श्रीगणेशाय नमः।
मर्म — विषय
साधना–योग
अभ्यास, संयम और मन का निग्रह
248 पद्य · 13 ग्रन्थ
देवी भागवत — उत्तरार्द्ध
श्रौतस्मार्तादिकं कर्म क्रियते मोक्षकाङ्क्षिभिः ।
साग्निकश्च सदाचारो विद्वद्भिश्च सुशिक्षितः ॥
ततः कुर्यात्प्रयत्नेन फलमूलोदकादिभिः ।
भिक्षान्नं शुद्धमश्नीयादष्टौ ग्रासान्स्वयं भुजेत् ॥
मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुष श्रौत और स्मार्त आदि कर्म करते हैं । साधकको फल, मूल तथा जल आदिके आहारपर रहते हुए विद्वानोंके द्वारा सम्यक् शिक्षा प्राप्त करके सदाचारी तथा अग्निहोत्री होकर प्रयत्नपूर्वक जप करना चाहिये । भिक्षामें प्राप्त शुद्ध अन्न ही ग्रहण करे, जिसमें स्वयं मात्र आठ ग्रास ही भोजन करे ।
भगवान् नारायण ने नारदजी से कहा।
महाभारत — खण्ड १
शमीक उवाच
तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः ।
क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥
इसलिये तुम सदा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए क्षमाशील बनो । क्षमासे ही ब्रह्माजीके निकटवर्ती लोकोंमें जा सकोगे ।
पाण्डु उवाच
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः ।
ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थिताः ॥
तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः ।
सम्परित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ॥
जीवित पुरुषोंद्वारा अपने अभ्युदयके लिये जो-जो कर्म किये जा सकते हैं, उन समस्त सकाम कर्मोंको मैं त्याग दूँगा; क्योंकि वे सब कालसे सीमित हैं । अनित्य फल देनेवाली क्रियाओंके लिये जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा चेष्टा की जाती है, उस चेष्टाको भी मैं सर्वथा त्याग दूँगा; धर्मके फलको भी छोड़ दूँगा । अपने अन्तःकरणके मलको सर्वथा धोकर शुद्ध हो जाऊँगा ।
गन्धर्व उवाच
वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः ।
धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ॥
जो छहों अंगोंसहित वेदके स्वाध्यायमें तत्पर, ईमानदार, सत्यवादी, धर्मात्मा और मनको वशमें रखनेवाले हों, ऐसे ही ब्राह्मण राजाओंके पुरोहित होने चाहिये ।
चित्ररथ गन्धर्व ने अर्जुन को पुरोहित के लक्षण बताते हुए कहा।
गन्धर्व उवाच
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।
तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।
इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥
गन्धर्वने कहा — वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है । जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं । इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ।
गन्धर्व ने अर्जुन को बताया कि वसिष्ठ मुनि कौन हैं।
महाभारत — खण्ड २
शौनक उवाच
इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः ।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥
यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग — ये धर्मके आठ मार्ग हैं ।
शौनकजी ने युधिष्ठिर से कहा।
शौनक उवाच
सम्यक्संकल्पसंबन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् ।
सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात् ॥
सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् ।
सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात् ॥
पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है ।
पुलस्त्य उवाच
प्रतिग्रहादपावृत्तः संतुष्टो येन केनचित् ।
अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥
जो प्रतिग्रहसे दूर रहे तथा जो कुछ अपने पास हो, उसीसे संतुष्ट रहे और जिसमें अहंकारका अभाव हो, वही तीर्थका फल पाता है ।
पुलस्त्यजी ने तीर्थ-सेवन का फल बताते हुए कहा।
बालमुकुन्द उवाच
यतयः शान्तिपरमा यतात्मानो बुभुत्सवः ।
कामक्रोधद्वेषमुक्ता निःसंगा वीतकल्मषाः ॥
सत्त्वस्था निरहङ्कारा नित्यमध्यात्मकोविदाः ।
मामेव सततं विप्राश्चिन्तयन्त उपासते ॥
शान्तिपरायण, संयमी, जिज्ञासु, काम-क्रोध-द्वेषरहित आसक्तिशून्य, निष्पाप, सात्त्विक, नित्य अहंकारशून्य तथा अध्यात्मज्ञानकुशल यति एवं ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं ।
बालमुकुन्द भगवान् ने मार्कण्डेय मुनि से कहा।
महाभारत — खण्ड ३
परमहंस उवाच
एतत् कार्यममराः संश्रुतं मे ।
धृतिः शर्मः सत्यधर्मानुवृत्तिः ।
ग्रन्थिं विनीय हृदयस्य सर्वं ।
प्रियाप्रिये चात्मसमं नयीत ॥
परमहंसने कहा — साध्यदेवताओ! मैंने सुना है कि धैर्य धारण, मनोनिग्रह तथा सत्य-धर्मोंका पालन ही कर्तव्य है; इसके द्वारा पुरुषको चाहिये कि हृदयकी सारी गाँठ खोलकर प्रिय और अप्रियको अपने आत्माके समान समझे ।
परमहंस ने साध्यदेवताओं से उनकी विद्वत्तापूर्ण उदार वाणी सुनाने के अनुरोध पर कहा।
विदुर उवाच
अरोषणो यः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः ।
निन्दाप्रशंसोपरतः प्रियाप्रिये ।
त्यजन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ॥
जो क्रोध न करनेवाला, लोष्ट, पत्थर और सुवर्ण को एक-सा समझनेवाला, शोकहीन, सन्धि-विग्रहसे रहित, निन्दा-प्रशंसासे शून्य, प्रिय-अप्रियका त्याग करनेवाला तथा उदासीन है, वही भिक्षुक (संन्यासी) है ।
सनत्सुजात उवाच
गुरुं शिष्यो नित्यमभिवादयीत ।
स्वाध्यायमिच्छेच्छुचिरप्रमत्तः ।
मानं न कुर्यान्नादधीत रोषमेष प्रथमो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥
ब्रह्मचारी शिष्यको चाहिये कि वह नित्य गुरुको प्रणाम करे, बाहर-भीतरसे पवित्र हो प्रमाद छोड़कर स्वाध्यायमें मन लगावे, अभिमान न करे, मनमें क्रोधको स्थान न दे । यह ब्रह्मचर्यका पहला चरण है ।
संजय उवाच
नाकृतात्मा कृतात्मानं जातु विद्याज्जनार्दनम् ।
आत्मनस्तु क्रियोपायो नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् ॥
संजयने कहा — महाराज! जिसने अपने मनको वशमें नहीं किया है, वह कभी नित्यसिद्ध परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको नहीं पा सकता । अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें किये बिना दूसरा कोई कर्म उन परमात्माकी प्राप्तिका उपाय नहीं हो सकता ।
सञ्जय ने धृतराष्ट्र को परममोक्ष प्राप्त करने के मार्ग के विषय में बताते हुए कहा।
महाभारत — खण्ड ४
संजय उवाच
तपोऽभ्युदीर्णं तपसैव बाध्यते ।
बलं बलेनैव तथा मनस्विभिः ।
मनश्च मे शत्रुनिवारणे ध्रुवं ।
स्वरक्षणे चाचलवद् व्यवस्थितम् ॥
मनस्वी पुरुष बढ़े हुए तपका तपसे और प्रचण्ड बलका बलसे ही निवारण करते हैं । यह सोचकर मेरा मन भी शत्रुओंको रोकनेके लिये दृढ़ निश्चय किये हुए है तथा अपनी रक्षाके लिये भी पर्वतकी भाँति अविचल भावसे स्थित है ।
मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेयं भगवन्नहम् ।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः ।
विधिं च योगस्य परं कार्याकार्यस्य शास्त्रतः ।
संन्यासकृतबुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः ।
सर्वाश्चास्य क्रियाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
‘भगवन्! मैं मोक्षधर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ ।’ उनकी वह बात सुनकर महातपस्वी जैगीषव्यने उनका संन्यास लेनेका विचार जानकर उन्हें ज्ञानका उपदेश किया । साथ ही योगकी उत्तम विधि बताकर शास्त्रके अनुसार कर्तव्य-अकर्तव्यका भी उपदेश दिया । इतना ही नहीं, उन्होंने शास्त्रीय विधिके अनुसार उनके संन्यासग्रहणसम्बन्धी समस्त कार्य (दीक्षा और संस्कार आदि) किये ।
देवल ने महामुनि महात्मा जैगीषव्य के पास जाकर विनीतभाव से मोक्षधर्म का आश्रय लेने की इच्छा प्रकट की।
विदुर उवाच
साधुः परमदुःखानां दुःखभैषज्यमाचरेत् ।
ज्ञानौषधमवाप्येह दूरपारं महौषधम् ।
छिन्द्याद् दुःखमहाव्याधिं नरः संयतमानसः ॥
साधु पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको वशमें करके ज्ञानरूपी महान् ओषधि प्राप्त करे, जो परम दुर्लभ है । उससे अपने बड़े-से-बड़े दुःखोंकी चिकित्सा करे । उस ज्ञानरूपी ओषधिसे दुःखरूपी महान् व्याधिका नाश कर डाले ।
विदुर उवाच
न विक्रमो न चाप्यर्थो न मित्रं न सुहृज्जनः ।
तथोन्मोचयते दुःखाद् यथाऽऽत्मा स्थिरसंयमः ॥
पराक्रम, धन, मित्र और सुहृद् भी उस तरह दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकते, जैसा कि दृढ़तापूर्वक संयममें रहनेवाला अपना मन दिला सकता है ।
महाभारत — खण्ड ५
युधिष्ठिर उवाच
तपसा महदाप्नोति बुद्ध्या वै विन्दते महत् ।
त्यागेन सुखमाप्नोति सदा कौन्तेय तत्त्ववित् ॥
कुन्तीनन्दन! तत्त्ववेत्ता पुरुष तपस्याद्वारा महान् पदको प्राप्त कर लेता है, ज्ञानयोगसे उस परमतत्त्वको उपलब्ध कर लेता है और स्वार्थत्यागके द्वारा सदा नित्य सुखका अनुभव करता रहता है ।
युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा।
भीष्म उवाच
अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यं दमो घृणा ।
एतत् तपो विदुर्धीरा न शरीरस्य शोषणम् ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, क्रूरताको त्याग देना, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना तथा सबके प्रति दयाभाव बनाये रखना-इन्हींको धीर पुरुषोंने तप माना है । केवल शरीरको सुखाना ही तप नहीं है ।
भीष्म उवाच
संनिकृष्टांश्चरेदेतान् न चैतान् मनसा त्यजेत् ।
विमुक्तस्तपसा सर्वान् धर्मादीन् कामनैष्ठिकान् ॥
ये धर्म आदि जिस प्रकार संनिकृष्ट अर्थात् अपना वास्तविक हित करनेवाले हों, उसी रूपमें इनका सेवन करे अर्थात् इनको कल्याणसाधन बनाकर ही उपयोगमें लावे । मनद्वारा भी इनका त्याग न करे, फिर स्वरूपसे शरीरद्वारा त्याग करना तो दूरकी बात है । केवल तप अथवा विचारके द्वारा ही उनसे अपनेको मुक्त रखे अर्थात् आसक्ति और फलका त्याग करके ही इन सब धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये ।
प्रह्लाद उवाच
ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते संयच्छन्ति च मां सदा ।
ते मां काव्यपथे युक्तं शुश्रूषुमनसूयकम् ॥
धर्मात्मानं जितक्रोधं नियतं संयतेन्द्रियम् ।
समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥
वे ब्राह्मण विश्वस्त होकर मुझे नीतिका उपदेश देते और सदा संयममें रखते हैं । मैं सदा ही यथाशक्ति शुक्राचार्यके बताये हुए नीतिमार्गपर चलता, ब्राह्मणोंकी सेवा करता, किसीके दोष नहीं देखता और धर्ममें मन लगाता हूँ । क्रोधको जीतकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें किये रहता हूँ । अतः जैसे मधुकी मक्खियाँ शहदके छत्तेको फूलोंके रससे सींचती रहती हैं, उसी प्रकार उपदेश देनेवाले ब्राह्मण मुझे शास्त्रके अमृतमय वचनोंसे सींचा करते हैं ।
प्रह्लाद ने उस ब्रह्मवादी ब्राह्मण से कहा।
महाभारत — खण्ड ६
भीष्म → तात
ब्रह्मचर्यात् परं तात मधुमांसस्य वर्जनम् ।
मर्यादायां स्थितो धर्मः शमश्चैवास्य लक्षणम् ॥
भीष्मजीने कहा — तात! मांस और मदिराका त्याग ब्रह्मचर्यसे भी श्रेष्ठ है-वही उत्तम ब्रह्मचर्य है । वेदोक्त मर्यादामें स्थित रहना सबसे श्रेष्ठ धर्म है तथा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना ही सर्वोत्तम पवित्रता है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर को उत्तम ब्रह्मचर्य, श्रेष्ठ धर्म और सर्वोत्तम पवित्रता के विषय में बताया।
भीष्म उवाच
क्रोधो हन्ति हि यद् दानं तस्माद् दानात् परं दमः ।
अदृश्यानि महाराज स्थानान्ययुतशो दिवि ।
ऋषीणां सर्वलोकेषु यानि ते यान्ति देवताः ।
दमेन यानि नृपते गच्छन्ति परमर्षयः ।
कामयाना महत्स्थानं तस्माद् दानात् परं दमः ॥
दान करते समय यदि क्रोध आ जाय तो वह दानके फलको नष्ट कर देता है; इसलिये उस क्रोधको दबानेवाला जो दमनामक गुण है, वह दानसे श्रेष्ठ माना गया है । महाराज! नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले ऋषियोंके स्वर्गमें सहस्रों अदृश्य स्थान हैं, जिनमें दमके पालनद्वारा महान् लोककी इच्छा रखनेवाले महर्षि और देवता इस लोकसे जाते हैं; अतः ‘दम’ दानसे श्रेष्ठ है ।
ब्रह्मा उवाच
अहिंसा ब्रह्मचर्यं च सत्यमार्जवमेव च ।
अक्रोधश्चानसूया च दमो नित्यमपैशुनम् ।
अष्टस्वेतेषु युक्तः स्याद् व्रतेषु नियतेन्द्रियः ॥
अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना — इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे । इन्द्रियोंको वशमें रखे ।
श्वशुर उवाच
क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्मबुद्धिं व्यपोहति ।
क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह ।
बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्गं जयते ध्रुवम् ॥
भूख मनुष्यकी बुद्धिको चौपट कर देती है । धार्मिक विचारको मिटा देती है । क्षुधासे ज्ञान लुप्त हो जानेके कारण मनुष्य धीरज खो देता है । जो भूखको जीत लेता है, वह निश्चय ही स्वर्गपर विजय पाता है ।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १
नारद उवाच
एवं यः प्रयतः कुर्याद् रामायणविधिं तथा ।
स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥
इस प्रकार जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर रामायणकी विधिका अनुष्ठान करता है, वह भगवान विष्णुके धाममें जाता है; जहाँसे लौटकर वह फिर इस संसारमें नहीं आता ।
त्वय्येतत् पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे ।
गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनां चानुयायिता ॥
पुरुषसिंह! तुम रघुकुलमें उत्पन्न हुए हो । तुममें गुरुजनोंकी सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुसरणका भाव होना उचित ही है ।
भगवान् भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत से कहा।
न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।
रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः ॥
‘राजन्! हमने जीवमात्रको दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लिया है । अब तपस्या ही हमारा धन है । जैसे माता गर्भस्थ बालककी रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरहसे हमारी रक्षा करनी चाहिये’
तपस्वी मुनियों ने वन में श्री रामचन्द्रजी का सत्कार करते हुए उनसे अपनी रक्षा की प्रार्थना की।
आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः ।
प्राप्तये निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम् ॥
चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्मका सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधनसे सुखके हेतुभूत धर्मकी प्राप्ति नहीं होती है ।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
न मांसं राघवो भुङ्के न चैव मधु सेवते ।
वन्यं सुविहितं नित्यं भक्तमश्नाति पञ्चमम् ॥
कोई भी रघुवंशी न तो मांस खाता है और न मधुका ही सेवन करता है; फिर भगवान् श्रीराम इन वस्तुओंका सेवन क्यों करते? वे सदा चार समय उपवास करके पाँचवें समय शास्त्रविहित जंगली फल-मूल और नीवार आदि भोजन करते हैं ।
न ह्येकः साधको हेतुः स्वल्पस्यापीह कर्मणः ।
यो हार्थे बहुधा वेद स समर्थोऽर्थसाधने ॥
छोटे-से-छोटे कर्मकी भी सिद्धिके लिये कोई एक साधक हेतु नहीं हुआ करता । जो पुरुष किसी कार्य या प्रयोजनको अनेक प्रकारसे सिद्ध करनेकी कला जानता हो, वही कार्य साधनमें समर्थ हो सकता है ।
अविक्लवमसम्भ्रान्तमव्यग्र हृदयेक्षणम् ।
रश्मिसंचारनियतं प्रचोदय रथं द्रुतम् ॥
भय तथा घबराहट छोड़कर मन और नेत्रोंको स्थिर रखते हुए घोड़ोंकी बागडोर काबूमें रक्खो और रथको ज चलाओ ।
श्रीरामचन्द्रजी ने अपने सारथि मातलिक से युद्ध के समय सावधान रहने और रथ चलाने हेतु कहा।
शिव महापुराण — २
तस्माज्ज्ञानं यथायोगमभ्यसेत्सततं बुधः ।
अभ्यासाज्जायते सिद्धिर्योगोऽभ्यासात्प्रवर्धते ॥
संवित्तिर्लभ्यतेऽभ्यासादभ्यासान्मोक्षमश्नुते ।
अभ्यासः सततं कार्यो धीमता मोक्षकारणम् ॥
अतः बुद्धिमान् पुरुषको योग-ज्ञानका नित्य अभ्यास करना चाहिये, अभ्याससे सिद्धि उत्पन्न होती है, अभ्याससे योग बढ़ता है । अभ्याससे ज्ञान प्राप्त होता है और अभ्याससे मुक्ति मिलती है, अतः बुद्धिमान्को मोक्षके कारणभूत योगका निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये ।
श्रीमद्भागवत महापुराण — १
एतां यो नियततया शृणोति भक्त्या ।
यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे ॥
तौ सम्यग्विधिकरणात्फलं लभेते ।
याथार्थ्यान्न हि भुवने किमप्यसाध्यम् ॥
जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्तिभावसे श्रवण करता है और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा-पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं — उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता ।
यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात् ।
एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत् ॥
जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़कर जानेवाला गन्ध अपने आश्रय पुष्पसे घ्राणेन्द्रियतक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोगमें तत्पर और राग-द्वेषादि विकारोंसे शून्य चित्त परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।
विरक्तश्चेन्द्रियरतौ भक्तियोगेन भूयसा ।
तं निरन्तरभावेन भजेताद्धा विमुक्तये ॥
यदि उपासकको इन्द्रियसम्बन्थी भोगोंसे वैराग्य हो गया हो तो वह मोक्षप्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक अविच्छिन्नभावसे भगवान्का भजन करे ।
नारदजी ने ध्रुव से कहा।
षड्वर्गसंयमैकान्ताः सर्वा नियमचोदनाः ।
तदन्ता यदि नो योगानावहेयुः श्रमावहाः ॥
शास्त्रोंमें जितने भी नियमसम्बन्धी आदेश हैं, उनका एकमात्र तात्पर्य यही है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — इन छः शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली जाय अथवा पाँचों इन्द्रिय और मन — ये छः वशमें हो जायँ । ऐसा होनेपर भी यदि उन नियमोंके द्वारा भगवान्के ध्यान-चिन्तन आदिकी प्राप्ति नहीं होती, तो उन्हें केवल श्रम-ही-श्रम समझना चाहिये ।
श्रीमद्भागवत महापुराण — २
यदि न समुद्धरन्ति यतयो हृदि कामजटा ।
दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः ।
असुतृपयोगिनामुभयतोऽप्यसुखं भगवन्ननपगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥
भगवन्! यदि मनुष्य योगी-यति होकर भी अपने हृदयकी विषय-वासनाओंको उखाड़ नहीं फेंकते तो उन असाधकोंके लिये आप हृदयमें रहनेपर भी वैसे ही दुर्लभ हैं, जैसे कोई अपने गलेमें मणि पहने हुए हो, परन्तु उसकी याद न रहनेपर उसे ढूँढ़ता फिरे इधर-उधर । जो साधक अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, विषयोंसे विरक्त भोगना दुःख-ही-दुःख, नहीं होते उन्हें जीवनभर और जीवनके बाद भी पड़ता है । क्योंकि वे साधक नहीं, दम्भी हैं । एक तो अभी उन्हें मृत्युसे छुटकारा नहीं मिला है, लोगोंको रिझाने, धन कमाने आदिके क्लेश उठाने पड़ रहे हैं, और दूसरे आपका स्वरूप न जाननेके कारण अपने धर्म-कर्मका उल्लंघन करनेसे परलोकमें नरक आदि प्राप्त होनेका भय भी बना ही रहता है ।
श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।
मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥
भगवान्की प्राप्तिका मार्ग बतलानेवाले शास्त्रोंमें श्रद्धा और दूसरे किसी भी शास्त्रकी निन्दा न करना, प्राणायामके द्वारा मनका, मौनके द्वारा वाणीका और वासनाहीनताके अभ्याससे कर्मोंका संयम करना, सत्य बोलना, इन्द्रियोंको अपने-अपने गोलकोंमें स्थिर रखना और मनको कहीं बाहर न जाने देना सीखे ।
प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः ।
ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः ॥
मैंने शरीरके भीतर रहनेवाले वायु-प्राणवायुसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह् आहारमात्रकी इच्छा रखता है और उसकी प्राप्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधकको भी चाहिये कि जितनेसे जीवन-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन कर ले । इन्द्रियोंको तृप्त करनेके लिये बहुत-से विषय न चाहे । संक्षेपमें उतने ही विषयोंका उपयोग करना चाहिये जिनसे बुद्धि विकृत न हो, मन चंचल न हो और वाणी व्यर्थकी बातोंमें न लग जाय ।
अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु से कहा।
गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति ।
न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः ॥
राजन्! मैंने सूर्यसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वे अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल खींचते और समयपर उसे बरसा देते हैं, वैसे ही योगी पुरुष इन्द्रियोंके द्वारा समयपर विषयोंका ग्रहण करता है और समय आनेपर उनका त्याग — उनका दान भी कर देता है । किसी भी समय उसे इन्द्रियके किसी भी विषयमें आसक्ति नहीं होती ।
श्रीरामचरितमानस
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥
ब्रह्माके बनाये हुए इस प्रपञ्च (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिनमें] जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं ।
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥
हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥
विषयरूपी साँपका जहर उतारनेके लिये मन्त्र और महामणि हैं । ये ललाटपर लिखे हुए कठिनतासे मिटनेवाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं । अज्ञानरूपी अन्धकारके हरण करनेके लिये सूर्यकिरणोंके समान और सेवकरूपी धानके पालन करनेमें मेघके समान हैं ।
भगति निरूपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥
सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पद रति रस बेद बखाना ॥
नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रियनिग्रह) लताओंके मण्डप हैं । मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है । ऐसा वेदोंने कहा है ।
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू ॥
सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ॥
राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह-इनके वश स्वप्नमें भी मत होना । सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना ।
सुमित्राजी ने लक्ष्मणजी को वन जाने की आज्ञा देते हुए इस प्रकार शिक्षा दी।
In English
Spiritual Discipline and Self-Control
These verses from the Mahabharata, Ramayana, Puranas, and Smritis focus on the importance of controlling the senses and the mind. They teach that true spiritual progress comes through discipline, austerity, and devotion rather than just external rituals.
These verses answer
- How to control senses according to manusmriti?
- Benefits of yoga and practice in shiva mahapurana?
- Importance of self-control in mahabharata?
- Rules for ascetic lifestyle in devi bhagavat?
- Ways to achieve moksha through discipline?