श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

नीति–व्यवहार

लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म

460 पद्य · 11 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड १

धन का बँटवारा

विभावसु उवाच

विभागं बहवो मोहात् कर्तुमिच्छन्ति नित्यशः ।

ततो विभक्तास्त्वन्योन्यं विक्रुध्यन्तेऽर्थमोहिताः ॥

भाई! बहुत-से मनुष्य मोहवश सदा धनका बँटवारा कर लेनेकी इच्छा रखते हैं । तदनन्तर बँटवारा हो जानेपर धनके मोहमें फँसकर वे एक-दूसरेके विरोधी हो परस्पर क्रोध करने लगते हैं ।

बड़े भाई विभावसु ने सुप्रतीक से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 29, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड १ पृ. 261 माया–संसार
परीक्षित के सद्गुण

सौति उवाच

जितेन्द्रियश्चात्मवांश्च मेधावी धर्मसेविता ।

षड्वर्गजिन्महाबुद्धिर्नीतिशास्त्रविदुत्तमः ॥

उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर मनको अपने वशमें कर रखा था । वे मेधावी तथा धर्मका सेवन करनेवाले थे । उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य — इन छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली थी । उनकी बुद्धि विशाल थी । वे नीतिके विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ थे ।

आदिपर्व, अध्याय 49, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड १ पृ. 360 काम–क्रोध–लोभ–मोह
सच्चा विद्वान

ययाति उवाच

न मानमान्यो मुदमाददीत ।

न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात् ।

सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके ।

नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते ॥

विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो और अपमानित होनेपर संतप्त न हो । इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं । दुष्ट पुरुषोंको ‘यह सत्पुरुष है’ ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती ।

आदिपर्व, अध्याय 90, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड १ पृ. 670
कुल का कल्याण

एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा ।

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ॥

ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।

स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः ॥

न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः ।

ततः पुत्रशतं पूर्णं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ॥

‘केवल एक पुत्रके त्यागद्वारा इस सम्पूर्ण कुलका तथा समस्त जगत्का कल्याण कीजिये । नीति कहती है कि समूचे कुलके हितके लिये एक व्यक्तिको त्याग दे, गाँवके हितके लिये एक कुलको छोड़ दे, देशके हितके लिये एक गाँवका परित्याग कर दे और आत्माके कल्याणके लिये सारे भूमण्डलको त्याग दे ।’ विदुर तथा उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके यों कहनेपर भी पुत्रस्नेहके बन्धनमें बँधे हुए राजा धृतराष्ट्रने वैसा नहीं किया । जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रके पूरे सौ पुत्र हुए ।

ब्राह्मणलोग तथा परम बुद्धिमान् विदुरजी राजा धृतराष्ट्र से इस प्रकार बोले।

आदिपर्व, अध्याय 114, श्लोक 38–40 महाभारत — खण्ड १ पृ. 831
कर्म का महत्व

दुर्योधन उवाच

भयं परिहरन् मन्द आत्मानं परिपालयन् ।

वर्षासु क्लिन्नकटवत् तिष्ठन्नेवावसीदति ॥

मूर्ख मनुष्य भयका त्याग और आत्मरक्षा करते हुए भी यदि चुपचाप बैठा रहे, उद्योग न करे, तो वह वर्षाकालमें भींगी हुई चटाईके समान नष्ट हो जाता है ।

दुर्योधन ने पिता धृतराष्ट्र से कहा।

सभापर्व, अध्याय 56, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड १ पृ. 2082 कर्म–प्रारब्ध

महाभारत — खण्ड १ के सब 38 पद्य

महाभारत — खण्ड २

अहङ्कार का पतन

लोमश उवाच

दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत ।

क्रोधादह्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत् ॥

दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ । क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया ।

लोमशजी ने युधिष्ठिर को असुरों के पतन का कारण बताते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 94, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड २ पृ. 683 काम–क्रोध–लोभ–मोह
अर्जुन का क्षमाशील स्वभाव

युधिष्ठिर उवाच

सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीयसा ।

ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभयस्य च ॥

स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माययाभिजिघांसतः ।

अपि वज्रधरस्यापि भवेत् कालविषोपमः ॥

जो छोटे लोगोंके आक्षेप करनेपर भी सदा क्षमाशील होनेके कारण उस आक्षेपको सह लेता है तथा सरल मार्गसे अपनी शरणमें आनेवाले लोगोंको सुख पहुँचाकर उन्हें अभयदान देता है, वही अर्जुन, जब कोई कुटिल मार्गका आश्रय ले छल-कपटसे उसपर आघात करना चाहता है तब वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उसके लिये काल और विषके समान भयंकर हो जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 957 धर्म–आचरण
त्याग से प्राप्त सुख

युधिष्ठिर उवाच

मानं हित्वा प्रियो भवति ।

क्रोधं हित्वा न शोचति ।

कामं हित्वार्थवान् भवति ।

लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥

युधिष्ठिर बोले — मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान् होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता ।

युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न का उत्तर दिया।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2098 काम–क्रोध–लोभ–मोह
राजमहल में व्यवहार

धौम्य उवाच

दृष्टद्वारो लभेद् द्रष्टुं राजस्वेषु न विश्वसेत् ।

तदेवासनमन्विच्छेद् यत्र नाभिपतेत् परः ॥

राजासे मिलना हो, तो पहले द्वारपालसे मिलकर राजाको सूचना देनी चाहिये और मिलनेके लिये उनकी आज्ञा मँगा लेनी चाहिये । इन राजाओंपर पूर्ण विश्वास कभी न करे । अपने लिये वही आसन पसंद करे, जिसपर दूसरा कोई बैठनेवाला न हो ।

धौम्य ने पाण्डवों को राजा के यहाँ रहने का ढंग बताया।

विराटपर्व, अध्याय 4, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2139
हितकारी एवं प्रिय वचन

धौम्य उवाच

समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रियमेव च ।

संवर्णयेत् तदेवास्य प्रियादपि हितं भवेत् ॥

कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयके सभी अवसरोंपर हितकारक और प्रिय वचन कहे । यदि दोनों सम्भव न हों, तो प्रिय वचनका त्याग करके भी जो हितकारक हो, वही बात कहे (हितविरोधी प्रिय वचन कदापि न कहे)

विराटपर्व, अध्याय 4, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2141

महाभारत — खण्ड २ के सब 49 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

धर्म, क्षमा और अहिंसा

विदुर उवाच

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा ।

विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा ॥

केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शान्तिका सर्वश्रेष्ठ उपाय है । एक विद्या ही परम संतोष देनेवाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देनेवाली है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 33, श्लोक 52 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 249 धर्म–आचरण
वाक् की श्रेष्ठता

हंस उवाच

अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय आहुः ।

सत्यं वदेद् व्याहृतं तद् द्वितीयम् ।

प्रियं वदेद् व्याहृतं तत् तृतीयं ।

धर्मं वदेद् व्याहृतं तच्चतुर्थम् ॥

बोलनेसे न बोलना ही अच्छा बताया गया है, (यह वाणीकी प्रथम विशेषता है और यदि बोलना ही पड़े तो) सत्य बोलना वाणीकी दूसरी विशेषता है यानी मौनकी अपेक्षा भी अधिक लाभप्रद है । (सत्य और) प्रिय बोलना वाणीकी तीसरी विशेषता है । यदि सत्य और प्रियके साथ ही धर्मसम्मत भी कहा जाय, तो वह वचनकी चौथी विशेषता है । (इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है)

उद्योगपर्व, अध्याय 36, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 292
समान व्यवहार का धर्म

विदुर उवाच

यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः ।

मायाचारो मायया वर्तितव्यः ।

साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥

जो मनुष्य अपने साथ जैसा बर्ताव करे, उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये-यही नीतिधर्म है । कपटका आचरण करनेवालेके साथ कपटपूर्ण बर्ताव करे और अच्छा बर्ताव करनेवालेके साथ साधुभावसे ही बर्ताव करना चाहिये ।

उद्योगपर्व, अध्याय 37, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 304
दान्त पुरुष के गुण

विदुर उवाच

क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।

इन्द्रियाभिजयो धैर्यं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः श्रद्दधानता ।

एतानि यस्य राजेन्द्र स दान्तः पुरुषः स्मृतः ॥

राजेन्द्र! जिस पुरुषमें क्षमा, धैर्य, अहिंसा, सम-दर्शिता, सत्य, सरलता, इन्द्रियसंयम, धीरता, मृदुता, लज्जा, स्थिरता, उदारता, अक्रोध, संतोष और श्रद्धा — ये गुण विद्यमान हैं, वह पुरुष दान्त (इन्द्रियविजयी) माना गया है ।

विदुर ने धृतराष्ट्र से दान्त पुरुष के लक्षण बताए।

उद्योगपर्व, अध्याय 63, श्लोक 14–15 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 512 धर्म–आचरण
इन्द्रियविजयी पुरुष के लक्षण

विदुर उवाच

कामो लोभश्च दर्पश्च मन्युर्निद्रा विकत्थनम् ।

मान ईर्ष्या च शोकश्च नैतद् दान्तो निषेवते ।

अजिह्ममशठं शुद्धमेतद् दान्तस्य लक्षणम् ॥

दमनशील पुरुष काम, लोभ, अभिमान, क्रोध, निद्रा, आत्मप्रशंसा, मान, ईर्ष्या तथा शोक — इन दुर्गुणोंको अपने पास नहीं फटकने देता । कुटिलता और शठताका अभाव तथा आत्मशुद्धि यह दमयुक्त पुरुषका लक्षण है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 63, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 512 काम–क्रोध–लोभ–मोह

महाभारत — खण्ड ३ के सब 50 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

नकुल के छह गुण

संजय उवाच

गुरुवात्सल्यमत्यन्तं नैभृत्यं विनयो दमः ।

नकुलेऽप्रातिरूप्यं च शौर्यं च नियतानि षट् ॥

बड़े भाईके प्रति अत्यन्त भक्ति, अपने पराक्रमको प्रकाशित न करना, विनयशीलता, इन्द्रिय-संयम, उपमा-रहित रूप तथा शौर्य — ये नकुलमें छः गुण निश्चितरूपसे निवास करते हैं ।

द्रोणपर्व, अध्याय 34, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 283
सदाचार और पुण्य की गति

संजय उवाच

राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती ।

चतुराश्रमिणां पुण्यैः पावितानां सुरक्षितैः ॥

दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् ।

पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

पुत्र! सदाचारके पालनसे राजाओंको तथा सुरक्षित पुण्यके प्रभावसे पवित्र हुए चारों आश्रमोंके लोगोंको जो सनातन गति प्राप्त होती है; दीनोंपर दया करनेवाले, उत्तम वस्तुओंको घरमें बाँटकर उपयोगमें लेनेवाले तथा चुगलीसे दूर रहनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति तुम्हें भी मिले ।

द्रोणपर्व, अध्याय 78, श्लोक 27–28 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 514 धर्म–आचरण
मित्र की पहचान

दुर्योधन उवाच

यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः ।

मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ॥

जो मूर्ख मनुष्य मित्रको ठीक-ठीक पहचाने बिना ही उसे मित्रके कार्यमें नियुक्त कर देता है, उसका वह काम बिगड़ जाता है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 150, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1094
गुरु का अपमान

अर्जुन उवाच

उपचीर्णो गुरुर्मिथ्या भवता राज्यकारणात् ।

धर्मज्ञेन सता नाम सोऽधर्मः सुमहान् कृतः ॥

आपने धर्मज्ञ होते हुए भी राज्यके लोभसे झूठ बोलकर जो अपने गुरुको धोखा दिया, वह महान् पाप किया है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 196, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1487 धर्म–आचरण
शान्ति का मार्ग

विदुर → राजन

यतेन्द्रियो नरो राजन् क्रोधलोभनिराकृतः ।

संतुष्टः सत्यवादी यः स शान्तिमधिगच्छति ॥

राजन्! जो मनुष्य जितेन्द्रिय, क्रोध और लोभसे शून्य, संतोषी तथा सत्यवादी होता है, उसे शान्ति प्राप्त होती है ।

स्त्रीपर्व, अध्याय 7, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3129 काम–क्रोध–लोभ–मोह

महाभारत — खण्ड ४ के सब 17 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

क्रोध और हर्ष का त्याग

युधिष्ठिर उवाच

संयुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधहर्षासमञ्जसाः ।

न ते जयफलं किंचिद् भोक्तारो जातु कर्हिचित् ॥

जो लोग कामना और खीझसे युक्त हो क्रोध और हर्षके कारण अपना संतुलन खो बैठते हैं, वे कभी कहीं किंचिन्मात्र भी विजयका फल नहीं भोग सकते ।

शान्तिपर्व, अध्याय 7, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 54 काम–क्रोध–लोभ–मोह
लोकहित हेतु त्याग

भीष्म उवाच

यथा हि गर्भिणी हित्वा स्वं प्रियं मनसोऽनुगम् ।

गर्भस्य हितमाधत्ते तथा राज्ञाप्यसंशयम् ॥

वर्तितव्यं कुरुश्रेष्ठ सदा धर्मानुवर्तिना ।

स्वं प्रियं तु परित्यज्य यद् यल्लोकहितं भवेत् ॥

जैसे गर्भवती स्त्री अपने मनको अच्छे लगने वाले प्रिय भोजन आदिका भी परित्याग करके केवल गर्भस्थ बालकके हितका ध्यान रखती है, उसी प्रकार धर्मात्मा राजाको भी चाहिये कि निःसंदेह वैसा ही बर्ताव करे । कुरुश्रेष्ठ! राजा अपनेको प्रिय लगनेवाले विषयका परित्याग करके जिसमें सब लोगोंका हित हो वही कार्य करे ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 56, श्लोक 45–46 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 374 धर्म–आचरण
कर्म का महत्व

भीष्म उवाच

अल्पं हि सारभूयिष्ठं यत् कर्मोदारमेव तत् ।

कृतमेवाकृताच्छ्रेयो न पापीयोऽस्त्यकर्मणः ॥

कोई काम देखनेमें छोटा होनेपर भी यदि उसमें सार अधिक हो तो वह महान् ही है । न करनेकी अपेक्षा कुछ करना ही अच्छा है; क्योंकि कर्तव्य-कर्म न करनेवालेसे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 75, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 518 कर्म–प्रारब्ध
क्षमा का महत्त्व

भीष्म उवाच

न दुष्करमिदं पुत्र यत् प्रभुर्घातयेत् परम् ।

श्लाघनीया यशस्या च लोके प्रभवतां क्षमा ॥

बेटा! यदि शक्तिशाली राजा दूसरेको मरवा डाले तो यह उसके लिये कोई कठिन काम नहीं है; परंतु शक्तिशाली पुरुषोंमें यदि क्षमाका भाव हो तो संसारमें उसीकी बड़ाई की जाती है और उसीसे राजाओंका यश बढ़ता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 111, श्लोक 68 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 746
धन वृद्धि के आठ साधन

भीष्म उवाच

धृतिर्दाक्ष्यं संयमो बुद्धिरात्मा ।

धैर्यं शौर्यं देशकालाप्रमादः ।

अल्पस्य वा बहुनो वा विवृद्धौ ।

धनस्यैतान्यष्ट समिन्धनानि ॥

धारणाशक्ति, चतुरता, संयम, बुद्धि, शरीर, धैर्य, शौर्य तथा देश-कालकी परिस्थितिसे असावधान न रहना — ये आठ गुण थोड़े या अधिक धनको बढ़ानेके मुख्य साधन हैं अर्थात् धनरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये ईंधन हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 120, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 790 कर्म–प्रारब्ध

महाभारत — खण्ड ५ के सब 128 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

स्त्री के प्रति व्यवहार

देवशर्मा उवाच

नासां स्नेहो नरैः कार्यस्तथैवेर्ष्या जनेश्वर ।

खेदमास्थाय भुञ्जीत धर्ममास्थाय चैव ह ।

अनृताविह पर्वादिदोषवर्ज नराधिप ॥

नरेश्वर! मनुष्योंको स्त्रियोंके प्रति न तो विशेष आसक्त होना चाहिये और न उनसे ईर्ष्या ही करनी चाहिये । वैराग्यपूर्वक धर्मका आश्रय लेकर पर्व आदि दोषका त्याग करते हुए ऋतुस्नानके पश्चात् उनका उपभोग करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 43, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 464 वैराग्य
वर्णसङ्करों की पारमार्थिक उन्नति

भीष्म उवाच

गोब्राह्मणाय साहाय्यं कुर्वाणा वै न संशयः ।

आनृशंस्यमनुक्रोशः सत्यवाक्यं तथा क्षमा ॥

स्वशरीरैरपि त्राणं बाह्यानां सिद्धिकारणम् ।

भवन्ति मनुजव्याघ्र तत्र मे नास्ति संशयः ॥

पुरुषसिंह! यदि ये गौ और ब्राह्मणोंकी सहायता करें, क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग दें, सबपर दया करें, सत्य बोलें, दूसरोंके अपराध क्षमा करें और अपने शरीरको कष्टमें डालकर भी दूसरोंकी रक्षा करें तो इन वर्णसंकर मनुष्योंकी भी पारमार्थिक उन्नति हो सकती है — इसमें संशय नहीं है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 48, श्लोक 34–35 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 497 धर्म–आचरण
भूमिदान का महत्त्व

बृहस्पति उवाच

अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् ।

नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः ।

नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधिः ॥

भूमिदान करनेवाला पुरुष अमृत पैदा करनेवाली भूमि पाता है, भूमिके समान कोई दान नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, सत्यके समान कोई धर्म नहीं है और दानके समान कोई निधि नहीं है ।

बृहस्पति ने इन्द्र से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 62, श्लोक 92 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 594 धर्म–आचरण
लोभ का त्याग

भीष्म → राजन

तस्मात् सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत् ।

एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥

राजन्! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा धर्म है । अतः लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 93, श्लोक 143 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 813 धर्म–आचरण
ब्राह्मण के कर्तव्य

ब्रह्मा उवाच

तेष्वप्रमादं कुर्वीत त्रिषु कर्मसु धर्मवित् ।

दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः सर्वभूतसमो मुनिः ॥

सर्वमेतद् यथाशक्ति विप्रो निर्वर्तयन् शुचिः ।

एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं गृहस्थः संशितव्रतः ॥

धर्मज्ञ ब्राह्मणको इनके पालनमें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये । इन्द्रियसंयमी, मित्रभावसे युक्त, क्षमावान्, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखनेवाला, मननशील, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला और पवित्रतासे रहनेवाला गृहस्थ ब्राह्मण सदा सावधान रहकर अपनी शक्तिके अनुसार यदि उपर्युका नियमोंका पालन करता है तो वह स्वर्गलोकको जीत लेता है ।

ब्रह्माजी ने महर्षिगण से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 45, श्लोक 24–25 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1795 धर्म–आचरण

महाभारत — खण्ड ६ के सब 35 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

राजधर्म और प्रजा रक्षा

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् ।

पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा ॥

प्रजापालक नरेशको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरतारहित, पातकयुक्त अथवा सदोष कर्म भी करना पड़े तो कर लेना चाहिये । यह बात उसे सदा ही ध्यानमें रखनी चाहिये ।

विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 25, श्लोक 18 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 128 धर्म–आचरण
क्षमा का महान कार्य

क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम् ।

ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम ॥

पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है । यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है । तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादापर ही दृष्टि रखी है-कामभावको अपने मनमें स्थान नहीं दिया है — यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है ।

राजा कुशनाभ ने अपनी कन्याओं से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 6 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 143 धर्म–आचरण
सज्जन के लक्षण

दृढभक्तिः स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वचः ।

निस्तन्द्रीरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित् ॥

गुरुजनोंके प्रति उनकी दृढ़ भक्ति थी । वे स्थितप्रज्ञ थे और असवस्तुओंको कभी ग्रहण नहीं करते थे । उनके मुखसे कभी दुर्वचन नहीं निकलता था । वे आलस्यरहित, प्रमादशून्य तथा अपने और पराये मनुष्योंके दोषोंको अच्छी प्रकार जाननेवाले थे ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 235 धर्म–आचरण
श्रीराम के सद्गुण

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः ।

क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः ॥

मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः ।

प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः ॥

श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान्, अदोषदर्शी, शान्त, दीन-दु: खियोंको सान्त्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 31–32 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 239 धर्म–आचरण
पति की सहधर्मिणी

तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती ।

पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी ।

भव स्वभर्तुः सहधर्मचारिणी ।

यशश्च धर्मं च ततः समाप्स्यसि ॥

‘अतः तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लगी रहो-सतीधर्मका पालन करो, पतिको प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामीकी सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनोंकी प्राप्ति होगी’

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 117, श्लोक 29 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 559 धर्म–आचरण

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ के सब 33 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

वानरों द्वारा मधुवन का उपभोग

प्रीतोऽस्मि सोऽहं यद्भुतं वनं तैः कृतकर्मभिः ।

धर्षितं मर्षणीयं च चेष्टितं कृतकर्मणाम् ॥

गच्छ शीघ्रं मधुवनं संरक्षस्व त्वमेव हि ।

शीघ्रं प्रेषय सर्वास्तान् हनूमत्प्रमुखान् कपीन् ॥

मामा! अपना कार्य सिद्ध करके लौटे हुए उन वानरोंने जो मेरे मधुवनका उपभोग किया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ; अतः तुम्हें भी कृतकृत्य होकर आये हुए उन कपियोंकी ढिठाई तथा उद्दण्डतापूर्ण चेष्टाओंको क्षमा कर देना चाहिये । अब शीघ्र जाओ और तुम्हीं उस मधुवनकी रक्षा करो । साथ ही हनुमान् आदि सब वानरोंको जल्दी यहाँ भेजो ।

सुग्रीव ने दधिमुख से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 63, श्लोक 30–31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 220
अहङ्कार का त्याग

नाशापयितुमीशोऽहं युवराजोऽस्मि यद्यपि ।

अयुक्तं कृतकर्माणो यूयं धर्षयितुं बलात् ॥

‘यद्यपि मैं युवराज हूँ तो भी आपलोगोंपर हुक्म नहीं चला सकता । आपलोग बहुत बड़ा कार्य पूरा करके आये हैं, अतः बलपूर्वक आपपर शासन चलाना कदापि उचित नहीं है’

अङ्गद ने वानरों से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 64, श्लोक 17 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 221 सेवा–करुणा–विनय
मध्यम श्रेणी का पुरुष

एकोऽर्थ विमृशेदेको धर्मे प्रकुरुते मनः ।

एकः कार्याणि कुरुते तमाहुर्मध्यमं नरम् ॥

जो अकेला ही अपने कर्तव्यका विचार करता है, अकेला ही धर्ममें मन लगाता है और अकेला ही सब काम करता है, उसे मध्यम श्रेणीका पुरुष कहा जाता है ।

युद्धकाण्ड, अध्याय 6, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 254
नीति और अनीति का ज्ञान

यः पश्चात् पूर्वकार्याणि कर्माण्यभिचिकीर्षति ।

पूर्व चापरकार्याणि स न वेद नयानयो ॥

जो पहले करने योग्य कार्योंको पीछे करना चाहता है और पीछे करने योग्य काम पहले ही कर डालता है, वह नीति और अनीतिको नहीं जानता ।

युद्धकाण्ड, अध्याय 12, श्लोक 32 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 266
परम बलवानों की उपस्थिति

एवं बलिभ्यो बलिनः सन्ति राघवनन्दन ।

नावज्ञा हि परे कार्या य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥

रघुकुलनन्दन! इस प्रकार संसारमें बलवान् से बलवान् वीर पड़े हुए हैं; अतः जो अपना कल्याण चाहे उसे दूसरे की अवहेलना नहीं करनी चाहिये ।

मुनि ने श्रीराम से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 22 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 762

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ के सब 22 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

मन्द बुद्धि का दण्ड

तद्वाममुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः ।

कर्तुं प्रकृष्टमिह धीमहि मन्दधीभ्याम् ॥

लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या ।

पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र ॥

तुम हो तो इन भगवान् वैकुण्ठनाथके पार्षद, किन्तु तुम्हारी बुद्धि बहुत मन्द है । अतएव तुम्हारा कल्याण करनेके लिये हम तुम्हारे अपराधके योग्य दण्डका विचार करते हैं । तुम अपनी मन्द भेदबुद्धिके दोषसे इस वैकुण्ठलोकसे निकलकर उन पापमय योनियोंमें जाओ, जहाँ काम, क्रोध, लोभ-प्राणियोंके ये तीन शत्रु निवास करते हैं ।

सनकादि मुनियों ने जय-विजय से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 34 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 518 काम–क्रोध–लोभ–मोह
आश्रमों के कलङ्क

गृहस्थस्य क्रियात्यागो व्रतत्यागो वटोरपि ।

तपस्विनो ग्रामसेवा भिक्षोरिन्द्रियलोलता ॥

आश्रमापसदा ह्येते खल्वाश्रमविडम्बकाः ।

देवमायाविमूढांस्तानुपेक्षेतानुकम्पया ॥

कर्मत्यागी गृहस्थ, व्रतत्यागी ब्रह्मचारी, गाँवमें रहनेवाला तपस्वी (वानप्रस्थ) और इन्द्रियलोलुप संन्यासी — ये चारों आश्रमके कलंक हैं और व्यर्थ ही आश्रमोंका ढोंग करते हैं । भगवान्‌की मायासे विमोहित उन मूढ़ोंपर तरस खाकर उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 38–39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1416 वैराग्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

परोपकारी जीवन की सफलता

एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।

प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा ॥

मेरे प्यारे मित्रो! संसारमें प्राणी तो बहुत हैं; परन्तु उनके जीवनकी सफलता इतनेमें ही है कि जहाँतक हो सके अपने धनसे, विवेक-विचारसे, वाणीसे और प्राणोंसे भी ऐसे ही कर्म किये जायँ, जिनसे दूसरोंकी भलाई हो ।

श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 22, श्लोक 35 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 426 सेवा–करुणा–विनय
धर्म और सद्व्यवहार

धर्मेण पालयन्नुर्वीं प्रजाः शीलेन रंजयन् ।

वर्तमानः समः स्वेषु श्रेयः कीर्तिमवाप्स्यसि ॥

आप धर्मसे पृथ्वीका पालन कीजिये । अपने सद्व्यवहारसे प्रजाको प्रसन्न रखिये और अपने स्वजनोंके साथ समान बर्ताव कीजिये । ऐसा करनेसे ही आपको लोकमें यश और परलोकमें सद्गति प्राप्त होगी ।

अक्रूरजी ने महाराज धृतराष्ट्रजी से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 49, श्लोक 18 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 660 धर्म–आचरण
प्राणवायु से शिक्षा

प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः ।

ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः ॥

मैंने शरीरके भीतर रहनेवाले वायु-प्राणवायुसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह् आहारमात्रकी इच्छा रखता है और उसकी प्राप्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधकको भी चाहिये कि जितनेसे जीवन-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन कर ले । इन्द्रियोंको तृप्त करनेके लिये बहुत-से विषय न चाहे । संक्षेपमें उतने ही विषयोंका उपयोग करना चाहिये जिनसे बुद्धि विकृत न हो, मन चंचल न हो और वाणी व्यर्थकी बातोंमें न लग जाय ।

अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1107 साधना–योग
दुर्जन की कटुवाणी

श्रीकृष्ण → उद्धव

बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः ।

दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा — देवगुरु बृहस्पतिके शिष्य उद्धवजी! इस संसारमें प्रायः ऐसे संत पुरुष नहीं मिलते, जो दुर्जनोंकी कटुवाणीसे बिंधे हुए अपने हृदयको सँभाल सकें ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धवजी से इस प्रकार कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 2 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1240
प्रेम की प्रधानता

उभयोर्वैपरीत्ये तुतु रसाभासे फलच्युतिः ।

धनार्थिनस्तु संसिद्धिर्विधिसम्पूर्णतावशात् ।

कृष्णार्थिनोऽगुणस्यापि प्रेमैव विधिरुत्तमः ॥

पर धनार्थीको तो तभी सिद्धि मिलती है, जब उनके अनुष्ठानका विधि-विधान पूरा उतर जाय । श्रीकृष्णकी चाह रखनेवाला सर्वथा गुणहीन हो और उसकी विधिमें कुछ कमी रह जाय तो भी, यदि उसके हृदयमें प्रेम है तो, वही उसके लिये सर्वोत्तम विधि है ।

वैष्णवखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 41 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1459 भक्ति

श्रीमद्भागवत महापुराण — २ के सब 6 पद्य

श्रीरामचरितमानस

सज्जन की उदारता

जग बहु नर सर सरि सम भाई । जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई ॥

सज्जन सकृत सिंधु सम कोई । देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ॥

हे भाई! जगत्में तालाबों और नदियोंके समान मनुष्य ही अधिक हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़से बढ़ते हैं (अर्थात् अपनी ही उन्नतिसे प्रसन्न होते हैं) । समुद्र-सा तो कोई एक विरला ही सज्जन होता है जो चन्द्रमाको पूर्ण देखकर (दूसरोंका उत्कर्ष देखकर) उमड़ पड़ता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 8.7 श्रीरामचरितमानस पृ. 31
कीर्ति का परोपकारी स्वरूप

कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥

राम सुकीरति भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥

कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गङ्गाजीकी तरह सबका हित करनेवाली हो । श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्ति तो बड़ी सुन्दर (सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है । यह असामञ्जस्य है (अर्थात् इन दोनोंका मेल नहीं मिलता), इसकी मुझे चिन्ता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 14(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 37 धर्म–आचरण
सत्ता और अहङ्कार

बड़ अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमानु हृदयँ तब आवा ॥

नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥

जब दक्षने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदयमें अत्यन्त अभिमान आ गया । जगत्में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो ।

ब्रह्माजी ने दक्ष को प्रजापतियों का नायक बनाया तब दक्ष के हृदय में अभिमान आ गया।

बालकाण्ड, चौपाई 60.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 82
समर्थ की निर्दोषता

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं । रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥

गङ्गाजीमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता । सूर्य, अग्नि और गङ्गाजीकी भाँति समर्थको कुछ दोष नहीं लगता ।

बालकाण्ड, चौपाई 69.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 89 धर्म–आचरण
श्रेष्ठ पुरुष के लक्षण

जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी । नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी ॥

मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं । ते नरबर थोरे जग माहीं ॥

रणमें शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात् जो लड़ाईके मैदानसे भागते नहीं), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टिको नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँसे ‘नाहीं’ नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसारमें थोड़े हैं ।

श्रीरामजी अपने छोटे भाई से बातें कर रहे हैं।

बालकाण्ड, चौपाई 231.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 228 धर्म–आचरण

श्रीरामचरितमानस के सब 80 पद्य

In English

Ethics, Social Conduct, and Governance

These verses from various texts like the Mahabharata, Ramayana, and Manusmriti discuss how to behave toward family, friends, and subjects. They cover topics such as the qualities of a noble person, the duties of a king, and the importance of maintaining emotional balance.

These verses answer

  • What are the qualities of a virtuous person according to agni purana?
  • How should a king treat his subjects and protect them?
  • What is the proper way to behave toward brothers and relatives?
  • How does anger affect a person's success?
  • What are the duties regarding marriage and social conduct?