोष

अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च ।

क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥

जो कर्म उचित उपायका अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्र के विपरीत होते हैं, वे पाप-कर्म उसी तरह दोषकी प्राप्ति कराते हैं, जैसे अपवित्र आभि-चारिक यज्ञों में होमे गये हविष्य ।

कामातुर रावण का यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्ण को क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 12, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 266 कर्म–प्रारब्ध
धर्मनिष्ठों की सामर्थ्य

नहि धर्माभिरतानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥

‘क्योंकि जो धर्म में अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है’

विभीषण ने ब्रह्माजी से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 10, श्लोक 33 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 693 धर्म–आचरण
आसक्ति का त्याग

तस्मात् पुत्रेषु दारेषु मित्रेषु च धनेषु च ।

नातिप्रसङ्गः कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवम् ॥

अतः स्त्री, पुत्र, मित्र और धनमें विशेष आसक्ति नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनसे वियोग होना निश्चित है ।

लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 52, श्लोक 12 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 803 वैराग्य
तप का महत्त्व

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना तपः कुर्यामनुत्तमम् ।

तपो हि परमं श्रेयः सम्मोहमितरत् सुखम् ॥

एक समय वृत्रासुरके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं परम उत्तम तप करूँ; क्योंकि तप ही परम कल्याणका साधन है । दूसरा सारा सुख तो मोहमात्र ही है ।

लक्ष्मण ने श्रीराम को वृत्रासुर की कथा सुनाते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 84, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 862 वैराग्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ के सब 10 पद्य

शिव महापुराण — २

अभ्यास से मुक्ति

तस्माज्ज्ञानं यथायोगमभ्यसेत्सततं बुधः ।

अभ्यासाज्जायते सिद्धिर्योगोऽभ्यासात्प्रवर्धते ॥

संवित्तिर्लभ्यतेऽभ्यासादभ्यासान्मोक्षमश्नुते ।

अभ्यासः सततं कार्यो धीमता मोक्षकारणम् ॥

अतः बुद्धिमान् पुरुषको योग-ज्ञानका नित्य अभ्यास करना चाहिये, अभ्याससे सिद्धि उत्पन्न होती है, अभ्याससे योग बढ़ता है । अभ्याससे ज्ञान प्राप्त होता है और अभ्याससे मुक्ति मिलती है, अतः बुद्धिमान्को मोक्षके कारणभूत योगका निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये ।

तस्मिन्पर्व, अध्याय 28, श्लोक 22-23 शिव महापुराण — २ पृ. 524 साधना–योग

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

सर्वान्तर्यामी परमात्मा का भजन

स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व ।

आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः ।

तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत ।

नान्यत्र सज्जेद् यत आत्मपातः ॥

जैसे स्वप्न देखनेवाला स्वप्नावस्थामें अपने-आपको ही विविध पदार्थोंके रूपमें देखता है, वैसे ही सबकी बुद्धि-वृत्तियोंके द्वारा सब कुछ अनुभव करनेवाला सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी एक ही है । उन सत्यस्वरूप आनन्दनिधि भगवान्का ही भजन करना चाहिये, अन्य किसी भी वस्तुमें आसक्ति नहीं करनी चाहिये । क्योंकि यह आसक्ति जीवके अधःपतनका हेतु है ।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 322 भक्ति
सत्सङ्ग का प्रभाव

संगो यः संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया ।

स एव साधुषु कृतो निःसंगत्वाय कल्पते ॥

अज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है ।

देवहूति ने अपने पति कर्दम मुनि से सन्न्यासाश्रम के समय यह बात कही।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 55 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 585 वैराग्य
विषय त्याग और मोक्ष

गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः ।

क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् ।

यथा प्रदीपो घृतवर्तिमश्नन् ।

शिखाः सधूमा भजति ह्यन्यदा स्वम् ।

पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं ।

वृत्तीर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम् ॥

विषयासक्त मन जीवको संसार-संकटमें डाल देता है, विषयहीन होनेपर वही उसे शान्तिमय मोक्षपद प्राप्त करा देता है । जिस प्रकार घीसे भीगी हुई बत्तीको खानेवाले दीपकसे तो धुएँवाली शिखा निकलती रहती है और जब घी समाप्त हो जाता है तब वह अपने कारण अग्नितत्त्वमें लीन हो जाता है — उसी प्रकार विषय और कर्मोंसे आसक्त हुआ मन तरह-तरहकी वृत्तियोंका आश्रय लिये रहता है और इनसे मुक्त होनेपर वह अपने तत्त्वमें लीन हो जाता है ।

पञ्चमस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 8 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 999
आत्मा की निर्लिप्तता

भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभिर्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः ।

न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थितस्तस्या गुणैरन्यतमो निबध्यते ॥

रानियो! सभी प्राणियोंकी मृत्यु अपने पूर्वजन्मोंकी कर्मवासनाके अनुसार समयपर होती है और उसीके अनुसार उनका जन्म भी होता है । परन्तु आत्मा शरीरसे अत्यन्त भिन्न है, इसलिये वह उसमें रहनेपर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मोंसे अछूता ही रहता है ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 41 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1287

श्रीमद्भागवत महापुराण — १ के सब 31 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

शुद्ध मन और परम गति

यस्मिञ्जनः प्राणवियोगकाले ।

क्षणं समावेश्य मनो विशुद्धम् ।

निर्हृत्य कर्माशयमाशु याति ।

परां गतिं ब्रह्ममयोऽर्कवर्णः ॥

जो जीव मृत्युके समय अपने शुद्ध मनको एक क्षणके लिये भी उनमें लगा देता है, वह समस्त कर्म-वासनाओंको धो बहाता है और शीघ्र ही सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्रह्ममय होकर परमगतिको प्राप्त होता है ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 46, श्लोक 32 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 628 कर्म–प्रारब्ध
जगत की मिथ्याता

न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधनादनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे ।

अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथैर्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधाः ॥

भगवन्! वास्तविक बात तो यह है कि यह जगत् उत्पत्तिके पहले नहीं था और प्रलयके बाद नहीं रहेगा; इससे यह सिद्ध होता है कि यह बीचमें भी एकरस परमात्मामें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है । इसीसे हम श्रुतियाँ इस जगत्का वर्णन ऐसी उपमा देकर करती हैं कि जैसे मिट्टीमें घड़ा, लोहेमें शस्त्र और सोनेमें कुण्डल आदि नाममात्र हैं, वास्तवमें मिट्टी, लोहा और सोना ही हैं । वैसे ही परमात्मामें वर्णित जगत् नाममात्र है, सर्वथा मिथ्या और मनकी कल्पना है । इसे नासमझ मूर्ख ही सत्य मानते हैं ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 37 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1001 माया–संसार
उत्तम भगवद्भक्त की पहचान

देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो ।

जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रः ।

संसारधर्मैरविमुह्यमानः ।

स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥

संसारके धर्म हैं — जन्म-मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट, भय और तृष्णा । ये क्रमशः शरीर, प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिको प्राप्त होते ही रहते हैं । जो पुरुष भगवान्की स्मृतिमें इतना तन्मय रहता है कि इनके बार-बार होते-जाते रहनेपर भी उनसे मोहित नहीं होता, पराभूत नहीं होता, वह उत्तम भागवत है ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 49 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1058 वैराग्य
परम सत्य का स्वरूप

यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् ।

पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।

तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं ।

नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥

उद्धवजी! सोनेसे कंगन, कुण्डल आदि बहुत-से आभूषण बनते हैं; परन्तु जब वे गहने नहीं बने थे, तब भी सोना था और जब नहीं रहेंगे, तब भी सोना रहेगा । इसलिये जब बीचमें उसके कंगन-कुण्डल आदि अनेकों नाम रखकर व्यवहार करते हैं, तब भी वह सोना ही है । ठीक ऐसे ही जगत्का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ । वास्तवमें मैं ही सत्य तत्त्व हूँ ।

भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवजी से ब्रह्मविद्या के रहस्य बताते हुए कहते हैं।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 28, श्लोक 19 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1283 लीला–रहस्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २ के सब 21 पद्य

श्रीरामचरितमानस

सत्सङ्ग का महत्व

बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥

सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥

सत्संगके बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजीकी कृपाके बिना वह सत्संग सहजमें मिलता नहीं । सत्संगति आनन्द और कल्याणकी जड़ है । सत्संगकी सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 24 सत्सङ्ग–सन्त महिमा
सत्पुरुष का विवेक

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ॥

संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥

विधाताने इस जड-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 6 श्रीरामचरितमानस पृ. 28 सत्सङ्ग–सन्त महिमा
नाम जप से ब्रह्मसुख

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥

ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥

ब्रह्माके बनाये हुए इस प्रपञ्च (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिनमें] जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 22.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 45 नाम महिमा साधना–योग
नाम की सर्वोच्चता

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा । अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥

मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ॥

निर्गुण और सगुण — ब्रह्मके दो स्वरूप हैं । ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं । मेरी सम्मतिमें नाम इन दोनोंसे बड़ा है, जिसने अपने बलसे दोनोंको अपने वशमें कर रखा है ।

बालकाण्ड, चौपाई 23.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 47 लीला–रहस्य

श्रीरामचरितमानस के सब 191 पद्य

In English

Knowledge, Discernment, and Self-Realization

These verses from the Mahabharata, Ramayana, Puranas, and Smritis explore the nature of the soul, the importance of detachment, and the path to liberation. They teach that true wisdom comes from understanding the eternal self versus the temporary body and overcoming worldly attachments.

These verses answer

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  • How to achieve moksha according to manusmriti?
  • Importance of sattva and detachment in mahabharata?
  • Benefits of listening to rama charitra in shrimad bhagavatam?
  • Difference between maya and reality in devi bhagavat?