श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३

वैराग्य

अनासक्ति और संसार की नश्वरता

25 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

पापपूर्ण कर्म का त्याग

संजय उवाच

सर्वक्षयो दृश्यते यत्र कृत्स्नः ।

पापोदयो निरयोऽभावसंस्थः ।

कस्तत् कुर्याज्जातु कर्म प्रजानन् ।

पराजयो यत्र समो जयश्च ॥

जिसमें सबका विनाश दिखायी देता है, जिससे पूर्णतः पापका उदय होता है, जो नरकका हेतु है, जिसके अन्तमें अभाव ही हाथ लगता है और जिसमें जय तथा पराजय दोनों समान हैं, उस युद्ध-जैसे कठोर कर्मके लिये कौन समझदार मनुष्य कभी उद्योग करेगा?

उद्योगपर्व, अध्याय 25, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 177
धृतराष्ट्र का पुत्रमोह

युधिष्ठिर उवाच

मानघ्नस्यासौ मानकामस्य चेर्षोः ।

संरम्भिणश्चार्थधर्मातिगस्य ।

दुर्भाषिणो मन्युवशानुगस्य ।

कामात्मनो दौर्हृदैर्भावितस्य ।

अनेयस्याश्रेयसो दीर्घमन्योमित्रद्रुहः संजय पापबुद्धेः ।

सुतस्य राजा धृतराष्ट्रः प्रियैषी ।

प्रपश्यमानः प्राजहाद् धर्मकामौ ॥

संजय! दूसरोंका मान मिटाकर अपना मान चाहनेवाले, ईर्ष्यालु, क्रोधी, अर्थ और धर्मका उल्लंघन करनेवाले, कटुवचन बोलनेवाले, क्रोध और दीनताके वशवर्ती, कामात्मा (भोगासक्त), पापियोंसे प्रशंसित, शिक्षा देनेके अयोग्य, भाग्यहीन, अधिक क्रोधी, मित्रद्रोही तथा पापबुद्धि पुत्र दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाले राजा धृतराष्ट्रने समझते हुए भी धर्म और कामका परित्याग किया है ।

युधिष्ठिर ने संजय से धृतराष्ट्र के विषय में कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 26, श्लोक 14–15 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 183 ज्ञान–विवेक
तीन नरक के द्वार

विदुर उवाच

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥

काम, क्रोध और लोभ — ये आत्माका नाश करनेवाले नरकके तीन दरवाजे हैं; अतः इन तीनोंको त्याग देना चाहिये ।

उद्योगपर्व, अध्याय 33, श्लोक 66 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 251 काम–क्रोध–लोभ–मोह
भिक्षुक के लक्षण

विदुर उवाच

अरोषणो यः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।

प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः ।

निन्दाप्रशंसोपरतः प्रियाप्रिये ।

त्यजन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ॥

जो क्रोध न करनेवाला, लोष्ट, पत्थर और सुवर्ण को एक-सा समझनेवाला, शोकहीन, सन्धि-विग्रहसे रहित, निन्दा-प्रशंसासे शून्य, प्रिय-अप्रियका त्याग करनेवाला तथा उदासीन है, वही भिक्षुक (संन्यासी) है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 38, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 316 साधना–योग
छह प्रकार का त्याग

सनत्सुजात उवाच

श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागः श्रियं प्राप्य न हृष्यति ।

इष्टापूर्ते द्वितीयं स्यान्नित्यवैराग्ययोगतः ॥

कामत्यागश्च राजेन्द्र स तृतीय इति स्मृतः ।

अप्यवाच्यं वदन्त्येतं स तृतीयो गुणः स्मृतः ॥

राजेन्द्र! छः प्रकारका जो सर्वश्रेष्ठ त्याग है, उसे बताते हैं । लक्ष्मीको पाकर हर्षित न होना — यह प्रथम त्याग है; यज्ञ-होमादिमें तथा कुएँ, तालाब और बगीचे आदि बनानेमें धन खर्च करना दूसरा त्याग है और सदा वैराग्यसे युक्त रहकर कामका त्याग करना — यह तीसरा त्याग कहा गया है । महर्षिलोग इसे अनिर्वचनीय मोक्षका उपाय कहते हैं । अतः यह तीसरा त्याग विशेष गुण माना गया है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 43, श्लोक 28–29 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 361
ब्रह्मचर्य का प्रभाव

सनत्सुजात → राजन

य आश्रयेत् पावयेच्चापि राजन् ।

सर्वं शरीरं तपसा तप्यमानः ।

एतेन वै बाल्यमभ्येति विद्वान् ।

मृत्युं तथा स जयत्यन्तकाले ॥

राजन्! जो इस ब्रह्मचर्यका आश्रय लेता है, वह ब्रह्मचारी यम-नियमादि तपका आचरण करता हुआ अपने सम्पूर्ण शरीरको भी पवित्र बना लेता है तथा इससे विद्वान् पुरुष निश्चय ही अबोध बालककी भाँति राग-द्वेषसे शून्य हो जाता है और अन्त समयमें वह मृत्युको भी जीत लेता है ।

सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 44, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 372 साधना–योग
दम्भियों का छल

सनत्सुजात उवाच

गूहन्ति सर्पा इव गह्वराणि ।

स्वशिक्षया स्वेन वृत्तेन मर्त्याः ।

तेषु प्रमुह्यन्ति जना विमूढा ।

यथाध्वानं मोहयन्ते भयाय ।

योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥

जैसे साँप बिलोंका आश्रय ले अपनेको छिपाये रहते हैं, उसी प्रकार दम्भी मनुष्य अपनी शिक्षा और व्यवहारकी आड़में अपने दोषोंको छिपाये रखते हैं । जैसे ठग रास्ता चलनेवालोंको भयमें डालनेके लिये दूसरा रास्ता बतलाकर मोहित कर देते हैं, मूर्ख मनुष्य उनपर विश्वास करके अत्यन्त मोहमें पड़ जाते हैं; इसी प्रकार जो परमात्माके मार्गमें चलनेवाले हैं, उन्हें भी दम्भी पुरुष भयमें डालनेके लिये मोहित करनेकी चेष्टा करते हैं, किंतु योगीजन भगवत्कृपासे उनके फंदेमें न आकर उस सनातन परमात्माका ही साक्षात्कार करते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 46, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 384 नीति–व्यवहार
ज्ञान और ब्रह्मभाव

विदुर उवाच

नैष्कर्म्यं वा समास्थाय ज्ञानतृप्तो जितेन्द्रियः ।

कालाकाङ्क्षी चरँल्लोके ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

अथवा जो ज्ञानसे तृप्त जितेन्द्रिय पुरुष नैष्कर्म्यका आश्रय लेकर कालकी प्रतीक्षा करता हुआ अनासक्तभावसे लोकमें विचरता रहता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 63, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 513 ज्ञान–विवेक
भक्ति से आत्मशुद्धि

संजय उवाच

मायां न सेवे भद्रं ते न वृथा धर्ममाचरे ।

शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद् वेद्मि जनार्दनम् ॥

संजयने कहा — महाराज! आपका कल्याण हो । मैं कभी माया (छल-कपट)-का सेवन नहीं करता । व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) धर्मका आचरण नहीं करता । भगवान्की भक्तिसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; अतः मैं शास्त्रके वचनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपको यथावत् जानता हूँ ।

सञ्जय ने धृतराष्ट्र को बताया कि वह भक्ति से अपने अन्तःकरण की शुद्धि करके शास्त्र के वचनों से भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप को जानते हैं।

उद्योगपर्व, अध्याय 69, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 531 भक्ति
इन्द्रिय संयम और कर्मयोग

श्रीभगवान् → अर्जुन

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।

कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

किंतु हे अर्जुन! जो पुरुष मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियोंद्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग के आदर्श के विषय में कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 27, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1393 साधना–योग

श्रीभगवान् उवाच

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।

आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥

परंतु जो मनुष्य आत्मामें ही रमण करनेवाला और आत्मामें ही तृप्त तथा आत्मामें ही संतुष्ट हो, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 27, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1397 ज्ञान–विवेक
अनासक्त कर्म का स्वरूप

श्रीभगवान् उवाच

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित् करोति सः ॥

जो पुरुष समस्त कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिका सर्वथा त्याग करके संसारके आश्रयसे रहित हो गया है और परमात्मामें नित्यतृप्त है, वह कर्मोंमें भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1414 साधना–योग

श्रीभगवान् उवाच

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

जो बिना इच्छाके अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थमें सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंसे सर्वथा अतीत हो गया है — ऐसा सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेवाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1414 साधना–योग
ज्ञान की अग्नि

श्रीभगवान् → अर्जुन

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥

क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्ममय कर देता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1417 ज्ञान–विवेक

श्रीभगवान् → अर्जुन

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।

योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥

परंतु हे अर्जुन! कर्मयोगके बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरद्वारा होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंमें कर्तापनका त्याग प्राप्त होना कठिन है? और भगवत्स्वरूपको मनन करनेवाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्माको शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1430 साधना–योग

श्रीभगवान् उवाच

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।

नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन् न कारयन् ॥

अन्तःकरण जिसके वशमें है, ऐसा सांख्ययोगका आचरण करनेवाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारोंवाले शरीररूप घरमें सब कर्मोंको मनसे त्यागकर आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1431 साधना–योग

श्रीभगवान् उवाच

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥

जिनका मन समभावमें स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया अर्थात् वे सदाके लिये जन्म-मरणसे छूटकर जीवन्मुक्त हो गये; क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही स्थित हैं?

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1432 ज्ञान–विवेक

श्रीभगवान् उवाच

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रता ॥

जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञानके द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभावसे परमात्मामें स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1433 ज्ञान–विवेक

श्रीभगवान् उवाच

प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।

विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥

बाहरके विषयभोगोंको न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रोंकी दृष्टिको भृकुटीके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपानवायुको सम करके,≠ जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं? – ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोधसे रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 27–28 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1434 साधना–योग
मन का नियन्त्रण

श्रीभगवान् → अर्जुन

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; परंतु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्यसे वशमें होता है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मन के चञ्चल स्वभाव और उसे वश में करने के उपाय बताते हुए कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 30, श्लोक 35 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1448 साधना–योग

श्रीभगवान् उवाच

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥

यदि मेरी प्राप्तिरूप योगके आश्रित होकर उपर्युक्त साधनको करनेमें भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदिपर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मोंके फलका त्याग क ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1558 साधना–योग
परम भक्त के लक्षण

श्रीभगवान् उवाच

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

जो पुरुष आकांक्षासे रहित, बाहर-भीतरसे शुद्ध, चतुर, पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा हुआ है, वह सब आरम्भोंका त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1559 भक्ति
समत्व बुद्धि का महत्व

श्रीभगवान् उवाच

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है, वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1559 भक्ति
समत्व और आसक्ति का त्याग

श्रीभगवान् उवाच

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।

शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥

जो शत्रु-मित्रमें और मान-अपमानमें सम है तथा सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें सम है और आसक्तिसे रहित है ।

भगवान ने अर्जुन को अपने प्रिय भक्त के लक्षणों के बारे में बताते हुए यह कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1560
स्थितप्रज्ञ भक्त की विशेषता

श्रीभगवान् उवाच

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मोनी संतुष्टो येन केनचित् ।

अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः ॥

जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील और जिस किसी प्रकारसे भी शरीरका निर्वाह होनेमें सदा ही संतुष्ट है तथा रहनेके स्थानमें ममता और आसक्तिसे रहित है, वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1560 भक्ति