श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

धर्म–आचरण

कर्तव्य और सदाचरण

6 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

सात्त्विक भक्त की पहचान

कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् ।

यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः ॥

जो व्यक्ति पापोंका क्षय करनेके लिये, परमात्माको अर्पण करनेके लिये और पूजन करना कर्तव्य है — इस बुद्धिसे मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है ।

कपिल ने माता देवहूति से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 29, श्लोक 10 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 631 भक्ति
सच्ची साधुता

श्रीशुकदेव → परीक्षित

प्रतिजग्राह तद्वाढं नारदः साधुसम्मतः ।

एतावान् साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वरः स्वयम् ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित्! संतशिरोमणि देवर्षि नारदने ‘बहुत अच्छा’ कहकर दक्षका शाप स्वीकार कर लिया । संसारमें बस, साधुता इसीका नाम है कि बदला लेनेकी शक्ति रहनेपर भी दूसरेको किया हुआ अपकार सह लिया जाय ।

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 44 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1151
दया और सौहृद

तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।

आसुरं भावमुन्मुच्य यया तुष्यत्यधोक्षजः ॥

इसलिये तुमलोग अपने दैत्यपनेका, आसुरी सम्पत्तिका त्याग करके समस्त प्राणियोंपर दया करो । प्रेमसे उनकी भलाई करो । इसीसे भगवान् प्रसन्न होते हैं ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 24 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1324 सेवा–करुणा–विनय
भगवान् के कर्मयोग

तमीहमानं निरहङ्कृतं बुधं ।

निराशिषं पूर्णमनन्यचोदितम् ।

नॄन् शिक्षयन्तं निजवर्त्मसंस्थितं ।

प्रभुं प्रपद्येऽखिलधर्मभावनम् ॥

भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, इसलिये उनमें अहंकारका लेश भी नहीं है । वे सर्वतः परिपूर्ण हैं, इसलिये उन्हें किसी वस्तुकी कामना नहीं है । वे बिना किसीकी प्रेरणाके स्वच्छन्दरूपसे ही कर्म करते हैं । वे अपनी ही बनायी हुई मर्यादामें स्थित रहकर अपने कर्मोंके द्वारा मनुष्योंको शिक्षा देते हैं । वे ही समस्त धर्मोंके प्रवर्तक और उनके जीवनदाता हैं । मैं उन्हीं प्रभुकी शरणमें ।

श्रीशुकदेवजी परीक्षित को उपदेश देते हुए कहते हैं।

अष्टमस्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 16 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1427 ज्ञान–विवेक
अतिथि सत्कार और दान

दक्षिण गुरवे दद्यादृत्विग्भ्यश्च यथार्हतः ।

अन्नाद्येनाश्वपाकांश्च प्रीणयेत्समुपागतान् ॥

भुक्तवत्सु च सर्वेषु दीनान्धकृपणेषु च ।

विष्णोस्तत्प्रीणनं विद्वान्भुञ्जीत सह बन्धुभिः ॥

गुरु और ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणा देनी चाहिये । जो चाण्डाल आदि अपने-आप वहाँ आ गये हों, उन सभीको तथा दीन, अंधे और असमर्थ पुरुषोंको भी अन्न आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये । जब सब लोग खा चुकें, तब उन सबके सत्कारको भगवान्की प्रसन्नताका साधन समझते हुए अपने भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे ।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 16, श्लोक 55–56 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1551 सेवा–करुणा–विनय
असत्य का अधर्म

बलि उवाच

न ह्यसत्यात् परोऽधर्म इति होवाच भूरियम् ।

सर्वं सोढुमलं मन्ये ऋतेऽलीकपरं नरम् ॥

इस पृथ्वीने कहा है कि ‘असत्यसे बढ़कर कोई अधर्म नहीं है । मैं सब कुछ सहनेमें समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्यका भार मुझसे नहीं सहा जाता’

राजा बलि ने शुक्राचार्य जी के प्रति यह कहा।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 20, श्लोक 4 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1575