श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १
काम–क्रोध–लोभ–मोह
भीतर के छह शत्रु
7 पद्य
महाभारत — खण्ड १
शमीक उवाच
स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् ।
चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ॥
तुम मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें तत्पर होकर जंगली कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए इस क्रोधको मिटाकर उत्तम आचरण करो; ऐसा करनेसे तुम्हारे धर्मकी हानि नहीं होगी ।
शमीक मुनि ने अपने पुत्र शृंगी को समझाते हुए कहा।
शमीक उवाच
क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम् ।
ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥
क्रोध प्रयत्नशील साधकोंके अत्यन्त दुःखसे उपार्जित धर्मका नाश कर देता है । फिर धर्महीन मनुष्योंको अभीष्ट गति नहीं मिलती है ।
शमीक मुनि ने अपने पुत्र शृंगी को समझाते हुए कहा।
सौति उवाच
जितेन्द्रियश्चात्मवांश्च मेधावी धर्मसेविता ।
षड्वर्गजिन्महाबुद्धिर्नीतिशास्त्रविदुत्तमः ॥
उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर मनको अपने वशमें कर रखा था । वे मेधावी तथा धर्मका सेवन करनेवाले थे । उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य — इन छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली थी । उनकी बुद्धि विशाल थी । वे नीतिके विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ थे ।
शुक्र उवाच
क्रुद्धस्य निष्फलान्येव दानयज्ञतपांसि च ।
तस्मादक्रोधने यज्ञस्तपो दानं महाफलम् ॥
न पूतो न तपस्वी च न यज्वा न च कर्मवित् ।
क्रोधस्य यो वशं गच्छेत् तस्य लोकद्वयं न च ॥
पुत्रभृत्यसुहृन्मित्रभार्या धर्मश्च सत्यता ।
तस्यैतान्यपयास्यन्ति क्रोधशीलस्य निश्चितम् ॥
यत् कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः ।
न तत् प्राज्ञोऽनुकुर्वीत न विदुस्ते बलाबलम् ॥
क्रोधीके यज्ञ, दान और तप-सभी निष्फल होते हैं । अतः जो क्रोध नहीं करता, उसी पुरुषके यज्ञ, तप और दान महान् फल देनेवाले होते हैं । जो क्रोधके वशीभूत हो जाता है, वह कभी पवित्र नहीं होता तथा तपस्या भी नहीं कर सकता । उसके द्वारा यज्ञका अनुष्ठान भी सम्भव नहीं है और वह कर्मके रहस्यको भी नहीं जानता । इतना ही नहीं, उसके लोक और परलोक दोनों ही नष्ट हो जाते हैं । जो स्वभावसे ही क्रोधी है, उसके पुत्र, भृत्स, सुहृद्, मित्र, पत्नी, धर्म और सत्य — ये सभी निश्चय ही उसे छोड़कर दूर चले जायँगे । अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ।
वैशम्पायन उवाच
तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः ।
मोहादैश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत ॥
वह सदा धर्मसे दूर रहता और पापकर्मोंपर ही दृष्टि रखता था । मोह और ऐश्वर्यके लोभसे उसके मनमें पापपूर्ण विचार भर गये थे ।
वैशम्पायनजी ने जनमेजय से दुर्योधन की मनोदशा का वर्णन किया।
गन्धर्व उवाच
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।
तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।
इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥
गन्धर्वने कहा — वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है । जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं । इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ।
गन्धर्व ने अर्जुन को बताया कि वसिष्ठ मुनि कौन हैं।
और्व उवाच
यो हि कारणतः क्रोधं संजातं क्षन्तुमर्हति ।
नालं स मनुजः सम्यक् त्रिवर्गं परिरक्षितुम् ॥
जो किसी कारणवश उत्पन्न हुए क्रोधको सह लेता है, वह मनुष्य धर्म, अर्थ और कामकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं होता ।
और्व ने पितरों से कहा।