श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५

गुरु महिमा

गुरु का स्थान और कृपा

9 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

गुरुहीनता और क्षणिक सुख

वामदेव उवाच

यस्य नास्ति गुरुर्धर्मे न चान्यानपि पृच्छति ।

सुखतन्त्रोऽर्थलाभेषु न चिरं सुखमश्नुते ॥

जिसको धर्मके विषयमें शिक्षा देनेवाला कोई गुरु नहीं है और जो दूसरोंसे भी कुछ नहीं पूछता है तथा धन मिल जानेपर सुखभोगमें आसक्त हो जाता है, वह दीर्घकालतक सुख नहीं भोग पाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 92, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 626
धर्म और गुरु का महत्व

वामदेव उवाच

गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वयमर्थानवेक्षिता ।

धर्मप्रधानो लाभेषु स चिरं सुखमश्नुते ॥

जो धर्मके विषयमें गुरुको प्रधान मानकर उनके उपदेशके अनुसार चलता है, जो स्वयं ही अर्थ-सम्बन्धी सारे कार्योंको देखता है तथा सब प्रकारके लाभोंमें धर्मको ही प्रधान लाभ समझता है, वह चिरकालतक सुखका उपभोग करता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 92, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 626 धर्म–आचरण
गुरुजनों का महत्त्व

भीष्म उवाच

अवध्या हि सदा माता पिता चाप्यपकारिणौ ।

न संदुष्यति तत् कृत्वा न च ते दूषयन्ति तम् ।

धर्माय यतमानानां विदुर्देवा महर्षिभिः ॥

पिता-माता यदि कोई अपराध करें तो भी वे सदा अवध्य ही हैं; क्योंकि पुत्र या शिष्य पिता-माता और गुरुका अपराध करके भी उनकी दृष्टिमें दूषित नहीं होते हैं । वे गुरुजन पुत्र या शिष्यपर स्नेहवश दोषारोपण नहीं करते; बल्कि सदा उसे धर्मके मार्गपर ही ले जानेका प्रयत्न करते हैं । ऐसे पिता-माता आदि गुरुजनोंका महत्त्व महर्षियोंसहित देवता ही जानते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 108, श्लोक 20–21 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 722
गुरु-भक्ति का महत्व

भीष्म उवाच

विद्यां श्रुत्वा ये गुरुं नाद्रियन्ते ।

प्रत्यासन्ना मनसा कर्मणा वा ।

तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं ।

नान्यस्तेभ्यः पापकृदस्ति लोके ।

यथैव ते गुरुभिर्भावनीयास्तथा तेषां गुरवोऽभ्यर्चनीयाः ॥

जो लोग विद्या पढ़कर गुरुका आदर नहीं करते, निकट रहकर मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुकी सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भके बालककी हत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है । संसारमें उनसे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं है । जैसे गुरुओंका कर्तव्य है, शिष्यको आत्मोन्नतिके पथपर पहुँचाना, उसी तरह शिष्योंका धर्म है गुरुओंका पूजन करना ।

शान्तिपर्व, अध्याय 108, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 723
गुरु की महिमा

भीष्म उवाच

येन प्रीणात्युपाध्यायं तेन स्याद् ब्रह्म पूजितम् ।

मातृतः पितृतश्चैव तस्मात् पूज्यतमो गुरुः ॥

जिस कर्मसे शिष्य उपाध्याय (विद्यागुरु) को प्रसन्न करता है, उसीके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी पूजा सम्पन्न हो जाती है; अतः गुरु माता-पितासे भी अधिक पूजनीय है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 108, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 723
गुरु की आज्ञा

कामन्दक → राजन

गुरवो हि परं धर्मं यं ब्रूयुस्तं तथा कुरु ।

गुरूणां हि प्रसादाद् वै श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥

राजन्! गुरुजन तुम्हारे लिये जिस उत्तम धर्मका उपदेश करें, उसका उसी रूपमें पालन करो । गुरुजनोंकी कृपासे तुम परम कल्याणके भागी होओगे ।

कामन्दक ने आंगरिष्ठ से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 123, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 816
कल्याण के तीन साधन

भीष्म → युधिष्ठिर

गुरुपूजा च सततं वृद्धानां पर्युपासनम् ।

श्रवणं चैव शास्त्राणां कूटस्थं श्रेय उच्यते ॥

भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! सदा गुरुजनोंकी पूजा, वृद्ध पुरुषोंकी सेवा और शास्त्रोंका श्रवण — ये तीन कल्याणके अमोघ साधन बताये जाते हैं ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर को कल्याण के अमोघ साधनों के विषय में बताया।

शान्तिपर्व, अध्याय 287, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1892 धर्म–आचरण
गुरु की महत्ता

जनक → ब्रह्मन

न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत् ।

न विना गुरुसम्बन्धं ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ॥

जनकने कहा — ब्रह्मन्! जैसे ज्ञान-विज्ञानके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सद्गुरुसे सम्बन्ध हुए बिना ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।

शुकदेवजी के प्रश्न के उत्तर में जनक ने कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 326, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2177 ज्ञान–विवेक
गुरु और ज्ञान का त्याग

जनक उवाच

गुरुः प्लावयिता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते ।

विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभयं त्यजेत् ॥

गुरु इस संसारसागरसे पार उतारनेवाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान यहाँ नौकाके समान बताया जाता है । मनुष्य उस ज्ञानको पाकर भवसागरसे पार और कृतकृत्य हो जाता है । जैसे नदीको पार कर लेनेपर मनुष्य नाव और नाविक दोनोंको छोड़ देता है, उसी प्रकार मुक्त हुआ पुरुष गुरु और ज्ञान दोनोंको छोड़ दे ।

जनक ने शुकदेवजी से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 326, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2177 ज्ञान–विवेक