श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६
काम–क्रोध–लोभ–मोह
भीतर के छह शत्रु
7 पद्य
महाभारत — खण्ड ६
बृहस्पति उवाच
हन्त निःश्रेयसं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम् ।
अहिंसापाश्रयं धर्मं यः साधयति वै नरः ॥
त्रीन् दोषान् सर्वभूतेषु निधाय पुरुषः सदा ।
कामक्रोधौ च संयम्य ततः सिद्धिमवाप्नुते ॥
अब मैं मनुष्यके लिये कल्याणके सर्वश्रेष्ठ उपायका वर्णन करता हूँ । जो मनुष्य अहिंसायुक्त धर्मका पालन करता है, वह मोह, मद और मत्सरतारूप तीनों दोषोंको अन्य समस्त प्राणियोंमेंस्थापित करके एवं सदा काम-क्रोधका संयम करके सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ।
श्रीभगवान् उवाच
सर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु ज्ञेयोऽऽत्मा संयतेन्द्रियैः ।
कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ॥
सभी आर्षधर्मोंमें इन्द्रियसंयमपूर्वक आत्मज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है । फिर काम और क्रोधको भी जीतना चाहिये । ऐसा मेरा मत है ।
ब्राह्मण → देवि
त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः ।
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ॥
तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः ।
श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥
ब्राह्मणने कहा — देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम—- ये तीन मेरे शत्रु हैं । ये-वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं । हर्ष, प्रीति और आनन्द — ये तीन सात्त्विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव-से तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह — ये तीन तामस गुण हैं ।
ब्राह्मण ने देवि से कहा।
ब्रह्मा उवाच
सम्मोहोऽज्ञानमत्यागः कर्मणामविनिर्णयः ।
स्वप्नः स्तम्भो भयं लोभः स्वतः सुकृतदूषणम् ।
अस्मृतिश्चाविपाकश्च नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता ।
निर्विशेषत्वमन्धत्वं जघन्यगुणवृत्तिता ।
अकृते कृतमानित्वमज्ञाने ज्ञानमानिता ।
अमैत्री विकृताभावो ह्यश्रद्धा मूढभावना ।
अनार्जवमसंज्ञत्वं कर्म पापमचेतना ।
गुरुत्वं सन्नभावत्वमवशित्वमवाग्गतिः ।
सर्व एते गुणा वृत्तास्तामसाः सम्प्रकीर्तिताः ।
ये चान्ये विहिता भावा लोकेऽस्मिन् भावसंज्ञिताः ।
तत्र तत्र नियम्यन्ते सर्वे ते तामसा गुणाः ॥
मोह, अज्ञान, त्यागका अभाव, कर्मोंका निर्णय न कर सकना, निद्रा, गर्व, भय, लोभ, स्वयं शुभ कर्मोंमें दोष देखना, स्मरणशक्तिका अभाव, परिणाम न सोचना, नास्तिकता, दुश्चरित्रता, निर्विशेषता (अच्छे-बुरेके विवेकका अभाव), इन्द्रियोंकी शिथिलता, हिंसा आदि निन्दनीय दोषोंमें प्रवृत्त होना, अकार्यको कार्य और अज्ञानको ज्ञान समझना, शत्रुता, काममें मन न लगाना, अश्रद्धा, मूर्खतापूर्ण विचार, कुटिलता, नासमझी, पाप करना, अज्ञान, आलस्य आदिके कारण देहका भारी होना, भाव-भक्तिका न होना, अजितेन्द्रियता और नीच कर्मोंमें अनुराग — ये सभी दुर्गुण तमोगुणके कार्य बतलाये गये हैं । इनके सिवा और भी जो-जो बातें इस लोकमें निषिद्ध मानी गयी हैं, वे सब तमोगुणी ही हैं ।
ब्रह्मा उवाच
नैशात्मकं तमो विद्यात् त्रिगुणं मोहसंज्ञितम् ।
अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु ।
तामसं रूपमेतत् तु दृश्यते चापि सङ्गतम् ॥
तमको अन्धकाररूप और त्रिगुणमय समझना चाहिये । उसका दूसरा नाम मोह है । वह अधर्मको लक्षित करानेवाला और पाप करनेवाले लोगोंमें निश्चित रूपसे विद्यमान रहनेवाला है । तमोगुणका यह स्वरूप दूसरे गुणोंसे मिश्रित भी दिखायी देता है ।
ब्रह्मा उवाच
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रः क्रोधसंज्ञितः ।
मरणं त्वन्धतामिस्रस्तामिस्रः क्रोध उच्यते ॥
तम (अविद्या), मोह (अस्मिता), महामोह (राग), क्रोध नामवाला तामिस्र और मृत्युरूप अन्धतामिस्र — यह पाँच प्रकारकी तामसी प्रकृति बतलायी गयी है । क्रोधको ही तामिस्र कहते हैं ।
ब्रह्माजी ने महर्षियों से तमोगुण का वर्णन किया।
ब्रह्मा उवाच
कामं क्रोधं भयं लोभमभिद्रोहमथानृतम् ।
इन्द्रियाणां निरोधेन सदा त्यजति दुस्त्यजान् ॥
सदा इन्द्रियोंके निरोधसे मनुष्य काम, क्रोध, भय, लोभ, द्रोह और असत्य — इन सब दुस्तयज अवगुणोंको त्याग देता है ।