श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

वैराग्य

अनासक्ति और संसार की नश्वरता

6 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

संसार की नश्वरता

तस्माल्लोकमिमं राजन् स्वप्नमायामनोरथम् ।

वीक्ष्यायम्यात्मनाऽऽत्मानं समः शान्तो भव प्रभो ॥

इसलिये महाराज! यह बात समझ लीजिये कि यह दुनिया चार दिनकी चाँदनी है, सपनेका खिलवाड़ है, जादूका तमाशा है और है मनोराज्यमात्र! आप अपने प्रयत्नसे, अपनी शक्तिसे चित्तको रोकिये; ममतावश पक्षपात न कीजिये । आप समर्थ हैं, समत्वमें स्थित हो जाइये और इस संसारकी ओरसे उपराम-शान्त हो जाइये ।

अक्रूर जी ने राजा धृतराष्ट्र को उपदेश दिया।

दशमस्कन्ध, अध्याय 49, श्लोक 25 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 661 माया–संसार
उत्तम भगवद्भक्त की पहचान

देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो ।

जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रः ।

संसारधर्मैरविमुह्यमानः ।

स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥

संसारके धर्म हैं — जन्म-मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट, भय और तृष्णा । ये क्रमशः शरीर, प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिको प्राप्त होते ही रहते हैं । जो पुरुष भगवान्की स्मृतिमें इतना तन्मय रहता है कि इनके बार-बार होते-जाते रहनेपर भी उनसे मोहित नहीं होता, पराभूत नहीं होता, वह उत्तम भागवत है ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 49 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1058 ज्ञान–विवेक
उत्तम भगवद्भक्त के लक्षण

न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भवः ।

वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः ॥

जिसके मनमें विषय-भोगकी इच्छा, कर्म-प्रवृत्ति और उनके बीज वासनाओंका उदय नहीं होता और जो एकमात्र भगवान् वासुदेवमें ही निवास करता है, वह उत्तम भगवद्भक्त है ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 50 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1058 भक्ति
अनासक्ति और दया का अभ्यास

सर्वतो मनसोऽसंगमादौ संगं च साधुषु ।

दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥

पहले शरीर, सन्तान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखे । फिर भगवान्‌के भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिये — यह सीखे । इसके पश्चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करे ।

योगीश्वरों ने राजा निमि को उत्तर देते हुए कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 23 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1065 धर्म–आचरण
स्मरण का फल

यशःश्रियामेव परिश्रमः परो ।

वर्णाश्रमाचारतपःश्रुतादिषु ।

अविस्मृतिः श्रीधरपादपद्मयोर्गुणानुवादश्रवणादिभिर्हरः ॥

वर्णाश्रमके अनुकूल आचरण, तपस्या और अध्ययन आदिके लिये जो बहुत बड़ा परिश्रम किया जाता है, उसका फल है-केवल यश अथवा लक्ष्मीकी प्राप्ति । परन्तु भगवान्के गुण, लीला, नाम आदिका श्रवण, कीर्तन आदि तो उनके श्रीचरणकमलोंकी अविचल स्मृति प्रदान करता है ।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 53 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1414 कर्म–प्रारब्ध
मोक्ष की औषधि

येऽपि संसारसन्तापनिर्विण्णा मोक्षकांक्षिणः ।

तेषां भवौषधं चैतत् कलौ सेव्यं प्रयत्नतः ॥

तथा जो संसारके दुःखोंसे घबराकर अपनी मुक्ति चाहते हैं, उनके लिये भी यही इस भवरोगकी ओषधि है। अतः इस कलिकालमें इसका प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये ।

वैष्णवखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 32 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1458 ज्ञान–विवेक