श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

शरणागति

समर्पण और प्रभु पर भरोसा

128 पद्य · 10 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड १

दैव का आश्रय

एलापत्र → राजन

दैवेनोपहतो राजन् यो भवेदिह पूरुषः ।

स दैवमेवाश्रयते नान्यत् तत्र परायणम् ॥

राजन्! इस लोकमें जो पुरुष दैवका मारा हुआ है, उसे दैवकी ही शरण लेनी चाहिये । वहाँ दूसरा कोई आश्रय नहीं काम देता ।

एलापत्र नाग ने वासुकि और अन्य नागों से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 38, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड १ पृ. 306

महाभारत — खण्ड २

हिमालय की महिमा

अर्जुन उवाच

साधूनां पुण्यशीलानां मुनीनां पुण्यकर्मणाम् ।

त्वं सदा संश्रयः शैल स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणाम् ॥

गिरिराज! तुम साधु-महात्माओं, पुण्यात्मा मुनियों तथा स्वर्गमार्गकी अभिलाषा रखनेवाले पुण्यकर्मा मनुष्योंके सदा शुभ आश्रय हो ।

अर्जुन ने हिमालय से विदा लेते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 42, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड २ पृ. 328
देवचिह्नों का विश्लेषण

बृहदश्व उवाच

श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत ।

देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे ।

तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्यापि न लक्षये ।

सा विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ।

शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत ॥

भारत! उसने अपने सुने हुए देवचिह्नोंपर भी विचार किया । वह मन-ही-मन कहने लगी ‘मैंने बड़े-बूढ़े पुरुषोंसे देवताओंकी पहचान करानेवाले जो लक्षण या चिह्न सुन रखे हैं, उन्हें यहाँ भूमिपर बैठे हुए इन पाँच पुरुषोंमेंसे किसी एकमें भी नहीं देख पाती हूँ।’ उसने अनेक प्रकारसे निश्चय और बार-बार विचार करके देवताओंकी शरणमें जाना ही समयोचित कर्तव्य समझा ।

दमयन्ती ने राजा नल को पहचानने के लिए अपने सुने हुए देवचिह्नों पर विचार किया।

वनपर्व, अध्याय 57, श्लोक 14–15 महाभारत — खण्ड २ पृ. 409 ज्ञान–विवेक
भक्त की रक्षा

सूर्य उवाच

भक्तिमन्तो हि मे रक्ष्या इत्येतेनापि हेतुना ।

भक्तोऽयं परया भक्त्या मामित्येव महाभुज ।

ममापि भक्तिरुत्पन्ना स त्वं कुरु वचो मम ॥

मुझे अपने भक्तोंकी रक्षा करनी ही चाहिये, इसलिये भी तुमसे तुम्हारे हितकी बात कहता हूँ । महाबाहो! यह मेरा भक्त है, परम भक्तिभावसे मेरा भजन करता है, यह सोचकर मेरे मनमें भी तुम्हारे प्रति स्नेह जाग उठा है । अतः तुम मेरी आज्ञाका पालन करो ।

सूर्यदेव ने कर्ण से कहा।

वनपर्व, अध्याय 301, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2028 भक्ति
अनन्य भक्ति का भाव

कर्ण उवाच

न मे दारा न मे पुत्रा न चात्मा सुहृदो न च ।

तथेष्टा वै सदा भक्त्या यथा त्वं गोपते मम ॥

स्त्री, पुत्र, सुहृद् और अपना शरीर भी मुझे वैसा प्रिय नहीं है, जैसे आप हैं । किरणोंके स्वामी सूर्यदेव! सदा आप ही मेरे भक्तिभावके आश्रय हैं ।

कर्ण ने सूर्यदेव से कहा।

वनपर्व, अध्याय 302, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2030 भक्ति

महाभारत — खण्ड ३

ईश्वर की माया और शरण

संजय उवाच

तेन वञ्चयते लोकान् मायायोगेन केशवः ।

ये तमेव प्रपद्यन्ते न ते मुह्यन्ति मानवाः ॥

भगवान् केशव अपनी मायाके प्रभावसे सब लोगोंको मोहमें डाले रहते हैं; किंतु जो मनुष्य केवल उन्हींकी शरण ले लेते हैं, वे उनकी मायासे मोहित नहीं होते हैं ।

सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 68, श्लोक 15 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 529 माया–संसार

महाभारत — खण्ड ४

कृष्ण की शरण

संजय उवाच

धनंजयसखा यश्च धनंजयहितश्च यः ।

धनंजयस्य गोप्ता तं प्रपद्य सुखमेधते ॥

जो अर्जुनके मित्र, अर्जुनके हितैषी और अर्जुनके रक्षक हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेकर मनुष्य सुखी होता है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 149, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1084
श्रेष्ठों की शरण

शल्य उवाच

यथाश्रयत चक्राङ्गं वायसो बुद्धिमास्थितः ।

तथाश्रयस्व वार्ष्णेयं पाण्डवं च धनंजयम् ॥

जैसे कौआ उत्तम बुद्धिका आश्रय लेकर चक्रांगकी शरणमें गया था, उसी प्रकार तुम भी वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनकी शरण लो ।

शल्य ने कर्ण से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 41, श्लोक 82 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1894

महाभारत — खण्ड ५

परमात्मा का साक्षात्कार

भीष्म उवाच

यमनन्यो व्यपेताशीरात्मानं वीतकल्मषम् ।

दृष्ट्यानन्त्याय गोविन्दं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥

अतिवाय्विन्द्रकर्माणमतिसूर्यातितेजसम् ।

अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥

सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके अनन्यभावसे स्थित रहनेवाला साधक मोक्षके उद्देश्यसे अपने विशुद्ध अन्तःकरणमें जिन पापरहित शुद्ध-बुद्ध परमात्मा गोविन्दका ज्ञानदृष्टिसे साक्षात्कार करता है, जिनका पराक्रम वायु और इन्द्रसे बहुत बढ़कर है, जो अपने तेजसे सूर्यको भी तिरस्कृत कर देते हैं तथा जिनके स्वरूपतक इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी भी पहुँच नहीं हो पाती, उन प्रजापालक परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ ।

शान्तिपर्व, अध्याय 47, श्लोक 30–31 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 304
शान्ति का आश्रय

भीष्म → राजन

यस्मिन् भयार्दितः सम्यक् क्षेमं विन्दत्यपि क्षणम् ।

स स्वर्गजित्तमोऽस्माकं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! भयसे डरा हुआ मनुष्य जिसके पास जाकर एक क्षणके लिये भी भलीभाँति शान्ति पा लेता है, वही हमलोगोंमें स्वर्गलोककी प्राप्तिका सबसे बड़ा अधिकारी है, यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ ।

युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्मजी ने स्वर्ग-प्राप्ति का साधन बताया।

शान्तिपर्व, अध्याय 75, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 519
परमात्मा में अनुराग

व्यास उवाच

त्यक्त्वा पूर्वकृतं कर्म रतिर्यस्य सदाऽऽत्मनि ।

सर्वभूतात्मभूतस्य गुणवर्गेष्वसज्जतः ॥

जो अपने पूर्वकृत कर्मोंके संस्कारोंका त्याग करके सदा परमात्मामें ही अनुराग रखता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा हो जाता है और विषयोंमें कभी आसक्त नहीं होता ।

शान्तिपर्व, अध्याय 248, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1626 वैराग्य
महात्माओं की परमगति

भीष्म उवाच

परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् ।

सत्यार्जवरतानां वै सर्वभूतदयावताम् ॥

कुन्तीकुमार! जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित, सत्यवादी, सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं, उन महात्माओंको वही परमगति मिलती है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 301, श्लोक 79 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1993 ज्ञान–विवेक
अनन्य भक्ति का फल

श्रीभगवान् उवाच

ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः ।

एतदभ्यधिकं तेषां यत् ते तं प्रविशन्त्युत ॥

जो सदा उसका स्मरण करते तथा अनन्य भावसे उसकी शरण लेते हैं, उन्हें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वे उसके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ।

भगवान् नारायण ने नारदजी से इस प्रकार कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 334, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2241 भक्ति
भगवान् द्वारा भक्तों के योग-क्षेम का वहन

वैशम्पायन उवाच

मनीषिणो हि ये केचिद् यतयो मोक्षधर्मिणः ।

तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ॥

मोक्षधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो कोई भी मनीषी यति हैं तथा जिनकी तृष्णाका सर्वथा नाश हो गया है, उनके योग-क्षेमका भार स्वयं भगवान् नारायण वहन करते हैं ।

वैशम्पायनजी ने जनमेजय से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 348, श्लोक 72 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2389

महाभारत — खण्ड ५ के सब 14 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

शिव की शरण

तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् ।

तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥

‘बेटा! सदा सर्वतोभावसे उन्हीं भगवान् शंकरकी शरण लेकर उनकी कृपासे ही इच्छानुसार फल पा सकोगे’

उपमन्यु की माता ने उपमन्यु से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 128 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 180 भक्ति
महादेव की भक्ति

अम्बा उवाच

तद्भक्तस्तद्गतो नित्यं तन्निष्ठस्तत्परायणः ।

भज पुत्र महादेवं ततः प्राप्स्यसि चेप्सितम् ॥

बेटा! तुम उन्हींके भक्त बनकर उन्हींमें आसक्त रहो । सदा उन्हींपर निर्भर रहो और उन्हींके शरणागत होकर महादेवजीका निरन्तर भजन करते रहो । इससे तुम्हें मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति होगी ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 166 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 186 भक्ति
परमेश्वर की शरण

श्रीकृष्ण उवाच

त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये ।

ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्त्वा जितेन्द्रियाः ॥

आपमें बोध और मननकी शक्ति विद्यमान है । जो लोग आपकी शरणमें आकर सर्वथा आपके आश्रित रहते हैं, वे ध्यानपरायण, नित्य योगयुक्त, सत्यसंकल्प तथा जितेन्द्रिय होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 421 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 223 ज्ञान–विवेक
महादेव की शरण

उपमन्यु उवाच

एवमन्ये विकुर्वन्ति देवाः संसारमोचनम् ।

मनुष्याणामृते देवं नान्या शक्तिस्तपोबलम् ॥

इसी प्रकार भगवान्की स्तुतिद्वारा अन्य देवगण भी अपने संसारबन्धनका नाश करते हैं; क्योंकि महादेवजीकी शरण लेनेके सिवा ऐसी दूसरी कोई शक्ति या तपका बल नहीं है जिससे मनुष्योंका संसारबन्धनसे छुटकारा हो सके ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 17, श्लोक 169 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 271
स्वतन्त्रता का आत्म-बोध

उत्तर दिशा उवाच

न दोषो भविता चैव सत्येनैतद् ब्रवीम्यहम् ।

स्वतन्त्रां मां विजानीहि योऽधर्मः सोऽस्तु वै मयि ।

त्वय्यावेशितचित्ता च स्वतन्त्रास्मि भजस्व माम् ॥

मैं सच कहती हूँ, आपको कोई दोष नहीं लगेगा । आप मुझे स्वतन्त्र समझिये । इसमें जो पाप होता है, वह मुझे ही लगे । मेरा चित्त आपके ही चिन्तनमें लगा है । मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मुझे स्वीकार कीजिये ।

उत्तर दिशा ने स्त्री के रूप में अष्टावक्र से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 20, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 305
लक्ष्मी की शरणागति

लक्ष्मी उवाच

महाभागा भवत्यो वै शरण्याः शरणागताम् ।

परित्रायन्तु मां नित्यं भजमानामनिन्दिताम् ॥

तुम महान् सौभाग्यशालिनी और सबको शरण देनेवाली हो । मैं भी तुम्हारी शरणमें आयी हूँ । तुम्हारी भक्त हूँ। मुझमें कोई दोष भी नहीं है; अतः तुम मेरी रक्षा करो-मुझे अपना लो ।

लक्ष्मी ने गौओं से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 82, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 710

महाभारत — खण्ड ६ के सब 14 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

रामभक्ति की महिमा

गर्ग उवाच

रामध्यानपराणां च कः समर्थः प्रबाधितुम् ।

रामभक्तिपरो यत्र तत्र ब्रह्मा हरिः शिवः ।

तत्र देवाश्च सिद्धाश्च रामायणपरा नराः ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ध्यानमें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको बाधा पहुँचानेमें कौन समर्थ हो सकता है । जहाँ श्रीरामका भक्त है, वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव विराजमान हैं । वहीं देवता, सिद्ध तथा रामायणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य हैं ।

गर्ग मुनि ने राक्षसराज को रामायण की कथा सुनाते हुए कहा।

उत्तरखण्ड, अध्याय 2, श्लोक 64 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 50 भक्ति
रामायण अनुष्ठान का फल

नारद उवाच

एवं यः प्रयतः कुर्याद् रामायणविधिं तथा ।

स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥

इस प्रकार जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर रामायणकी विधिका अनुष्ठान करता है, वह भगवान विष्णुके धाममें जाता है; जहाँसे लौटकर वह फिर इस संसारमें नहीं आता ।

उत्तरखण्ड, अध्याय 5, श्लोक 15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 60 साधना–योग
लोकहित का कर्तव्य

यदत्रानन्तरं कार्यं लोकानां हितकाम्यया ।

संविधत्स्व विधानज्ञ त्वं हि नः परमा गतिः ॥

‘विधि-विधानके ज्ञाता पितामह! अब लोकहितके लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं’

इन्द्र और अग्निसहित समस्त देवताओं ने भगवान् ब्रह्मा को प्रणाम करके यह कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 37, श्लोक 4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 150 धर्म–आचरण
कौसल्या की शरण

सानुक्रोशां वदान्यां च धर्मज्ञां च यशस्विनीम् ।

कौसल्यां शरणं यामः सा हि नोऽस्ति ध्रुवा गतिः ॥

‘अतः हमलोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौसल्याकी शरणमें चलें । इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं’

शत्रुघ्न के क्रोध से भयभीत सखियों ने आपस में सलाह करके यह कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 78, श्लोक 15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 466

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

अनन्य आत्मभाव का महत्त्व

अथेह धन्या भगवन्त इत्थं ।

यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे ।

कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं ।

न यत्र भूयः परिवर्त उग्रः ॥

शौनकादि ऋषियो! आपलोग बड़े ही सौभाग्यशाली तथा धन्य हैं जो इस जीवनमें और विघ्न-बाधाओंसे भरे इस संसारमें समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे वह सर्वात्मक आत्मभाव, वह अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं, जिससे फिर इस जन्म-मरणरूप संसारके भयंकर चक्रमें नहीं पड़ना होता ।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 174 भक्ति
वैष्णव पद की परिभाषा

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद् ।

यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः ।

विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा ।

हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे ॥

योगीलोग ‘यह नहीं, यह नहीं’ — इस प्रकार परमात्मासे भिन्न पदार्थोंका त्याग करना चाहते हैं और शरीर तथा उसके सम्बन्धी पदार्थोंमें आत्मबुद्धिका त्याग करके हृदयके द्वारा पद-पदपर भगवान् के जिस परम पूज्य स्वरूपका आलिंगन करते हुए अनन्य प्रेमसे परिपूर्ण रहते हैं, वही भगवान् विष्णुका परम पद है — इस विषयमें समस्त शास्त्रोंकी सम्मति है ।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 18 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 327 भक्ति
नृसिंह शरण की प्रेरणा

तस्माद्रजोरागविषादमन्युमानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम् ।

हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालं ।

नृसिंहपादं भजताकुतोभयमिति ॥

अतः असुरगण! तुम तृष्णा, राग, विषाद, क्रोध, अभिमान, इच्छा, भय, दीनता और मानसिक सन्तापके मूल तथा जन्म-मरणरूप संसारचक्रका वहन करनेवाले गृह आदिको त्यागकर भगवान् नृसिंहके निर्भय चरणकमलोंका आश्रय लो ।

पञ्चमस्कन्ध, अध्याय 18, श्लोक 14 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1041
परमेश्वर की सर्वव्यापकता

तमेव देवं वयमात्मदैवतं ।

परं प्रधानं पुरुषं विश्वमन्यम् ।

व्रजाम सर्वे शरणं शरण्यं ।

स्वानां स नो धास्यति शं महात्मा ॥

वे ही सबके आत्मा और परमाराध्य देव हैं । वे ही प्रकृति और पुरुषरूपसे विश्वके कारण हैं । वे विश्वसे पृथक् भी हैं और विश्वरूप भी हैं । हम सब उन्हीं शरणागतवत्सल भगवान् श्रीहरिकी शरण ग्रहण करते हैं । उदारशिरोमणि प्रभु अवश्य ही अपने निजजन हम देवताओंका कल्याण करेंगे ।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 9, श्लोक 27 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1181
ईश्वर की शरण

प्रह्लाद उवाच

तत्साधु मन्येऽसुरवर्य देहिनां ।

सदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात् ।

हित्वाऽऽत्मपातं गृहमन्धकूपं ।

वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ॥

प्रह्लादजीने कहा — पिताजी! संसारके प्राणी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के झूठे आग्रहमें पड़कर सदा ही अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं । ऐसे प्राणियोंके लिये मैं यही ठीक समझता हूँ कि वे अपने अधःपतनके मूल कारण, घाससे ढके हुए अँधेरे कूएँके समान इस घरको छोड़कर वनमें चले जायँ और भगवान् श्रीहरिकी शरण ग्रहण करें ।

प्रह्लाद ने हिरण्यकशिपु से कहा।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 5 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1309 वैराग्य
हृदयेश्वर का भजन

अधोक्षजालम्भमिहाशुभात्मनः ।

शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।

तद् ब्रह्म निर्वाणसुखं विदुर्बुधास्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥

इस अशुभ संसारके दलदलमें फँसकर अशुभमय हो जानेवाले जीवके लिये भगवान्की यह प्राप्ति संसारके चक्करको मिटा देनेवाली है । इसी वस्तुको कोई विद्वान् ब्रह्म और कोई निर्वाण-सुखके रूपमें पहचानते हैं । इसलिये मित्रो! तुमलोग अपने-अपने हृदयमें हृदयेश्वर भगवान्का भजन करो ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 37 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1334 ज्ञान–विवेक

श्रीमद्भागवत महापुराण — १ के सब 9 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

श्रीराम का निर्मल यश

यस्यामलं नृपसदस्सु यशोऽधुनापि ।

गायन्त्यघघ्नमृषयो दिगिभेन्द्रपट्टम् ।

तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्टपादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये ॥

भगवान् श्रीरामका निर्मल यश समस्त पापोंको नष्ट कर देनेवाला है । वह इतना फैल गया है कि दिग्गजोंका श्यामल शरीर भी उसकी उज्ज्वलतासे चमक उठता है । आज भी बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि राजाओंकी सभामें उसका गान करते रहते हैं । स्वर्गके देवता और पृथ्वीके नरपति अपने कमनीय किरीटोंसे उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं । मैं उन्हीं रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीरामचन्द्रकी शरण ग्रहण करता हूँ ।

नवमस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 21 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 107
चरण-चिन्तन का महत्व

आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं ।

योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः ॥

संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं ।

गेहञ्जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥

उन्होंने कहा — हे कमलनाभ! अगाधबोध-सम्पन्न बड़े-बड़े योगेश्वर अपने हृदयकमलमें आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं । जो लोग संसारके कुएँमें गिरे हुए हैं, उन्हें उससे निकलनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र अवलम्बन हैं । प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपका वह चरणकमल, घर-गृहस्थके काम करते रहनेपर भी सदा-सर्वदा हमारे हृदयमें विराजमान रहे, हम एक क्षणके लिये भी उसे न भूलें ।

गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 82, श्लोक 49 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 943 भक्ति
भगवत-धर्म का उपदेश

धर्मान् भागवतान् ब्रूत यदि नः श्रुतये क्षमम् ।

यैः प्रसन्नः प्रपन्नाय दास्यत्यात्मानमप्यजः ॥

योगीश्वरो! यदि हम सुननेके अधिकारी हों तो आप कृपा करके भागवत-धर्मोंका उपदेश कीजिये; क्योंकि उनसे जन्मादि विकारसे रहित, एकरस भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और उन धर्मोंका पालन करनेवाले शरणागत भक्तोंको अपने-आपतकका दान कर डालते ।

राजा निमि ने नौ योगीश्वरों से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 31 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1054 धर्म–आचरण
परम शरणागति का फल

देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां ।

न किंकरो नायमृणी च राजन् ।

सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं ।

गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम् ॥

राजन्! जो मनुष्य ‘यह करना बाकी है, वह करना आवश्यक है’ — इत्यादि कर्म-वासनाओंका अथवा भेद-बुद्धिका परित्याग करके सर्वात्मभावसे शरणागतवत्सल, प्रेमके वरदानी भगवान् मुकुन्दकी शरणमें आ गया है, वह देवताओं, ऋषियों, पितरों, प्राणियों, कुटुम्बियों और अतिथियोंके ऋणसे उऋण हो जाता है; वह किसीके अधीन, किसीका सेवक, किसीके बन्धनमें नहीं रहता ।

योगीश्वर करभाजन ने राजा निमि से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 41 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1086
भगवान की शरण

मार्कण्डेय उवाच

प्रपन्नोऽस्म्यङ्घ्रिमूलं ते प्रपन्नाभयदं हरे ।

यन्माययापि विबुधा मुह्यन्ति ज्ञानकाशया ॥

मार्कण्डेयजीने मन-ही-मन कहा — प्रभो! आपकी माया वास्तवमें प्रतीतिमात्र होनेपर भी सत्य ज्ञानके समान प्रकाशित होती है और बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके खेलोंमें मोहित हो जाते हैं । आपके श्रीचरणकमल ही शरणागतोंको सब प्रकारसे अभयदान करते हैं । इसलिये मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है ।

मार्कण्डेय मुनि ने मायापति भगवान की शरण में स्थित होने का निश्चय करके मन-ही-मन कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 10, श्लोक 2 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1389 माया–संसार

श्रीरामचरितमानस

ईश्वरीय विधान की स्वीकार्यता

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥

अस कहि लगे जपन हरिनामा । गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥

जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा । तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे । [मनमें] ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुखके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ।

सतीजी को राम की परीक्षा लेने से रोक न पाकर शिवजी ने मन ही मन ऐसा कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 52.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 75 कर्म–प्रारब्ध भक्ति
प्रभु की महिमा

प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम ॥

जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम ॥

हे प्रभो! आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं । सब कलाओं और गुणोंके निधान हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्यके भण्डार हैं । आपका नाम शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष है ।

पार्वतीजी ने शिवजी से प्रार्थना की।

बालकाण्ड, दोहा 107 श्रीरामचरितमानस पृ. 123 ज्ञान–विवेक
ईश्वर की महिमा

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू । बिधि हरि हर बंदित पद रेनू ॥

सेवत सुलभ सकल सुखदायक । प्रनतपाल सचराचर नायक ॥

हे प्रभो! सुनिये, आप सेवकोंके लिये कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं । आपकी चरण-रजकी ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी भी वन्दना करते हैं । आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं । आप शरणागतके रक्षक और जड-चेतनके स्वामी हैं ।

मनुजी ने प्रेमपूर्वक भगवान से यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 146.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 155 भक्ति
परम कृपालु प्रभु

अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल ॥

तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऐसे दीनबन्धु और बिना ही कारण दया करनेवाले हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ [मन]! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हींका भजन कर ।

बालकाण्ड, दोहा 211 श्रीरामचरितमानस पृ. 212 भक्ति
सच्चे स्नेह का फल

तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी ॥

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥

तो सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् मुझे रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी दासी अवश्य बनायेंगे । जिसका जिसपर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ।

सीताजी ने अपनी व्याकुलता जानकर धीरज धरकर हृदय में विश्वास लेकर यह वाणी कही।

बालकाण्ड, चौपाई 259.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 253 भक्ति
गुरु पद-रज की महिमा

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं । ते जनु सकल बिभव बस करहीं ॥

मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें । सबु पायउँ रज पावनि पूजें ॥

जो लोग गुरुके चरणोंकी रजको मस्तकपर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्यको अपने वशमें कर लेते हैं । इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसीने नहीं किया । आपकी पवित्र चरण-रजकी पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया ।

राजा ने मुनिराज से यह बात कही।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 3.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 348 गुरु महिमा

श्रीरामचरितमानस के सब 74 पद्य

In English

Surrender and Trust in God

These verses from the Mahābhārata, Purāṇas, Rāmāyaṇa, and Rāmacaritmānasa explain the concept of Sharanagati, or total surrender to the Divine. They teach that seeking refuge in deities like Vishnu, Shiva, and Rama helps one overcome fear, worldly suffering, and the cycle of rebirth.

These verses answer

  • How to seek refuge in lord vishnu according to puranas?
  • Benefits of surrendering to shri rama in valmiki ramayana?
  • Importance of shiva bhakti in ramcharitmanas?
  • Ways to overcome fear through divine remembrance in agni purana?
  • Meaning of sharanagati in mahabharata?