श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

काल–मृत्यु

समय, आयु और मृत्यु

37 पद्य · 7 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड २

दोषों पर विजय

यक्ष उवाच

दिष्ट्या पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्ट्या ते षट्पदी जिता ।

द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्परायिके ॥

सौभाग्यवश तुम्हारा शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान — इन पाँचों साधनोंपर अनुराग है तथा सौभाग्यसे तुमने भूख-प्यास, शोक-मोह और जरा-मृत्यु — इन छहों दोषोंको जीत लिया है । इनमेंसे पहले दो दोष आरम्भसे ही रहते हैं, बीचके दो तरुणावस्था आनेपर होते हैं तथा बादवाले दो दोष अन्तिम समयपर आते हैं ।

धर्म ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 314, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2110 साधना–योग

महाभारत — खण्ड ३

विनाशकारी दुर्गुण

विदुर उवाच

जरा रूपं हरति हि धैर्यमाशा ।

मृत्युः प्राणान् धर्मचर्यामसूया ।

क्रोधः श्रियं शीलमनार्यसेवा ।

ह्रियं कामः सर्वमेवाभिमानः ॥

बुढ़ापा (सुन्दर) रूपको, आशा धीरताको, मृत्यु प्राणोंको, असूया (गुणोंमें दोष देखनेका स्वभाव) धर्माचरणको, क्रोध लक्ष्मीको, नीच पुरुषोंकी सेवा सत्स्वभावको, काम लज्जाको और अभिमान सर्वस्वको नष्ट कर देता है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 35, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 284
विनाश के कारण

विदुर उवाच

जरा रूपं हरति हि धैर्यमाशा ।

मृत्युः प्राणान् धर्मचर्यामसूया ।

कामो ह्रियं वृत्तमनार्यसेवा ।

क्रोधः श्रियं सर्वमेवाभिमानः ॥

बुढ़ापा रूपका, आशा धैर्यका, मृत्यु प्राणोंका, दूसरोंके गुणोंमें दोषदृष्टि धर्माचरणका, काम लज्जाका, नीच पुरुषोंकी सेवा सदाचारका, क्रोध लक्ष्मीका और अभिमान सर्वस्वका ही नाश कर देता है ।

धृतराष्ट्र ने विदुर से पूछा कि मनुष्य अपनी पूर्ण आयु क्यों नहीं पाता, तब विदुर ने उत्तर दिया।

उद्योगपर्व, अध्याय 37, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 304
काल का चक्र

धृतराष्ट्र उवाच

मन्ये पर्यायधर्मोऽयं कालस्यात्यन्तगामिनः ।

चक्रे प्रधिरिवासक्तो नास्य शक्यं पलायितुम् ॥

मैं समझता हूँ कि अत्यन्त तीव्र गतिसे चलनेवाले कालका ही यह क्रमशः प्राप्त होनेवाला नियम है । इस कालचक्रमें उसकी नेमिके समान मैं जुड़ा हुआ हूँ, अतः मेरे लिये इससे दूर भागना सम्भव नहीं है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 51, श्लोक 58 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 446 माया–संसार
कृष्ण की सर्वोच्चता

संजय उवाच

कालस्य च हि मृत्योश्च जङ्गमस्थावरस्य च ।

ईशते भगवानेकः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥

मैं आपसे यह सच कहता हूँ कि एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही काल, मृत्यु तथा चराचर जगत्के स्वामी एवं शासक हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 68, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 529 लीला–रहस्य
धर्मानुकूल मृत्यु का महत्व

युधिष्ठिर उवाच

यदस्य धर्म्यं मरणं शाश्वतं लोकवर्त्म तत् ।

समन्तात् सर्वभूतानां न तदत्येति कश्चन ॥

मनुष्यकी जो धर्मानुकूल मृत्यु है, वह परलोकके लिये सनातन मार्ग है । सम्पूर्ण प्राणियोंमेंसे कोई भी उस मृत्युका सब ओरसे उल्लंघन नहीं कर सकता ।

उद्योगपर्व, अध्याय 72, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 545 कर्म–प्रारब्ध

महाभारत — खण्ड ५

मृत्यु का सत्य

अश्मा उवाच

संनिमज्जेज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे ।

जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदवबुध्यते ॥

जिसमें जरा और मृत्युरूपी बड़े-बड़े ग्राह पड़े हुए हैं, उस गम्भीर कालसमुद्रमें यह सारा संसार डूब रहा है, किंतु कोई इस बातको समझ नहीं पाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 28, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 184
पुण्यात्मा का लोक

कश्यप उवाच

पुण्यस्य लोको मधुमान् घृतार्चिहिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभिः ।

तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी ।

न तत्र मृत्युर्न जरा नोत दुःखम् ॥

पुण्यात्माका लोक मधुरतम सुखसे भरा होता है । वहाँ घीके चिराग जलते हैं । उसमें सुवर्णके समान प्रकाश फैला रहता है । वहाँ अमृतका केन्द्र होता है । उस लोकमें न तो मृत्यु है, न बुढ़ापा है और न दूसरा ही कोई दुःख है । ब्रह्मचारी पुरुष मृत्युके पश्चात् उसी स्वर्गादि लोकमें जाकर आनन्दका अनुभव करता है ।

कश्यप ने परलोक की स्थिति बताते हुए कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 73, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 507
काल की समदृष्टि

गृध्र उवाच

किं करिष्यथ शोचित्वा मृतं किमनुशोचथ ।

सर्वस्य हि प्रभुः कालो धर्मतः समदर्शनः ॥

अच्छा, यह तो बताओ, तुम शोक करके क्या कर लोगे? क्या इसे जिला दोगे? फिर इस मृतकके लिये क्यों शोक करते हो? काल ही सबका शासक और स्वामी है, जो धर्मतः सबके ऊपर समान दृष्टि रखता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 153, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1007
काल की सर्वव्यापकता

गृध्र उवाच

यौवनस्थांश्च बालांश्च वृद्धान् गर्भगतानपि ।

सर्वानाविशते मृत्युरेवंभूतमिदं जगत् ॥

यह कराल काल युवा, बालक, वृद्ध और गर्भस्थ शिशु-सबमें प्रवेश करता है । इस संसारकी ऐसी ही दशा है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 153, श्लोक 45 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1008
काल का सदुपयोग

पुत्र उवाच

अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगादयम् ।

अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति ॥

इसलिये जो कल्याणकारी कार्य हो, उसे आज ही कर डालिये । आपका यह समय हाथसे निकल न जाय; क्योंकि सारे काम अधूरे ही पड़े रह जायँगे और मौत आपको खींच ले जायगी ।

शान्तिपर्व, अध्याय 175, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1139 नीति–व्यवहार
कल्याणकारी कार्य की तत्परता

पुत्र उवाच

अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगान्महान् ।

को हि जानाति कस्याद्य मृत्युकालो भविष्यति ॥

जो कल्याणकारी कार्य है, उसे आप आज ही कर डालिये । यह महान् काल आपको लाँघ न जाय; क्योंकि कौन जानता है कि आज किसकी मृत्युकी घड़ी आ पहुँचेगी ।

शान्तिपर्व, अध्याय 277, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1788
पुरुषत्व का क्षय

पुंस्त्वोपघातं कालेन दर्शनोपरमं तथा ।

बाधिर्यं प्राणमन्दत्वं यः पश्यति स मुच्यते ॥

‘समय आनेपर पुरुषत्व नष्ट हो जाता है, आँखोंसे दिखायी नहीं देता है, कान बहरे हो जाते हैं और प्राणशक्ति अत्यन्त क्षीण हो जाती है । इन सब बातोंको जो सदा देखता और इनपर विचार करता रहता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है’

शान्तिपर्व, अध्याय 288, श्लोक 40 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1906 वैराग्य
निरन्तर धर्म का आचरण

पराशर उवाच

न धर्मकालः पुरुषस्य निश्चितो ।

न चापि मृत्युः पुरुषं प्रतीक्षते ।

सदा हि धर्मस्य क्रियैव शोभना ।

यदा नरो मृत्युमुखेऽभिवर्तते ॥

पुरुषके लिये धर्म करनेका कोई विशेष समय निश्चित नहीं है; क्योंकि मृत्यु किसीकी बाट नहीं जोहती । जब मनुष्य सदा मौतके मुखमें ही है, तब नित्य निरन्तर धर्मका आचरण करते रहना ही उसके लिये शोभाकी बात है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 298, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1958

महाभारत — खण्ड ५ के सब 20 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

महादेव के स्वरूप

तण्डि उवाच

मृत्युर्यमो हुताशश्च कालः संहारवेगवान् ।

कालस्य परमा योनिः कालश्चायं सनातनः ॥

मृत्यु, यम, अग्नि, संहारके लिये वेगशाली काल, कालके परम कारण तथा सनातन काल भी — ये महादेव ही हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 16, श्लोक 51 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 235 ज्ञान–विवेक
कर्मों का क्षय

सिद्ध उवाच

आयुः कीर्तिकराणीह यानि कृत्यानि सेवते ।

शरीरग्रहणे यस्मिंस्तेषु क्षीणेषु सर्वशः ॥

आयुःक्षयपरीतात्मा विपरीतानि सेवते ।

बुद्धिर्व्यावर्तते चास्य विनाशे प्रत्युपस्थिते ॥

सिद्धने कहा — काश्यप! मनुष्य इस लोकमें आयु और कीर्तिको बढ़ानेवाले जिन कर्मोंका सेवन करता है, वे शरीर-प्राप्तिमें कारण होते हैं । शरीर-ग्रहणके अनन्तर जब वे सभी कर्म अपना फल देकर क्षीण हो जाते हैं, उस समय जीवकी आयुका भी क्षय हो जाता है । उस अवस्थामें वह विपरीत कर्मोंका सेवन करने लगता है और विनाशकाल निकट आनेपर उसकी बुद्धि उलटी हो जाती है ।

सिद्ध महात्मा ने काश्यप के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 17, श्लोक 6–7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1659 कर्म–प्रारब्ध
अन्तकाल में अज्ञान

सिद्ध उवाच

ततः सचेतनो जन्तुर्नाभिजानाति किंचन ।

तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वेव मर्मसु ।

स जीवो निरधिष्ठानश्चाल्यते मातरिश्वना ॥

तब अन्तकाल उपस्थित होनेपर प्राणी सचेतन होनेपर भी कुछ समझ नहीं पाता; क्योंकि तम (अविद्या)-के द्वारा उसकी ज्ञानशक्ति आवृत्त हो जाती है । मर्मस्थान भी अवरुद्ध हो जाते हैं । उस समय जीवके लिये कोई आधार नहीं रह जाता और वायु उसे अपने स्थानसे विचलित कर देती है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 17, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1661 ज्ञान–विवेक

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

कालपाश और विवेक का ह्रास

कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये ।

कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रियाः ॥

‘जो पुरुष कालके फन्देमें फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं; इसीलिये उन्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान नहीं रह जाता है’

वन में श्रीरामचन्द्रजी से क्रोध में भरकर खर ने उन्हें फटकारते हुए कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 30, श्लोक 15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 635 ज्ञान–विवेक

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

काल का चक्र

कालचक्रं भ्रमिस्तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत् ।

स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥

यह काल ही एक चक्र है । यह निरन्तर घूमता रहता है । इसकी धार छुरे और वज्रके समान तीखी है और यह सारे जगत्को अपनी ओर खींच रहा है । इसको रोकनेवाला कोई नहीं, यह परम स्वतन्त्र है । यह बात न जानकर कर्मोंके फलको नित्य समझकर जो लोग सकामभावसे उनका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उन अनित्य कर्मोंसे क्या लाभ होगा?

नारदजी ने दक्ष के पुत्रों से कहा।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 19 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1148
मोह और आसक्ति का प्रभाव

दुरापूरेण कामेन मोहेन च बलीयसा ।

शेषं गृहेषु सक्तस्य प्रमत्तस्यापयाति हि ॥

रह गयी बीचकी कुछ थोड़ी-सी आयु । उसमें कभी न पूरी होनेवाली बड़ी-बड़ी कामनाएँ हैं, बलात् पकड़ रखनेवाला मोह है और घर-द्वारकी वह आसक्ति है, जिससे जीव इतना उलझ जाता है कि उसे कुछ कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान ही नहीं रहता । इस प्रकार बची-खुची आयु भी हाथसे निकल जाती है ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 17, श्लोक 8 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1321 वैराग्य

श्रीरामचरितमानस

रामनाम की महिमा

नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जग जाला ॥

राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितु माता ॥

ऐसे कराल (कलियुगके) कालमें तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसारके सब जंजालोंको नाश कर देनेवाला है । कलियुगमें यह रामनाम मनोवाञ्छित फल देनेवाला है, परलोकका परम हितैषी और इस लोकका माता-पिता है (अर्थात् परलोकमें भगवान्‌का परमधाम देता है और इस लोकमें माता-पिताके समान सब प्रकारसे पालन और रक्षण करता है)

बालकाण्ड, चौपाई 27.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 50 नाम महिमा
यातनाशरीर का बोध

हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु ॥

जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु ॥

प्रियतम (श्रीरामजी) रूपी जलके बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूँ कि विधाताने मुझे यह ‘यातनाशरीर’ ही दिया है [जो पापी जीवोंको नरक भोगनेके लिये मिलता है] ।

सुमन्त्र मार्ग में पछतावा करते हुए यह विचार कर रहे थे।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 146 श्रीरामचरितमानस पृ. 467 वैराग्य
काल-कर्म का प्रभाव

जनम मरन सब दुख सुख भोगा । हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा ॥

काल करम बस होहिं गोसाईं । बरबस राति दिवस की नाईं ॥

जन्म-मरण, सुख-दुःखके भोग, हानि-लाभ, प्यारोंका मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी! काल और कर्मके अधीन रात और दिनकी तरह बरबस होते रहते हैं ।

मन्त्री ने राजा को धीरज बँधाते हुए यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 150.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 470 कर्म–प्रारब्ध माया–संसार
काल का प्रभाव

काल दंड गहि काहु न मारा । हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ॥

निकट काल जेहि आवत साईं । तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं ॥

काल दण्ड (लाठी) लेकर किसीको नहीं मारता । वह धर्म, बल, बुद्धि और विचारको हर लेता है । हे स्वामी! जिसका काल (मरण-समय) निकट आ जाता है, उसे आपहीकी तरह भ्रम हो जाता है ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 37.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 810 ज्ञान–विवेक
राम रहस्य का ज्ञान

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ । कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ ॥

राम रहस्य ललित बिधि नाना । गुप्त प्रगट इतिहास पुराना ॥

काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभावसे उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा । अनेकों प्रकारके सुन्दर श्रीरामजीके रहस्य (गुप्त मर्मके चरित्र और गुण), जो इतिहास और पुराणोंमें गुप्त और प्रकट हैं (वर्णित और लक्षित हैं)

उत्तरकाण्ड, चौपाई 114(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1023 ज्ञान–विवेक

In English

Time, Age, and Death

These verses from the Mahabharata, Puranas, Ramayana, and Ramcharitmanas discuss the inescapable nature of time (Kaal) and death. They teach that while life is subject to aging and decay, the soul is eternal, and one should perform righteous deeds without delay because death arrives unexpectedly.

These verses answer

  • What happens to the soul after death?
  • How does time affect human intelligence and senses?
  • Why should a person not delay good deeds?
  • What are the effects of aging on human qualities?
  • Is there a place without death or old age?