श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३

साधना–योग

अभ्यास, संयम और मन का निग्रह

39 पद्य

महाभारत — खण्ड ३

इन्द्रिय निग्रह का महत्त्व

विदुर उवाच

दृश्यन्ते हि महात्मानो बध्यमानाः स्वकर्मभिः ।

इन्द्रियाणामनीशत्वाद् राजानो राज्यविभ्रमैः ॥

इन्द्रियोंपर अधिकार न होनेके कारण बड़े-बड़े साधु भी अपने कर्मोंसे तथा राजालोग राज्यके भोग-विलासोंसे बँधे रहते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 34, श्लोक 69 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 270
धैर्य और समभाव

परमहंस उवाच

एतत् कार्यममराः संश्रुतं मे ।

धृतिः शर्मः सत्यधर्मानुवृत्तिः ।

ग्रन्थिं विनीय हृदयस्य सर्वं ।

प्रियाप्रिये चात्मसमं नयीत ॥

परमहंसने कहा — साध्यदेवताओ! मैंने सुना है कि धैर्य धारण, मनोनिग्रह तथा सत्य-धर्मोंका पालन ही कर्तव्य है; इसके द्वारा पुरुषको चाहिये कि हृदयकी सारी गाँठ खोलकर प्रिय और अप्रियको अपने आत्माके समान समझे ।

परमहंस ने साध्यदेवताओं से उनकी विद्वत्तापूर्ण उदार वाणी सुनाने के अनुरोध पर कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 36, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 290
शान्ति के उपाय

विदुर उवाच

नान्यत्र विद्यातपसोर्नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् ।

नान्यत्र लोभसंत्यागाच्छान्तिं पश्यामि तेऽनघ ॥

विदुरजी बोले — पापशून्य नरेश! विद्या, तप, इन्द्रियनिग्रह और लोभत्यागके सिवा और कोई आपके लिये शान्तिका उपाय मैं नहीं देखता ।

विदुरजी ने धृतराष्ट्र को शान्ति प्राप्त करने के मार्ग बताते हुए कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 36, श्लोक 51 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 298
भिक्षुक के लक्षण

विदुर उवाच

अरोषणो यः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।

प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः ।

निन्दाप्रशंसोपरतः प्रियाप्रिये ।

त्यजन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ॥

जो क्रोध न करनेवाला, लोष्ट, पत्थर और सुवर्ण को एक-सा समझनेवाला, शोकहीन, सन्धि-विग्रहसे रहित, निन्दा-प्रशंसासे शून्य, प्रिय-अप्रियका त्याग करनेवाला तथा उदासीन है, वही भिक्षुक (संन्यासी) है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 38, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 316 वैराग्य
कामनाओं का दमन

सनत्सुजात उवाच

सोऽभिध्यायन्नुत्पतितान् निहन्यादनादरेणाप्रतिबुध्यमानः ।

नैनं मृत्युर्मृत्युरिवात्ति भूत्वा ।

एवं विद्वान् यो विनिहन्ति कामान् ॥

(अतः जो मृत्युको जीतनेकी इच्छा रखता है,) उसे चाहिये कि परमात्माका ध्यान करके विषयोंको तुच्छ मानकर उन्हें कुछ भी न गिनते हुए उनकी कामनाओंको उत्पन्न होते ही नष्ट कर डाले । इस प्रकार जो विद्वान् विषयोंकी इच्छाको मिटा देता है, उसको [साधारण प्राणियोंकी] मृत्युकी भाँति मृत्यु नहीं मारती (अर्थात् वह जन्म-मरणसे मुक्त हो जाता है)

उद्योगपर्व, अध्याय 42, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 348

सनत्सुजात उवाच

निवृत्तेनैव दोषेण तपोव्रतमिहाचरेत् ।

एतद् धातृकृतं वृत्तं सत्यमेव सतां व्रतम् ॥

दोषैरेतैर्वियुक्तस्तु गुणैरेतैः समन्वितः ।

एतत् समृद्धमत्यर्थं तपो भवति केवलम् ॥

यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र संक्षेपात् प्रब्रवीमि ते ।

एतत् पापहरं पुण्यं जन्ममृत्युजरापहम् ॥

दोषोंको निवृत्त करके ही यहाँ तप और व्रतका आचरण करना चाहिये, यह विधाताका बनाया हुआ नियम है । सत्य ही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है । मनुष्यको उपर्युक्त दोषोंसे रहित और गुणोंसे युक्त होना चाहिये । ऐसे पुरुषका ही विशुद्ध तप अत्यन्त समृद्ध होता है । राजन्! तुमने जो मुझसे पूछा है, वह मैंने संक्षेपसे बता दिया । यह तप जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके कष्टको दूर करनेवाला, पापहारी तथा परम पवित्र है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 43, श्लोक 38–40 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 362
आन्तरिक आत्म-साक्षात्कार

सनत्सुजात → राजन

तूष्णीम्भूत उपासीत न चेष्टेन्मनसापि च ।

उपावर्तस्व तद् ब्रह्म अन्तरात्मनि विश्रुतम् ॥

वागादि इन्द्रियोंकी सब प्रकारकी चेष्टासे रहित होकर परमात्माकी उपासना करे, मनसे भी कोई चेष्टा न करे । राजन्! तुम भी अपने हृदयाकाशमें स्थित उस विख्यात परमेश्वरकी बुद्धिपूर्वक उपासना करो ।

उद्योगपर्व, अध्याय 43, श्लोक 59 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 366 भक्ति

सनत्सुजात → राजन

नैतद् ब्रह्म त्वरमाणेन लभ्यं ।

यन्मां पृच्छन्नतिहृष्यतीव ।

बुद्धौ विलीने मनसि प्रचिन्त्या ।

विद्या हि सा ब्रह्मचर्येण लभ्या ॥

सनत्सुजातने कहा — राजन्! तुम जो मुझसे बारंबार प्रश्न करते समय अत्यन्त हर्षित हो उठते हो, सो इस प्रकार जल्दबाजी करनेसे ब्रह्मकी उपलब्धि नहीं होती । बुद्धिमें मनके लय हो जानेपर सब वृत्तियोंका विरोध करनेवाली जो स्थिति है, उसका नाम है ब्रह्मविद्या और वह ब्रह्मचर्यका पालन करनेसे ही उपलब्ध होती है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 44, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 368 ज्ञान–विवेक
ब्रह्मचर्य का प्रथम चरण

सनत्सुजात उवाच

गुरुं शिष्यो नित्यमभिवादयीत ।

स्वाध्यायमिच्छेच्छुचिरप्रमत्तः ।

मानं न कुर्यान्नादधीत रोषमेष प्रथमो ब्रह्मचर्यस्य पादः ॥

ब्रह्मचारी शिष्यको चाहिये कि वह नित्य गुरुको प्रणाम करे, बाहर-भीतरसे पवित्र हो प्रमाद छोड़कर स्वाध्यायमें मन लगावे, अभिमान न करे, मनमें क्रोधको स्थान न दे । यह ब्रह्मचर्यका पहला चरण है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 44, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 370 गुरु महिमा
ब्रह्मचर्य का प्रभाव

सनत्सुजात → राजन

य आश्रयेत् पावयेच्चापि राजन् ।

सर्वं शरीरं तपसा तप्यमानः ।

एतेन वै बाल्यमभ्येति विद्वान् ।

मृत्युं तथा स जयत्यन्तकाले ॥

राजन्! जो इस ब्रह्मचर्यका आश्रय लेता है, वह ब्रह्मचारी यम-नियमादि तपका आचरण करता हुआ अपने सम्पूर्ण शरीरको भी पवित्र बना लेता है तथा इससे विद्वान् पुरुष निश्चय ही अबोध बालककी भाँति राग-द्वेषसे शून्य हो जाता है और अन्त समयमें वह मृत्युको भी जीत लेता है ।

सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र से कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 44, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 372 वैराग्य

सनत्सुजात उवाच

तूष्णीमेक उपासीत चेष्टेत मनसापि न ।

तथा संस्तुतिनिन्दाभ्यां प्रीतिरोषौ विवर्जयेत् ॥

इसलिये सब प्रकारकी चेष्टासे रहित होकर एकान्तमें उपासना करे, मनसे भी कोई चेष्टा न होने दे तथा स्तुतिमें राग और निन्दामें द्वेष न करे ।

उद्योगपर्व, अध्याय 45, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 378

विदुर उवाच

कर्मणाऽऽचरितं पूर्वं सद्भिराचरितं च यत् ।

तदेवास्थाय मोदन्ते दान्ताः शमपरायणाः ॥

जो कर्तव्य कर्मोंद्वारा आचरित है तथा पहलेके साधुपुरुषोंके द्वारा जिसका आचरण किया गया है, उसे अपनाकर शम-दमसे सम्पन्न पुरुष सदा आनन्दमग्न रहते हैं ।

उद्योगपर्व, अध्याय 63, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 512 धर्म–आचरण
इन्द्रिय निग्रह का महत्व

संजय उवाच

नाकृतात्मा कृतात्मानं जातु विद्याज्जनार्दनम् ।

आत्मनस्तु क्रियोपायो नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् ॥

संजयने कहा — महाराज! जिसने अपने मनको वशमें नहीं किया है, वह कभी नित्यसिद्ध परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको नहीं पा सकता । अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें किये बिना दूसरा कोई कर्म उन परमात्माकी प्राप्तिका उपाय नहीं हो सकता ।

सञ्जय ने धृतराष्ट्र को परममोक्ष प्राप्त करने के मार्ग के विषय में बताते हुए कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 69, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 533 ज्ञान–विवेक
तत्त्वज्ञान के तीन आधार

संजय उवाच

इन्द्रियाणामुदीर्णानां कामत्यागोऽप्रमादतः ।

अप्रमादोऽविहिंसा च ज्ञानयोनिरसंशयम् ॥

विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन्द्रियोंकी भोग-कामनाओंका पूर्ण सावधानीके साथ त्याग कर देना, प्रमादसे दूर रहना तथा किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना — ये तीन निश्चय ही तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिमें कारण हैं ।

सञ्जय ने धृतराष्ट्र को परममोक्ष प्राप्त करने के मार्ग बताते हुए कहा।

उद्योगपर्व, अध्याय 69, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 534 ज्ञान–विवेक

संजय → राजन

अप्राप्यः केशवो राजन्निन्द्रियैरजितैर्नृभिः ।

आगमाधिगमाद् योगाद् वशी तत्त्वे प्रसीदति ॥

राजन्! मनुष्य अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किये बिना भगवान् श्रीकृष्णको नहीं पा सकते । जिसने शास्त्रज्ञान और योगके प्रभावसे अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें कर रखा है, वही तत्त्वज्ञान पाकर प्रसन्न होता है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 69, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 534 ज्ञान–विवेक

वैशम्पायन उवाच

अविजित्य य आत्मानममात्यान् विजिगीषते ।

अमित्रान् वाजितामात्यः सोऽवशः परिहीयते ॥

जो पहले अपने मनको न जीतकर मन्त्रियोंको जीतनेकी इच्छा करता है अथवा मन्त्रियोंको जीते बिना शत्रुओंको जीतना चाहता है, वह विवश होकर राज्य और जीवन दोनोंसे वंचित हो जाता है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 129, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 841

वैशम्पायन उवाच

आत्मानमेव प्रथमं द्वेष्यरूपेण योजयेत् ।

ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ॥

अतः पहले अपने मनको ही शत्रुके स्थानपर रखकर इसे जीते । तत्पश्चात् मन्त्रियों और शत्रुओंपर विजय पानेकी इच्छा करे । ऐसा करनेसे उसकी विजय पानेकी अभिलाषा कभी व्यर्थ नहीं होती है ।

उद्योगपर्व, अध्याय 129, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 842

वैशम्पायन उवाच

सततं निग्रहे युक्त इन्द्रियाणां भवेन्नृपः ।

ईप्सन्नर्थं च धर्मं च द्विषतां च पराभवम् ॥

अतः अर्थ, धर्म तथा शत्रुओंका पराभव चाहनेवाले राजाको सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखनेका प्रयत्न करना चाहिये ।

उद्योगपर्व, अध्याय 129, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 842

संजय उवाच

ब्रह्मलोकच्युताः सर्वे सर्वे सर्वेषु साधवः ।

तपस्तप्यन्ति ते तीव्रं भवन्ति ह्यूर्ध्वरेतसः ।

रक्षणार्थं तु भूतानां प्रविशन्ते दिवाकरम् ॥

वे सब लोग ब्रह्मलोकसे नीचे आये हुए पुण्यात्मा मनुष्य हैं । उन सबका सबके प्रति साधुतापूर्ण बर्ताव होता है । वे ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होते और कठोर तपस्या करते हैं । फिर समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये सूर्यलोकमें प्रवेश कर जाते हैं ।

भीष्मपर्व, अध्याय 7, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1271

श्रीभगवान् → अर्जुन

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते ।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥

इसलिये हे अर्जुन! नपुंसकताको मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती । हे परंतप! हृदयकी तुच्छ दुर्बलताको त्यागकर युद्धके लिये खड़ा हो जा ।

भीष्मपर्व, अध्याय 26, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1368
समत्व का योग

श्रीभगवान् उवाच

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

हे धनंजय! तू आसक्तिको त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धिमें समान बुद्धिवाला होकर योगमें स्थित हुआ कर्तव्यकर्मोंको कर, समत्व ही योग कहलाता है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 26, श्लोक 48 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1380
समत्व रूप योग

श्रीभगवान् उवाच

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।

तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥

समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनोंको इसी लोकमें त्याग देता है अर्थात् उनसे मुक्त हो जाता है । इससे तू समत्वरूप योगमें लग जा; यह समत्वरूप योग ही कर्मोंमें कुशलता है अर्थात् कर्मबन्धनसे छूटनेका उपाय है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 26, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1380
इन्द्रिय संयम और कर्मयोग

श्रीभगवान् → अर्जुन

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।

कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

किंतु हे अर्जुन! जो पुरुष मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियोंद्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग के आदर्श के विषय में कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 27, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1393 वैराग्य

श्रीभगवान् उवाच

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।

लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि ॥

जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे । इसलिये तथा लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू कर्म करनेको ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 27, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1398 कर्म–प्रारब्ध

श्रीभगवान् उवाच

तत्त्ववित् तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥

परंतु हे महाबाहो! गुणविभाग और कर्मविभागके तत्त्वको जाननेवाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता ।

भीष्मपर्व, अध्याय 27, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1399 ज्ञान–विवेक
अनासक्त कर्म का स्वरूप

श्रीभगवान् उवाच

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित् करोति सः ॥

जो पुरुष समस्त कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिका सर्वथा त्याग करके संसारके आश्रयसे रहित हो गया है और परमात्मामें नित्यतृप्त है, वह कर्मोंमें भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1414 वैराग्य

श्रीभगवान् उवाच

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

जो बिना इच्छाके अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थमें सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंसे सर्वथा अतीत हो गया है — ऐसा सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेवाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1414 वैराग्य

श्रीभगवान् उवाच

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।

यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥

जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है, जो देहाभिमान और ममतासे रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्माके ज्ञानमें स्थित रहता है — ऐसे केवल यज्ञसम्पादनके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1414 ज्ञान–विवेक

श्रीभगवान् उवाच

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।

आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥

किंतु हे धनंजय! जिसने कर्मयोगकी विधिसे समस्त कर्मोंका परमात्मामें अर्पण कर दिया है और जिसने विवेकद्वारा समस्त संशयोंका नाश कर दिया है, ऐसे वशमें किये हुए अन्तःकरणवाले पुरुषको कर्म नहीं बाँधते ।

भीष्मपर्व, अध्याय 28, श्लोक 41 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1418 ज्ञान–विवेक

श्रीभगवान् → अर्जुन

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।

योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥

परंतु हे अर्जुन! कर्मयोगके बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरद्वारा होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंमें कर्तापनका त्याग प्राप्त होना कठिन है? और भगवत्स्वरूपको मनन करनेवाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्माको शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1430 वैराग्य

श्रीभगवान् उवाच

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।

सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥

जिसका मन अपने वशमें है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरणवाला है और सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1430 ज्ञान–विवेक

श्रीभगवान् उवाच

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।

नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन् न कारयन् ॥

अन्तःकरण जिसके वशमें है, ऐसा सांख्ययोगका आचरण करनेवाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारोंवाले शरीररूप घरमें सब कर्मोंको मनसे त्यागकर आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1431 वैराग्य

श्रीभगवान् उवाच

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात् ।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥

जो साधक इस मनुष्यशरीरमें, शरीरका नाश होनेसे पहले-पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1433 काम–क्रोध–लोभ–मोह

श्रीभगवान् उवाच

प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।

विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥

बाहरके विषयभोगोंको न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रोंकी दृष्टिको भृकुटीके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपानवायुको सम करके,≠ जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं? – ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोधसे रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 29, श्लोक 27–28 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1434 वैराग्य

श्रीभगवान् उवाच

मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ।

शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।

आत्मसंस्थं मनःकृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥

संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको निःशेषरूपसे त्यागकर और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर । क्रम-क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे ।

भीष्मपर्व, अध्याय 30, श्लोक 24–25 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1446 ज्ञान–विवेक
मन का नियन्त्रण

श्रीभगवान् → अर्जुन

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; परंतु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्यसे वशमें होता है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मन के चञ्चल स्वभाव और उसे वश में करने के उपाय बताते हुए कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 30, श्लोक 35 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1448 वैराग्य
ब्रह्मज्ञान और योग

श्रीभगवान् उवाच

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥

परंतु जो पुरुष इन्द्रियोंके समुदायको भली प्रकार वशमें करके मन-बुद्धिसे परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको निरन्तर एकीभावसे (अभिन्नभावसे) ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं ।

श्रीभगवान् ने अर्जुन को योगियों की श्रेष्ठता बताते हुए कहा।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1556 भक्ति

श्रीभगवान् उवाच

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥

यदि मेरी प्राप्तिरूप योगके आश्रित होकर उपर्युक्त साधनको करनेमें भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदिपर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मोंके फलका त्याग क ।

भीष्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1558 वैराग्य
तपस्या और भक्ति का फल

भीष्म उवाच

तपसा नियतो देवं विधानं सर्वदेहिनाम् ।

ब्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च ।

योगभूतं परिचरन् केशवं महदाप्नुयात् ॥

जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर हो संयम-नियमका पालन करते हुए अमावास्या और पूर्णिमाको समस्त देहधारियोंके आश्रय, ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान् केशवकी आराधना करता है, वह परम पदको प्राप्त कर लेता है ।

भीष्मपर्व, अध्याय 67, श्लोक 19–20 महाभारत — खण्ड ३ पृ. 1911 भक्ति