श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४

साधना–योग

अभ्यास, संयम और मन का निग्रह

6 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

दृढ़ निश्चय और सङ्कल्प

संजय उवाच

तपोऽभ्युदीर्णं तपसैव बाध्यते ।

बलं बलेनैव तथा मनस्विभिः ।

मनश्च मे शत्रुनिवारणे ध्रुवं ।

स्वरक्षणे चाचलवद् व्यवस्थितम् ॥

मनस्वी पुरुष बढ़े हुए तपका तपसे और प्रचण्ड बलका बलसे ही निवारण करते हैं । यह सोचकर मेरा मन भी शत्रुओंको रोकनेके लिये दृढ़ निश्चय किये हुए है तथा अपनी रक्षाके लिये भी पर्वतकी भाँति अविचल भावसे स्थित है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 2, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 47
अर्जुन की शीघ्र उपस्थिति

भीमसेन उवाच

आशास्तारः कर्म चाप्युत्तमं ये ।

तन्मे देवाः केवलं साधयन्तु ।

आयात्विहाद्यार्जुनः शत्रुघाती ।

शक्रस्तूर्णं यज्ञ इवोपहूतः ॥

जो उत्तम कर्मोंका उपदेश देनेवाले हैं, वे देवता-लोग मेरा केवल एक कार्य सिद्ध कर दें । जैसे यज्ञमें आवाहन करनेपर इन्द्रदेव तुरंत पदार्पण करते हैं, उसी प्रकार शत्रुघाती अर्जुन यहाँ शीघ्र ही आ पहुँचे ।

भीमसेन ने सूत से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 76, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2203
सन्न्यास और योग का उपदेश

मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेयं भगवन्नहम् ।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः ।

विधिं च योगस्य परं कार्याकार्यस्य शास्त्रतः ।

संन्यासकृतबुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः ।

सर्वाश्चास्य क्रियाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

‘भगवन्! मैं मोक्षधर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ ।’ उनकी वह बात सुनकर महातपस्वी जैगीषव्यने उनका संन्यास लेनेका विचार जानकर उन्हें ज्ञानका उपदेश किया । साथ ही योगकी उत्तम विधि बताकर शास्त्रके अनुसार कर्तव्य-अकर्तव्यका भी उपदेश दिया । इतना ही नहीं, उन्होंने शास्त्रीय विधिके अनुसार उनके संन्यासग्रहणसम्बन्धी समस्त कार्य (दीक्षा और संस्कार आदि) किये ।

देवल ने महामुनि महात्मा जैगीषव्य के पास जाकर विनीतभाव से मोक्षधर्म का आश्रय लेने की इच्छा प्रकट की।

शल्यपर्व, अध्याय 50, श्लोक 55–56 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2855 ज्ञान–विवेक
ज्ञान रूपी औषधि

विदुर उवाच

साधुः परमदुःखानां दुःखभैषज्यमाचरेत् ।

ज्ञानौषधमवाप्येह दूरपारं महौषधम् ।

छिन्द्याद् दुःखमहाव्याधिं नरः संयतमानसः ॥

साधु पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको वशमें करके ज्ञानरूपी महान् ओषधि प्राप्त करे, जो परम दुर्लभ है । उससे अपने बड़े-से-बड़े दुःखोंकी चिकित्सा करे । उस ज्ञानरूपी ओषधिसे दुःखरूपी महान् व्याधिका नाश कर डाले ।

स्त्रीपर्व, अध्याय 7, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3129 ज्ञान–विवेक
आत्म-संयम की शक्ति

विदुर उवाच

न विक्रमो न चाप्यर्थो न मित्रं न सुहृज्जनः ।

तथोन्मोचयते दुःखाद् यथाऽऽत्मा स्थिरसंयमः ॥

पराक्रम, धन, मित्र और सुहृद् भी उस तरह दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकते, जैसा कि दृढ़तापूर्वक संयममें रहनेवाला अपना मन दिला सकता है ।

स्त्रीपर्व, अध्याय 7, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3129 वैराग्य
शील और आत्मिक प्रगति

विदुर उवाच

तस्मान्मैत्रं समास्थाय शीलमापद्य भारत ।

दमस्त्यागोऽप्रमादश्च ते त्रयो ब्रह्मणो हयाः ॥

शीलरश्मिसमायुक्तः स्थितो यो मानसे रथे ।

त्यक्त्वा मृत्युभयं राजन् ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥

भरतनन्दन! इसलिये सर्वत्र मैत्रीभाव रखते हुए शील प्राप्त करना चाहिये । दम, त्याग और अप्रमाद — ये तीन परमात्माके धाममें ले जानेवाले घोड़े हैं । जो मनुष्य शीलरूपी लगामको पकड़कर इन तीनों घोड़ोंसे जुते हुए मनरूपी रथपर सवार होता है, वह मृत्युका भय छोड़कर ब्रह्मलोकमें चला जाता है ।

स्त्रीपर्व, अध्याय 7, श्लोक 23–24 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3130 धर्म–आचरण