श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १
वैराग्य
अनासक्ति और संसार की नश्वरता
8 पद्य
महाभारत — खण्ड १
सौति उवाच
धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानां ।
स ह्येक एव परलोकगतस्य बन्धुः ॥
अर्थाः स्त्रियश्च निपुणैरपि सेव्यमाना ।
नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ॥
तपस्वी महर्षियो! (तथा महाभारतके पाठको!) आप सब लोग सदा सांसारिक आसक्तियोंसे ऊँचे उठें और आपका मन सदा धर्ममें लगा रहे; क्योंकि परलोकमें गये हुए जीवका बन्धु या सहायक एकमात्र धर्म ही है । चतुर मनुष्य भी धन और स्त्रियोंका सेवन तो करते हैं, किंतु वे उनकी श्रेष्ठतापर विश्वास नहीं करते और न उन्हें स्थिर ही मानते हैं ।
सौतिजी ने अनुक्रमणिका के अन्त में ऋषियों से कहा।
देवयानी उवाच
सुयन्त्रिता वरा नित्यं विहीनाश्च धनैर्नराः ।
दुर्वृत्ताः पापकर्माणश्चाण्डाला धनिनोऽपि वा ॥
अकारणाद् ये द्विषन्ति परिवादं वदन्ति च ।
न तत्रास्य निवासोऽस्ति पाप्मभिः पापतां व्रजेत् ॥
सुकृते दुष्कृते वापि यत्र सज्जति यो नरः ।
ध्रुवं रतिर्भवेत् तत्र तस्माद् दोषं न रोचयेत् ॥
वाग् दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः ।
मम मथ्नाति हृदयमग्निकाम इवारणिम् ॥
धनहीन मनुष्य भी यदि सदा अपने मनपर संयम रखें तो वे श्रेष्ठ हैं और धनवान् भी यदि दुराचारी तथा पापकर्मी हों, तो वे चाण्डालके समान हैं। जो अकारण किसीके साथ द्वेष करते हैं और दूसरोंकी निन्दा करते रहते हैं, उनके बीचमें सत्पुरुषका निवास नहीं होना चाहिये; क्योंकि पापियोंके संगसे मनुष्य पापात्मा हो जाता है । मनुष्य पाप अथवा पुण्य जिसमें भी आसक्त होता है, उसीमें उसकी दृढ़ प्रीति हो जाती है, इसलिये पापकर्ममें प्रीति नहीं करनी चाहिये । तात! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको मथ रहा है । ठीक उसी तरह, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है ।
देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से कहा।
शुक्र उवाच
धर्मज्ञः सन् महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम् ।
तस्माज्जरा त्वामचिराद् धर्षयिष्यति दुर्जया ॥
शुक्राचार्यने कहा — महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्मको प्रिय मानकर उसका आचरण किया है । इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबायेगी ।
शुक्राचार्य ने महाराज ययाति से कहा।
ययाति उवाच
तस्मादेनामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम् ।
निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिष्यामि मृगैः सह ॥
अतः मैं इस तृष्णाको छोड़कर परब्रह्म परमात्मामें मन लगा द्वन्द्व और ममतासे रहित हो वनमें मृगोंके साथ विचरूँगा ।
राजा ययाति ने अपने पुत्र पूरु से संवाद करते हुए यह कहा।
ययाति उवाच
रात्र्या यया वाभिजिताश्च लोका ।
भवन्ति कामाभिजिताः सुखाश्च ।
तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वानरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा ॥
जिस समय रूप, रस आदि विषय तुच्छ प्रतीत होने लगें, इच्छानुसार जीत लिये जायँ तथा उनके परित्यागमें ही सुख जान पड़े, उसी समय विद्वान् पुरुष मनको वशमें करके समस्त संग्रहोंका त्याग कर वनवासी होनेका प्रयत्न करे ।
ययाति उवाच
यस्तु कामान् परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः ।
आतिष्ठेच्च मुनिर्मेनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात् ॥
जो मुनि सम्पूर्ण कामनाओंको छोड़कर कर्मोंको त्याग चुका है और इन्द्रिय-संयमपूर्वक सदा मौनमें स्थित है, ऐसा संन्यासी लोकमें परम सिद्धिको प्राप्त होता है ।
पाण्डु उवाच
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः ।
ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थिताः ॥
तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः ।
सम्परित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ॥
जीवित पुरुषोंद्वारा अपने अभ्युदयके लिये जो-जो कर्म किये जा सकते हैं, उन समस्त सकाम कर्मोंको मैं त्याग दूँगा; क्योंकि वे सब कालसे सीमित हैं । अनित्य फल देनेवाली क्रियाओंके लिये जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा चेष्टा की जाती है, उस चेष्टाको भी मैं सर्वथा त्याग दूँगा; धर्मके फलको भी छोड़ दूँगा । अपने अन्तःकरणके मलको सर्वथा धोकर शुद्ध हो जाऊँगा ।
बहुमायासमाकीर्णो नानादोषसमाकुलः ।
लुप्तधर्मक्रियाचारो घोरः कालो भविष्यति ॥
‘अब ऐसा भयंकर समय आयेगा, जिसमें सब ओर छल-कपट और मायाका बोलबाला होगा । संसारमें अनेक प्रकारके दोष प्रकट होंगे और धर्म-कर्म तथा सदाचारका लोप हो जायगा’
व्यासजी ने श्राद्ध की समाप्ति पर दुखी एवं मोह में पड़ी माता सत्यवती से कहा।