श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

6 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

पापी का विनाश

स्वतैन्यमानस्य रावणादीर्घदर्शिनः ।

अभिनन्दन्ति भूतानि विनाशे पापकर्मणः ॥

रावण! जब कोई अदूरदर्शी पापाचारी अपने कुकर्मों से मारा जाता है, उस समय उसका विनाश होने पर समस्त प्राणियोंको प्रसन्नता होती है ।

सीता ने रावण से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 13 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 93
अनुचित कर्मों का दोष

अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च ।

क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥

जो कर्म उचित उपायका अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्र के विपरीत होते हैं, वे पाप-कर्म उसी तरह दोषकी प्राप्ति कराते हैं, जैसे अपवित्र आभि-चारिक यज्ञों में होमे गये हविष्य ।

कामातुर रावण का यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्ण को क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 12, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 266 ज्ञान–विवेक
कर्म का महत्व

कर्म चैव हि सर्वेषां कारणानां प्रयोजनम् ।

श्रेयः पापीयसां चात्र फलं भवति कर्मणाम् ॥

सुखके साधनभूत जो त्रिवर्गं (धर्म, अर्थ एवं काम) हैं, उन सबका एकमात्र कर्म ही प्रयोजक है (क्योंकि जो कर्मानुष्ठानसे रहित है, उसका धर्मं, अर्थ अथवा काम कोई भी पुरुषार्थ सफल नहीं होता) । इसी तरह एक पुरुषके प्रयत्न से सिद्ध होनेवाले सभी शुभाशुभ व्यापारोंका फल यहाँ एक ही कर्ताको प्राप्त होता है (इस प्रकार जब परस्पर विरुद्ध होनेपर भी धर्म और कामका अनुष्ठान एक ही पुरुषके द्वारा होता देखा जाता है, तब तुम्हारा यह कहना कि केवल धर्म-का ही अनुष्ठान करना चाहिये, धर्मविरोधी कामका नहीं, कैसे संगत हो सकता है?)

महोदर ने रावण से कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 64, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 432
पापकर्म का फल

उत्से केनाभिपन्नस्य गर्हितस्याहितस्य च ।

कर्मणः प्राप्नुहीदानीं तस्याद्य सुमहत् फलम् ॥

अभिमानपूर्वक किये गये उन निन्दित और अहितकर पापकर्मका जो महान् फल है, उसे तू आज अभी प्राप्त कर ले ।

श्रीराम ने रावण से कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 103, श्लोक 16 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 584
कर्मों का फल

राजसंश्रयवश्यानां कुर्वतीनां पराशया ।

विधेयानां च दासीनां कः कुप्येद् वानरोत्तम ।

भाग्यवैषम्यदोषेण पुरस्तादुष्कृतेन च ।

मयैतत् प्राप्यते सर्व स्वकृतं ह्यपभुज्यते ।

मैवं वद महाबाहो देवी ह्येषा परा गतिः ॥

कपिश्रेष्ठ! ये बेचारी राजाके आश्रय में रहने के कारण पराधीन थीं । दूसरोंकी आज्ञासे ही सब कुछ करती थीं, अतः स्वामीकी आशाका पालन करनेवाली इन दासियोंपर कौन क्रोध करेगा? मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं था तथा मेरे पूर्वजन्मके दुष्कर्म अपना फल देने लगे थे, इसीसे मुझे यह सब कष्ट प्राप्त हुआ है; क्योंकि सभी प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका ही फल भोगते हैं, अतः महाबाहो! तुम इन्हें मारनेकी बात न कहो । मेरे लिये दैवका ही ऐसा विधान था ।

युद्धकाण्ड, अध्याय 113, श्लोक 38–40 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 618
कर्मफल की व्यवस्था

अपश्यत् स यमं तत्र देवमग्निपुरस्कृतम् ।

विधानमनुतिष्ठन्तं प्राणिनो यस्य यादृशम् ॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा, यमदेवता अग्निको साक्षीके रूपमें सामने रखकर बैठे हैं और जिस प्राणीका जैसा कर्म है, उसीके अनुसार फल देनेकी व्यवस्था कर रहे हैं ।

राक्षसराज ने यमलोक जाकर देखा कि यमदेवता अग्निको साक्षी रखकर जीवों को उनके कर्मों के अनुसार फल देने की व्यवस्था कर रहे हैं।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 2 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 721