श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १
साधना–योग
अभ्यास, संयम और मन का निग्रह
8 पद्य
महाभारत — खण्ड १
शमीक उवाच
तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः ।
क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥
इसलिये तुम सदा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए क्षमाशील बनो । क्षमासे ही ब्रह्माजीके निकटवर्ती लोकोंमें जा सकोगे ।
ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरौ ।
अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन् सहस्रं परिवत्सरान् ॥
‘ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं । मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षोंतक उत्तम ब्रह्मचर्यका पालन करूँगा । इसके लिये आप मुझे अनुमति दें’
कच ने शुक्राचार्य से ब्रह्मचर्य-व्रत की अनुमति माँगते हुए कहा।
पाण्डु उवाच
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः ।
ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थिताः ॥
तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः ।
सम्परित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ॥
जीवित पुरुषोंद्वारा अपने अभ्युदयके लिये जो-जो कर्म किये जा सकते हैं, उन समस्त सकाम कर्मोंको मैं त्याग दूँगा; क्योंकि वे सब कालसे सीमित हैं । अनित्य फल देनेवाली क्रियाओंके लिये जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा चेष्टा की जाती है, उस चेष्टाको भी मैं सर्वथा त्याग दूँगा; धर्मके फलको भी छोड़ दूँगा । अपने अन्तःकरणके मलको सर्वथा धोकर शुद्ध हो जाऊँगा ।
गन्धर्व उवाच
वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः ।
धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ॥
जो छहों अंगोंसहित वेदके स्वाध्यायमें तत्पर, ईमानदार, सत्यवादी, धर्मात्मा और मनको वशमें रखनेवाले हों, ऐसे ही ब्राह्मण राजाओंके पुरोहित होने चाहिये ।
चित्ररथ गन्धर्व ने अर्जुन को पुरोहित के लक्षण बताते हुए कहा।
गन्धर्व उवाच
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।
तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।
इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥
गन्धर्वने कहा — वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है । जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं । इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ।
गन्धर्व ने अर्जुन को बताया कि वसिष्ठ मुनि कौन हैं।
पुलस्त्य उवाच
शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर ।
अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन् कुरुषे त्वं पराशर ॥
पराशर! शान्त रहना ही (ब्राह्मणोंका) श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसीका आचरण करो । तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो?
पुलस्त्य मुनि ने पराशर से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
एवं प्रज्ञानयबलं क्रियोपायसमन्वितम् ।
पुरस्कुर्वीत कार्येषु कृष्णं कार्यार्थसिद्धये ॥
इसी प्रकार सबके लिये यह उचित है कि कार्य और प्रयोजनकी सिद्धिके लिये सभी कार्योंमें बुद्धि, नीति, बल, प्रयत्न और उपायसे युक्त श्रीकृष्णको ही आगे रखे ।
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए कहा।
युधिष्ठिर उवाच
एवमेव यदुश्रेष्ठ यावत्कार्यार्थसिद्धये ।
अर्जुनः कृष्णमन्वेतु भीमोऽन्वेतु धनंजयम् ।
नयो जयो बलं चैव विक्रमे सिद्धिमेष्यति ॥
यदुश्रेष्ठ! इसी प्रकार समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये आपका आश्रय लेना परम आवश्यक है । अर्जुन आप श्रीकृष्णका अनुसरण करें और भीमसेन अर्जुनका । नीति, विजय और बल तीनों मिलकर पराक्रम करें तो उन्हें अवश्य सिद्धि प्राप्त होगी ।
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से कहा।