श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३

भक्ति

प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध

14 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

आन्तरिक आत्म-साक्षात्कार

सनत्सुजात → राजन

तूष्णीम्भूत उपासीत न चेष्टेन्मनसापि च ।

उपावर्तस्व तद् ब्रह्म अन्तरात्मनि विश्रुतम् ॥

वागादि इन्द्रियोंकी सब प्रकारकी चेष्टासे रहित होकर परमात्माकी उपासना करे, मनसे भी कोई चेष्टा न करे । राजन्! तुम भी अपने हृदयाकाशमें स्थित उस विख्यात परमेश्वरकी बुद्धिपूर्वक उपासना करो ।

उद्योगपर्व, अध्याय 43, श्लोक 59 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 366 साधना–योग
सत्य और धर्म की विजय

संजय उवाच

यतः सत्यं यतो धर्मो यतो हीरार्जवं यतः ।

ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥

जिस ओर सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता है, उसी ओर भगवान् श्रीकृष्ण रहते हैं और जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 68, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 529 लीला–रहस्य
भक्ति से आत्मशुद्धि

संजय उवाच

मायां न सेवे भद्रं ते न वृथा धर्ममाचरे ।

शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद् वेद्मि जनार्दनम् ॥

संजयने कहा — महाराज! आपका कल्याण हो । मैं कभी माया (छल-कपट)-का सेवन नहीं करता । व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) धर्मका आचरण नहीं करता । भगवान्की भक्तिसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; अतः मैं शास्त्रके वचनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपको यथावत् जानता हूँ ।

सञ्जय ने धृतराष्ट्र को बताया कि वह भक्ति से अपने अन्तःकरण की शुद्धि करके शास्त्र के वचनों से भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप को जानते हैं।

उद्योगपर्व, अध्याय 69, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 531 वैराग्य
परमेश्वर के गुण

वैशम्पायन उवाच

यो वै न कामान्न भयान्न लोभान्नार्थकारणात् ।

अन्यायमनुवर्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुपः ॥

धर्मज्ञो धृतिमान् प्राज्ञः सर्वभूतेषु केशवः ।

ईश्वरः सर्वभूतानां देवदेवः सनातनः ॥

जो कभी कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा अन्य किसी प्रयोजनके कारण भी अन्यायका अनुसरण नहीं कर सकते, जिनकी बुद्धि स्थिर है, जो लोभ-रहित, धर्मज्ञ, धैर्यवान्, विद्वान् तथा सम्पूर्ण भूतोंके भीतर विराजमान हैं, वे भगवान् केशव देवताओंके भी देवता, सनातन परमेश्वर तथा समस्त प्राणियोंके ईश्वर हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 83, श्लोक 34–35 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 603 ज्ञान–विवेक
भक्तों का परित्याग

अम्बा उवाच

भजस्व मां शाल्वपते भक्तां बालामनागसम् ।

भक्तानां हि परित्यागो न धर्मेषु प्रशस्यते ॥

शाल्वराज! मैं निरपराध अबला हूँ । तुम्हारे प्रति अनुरक्त हूँ। मुझे स्वीकार करो; क्योंकि भक्तोंका परित्याग किसी भी धर्ममें अच्छा नहीं बताया गया है ।

कामदेव के बाणों से पीड़ित हुई अम्बा ने शाल्वराज से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 175, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1107
परम तत्त्वज्ञान

श्रीभगवान् उवाच

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।

यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥

मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञानको सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसारमें फिर और कुछ भी जाननेयोग्य शेष नहीं रह जाता ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 31, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1461 ज्ञान–विवेक
दृढव्रत भक्त की भक्ति

श्रीभगवान् उवाच

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥

परंतु निष्कामभावसे श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण करनेवाले जिन पुरुषोंका पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्वरूप मोहसे मुक्ता दृढनिश्चयी भक्त मुझको सब प्रकारसे भजते हैं ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 31, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1465 कर्म–प्रारब्ध
ब्रह्मज्ञान और योग

श्रीभगवान् उवाच

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥

परंतु जो पुरुष इन्द्रियोंके समुदायको भली प्रकार वशमें करके मन-बुद्धिसे परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको निरन्तर एकीभावसे (अभिन्नभावसे) ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं ।

श्रीभगवान् ने अर्जुन को योगियों की श्रेष्ठता बताते हुए कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1556 साधना–योग
परम भक्त की विशेषता

श्रीभगवान् उवाच

निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ।

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।

मय्यर्पितमनोबुद्धियों मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंकी प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है ± ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1559 सेवा–करुणा–विनय
परम भक्त के लक्षण

श्रीभगवान् उवाच

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

जो पुरुष आकांक्षासे रहित, बाहर-भीतरसे शुद्ध, चतुर, पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा हुआ है, वह सब आरम्भोंका त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1559 वैराग्य
समत्व बुद्धि का महत्व

श्रीभगवान् उवाच

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है, वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1559 वैराग्य
स्थितप्रज्ञ भक्त की विशेषता

श्रीभगवान् उवाच

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मोनी संतुष्टो येन केनचित् ।

अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः ॥

जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील और जिस किसी प्रकारसे भी शरीरका निर्वाह होनेमें सदा ही संतुष्ट है तथा रहनेके स्थानमें ममता और आसक्तिसे रहित है, वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1560 वैराग्य
तपस्या और भक्ति का फल

भीष्म उवाच

तपसा नियतो देवं विधानं सर्वदेहिनाम् ।

ब्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च ।

योगभूतं परिचरन् केशवं महदाप्नुयात् ॥

जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर हो संयम-नियमका पालन करते हुए अमावास्या और पूर्णिमाको समस्त देहधारियोंके आश्रय, ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान् केशवकी आराधना करता है, वह परम पदको प्राप्त कर लेता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 67, श्लोक 19–20 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1911 साधना–योग
केशव की महिमा

भीष्म → तात

एष ते विस्तरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तितः ।

केशवस्य यथातत्त्वं सुप्रीतो भज केशवम् ॥

तात! दुर्योधन! इस तरह विस्तार और संक्षेपसे मैंने तुम्हें भगवान् केशवकी यथार्थ महिमा बतायी है । अब तुम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका भजन करो ।

भीष्मजी ने दुर्योधन को भगवान् केशव की यथार्थ महिमा बताते हुए यह कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 68, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1914