श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण — २
भक्ति
प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध
18 पद्य
श्रीमद्भागवत महापुराण — २
श्रीभगवान् उवाच
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥
श्रीभगवान्ने कहा — दुर्वासाजी! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ । मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है । मेरे सीधे-सादे सरल भक्तोंने मेरे हृदयको अपने हाथमें कर रखा है । भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे ।
श्रीभगवान् ने दुर्वासाजी से कहा।
मयि निर्बद्धहृदयाः साधवः समदर्शनाः ।
वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा ॥
जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्यसे सदाचारी पतिको वशमें कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदयको प्रेम-बन्धनसे बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु भक्तिके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लेते हैं ।
भगवान ने दुर्वासाजी से कहा।
पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।
आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥
जो पुरुष अपने कानोंसे भगवान् श्रीरामका चरित्र सुनता है — उसे सरलता, कोमलता आदि गुणोंकी प्राप्ति होती है । परीक्षित्! केवल इतना ही नहीं, वह समस्त कर्म-बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ।
शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को भगवान् श्रीराम के चरित्र श्रवण के लाभ बताते हुए कहा।
आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं ।
योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः ॥
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं ।
गेहञ्जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥
उन्होंने कहा — हे कमलनाभ! अगाधबोध-सम्पन्न बड़े-बड़े योगेश्वर अपने हृदयकमलमें आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं । जो लोग संसारके कुएँमें गिरे हुए हैं, उन्हें उससे निकलनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र अवलम्बन हैं । प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपका वह चरणकमल, घर-गृहस्थके काम करते रहनेपर भी सदा-सर्वदा हमारे हृदयमें विराजमान रहे, हम एक क्षणके लिये भी उसे न भूलें ।
गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा।
सूत उवाच
य इदमनुशृणोति श्रावयेद् वा मुरारेश्चरितममृतकीर्तेर्वर्णितं व्यासपुत्रैः ।
जगदघभिदलं तद्भक्तसत्कर्णपूरं ।
भगवति कृतचित्तो याति तत्क्षेमधाम ॥
सूतजी कहते हैं — शौनकादि ऋषियो! भगवान् श्रीकृष्णकी कीर्ति अमर है, अमृतमयी है । उनका चरित्र जगत्के समस्त पाप-तापोंको मिटानेवाला तथा भक्तजनोंके कर्णकुहरोंमें आनन्दसुधा प्रवाहित करनेवाला है । इसका वर्णन स्वयं व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीने किया है । जो इसका श्रवण करता है अथवा दूसरोंको सुनाता है, उसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्ति भगवान्में लग जाती है और वह उन्हींके परम कल्याणस्वरूप धामको प्राप्त होता है ।
सूतजी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं।
हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः ।
स सर्वदृगुपद्रष्टा तं भजन् निर्गुणो भवेत् ॥
परन्तु परीक्षित्! भगवान् श्रीहरि तो प्रकृतिसे परे स्वयं पुरुषोत्तम एवं प्राकृत गुणरहित हैं । वे सर्वज्ञ तथा सबके अन्तःकरणोंके साक्षी हैं । जो उनका भजन करता है, वह स्वयं भी गुणातीत हो जाता है ।
न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भवः ।
वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः ॥
जिसके मनमें विषय-भोगकी इच्छा, कर्म-प्रवृत्ति और उनके बीज वासनाओंका उदय नहीं होता और जो एकमात्र भगवान् वासुदेवमें ही निवास करता है, वह उत्तम भगवद्भक्त है ।
त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठस्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात् ।
न चलति भगवत्पदारविन्दाल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्र्यः ॥
राजन्! बड़े-बड़े देवता और ऋषि-मुनि भी अपने अन्तःकरणको भगवन्मय बनाते हुए जिन्हें ढूँढ़ते रहते हैं — भगवान्के ऐसे चरणकमलोंसे आधे क्षण, आधे पलके लिये भी जो नहीं हटता, निरन्तर उन चरणोंकी सन्निधि और सेवामें ही संलग्न रहता है; यहाँतक कि कोई स्वयं उसे त्रिभुवनकी राज्यलक्ष्मी दे तो भी वह भगवत्स्मृतिका तार नहीं तोड़ता, उस राज्यलक्ष्मीकी ओर ध्यान ही नहीं देता; वही पुरुष वास्तवमें भगवद्भक्त वैष्णवोंमें अग्रगण्य है, सबसे श्रेष्ठ है ।
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः ।
जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम् ॥
राजन्! भगवान्की लीलाएँ अद्भुत हैं । उनके जन्म, कर्म और गुण दिव्य हैं । उन्हींका श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना तथा शरीरसे जितनी भी चेष्टाएँ हों, सब भगवान्के लिये करना सीखे ।
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम् ।
दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत् परस्मै निवेदनम् ॥
यज्ञ, दान, तप अथवा जप, सदाचारका पालन और स्त्री, पुत्र, घर, अपना जीवन, प्राण तथा जो कुछ अपनेको प्रिय लगता हो-सब-का-सब भगवान्के चरणोंमें निवेदन करना उन्हें सौंप देना सीखे ।
स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम् ।
भक्त्या संजातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम् ॥
राजन्! श्रीकृष्ण राशि-राशि पापोंको एक क्षणमें भस्म कर देते हैं । सब उन्हींका स्मरण करें और एक-दूसरेको स्मरण करावें । इस प्रकार साधन-भक्तिका अनुष्ठान करते-करते प्रेम-भक्तिका उदय हो जाता है और वे प्रेमोद्रेकसे पुलकित-शरीर धारण करते हैं ।
महर्षियों ने राजा निमि को उत्तर देते हुए कहा।
स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य ।
त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः ।
विकर्म यच्चोत्पतितं कथंचिद् ।
धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥
जो प्रेमी भक्त अपने प्रियतम भगवान्के चरण-कमलोंका अनन्यभावसे — दूसरी भावनाओं, आस्थाओं, वृत्तियों और प्रवृत्तियोंको छोड़कर-भजन करता है, उससे, पहली बात तो यह है कि पापकर्म होते ही नहीं; परन्तु यदि कभी किसी प्रकार हो भी जायँ तो परमपुरुष भगवान् श्रीहरि उसके हृदयमें बैठकर वह सब धो-बहा देते और उसके हृदयको शुद्ध कर देते हैं ।
योगीश्वर करभाजन ने राजा निमि से कहा।
सत्संगलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता ।
स वै मे दर्शितं सद्भिरंजसा विन्दते पदम् ॥
भक्तिकी प्राप्ति सत्संगसे होती है; जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्निध्यका अनुभव करता है । इस प्रकार जब उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतोंके उपदेशोंके अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपदको — वास्तविक स्वरूपको सहजहीमें प्राप्त हो जाता है ।
श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा।
संकीर्त्यमानो भगवाननन्तः ।
श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् ।
प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं ।
यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ॥
संकीर्तन किया जाय अथवा उनके प्रभाव, महिमा आदिका श्रवण किया जाय तो वे स्वयं ही हृदयमें आ विराजते हैं और श्रवण तथा कीर्तन करनेवाले पुरुषके सारे दुःख मिटा देते हैं — ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अन्धकारको और आँधी बादलोंको तितर-बितर कर देती है ।
सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं ।
न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम् ।
कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे ।
न ह्यर्पितं कर्म यदप्यनुत्तमम् ॥
वह निर्मल ज्ञान भी, जो मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन है, यदि भगवान्की भक्तिसे रहित हो तो उसकी उतनी शोभा नहीं होती । फिर जो कर्म भगवान्को अर्पण नहीं किया गया है — वह चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न हो-सर्वदा अमंगलरूप, दुःख देनेवाला ही है; वह तो शोभन — वरणीय हो ही कैसे सकता है?
ज्ञानविज्ञानभक्त्यङ्गचतुष्टयपरं वचः ।
मायामर्दनदक्षं च विद्धि भागवतं च तत् ॥
जो वाक्य ज्ञान, विज्ञान, भक्ति एवं इनके अंगभूत साधनचतुष्टयको प्रकाशित करनेवाला है तथा जो मायाका मर्दन करनेमें समर्थ है, उसे भी तुम श्रीमद्भागवत समझो ।
सूतजी ऋषिगणों से कहते हैं।
वर्षमासदिनानां तु विमुच्य नियमाग्रहम् ।
सर्वदा प्रेमभक्त्यैव सेवनं निर्गुणं मतम् ॥
जब वर्ष, महीना और दिनोंके नियमका आग्रह छोड़कर सदा ही प्रेम और भक्तिके साथ श्रवण किया जाय, तब वह सेवन ‘निर्गुण’ माना गया है ।
राजा परीक्षित् और शुकदेव के संवाद में जो भागवत का सेवन हुआ था, वह निर्गुण ही बताया गया है।
उभयोर्वैपरीत्ये तुतु रसाभासे फलच्युतिः ।
धनार्थिनस्तु संसिद्धिर्विधिसम्पूर्णतावशात् ।
कृष्णार्थिनोऽगुणस्यापि प्रेमैव विधिरुत्तमः ॥
पर धनार्थीको तो तभी सिद्धि मिलती है, जब उनके अनुष्ठानका विधि-विधान पूरा उतर जाय । श्रीकृष्णकी चाह रखनेवाला सर्वथा गुणहीन हो और उसकी विधिमें कुछ कमी रह जाय तो भी, यदि उसके हृदयमें प्रेम है तो, वही उसके लिये सर्वोत्तम विधि है ।