श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४

भक्ति

प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध

8 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

कृष्ण के आदर्श

युधिष्ठिर उवाच

सोऽभिजात्या च भक्त्या च सख्यस्याचार्यकस्य च ।

सौहृदस्य च वीर्यस्य कुलीनत्वस्य माधव ॥

सत्यस्य च महाबाहो अनुकम्पार्थमेव च ।

अनुरूपं महेष्वास कर्म त्वं कर्तुमर्हसि ॥

महाबाहु महाधनुर्धर माधव! वही तुम हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये ही उत्तम कुलमें जन्म-ग्रहण, अर्जुनके प्रति भक्तिभाव, मैत्री, गुरुभाव, सौहार्द, पराक्रम, कुलीनता और सत्यके अनुरूप कर्म करो ।

द्रोणपर्व, अध्याय 110, श्लोक 66–67 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 734 गुरु महिमा
सखा के प्रति अनुराग

दुर्योधन उवाच

यत्र मामभिसंधत्से त्वां चाहं शिनिपुङ्गव ।

त्वं हि प्राणैः प्रियतरो ममाहं च सदा तव ॥

शिनिप्रवर! इन क्रोध, लोभ आदिके ही अधीन होकर तुम मुझे अपने बाणोंका निशाना बनाते हो और तुम्हें मैं । वैसे तो तुम मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय रहे हो और मैं भी तुम्हारा सदा ही प्रीतिपात्र रहा हूँ ।

राजा दुर्योधन ने अपने सखा सात्यकि से इस प्रकार कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 189, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1422
द्रोणाचार्य का योग

संजय उवाच

तथोक्त्वा योगमास्थाय ज्योतिर्भूतो महातपाः ।

पुराणं पुरुषं विष्णुं जगाम मनसा परम् ॥

वे महातपस्वी द्रोण पूर्वोक्त बात कहकर योगका आश्रय ले ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मसे अभिन्नताका अनुभव करते हुए मन-ही-मन सर्वोत्कृष्ट पुराणपुरुष भगवान् विष्णुका ध्यान करने लगे ।

धृष्टद्युम्न के प्रहार के अवसर पर महातपस्वी द्रोण ने योग का आश्रय लेकर भगवान विष्णु का ध्यान किया।

द्रोणपर्व, अध्याय 192, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1454
ब्रह्मज्ञान और भक्ति

अश्वत्थामा उवाच

आत्मानं त्वामात्मनोऽनन्यबोधं ।

विद्वानेवं गच्छति ब्रह्म शुक्रम् ।

अस्तौषं त्वां तव सम्मानमिच्छन् ।

विचिन्वन् वै सदृशं देववर्य ।

सुदुर्लभान् देहि वरान् ममेष्टानभिष्टुतः प्रविकार्षीश्च मायाम् ॥

आप जीवात्मासे अभिन्न अनुभव किये जानेवाले सबके आत्मा हैं, ऐसा जाननेवाला विद्वान् पुरुष विशुद्ध ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। देववर्य! मैंने आपके सत्कारकी शुभ इच्छा लेकर यह स्तवन किया है । स्तुतिके सर्वथा योग्य आप परमेश्वरका मैं चिरकालसे अन्वेषण कर रहा था । जिनकी भलीभाँति स्तुति की गयी है ऐसे आप अपनी मायाको दूर कीजिये और मुझे अभीष्ट दुर्लभ वर प्रदान कीजिये ।

द्रोणकुमार ने नारायण की इस प्रकार स्तुति की।

द्रोणपर्व, अध्याय 201, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1557 ज्ञान–विवेक
परमेश्वर के स्वरूप

व्यास उवाच

विश्वेश्वरं विश्वनरं कर्मणामीश्वरं प्रभुम् ।

शम्भुं स्वयम्भुं भूतेशं भूतभव्यभवोद्भवम् ॥

वे ही विश्वेश्वर, विश्वनियन्ता, कर्मोंके फलदाता ईश्वर और प्रभावशाली हैं । वे ही सबका कल्याण करनेवाले और स्वयम्भू हैं । सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा भूत, भविष्य और वर्तमानके कारण भी वे ही हैं ।

द्रोणपर्व, अध्याय 202, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1564
ज्ञानस्वरूप ईश्वर की महिमा

व्यास उवाच

ज्ञानात्मानं ज्ञानगम्यं ज्ञानश्रेष्ठं सुदुर्विदम् ।

दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान् वरान् ॥

वे ज्ञानस्वरूप, ज्ञानगम्य तथा ज्ञानमें श्रेष्ठ हैं । उनके स्वरूपको समझ लेना अत्यन्त कठिन है । वे अपने भक्तोंको कृपापूर्वक मनोवांछित उत्तम फल देनेवाले हैं ।

द्रोणपर्व, अध्याय 202, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1565 ज्ञान–विवेक
शिव भक्ति का फल

व्यास उवाच

चरितं महात्मनो नित्यं सांग्रामिकमिदं स्मृतम् ।

पठन् वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः ॥

भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा ।

वरान् कामान् स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः ॥

परमात्मा शिवका यह चरित सदा संग्राममें विजय दिलानेवाला है, जो सदा उद्यत रहकर शतरुद्रियको पढ़ता और सुनता है तथा मनुष्योंमें जो कोई भी निरन्तर भगवान् विश्वेश्वरका भक्तिभावसे भजन करता है, वह उन त्रिलोचनके प्रसन्न होनेपर समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 202, श्लोक 151–152 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1582
दैव की प्रधानता

धृतराष्ट्र उवाच

अहो बत महद् दुःखं यत्र पाण्डुसुतान् रणे ।

नातरद् रभसः कर्णो दैवं नूनं परायणम् ॥

अहो! यह महान् दुःखकी बात है कि वेगशाली वीर कर्ण भी रणभूमिमें पाण्डवोंसे पार न पा सका । अवश्य दैव ही सबका परम आश्रय है ।

धृतराष्ट्र ने सञ्जय से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 31, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1787 कर्म–प्रारब्ध