श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

8 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

कर्मों का समर्पण

एतत्संसूचितं ब्रह्मंस्तापत्रयचिकित्सितम् ।

यदीश्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम् ॥

सत्यसंकल्प व्यासजी! पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके प्रति समस्त कर्मोंको समर्पित कर देना ही संसारके तीनों तापोंकी एकमात्र ओषधि है, यह बात मैंने आपको बतला दी ।

देवर्षि नारद ने व्यासजी को यह बात बताई।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 32 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 188 भक्ति
ईश्वरेच्छा का पालन

तस्मादिदं दैवतन्त्रं व्यवस्य भरतर्षभ ।

तस्यानुविहितोऽनाथा नाथ पाहि प्रजाः प्रभो ॥

युधिष्ठिर! संसारकी ये सब घटनाएँ ईश्वरेच्छाके अधीन हैं । उसीका अनुसरण करके तुम इस अनाथ प्रजाका पालन करो; क्योंकि अब तुम्हीं इसके स्वामी और इसे पालन करनेमें समर्थ हो ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 9, श्लोक 17 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 218
प्राणियों के कर्मफल

द्विविधाश्चतुर्विधा येऽन्ये जलस्थलनभौकसः ।

कुशलाकुशला मिश्राः कर्मणां गतयस्त्विमाः ॥

संसारमें चर और अचर भेदसे दो प्रकारके तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज भेदसे चार प्रकारके जितने भी जलचर, थलचर तथा आकाशचारी प्राणी हैं, सब-के-सब शुभ-अशुभ और मिश्रित कर्मोंके तदनुरूप फल हैं ।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 10, श्लोक 40 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 394
संसार मार्ग की दुर्गमता

सदस्यगण उवाच

उत्पत्त्यध्वन्यशरण उरुक्लेशदुर्गेऽन्तकोग्रव्यालान्विष्टे विषयमृगतृष्यात्मगेहोरुभारः ।

द्वन्द्वश्वभ्रे खलमृगभये शोकदावेऽज्ञसार्थः ।

पादौकस्ते शरणद कदा याति कामोपसृष्टः ॥

सदस्योंने कहा — जीवोंको आश्रय देनेवाले प्रभो! जो अनेक प्रकारके क्लेशोंके कारण अत्यन्त दुर्गम है, जिसमें कालरूप भयंकर सर्प ताकमें बैठा हुआ है, द्वन्द्वरूप अनेकों गढ़े हैं, दुर्जनरूप जंगली जीवोंका भय है तथा शोकरूप दावानल धधक रहा है — ऐसे, विश्राम-स्थलसे रहित संसारमार्गमें जो अज्ञानी जीव कामनाओंसे पीड़ित होकर विषयरूप मृगतृष्णाजलके लिये ही देह-गेहका भारी बोझा सिरपर लिये जा रहे हैं, वे भला आपके चरणकमलोंकी शरणमें कब आने लगे ।

यज्ञ के सदस्यों ने भगवान् विष्णु से कहा।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 28 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 719 माया–संसार
लिङ्गशरीर और कर्म का फल

श्रीनारद → राजन

येनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान् ।

भुङ्क्ते ह्यव्यवधानेन लिंगेन मनसा स्वयम् ॥

श्रीनारदजीने कहा — राजन्! (स्थूल शरीर तो लिंगशरीरके अधीन है, अतः कर्मोंका उत्तरदायित्व उसीपर है) जिस मनः प्रधान लिंगशरीरकी सहायता से मनुष्य कर्म करता है, वह तो मरनेके बाद भी उसके साथ रहता ही है; अतः वह परलोकमें अपरोक्षरूपसे स्वयं उसीके द्वारा उनका फल भोगता है ।

नारदजी ने राजा प्राचीनबर्हि से कहा।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 29, श्लोक 60 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 913
कर्मफल का भोग

शयानमिममुत्सृज्य श्वसन्तं पुरुषो यथा ।

कर्मात्मन्याहितं भुङ्क्ते तादृशेनेतरेण वा ॥

स्वप्नावस्थामें मनुष्य इस जीवित शरीरका अभिमान तो छोड़ देता है, किन्तु इसीके समान अथवा इससे भिन्न प्रकारके पशु-पक्षी आदि शरीरसे वह मनमें संस्काररूपसे स्थित कर्मोंका फल भोगता रहता है ।

नारदजी ने राजा प्राचीनबर्हि से कहा।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 29, श्लोक 61 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 914
कर्म और फल का अन्तर

यथा वार्तादयो ह्यर्था योगस्यार्थं न बिभ्रति ।

अनर्थाय भवेयुस्ते पूर्तमिष्टं तथासतः ॥

जैसे खेती, व्यापार आदि और उनके फल भी योग-साधनाके फल भगवत्प्राप्ति या मुक्तिको नहीं दे सकते — वैसे ही दुष्ट पुरुषके श्रौतस्मार्त कर्म भी कल्याणकारी नहीं होते, प्रत्युत उलटा फल देते हैं ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 29 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1414 ज्ञान–विवेक
समर्पित कर्म का सुख

क्लेश भूर्यल्पसाराणि कर्माणि विफलानि वा ।

देहिनां विषयार्तानां न तथैवार्पितं त्वयि ॥

विषयोंके लोभमें पड़कर जो देहाभिमानी दुःख भोग रहे हैं, उन्हें कर्म करनेमें परिश्रम और क्लेश तो बहुत अधिक होता है; परन्तु फल बहुत कम निकलता है । अधिकांशमें तो उनके विफलता ही हाथ लगती है । परन्तु जो कर्म आपको समर्पित किये जाते हैं, उनके करनेके समय ही परम सुख मिलता है । वे स्वयं फलरूप ही हैं ।

देवताओं ने परम पुरुष भगवान की स्तुति की।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 47 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1462