श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

वैराग्य

अनासक्ति और संसार की नश्वरता

291 पद्य · 12 ग्रन्थ

देवी भागवत — उत्तरार्द्ध

पञ्चभूतों का आत्मिक विलय

विलाप्य खमहङ्कारे महत्तत्त्वेऽप्यहङ्कृतिम् ।

महान्तं प्रकृतौ मायामात्मनि प्रविलापयेत् ॥

इस प्रकारसे पंचभूतोंकी भावना करके प्रत्येकका अपने कारणरूप दूसरे भूतमें लय करे । पृथ्वीको जलमें, जलको अग्निमें अग्निको वायुमें, वायुको आकाशमें विलीन करनेका ध्यान करके पुनः आकाशको अहंकारमें, अहंकारको महत्तत्त्वमें, महत्तत्त्वको प्रकृतिमें और मायारूपी प्रकृतिको आत्मामें विलीन करना चाहिये ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 8, श्लोक 9 देवी भागवत — उत्तरार्द्ध पृ. 691 ज्ञान–विवेक

महाभारत — खण्ड १

धर्म की महत्ता

सौति उवाच

धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानां ।

स ह्येक एव परलोकगतस्य बन्धुः ॥

अर्थाः स्त्रियश्च निपुणैरपि सेव्यमाना ।

नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ॥

तपस्वी महर्षियो! (तथा महाभारतके पाठको!) आप सब लोग सदा सांसारिक आसक्तियोंसे ऊँचे उठें और आपका मन सदा धर्ममें लगा रहे; क्योंकि परलोकमें गये हुए जीवका बन्धु या सहायक एकमात्र धर्म ही है । चतुर मनुष्य भी धन और स्त्रियोंका सेवन तो करते हैं, किंतु वे उनकी श्रेष्ठतापर विश्वास नहीं करते और न उन्हें स्थिर ही मानते हैं ।

सौतिजी ने अनुक्रमणिका के अन्त में ऋषियों से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 2, श्लोक 391 महाभारत — खण्ड १ पृ. 132 धर्म–आचरण
सङ्गति का प्रभाव

देवयानी उवाच

सुयन्त्रिता वरा नित्यं विहीनाश्च धनैर्नराः ।

दुर्वृत्ताः पापकर्माणश्चाण्डाला धनिनोऽपि वा ॥

अकारणाद् ये द्विषन्ति परिवादं वदन्ति च ।

न तत्रास्य निवासोऽस्ति पाप्मभिः पापतां व्रजेत् ॥

सुकृते दुष्कृते वापि यत्र सज्जति यो नरः ।

ध्रुवं रतिर्भवेत् तत्र तस्माद् दोषं न रोचयेत् ॥

वाग् दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः ।

मम मथ्नाति हृदयमग्निकाम इवारणिम् ॥

धनहीन मनुष्य भी यदि सदा अपने मनपर संयम रखें तो वे श्रेष्ठ हैं और धनवान् भी यदि दुराचारी तथा पापकर्मी हों, तो वे चाण्डालके समान हैं। जो अकारण किसीके साथ द्वेष करते हैं और दूसरोंकी निन्दा करते रहते हैं, उनके बीचमें सत्पुरुषका निवास नहीं होना चाहिये; क्योंकि पापियोंके संगसे मनुष्य पापात्मा हो जाता है । मनुष्य पाप अथवा पुण्य जिसमें भी आसक्त होता है, उसीमें उसकी दृढ़ प्रीति हो जाती है, इसलिये पापकर्ममें प्रीति नहीं करनी चाहिये । तात! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको मथ रहा है । ठीक उसी तरह, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है ।

देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 79, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड १ पृ. 603 धर्म–आचरण
तृष्णा का त्याग

ययाति उवाच

तस्मादेनामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम् ।

निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिष्यामि मृगैः सह ॥

अतः मैं इस तृष्णाको छोड़कर परब्रह्म परमात्मामें मन लगा द्वन्द्व और ममतासे रहित हो वनमें मृगोंके साथ विचरूँगा ।

राजा ययाति ने अपने पुत्र पूरु से संवाद करते हुए यह कहा।

आदिपर्व, अध्याय 85, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड १ पृ. 641
सकाम कर्मों का त्याग

पाण्डु उवाच

याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः ।

ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थिताः ॥

तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः ।

सम्परित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ॥

जीवित पुरुषोंद्वारा अपने अभ्युदयके लिये जो-जो कर्म किये जा सकते हैं, उन समस्त सकाम कर्मोंको मैं त्याग दूँगा; क्योंकि वे सब कालसे सीमित हैं । अनित्य फल देनेवाली क्रियाओंके लिये जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा चेष्टा की जाती है, उस चेष्टाको भी मैं सर्वथा त्याग दूँगा; धर्मके फलको भी छोड़ दूँगा । अपने अन्तःकरणके मलको सर्वथा धोकर शुद्ध हो जाऊँगा ।

आदिपर्व, अध्याय 118, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड १ पृ. 847 साधना–योग
कलियुग का आगमन

बहुमायासमाकीर्णो नानादोषसमाकुलः ।

लुप्तधर्मक्रियाचारो घोरः कालो भविष्यति ॥

‘अब ऐसा भयंकर समय आयेगा, जिसमें सब ओर छल-कपट और मायाका बोलबाला होगा । संसारमें अनेक प्रकारके दोष प्रकट होंगे और धर्म-कर्म तथा सदाचारका लोप हो जायगा’

व्यासजी ने श्राद्ध की समाप्ति पर दुखी एवं मोह में पड़ी माता सत्यवती से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 127, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड १ पृ. 919 माया–संसार

महाभारत — खण्ड १ के सब 8 पद्य

महाभारत — खण्ड २

सत्त्वगुणियों का धैर्य

बृहदश्व उवाच

विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते ।

विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः ॥

जब दैव (प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते ।

बृहदश्व मुनि ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 79, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 554 कर्म–प्रारब्ध
तीर्थफल की पात्रता

पुलस्त्य उवाच

प्रतिग्रहादपावृत्तः संतुष्टो येन केनचित् ।

अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥

जो प्रतिग्रहसे दूर रहे तथा जो कुछ अपने पास हो, उसीसे संतुष्ट रहे और जिसमें अहंकारका अभाव हो, वही तीर्थका फल पाता है ।

पुलस्त्यजी ने तीर्थ-सेवन का फल बताते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 82, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड २ पृ. 568 साधना–योग
सत्ययुग का धर्म

हनुमान् उवाच

न सामऋग्यजुर्वर्णाः क्रिया नासीच्च मानवी ।

अभिध्याय फलं तत्र धर्मः संन्यास एव च ॥

ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रवर्णोंका पृथक्-पृथक् विभाग नहीं था । कोई मानवी क्रिया (कृषि आदि) भी नहीं होती थी । उस समय चिन्तन करनेमात्रसे सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती थी । सत्ययुगमें एक ही धर्म था, स्वार्थका त्याग ।

हनुमानजी ने भीमसेन को सत्ययुग का धर्म बताया।

वनपर्व, अध्याय 149, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1015 धर्म–आचरण
सद्गुणों की प्रधानता

सर्प → राजन

ब्रह्म च ब्राह्मणत्वं च येन त्वाहमचूचुदम् ।

सत्यं दमस्तपो दानमहिंसा धर्मनित्यता ।

साधकानि सदा पुंसां न जातिर्न कुलं नृप ।

अरिष्ट एष ते भ्राता भीमसेनो महाबलः ।

स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ॥

राजन्! उनका ब्रह्म-ज्ञान और ब्राह्मणत्व देखकर भी मुझे बड़ा विस्मय हुआ । इसीलिये इस विषयमें मैंने तुमसे पहले प्रश्न किया था । राजन्! सत्य, इन्द्रियसंयम, तपस्या, दान, अहिंसा और धर्मपरायणता — ये सद्गुण ही सदा मनुष्योंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले हैं, जाति और कुल नहीं । ये रहे तुम्हारे भाई महाबली भीमसेन, जो सर्वथा सकुशल हैं । महाराज! तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं पुनः स्वर्गलोकको जाऊँगा ।

राजा नहुष ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 181, श्लोक 42–43 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1227 धर्म–आचरण ज्ञान–विवेक
सच्ची तपस्या

मार्कण्डेय उवाच

ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक्कर्मबुद्धिभिः ।

ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम् ॥

जो मन, वाणी, क्रिया और बुद्धिके द्वारा कभी पाप नहीं करते हैं, वे ही महात्मा तपस्वी हैं । शरीरको सुखा देना ही तपस्या नहीं है ।

वनपर्व, अध्याय 200, श्लोक 99 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1388 ज्ञान–विवेक

महाभारत — खण्ड २ के सब 17 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

भिक्षुक के लक्षण

विदुर उवाच

अरोषणो यः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।

प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः ।

निन्दाप्रशंसोपरतः प्रियाप्रिये ।

त्यजन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ॥

जो क्रोध न करनेवाला, लोष्ट, पत्थर और सुवर्ण को एक-सा समझनेवाला, शोकहीन, सन्धि-विग्रहसे रहित, निन्दा-प्रशंसासे शून्य, प्रिय-अप्रियका त्याग करनेवाला तथा उदासीन है, वही भिक्षुक (संन्यासी) है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 38, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 316 साधना–योग
इन्द्रिय संयम और कर्मयोग

श्रीभगवान् → अर्जुन

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।

कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

किंतु हे अर्जुन! जो पुरुष मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियोंद्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग के आदर्श के विषय में कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 27, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1393 साधना–योग
अनासक्त कर्म का स्वरूप

श्रीभगवान् उवाच

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित् करोति सः ॥

जो पुरुष समस्त कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिका सर्वथा त्याग करके संसारके आश्रयसे रहित हो गया है और परमात्मामें नित्यतृप्त है, वह कर्मोंमें भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1414 साधना–योग
ज्ञान की अग्नि

श्रीभगवान् → अर्जुन

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥

क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्ममय कर देता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1417 ज्ञान–विवेक
मन का नियन्त्रण

श्रीभगवान् → अर्जुन

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; परंतु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्यसे वशमें होता है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मन के चञ्चल स्वभाव और उसे वश में करने के उपाय बताते हुए कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 30, श्लोक 35 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1448 साधना–योग

महाभारत — खण्ड ३ के सब 25 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

पुत्र शोक का त्याग

नारद उवाच

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।

अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥

श्वैत्य सृजय! वे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य — इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी जीवित न रह सके, तब औरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम अपने उस पुत्रके लिये शोक न करो, जिसने न तो यज्ञ किया था और न दक्षिणा ही दी थी । ऐसा नारदजीने कहा ।

नारदजी ने राजा सृंजय से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 63, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 433 ज्ञान–विवेक
जीवन की अनित्यता

कर्ण उवाच

नेह ध्रुवं किंचिदपि प्रचिन्तयन् ।

विद्यां लोके कर्मणो नित्ययोगात् ।

सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो ।

भावं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते ॥

बहुत सोचनेपर भी मैं कर्म-सम्बन्धकी अनित्यताके कारण इस लोकमें किसी भी वस्तुको नित्य नहीं मानता । जब आचार्य द्रोण भी मार दिये गये, तब कौन संदेहरहित होकर आगामी सूर्योदयतक जीवित रहनेका दृढ़ विश्वास कर सकता है?

कर्ण ने शल्य से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 37, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1855 कर्म–प्रारब्ध
आत्म-संयम की शक्ति

विदुर उवाच

न विक्रमो न चाप्यर्थो न मित्रं न सुहृज्जनः ।

तथोन्मोचयते दुःखाद् यथाऽऽत्मा स्थिरसंयमः ॥

पराक्रम, धन, मित्र और सुहृद् भी उस तरह दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकते, जैसा कि दृढ़तापूर्वक संयममें रहनेवाला अपना मन दिला सकता है ।

स्त्रीपर्व, अध्याय 7, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3129 साधना–योग

महाभारत — खण्ड ५

संसार का त्याग

युधिष्ठिर उवाच

जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरभिद्रुतम् ।

अपारमिव चास्वस्थं संसारं त्यजतः सुखम् ॥

इस संसारमें जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और वेदनाओंका आक्रमण होता ही रहता है, जिससे यहाँका जीवन कभी स्वस्थ नहीं रहता । जो अपार-सा प्रतीत होनेवाले इस संसारको त्याग देता है, उसीको सुख मिलता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 9, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 78 माया–संसार
क्षेमाश्रम की महिमा

भीष्म उवाच

निराशीः स्यात् सर्वसमो निर्भोगो निर्विकारवान् ।

विप्रः क्षेमाश्रमं प्राप्तो गच्छत्यक्षरसात्मताम् ॥

आशा-तृष्णाका सर्वथा त्याग करके सबके प्रति समान भाव रखे । भोगोंसे दूर रहे और हृदयमें किसी प्रकारका विकार न आने दे । इन्हीं सब धर्मोंके कारण इस आश्रमको ‘क्षेमाश्रम’ (कल्याणप्राप्तिका स्थान) कहते हैं । इस आश्रममें आया हुआ ब्राह्मण अविनाशी ब्रह्मके साथ एकता प्राप्त कर लेता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 61, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 422 ज्ञान–विवेक
प्रारब्ध की प्रधानता

मुनि उवाच

अनागतं यन्न ममेति विद्यादतिक्रान्तं यन्न ममेति विद्यात् ।

दिष्टं बलीय इति मन्यमाना ।

स्ते पण्डितास्तत्सतां स्थानमाहुः ॥

जो वस्तु भविष्यमें मिलनेवाली है, उसे यही माने कि ‘वह मेरी नहीं है’ तथा जो मिलकर नष्ट हो चुकी हो, उसके विषयमें भी यही भाव रखे कि ‘वह मेरी नहीं थी ।’ जो ऐसा मानते हैं कि ‘प्रारब्ध ही सबसे प्रबल है,’ वे ही विद्वान् हैं और उन्हें सत्पुरुषोंका आश्रय कहा गया है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 104, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 697 कर्म–प्रारब्ध
अनित्य वस्तुओं का त्याग

मुनि उवाच

संचये च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते ।

संयोगे च वियोगान्ते को नु विप्रणयेन्मनः ॥

जब संग्रहका अन्त विनाश ही है, जब जीवनका अन्त मृत्यु ही है और जब संयोगका अन्त वियोग ही है, तब इनकी ओर कौन अपना मन लगायेगा?

शान्तिपर्व, अध्याय 104, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 701
मोह का निवारण

भीष्म उवाच

अज्ञानप्रभवो मोहः पापाभ्यासात् प्रवर्तते ।

यदा प्राज्ञेषु रमते तदा सद्यः प्रणश्यति ॥

मोह अज्ञानसे उत्पन्न होता है और पापकी आवृत्ति करनेसे बढ़ता है । जब मनुष्य विद्वानोंमें अनुराग करता है, तब उसका मोह तत्काल नष्ट हो जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 163, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1056 ज्ञान–विवेक

महाभारत — खण्ड ५ के सब 81 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

शिव भक्ति का महत्त्व

अम्बा उवाच

हरचरणनिरतमतिना ।

भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य ।

संसारभयं न भवति ।

हरभक्तिरसायनं पीत्वा ॥

कुटिल कलिकालको पाकर सभी पुरुषोंको अपना मन भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा देना चाहिये । शिव भक्तिरूपी रसायनके पी लेनेपर संसाररूपी रोगका भय नहीं रह जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 184 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 188 भक्ति
उत्तम ब्रह्मचर्य और धर्म

भीष्म → तात

ब्रह्मचर्यात् परं तात मधुमांसस्य वर्जनम् ।

मर्यादायां स्थितो धर्मः शमश्चैवास्य लक्षणम् ॥

भीष्मजीने कहा — तात! मांस और मदिराका त्याग ब्रह्मचर्यसे भी श्रेष्ठ है-वही उत्तम ब्रह्मचर्य है । वेदोक्त मर्यादामें स्थित रहना सबसे श्रेष्ठ धर्म है तथा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना ही सर्वोत्तम पवित्रता है ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर को उत्तम ब्रह्मचर्य, श्रेष्ठ धर्म और सर्वोत्तम पवित्रता के विषय में बताया।

अनुशासनपर्व, अध्याय 22, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 324 साधना–योग
स्त्री के प्रति व्यवहार

देवशर्मा उवाच

नासां स्नेहो नरैः कार्यस्तथैवेर्ष्या जनेश्वर ।

खेदमास्थाय भुञ्जीत धर्ममास्थाय चैव ह ।

अनृताविह पर्वादिदोषवर्ज नराधिप ॥

नरेश्वर! मनुष्योंको स्त्रियोंके प्रति न तो विशेष आसक्त होना चाहिये और न उनसे ईर्ष्या ही करनी चाहिये । वैराग्यपूर्वक धर्मका आश्रय लेकर पर्व आदि दोषका त्याग करते हुए ऋतुस्नानके पश्चात् उनका उपभोग करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 43, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 464 नीति–व्यवहार
तृष्णा का स्वभाव

विश्वामित्र उवाच

कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते ।

अथैनमपरः कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत् ॥

विश्वामित्र बोले — किसी वस्तुकी कामना करनेवाले मनुष्यकी एक इच्छा जब पूरी होती है, तब दूसरी नयी उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार तृष्णा तीरकी तरह मनुष्यके मनपर चोट करती ही रहती है ।

विश्वामित्र ने कश्यप और गौतम के कथनों के सन्दर्भ में कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 93, श्लोक 43 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 796 माया–संसार
संसार से मुक्ति

ब्राह्मण उवाच

सुखदुःखे यथा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति ।

कायं चामेध्यसंघातं विनाशं कर्मसंहितम् ॥

यच्च किंचित्सुखं तच्च दुःखं सर्वमिति स्मरन् ।

संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम् ॥

जो मनुष्य सुख और दुःख दोनोंको अनित्य समझता है, शरीरको अपवित्र वस्तुओंका समूह समझता है और मृत्युको कर्मका फल समझता है तथा सुखके रूपमें प्रतीत होनेवाला जोकुछ भी है वह सब दुःख ही दुःख है, ऐसा मानता है, वह घोर एवं दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायगा ।

सिद्ध ब्राह्मण ने काश्यप से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 18, श्लोक 31–32 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1669 ज्ञान–विवेक

महाभारत — खण्ड ६ के सब 36 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

रामायण का माहात्म्य

नारद उवाच

अन्यमासं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः ।

सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् ॥

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषिताम् ।

समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम् ॥

दुःस्वप्ननाशनं धन्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ।

रामायणस्य माहात्म्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः ॥

नारदजी कहते हैं — महर्षियो! अब मैं रामायणके पाठ और श्रवणके लिये उपयोगी दूसरे मासका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ।

नारदजी महर्षियों से कहते हैं।

उत्तरखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 1–3 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 56 भक्ति
मोह का घातक परिणाम

विनाशकामामहिताममित्रामावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम् ।

चिरं बताङ्केन धृतासि सर्प ।

महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात् ॥

अरी! तू मेरा विनाश चाहनेवाली, अहित करनेवाली और शत्रुरूप है । जैसे कोई अपनी ही मृत्युको घरमें स्थान दे दे, उसी प्रकार मैंने तुझे घरमें बसा लिया है । खेदकी बात है कि मैंने मोहवश तुझ महाविषैली नागिनको चिरकालसे अपने अङ्कमें धारण कर रखा है; इसीलिये आज मैं मारा गया ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 12, श्लोक 105 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 276 माया–संसार
धर्म का त्याग

ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम ।

केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम् ॥

जो तेरा आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं । तूने केवल धनमें आसक्त होकर धर्मका त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ ।

राजा दशरथ ने कैकेयी से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 42, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 366 कर्म–प्रारब्ध
सांसारिक आसक्ति का त्याग

यथा ग्रामान्तरं गच्छन् नरः कश्चिद् बहिर्वसेत् ।

उत्सृज्य च तमावासं प्रतिष्ठेतापरेऽहनि ॥

एवमेव मनुष्याणां पिता माता गृहं वसु ।

आवासमात्रं काकुत्स्थ सज्जन्ते नात्र सज्जनाः ॥

जैसे कोई मनुष्य दूसरे गाँवको जाते समय बाहर किसी धर्मशालामें एक रातके लिये ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थानको छोड़कर आगेके लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन-ये मनुष्योंके आवासमात्र हैं । ककुत्स्थकुलभूषण! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं ।

जाबालि ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 108, श्लोक 5–6 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 537
शोक का त्याग

एष शोकः परित्यक्तः सर्वकार्यावसादकः ।

विक्रमेष्वप्रतिहतं तेजः प्रोत्साहयाम्यहम् ॥

लो, सब तरहके काम बिगाड़नेवाले शोकको मैंने त्याग दिया । अब मैं पराक्रमविषयक दुर्धर्ष तेजको प्रोत्साहित करता हूँ (बढ़ाता हूँ)

श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मण से इस प्रकार कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 27, श्लोक 43 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 836

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ के सब 10 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

श्रीराम का धैर्य

धर्मापदेशात् त्यजतः खराज्यं ।

मां चाप्यरण्यं नयतः पदातेः ।

नासीद् यथा यस्य न भीर्न शोकः ।

कश्चित् स धैर्य हृदये करोति ॥

धर्मपालन के उद्देश्यसे अपने राज्यका त्याग करते और मुझे पैदल ही वनमें लाते समय जिन्हें तनिक भी भय और शोक नहीं हुआ, वे श्रीरघुनाथजी इस संकट के समय हृदय में धैर्य तो धारण करते हैं न?

सीता ने हनुमान्जी से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 36, श्लोक 29 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 134 धर्म–आचरण
पातिव्रत्य का प्रभाव

नहि धर्मात्मनस्तस्य भार्याममिततेजसः ।

स्वचरित्राभिगुप्तां तां स्प्रष्टुमर्हति पावकः ॥

सीता अमिततेजस्वी धर्मात्मा भगवान् श्रीरामकी पत्नी हैं । वे अपने चरित्र के बलसे-पातिव्रत्य के प्रभावसे सुरक्षित हैं । आग उन्हें छू भी नहीं सकती ।

हनुमान्जी ने चिन्ता में पड़कर यह विचार किया।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 55, श्लोक 23 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 189
आसक्ति का त्याग

तस्मात् पुत्रेषु दारेषु मित्रेषु च धनेषु च ।

नातिप्रसङ्गः कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवम् ॥

अतः स्त्री, पुत्र, मित्र और धनमें विशेष आसक्ति नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनसे वियोग होना निश्चित है ।

लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 52, श्लोक 12 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 803 ज्ञान–विवेक
तप का महत्त्व

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना तपः कुर्यामनुत्तमम् ।

तपो हि परमं श्रेयः सम्मोहमितरत् सुखम् ॥

एक समय वृत्रासुरके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं परम उत्तम तप करूँ; क्योंकि तप ही परम कल्याणका साधन है । दूसरा सारा सुख तो मोहमात्र ही है ।

लक्ष्मण ने श्रीराम को वृत्रासुर की कथा सुनाते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 84, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 862 ज्ञान–विवेक

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

भक्ति की व्यापकता

ज्ञानवैराग्यसंयुक्ता भक्तिः प्रेमरसावहा ।

प्रतिगेहं प्रतिजनं ततः क्रीडां करिष्यति ॥

तब प्रेमरस प्रवाहित करनेवाली भक्ति ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर प्रत्येक घर और व्यक्तिके हृदयमें क्रीड़ा करेगी ।

उत्तरखण्ड, अध्याय 2, श्लोक 63 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 100 ज्ञान–विवेक
परम स्वरूप में रमण

यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययोः ।

रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥

किन्तु जब यह गुणोंको क्षुब्ध करनेवाले काल और मोह उत्पन्न करनेवाली माया — इन दोनोंसे परे अपने अनन्त स्वरूपमें मोहरहित होकर रमण करने लगता है-आत्माराम हो जाता है; तब यह ‘मैं, मेरा’ का भाव छोड़कर पूर्ण उदासीन-गुणातीत हो जाता है ।

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 9, श्लोक 3 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 380 माया–संसार
सत्सङ्ग का प्रभाव

संगो यः संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया ।

स एव साधुषु कृतो निःसंगत्वाय कल्पते ॥

अज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है ।

देवहूति ने अपने पति कर्दम मुनि से सन्न्यासाश्रम के समय यह बात कही।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 55 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 585 ज्ञान–विवेक
सिद्धपुरुष की देह-अहन्ता

देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् ।

स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः ।

तं सप्रपंचमधिरूढसमाधियोगः ।

स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥

उसका शरीर तो पूर्वजन्मके संस्कारोंके अधीन है; अतः जबतक उसका आरम्भक प्रारब्ध शेष है तबतक वह इन्द्रियोंके सहित जीवित रहता है; किन्तु जिसे समाधिपर्यन्त योगकी स्थिति प्राप्त हो गयी है और जिसने परमात्मतत्त्वको भी भलीभाँति जान लिया है, वह सिद्धपुरुष पुत्र-कलत्रादिके सहित इस शरीरको स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले शरीरोंके समान फिर स्वीकार नहीं करता-फिर उसमें अहंता-ममता नहीं करता ।

कपिल ने माता देवहूति से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 28, श्लोक 38 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 627 ज्ञान–विवेक
देह की कष्टकारी प्रकृति

अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।

देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥

जीवात्माका यह देह — जो पंचभूत, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंका संघात है — जीवको विविध प्रकारके क्लेश और सन्ताप देनेवाली कही जाती है ।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 25 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1228

श्रीमद्भागवत महापुराण — १ के सब 14 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

संसार की नश्वरता

तस्माल्लोकमिमं राजन् स्वप्नमायामनोरथम् ।

वीक्ष्यायम्यात्मनाऽऽत्मानं समः शान्तो भव प्रभो ॥

इसलिये महाराज! यह बात समझ लीजिये कि यह दुनिया चार दिनकी चाँदनी है, सपनेका खिलवाड़ है, जादूका तमाशा है और है मनोराज्यमात्र! आप अपने प्रयत्नसे, अपनी शक्तिसे चित्तको रोकिये; ममतावश पक्षपात न कीजिये । आप समर्थ हैं, समत्वमें स्थित हो जाइये और इस संसारकी ओरसे उपराम-शान्त हो जाइये ।

अक्रूर जी ने राजा धृतराष्ट्र को उपदेश दिया।

दशमस्कन्ध, अध्याय 49, श्लोक 25 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 661 माया–संसार
उत्तम भगवद्भक्त की पहचान

देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो ।

जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रः ।

संसारधर्मैरविमुह्यमानः ।

स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥

संसारके धर्म हैं — जन्म-मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट, भय और तृष्णा । ये क्रमशः शरीर, प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिको प्राप्त होते ही रहते हैं । जो पुरुष भगवान्की स्मृतिमें इतना तन्मय रहता है कि इनके बार-बार होते-जाते रहनेपर भी उनसे मोहित नहीं होता, पराभूत नहीं होता, वह उत्तम भागवत है ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 49 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1058 ज्ञान–विवेक
उत्तम भगवद्भक्त के लक्षण

न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भवः ।

वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः ॥

जिसके मनमें विषय-भोगकी इच्छा, कर्म-प्रवृत्ति और उनके बीज वासनाओंका उदय नहीं होता और जो एकमात्र भगवान् वासुदेवमें ही निवास करता है, वह उत्तम भगवद्भक्त है ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 50 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1058 भक्ति
अनासक्ति और दया का अभ्यास

सर्वतो मनसोऽसंगमादौ संगं च साधुषु ।

दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥

पहले शरीर, सन्तान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखे । फिर भगवान्‌के भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिये — यह सीखे । इसके पश्चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करे ।

योगीश्वरों ने राजा निमि को उत्तर देते हुए कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 23 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1065 धर्म–आचरण
स्मरण का फल

यशःश्रियामेव परिश्रमः परो ।

वर्णाश्रमाचारतपःश्रुतादिषु ।

अविस्मृतिः श्रीधरपादपद्मयोर्गुणानुवादश्रवणादिभिर्हरः ॥

वर्णाश्रमके अनुकूल आचरण, तपस्या और अध्ययन आदिके लिये जो बहुत बड़ा परिश्रम किया जाता है, उसका फल है-केवल यश अथवा लक्ष्मीकी प्राप्ति । परन्तु भगवान्के गुण, लीला, नाम आदिका श्रवण, कीर्तन आदि तो उनके श्रीचरणकमलोंकी अविचल स्मृति प्रदान करता है ।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 53 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1414 कर्म–प्रारब्ध

श्रीमद्भागवत महापुराण — २ के सब 6 पद्य

श्रीरामचरितमानस

ज्ञानियों का मोह

सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें । ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें ॥

ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा । तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा ॥

हे मुनि! सुनिये, मोह तो उसके मनमें होता है जिसके हृदयमें ज्ञान-वैराग्य नहीं है । आप तो ब्रह्मचर्यव्रतमें तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं । भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है?

भगवान् ने नारदजी से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 129.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 141 ज्ञान–विवेक
भक्तिहीन जीवन का शोक

होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन ॥

हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु ॥

घरमें रहते बुढ़ापा आ गया, परन्तु विषयोंसे वैराग्य नहीं होता; [इस बातको सोचकर] उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीहरिकी भक्ति बिना जन्म यों ही चला गया ।

स्वायम्भुव मनुजी ने घर में रहते बुढ़ापा आने पर विषयों से वैराग्य न होने और हरि भक्ति के बिना जन्म बीत जाने पर दुःख व्यक्त किया।

बालकाण्ड, सोरठा 142 श्रीरामचरितमानस पृ. 152 भक्ति
अकिञ्चनता की महिमा

तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें । परम अकिंचन प्रिय हरि केरें ॥

तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा । होत बिरंचि सिवहि संदेहा ॥

इसीसे तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिञ्चन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान्‌को प्रिय होते हैं । आप-सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनोंको देखकर ब्रह्मा और शिवजीको भी सन्देह हो जाता है [कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी] ।

कपट-तपस्वी ने राजा से कहा कि वह निर्धन और घर-द्वारहीन है।

बालकाण्ड, चौपाई 161(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 167 भक्ति
परमेश्वर की व्यापकता

अग जगमय सब रहित बिरागी । प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ॥

मोर बचन सब के मन माना । साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥

वे चराचरमय (चराचरमें व्याप्त) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है); वे प्रेमसे प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि । (अग्नि अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिये अरणिमन्थनादि साधन किये जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है । इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान् भी प्रेमसे प्रकट होते हैं ।) मेरी बात सबको प्रिय लगी । ब्रह्माजीने ‘साधु, साधु’ कहकर बड़ाई की ।

शिवजी ने पार्वतीजी को देवताओं की सभा में कही अपनी बात सुनायी।

बालकाण्ड, चौपाई 185.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 188 भक्ति
मिथ्या इच्छा का त्याग

ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई । मन मोदकन्हि कि भूख बुताई ॥

सिख हमारि सुनि परम पुनीता । जगदंबा जानहु जियँ सीता ॥

जगत पिता रघुपतिहि बिचारी । भरि लोचन छबि लेहु निहारी ॥

सुंदर सुखद सकल गुन रासी । ए दोउ बंधु संभु उर बासी ॥

गाल बजाकर व्यर्थ ही मत मरो । मनके लड्डुओंसे भी कहीं भूख बुझती है? हमारी परम पवित्र (निष्कपट) सीखको सुनकर सीताजीको अपने जीमें साक्षात् जगज्जननी समझो (उन्हें पत्नीरूपमें पानेकी आशा एवं लालसा छोड़ दो), और श्रीरघुनाथजीको जगत्‌का पिता (परमेश्वर) विचारकर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो [ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा] । सुन्दर, सुख देनेवाले और समस्त गुणोंकी राशि ये दोनों भाई शिवजीके हृदयमें बसनेवाले हैं (स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदयमें छिपाये रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रोंके सामने आ गये हैं)

श्रीराम के दर्शन से विवेकी राजाओं ने अन्य राजाओं को समझाते हुए कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 246.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 241

श्रीरामचरितमानस के सब 86 पद्य

In English

Detachment and the Impermanence of the World

These verses from the Mahābhārata, Purāṇas, Smṛtis, Rāmayana, and Rāmacaritamānasa teach that worldly life is transient and full of suffering. They advocate for vairagya (detachment) through self-control, devotion to the divine, and recognizing that material possessions and relationships are temporary.

These verses answer

  • What is vairagya in hinduism?
  • How to overcome worldly attachment according to mahabharata?
  • Meaning of detachment from the shrimad bhagavatam?
  • Importance of dharma and renunciation in मनुस्मृति?
  • How to achieve peace through devotion to shiva?