श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

साधना–योग

अभ्यास, संयम और मन का निग्रह

8 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

असाधकों का कष्ट

यदि न समुद्धरन्ति यतयो हृदि कामजटा ।

दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः ।

असुतृपयोगिनामुभयतोऽप्यसुखं भगवन्ननपगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥

भगवन्! यदि मनुष्य योगी-यति होकर भी अपने हृदयकी विषय-वासनाओंको उखाड़ नहीं फेंकते तो उन असाधकोंके लिये आप हृदयमें रहनेपर भी वैसे ही दुर्लभ हैं, जैसे कोई अपने गलेमें मणि पहने हुए हो, परन्तु उसकी याद न रहनेपर उसे ढूँढ़ता फिरे इधर-उधर । जो साधक अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, विषयोंसे विरक्त भोगना दुःख-ही-दुःख, नहीं होते उन्हें जीवनभर और जीवनके बाद भी पड़ता है । क्योंकि वे साधक नहीं, दम्भी हैं । एक तो अभी उन्हें मृत्युसे छुटकारा नहीं मिला है, लोगोंको रिझाने, धन कमाने आदिके क्लेश उठाने पड़ रहे हैं, और दूसरे आपका स्वरूप न जाननेके कारण अपने धर्म-कर्मका उल्लंघन करनेसे परलोकमें नरक आदि प्राप्त होनेका भय भी बना ही रहता है ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1002 काम–क्रोध–लोभ–मोह
मृत्यु भय का नाश

हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः ।

स सर्वदृगुपद्रष्टा तं भजन् निर्गुणो भवेत् ॥

परन्तु परीक्षित्! भगवान् श्रीहरि तो प्रकृतिसे परे स्वयं पुरुषोत्तम एवं प्राकृत गुणरहित हैं । वे सर्वज्ञ तथा सबके अन्तःकरणोंके साक्षी हैं । जो उनका भजन करता है, वह स्वयं भी गुणातीत हो जाता है ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 88, श्लोक 5 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1012 भक्ति
शास्त्रों में श्रद्धा

श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।

मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥

भगवान्की प्राप्तिका मार्ग बतलानेवाले शास्त्रोंमें श्रद्धा और दूसरे किसी भी शास्त्रकी निन्दा न करना, प्राणायामके द्वारा मनका, मौनके द्वारा वाणीका और वासनाहीनताके अभ्याससे कर्मोंका संयम करना, सत्य बोलना, इन्द्रियोंको अपने-अपने गोलकोंमें स्थिर रखना और मनको कहीं बाहर न जाने देना सीखे ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 26 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1065 धर्म–आचरण
प्राणवायु से शिक्षा

प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः ।

ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः ॥

मैंने शरीरके भीतर रहनेवाले वायु-प्राणवायुसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह् आहारमात्रकी इच्छा रखता है और उसकी प्राप्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधकको भी चाहिये कि जितनेसे जीवन-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन कर ले । इन्द्रियोंको तृप्त करनेके लिये बहुत-से विषय न चाहे । संक्षेपमें उतने ही विषयोंका उपयोग करना चाहिये जिनसे बुद्धि विकृत न हो, मन चंचल न हो और वाणी व्यर्थकी बातोंमें न लग जाय ।

अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1107 नीति–व्यवहार
इन्द्रिय निग्रह और अनासक्ति

गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति ।

न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः ॥

राजन्! मैंने सूर्यसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वे अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल खींचते और समयपर उसे बरसा देते हैं, वैसे ही योगी पुरुष इन्द्रियोंके द्वारा समयपर विषयोंका ग्रहण करता है और समय आनेपर उनका त्याग — उनका दान भी कर देता है । किसी भी समय उसे इन्द्रियके किसी भी विषयमें आसक्ति नहीं होती ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 50 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1109
अनाहत नाद का अनुभव

सूत → ब्रह्मन

समाहितात्मनो ब्रह्मन् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।

हृद्याकाशादभून्नादो वृत्तिरोधाद् विभाव्यते ॥

सूतजीने कहा — ब्रह्मन्! जिस समय परमेष्ठी ब्रह्माजी पूर्वसृष्टिका ज्ञान सम्पादन करनेके लिये एकाग्रचित्त हुए, उस समय उनके हृदयाकाशसे कण्ठ-तालु आदि स्थानोंके संघर्षसे रहित एक अत्यन्त विलक्षण अनाहत नाद प्रकट हुआ । जब जीव अपनी मनोवृत्तियोंको रोक लेता है, तब उसे भी उस अनाहत नादका अनुभव होता है ।

सूतजी ने शौनक आदि ऋषियों को बताया।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 37 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1358 ज्ञान–विवेक
परमात्म-ज्ञान की प्राप्ति

य इदं कल्य उत्थाय महापुरुषलक्षणम् ।

तच्चित्तः प्रयतो जप्त्वा ब्रह्म वेद गुहाशयम् ॥

पुरुषोत्तमभगवान्के चिह्नभूत अंग, उपांग और आयुध आदिके इस वर्णनका जो मनुष्य भगवान्में ही चित्त लगाकर पवित्र होकर प्रातःकाल पाठ करेगा, उसे सबके हृदयमें रहनेवाले ब्रह्मस्वरूप परमात्माका ज्ञान हो जायगा ।

सूतजी ने शौनकजी से कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 26 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1401 ज्ञान–विवेक
निर्गुण सेवन की परिभाषा

वर्षमासदिनानां तु विमुच्य नियमाग्रहम् ।

सर्वदा प्रेमभक्त्यैव सेवनं निर्गुणं मतम् ॥

जब वर्ष, महीना और दिनोंके नियमका आग्रह छोड़कर सदा ही प्रेम और भक्तिके साथ श्रवण किया जाय, तब वह सेवन ‘निर्गुण’ माना गया है ।

राजा परीक्षित् और शुकदेव के संवाद में जो भागवत का सेवन हुआ था, वह निर्गुण ही बताया गया है।

वैष्णवखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 28 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1458 भक्ति