श्रीगणेशाय नमः।
मर्म — विषय
गुरु महिमा
गुरु का स्थान और कृपा
48 पद्य · 10 ग्रन्थ
महाभारत — खण्ड १
युधिष्ठिर उवाच
गुरोर्हि वचनं प्राहुर्धर्म्यं धर्मज्ञसत्तम ।
गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः ॥
धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ व्यासजी! गुरुजनोंकी आज्ञाको धर्मसंगत बताया गया है और समस्त गुरुओंमें माता परम गुरु मानी गयी है ।
युधिष्ठिर ने व्यासजी से कहा।
महाभारत — खण्ड २
शौनक उवाच
सम्यक्संकल्पसंबन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् ।
सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात् ॥
सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् ।
सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात् ॥
पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है ।
बक दाल्भ्य → तात
नाब्राह्मणस्तात चिरं बुभूषेदिच्छन्निमं लोकममुं च जेतुम् ।
विनीतधर्मार्थमपेतमोहं ।
लब्ध्वा द्विजं नुदति नृपः सपत्नान् ॥
तात! इहलोक और परलोकपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाला राजा किसी ब्राह्मणको साथ लिये बिना अधिक कालतक न रहे । जिसे धर्म और अर्थकी शिक्षा मिली हो तथा जिसका मोह दूर हो गया हो, ऐसे ब्राह्मणको पाकर राजा अपने शत्रुओंका नाश कर देता है ।
बक दाल्भ्य ने युधिष्ठिर से कहा।
देवगण उवाच
मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने ।
ऋते गुरुमधीता हि सुखं वेदास्त्वया पुरा ॥
अनेन तु गुरून् दुःखात् तोषयित्वाऽऽत्मकर्मणा ।
कालेन महता क्लेशाद् ब्रह्माधिगतमुत्तमम् ॥
देवताओंने कहा — मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो । तुमने पूर्वकालमें बिना गुरुके ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्यमुनिने बड़े क्लेश उठाकर अपने व्यवहारसे गुरुजनोंको संतुष्ट करके दीर्घकालतक कष्टसहनपूर्वक उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है ।
देवताओं ने यवक्रीत से कहा।
व्याध उवाच
पञ्चैव गुरवो ब्रह्मन् पुरुषस्य बुभूषतः ।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च द्विजसत्तम ॥
ब्राह्मणश्रेष्ठ! उन्नति चाहनेवाले पुरुषके पाँच ही गुरु हैं — पिता, माता, अग्नि, परमात्मा तथा गुरु ।
धर्मव्याध ने कौशिक ब्राह्मण से कहा।
महाभारत — खण्ड ३
सनत्सुजात उवाच
गुरुं शिष्यो नित्यमभिवादयीत ।
स्वाध्यायमिच्छेच्छुचिरप्रमत्तः ।
मानं न कुर्यान्नादधीत रोषमेष प्रथमो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥
ब्रह्मचारी शिष्यको चाहिये कि वह नित्य गुरुको प्रणाम करे, बाहर-भीतरसे पवित्र हो प्रमाद छोड़कर स्वाध्यायमें मन लगावे, अभिमान न करे, मनमें क्रोधको स्थान न दे । यह ब्रह्मचर्यका पहला चरण है ।
सनत्सुजात उवाच
नाचार्यस्यानपाकृत्य प्रवासं ।
प्राज्ञः कुर्वीत नैतदहं करोमि ।
इतीव मन्येत न भाषयेत ।
सवै चतुर्थो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥
आचार्यके उपकारका बदला चुकाये बिना अर्थात् गुरुदक्षिणा आदिके द्वारा उन्हें संतुष्ट किये बिना विद्वान् शिष्य वहाँसे अन्यत्र न जाय । [दक्षिणा देकर या गुरुकी सेवा करके] कभी मनमें ऐसा विचार न लावे कि मैं गुरुका उपकार कर रहा हूँ तथा मुँहसे भी कभी ऐसी बात न निकाले । यह ब्रह्मचर्यका चौथा पाद है ।
संजय उवाच
श्रुत्वेदं भरतश्रेष्ठ भूमिपर्व मनोनुगम् ।
श्रीमान् भवति राजन्यः सिद्धार्थः साधुसम्मतः ।
आयुर्बलं च कीर्तिश्च तस्य तेजश्च वर्धते ॥
भरतश्रेष्ठ! जो राजा इस भूमिपर्वको मनोयोगपूर्वक सुनता है, वह श्रीसम्पन्न, सफलमनोरथ तथा श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित होता है और उसके बल, आयु, कीर्ति तथा तेजकी वृद्धि होती है ।
संजय ने धृतराष्ट्र से भूमिपर्व के श्रवण का फल बताया।
महाभारत — खण्ड ४
अर्जुन → ब्रह्मन
गुरुर्भवान् न मे शत्रुः शिष्यः पुत्रसमोऽस्मि ते ।
न चास्ति स पुमाँल्लोके यस्त्वां युधि पराजयेत् ॥
अर्जुन बोले — ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं । शत्रु नहीं हैं । मैं आपका पुत्रके समान प्रिय शिष्य हूँ। इस जगत्में ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो युद्धमें आपको पराजित कर सके ।
अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
सोऽभिजात्या च भक्त्या च सख्यस्याचार्यकस्य च ।
सौहृदस्य च वीर्यस्य कुलीनत्वस्य माधव ॥
सत्यस्य च महाबाहो अनुकम्पार्थमेव च ।
अनुरूपं महेष्वास कर्म त्वं कर्तुमर्हसि ॥
महाबाहु महाधनुर्धर माधव! वही तुम हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये ही उत्तम कुलमें जन्म-ग्रहण, अर्जुनके प्रति भक्तिभाव, मैत्री, गुरुभाव, सौहार्द, पराक्रम, कुलीनता और सत्यके अनुरूप कर्म करो ।
महाभारत — खण्ड ५
वामदेव उवाच
यस्य नास्ति गुरुर्धर्मे न चान्यानपि पृच्छति ।
सुखतन्त्रोऽर्थलाभेषु न चिरं सुखमश्नुते ॥
जिसको धर्मके विषयमें शिक्षा देनेवाला कोई गुरु नहीं है और जो दूसरोंसे भी कुछ नहीं पूछता है तथा धन मिल जानेपर सुखभोगमें आसक्त हो जाता है, वह दीर्घकालतक सुख नहीं भोग पाता है ।
वामदेव उवाच
गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वयमर्थानवेक्षिता ।
धर्मप्रधानो लाभेषु स चिरं सुखमश्नुते ॥
जो धर्मके विषयमें गुरुको प्रधान मानकर उनके उपदेशके अनुसार चलता है, जो स्वयं ही अर्थ-सम्बन्धी सारे कार्योंको देखता है तथा सब प्रकारके लाभोंमें धर्मको ही प्रधान लाभ समझता है, वह चिरकालतक सुखका उपभोग करता है ।
भीष्म उवाच
अवध्या हि सदा माता पिता चाप्यपकारिणौ ।
न संदुष्यति तत् कृत्वा न च ते दूषयन्ति तम् ।
धर्माय यतमानानां विदुर्देवा महर्षिभिः ॥
पिता-माता यदि कोई अपराध करें तो भी वे सदा अवध्य ही हैं; क्योंकि पुत्र या शिष्य पिता-माता और गुरुका अपराध करके भी उनकी दृष्टिमें दूषित नहीं होते हैं । वे गुरुजन पुत्र या शिष्यपर स्नेहवश दोषारोपण नहीं करते; बल्कि सदा उसे धर्मके मार्गपर ही ले जानेका प्रयत्न करते हैं । ऐसे पिता-माता आदि गुरुजनोंका महत्त्व महर्षियोंसहित देवता ही जानते हैं ।
भीष्म उवाच
विद्यां श्रुत्वा ये गुरुं नाद्रियन्ते ।
प्रत्यासन्ना मनसा कर्मणा वा ।
तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं ।
नान्यस्तेभ्यः पापकृदस्ति लोके ।
यथैव ते गुरुभिर्भावनीयास्तथा तेषां गुरवोऽभ्यर्चनीयाः ॥
जो लोग विद्या पढ़कर गुरुका आदर नहीं करते, निकट रहकर मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुकी सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भके बालककी हत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है । संसारमें उनसे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं है । जैसे गुरुओंका कर्तव्य है, शिष्यको आत्मोन्नतिके पथपर पहुँचाना, उसी तरह शिष्योंका धर्म है गुरुओंका पूजन करना ।
जनक → ब्रह्मन
न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत् ।
न विना गुरुसम्बन्धं ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ॥
जनकने कहा — ब्रह्मन्! जैसे ज्ञान-विज्ञानके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सद्गुरुसे सम्बन्ध हुए बिना ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।
शुकदेवजी के प्रश्न के उत्तर में जनक ने कहा।
जनक उवाच
गुरुः प्लावयिता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते ।
विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभयं त्यजेत् ॥
गुरु इस संसारसागरसे पार उतारनेवाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान यहाँ नौकाके समान बताया जाता है । मनुष्य उस ज्ञानको पाकर भवसागरसे पार और कृतकृत्य हो जाता है । जैसे नदीको पार कर लेनेपर मनुष्य नाव और नाविक दोनोंको छोड़ देता है, उसी प्रकार मुक्त हुआ पुरुष गुरु और ज्ञान दोनोंको छोड़ दे ।
जनक ने शुकदेवजी से कहा।
महाभारत — खण्ड ६
यम उवाच
गुरुं शिष्यो वरयेद् गोप्रदाने ।
स वै गन्ता नियतं स्वर्गमेव ।
विधिज्ञानां सुमहान् धर्म एष ।
विधिं ह्याद्यं विधयः संविशन्ति ॥
शिष्य जब गोदान करने लगे, तब उसे ग्रहण करनेके लिये गुरुको चुने । यदि गुरुने वह गोदान स्वीकार कर लिया तो शिष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है । विधिके जाननेवाले पुरुषोंके लिये यह गोदान महान् धर्म है। अन्य सब विधियाँ इस आदि विधिमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं ।
यमराज ने नाचिकेत से कहा।
अंगिरा उवाच
नास्ति वेदात् परं शास्त्रं नास्ति मातृसमो गुरुः ।
न धर्मात् परमो लाभस्तपो नानशनात् परम् ॥
वेदसे बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, धर्मसे बढ़कर कोई उत्कृष्ट लाभ नहीं है तथा उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है ।
श्रीमहेश्वर उवाच
गुरुतल्पी गुरुद्रोही गुरुकुत्सारतिश्च यः ।
ब्रह्मविच्चापि पतति ब्राह्मणो ब्रह्मयोनितः ॥
जो गुरुकी शैय्यापर सोनेवाला, गुरुद्रोही और गुरुनिन्दामें अनुरक्त है, वह ब्राह्मण वेदवेत्ता होनेपर भी ब्रह्मयोनिसे नीचे गिर जाता है ।
भीष्म उवाच
सर्वेषां तुल्यदेहानां सर्वेषां सदृशात्मनाम् ।
कालो धर्मेण संयुक्तः शेष एव स्वयं गुरुः ॥
सब मनुष्योंके शरीर एक-से होते हैं और सबका आत्मा भी समान ही है; किंतु धर्मयुक्त संकल्प ही यहाँ शेष रहता है, दूसरा नहीं । वह स्वयं ही गुरु है अर्थात् धर्मबलसे स्वयं ही उदित होता है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव ।
आनृशंस्यपरं ह्येनं जानामि गुरुवत्सलम् ॥
धर्मराज युधिष्ठिरका हृदय बहुत ही शुद्ध है । ये सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहेंगे । मैं जानता हूँ, इनका स्वभाव बहुत ही कोमल है और ये गुरुजनोंके प्रति बड़ी भक्ति रखते हैं ।
कुरुवंशी भीष्म ने महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥
क्योंकि यदि गुरु भी घमंडमें आकर कर्तव्याकर्तव्यका । ज्ञान खो बैठे और कुमार्गपर चलने लगे तो उसे भी दण्ड देना आवश्यक हो जाता है ।
लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा।
न तेन शक्नोमि पितुः प्रतिज्ञामिमां न कर्तुं सकलां यथावत् ।
देव्याश्च भर्ता स गतिश्च धर्मः ॥
इसलिये मैं पिताकी इस सम्पूर्ण प्रतिज्ञाका यथावत् पालन करनेसे मुँह नहीं मोड़ सकता । तात लक्ष्मण! वे हम दोनोंको आज्ञा देनेमें समर्थ गुरु हैं और माताजीके तो वे ही पति, गति तथा धर्म हैं ।
श्रीराम ने लक्ष्मण से पिता की आज्ञा के पालन के विषय में कहा।
पिता हि भवति ज्येष्ठो धर्ममार्यस्य जानतः ।
तस्य पादौ ग्रहीष्यामि स हीदानीं गतिर्मम ॥
धर्मके ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुषके लिये बड़ा भाई पिताके समान होता है । मैं उनके चरणोंमें प्रणाम करूँगा । अब वे ही मेरे आश्रय हैं ।
भरत ने कैकेयी से कहा।
पिता ह्येनं जनयति पुरुषं पुरुषर्षभ ।
प्रज्ञां ददाति चाचार्यस्तस्मात् स गुरुरुच्यते ॥
पुरुषप्रवर! पिता पुरुषके शरीरको उत्पन्न करता है, इसलिये गुरु है और आचार्य उसे ज्ञान देता है, इसलिये गुरु कहलाता है ।
वसिष्ठजी ने श्रीराम से कहा।
ज्येष्ठो भ्राता पिता वापि यश्च विद्यां प्रयच्छति ।
त्रयस्ते पितरो ज्ञेया धर्मे च पथि वर्तिनः ॥
बड़ा भाई, पिता तथा जो विद्या देता है, वह गुरु — ये तीनों धर्ममार्गपर स्थित रहनेवाले पुरुषोंके लिये । पिताके तुल्य माननीय हैं, ऐसा समझना चाहिये ।
गुरुश्च गुरुपुत्रश्च त्वं हि नः कपिसत्तम ।
भवन्तमाश्रित्य वयं समर्था ह्यर्थसाधने ॥
‘कपिश्रेष्ठ! तुम्हीं हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो । तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधनमें समर्थ हो सकते हैं’
अङ्गद ने जाम्बवान् से कहा।
श्रीमद्भागवत महापुराण — १
ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम् ।
कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते ॥
यह साक्षात् भगवद्विषयक अमृतमय ज्ञान है; जो लोग भगवन्मार्गके मर्मसे अनभिज्ञ हैं — उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, उस दीनवत्सल कृपालु पुरुषपर देवता अनुग्रह करते हैं ।
सूतजी ने शौनकजी से कहा।
सत्यव्रत उवाच
अनाद्यविद्योपहतात्मसंविदस्तन्मूलसंसारपरिश्रमातुराः ।
यदृच्छयेहोपसृता यमाप्नुयुविमुक्तिदो नः परमो गुरुर्भवान् ॥
राजा सत्यव्रतने कहा — प्रभो! संसारके जीवोंका आत्मज्ञान अनादि अविद्यासे ढक गया है । इसी कारण वे संसारके अनेकानेक क्लेशोंके भारसे पीड़ित हो रहे हैं । जब अनायास ही आपके अनुग्रहसे वे आपकी शरणमें पहुँच जाते हैं तब आपको प्राप्त कर लेते हैं । इसलिये हमें बन्धनसे छुड़ाकर वास्तविक मुक्ति देनेवाले परम गुरु आप ही हैं ।
राजा सत्यव्रत ने मत्स्य भगवान से प्रार्थना करते हुए यह कहा।
श्रीमद्भागवत महापुराण — २
भवद्विधा महाभागा निषेव्या अर्हसत्तमाः ।
श्रेयस्कामैर्नृभिर्नित्यं देवाः स्वार्था न साधवः ॥
अपना परम कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको आप जैसे परम पूजनीय और महाभाग्यवान् संतोंकी सर्वदा सेवा करनी चाहिये । आप जैसे संत देवताओंसे भी बढ़कर हैं; क्योंकि देवताओंमें तो स्वार्थ रहता है, परन्तु संतोंमें नहीं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी से कहा।
श्रीरामचरितमानस
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू । समन सकल भव रुज परिवारू ॥
मैं गुरु महाराजके चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि(सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है । वह अमर मूल (सञ्जीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भवरोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है ।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती । सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती ॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू । बड़े भाग उर आवइ जासू ॥
श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है । वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है; वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं ।
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥
माता, पिता, गुरु और स्वामीकी बातको बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिये । फिर आप तो सब प्रकारसे मेरे परम हितकारी हैं । हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिरपर है ।
शिवजी ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा।
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा । द्विज गुर कोप कहहु को राखा ॥
राखड़ गुर जौं कोप बिधाता । गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता ॥
राजाने मुनिके चरण पकड़कर कहा — हे स्वामी! सत्य ही है । ब्राह्मण और गुरुके क्रोधसे, कहिये, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं; पर गुरुसे विरोध करनेपर जगत्में कोई भी बचानेवाला नहीं है ।
राजा प्रतापभानु ने कपटी मुनि के चरण पकड़कर कहा।
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं । ते जनु सकल बिभव बस करहीं ॥
मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें । सबु पायउँ रज पावनि पूजें ॥
जो लोग गुरुके चरणोंकी रजको मस्तकपर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्यको अपने वशमें कर लेते हैं । इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसीने नहीं किया । आपकी पवित्र चरण-रजकी पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया ।
राजा ने मुनिराज से यह बात कही।
सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ॥
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥
स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है ।
श्रीरामजी ने सीताजी को वन जाने से रोकने के लिए यह शीतल सीख दी।
In English
The Glory and Role of the Guru
These verses from the Mahabharata, Puranas, Ramayana, and Ramcharitmanas describe the essential role of a spiritual teacher. They teach that a guru provides true knowledge to overcome worldly suffering, while students must serve their teachers with humility and devotion.
These verses answer
- Importance of guru in mahabharata?
- Difference between guru and acharya in linga purana?
- Rules for a brahmachari student according to mahabharata?
- How to show respect to a guru in hinduism?
- Role of guru in overcoming ignorance in bhagavata purana?