श्रीगणेशाय नमः।

मर्म — विषय

काम–क्रोध–लोभ–मोह

भीतर के छह शत्रु

121 पद्य · 11 ग्रन्थ

महाभारत — खण्ड १

क्रोध का त्याग

शमीक उवाच

स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् ।

चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ॥

तुम मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें तत्पर होकर जंगली कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए इस क्रोधको मिटाकर उत्तम आचरण करो; ऐसा करनेसे तुम्हारे धर्मकी हानि नहीं होगी ।

शमीक मुनि ने अपने पुत्र शृंगी को समझाते हुए कहा।

आदिपर्व, अध्याय 42, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड १ पृ. 324 धर्म–आचरण
क्रोध का विनाशकारी प्रभाव

शमीक उवाच

क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम् ।

ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥

क्रोध प्रयत्नशील साधकोंके अत्यन्त दुःखसे उपार्जित धर्मका नाश कर देता है । फिर धर्महीन मनुष्योंको अभीष्ट गति नहीं मिलती है ।

शमीक मुनि ने अपने पुत्र शृंगी को समझाते हुए कहा।

आदिपर्व, अध्याय 42, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड १ पृ. 324 धर्म–आचरण
परीक्षित के सद्गुण

सौति उवाच

जितेन्द्रियश्चात्मवांश्च मेधावी धर्मसेविता ।

षड्वर्गजिन्महाबुद्धिर्नीतिशास्त्रविदुत्तमः ॥

उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर मनको अपने वशमें कर रखा था । वे मेधावी तथा धर्मका सेवन करनेवाले थे । उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य — इन छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली थी । उनकी बुद्धि विशाल थी । वे नीतिके विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ थे ।

आदिपर्व, अध्याय 49, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड १ पृ. 360 नीति–व्यवहार
क्रोध का विनाश

शुक्र उवाच

क्रुद्धस्य निष्फलान्येव दानयज्ञतपांसि च ।

तस्मादक्रोधने यज्ञस्तपो दानं महाफलम् ॥

न पूतो न तपस्वी च न यज्वा न च कर्मवित् ।

क्रोधस्य यो वशं गच्छेत् तस्य लोकद्वयं न च ॥

पुत्रभृत्यसुहृन्मित्रभार्या धर्मश्च सत्यता ।

तस्यैतान्यपयास्यन्ति क्रोधशीलस्य निश्चितम् ॥

यत् कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः ।

न तत् प्राज्ञोऽनुकुर्वीत न विदुस्ते बलाबलम् ॥

क्रोधीके यज्ञ, दान और तप-सभी निष्फल होते हैं । अतः जो क्रोध नहीं करता, उसी पुरुषके यज्ञ, तप और दान महान् फल देनेवाले होते हैं । जो क्रोधके वशीभूत हो जाता है, वह कभी पवित्र नहीं होता तथा तपस्या भी नहीं कर सकता । उसके द्वारा यज्ञका अनुष्ठान भी सम्भव नहीं है और वह कर्मके रहस्यको भी नहीं जानता । इतना ही नहीं, उसके लोक और परलोक दोनों ही नष्ट हो जाते हैं । जो स्वभावसे ही क्रोधी है, उसके पुत्र, भृत्स, सुहृद्, मित्र, पत्नी, धर्म और सत्य — ये सभी निश्चय ही उसे छोड़कर दूर चले जायँगे । अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ।

आदिपर्व, अध्याय 79, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड १ पृ. 602
इन्द्रियों का वश

गन्धर्व उवाच

ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।

तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥

कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।

इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥

गन्धर्वने कहा — वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है । जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं । इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ।

गन्धर्व ने अर्जुन को बताया कि वसिष्ठ मुनि कौन हैं।

आदिपर्व, अध्याय 173, श्लोक 5–6 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1233 साधना–योग

महाभारत — खण्ड १ के सब 7 पद्य

महाभारत — खण्ड २

तृष्णा का दुष्परिणाम

शौनक उवाच

रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते ।

इच्छा संजायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते ॥

तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता ।

अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी ॥

रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है । फिर उसके मनमें कामभोगकी इच्छा जाग उठती है । तत्पश्चात् तृष्णा बढ़ने लगती है । तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ (पापमें प्रवृत्त करनेवाली) तथा नित्य उद्वेग करनेवाली बतायी गयी है । उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है । वह अत्यन्त भयंकर पापाबन्धनमें डालनेवाली है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 34–35 महाभारत — खण्ड २ पृ. 41 माया–संसार
अहङ्कार का पतन

लोमश उवाच

दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत ।

क्रोधादह्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत् ॥

दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ । क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया ।

लोमशजी ने युधिष्ठिर को असुरों के पतन का कारण बताते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 94, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड २ पृ. 683 नीति–व्यवहार
क्रोध का विनाश

स्त्री उवाच

बलाका हि त्वया दग्धा रोषात् तद् विदितं मया ।

क्रोधः शत्रुः शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम ॥

तुमने क्रोध करके जो एक बगुलीको जला दिया था वह बात मुझे मालूम हो गयी । द्विजश्रेष्ठ! मनुष्योंका एक बहुत बड़ा शत्रु है, वह उनके शरीरमें ही रहता है । उसका नाम है ‘क्रोध’

वनपर्व, अध्याय 206, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1430
लोभ-क्रोध का दमन

व्याध उवाच

सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः ।

एतत् पवित्रं लोकानां तपो वै संक्रमो मतः ॥

सम्पूर्ण उपायोंसे लोभ और क्रोधकी वृत्तियोंको दबाना चाहिए । संसारमें यही पवित्र तप है और यही सबके लिये भवसागरसे पार उतारनेवाला सेतु माना गया है ।

वनपर्व, अध्याय 213, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1480
त्याग से प्राप्त सुख

युधिष्ठिर उवाच

मानं हित्वा प्रियो भवति ।

क्रोधं हित्वा न शोचति ।

कामं हित्वार्थवान् भवति ।

लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥

युधिष्ठिर बोले — मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान् होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता ।

युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न का उत्तर दिया।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2098 नीति–व्यवहार

महाभारत — खण्ड २ के सब 19 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

आयु का विनाशक षडरिपु

विदुर → राजन

अतिमानोऽतिवादश्च तथात्यागो नराधिप ।

क्रोधश्चात्मविधित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट् ॥

एत एवासयस्तीक्ष्णा कृन्तन्त्यायूंषि देहिनाम् ।

एतानि मानवान् घ्नन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तु ते ॥

विदुरजी बोले — राजन्! आपका कल्याण हो । अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्यागका अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालनेकी चिन्ता और मित्रद्रोह — ये छः तीखी तलवारें देहधारियोंकी आयुको काटती हैं । ये ही मनुष्योंका वध करती हैं, मृत्यु नहीं ।

विदुरजी ने धृतराष्ट्र से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 37, श्लोक 10–11 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 304
बारह मानवीय दोष

सनत्सुजात उवाच

क्रोधः कामो लोभमोहौ विधित्सा ।

कृपासूये मानशोकौ स्पृहा च ।

ईर्ष्या जुगुप्सा च मनुष्यदोषा ।

वर्ज्याः सदा द्वादशैते नराणाम् ॥

काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिकीर्षा, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा — मनुष्योंमें रहनेवाले ये बारह दोष मनुष्योंके लिये सदा ही त्याग देनेयोग्य हैं ।

सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र को बारह दोषों के विषय में बताया।

उद्योगपर्व, अध्याय 43, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 359
देवत्व की प्राप्ति

वैशम्पायन उवाच

अकामद्वेषसंयोगलोभद्रोहाच्च भारत ।

उपेक्षया च भावानां देवा देवत्वमाप्नुवन् ॥

भरतनन्दन! काम (राग), द्वेष, संयोग (ममता), लोभ और द्रोह (क्रोध)-रूपी दोषोंसे रहित होनेके कारण तथा दूषित भावोंकी उपेक्षा कर देनेके कारण ही देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 61, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 498 ज्ञान–विवेक
इन्द्रियविजयी पुरुष के लक्षण

विदुर उवाच

कामो लोभश्च दर्पश्च मन्युर्निद्रा विकत्थनम् ।

मान ईर्ष्या च शोकश्च नैतद् दान्तो निषेवते ।

अजिह्ममशठं शुद्धमेतद् दान्तस्य लक्षणम् ॥

दमनशील पुरुष काम, लोभ, अभिमान, क्रोध, निद्रा, आत्मप्रशंसा, मान, ईर्ष्या तथा शोक — इन दुर्गुणोंको अपने पास नहीं फटकने देता । कुटिलता और शठताका अभाव तथा आत्मशुद्धि यह दमयुक्त पुरुषका लक्षण है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 63, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 512 नीति–व्यवहार
लोभ का विनाशकारी प्रभाव

युधिष्ठिर उवाच

कुले जातस्य वृद्धस्य परवित्तेषु गृध्यतः ।

लोभः प्रज्ञानमाहन्ति प्रज्ञा हन्ति हता ह्रियम् ॥

मनुष्य उत्तम कुलमें जन्म लेकर और वृद्ध होनेपर भी यदि दूसरोंके धनको लेना चाहता है तो वह लोभ उसकी विचारशक्तिको नष्ट कर देता है । विचारशक्ति नष्ट होनेपर उसकी लज्जाको भी नष्ट कर देती है ।

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से दुर्योधन के विषय में कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 72, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 543 नीति–व्यवहार

महाभारत — खण्ड ३ के सब 19 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

पाण्डवों के क्रोध का फल

अभिमन्यु उवाच

परवित्तापहारस्य क्रोधस्याप्रशमस्य च ।

लोभस्य ज्ञाननाशस्य द्रोहस्यात्याहितस्य च ॥

पितॄणां मम राज्यस्य हरणस्योग्रधन्विनाम् ।

तत् त्वयेदमनुप्राप्तं प्रकोपाद् वै महात्मनाम् ॥

दूसरोंके धनका अपहरण, क्रोध, अशान्ति, लोभ, ज्ञानलोप, द्रोह, दुःसाहसपूर्ण बर्ताव तथा मेरे उग्र धनुर्धर पितरोंके राज्यका अपहरण — इन सभी बुराइयोंके फलस्वरूप उन महात्मा पाण्डवोंके क्रोधसे तुझे आज यह बुरा दिन प्राप्त हुआ है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 40, श्लोक 5–6 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 317 कर्म–प्रारब्ध
क्रोध का त्याग

संजय उवाच

पक्षवादांश्च सुबहून् प्रावदंस्तव सैनिकाः ।

न वार्ष्णेयस्यापराधो भवितव्यं हि तत् तथा ।

तस्मान्मन्युर्न वः कार्यः क्रोधो दुःखतरो नृणाम् ॥

आपके सैनिकोंने सात्यकिके पक्ष और विपक्षमें बहुत-सी बातें कहीं । अन्तमें वे इस प्रकार बोले — इसमें सात्यकिका कोई अपराध नहीं है । होनहार ही ऐसी थी । इसलिये आपलोगोंको अपने मनमें क्रोध नहीं करना चाहिये; क्योंकि क्रोध ही मनुष्योंके लिये अधिक दुःखदायी होता है ।

संजय ने धृतराष्ट्र से कौरव-सैनिकों की बात बताई।

द्रोणपर्व, अध्याय 143, श्लोक 57–58 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1012
धर्म के विरुद्ध कार्य

अश्वत्थामा उवाच

कामात् क्रोधादविज्ञानाद्धर्षाद् बाल्येन वा पुनः ।

विधर्मकाणि कुर्वन्ति तथा परिभवन्ति च ।

तदिदं पार्षतेनेह महदाधर्मिकं कृतम् ।

अवज्ञाय च मां नूनं नृशंसेन दुरात्मना ।

तस्यानुबन्धं द्रष्टासौ धृष्टद्युम्नः सुदारुणम् ॥

लोग काम, क्रोध, अज्ञान, हर्ष अथवा बालोचित चपलताके कारण धर्मके विरुद्ध कार्य करते तथा श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान कर बैठते हैं । क्रूर एवं दुरात्मा द्रुपदपुत्रने निश्चय ही मेरी अवहेलना करके यह महान् पाप कर्म कर डाला है । अतः उस धृष्टद्युम्नको उस पापका अत्यन्त भयंकर परिणाम भोगना पड़ेगा ।

अश्वत्थामा ने दुर्योधन से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 195, श्लोक 10–12 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1477 कर्म–प्रारब्ध
शान्ति का मार्ग

विदुर → राजन

यतेन्द्रियो नरो राजन् क्रोधलोभनिराकृतः ।

संतुष्टः सत्यवादी यः स शान्तिमधिगच्छति ॥

राजन्! जो मनुष्य जितेन्द्रिय, क्रोध और लोभसे शून्य, संतोषी तथा सत्यवादी होता है, उसे शान्ति प्राप्त होती है ।

स्त्रीपर्व, अध्याय 7, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3129 नीति–व्यवहार

महाभारत — खण्ड ५

क्रोध और हर्ष का त्याग

युधिष्ठिर उवाच

संयुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधहर्षासमञ्जसाः ।

न ते जयफलं किंचिद् भोक्तारो जातु कर्हिचित् ॥

जो लोग कामना और खीझसे युक्त हो क्रोध और हर्षके कारण अपना संतुलन खो बैठते हैं, वे कभी कहीं किंचिन्मात्र भी विजयका फल नहीं भोग सकते ।

शान्तिपर्व, अध्याय 7, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 54 नीति–व्यवहार
समभाव और विकार त्याग

देवगण उवाच

प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु ।

कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ॥

प्रिय और अप्रियका विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और मानको दूर हटाकर समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखो ।

देवताओं और महर्षियों ने राजा पृथु से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 59, श्लोक 104 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 403 धर्म–आचरण
लोभ का मूल प्रभाव

भीष्म उवाच

अतः पापमधर्मश्च यथा दुःखमनुत्तमम् ।

निकृत्या मूलमेतद्धि येन पापकृतो जनाः ॥

लोभसे ही पाप, अधर्म तथा महान् दुःखकी उत्पत्ति होती है । शठता तथा छल-कपटका भी मूल कारण लोभ ही है । इसीके कारण मनुष्य पापाचारी हो जाते हैं ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर को पाप के अधिष्ठान के विषय में बताया।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1034
लोभ की असीमता

भीष्म उवाच

जातौ बाल्ये च कौमारे यौवने चापि मानवाः ।

न संत्यजन्त्यात्मकर्म यो न जीर्यति जीर्यतः ॥

यो न पूरयितुं शक्यो लोभः प्राप्त्या कुरूद्वह ।

नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधिः ॥

कुरुश्रेष्ठ! मनुष्य जन्मकालमें, बाल्यावस्थामें तथा कौमार और यौवनावस्थामें जिसके कारण अपने बुरे कर्मोंको छोड़ नहीं पाते हैं, जो मनुष्यके वृद्ध होनेपर भी जीर्ण नहीं होता, वह लोभ ही है । जिस प्रकार गहरे जलवाली बहुत-सी नदियोंके मिल जानेसे भी समुद्र नहीं भरता है, उसी प्रकार कितने ही पदार्थोंका लाभ क्यों न हो जाय, लोभका पेट कभी नहीं भरता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 11–12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1035 माया–संसार
काम का विनाश

मङ्कि उवाच

आत्मना सप्तमं कामं हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् ।

प्राप्यावध्यं ब्रह्मपुरं राजेव स्यामहं सुखी ॥

‘काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और ममता — ये देहधारियोंके सात शत्रु हैं । इनमें सातवाँ कामरूप शत्रु सबसे प्रबल है । उन सबके साथ इस महान् शत्रु कामका नाश करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुरमें स्थित हो राजाके समान सुखी होऊँगा’

मङ्कि ने अपनी तृष्णा पर विजय पाने के बाद यह कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 177, श्लोक 52 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1155

महाभारत — खण्ड ५ के सब 29 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

सिद्धि का मार्ग

बृहस्पति उवाच

हन्त निःश्रेयसं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम् ।

अहिंसापाश्रयं धर्मं यः साधयति वै नरः ॥

त्रीन् दोषान् सर्वभूतेषु निधाय पुरुषः सदा ।

कामक्रोधौ च संयम्य ततः सिद्धिमवाप्नुते ॥

अब मैं मनुष्यके लिये कल्याणके सर्वश्रेष्ठ उपायका वर्णन करता हूँ । जो मनुष्य अहिंसायुक्त धर्मका पालन करता है, वह मोह, मद और मत्सरतारूप तीनों दोषोंको अन्य समस्त प्राणियोंमेंस्थापित करके एवं सदा काम-क्रोधका संयम करके सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 113, श्लोक 3–4 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1000 साधना–योग
आत्मज्ञान और इन्द्रिय विजय

श्रीभगवान् उवाच

सर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु ज्ञेयोऽऽत्मा संयतेन्द्रियैः ।

कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ॥

सभी आर्षधर्मोंमें इन्द्रियसंयमपूर्वक आत्मज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है । फिर काम और क्रोधको भी जीतना चाहिये । ऐसा मेरा मत है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 108 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1173 ज्ञान–विवेक
त्रिगुणों का वर्गीकरण

ब्राह्मण → देवि

त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः ।

प्रहर्षः प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ॥

तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः ।

श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥

ब्राह्मणने कहा — देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम—- ये तीन मेरे शत्रु हैं । ये-वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं । हर्ष, प्रीति और आनन्द — ये तीन सात्त्विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव-से तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह — ये तीन तामस गुण हैं ।

ब्राह्मण ने देवि से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 31, श्लोक 1–2 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1730 ज्ञान–विवेक
तमोगुण के कार्य

ब्रह्मा उवाच

सम्मोहोऽज्ञानमत्यागः कर्मणामविनिर्णयः ।

स्वप्नः स्तम्भो भयं लोभः स्वतः सुकृतदूषणम् ।

अस्मृतिश्चाविपाकश्च नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता ।

निर्विशेषत्वमन्धत्वं जघन्यगुणवृत्तिता ।

अकृते कृतमानित्वमज्ञाने ज्ञानमानिता ।

अमैत्री विकृताभावो ह्यश्रद्धा मूढभावना ।

अनार्जवमसंज्ञत्वं कर्म पापमचेतना ।

गुरुत्वं सन्नभावत्वमवशित्वमवाग्गतिः ।

सर्व एते गुणा वृत्तास्तामसाः सम्प्रकीर्तिताः ।

ये चान्ये विहिता भावा लोकेऽस्मिन् भावसंज्ञिताः ।

तत्र तत्र नियम्यन्ते सर्वे ते तामसा गुणाः ॥

मोह, अज्ञान, त्यागका अभाव, कर्मोंका निर्णय न कर सकना, निद्रा, गर्व, भय, लोभ, स्वयं शुभ कर्मोंमें दोष देखना, स्मरणशक्तिका अभाव, परिणाम न सोचना, नास्तिकता, दुश्चरित्रता, निर्विशेषता (अच्छे-बुरेके विवेकका अभाव), इन्द्रियोंकी शिथिलता, हिंसा आदि निन्दनीय दोषोंमें प्रवृत्त होना, अकार्यको कार्य और अज्ञानको ज्ञान समझना, शत्रुता, काममें मन न लगाना, अश्रद्धा, मूर्खतापूर्ण विचार, कुटिलता, नासमझी, पाप करना, अज्ञान, आलस्य आदिके कारण देहका भारी होना, भाव-भक्तिका न होना, अजितेन्द्रियता और नीच कर्मोंमें अनुराग — ये सभी दुर्गुण तमोगुणके कार्य बतलाये गये हैं । इनके सिवा और भी जो-जो बातें इस लोकमें निषिद्ध मानी गयी हैं, वे सब तमोगुणी ही हैं ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 36, श्लोक 12–16 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1754
इन्द्रिय निरोध का महत्त्व

ब्रह्मा उवाच

कामं क्रोधं भयं लोभमभिद्रोहमथानृतम् ।

इन्द्रियाणां निरोधेन सदा त्यजति दुस्त्यजान् ॥

सदा इन्द्रियोंके निरोधसे मनुष्य काम, क्रोध, भय, लोभ, द्रोह और असत्य — इन सब दुस्तयज अवगुणोंको त्याग देता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 42, श्लोक 56 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1780 साधना–योग

महाभारत — खण्ड ६ के सब 7 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

श्रीराम के अनुपम गुण

अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरैः ।

अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी ॥

संग्राममें कुपित होकर आये हुए समस्त देवता और असुर भी उनको परास्त नहीं कर सकते थे । उनमें दोषदृष्टिका सर्वथा अभाव था । वे क्रोधको जीत चुके थे । दर्प और ईर्ष्याका उनमें अत्यन्त अभाव था ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 30 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 235 नीति–व्यवहार
वनवास का कष्ट

क्रोधलोभौ विमोक्तव्यौ कर्तव्या तपसे मतिः ।

न भेतव्यं च भेतव्ये दुःखं नित्यमतो वनम् ॥

वहाँ क्रोध और लोभको त्याग देना होता है, । तपस्यामें मन लगाना पड़ता है और जहाँ भयका स्थान है, वहाँ भी भयभीत न होनेकी आवश्यकता होती है; अतः वनमें सदा दुःख-ही-दुःख है ।

श्रीराम ने सीता से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 28, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 327 वैराग्य
दुष्ट स्त्रियों के लक्षण

असत्यशीला विकृता दुर्गा अहृदयाः सदा ।

असत्यः पापसंकल्पाः क्षणमात्रविरागिणः ॥

जो झूठ बोलनेवाली, विकृत चेष्टा करनेवाली, दुष्ट पुरुषोंसे संसर्ग रखनेवाली, पतिके प्रति सदा हृदयहीनताका परिचय देनेवाली, कुलटा, पापके ही मनसूबे बाँधनेवाली और छोटी-सी बातके लिये भी क्षणमात्रमें पतिकी ओरसे विरक्त हो जानेवाली हैं, वे सब-की-सब असती या दुष्टा कही गयी हैं ।

कौसल्या ने सीता से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 39, श्लोक 22 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 358
तीन प्रमुख व्यसन

त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत ।

मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ ॥

परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता ।

मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव ॥

इस जगत्में कामसे उत्पन्न होनेवाले तीन ही व्यसन होते हैं । मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं-परस्त्रीगमन और बिना वैरके ही दूसरोंके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव । रघुनन्दन! इनमेंसे मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आपमें कभी हुआ है और न आगे होगा ही ।

सीता ने वन की ओर प्रस्थित हुए श्रीराम से स्नेहभरी मनोहर वाणी में यह कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 9, श्लोक 3–4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 582 नीति–व्यवहार
काम और लोभ का परिणाम

लोभात् पापानि कुर्वाणः कामाद् वा यो न बुध्यते ।

हृष्टः पश्यति तस्यान्तं ब्राह्मणी करकादिव ॥

‘जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छाको’ काम ‘कहते हैं और प्राप्त हुई वस्तुको अधिक-से-अधिक संख्यामें पानेकी इच्छाका नाम’ लोभ है । जो काम अथवा लोभसे प्रेरित हो पाप करता है और उसके (विनाशकारी) परिणामको नहीं समझता है, उलटे उस पापमें हर्षका अनुभव करता है, वह उसी प्रकार अपना विनाशरूप परिणाम देखता है जैसे वर्षाके साथ गिरे हुए ओलेको खाकर ब्राह्मणी (रक्तपुच्छिका) नामवाली कीड़ी अपना विनाश देखती है ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 29, श्लोक 5 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 632 माया–संसार

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

मन की शुद्धि

कामं दृष्टा मया सर्वा विश्वस्ता रावणस्त्रियः ।

न तु मे मनसा किंचिद् वैकृत्यमुपपद्यते ॥

(वे सोचने लगे) इसमें संदेह नहीं कि रावणकी स्त्रियाँ निःशङ्क सो रही थीं और उसी अवस्थामें मैंने उन सबको अच्छी तरह देखा है, तथापि मेरे मनमें कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ है ।

हनुमानजी ने अपनी निष्कपटता और कर्तव्य के प्रति अपने सुदृढ़ सङ्कल्प को स्पष्ट करते हुए यह कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 11, श्लोक 41 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 64
क्रोध का महत्व

तदलं शोकमालम्ब्य क्रोधमालम्ब भूपते ।

निश्चेष्टाः क्षत्रिया मन्दाः सर्वे चण्डस्य बिभ्यति ॥

पृथ्वीनाथ! अपने हृदयमें शोकको स्थान देना व्यर्थ है । इस समय तो आप शत्रुओंके प्रति क्रोध धारण कीजिये । जो क्षत्रिय मन्द (क्रोधशून्य) होते हैं, उनसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती; परंतु जो शत्रुके प्रति आवश्यक रोषसे भरा होता है, उससे सब डरते हैं ।

युद्धकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 19 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 240 नीति–व्यवहार
क्रोध का त्याग

तपते यजते चैव यच्च दानं प्रयच्छति ।

क्रोधेन सर्वं हरति तस्मात् क्रोधं विसर्जयेत् ॥

मनुष्य जो तप करता, यज्ञ करता और दान देता है, उन सबके पुण्यको वह क्रोधके द्वारा नष्ट कर देता है । इसलिये क्रोधको त्याग देना चाहिये ।

श्रीराम की बात सुनकर कुत्ता बोला।

उत्तरकाण्ड, प्रक्षिप्त सर्ग 2, श्लोक 22 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 820

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

मन्द बुद्धि का दण्ड

तद्वाममुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः ।

कर्तुं प्रकृष्टमिह धीमहि मन्दधीभ्याम् ॥

लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या ।

पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र ॥

तुम हो तो इन भगवान् वैकुण्ठनाथके पार्षद, किन्तु तुम्हारी बुद्धि बहुत मन्द है । अतएव तुम्हारा कल्याण करनेके लिये हम तुम्हारे अपराधके योग्य दण्डका विचार करते हैं । तुम अपनी मन्द भेदबुद्धिके दोषसे इस वैकुण्ठलोकसे निकलकर उन पापमय योनियोंमें जाओ, जहाँ काम, क्रोध, लोभ-प्राणियोंके ये तीन शत्रु निवास करते हैं ।

सनकादि मुनियों ने जय-विजय से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 34 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 518 नीति–व्यवहार
शास्त्रों का वास्तविक उद्देश्य

षड्वर्गसंयमैकान्ताः सर्वा नियमचोदनाः ।

तदन्ता यदि नो योगानावहेयुः श्रमावहाः ॥

शास्त्रोंमें जितने भी नियमसम्बन्धी आदेश हैं, उनका एकमात्र तात्पर्य यही है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — इन छः शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली जाय अथवा पाँचों इन्द्रिय और मन — ये छः वशमें हो जायँ । ऐसा होनेपर भी यदि उन नियमोंके द्वारा भगवान्‌के ध्यान-चिन्तन आदिकी प्राप्ति नहीं होती, तो उन्हें केवल श्रम-ही-श्रम समझना चाहिये ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 28 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1413 साधना–योग
जीव के शत्रु

रागो द्वेषश्च लोभश्च शोकमोहौ भयं मदः ।

मानोऽवमानोऽसूया च माया हिंसा च मत्सरः ॥

रजः प्रमादः क्षुन्निद्रा शत्रवस्त्वेवमादयः ।

रजस्तमःप्रकृतयः सत्त्वप्रकृतयः क्वचित् ॥

राग, द्वेष, लोभ, शोक, मोह, भय, मद, मान, अपमान, दूसरेके गुणोंमें दोष निकालना, छल, हिंसा, दूसरेकी उन्नति देखकर जलना, तृष्णा, प्रमाद, भूख और नींद — ये सब, और ऐसे ही जीवोंके और भी बहुत-से शत्रु हैं । उनमें रजोगुण और तमोगुणप्रधान वृत्तियाँ अधिक हैं, कहीं-कहीं कोई-कोई सत्त्वगुणप्रधान ही होती हैं ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 43–44 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1416

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

असाधकों का कष्ट

यदि न समुद्धरन्ति यतयो हृदि कामजटा ।

दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः ।

असुतृपयोगिनामुभयतोऽप्यसुखं भगवन्ननपगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥

भगवन्! यदि मनुष्य योगी-यति होकर भी अपने हृदयकी विषय-वासनाओंको उखाड़ नहीं फेंकते तो उन असाधकोंके लिये आप हृदयमें रहनेपर भी वैसे ही दुर्लभ हैं, जैसे कोई अपने गलेमें मणि पहने हुए हो, परन्तु उसकी याद न रहनेपर उसे ढूँढ़ता फिरे इधर-उधर । जो साधक अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, विषयोंसे विरक्त भोगना दुःख-ही-दुःख, नहीं होते उन्हें जीवनभर और जीवनके बाद भी पड़ता है । क्योंकि वे साधक नहीं, दम्भी हैं । एक तो अभी उन्हें मृत्युसे छुटकारा नहीं मिला है, लोगोंको रिझाने, धन कमाने आदिके क्लेश उठाने पड़ रहे हैं, और दूसरे आपका स्वरूप न जाननेके कारण अपने धर्म-कर्मका उल्लंघन करनेसे परलोकमें नरक आदि प्राप्त होनेका भय भी बना ही रहता है ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1002 साधना–योग

श्रीरामचरितमानस

पवित्र जल के गुण

काम कोह मद मोह नसावन । बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन ॥

सादर मज्जन पान किए तें । मिटहिं पाप परिताप हिए तें ॥

यह जल काम, क्रोध, मद और मोहका नाश करनेवाला और निर्मल ज्ञान और वैराग्यका बढ़ानेवाला है । इसमें आदरपूर्वक स्नान करनेसे और इसे पीनेसे हृदयमें रहनेवाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 43(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 67 ज्ञान–विवेक
विकार त्याग और सेवा

रागु रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू ॥

सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ॥

राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह-इनके वश स्वप्नमें भी मत होना । सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना ।

सुमित्राजी ने लक्ष्मणजी को वन जाने की आज्ञा देते हुए इस प्रकार शिक्षा दी।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 75.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 407 साधना–योग
शुद्ध हृदय का निवास

काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया । तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥

जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; न राग है, न द्वेष है; और न कपट, दम्भ और माया ही है-हे रघुराज! आप उनके हृदयमें निवास कीजिये ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 130.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 454 वैराग्य
तीन प्रबल दुर्गुण

तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ ॥

मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ॥

हे तात! काम, क्रोध और लोभ-ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं । ये विज्ञानके धाम मुनियोंके भी मनोंको पलभरमें क्षुब्ध कर देते हैं ।

श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, दोहा 38(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 673 नीति–व्यवहार
विकारों के बल

लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि ॥

क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥

लोभको इच्छा और दम्भका बल है, कामको केवल स्त्रीका बल है और क्रोधको कठोर वचनोंका बल है; श्रेष्ठ मुनि विचारकर ऐसा कहते हैं ।

श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, दोहा 38(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 673

श्रीरामचरितमानस के सब 24 पद्य

In English

The Six Inner Enemies

These verses from the Mahabharata, Ramayana, Bhagavata Purana, Manusmriti, Devi Bhagavata, and Ramcharitmanas describe the six internal enemies: lust, anger, greed, delusion, pride, and envy. The texts teach that mastering these impulses through self-control and righteousness is essential for spiritual success and peace.

These verses answer

  • What are the six inner enemies in hinduism?
  • How to control anger and lust according to mahabharata?
  • Consequences of greed and anger in shastras?
  • Importance of sense control in bhagavata purana?