श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

नीति–व्यवहार

लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म

6 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

परोपकारी जीवन की सफलता

एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।

प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा ॥

मेरे प्यारे मित्रो! संसारमें प्राणी तो बहुत हैं; परन्तु उनके जीवनकी सफलता इतनेमें ही है कि जहाँतक हो सके अपने धनसे, विवेक-विचारसे, वाणीसे और प्राणोंसे भी ऐसे ही कर्म किये जायँ, जिनसे दूसरोंकी भलाई हो ।

श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 22, श्लोक 35 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 426 सेवा–करुणा–विनय
धर्म और सद्व्यवहार

धर्मेण पालयन्नुर्वीं प्रजाः शीलेन रंजयन् ।

वर्तमानः समः स्वेषु श्रेयः कीर्तिमवाप्स्यसि ॥

आप धर्मसे पृथ्वीका पालन कीजिये । अपने सद्व्यवहारसे प्रजाको प्रसन्न रखिये और अपने स्वजनोंके साथ समान बर्ताव कीजिये । ऐसा करनेसे ही आपको लोकमें यश और परलोकमें सद्गति प्राप्त होगी ।

अक्रूरजी ने महाराज धृतराष्ट्रजी से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 49, श्लोक 18 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 660 धर्म–आचरण
प्राणवायु से शिक्षा

प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः ।

ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः ॥

मैंने शरीरके भीतर रहनेवाले वायु-प्राणवायुसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह् आहारमात्रकी इच्छा रखता है और उसकी प्राप्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधकको भी चाहिये कि जितनेसे जीवन-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन कर ले । इन्द्रियोंको तृप्त करनेके लिये बहुत-से विषय न चाहे । संक्षेपमें उतने ही विषयोंका उपयोग करना चाहिये जिनसे बुद्धि विकृत न हो, मन चंचल न हो और वाणी व्यर्थकी बातोंमें न लग जाय ।

अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1107 साधना–योग
एकान्त का महत्त्व

अन्वशिक्षमिमं तस्या उपदेशमरिन्दम ।

लोकाननुचरन्नेताँल्लोकतत्त्वविवित्सया ॥

वासे बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।

एक एव चरेत्तस्मात् कुमार्या इव कंकणः ॥

रिपुदमन! उस समय लोगोंका आचार-विचार निरखने-परखनेके लिये इधर-उधर घूमता-घामता मैं भी वहाँ पहुँच गया था । मैंने उससे यह शिक्षा ग्रहण की कि जब बहुत लोग एक साथ रहते हैं तब कलह होता है और दो आदमी साथ रहते हैं तब भी बातचीत तो होती ही है; इसलिये कुमारी कन्याकी चूड़ीके समान अकेले ही विचरना चाहिये ।

अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 9, श्लोक 9–10 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1125
दुर्जन की कटुवाणी

श्रीकृष्ण → उद्धव

बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः ।

दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा — देवगुरु बृहस्पतिके शिष्य उद्धवजी! इस संसारमें प्रायः ऐसे संत पुरुष नहीं मिलते, जो दुर्जनोंकी कटुवाणीसे बिंधे हुए अपने हृदयको सँभाल सकें ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धवजी से इस प्रकार कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 2 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1240
प्रेम की प्रधानता

उभयोर्वैपरीत्ये तुतु रसाभासे फलच्युतिः ।

धनार्थिनस्तु संसिद्धिर्विधिसम्पूर्णतावशात् ।

कृष्णार्थिनोऽगुणस्यापि प्रेमैव विधिरुत्तमः ॥

पर धनार्थीको तो तभी सिद्धि मिलती है, जब उनके अनुष्ठानका विधि-विधान पूरा उतर जाय । श्रीकृष्णकी चाह रखनेवाला सर्वथा गुणहीन हो और उसकी विधिमें कुछ कमी रह जाय तो भी, यदि उसके हृदयमें प्रेम है तो, वही उसके लिये सर्वोत्तम विधि है ।

वैष्णवखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 41 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1459 भक्ति