श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १

साधना–योग

अभ्यास, संयम और मन का निग्रह

8 पद्य

महाभारत — खण्ड १

क्षमा का महत्त्व

शमीक उवाच

तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः ।

क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥

इसलिये तुम सदा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए क्षमाशील बनो । क्षमासे ही ब्रह्माजीके निकटवर्ती लोकोंमें जा सकोगे ।

आदिपर्व, अध्याय 42, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड १ पृ. 324 धर्म–आचरण
ब्रह्मचर्य का सङ्कल्प

ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरौ ।

अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन् सहस्रं परिवत्सरान् ॥

‘ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं । मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षोंतक उत्तम ब्रह्मचर्यका पालन करूँगा । इसके लिये आप मुझे अनुमति दें’

कच ने शुक्राचार्य से ब्रह्मचर्य-व्रत की अनुमति माँगते हुए कहा।

आदिपर्व, अध्याय 76, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड १ पृ. 575
सकाम कर्मों का त्याग

पाण्डु उवाच

याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः ।

ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थिताः ॥

तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः ।

सम्परित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ॥

जीवित पुरुषोंद्वारा अपने अभ्युदयके लिये जो-जो कर्म किये जा सकते हैं, उन समस्त सकाम कर्मोंको मैं त्याग दूँगा; क्योंकि वे सब कालसे सीमित हैं । अनित्य फल देनेवाली क्रियाओंके लिये जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा चेष्टा की जाती है, उस चेष्टाको भी मैं सर्वथा त्याग दूँगा; धर्मके फलको भी छोड़ दूँगा । अपने अन्तःकरणके मलको सर्वथा धोकर शुद्ध हो जाऊँगा ।

आदिपर्व, अध्याय 118, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड १ पृ. 847 वैराग्य
पुरोहित के लक्षण

गन्धर्व उवाच

वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः ।

धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ॥

जो छहों अंगोंसहित वेदके स्वाध्यायमें तत्पर, ईमानदार, सत्यवादी, धर्मात्मा और मनको वशमें रखनेवाले हों, ऐसे ही ब्राह्मण राजाओंके पुरोहित होने चाहिये ।

चित्ररथ गन्धर्व ने अर्जुन को पुरोहित के लक्षण बताते हुए कहा।

आदिपर्व, अध्याय 169, श्लोक 75 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1210 धर्म–आचरण
इन्द्रियों का वश

गन्धर्व उवाच

ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।

तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥

कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।

इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥

गन्धर्वने कहा — वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है । जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं । इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ।

गन्धर्व ने अर्जुन को बताया कि वसिष्ठ मुनि कौन हैं।

आदिपर्व, अध्याय 173, श्लोक 5–6 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1233 काम–क्रोध–लोभ–मोह
शान्ति का श्रेष्ठ धर्म

पुलस्त्य उवाच

शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर ।

अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन् कुरुषे त्वं पराशर ॥

पराशर! शान्त रहना ही (ब्राह्मणोंका) श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसीका आचरण करो । तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो?

पुलस्त्य मुनि ने पराशर से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 180, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1278 धर्म–आचरण
कृष्ण का अनुसरण

युधिष्ठिर उवाच

एवं प्रज्ञानयबलं क्रियोपायसमन्वितम् ।

पुरस्कुर्वीत कार्येषु कृष्णं कार्यार्थसिद्धये ॥

इसी प्रकार सबके लिये यह उचित है कि कार्य और प्रयोजनकी सिद्धिके लिये सभी कार्योंमें बुद्धि, नीति, बल, प्रयत्न और उपायसे युक्त श्रीकृष्णको ही आगे रखे ।

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए कहा।

सभापर्व, अध्याय 20, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1737 नीति–व्यवहार
कृष्ण का अनुसरण

युधिष्ठिर उवाच

एवमेव यदुश्रेष्ठ यावत्कार्यार्थसिद्धये ।

अर्जुनः कृष्णमन्वेतु भीमोऽन्वेतु धनंजयम् ।

नयो जयो बलं चैव विक्रमे सिद्धिमेष्यति ॥

यदुश्रेष्ठ! इसी प्रकार समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये आपका आश्रय लेना परम आवश्यक है । अर्जुन आप श्रीकृष्णका अनुसरण करें और भीमसेन अर्जुनका । नीति, विजय और बल तीनों मिलकर पराक्रम करें तो उन्हें अवश्य सिद्धि प्राप्त होगी ।

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से कहा।

सभापर्व, अध्याय 20, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1737 नीति–व्यवहार