श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १
भक्ति
प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध
6 पद्य
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १
गर्ग उवाच
रामध्यानपराणां च कः समर्थः प्रबाधितुम् ।
रामभक्तिपरो यत्र तत्र ब्रह्मा हरिः शिवः ।
तत्र देवाश्च सिद्धाश्च रामायणपरा नराः ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ध्यानमें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको बाधा पहुँचानेमें कौन समर्थ हो सकता है । जहाँ श्रीरामका भक्त है, वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव विराजमान हैं । वहीं देवता, सिद्ध तथा रामायणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य हैं ।
गर्ग मुनि ने राक्षसराज को रामायण की कथा सुनाते हुए कहा।
नारद उवाच
अन्यमासं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः ।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषिताम् ।
समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम् ॥
दुःस्वप्ननाशनं धन्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ।
रामायणस्य माहात्म्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः ॥
नारदजी कहते हैं — महर्षियो! अब मैं रामायणके पाठ और श्रवणके लिये उपयोगी दूसरे मासका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ।
नारदजी महर्षियों से कहते हैं।
उत्तङ्क उवाच
चैत्रे मासि सिते पक्षे कथा रामायणस्य च ।
नवाह्ना किल श्रोतव्या भक्तिभावेन सादरम् ।
यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
चैत्रमासके शुक्लपक्षमें तुम्हें भक्तिभावसे आदरपूर्वक रामायणकी नवाह कथा सुननी चाहिये । उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।
उत्तङ्क मुनि ने कलिक व्याध से कहा।
नारद उवाच
श्रुत्वा नरो रामकथामतिदीप्तोऽतिभक्तितः ।
ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्रैव परिमोदते ॥
रामकथाको अत्यन्त भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य महान् तेजसे उद्दीप्त हो उठता है और ब्रह्मलोकमें जाकर वहीं आनन्दका अनुभव करता है ।
तेनैव पूर्वमाक्रान्त आश्रमः श्रमनाशनः ।
मयापि भक्त्या तस्यैव वामनस्योपभुज्यते ॥
उन्हीं भगवान्ने पूर्वकालमें यहाँ निवास किया था; इसलिये यह आश्रम सब प्रकारके श्रम (दुःख-शोक) का नाश करनेवाला है । उन्हीं भगवान् वामनमें भक्ति होनेके कारण मैं भी इस स्थानको अपने उपयोगमें लाता हूँ ।
विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा।
महात्मनां तु भूयिष्ठं त्वद्विधानां कृतात्मनाम् ।
निश्चला भवति प्रीतिधैर्यमात्मवतां वर ॥
आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! आप-जैसे पुण्यात्मा महात्माओंका प्रेम और धैर्य अधिकाधिक बढ़ता और अविचल होता है ।
सुग्रीव ने श्रीराम से कहा।