श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३

काम–क्रोध–लोभ–मोह

भीतर के छह शत्रु

19 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

तीन नरक के द्वार

विदुर उवाच

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥

काम, क्रोध और लोभ — ये आत्माका नाश करनेवाले नरकके तीन दरवाजे हैं; अतः इन तीनोंको त्याग देना चाहिये ।

उद्योगपर्व, अध्याय 33, श्लोक 66 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 251 वैराग्य
छह शत्रुओं पर विजय

विदुर उवाच

षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति ।

न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥

मनमें नित्य रहनेवाले छः शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य)-को जो वशमें कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंसे ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होनेवाले अनर्थोंसे युक्त होनेकी तो बात ही क्या है?

उद्योगपर्व, अध्याय 33, श्लोक 83 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 253 ज्ञान–विवेक
दुर्जनों से विवाद का त्याग

विदुर उवाच

दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं ।

राजद्विष्टं पैशुनं पूगवैरम् ।

मत्तोन्मत्तैर्दुर्जनैश्चापि वादं ।

यः प्रज्ञावान् वर्जयेत् स प्रधानः ॥

जो बुद्धिमान् दम्भ, मोह, मात्सर्य, पापकर्म, राजद्रोह, चुगलखोरी, समूहसे वैर और मतवाले, पागल तथा दुर्जनोंसे विवाद छोड़ देता है, वह श्रेष्ठ है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 33, श्लोक 115 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 258 नीति–व्यवहार
आयु का विनाशक षडरिपु

विदुर → राजन

अतिमानोऽतिवादश्च तथात्यागो नराधिप ।

क्रोधश्चात्मविधित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट् ॥

एत एवासयस्तीक्ष्णा कृन्तन्त्यायूंषि देहिनाम् ।

एतानि मानवान् घ्नन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तु ते ॥

विदुरजी बोले — राजन्! आपका कल्याण हो । अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्यागका अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालनेकी चिन्ता और मित्रद्रोह — ये छः तीखी तलवारें देहधारियोंकी आयुको काटती हैं । ये ही मनुष्योंका वध करती हैं, मृत्यु नहीं ।

विदुरजी ने धृतराष्ट्र से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 37, श्लोक 10–11 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 304
अहङ्कार और विनाश

सनत्सुजात उवाच

अस्यादेशान्निःसरते नराणां ।

क्रोधः प्रमादो लोभरूपश्च मृत्युः ।

अहंगतेनैव चरन् विमार्गान् ।

न चात्मनो योगमुपैति कश्चित् ॥

इन यमकी आज्ञासे ही क्रोध, प्रमाद और लोभरूपी मृत्यु मनुष्योंके विनाशमें प्रवृत्त होती है । अहंकारके वशीभूत होकर विपरीत मार्गपर चलता हुआ कोई भी मनुष्य परमात्माका साक्षात्कार नहीं कर पाता ।

उद्योगपर्व, अध्याय 42, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 347

सनत्सुजात उवाच

अभिध्या वै प्रथमं हन्ति लोकान् ।

कामक्रोधावनुगृह्याशु पश्चात् ।

एते बालान् मृत्यवे प्रापयन्ति ।

धीरास्तु धैर्येण तरन्ति मृत्युम् ॥

पहले तो विषयोंका चिन्तन ही लोगोंको मारे डालता है । इसके बाद वह काम और क्रोधको साथ लेकर पुनः जल्दी ही प्रहार करता है । इस प्रकार ये विषय-चिन्तन (काम और क्रोध) ही विवेकहीन मनुष्यों को मृत्युके निकट पहुँचाते हैं; परंतु जो स्थिर बुद्धिवाले पुरुष हैं, वे धैर्यसे मृत्युके पार हो जाते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 42, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 348
बारह मानवीय दोष

सनत्सुजात उवाच

क्रोधः कामो लोभमोहौ विधित्सा ।

कृपासूये मानशोकौ स्पृहा च ।

ईर्ष्या जुगुप्सा च मनुष्यदोषा ।

वर्ज्याः सदा द्वादशैते नराणाम् ॥

काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिकीर्षा, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा — मनुष्योंमें रहनेवाले ये बारह दोष मनुष्योंके लिये सदा ही त्याग देनेयोग्य हैं ।

सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र को बारह दोषों के विषय में बताया।

उद्योगपर्व, अध्याय 43, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 359
देवत्व की प्राप्ति

वैशम्पायन उवाच

अकामद्वेषसंयोगलोभद्रोहाच्च भारत ।

उपेक्षया च भावानां देवा देवत्वमाप्नुवन् ॥

भरतनन्दन! काम (राग), द्वेष, संयोग (ममता), लोभ और द्रोह (क्रोध)-रूपी दोषोंसे रहित होनेके कारण तथा दूषित भावोंकी उपेक्षा कर देनेके कारण ही देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 61, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 498 ज्ञान–विवेक
इन्द्रियविजयी पुरुष के लक्षण

विदुर उवाच

कामो लोभश्च दर्पश्च मन्युर्निद्रा विकत्थनम् ।

मान ईर्ष्या च शोकश्च नैतद् दान्तो निषेवते ।

अजिह्ममशठं शुद्धमेतद् दान्तस्य लक्षणम् ॥

दमनशील पुरुष काम, लोभ, अभिमान, क्रोध, निद्रा, आत्मप्रशंसा, मान, ईर्ष्या तथा शोक — इन दुर्गुणोंको अपने पास नहीं फटकने देता । कुटिलता और शठताका अभाव तथा आत्मशुद्धि यह दमयुक्त पुरुषका लक्षण है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 63, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 512 नीति–व्यवहार
लोभ का विनाशकारी प्रभाव

युधिष्ठिर उवाच

कुले जातस्य वृद्धस्य परवित्तेषु गृध्यतः ।

लोभः प्रज्ञानमाहन्ति प्रज्ञा हन्ति हता ह्रियम् ॥

मनुष्य उत्तम कुलमें जन्म लेकर और वृद्ध होनेपर भी यदि दूसरोंके धनको लेना चाहता है तो वह लोभ उसकी विचारशक्तिको नष्ट कर देता है । विचारशक्ति नष्ट होनेपर उसकी लज्जाको भी नष्ट कर देती है ।

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से दुर्योधन के विषय में कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 72, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 543 नीति–व्यवहार
अधम पुरुष का लक्षण

श्रीकृष्ण उवाच

कामक्रोधानुवर्ती हि यो मोहाद् विरुरुत्सति ।

गुणवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुः पुरुषाधमम् ॥

जो काम और क्रोधके वशीभूत होकर मोहवश किसी गुणवान् पुरुषके साथ विरोध करना चाहता है, उसे पुरुषोंमें अधम कहा गया है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 91, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 658
क्रोध और मोह का परिणाम

श्रीकृष्ण उवाच

यः कल्याणगुणान् ज्ञातीन् मोहाल्लोभाद् दिदृक्षते ।

सोऽजितात्माजितक्रोधो न चिरं तिष्ठति श्रियम् ॥

जो कल्याणमय गुणोंसे युक्त अपने कुटुम्बीजनोंको मोह और लोभ की दृष्टिसे देखना चाहता है, वह अपने मन और क्रोधको न जीतनेवाला पुरुष दीर्घकालतक राजलक्ष्मीका उपभोग नहीं कर सकता ।

श्रीकृष्ण ने अमर्षशील दुर्योधन से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 91, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 658 ज्ञान–विवेक
क्रोध का परिणाम

भीष्म उवाच

धर्मार्थावभिसंत्यज्य संरम्भं योऽनुमन्यते ।

हसन्ति व्यसने तस्य दुर्हृदो नचिरादिव ॥

जो धर्म और अर्थका परित्याग करके क्रोधका ही अनुसरण करता है, उसे शीघ्र ही विपत्तिमें पड़ा देख उसके शत्रुगण हँसी उड़ाते हैं ।

भीष्म ने सभा से क्रोध में भरकर जाते हुए दुर्योधन को देखकर कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 128, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 833
काम और क्रोध पर विजय

गान्धारी उवाच

कामक्रोधौ हि पुरुषमर्थेभ्यो व्यपकर्षतः ।

तौ तु शत्रू विनिर्जित्य राजा विजयते महीम् ॥

काम और क्रोध मनुष्यको धनसे दूर खींच ले जाते हैं । उन दोनों शत्रुओंको जीत लेनेपर राजा इस पृथ्वीपर विजय पाता है ।

गान्धारी ने दुर्योधन से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 129, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 841
काम-क्रोध का प्रभाव

गान्धारी उवाच

क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुभौ ।

कामक्रोधौ शरीरस्थौ प्रज्ञानं तौ विलुम्पतः ॥

छोटे छिद्रवाले जालसे ढकी हुई दो मछलियोंकी भाँति ये काम और क्रोध भी शरीरके भीतर ही छिपे हुए हैं, जो मनुष्यके ज्ञानको नष्ट कर देते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 129, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 842

वैशम्पायन उवाच

कामाभिभूतः क्रोधाद् वा यो मिथ्या प्रतिपद्यते ।

स्वेषु चान्येषु वा तस्य न सहाया भवन्त्युत ॥

जो राजा काम अथवा क्रोधसे अभिभूत होकर स्वजनों या दूसरोंके प्रति मिथ्या बर्ताव (कपट एवं अन्याययुक्त आचरण) करता है, उसके कोई सहायक नहीं होते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 129, श्लोक 35 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 842
क्रोध का विनाशकारी प्रभाव

श्रीभगवान् उवाच

क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥

क्रोधसे अत्यन्त मूढभाव उत्पन्न हो जाता है, मूढभावसे स्मृतिमें भ्रम हो जाता है, स्मृतिमें भ्रम हो जानेसे बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश हो जाता है और बुद्धिका नाश हो जानेसे यह पुरुष अपनी स्थितिसे गिर जाता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 26, श्लोक 63 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1383

श्रीभगवान् उवाच

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात् ।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥

जो साधक इस मनुष्यशरीरमें, शरीरका नाश होनेसे पहले-पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1433 साधना–योग
मोह और लोभ का प्रभाव

संजय उवाच

लोभमोहसमाविष्टः पुत्रप्रीत्या जनाधिप ।

न बुध्यसे पुरा यत् तत् तथ्यमुक्तं वचो महत् ॥

जनेश्वर! आपने अपने पुत्रोंके प्रति प्रेमके कारण लोभ और मोहके वशीभूत हो, विदुरने पहले जो सत्य एवं हितकी महत्त्वपूर्ण बात बतायी थी, उसपर ध्यान नहीं दिया ।

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 88, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 2054 माया–संसार