श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

लीला–रहस्य

अवतार और प्रभु की लीला का रहस्य

75 पद्य · 10 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड १

ईश्वर के रूप और कार्य

वैशम्पायन उवाच

ईशौ हि तौ महात्मानौ सर्वकार्यप्रवर्तिनौ ।

धर्मकामार्थलोकानां कार्याणां च प्रवर्तकौ ॥

क्योंकि वे दोनों महात्मा निमेष-उन्मेषसे लेकर महाप्रलयपर्यन्त समस्त कार्योंके नियन्ता तथा धर्म, काम और अर्थसाधनमें लगे हुए लोगोंको तत्सम्बन्धी कार्योंमें लगानेवाले ईश्वर (नर-नारायण) हैं ।

सभापर्व, अध्याय 20, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1738
कृष्ण की सर्वोपरता

भीष्म उवाच

कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः ।

कृष्णस्य हि कृते विश्वमिदं भूतं चराचरम् ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं । यह सारा चराचर विश्व इन्हींके लिये प्रकट हुआ है ।

सभापर्व, अध्याय 38, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1871

महाभारत — खण्ड २

भक्तों की आराधना

बालमुकुन्द → ब्रह्मन

सर्वलोके च मां भक्ताः पूजयन्ति च सर्वशः ।

यच्च किंचित् त्वया प्राप्तं मयि क्लेशात्मकं द्विज ॥

सुखोदयाय तत् सर्वं श्रेयसे च तवानघ ।

यच्च किंचित् त्वया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥

विहितः सर्वथैवासी ममात्मा भूतभावनः ।

अर्धं मम शरीरस्य सर्वलोकपितामहः ॥

समस्त जगत्में भक्त पुरुष सब प्रकारसे मेरी आराधना करते हैं । तुमने मेरे निकट आकर जो कुछ भी क्लेश उठाया है, ब्रह्मन्! वह सब तुम्हारे भावी कल्याण और सुखका साधक है । अनघ! लोकमें तुमने जो कोई भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखा है, उसके रूपमें सर्वथा मेरा भूत-भावन आत्मा ही प्रकट हुआ है । सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मा मेरा आधा अंग हैं ।

वनपर्व, अध्याय 189, श्लोक 37–39 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1306 भक्ति
स्कन्द के दिव्य गुण

मार्कण्डेय → राजन

शक्तिर्धर्मो बलं तेजः कान्तत्वं सत्यमुन्नतिः ।

ब्रह्मण्यत्वमसम्मोहो भक्तानां परिरक्षणम् ॥

निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम् ।

स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप ॥

राजन्! शक्ति, धर्म, बल, तेज, कान्ति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, असम्मोह (विवेक), भक्तजनोंकी रक्षा, सुनका संहार और समस्त लोकोंका पालन — ये सारे गुण स्कन्दके साथ ही उत्पन्न हुए थे ।

वनपर्व, अध्याय 229, श्लोक 36–37 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1563

महाभारत — खण्ड ३

ब्रह्मविद्या का महत्व

सनत्सुजात उवाच

उभौ लोकौ विद्यया व्याप्य याति ।

तदा हुतं चाहुतमग्निहोत्रम् ।

मा ते ब्राह्मी लघुतामादधीत ।

प्रज्ञानं स्यान्नाम धीरा लभन्ते ।

योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

ज्ञानी पुरुष ब्रह्मविद्याके द्वारा इस लोक और परलोक दोनोंके तत्त्वको जानकर ब्रह्मभावको प्राप्त होता है । उस समय उसके द्वारा यदि अग्निहोत्र आदि कर्म न भी हुए हों तो भी वे पूर्ण हुए समझे जाते हैं । राजन्! यह ब्रह्मविद्या तुममें लघुता न आने दे तथा इसके द्वारा तुम्हें वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो, जिसे धीर पुरुष ही प्राप्त करते हैं । उसी ब्रह्मविद्याके द्वारा योगीलोग उस सनातन परमात्माका साक्षात्कार करते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 46, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 383 ज्ञान–विवेक
सनातन ब्रह्म का स्वरूप

सनत्सुजात → राजन

नाहं सदासत्कृतः स्यां न मृत्युर्न चामृत्युरमृतं मे कुतः स्यात् ।

सत्यानृते सत्यसमानबन्धे ।

सतश्च योनिरसतश्चैक एव ।

योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

राजन्! मैं कभी किसीके असत्कारका पात्र नहीं होता । न मेरी मृत्यु होती है न जन्म, फिर मोक्ष किसका और कैसे हो [क्योंकि मैं नित्यमुक्त ब्रह्म हूँ] । सत्य और असत्य सब कुछ मुझ सनातन समब्रह्ममें स्थित हैं । एकमात्र मैं ही सत् और असत्की उत्पत्तिका स्थान हूँ। मेरे स्वरूपभूत उस सनातन परमात्माका योगीजन साक्षात्कार करते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 46, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 384 ज्ञान–विवेक
कृष्ण की सर्वोच्चता

संजय उवाच

कालस्य च हि मृत्योश्च जङ्गमस्थावरस्य च ।

ईशते भगवानेकः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥

मैं आपसे यह सच कहता हूँ कि एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही काल, मृत्यु तथा चराचर जगत्के स्वामी एवं शासक हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 68, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 529 काल–मृत्यु
सत्य और धर्म की विजय

संजय उवाच

यतः सत्यं यतो धर्मो यतो हीरार्जवं यतः ।

ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥

जिस ओर सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता है, उसी ओर भगवान् श्रीकृष्ण रहते हैं और जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 68, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 529 भक्ति
दिव्य गङ्गा का प्रादुर्भाव

संजय उवाच

अचिन्त्या दिव्यसंकाशा प्रभोरेषैव संविधिः ।

उपासते यत्र सत्रं सहस्रयुगपर्यये ॥

यह (सात धाराओंका प्रादुर्भाव जगत्के उपकारके लिये) भगवान्‌का ही अचिन्त्य एवं दिव्य सुन्दर विधान है । जहाँ लोग कल्पके अन्ततक यज्ञानुष्ठानके द्वारा परमात्माकी उपासना करते हैं ।

भीष्मपर्व, अध्याय 6, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1266
परमेश्वर का स्वरूप

अर्जुन उवाच

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम ।

त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥

आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत्के परम आश्रय और जाननेवाले तथा जाननेयोग्य और परम धाम हैं । हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत् व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है ।

अर्जुन ने भगवान से कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 35, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1537

महाभारत — खण्ड ४

परब्रह्म श्रीकृष्ण की महिमा

युधिष्ठिर उवाच

त्वं तेजस्त्वं परं ब्रह्म त्वं सत्यं त्वं महत् तपः ।

त्वं श्रेयस्त्वं यशश्चाग्र्यं कारणं जगतस्तथा ॥

त्वया सृष्टमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।

प्रलये समनुप्राप्ते त्वां वै निविशते पुनः ॥

आप ही तेज, आप ही परब्रह्म, आप ही सत्य, आप ही महान् तप, आप ही श्रेय, आप ही उत्तम यश और आप ही जगत्के कारण हैं । आपने ही इस सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्की सृष्टि की है और प्रलयकाल आनेपर यह पुनः आपहीमें लीन हो जाता ।

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 149, श्लोक 28–29 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1084
परमेश्वर के स्वरूप

व्यास उवाच

धाता च स विधाता च विश्वात्मा विश्वकर्मकृत् ।

सर्वासां देवतानां च धारयत्यवपुर्वपुः ॥

वे ही धाता, विधाता, विश्वात्मा और विश्वरूपी कार्यके कर्ता हैं । वे शरीररहित होकर भी सम्पूर्ण देवताओंके शरीर धारण करते हैं ।

द्रोणपर्व, अध्याय 202, श्लोक 105 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1576
धर्मनिष्ठों की विजय

संजय उवाच

येषां च जगतीनाथ नाथः कृष्णो जनार्दनः ।

कथं तेषां जयो न स्याद् येषां धर्मो व्यपाश्रयः ॥

सम्पूर्ण जगत्के स्वामी जनार्दन श्रीकृष्ण जिनके रक्षक हैं और जिन्हें धर्मका आश्रय प्राप्त है, उनकी विजय क्यों न हो?

पाण्डव-सैनिकों ने आपस में कहा।

शल्यपर्व, अध्याय 19, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2584

महाभारत — खण्ड ५

ब्रह्म की प्राप्ति

युधिष्ठिर उवाच

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥

जब पुरुष प्राणियोंकी पृथक्-पृथक् सत्ताको एकमात्र परमात्मामें ही स्थित देखता है और उस परमात्मासे ही सम्पूर्ण भूतोंका विस्तार हुआ मानता है, उस समय वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको प्राप्त होता है ।

युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 17, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 124 ज्ञान–विवेक
परमात्मा के विविध नाम

विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।

विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥

‘यह सम्पूर्ण विश्व आपकी लीलामयी सृष्टि है । आप इस विश्वके आत्मा हैं । आपहीसे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है । आप ही व्यापक होनेके कारण’ विष्णु‘, विजयी होनेसे’ जिष्णु ‘, दुःख और पाप हर लेनेसे’ हरि‘, अपनी ओर आकृष्ट करनेके कारण’ कृष्ण ‘, विकुण्ठ धामके अधिपति होनेसे’ वैकुण्ठ ‘तथा क्षर-अक्षर पुरुषसे उत्तम होनेके कारण’ पुरुषोतम कहलाते हैं । आपको नमस्कार है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 43, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 282
राजा का अग्निस्वरूप

बृहस्पति उवाच

यदा ह्यासीदतः पापान् दहत्युग्रेण तेजसा ।

मिथ्योपचरितो राजा तदा भवति पावकः ॥

जब पापात्मा मनुष्य राजाके साथ मिथ्या बर्ताव करके उसे ठगते हैं, तब वह अग्निस्वरूप हो जाता है और अपने उग्र तेजसे समीप आये हुए उन पापियोंको जलाकर भस्म कर देता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 68, श्लोक 42 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 466 कर्म–प्रारब्ध
नारायण का आत्मज्ञान

श्रीभगवान् उवाच

जानाम्यध्यात्मयोगांश्च योऽहं यस्माच्च भारत ।

निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाऽऽभ्युदयिकोऽपि च ।

नराणामयनं ख्यातमहमेकः सनातनः ॥

भारत! मैं अध्यात्मयोगोंको जानता हूँ तथा मैं कौन हूँ और कहाँसे आया हूँ — इस बातका भी मुझे ज्ञान है । लौकिक अभ्युदयका साधक प्रवृत्तिधर्म ओर निःश्रेयस प्रदान करनेवाला निवृत्तिधर्म भी मुझसे अज्ञात नहीं है । एकमात्र मैं सनातन पुरुष ही सम्पूर्ण मनुष्योंका सुविख्यात आश्रयभूत नारायण हूँ ।

भगवान ने अर्जुन से अपने स्वरूप और ज्ञान के विषय में कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 341, श्लोक 38–39 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2315 ज्ञान–विवेक
वासुदेव के रूप

ब्रह्मा उवाच

ये केचित् सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते ।

दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत् ॥

सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः ।

सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते ॥

समस्त विश्वमें जो कोई देवताओंके लिये यज्ञ और पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, दान देते हैं और बड़ी भारी तपस्या करते हैं, उन सबके आश्रय भगवान् विष्णु ही हैं । वे अपने ऐश्वर्ययोगमें स्थित रहते हैं । सम्पूर्ण प्राणियोंके आवासस्थान होनेके कारण वे ‘वासुदेव’ कहे जाते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 347, श्लोक 93–94 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2378 शरणागति

महाभारत — खण्ड ६

धर्म की रक्षा हेतु अवतार

भीष्म उवाच

यदा धर्मो ग्लाति वंशे सुराणां ।

तदा कृष्णो जायते मानुषेषु ।

धर्मे स्थित्वा स तु वै भावितात्मा ।

परांश्च लोकानपरांश्च पाति ॥

जब धर्मका ह्रास होने लगता है, तब ये शुद्ध अन्तःकरणवाले श्रीकृष्ण देवताओं तथा मनुष्योंके कुलमें अवतार लेकर स्वयं धर्ममें स्थित हो उसका आचरण करते हुए उसकी स्थापना तथा पर और अपर लोकोंकी रक्षा करते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 158, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1498 धर्म–आचरण
कृष्ण का सर्वव्यापी स्वरूप

भीष्म उवाच

वेद्यं च यद् वेदयते च वेद्यं ।

विधिश्च यश्च श्रयते विधेयम् ।

धर्मे च वेदे च बले च सर्वं ।

चराचरं केशवं त्वं प्रतीहि ॥

ये स्वयं वेद्यस्वरूप होकर भी वेदवेद्य तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करते हैं । विधिरूप होकर भी विहित कर्मोंका आश्रय लेते हैं । ये ही धर्म, वेद और बलमें स्थित हैं । तुम यह विश्वास करो कि सारा चराचर जगत् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 158, श्लोक 36 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1503 माया–संसार
मृत्यु के रूप में श्रीकृष्ण

भीष्म उवाच

मृत्युश्चैव प्राणिनामन्तकाले ।

साक्षात् कृष्णः शाश्वतो धर्मवाहः ।

भूतं च यच्चेह न विद्या किंचिद् ।

विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि ॥

प्राणियोंका अन्तकाल आनेपर साक्षात् श्रीकृष्ण ही मृत्युरूप बन जाते हैं । ये धर्मके सनातन रक्षक हैं । जो बात बीत चुकी है तथा जिसका अभी कोई पता नहीं है, वे सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट होते हैं, यह निश्चितरूपसे जान लो ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 158, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1505 कर्म–प्रारब्ध
धर्म की रक्षा हेतु अवतार

वासुदेव → भार्गव

तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः ।

बह्वीः संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम ॥

धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।

तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव ॥

भार्गव! उस धर्ममें प्रवृत्त होकर जो पाप कर्मोंसे निवृत्त हो गये हैं ऐसे मनुष्योंके साथ मैं सदा निवास करता हूँ । साधुशिरोमणे! मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप बर्ताव करता हूँ ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 54, श्लोक 12–13 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1845 धर्म–आचरण
धर्म की स्थापना

वासुदेव उवाच

अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमच्युतः ।

धर्मस्य सेतुं बध्नामि चलिते चलिते युगे ।

तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ॥

अधर्ममें लगे हुए सभी मनुष्योंको दण्ड देनेवाला और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाला ईश्वर मैं ही हूँ । जब-जब युगका परिवर्तन होता है, तब-तब मैं प्रजाकी भलाईके लिये भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादाकी स्थापना करता हूँ ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 54, श्लोक 15–16 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1846 धर्म–आचरण

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

श्रीराम के दिव्य गुण

तेजसाऽऽदित्यसंकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।

बृहस्पतिसमो बुद्ध्या यशसा वासवोपमः ॥

रक्षिता जीवलोकस्य खजनस्य च रक्षिता ।

रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य धर्मस्य च परंतपः ॥

वे तेजमें सूर्य के समान, क्षमामें पृथ्वीके तुल्य, बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश और यशमें इन्द्रके समान हैं । वे सम्पूर्ण जीव-जगत् के तथा स्वजनोंके भी रक्षक हैं । शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम अपने सदाचार और धर्मकी रक्षा करते हैं ।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 35, श्लोक 9–10 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 127 धर्म–आचरण

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

परमेश्वर का अवतार

यो नः सपत्नैर्भृशमर्द्यमानान् ।

देवर्षितिर्यङ्नृषु नित्य एव ।

कृतावतारस्तनुभिः स्वमायया ।

कृत्वाऽऽत्मसात् पाति युगे युगे च ॥

इति तेषां महाराज सुराणामुपतिष्ठताम् । वे प्रभु जब देखते हैं कि देवता अपने शत्रुओंसे बहुत पीड़ित हो रहे हैं, तब वे वास्तवमें निर्विकार रहनेपर भी अपनी मायाका आश्रय लेकर देवता, ऋषि, पशु-पक्षी और मनुष्यादि योनियोंमें अवतार लेते हैं, तथा युग-युगमें हमें अपना समझकर हमारी रक्षा करते हैं ।

देवताओं ने भगवान् से कहा।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 9, श्लोक 26 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1181
काल और निर्विकार आत्मा

त्वमेव कालोऽनिमिषो जनानामायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि ।

कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महांस्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ॥

आप ही काल हैं । आप प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने क्षण, लव आदि विभागोंके द्वारा लोगोंकी आयु क्षीण करते रहते हैं । फिर भी आप निर्विकार हैं । क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अजन्मा, महान् और सम्पूर्ण जीवोंके जीवनदाता अन्तरात्मा हैं ।

हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी की स्तुति करते हुए कहा।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 31 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1298 ज्ञान–विवेक
परमात्मनिष्ठता का प्रभाव

परे ब्रह्मण्यनिर्देश्ये भगवत्यखिलात्मनि ।

युक्तात्मन्यफला आसन्नपुण्यस्येव सत्क्रियाः ॥

उस समय प्रह्लादजीका चित्त उन परमात्मामें लगा हुआ था, जो मन-वाणीके अगोचर, सर्वात्मा, समस्त शक्तियोंके आधार एवं परब्रह्म हैं । इसलिये उनके सारे प्रहार ठीक वैसे ही निष्फल हो गये, जैसे भाग्यहीनोंके बड़े-बड़े उद्योग-धंधे व्यर्थ होते हैं ।

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 41 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1316 ज्ञान–विवेक
सर्वत्र व्याप्त परमात्मा

परावरेषु भूतेषु ब्रह्मान्तस्थावरादिषु ।

भौतिकेषु विकारेषु भूतेष्वथ महत्सु च ॥

गुणेषु गुणसाम्ये च गुणव्यतिकरे तथा ।

एक एव परो ह्यात्मा भगवानीश्वरोऽव्ययः ॥

ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक छोटे-बड़े समस्त प्राणियोंमें, पंचभूतोंसे बनी हुई वस्तुओंमें, पंचभूतोंमें, सूक्ष्म तन्मात्राओंमें, महत्तत्त्वमें तीनों गुणोंमें और गुणोंकी साम्यावस्था प्रकृतिमें एक ही अविनाशी परमात्मा विराजमान हैं । वे ही समस्त सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्योंकी खान हैं ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 20–21 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1323 ज्ञान–विवेक

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

परमेश्वर की माया और शक्ति

स्थिरचरजातयः स्युरजयोत्थनिमित्तयुजो ।

विहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त ततः ॥

न हि परमस्य कश्चिदपरो न परश्च भवेद् ।

वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधतः ॥

नित्यमुक्त! आप मायातीत हैं, फिर भी जब अपने ईक्षणमात्रसे-संकल्पमात्रसे मायाके साथ क्रीडा करते हैं, तब आपका संकेत पाते ही जीवोंके सूक्ष्म शरीर और उनके सुप्त कर्म-संस्कार जग जाते हैं और चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है । प्रभो! आप परम दयालु हैं । आकाशके समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई आपका अपना है और न तो पराया । वास्तवमें तो आपके स्वरूपमें मन और वाणीकी गति ही नहीं है । आपमें कार्य-कारणरूप प्रपंचका अभाव होनेसे बाह्य दृष्टिसे आप शून्यके समान ही जान पड़ते हैं; परन्तु उस दृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारण आप परम सत्य हैं ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 29 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 997 ज्ञान–विवेक
परमात्मा की अद्वैतता

स यदजया त्वजामनुशयीत गुणांश्च जुषन् ।

भजति सरूपतां तदनु मृत्युमपेतभगः ॥

त्वमुत जहासि तामहिरिव त्वचमात्तभगो ।

महसि महीयसेऽष्टगुणितेऽपरिमेयभगः ॥

भगवन्! जब जीव मायासे मोहित होकर अविद्याको अपना लेता है, उस समय उसके स्वरूपभूत आनन्दादि गुण ढक जाते हैं; वह गुणजन्य वृत्तियों, इन्द्रियों और देहोंमें फँस जाता है तथा उन्हींको अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है । अब उनकी जन्म-मृत्युमें अपनी जन्म-मृत्यु मानकर उनके चक्करमें पड़ जाता है । परन्तु प्रभो! जैसे साँप अपने केंचुलसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, उसे छोड़ देता है — वैसे ही आप माया — अविद्यासे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, उसे सदा-सर्वदा छोड़े रहते हैं । इसीसे आपके सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सदा-सर्वदा आपके साथ रहते हैं । अणिमा आदि अष्टसिद्धियोंसे युक्त परमैश्वर्यमें आपकी स्थिति है । इसीसे आपका ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य अपरिमित है, अनन्त है; वह देश, काल और वस्तुओंकी सीमासे आबद्ध नहीं है ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 38 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1002 माया–संसार
भक्त की मोक्षगति

त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थशुभाशुभयोर्गुणविगुणान्वयांस्तर्हि देहभृतां च गिरः ।

अनुगमन्वहं सगुण गीतपरम्परया ।

श्रवणभृतो यतस्त्वमपवर्गगतिर्मनुजैः ॥

भगवन्! आपके वास्तविक स्वरूपको जाननेवाला पुरुष आपके दिये हुए पुण्य और पाप-कर्मोंके फल सुख एवं दुःखोंको नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य और भोक्तापनके भावसे ऊपर उठ जाता है । उस समय विधि-निषेधके प्रतिपादक शास्त्र भी उससे निवृत्त हो जाते हैं; क्योंकि वे देहाभिमानियोंके लिये हैं । उनकी ओर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता । जिसे आपके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ है, वह भी यदि प्रतिदिन आपकी प्रत्येक युगमें की हुई लीलाओं, गुणोंका गान सुन-सुनकर उनके द्वारा आपको अपने हृदयमें बैठा लेता है तो अनन्त, अचिन्त्य, दिव्यगुणगणोंके निवासस्थान प्रभो! आपका वह प्रेमी भक्त भी पाप-पुण्योंके फल सुख-दुःखों और विधि-निषेधोंसे अतीत हो जाता है । क्योंकि आप ही उनकी मोक्षस्वरूप गति हैं । (परन्तु इन ज्ञानी और प्रेमियोंको छोड़कर और सभी शास्त्र बन्धनमें हैं तथा वे उसका उल्लंघन करनेपर दुर्गतिको प्राप्त होते हैं)

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 40 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1003 ज्ञान–विवेक
परमात्मा की महिमा

य एवमव्याकृतशक्त्युदन्वतः ।

परस्य साक्षात् परमात्मनो हरेः ।

गिरित्रमोक्षं कथयेच्छृणोति वा ।

विमुच्यते संसृतिभिस्तथारिभिः ॥

भगवान् अनन्त शक्तियोंके समुद्र हैं । उनकी एक-एक शक्ति मन और वाणीकी सीमाके परे है । वे प्रकृतिसे अतीत स्वयं परमात्मा हैं । उनकी शंकरजीको संकटसे छुड़ानेकी यह लीला जो कोई कहता या सुनता है, वह संसारके बन्धनों और शत्रुओंके भयसे मुक्त हो जाता है ।

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 88, श्लोक 40 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1018 ज्ञान–विवेक
परम सत्य का स्वरूप

यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् ।

पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।

तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं ।

नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥

उद्धवजी! सोनेसे कंगन, कुण्डल आदि बहुत-से आभूषण बनते हैं; परन्तु जब वे गहने नहीं बने थे, तब भी सोना था और जब नहीं रहेंगे, तब भी सोना रहेगा । इसलिये जब बीचमें उसके कंगन-कुण्डल आदि अनेकों नाम रखकर व्यवहार करते हैं, तब भी वह सोना ही है । ठीक ऐसे ही जगत्का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ । वास्तवमें मैं ही सत्य तत्त्व हूँ ।

भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवजी से ब्रह्मविद्या के रहस्य बताते हुए कहते हैं।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 28, श्लोक 19 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1283 ज्ञान–विवेक

श्रीरामचरितमानस

सकल जगत की वन्दना

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ॥

बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥

जगत्में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलोंकी सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ ।

बालकाण्ड, दोहा 7(ग) श्रीरामचरितमानस पृ. 29 माया–संसार
भगवान की कृपा

सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ॥

जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ॥

वह लीला केवल भक्तोंके हितके लिये ही है; क्योंकि भगवान् परम कृपालु हैं और शरणागतके बड़े प्रेमी हैं । जिनकी भक्तोंपर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिसपर कृपा कर दी, उसपर फिर कभी क्रोध नहीं किया ।

बालकाण्ड, चौपाई 13.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 36
राम नाम की महिमा

बंदउँ नाम राम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ॥

बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ॥

मैं श्रीरघुनाथजीके नाम ‘राम’ की वन्दना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् ‘र’ ‘आ’ और ‘म’ रूपसे बीज है । वह ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है । वह वेदोंका प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणोंका भण्डार है ।

बालकाण्ड, चौपाई 19.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 43 नाम महिमा
नाम की सर्वोच्चता

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा । अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥

मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ॥

निर्गुण और सगुण — ब्रह्मके दो स्वरूप हैं । ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं । मेरी सम्मतिमें नाम इन दोनोंसे बड़ा है, जिसने अपने बलसे दोनोंको अपने वशमें कर रखा है ।

बालकाण्ड, चौपाई 23.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 47 ज्ञान–विवेक
शक्ति का स्वरूप

अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि । सदा संभु अरधंग निवासिनि ॥

जग संभव पालन लय कारिनि । निज इच्छा लीला बपु धारिनि ॥

ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनी शक्ति हैं । सदा शिवजीके अर्द्धाङ्गमें रहती हैं । ये जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली हैं; और अपनी इच्छासे ही लीला-शरीर धारण करती हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 98.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 114
परमेश्वर का स्वरूप

प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू । जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥

राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्ब रहित सब उर पुर बासी ॥

हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने पहले आपसे पूछी थी, वही कहिये । [यह सत्य है कि] श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्म हैं, चिन्मय (ज्ञानस्वरूप) हैं, अविनाशी हैं, सबसे रहित और सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करनेवाले हैं ।

पार्वतीजी ने शिवजी से अपना पहला प्रश्न फिर पूछा।

बालकाण्ड, चौपाई 120(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 134 ज्ञान–विवेक भक्ति

श्रीरामचरितमानस के सब 42 पद्य

In English

The Mystery of Divine Play

These verses from the Mahabharata, Puranas, Ramayana, and Ramcharitmanas describe how the Supreme Being manifests through divine play (Leela). They teach that all living beings and the entire universe originate from and exist within the Divine, who takes incarnations to protect righteousness.

These verses answer

  • How is the universe connected to vishnu or krishna?
  • Why does god take different forms or incarnations?
  • What is the relationship between the supreme soul and the material world?
  • How can one achieve liberation according to these texts?