श्रीगणेशाय नमः।
मर्म — विषय
नाम महिमा
भगवन्नाम की सामर्थ्य
45 पद्य · 6 ग्रन्थ
महाभारत — खण्ड ४
व्यास उवाच
नामधेयानि लोकेषु बहून्यस्य यथार्थवत् ।
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात् कर्मणस्तथा ॥
उनकी महत्ता, सर्वव्यापकता तथा कर्मके अनुसार लोकमें इनके बहुत-से यथार्थ नाम बताये जाते हैं ।
महाभारत — खण्ड ५
भीष्म उवाच
एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो ।
दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः ।
दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म ।
कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥
भगवान् श्रीकृष्णको एक बार भी प्रणाम किया जाय तो वह दस अश्वमेध यज्ञोंके अन्तमें किये गये स्नानके समान फल देनेवाला होता है । इसके सिवा प्रणाममें एक विशेषता है — दस अश्वमेध करनेवालेका तो पुनः इस संसारमें जन्म होता है, किंतु श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला मनुष्य फिर भव-बन्धनमें नहीं पड़ता ।
महाभारत — खण्ड ६
भीष्म उवाच
देवानृषिगणांश्चैव नृपांश्च जगतीश्वरान् ।
सांख्यं योगं च परमं हव्यं कव्यं तथैव च ॥
कीर्तितं परमं ब्रह्म सर्वश्रुतिपरायणम् ।
मङ्गल्यं सर्वभूतानां पवित्रं बहुकीर्तितम् ॥
व्याधिप्रशमनं श्रेष्ठं पौष्टिकं सर्वकर्मणाम् ।
प्रयतः कीर्तयेच्चैतान् कल्यं सायं च भारत ॥
देवताओं, ऋषियों तथा पृथ्वीपर शासन करनेवाले राजाओंका कीर्तन करना चाहिये । सांख्ययोग, उत्तम हव्य-कव्य तथा समस्त श्रुतियोंके आधारभूत परब्रह्म परमात्माका कीर्तन सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मंगलमय परम पावन है । इनके बारंबार कीर्तनसे रोगोंका नाश होता है । इससे सब कर्मोंमें उत्तम पुष्टि प्राप्त होती है । भारत! मनुष्यको प्रतिदिन सबेरे और शामके समय शुद्धचित्त होकर भगवत्-कीर्तनके साथ ही उपर्युक्त देवताओं, ऋषियों और राजाओंके भी नाम लेने चाहिये ।
भीष्म उवाच
धर्मो विवर्धति भृगोः परिकीर्तनेन ।
वीर्यं विवर्धति वसिष्ठनमोनतेन ॥
संग्रामजिद् भवति चैव रघुं नमस्यन् ।
स्यादश्विनौ च परिकीर्तयतो न रोगः ॥
भृगुका नाम लेनेसे धर्मकी वृद्धि होती है । वसिष्ठ मुनिको नमस्कार करनेसे वीर्य बढ़ता है । राजा रघुको प्रणाम करनेवाला क्षत्रिय संग्रामविजयी होता है तथा अश्विनीकुमारोंका नाम लेनेवाले मनुष्यको कभी रोग नहीं सताता ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
श्रीमद्भागवत महापुराण — १
कृष्णप्रियं सकलकल्मषनाशनं च ।
मुक्त्येकहेतुमिह भक्तिविलासकारि ॥
सन्तः कथानकमिदं पिबतादरेण ।
लोके हि तीर्थपरिशीलनसेवया किम् ॥
संतजन! आपलोग आदरपूर्वक इस कथामृतका पान कीजिये । यह श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला मुक्तिका एकमात्र कारण और भक्तिको बढ़ानेवाला है । लोकमें अन्य कल्याणकारी साधनोंका विचार करने और तीर्थोंका सेवन करनेसे क्या होगा ।
सूतजी ने सन्तों से यह कहा।
कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य ।
महत्तमैकान्तपरायणस्य ।
योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो ।
महद्गुणत्वाद् यमनन्तमाहुः ॥
फिर उन लोगोंकी तो बात ही क्या है, जो सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय भगवान्का नाम लेते हैं! भगवान्की शक्ति अनन्त है, वे स्वयं अनन्त हैं । वास्तवमें उनके गुणोंकी अनन्तताके कारण ही उन्हें अनन्त कहा गया है ।
यथागदं वीर्यतममुपयुक्तं यदृच्छया ।
अजानतोऽप्यात्मगुणं कुर्यान्मन्त्रोऽप्युदाहृतः ॥
जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृतको उसका गुण न जानकर अनजानमें पी ले तो भी वह अवश्य ही पीनेवालेको अमर बना देता है, वैसे ही अनजानमें उच्चारण करनेपर भी भगवान्का नाम अपना फल देकर ही रहता है (वस्तुशक्ति श्रद्धाकी अपेक्षा नहीं करती)
विष्णुदूतों ने यमदूतों से कहा।
श्रीमद्भागवत महापुराण — २
सूत उवाच
य इदमनुशृणोति श्रावयेद् वा मुरारेश्चरितममृतकीर्तेर्वर्णितं व्यासपुत्रैः ।
जगदघभिदलं तद्भक्तसत्कर्णपूरं ।
भगवति कृतचित्तो याति तत्क्षेमधाम ॥
सूतजी कहते हैं — शौनकादि ऋषियो! भगवान् श्रीकृष्णकी कीर्ति अमर है, अमृतमयी है । उनका चरित्र जगत्के समस्त पाप-तापोंको मिटानेवाला तथा भक्तजनोंके कर्णकुहरोंमें आनन्दसुधा प्रवाहित करनेवाला है । इसका वर्णन स्वयं व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीने किया है । जो इसका श्रवण करता है अथवा दूसरोंको सुनाता है, उसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्ति भगवान्में लग जाती है और वह उन्हींके परम कल्याणस्वरूप धामको प्राप्त होता है ।
सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं।
संकीर्त्यमानो भगवाननन्तः ।
श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् ।
प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं ।
यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ॥
संकीर्तन किया जाय अथवा उनके प्रभाव, महिमा आदिका श्रवण किया जाय तो वे स्वयं ही हृदयमें आ विराजते हैं और श्रवण तथा कीर्तन करनेवाले पुरुषके सारे दुःख मिटा देते हैं — ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अन्धकारको और आँधी बादलोंको तितर-बितर कर देती है ।
सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।
मृषा गिरस्ता ह्यसतीरसत्कथा ।
न कथ्यते यद् भगवानधोक्षजः ।
तदेव सत्यं तदुहैव मंगलं ।
तदेव पुण्यं भगवद्गुणोदयम् ॥
गुण -,, जिस वाणीके द्वारा घट घटवासी अविनाशी भगवान्के नाम लीला आदिकाउच्चारण नहीं होता, वह वाणी भावपूर्ण होनेपर भी निरर्थक है-सारहीन है, सुन्दर होनेपर भी असुन्दर है और उत्तमोत्तम विषयोंका प्रतिपादन करनेवाली होनेपर भी असत्कथा है । जो वाणी और वचन भगवान्के गुणोंसे परिपूर्ण रहते हैं, वे ही परम पावन हैं, वे ही मंगलमय हैं और वे ही परम सत्य हैं ।
अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः ।
क्षिणोत्यभद्राणि शमं तनोति च ।
सत्त्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं ।
ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम् ॥
भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी अविचल स्मृति सारे पाप ताप और अमंगलोंको नष्ट कर देती और परम शान्तिका विस्तार करती है । उसीके द्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, भगवान्की भक्ति प्राप्त होती है एवं परवैराग्यसे युक्त भगवान्के स्वरूपका ज्ञान तथा अनुभव प्राप्त होता है ।
सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।
श्रीरामचरितमानस
बंदउँ नाम राम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ॥
मैं श्रीरघुनाथजीके नाम ‘राम’ की वन्दना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् ‘र’ ‘आ’ और ‘म’ रूपसे बीज है । वह ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है । वह वेदोंका प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणोंका भण्डार है ।
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ॥
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और ‘राम’ नामके दो सुन्दर अक्षर सावन-भादोंके महीने हैं ।
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥
ब्रह्माके बनाये हुए इस प्रपञ्च (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिनमें] जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं ।
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा । ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा ॥
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ । कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ ॥
चारों ही चतुर भक्तोंको नामका ही आधार है; इनमें ज्ञानी भक्त प्रभुको विशेषरूपसे प्रिय है । यों तो चारों युगोंमें और चारों ही वेदोंमें नामका प्रभाव है, परन्तु कलियुगमें विशेषरूपसे है । इसमें तो [नामको छोड़कर] दूसरा कोई उपाय ही नहीं है ।
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार ॥
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार ॥
इस प्रकार निर्गुणसे नामका प्रभाव अत्यन्त बड़ा है । अब अपने विचारके अनुसार कहता हूँ कि नाम [सगुण] रामसे भी बड़ा है ।
राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ॥
रिषि हित राम सुकेतुसुता की । सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी ॥
सहित दोष दुख दास दुरासा । दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा ॥
भंजेउ राम आपु भव चापू । भव भय भंजन नाम प्रतापू ॥
श्रीरामजीने एक तपस्वीकी स्त्री (अहल्या) को ही तारा, परन्तु नामने करोड़ों दुष्टोंकी बिगड़ी बुद्धिको सुधार दिया । श्रीरामजीने ऋषि विश्वामित्रके हितके लिये एक सुकेतु यक्षकी कन्या ताड़काकी सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की; परन्तु नाम अपने भक्तोंके दोष, दुःख और दुराशाओंका इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रिका । श्रीरामजीने तो स्वयं शिवजीके धनुषको तोड़ा, परन्तु नामका प्रताप ही संसारके सब भयोंका नाश करनेवाला है ।
तुलसीदासजी राम-नाम की महिमा का वर्णन करते हुए।
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि ॥
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि ॥
इस प्रकार नाम [निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] राम दोनोंसे बड़ा है । यह वरदान देनेवालोंको भी वर देनेवाला है । श्रीशिवजीने अपने हृदयमें यह जानकर ही सौ करोड़ रामचरित्रमेंसे इस ‘राम’ नामको [साररूपसे चुनकर] ग्रहण किया है ।
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥
अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (वैर) से, क्रोधसे या आलस्यसे, किसी तरहसे भी नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें कल्याण होता है । उसी (परम कल्याणकारी) रामनामका स्मरण करके और श्रीरघुनाथजीको मस्तक नवाकर मैं रामजीके गुणोंका वर्णन करता हूँ ।
In English
The Power of the Divine Name
These verses from the Mahābhārata, Śrīmad Bhāgavata Purāṇa, and Rāmacaritmānasa explain the spiritual potency of chanting God's name. They teach that reciting the names of Krishna or Rama can destroy sins, remove suffering, and grant liberation more effectively than many rituals.
These verses answer
- Benefits of chanting krishna's name in bhagavata purana?
- Significance of rama nama in ramcharitmanas?
- How does chanting god's name destroy sins according to mahabharata?
- Is the divine name more powerful than the deity itself?